वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 471–480
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 471–480
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वेदार्थपारिजातः ४४१ नापि कर्मभागेषु प्रत्येकमुत्क्षेपणादिरूपतया प्रतीतिः, किं तर्हि तद्भागरूपतया तत्कथं तेषु भागेषूत्क्षेपणत्व सामान्य-मभ्युपगम्येत? अभ्युपगमे वा एकस्मादपि कर्मभागाद् गमनादिलक्षणस्यार्थस्य प्रतिपत्तिः स्यादर्थाभिधायकस्य सामान्यस्या-भावात् । यथा च न कर्मभागेषु व्यतिरिक्तं कर्मात्मा तथा ध्वनि भागेष्वपि न तद्व्यतिरिक्तः शब्दशत्मेति, तदपि न समीचीनम्, मृत्तिकाभागेषु मृत्तिकात्ववत्कर्मभागेषु कर्मत्वाभ्युपगमे बाधाभावात् । न चैवं ततो गमनाद्यर्थप्रतीत्यापत्तिः, तदर्थं कर्मसामस्त्यस्यापेक्षणात् । न चैवं ध्वनिसामस्त्यमात्रेण शब्दार्थप्रतीतिः घण्टाभेरीध्वन्यादिभ्यस्तदप्रतीतेः । यदप्युक्तम्- ' ध्वनयः सम्मता यैस्ते दोषैः कैरव्णवाचकाः । ध्वनिभिर्व्यज्यमानेऽस्मिन् वाचकेऽपि कथं न ते ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।२५ ९ -२६० ), तदप्यकिञ्चित्करम्, वैषम्यात् । तथाहि-- प्रत्येकं समुदिता वा पूर्वोक्तन्यायेन न प्रत्यायकास्तैराभव्यक्तवर्णपदादयस्तु प्रत्यायकाः । एकेन ध्वनना वाचकस्यानववृतत्वादन्यान्ये रभिव्यक्तस्य संस्काराधान-तारतम्यप्रबोधेनावधारणमिति ध्वनिभिव्यंज्यमाने वाचके कुतस्ते दोपाः? तदुक्तं मण्डनेनैव - - ' नानेकावयवं वाक्यं पदं वा स्फोटवादिनाम् । एकत्वेऽपि ह्यभिन्नस्य क्रमशो दर्शिता गतिः ॥ ' यदप्युक्तम् -'अभिव्यक्तिर्ज्ञानम्, तच्च न शब्दानुगमेन विना भवन्मते सिद्धयति । न च प्रथमध्वन्यनन्तरं वाचकनिश्चयश्चेत् कुतोऽभिव्यक्तिसिद्धिरिति, तदप्यकिञ्चित्करम्, रत्नतत्त्वाभिव्यक्तेरिव वाचकव्यक्तेरप्यनेकव्यङ्ग्यत्वे-ऽपि दोषाभावात् । समस्तव्यस्तध्वनीनां स्फुटास्फुटवाचकप्रतिपत्त्युपायत्वात् । अत एव यदुक्तम् -- ' क्रमवद्भिर्ध्वनि भागे क्षणिकैरभिव्यक्तः शब्दात्मा वाचको भवति ' इत्यपि न सम्यक् । ते ध्वनयः शब्दात्मानं न सकृत् प्रकाशयन्ति तेषां क्रमिकत्वात् सकृदनुपस्थितत्वात् । नाप्येक एव ध्वनिभागः शब्दं व्यनक्ति, तदन्यस्य वैयर्थ्यात् । एकवर्णभागकाले च सम-को कोई स्थिति नहीं होती । कर्म के भागों में प्रत्येक की उत्क्षेपण आदि के रूप में प्रतीति होती भी नहीं, किन्तु भागरूपतया ही प्रतीति होती है । इस तरह से उन सब भागों में उत्क्षेपणादि सामान्य ( जाति ) की प्रतीति कैसे हो सकती है? यदि मान भी ली जाय तो एक ही कर्मभाग से गमनादि लक्षण अर्थ की प्रतिपत्ति हो जायगी, क्योंकि यहाँ पर अर्थाभिधायक सामान्य का अभाव है । जैसे कर्मभागों से अतिरिक्त क्रिया का स्वरूप नहीं है, उसी तरह से ध्वनि भागों में उसके अतिरिक्त शब्द का कोई स्वरूप नहीं है । ' किन्तु यह बात भी समीचीन नहीं है, क्योंकि मृतिका के भागों में मृत्तिकात्व की तरह कर्म के भागों में कर्मत्व सामान्य के मानने में कोई arer नहीं है । इतने मात्र से उससे गमनादि अर्थ की प्रतीति की आपत्ति नहीं उठ सकती, क्योंकि उसके लिये सम्पूर्ण क्रिया की अपेक्षा है । इसी तरह से संपूर्ण ध्वनियों के बाद भी शब्द से अर्थ की प्रतीति नहीं होती, क्योंकि घण्टाध्वनि, भेरीध्वनि इत्यादि में यह सामर्थ्य नहीं है, इसलिये उनसे अर्थ की प्रतीति नहीं होती । sarvafir में यह भी कहा गया है कि जिन दोषों के कारण ध्वनियों की वाचकता नहीं मानी गई, वे ही दोष soft से व्यंग्य शब्द की वाचक मानने में भी कैसे नहीं जायेंगे? ' किन्तु यह कथन भी affair है, क्योंकि दोनों में faurat है । जैसे कि पूर्वोक्त न्याय से ध्वनियाँ प्रत्येक अथवा समुदित रूप से प्रत्यायक नहीं हो सकती, उनसे अभिव्यक्त वर्ण पद - आदि हो प्रत्यायक हो सकते हैं । एक ध्वनि से area का free य नहीं हो पाता, इसलिये अन्यान्य ध्वनियों से अभिव्यक्त होने के कारण संस्कार के आधान के तारतम्य के प्रबोध ( ज्ञान ) के अनुसार अर्थ की अवधारणा ( निश्चय ) होती है । इस तरह से ध्वनियों से व्ययमान वाचक ree में ये दोष कैसे आ सकते हैं? इस विषय में भी मण्डनमिश्र ने ही कहा है कि स्फोटवादियों ' के मत में वाक्य अथवा पद में are rare नहीं होते । अभेद रूप से एकता के रहते हुए भी उनमें क्रमिक गति दिखाई जा चुकी है । " यह भी कहा गया है कि- ' ज्ञान एक अभिव्यक्ति है । यह आपके मत में शब्दानुगम के बिना नहीं सिद्ध हो सकती । प्रथम ध्वनि के अनन्तर यदि वाचक का निश्चय हो जाय तो अभिव्यक्ति की सिद्धि कैसे होगी ' । किन्तु यह कथन भी अकिंचित्कर है, रत्न तत्व की अभिव्यक्ति की तरह वाचक तत्व की अभिव्यक्ति भी यदि अनेकाभिव्यङ्य मानी जाती हैं, तो उसमें कोई दोष नहीं है । समस्त और व्यस्त ध्वनियों वाचक की स्फुट और अस्फुट प्रतीति में उपाय मानी जाती हैं । इसीलिये यह जो कहा गया है कि क्रमवा क्षणिक ध्वनि भागों से अभिव्यक्त शब्दात्मा बाचक होता है ' वह ठीक नहीं है । इसीलिये ये ध्वनियाँ शब्दात्मक पदार्थ को एक साथ नहीं प्रकाशित करतीं । ये ध्वनियाँ क्रमशः उत्पन्न होती है, अतः इनकी एक साथ उपस्थिति नहीं हो सकती और न ही एक ध्वनिभाग ५६
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III वनाथपारिजातः स्तस्यानुपलम्भात् । तदयमप्रतिसंहत सकलोपलम्भ उपलम्भसाकल्यसाध्यमर्थ ध्वनिवत् कथं साधयेत्? उपलम्भ-साध्वर्थेषु कोहि सदसतोरत्यन्तानुपलभ्भे सति विशेषो न कश्चित् । यथा हि - क्षणिका ध्वनिभागा उत्तरोत्तरभागा-वस्थायामसत्त्वादसमस्तोपलम्भनान्न समर्थाः, तथैवाक्रमोऽपि शब्दात्मा सतप्यस्वीकृत समस्तोपलम्भनो न समर्थ एव । न च सन्निधिमात्रेण साधनम्, व्यक्तिव्यपेक्षणात् । सा च सतः शब्दात्मनोऽसतश्च ध्वनिभागस्य क्रमेण भवन्ती तुल्यफलेति ध्वनिभिरशक्यसाधनम्, शब्देनापि न साधयितुं शक्यम्, तदपि कुशकाशावलम्बनम्, अनेकाभि ष्टिभो रत्नतस्वस्येवाने-कंर्ध्वनिभिर्वर्णपदादितत्वस्याभिव्यक्तो बाधकाभावस्योक्तत्वात् । क्षणिकत्वस्य च निराकृतत्वात् । क्रमवतीभिरपि दृष्टि-भिर्यकरत्नतत्त्वज्ञानं न विरुद्धयते, तथैव क्रमवद्भिरपि ध्वनिभिध्वनिभार्गव वाचकतत्वाभिव्यक्तिर्न विरुद्वयते । स्फोट-वादिनां मतेन वाचकस्यासाकल्येनोपलम्भः सम्भवति, तस्थानवयवत्वात् । न सन्निविमात्रेण साधनमित्यप्यनुक्तो -पालम्भ:, स्फोटात्मनः स्फुटत्वादेव । ' वर्णा एव तु शब्द इति भगवानुपवर्ष: ' इत्यम्युपगन्तॄणां मीमांसकानामपि मते सेनावनप्रत्ययवद् वणषु पदादिप्रत्ययः स्फुटएव ततश्च क्वानुपलम्भप्रसक्तिः? एतेन वर्णभागाः कर्मभागा वा क्रमेण विकल्पविषया इत्यनु-ज्ञानानुक्रमानुसारिणां विकल्पानां क्रमेण विषयमुपगता यथासङ्केतमेवार्थप्रतीति जनयन्तीति बौद्धोक्तिरपि पराहता, विकल्पविषयाणामसत्त्वादसतां चार्थप्रतीतिजनकत्वानुपपत्तेः । ' नानात्वाच्च ध्वनीनां हि वाचकस्य त्वभेदतः । ध्वनि -भिर्व्यज्यमानेऽस्मिन्न ते दोषा भवन्ति हि ॥ शब्द को अभिव्यक्त करता है, क्योंकि ऐसा मानने पर अन्य भागों की व्यर्थता हो जायगी । एक वर्णभाग के काल में समस्त भागों की उपलब्ध भी नहीं होती । इसलिये ऐसी उपलब्धि, जिसमें संपूर्ण भागों का अनुसन्धान नहीं हुआ है, वह संपूर्ण भाग का अनुसन्धान वाली उप से साध्य अर्थ को ध्वनि की तरह कैसे सिद्ध करेगी? उपलम्भ साध्य श्रथों में सत् की और असत् ( विद्यमान- अविद्यमान ) की अत्यन्त अनुपलब्ध होने पर क्या विशेषता न्ह जायगी? जैसे कि क्षणिक ध्वनिभाग उत्तरोत्तर भागावस्था में अपनी असत्ता के कारण संपूर्ण भागों की उपलब्धि न होने से समर्थ नहीं माने जाते, उसी तरह से अक्रमात्मा शब्दात्मक तत्व का अस्तित्व मानने पर भी उसकी समस्त उपलब्धि न मानने से वह भी समर्थ न होगा । कोई वस्तु सन्निषि मान ' साधन नहीं हो जाती, उसकी अभिव्यक्ति की अपेक्षा रहती है । यह अभिव्यक्ति शब्दात्मक सत्तत्व के और अदात्मक ध्वनिभाग के क्रम से होती हुई समान फल देती है । इसलिये frent सिद्धि ध्वनि से न होगी, उसको सिद्ध करने में शब्द की भी सामर्थ्य नहीं मानी जा सकती ', किन्तु यह पूरा कथन कुशकाशाव-लम्बन तुल्य है, क्योंकि यह बाल कई बार कही जा चुकी है कि जैसे रत्न की परीक्षा में अनेक दृष्टियों का समान उपयोग माना जाता है, उसी तरह से अनेक व्वनियों से वर्ण, पद आदि तत्वों की अभिव्यक्ति में भी कोई बाधा नहीं है । क्षणिकता का हम निराकरण कर चुके हैं । क्रमवती दृष्टियों से जैसे एक रजतस्व की परीक्षा में कोई विरोध नहीं उठता, उसी तरह से क्रमवती ध्वनियों अथवा after a तस्व की अभिव्यक्ति में भी कोई विरोध नहीं है | स्फोटवादों के मत में वाचक की असाकल्येन प्रतीति नहीं होती, afe वह निर ara होता है । संनिधिमान से कोई साधन नहीं होता, यह वो हमारे लिये अनुक्त उपालम्भ है, क्योंकि इनमें स्फोटात्मक शब्दवस्फुट है । ' वर्ण ही शब्द है, यह भगवान् उपवर्ष आचार्य का कहना है ' इस मत को मानने वाले मीमांसकों के मत में सेना और वन की प्रीति की तरह वर्णों में पदादि प्रत्यय स्पष्ट ही है, तब अनुपलम्भ की प्रसक्ति कहाँ होगी? इतना मानने से ' वर्णभाग और भाग की क्रमेण विकल्पविषयता के कारण अनुभव ज्ञान के अनुक्रम के अनुसारी विकल्पों के क्रम से विषयभाव को प्राप्त होकर संकेत के अनुसार ही अर्थप्रतीति को उत्पन्न करते हैं, यह बौद्ध मत भी खण्डित हो जाता है, क्योंकि विकल्प के विषय असत होते हैं और असत् पदार्थों में अर्थ की प्रतीति की जनकता नहीं मानी जा सकती । ' ध्वनियाँ अनेक प्रकार की हैं और वाचक शब्द की अभेदता है | aft यों से इसकी अभिव्यक्ति मानने पर वादियों के द्वारा उठाये गये किसी भी दोष की प्रसक्ति नहीं हो पाती ' ।
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वदार्थपारिजा वर्णानुपूर्वो fear ४४ * अत्र धर्मकीति: -- ' बर्णानुपूर्वी वाक्यं चेन्न वर्णानामभेदतः । तेषां च न व्यवस्थानं क्रमान्तरविरोधिनः ॥ ' ( प्र ० वा ० ३।२६०-२६१ ), न वर्णव्यतिरिक्तं शब्दरूपं वाक्यमपौरुषेयम्, किन्तर्हि वर्णानुक्रमलक्षणं हि वाक्यमपौरुषेय-मिति चेन्न, वर्णानामानुपूर्व्या अभेदात् । तस्यां दश्यायां भेदेनोपलम्भ: स्यात्, अदृश्यायां ततोऽप्रतिपत्तिः । अनिरूपणाच्च भेदवत्याश्चानुपूर्व्या अभावे वर्णमात्रमवशिष्टमिति पूर्वप्रसङ्गः । सा च नाकृतका, यतो वर्णाश्च न बहवः समानजातीया येन केनचिद् व्यवस्थितक्रमाः स्युर्वेदिका अन्ये च यथेष्टपरावृत्तयः, किन्तर्हि त्रैलोक्य एक एवाकारस्तथा पकारोऽपि व्यवस्थित एव स्यात् । तथा चाग्निरेव स्यात्, न गगनमिति, अकारगकारयोः पूर्वापरभावस्य व्यवस्थितत्वात् । कृतकानामपि हेतुपरिणामनियमवतामशक्यः क्रमविपर्ययः कर्तुम् । बोजाङ्कुरकाण्डादीनां हेमन्तादिलक्षणानामृतूनां शोक-बार्हस्पत्यादिवत्सराणामपि क्रमविपर्ययो न शक्यः कर्तुम् । किं पुनरप्रचलितावस्थास्वभावानामकृतकानां कथञ्चिक्ष् व्यवस्थितानाम्, पूर्वावस्थायास्त्यागमन्तरेणान्यथाभावायोगात् । त्यागे वा विनाशप्रसङ्गः । विशेषेण नित्यायामानु-पूर्व्यामपि प्रतिपदं वर्णान्यत्वेऽपूर्वाणामुत्पादाद्वा वर्णबाहुल्यं तच्च नाभिमतं मीमांसकानामिति ', तदेतन्मीमांसावृत्तान्तान-वर्णापूर्वी पर विचार इस विषय पर धर्मकीर्ति का कहना है कि ' यदि आप वर्णों की आनुपूर्वी ( परिपाटी विशेष ) को वाक्य कहते हैं, जिसकी कि प्रतीति सबको होती है, तो यह संभव नहीं है, क्योंकि वर्णों की भिन्नता नहीं मानी जाती, अर्थात् वर्णों के अतिरिक्त किसी आनुपूर्वी की प्रतीति नहीं होती, इसलिये वर्णों को ही वाक्य कहा जाता है । लोकिक और वैदिक वाक्यों में कोई अन्तर नहीं है, विशेष आनुपूर्वी वाले वर्ण ही वैदिक वाक्य होते हैं, ऐसा कोई नियम नहीं हैं । इस परिस्थिति में लौकिक वाक्यों के क्रम से वैदिक वाक्यों में क्रम के भेद की आपत्ति उठेगी ' । वर्णों से अतिरिक्त शब्दरूप वाक्य अपौरुषेय नहीं होता, किन्तु वर्णानुक्रम लक्षण वाक्य ही अपौरुषेय माना जाता है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि वर्णानुपूर्वी में कोई भेद नहीं है । बस आनुपूर्वी को यदि दृश्य माना जाय तो उसकी भेद रूप से उपलब्धि होनी चाहिये, यदि वह अदृश्य है तो उससे किसी की उपलब्धि में सहायता नहीं मिल सकती । भेदवती आनुपूर्वी का निरूपण न होने से जब जानुपूर्वी का ही अभाव है तो वर्णमात्र ही तो बचा, यह तो पूर्व की स्थिति पर हो हम आ गये । यह आनुपूर्वी अकृतक नहीं हो सकती, क्योंकि समानजातीय बहुत से वर्ण जिस किसी प्रकार से क्रमशः व्यवस्थित होकर वैदिक कहलाते हैं और लौकिक वर्णं यथेष्ट परावृत्ति वाले हैं, ऐसा नहीं है, किन्तु जैसे में मकार एक ही है, उसी तरह से कार का स्वरूप भी व्यवस्थित ही होगा । यह अग्नि ही है, गगन ( आकाश ) नहीं, यहाँ अग्नि और गगन में अकार और कार का पूर्वापरभाव रूप क्रम व्यवस्थित है | aar ( पैदा होने वाले ) पदार्थों में कारण के परिणाम or free विद्यमान हैं । वहाँ पर भी क्रम का विपर्यय नहीं किया जा सकता । बीज, अंकुर और काण्ड का, हेमन्त प्रभृति ऋतुओं का और ' शौक, बार्हस्पत्य आदि वत्सरों का क्रम बदला नहीं जा सकता | इस परिस्थिति में जिनकी अवस्था और स्वभाव में कोई अस्थिरता नहीं या सकती, ऐसे अकृतक ( नित्य ) पदार्थों में जिस रूप में व्यवस्थित हैं, उस पूर्वावस्था का त्याग किये बिना अन्यथाभाव की स्थिति कैसे आ सकती है? यदि वे अपनी पूर्वावस्था का त्याग करते हैं तो यह उनका विनाश ही माना जायगा । विशेषरूप से नित्य आनुपूर्वी में भी प्रत्येक पद में वर्णों की भिन्नता मानने पर अथवा अपूर्व वर्ण का उत्पाद मानने पर वर्णों का बाहुल्य मानना पड़ेगा, जो कि मोमांसकों को अभिप्रेत नहीं | किन्तु धर्मकीर्ति का यह १ शुक्र की गति के अनुसार होने वाले वर्ष को शौक वर्ष कहा जा सकता है, किन्तु यह वर्ष ज्योतिष शास्त्र में कहीं नहीं माना गया, क्योंकि शुक्र की गति सूर्य, मंगल और बुध ग्रहों की गति के समान है । इसलिये सौर वर्ष ( सूर्य संबन्धी ) से भिन्न कोई शौक़ वर्ष नहीं हो सकता, किन्तु बोद्ध दार्शनिक धर्मको को इन बात का ज्ञान नहीं । इसलिये उसमें बास्पत्य वर्ष के समान शौक वर्ष भी लिख दिया । बृहस्पति की गति तो सूर्य की गति से भिन्न है । सूर्य एक राशि को ( और शुक्र भी ) लगभग एक महीने में पार करता है, किन्तु बृहस्पति एक राशि को तेरह महीने में पार करता है । इसीलिये सौर वर्ष १२ महीने का और बार्हस्पत्य वर्ष १३ महीने का माना जाता है । शुक्र का कोई पृथक वर्ष नहीं है ।
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वार्थपारिजातः भिज्ञानविजृम्भितम्, वर्णानां नित्यत्वेऽपि कृतकानां वर्णव्यक्तीनां कालकृतपौर्वापर्यलक्षणस्यानुक्रमस्य वर्णधर्मत्वाङ्गी कारेणादोषात् | व्यक्तीनां नानात्वेन क्रमनानात्वमपि न विरुद्धयते । पारम्पर्य प्राप्तस्यैव क्रमस्योपयोग इति तत्कार्य-स्वमपि } । क्रमाणां नानात्वेन तद्भेदो न विरोधावहः । आनुपूर्व्या वर्णधर्मत्वे नोक्तदोषः प्रसज्यते । व्यक्तिभेदकृतो भेदो क्रमनिष्ठो न दोषभाक् । तदुक्तम्- ' धर्ममात्रमसौ तेषां न वस्त्वन्तरमिष्यते । क्रमेण ज्ञायमानाः स्युर्वर्णास्तेनावबोधकाः || न च क्रमस्य कार्यत्वं पूर्वसिद्धपरिग्रहात् । वक्ता नहि क्रमं कश्चित् स्वातन्त्र्येण प्रपद्यते ॥ यथैवास्य परैरुक्तस्तर्थवेनं विवक्षति । परोऽप्येवं सतश्चास्य सम्बन्धवदनादिता ॥ ' व्यक्तीनां भेदेऽपि न वस्तुतो गकारादीनां भेद इत्यपि स्फुटम् । ' देशकालप्रयोक्तृणां भेदेऽपि च न भेदवान् । गादिवर्णो यतस्तत्र प्रत्यभिज्ञा परिस्फुटा ॥ ' अपि च, वर्णेषु पौर्वापर्यमन्तरा पदवाक्यत्वादिकं दुर्घटमित्यान सर्वैरपि तदभ्युपगन्तव्यम् । पौर्वापर्यानुभूतिरपि नापलपितुं शक्या | प्रत्यभिज्ञानाच्च वर्णानां नित्यत्वमपि स्फुटम् । तेन वर्णव्यक्तिद्वारैव तद्वक्तव्यम् । तेन न तत्र कृतकपक्षदोपाः, नित्यत्वेऽपि व्यक्तिद्वारैव पौर्वापर्योपपत्तेः । नापि कृतक-पक्षदोषाः, वीजाङ्कुरादीनां यथा पौर्वापर्यं दृष्टं तथैवैषु पौर्वापर्यलक्षणस्यानुक्रमस्य भेददर्शनात् । यदपि ' अनित्यता-व्याप्तितायां च दोषः प्रागेव कीर्तितः ' ( प्र ० वा ० ३।२६३ ) इति, तदनभ्युपगमादेव पराहतम् । विभुषु नित्येषु वर्णेषु देशकालकृतस्यानुक्रमस्यासम्भवादेव वर्णव्यक्ति कालकृतोऽनुक्रमोऽभ्युपेयते । यदप्युक्तम् —– ' अनित्यध्वनिकार्यत्वात्कमस्यातो विनाशिता । पुरुषाधीनता चास्य तद्विवक्षावशा स्थिता || ' व्यापित्वाद्वर्णानां योगपद्यम् । व्यापित्वविरोधी क्रमः क्रमविरोधि च व्यापित्वम् । क्रमश्चेदिष्यते व्यापित्वग्राहि सब कथन मीमांसा सिद्धान्त को ठीक से न समझ पाने के कारण है । वर्णों के नित्य मानने पर भी पैदा होने वाली वर्णों की अभिव्यक्ति में कालकृत पौर्वापर्यलक्षण अनुक्रम को वर्णों का लाक्षणिक धर्म मान लेने से उक्त दोष का परिहार हो जायगा | अभिव्यक्तियों के भेद के कारण क्रम के नानात्व ( भेद ) में भी कोई विशेष नहीं उठता । परम्परा से प्राप्त क्रम का ही उपयोग होता है, अतः उसको कार्य भी कह सकते है । क्रमों के नानात्व के कारण इनमें भेद माता भी विरोध का कारण नहीं बन सकता । आनुपूर्वी को वर्ण का धर्म मानते पर उक्त दोष नहीं प्रसक्त होंगे । अभिव्यक्ति के भेद से निष्पादित भेद कमनिष्ठ है, अतः वहाँ पर यह भी दोषावह नहीं है । जैसा कि कहा गया है -- ' यह आनुपूर्वी उनका धर्ममात्र मानी जाती है, इसको एक पृथक पदार्थ नहीं माना जाता । अतः क्रमेण ज्ञानमान वर्ण अववोधक माने जायेंगे! इस आनुपूर्वी को कार्य भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि यहां पर केवल पूर्वसिद्ध क्रम का ही सहारा लिया जाता है | कोई भी वक्ता अपनी स्वतन्त्र इच्छा के अनुसार क्रम को बना या बदल नहीं सकता । यह वक्ता अपने पूर्व पुरुषों से सुने हुए क्रम को उसी रूप में कहना है और इसी तरह से दूसरा व्यक्ति भी इसी परिपाटी को दुहराता है | अतः इस परिपाटी की सतत विद्या के कारण शब्दार्थ संबन्ध के समान यह भी अनादि काल से चली आ रही है ' । व्यक्तियों के भेद के रहते भी वस्तुतः कारादि का भेद नहीं रहता, यह स्पष्ट है । ' देश, काल और प्रयोक्ताओं का भेद रहते भीग आदि वर्णों की भिन्नता नहीं होती, क्योंकि स्पष्ट प्रत्यभिशा के आधार उनका अभेद सिद्ध होता है । दूसरी बात वर्णों में tat far as ाक्य आदि की घटना भी नहीं बन सकती, न चाहते हुए भी यह बात आपको माननी पड़ेगी । पौर्वापर्य की अनुभूति का पता भी नहीं किया जा सकता । प्रत्यभिज्ञा के सहारे वर्णों की नित्यता भी स्पष्ट है । वर्ण की अभिव्यक्ति के द्वारा ही यह मानना पड़ेगा । अतः यहाँ पर अकृतक ( नित्य ) पक्ष में उठने वाले कोई दोष नहीं रहेंगे, क्योंकि नित्यता के रहने पर भी वहाँ पर afrof त के आधार पर ही पौर्वापर्य का क्रम बन सकता है । कृतक ( अनित्य ) पक्ष के दोष भी नहीं रहेंगे, क्योंकि बीज, अंकुर बाद में जैसे पौर्वापर्य दृष्ट है, उसी तरह से इनमें भी पौर्वापर्य लक्षण अनुक्रम के आधार पर भेद हो सकता है । इसी तरह से प्रमाणवात्तिक की यह आपत्ति का भी --- ' आनुपूर्वी की अनित्यता और अध्यापिता मानने पर इसकी पौरुषेयता और सर्वत्रोपलब्धि के दोष उठ खड़े होंगे, जो कि पहले ही कही जा चुकी है ', खण्डन हो जाता है, क्योंकि अनित्यता को हमने स्वीकार ही नहीं किया है । विभु ( व्यापक ) और free वर्णों में देशकालकृत अनुक्रम की संभावना न रहने से ही वर्णाभिव्यक्तियों में कालकृत क्रम माना जाता है ।
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वेदार्थपारिजातः *** प्रत्यभिज्ञानंभ्रान्तम् । तथा च देशकालप्रयोक्तृभेदेन वर्णानां भिन्नत्वात्कार्यत्वमिति कुतः क्रमस्यानादित्वम्? क्रमस्य तेभ्योऽनर्थान्तरत्वमप्युक्तमेव । न च क्रमः क्रमिणां धर्मः, धर्मस्यापि धर्मिणः सकाशाद्भेदात् । भेदे श्रोत्रज्ञानेऽनव-भासः स्यात् न च भवति । तस्यादयुगपदुत्पन्ना एव भावा: क्रम:, तेन प्रत्युच्चारणं वर्णानामुत्पत्तिभेदात्क्रमभेदेऽपि ' पूर्वदृष्ट एवायं क्रम इति प्रत्यभिज्ञानं सादृश्यनिबन्धनम् । तत्कथं क्रमस्यानादित्वापौरुषेयत्वमिति, तदप्यज्ञानविजृम्भितम्, क्रमस्यानित्यत्वेऽपि तत्र पुरुषस्वातन्त्र्याभावात् । ' क्रमस्य ध्वनिकार्यत्वेऽप्यनित्यत्वेऽपि न क्षतिः । यत पूर्वक्रमापेक्षी क्रमः सर्वत्र दृश्यते ॥ ' अवाधितप्रत्यभिज्ञानेन वर्णानामेकत्वनित्यत्वव्यापित्वसिद्धावपि वर्णव्यक्तीनामनित्यत्वेन क्रमोपपत्तेः । तस्य च कूटस्थ नित्यत्वाभावेऽपि पूर्वसापेक्षत्वेन प्रवाहनित्यत्वे बाधाभावात् । नहि पुरुषोच्चरितत्वमात्रेण पौरुषेयत्वम्, किन्तर्हि पूर्वानुपूर्वीनेरपेक्ष्येण स्वतन्त्रोच्चरितत्वमेव पौरुषेयत्वापादकम् । नहि गोघटादिशब्दानामानुपूर्वी स्वातन्त्र्येण केनचिन्निर्मीयते । वृद्धव्यवहारपारम्पर्येणैव ज्ञात्वा सर्वेनिर्मीयते । तेनानुपूर्व्या निर्मितत्वेऽप्यपौरुषेयत्वमक्षतमेव । क्रमस्य व्यापित्वादिभिर्वैयधिकरण्येन न विरोधः । यदप्युक्तम् — ' एवमपि न वर्णानां रूपानुपूर्वी वाक्यम्, कहि व्यक्तेः । सा यथा स्ववर्णाभिव्यक्ति " प्रत्ययानां कण्ठताल्वादिव्यापाराणां क्रमाद्भवन्तो कमोपयोगिनीति तदानुपूर्वी वाक्यमित्यपि मिथ्या, तस्यानित्येषु प्रागेव निराकृतत्वात् । व्यञ्जककृतेन साक्षाज्जननशक्त्युपधानेन ज्ञानजननासमर्थानां घटादीनां कार्यविशेष एव व्यक्तिरित्याख्यातत्वात् । ‘ व्यक्तिक्रमोऽपि वाक्यं न नित्यव्यक्तिनिराकृतेः ' ( प्र ० वा ० ३।२६२ ) इति, तदपि न सम्यक्, यह भी कहा गया है कि - ' अनित्य ध्वनि का कार्य होने से क्रम भी नाशवान् है और यह पुरुषाधीन भी है, क्योंकि इसकी विवक्षा पुरुष से भी होती है ' । वर्णों को व्यापिता ( व्यापक ) के आधार पर उनमें यौगपद्यभाव मानना पड़ेगा | क्रम व्यापकता का fast है और व्यापिता क्रम की विरोधी है । यदि क्रम माना जाता है, तो उनमें व्यापिता की ग्राहिका ( बताने वाली ) प्रत्यभिज्ञा को भ्रान्त मानना पड़ेगा । ऐसी अवस्था में देश, काल और प्रयोक्ता के भेद से वर्णों की भिन्नता मानने पर उनमें कार्यता ही मानी जायगी, फिर क्रम की अनादिता कहाँ से बन सकेगी । क्रम को उनसे भिन्न वस्तु भी नहीं माना जा सकता । क्रम क्रमी का धर्म नहीं है, क्योंकि धर्म का धर्मो से भेद ही माना जाता है । इनका भेद होने से श्रोत्र ज्ञान में प्रतिभास न हो सकेगा और यह होता भी नहीं, अतः एक साथ न उत्पन्न होने वाले भाव ही क्रम कहलाते हैं । इसलिये प्रत्येक उच्चारण में वर्णों की उत्पत्ति के भेद से क्रम की भिन्नता के रहते हुए भी, यह क्रम पूर्वदृष्ट ही है, इस तरह की प्रत्यभिज्ञा सादृश्यमूलक भ्रान्ति मानी जायगी । इस तरह से क्रम की अनादिता और autoear कैसे मानी जा सकती हैं । किन्तु यह पूरा कथन अज्ञान का प्रदर्शन मात्र है, क्योंकि क्रम के अनित्य होने पर भी उसमें - पुरुष की स्वतन्त्रता नहीं है । ' क्रम को ध्वनि का कार्य और अनित्य मानने में भी हमारी कोई क्षति नहीं है, क्योंकि क्रम सर्वत्र अपने पूर्ववर्ती रूम की अपेक्षा रखता है ' । अबाधित प्रत्यभिज्ञा से वर्णों की एकता, नित्यता और व्यापिता सिद्ध हो जाने पर भी वर्णाभिव्यक्ति की अत्यता के कारण क्रम की उपपत्ति हो सकती ही है । उसकी कूटस्थ नित्यता के अभाव में भी पूर्वसापेक्षता के आधार पर प्रवाहमित्यता में कोई बाधा नहीं है । पुरुषोच्चरितत्व मात्र से कोई पौरुषेय नहीं होता, किन्तु पूर्वानुपूर्वी निरपेक्ष स्वतन्त्र उच्चारण को ही पौरुषेयत्र का प्रयोजक माना जाता है । गो, घट आदि शब्दों की आनुपूर्वी स्वतन्त्र रूप से कोई बनाई नहीं जाती, वृद्ध व्यवहार की परम्परा से ही इसको जाना जाता है । इस तरह से आनुपूर्वी का निर्माण मानने पर भी उसको अपौरुषेयता में कोई बाधा नहीं पड़ती । क्रम का व्यापक प्रभृति से वैयधिकरण्य रहने पर भी कोई विरोध नहीं है । यह भी कहा गया है कि- ' इस तरह से भी वर्ण स्वरूप आनुपूर्वी वाक्य न होकर अभिव्यक्ति स्वरूप ही हो सकता है! यह अभिव्यक्ति जैसे अपने द्वारा अभिव्यक्त वर्ण प्रत्ययों के कण्ठ, तालु प्रभृति के व्यापारों के क्रम से होती हुई जब क्रम में उपयोगी बनती हैं, तब यह आनुपूर्वी वाक्य कहलाती है । ' यह कथन भी मिथ्या है, क्योंकि अनित्य पदार्थों में इसकी सत्ता का पहले ही निराकरण किया चुका है | व्यंजक के द्वारा किये गये साक्षात् उत्पादक शक्ति के सहयोग से ज्ञान को उत्पन्न करने में असमर्थ घट आदि का प्राकट्य कार्य विशेष स्वरूप ही है, यह कहा जा चुका है । प्रमाणवार्तिक में ही यह भी कहा गया है कि- ' अभिव्यक्ति के क्रम को भी वाक्य नहीं कह
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**** तथा बौद्धाभिमतस्य विज्ञानात्मनोऽपि भौतिकदेहादिव्यङ्ग्यत्वेन भौतिकत्वापत्तेः । नित्यानामात्मसामान्यादीनामपि व्यक्तिसम्भवस्योक्तत्वात्। ' व्यक्तिक्रमस्य वाक्यत्वे न विरोधो मनागपि । नित्यानामपि भावानामभिव्यक्ति प्रसाधनात् ॥ ' यदपि - ' यत्खलु रूपं यत उपलभ्यते तस्य तदुपलब्धिनान्तरीयकमेवोपलब्धिमाश्रित्य लोकः कार्यता प्रज्ञापयति । तथा प्रयत्नोपलब्धिनान्तरीयकत्वादेव वर्णोपलब्धेर्वर्णे कार्यत्वमेव । कार्यताभ्युपगमनिबन्धने तुल्ये कुतो वर्णा न कार्यम्? ' व्यापारादेव तत्सिद्धेः करणानां च कार्यता ' ( प्र ० वा ० ३।२६३ ) इति, तदप्यविचारितरमणीयम्, व्यभिचारात् । तथाहि - रूपोपलब्धेः प्रकाशोपलब्धिनान्तरीयकत्वेऽपि न रूपस्य प्रकाशकार्यत्वम् रूपस्य प्रकाशात्प्राक् प्रसिद्धेः । एवं गन्धोपलब्धे घ्रणिव्यापारोपलब्धिनान्तरीयकत्वेऽपि न गन्धस्य तत्कार्यत्वं वक्तुं शक्यम्, किन्तुपलब्धौ उपलब्धेः सत्त्वे सत्त्वादेव तत्कार्यत्वनिर्णयः । यस्मिन् सत्येव यद्भवति यस्मिन्त्रसति यन भवति तत्तस्य कार्यमित्येव तु युक्तम् । यर्णानां कण्ठतात्वादिव्यापारात सत्ता किन्तुपलब्धिरेव । यदप्युक्तम् --- ' सा सत्ता कुतः सिद्धा येन कार्यतां साधयेत् । नह्यसिद्धायामस्यामेवं भवति, तस्मात्सत्तासिद्धिः साधनीया । सा चोपलब्धिरेवेति, तदप्यकिञ्चित्करम्, सत्तासिद्धेः प्रमाणायत्तत्वेऽपि सत्तायाः प्रमाणकार्यत्वानुपपत्तेः । अत एवानधिगतगन्तृ तन्नाकृतकर्तृ । यदि ताल्वादिव्यापारात्प्राक् शब्दस्य सत्ता न सिद्धा स्यात् तदा घटस्य प्रागसतः कुलालादिव्यापारात् परतः सिद्धिवत्स्यादपि तदधीनसिद्धित्वे तत्कार्यता, किन्तु पूर्व गोघटादिशब्दं श्रुतवतोऽभ्यदापि सकते, क्योंकि नित्य की अभिव्यक्ति का निराकरण किया जा चुका है । ' किन्तु यह कथन भी ठीक नहीं है । ऐसा मानने पर बौद्धाभिमत विज्ञान स्वरूप आत्मा को भी भौतिक देह आदि से अभिव्यंग्य होने के कारण भौतिक मानना पड़ेगा । नित्य आत्मा और जाति आदि की भी अभिव्यक्ति होती है, यह बताया जा चुका है । ' अभिव्यक्ति के क्रम को वाक्य मानने पर थोड़ा सा भी विरोध नहीं होगा, क्योंकि face भावों की भी अभिव्यक्ति भलीभांति सिद्ध की जा चुकी है । ' यह भी कहा गया है कि ' जो स्वरूप जहाँ से उपलब्ध होता है, उसकी उपलब्धि से अविनाभूत उपलब्धि के आधार पर ही लोक कार्यता को बताता है । इस तरह से प्रयत्नपूर्वक उपलब्धि की अविनाभूत वर्णपलब्धि को देखकर वर्ण में भी कार्यता जानी जाती है । कार्यता की स्वीकृति के लिये आवश्यक सामग्री की समानता रहने पर भी वर्णों की कार्यता कैसे नहीं मानी जायगी । कुण्ठ तालु आदि के प्रयत्न से ही वर्णों में कार्यता की सिद्धि होती है, अतः इनकी कार्यता ही मानी जायगी, व्यंग्यता नहीं । ' किन्तु यह कथन भी अविचारित रमणीय है, क्योंकि आपका कार्यत्व साचक हेतु व्यभिचरित है । जैसे कि रूप की उपलब्धि प्रकाश की उपलब्धि के बिना नहीं होती, तो भी रूप प्रकाश का कार्य नहीं है, क्योंकि रूप प्रकाश के पहले ही प्रसिद्ध है । इसी तरह से गन्ध की उपलब्धि भी बिना घ्राणेन्द्रिय के व्यापार के नहीं होती, तो भी गन्ध उसका कार्य नहीं है । उपलब्धि में उपलब्धि की सत्ता होने पर सत्ता से ही उसकी कार्यता का निर्णय होता है । जिसके रहने से जो होता है, जिसके न रहने से जो नहीं होता, वही उसका कार्य होता है, यहोव्याप्ति ठीक है । वर्णों की कण्ठ तालु प्रभृति के व्यापार से सत्ता नहीं होती, किन्तु उपलब्धि ही होती है । यह भी कहा गया है कि ' यह सत्ता कहाँ से सिद्ध होती है, जिसके आधार पर कि कार्यता सिद्ध की जाती है । इस सत्ता के असिद्ध रहते कार्यता भी सिद्ध नहीं होती । अतः सत्ता को ही पहले सिद्ध करना पड़ेगा और वह उपलब्धि ही हैं । ' किन्तु यह कथन भी चित्कर है, क्योंकि सत्ता की सिद्धि के प्रमाणों के अधीन होते हुए भी सत्ता को प्रमाण का कार्य नहीं माना जा सकता | इसी लिये जो प्रमाण अनधिगत का ज्ञान कराता है, वही अकृत वस्तु का कर्ता नहीं माना जा सकता । यदि तालु प्रभूति के व्यापार से पहले शब्द की सत्ता सिद्ध न हो तो पहले असत् स्वभाव के घट की तरह कुलाल आदि के व्यापार के बाद घट की सत्ता के समान शब्द की भी सिद्धि मानी जाय, तब उसके अधीन सिद्धि रहने से उसकी कार्यता भी बन सकती है, किन्तु पहले गो, घट प्रभृति शब्दों को सुनने वाला जब बाद में भी उनको सुनना है तो यह वहीं गो, घट प्रभुति शब्द हैं, इस तरह की प्रत्यभिज्ञा होती है । उस
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दार्थपारिजातः * IIII तच्छ्रवणे सोऽयं गोघटादिशब्द इति भवति प्रत्यभिज्ञा । तयान्तरालेऽपि शब्दसिद्धिरर्थापत्त्या । न च सिद्धिपूर्विका सिद्धिः कार्यतासाधनी, किन्वसिद्धिपूर्विकैव सिद्धि: कार्यत्वप्रज्ञापिका । प्रत्यभिज्ञाप्रामाण्यं तुक्तं वक्ष्यते च । ननु तथापि तद्रूपमसिद्धमेव यत्तथाभूतविज्ञानाव्यवधानोपयोगि, यदि तथाभूतं रूपं प्राक् सिद्धं स्यात्तदा नित्यं शब्दोपलम्भः स्यादिति चेन्न तद्रूपस्य नित्य सिद्धत्वेऽपि व्यञ्जकवैकल्येन तदनभिव्यक्तेः । ननु चैवमपि सहकारि सन्निधाने शब्दस्य या स्वज्ञाने उपयुक्ता या च प्रयत्नात्प्रागनुपयुक्तावस्था ते परस्परं विरुद्धे, कथं तयोरभेदः? भेदे च नानात्वात् स तादृशः शब्दस्य स्वभावः कृत इति कार्य एव शब्दः स्यादिति चेन्न, ज्ञाताज्ञातत्वभेदेन ज्ञेयभेदानुपपत्तेः । नहि ज्ञातो देवदत्तोऽन्योऽज्ञातोऽस्य इति कश्चित् प्रत्येति । भेदव्यतिरेके हि तस्यैवातिशयस्य शब्दज्ञाने उपयोगसिद्धेः । कारणत्वसिद्धेस्तस्य शब्दस्याकारणत्वप्रसङ्गः । यस्यैव भावे साध्यसिद्धिस्तदेव तत्रोपयोगि नापरम् । अतिशय ज्ञान उपयुज्यते । साक्षादतिशये तु शब्द उपयुज्यत इति परम्परया शब्दोऽपि ज्ञान उपयुज्यत इत्यपि न युक्तम्, तत्रापि तद्वत् प्रसङ्गात् । यथा विज्ञाने कर्तव्येऽर्थान्तरभूतेऽतिशये शब्दो नोपयुज्यते, तदतिशयेऽपि कर्तव्ये र्थान्तरभूतोऽतिशयः कल्पनीयः । तथा चानवस्था । ततोऽतिशयः शब्दादभिन्नः 3 तस्मात्तदन्यं स्वभावविषयज्ञानजनन शब्दस्वभावमतिशेत एवाव्यवहितसामर्थ्योपयोगोऽवस्थाभेद इत्यप्यपास्तम्, शब्दस्वभावस्याभेदेऽपि सहकारिसाकल्य-वैकल्याभ्यां कारकाकारकत्वभेदोपपत्तेः । तथा च वाल्वादिव्यापारसापेक्षः शब्दो ज्ञानं जनयति, नान्यथा । • प्रत्यभिज्ञा से पूर्वकालिक श्रवण और वर्तमान कालिक श्रवण के बीच भी शब्द की सिद्धि अर्थापत्ति प्रमाण से होती है । सिद्धिपूर्विका सिद्धि कार्यता की साधिका नहीं हो सकती, किन्तु असिद्धिपूर्विका सिद्धि ही कार्यता की ज्ञापिका होती है । प्रत्यभिज्ञा का प्रामाण्य सिद्ध किया जा चुका है और इसके विषय में लागे भी कहा जायगा । प्रश्न है कि ' तो भी यह रूप असिद्ध ही है, जो कि तथाभूत विज्ञान का बिना व्यवधान क उपयोगी हो । यदि तथाभूत रूप पहले से सिद्ध होता, तो नित्य शब्द की उपलब्धि होती । ' उत्तर है कि शब्द का स्वरूप यद्यपि नित्य सिद्ध है, तो भी व्यंजक के अभाव में उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती । पुनः प्रश्न उठता है कि ' इस परिस्थिति में भी सहकारी का संविधान रहने पर शब्द की अपने ज्ञान में उपयोगिती और प्रयत्न से पहले अनुपयोगिनी अवस्थाएँ हैं, वे परस्पर विरुद्ध स्थिति वाली हैं, उसका अभेद कैसे हो सकता है? यदि भेद है, तो भेद प्रयुक्त नानात्व के कारण इस तरह का वह शब्द का स्वभाव कृतक ( अनित्य ) माना जायगा | इस तरह शब्दकार्य ( उत्पन्न होने वाला ) हो माना जायगा । ' इसका उत्तर भी यह है कि ज्ञान और अज्ञान के भेद से शेय का भेद नहीं माना जा सकता । ज्ञात देवदत्त भिन्न है और वही यदि अज्ञात है वह दूसरा है, इस बात को कोई स्वीकार नहीं करता । इसी लिये भेद का व्यतिरेक रहने पर भी उसी अतिशय का शब्द ज्ञान में भी उपयोग सिद्ध हो सकता है । कारणता की सिद्धि करने पर शब्द के अपकरण ( समाप्ति ) का ही प्रसंग उठ खड़ा होगा | जिसके रहने से साध्य की सिद्धि होती है, वही वहाँ उपयोगी हो सकता है, अन्य नहीं । ' अतिशय का उपयोग ज्ञान में होता है । साक्षात् अतिशय मैं तो शब्द का उपयोग होता है, इस तरह से परम्परा से शब्द का भी ज्ञान में उपयोग होता है, यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि वहां पर भी वैसी ही प्रसक्ति हा जायगी । जैसे विज्ञान की कार्यता के समय अर्थान्तरभूत अतिशय में शब्द का उपयोग नहीं होता, उसी तरह से अतिशय की कार्यता में भी अर्थान्तरभूत अतिशय की · कल्पना करनी पड़ेगी और इस तरह से अनवस्था का प्रसंग उठ खड़ा होगा । इस तरह से अतिशय को शब्द से अभिश ही मानना पड़ेगा । इसलिये उससे भिन्न अपने सत्ताविषयक ज्ञान को पैदा करने वाले शब्द के स्वभाव से कुछ विशेषता रखने पर ही अपने अव्यवहित सामर्थ्य का अवस्था भेद के रूप में वह उपयोग करा सकेगा इसका भी खण्डन होता है, क्योंकि शब्द स्वभाव का भेद न - रहने पर भी सहकारी के साकल्य और वैकल्य के आधार पर कारकता और अकारकता के भेद की उपपत्ति होती है । इस तरह से • तालु प्रभृति के व्यापार की अपेक्षा रखने वाला शब्द ज्ञान का जनक होता है, अन्यथा नहीं ।
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४४८ वैवार्थपारिजातः • ननु च सहकारिणामनुपकारकत्वे व्यर्था तदपेक्षा, उपकारकत्वे तस्यैव हेतुत्वमस्तु कृतं शब्देन, उपकारस्योप-कार्याभिन्नत्वे उपकारस्य जन्यत्वेन तदभिन्नस्योपकार्यस्य शब्दस्यापि जन्यत्वम्, भिन्नत्वे तु कुतः शब्दस्य कारणत्वमिति चैत्र, उपकारस्योपकार्यधर्मत्वाभ्युपगमेन दोषाभावात् । शब्दस्य प्रत्यभिज्ञानस धर्मधर्मितया चोपकारतद्वतोर्भेदः । न च भेदे तस्यैव जनकत्वं तद्वतोऽजनकत्वमिति वाच्यम्, अत्यन्त भेदाप्रसिद्धेः । धर्मधमितया भेदः, अशक्यविवेचनत्वेन चाभेदः, बुद्धितदाकारवत् । न च यो यदर्थमेव कल्पितः स तस्यैव वेदान्तमतरीत्या स बाधकः, बुद्धेरर्थग्राहकत्वाभावप्रसङ्गात्, आकारस्यैव अर्थग्राहकत्वानुषङ्गात् । चोपकारो न भिन्नः नाभिन्नः किन्त्वनिर्वाच्य एव । तस्माच्च कार्यमप्यनिर्वाच्यमेव । न चैतावता स्थिरस्याशब्दस्या-कारणत्वम्, तदधिष्ठानत्वेन तस्याप्यपेक्षणात् । न चानिर्वाच्यस्य काल्पनिकस्योपकारस्य कुतः कारणत्वम्, बौद्धेरपि काल्पनिकस्य कारणत्वाभ्युपगमात् । तन्मते सर्वाणि वस्तूनि सर्वतो विलक्षणानि स्वलक्षणानि । तत् किं कारणं बीजजातीयेभ्योऽङ्कुरजातीयान्येव जायन्ते, न क्रमेलकजातीयानि । बीजाद् बोजान्तरस्य क्रमेलकस्य वात्यन्तवैलक्षण्ये न विशेषः । न च बीजाङ्कुरत्वे परमार्थसती, येनैतयोर्भाविकः कार्यकारणभावो भवेत् । तस्मात् काल्पनिका देव स्वलक्षणोपादानाद् वीजजातीयात्तथा-विधस्यैवाङ्कुरजातीयस्योत्पत्तिः । है कि ' सहकारी यदि उपकारक नहीं है तो फिर उसकी अपेक्षा करना व्यर्थ है, यदि उपकारक है तो उसी की अर्थ के बोध के प्रति कारणता मान ली जाय तब शब्द को मानने की क्या आवश्यकता है? यदि उपकार उपकारी से अभिन्न है और उपकार जन्य माना जाता है तो तदभिन्न उपकारी शब्द भी जन्य ही होगा | अब यदि उपकार उपकारी से भिन्न है तो यह शब्द का कारण कैसे हो सकता है? ' इस प्रश्न का उत्तर यह है कि उपकार को उपकारी ( जिसका वह उपकार करे ) का धर्म माना जाता है । ऐसा मानने पर उक्त दोष का परिहार हो जाता है! शब्द की प्रत्यभिज्ञा प्रश्न है कि उपकार और उपकारी का धर्मधमिभाव होने से भेद ही है । भेद के रहते उपकार की जमकता और उपकारी को अजनकता है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि इनका अत्यन्त भेद नहीं माना जा सकता । धर्म और धर्मीभाव होने से इनमें भेद है और इसका fa वेचन कर पाना कठिन है, अतः इनका अभेद है, जैसा कि बुद्धि का और उसके आकार का होता है । जिसकी कल्पना किसी की सहायता के लिये होती है, वह उसका बाधक नहीं हो सकता । ऐसा मानने पर बुद्धि ( ज्ञान ) में अग्रता का अभाव हो जायगा और आकार में ही अर्थग्राहकता माननी पड़ जायगी । वेदान्त की दृष्टि से यह उपकार न तो भिन्न है और न अभिल, किन्तु अनिर्वाच्य है | इसलिये कार्य अनिर्वाच्य ही माना जायगा । इतना मानने से स्थिर अशब्द में अकारणता नहीं आ जायगी, क्योंकि अधिष्ठाता के रूप में उसकी भी अपेक्षा रहती है । taaraar और काल्पनिक उपकार कारण कैसे हो सकता है? ' ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बौद्ध भी काल्पनिक को कारण मानते ही हैं । बौद्धों के मत में सभी वस्तुओं का सबसे विलक्षण अपना एक विशेष ' स्वलक्षण ' स्वरूप होता है । तब फिर उनसे पूछा जा सकता है कि इसका क्या कारण है कि बीजजातीय से अंकुरजातीय ही पैदा होता है, ऊँटजातीय नहीं । एक बीज से दूसरे बीज की अथवा ऊँट को अत्यन्त विलक्षणता में कोई अन्तर नहीं है । वास्तव में बीज और अंकुर दोनों ही मिथ्या हैं, अतः इनका भावी कार्यकारणभाव भी नहीं होगा । इसलिये काल्पनिक स्वलक्षण कारणरूप बीजजातीय से ही काल्पनिक स्वलक्षण कार्य-रूप अंकुरजातीय पदार्थ की उत्पत्ति माननी पड़ेगी ।
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वेदार्थपारिजातः ** यदपि स च शब्दस्वभावः करणव्यापारादेव सिद्ध इति सर्वकार्य तुल्यधर्मात्तस्य तादृशस्य व्यक्ताविष्य -माणायां सर्वं व्यङ्ग्यं स्यात्, न वा किञ्चिदप्यविशेषात् । तथाहि - ' स्वज्ञानेनान्यबीहेतुः सिद्धेऽर्थे व्यञ्जको मतः । यथा दीपो s न्यथा वापि को विशेषोऽस्य कारकात् | ' ( प्र ० वा ० ३।२६३ - २६४ ) । स्वप्रतिपत्तिद्वारेणान्यप्रतिपत्ति-हेतुलके व्यञ्जको भवति, यदि व्यङ्ग्यः प्राक् सिद्धः स्यात् । यद्यपि प्रदीपादिरुपलब्धियोग्यं घटक्षणं प्रागसिद्धमेव जनयति, तथापि व्यञ्जकाल्लस्यस्य ज्ञानहेतोरतिशयस्य तत्सामग्रीप्रत्ययत्वेन प्रागसिद्धावपि समानजातीयोपादान-लक्षणस्य प्राक् सिद्धत्वात् । ये पुनरसिद्धोपलम्भनाः कारका एव कुलालादिवद् घटादी शब्दोऽपि घटादिवत् कार्य्य -मेव, ताल्वादिव्यापारात् प्रागसिद्धत्वादिति, तदप्यकिञ्चित्करम् सोऽयं गकार इति प्रत्यभिज्ञानेन शब्दस्वरूपस्यापि ताल्वादिव्यापारात् प्राक् सिद्धत्वात् । यदयुक्तम् - प्रथमे क्षणे शब्दग्रहणम्, द्वितीये क्षणे पूर्व गृहीतशब्दा हित संस्कारप्रबोधः, ततः शब्दस्मरणम्, ततश्चतुर्थे क्षणे तिरोहिते तस्मिन् स एवायं घटशब्द इति प्रत्यभिज्ञानं कथं प्रत्यक्षं स्यात्, असन्निहितविषयत्वात् । नापि प्राक्प्रबुद्धसंस्कारस्य पुंसो वर्णग्राहकं प्रत्यभिज्ञानं संभवति, वर्णस्य सांशत्वात्, अन्त्यवर्णभागकाले पूर्वपूर्ववर्ण-भागानामसत्त्वेनान्त्यस्यापि वर्णस्यासन्निहितत्वात् । अत एव पदवाक्ययोरपि ग्राहकं प्रत्यक्षं प्रत्यभिज्ञानं न संभवति, वर्णसमुदायत्वात् । पटादेरन्त्यवर्णकाले च पूर्वपूर्ववर्णानामसत्त्वात् सन्निहित विषयं च प्रत्यक्षमिष्यते । तस्मान्न प्रत्यक्षं प्रत्यभिज्ञानं वर्णपदवाक्येषु तत्त्वग्राहकं भवतीति, तदप्यकिञ्चित्करम्, शब्दस्य सावयवत्वक्षणिकत्वाद्यसिद्धेः । तन्त्वादिसंयोगापेक्षजन्यत्वं पटादीनामवबुद्धयः । तन्त्वादिनाशात्तत्संयोगनाशाच्च विनङ्क्ष्यतीत्य-नित्यत्वं निश्चीयते नैवं शब्दस्य किश्चित्कारणमवगम्यते, यद्विनाशात्तद्विनाशः स्यात् । ततोऽवयवादिसंयोगादिकारणा-यह भी कहा गया है कि ' यह शब्दस्वभाव करण व्यापार से ही सिद्ध है, यह धर्म सभी कार्यों में समान रूप से विद्यमान है, अतः यदि इस तरह के कार्य की अभिव्यक्ति मानी जाती है, तो सभी व्यंग्य हो जायेंगे अथवा कुछ भी व्यंग्य नहीं होगा, क्योंकि कार्य और व्यंग्य में परस्पर कोई विशेषता नहीं रहेगी । जैसा कि प्रमाणवार्तिक में कहा गया है- ' अर्थ को पहले से विद्यमानता मानने में कारण के द्वारा उसकी प्रदीप से घट के समान अभिव्यक्ति माननी पड़ेगी । यदि व्यंग्य पहले से सिद्ध नहीं है तो उस व्यंजक की erre हेतु से क्या विशेषता होगी '? अपनी प्रतिपत्ति के माध्यम से अन्य की प्रतिपत्ति कराने वाला लोक व्यवहार में व्यंजक कहलाता है, यदि व्यंग्य पहले से सिद्ध हो । यद्यपि प्रदीप आदि पहले से अविद्यमान उपलब्धि योग्य घटक्षण की ही उत्पत्ति करते हैं, तो भी व्यंजक से लक्ष्य ज्ञान के हेतु अतिशय को उसकी सामग्री के प्रत्यय से पहले असिद्धि होने पर भी समानजातीय उपादान लक्षण वहाँ पहले से सिद्ध रहते हैं । इसके विपरीत जिनका उपलम्भ पहले से असिद्ध है, ऐसे कारक घटादि पदार्थों की तरह से ही शब्द भी कार्य ही है, क्योंकि तलु प्रभृति के व्यापार से पहले वे असिद्ध होते हैं । किन्तु यह कथन भी अचिकर है, क्योंकि ' यह वही गकार है ' इस तरह की प्रत्यभिज्ञा से शब्द स्वरूप की सत्ता भी तालु आदि के व्यापार से पहले भी सिद्ध हो ही जाती है । यह भी कहा गया है कि ' प्रथम क्षण में शब्द का ग्रहण ( ज्ञान ), द्वितीय क्षण में पूर्वगृहीत शब्दों से आहित होने वाले संस्कार का प्रबोध, तृतीय क्षण में शब्द का स्मरण और तब चतुर्थ क्षण में उसके तिरोहित हो जाने पर ' यह वही घट शब्द हैं ' इस तरह की प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष कैसे हो सकती है, क्योंकि तब उसका विषय संनिहित नहीं है । पहले के संस्कार जिसको प्रबुद्ध हो गये हैं, ऐसे पुरुष को वर्णग्राहक प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, क्योंकि वर्ण अंशवाला होता है, जब अन्त्य वर्ण के भाग की स्थिति रहती है, उस समय पूर्व - पूर्व वर्ण भागों की सत्ता न रहने से अन्त्य वर्ण भी संनिहित न रहेगा । इसीलिये पद और वाक्यों का ग्राहक प्रत्यक्ष ज्ञान भी प्रत्यभिज्ञा नहीं बन सकता, क्योंकि पद और वाक्य भी वर्णसमुदाय मात्र हैं । पद आदि के अन्त्य वर्ण के समय पूर्व - पूर्व की स्थिति नहीं रहेगी । प्रत्यक्ष तो संनिहित विषय का ही होता है । इसलिये प्रत्यक्ष प्रत्यभिज्ञारूप प्रमाण वर्णों में, पदों में अथवा वाक्यों में ' ये ही है ' ऐसा ज्ञान नहीं करा सकता ' । यह कथन भी कुछ नहीं है, क्योंकि शब्द की सावयवता, क्षणिकता आदि तर्कों के द्वारा सिद्ध नहीं है । पट आदि की अवगति वन्तु प्रभूति के संयोग की अपेक्षा के आधार पर होती है । तन्तु प्रभूति के नाश से अथवा उनके संयोग के नष्ट हो जाने पर ये पट आदि बुद्धियाँ भी नष्ट हो जाती हैं । इस तरह से इनकी अनित्यता स्पष्ट है । शब्द का इस तरह का ५७
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*** वेदार्थपारिजातः नपेक्षत्वान्नित्यः शब्दः, श्रावणत्वाच्छन्दत्ववत् । कर्मैके तत्र दर्शनादित्यनेकैः सूत्रैः शब्दस्यानित्यत्वमाशङ्क्य समेषां हेतूनामनैकान्तिकत्वमपि सूत्रकारैः प्रदर्शितम् । तत्रोच्चारणरूपप्रयत्नानन्तर्य्योपलम्भाच्छन्दस्य प्रयत्नकार्यत्वमाशङ्कय खण्डितं वातिककारः । प्रयत्नानन्तरं शब्दस्य दर्शनात्तदानीं तत्सत्तैव सिद्ध्यति, नान्यत्र तन्निषेधः सिद्ध्यति, तत्र प्रमाणा-भावात्, कालान्तरे तत्सत्स्वस्यानिषिद्धत्वात् । दर्शनानन्तरं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञानेन प्रत्यक्षेण दृष्टत्वादन्यदापि तत्सद्भाव-कल्पना सिद्धयति । न च प्रागूर्ध्वमनुपलब्ध्या तदसत्वं सिद्ध्यति, वैशेषिकादिमते शब्दत्वजातेनित्यत्वेऽपि प्रागूर्ध्वानु-पलब्धेः समानत्वात् । सांख्यमते नित्यस्यात्मचैतन्यस्य बुद्धयभिव्यक्तस्य सुषुप्त्यादावनुपलब्धेर्बुद्धिसम्बन्धात् प्रागूर्ध्वानु-पलब्ध्याऽपि न तदसत्त्वसिद्धिः । शाक्यमतेऽपि प्रतिसंख्याऽप्रतिसंख्यानि रोधयोर्व्योम्नश्चाकृतकत्वमविनाशित्वं चेष्टम् । तत्र मुद्गरपाताद्यभिव्यङ्गयो बुद्धिपूर्वी विनाश: प्रतिसंख्या निरोधः । कुड्यनिपाताद्यभिव्यङ्गयोऽबुद्धिपूर्वकोऽप्रतिसंख्या-निरोधः । कृतकता हि विनाशित्वव्याप्या घटादिषु दृष्टा । तच्च विनाशित्वनिरोधाभ्यां व्यावर्तमानः स्वव्याप्यां कृतकतामपि निवर्तयति । विनाशश्च स्वाभाविकः । विनाशस्य विनाशो न दृष्टस्तेन सोऽकृत्रिमः । मुद्गरपातादिस्यो घटात्कपालं जायते, न विनाशः । सर्वं हि कारणं सदृशकाय्यंजननस्वरसं विलक्षण कार्य्योपनिपाते तु विसदृशं जनयति । तेन मुद्गराभिघातो s पि विसदृशोत्पत्ती उपयुज्यते, न विनाशे । तेन - ' मुद्गरपातेनाक्रियमाणोऽपि नाशोऽभिव्यज्यते स्फुट: । समुद्गरप्रहारादिप्रयत्ननान्तरीयकः । आकाशमपि नित्यं सद्यदा भूमिजलावृतम् । व्यज्यते तदपोहेन खननोत्से-चनादिभिः || प्रयत्नानन्तरं ज्ञानं तदा तत्रापि दृश्यते । तेनानैकान्तिको हेतुर्यदुक्तं तत्र दर्शनात् ॥ अथ स्थगितमप्येतद-कोई कारण उपलब्ध नहीं है, जिसके विनाश से इसका विनाश उपलब्ध होता हो । इस तरह से अवयवसंयोग आदि कारणकलाप की अपेक्षा न रहने से शब्द नित्य है, क्योंकि यह शब्दत्व की तरह श्रावण प्रत्यक्ष का विषय है । इस अनुमान के अतिरिक्त ' के तत्र दर्शनात् ' इस तरह के अनेक सूत्रों के द्वारा भी पूर्वपक्ष के रूप में शब्द की अनित्यता की आशंका उठाकर सभी हेतुओं की अनैकान्तिकता ( व्यभिचारिता ) मीमांसा सूत्रकार ने सिद्ध की है । वार्तिककार ने यहाँ पर उच्चारण रूप प्रयत्न के अनन्तर शब्द की उपलब्धि को देखकर पर प्रयत्न का आरोप लगाकर उसका खण्डन किया है । प्रयत्न के अनन्तर शब्द का दर्शन होता है, इससे उसकी सत्ता ही सिद्ध होती है, अन्यत्र उसका निषेध नहीं सिद्ध होता, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । कालान्तर में उसकी सत्ता का निषेध भी नहीं किया गया है । दर्शन के अनन्तर ' यह वही है ' इस तरह के प्रत्यभिज्ञानात्मक प्रत्यक्ष से दृष्ट होने से अन्य समयों में भी उसके सद्भाव की कल्पना सिद्ध होती है । पहले की और बाद की अनुपलब्धि के आधार पर उसकी असत्ता नहीं सिद्ध हो सकती, क्योंकि वैशेषिक आदि के मत में शब्दस्व जाति के नित्य होने पर भी पहले की और बाद की अनुपलब्धि समान है । सांख्य के मत से बुद्धि में अभिव्यक्त नित्य आत्मचैतन्य की सुषुप्ति प्रभूति में उपलब्धि न होने पर भी बुद्धि के संबन्ध से पहले और बाद में भी अनुपलब्धि की समानता होने पर भी उसका असत्त्व नहीं माना जाता । बौद्ध मत में भी प्रतिसंख्यानिरोध, अप्रतिसंख्यानिरोध और आकाश की अकृतकता ( नित्यता ) और अविनाशिता मानी गई है । यहाँ पर मुद्गर के पात से अभिव्यक्त होने वाला बुद्धिपूर्वक विनाश प्रतिसंख्यानिरोध कहलाता है । दीवार के गिरने आदि से अभिव्यक्त होने वाला अबुद्धि ( अज्ञान ) पूर्वक विनाश अप्रतिसंख्यानिरोष होता है । कृतकता विनाशित्व की व्याप्य हैं, अर्थात् जो पैदा होते हैं, उनका विनाश अवश्य होता है, किन्तु यहाँ कृतकत्व व्याप्य है और विनाशित्व व्यापक । यह नियम है कि व्यापक जहाँ नहीं रहता, वहाँ व्याप्य को भी नहीं रहने देता । जैसे तालाब आदि में अग्नि नहीं रहती तो धूम भी नहीं रह सकता । प्रकृत में शब्द में कृतकत्व का व्यापक विनाशित्व नहीं रहता, इसलिये वह कृतकत्व को भी नहीं रहने देगा । विनाश एक स्वाभाविक व्यापार है । विनाश का विनाश नहीं देखा जाता । इसलिये वह अकृत्रिम होता है । मुद्गरपात प्रादि से घट से कपाल की उत्पत्ति होती है, विनाश नहीं । सभी कारण स्वभावतः अपने सदृश कार्य की उत्पत्ति करते हैं, विलक्षण कार्य के बीच में आ जाने पर विसदृश कार्य को भी करने लगते हैं । इस तरह से मुद्गर के अभिघात का उपयोग विसदृश की उत्पत्ति में होता है, विनाश में नहीं । इसलिये मुद्गर पात न उत्पन्न होने वाले विनाश की अभिव्यक्ति वहाँ स्पष्ट है और यह मुद्गर प्रहार प्रयत्न के बिना नहीं हो सकता | aara auf free है, किन्तु जब उसको भूमि, जल आदि से भर दिया जाता है तो प्रयत्नपूर्वक मिट्टी, जल आदि के हटा देने पर वह पुनः अभिव्यक्त हो जाता है । यहाँ पर नित्य आकाश का भी ज्ञान प्रयत्न अनन्तर ही देखा जाता है । इस तरह से कृतकता में