वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 531–540

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 531–540

पृष्ठ 531

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 531 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः ४०१ तनिष्ठस्य सत्त्वशुद्धिक्रमेण प्रत्यकुचैतन्याभिन्नपरमात्मसाक्षात्कार हेतुत्वाच्च वेदानां बाहुल्येन यज्ञ एवं मुख्योऽर्थः । वेदभागोऽल्पीयानेव | पारम्पर्येण सर्वोऽपि साक्षाद् ब्रह्मपरस्तु मन्त्रब्राह्मणोपनिषद्रूपोऽनन्यशेषो तु वेदो ब्रह्मपर एवेत्यन्यत्र विस्तरः । यदपि --- ' एषां ज्ञानमध्ये प्रेरयित्वा तद्द्वारा वेदाः प्रकाशिताः ' ( पृ ० १८ ) इति, तदप्यसङ्गतम्, ईश्वरीय-ज्ञानरूपाणां वेदानामन्यज्ञानमध्ये प्रेरणासम्भवात् । नहि कचिदपि स्वकीयं समवेतं ज्ञानं विशेषतो नित्यज्ञानमन्यत्र प्रेरयितुं पारयेत् । किंरूपा च सा प्रेरणा? तत्र प्रवर्तनादिरूपाया: प्रेरणाया असम्भवात् । ज्ञानस्य च सावयवत्व एव प्रेरणायास्तदवच्छिन्नतापि युज्यते नान्यथा । यदपिच --- -- ' ' परमेश्वरेण तेभ्यो ज्ञानं दत्तम्, ज्ञानेन तैर्वेदानां रचनं कुतमिति विज्ञायते } । मैवं विज्ञायि, ज्ञान किप्रकारकं दत्तम्? वेदप्रकारकम् । तदीश्वरस्य वा तेषामीश्वरस्यैव, पुनस्तेनैव प्रणीता वेदा आहोस्वित्तेश्च? यस्य ज्ञानं तेनैव प्रणीताश्चेत् पुनः किमर्थं शङ्का कृता? तेरेव रचिता इति निश्चयकरणार्थी ' ( पृ ० १८ ) इति, तदपि मन्दम्, ज्ञानस्य गवादिवर्तत्वाभावेन स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वक परस्वत्वोपपादनरूप दानासम्भवात् । तस्मात्तेषु वेदविषयकज्ञान-पादितमित्येव वक्तव्यम् । तदीश्वरस्य तेषां वा? ईश्वरस्यैवेत्यप्यमनोज्ञम् यतो गौर्यस्मै दीयते तस्यैव भवति, न दातुरेव तेन स्वस्वत्व निवृत्तिपूर्वं कपरस्वत्वोपपादनात् । पुनस्तेनैव प्रणीता वेदा आहोस्वित्तश्च? यस्य ज्ञानं तेनैव प्रणीता इति प्रश्नोत्तररूपं वाक्यमप्यसङ्गतम्, यदि हि वेदा ज्ञानरूपा एवं तहि ज्ञानविषयकं ज्ञानं किमनुव्यवसायात्मकमन्यद्वा? नान्यदवसिद्धेः । न पूर्वम्, अनुच्यव सायस्य व्यवसायाधिकरणत्वनियमात् । किञ्च वेदविषयके ज्ञाने कि ' इषे खोजें त्वा ', ' अग्निमीले पुरोहितम् ' इत्यादि-में भी कारण है । यह सब होते हुए भी इनका मुख्य प्रयोजन यज्ञ संपादन करना ही है । साक्षात् ब्रह्म का प्रतिपादक तथा इससे भिन्न जिसका कोई अन्य प्रयोजन नहीं है, ऐसा मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद् रूप वेदभाग थोड़ा सा ही है । परम्परा से तो सारा वेद ब्रह्म का ही प्रतिपादक है, यह बात अन्यत्र विस्तार से कही गई है । ' उन चार मनुष्यों के ज्ञान के बीच में वेदों का प्रकाश करके उनसे ब्रह्मादि के ज्ञान के बीच में वेदों का प्रकाश कराया था ' ( पृ ० १ ९ ) यह कथन भी असंगत है । वेद तो ईश्वर के ज्ञान हैं, इनका दूसरे के ज्ञान में संक्रमण नहीं हो सकता । कोई भी व्यक्ति अपने में समवाय सम्बन्ध से विद्यमान ज्ञान को, विशेषतः नित्य ज्ञान को अन्यत्र संक्रमित नहीं कर सकता । वह किस प्रकार संक्रमित करेगा? प्रवर्तना रूप प्रेरणा वहाँ हो नहीं सकती । ज्ञान यदि सावयव हो तो ही उसकी प्रवृत्ति कराई जा सकती है, अन्यथा नहीं | ' ईश्वर ने उनको ज्ञान दिया और उन्होंने अपने ज्ञान से वेदों की रचना की, ऐसा मालूम होता है | यह कहना आपका afer नहीं, क्या आप यह जानते हैं कि ईश्वर ने उनको किस प्रकार का ज्ञान दिया था? उनको वेद रूप ज्ञान दिया था तो यह ज्ञान ईश्वर का है या उनका? यदि यह ज्ञान ईश्वर का ही है तो फिर वेद ईश्वर में बनाये या उन्होंने? जिसका ज्ञान है उसी ने वेदों को बनाया तो फिर यह शङ्का उठाने का क्या प्रसङ्ग बाया? प्रसङ्ग इसलिये उठा कि हमको यह निश्चय करना था कि वेद ईश्वर ने ही बनायें । यह भी दुर्बल पक्ष है । ज्ञान गाय आदि वस्तुओं की तरह मूर्त तो है नहीं कि उस पर अपने स्वत्व को छोड़कर दूसरे के स्वत्व का उपपादन कराया जा सके, अर्थात् उसका दान किया जा सके | इसलिये उनमें वेद विषयक ज्ञान का संचार किया, यही कहना पड़ेगा । वह वेद रूप ज्ञान ईश्वर का है या उनका? ईश्वर का ही है, यह कथन भी उचित नहीं । क्योंकि गाय जिसको दी जाती हैं, उसकी हो जाती है, दाता ही नहीं । क्योंकि दाता उस पर से अपना स्वत्व छोड़कर पाने वाले का स्वत्व स्वीकार कर लेता है । आगे ' ईश्वर ने ही वेद बनाये या उन्होंने भी? जिसका ज्ञान है उसी ने बनायें यह प्रश्नोत्तर रूप वाक्य भी असंगत है । यदि वेद ज्ञानरूप ही है, तो यह ज्ञानविषयक ज्ञान अनुव्यवसायात्मक है या उससे भिन्न? अनुव्यवसायात्मक ज्ञान से भिन्न कोई ज्ञान प्रसिद्ध नहीं है । पहला पक्ष भी इसलिये नहीं बनेगा कि व्यवसाय के बिना धनुष्यवसाय कैसे बनेगा । दूसरी बात यह कि वेदविषयक

पृष्ठ 532

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 532 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेवार्थपारिजातः प्रसिद्धशब्दराशिविषयतया भात्यन्यदेव वा किञ्चित्? नान्त्यः, तस्य वेदत्वाप्रसिद्धेः । नाद्यस्तथात्वे सिद्धा एव वेदाः । किं तद्व्यतिरिक्तवेदप्रणयनम्? एवमेव यस्य ज्ञानं तेनैव प्रणीता इत्यप्यसाम्प्रतम्, ईश्वरज्ञानेन तेषां प्रणेतृत्वकथना-सङ्गतेः । एषां ज्ञानमध्ये प्रेरयित्वा तद्द्वारा वेदा: प्रकाशिता इति स्ववचनविरोधाच्च । यत्तु तद्द्वारा प्रकाशिता इत्यस्य ब्रह्मादीनां ज्ञानेषु वेदाः प्रकाशिता इत्यर्थः कृतः, तदपि न सङ्गतम्, निर्मूलत्वात् । श्वेताश्वतरोपनिषदि साक्षात्परमेश्वरेणैव ब्रह्मणो वेदप्रेषणस्योक्तत्वात् । तथाहि - ' यो ब्रह्माणं farara पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं हृ देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षवै शरणमहं प्रपद्ये ॥ ' ( ६।१८ ) इति वचनात् । प्रेरयित्वेति कथमुपसर्गयोगेऽपि व्यपोऽभाव इति चिन्त्यम्? यत्तु — ' चतुर्मुखेण ब्रह्मणा वेदा निरमायिषतेत्यैतिह्यम्, मैवं वाच्यम्, ऐतिह्यस्य शब्दप्रमाणान्तगतत्वात् ' आप्तोपदेशः शब्दः ' ( १ | १ | ७ ) इति गोतमाचार्येणोक्तत्वात् । ' शब्द ऐतिह्यम् ' । ( २२२ ) इत्यादि च । ' आप्तः खलु साक्षात्कृतधर्मा यथा दृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा । साक्षात्करणमर्थस्याप्तिस्तया प्रवर्तत इत्याप्तः ' इति न्यायभाष्ये वात्स्यायनेनोक्तः । अतः सत्यस्यैतिह्यत्वेन ग्रहणं नानृतस्य । यत्सत्यप्रमाणमाप्तोपदिष्टं तद् ग्राह्यं नातो विपरीतमिति, अनृतस्य प्रमत्तगीतत्वात् । ' इति, तदप्यसम्बद्धप्रलपितम् ऐतिह्यस्य शब्दप्रमाणान्तर्भावेण मैवमिति निषेधानुपपत्तेः । प्रतीकतयैतिह्यमित्यशुद्धमेव गृहीतम् । एवमेव ' आप्तोपदेश: ' इत्यत्र गोतमाचार्येणोक्तत्वादिति हेतुरुक्तः । तथा च थोऽयमाप्तोक्तः शब्दो गोतमाचार्येणोक्तः स च प्रमाणमित्यायातम् । एतेन तद्भिन्नस्याप्रामाण्यमेवाङ्गी-ज्ञान में क्या ' इषे त्वोर्जे त्वा ', ' अग्निमीले पुरोहितम् ' इत्यादि प्रसिद्ध शब्दराशि का विषय के रूप में भान होता है, अथवा अन्य कोई दूसरी ही वस्तु का? अन्तिम पक्ष यहीं नहीं है, क्योंकि इस प्रकार की कोई वस्तु वेद के नाम से प्रसिद्ध नहीं है । पहला पक्ष मानने पर तो वेद की सिद्धि हो ही जायगी । तब भला उससे अतिरिक्त वेद बनाने की क्या बात आई? इसी तरह जिसका ज्ञान है, उसी ने वेद बनाये, यह कथन भी ठीक नहीं है । ईश्वर के ज्ञान होने मात्र से उनकी रचना तो हो नहीं जाती और यह वाक्य आपके पहले के इस art के भी faea है कि उनके ज्ञान के बीच में वेदों का प्रकाश करके उनसे वेदों का प्रकाश कराया । उनके द्वारा वेदों का प्रकाश कराया, इस वाक्य का ब्रह्मादि के ज्ञान में वेदों का प्रकाश कराया, यह अर्थ करना भी असङ्गत है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसके विपरीत वेतार उपनिषद् में साक्षात् परमेश्वर ही वेद के उपदेष्टा माने गये हैं । जैसे कि जो पहले ब्रह्मा को बनाता है और जो उसको वेद का उपदेश देता है, अपनी बुद्धि में भी प्रकाश का संचार करने वाले उस परमात्मा की शरण में मोक्ष की कामना से मैं पहुंचा हूँ ' । ' प्रेरयित्वा ' यहाँ पर उपसर्ग के रहने पर भी ' क्वा ' प्रत्यय का ' स्यप् ' क्यों नहीं किया गया, यह भी विचारणीय बात है । ' चार मुख के ब्रह्माजी ने वेदों को रवा, ऐसे इतिहास को हम सुनते हैं । ऐसा मत कहो, क्योंकि इतिहास को शब्द प्रमाण के भीतर गिना है । ' आप्तोपदेश: ', ' शब्द ऐतिह्यम् ' इत्यादि न्याय दर्शन के सूत्रों में गौतम मुनि ने कहा है कि ' सत्यवादी विद्वानों का जो उपदेश है, उसको शब्द प्रमाण में गिनते हैं । शब्द प्रमाण से जो युक्त है, वहीं इतिहास मान्य हैं, अन्य नहीं । ' इस सूत्र के भाष्य में वात्स्यायन मुनि ने आप्त का लक्षण कहा है कि जो साक्षात् सब पदार्थ विद्याओं का जानने वाला, कपट आदि दोषों से रहित धर्मात्मा है, सत्यवादी, सत्यमानी और सत्यकारी हैं, जिसको पूर्ण विद्या से आत्मा में जिस प्रकार का ज्ञान है, उसको कहने की इच्छा • सब मनुष्यों पर कृपादृष्टि से सब सुख होने के लिये सत्य उपदेश का करने वाला है, जो पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त सब पदार्थों को यथावत् साक्षात् करता है, उसी के अनुसार व्यवहार करता है, वही आप्त है । इस प्रकार सत्य वृत्तान्त का ही नाम इतिहास है, मनूत का नहीं । सत्य प्रमाण से युक्त जो इतिहास है, वही सब मनुष्यों को ग्राह्य है । इसको विपरीत का नहीं, क्योंकि प्रमादी पुरुष के मिथ्या कथन का इतिहास में ग्रहण हीनहीं होता ' ( पृ ० २०-२१ ) यह सब असंबद्ध बाते हैं । ऐतिह्य को शब्द प्रमाण के अन्तर्गत मान लेने मात्र से उक्त बात का निषेध नहीं हो जायगा । प्रतीक के रूप ' ऐतिह्यम् ' इस पद का तरह ' आप्तोपदेशः ' यहाँ पर ' गोतम मुनि की उक्ति होने से ' यह हेतु दिया है । इसका अर्थ यह हुआ कि द्वारा कहे गये शब्द की चर्चा की है, वह प्रमाण है । इससे यह अर्थ निकलेगा कि ग्रहण भीगलत है । इसी गोतम ने जिस आप्त के इससे भिन्न शब्द अप्रमाण होगा । यह बात ठीक

पृष्ठ 533

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 533 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* येथार्थपारिजातः प्रसिद्धशब्दराशिविषयतया भात्यन्यदेव वा किश्चित्? नान्त्यः, तस्य वेदत्वाप्रसिद्धेः । नाद्यस्तथात्वं सिद्धा एव वेदाः | कि तद्व्यतिरिक्तवेदप्रणयनम्? एवमेव यस्य ज्ञानं तेनैव प्रणीता इत्यप्यसाम्प्रतम्, ईश्वरज्ञानेन तेषां प्रणेतृत्वकथना-सङ्गतेः । एषां ज्ञानमध्ये प्रेरयित्वा तद्द्वारा वेदा: प्रकाशिता इति स्ववचनविरोधाच्च । यत्तु तद्द्वारा प्रकाशिता इत्यस्य ब्रह्मादीनां ज्ञानेषु वेदाः प्रकाशिता इत्यर्थः कृतः, तदपि न सङ्गतम्, निर्मूलत्वात् । श्वेताश्वतरोपनिषदि साक्षात्परमेश्वरेणैव ब्रह्मणो वेदप्रेषणस्योक्तत्वात् । तथाहि - ' यो ब्रह्माणं fara पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं हृ देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षवै शरणमहं प्रपद्ये ॥ ' ( ६।१८ ) इति वचनात् । प्रेरयित्वेति कथमुपसर्गयोगेऽपि ल्यपोऽभाव इति चिन्त्यम्? यत्तु - ' चतुर्मुखेण ब्रह्मणा वेदा निरमायिषतेत्यैतिह्यम्, मैवं वाच्यम्, ऐतिह्यस्य शब्दप्रमाणान्तगतत्वात् ' आप्तोपदेश: शब्द: ' ( १ | १ | ७ ) इति गोतमाचार्येणोक्तत्वात् । ' शब्द ऐतिह्यम् ' । ( २२१२ ) इत्यादि च । ' आप्तः खलु साक्षात्कृतधर्मा यथादृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा । साक्षात्करणमर्थस्याप्तिस्तया प्रवर्तत इत्याप्तः ' इति न्यायभाष्ये वात्स्यायनेनोक्तः । अतः सत्यस्यैतिह्यत्वेन ग्रहणं नानृतस्य । यत्सत्यप्रमाणमाप्तोपदिष्टं तद् ग्राह्यं नातो विपरीतमिति, अनृतस्य प्रमत्तगीतत्वात् । इति, तदप्यसम्बद्धप्रलपितम् ऐतिह्यस्य शब्दप्रमाणान्तर्भावेण मेवमिति निषेधानुपपत्तेः । प्रतीकतयंतिह्यमित्यशुद्धमेव गृहीतम् । एवमेव ' आप्तोपदेश: ' इत्यत्र गोतमाचार्येणोक्तत्वादिति हेतुरुक्तः । तथा च योऽयमाप्तोक्तः शब्दो गोतमाचार्येणोक्ता स च प्रमाणमित्यायातम् । एतेन तद्भिन्नस्याप्रामाण्यमेवाङ्गी-ज्ञान में क्या ' इषे त्योर्जे त्वा ', ' अग्निमीले पुरोहितम् ' इत्यादि प्रसिद्ध शब्दराशि का विषय के रूप में भान होता है, अथवा अन्य कोई दूसरी ही वस्तु का? अन्तिम पक्ष यहीं नहीं है, क्योंकि इस प्रकार की कोई वस्तु वेद के नाम से प्रसिद्ध नहीं है । पहला पक्ष मानने पर तो वेद की सिद्धि हो हो जायगी । तब भला उससे अतिरिक्त वेद बनाने की क्या बात आई? इसी तरह जिसका ज्ञान है, उसी ने वेद बनाये, यह कथन भी ठीक नहीं है । ईश्वर के ज्ञान होते मात्र से उनकी रचना तो हो नहीं जाती और यह वाक्य आपके पहले के इस aritra है कि उनके ज्ञान के बीच में वेदों का प्रकाश करके उनसे वेदों का प्रकाश कराया | उनके द्वारा वेदों का प्रकाश कराया इस वाक्य का ब्रह्मादि के ज्ञान में वेदों का प्रकाश कराया, यह अर्थ करना भी असङ्गत है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसके विपरीत श्वेताश्वतर उपनिषद् में साक्षात् परमेश्वर ही वेद के उपदेष्टा माने गये हैं । जैसे कि - ' जो पहले ब्रह्मा को बनाता है और जो उसको वेद का उपदेश देता है, अपनी बुद्धि में भी प्रकाश का संचार करने वाले उस परमात्मा की शरण में मोक्ष की कामना से मैं पहुंचा हूँ ' । ' प्रेरयित्वा ' यहाँ पर उपसर्ग के रहने पर भी ' क्त्वा ' प्रत्यय का ' ल्यप् ' क्यों नहीं किया गया, यह भी विचारणीय बात है । ' चार मुख के ब्रह्माजी ने वेदों को रचा, ऐसे इतिहास को हम सुनते हैं । ऐसा मत कहो, क्योंकि इतिहास को शब्द प्रमाण के भीतर गिना है । ' आप्तोपदेश: ', ' शब्द ऐतिहाम् ' इत्यादि न्याय दर्शन के सूत्रों में गौतम मुनि ने कहा है कि ' सत्यवादी विद्वानों का जो उपदेश है, उसको शब्द प्रमाण में गिनते हैं । शब्द प्रमाण से जो युक्त है, वही इतिहास मान्य है, अन्य नहीं । ' इस सूत्र के भाष्य में वात्स्यायन मुनि ने आप्त का लक्षण कहा है कि जो साक्षात् सब पदार्थ विद्याओं का जानने वाला, कपट आदि दोषों से रहित धर्मात्मा है, सत्यवादी, सत्यमानी और सत्यकारी है, जिसको पूर्ण विद्या से आत्मा में जिस प्रकार का ज्ञान है, उसको कहने की इच्छा से सब मनुष्यों पर कृपादृष्टि से सब सुख होने के लिये सत्य उपदेश का करने वाला है, जो पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त सब पदार्थों को यथावत् साक्षात् करता है, उसी के अनुसार व्यवहार करता है, वही आप्त है । इस प्रकार सत्य वृत्तान्त का ही नाम इतिहास है, अनृत का नहीं । सत्य प्रमाण से युक्त जो इतिहास है, वही सब मनुष्यों को ग्राह्य है । इसको विपरीत का नहीं, क्योंकि प्रमादी पुरुष के मिथ्या कथन का इतिहास में ग्रहण ही नहीं होता ' ( पृ ० २०-२१ ) यह सब असंबद्ध बाते हैं । ऐति को शब्द प्रमाण के अन्तर्गत मान लेने मात्र से उक्त बात का निषेध नहीं हो जायगा । प्रतीक के रूप ' ऐतिह्यम् ' इस पद का ग्रहण भी गलत है । इसी तरह ' आप्तोपदेश: ' यहाँ पर ' गोतम मुनि की उक्ति होने से यह हेतु दिया है । इसका अर्थ यह हुआ कि गोतम ने जिस आप्त के द्वारा कहे गये शब्द को चर्चा की है, वह प्रमाण हैं । इससे यह अर्थ निकलेगा कि इससे भिन्न शब्द अप्रमाण होगा । यह बात ठीक

पृष्ठ 534

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 534 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* वेदार्थपारिजातः कि, ' मन्त्रकृतः ', ' मन्त्रकृद्भ्यः ' इत्याद्यनेकै मन्त्रवचनैर्ब्राह्मणवचनैश्च वेदानामृषिकर्तृकत्वमुक्तम्, सामानि त्वद्रीत्याप्यग्न्यादिभ्य ऋषिभ्यो वेदानामुत्पत्तिः श्रूयते । यथैवं ' तस्माद्यज्ञात सर्वहुत ऋचः जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत || ' ( वा ० सं ० ३१।७ ), तथैवमपि - ' अग्नेर्ऋग्वेदः ' ( श ० ११ | ५ | ८ | ३ ) इत्युक्तम्, तत्र का वाचोयुक्तिर्यया परमेश्वराद्वेदोत्पत्तिरभ्युपेया, नाग्न्यादिभ्यः श्रुताप्युत्पत्तिः । सिद्धान्ते तु वेदानां नित्यत्वान्न कस्मादपि वेदानामुत्पत्तिः । सम्प्रदायप्रवर्तकत्वं तु यथैवेश्वरस्य तथैव ब्रह्मादीनामृषी-णामन्यादीनां च सम्भवत्येव । व्यासस्यानृषित्वोक्तिस्तु दयानन्दस्य वाष्टचं मेव । तदनुयायिनस्तु तं महर्षि मन्वते । तच्च सर्वथा निर्मूलम् । चित्तु नवीनपुराणग्रन्थानामित्यत्र कर्मधारयसमासस्तु न सम्भवति, नवीनत्वपुराणत्वयोः सामानाधि करण्याभावात् । यदि नवीननिर्मितपुराणग्रन्थानामिति मध्यमपदलोपी समास इत्युच्येत, तदपि न सम्यक्, नवीन-जनकर्तृकवस्तुनः पुराणत्वाभिधानासम्भवादित्यप्याह । यदपि च-- ' यो मन्त्रसूक्तानामृषिलिखितस्तेनैव तद्रचितमिति कुतो न स्यात्, मैवं वादि, ब्रह्मादिभिरपि वेदानामध्ययनश्रवणयोः कृतत्वात् । ' यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम् ' इति श्वेताश्वतरोपनिषदादिवचनस्य विद्यमानत्वात् । समीपे वेदानां वर्तमानत्वात् । तद्यथा- - ' ' अग्निवायुरविभ्यस्तु एवं यदर्षीणामुत्पत्तिरपि नासीत्, तदा ब्रह्मादीनां ब्रह्म सनातनम् । दुदोह यज्ञसिद्धयर्थं मृग्यजुःसामलक्षणम् || ' ( म ० ११५ ), ' अध्यापयामास पितॄन् शिशुराङ्गिरसः कविः ' ( म ० २२६ ) इति मनुसाक्ष्यत्वात् । अग्न्यादीनां सकाशात् ब्रह्मापि वेदाध्ययनं चक्रे, अन्येषां व्यासादीनां का कथा ' ( पृ ० २१ ) इति, तदपि न मनोज्ञम्, अशुद्धयादिदोषबाहुल्यात् । तथाहि तत्पदपरामृष्टस्य वेदस्य पुल्लिङ्गत्वात् तद्रचितमिति नोचितम् । न च मन्त्रसूक्ताभिप्रायेण तद्युक्तम्, ब्रह्मादिभिर्वेदानामध्ययनश्रवणयोः कृतत्वादिति ' मन्त्रकृतः ', मन्त्रकृद्भयः ' इत्यादि अनेक मन्त्र और ब्राह्मणों के वचनों में वेदों को ऋषियों की कृति माना गया है । आपके मत में भी अग्नि प्रभृति ऋषियों से वेदों की उत्पत्ति सुनी गई है । ' तस्माद्यज्ञात् ' तथा ' अग्नेर्ऋग्वेदः ' इत्यादि श्रुतियों में यही बात कही गई है । तब इसमें क्या प्रमाण है कि जिसके आधार पर परमेश्वर से वेद की उत्पत्ति मानी जाय, न कि अग्निप्रभृति से, जिसके लिये कि उक्त श्रुतियों में स्पष्ट निर्देश है । हमारे मत में तो वेद नित्य हैं, अतः उनकी उत्पत्ति किसी से भी नहीं होती । लुप्त सम्प्रदाय की प्रवर्तकता जैसे ईश्वर में हैं, उसी तरह ब्रह्मा, ऋषिगण और अग्नि प्रभृति में भी मानी हो जा सकती है । व्यास को ऋषि न मानना दयानन्द की धृष्टता है । दयानन्द के अनुयायी तो दयानन्द को महर्षि मानते हैं, इसमें क्या प्रमाण हैं? कुछ लोगों का कहना है कि ' नवीनपुराणग्रन्थानाम् ' यहाँ पर कर्मधारय समास नहीं हो सकता, क्योंकि नवीनत्व और पुराणत्व का सामानाधिकरण्य नहीं होगा । यदि ' नवीन निर्मितपुराणग्रन्थानाम् ' यह मध्यम पद लोपी समास माना जाता है, तो भी ठीक नहीं है, क्योंकि नवीन व्यक्ति के बनाये गये ग्रन्थ ' पुराण ' नहीं कहे जा सकते । ' जो सूक्त और मन्त्रों के ऋषि लिखे जाते हैं, उन्होंने ही वेद रचे हों, ऐसा क्यों नहीं माना जाय? ऐसा मत कहो, क्योंकि ब्रह्मादि ने भी वेदों को पढ़ा है । सो श्वेताश्वतर आदि उपनिषदों में यह वचन है- ' जिसने ब्रह्मा को उत्पन्न किया और ब्रह्मादि को सृष्टि के आदि में अग्नि आदि के द्वारा वेदों का भी उपदेश दिया है, उसी परमेश्वर के शरण को हम लोग प्राप्त होते है । इसी प्रकार ऋषियों ने भी वेदों को पढ़ा है, क्योंकि जब मरीचि भादि ऋषि और व्यास आदि मुनियों का जन्म भी नहीं हुआ था, उस समय भी ब्रह्मा के समीप वेद वर्तमान थे । इसमें मनु के श्लोकों की भी साक्षी है कि ' पूर्वोक्त अग्नि, वायु, रवि और अङ्गिरा से ब्रह्माजी ने वेदों को पढ़ा था ' । जब ब्रह्माजी ने वेदों को पढ़ा था तो व्यास आदि की तो कथा हो क्या हो सकती है ' ( पृ ० २१-२२ ), किन्तु यह बात भी मन को रुचती नहीं, क्योंकि इसमें अशुद्धि आदि अनेक दोष हैं । जैसे कि यहाँ पर ' तत् ' पद से वेद का परामर्श होता है । वेद शब्द पुलि अतः ' तद्रचितम् ' यह उचित प्रयोग नहीं है । मन्त्र और सूक्त का यह ' तत् ' पद से परामर्श होता है, यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि

पृष्ठ 535

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 535 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजा ५०५ वक्ष्यमाणग्रन्थविरोधात् । • ब्रह्मादीनां समीपे वेदानां वर्तमानत्वादित्यपि निःसारम्, तदा ब्रह्मादिभिस्तेषामधीतत्व-श्रवणादित्यस्यैव सुवचत्वात् । मनुसाक्ष्यादित्यनेनैवाभीष्टसिद्धी साक्ष्यत्वादिति त्वत्प्रयोगानर्थक्यात् । ऋषयो मन्त्रकृत इति विरोधाच्च । त्वद्रीत्याप्यग्न्यादयश्चत्वारो मनुष्या अपि ऋषय एव । तथात्वे यदर्षीणामुत्पत्तिरपि नासीत् इति वचनमपि तव स्वाभ्युपगमविरुद्धम् । ' यो वै ब्रह्माणम् ' इत्यत्र तु ' वै ' इति कपोलकल्पितम्, न श्रुति सिद्धम् । तथा ब्रह्मणे परमेश्वरेण वेदाः प्रहिता इति विज्ञायते । तथा चान्यादिद्वारा परमेश्वरेण ब्रह्मणे वेदाः प्रहिता इत्यप्यशुद्धमेव । किच, कुत एतद्विज्ञायते यदृषीणामुत्पत्तेः प्राग् ब्रह्मणा वेदा अधीताः । ब्रह्मण ऋषीणां जनकत्वादिति चेत्, तथात्वेऽग्न्यादीनामपि तज्जन्यत्वात् कुतस्तेभ्योऽपि तदध्ययनं युज्यते? तेभ्यस्तदुपपत्तावृषिभ्योऽपि कुतो न तदुपपत्ति:? अग्न्यादयोऽपि मनुष्या एव त्वयाभ्युपेयन्त इति कुतस्तेऽपि न ब्रह्मणोऽर्वाचीनास्तज्जन्याश्च । किश्व, ब्रह्मणस्तु साक्षात् परमेश्वरजभ्यत्वं विज्ञायते, ' यो ब्रह्माणं विदधाति ' इति श्रुतेः । न तथाग्न्यादीनां परमेश्वरजन्यत्वं श्रूयते । ' दुदोह यज्ञसिद्धयर्थम् ( ११२३ ) इति मनुवचनं तु नाम्यादिभ्यो ब्रह्मणो वेदाध्ययनसाधकम्, किन्त्वग्भ्यादिभ्यः सारसंग्रहसाधकमेव । उपरिष्टादपि ऋगादिभ्यो भूर्भुवःस्वरिति व्याहृतिरूपस्य सारस्य सङ्कलनमुक्तम् । अग्न्यादीनां मनुष्यत्वोक्तिरपि निर्मूलैव । न च ज्ञानवस्वमेव मनुष्यत्वसाधकम्, देवानामपि ज्ञानवत्त्वेन व्यभिचारात् । अत एव सन्मूलश्रुतिष्वग्न्यादीनामपि पृथिव्यन्तरिक्षचुलोकानां साररूपेण सङ्कलनमुक्तम् । अत एव नाघीतिपठितिप्रयोगः, किन्तु दुदोहेत्येव । किञ्च त्वदुद्धृतेन ' दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थम् ' इति वचनेन यज्ञसिद्ध्यर्थमेव वेदानामाविर्भाव उक्तः । इसका आगे के इस वाक्य से विरोध होगा, जिसमें कि वेदों का अध्ययन और श्रवण कर लिया, ऐसा कहा गया है । ब्रह्मा आदि के पास वेद वर्तमान है, यह कथन भी निःसार है, क्योंकि उस अवस्था में यह कहना उचित था कि ब्रह्मा प्रभूति ने वेद पढ़ लिया है, ऐसा सुना जाता है । ' मनु साक्ष्यात् ' इतने मात्र से अभीष्ट अर्थ निकल आता है, तब भी यहाँ पर ' साक्ष्यत्वात् ' इस त्वत् प्रत्ययान्त पद का प्रयोग करना व्यर्थ है और ' ऋषि मन्त्र के कर्ता है ' इस वाक्य से विरोध भी होगा । आपके मत से भी अग्नि प्रभृति चार ऋषि ही है । ऐसी स्थिति में जब ऋषियों की उत्पत्ति भी नहीं हुई थी, यह कथन आपकी अपनी बात के भी विरुद्ध पड़ेगा । ' यो वै ब्रह्माणम् ' यहाँ पर ' ' का पाठ कपोलकल्पित है, श्रुति में यह नहीं है । इसी तरह ब्रह्मा के लिये परमेश्वर ने वेद भेजे, ऐसा ज्ञात होता है । तथा अग्नि प्रभृति के द्वारा परमेश्वर ने ब्रह्मा के लिये वेद भेजे, इस तरह के प्रयोग भी अशुद्ध हैं । यह कैसे मालूम होता है कि ऋषियों की उत्पत्ति के पहले ब्रह्मा ने वेदों का अध्ययन किया? यदि यह माना जाय कि ब्रह्मा ऋषियों का जनक है? ऐसा मानने पर वो अग्नि आदि का भी ब्रह्मा ही जनक है, तब उसमें अग्नि प्रभृति से अध्ययन किया, यह कैसे सम्भव होगा? इतने पर भी यदि अग्नि प्रभूति से वेद की उत्पत्ति मानी जाय तो ऋषियों से भी उनकी उत्पत्ति मानने में क्या बाधा है? अग्निप्रभृति भी आपके मत से मनुष्य ही हैं, तब वे ब्रह्मा से नवीन और उन्हीं से उत्पन्न क्यों न माने जांय । ' यो ब्रह्माणम् ' इस श्रुति से यह ज्ञात होता है कि परमेश्वर से ब्रह्मा की सृष्टि साक्षात् हुई । इस तरह की उत्पत्ति अग्नि प्रभूति की परमेश्वर से नहीं सुनी गई । ' दुदोह यज्ञसिद्धयर्थम् ' इत्यादि मनु बचन भी अग्नि प्रभृति से ब्रह्मा के वेदाध्ययन का साधक नहीं है, अपि तु इससे केवल यही सिद्ध होता है कि इनसे सार का संग्रह किया । इसके आगे भी ऋगादि से भूरादि तीन व्याहृतियों का सार संग्रह के रूप में ही उल्लेख हैं । अस्ति प्रभूति को मनुष्य मानना भी बिना प्रमाण का है । ज्ञानवान् होना ही मनुष्यत्य का साधक नहीं हो सकता, क्योंकि देवता भी ज्ञानवान् हैं, किन्तु वे मनुष्य नहीं हैं । इसी लिये इससे पहले की श्रुति में अग्नि प्रभूति का भी द्युलोक प्रभृति से सार संकलन बताया गया है । इसीलिये यहाँ पर अध्ययन, पठन आदि का प्रयोग न होकर दोहन पद प्रयुक्त है । यह भी ध्यान देने की बात है कि आपके उद्धृत मनुस्मृति के श्लोक में यज्ञ सम्पादन के लिये ही वेदों का आविर्भाव बताया गया है । ६४

पृष्ठ 536

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 536 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

I वैवार्थपारिजात: यत्तु - ' कथं वेदः श्रुतिश्चेति द्वे नामनी ऋक्संहितादीनां जाते ' इत्याशङ्कय समाहितम् -- ' अर्थवशात् विद् ज्ञाने, विद् सत्तायाम्, विद्लृ लाभे, विद् विचारणे -- एभ्यो हलश्चेति सूत्रेण करणाधिकरणयोर्वत्रि प्रत्यये कृते वेदशब्दः साध्यते । तथा श्रु श्रवणे इत्यस्माद्धातोः करणकारके क्तिन्प्रत्यये श्रुतिशब्दो व्युत्पाद्यते । विदन्ति जानन्ति विद्यन्ते भवन्ति विन्दन्ति लभन्ते विन्दते विचारयन्ति सर्वे मनुष्याः सर्वाः सत्यविद्या येर्येषु वा, तथा विद्वांसश्च भवन्ति ते वेदाः । तथाऽऽदिसृष्टिमारभ्याद्यपर्यन्तं ब्रह्मादिभिः सर्वाः सत्यविद्याः श्रूयन्तेऽनया सा श्रुतिः । न कस्यचिद्देहधारिणः सकाशात् कदाचित्कोऽपि वेदरचनं दृष्टवान् । कुतः? निरवयवेश्वरात्तेषां प्रादुर्भावात् । अग्निवाय्वादित्याङ्गिरसस्तु निमित्तीभूताः, वेदप्रकाशार्थमीश्वरेण कृता इति विज्ञेयम्, तेषां ज्ञानेन वेदानामनुत्पत्तेः । वेदेषु शब्दार्थसम्बन्धाः परमेश्वरादेव प्रादुर्भूताः, तस्य पूर्णविद्यावत्वात् । अतः किं सिद्धम्, अग्निवाय्वादित्याङ्गिरोभूतमनुष्य देहधारि-जीवद्वारेण परमेश्वरेण श्रुतिर्वेद: प्रकाशीकृत इति बोध्यम् ' ( पृ ० २२ ) इति । तदपि निःसारमशुद्धं च येषु यैरिति पदाभ्यां तन्त्राणामागमानामितिहासपुराणादीनामपि ग्रहणसम्भवेन तत्रापि वेदत्वापत्तेः । त्वदभिमतेषु वेदमूलकेषु च वेदत्वापत्तेः । किञ्च वेदेषु वेदैर्वा कास्ता: सत्यविद्या या भवन्ति याश्च सर्वेजना जानन्ति लभन्ते तथा बिचारयन्ति ता अपि निरूपणीयाः । तैश्व कथं सर्वसत्यविद्याविचार: सम्पद्यते? सम्प्रति राकेट कम्प्यूटरादिविद्या भौतिकविज्ञानानि कथं त्वया त्वदनुयायिभिर्वा नाविष्कृतानि? कतिविधा विद्या या: सत्य-शब्देन विशेष्यते? येषु विद्वांसो भवन्तीत्यस्य को वार्थः? विषयसप्तमी चेदधिकरणकारके इति स्वीकृतिविरोधः । किञ्च त्वगत्या वेदा अपि ज्ञानरूपाः । ज्ञानं च प्रमारूपमेव वक्तव्यम्, ओमिति चेत् प्रमारूपाणां वेदानां कथं सत्यव विद्याजनकत्वमेकत्र प्रमात्वप्रमाणत्वविरोधात् । सत्यविद्याश्च प्रमारूपा वक्तव्याः । तथा चोभयप्रमाणां वैलक्षण्यमपि ' बेद और श्रुति ये दो नाम ऋग्वेद आदि संहिताओं के क्यों हुए हैं? " ऐसी आशङ्का कर उसका समाधान किया है कि अर्थ के भेद से । क्योंकि एक ' विद् ' धातु ज्ञानार्थक है, दूसरा ' विद् ' सत्तार्थक है, तीसरे ' विदुलू ' का लाभ अर्थ है, चोथे ' विद् ' का अर्थ विचार है । इन चार धातुओं से करण और अधिकरण कारक में ' धन् ' प्रत्यय करने से ' वेद ' शब्द सिद्ध होता है । तथा ' श्रु ' धातु श्रवण अर्थ में है । इससे करण कारक में ' कि ' प्रत्यय के होने से ' श्रुति ' शब्द सिद्ध होता है । जिनके पढ़ने से यथार्थ विद्या का विज्ञान होता है, जिनको पढ़ के विद्वान होते हैं, जिनसे सब सुखों का लाभ होता है और जिनसे ठीक - ठीक सत्यासत्य का विचार मनुष्यों को होता है, इससे ऋक्संहिता आदि का नाम ' वेद ' है । वैसे ही सृष्टि के आरम्भ से आज तक और ब्रह्मादि से लेकर हम लोगों तक जिससे सब सत्य famrat at सुनते आये हैं, इससे वेदों का ' श्रुति ' नाम पड़ा | क्योंकि किसी ने वेदों के बनाने वाले देहधारी को साक्षात् कभी नहीं देखा । इस कारण से जाना गया कि वेद निराकार ईश्वर से ही उत्पन्न हुए हैं और उनको सुनते - सुनाते ही आजतक सब लोग चले आते हैं । अग्नि, वायु आदित्य और अङ्गिरा इन चारों मनुष्यों को, जैसे वादित्र को कोई बजाये या काठ की पुतली को नचावे, इसी तरह ईश्वर ने उनको निमित्त मात्र किया था, क्योंकि उनके ज्ञान से वेदों की उत्पत्ति नहीं हुई । किन्तु इससे यह जानना कि वेदों में जितने शब्द, अर्थ और सम्बन्ध हैं, वे सब ईश्वर से ही प्रकट हैं, क्योंकि वह पूर्ण विद्या वाला है ' ( १० २२-२३ ) । यह कथन भी निःसार और अशुद्ध है, क्योंकि यहाँ पर ' येषु ये: ' इन दो पदों से तन्त्र, आगम, इतिहास, पुराण आदि का भी ग्रहण किया जा सकता है, ऐसी दशा में इनको भी बेद मानना पड़ेगा । आप जिनको वेदमूलक मानते हैं, उनमें भी वेदत्व की आपत्ति होगी । आप यह भी बताइये कि वेदों में अथवा वेदों से वे कौन सी सत्य विद्याएँ होती है, जिनको कि सब लोग जानते हैं, पाते हैं और विचार करते हैं । उनसे सभी सत्य विद्याओं का विचार कैसे सम्भव होता है? आजकल के राकेट, कम्प्यूटर आदि की farara और afre विज्ञान का आपने अथवा आपके अनुयायियों ने क्यों नहीं आविष्कार किया? वे कितनी विद्याएं हैं, जो कि सत्य शब्द से अभिहित हो सकती हैं । जिनमें विद्वान् होते हैं, इसका क्या अभिप्राय है? यदि यहाँ पर विषय में सप्तमी मानें तो इसके पहले आपने तो अधिकरण में सप्तमी मानी है, उससे विरोध होगा । आपके मत से तो वेद ज्ञानरूप हैं । ज्ञान तो प्रमारूप ही होता है । यदि इस बात को आप मानते है तो प्रमारूप वेदों को सत्य विद्या का जनक कैसे मानेंगे? क्योंकि प्रमात्व और प्रमाणत्व दोनों एक जगह नहीं रह सकते । सत्य विद्या भी प्रमारूप ही मानी जायगी । इस परिस्थिति में वेदरूप प्रभा और सत्य विद्या रूप प्रमा में क्या वैलक्षण्य

पृष्ठ 537

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 537 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थ पारिजातः III वक्तव्यम्, अत्यन्तसालक्षण्ये साध्यसाधनभावानुपपत्तेः । ज्ञानरूपाणां वेदानां किमधिकरणम्? परमेश्वरोऽन्यो वा? नाम्यस्तस्यैव सर्वविद्यावत्त्वप्रसङ्गात् । परमेश्वर एव चेत्, तदापि सत्यविद्यायाः किमधिकरणम्? ज्ञानं वेदा वा? आद्ये वेदेष्वित्युक्तिविरोधात् । वेदेषु चेत्तदपि नोपपद्यते, ज्ञानस्य ज्ञानान्तराधिकरणत्वे मानाभावात् । तु वाक्यज्ञानेन वाक्यार्थज्ञानवत् परमेश्वरनिष्ठवेदात्मकज्ञानेन सत्यविद्यात्मकं ज्ञानं भविष्यतीति चेन्न, तथात्वे वेदात्मकज्ञानेन मनुष्येषु सत्यविद्योत्पत्त्यनुपपत्तेः । अभ्यनिष्ठवाक्यज्ञानेनान्यनिष्ठवाक्यार्थज्ञानाभावात् । यीश्वरीयज्ञानात्मका वेदास्तदा तेषामन्यत्र संक्रमणमन्यनिष्ठजनकत्वं च सर्वथा नोपपद्यते । किञ्चेश्वरस्य समस्तं ज्ञानं वेदो ज्ञानांशो वा? नाद्यस्तथात्वे परमेश्वरस्य भौतिकादिवेदवाह्मज्ञानाभावेनासावंश्यापत्तिः । नान्त्यः, वेदसर्व-विद्यात्वोक्तिविरोधात् । ईश्वरज्ञानरूपा वेदा निर्विषयाः सविषया वा? नाद्यः, विकल्पानुपपत्तेः । ईश्वरज्ञानमेकं व्यापकं नित्यमनेकं परिच्छिन्नमनित्यं वा? नाद्यः, वेदा इति बहुवचनानुपपत्तेः । नान्त्यः, नित्यत्वोक्तिव्याघातात् । न द्वितीयः, तज्जन्यायाः सद्विद्याया विषयेभ्यो भिन्नास्तद्विषया अभिन्ना वा? भिन्नत्वे के ते? कथं वा भिन्नविषयज्ञनिभिन्नविषया विद्या जन्यन्ते? कार्यकारणभावनियामकाभावादतिप्रसक्तिश्च । अभिन्नाश्वेतैरर्थक्यापत्तिः । नहि घटविषयया प्रमया घटप्रमाजन्यत्वेऽपि किञ्चित् प्रयोजनं सिद्धयति । तस्माद्वेदविषयकं सर्वमपि दयानन्दीयं मतमशुद्धमेव । मन्त्रब्राह्मण समुदायात्मकशब्दराशिरेव वेदः । तस्य वर्णरूपेण नित्यत्व-विशिष्टविभुत्वेऽपि वर्णानुपूर्वीविशिष्टपदवाक्यरूपेणानित्यत्वेऽपि पूर्वोच्चारणसजातीयोच्चारणानुपूर्वीकत्वेन प्रवाहरूपेण नित्यत्वम् । नित्यानां विभुनां वर्णानां देशतः कालतश्च पौर्वापर्यरूपाया आनुपूर्व्या असम्भवेनानित्यानां वर्णाभिव्यक्ती-है, यह आपको बताना पड़ेगा । अत्यन्त सदृश वस्तुओं में साध्यसाधनभाव नहीं बनता । ज्ञानरूप वेदों का अधिकरण परमेश्वर है या कोई दूसरा? दूसरा कोई हो नहीं सकता, क्योंकि इस अवस्था में उसी को सब विद्याओं से युक्त मानना पड़ेगा । यदि परमेश्वर को ही माने तो सत्य विद्या का अधिकरण कौम होगा? ज्ञान अथवा वेद? पहले पक्ष में ' वेदेषु ' इस उक्ति का विरोध होगा । यदि वेदों में after णता मानी जाय तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि एक ज्ञान के दूसरे ज्ञान का अधिकरण होने में कोई प्रमाण नहीं है । वाक्य ज्ञान की सहायता से जैसे वाक्यार्थ का ज्ञान होता है, उसी तरह परमेश्वरनिष्ठ वेदात्मक ज्ञान से सत्यविद्यात्मक ज्ञान हो सकेगा, यह भी नहीं बन सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर वेदात्मक ज्ञान से मनुष्यों में सत्यविद्या की उत्पत्ति नहीं होगी । एक व्यक्ति में वर्तमान वाक्यज्ञान से दूसरे व्यक्ति को वाक्यार्थ का ज्ञान नहीं हो सकता । यदि वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं, तब उनका अन्यथ संक्रमण अथवा जन्म सर्वथा नहीं हो सकता । यह भी बताना पड़ेगा कि वेद ईश्वर का समस्त ज्ञान है या उसका एक अंश? पहला पक्ष हम नहीं मान सकते, क्योंकि तब परमेश्वर को वेद बाह्य भौतिक विषयों का ज्ञान न होने से वह असर्वज्ञ अर्थात् बल्प हो जायगा | दुसरा पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर वेद में सब विद्याएं वर्तमान है, आपकी इस उक्ति का विरोध होगा । ईश्वर ज्ञानरूप वेद निर्विषय है या सविषय? यहाँ पहला पक्ष इसलिये नहीं बनेगा कि उसके मानने पर ईश्वर का ज्ञान एक, व्यापक, नित्य है या अनेक, परिच्छिन्न और अनित्य? इस विकल्प का कोई उत्तर नहीं बनता, क्योंकि पहले पक्ष में ' वेदा: ' यह बहुवचन नहीं हो सकता, दूसरे पक्ष में वेद की नित्यता की उक्ति का विरोध होगा । दूसरा पक्ष भी सम्भव नहीं, क्योंकि वहाँ पर भी यह विकल्प नहीं बन सकेगा कि ईश्वर ज्ञान जन्य सद्विद्या के विषयों से ये विषय भिन्न हैं या अभित? यदि भिन्न हैं तो वे कौन से हैं? अथवा भिन्न विषयक ज्ञानों fara fares far कैसे पैदा होगी? यहाँ पर कार्य कारणभाव का नियामक हेतु न रहने से अतिप्रसंग भी होगा । यदि अभिन्न मानें तो फिर निरर्थक हैं । घटविषयक प्रमा से घट प्रमा के पैदा होने पर भी कुछ नवीन प्रयोजन नहीं सिद्ध होता । इस तरह दयानन्द का वेदविषयक पूरा विचार गलत है । नियत आनुपूर्वी वाला अपौरुषेय मन्त्रब्राह्मण समुदायात्मक वेदराशि ही वेद है । वर्ण के रूप में यह नित्यत्व और विभुत्व से युक्त होते हुए भी और वर्णानुपूर्वी से विशिष्ट पद वाक्य के रूप में अनित्य होते हुए भी पूर्व उच्चारण के सदृश हो उच्चारण की आनुपूर्वी के सदा विद्यमान रहने से यह प्रवाह रूपेण नित्य है । नित्य और विशु वर्णों की देश और काल के पौर्वापर्य से होने वाली

पृष्ठ 538

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 538 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

I वेदार्थपारिजातः नामेव पौर्वापर्योपपस्या तदनित्यत्वधोव्यात् । वर्णनित्यत्वेन वेदानां नित्यत्वोपपादने त्वस्मदादिवचनानामपि तन्न दुरुपपादम्, वर्णानां तत्रापि नित्यत्वानपायात् । यथा शिक्षकीयगात्रविक्षेपमनुकुर्वाणाया नर्तक्या गात्रविक्षेपो भित्र एव, तथैवाचायच्चारितां वेदानुपूर्वीमनुकुर्वाणस्य शिष्यस्य वेदानुपूर्वी भिन्नैव । तथात्वेऽपि वेदानुपूर्व्या नानित्यत्वम्, सर्वासामानुपूर्वीणां नियतत्वेनैकरूप्यात् । कस्याश्चिदप्यानुपूर्व्याः प्राथम्याभावात् । पूर्वानुपूर्वीसापेक्षत्वेनास्वातन्त्र्यात् । प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य विरचितत्वाभावाच्च । अतीतानागतेषु क्षण- विपल - पल - दण्ड- घटी - प्रहर. अहोरात्र पक्ष - मास-वर्ष युग - महायुग कल्प - महाकल्पेष्वपूर्वाया बेदानुपूर्व्या उत्पत्तेरभावादनादिनिधनत्वेन वेदानां नित्यत्वम् । संस्कार-रूपेण प्रलयेऽप्यनुपूर्व्या विद्यमानत्वेनानादिनिधनत्वमप्यव्याहतमेव । ईश्वरनिष्ठाया ब्रह्माग्यस्मदादिनिष्ठानां चानुपूर्वीणां भिन्नत्वेऽप्येकरूपत्वेनैक्यमेव । तथा च सत्यसङ्कल्पस्य परमेश्वरस्य सङ्कल्पेन ब्रह्मादिविशिष्टेषु ऋषिष्वीशनिष्ठाया बेदानुपूर्व्याः सदृश्य आनुपूर्व्याः प्रादुर्भावनम् सुप्तप्रतिबुद्धन्यायेन तत्तन्निष्ठाया एव वा वेदानुपूर्व्याः प्रादुर्भावनमेतेषु tranded प्रेषणं तद्दानं वा । तदेव च वैदिकसम्प्रदायप्रवर्तनमिति न काचिदनुपपत्तिः । वेद श्रुत्यादिशब्दास्तु योगरूढा एव । तेन यथा कुमुदादीनां पङ्कजनिकर्तृत्वेऽपि न पङ्कजशब्दवाच्यत्वम्, तथैवान्यग्रन्थानां सत्यज्ञानजनकत्वेऽपि न वेदशब्दवाच्यतेति । यदुक्तम् -- ' कोऽपि कदाचिदपि देहधारिणः सकाशाद् वेदरचनं न दृष्ट्वान् ' ( पृ ० २२ ) इति, तदपि तुच्छम्, निरवयवत्वात् परमेश्वरादपि वेदरचनं न कश्चित्कदाचिदपि दृष्टवानित्यस्यापि सुवचत्वात् । एको न दृष्टवान् सर्वे वा न दृष्टवन्तः? नाथ:, त्वत्कर्तृकभूमिकारचनस्यापि बहुभिरवृष्टत्वात् । तस्यापि निरवयवत्वादुत्पत्तिप्रसङ्गात् । आनुपूर्वी बन नहीं सकती, यह तो अनित्य वर्णाभिव्यक्ति में ही बन सकती है, इस प्रकार निश्चय हो उसमें भी अनित्यता आ जायगी । art at face ता से यदि वेदों की नित्यता सिद्ध की जाती है तो हमारे वचनों की भी नित्यता सिद्ध की जा सकेगी, क्योंकि वर्णों की नित्यता तो वहाँ भी रहेंगी ही । जैसे शिक्षक के शरीर की विभिन्न मुद्राओं और भंगिमाओं का अनुकरण करने वाली नर्तकी का गात्र-विक्षेष भित्र प्रकार का ही है, उसी तरह बाचार्य की उच्चारित वर्णानुपूर्वी का अनुकरण वाले शिष्य की वेदानुपूर्वी भी भिन्न है । तो भी वेद की आनुपूर्वी अनित्य नहीं है, क्योंकि इन सभी अनुपूत्रियों में निश्चित रूप एक समानता विद्यमान है । इनमें से किसी पूर्वी को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती । प्रत्येक आनुपूर्वी पूर्व की आनुपूर्वी की अपेक्षा रखती है, इस प्रकार वह अपने में स्वतन्त्र नहीं है । इसकी रचना बिना किसी दूसरे प्रमाण की सहायता से की गई है । अतीत अथवा अनागत क्षण, विपल, पल, दण्ड, घटी, पहर दिन, रात, पक्ष, मास, वर्ष, युग, महायुग, कल्प और महाकल्प में भी वेद की कोई अपूर्व आनुपूर्वी उत्पन्न नहीं होती, अतः अनादि-free वेद नित्य माने जाते हैं । प्रलय काल में भी संस्कार रूप से आनुपूर्वी विद्यमान रहती है, अतः वेदों की अनादिनिधनता पर कोई आघात नहीं आता । ईश्वरनिष्ठ तथा ब्रह्मा, अग्नि आदि में तथा अस्मदादि में विद्यमान आनुपूदियों के भिन्न होने पर भी इनमें एक-रूपता के रहने से एकता है । इस प्रकार सत्यसंकल्प परमेश्वर के संकल्प से ब्रह्मा प्रभृति विशिष्ट ऋषियों में ईशनिष्ठ वेदानुपूर्वी के समान आनुपूर्वी का प्रादुर्भावन, अथवा सुप्त प्रतिबुद्धन्याय से उनमें पहले से विद्यमान वेदानुपूर्वी का प्रादुर्भाव हो यहां पर इनमें ईश्वरकृत वेद का प्रेषण अथवा दान कहलावेगा । यहीं वेद संप्रदाय की प्रवृत्ति कहलाती है । इस प्रकार यहां पर कोई दोष नहीं उपस्थित होगा । वेद, श्रुति आदि शब्द योगरूढ हैं । इससे जैसे यद्यपि कुमुद आदि भा कीचड़ से पैदा होते हैं, तो भी उनको पङ्कज नहीं कहा जाता, उसी तरह अन्य ग्रन्थों के सत्य ज्ञान जनक होने पर भी उनको वेद नहीं कहा जाता । ' किसी ने वेदों के बताने वाले देहधारी को साक्षात् कभी नहीं देखा ' यह कथन व्यर्थ है, इसके विपरीत आप यह भी कह सकते हैं कि rear परमेश्वर से भी वेद की रचना होते हुए किसी ने नहीं देखी । आप यह बताइये कि एक ने नहीं देखा या किसी ने नहीं देखा? एक ने नहीं देखा तो इससे अभीष्ट की सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि आपकी बनाई भूमिका को भी अनेक व्यक्तियों ने नहीं देखा, तो क्या वह भी वेद के समान नित्य हो जायगी? दूसरा पक्ष भी इसलिये ठीक नहीं है कि असर्वज्ञ मनुष्यों को उसका ज्ञान

पृष्ठ 539

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 539 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* & नान्त्य:, असर्वज्ञस्य तज्ज्ञानासम्भवात् । नन्वेवं सिद्धान्तेऽपि चोद्यसम्भव:? न तत्र सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यप्रमोयमाण-कर्तृकत्वेन नित्यत्वाभ्युपगमेन रचनविषयकस्य दृष्टत्वस्यादृष्टत्वस्य वातन्त्रत्वात् । अग्न्यादयो वेदप्रकाशार्थमीश्वरेण निमित्तीभूताः कृताः तेषां ज्ञानेन वेदानामनुत्पत्तेः ' ( पृ ० २२ ) इति यत्, तदप्यसाम्प्रतम्, विकल्पानुपपत्तेः । किं वेदाः परमेश्वरेण रचिता अथवा परमेश्वरीयज्ञानेनान्यादिभी रचिता:? नाद्यः, तथात्वेऽग्न्यादानां निमित्तत्वानुपपत्तेः । नान्त्यः, अध्यापकदत्तेन ज्ञानेन अध्येतृ ( शिष्य ) निर्मितग्रन्थानां शिष्य-कर्तृत्वप्रसिद्धिविरोधात् । तेषां ज्ञानेन वेदानुत्पत्तेरित्युक्त्यापि परमेश्वरीयज्ञानेन वेदानामुत्पत्तिरभ्युपेतैव । तथात्वे वेदानां नित्यत्वाक्तिविरुद्धयत इत्युभयतः पाशारज्जुः । ' वेदेषु शब्दार्थसम्बन्धाः परमेश्वरादेव प्रादुर्भूतास्तस्य पूर्णविद्यावत्वात् ' ( पृ ० २२ ) इति यदुक्तम्, तदपि तुच्छम् पूर्णविद्यावत्त्वस्यातन्त्रत्वात् । तथात्वे घटादीनामपि परमेश्वरादेव कुतो नाविर्भावः? नित्यानामात्मनामपि पूर्ण विद्यावत्त्वात् परमेश्वरात् कुतो नोत्पत्तिः? नित्यत्वविरोधादिति चेदत्रापि समानमेव नित्यत्वम् । किञ्च, सर्वे शब्दाः सर्वेऽर्थाः सर्वे सम्बन्धाः पूर्णविद्यावत्त्वेन परमेश्वरादेवोत्पन्ना वैदिका एव वा? नाद्यः, प्रत्यक्षविरोधात् । दृश्यन्त एवानेके शब्दा अर्थास्तत्सम्बन्धाश्च तेभ्यस्तेभ्यः कारणेभ्य उत्पद्यमानाः परमेश्वराच्चानुत्पद्यमानाः । नान्यः पूर्णः विद्यावत्त्वव्याघातात् । लौकिकशब्दार्थसम्बन्धानां वैदिकशब्दादिभ्यो भिन्नत्वे ' अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः ' ( जै ० सू ० १२/३० ) इति न्यायविरोधाच्च । लौकिकशब्दार्थसम्बन्धज्ञानवतां वैदिकशब्दार्थानवबोधापाताच्च । अतोऽन्यादिमनुष्य-देहधारीद्वारेण परमेश्वरेण श्रुतिर्वेदः प्रकाशीकृत इत्यसिद्धमेव प्रमाणशून्यत्वात् । नित्या एव वेदा: । परमेश्वरेणा-यादिषु वेदानाविर्भाव्य सम्प्रदायः प्रवर्तितः । अन्येश्चाध्यापनादिद्वारा वैदिकाध्ययनाध्यापनसम्प्रदायः प्रवर्तितः । नहीं हो सकता । तब तो यही प्रश्न आपके सिद्धान्त पर भी लागू होगा? नहीं, क्योंकि वहाँ पर तो सम्प्रदाय का विच्छेद नहीं होता और उसके कर्ता का भी कोई यथार्थ ज्ञान नहीं है, अतः उसको नित्य माना जाता है । यहाँ पर रचना विषयक दर्शन और अदर्शन का प्रश्न उठ ही नहीं सकता । ' अग्नि आदि को ईश्वर ने वेदों के प्रकाश के लिये केवल निमित्त मात्र बनाया है ' यह कथन भी असंगत हैं, क्योंकि इसमें आगे दिये विकल्प की उपपत्ति नहीं बनती । वेदों को परमेश्वर ने बनाया अथवा परमेश्वर के ज्ञान की सहायता से अग्नि प्रभूति ने बनाया? पहला पक्ष इसलिये नहीं बनेगा कि ऐसा मानने पर अग्नि प्रभृति की निमित्तता नहीं बनेगी । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं हैं, क्योंकि अध्यापक के दिये ज्ञान की सहायता से शिष्य के द्वारा बनाये ग्रन्थ शिष्य के ही माने जाते हैं । अनि प्रभृति के ज्ञान से वेदों की अनुत्ति मान कर भी परमेश्वर के ज्ञान से वेदों की उत्पत्ति आपने मानी ही है । इस तरह वेदों की नित्यता का विशेष उपस्थित होता है । आपके गले में इस प्रकार दोनों तरफ से रस्सी की फंदा पड़ा हुआ है । ' वेदों में जितने शब्द, अर्थ और संबन्ध हैं, ये सब ईश्वर से ही प्रकट हुए हैं, क्योंकि वह पूर्ण विद्या वाला है ' यह कथन भी सारहीन है, क्योंकि पूर्ण विद्यावत्त्व किसी की उत्पत्ति में हेतु नहीं हो सकता । इस प्रकार से तो घटादि का भी परमेश्वर से ही प्रादुर्भाव क्यों न माना जाय? नित्य आत्माओं में भी पूर्ण विद्यावश्व विद्यमान है, उनकी भी परमेश्वर से ही उत्पत्ति क्यों न मानी जाय? यदि आप कहें कि इस तरह से तो नित्यत्व का विरोध होगा तो नित्यत्व तो वेद में भी समान रूप से विद्यमान है । आप यह बताइये कि सब शब्द, सब गर्थ, सब संवन्ध पूर्ण विद्यावान् परमेश्वर से ही उत्पन्न हुए हैं अथवा वे सब वैदिक है? पहला पक्ष तो प्रत्यक्ष विरुद्ध है । यह देखा गया है कि अनेक शब्द, अर्थ और उनके संबन्ध उन उन कारणों से पैदा होते हैं, परमेश्वर से नहीं । दूसरा पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि इस प्रकार से परमेश्वर में पूर्ण विद्या का व्याघात हो जायगा । लौकिक शब्द, अर्थ और संबन्ध की वैदिक शब्दादि से भिन्नता मानने पर ' अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः ' इस मीमांसा के न्याय से विरोध भी होगा । साथ हीं atree शब्द, अर्थ और संबन्ध के ज्ञाता को वैदिक शब्द, अर्थ आदि का अवोध न ' सकेगा । यतः अग्नि आदि मनुष्यों का देह धारण वाले जीव के द्वारा परमेश्वर ने वेद का प्रकाश किया, यह नहीं सिद्ध होगा, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । वेद नित्य ही

पृष्ठ 540

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 540 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः यच्च - ' वेदानामुत्पत्ती कियन्ति वर्षाणि व्यतीतानि ' इति प्रश्नमुत्थाप्य ' एको वृन्दः षण्णवतिः कोटयोऽष्टी लक्षाणि द्विपचाशत्सहस्राणि नवशतानि षट्सप्तति १ ९ ६०८५२ ९ ७६ वर्षाणि व्यतीतानि । एतावन्त्येव वर्षाणि वर्तमान-कल्पसृष्टेश्च ' ( पृ ० २३ ) इति कथितम्, तत्प्रमाणतया च ' ब्राह्मस्य तु क्षयाहस्य तत्प्रमाणं समासतः । एकैकशो युगानाम् ' इत्यादिमनुश्लोकाः समुद्धृताः, तदेतत्सर्वमप्यसमञ्जसम् ' पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदूचु: ', ' वाचा विरूपनित्यया ' ( ऋ ० ८ ) ७।५-६ ) इति वेदानां नित्यत्वश्रवणाद् वेदानामुत्पत्तिकालस्यैवाभावात् । ' ऋचः सामानि जज्ञिरे ' इत्यादिवचनानि तु सम्प्रदायप्रवर्तनपराणि । वर्तमानकल्प सृष्टिकालगणनाप्यशुद्धैव । सप्तसम्धीनां १२० ९ ६००० वर्षाणां तत्र योजनेन-१६७२ ९ ४८ ९ ७६ इति शुद्धगणनोपपद्यत इति तदीयटिप्पणीकारोक्तः । के मनवः? तावतोऽहर्गणस्य कथं मन्वन्तरसंज्ञा? कथञ्च चतुर्दशसंख्याका मनवः? मनूनां च स्वायम्भुवस्वारोचिषादिसंज्ञाः किमूला:? मनु मन्वन्तर ब्राह्माहोरात्रादि-कल्पनानामाश्रयणं तन्मूलभूतस्येतिहासपुराणस्योपेक्षणं चेत्यर्थं कुक्कुटीन्यायानुसरणमेव । पुराणेषु मनु मन्वन्तरकथाः प्रसिद्धा एव । मानवातिरिक्तदेवतामनङ्गीकुर्वाणस्य ' देवानां युगमुच्यते ' ( म ० १।७१ ) इति वचनस्यार्थोऽपि गगनकुसु मायते । तथा -- ' एतद् द्वादशसाहस्रं देवानां युगमुच्यते ' इति देवयुगानुसारेण त्वम्निदिष्टसंख्यापि नोपपद्यते । ॐ तत्सद् ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणेऽमुक संवत्सरायनर्तुमासपक्ष तिथि-नक्षलग्न मुहूर्तेऽमुकदेशेऽमुकगोत्रोऽमुकशर्माहमित्यादिसङ्कल्पोऽपि न सामाजिकेषु प्रचलति सर्वस्यैतस्य पुराणेति-हासोपोद्बलितत्वात् । न क्वचिदपि त्वदभिमतेषु वेदेषु वेदकालो निर्दिष्टः । न च सृष्ट्यादौ तदुत्पत्तिरपि वेदेन साधयितुं शक्यते । नह्येकस्मिन् क्षणे महदहमादयः प्रकृतिविकृतयः षोडशविकाराश्चोत्पद्यन्ते । महदाद्युत्पत्तेः प्राक् कथमग्न्यादयः समागताः । न वा महदादिसमुत्पत्तिदिन एव तदुत्पत्तिः शक्यसमर्थना, निराधारत्वात् । है । परमेश्वर ने अग्नि आदि में वेदों का आविर्भाव करके सम्प्रदाय प्रवृत्त किया और दूसरे ऋषि मुनियों ने अध्यापन के द्वारा वेदों के अध्ययन अध्यापन का सम्प्रदाय चलाया । ' वेदों की उत्पत्ति में कितने वर्ष हो गये? ' इस प्रश्न को उठा कर ' एक वृन्द, छानवे करोड़, आठ लाख, बावन हजार, नो सो छिहत्तर अर्थात् १ ९ ६०८५२ ९ ७६ वर्ष वेदों की और जगत् की उत्पत्ति में हो गये ' ( पृ ० २५ ) यह उतर दिया गया है और इसके प्रमाण में ' ब्रह्मा के दिन रात का और एक एक युग का जो प्रमाण हैं, उसको संक्षेप में सुनो ' इत्यादि मनुस्मृति के श्लोक उद्धृत किये गये हैं, यह सब असंबद्ध है । ' पूर्व पुरुषों ने पूर्व पुरुषों को ये वचन कहे थे ', ' अविकार नित्य वाणी से ' इत्यादि स्थलों में वेदों को नित्य माना गया है, अतः उनका कोई उत्पत्ति काल नहीं है । ' ऋचाएँ और साम पैदा हुए ' ऐसे वचन केवल सम्प्रदाय की प्रवृति को सूचित करते हैं । वर्तमान कल्प की सृष्टि की काल गणना भी गलत है । सात सन्धियों के १२० ९ ६००० वर्षों को उसमें जोड़ने पर १ ९ ७२ ९ ४८ ९ ७६ वर्षो की शुद्ध गणना बनती है, यह बात उन्हीं के टिप्पणीकार ने कही है । मनु कौन है? इनमें अहर्गण की मन्वन्तर संज्ञा कैसे होती है? चौदह मनु कौन से हैं? मनुकों की स्वायम्भुव, स्वारोचिष आदि संज्ञाओं का आधार क्या है? मनु, मन्वन्तर ब्रह्मा के दिन - रात की कल्पना का सहारा लेना और इनके मूलभूत इतिहास - पुराण आदि की उपेक्षा करना ' बाधा तीतर आधा बटेर ' वाली कहावत की याद दिलाता है । पुराणों में मनु और मन्वन्तर की कथाएँ प्रसिद्ध है । मनुष्यों से भिन्न देवता को न मानने वाले के मत में ' देवानां युगमुच्यते ' इस वाक्य का अर्थ आकाश कुसुम हो जायगा । इसी तरह ' इन वारह हजार वर्षो का देवताओं का एक युग होता है ' यहाँ पर देवयुग के अनुसार बताई गई गई आपकी संख्या भी उपपन्न नहीं होगी । ॐ तत्सत् ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध में, वैवस्वत मन्वन्तर में, २८ वें कलियुग में, कलि के प्रथम चरण में, अमुक नाम के वर्ष में, अमुक अयन, ऋतु, मास, पक्ष तिथि, नक्षत्र, लग्न, मुहूर्त में, अमुक स्थान में, अमुक गोत्र में, उत्पन्न में अमुक धर्मा ' इत्यादि संकल्प वाक्य भी आर्यसमाजियों में प्रचलित नहीं है, क्योंकि इस पूरे संकल्पवाक्य की रचना पुराण, इतिहास के प्रमाण पर ही आधारित है । आपके अभिमत वेदों में कहीं भी वे का समय नहीं बताया गया है । वेद से सृष्टि के आदि में उसकी उत्पत्ति की भी सिद्धि नहीं हो सकती । एक ही क्षण सेंमहत्, अहङ्कार बादि प्रकृति विकृतियाँ और षोडश विकार नहीं उत्पन्न हो जाते । महदादि की उत्पत्ति के पहिले अग्नि आदि कैसे आ जायेंगे | महदादि की उत्पत्ति के दिन ही उनकी उत्पत्ति हुई, निराधार होने से इस बात का समर्थन नहीं किया जा सकता |