वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 451–460

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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date पारिजातः ४२१ लक्षणाच्च वेदिकवर्णासिद्धिः " प्रत्यभिज्ञानादविप्रतिपत्तिप्रसङ्गाद् अनभ्युपगमाच्च । तेषाञ्चापौरुषेयत्वसाधने ते तुल्याः सर्वत्रेति किमनेन परिशेषितम् । तथा च सर्वो व्यवहारोऽपौरुषेयो न च सर्वोऽवितथ इति व्यर्थः परिश्रम इति, तदप्य-कोपालम्भनम्, नहि वैदिकैलौकिकेषु वैदिकेषु च वर्णेषु भेदोऽभ्युपेयते । उभयेषामप्यपौरुषेयत्वे दोषाभावात् । वर्णानित्यत्ववादिभिर्यद्वर्णानित्यत्वेन पौरुषेयत्वेन तद्द्वारा वेदे पौरुषेयत्वं सिषाधयिषितं तदेव वर्णनित्यत्वसाधनेन प्रतिक्षिप्यते । एवं पदानामपि लौकिकानां वदिकानां नित्यत्वेऽपि न हानिः । वाक्ये तु वैलक्षण्यं भवति । लौकिकानि वाक्यानि प्रमाणान्तरेणाथमुपलभ्य निर्मितानीति पौरुषेयाणि वदिकानि त तद्भिन्नानीत्यपौरुषेयाणि । लौकिकानि पूवानुपूर्वीनं रपेक्ष्येणाप्युच्चायन्तेऽतः प्रयमाच्चारितान्यपि भवन्ति, वेदिकानि तु न तथाभूतान्यतो न तानि तन्नेरपे क्ष्येणोच्चार्यन्तेऽतो न प्रथमोच्चारितानि कदापि भवन्ति तेनापौरुषेयाणि । ' अन्याविशेषे जातेऽपि तदनित्यत्वहेतुना । वेदानित्यत्वनिर्णीतेरह जातं निवारणम् ॥ ' यदयुक्तम्- ' वाक्यं न भिन्नं वर्णेभ्यो विद्यतेऽनुपलम्भनात् ' ( प्र ० वा ० ३।२४ ९ ) । नहि देवदत्तादि-पदवाक्येषु दकारादिप्रतिभासं मुक्त्वाऽन्यं प्रतिभासं बुद्धेः प्रथमो द्वितीयवर्णप्रतिभासवत्, न चाप्रतिभानं ग्रहणे ग्राह्यतयेष्टमस्त, अन्यद्वा शक्यमध्यव सातुमाकारान्तरवत् । ननु वर्णासंभवि अर्थप्रत्यायनलक्षणं कार्यं गमकमिति चेत्, स्याद्यदि तेषु वर्णेषु सत्स्वपि तत्कार्यं न स्यात् । यावान् वर्णसमुदायोऽर्थप्रतिपादनाय सङ्केतितस्तावताऽर्थप्रतीतिर्भवत्येवे-ति, तदव्य किश्चित्करम्, वनसेनादिवद्वर्णपदवाक्यादीनामभेदेऽपि भेदव्यवहारदर्शनात् । वर्णपदयोनित्यत्वेन तत्र और वेद में वर्णों की भिन्नता नहीं है । यदि भेद मान भी लिया जाय तो प्रत्यभिज्ञा की अविशेषता के कारण उनमें पुनः एकल्व की सिद्धि हो जायगी, इस तरह से भेद की प्रतीति न होने से वैदिक वर्ष सिद्ध न हो सकेंगे, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा के बल पर उनमें भेद की विप्रतिपत्तिसमाहित हो जायगी और ऐसा माना नहीं गया है । यदि उन्हीं की अपौरुषेयता सिद्ध करनी हैं तो वे तो सर्वत्र तुल्य हैं, तब इससे आपका क्या अभिप्राय सिद्ध हुआ? इस तरह से सारा व्यवहार अपौरुषेय और यथार्थ मानना पड़ेगा और वेदार्थ की अपौरुषेयता को सिद्ध करने के लिये किया गया आपका सारा परिश्रम ही व्यर्थ जायगा । ' किन्तु यह आक्षेप जिस बात को हम स्वीकार नहीं करते, उसकी कल्पना करके उठाया गया है । वैदिक गण लौकिक और वैदिक वर्णों में भेद कहीं मानते हैं | दोनों की अपौरुषेयता में भी कोई दोष नहीं है । वर्णों के अनित्य मानने वाले वर्णों की अनित्यता के कारण पौरुषेयता मानते हैं और इसी के आधार पर वेदों की भी पौरुषेयता सिद्ध करना चाहते हैं, किन्तु वर्णों की नित्यता सिद्ध करके उसी का समाधान किया जाता है । इसी तरह से लौकिक और वैदिक पदों की नित्यता में भी कोई हानि नहीं हैं । वाक्यों में अवश्य विलक्षणता मानी जाती है । लौकिक वाक्य प्रमाणान्तर से अर्थ को अवगति करके बाद में बनाये जाते हैं, अत: पौरुषेय हैं और वैदिक वाक्य प्रमाणान्तर से अवगत अर्थ के प्रतिपादक होने से afer area a free अपौरुषेय माने जाते हैं । लौकिक वाक्यों का उच्चारण पूर्व पूर्व आनुपूर्वी निरपेक्ष ( पहले पहले की आनुपूर्वी की अपेक्षा रक्खे बिना हो ) होता है, अतः इनका प्रथमोच्चारण भी होता है, वैदिक वाक्यों में ऐसी बात नहीं है, अतः इनका पूर्वानुपूर्वी निरपेक्ष उच्चारण नहीं होता और इसीलिये ये कभी प्रथमोच्चरित भी नहीं होते, इसीलिये ये अपौरुषेय होते हैं । इस तरह से-' लौकिक और वैदिक वर्णों की विशेषता ( समानता ) के रहने पर भी, उनकी अनित्यता के कारण वेद की अनित्यता को सिद्ध करने वाले ant का उचित निवारण हो जाता है । प्रमाणवार्तिक में यह भी कहा गया है कि ' वाक्य वर्ण अथवा पद से भिन्न नहीं है, क्योंकि इनके अतिरिक्त वाक्य की कोई उप for नहीं होती ' । देवदत्त आदि पदों और वाक्यों में दकार आदि के प्रतिभास को छोड़कर बुद्धि में दूसरा कोई प्रतिभास नहीं होता, जैसे कि पहले द्वितीय वर्ण का प्रतिभास नहीं होता । अप्रतिभास ग्रहण ( ज्ञान ) में ग्राह्यता ( शेष ) के रूप में भी नहीं रहता और न इसके अतिरिक्त वाक्य का कोई भिन्न आकार हो दिखाई देता है । वर्णों के द्वारा संभव न हो सकने वाला अर्थ का ज्ञान भी स्वतन्त्र वाक्य का अनुमान नहीं करा सकता, क्योंकि ऐसा तब हो यदि वर्णों के रहते हुए भी अर्थ का ज्ञान न हो । जितना वर्णसमुदाय अर्थ के प्रतिपादन के लिये संकेतित है, उतने से अर्थ को अवगति ( ज्ञान ) होती ही है ' । यह प्रतिपादन भी अकिचित्कर है । वन, सेता आदि की तरह पद और

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४२२ वेदार्थपारिजातः पुरुषस्वातन्त्र्याभावेऽपि पदसन्दर्भात्मके वाक्ये पुरुषस्वातन्त्र्यं सम्भवत्येव । प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य तद्विवक्षयाऽपूर्व-वाक्यनिर्माणदर्शनात् । वेदे तु वर्णपदानामिव वाक्यानामपि नित्यत्वमेव, तत्र वेदार्थस्य प्रमाणान्तरागोचरत्वात्, प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य यथेच्छं वाक्यनिर्माणासंभवात् । अत एव ' स्वर्गकामश्चेत्यं वन्देत ' इत्यादिवाक्यानामप्रामाण्य-मेव । न च वेदवत्प्रामाण्यं तस्य पौरुषेयत्वात्, सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वाभावात् । अन्ये तु न भवत्येव वर्णेभ्योऽर्थप्रतीतिः तेषामविशेषेऽपि पदवाक्यान्तरे सरो रस इत्यादावभावात् । न चाविशेषा सिद्धिरिति वाच्यम्, प्रत्यभिज्ञानात्तत्सिद्धेः । ननु प्रत्यभिज्ञानस्य व्यभिचारो दृश्यते, लूनपुनर्जातेषु केशेषु भिन्नेष्वपि सादृश्यग्रहणाद्विप्रलब्धस्य प्रत्यभिज्ञानम्, सादृश्यग्रहणञ्च सदृशस्य स्वरूपग्रहणम्, न त्वन्यसदृशग्रहणम्, वादिप्रतिवादिसम्मतस्य प्रत्यभिज्ञाननिदर्शनस्य चाभावः । न च प्रतिपदं वर्णैकत्वग्राहकं प्रत्यक्षं प्रत्यभिज्ञानं सम्भवति, पूर्वकालसम्बन्धित्वस्येदानीमसन्निहितत्वेनाग्रहणात्, ग्रहणे वा श्रोत्रज्ञानवत् स्पष्टप्रतिभास: स्यात् । न च भवति, तस्मात्र पूर्वकालवर्णग्राहकं प्रत्यभिज्ञानम्, दृश्यमानस्य चेदानीन्तनकालत्वात् । यश्चेदानीन्तनकालसम्बन्धी स्वभावः स कथं पूर्वकालसम्बन्धी, पूर्वापरकालयोः परस्परविरोधात् । सन्निहितविषयश्च प्रत्यक्षमिष्यते । न च वर्णस्य सन्निधान सम्भवति सांशत्वात् । अन्त्यवर्णभागकाले च पूर्ववर्णभागानामसत्त्वात् । तेन न वर्णेषु प्रतिपदमेकत्वग्राहकं प्रत्यक्ष-प्रत्यभिज्ञानं सम्भवति । तस्मात् स्थितमेतत् प्रतिवाक्यं भिन्ना एवं वर्णस्तिषामेव भेदादर्थप्रतीतेर्भेदः । ननु वर्णा निरर्थका इत्युक्तम्, कथं पुनस्तेषामेव भेदादर्थप्रतीतेर्भेदः? सत्यं सन्तो वर्णा निरर्थका विकल्पविषयास्तु सामान्यरूपा एव । प्रतिवाक्यं भिन्ना वर्णा वर्णस्वलक्षणाभेदेनाध्यस्ता वाचका इष्यन्ते, artat after रहने पर भी भेद - व्यवहार देखा जाता है । वर्ण और पद की नित्यता के कारण वहाँ पर पुरुष की स्वतन्त्रता न रहने पर भी पसन्दर्भात्मक वाक्य में पुरुष की स्वतन्त्रता संभव ही है, क्योंकि वह प्रमाणान्तर से अर्थ की अवगति करके उसको जब करना चाहता है, तो वह एक नये वाक्य का निर्माण करता देखा जाता है । वेद में तो वर्ण और पद की तरह वाक्य भी नित्य हैं, क्योंकि यहाँ पर वेदार्थ की प्रमाणान्तर से अवगति नहीं होती, अतः प्रमाणान्तर से अर्थ को जानकर यथेच्छ वाक्य निर्माण की यहाँ संभावना ही नहीं रहती । इसीलिये ' स्वर्ग की कामना वाला चैत्य की बन्दना करे ' इत्यादि वाक्य अप्रमाण हो माने जाते हैं । इन वाक्यों में वेद वाक्यों की तरह प्रामाण्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि सम्प्रदाय की अविच्छिन्नता के साथ अस्मर्यमाणकर्तृकता का यहाँ अभाव है । अन्य दार्शनिकों का कहना है कि वर्णों से अर्थ की प्रतीति नहीं होती, क्योंकि सर, रस आदि पदान्तर और वाक्यान्तर में उन्हीं वर्णों के रहते हुए भी अर्थ की एक सी प्रतीति नहीं होती । यहाँ पर वे ही वर्ण हैं, यह नहीं सिद्ध किया जा सकता, सो बात भी नहीं है, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा के बल से उनकी विशेषता ( समानता ) सिद्ध हो जाती है । प्रश्न है कि प्रत्यभिज्ञा का प्रामाण्य अन्यभिचरित नहीं है, क्योंकि केशों को काट लेने पर वे फिर उग आते हैं और वहाँ पर भी ये वही केश हैं, इस तरह की प्रत्यभिशा होती है, जो कि गलत है । यहाँ पर व्यक्ति सादृश्य ग्रहण के कारण भ्रम में पड़ जाता है । सादृश्य ग्रहण का अर्थ है सदृश का स्वरूप ग्रहण, अन्य सदृश का स्वरूप ग्रहण नहीं । वादी और प्रतिवादी दोनों जिसमें सहमत हों, इस तरह का कोई उदाहरण प्रत्यभिज्ञा का नहीं मिलता । प्रत्येक पद में वकत्व का ग्राहक प्रत्यक्ष या प्रत्यभिज्ञान नहीं होता । पूर्वकाल के साथ संबद्ध वस्तु का इस काल में ग्रहण संभव नहीं है | यदि ग्रहण होता हो तो उसका श्रोत्र ज्ञान के समान स्पष्ट प्रतिभास होना चाहिये, ऐसा होता नहीं, इसलिये पूर्वकाल के वर्ण का ग्राहक प्रत्यभिज्ञान नहीं होता । जो दिखाई देता है, उसका इस काल से संबन्ध है । जो स्वभाव इस काल से संबद्ध है, उसका पूर्वकाल से संबन्ध कैसे हो सकता है, क्योंकि ये दोनों काल परस्पर विरोधी हैं । प्रत्यक्ष में विषय का संविधान आवश्यक है । वर्णों की सांता ( सावयवता ) के कारण उनका संविधान नहीं बन सकता । अन्तिम वर्ण भाग के उच्चारण के समय उसके पूर्व भागों की स्थिति नहीं रहती । अतः वर्णों में प्रत्येक पद में उनकी एकता का ग्राहक न तो प्रत्यक्ष ही बन सकता है और न प्रत्यभिज्ञान ही । ऐसी परिस्थिति में यही मानना पड़ेगा कि प्रत्येक वाक्य में free - f भन्न वर्ण हैं और इनके भेद के रहने से ही अर्थ की प्रतीति भिन्न - भिन्न तरह से होती है । है कि ' ant at तो निरर्थक माना गया है, तब उनके भेद से अर्थ की प्रतीति का भेद कैसे हो सकेगा? यह ठीक है fe वर्ण निरर्थक हैं, ऐसा पहले कहा जा चुका है, फिर उनके भेद से अर्थ के ज्ञान में भेद कैसे होगा? वास्तव में वर्ण दो तरह के हैं, एक

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वैवार्थपारिजातः ४२३ तेन वर्णानां भेदादर्थप्रतीतेर्भेद इत्युच्यते । यदि तु वर्णभेदादर्थप्रतीतेर्भेदो नेष्यते, किन्तु वर्णाविशेषेऽपि वाक्यभेदात्प्रतीतिभेदः, स एव कार्यभेदः । सा चार्थप्रतीतिर्वाक्याद्भवेत् । तत्र वाक्यमतीन्द्रियम्, वर्णव्यतिरेकेण बुद्धावप्रतिभासात् । तथा च सम्बन्धाग्रहात् वाक्यात्तदप्रतीतिरेव ( अत्र वर्णविशेषेऽपि वाक्याभेदादिति मूलमशुद्धम् ) । सनिधिमात्रेण जननेऽव्युत्पन्नस्यापि स्यात् । तस्मान्न वाक्यं नाम किचिदर्थान्तरं वर्णेभ्यो यस्यापौरुषेयत्वं साध्येत । तदभावाद्वेदाविशिष्टवर्णापौरुषेयत्वमपि प्रथमपक्षे प्रत्युक्तमिति चेन्न, प्रमाणान्तरेण प्रत्यभिज्ञातस्य बाधानुपपत्तेः । न च लूनपुनर्जातकेशज्वालादिवत् सादृश्यनिबन्धनं प्रत्यभिज्ञानमित्युक्तमेवेति वाच्यम्, केशादिष्विवात्र बलवद्वावकाभावात् । क्वचिद् व्यभिचारदर्शने तदुत्प्रेक्षायां सर्वव्यवहारबाधप्रसङ्गः । तदुक्तम् -- उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादजातमपि बाधनम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा क्षयं व्रजेत् ॥ ' किश्व, सादृश्यग्रहण निबन्धनं प्रत्यभिज्ञानमिति बदता सादृश्यग्रहणमुपपादनीयम्, तच्च नोपपद्यते, क्षणिकस्य ग्रहीतुरर्थतत्सादृश्यग्रहणासंभवात् । न च सदृशमित्येव ग्रहीतुं शक्यते, सदृशस्य भेदादिवत्प्रतियोग्यनुयोगिग्रहसापेक्षत्वात् । तथा चाबाधितप्रत्यभिज्ञानेन वर्णेकत्व सिद्धिनिष्प्र-त्यूदेव | अत एवानिदर्शनमपि सिद्धमेव । भेदप्रत्ययस्तु परोपाधिक इत्यादि प्रपञ्चितमधस्तात्, ध्वनिकृतोऽयं विशेष इत्युक्तमेव । एवं पक्तिर्वनं सेना शतं सहस्रमित्यादिवद् बहुषु वर्णेष्वेवैकार्थाऽवच्छेदेनौपचारिकी पदवाक्यादिबुद्धिः । यथा गजपदातितुरगादिषु चम्पकाशोक कशुकादिषु केनचिदेकेनोपाधिना वनसेनादिप्रत्ययस्तथैव प्रत्येकवर्णानुभव-जनितभावनानिचयलब्धजन्मनि निखिलवर्णावगाहिनि स्मृतिरूपे एकस्मिन् ज्ञाने भासमानानां वर्णानामेकज्ञान-सत्स्वरूप और दूसरे विकल्पात्मक | इनमें से पहले निरर्थक ही हैं, किन्तु विकल्पात्मक वर्ण सामान्य स्वरूप के होते हैं । प्रत्येक वाक्य में fe वर्ण वर्णों के स्वलक्षण से अभिन्न से प्रतोत होते है, तब उनकी वाचकता मानी जाती है । इसीलिये वर्णों के भेद से अर्थ भेद की प्रतीति की बात कही जाती है । वर्णों के भेद से यह अर्थ की प्रतीति का भेद नहीं माना जाता, किन्तु वर्णों की अविशेषता के रहते भी वाक्यभेद से प्रतीतिभेद माना जाता है, इसी को कार्यभेद कहा जाता है और यह भिन्न अर्थप्रतीति वाक्यभेद के कारण मानी जाती हैं, यह वाक्यभेद अतीन्द्रिय माना जाता है, क्योंकि वर्णों से भिन्न रूप में इसका बुद्धि ( ज्ञान ) में प्रतिभास नहीं होता । इस तरह से संबन्ध के ज्ञात न होने से वाक्य से अर्थ की प्रतीति नहीं ही बन सकेगी । ( यहाँ पर बौद्ध ग्रन्थ के मूल में ' वर्णविशेषेऽपि वाक्याभेदात् ' ऐसा पाठ दिया गया है, जो कि अशुद्ध है ) । संनिधिमात्र से अर्थप्रतीति मानने पर अव्युत्पन्न ( संकेत ज्ञान से रहित ) व्यक्ति में भी इसको मानना पड़ जायगा । इस तरह से वाक्य वर्णों से अतिरिक्त कोई अर्थान्तर ( भिन्न वस्तु ) नहीं है, जिसकी कि अपौरुषेयता सिद्ध की जा सके । इसके अभाव में वेदाविशिष्ट वर्णों की अपौरुषेयता भी प्रथम पक्ष में न बन सकेगी ' । इस प्रश्न का समाधान इस प्रकार से है कि प्रमाणान्तर से प्रत्यभिज्ञान का बाध नहीं हो सकता । लूनपुनर्जात ( काटने के बाद फिर उगे हुए ) केश की भांति तथा ज्वाला से ज्वालान्तर की भाँति यह प्रत्यभिज्ञान सादृश्यमूलक है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि केश आदि की तरह यहाँ पर बलवान् बाधक का अभाव है । कहीं Before देखकर सभी स्थानों में उसकी कल्पना कर लेने पर सारे व्यवहारों के विलोप का प्रसंग उठ खड़ा होगा । जैसा कि बार - बार कहा गया है -- ' जो व्यक्ति अज्ञानवश बाध के न रहते हुए भी उसकी कल्पना कर लेता है, ऐसा संशयात्मा व्यक्ति सभी व्यवहारों में मुँह ताकता रह जाता है और अन्त में नष्ट हो जाता है ' । आप कहते हैं कि प्रत्यभिज्ञान सादृश्यग्रहण निबन्धन है । आप इस सादृश्यग्रहण का उपपादन कीजिये । इसका उपपादन आप कर नहीं सकते, क्योंकि आपका क्षणिक ग्रहीता अर्थ और उसके सादृश्य दोनों को ग्रहण नहीं कर सकता । केवल सदृश का ग्रहण हो नहीं सकता, क्योंकि सदृश की प्रतीति अपने से विसदृश की प्रतियोगिनी और साथ ही सदृश की अनुयोगिनी होती है | इस तरह से अबाधित प्रत्यभिज्ञा से वर्ण की एकता की सिद्धि निष्प्रत्यूह ( निर्विघ्न ) हो जाती है । इसीलिये निदर्शन ( दृष्टान्त ) भी सिद्ध हो जाता है । भेद की प्रतीति नोपाधिक है, इस बात को पहले ही विस्तार से बता दिया गया है कि यह विशेषता ध्वनि के कारण है । इसी तरह से पंक्ति, वन, सेना, शत, सहस्र इत्यादि की तरह वर्णों में भी एकार्थावच्छेदेन एक पद, एक वाक्य after it trafts ( ण ) बुद्धि बन सकती हैं । जैसे गज, पदाति, तुरंग प्रभुति में और चम्पक, अशोक, किशुक प्रभृति में किसी एक उपाधि सेवन, सेना आदि का प्रत्यय होता है, उसी तरह से प्रत्येक वर्ण के अनुभव से जनित भावनासमूह से उत्पन्न हुए निखिल वर्णों

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४२४ वार्थपारिजातः विषयतया वैकार्थधीहेतुतया वैकपदवाक्यत्वादिव्यवहार उपपद्यत एव । स्फोटवादिमतरीत्या तु वर्णेभ्यो व्यतिरिक्तेः पदवाक्यादिस्फोटैरेवार्थप्रतीतिसिद्धिः । न च स्फोटस्यातीन्द्रियत्वम्, श्रौतप्रत्यये प्रतिभासमानस्य तस्य प्रत्यक्षत्वात् । न च वर्णाः प्रत्यक्षमुपलभ्यमाना अपि न प्रत्यक्षाः, कथमभासमानोऽपि स्फोटः प्रत्यक्ष इति चेदुच्यते- न ब्रूमो वर्णा न प्रत्यक्षा इति, किन्तु तेऽसन्तोऽप्यु-पाधिवशाद्वदनदैर्घ्यादिवदवभासन्ते । शब्दस्त्वेको निरवयवः प्रतीयते । तथा च पदमिति वाक्यमित्येकाकारप्रतीतिरस्ति । न च भिन्ना वर्णास्तस्यामालम्बनीभवन्ति । नहि सामान्यप्रत्ययो व्यक्त्यालम्बनोऽवयविप्रत्ययो वाऽवयवालम्बनो भवति । न च पदवाक्यबुद्धिरयथार्था, बाधकाभावात् । अन्यत्तु पूर्वमेव समाहितम् । ' स्फोटात्मकस्य वाक्यस्य सिद्धत्वादिह सर्वतः । वाक्यं वर्णातिरिक्तं हि तत एवाभिधीयते ॥ वर्णात्मताया वाक्यस्य स्वीकृतावप्यसंशयम् । वनसेनादिवत्तस्या-पौरुषेयत्वमिष्यते ॥ नित्यानां व्यापकानान्च क्रमवत्त्वं न सम्भवि । वर्णानां पदवाक्यत्वनिष्पत्तिस्तेन दुर्घटा || क्रमवत्त्व-प्रसिद्धयर्थं वर्णव्यक्तय आश्रिताः । कण्ठताल्वादिनिष्पन्ना पौर्वापयं हि कालिकम् ॥ आनुपूर्व्यास्तु निर्माणं पौरुषेयत्व-मिष्यते । स्वातन्त्र्येणान्ययान्यत् स्यादिति वेदविदो विदुः ॥ ' यदप्युक्तम्- ' वाक्यमनेकावयवं स्यादनवयवं वा? ' अनेकाङ्गिकतात्मत्वे पृथक् तेषां निरर्थता । अतद्रूपे च ताद्रूप्यं कल्पितं सिंहतादिवत् ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।२४ ९ -२५० ) । अनेकावयवात्मत्वे तेषामवयवानां पृथग् नैरर्थक्यमेव! anti cet तत्समुदायात्मकस्य वाक्यस्याप्यानर्थक्यमेव । अर्थवानेवात्मा ( वाचकस्वभाव ) एव वाक्यम् । ते च वाक्या-वयवाः स्वयमनर्थकाः । तेष्ववयवेषु स आत्मा सिंहतादिवत् कल्पित एव । तेन तस्य पौरुषेयत्वमेव, पुरुषकल्पितत्वात् । का अवगाहन करने वाले एक स्मृति रूप ज्ञान में भासमान वर्णों का एक ज्ञान के विषय होने से अथवा एक अर्थ का ज्ञान कराने से एक पद, एक वाक्य के रूप में व्यवहार बन ही सकता है । स्फोटवादी के मत के अनुसार तो वर्णों से अतिरिक्त पदस्फोट, वाक्यस्फोट आदि से ही अर्थ की प्रतीति सिद्ध हो जाती है । स्फोट को अतीन्द्रिय नहीं माना जाता श्रोत प्रत्यय ( शब्दजन्य ज्ञान ) में प्रतिभासमान होने से वह प्रत्यक्ष माना जाता है । वर्णों को प्रत्यक्ष प्रतीति होने पर भी उनका प्रत्यक्ष नहीं माना जाता और स्फोट भासमान नहीं है, तब भी उसकी प्रत्यक्षता मानी जाती है, ऐसा क्यों? इसका उत्तर यह है कि हम यह कहाँ कहते हैं कि वर्ण प्रत्यक्ष नहीं है, हमारा केवल इतना ही कहना है कि इनकी कोई सत्ता नहीं है, तो भी उपाधि के भेद से जैसे मुँह को दर्पण आदि में दीर्घता प्रभृति विभिन्न आकारों की प्रतीति होती है, उसी तरह से वर्णों की भी औपाधिक प्रतीति होती है । शब्द तो एक और निरवयव हो प्रतीत होता है । इसीलिये यह पद है, यह वाक्य है, इस तरह की एकाकार प्रतीति होती है । इसमें भिन्न - भिन्न वर्ण आलम्बन नहीं हो सकते । सामान्य ( जाति ) का प्रत्यय ( ज्ञान ) व्यक्ति पर लम्बित और अवयवी का प्रत्यय अवयवों पर आलम्बित नहीं माना जा सकता । पद बुद्धि ( ज्ञान ) और वाक्य बुद्धि अयथार्थ ( मिया ) नहीं मानी जा सकती, क्योंकि इन प्रतीतियों का अन्य कोई बाधक प्रत्यय उपलब्ध नहीं है । अन्य शंकाओं का समाधान पहले ही किया जा चुका है । संक्षेप में इस पूरे विषय को इस प्रकार प्रदर्शित किया जा सकता है-- ' इस तरह से सभी प्रकार ' वाक्य की स्फोटात्मकता सिद्ध हो जाती है । इसीलिये वाक्य को वर्णों से भिन्न माना जाता है । वाक्य को वर्णात्मकता स्वीकार करने पर भी निःसन्देह वन, सेना आदि की बुद्धि की तरह उसकी अपौरुषेयता ही मानी जाती है । नित्य और व्यापक वर्णों में क्रमवत्ता नहीं रह सकती । इस तरह से वर्णों से पद और वाक्य की निष्पत्ति नहीं हो सकती । इस क्रमवत्ता की सिद्धि के लिये वर्ण व्यक्ति का आश्रय लेना पड़ता है, जिनकी fe निष्पत्ति कण्ठ तालु प्रभृति से होने के कारण उनमें कालिक पूर्वापरमाव की प्रतीति होती है । इस आनुपूर्वी के निर्माण में पौरुषेयता मानी जाती है । अन्यथा सर्वत्र स्वातन्त्र्य मानने पर सबकी अपौरुषेयता ही माननी पड़ जायगी ' । आप पूछते हैं कि ' वाक्य अनेक अवयव वाला है या निरवयव '? यदि वह अनेकावयव है तो वाक्य के उन प्रत्येक अवयवों की अर्थात् पदों की निरर्थकता माननी पड़ेगी । अब यदि आप मानें कि अवाचक रूप में वाचकत्व कल्पित है, जैसे कि माणवक ( बच्चा ) में सिंता ( सिंह के समान निर्भीकता ) आदि कल्पित होती है, तो वाचकता में पौरुषेयता माननी पड़ जायगी ' । वाक्य की अनेकावयवता मैं उसके अवयवों की अलग से कोई उपयोगिता न होने से निरर्थकता माननी पड़ेगी । वर्णों को इस रूप में मानने पर वर्णसमुदायात्मक

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der पारिजात: ४२५ ' प्रत्येकं सार्थकत्वेऽपि मिथ्यानेकत्वकल्पना | एकावयवगत्या च वाक्यार्थप्रतिपद्भवेत् ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।३५०-३५१ ) । परिसमाप्तार्थं हि शब्दस्वरूपं वाक्यम्, ते चावयवास्तथाविधाः पृथक् पृथगिति ते प्रत्येकं वाक्यम् । तथा च नानेकावयवं वाक्यम् । एकावयवप्रतिपत्त्या च वाक्यार्थप्रतिपत्तेरवयवान्तरापेक्षा कालक्षेपश्च न स्यात् । तस्य निष्कलात्मनः क्षणेन प्रतिपत्तेरेकज्ञानोत्पत्ती च निःशेषावगमादिति, तदपि भ्रान्तिनिबन्धनम्, रत्नपरीक्षणे प्रथमातिरिक्तदर्शनानामिव वाक्यार्थवंश प्रथमातिरिक्तावयवानां प्रयोगे बाधाभावात् । तदुक्तमेव भर्तृहरिणा - सर्वेषां पृथगवयवानां सर्वेषु प्रतिशब्दं कृत्स्नार्थपरिसमाप्तिः । तथा यदेव प्रथमं पदमुपादीयते तस्मिन् सर्वरूपार्थोपग्राहिणि नियमानुवादनिबन्धनानि पदान्तराणि विज्ञायन्ते । अत एव ' प्रत्येकं सार्थकत्वेऽपि सार्थानेकत्वकल्पना । वैशद्याय गिरां तद्वद् रानिकानेकदृष्टिवत् ॥ ' सावयवपदवाक्यादिपक्षे कश्चिदवयवः कारकविशेषस्याभिधायकोऽन्यश्च क्रियाविशेषस्याभिधायक इति वाक्यावयवानां प्रत्येकं सार्थकत्वात् सकलमित्यपि युक्तम् । ननु क्रियाविशेषान्वितस्य कारकविशेषस्याभिधानं न कर्तुं शक्यत इति चेत्, तात्पर्यशक्त्याऽन्वितप्रतीत्युपपत्तेः । समुदितः पदैरेको वाक्यार्थः प्रत्याय्यते स च गुणभूतेतरपदार्थसंसृष्टः कश्चित्पदार्थ एवेति किमत्र संकुलम् । अन्वितमर्थं पदानि संहत्य सम्पादयन्ति न त्वम्वितमभिदधति । ननु कि पदानि वाक्यार्थं घटादिकं मृदादीनीव कुर्वन्तीति चेन्न तेषां ज्ञापकत्वात् । कथं तहि पदानि संहत्यकारीणि न चान्वित-art की निरर्थकता हो जायगी । वाक्य की आत्मा अर्थवत्ता ही है, उसका वाचक स्वभाव ही है । इसके अवयव अनर्थक होते हैं । इन अवयवों में वाचकता माणवक में सिंहता की तरह कल्पित है, अतः इसको पौरुषेय ही मानना पड़ेगा, क्योंकि यह पुरुषकल्पित है | ' यदि प्रत्येक अवयव की सार्थकता मानी जाती है तो अनेक अवयवों की कल्पना मिथ्या हो जायगी, क्योंकि एक अवयव से ही अर्थ की प्रतीत हो जायगी तो अन्य अवयवों की उपयोगिता कहाँ रह जायगी और एक अवयव की अर्थ प्रतीति हो जाने से पूरे वाक्य का अर्थ-बोध मान लेना पड़ेगा, क्योंकि इस पद्धति से एक अवयव में भी वाचकता विद्यमान है | शब्द का वह स्वरूप वाक्य कहा जाता है, जिसमें कि अर्थ की पूर्णता विद्यमान रहती है । इन अवयवों में प्रत्येक की बाचकता यदि मानते हैं तो उनमें अलग - अलग रूप से भी उक्त लक्षण की विद्यमानता के कारण वाक्यता माननी पड़ेगी । इस तरह से वाक्य की अनेकावयवता निष्पन्न न हो सकेगी, क्योंकि जब एक अवयव की प्रतीति से ही वाक्यार्थ की प्रतिपत्ति हो जायगी तो अवयवान्तर की कल्पना में व्यर्थ के कालक्षेप के सिवाय क्या हाथ लगने वाला है । उस निष्फल स्वरूप की प्रतिपत्ति एक ही क्षण में होने से एक ज्ञान की उत्पत्ति होते हो पूरे स्वरूप की प्रतीति हो arent ' | किन्तु आपके ये सब प्रश्नोत्तर भी भ्रममूलक हैं, क्योंकि रत्न की परीक्षा में प्रथम क्षण के दर्शन के अतिरिक्त अन्य दर्शनों की भी जैसे सार्थकता मानी जाती है, उसी तरह से वाक्यार्थ की स्पष्टता के लिये प्रत्यय से अतिरिक्त अन्य अवयवों के प्रयोग में भी कोई बाधा नहीं है । जैसा कि भर्तृहरि ने कहा है- ' सभी पृथक् - पृथक् अवयवों की भी सर्वत्र प्रत्येक शब्द में कृत्स्नता ( संपूर्णता ) की परिसमाप्ति देखी जाती है । इसी तरह से जिस पद का प्रथम उपादान होता है, उसी में सम्पूर्ण अर्थ की ग्राहक शक्ति रहने पर भी नियम, अनुवाद आदि के रूप में पदान्तरों की भी उपयोगिता ज्ञात होती है । इसीलिये कहा गया है कि – ' प्रत्येक वर्ण अथवा अवयव के हो सार्थक रहने पर भी अनेक सार्थक वर्ण या अवयवों को इसलिये स्वीकार किया जाता है कि वाणी से उच्चरित शब्द और उनके अर्थ पूर्णरूप से स्पष्ट हो सकें, जैसे रत्न का पारखी व्यक्ति एक बार देख लेने से ही यह जान जाता है कि यह हीरा, पता, मोती आदि रत्न है, किन्तु फिर भी बार - बार उसको सूक्ष्म दृष्टि से भली - भांति से परख कर ही उसकी सही कीमत आंकता है ' | ' पद, वाक्य आदि की सावयवता मानने वालों के पक्ष में कोई अवयव कारकविशेष का अभिधायक और कोई क्रियाविशेष or after होगा, इसी लिये वाक्य के अवयवों में से प्रत्येक की सार्थकता के कारण सकल ( संपूर्ण ) शब्द का प्रयोग भी सार्थक हैं । ' यह कथन ठीक हो हैं । इस पर शंका उठ सकती है कि क्रियाविशेष से अन्वित ( संबद्ध ) कारणविशेष का कथन नहीं हो सकता? समाधान यह है कि तात्पर्य शक्ति से क्रिया और कारक से अम्वित की प्रतीति हो सकती है । समुदित पदों से एक वाक्यार्थ की प्रतीति होती है । वह गुणभूत इतर पदार्थों से संसृष्ट कोई पदार्थ ही है, इसमें सांकर्ष कहा है । सब पद मिलकर अन्वित अर्थ का संपादन करते हैं, अति अर्थ का अभिधान नहीं करते । प्रश्न है कि मिट्टी से जैसे घट का निर्माण होता है, उसी तरह से क्या पदवाक्यार्थं का निर्माण करते हैं? नहीं, पद वाक्यार्थ के ज्ञापकमात्र हैं । तब फिर पदों की संहत्यकारिता होते हुए भी उनमें अम्विताभिधान की ५४

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४२६ वेदार्थपारिजात: मभिदधतीति चेदित्थं पदान्यन्वितं प्रत्याययन्ति, नान्वितमभिदधति । नाभिधात्री शक्तिरन्वितविषया, किन्त्वस्वयव्यति-कावगत निष्कृष्टस्वार्थविषयेव । तात्पर्यशक्तिस्तु तेषामन्वितावगमपर्यन्ता पर्यवस्यति । व्यापारस्य च तदीयस्य निराकाङ्क्षप्रत्ययोत्पादनपर्यन्तत्वात् । तदुक्तम्-- ' अन्यथैव प्रवर्तन्ते प्रत्यक्षादुद्भवा धियः । अर्थ पूर्णमपूर्ण वा दर्शयभ्यः पुरः स्थितम् || अन्यथैव मतिः शब्दे विषयेषु विजृम्भते । प्रतिपत्तुरनाकाङ्क्षप्रत्ययोत्पादनावधिः ॥ अत एव पदं लोके केवलं न प्रयुज्यते । नहि तेन निराकाङ्क्षा श्रोतुरात्रीयते मतिः ॥ ' न चाभिधानव्यतिरिक्तः कोऽन्यः शब्दस्य कृत्स्नफलपर्यन्तः प्रत्यायनात्मा व्यापारः? अस्ति कश्चिद्यः सर्वैरेव संसर्गवादिभिरप्रत्याख्येयः । नहि संसर्गोऽभिधीयते, प्रतीयते च वाक्यम् । ननु संसृष्टाभिधाने सत्येव संसर्गः प्रतीयते नान्यथेति चेन्न, संहत्यकारित्वादेव संसर्गावगतिसिद्धेः । नहि संहत्यकरण-मसृष्टञ्च कार्य क्वचिद् दृश्यते । अपि च, प्रकृतिप्रत्ययौ परस्परापेक्षमर्थमभिदधाते । न च प्रकृत्या प्रत्ययार्थोऽभिधोयते, नियोगस्याघातुवाच्यत्वात् । न च प्रत्ययेन प्रकृत्यर्थोऽभिधीयते, यागादेलिङ्वाच्यत्वानुपपत्तेः । न च तो पृथक् स्वकार्यं कुरुत: । एतेन कालक्षेपोऽपि व्याख्यातः, निरवयववाक्यवैशद्याय वर्णपदादीनामपेक्षितत्वेन तत्रैव कालक्षेपस्य सार्थक्यात् । सावयवपक्षे तु तत्सार्थक्यं स्पष्टमेव । यदुक्तम्- ' सकृच्छुतो च सर्वेषां कालभेदो न युज्यते ' ( प्र ० वा ० ३।२५१ ) । न च सर्वावयवानां सकृच्छ्रवणं सम्भवति, तथात्वे कालक्षेपो न स्यात्, एकावयवप्रतिपत्तिकाले सर्वेषां श्रवणात् । क्रमश्रवणे च पृथगर्थवता-मेकस्मादेव तदर्थसिद्धेरन्यस्य वैयर्थ्यात् । सकृच्छ्रुतौ च पृथगर्थेषु अदृष्टसामर्थ्यानामर्थवत्ता न सिद्ध्यति । ननु सहितेष्ववयवेष्वर्थदर्शनादर्थप्रतीतेः मस्तीत्यतो न दोष इति चेन्न, पृथगप्यवयवानामर्थ प्रतीतिजननसामर्थ्य पृथक् सामर्थ्य क्यों नहीं मानी जाती? इसलिये नहीं मानी जाती कि पद अन्वित की प्रतीति कराते हैं, अम्बित का अभिधान नहीं करते । अभिधात्री शक्ति बम्बितविषयिणी नहीं होती, किन्तु अन्वयव्यतिरेक से अवगत निष्कृष्ट स्वार्थविषयिणी होती है | इनकी तात्पर्य शक्ति का पर्यवसान तो संबन्धित ज्ञान पर्यन्त है, और उस तात्पर्य शक्ति का व्यापार वाक्यार्थ की निराकाक्षता के ज्ञान के उत्पादन तक चलता है । जैसा कि कहा गया है - ' प्रत्यक्ष से उत्पन्न हुई प्रतीति एक भिन्न प्रकार से प्रवृत्त होती है, क्योंकि वे अपने सामने वर्तमान पूर्ण अथवा अपूर्ण विषय का दर्शन कराती हैं । इसके विपरीत शब्द के द्वारा एक free प्रकार से ही प्रतीति कराई जाती है, जिससे कि प्रतिपत्ता ( ज्ञाता ) को होने वाले ज्ञान में किसी प्रकार की आंकाक्षा न रह जाय । इसी लिये लोक में केवल पद का प्रयोग नहीं होता, क्योंकि उससे श्रोता को आकाक्षा रहित ज्ञान नहीं होता, केवल पद के सुनने पर आकांक्षा बनी हां रह जाती है । क्या शब्द का अभिधान के स्वार्थ प्रतिपादन के अतिरिक्त कोई कृत्स्न फल को प्रत्यायकता पर्यन्त व्यापार है भी? हाँ ऐसा व्यापार है । हो, जिसका कि शब्द और अर्थ का संबन्ध मानने वाला कोई भी बादी खण्डन नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा नहीं हो सकता कि वाक्य की तो प्रतीति हो और उसका वाच्य संबन्ध न हो । प्रश्न है कि संसृष्ट का अभिधान होने पर ही संसर्ग की प्रतीति होती है, अन्यथा नहीं । उत्तर है कि संहत्यकारित्व से भा संसर्ग को अवगति सिद्ध हो जाती है । कार्य मिल - जुलकर बने हों और संसृष्टता न हो, ऐसा नहीं देखा जाता । अपि च प्रकृति और प्रत्यय एक दूसरे की अपेक्षा से अर्थ का अभिधान करते हैं । प्रकृति से प्रत्ययार्थ का अभियान नहीं होता, क्योंकि नियोग ( आशा = विधि ) धातु वाच्य नहीं है । इसी तरह से प्रत्यय से भी प्रकृत्यर्थ का अभियान नहीं होता, क्योंकि प्रभा afe fr ङ्ग प्रत्यय के वाच्य नहीं हो सकते । ये दोनों अलग - अलग भी अपना काम नहीं करते | इसी से कालक्षेप के आक्षेप का भी समाधान हो जाता है । निरवयव वाक्य की विशदता ( स्पष्टता ) के लिये वर्ण, पद आदि अपेक्षित है, इसी प्रसंग में कालक्षेप की सार्थकता रहती है । सावयव पक्ष में तो उसकी सार्थकता और भी स्पष्ट है । प्रमाणवासिक में ही यह भी कहा गया हैं कि - ' यदि एक बार ही सबको सुन लें, तब तो काल का भेद मानना ठीक नहीं हो सकता ' किन्तु सब अवयवों का एक साथ सुन लेना संभव नहीं है । वैसा हो तो कालक्षेप न हो, क्योंकि एक अवयव के ज्ञान काल में ही सवका श्रवण हो चुका | क्रम ' श्रवण मानने पर एक के श्रवण से ही पृथक् पृथक् अर्थ वाले सबका एक से ही अर्थज्ञान हो जायगा तो अन्य ranat की व्यर्थता हो जायगी । सकृत् श्रवण होने पर पृथगर्थ में अदृष्ट सामर्थ्य वाले अवयवों की अर्थवत्ता नहीं सिद्ध होगी । प्रश्न है कि सभी अवयवों के साथ रहने पर अर्थ की प्रतीति ( ज्ञान ) होती है, अतः पृथक् - पृथक् अवयवों में भी अर्थप्रतीति

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वेदाथपारिजातः ४२७ प्रत्येकं तेष्ववयवेष्वसतो रूपस्यार्थप्रतिपादनस्वभावस्य संहतेष्वसम्भवात् । केवलानामवयवानां यद्रूपं ततोऽन्यदेव समुदितानामर्थ प्रतिपादनसमर्थं रूपमुपपद्यत इत्यपि न सम्भवति, अर्थान्तरस्य समर्थस्यानुत्पत्तेः । शब्दोत्पत्तिवादिनस्तु पृथगसमर्थानामप्यवयवानामुपकारविशेषादतिशयवतां कार्यविशेषोपयोगात्, नित्यत्व-वादिनस्तु प्रत्येकमवयवेषु समर्थेषु व्यर्था स्यादन्यकल्पनेत्यादिकम्, तदपि तुच्छम्, प्रत्येकं पृथपिठरादिधारणासमर्थानामपि ग्राणां समुदितानां यथा तत्सामर्थ्यम्, तथैव पृथगवयवानामसामर्थ्येऽपि समुदितानां सामर्थ्ये दोषाभावात् । यथा च रत्न-स्वप्रतिपत्त विविधानां दृष्टीनां सार्थक्यम्, तथैवानेकेषामवयवानां निश्चयवाक्यप्रतिपत्ता उपयोगः । यथा च कल्पित-afararat रेखायो वर्णप्रतिपत्तिस्तथैव कल्पितेभ्योऽवयवेभ्यो निरवयववाक्यप्रतिपत्तिरपि । ' कालभेदोऽपि तेनैव युज्यते ह्यन्यदृष्टिवत् । रत्नतत्त्वपरीक्षायां गिरां तद्वत् कथा मता ॥ ' यदप्युक्तम् —'एकत्वेऽपि ह्यभिन्नस्य क्रमशो गत्यसम्भवात् । ' ( प्र ० वा ० ३।२५२ ) कालभेद एव न युज्यते, नकस्य क्रमेण प्रतिपत्तिर्युक्ता, गृहीतागृहीतयोरभेदात्, एकस्मिन् गृहीतागृहीतत्वाभावात् । क्रमेण च वाक्यप्रति पत्तिर्दृष्टा, सर्ववाक्याध्याहारश्रवणस्मरणकालस्यानेकक्षणनिमेषानुक्रमपरिसमाप्तेः । वर्णरूपासंस्पशिनश्चकप्रतिभा-निश्चैक बुद्धिप्रतिभासिनः शब्दात्मनोऽप्रतिभासनात् । वर्णानुक्रमप्रतीतेस्तदविशेषेऽप्यनुक्रमकृतत्वाद् वाक्यस्यानुक्रमवती वाक्यप्रतीतिः । वर्णानुक्रमानुकारानपेक्षणे तैर्यथाकथञ्चित् प्रयुक्तैरपि यत्किचित्प्रतीयते, विनापि वर्णैरनुक्रमवद्भि-रक्रमस्योपयोगायोगात्, अक्रमेण व्याहर्तुमशक्यत्वात् गत्यन्तराभावाच्चेति, तदपि स्फोटवादिभिर्निराकृतमेव, कोई दोष नहीं है । यह प्रश्न इसलिये गलत है कि अलग से उन अवयवों तो वह संहतों ( संमिलित ) में भी नहीं रह सकता । ' केवल अवयवों का माना जाता है, जिसमें कि अर्थप्रतिपादन की सामर्थ्य विद्यमान है । ' यह कथन को उत्पन्न करने की सामर्थ्य हो सकती है, इसलिये यहां पर में से प्रत्येक में अर्थप्रतिपादन रूप स्वभाव विद्यमान नहीं है, जो स्वभाव है, उससे भिन्न ही स्वभाव समुदिलों का भी असंगत है, क्योंकि अवयवों से अतिरिक्त समुदाय में समर्थ अर्थान्तर की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती । ' शब्द की उत्पत्ति मानने वालों के मत में तो अवयवों के पृथक् - पृथक् असमर्थ रहते हुए भी उपकार विशेष से अतिशयिता आ सकती है और उसका कार्य विशेष में उपयोग हो सकता है । किन्तु शब्द को नित्य मानने वालों के मल में तो प्रत्येक अवयव यदि अर्थ का ज्ञान कराने में समर्थ है, तो उनसे भिन्न किसी पद, वाक्य, स्फोट आदि की कल्पना व्यर्थं ही रहेगी । ' बौद्धों का यह कथन भी तुच्छ है, क्योंकि अलग अलग प्रत्येक पत्थर में पिठर ( बर्तन ) आदि की धारण करने की सामर्थ्य न रहने पर भी उन्हीं पत्थरों को इकट्ठे कर दिये जाने पर जैसे उनमें वह सामर्थ्य आ जाती है उसी तरह से शब्द के भी पृथक् - पृथक् अवयवों की पृथक् रूप से सामर्थ्य न होने पर भी जब वे इकट्ठे हो जाते हैं तो वह सामर्थ्य आ जाती है । जैसे रत्न की परीक्षा में विविध दृष्टियों की सार्थकता है, उसी तरह are raat का निश्चित वाक्य प्रतिपति ( ज्ञान ) में उपयोग होता है । जैसे कल्पित वर्णभाव वाली लिपिस्वरूप रेखाओं से वर्णों की प्रतिपत्ति होती है, उसी तरह से कल्पित अवयवों से निरवयव वाक्य की प्रतिपत्ति भी होती है । ' रत्न की परीक्षा में जैसे विभिन्न दृष्टियों का उपयोग होता है, उसी तरह से वाणी के विषय में कालभेद के उपयोग की भी कथा समझनी चाहिये । " प्रमाणातक में यह भी कहा गया है कि ' अभिन्न अनवयव स्फोटरूप वाक्य की एकता मानने पर प्रथम ध्वनि से भी उसकी अभिव्यक्ति हो जाने पर क्रमशः प्रतीति न होकर एक साथ ही प्रतीति हो जायगी । ' इसमें कालभेद को मानना ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही वस्तु की क्रम से प्रतिपति मानना ठीक नहीं । इसमें गृहीत और अगृहीत में कोई भेद नहीं रह जायगा, एक हो वस्तु में गृहीतत्व और अगृहीतत्व ये परस्पर विरोधी धर्म नहीं रह सकते । यह देखा गया है कि वाक्य की प्रतिपत्ति क्रम से होती है, क्योंकि पूरे वाक्य का अध्याहार करके श्रवण और स्मरण करने में काल के अनेक क्षणों और निमेषों का क्रम परिसमाप्त हो जाता है । वर्ण रूपों से असंसृष्ट एक प्रतिभास के रूप में और एक बुद्धि से प्रतिभासित होने वाले रूप में शब्दात्मक वाक्य का प्रतिभास नहीं माना जाता । वर्णानुक्रम की प्रतीति यद्यपि अविशेष होती है, तो भी वाक्य अनुक्रम कत है, अतः वाक्य की प्रतीति भी अनुक्रमवती होती है । वर्णों के अनुक्रमाकार की अपेक्षा न रखने पर उनका मनमाना उपयोग करने पर भी कुछ न कुछ प्रतीत हो ही जायगा, अनुक्रम-वान् वर्णों के बिना भी अक्रम का उपयोग नहीं हो सकता, क्योंकि बिना क्रम के बोल पाना संभव नहीं और दूसरी कोई गति नहीं

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४२८ -वेदार्थपारिजातः वर्णेभ्योऽर्थान्तरस्य शब्दरूपस्य वाक्यस्याभ्युपगतत्वात् । व्यञ्जकाश्च ध्वनयोऽनुक्रमवन्तो विशिष्टेनानुक्रमेण व्यञ्जयन्ति न व्युत्क्रमेण । तदुक्तम् – ' यथानुपूर्वीनियमो विकारः क्षीरवोजयोः । तथैव प्रतिपतॄणां नियतो बुद्धिषु क्रमः ॥ ' तेन सरोऽस्तीति प्रयुक्त्या, रसोऽस्तीति प्रतीत्यापत्तिरप्यपाकृता । तदेकमपि व्यक्त्यनुक्रमादनुक्रमवत् प्रतीयते । परमार्थतोऽनु-क्रमवर्णविभागरहितमेव स्फोटात्मकं शब्दतत्त्वम् । तदुक्तमेव-- ' नादस्य क्रमजन्यत्वान्न पूर्वो नापरश्च सः । अक्रमः * मरूपेण भेदवानिव जायते || तस्मादभिन्नकालेषु वर्णवाक्यपदादिषु । शब्दः कालः स्वभावश्च नादभेदाद्वि-भिद्यते ॥ ' इति । यदुक्तम् --- ' कमवता व्यञ्जकेनाक्रमस्य व्यक्तिर्न युज्यते, व्यक्ताव्यक्तयोरेकत्र विरोधात् । अवधूतरूपादन्यस्यान-वधूतं रूपान्तरमेकस्य शब्दस्य न सम्भवति, येनान्यवर्णैरभिव्यज्येत तदप्यकिञ्चित्करम्, क्रमवतीभिरनेकाभिर्दृष्टिभिरपि रत्नतत्त्वदृष्टेरेकस्याप्यभिव्यक्तिदर्शनात् । तदप्युक्तम् --- प्रथमेन वर्णेनानभिव्यक्तस्थानवधारणादवधारणार्थमन्येषां वर्णानां व्यापारः । न च प्रथमेनैव वर्णेनानवधारणरूपाया व्यक्तेः सम्पत्तिरिति वाच्यम्, तत्तच्छन्दव्यक्ती तेषां तेषां वर्णाना-मुपयोगस्यानुभवसिद्धत्वात् । एतेनावर्णभागे वाक्ये s सकलश्राविणो वाक्यगतिर्न स्यादेकस्य सकलाभावात् । सकलश्रुतिर्न वा कस्यचित्, वर्णव्यतिरिक्तस्यैकस्य वाक्यस्य शकलाभावात् । भवति च लोके कतिपयवर्णश्रवणे पूर्ववाक्यभागश्रवणप्रतोतिः । वर्णैक-भागवतो वाक्यस्याभ्युपगमः स्यात् । ततः कतिपयवर्णश्रवणे पूर्ववाक्यभागश्रवणमिष्यते । वाक्यस्यैकत्वे यदि पूर्वभाग-श्रवणं तदा सकलश्रुतिः स्यात् पूर्वभागाव्यतिरेकात् । अथ न सकलश्रुतिस्तदा न वा कस्यचिच्छ्रुतिः स्यात् । पूर्वस्यापि है । ' इन आक्षेपों का भी स्फोटवादियों ने निराकरण कर दिया है । वे लोग वर्णों से भिन्न शब्दरूप वाक्य की सत्ता मानते हैं । व्यंजक saft अनुक्रमवती होती हैं । ये एक विशिष्ट क्रम से शब्दों की अभिव्यक्ति करती हैं, मनमाने ढंग से नहीं । जैसा कि कहा गया - ' जैसे दूध और बीज के विकार के होने में आनुपूर्वी देखी जाती है, उसी तरह से शब्द से अर्थ की प्रतीति में प्रतिपत्ता की बुद्धि एक निश्चित क्रम रहता है । ' इसी लिये ' सर ' शब्द के उच्चारण करने पर ' रस ' की प्रतीति नहीं होती । वह यद्यपि एक है, तो भी अभिव्यक्ति के अनुक्रम से अनुक्रमवान् प्रतीत होता है । परमार्थतः स्फोटात्मक शब्दतस्व अनुक्रम और वर्णों के विभाग से रहित ही है । जैसा कि कहा गया है- ' नाद ही क्रम से उत्पन्न होता है, अतः शब्द में यद्यपि पूर्वापर क्रम नहीं है, वो भी अक्रम रहता हुआ भी यह क्रमवान् इसलिये प्रतीत होता है कि नाद का क्रम इस पर आरोपित किया जाता है । इसी लिये विभक्ताकार में इनकी प्रतीति होने लगती है । इस तरह से वर्ण, वाक्य और पदों में अभिनकालता, अक्रमता के रहते हुए भी, इनमें नाद के भेद के कारण कालभेद और स्वभाव - भेद को प्रतोति होने लगती है । ' यह भी कहा गया है कि ' क्रमवान् व्यंजक से अक्रम अभिव्यक्ति नहीं मानी जा सकती, क्योंकि व्यक्त और अव्यक्त इन विरोधी स्वभावों की एकत्र स्थिति नहीं रह सकती । एक हो शब्द के अवधूत ( निश्चित ) रूप से अनवधूत ( अनिश्चित ) रूपान्तर की प्रतीति नहीं हो सकती, जिससे कि अन्य वर्णों से इसको अभिव्यक्ति मानी जाय । ' यह कथन भी अकिचित्कर है, क्योंकि अनेक क्रमवती दृष्टियों से एक reader को परीक्षा होती है । जैसा कि कहा गया है --- प्रथम वर्ण से अभिव्यक्त स्वरूप का यवधारण नहीं हो पाता, अतः उसके अवधारण के लिये अन्य वर्णों का व्यापार माना जाता है । प्रथम वर्ण से हो अवधारणरूप व्यक्ति ( प्राकट्य ) की सम्पत्ति नहीं हो पाती, इसलिये उस उस शब्द की व्यक्ति ( प्राकट्य ) के लिये उन उन वर्णों का उपयोग अनुभव से सिद्ध है | इस तरह से ' वर्ण विभाग से रहित वाक्य से समस्त वर्णों का श्रवण न करने वाले को वाक्यार्थ की अवगति नहीं हो सकती, क्योंकि एक ही सब नहीं हो जाता । अथवा सकल श्रुति किसी को भी नहीं होगी, क्योंकि वर्णों से व्यतिरिक्त एक वाक्य के टुकड़े नहीं हो सकते, किन्तु लोक में after वर्णों के श्रवण के उपरान्त वाक्य के पूर्व भाग की प्रतीति होती है । अतः वर्ण के एक भाग के रूप में भी area को स्वीकार करना पड़ेगा । इसी लिये कतिपय वर्णों के श्रवण के उपरान्त पूर्व वाक्य भाग का aar मान्य है । art यदि एक है और उसके पूर्वभाग की यदि श्रुति होती है, तो उससे सकल वाक्य की श्रुति मानी जायगी, क्योंकि

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 459 का मूल पृष्ठ
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वैवार्थपारिजातः ४२६ भागस्य श्रुति स्यात्, वाक्यव्यतिरिक्तत्वात् इत्यप्यपास्तम् व्यञ्जकानां सादृश्येन वाक्येऽपि भागप्रतीत्युपपत्तेः । तदप्युक्तम् --- ' व्यञ्जकसादृश्याच्च वाक्ये तदात्मग्रहणाभिमानस्तेन नाश्रवणं सकलश्रवणं वा । यदप्युक्तम् --- सकलासकलवर्णभागप्रतिपत्तिकाले निष्कलस्य वाक्यस्य श्रवणं नोपपद्यते, वर्णावर्णात्मकत्वेन व्यङ्ग्यव्यञ्जकयोर्विसदृशत्वेन वर्णात्मग्रहणाभिमानो नोपपद्यते, तदपि न विचारचारु, व्यञ्जकानां व्यङ्ग्यवैरूप्येऽपि व्यङ्गाकारत्वोपपत्त्या तत्सारूप्यकल्पनोपपत्तेः । भास्यविलक्षणस्यापि भानस्य भास्याकारताया दर्शनात् । यथा वा बौद्धमते सादृश्यग्रहणानुपपत्तावपि सादृश्यमूलकप्रत्यभिज्ञाश्रमस्तथैवेहापि वर्णावर्णात्मकत्वेन सारूप्याभावेऽपि व्यङ्ग्यस्य व्यञ्जकाकारतोपपत्तिः । समस्तवर्ण संस्कारवत्याऽन्त्यया बुद्ध्या वाक्यावधारणमित्यपि युक्तमेव । तदुक्तमपि - ' यथानुवाकः

श्लोको वा सोढत्वमुपगच्छति । आवृत्त्या न तु स ग्रन्थः प्रत्यावृत्तिनिरुच्यते ॥ प्रत्ययंरनुपाख्येयेर्ग्रहणानुगुणैस्तथा }

। ध्वनि-प्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥ नादेराहितवोजायामन्त्येन ध्वनिना सह । आवृत्तपरिपाकायां बुद्धौ शब्दोऽवधार्यते । ' यदुक्तम् — ' तस्यावर्णरूप संस्पशिनः कस्यचित्कदाचिदप्रतिपत्तिरिति, तदप्यकिञ्चित्करम् एकं पदमेकं वाक्य-मित्येक बुद्धिविषयत्वेन तस्यानुभवसिद्धत्वात् । बौद्धमतवादापेक्षया स्फोटवादोऽपि संगत एव । वस्तुतस्तु वर्णात्मकमेव वाक्यम् । तच्चेन्द्रियविषयमेवेत्युक्तमेव । यदपि वर्णानां क्रमेण प्रतिपत्या कुतो -क्रममेकबुद्धिग्राह्यमिति, तदप्यपहस्तितमेव, वनसेनादिप्रत्ययवद् नानावर्णेष्वपि पदवाक्यबुद्ध्य ुपपत्तेरुक्तत्वात् । वह पूर्वभाग से भिन्न नहीं है । अब यदि सकल श्रुति नहीं मानी जाती तो किसी की भी श्रुति नहीं होगी । पूर्वभाग को भी श्रुति नहीं होगी, क्योंकि तब उसको वाक्य से अतिरिक्त मानना पड़ेगा ' इस कथन का भी समाधान हो जाता है, क्योंकि अभिव्यंजकों के सादृश्य के कारण वाक्य में भी भाग की प्रतीति संभव होती है । इसी बात को इस तरह से कहा गया है- ' व्यंजक ध्वनि की सदृशता के कारण वाक्य में भी तदात्मता ( ध्वनि के स्वरूप के ज्ञान ) का अभिमान होता है, इस तरह से भश्रवण अथवा सकल श्रवण को आपत्ति का कोई प्रसंग नहीं उठता । ' यह भी आपत्ति उठाई गई है कि सकल अथवा असकल वर्णभाग की प्रतीति के समय में निष्कल ( एक अखण्ड ) वाक्य की नहीं संभव हो सकती । इसी तरह से वर्ण और अवर्ण के रूप में व्यंग्य और व्यंजक की भिन्नता के कारण वत्मिकता के ग्रहण का after भी उत्पन्न नहीं हो सकता । ' यह कथन भी आपात रमणीय है, क्योंकि व्यंजक और व्यंग्य की विलक्षणता के रहते भी व्यंग्या-कारता की उपपत्ति की संभावना से सारूप्य ( समान रूप वाले ) कल्पना को उपपत्ति संभव हो सकती है । भास्य ( विषय ) से विलक्षण भान ( ज्ञान ) की मायाकारता ( विषयाकारता ) देखी जाती है । अथवा जैसे बौद्धमत में सादृश्य ग्रहण ( ज्ञान ) की उपपत्ति न बनने पर सादृश्यमुलक प्रत्यभिज्ञा को भ्रम माना जाता है, उसी तरह यहाँ पर वर्णात्मकता और अवर्णात्मकता में सारूप्य न रहने पर भी व्यंग्य की व्यंग्याकारता उपपन्न हो सकती है । समस्त वर्णों के संस्कार से युक्त अन्तिम बुद्धि से वाक्य की अवधारणा होती है, यह भी ठीक है । ऐसा कहा भी गया है— ' किसी अनुवाक या श्लोक की बार - बार आवृत्ति करने से वह कण्ठस्थ हो जाता है, प्रत्येक आवृत्ति में उस ग्रन्थ की नवीन रूप में प्रतीति नहीं होती । उसी तरह से ग्रहण ( ज्ञान ) के अनुगुण अनुपाख्येय ( अवाच्य ) प्रत्ययों के सहारे ध्वनियों से प्रकाशित होने वाले शब्द में उनके एक स्वरूप का अवधारण होता है । विभिन्न ध्वनियों से स्थापित संस्कारों के साथ विद्यमान अन्तिम ध्वनि से आवृत्ति के कारण परिपक्व बुद्धि में शब्द के उस स्वरूप का निश्चय होता है । ' यह भी आपत्ति उठाई गई हैं कि ' वाक्य को वर्णरूप से असंस्पृष्ट सर्वथा भिन्न मानने पर कभी किसी को उसकी प्रतीति भी हो सकती है । ' किन्तु यह कथन भी अकिंचित्कर है, क्योंकि यह एक पद है, एक वाक्य है, इस तरह की एक बुद्धि . विषयता के आधार पर उसकी प्रतीति अनुभव सिद्ध है । इस तरह से बोद्ध मतवाद की अपेक्षा से स्फोटवाद अधिक संगत है । वास्तव में तो वाक्य वर्णात्मक ही है और वह श्रोत्रेन्द्रिय का विषय है, यह हम पहले ही कह चुके है । वर्णों की प्रतीति क्रम से नहीं होती, अतः उनकी अक्रमेण एकबुद्धिग्राह्यता कैसे मानी जा सकती है? इसका भी जबाब हम दे चुके हैं कि बन और सेना बुद्धि की तरह नाना वर्णों में ही पदबुद्धि और वाक्यबुद्धि मानी जाती है । आपने जो यह कहा है कि ' अन्त्य वर्ण की प्रतिपत्ति

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४३० वेदार्थपारिजातः यदप्युक्तम् - ' न चान्त्यवर्णप्रतिपत्तेरूर्ध्वमन्यम शकलं शब्दात्मानमुपलक्षयामः, तदपि सर्वजनीनानुभवापलापप्रायम्, गौरित्येकं पदं गामानयेत्येकं वाक्यम् इत्यनुभवस्य सर्वजनीनत्वात् । तत्तद्वर्णानुभवाहितसंस्कारायामन्त्यायां बुद्धी तज्जन्यस्मृतौ वा पदवाक्यभानं स्फुटमेव । यदप्युक्तम्- ' नहि स्मर्यमाणयोरपि पदवाक्ययोर्वर्णाः क्रमविशेषमन्तरा विभाव्यन्ते, अक्रमायां बुद्धी पौर्वापर्याभावात् । पदवाक्यभेदानाञ्च तत्कृतो भेदो न स्यात् । नापि वर्णाक्रमं शब्दस्वरूपं पश्याम: ' इति, तदपि तुच्छम् क्रमोपेतानां वर्णानामर्थावबोधकत्वे बाघाभावात्, गमनक्रियाक्षणसमूहस्य ग्रामप्राप्ताविव वर्णसमूहस्यार्थावगत हेतुत्वोपपत्तेरुक्तत्वात् । क्रमोपलब्धेष्वपि वर्णेषु निखिल वर्ण विषयस्यानुव्यवसायरूपस्य संकलनाज्ञान-स्यार्थप्रत्यायकत्वमित्यप्युक्तमेव । संकलनाप्रत्ययस्य च विशिष्टानुपूर्वीकवर्णमालानुभव समनन्तरभावित्वेन न विपरीतक्रमाशङ्कनम्, किन्तु प्रथमावगमनियतानुपूर्वीकास्ते तदनन्तरभा विस्मरणभासि संकलनाप्रत्ययोपारूढा वर्णा अर्थप्रत्यायकाः । यदपि विकल्पितम् ' सति वा अनित्यं स्यान्नित्यं वा? ' अनित्यं यत्नसम्भूतं पौरुषेयं कथं न तत् ' ( प्र ० वा ० ३१२५२ ) । अवश्यं नित्यं कुतश्चिद्धेतुमद्भवति, तद्वत्ताया आकस्मिकत्वे देशादिनियमो न स्यात् ' इति, तदपि चर्वितचर्वणम्, वर्णशब्दादिरूपेण नित्यत्वे बाधाभावात्, वेदगतवर्णपदपौर्वापर्यादीनामनित्यत्वेऽपि तेषां नैरपेक्ष्याभावेन पुरुषास्वातन्त्र्येणापौरुषेयत्वस्य साधितत्वात् । नित्यत्वानित्यत्वादीनां पौरुषेयत्वाद्यप्रयोजकत्वात्, प्रथमोच्चरितत्वादीनां निरुक्तहेतुनामेव पौरुषेयत्वादिप्रयोजकत्वस्योक्तत्वात् । एतेन तच्च प्रयत्नप्रेरिताविगुणकरणानां दृष्टम्, अन्यथा वा न दृष्टम्, तथा कारणधर्मदर्शनात् पुरुषव्यापार एव कारणमतः पौरुषेयं स्यादित्यप्यपास्तम्, वेदवाक्योच्चारणे पुरुषव्यापार-के बाद अन्य निर्विभाग शब्दात्मा की उपलब्धि नहीं होती ', किन्तु आपकी यह बात सर्वजनीन अनुभव का अपलाप मात्र है, क्योंकि ' गौ ' यह एक पद है, ' गामानय ' ( गाय लाओ ) यह एक वाक्य है, इस तरह की प्रतीति सर्वानुभव सिद्ध है । उन उन वर्णों के अनुभव से स्थापित संस्कारों के साथ विद्यमान अन्तिम वर्ण की बुद्धि अथवा उससे उत्पन्न स्मृति में पद और वाक्य की प्रतीति स्पष्ट है । आपने जो यह कहा कि ' स्मर्यमाण पद वाक्यों में भी वर्ण क्रम विशेष के बिना नहीं भासित होते । अक्रम बुद्धि में पौर्वापर्य भाग नहीं होना चाहिये, तब पद, वाक्य भेदों में वर्णकृत भेद कैसे रह सकता है, किन्तु हम वर्णों के क्रम जहाँ न हों, ऐसा कोई शब्द का स्वरूप नहीं देख पाते । ' यह भी तुच्छ बात है, क्योंकि क्रमयुक्त वर्णों के अर्थ का ज्ञान कराने वाले होने में कोई बाधा नहीं है । गमन क्रिया के क्षणों का समूह जैसे ग्राम की प्राप्ति में कारण है, उसी तरह से वर्ण समूह की भी अर्थावगति में हेतुता उपपन्न होती है । क्रमोपलब्ध वर्णों में भी निखिल वर्णविषयक अनुव्यवसाय रूप संकलनाज्ञान की अर्थप्रत्यायकता बताई जा चुकी है । यह संकलनाप्रत्यय ( सामूहिक ज्ञान ) विशिष्ट आनुपूर्वी वाली वर्णमाला के अनुभव के अनन्तर ही उत्पन्न होता है, अतः यहाँ पर विपरीत क्रम को आशंका नहीं है । किन्तु प्रथम अवगम में नियत आनुपूर्वी का अनुसरण करते हुए वे वर्णं उसके अनन्तर होने वाले स्मरण में भासित हो रहे संकलनाप्रत्यय में मिलकर अर्थ की प्रतीति कराते हैं । arrafts में यह वाक्य नित्य है या अनित्य ऐसा विकल्प उपस्थित करने के बाद कहा है कि ' यदि वह अनित्य है तो वह घटादि की तरह प्रयत्न से उत्पन्न है, तब वह पौरुषेय कैसे नहीं होगा । ' अनित्य का अवश्य ही कोई न कोई कारण होता है । after at after as स्मिक मान लिया जो उसमें देश आदि का नियम नहीं होगा । ' यह भी चति चर्वण मात्र है, क्योंकि वाक्य की वर्ण - शब्द आदि के रूप में नित्यता मानने में कोई बाधा नहीं है । वेदगत वर्ण - पद आदि की पूर्वापरता ( क्रम ) के अनित्य होने पर भी उनकी निरपेक्षता नहीं है और उसमें पुरुष की स्वतन्त्रता भी नहीं है, अतः उसमें अपीरुषेयता की सिद्धि की जा चुकी है । free ता और after में पौरुषेयत्व - अपौरुषेयत्व की प्रयोजकता नहीं मानी गई है । किन्तु प्रथमोच्चरित आदि कुछ हेतु ही terrar के प्रयोजक होते हैं, यह भी कहा जा चुका है । इससे इस बात का भी खण्डन हो जाता है कि वाक्य की उत्पत्ति अविगुण करण ( निर्दोष इद्रिय ) वालों के प्रयत्न से ही होती है, अन्यथा नहीं होती । तथा कारणधर्म दर्शन से भी यह होती है । पुरुष व्यापार हो इसमें कारण है, अतः इसकी पौरुषेयता ही होगी, क्योंकि वेद वाक्यों के उच्चारण में पुरुष व्यापार की विद्यमानता को अपौरुषेयतावादी