वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 541–550

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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dattatr २- वेदनित्यत्वविचार: * यदपि च ' ईश्वरस्य सकाशाद् वेदानामुत्पत्तौ सत्यां स्वतो नित्यत्वमेव भवति, तस्य सर्वसामर्थ्यस्य नित्यत्वात् ' ( पृ ० ३१ ) इत्युक्तम्, तदतीव तुच्छम् ईश्वरसामर्थ्यस्य नित्यत्वेऽपि तत्कार्यस्य वेदस्य नित्यत्वायोगात् । तथात्वे सर्वस्यैव जगत ईश्वरसामर्थ्यस्य नित्यत्वेन नित्यत्वापातात् । न च वेदानामीश्वरसामर्थ्यजन्यत्वेन नित्यत्वमिति वैशेष्यम्, जगतोऽपि तदीयसामर्थ्यजन्यत्वात् । त्वदीयवाक्ये ' सकाशात् स्वत: ' इति पदद्वयं तु निरर्थकमेव, वेदानामी-पत्ती सत्यां नित्यत्वमित्यनेनैव तत्समीहितसिद्धेः । वेदो नित्यः, ईश्वरसामर्थ्यस्य नित्यत्वादिति किं केन श्लिष्यते? नान्यस्य नित्यत्वेनाभ्यस्य नित्यत्वमतिप्रसङ्गात् । न च कार्यकारणभावोऽतिप्रसङ्गवारकः, आकाशस्य नित्यत्वेऽपि तज्ज्ञानेच्छादीनामनित्यत्वाभ्युपगमात् । नित्यप्रकृतिकार्यस्य महदादेरनित्यत्वदर्शनाच्च । येषामुत्पत्ति-रिष्यते तेषां नित्यत्वकथनं वदतो व्याघातः उत्पत्तिमतोऽनित्यत्वनोग्यात् । मोमांसकास्तु नोत्पत्तिमङ्गीकुर्वन्ति । वेदानां तदुत्पत्तिबोधकमन्त्रार्थवादानामभ्यशेषत्वेन स्वार्थे तात्पर्याभावात् । उत्तरमीमांसकास्तु सम्प्रदायप्रवर्तन रूपामेवोत्पत्तिमूरीकुर्वन्ति । सर्वस्याप्युच्चारणस्य स्वसजातायानुपूर्वी सव्यपेक्षत्वेन नित्यत्वमेव वेदानामङ्गीकुर्वन्ति । यदप्युक्तम्- ' न वेदानां शब्दमयत्वान्नित्यत्वं सम्भवति । शब्दोऽनित्यः कार्यत्वाद् घटवत् । यथा घटः कृतोऽस्ति तथा शब्दोऽपि । तस्माच्छन्दानित्यत्वे वेदानामप्यनित्यत्वमङ्गीकार्यम्, मैवं मन्यताम् | शब्दो द्विविधो नित्यकार्यभेदात् । ये परमात्मज्ञानस्थाः शब्दार्थसम्बन्धाः सन्ति ते नित्याः येऽस्मदादीनां वर्तन्ते ते तु कार्याः । कुतः? यस्य ज्ञानक्रिये नित्ये स्वभावसिद्धे अनादी स्तः, तस्य सर्व सामर्थ्यमपि नित्यमेव भवितुमर्हति तद्विद्यामयत्वात् । वेदानामनित्यत्वं नैव घटते ' ( पृ ० ३१ ) इति, तदपि प्रमत्तप्रलपितमेव परमात्मज्ञानस्थानां शब्दार्थसम्बन्धानां २- वेद की नित्यता का विचार यह कहना कि -- ' वेद ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं, इससे वे स्वतः नित्यस्वरूप ही है, क्योंकि ईश्वर का सब सामर्थ्य नित्य ही हैं ' ( पृ ० ३१ ), ठीक नहीं, क्योंकि ईश्वर की सामर्थ्य के नित्य होने पर भी यदि वेद उसका कार्य हैं, तो वह नित्य नहीं हो सकता, ऐसा मानने पर तो सारे जगत् के ही ईश्वर का कार्य होने से नित्यता की आपत्ति होगी । यदि यह माना जाय कि वेद ईश्वर की सामर्थ्य से पैदा होते हैं, इसलिये नित्य है, तो यह बात ' सारे जगत् में भी लागू है । आपके वाक्य में ' सकाशात् ' और ' स्वतः ' ये दो पद निरर्थक हैं, क्योंकि वेदों की ईश्वर से उत्पत्ति होती है, अतः वे नित्य हैं, इतना कहने से हो अभीष्ट अर्थं निकल आता है | वेद नित्य है, क्योंकि ईश्वर की सामर्थ्य नित्य है, इससे वेद में क्या लगेगा? एक की नित्यता से दूसरा नित्य नहीं हो सकता, इससे तो अतिप्रसङ्ग दोष आवेगा, अर्थात् जो नित्य नहीं है, वह भी नित्य होने लगेगा | कार्यकारणभाव अतिप्रसंग का बारक नहीं होगा, क्योंकि आकाश के नित्य होने पर भी तत्सम्बद्ध ज्ञान, इच्छा आदि नित्य नहीं माने जाते । नित्य प्रकृति के कार्य महदादि अनित्य देखे जाते हैं । जिनकी उत्पत्ति मानी जाती है, उनको नित्य कहना ही गलत हैं । जो उत्पत्तिमात् है, वह निश्चय ही अनित्य होता है । मीमांसक वेद की उत्पत्ति नहीं मानते । वेदों की उत्पत्ति को बताने वाले मन्त्र, अर्थवाद वाक्य आदि का प्रयोजन कोई दूसरा ही है, उनका अपने स्वार्थ में तात्पर्य नहीं माना जाता । उत्तर मीमांसक ( वेदान्ती ) सम्प्रदाय की प्रवृत्ति को ही उत्पत्ति मानते हैं । ये लोग सभी उच्चारण अपने सजातीय पूर्ववर्ती उच्चारण की अपेक्षा रखते हैं, अत: इस पद्धति से वेदों की नित्यता को ही मानते हैं । आगे कहा गया है कि ' वेदों में शब्द, छन्द, पद और वाक्यों के योग होने से वे नित्य नहीं हो सकते | जैसे बिना बनाये घड़ा नहीं बनता, इसी प्रकार से शब्दरूप वेदों को भी किसी ने बनाया होगा, क्योंकि बनाने से पहले वे नहीं थे और प्रलय में भी नहीं रहेंगे, इससे वेदों को free मानना ठीक नहीं । ऐसा आपको कहना उचित नहीं, क्योंकि शब्द दो प्रकार का होता है - एक free दूसरा कार्य | इनमें से जो शब्द, अर्थ और सम्बन्ध परमेश्वर के ज्ञान में हैं, वे सब नित्य हैं और जो हम लोगों की कल्पना से पैदा होते हैं, वे कार्य हैं । क्योंकि जिसका ज्ञान और क्रिया स्वभाव से सिद्ध और अनादि है, उसका सब सामर्थ्य भी नित्य ही होता है । इससे वेद भी उसको विद्यास्वरूप होने से नित्य ही है, क्योंकि ईश्वर की विद्या अनित्य कभी नहीं हो सकती ' ( पृ ० ३१ ) | यह भी

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५१२ वेदार्थ पारिजातः नित्यत्वे तदुत्पत्तिसाधनप्रयासस्य वैयर्थ्यापत्तेः । यद्येवं तर्हि वेदानामुत्पत्तिकालबोधकं पूर्वं प्रकरणं कथं न विरुद्धघेत? किं शब्दमयत्वं हेतुः शब्दानित्यत्वसाधको नास्ति? न चेदस्मदादिशब्दानामप्यनित्यत्वं न सिद्धयेत, अस्ति चेत्कुतो वैदिक शब्दानामपि तन्न स्यात्? यद्युत्पन्नो गकार इति प्रत्यक्षप्रतीत्या नैयायिकरीत्या वर्णानामनित्यत्वमभिप्रेयते, तदा तद्घटितवेदानामप्यनित्यत्वं सिद्धयति । यदि तु मीमांसकरीत्या स एवायं गकार इति प्रत्यभिज्ञया कण्ठतालवाद्य-भिघातजनितध्वनिविशिष्टानां नित्यत्वमेवास्थीयते, तदा त्वस्मदादिशब्दानामपि नित्यत्वमेवेति न शब्दद्वैविध्यप्रति-पादनं समञ्जसम् । किञ्च, अस्मदादीनां शब्दाः कार्या इत्युक्त्या किं वैदिकशब्दानामकार्यत्वमिष्यते? तथैवेति चेत् तदुत्पत्तिवचनं निरर्थकमेव स्यात् । उत्पत्तिमदकार्य चेति विप्रतिषिद्धम् । यत्तु ' यदृच्छाशब्दानामनित्यत्वमभिप्रेतम् ' इति, तदपि न किञ्चित्, तथात्वे तद्भिन्नानां रामायण-महाभारतादिशब्दानामस्मदादिप्रयुक्तशब्दानां च नित्यत्वमेव सिद्धयति । अस्यां च स्थितौ वेदानामेव नित्यत्वसाधनं विरुद्धमेव स्यात् । किव, परमात्मज्ञानस्था: शब्दार्थसम्बन्धा नित्या इत्यप्यसङ्गतम्, गोतमादिरीत्या शब्दानामाकाशाश्रयत्वेन ज्ञानाश्रयत्वानभ्युपगमात् । ज्ञान शब्दयोरुभयोरपि गुणत्वेन गुणे गुणानङ्गीकारात् । अर्थस्यापि न ज्ञानाश्रयत्वं सम्भवति, गुणस्य द्रव्याश्रयत्वासम्भवात् । सम्बन्धस्य तु सुतरां तदनुपपत्तिः, सम्बन्धस्य सम्बन्ध्याश्रयत्वप्रसिद्धेः । भाट्टरीत्या शब्दस्य द्रव्यत्वेऽपि शब्देना काशस्यैव विष्टम्भकाख्यः संयोगो जतुकाष्ठवदभ्युपेयते । शब्दस्य द्रव्यत्वेऽपि न ज्ञानाश्रयत्वं सम्भवति, गुणस्य द्रव्यानाश्रयादेव । यदि तु विषयतासम्बन्धेन तत्स्थत्वमिष्यते, तदपि पागल की बकवास है, क्योंकि परमात्मा के ज्ञान में स्थित शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के नित्य होने पर उसकी उत्पत्ति की सिद्धि के लिये जो प्रयास किया, वह सब व्यर्थ हो जायगा । इस तरह से वेदों की उत्पत्ति के काल को बताने वाले पहले प्रकरण से क्या इसका विरोध नहीं होगा? वेद के लिये ' शब्दमयत्व ' हेतु क्या उसकी अनित्यता को नहीं सिद्ध कर देगा? यदि नहीं तो हमारे द्वारा उच्चरित शब्दों की भी अनित्यता नहीं सिद्ध होगी । यदि इसी हेतु से हमारे शब्दों की अनित्यता सिद्ध होती है, तो फिर वेद शब्दों की क्यों न होगी? यदि गकार उत्पन्न हुआ इस प्रत्यक्ष प्रतीति के अनुसार नैयायिक की पद्धति से वर्णों की अनित्यता मानी जाती है, तो उन वर्णों से घटित वेदों की भी अनित्यता सिद्ध हो जायगी । यदि भीमांसक की रीति से यह वही गकार है, इस प्रत्यभिज्ञा के द्वारा कण्ठ, तालु आदि स्थानों में अभिघात ( टकराव ) से पैदा हुई ध्वनिमय शब्दों की नित्यता मानी जाती है, तो हम लोगों के द्वारा उच्चरित शब्दों की भी नित्यता माननी पड़ेगी, इस प्रकार दो प्रकार के शब्दों का वर्णन ठीक नहीं होगा | क्या हमारे शब्द कार्य हैं, इस उक्ति से आपको वैदिक शब्दों की नित्यता अभिप्रेत है? उत्पत्ति भी हो और कार्य भी न हो, अर्थात् नित्य भी हो, ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध हैं । यहाँ पर ' यदृच्छा शब्दों की अनित्यता अभिप्रेत है ' ( पृ ० ३१ टि ० ) यह कथन भी उचित नहीं, ऐसा मानने पर यदृच्छा शब्द से भिन्न रामायण, महाभारत आदि के शब्द तथा हमारे द्वारा प्रयुक्त शब्द नित्य सिद्ध हो जायेंगे । इस स्थिति में केवल वेदों में ही नित्यता को सिद्ध करना विरुद्ध पड़ेगा । परमेश्वर के ज्ञान में स्थित शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध नित्य है, यह बात भी असङ्गत है, क्योंकि गोतम आदि के मत से शब्द आकाश का गुण है, वह ज्ञान में आश्रित नहीं माना जा सकता । ज्ञान और शब्द दोनों गुण है और एक गुण दूसरा गुण नहीं रहता । अर्थ भी ज्ञान में आश्रित नहीं होगा, क्योंकि गुण द्रव्य का आश्रय नहीं होता । जब शब्द और अर्थ ज्ञान में नहीं रहेंगे, तो फिर सम्बन्ध तो सुतरां ( निश्चय ही ) अपने आप वहीं नहीं रहेगा, क्योंकि एक सम्बन्ध दूसरे सम्बन्ध का आश्रय नहीं होता । भट्ट मीमांसकों के मत में शब्द के द्रव्य होने पर भी उसका आकाश के साथ विष्टम्भक नाम का संयोग उसी प्रकार का माना जाता है, जैसा कि लाह का लकड़ी के साथ होता है । शब्द को द्रव्य मानने पर भी वह ज्ञान का आश्रय नहीं हो सकता, क्योंकि गुणद्रव्य का आश्रय नहीं होता । यदि विषयता सम्बन्ध से शब्द में ज्ञानाश्रयत्व माना जाता है, तो यह भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि

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वैवार्थपारिजातः न सम्यक् विषयतासम्बन्धस्य वृत्तिताऽनियामकत्वात् । तथात्वे वा परमेश्वरज्ञानस्य सर्वविषयकत्वेन कार्यत्वेनाभि-मवानामपि नित्यत्वापत्तिः । वैदिकशब्दानां नित्यत्वं लौकिकशब्दानां च कार्यत्वमुक्तम् कार्यत्वे न कश्चिदपि हेतुरुक्तः । यदपि वेदानां नित्यत्वसाधनाय ज्ञानक्रिये इत्यादि ग्रन्थेन हेतुरुपक्षिप्तः, तत्र नित्य इत्यनेनैव समीहित-सिद्धया स्वभावसिद्धे अनादी इति नैरर्थक्यम् । ' न तस्य कार्यं करणं च विद्यते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ ' ( श्वे ० उ ० ६१८ ) इति श्रुत्या परमेश्वरस्य ज्ञानक्रिययोनित्यत्वेन शक्तित्वादेव सामर्थ्यबोध्यास्विच्छादिशक्तिष्वपि नित्यत्वं सिद्ध्यति । परं न शक्तिजनितेषु वेदेषु नित्यत्वं सिद्धयति, तच्छक्तिजनितप्रपञ्चेष्वपि तदापातात् । यदपि च विद्यामयत्वेन हेतुना वेदस्य नित्यत्वं सिषाधयिषितम्, तदपि निरर्थकम् क्वचिद् व्याप्यत्वेन गृहीतस्यैव हेतोः साध्य-साधनक्षमत्वेन प्रकृते चेश्वरीयविद्यामयत्वेन कस्यचिन्नित्यत्वासम्प्रतिपत्त्या तदसिद्धेः । तथा च यथा ' शब्दो नित्यः श्रावणत्वात् ' इत्यसाधारणां हेतुस्तथैव वेदा नित्या ईश्वरीयवेदत्वाद् इति हेतोरसाधारण्याद् असाधकत्वमेव । यदपिच-- ' “ किञ्च भोः सर्वस्यास्य जगतो विभागं प्राप्तस्य कारणरूपस्थिती सर्वस्थूलकार्याभावे पठनपाठनपुस्तकाभावात् कथं वेदानां नित्यत्वं स्वीक्रियते? अत्रोच्यते, इदं तु पुस्तकपत्रमसीपदार्थेषु घटते, तथास्मत्-क्रियापक्षे घटते नेतरस्मिन् । अतः कारणादीश्वर विद्यामयत्वेन वेदानां नित्यत्वं वयं मन्यामहे । किञ्च न पठनपाठन-पुस्तकानित्यत्वे वेदानित्यत्वं जायते, तेषामीश्वरज्ञानेन सह सदैव विद्यमानत्वात् । यथास्मिन् कल्पे वेदेषु शब्दाक्षरार्थ-सम्बन्धाः सन्ति, तथैव पूर्वमासन्न भविष्यन्ति च । कुतः? ईश्वरविद्याया नित्यत्वादव्यभिचारित्वाच्च । अत एवोक्त-विषयता सम्बन्ध वृसिता का नियामक होता है । विषयता सम्बन्ध से शब्द को ज्ञानाश्रयता मानने पर परमेश्वर ज्ञान के सर्वविषयक होने से अनित्य पदार्थों की भी नित्यता माननी पड़ जायगी । वैदिक शब्दों को नित्य और लौकिक शब्दों को कार्य माना है, किन्तु इसमें कोई हेतु नहीं दिया गया । वेदों की freear की सिद्धि के लिये यह जो ' ज्ञानक्रिये ' इत्यादि ग्रन्थ से हेतु दिया गया है, वहाँ ' नित्यः ' इतना कहने से atri की सिद्धि हो जाती है, तब ' स्वभावसिद्धे ' और ' बनादी ' ये दोनों विशेषण निरर्थक हैं । ' उसका कोई कार्य और करण नहीं है. ' ' उसका ज्ञान, बल और क्रिया भी स्वाभाविक है ' इस श्वेताश्वतर श्रुति के अनुसार परमेश्वर के ज्ञान और क्रिया के नित्य होने से बल, शक्ति अर्थात् सामर्थ्य शब्द से ज्ञात होने वाली इच्छा आदि शक्तियों की भी नित्यता सिद्ध होती है । किन्तु शक्ति से जनित वेदों में नित्यता नहीं बन सकती, ऐसा मानने पर उसकी शक्तियों से हो पैदा हुए इस सारे प्रपञ्च में भी नित्यता माननी पड़ेगी । इसी प्रकार विद्यामयत्व हेतु से वेद की नित्यता को सिद्ध करने की इच्छा भी निरर्थक है, क्योंकि कहीं पर व्याप्य रूप से गृहीत हेतु की ही साध्य को सिद्ध करने में क्षमता होती है । प्रकृत स्थल में ईश्वर की विद्यामयता से किसी नित्य पदार्थ की अधिगति नहीं होती, बतः वह साध्य को सिद्ध करने में अक्षम है । इस तरह जैसे शब्द नित्य है, क्योंकि वह सुना जाता है, यह हेतु जैसे असाधारण है, उसी तरह वेद नित्य है, क्योंकि वह ईश्वर की विद्या से युक्त है, यह हेतु भी असाधारण होने से साध्य की सिद्धि में सहायक नहीं हो सकता । आगे कहा गया है कि ' जब सब जगत् के परमाणु अलग अलग हो के कारण रूप हो जाते हैं, तब तो कार्यरूप सब स्थूल जगत् का अभाव हो जाता है । उस समय वेदों की पुस्तकों का और पठन - पाठन का भी अभाव हो जाता है, फिर वेदों को नित्य • क्यों मानते हो? हमारा कहना है कि यह बात तो पुस्तक, पत्र, स्थाही और अक्षरों की बनावट आदि के पक्ष में घटती है, तथा हम लोगों के क्रियापक्ष में भी बन सकती है, वेद पक्ष में नहीं घटती, क्योंकि वेद तो शब्द, अर्थ और संबन्ध स्वरूप ही है और ईश्वर के ज्ञान में सदा बने रहने से वेदों को हम नित्य मानते हैं । इससे यह सिद्ध हुआ कि पठन - पाठन और पुस्तक के अनित्य होने से वेद वर्तमान रहते हैं । जैसे इस सृष्टि में शब्द, अर्थ और उनका संबन्ध विद्यमान क्योंकि ईश्वर की faar free है और उससे वह कभी अलग नहीं होती । इसी after नहीं हो सकते, क्योंकि वे ईश्वर के ज्ञान में नित्य है, उसी तरह का पहले भी था और आगे भी होगा । ६५ R

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वेदार्थपारिजातः सृग्वेदे - ' सूर्याचन्द्रमसौ वाता यथापूर्वमकल्पयत् ' इति । अस्यायमर्थः -- सूर्यचन्द्रग्रहणमुपलक्षणार्थम् । यथा पूर्वकल्पे चन्द्रादित्यरचनं तस्य ज्ञानमध्य आसीत्, तथैव तेनास्मिन् कल्पेऽपि कृतमस्तीति विज्ञायते । कुत:? ईश्वरज्ञानस्य वृद्धिक्षयविपर्ययाभावात् । एवं वेदेष्वपि स्वीकार्यम् । वेदानां तेनैव स्वविद्यातः सृष्टत्वात् ' ( पृ ० ३२ ) इति । तदप्यकिञ्चित्करम्, पूर्वोत्तरपक्षयोरुभयोरप्यनुपपन्नत्वात् । तथाहि-- विभागं प्राप्तस्य जगतोऽभावेऽपि वेदस्यानित्यत्वसिद्धिरूपपूर्व पक्षानुपपत्तिः, अन्यस्याभावेऽन्यस्यानित्यत्वानुपपत्तेः । उत्तरपक्षोऽपि निःसार एव, वेदानां सर्वदा विद्यमानत्वं तदुत्पत्तिप्रतिपादन वैयर्थ्यात् । तेनेव स्वविद्यातः सृष्टत्वादिति स्ववचनविरोधाच्च । यदि तु प्रलये स्थूलरूपेणावर्तमानानामपि वेदानां सुक्ष्मरूपेण विद्यमानत्वानित्यत्वमित्युच्येत 1 तदा तु सत्कार्यवादरीत्या सर्वस्यैव जगतः सूक्ष्मरूपेण विद्यमानत्वान्नित्यत्वेन वेदनित्यत्वे वैशेष्यानुपपत्तिः । ' अस्मत्क्रियापक्षे ' इत्यत्र क्रियापदेनो-क्षेपणपक्षेपणादिकं विवक्ष्यते प्रयत्नापरपर्याया कृतिर्वा? नेतरस्मिन्नित्यनेनाप्यत्यत्क्रियाभिनपरमेश्वरीय क्रियापक्ष इत्यर्थो युक्तः, तथा चेश्वरस्य कृता उत्क्षेपणादी प्रयत्ने वाऽनित्यत्वाभावः साध्यः । स च न सिद्ध्यति, निष्प्रमाणत्वात् । ' स्वाभाविक ज्ञानबलक्रिया च ' इत्यत्र त्वीश्वरस्य कस्यावन स्वाभाविक्या: क्रियाया एव नित्यत्वसिद्धिः, न क्रियामात्रस्य, स्वाभाविकोति विशेषणर्वयर्थ्यापातात् । कथञ्चिदीश्वरक्रियामात्रस्य नित्यत्वेऽपि न वंदानां नित्यत्व-सिद्धि:, क्रियामात्रजन्यस्यानित्यत्वधोव्यात् । परमेश्वरीयक्रियाजन्यस्य नित्यत्वनियमे सर्वस्यापि प्रपञ्चस्य तत्क्रिया-जन्यत्वेन नित्यत्वापातात् । तथा च प्रमाणान्तरेण साध्याभावनिश्चयाद् बाध एव ज्ञेयः । तेन ' परमेश्वरस्य विद्यामयत्वेन वेदानां नित्यत्वं मन्यामहे ' इति निर्मूलमेव । किञ्च वादिप्रतिवाद्युभय सम्मतस्यैव हेतोः साध्यसाधकत्वं नान्यतरा-सिद्धस्य । वेदस्येश्वरविद्यामयत्वं तु नोभयसम्मतम्, ततः स्वरूपासिद्धिदूषण ग्रस्तमप्यनुमानम् । लिये ऋग्वेद में कहा है कि ' परमेश्वर ने सूर्य चन्द्र को पूर्व कल्प के समान ही बनाया । यहाँ सूर्य और चन्द्र का ग्रहण उपलक्षणार्थ है । इसलिये जैसे पूर्व कल्प की चन्द्र - सूर्य आदि की सृष्टि उसके ज्ञान में थी, वदनुसार ही रचना उसने इस कल्प में भी की । यही बात वेदों के शब्द, अर्थ और संबन्ध के विषय में भी जाननी चाहिये । क्योंकि ईश्वर का ज्ञान नित्य है, उसकी वृद्धि, क्षय और विपरीतता कभी नहीं होती । इस कारण से वेदों को नित्यस्वरूप ही मानना चाहिये ' ( पृ ० ३२-३३ ) । यह कथन भी कुछ सिद्ध नहीं कर पाता, क्योंकि यहाँ पर दिये गये पूर्व और उत्तर पक्ष दोनों नहीं बनते । जैसे कि पूर्वपक्ष इस तरह से नहीं बनेगा कि प्रलयावस्था में परमाणुओं के विभक्त हो जाने पर जगत् का अभाव भले ही हो जाय, उससे वेद की अनित्यता सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि सृष्टि के न रहने से वेद भी नहीं रहेंगे, यह तो कोई बात नहीं हुई । उत्तर पक्ष भी निःसार है | वेद यदि सर्वदा विद्यमान है तो फिर उनकी उत्पत्ति का प्रतिपादन व्यर्थ होगा । परमेश्वर ने ही अपनी विद्या से उसको रचा है, arat पहले कही गई बात से इस बात का विरोध भी होगा । यदि प्रलय में स्थूल रूप से विद्यमान न होते हुए भी सूक्ष्म रूप से वेद विद्यमान रहते हैं, अतः नित्य हैं, यह आपका कहना है तो क्या सत्कार्यवाद की पद्धति से सारा ही जगत् सूक्ष्म रूप से विद्यमान होने से नित्य माना जायगा? तब तो वेद को नित्यता भी इसी प्रकार की होगी, उसमें कोई विशेषता नहीं रहेंगी । ' अस्मत्क्रियापक्षे ' यहाँ पर क्रियापद से उत्क्षेपण, अपक्षेपण आदि क्रियाएँ अभिप्रेत या प्रयत्न जिसका दूसरा नाम है, ऐसी कृति? ' नेतरस्मिन् ' यहाँ पर भी हमारी क्रिया से भिन्न परमेश्वर की क्रिया के पक्ष में, यही अर्थ उचित है । इस तरह ईश्वर की कृति उत्क्षेपणादि में अथवा प्रयत्न में afra का अभाव सिद्ध करना है । बिना प्रमाण के वह सिद्ध नहीं हो सकता | ' स्वाभाविकी ज्ञान ० ' इत्यादि श्रुति में ईश्वर की fair स्वाभाविक क्रिया को हो नित्य माना गया है, क्रियामात्र को नहीं, अन्यथा ' स्वाभाविकी ' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा । किसी तरह ईश्वर की क्रियामात्र की नित्यता मान भी ली जाय, भी वेदों की नित्यता नहीं बनेगी, क्योंकि क्रियामात्र से जो होता है, वह निश्चित ही अनित्य होता है । परमेश्वर की क्रिया से उत्पन्न वस्तु को नित्य मानने पर इस सारे प्रपंच की भी, उसी की क्रिया से उत्पन्न होने के कारण, नित्यता माननी पड़ जायगी । इस प्रकार प्रमाणान्तर से साध्याभाव का निश्चय होने से यहाँ पर बाघ समझना चाहिये । इस प्रकार ' ईश्वर के ज्ञान में सदा बने रहने से वेदों को हम लोग नित्य मानते है ' यह कथन निराधार है । एक बात यह

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वैवार्थपारिजातः ५१५ ' वेदानामीश्वरविद्यामयत्वम् ' इत्यत्र विद्या शब्दरूपा ज्ञानरूपा वा? मयट्प्रत्ययश्व प्राचुर्यार्थिकः स्वार्थार्थी विकारार्थको वा? शब्दार्थका द्विद्याशब्दात् प्राचुर्यार्थिके मयटि ईश्वरीयशब्दवाहुल्यविशिष्टो वेद इत्येव तदर्थः स्यात्, तथात्वे ईश्वरीयशब्दातिरिक्तशब्दवेशिष्ट्यमपि वेदे सिद्ध्यति, अन्नप्रचुरो याग इत्युक्तो यान्नातिरिक्त-घृतादिविशिष्टत्ववत् । तथा चार्य सिद्धान्त एव । किञ्च वैदिकशब्देषु कथमीश्वरीयत्वम्? उच्चारयितृत्वन निरपेक्षापूर्वी निर्मातृत्वेन वा? नाद्यः, निरवयवस्य कण्ठतालवाद्यभावेनोच्चारयितृत्वासम्भवात् । नाप्यन्त्यः, पूर्वकल्पीयानुपूर्वीनिरपेक्षानुपूर्वी निर्मातृत्वे तन्नित्यत्वासिद्धेः, प्रतिकल्पं वेदभेदापत्तेश्च । यथाकथञ्चित् सर्वशक्तिमत्त्वादिना हेत्वाभासेनोच्चारणे साधितेऽपि नेष्टसिद्धि:, उच्चारणक्रियाजन्य-स्वेन वेदानित्यत्वस्य दुर्वारत्वात् । स्वार्थिके मयट्यप्यनित्यत्वादयो दोषा अपरिहार्या एव । विकारार्थोऽपि मयट् -प्रत्ययो नोपपद्यते, नित्येषु शब्देषु विकारासम्भवात् महाभाष्यविरोधाच्च । ईश्वरीयज्ञानरूपाया विद्याया अपि प्राचुर्यार्थे मयट्प्रत्ययो नोपपद्यते, परमेश्वरस्य स्वरूपज्ञानेनान्तत्वानुपपत्तेः । स्वरूपातिरिक्तज्ञानस्यापि न नानात्वम्, एकेनैव नित्यज्ञानेन सर्वविषयभान सिद्धौ नानात्वकल्पनाया निर्मूलत्वात्, गौरवग्रस्तत्वाच्च । ईश्वरज्ञानरूपस्य वेदस्य परमेश्वर एवं समवेतत्वेनान्यत्र संक्रमासम्भवात् ब्रह्माग्न्यादिषु वेदप्रदानोक्तिविरोधापाताच्च । अधुनोपलब्ध-शब्दराशिरूपाणामृगादिवेदानामवेदत्वापत्तेश्च । नह्येषामपि ज्ञानरूपत्वमेव, अप्रत्यक्षत्वापातात् । नहि ज्ञानं श्रोत्रगम्यं शब्दभिन्नत्वात् । नापि मनोजन्यमन्यज्ञानस्यान्यमनोऽगोचरत्वात् । न वा तत्र स्वार्थेऽपि मयट्प्रत्ययः, पूर्वोक्तदोषानु-सङ्गात् । न च विकारेऽपि प्रत्ययो युक्तः, परमेश्वरज्ञाने विकारविरहात् । वेदप्रामाण्याद्वेदानां नित्यत्वसाधनं तु भी है कि वादी और प्रतिवादी दोनों के द्वारा स्वीकृत हेतु से ही साध्य की सिद्धि हो सकती है, एक के द्वारा स्वीकृत से नहीं । वेद की ईश्वरविद्यामयता उभयसंगत नहीं है, अतः इस अनुमान में स्वरूपासिद्धि दूषण भी है । ' वेदानामीश्वरविद्यामयत्वम् ' यहां पर विद्या शब्दरूप है या ज्ञानरूप? मयट् प्रत्यय प्राचुर्य अर्थ में होता है, यहाँ पर प्र का अर्थ स्वार्थ ही है या विकार? शब्दार्थक विद्या शब्द से प्राचुर्यार्थिक मयट् प्रत्यय के होने पर ' ईश्वरीय शब्द बाहुल्य से विशिष्ट वेद ' यह अर्थ होगा । ऐसा मानने पर ईश्वरीय शब्द से अतिरिक्त शब्दों का वैशिष्ट्य भी वेद में सिद्ध होता है, जैसा कि ' प्रचुर अन्न वाला याग है ' ऐसा कहने पर याग में अन्न के अतिरिक्त घृत आदि का वैशिष्टय भी प्रतीत होता है | आप यह बताइये कि वैदिक शब्दों की ईश्वरीयता कैसे है? वह इनका उच्चारण करता है या निर्माण? पहला पक्ष नहीं बनेगा, क्योंकि ईश्वर निर are है, उसके कण्ठ, तालु आदि के न रहने से वह उच्चारण नहीं कर सकता । दूसरा पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि पूर्व कल्प की आनुपूर्वी से निरपेक्ष नई आनुपूर्वी के बनाने में वेद की निस्यता नहीं सिद्ध होगी और प्रत्येक कल्प का वेद भिन्न मानना पड़ेगा | जिस किसी तरह सर्वशक्तिमत्व आदि हेत्वाभासों से उच्चारण सिद्ध भी कर दिया जाय तो भी आपकी इष्ट सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि उच्चारण रूप क्रिया से उत्पन्न होने के कारण वेद की अनित्यता किसी प्रकार हटाई नहीं जा सकती । स्वार्थ में मयट् करने पर भी अनित्यता आदि दोषों का परिहार नहीं हो सकता । विकार अर्थ में यहाँ पर मयट् प्रत्यय हो नहीं सकता, क्योंकि नित्य शब्दों में कोई विकार नहीं होता । फिर इस बात का महाभाष्य की उक्ति से विरोध भी होगा । ईश्वरीय ज्ञान रूप विद्या के प्राचुर्य में मयद प्रत्यय नहीं होगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वरूप ज्ञान में अनन्तता नहीं हो सकती । स्वरूपातिरिक्त ज्ञान भी अनन्त नहीं होंगे, क्योंकि. ईश्वर के एक नित्य ज्ञान से ही सर्व विषयक ज्ञान हो जाने से नाना ज्ञान की कल्पना निरर्थक होगी और गौरव भी होगा । ईश्वर का ज्ञानरूप वेद परमेश्वर में ही समवाय संबन्ध से रहेगा, उसका अन्य संक्रमण संभव नहीं । अतः ब्रह्मा, अग्नि आदि को वेद का उपदेश देने वाली उक्ति से भी विरोध होगा । इस प्रकार आज कल उपलब्ध शब्दराशि रूप ऋग्वेद आदि को अवेक्षता सिद्ध हो जायगी, क्योंकि ये ज्ञानरूप तो है नहीं । यदि इनको ज्ञानरूप माना जाय तो इनका प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हो सकेगा । ज्ञान कान से नहीं सुना जा सकता, वह शब्द से भिन्न होता है । मन से भी इसका प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि दूसरे के ज्ञान का मानस प्रत्यक्ष संभव नहीं । यहाँ पर स्वार्थ में भी मयट् प्रत्यय नहीं हो सकता, क्योंकि पहले कहे गये सभी दोष यहाँ पर भी लागू हो जायेंगे । विकार में भी प्रत्यय नहीं होगा, क्योंकि

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५१६ dardureate: न मनोज्ञम् वेदप्रामाण्यस्याद्यापि साधयिष्यमाणत्वात् । यथा पटुरपि नटबदुर्न स्वस्कन्धमारोढुं पारयति तथैव । न च कश्चिद् ग्रन्थः स्वेनैव स्वस्य प्रामाण्यं साधयितुं प्रभवेत्, तथात्वे मोहम्मदादिग्रन्थानामपि तथात्वापातात् । न च सूर्यस्येव स्वपरप्रकाशकत्वं वेदानामिति वक्तुं युक्तम्, तथात्वे तत्प्रामाण्ये नास्तिकानां विप्रतिपत्त्यनुपपत्तेः । पूर्वोत्तरमीमांसकर्यथा वेदानां नित्यत्वं प्रामाण्यस्वतस्त्वं साधितं तथोक्तं वक्ष्यते च । ' पठनपाठन पुस्तकानित्यत्वेन वेदानामनित्यत्वं न केनाप्यभ्युपगम्यते ' इति पूर्वपक्षो निरर्थक एव । यत्तु ईश्वरज्ञाने तेषां विद्यमानत्वादित्युक्तम्, तत्तु मन्दम्, तदनिरुक्तः । तथाहि-- ईश्वरज्ञानस्य वेदे: कीदृशः सम्बन्धः? यदि विषयतासम्बन्धश्चेतहिं न स नित्यत्वपोबलतया सम्बन्धुं शक्नुयात्, सर्वज्ञस्य तस्य सतस्तज्ज्ञानेन सर्वस्यैव वस्तुनः सम्बन्धात् विषयतासम्बन्धस्य नित्यत्वाप्रयोजकत्वात् । किं पूर्वं वेदानां विद्यामयत्वं प्रतिज्ञायेदानीं हाय ईश्वरज्ञानेन सह विद्यमानत्वं प्रतिपाद्यत इति कथङ्कारं पौर्वापर्य सङ्गति:? एवमेव पूर्वं शब्दार्थसम्बन्धा एव नित्यत्वेनोक्ताः साम्प्रतं त्वक्षरमपि नित्यमुच्यत इति कोऽभिप्रायः? किञ्च शब्दस्याक्षरघटितत्वात् तस्य पूर्ववतित्वेऽपि शब्दाक्षरार्थसम्बन्धाः सम्लीति किमर्थमुक्तम्? वस्तुतस्तु ' वर्णा एव तु शब्द: ' इत्याप्तोक्तरीत्या वर्णात्मका एव शब्दा इति तेषां पृथग् व्यपदेश औपचारिक एव । ईश्वरविद्याया नित्यत्वेऽपि वेदस्य कुतो नित्यत्वम्? तदभिन्नत्वाच्चेत् कथमेकत्रैव साध्यसाधनभाष:? भिन्नत्वे वा कथमन्यनित्यत्वेनान्यनित्यत्वम् । किञ्चेश्वर विद्यारूपा परमेश्वर के ज्ञान में कोई विकार नहीं हो सकता । वेद के प्रमाण से वेदों की नित्यता सिद्ध करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि वेद का प्रामाण्य तो हमको अभी सिद्ध करना बाकी है । जैसे नट अत्यन्त कुशल होते हुए भी स्वयं अपने कन्धे पर नहीं चढ़ सकता, उसी तरह यहाँ समझना चाहिये । कोई ग्रन्थ स्वयं अपनी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं कर सकता, ऐसा मानने पर मुसलमान आदि के ग्रन्थों का भी उन्हीं के प्रमाण पर प्रामाण्य मानना पड़ेगा । सूर्य जैसे स्वयं प्रकाशित होता है और दूसरों को भी प्रकाशित करता है, उसी तरह की प्रामाण्य की प्रकाशता वेद में नहीं मानी जा सकती, यदि ऐसा होता तो नास्तिकों को भी इसमें विवाद न होता । मीमांसकों और वेदान्तियों ने वेदों की जिस प्रकार की नित्यता और स्वतःप्रमाणता मानी है, उसका बिस्वार से निरूपण किया जा चुका है और आगे भी प्रतिपादन किया जायगा । ' पठन - पाठन की पुस्तकें अनित्य होने से वेदों की अनित्यता को कोई स्त्रीकार नहीं करता ' यह पूर्वपक्ष निरर्थक ही है । ' ईश्वर के ज्ञान में उनके विद्यमान होने से यह कहना भी बिलकुल व्यर्थ है, क्योंकि अपने कथन का वे उपपादन नहीं कर सकते । पूर्वपक्षी से हम पूछते हैं कि ईश्वर ज्ञान का वेदों के साथ कैसा सम्बन्ध है? यदि ईश्वर ज्ञान का वेदों के साथ ' विषयता सम्बन्ध ' कहे तो वह ठीक नहीं होगा, क्योंकि ' विषयता सम्बन्ध ' नित्यत्व का समर्थन करता हुआ उन दोनों को सम्बद्ध नहीं कर सकेगा । इसमें कारण यह है कि ईश्वर तो सर्वज्ञ है, तब उसके ज्ञान से सभी वस्तुओं का सम्बन्ध रहने से सभी को नित्य मानना होगा | अतः विषयता सम्बन्ध से नित्यत्व की सिद्धि नहीं हो सकती, अर्थात् विषयता सम्बन्ध नित्यत्व का प्रयोजक नहीं है । दूसरी बात यह है कि पूर्वपक्षी ने पहिले तो यह प्रतिज्ञा की कि ' वेद विद्यामय ' हैं, और अब उस प्रतिज्ञा को भूलकर ' ईश्वरज्ञान के साथ वेदों के सम्बन्ध ' को बताने लगे । पहिले कुछ कह गये बाद में कहीं बह गये, इस प्रकार पूर्वपक्षी का सब असंगत प्रताप सिद्ध हो रहा है । विचारशील बुद्धिमान् व्यक्ति के कथन में पप सङ्गति हुआ करती है । यहाँ उसका बिलकुल ही अभाव है । उसी प्रकार दूसरी असङ्गति देखिये --- पहिले शन्दार्थ सम्बन्धों को ही नित्यं बताया और बाद में अक्षर को भी नित्य कहने लगे । इस असंगत कथन से पूर्वपक्षी का कोई अभिप्राय ही व्यक्त नहीं हो रहा है । उसी प्रकार तीसरी असङ्गति - अक्षरों से शब्द froya होते हैं, अतः अक्षरों का शब्द के पहिले रहना ( पूर्ववस्त्रि ) निश्चित ही है, तब ' शब्द, अक्षर, अर्थ के सम्बन्ध होते हैं इस कथन की आवश्यकता क्यों प्रतीत हुई? वास्तविकता तो यह हैं कि ' वर्ण ही शब्द है ' ऐसा आप्तों ने बताया है । शब्दों के वर्णात्मक ( वर्णरूप ) होने से, दोनों का पृथक् - पृथक् व्यवहार करना औपचा fre समझना चाहिये | ईश्वर की विद्या नित्य रहने पर भी उससे वेद की नित्यता कैसे हो सकेगी? ' ईश्वर की विद्या और वेद दोनों का अभेद रहने से ' ऐसा यदि कहें तो बताइये कि एक ही पदार्थ साध्य एवं साधन दोनों बने, यह कैसे हो सकता है । साध्यसाधनभाव तो

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वेदार्थ पारिजातः * te एव वेदा इत्यत्र प्रमाणमप्यपेक्षितम्, निष्प्रमाणस्य सत्त्वासम्भवात् । तस्माच्छन्दोऽनित्यश्चाक्षुषत्वादिति वदाभास-समानयोगक्षेमत्वमेव विद्या- नित्यत्वहेतोः । एवमीश्वरविद्याया अव्यभिचारित्वहेतोरपि न वेदानां नित्यत्वसाधकत्वम्, पूर्वोक्तदोषानुषङ्गात् । ' सूर्याचन्द्रमसौ घाता ' इत्यस्यार्थवर्णनप्रसङ्गे यत् सूर्यचन्द्रग्रहणमुपलक्षणमित्युक्तम्, तत्र कस्योपलक्षणमिति वक्तव्यमासीत्, तन्नोक्तमिति न्यूनतैव । यच्च यथा पूर्वकल्पे चन्द्रादिरचनं तस्य ज्ञानमध्ये ह्यासीत्, तथैव तेन ह्यस्मिन् कल्पेऽपि रचनं कृतमस्तीति विज्ञायते । कुतः? ईश्वरज्ञानस्य बृद्धिक्षयविपर्ययाभावात् । एवं वेदेष्वपि स्वीकार्यम्, वेदानां तेनैव स्वविद्यातः सृष्टत्वात् ' ( पृ ० ३२ ) इति, तदपि निःसारम् उक्तोत्तरत्वात् । ईश्वरज्ञाने को मध्यः कोऽन्त इति निरूपयितुमशक्यत्वात् । किञ्च ज्ञानमध्ये सूर्यचन्द्रादिरचनं कृतमित्यत्रादिपदेन वियदनिलानलजलोर्वीघटादिकमपि गृह्यते न वा? न चेत्तेषामीश्वरज्ञानस्यादावस्तेऽन्यत्र वा रचना जातेत्यपि वक्तव्यमासीत् । तेषामपि तज्ज्ञानमध्य एव रचनया नित्यत्वमापतितं स्यात् । वियदादयः किं नेश्वरविद्यया सृष्टाः? न चेत् कथं तेषां सृष्टिः? तत एव चेत् कुतो न तेषामपि नित्यत्वम्? रचनं तु क्रिया । क्रियाश्रयस्तु कर्मैव न कर्ता, तस्य क्रियाजनकव्यापाराश्रयत्वात् । ' ईश्वरज्ञानस्य वृद्धि - क्षय-विपर्ययाभावात् ' इत्यपि न समीचीनम्, वृद्धिक्षयाद्यभावाद् इत्येवं वक्तव्यं स्यात् । तथात्वे जन्यभावानाश्रितानां जायते-ऽस्ति वर्धते विपरिणमतेऽपक्षीयते विनश्यतीति षडविकाराणां निषेधोपपत्तेश्च । वृद्धिक्षययोर्विपर्ययः, वृद्धिक्षयरूपो दो भिन्न पदार्थों में हुआ करता है, एक में नहीं । यदि ईश्वर की विद्या से वेद को भिन्न कहें तो एक के नित्य होने से दूसरे की नित्यता कैसे हो सकेगी? दूसरी बात यह भी है कि वेदों के ईश्वर के विद्यास्वरूप होने में प्रमाण देना होगा 1 । बिना प्रमाण के कोई बात मानी नहीं जाती । अतः वेद की नित्यता में ' ईश्वरविद्या नित्यत्व ' हेतु को उपस्थित करना वैसा ही होगा, जैसा कि शब्द की अनित्यता में ' चाक्षुषत्व ' हेतु । अर्थात् ' चाक्षुषत्व ' हेतु श्राश्रयासिद्ध होने से जैसे असद्धेतु है, उससे शब्द में अनित्यता सिद्ध नहीं की जा सकती, उसी तरह ' विद्यानित्यत्व ' हेतु भी असद्धेतु ही हैं, उससे वेद की नित्यता सिद्ध नहीं हो सकेगी । उसी प्रकार ईश्वरविद्यारूपी अव्यभिचरित हेतु से भी aa at free f द सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाय, तो पूर्वोक्त दोष वहीं उपस्थित हुए बिना नहीं रह सकते । ' सूर्याचन्द्रमसो घाता था इसका अर्थ वर्णन करते हुए जो कहा है कि सूर्यचन्द्र का ग्रहण उपलक्षण है, वह किसका उपलक्षण है, यह बतलाना होगा । किन्तु उसे नहीं बता सके, यह न्यूनता ही कही जायेगी । जो यह कहना है कि ' यथा पूर्वमकल्पयत् चन्द्रादिरचनं तस्य ज्ञानमध्ये ह्यासीत् ' अर्थात् पूर्वकल्प में चन्द्र आदि की रचना उसके ( ईश्वर के ) ज्ञान में थी, उसी प्रकार इस कल्प में भी उसने रचना की है, ऐसा समझा जा सकता है, क्योंकि ईश्वर के ज्ञान में कभी भी वृद्धि, क्षय तथा विपर्यय नहीं हुआ करता । अतः वेदों के विषय में भी उसी प्रकार स्वीकार कर लेना चाहिये, क्योंकि उसी ने अपनी विद्या से वेदों की सृष्टि की है । ' किन्तु यह कथन भी सारहीन है । क्योंकि इसका उत्तर पूर्व दिया जा चुका है । ईश्वर के ज्ञान में कौन मध्य है और कौन अन्त है, इसका निरूपण करना सम्भव नहीं । दूसरी बात यह है कि ' अपने ज्ञान के मध्य में सूर्य, चन्द्र आदि की रचना उसने की ' इस वाक्य में ' आदि ' पद से आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी तथा वादिक भी ग्रहण किये जाते हैं या नहीं? यदि नहीं होते हैं, ता उनकी रचना ईश्वर ज्ञान के पहिले या अन्त में अथवा अन्यत्र कहाँ हुई है, यह भी बताना चाहिये था । उसके ज्ञान के मध्य में ही उन पदार्थों की रचना मानने पर उन पदार्थों को नित्य कहना पड़ेगा । इस पर यदि कहा जाय कि आकाशादि पदार्थ ईश्वर की विद्या के द्वारा सृष्ट नहीं हुए हैं, तो उनकी सृष्टि कैसे हुई, यह बताना पड़ेगा । यदि उसी से ( ईश्वर से ) हुई तो उन पदार्थों की नित्यता क्यों न मानी जाय? रचना तो क्रियारूप है | farmer कर्म ही होता है, कर्ता नहीं, क्योंकि वह तो क्रियाजनक व्यापार का आश्रय हुआ करता है । ' ईश्वर के नाम में वृद्धि क्षय तथा विपर्यय भी नहीं हुआ करते ' यह कहना भी ठीक नहीं हैं, क्योंकि ' वृद्धिक्षयाद्यभावात् ' वृद्धि, क्षय आदि के न होने से इतना कहना हो पर्याप्त है । इस प्रकार कहने पर ही जन्यभाव से रहित पदार्थों में जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते विनश्यति इन छह भावविकारों का निषेव उपपन्न हो सकता है । ' वृद्धिक्षयविपर्ययाभावात् ' यहाँ पर वृद्धि, क्षय,

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वेदार्यपारिजातः वा विपर्ययः । विपर्ययश्च कः? भ्रमरूपो वाऽभावरूपो वा? तत्र न परमेश्वरीयज्ञाने वृद्धिक्षययोर्भ्रमः प्रसक्तः, वृद्ध्यादीनां जन्यभावविकारत्वात् । ईश्वरज्ञानस्य त्वजन्यत्वेन तत्र तदप्रसक्तेः । नाप्यभावार्थको विपर्ययशब्दः, तथात्वे वृद्धिक्षयाभावाभावत्वोक्त्येश्वरज्ञानस्य वृद्धिक्षयप्रसक्तेः । नापि वृद्धिक्षयरूपो विपर्ययः, वृद्धिक्षययोर्भ्रम-रूपत्वस्याभावरूपत्वस्य चाप्रसिद्धेः । ईश्वरज्ञानं यथा वृद्विक्षयादिशून्यत्वान्नित्यम्, तथैव तद्विद्यासृष्टत्वाद्वेदा अपि नित्या इति जल्पनं तु ' मुखमस्तीति वक्तव्यं दशहस्ता हरीतकी ' इति वाक्यमेवानुहरति तादृग्व्याप्तिग्रहा सिद्धेः । नहि नित्योपादानकं तन्नित्यमिति व्याप्तिः, त्वद्रीत्या नित्यप्रकृत्युपादानस्यापि जगतो नित्यत्वाभावात् । वेदान्त रीत्या नित्यपरमेश्वरोपादानकस्य जगतोऽनित्यत्वाभ्युपगमात् । नापि यन्नित्यनिमित्तकं तन्नित्यमिति व्याप्तिः, स्वीत्या नित्येश्वरनिमित्तकस्यापि जगतो नित्यत्वाभावात् । अत्र वेदानां नित्यत्वे व्याकरणशास्त्रादीनां साक्ष्यर्थं प्रमाणानि लिख्यन्ते । वस्तुतस्त्वत्र वेदानां नित्यत्वे व्याकरणादिशास्त्राणां साक्षितया प्रमाणानि दीयन्ते इत्येव वक्तव्यमासीत् । व्यञ्प्रत्यये तु साक्ष्यार्थमिति वक्तव्यं न साक्ष्यर्थमिति । तथा च वेदानां नित्यत्वे साक्ष्यार्थं व्याकरणादिशास्त्राणि प्रमाणमिति वक्तव्यम् । यदपि च-- ' नित्या: शब्दा:, नित्येषु शब्देषु कूटस्थैरविचालिभिर्वर्णैर्भवितव्यमनपायोपजन विकारिभिरिति । इदं वचनं प्रथमाह्निकमारभ्य बहुषु स्थलेषु व्याकरणमहाभाष्येऽस्ति । तथा ' श्रोत्रोपलब्धिर्बुद्विनिर्ग्राह्यः प्रयोगेणाभि-ज्वलित आकाशदेश: शब्द: ' इदम् ' अ इ उ ण् ' इति सूत्रभाष्ये चोक्तमिति । अस्यायमर्थः -- वैदिका लौकिकाः सर्वे शब्दा नित्याः सन्ति । कुतः? शब्दानां मध्ये कूटस्था विनाशरहिता अचला अनपाया अनुपजना अविकारिणो वर्णाः सन्ति, अतः | अपायो लोपो निवृत्तिरग्रहणम्, उपजन आगमो विकार आदेश एते न विद्यन्ते येषु शब्देषु तस्मान्नित्याः विपर्यय कहने का क्या तात्पर्य है, क्या वृद्धि और क्षय दोनों का विपर्यय अथवा वृद्धिक्षय रूप विपर्यय? इतने से ही प्रश्न की समाप्ति नहीं हो जाती । उसके अतिरिक्त अन्य प्रश्न भी हो सकते हैं । विपर्यय का स्वरूप क्या है, क्या वह भ्रमरूप है या अभावरूप? परमेश्वर के ज्ञान में वृद्धि और क्षय का भ्रम कहा नहीं जा सकता, क्योंकि वृद्धि आदि तो जन्यभाव पदार्थ के विकार हुआ करते हैं । ईश्वर का ज्ञान तो अजन्य होने से उसमें उन विकारों की प्रसक्ति ही नहीं हो सकती । विपर्यय का अर्थ अभाव भी नहीं कर सकते । अन्यथा वृद्धि-क्षय को भावाभावरूप कहने से ईश्वर के ज्ञान में भी वृद्धि और क्षय प्रसक्त होने लगेंगे । वृद्धिक्षयरूप विपर्यय इस दूसरे पक्ष को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि वृद्धि और क्षय में भ्रमरूपता और अभावरूपता कहीं प्रसिद्ध नहीं है । यह जो कहना है कि वृद्धिश्रयादि से शून्य होने के कारण ईश्वर का ज्ञान जैसे नित्य माना जाता है, उसी प्रकार उसकी विद्या से उत्पन्न होने के कारण वेदों को भी नित्य कहा जा सकता है, किन्तु यह कथन तो ' मुखमस्तीति वक्तव्यं दशहस्ता हरीतकी ' वाली उक्ति के तुल्य ही है । उपादान कारण के नित्य होने से उसका कार्य भी नित्य हो ऐसी कोई व्याप्ति नहीं है । आपकी ही रीति के अनुसार नित्य प्रकृति के जगत् का उपादान कारण रहने पर भी जगत् को नित्य नहीं माना जाता । वेदान्तियों को दृष्टि से जगत् का उपादान कारण नित्य परमेश्वर के रहने पर भी जगत् की अनित्यता ही स्वीकार की गई है । जिसका निमित्त नित्य हो उसका कार्य भी नित्य रहे, ऐसी कोई व्याप्ति नहीं है । आपकी रीति के अनुसार नित्येश्वर को निमित्त मानकर उससे उत्पन्न हुए जगत् की नित्यता नहीं हो पा रही है । वेदों की नित्यता के विषय में साक्षी के रूप में व्याकरणादि शास्त्रों के प्रमाण लिखे गये हैं । ऐसा न कहकर वस्तुतः वेदों की निस्यता के विषय में व्याकरणादि शास्त्रों के प्रमाण दिये जा रहे हैं, इतना ही कहना चाहिये था । ष्यम् प्रत्यय करने पर तो ' साक्ष्यार्थ ' ऐसा कहना चाहिये, न कि ' साक्ष्यर्थम् ' । तब वेदों की नित्यता के विषय में साक्ष्य देने के लिये ( साक्ष्यार्थ ) व्याकरणादि शास्त्र प्रमाण हैं, ऐसा कहना चाहिये । यद्यपि ' freer: शब्दाः, नित्येषु शब्देषु कूटस्थैरविचालिभिः वर्णेर्भवितव्यमनपायोपजन विकारिभिरिति ' यह वाक्य प्रथम आह्निक से लेकर अनेक स्थलों पर व्याकरण महाभाष्य में उपलब्ध होता है । उसी प्रकार ' श्रोत्रोपलब्धिर्बुद्धिः प्रयोगे -भिज्वलित आकाशदेशः शब्दः ' यह उल्लेख ' अइउण ' सूत्र के भाष्य में किया गया है । इसका अभिप्राय यह है कि वैदिक लौकिक सभी शब्द नित्य है, क्योंकि शब्दों के मध्य में कूटस्थ ( विनाशरहित ) अचल ( अनपाय = स्थिर ), अनुपजन ( अविकारी ) ऐसे वर्ण होते

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* * * शब्दा: ' ( पृ ० ३३ ) । तदप्यविचारितरमणीयम्, तात्पर्यानवबोधात् । तथाहि-- अवश्यं महाभाष्यकारे: ' शब्दा नित्याः ' इति सिद्धान्तितम्, परमेतत्समुद्धृतं तु महाभाष्यवचनं पूर्वपक्षपरम् । महाभाष्ये चात्र वर्णनानात्वमविकृत्योक्तम्--नैवं शक्यमनित्यमेवं स्यात् । नित्या: शब्दा:, नित्येषु च शब्देषु कूटस्थेरबिचालिभिर्वर्णैर्भवितव्यमनपायोपजन-दिकारिभिः । यदि चार्य द इत्यत्र दृष्टो ' ण्ड ' इत्यत्र दृश्येत, नायं कूटस्थ: स्यादिति । जातिस्फोटवादी व्यक्तिस्फोटवादिनं पर्यनुयुङ्क्ते -- अनित्यत्वमेवं स्यादिति । भवता जातिस्तावन्नाम्युपगम्यते, व्यक्तेरेकत्वनित्यत्वप्रतिज्ञानात् । तच्चैकत्वं नित्यत्वं व्यवतेर्नोपपद्यते दण्ड इत्युदात्तानुदात्तस्वरितभेदेन भिन्नत्वात् । नह्येकस्यैवोदात्तत्वपरित्यागेनानुदात्तत्वं युक्तम्, रूपान्तरपरिग्रहादनित्यत्वप्रसङ्गात् । तस्माद्धिना एवानित्या एवाकाराः प्रत्यभिज्ञा त्वाकृतिनिबन्धना । जातिस्फोटपक्षोऽत्र व्यवस्थित इति प्रदीपः । उद्योऽप्ययमेवाथः स्फुटीकृतः । जातिस्फोटवादी वदति - तव नित्याः शब्दाः । तेषु वर्णैरविचालिभिरविकारिभिरेव भाव्यम् । न च वर्णानां कूटस्थत्वं सम्भवति ' दण्ड ' इत्यत्र दकारडका रश्लिष्टाकाराणामुदात्तानुदात्तस्वरितभेदेन भेदाभ्युपगमात् । नह्येकस्मिन्नेवाकारे उदात्तत्वादिभेदः सम्भवति, विरुद्धधर्माक्रान्तानामेकत्वविरोधात् । यद्यपि सिद्धान्तेऽनुदात्तत्वादीनां ध्वनिनिष्ठत्वान्न तेन वर्णनानात्वं सिद्धयति, तथापि स्फटिकस्येवास्यापीतरसन्निधानेन तद्रूपपरिग्रहे कूटस्थत्वं भज्यत एवेति पूर्वपक्ष्यभिप्रायः । अनन्तवर्णवादे तु तदनित्यत्वमिष्टमेव । हैं । ' अपाय ' का अर्थ है - लोप, निवृति, या थग्रहण, ' उपजन ' का अर्थ है -- आगम, विकार का अर्थ है- आदेश, ये जिन शब्दों में नहीं होते हैं, इसलिये शब्द को नित्य कहा जाता है । किन्तु यह कथन भी तात्पर्य का बोधक न बन पाने से तभी तक रमणीय प्रतीत होता है, जब तक उसपर विचार न किया जाय । उक्त कथन पर विचार इस प्रकार किया जा सकता है - ' महाभाष्यकार ने शब्द-नित्यत्व का सिद्धान्त तो अवश्य स्वीकार किया है, किन्तु महाभाष्यकार ने महाभाष्य में जिस वचन को पूर्वपक्ष के रूप में रखा है, उसी को स्वामी दयानन्द ने सिद्धान्त समझकर अपनी भूमिका में उद्धुत कर दिया है । इस प्रसंग पर महाभाष्य में वर्ण के नानात्व को लक्ष्यकर कहा गया है कि ' यह मानना संभव नहीं, ऐसा मानने से वर्णों में अनित्यता आवेगी । शब्द तो नित्य हैं, उनमें कूटस्थ अवि-चलित वर्ण जो अनपाय, अनुपजन, अविकारी हैं - होते हैं । यदि यह पूर्व दिखाई देने वाला ' द ' ' ण्ड ' की जगह दिखलाई दे, तो उसे कूटस्थ नहीं कहा जा सकेगा । जातिस्फोटवादी, व्यक्तिस्फोटवादी से प्रश्न करता है कि आपने व्यक्ति को एक और नित्य बताया है, इससे प्रतीत हो रहा है कि आप जाति को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, ऐसी परिस्थिति में आपकी व्यक्ति में ' अनित्यता ' ही सिद्ध होगी । वह नित्य नहीं बन पायेंगी । ' दण्ड ' शब्द के कहने पर उदान्त, अनुदात और स्वरित स्वरों की पृथक् पृथक् प्रतोति हुआ करती है, इसलिये व्यक्ति में एकत्व तथा नित्यत्व बन नहीं सकता । यह भी नहीं कह सकते कि एक ही व्यक्ति में उदात्त स्वर का परित्याग करने पर अनुदात्त स्वर हो जाता है, क्योंकि एक स्वरूप को छोड़कर अन्य स्वरूप को स्वीकार करने में अनित्यता तो हो ही जायगी । इसलिये यही मानना उचित है कि व्यक्ति ( आकार ) एक न होकर free free ( अनेक ) हैं और अनित्य है । ' वहीं यह व्यक्ति है ' इस प्रकार से जो प्रत्यभिज्ञा होती है, वह जाति ( आकृति ) मूलक होती है । ' जातिस्फोटपक्षो s न व्यवस्थितः ' यहाँ = ' जातिस्फोट ' ही व्यवस्थित हो सकता है - ऐसा प्रदीपकार ने कहा है । उद्योत में इसी अभिषाप को स्पष्ट किया है । जाविस्फोटवादी कहता है - आपके मत में शब्द यदि नित्य है, तो उन शब्दों के घटक ( अवयव ) वर्णों को अविचाली तथा अविकारी रहना चाहिये । लेकिन वर्णों में अविचालिता ( कूटस्थता ) का होना संभव नहीं, क्योंकि ' दण्ड ' शब्द में संश्लिष्ट आकार वाले ' दकार णकार, डकार वर्णों की प्रतीति, उदात्त, अनुदान और स्वरित स्वरों के भेद से भिन्न भिन्न रूप में होती है । एक ही आकार ( व्यक्ति ) में उदात्त, अनुदात्त आदि भिन्न भिन स्वरों का होना संभव नहीं, क्योंकि विरुद्ध धर्मों से आक्रान्त ( व्याप्त ) हुए वर्णो ( व्यक्ति ) में एकत्व की प्रतीति हो ही नहीं सकती । fro द्ध धर्मों से आक्रान्त रहना और उसमें एकत्व की प्रतीति भी होना ये दोनों बातें विरुद्ध हैं । पूर्वपक्षी का यह कहना है कि यद्यपि सिद्धान्ती के मत से अनुदात्तत्वादि धर्मो का होना ध्वनिनिष्ठ ( safe में ) माना गया है, उससे वर्णों का नानात्व ( अनेकता ) सिद्ध नहीं होगा, तथा ft enfen मणि की तरह अन्य के सविधान से उसके स्वरूप को स्वीकार कर लेने पर इसकी कूटस्थता तो भंग हो ही जायगी । अनन्त वर्णवादी के मत में वर्णों की अनित्यता तो इष्ट ही है ।

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 550 का मूल पृष्ठ
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५२० वेदार्थपारिजातः स्वया तु पूर्वं नित्यकार्यभेदेन शब्दद्वैविध्यमुक्तम् । परमात्मज्ञानस्थाः शब्दार्थसम्बन्धा नित्या:, येऽस्मदादीनां वर्तन्ते तु ते कार्या इति तद्भिन्नानामनित्यत्वमुक्तम् । इह तु वैदिका लौकिकाश्च सर्वे नित्याः सन्तीत्युच्यते । यदपि तत्र कार्यत्वेन यदच्छाशब्दाः ( मनुष्यकृता नवनिर्मितशब्दा: ) एव गृहीता इति विरोधपरिहार इति, तदपि न, महाभारता-दिसंस्कृतशब्दानामपि परमात्मज्ञानस्थशब्द भिन्नत्वाभ्युपगमविरोधात् । महाभाष्यकारोऽपि गौरश्वो हस्तीत्यादिशब्दानां लौकिकत्वमिषे त्वादीनां च वैदिकत्वमुक्तवानिति त्वदीयग्रन्थपौर्वापर्यविरोधोऽपरिहार्य एवेति पूर्वापरविरोध एव । यदपिच- - ' ' नतु गणपाठाष्टाध्यायीमहाभाष्येष्वप्यपायादयो विधीयन्ते । पुनरेतत्कथं सङ्गच्छत इत्येवं प्राप्ते ब्रूते महाभाष्यकार: - ' सर्वे सर्वपदादेशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः । एकदेशविकारे हि नित्यत्वं नोपपद्यते ॥ ' इति ' दाघाघ्वदाप् ' इत्यस्य सूत्रस्योपरि महाभाष्यवचनम् । अस्यायमर्थः -- सर्वे सङ्घाताः सर्वेषां पदानां स्थान आदेशा भवन्ति । अर्थात् शब्दसङ्घातान्तराणां स्थानेष्वन्ये शब्दसङ्घाताः प्रयुज्यन्ते । तद्यथा - वेदपारंग स् ड सु भू शप् तिष् इत्येतस्य वाक्यसमुदायस्य स्थाने वेदपारगोऽभवत् इतीदं समुदायान्तरं प्रयुज्यते । अस्मिन् प्रयुक्ते समुदाये गम् ड सु तिप् इत्येतेषाम् अडम् इ प इत्येतेऽपयान्तीति केषाञ्चिद् बुद्धिर्भवति । सा भ्रममूलिकेवास्तीति । कुतः? शब्दानामेकदेशविकारे चेत्युपलक्षणात् । नैव शब्दस्य एकदेशापाय एकदेशोपजन एकदेशविकारे च सति दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेराचार्यस्य मते शब्दानां नित्यत्वमुपपन्नं भवति, तथात्र डागमे भू इत्यस्य स्थाने भो इति विकारे चैवं सङ्गतिः कार्या ' ( पृ ० ३४ ) इति, तदपि पौर्वापर्य विचारवैधुर्यमूलकम् । तथाहि -- तत्रागमादेशपक्षमुपक्रम्य सिद्धान्तभूतमादेश-पक्षमुपसंहरन्नाह भाष्यकारः -- ' आदेशास्तर्हमें भविष्यन्ति । अनागमकानां सागमका इति । तत्कथमिति प्रश्ने तुल्यन्यायत्वादाह - ' सर्वे सर्वपदादेशाः ' इति 1 । तत्रत्यभाष्यादिकं तु ' दाधाध्वदाप् ' ( पा ० सू ० १/१/२० ) | आदेश-चादिन आगसवादिनं प्रत्याक्षेपभाष्यम्- ' युक्तं पुनर्यंशित्येषु नाम शब्देष्वागमशासनं स्यात्, न नित्येषु नाम शब्देषु कूटस्थे र विचालिभिर्वर्भवितव्यम् अनपायोपजन विकारिभिः । आगमश्च नामापूर्वः शब्दोपजन:? ' आगमवा fer पहले तो आपने नित्य और कार्य के रूप में शब्दों के दो प्रकार बताये । परमात्मा के ज्ञान में अवस्थित शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध नित्य हैं । हम लोगों के ज्ञान में हैं, वे तो कार्य हैं, इसलिये उनसे भिन्न जो होंगे वे अनित्य हैं, यह आपने कहा था । यहाँ तो after और लौकिक सभी शब्दों को नित्य बताया जा रहा है । वहाँ पर यदूच्छा शब्दों ( मनुष्य कृत = नवनिर्मित शब्द ) का ही ' कार्य ' शब्द से ग्रहण किया गया है, इसलिये विरोध का परिहार हो जायगा, ऐसा जो कहा गया है, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि महाभारत आदि संस्कृत शब्द भी परमात्मा के ज्ञान में रहने वाले शब्दों से भिन्न माने गये हैं, अतः विरोध होगा । महाभाष्यकार ने भी ' गौः, अवः, हस्ती ' इत्यादि शब्दों को लौकिक और ' हवे त्वा ' आदि शब्दों को वैदिक बनाया है । इसलिये आपके ग्रन्थयत पौर्वापर्य का विरोध वैसा ही बना रहा, वह दूर नहीं हो पाया । ' गणपाठ, अष्टाध्यायी, महाभाष्य में भी अपाय आदि का विधान किया गया है । वह कैसे संगत हो सकेगा? इस शंका का समाधान महाभाष्यकार करते हैं कि सभी संघात, सभी पदों के स्थान में आदेश के रूप में होते हैं । अर्थात् भिन्न भिन्न शब्द समूहों के स्थान में भिन्न भिन्न शब्द समूहों का प्रयोग किया जाता है 1 । जैसे— ' वेदपारग स् ड भू शप् तिप् ' इस वाक्य समुदाय ( समूह ) के स्थान में ' वेदपारगोऽभवत् ' इस समुदायान्तर ( अन्य समूह ) का प्रयोग किया जाता है । समुदायान्तर का प्रयोग किये जाने पर ' गम् ड सु तिम् ' की जगह ' अम्ड इप ' ये वर्ण आ जाते हैं, ऐसा कुछ कुछ लोग समझते हैं, किन्तु उनकी यह समझ भ्रममूलक है, क्योंकि ' शब्दानामेकदेवाविकारे च ' उपलक्षण है । शब्द के एकदेश का अपाय ( हानि ), एकदेश का उपजन ( वृद्धि ) और एकदेश में विकार होने पर भी दाक्षीपुत्र आचार्य पाणिनि के मत में शब्दों की fre यता बनी रहती है, उसमें किसी प्रकार की हानि नहीं होती । इसलिये प्रकृत में भी डा का आगम और भू के स्थान में ' भी ' विकार हो जाने से शब्द के नित्यत्व में कोई हानि नहीं हो सकती । इस प्रकार संगति लगा लेनी चाहिये ' यह कथन भी पौर्वापर्य ( आगे पीछे ) का विचार न कर पाने का ही सूचक है । तथाहि -- वहाँ ( भाष्य में ) आगम, आदेश पक्ष को प्रारंभ कर सिद्धान्तभूत आदेश पक्ष का उपसंहार करते हुए महाभाष्यकार कहते हैं -- ' आदेशास्तहीं में ' इत्यादि ।