वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 461–470

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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वार्थपारिजातः ४३१ स्यापौरुषेयत्ववादिभिरप्यभ्युपगमात् । न चोच्चारणमात्रं कर्तृत्व मन्यकृतस्याप्युच्चारणदर्शनात्, किन्तु निरपेक्षोच्चारणम् । ' गिरां प्रयत्नसाध्यत्वे न सिद्धा पौरुषेयता । नोच्चारणं हि कर्तृत्वं यतोऽन्यत्रापि दृश्यते ॥ ' यदप्युक्तम्- ' नित्योपलब्धिनित्यत्वेऽप्यनावरणसम्भवात् ' ( प्र ० वा ० ३।२५३ ) । नित्यं अथ तच्छब्दरूपं स्यादुपलभ्यस्वभावश्व स्वभावस्य कदाचिन्नापैतीति नित्यमुपलभ्येत । यदि स नित्यः स्यात्, न कुतश्चिदपि ज्ञानजनन-सामर्थ्यात् प्रच्यवेत्, तस्य नित्यशब्दस्वभावत्वात् । नापि ज्ञानजननसामर्थ्यं शब्दादर्थान्तरम्, तस्य प्रागेव निषिद्धत्वात् ' इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, नित्यानामप्यभिव्यक्तिसापेक्षत्वेन कार्यकरत्वात् । यद्यपि शब्दा नित्यास्तदवबोधकत्वञ्च नित्यं तथापि कण्ठताल्वादिजन्यध्वनिभिर्व्यक्ता व्यवहारादिना गृहीतसङ्गतिका एवार्थप्रत्यायका भवन्ति नान्यथा, तेषां तथा स्वभावस्य सर्वानुभवसिद्धत्वात्, अभिव्यक्त्युत्पत्त्योभिन्नत्वाच्च । ' नित्योपलब्धिर्नो युक्ता नित्यत्वेऽप्यावृतत्वतः । तदुत्सारणमेवातः पुंव्यापार प्रयोजनम् ॥ ' यदप्युक्तम् -'तस्योपलभ्यात्मनो न किचिदुपलम्भावरणं सम्भवति । तस्य सतोऽपि तदात्मानमखण्डयतः सामर्थ्य तिरस्कारायोगात् । नहि तत्रातिशयोत्पादनासमर्थः किञ्चित्करो भवति, अकिञ्चित्करञ्चावरण सदसद्वेति विचारितप्रायम्, तदपि न क्षोदक्षमम्, स्तिमितेन वायुना नित्यस्यापि शब्दस्यावरणसम्भवात् । कुडचादीनां घटादिष्वति-शयानुत्पादकत्वेऽव्यापादकत्वे च सामर्थ्यस्यावरकस्येष्टत्वात् । यदप्युक्तम्न ब्रूमस्ते कुडचादयः किञ्चिदतिशाययन्ति, अपि तु न सर्वेघटक्षणाः सर्वस्येन्द्रियज्ञानहेतवः, परस्परसहितास्तु विषयेन्द्रियालोका एकेन विशिष्टक्षणान्तरोत्पादाद् विज्ञानहेतवः, अनुपकार्यस्यापेक्षायोगात्, भी मानते हैं । किन्तु उच्चारणमात्र कर्तृत्व का प्रयोजक नहीं होता, क्योंकि उच्चारण अन्य कृत वाक्यों का भी होता है । कर्तृव का प्रयोजक निरपेक्ष उच्चारण को हो माना जाता है । ' वाणी की प्रयत्न साध्यता के आधार पर पौरुषेयता नहीं सिद्ध की जा सकती । केवल उच्चारण कर्तृत्व में प्रयोजक नहीं है, क्योंकि अन्यकृत वाक्यों का भी उच्चारण अन्य कृत देखा जाता है । ' अर्थात् दूसरों के बनाये हुए वाक्यों का उच्चारण बनाने वाले से भिन्न व्यक्ति द्वारा भी किया जाता देखा गया है । प्रमाणवासिक में ही यह भी कहा गया है कि --- ' वाक्य की नित्यता मानने पर उसके आवरण की संभावना न रहने से नित्य उपलब्धि होनी चाहिये । ' यदि यह शब्दस्वरूप नित्य और उपलभ्य स्वभाव हो तो कभी दूर उपलब्धि होनी चाहिये । यदि वह नित्य है तो उसको ज्ञान की उत्पत्ति की किसी भी सामर्थ्य से वह free शब्दस्वभाव है | ज्ञानजनन सामर्थ्य शब्द से कोई अतिरिक्त वस्तु नहीं है, क्योंकि उसका है । ' किन्तु यह कथन भी अर्कचित्र हैं, क्योंकि नित्य पदार्थ भी अभिव्यक्ति सापेक्ष होते हैं, सापेक्ष हो सकते हैं । यद्यपि शब्द नित्य है और उनकी अवबोधकता ( अर्थज्ञापकता ) भी नित्य है, ध्वनियों से व्यक्त होने पर ही और व्यवहार प्रभूति से उनके अपने अपने अर्थ में नहीं होता, अतः उसकी नित्य च्युत नहीं होना चाहिये, क्योंकि पहले ही निषेध किया जा चुका अतः अभिव्यक्ति के लिये वे करण तथापि कण्ठ तालु आदि से उत्पन्न संकेत का ज्ञान होने पर ही वे अर्थ के प्रत्यायक ( ज्ञान कराने वाले ) होते हैं, अन्यथा नहीं । इनका यह स्वभाव सर्वानुभव सिद्ध है | अभिव्यक्ति और उत्पत्ति दो भिन्न - भिन्न वस्तुएँ हैं । ' शब्दों की नित्यता मानने पर भी उनकी नित्य उपलब्धि इसलिये नहीं होगी कि उनकी नित्यता आवृत रहती है । उस आवरण के हटाने मात्र के लिये पुरुष का व्यापार अपेक्षित रहता है । ' यह भी कहा गया है कि ' उपलभ्य ( ज्ञान - ज्ञेय ) स्वभाव शब्द की उपलब्धि पर कोई आवरण नहीं पड़ सकता, क्योंकि उसकी अखण्ड सत्ता है, उसका यह स्वभाव कैसे तिरस्कृत हो सकता है? जो उसमें अतिशय का आधान नहीं कर पाता, वह उसके वर्तमान स्वरूप का कुछ बिगाड़ भी नहीं सकता । बाप आवरण को सत् माने या असत् वह अकिचित्कर हो होता है, इस पर विचार किया जा चुका है । ' किन्तु यह बात भी तर्क के सामने नहीं टिक पाती, क्योंकि वायु के बन्द हो जाने पर शब्द के नित्य होने पर भी वह आवृत हो जाता है । कुड्य ( दीवाल ) आदि घट आदि में अतिशय ( विशेषता ) के उत्पादक नहीं है और न वे घट को नष्ट हो कर पाते हैं, तो भी उनमें घट आदि पर आवरण डाल देने को सामर्थ्य तो विद्यमान है ही, यह आपको भी मानना पड़ेग

पृष्ठ 462

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* I वेदार्थपारिजातः शक्तस्वभावस्य नित्यं जननमजननं वाऽन्यस्य सर्वदा स्यादित्युक्तम् । ते च प्रतिघातिनाऽन्येनाव्यवहिता अन्योन्यस्योपकारिणः, अव्यवधानदेशयोग्यतासहकारित्वात् तेषामन्योन्यातिशयोत्पत्तेः । व्यवधाने सति हेतोरभावात् समर्थक्षणान्तरानुत्पत्ते-विज्ञानानुत्पत्तिः । तस्मात् पूर्वोत्पन्नस्य समर्थस्य निरोधात् सति च कुडऽन्यस्योत्पित्सोः कारणाभावेनानुत्पत्तेः कार्यकारणज्ञानानुत्पत्तिरिति कुडचादय आवरणं ज्ञेयाः, न पुनः प्राक् प्रतिबन्धात् ' इति, तदपि गगनरोमन्थायितम्, सति कुडादिव्यवधाने घटादयः प्रयत्नवतापि नोपलभ्यन्तेऽसति तु लभ्यन्त इति तेन कुडद्यादीनामावरकत्वं तदर्थस्या-न्यथोपपादनं द्रविडप्राणायामाश्रयणं निरर्थकम् । शक्तस्यापि न नित्यकार्यजननं सहकारिसापेक्षत्वात्, न चानुपकार्यस्या-पेक्षाभाव:, अनिर्वाच्यस्योपकारस्य साधितत्वात् । न वै किश्विदेकं जनकमिति बौद्धा अपि मन्यन्ते । अत एव रूपग्रहणे चक्षुषः प्रदीपाद्यपेक्षा । यथैव घटादिग्रहणे कुड्यादिव्यवधानं बाधकम्, तदपनये सति तद्ग्रहः, तथैव स्तिमितो वायुः शब्दस्यावरणं पुरुषप्रयत्नेन तदुत्सारणे तदभिव्यक्तिः । यदप्युक्तम्- ' भावानां क्षणिकानामन्योन्योपकारोऽचिन्त्यत्वात् हेतुप्रत्ययसामर्थ्यस्यासर्वविदा दूरवासिना-व्ययस्कान्तेनायसः समाकर्षणदर्शनादिति ', तदपि घट्टकुटी प्रभातायितम्, तथैव स्तिमितवायोः शब्दस्यावरणं कण्ठताल्वा-द्यभिघाते जनितवायुविशेषेण तदुत्सारणम्, ततस्तदभिव्यक्तिरित्यस्याप्यभ्युपगन्तव्यत्वापातात् क्षणभङ्गभङ्गस्य चोपरिष्टाद्वक्ष्यमाणत्वात् । यह भी कहा गया है कि ' हम यह नहीं कहते हैं कि कुडच आदि घट आदि में किसी अतिशय का आधान करते हैं, हमारा तो मात्र यह कहना है कि सभी घटक्षण सभी इन्द्रिय ज्ञान के कारण नहीं होते । विषय, इन्द्रिय और आलोक परस्पर मिल कर एक विशिष्ट नये क्षण का उत्पाद करते हैं । इस तरह से वे विज्ञान के हेतु होते है । अनुपकारी आक्षेप नहीं किया जा सकता और समर्थ स्वभाव से अन्य वस्तु को सर्वदा नित्य उत्पत्ति अथवा अनुत्पत्ति माननी पड़ेगी, यह बात पहले कही गई है । किसी प्रतिघाती पदार्थ से इनका बीच में व्यवधान नहीं होता तो ये एक दूसरे का उपकार करते हैं, क्योंकि अव्यवधान, देश और योग्यता इनकी सहायता से ही इनमें अन्योन्य अतिशय की उत्पत्ति मानी जा सकती है । व्यवधान हो जाने पर हेतु के अभाव में समर्थ नये क्षण को उत्पत्ति न होने पर विज्ञान भी उत्पन्न न होगा, क्योंकि इस व्य aarr के कारण पहले उत्पन्न समर्थ क्षण का निरोध हो जाता है । कुड्य ( दीवाल ) के रहते अन्य उत्पन्न होने वाले ज्ञान के कारण के अभाव में उत्पत्ति नहीं होगी, इस तरह से कार्यकारण ज्ञान की उत्पत्ति न होने से कुड्य आदि को आवरण मानना पड़ता है, उनकी प्रतिबन्धकता को जानने से पहले नहीं । ' किन्तु यह कथन भी anta की जुगाली करने के समान है, क्योंकि कुड्य आदि का व्यवधान होने पर बहुत प्रयत्न करने पर भी घट आदि की उपलब्धि नहीं होती और उसके न रहने पर घट आदि उपलब्ध होते हैं । इस तरह से कुडच आदि की आवश्यकता स्पष्ट सिद्ध होने पर भी उसे भित्र पद्धति से सिद्ध करने में द्रविड प्राणायाम के सिवाय और कुछ नहीं है, जो कि निरर्थक है । समर्थ कारण से भी नित्य कार्य की उत्पत्ति नहीं मानी जाती, क्योंकि उसको भी सहकारी की अपेक्षा रहती है । अनुपकार्य में भी अपेक्षा का अभाव नहीं रहता, क्योंकि सर्वत्र अनिर्वाच्य उपकार सिद्ध किया जा चुका है । सभी पदार्थों का कोई एक ही जनक हो, ऐसी बात बौद्ध भी नहीं मानते । इसी लिये रूप का ग्रहण करने में चक्षु को प्रकाश को अपेक्षा रहती है । जैसे घट आदि के ग्रहण ( ज्ञान ) में कुडघ आदि का व्यवधान बाधक होता है, उस आवरण के हटा दिये जाने पर घट बादि का ग्रहण ( ज्ञान ) होता है, उसी तरह से स्तिमित ( रुका हुआ ) वायु शब्द का आवरक होता है, पुरुष के प्रयत्न से उस रुकावट के हटा दिये जाने पर शब्द की अभिव्यक्ति होती है । यह भी कहा गया कि ' क्षणिक भावों की परस्पर उपकारिता अचिन्त्य है | हेतुप्रत्यय सामर्थ्य का कुछ भी ज्ञान न रखने वाला चुम्बक दूर स्थित लोह का आकर्षण इसी पद्धति से करता है । यह कथन भी घट्टकुटी ( चौकी - चुंगी ) में हुए प्रभात के समान है । क्योंकि इसी पद्धति से स्मिमित वायु से शब्द का आवरण और कण्ठ तालु आदि के अभिघात से उत्पन्न वायु विशेष से उसका उत्सारण होने पर शब्द की अभिव्यक्ति भी मानी जा सकती है | क्षणभंगवाद का खण्डन आगे विस्तार से किया जायगा ।

पृष्ठ 463

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daruf रजातः ४३५ यच्च तेन यदिन्द्रिय विषययोर्मध्ये स्थितं तमावरणं विज्ञानोत्पत्तिवैगुण्यतारतम्येन तदतिशाययेदपि, आवरण-भेदेन शब्दादी श्रुतिमान्द्यपाटवदर्शनात्, अन्यथा ऽकिञ्चित्करस्य सन्निधानस्याप्यसन्निधानतुल्यत्वात् । तस्य शब्दस्येद-मावरणमित्युपसंहारो विकल्पनिर्मित एव स्यान्न वस्त्वाश्रयः । न च समारोपानुविधायिन्योऽर्थक्रियाः । नहि माणवके दहनोपचारात् पाक आधीयते । तस्मात् सत्यामपि कल्पनायां तत्परावृत्तयो भावा यथास्वभावस्थिता एव स्युः । तस्माद् यद्यावरणेन न विशेष आधीयते तदा सत्यध्यावरणे ज्ञापयेयुरिन्द्रियादयः, न चैवम्, तस्मात्तेनाधेयविशेषास्तथा ज्ञायेरन् । न खल्वेवं नित्यानां शब्दानां कस्मिश्चिदावरण विशेषे सत्यतिशयहानिरुत्पत्तिर्वातिशयस्य 1 । तस्माद्यदि नित्यानां शब्दानां ज्ञानजननं स्वभावः सर्वस्य पुरुषस्य सर्वदा सर्वाणि स्वविषयाणि ज्ञानानि सकृज्जनयेयुर्न वा कदाचित् किञ्चिदपि जनयेयु-रित्येकान्त एषः, तदपि न विचारचारु, स एवायं ककार इति प्रत्यभिज्ञानेन शब्दस्यैकत्वनित्यत्वसिद्धौ कण्ठतालवाद्य-भिघातेन स्तिमितवायूत्सारणेन कारणसंस्कार सिद्धचा नित्यानामेव शब्दानामभिव्यक्तिसिद्धेः । न चार्थक्रिया परमार्थ-सत्यमूलिका, कूटकार्षापणादिभिरप्यर्थक्रियादर्शनात् । तच्च करणं किञ्चिदेव मरुद्भिरुपाहितसंस्कारं कश्विदेव शब्द गृह्णाति । ' यथा ताल्वादिसंयोगविभागा केचिदेव नः । कस्यचिद् ग्रहणे शक्तं श्रोत्रं कुर्वन्ति संस्कृतम् ॥ यथा च तेषामुत्पत्ती सामर्थ्य नियमस्तव 1 । तथैवैषामभिव्यक्तौ सामर्थ्य नियमो मम ॥ ' न च सीमितसमीरणापसरणमेव करणस्य संस्कारः । स चायं तद्देशव्यवस्थितशब्दस्य तद्विषयसाधारण एव । यथा जवनिकापायप्राप्तप्रसरमीक्षणं रङ्गभूमिषु तद्देशस्थमशेषं वस्तु पश्यति, तथा प्रसरसं रोधिसमीरोत्सारणे सति श्रोत्रं तद्देशनिः शेषशब्दग्राहि भविष्यति । आकाशमेव श्रोत्रं तच्च निरवयव विभु च । तस्मिन् संस्कृते सर्वे च तदैव संस्कृतकरणाः सर्वे प्राणिनः सम्पन्नाः सर्व एव शृणुयुः । विषये तु संस्क्रियमाणे यह भी कहा गया है कि- ' इन्द्रिय और विषय के मध्य में स्थित अज्ञान या अन्य कोई आवरण वैगुण्य के तारतम्य से कुछ कम - ज्यादा हो भी सकता है, किन्तु शब्द ' आवरण के भेद से श्रुतिमान्ध, श्रुतिपाठवता यदि देखे जाते हैं । अन्यथा संविधान को offee मानने में वह असंनिधान के समान ही हो जायगा । इस तरह से उस शब्द का यह आवरण है, यह उपसंहार हैं, ये सब बातें विकल्पप्रसूत ( काल्पनिक ) ही हैं, वास्तविक नहीं । अर्थक्रिया समारोप के आधार पर नहीं होती | माणवक ( बालक ) में दहन ( अग्नि ) का उपचार करने से उस पर पाकक्रिया नहीं की जाती । इसलिये कल्पना के रहने पर भी उससे असंबद्ध पदार्थ अपने स्वभाव में ही वर्तमान रहेंगे । इसलिये यदि आवरण से किसी विशेषता का आधान नहीं होता तो उस परिस्थिति में बावरण के रहते हुए भी इन्द्रियों में ज्ञापकता माननी पड़ेगी, किन्तु ऐसा है नहीं । अतः उनमें विशेषता के आधान के साथ ही ज्ञापकता भी माननी पड़ेगी । इ तरह की अतिशयिता को हानि अथवा उत्पत्ति नित्य शब्दों में किसी आवरण के रहते हुए भी नहीं मानी जा सकती । इसलिये यदि free शब्दों का ज्ञानजनन स्वभाव है तो वे सभी पुरुषों में सदा सर्वविषयक ज्ञानों को एक साथ पैदा करेंगे, अथवा कभी भी किसी में कोई भी ज्ञान नहीं पैदा करेंगे, इनमें से कोई एक ही बात हो सकती है ' । किन्तु यह बात भी विचार करने पर अच्छी नहीं लगती, क्योंकि यह वही गकार है, इस प्रत्यभिज्ञा ( ज्ञान ) के आधार पर शब्द की एकता और नित्यता के सिद्ध हो जाने पर कण्ठ तालु आदि के अभि से स्तिमित ( रुका हुआ ) वायु का उत्सारण देखकर उसमें कारण संस्कार की सिद्धि हो जाने से नित्य शब्दों की भी अभिव्यक्ति सिद्ध हो जाती है । अथक्रिया परमार्थसत् पदार्थ से ही होती हो, ऐसा भी नहीं है, क्योंकि खोटे सिक्कों और नोटों से भी व्यवहार को निष्पत्ति देखी जाती है । यहाँ पर कोई एक शब्दों के प्राकट्य का हेतु पवन से संस्कृत हो करके किसी एक नियत शब्द को ही प्रकट करता है । जैसा कि कहा गया है-- ' जैसे कुछ ही तालु प्रभृति के संयोग - विभाग कुछ ही शब्दों के ग्रहण के लिये श्रोत्र इन्द्रिय को समर्थ बनाते हैं । यहाँ पर जैसे इनकी उत्पत्ति के प्रसंग में आपके यहाँ सामर्थ्य नियत है, उसी तरह से इनकी अभिव्यक्ति में हमारे यहाँ सामर्थ्यं नियत है । स्निमित पवन का अपसारण मात्र ही करण का संस्कार नहीं है । यह संस्कार उस देश में व्यवस्थित शब्द का और उसके विषय का भी समान रूप से होता है । जैसे जवनिका ( पर्दे ) के हटते ही चक्षु रंगभूमि में विद्यमान समस्त देश और उसमें स्थित वस्तुओं को देख लेती है, उसी तरह से विस्तार के विरोधी ( रोकने वाले ) पवन के हटा दिये जाने पर श्रोत्रेन्द्रिय उस देश के समस्त शब्दों का ग्रहण कर सकती है । ' आकाश ही श्रोत्र है और वह निरवयव ( अवयवों से रहित ) तथा विभु ( व्यापक ) है । इसमें संस्कार मानने पर सभी प्राणियों के श्रोत्रों का तत्काल संस्कार हो जाने से वे सभी शब्दों को सुन सकेंगे । विषय में संस्कार मानने पर वह भी ५५

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I वेदार्थपारिजातः तस्यानवयवस्य व्यापिनश्च संस्कृतत्वात् सर्वत्र श्रवर्ण स्यादिति मद्रेषु व्यक्तं कश्मीरेष्वपि श्रूयेत । नहि तस्याचारद्वारक-संस्कारः, आकाशवदनाश्रितत्वादिति चेन्न, समानदेशेषु समानेन्द्रियग्राह्येष्वपि नियतविशेषदर्शनेन तददोषात् । ' क्वचित्पा वकसम्पर्कादर्काशुस्पर्शतः क्वचित् । क्वचित्सलिलसंसेकाद् गन्धाऽभिव्यज्यते भुवः ॥ ' न च स्तिमितपथनापनोदनमात्रं करणस्य संस्कारः किन्तु प्रतिविषयं योग्यतालक्षणोऽपि संस्कारः । श्रोत्रस्याकाशरूपत्वेऽपि घटाकाशादिवदीपाधिक-भेदस्य तत्राभ्युपगमे वाघाभावात् धर्माधर्मयोश्च नियामकत्वाभ्युपगमात् । जातिवच्चास्य ग्रहण नियमो भविष्यति । ' यथा सर्वगता जातिः पिण्डदेशेऽवगृह्यते । न च कार्त्स्यगृहांतापि पिण्डेऽन्यत्र न दृश्यते ॥ तथा सर्वगतः शब्दो नाददेशेषु गृह्यते । स कार्त्स्न्येन गृहीतोऽपि पुनरन्यत्र गृह्यते ॥ पिण्डोऽभिव्यञ्जको जातेः शब्दस्य व्यञ्जको ध्वनिः । आश्रिता-नाश्रितत्वादिविशेषः क्वोपयुज्यते ॥ ' यद्यपि बोद्धर्जातिरपलप्यते, तथापि मीमांसकेस्तत्साध्यते । सर्वगतत्व निरवयवत्वाविशेषात् तीव्रत्वमन्दत्वादयश्च ध्वनिधर्मा शब्दवृत्तितयाऽवभान्ति । यथा स्थूलत्व-कृशत्वादयः पिण्डधर्मा जातिवृत्तित्वे क्वचिद् गृह्यन्ते, अगृहोतशाबलेयादिविशेषस्य कृशा गाव इत्यादिप्रतिभासदर्शनात् । ' द्वान तीव्रमन्दादेर्वर्णधर्मतया ग्रहः । बुद्धिरेव तथोदेति व्यञ्जकानुविधायिनी ॥ तावन्त एव ते वर्णाः प्रचयापचयस्पृशः । एवञ्चाभिभवोऽप्येषां स्वतो नास्ति परस्परम् ॥ मरुद्भिरभिभूयन्ते मारुता एव दुर्बलाः । तेजोभिरिव दीप्तांशोदिवा दीपप्रभादयः ॥ ' इति मीमांसकाः । तो अवयव और व्यापी हैं, अतः उसके संस्कृत होने पर सर्वत्र श्रवण होने लगेगा । इस तरह से मह देश में व्यक्त शब्द का कश्मीर में श्रवण मानना पड़ जायगा । उसका संस्कार आधार के द्वारा नहीं माना जा सकता, क्योंकि शब्द आकाश की तरह ही अनाश्रित है, आधारहीन है | किन्तु यह कथन भी उचित नहीं है, क्योंकि समान देशों की समान इन्द्रियग्राह्यता मानने पर भी नियत विशेषों का ही उनसे ग्रहण होता है, इस तरह से यहाँ पर कोई दोष नहीं आवेगा । यह देखा जाता है कि पृथिवी का कहीं अति के संपर्क से, कहीं सूर्य की किरणों से और कहीं सलिल ( जल ) के संपर्क से अभिव्यक्त होता है ' । केवल स्तिमित पवन का अपनोदन मात्र ही करण का संस्कार नहीं होता, किन्तु प्रतिविषय में योग्यता लक्षण संस्कार भी माना जाता है । श्रीत्र की आकाशरूपता के रहते हुए भी aff पर घटाकाश आदि की तरह औपाधिक भेद मानने में कोई बाधा नहीं है । इसमें नियामकता धर्म और अधर्म की मानी जायगी । जाति की तरह ही इनके ग्रहण का भी नियम होगा ' | जैसे सर्वगत ( व्यापक ) जति का पिण्ड देश में ग्रहण होता है । एक ही पिण्ड ( व्यक्ति का शरीर ) में संपूर्ण रूप में गृहीत होने पर भी वह जैसे दूसरे पिण्ड में भी संपूर्ण रूप से ही गृहोत होती है, उसी तरह से सर्वगत शब्द का ग्रहण ध्वनि प्रदेश में होता है । एक स्थान पर संपूर्ण रूप से गृहीत होने पर भी वह अन्यत्र भी उसी रूप में गृहीत होता है । जैसे पिण्ड जाति का अभिव्यंजक है, उसी तरह से ध्वनि शब्द का अभिव्यंजक है । यहाँ पर आश्रितता अनाश्रितता आदि विशेषों का उपयोग कहाँ है ' । यद्यपि बौद्ध जाति का अपलाप करते हैं, जाति को नहीं मानते, तो भी वेदों को प्रमाण मानने वाले मीमांसक इसको प्रमाणों से सिद्ध करते हैं । आकाश की तरह शब्द में भी सर्वगतता ( व्यापकता ) और निरवयता समान रूप से विद्यमान है | तीव्रता मन्द्रता आदि safe के ही धर्म हैं, किन्तु वे शब्द में भासित होते हैं । जैसे कि स्थूलत्व, कृशत्व आदि शरीर के धर्मं मी कहीं - कहीं जाति में रहते हुए प्रतीत होने लगते हैं । शाबलेयादि विशेषताओं को जो नहीं जान पाता, उसको गायें कुश है, इस तरह की प्रतीति होती देखी जाती है । ' अथवा तीव्र - मन्द आदि का वर्ण - धर्म रूप से ज्ञान नहीं होता । ferg airs waf का अनुसरण करने वाली बुद्धि हो तीव्र - मन्द रूप में उदित होती है, जिसके कारण कि उतने ही वर्ण प्रचय और अपचय भाव को प्राप्त कर लेते हैं । इस तरह से इनका परस्पर अभिभव भी स्वतः नहीं होता, किन्तु ये पवनगत ध्वनिधर्म यदि दुर्बल हैं, तो अपने से प्रबल पवन से अभिभूत हो जाते हैं, जैसे कि सूर्य की दीप्ति से दिन में दीपक की प्रभा ( प्रकाश ) अभिभूत हो जाती है ' यह मीमांसकों की मान्यता है ।

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वेदार्थपारिजातः *** यदपि च- ' अश्रुतिविकलत्वाच्च कस्यचित्सहकारिणः । काममन्यप्रतीक्षास्तु नियमस्तु विरुद्धयते ॥ ( प्र ० वा ० ३।२५३-२५४ ) । नावरणेन नित्यानां शब्दानामश्रुतिः । प्रतिनियतसहकारिकृतं क्वचित् कस्यचिच्छ्रवणमिति चेन्न, ततो लभ्यस्य कार्य उपयोगात् संकुला प्रतिपत्तिः स्यात् । तथा शब्दोऽपि यत्किञ्चिदपेक्ष्य कार्यं कुर्यात् पूर्वस्वभाव-नियत इति तन्न स्यात्, तस्याक्षेपाच्च सहकारिणः स्वभावस्थ प्रतिलम्भात् । अतिशयप्रतिलम्भाभावे अपेक्षायोगात् । अथार्थान्तरभूतमुपकारं लभते तस्य सम्बन्धाद्यभावस्योक्तत्वात् । तस्य चाज्ञेयत्वम् । यदि सम्बन्ध सिद्धयर्थं सहकारिकृते उपकारे शब्दकृत उपकारः कल्प्येत, तदा तत्राप्यपरस्तत्राप्यपर इत्यनवस्थादयः । तस्य च शब्दस्याज्ञेयत्वं प्रसक्तम्, सहकारिकृतादेवोपकारादर्थान्तरभूताज्ज्ञानोत्पत्तेः । तस्मादेष शब्दो नेन्द्रियं न सन्निकर्षं नात्मानमन्यविज्ञानोत्पत्ति-समाश्रयं किञ्चित्स्वज्ञानजननेऽपेक्षते, सर्वस्य नित्ये शब्देऽनुपयोगादित्यादि बहुजल्पितम्, तदपि वृथैव कण्ठशोषणम्, अबाधितप्रत्यभिज्ञया शब्दस्य नित्यत्वसिद्धावपि सहकार्याद्यपेक्षायाः सर्वानुभवसिद्धत्वात् । बौद्धा अपि शब्देर्व्यवहरन्ति अन्यथा समनन्तरवाचोयुक्तेरप्ययोगात् । श्रोत्रमिन्द्रियं सन्निकर्षं शक्तिग्रहं च तेऽप्यभिलषन्ति । न च सहकारिता -धेयातिशयाभावात्तदनपेक्षा, तद्वयक्तौ तदपेक्षाया उक्तत्वात् । यथा सर्वगतापि जातिः पिण्डमपेक्ष्यैव व्यज्यते, तथैवेहापि ज्ञेयम् । न चारोपितोऽप्यतिशयोऽकिञ्चित्करः, समारोपितैरपि कूटकार्षापणैरथं क्रियादर्शनात् । विज्ञाने समारोपितैरेव वस्तुभिविज्ञानवादिनां सर्वोऽपि व्यवहारश्चलति । यदपि च ' सर्वत्रानुपलम्भ: स्यात्तेषामव्यापिता यदि । सर्वेषामुपलम्भः स्याद्युगपद् व्यापिता यदि ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।२५४-२५५ ), तदप्यकिञ्चित्करम्, निरुक्तविकल्पस्य बौद्ध प्रत्यपि सम्भवात् । मीमांसकानां रीत्या व्यापित्वेऽपि प्रमाणवार्तिक में यह भी कहा गया है कि ' शब्द यद्यपि नित्य स्वभाव ही है, किन्तु उसकी अश्रुति किसी सहकारी के वैगुण्य के कारण होती है । इस पक्ष को मानने में यह दोष है कि भले ही उसको अन्य सहकारी के उपकार को प्रतीक्षा रहे, किन्तु इससे इसकी एकस्वभावता का नियम बाधित हो जायगा । यदि शब्द नित्यस्वभाव है, तो उनकी आवरण के कारण अश्रुति नहीं होनी चाहिये । यदि कहीं पर किसी शब्द का ग्रहण अत्यन्त प्रतिनियत सहकारी के कारण माना जाता है, तो इसमें दोष यह होगा कि सहकारी का उपयोग तो किसी कार्य की उत्पत्ति में होता है । यहाँ पर भी इसका उपयोग मानने पर शब्द की नित्यता- अनित्यता से मिला - जुला ज्ञान होगा | इस तरह से जब शब्द भी जिस किसी की अपेक्षा से ही कुछ कार्य करेगा, तब उसमें पूर्व स्वभाव की नियतता कैसे रहेगी? किसी की अपेक्षा रहने से ही सहकारी के स्वभाव का प्रतिलम्भ होगा । यदि इसका अतिशय प्रतिलम्भ नहीं होता, तो उसकी अपेक्षा रखना भी व्यर्थ है । अब यदि अर्थान्तरभूत ( अन्य किसी प्रकार के ) उपकार को प्राप्त करता है, तो उसमें संबन्ध आदि का अभाव बताया जा चुका है और यह अज्ञेय भी है । यदि संबन्ध की सिद्धि के लिये सहकारिकृत उपकार में शब्दकृत उपकार की कल्पना की जाती है, तो वहीं दूसरा और फिर उसके लिये भी दूसरा उपकार मानने में अनवस्था होगी और इस तरह शब्द की अज्ञेयता की आपत्ति उठ खड़ी होगी, क्योंकि अर्थान्तरभूत सहकारी कृत उपकार से ही ज्ञान की उत्पत्ति होगी । इसलिये यह शब्द अपने ज्ञान की उत्पत्ति में इन्द्रिय, संनिकर्ष अथवा अन्य विज्ञान की उत्पत्ति के रूप में स्वात्मस्वरूप की भी अपेक्षा नहीं रखता, क्योंकि नित्य शब्द के लिये इनमें से किसी की भी अपेक्षा नहीं है ' । इस प्रसंग में इसी तरह की और भी बहुत सी बातें कही गई है । किन्तु यह सब वृथा कण्ठशोषण के सिवाय और कुछ नहीं हैं, क्योंकि अबाधित प्रत्यभिज्ञा से शब्द की नित्यता सिद्ध हो जाने पर भी उसमें सहकारी की अपेक्षा रहती है, यह बात सर्वानुभव से सिद्ध है । बौद्ध दार्शनिकों का व्यवहार भी शब्दों से ही चलता है । अन्यथा अभी कही गई बातों की भी प्रवृत्ति न हो पावेगी । श्रोत्रेन्द्रिय, संनिकर्ष और शक्तिग्रह को वे भी मानते हैं । सहकारीकृत आधेयातिशयता के अभाव में pratar क्षा नहीं हो सकती, क्योंकि इस अतिशयिता की अभिव्यक्ति में ही उसकी अपेक्षा मानी गई है । जैसे जाति सर्वगत होते हुए भी पिण्ड की अपेक्षा रखकर ही अभिव्यक्त होती है, उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये । आरोपित अतिशय किसी काम का नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि समारोपित खोटे सिक्कों से अर्थव्यवहार चलता देखा जाता है । स्वयं विज्ञानवादियों का सारा व्यवहार भी विज्ञान में समारोपित वस्तुओं से ही चलता है ।

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४३६ वेदार्थ पारिजातः येषामिन्द्रियसंस्कारस्तेषामेवोपलम्भो नान्येषामित्युक्तत्वात् । अव्यापित्वेऽप्यप्राप्तग्रहणपक्षे न दोषः । ननु तत्रापि योग्यदेशस्थितिविशेषापेक्षाऽयस्कान्तादिवत् । यथायस्कान्तस्याप्राप्ताकर्षकत्वेऽपि नायोग्यदेशस्थित लौहाकर्षणमेवमत्रापि ज्ञेयम् । अन्यथा स्पष्टश्रुतिभेदो न स्यात् । सति च ताल्वादिव्यापारे सर्वत्र दुरे समीपे च तुल्यमुपलभ्येरन्निति चेन्न, बौद्धपक्षेऽप्यस्य चोद्यस्य तुल्यत्वात् । तदुक्तमेव - ' येषामप्राप्त एवायं शब्दः श्रोत्रेण गृह्यते । तेषामप्राप्तितुल्यत्वं दुरव्यवहितादिषु । ' तत्र दूरसमीपस्थग्रहणाग्रहणे समे । स्यातां न च क्रमो नापि तीव्रमन्दादिसम्भवः ॥ ' यदप्युक्तम् -- ' यस्थ स्पष्टास्पष्टप्रतिभासानि सर्वाण्येव ज्ञानान्यभ्रान्तानि 2 तस्यायं दोषो न वौद्धस्यास्पष्ट-प्रतिभासस्य ज्ञानस्य भ्रान्तत्वाभ्युपगमात्, अपरापरदेशोत्पत्त्या चागच्छतः शब्दस्य ग्रहणात् क्रमो गृह्यते, कर्णदेशे च तीव्रस्य शब्दस्य मन्दस्य चोत्पत्तेस्तीव्रमन्दादिसम्भव इति, तदेतत्कर्णस्पर्श कटिचालनम् अप्राप्तस्यापि ग्रहणे स्पष्टास्पष्ट-प्रतिभास हेतोरनिरूपणात् । न चास्पष्टप्रतिभासज्ञानानां भ्रान्तत्वाम्युपगम एवोक्तवोद्यसमाधानम्, अन्यैरपि यथा दूरे रूपं रजोनीहारादिसंसृष्टमस्पष्टं गृह्यते, समोपे तु तदभावान् स्पष्टम्, तथा शब्दोऽपि स्पष्टास्पष्ट प्रतिभास: । तदुक्तम्-' दूरासन्नादिभेदेन स्पष्टास्पष्टः प्रतीयते ' इति । यदपि रजोनीहारादेः संसृष्टता ग्रहणं यदि तावत् तयोः पृथक् पृथग्ग्रहणम्, तदा दूरासन्नवर्तिनोः पुरुषयोस्तुल्यो रूपप्रतिभासः स्यात् यथावस्थितेन स्वरूपेण ग्रहणात् । अर्थकत्वेन तयोग्रहणं वासिक में यह भी कहा गया है कि ' यदि शब्द अव्यापक हैं, तो उनकी सर्वत्र उपलब्धि न होगी । अब यदि व्यापक है, तो सभी शब्दों का एक साथ ज्ञान मानना पड़ेगा । यह कथन भी अर्कचित्कर है, क्योंकि यही विकल्प बौद्ध मत के विरुद्ध भी प्रयुक्त किया जा सकता है । मीमांसकों के मत से शब्दों के व्यापक होने पर भी जिनको इन्द्रियों का संस्कार हो जाता है, उन्हीं में शब्द ग्रहण की शक्ति आती है, अन्यत्र नहीं । अव्यापक पक्ष में भी जिसका ग्रहण नहीं हुआ है, उसका ज्ञान न होगा, इस तरह से वहाँ पर भी कोई दोष नहीं है । प्रश्न है कि ' यहाँ पर भी अयस्कान्त ( चुंबक ) की तरह योग्य देश में स्थितिविशेष को अपेक्षा रहेगी । जैसे अयस्कान्त में अप्राप्त लोह के आकर्षण को सामर्थ्य है, किन्तु यह कार्य यदि लोह उसकी आकर्षण शक्ति के भीतर के प्रदेश में स्थित है, तभी वह ऐसा कर सकता है, इसी तरह अभ्यत्र भी समझना चाहिये । अन्यथा स्पष्ट और अस्पष्ट श्रुति का भेद नहीं रहेगा और तालु प्रभृति के व्यापार होने पर सभी जगह, वह दूर हो या समीप, एक सी शब्द की प्रतीति माननी पड़ेगो ' । इसका भी उत्तर यह है कि यह प्रश्न बौद्ध पक्ष में भी समानरूप से उठाया जा सकता है । जैसा कि कहा गया है ' जिनके मत में श्रत्र देश में अप्राप्त शब्द का भी श्रवण माना जाता है, उनकी अप्राप्ति, वह दूर अथवा व्यवहित हो या समाप, अथवा अभ्यवहित एक सी हैं । इस परिस्थिति में के और समीप के शब्दों की श्रुति समान माननी पड़ेगी । यहाँ पर किसी क्रम की और वोव्रत्व, मन्दत्व आदि की प्रतीति संभव न हो सकेगी । यह भी कहा गया है कि- ' जिसके मत में स्पष्ट प्रतिभास और अस्पष्ट प्रतिभास सभी ज्ञान यथार्थ हैं, उभी के मत में यह दोष हो सकता है । यह दोष बौद्ध मत में नहीं आ सकता, क्योंकि उनके मत में अस्पष्ट प्रतिभास वाले ज्ञान को भ्रान्त मानते हैं । एक से दूसरे देश में उत्पन्न होकर आते हुए शब्द का ग्रहण होता है, अतः उसमें क्रम का भी ग्रहण माना जाता और कर्ण प्रदेश में तीव्र और मन्द शब्द की उत्पत्ति के आधार पर शब्द में तीव्रत्व, मन्दत्व आदि का भी बोध माना जा सकता है । किन्तु ये सब बातें कान पकड़ने पर कटिचालन के समान हैं, क्योंकि अप्राप्त का भी यदि ग्रहण माना जाता है, तो स्पष्ट प्रतिभास और अस्पष्ट प्रतिभास का क्या कारण है? इसका कोई जवाब नहीं बन पाता । अस्पष्ट प्रतिभास वाली प्रतीतियों को भ्रान्त मान लेना हो उनका एकमात्र समाधान नहीं माना जा सकता । जैसे धूल, नोहार ( धुन्ध ) आदि से भरे आकाश में दूर की वस्तु अस्पष्ट प्रतीत होती है और समीप की वस्तु स्पष्ट, उसी तरह से शब्द का भी स्पष्ट और अस्पष्ट प्रतिभास भी होता है । जैसा कि कहा गया है- ' दूर और आसन्न ( समीप ) के भेद से शब्द की स्पष्ट और अस्पष्ट प्रतीति होती है । यह जो कहा जाता है कि ' रज, नोहार प्रादि की संसृष्टता का ग्रहण ही यदि इनका पृथक - पृथक ग्रहण माना जाता है, तो दूर और आसन्न प्रदेश में रहने वाले दो परुषों को एक सी रूप की प्रतीति होनी चाहिये, क्योंकि इनको यथावस्थित स्वरूप का ग्रहण होता है । अब यदि उनका एकत्वेन ग्रहण संसृष्टता ग्रहण है, तो फिर अस्पष्ट विभा

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वेदार्थपारिजातः I संसृष्टताग्रहणं कथमस्पष्टप्रतिभासं ज्ञानं भ्रान्तं न स्यात्, भिन्नानामेकत्वग्रहणात् । कथं चैकस्य रूपस्यानेकाकारप्रतिभासः । ' जातीनामाश्रयोऽन्योन्यश्चेतमा तस्य वस्तुनः । एकस्यैव कुतो रूपं भिन्नाकारावभासितात् ॥ ' इति, तदपि तुच्छम् । ननु देशकालादिव्यापितास्तु ' यस्माच्छन्दस्य नित्यत्वं श्रोत्रजप्रत्यभिज्ञया । विभुत्वं च स्थितं तस्य कोड-व्यवस्येद्विपर्ययम् ॥ देशभेदेन भिन्नत्वमित्येतच्चानुमानिकम् । प्रत्यक्षस्तु स एवति प्रत्ययस्तस्य बाधकः । पर्यायेण यथा लोके भिन्नान् देशान् व्रजन्नपि । देवदत्तो न भिद्येत तथा शब्दो न भिद्यते ॥ तस्माद्या सर्वकालेषु सर्वदेशेषु चैकता । प्रत्यक्षप्रत्यभिज्ञानप्रसिद्धा सास्य वाधिका ॥ ' तस्माद् व्यापिनः शब्दाः । ननु तथापि व्यापित्वे युगपदुलम्भः स्यात्, नहि शब्दः क्वचिन्नास्तीति सर्वेऽपि शब्दाः सर्वदेशावस्थिते-युगपदुपलभ्येरन्, योग्येन्द्रियत्वात् विषयसन्निहितत्वाद् अनुपलम्भहेतोरभावाच्चेति चेन्न, संस्कृतस्य शब्दस्य संस्कृतेन्द्रि येोपलम्भनियमात् । तदुक्तम्- ' प्रयत्नमिह वो वायुः कोष्ठ्यो यातीत्यसंशयम् । कर्णव्योमनि निष्पन्ना शक्ति: श्रोत्रे नियच्छति ॥ ( श्लो ० वा ० १२२/१२४ ) यदुक्तम् - ' संस्कृतस्योपलम्भे च कः संस्कर्ता विकारिणः । इन्द्रियस्य च संस्कारः शृणुयान्निखिलं च तत् ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।२५५-२५६ ), तदपि यत्किञ्चित् कण्ठताल्वभिहतवायुना स्तिमितवायुत्सारणेन च शब्दस्येन्द्रियस्य च संस्कारसम्भवात् । न चानाधेयविकारस्य संस्कारायोग इति वाच्यम्, स्तिमितवायुरूपावरणापनयनस्यैव तत्संस्कार-त्वात् । न च तहि यस्येन्द्रियसंस्कारः स युगपत्सर्वान् शब्दान् शृणयाद् इति वाच्यम्, संस्कारप्रतिनियमेन तददोषात् 1 का ग्रहण भ्रान्त नहीं होगा, क्योंकि भिन्नों का एकत्वेन ग्रहण होगा । एक रूप का अनेकाकार प्रतिभास कैसे हो सकता है ' । इनमें परस्पर एक दूसरे को बौद्धिक आश्रयता मानी जाती है । ऐसी परिस्थिति में वस्तुतः एक ही वस्तु को free free आकारों में प्रतीति कैसे हो सकती है । किन्तु यह कथन भी बहुत हलका है, क्योंकि ध्वनि, अभिव्यंजक आदि के भेद से स्पष्टता, अस्पष्टता आदि का उपपादन शब्द में किया जा चुका है । Recent rate era t aurte are fa या जाय, क्योंकि ' जब श्रोत्रेन्द्रियजन्य प्रत्यभिज्ञा से शब्द की नित्यता और भुता सिद्ध हो जाती है, तो इसके विपरीत अध्यवसाय ( निश्चय ) कैसे हो सकता है । देशभेद से शब्दभेद की प्रतीति केवल आनु arfe है | ' यह वही है ' इस तरह का प्रत्यक्षाधारित प्रत्यभिज्ञा प्रत्यय उसका बाधक है । पारो पारी से अनेक भिन्न स्थानों में जाने पर भी जैसे देवदत्त व्यक्ति सर्वत्र एक ही माना जाता है, उसी तरह से शब्द की भी भिन्नता नहीं मानी जा सकती । क्योंकि शब्द में सर्व काल में और सर्व देश में जो एकता की प्रतीति प्रत्यक्ष तथा प्रत्यभिज्ञा के आधार पर होती है, वही प्रतीति शब्द में अनेकता की बाधक है । ऐसी परिस्थिति में शब्दों को व्यापक मानना ही ठीक है । ' प्र है कि ' यदि ये व्यक्त हैं वो इनकी एक साथ उपलब्धि होती रहेगी, कहीं भी शब्द न हो, ऐसा नहीं हो सकता । इस तरह से सभी शब्द सभी देशों में स्थित व्यक्तियों के द्वारा एक साथ गृहीत होने चाहिये, क्योंकि इसको ग्रहण करने में समर्थ safe famera है, विषय भी संनिहित है और इसकी अनुपलब्धि का कोई कारण भी यहाँ उपस्थित नहीं है । ' इसका समाधान यह है कि संस्कृत शब्द की संस्कृत इन्द्रियों से ही उपलब्धि हो सकती है । जैसा कि कहा गया है- ' आपका कोष्ठच वायु प्रयत्न से प्रेरित होता है, यह निःसन्देह ठीक है । श्रोत्रेन्द्रियवर्ती आकाश में ही उस शब्द को सुनने की शक्ति मानी जाती है । ' प्रमाणवार्तिक में ही जो यह कहा गया है कि- ' यदि आप संस्कृत शब्द की ही उपलब्धि मानने के पक्ष में हैं, तो आप यह बताइये कि नित्य अविकारी शब्द का संस्कर्ता कौन होगा? यदि आप इन्द्रिय का संस्कार मानें तो ऐसा मानने पर वह इन्द्रिय सारे शब्द समूह को सुनने लगेगी । ' किन्तु यह कथन भी कुछ नहीं है, क्योंकि कण्ठ तालु आदि से अभिहत पचन से स्तिमित वायु के उत्सारण से शब्द और इन्द्रिय दोनों का संस्कार होता है । ' जिसमें विकार का आधान नहीं होता, उसका संस्कार भी नहीं माना जा सकता, यह कथन भी गलत है, क्योंकि स्तिमित वायुरूप आचरण का अपनयन ही वहीं संस्कार माना जाता है । इससे यह भी नहीं कहा जा सकता कि जिस इन्द्रिय का संस्कार हो गया है, वह एक साथ सभी विषयों को ग्रहण करने लगेगी, क्योंकि संस्कार को

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I तथाहि केनचित्संस्कृतमिन्द्रियं कस्यचिदेव ग्राहकमिति न युगपत् सर्वश्रुतिः । न चैवं संस्कारविशेषात् श्रुतिनियमेऽभ्युप-गम्यमानेऽनेकशब्दसङ्घातस्य कलकलशब्दस्य श्रुतिर्न स्यात्, तत्र भिन्नस्वभावानां युगपच्छ्वणात् स्वभावभेदाश्रयत्वाच्च व्यवस्थितेरिति वाच्यम्, तत्र देशविशेषस्थितानां बहूनां कण्ठतालवाद्यभिघातेन प्रतिनियतानामेव बहूनामेव शब्दानां समभिहारेण प्रतिवद्धानामेव कलकलशब्दत्वात् समभिहारस्य स्पष्टग्रहणे प्रतिबन्धकत्वात् । अनेक शब्दश्रवणान्यथा-नुपपत्या s पीन्द्रियस्यानेक संस्कारवत्त्वकल्पनोपपत्तेश्च । यच्च प्रयत्नाभिहतैर्वायुभिराधीयमानाः संस्कारा यदीन्द्रियादभिन्नास्तदा तेषां बहुत्वं स्यात्, भिन्नाश्चेत्कथं सहि तैरिन्द्रयं संस्कृतम्? तस्य संस्कार इति सम्बन्धश्च न सिद्ध्यति । ये च निष्पन्ने भवन्ति ते कथं तत्स्वभावा-विरुद्धधर्माध्यासादिति, तदप्यपास्तम्, लोके मलापनयनातिशयाधानादिलक्षणस्य संस्कारस्य संस्कार्य्यभिन्नत्वतत्सम्बद्ध-त्वादिरूपेणैवानुभवाद् निष्पन्न एव संस्कारा भवन्ति । केचित्तु न कलकले युगपदनेकशब्दश्रवणम्, किन्तु क्रमेणैवैकः शब्दः श्रूयते । तानि च श्रवणज्ञानानि लघुवृत्तीनि तत एव क्रमेण गृह्यमाणेष्वपि सकृच्छ्र तिर्भ्रान्तिरेव । ननु तहि तदा वंशादिस्वरधारागमकावयवानामप्येकी-करणात् सङ्कुलाप्रतिपत्तिः स्यात्, न त्वसंसृष्टगमकावयवानामनुक्रमवती । तस्माद् गती शक्तिप्रतिनियमादिन्द्रियस्थाने-कात्मा कलकलो न श्रूयते, तदपि तुच्छम्, तत्र क्रमप्रतिपत्तेः सुस्पष्टत्वात् । एकत्वप्रतिपत्तिस्तत्रापि भ्रान्तिरेव । केचित्तु - ध्वनयस्तत्र श्रूयन्ते न वाचका वर्णात्मानः शब्दाः श्रूयन्ते । ननु ध्वनिभ्यो भिन्ना न वर्णा नाम, ध्वनिविशेषस्यैव वर्णत्वादिति, तदप्यविचारितरमणीयम् बोधकत्वाबोधकत्वाभ्यां तद्भेदस्य सुस्पष्टत्वात् । विशेषस्य विशेषिभिन्नत्वेनापि तद्भेदसिद्धिः । अभेदत्वे विशेष विशेषिभावानुपपत्तिश्च । नियमितता के कारण इस दोष की प्रसक्ति नहीं होगी । जैसे कि किसी वस्तु से इन्द्रिय का संस्कार होने पर वह किसी एक हो विषय की ग्राहक हो सकती है, अतः युगपत् सर्वभूति की आपत्ति नहीं आवेगी । प्रश्न है कि यदि इस तरह से संस्कार विशेष से श्रुति नियम माना जाता है तो अनेक शब्द संघातरूप कलकल शब्द की श्रुति नहीं होनी चाहिये, क्योंकि यहाँ पर भिन्न स्वभाव शब्दों की एक साथ श्रुति होती है और भेद की व्यवस्था स्वभाव भेद के कारण होती है । उत्तर है कि ऐसे स्थलों में देश विशेष में स्थित अनेक कण्ठ तालु आदि के अभिधान से प्रतिनियत आकार वाले अनेक शब्दों के एक साथ उच्चारण की प्रतिबद्धता के आधार पर कल - कल शब्द उत्पन्न होता है | एक साथ उच्चरित होने से स्पष्ट ग्रहण में बाधा पड़ जाती है और यहाँ हम अनेक शब्दों के ear की अन्यथानुपपत्ति के आधार पर इन्द्रिय के अनेक संस्कारों की कल्पना भी कर सकते हैं । यह भी प्रश्न उठाया गया है कि ' प्रयत्न से अभिहत वायु के द्वारा आधीयमान संस्कार यदि इन्द्रिय से अभिन्न हैं, तो aat aadhar माननी पड़ेगी, यदि भिन्न है तो क्या उनसे इन्द्रिय का संस्कार हुआ? उसके संस्कार तो हैं, किन्तु उससे संबद्ध नहीं है, यह कैसे संभव हो सकता है । वस्तु के निष्पन्न हो जाने पर जो जो संस्कार होते हैं, ये उसके स्वभाव के अविरुद्ध धर्म के अध्यास से कैसे माने जायेंगे । ' इस प्रश्न का भी उत्तर इस तरह से हो जाता है कि दोषों का दूर किया जाना और विशेषता का आधान करना इत्यादि स्वरूप वाले संस्कारों का, जिसका वे संस्कार करते हैं, उनसे अभिन्न और संबद्ध होते हुए ही अनुभव होता है । कुछ लोगों का कहना है कि कोलाहल में एक साथ अनेक शब्द नहीं सुनाई पड़ते, किन्तु क्रम से एक एक शब्द ही सुनाई पड़ता है । इनका श्रावण प्रत्यक्ष अतीव स्वल्प काल का होता है । इसलिये क्रमेण ग्रहण होने पर भी उसकी एक साथ श्रुति एक भ्रान्त प्रतीति है । प्रश्न है कि ' तब बांसुरी आदि की स्वर धारा के गमक अवयवों के एकीकरण से भी संकुल ( मिली - जुली ) प्रतिपत्ति होनी चाहिये, ऐसी अवस्था में गमकों की असंसृष्ट और क्रमवती प्रतीति नहीं होनी चाहिये | इसलिये गति में शक्ति का प्रतिनियम मानने पर इन्द्रिय को अनेकात्मा कोलाहल नहीं दिखाई पड़ता । ' यह कथन भी तुच्छ है, क्योंकि दोनों ही स्थानों में क्रम की प्रतिपति सुस्पष्ट है । एकता की प्रतीति तो वहाँ पर भ्रान्त ही मानी जाती है । कुछ लोगों के मत से ऐसे स्थलों पर ध्वनियों ही सुनाई पड़ती हैं, वाचक वर्णात्मक शब्द नहीं । प्रश्न है कि ध्वनि से भिन्न वर्ण है ही कहाँ? ध्वनिविशेष का ही तो नाम वर्ण हैं । यह प्रश्न अविचारित रमणीय है, क्योंकि बोधकता और अबोधकता के

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वेदार्थपारिजातः ४३६ यदप्युक्तम् -- ' स्थितेष्वन्येषु शब्देषु श्रूयते वाचकः कथम् ' ( प्र ० वा ० ३१२५८ ) । न ध्वनिरतो भिन्नो रूपं सह पृथग् वा । नहि प्रत्यक्षेऽर्थे परोपदेशो गरीयान् । तदयं स्थितेष्वभ्येषु व्यवहर्तृषु केवलमेव शब्दं शृण्वन् तदुपलम्भ-प्रत्ययानां सामर्थ्याभावं प्रत्येति । श्रूयमाणाच्छब्दादन्यस्य ध्वनेर्निष्पादने यदि तदुपलम्भप्रत्ययास्तदन्यनिष्पादने समर्थाः स्युः, तदा तत्साधितमुपलभ्येत, न चोपलभ्यते । न च शब्दजननस्वभावा एवं शब्दोपलम्भप्रत्यया बहुषु व्याहरत्सु कलकले स्वकार्यं मुक्त्वा कार्यान्तरं ध्वनिमारभेरन्निति वाच्यम्, कारणाभेदे कार्यभेदस्यायुक्तत्वात् कारणभेदापेक्षिण: कार्यस्य हेतुत्वप्रसङ्गादिति तन्न, ध्वनेर्वणव्यञ्जकत्वेन तथात्वावगमात् । यथा काष्ठादिव्यञ्जक प्रदेशेऽग्नेर्दर्शनेऽपि काष्ठादिभिन्नत्वमग्ने रभ्युपेयते, तथैव ताल्वादिजन्यध्वनिव्यङ्गत्वेन वर्णानां तत्करणजन्यताप्रतीतिः । प्रत्यभिज्ञा-प्रत्ययेन वर्णानां नित्यत्वसिद्धया तद्भिन्नत्वसिद्धि:, ध्वनिवर्णयोरभेदे ध्वनिमात्रश्रवणेऽप्यर्थप्रतीत्यापत्तिश्च स्यात् । यदुक्तम् -- ' य एव वाचकाः प्रयत्न निष्पन्नास्त एव परस्परसङ्घर्षेण ध्वन्यारम्भकास्तेन कलकले केषाञ्चिद् ध्वनिमात्र -प्रतीतिरन्येषामुभयप्रतीति: ' इति, तदपि प्रतिक्षिप्तं वेदितव्यम्, वाचकानां ध्वनीनामभेदे वर्णानां ध्वन्यारम्भकत्वानुपपत्तेः । वस्तुतस्तु समभिव्याहारस्य प्रतिबन्धकत्वेन ध्वनिव्यङ्गानां वर्णानामनुपलब्धिः । यदुक्तम्- ' कथं वा शक्तिनियमाद्भिन्नध्वनिगतिर्भवेत् ' ( प्र ० वा ० ३१२५ ९ ) । तानि प्रतिनियतशक्तीनोन्द्रि-याणि प्रतिशब्दनियतानानारूपान् शब्दव्यञ्जकान् ध्वनोन् युगपच्छृण्वन्ति शब्दांश्च न शृण्वन्तीति शब्देष्वेषां निर्वेदः । रूप में soft और वर्णों का भेद स्पष्ट है । अर्थात् केवल ध्वन्यात्मक शब्द से किसी अर्थ का ज्ञान नहीं होता और वर्णात्मक शब्द से ज्ञान होता है । अतः दोनों का भेद स्पष्ट है । आपकी रीति से ध्वनिविशेष को ही वर्ण आनने पर भी ध्वनि और वर्ण का भेद सिद्ध हुए बिना न रहेगा, क्योंकि विशेष स्वयं जहाँ वह विशेष होता है, उससे भिन्न है । यदि इनका अभेद माना जाय तो उस अवस्था में विशेष- विशेषभाव भी नहीं बन सकता । यह भी कहा गया है कि ' कलकल safe में यदि वाचक शब्द की श्रुति नहीं होती, ती एकाएक सभी लोगों के चुप हो जाने पर किसी एक शब्द की वाचकता का बोध कैसे होता है । ' इसलिये यह ध्वनि इसके साथ रहे या अलग, इससे भिन्न स्वरूप नहीं है । किसी वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान हो रहा हो, ऐसी अवस्था में उस वस्तु के विषय में दूसरे का उपदेश अधिक वजनी नहीं माना जा सकता । यह श्रोता अन्य व्यवहर्ताओं की उपस्थिति में केवल शब्द को सुनकर उसके उपलम्भ - प्रत्ययों की सामर्थ्य के अभाव को जान लेता है । श्रूयमाण शब्द से अन्य ध्वनि की निष्पत्ति मानने पर यदि उसके उपलम्भ- प्रत्यय उससे भिन्न की निष्पत्ति में समर्थ हों, तो उनकी सिद्ध पदार्थ के रूप में उपलब्धि होनी चाहिये, किन्तु ऐसा होता नहीं । प्रश्न है कि ' शब्दोपलम्भ - प्रत्यय ( शब्द से होनेवाला ज्ञान ) केवल शब्दजनन स्वभाव वाले ही हों, ऐसा भी नहीं है, क्योंकि अनेक व्यक्तियों के एक साथ बोलने पर कलकल ध्वनि में ये अपने कार्य को छोड़कर कार्यान्तर ध्वनि को उत्पन्न करने लगते हैं | उत्तर है कि कारण का भेद न होने पर कार्य में भिन्नता मानना उचित नहीं है । कारण के भेद की अपेक्षा रखने वाला कार्य यदि बिना भेद के पैदा हो जायगी तो वह बिना हेतु के उत्पन्न हुआ है, ऐसा मानना पड़ेगा | किन्तु यह पूरा कथन इसलिये गलत है कि यहाँ पर ध्वनि वर्ण की अभिव्यंजक है, कारक नहीं । अतः कभी - कभी उसकी वर्णरूप में प्रतीति होने लगती है और वर्ण की ध्वनिरूप में प्रतीति हो जाती है । जैसे अग्नि के व्यंजक काष्ठ आदि जहाँ स्थित हो वहीं पर अग्नि के दिखाई देने पर भी वह उनसे भिन्न मानी जाती है, उसी तरह से तालु प्रभृति स्थानों से उत्पन्न ध्वनि से अभिव्यक्त वर्णों की उस स्थान से उत्पत्ति हुई हो, ऐसी प्रतीति होने लगती है । बाद में प्रत्यभिज्ञा प्रत्यय से वर्णों की नित्यता सिद्ध हो जाने पर उनकी saft यों से fraar सिद्ध हो जाती है । ध्वनि और वर्ण का अभेद मानने पर केवल ध्वनि के सुनने से ही अर्थ की प्रतीति की आपति उठेगी । जैसा कि कहा गया है --- ' जो वाचक वर्णं प्रयत्न से निष्पन्न होते हैं, दें ही परस्पर संघर्ष से ध्वनि के आरमक हो जाते है । surfa ये कलकल शब्द में कुछ लोगों को केवल ध्वनिमात्र की प्रतोति होती है, तो दूसरों को दोनों तरह की प्रतीति होती है । ' इसका खण्डन भी कर दिया गया है, क्योंकि वाचक वर्ण और ध्वनि का अभेद मानने पर वर्णों की ध्वनि की आरंभकता ( जनकता ) नहीं बन पावेगी | वस्तुतस्तु समभिव्याहार ( एक साथ उच्चारण ) रूप प्रतिबन्धकता के कारण ध्वनि व्यय वर्णों की उपलब्धि नहीं होती ।

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४४० dardurf रजातः तत्र भावशक्तिरीदृशीति शक्यं वक्तुम्, कदाचिद् बहूनां वाचकानां शब्दानां श्रवणादिति, तदपि न किञ्चित्, समभिव्याहा-प्रतिबन्धकत्वेन वाचकानां शब्दानामनवगमात् । वाचकाच्छन्दादर्थावगतिः, ध्वनिभागाद्वर्णव्यञ्जकान्नार्थ प्रतीतिः । वर्णोऽप्येको नार्थावबोधकः । प्रागेव वर्णव्यञ्जकोऽल्पीयान्तार्थावबोधकः, न च सहिता ध्वनयोऽर्थावबोधका भवितुमर्हन्ति, ध्वनीनां क्षणिकत्वेन साहित्यानुपपत्तेः । तेन वाचकेभ्यः शब्देभ्योऽर्थप्रतीतिर्न ध्वनिभ्यः । तेनाक्रमसत्त्वं शब्दस्य सिद्धमेव । यदप्युक्तम् --- क्रमवद्वर्णव्यतिरेकेण क्रमो नास्त्येवेति 1 तन्न, पौर्वापर्यलक्षणस्य क्रमस्य ध्वनिव्यङ्गयेषु वर्णेषु साधितत्वात् । यदुक्तं वर्णस्य ध्वनिभिन्नत्वे पूर्वेण कर्मभागेनापरस्याप्रतिसन्धानाद् एकांशाच्चाप्रतीतेर्हस्तसंज्ञाशिर: -कम्पादिषु समस्तरूपकर्मात्मा शब्दवदेवाभ्युपगन्तव्यः स्यादिति, तदपि न साधु, सामान्य विशेषसमस्तव्यस्ताभ्युपगमेन समस्तकर्मात्मनस्तत्रैवान्तर्भावात्, सर्वस्य कर्मत्वाविशेषात् । न चैवं ध्वनितद्वचङ्घवर्णेषु वक्तुं शक्यम्, तयोर्वेजात्यस्य स्फुटतरमुपलम्भात् । तदुक्तं मण्डनमिश्रेण -- ' यदा त्रैविद्यवृद्धा हस्तसंज्ञादिविशेषानुत्क्षेपणत्वादिशब्दनिर्देश्यान् सामान्य-विशेषानुपगच्छन्ति, तदा कोऽयं प्रसङ्गः " एकः कर्मात्माभ्युपगन्तव्य: '? यदुक्तम्- ' एकमुत्क्षेपणरूपं कर्मासिद्धम्, तथा पूर्वापरमपि यदि सिद्धं भवेत् तदा तेषु बहुषूत्क्षेपणेषु प्रत्येक मुत्क्षेपणसामान्यमनुवर्तत, तदेव तु न सिद्धम्, पूर्वापरकर्मभागानामनन्वयात् । न च विशेषणाभावे सामान्यसद्भावः, प्रमाणवार्त्तिक में यह भी कहा गया है कि- ' यदि इन्द्रियों के संस्कारविशेष से शब्द विशेष की उपलब्धि का नियम माना जाता है तो शक्तिनियम के आधार पर शब्दविशेष की तरह ध्वनिविशेष को ही प्रतीति होनी चाहिये, ध्वनिवैचित्र्य रूप कलकल aft की प्रतीति कैसे होगी? ' नियत शक्तिवाली इन्द्रियाँ प्रत्येक शब्द के लिये नियत नानारूप शब्दव्यंजक ध्वनियों को एक साथ सुनती हैं और शब्दों को नहीं सुनती तो यह शब्दों के लिये ही उनका वैराग्य क्यों? यहाँ पर उसकी स्वभावशक्ति ऐसी ही है, यही कहना पड़ेगा कि वह कभी बहुत से वाचक शब्दों को भी सुनने लगती है । ' यह कथन भी कुछ नहीं है. क्योंकि समभिव्याहार की प्रति-बन्धकता के कारण वाचक शब्दों की अवगति नहीं होती । वाचक शब्द से अर्थ की अवगति होती है । ध्वनि भाग केवल वर्ण का अभिव्यंजक है | इससे अर्थ की प्रतीति नहीं होती । क्योंकि वह वर्ण का व्यंजक होने के कारण छोटा सा विचारा अपनी शक्ति के क्षीण हो जाने पर अर्थ का ज्ञान नहीं करा सकता । वर्ण भी अकेला अर्थ का बोधक नहीं होता । सब ध्वनियाँ मिलकर भी अर्थ का बोध नहीं कराती, क्योंकि ध्वनियों को क्षणिकता के कारण उनका साहित्य ( सहभाव ) नहीं बन सकता । इस तरह से बाचक शब्दों से हो अर्थ की प्रतीति होती है, ध्वनियों से नहीं । इस तरह से शब्द की अक्रमवत्ता अर्थात् नित्यता सिद्ध है | ' क्रमवान् वर्ण से अतिरिक्त कोई क्रम नहीं है ' यह बात भी गलत है, क्योंकि पौर्वापर्यलक्षण क्रम में सिद्ध किया जा चुका है । यह भी कहा गया है कि ' वर्ण को ध्वनि से भिन्न मानने पर पूर्व कर्म भाग से अपर भाग का प्रतिसन्धान न होने से तथा एक अंश से प्रतीत न होने से हाथ के इशारे, शिर के हिलाने जैसी क्रियाओं में समस्त रूप और कर्म वाली ध्वनि भी शब्द की तरह ही मानी जानी चाहिये । ' यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि सामान्य और विशेष, समस्त और व्यस्त की स्वीकृति के आधार पर समस्त क्रियाओं का उसी में अन्तर्भाव मान लिया जाता है | ये सब क्रियारूप से समान हैं । इस तरह का सादृश्य ध्वनि और तद्वयंग्य वर्णों में नहीं माना जा सकता, क्योंकि इनकी भिन्नता स्पष्ट प्रतीत होती है । जैसा कि मण्डनमिश्र ने कहा है-' जब वृद्ध हस्तसंज्ञा आदि के विशेष इशारों से ' इस वस्तु को उठाओ ' ऐसे शब्दों से ज्ञात होने वाले अर्थ का ज्ञान, चाहे वह सामान्य रूप हो या विशेषरूप से, कर लेते हैं, तो यह कौन सी आफत आ गई कि जिसके कारण एक कर्मात्मक स्वरूप ( शब्द और इशारे ) को आप मान लेने के लिये कहते हैं । ' में होना सिद्ध हो भी जाय तो उन बहुत से यह शंका भी उठाई गई है कि ' एक उत्क्षेपण ( ऊपर उठाना ) रूप कर्म असिद्ध है, यदि इसका पहले होना और बाद उत्क्षेपणों में से प्रत्येक में उत्क्षेपण सामान्य ( जाति ) को अनुवृत्ति मानी जा सके । यही अपर कर्म भागों का परस्पर अन्वय ( संबन्ध ) नहीं बनेगा | विशेषण के अभाव में सामान्य तो सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि पूर्व और