वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 551–560
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 551–560
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बेदार्थपारिवातः ५२१ आदेशवादिनं प्रत्याक्षेपभाष्यम् – ' अथ युक्तं यन्नित्येषु शब्देषु आदेशाः स्युः? ' आदेशवादिनः समाधानभाष्यम्-' बाढं युक्तम् | शब्दान्तरैरिह भवितव्यम् । तत्र शब्दान्तरे शब्दान्तरस्य प्रतिपत्तिर्युक्ता । ' अत्र कैयट: - ' प्रसङ्गवाची स्थानशब्दो न निवृत्तिवाची, ततश्च सन्त एव प्रयोगे नित्या: शब्दा बुद्धधम्म-ज्जननिमज्जनद्वारेण प्रतिपाद्यन्ते । आगमस्त्ववस्थितस्यापूर्वः क्रियमाणो नित्यत्वं विरुणद्धि | अत्र नागेशः -- ' प्रसङ्गवाचीति । षष्ठीस्थान इत्यत्रत्यः । प्रसङ्गश्च बुद्धेरिति भाव: । ' सन्त एव प्रयोगे नित्या: ' इति । आदेशरूपा इत्यर्थः । बुद्धय स्मज्जननिमज्जने यथाक्रममादेशस्य स्थानिनश्च । भान्ये- शब्दान्तर इति । तबुद्धौ प्राप्तायामित्यर्थः । सिद्धान्तोपसंहारभाष्यम्-- आदेशास्तहीमे भविष्यन्ति, अनागमकानां सागमकाः । तत्कथम्? सर्वे सर्वपदा-देशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः । एकदेशविकारे हि नित्यत्वं नोपपद्यते ॥ ' अत्र कैयट: --- पदशब्देन न सुप्तिङन्तं गृह्यतेऽपि कार्यं प्रतिपद्यमानं प्रतीयमानप्रकृतिप्रत्ययादि तत्सर्वं पदम् । एकदेशविकारे हीति । यद्यपि सर्वविकारेऽप्यनित्यत्वं यथा पिठरस्थस्य पयसः पाकादिषु, तथापि विकाराभावप्रतिपादनपरमेतत् । बुद्धिविपरिणाममात्रं स्थान्यादेशागमागमि-भावद्वारेण क्रियत इत्यर्थः । परन्तु त्वया तु गणपाठाष्टाध्यायीमहाभाष्येष्वपाया विधीयन्त इत्युच्यते । अन्यथा उत्तरपक्षेण महाभाष्येऽपायादयो भवन्तीत्यपि वक्तव्यमासीत् । तत्रापायो विनाशः | आगमस्त्ववस्थितस्यापूर्वः क्रियमाणः कश्चिद् धर्मः । कारिकास्थसर्वपदं त्ववयवकार्त्स्यवाची, न पदसङ्घातवाची, ' सर्वशब्दश्चात्रावयव कात्स्यंवाची ' इत्युद्योत वचनात् । ' न तु पदबहुत्वे ' इति छायावचनाच्च । अत एव कारिकायां पदादेशा इत्युक्तम्, अन्यथा वाक्यस्थाने वाक्यादेशा इति स्यात् । विकारादयोऽपि पदेष्वेव भवन्ति न वाक्येषु व्याकरणशास्त्रस्य पदशास्त्रत्वाच्च । त्वया तु पदसङ्घातरूपवाक्यस्थाने तथाविधवाक्यान्तरमेव प्रयुक्तं मन्यते । इस प्रसंग पर कैयट ' स्थान ' शब्द, प्रसंग का वाचक है, निवृति का वाचक नहीं है, अत: प्रयोग में विद्यमान रहने पर ही नित्य शब्दों का बुद्धि में उन्मज्जन- निमज्जन द्वारा प्रतिपादन किया जाता है । किन्तु आगम अवस्थित वर्ण के पूर्व किया जाता है । अत: वह नित्यता से विरोध रखता है । ' इसी प्रसङ्ग पर नागेश --- ' प्रसङ्गवाचीति । ' ' षष्ठीस्थाने ' यहां का और प्रसंग बुद्धि का यह अभिप्राय है । ' सन्त एव प्रयोगे नित्या ' इति । ' आदेश रूप ' यह अर्थ है । बुद्धि का उन्मज्जन और निमज्जन क्रमश: यादेश और स्थानी का समझना चाहिये | भाष्ये शब्दान्तरे इति । उसका ज्ञान प्राप्त होने पर, यह अर्थ है । इस प्रसंग में कैयट --- यहाँ पर ' पद ' शब्द से सुप् तिङन्त का ग्रहण नहीं करना, अपि तु प्रतिपद्यमान कार्य प्रतीयमान प्रकृति - प्रत्यय आदि सभी का ' पद ' शब्द से ग्रहण किया गया है । ' एकदेशविकारे हीति ' यद्यपि सभी विकारों में अनित्यता है, जैसे ---पिठरस्थ ( बटलीही के ) पय की पाकादि में । तथापि यह विकाराभाव प्रतिपादन परक है । स्थान्यादेश आगमागमिभाव के द्वारा बुद्धि का विपरिणाम मात्र किया जाता है । लेकिन आपने तो यह कहा है कि गणपाठ, अष्टाध्यायी, महाभाष्य आदि में अपायों का विधान किया जाता है, अन्यथा उत्तरपक्ष के द्वारा महाभाष्य में अपाय आदि होते हैं, यह भी कहना चाहिये था । अपाय का अर्थ, विनाश है और आगम का अर्थ है — अवस्थित के लिये किया जाने वाला नवीन कोई धर्म विशेष | कारिकागत ' सर्व ' पद का अर्थ अवयव की सम्पूर्णता है, ' पदसमुदाय ' अर्थ नहीं है । इसी को उद्योतकार ने भी कहा है- ' सर्वशब्दश्चात्र अवयवकात्स्यैवाची ' । छायाकार ने भी ' न तु पदबहुत्वे ' कहा है । इसी लिये कारिका में ' पदादेशा ' कहा गया है । अन्यथा ' वाक्य ' की जगह ' वाक्यादेश ' कहते | विकारादि भी पदों में ही होते हैं, वाक्यों में नहीं, क्योंकि व्याकरणशास्त्र तो ' पदशास्त्र ' है । आप तो पदसंधातरूप वाक्य के स्थान में उसी प्रकार के वाक्यान्तर को प्रयुक्त किया समझ रहे हैं । ६६
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५२२ वेदार्थ पारिजातः ' एवं केषाञ्चिद् भवति । सा भ्रममूलैवास्ति ' इत्यप्यसङ्गतम्, विकल्पानुपपत्तेः । भ्रभो मूलं यस्याः सा भ्रममूला इति, भ्रमस्य मूलमिति वा तत्समासः । नाद्यः, मूलपदस्य कारणपरतया कारणस्य च कार्यनियतपूर्ववृत्तित्वेना. पायबुद्धेः पूर्वं तत्कारणीभूतस्य भ्रमस्यावश्यं स्वीकार्यत्वापातात् । तदङ्गीकारे तस्य भ्रमरूपत्वात् कर्मसिद्धाव पर ल बुद्धेनिष्प्रयोजनत्वात् । न द्वितीयपक्षोऽपि अपायबुद्धेरुत्तरवति किमपि भ्रमात्मकं ज्ञानमवश्यं स्वीकर्तव्यमन्यथा बुद्धेस्तत्कारणत्वानुपपत्तेः । अत एव सा श्रमात्मिवेत्येव सुवचम् । यच्च- -- श्रममूलत्वे च तस्याः कारणत्वमुक्तम्, कुतः? शब्दानामेकदेशविकारे चेत्युपलक्षणादित्यादिना, तदपि न क्षोदक्षमम् त्वदुक्तस्य हेतोर्भ्रममूलत्वस्य च साध्यस्य व्याप्तिग्रहाभावात् । भूमिकायाः पूर्वसंस्करणेषु शब्दस्यैकदेशाय एकदेशोपजन एकदेशविकारिणि इति पाठ आसीत् । स शुद्ध एवासीत् । एकदेशविकारिणीत्यत्र शब्दस्यानन्वयापातात् । २०२४ क्रमाब्दसंस्करणे तं पाठमशुद्धमङ्गीकृत्य सनातनि विद्वद्धौरेयाणां परामर्शानुसारम् ' एकदेशविकारे ' इति शुद्धः पाठः सन्निवेशित इति मोदास्पदम् । ' श्रोत्रेन्द्रियेण ज्ञानं यस्य, बुद्धचा नितरां ग्रहीतुं योग्यः, उच्चारणेनाभिप्रकाशितो यस्याकाशदेशोऽधि-करणं वर्तते स शब्दो भवतीति बोध्यम् ' ( पृ ० ३४ ) इति महाभाष्यविवरणं कुर्वता त्वया स्वीयानि पूर्ववचनानि स्मर्तव्यानि । यत्र त्वया वैदिकशब्दानां परमात्मज्ञानस्यत्वं प्रदर्शितम् । किं निराकारेण शब्दानामुच्चारणं सम्भवति? कि वा निराकारोच्चारितशब्दानां श्रोत्रेन्द्रियग्राह्यतापि सम्भवति? उच्चारणश्रवणादिक्रियायाः क्षणप्रध्व-सित्वात् । ' एकैकवर्णवर्तिनी वाकू ' ( १ | ४ | १०८ ) इति महाभाष्यप्रामाण्यात् प्रतिवर्णं वाक्क्रिया विपरिणमते, अतस्तस्या एवानित्यत्वम्, न शब्दस्येति वर्णात्मकशब्दानां नित्यत्वेऽपि पद- वाक्य कदम्बात्मकानां वेदानां कथं ' एवं केषाञ्चिद् भवति । सा भ्रममूलैवास्ति ' यह कथन भी असंगत है । क्योंकि ' अमला ' में ' भ्रमो मूलं यस्याः सा - श्रममूला, अथवा मूलमस्तीत्यस्यामिति मूला, भ्रमस्य मूला - भ्रममूला ' इन दो प्रकार के समासों में कौन सा समास आप करेंगे? पहिला समास तो आप कर नहीं सकेंगे, क्योंकि ' मूल ' पद का अर्थं तो ' कारण ' है और कारण सदा कार्य के पूर्व हुआ करता है, अतः अपायबुद्धिरूप कार्य के पूर्व ही उसके कारण रूप भ्रम को अवश्य मानना होगा । उसके मानने पर तो कार्यसिद्धि विषयक जो उत्तर ज्ञात होगा, वह निष्फल ही होगा, क्योंकि जिस कारण से वह उत्तर ज्ञान हुआ है, वह कारण तो स्वयं ही भ्रमरूप है । अतः पहिला समास तो आप कर हो नहीं सकते । अब रहा दूसरा पक्ष, उसे भी आप स्वीकार नहीं कर सकेंगे, क्योंकि अपाय बुद्धि के बाद किसी भ्रमात्मक ज्ञान को अवश्य स्वीकार करना होगा, अन्यथा कारण के बिना कार्य कैसे होगा? अतः उस अपाय बुद्धि को भ्रमात्मक ही कहना उचित है । are farari देशविकारे चेत्युपलक्षणात् ' इत्यादि से उसमें ( अपाय बुद्धि में ) उचित नहीं है, क्योंकि आपके दिये हुए हेतु ( भ्रममूलत्व ) और साध्य की व्याप्ति का ज्ञान नहीं है । साध्यसाधनभाव का निश्चय नहीं किया जाता । भ्रममूलता को कारण कहना भी बिना व्याप्तिग्रह ( व्याप्ति ज्ञान ) के भूमिका के पूर्व संस्करणों में ' शब्दस्यैकदेशाय एकदेशोपजन एकदेशविकारिणि ' यह जो पाठ था, अशुद्ध ही था, क्योंकि ' एकदेशविकारिणि ' में शब्द का अन्वय नहीं बैठ पाता है । किन्तु २०२४ विक्रम संवत्सर में उक्त पाठ की अशुद्धि जब समझ में नागई, तब सनातनी विद्वानों के परामर्शानुसार ' एकदेशविकारे ' इस शुद्ध पाठ का सन्निवेश किया गया, यह हर्ष की बात है । ' श्री से जिसका ज्ञान होता है, बुद्धि से जिसका ग्रहण करना अत्यन्त योग्य है, उच्चारण से जो प्रकाशित किया जाता है, जिसका अधिकरण आकाशदेश है, उसे शब्द समझना चाहिये । इस प्रकार महाभाष्य का विवरण करते हुए आपने पहिले जिन artit at कहा था, उनका स्मरण आपको कर लेना चाहिये | जहाँ आपने वैदिक शब्दों को परमात्मा के ज्ञान में स्थित होना प्रदर्शित किया है । क्या निराकार के द्वारा शब्दों का उच्चारण करना सम्भव हो सकता है? और क्या निराकार के द्वारा उच्चरित हुए शब्दों की श्रन्द्रियग्राह्यता भी हो सकती है? उच्चारण, श्रवण आदि क्रियाएं क्षणविनाशी होने से वह कभी सम्भव नहीं है । ' एकैकवर्णवतिनी वाक् ( १।४।१०८ ) इस महाभाष्य के प्रमाण से यह वाक्क्रिया प्रत्येक वर्ण के रूप में परिणत होती है, इसलिये उस वाक्क्रिया को ही
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वेदार्थपारि II नित्यत्वं सेत्स्यति? नित्येषु विभुषु वर्णेषु पौर्वापर्यलक्षणाया आनुपूर्व्या असम्भवेन पदवाक्याद्यसम्भवात् । शब्दानां नित्यत्वेन वेदनित्यत्वे त्वस्मदादिवाक्यानामपि नित्यत्वापत्तेः अस्मदादिवाक्यघटितशब्दानामपि नित्यत्वानपायात् । ' यत्र खलु वायुवाक्क्रिये न भवतस्तत्रोच्चारणश्रवणे अपि न भवत: ' ( पृ ० ३५ ) इति त्वद्वचनेनापि निराकारकर्तृकोच्चारणं न सम्भवति । यदपि शब्दस्य नित्यत्वसाधनाय ' नित्यस्तु स्याद् दर्शनस्य परार्थत्वात् ' ( १ | १ | १८ ) इति जैमिनिसूत्रमुद्धृत्योक्तम्- ' अस्यायमर्थ: - तु शब्देनानित्यत्वशङ्का निवार्यते । विनाशरहित-त्वाच्छन्दो नित्योऽस्ति । कस्मात्? दर्शनस्य परार्थत्वाद् दर्शनस्योच्चारणस्य परस्यार्थस्य ज्ञापनार्थत्वात् शब्दस्यानित्यत्वं नैवास्तीति ' ( पृ ० ३६ ), तदपि न युक्तम्, विनाशरहितत्वादित्यस्य सूत्रासम्बद्धत्वाद् व्यर्थत्वाच्च प्रत्यभिज्ञानेनैव नित्यत्वसिद्धेः । ननूच्चारणजन्यः शब्दो भवति । नित्यत्वे किमर्थमुच्चारणमित्याशङ्क्य तन्निराक्रियते - नित्य एव शब्दः । उच्चारणं न शब्दस्वरूपसिद्धयर्थम्, किन्तु परप्रत्यायनायोच्चारणं क्रियते, दर्शनस्योच्चारणस्य परस्यार्थस्य ज्ञापनार्थत्वाद् इति वाक्ये सर्वत्र षष्ठ्यनुपपत्तिः । दर्शनस्योच्चारणस्य परं प्रत्यर्थबोधकत्वादित्यस्यैव युक्तत्वात् । शबर-स्वामिनापि तथैव स्पष्टीकृतम् | दर्शनमुच्चारणम्, तत्परार्थं परमर्थं प्रत्याययितुम् । उच्चारितमात्रे हि विनष्टे शब्दे न चान्योऽयं प्रत्याययितुं शक्नुयात् । अतो न परार्थमुच्चार्येत । अथ न विनष्टस्ततो बहुमा उपलब्धत्वादर्थावगम इति युक्तमिति । यदुक्तम्- ' शब्दस्यानित्यत्वं नैव भवति, अन्यथायं गोशब्दार्थोऽस्तीत्यभिज्ञा अनित्येन शब्देन भवितुमयो-ग्यास्ति नित्यत्वे सति ज्ञाप्यज्ञापकयोविद्यमानत्वादिति ' ( पृ ० ३६ ), तदपि न किञ्चित् शब्दनित्यत्वस्य ज्ञाप्यज्ञापकयो-after कहना चाहिये, शब्द को नहीं । इस रीति से वर्णात्मक शब्द को नित्य बताने पर भी उससे पदवाक्यकदम्बात्मक वेदों की नित्यता कैसे सिद्ध हो सकेंगी? क्योंकि वर्ण जब विभु और नित्य है, तब उनकी पौर्वापर्यरूप आनुपूर्वी का होना सम्भव नहीं और जब पूर्वी नहीं बनेगी तब पद - वाक्य आदि उनसे कैसे बन सकेंगे? शब्दों की नित्यता के बल पर वेद की नित्यता को यदि कहा जाय तो हम लोगों के वाक्यों को भी नित्य कहना होगा, क्योंकि हमलोगों के वाक्यों में स्थित शब्दों की भी नित्यता है हो । ' जहाँ बाकू और क्रिया न हो वहाँ उच्चारण और श्रवण भी नहीं होते ' अता तुम्हारे कथनानुसार भी निराकार के द्वारा उच्चारण किया जाना कभी सम्भव नहीं । ' नित्यस्तु स्याद् दर्शनस्य परार्थत्वात् ' - ( जै ० सू ० १११११८ ) इस जैमिनि सूत्र का उद्धरण देकर शब्द की नित्यता सिद्ध करने के लिये जो तुमने कहा है, वह भी ठीक नहीं है । उपर्युक्त सूत्र का अर्थ आपने इस प्रकार किया है--सूत्र में स्थित ' तु ' शब्द से अनित्यत्व की आशा का निवारण किया गया है । विनाशरहित होने से शब्द नित्य है, क्योंकि ' दर्शनस्य परार्थत्वात्'- उच्चारण का प्रयोजन ज्ञापन करना है, इसलिये शब्द कभी अनित्य नहीं है --- क्योंकि ' विनाशरहितत्वात् ' यह अंश सूत्र से सम्बद्ध नहीं है और व्यर्थ भी है, क्योंकि शब्द की प्रत्यभिशा से ही उसकी नित्यता सिद्ध हो जाती है । शङ्का --- शब्द की उत्पत्ति तो उच्चारण से होती है । शब्द यदि नित्य होता तो उसके उच्चारण करने की आवश्यकता ही क्योंहोती? समा ० --- - उपर्युक्त ! शङ्का का निराकरण ' शब्द नित्य ही है ' कहकर किया गया है । शब्द का उच्चारण, शब्द स्वरूप की उत्पत्ति के लिये नहीं है, अपि तु दूसरे को बोध कराने के लिये किया जाता है | अन्यथा ' दर्शनस्य उच्चारणस्य परस्य अर्थस्य ज्ञापनार्थत्वात् ' आपके इस वाक्य में आपके द्वारा सर्वत्र प्रयुक्त षष्ठी विभक्ति की सङ्गति कहीं भी नहीं बन सकेगी । इतने लम्बे चौड़े भाष्य करने की अपेक्षा ' दर्शनस्य उच्चारणस्य परं प्रति अर्थबोधकत्वात् ' इतना कहना ही उचित होता । इस आशय को शबरस्वामी ने भी स्पष्ट किया है ' दर्शनम् उच्चारणम्, तत् परार्थ परमर्थं प्रत्याययितुम् । उच्चारितमात्रे हि विनष्टे शब्दे न चान्योऽथं प्रत्याययितुं शक्नुयात्, अतो न परार्थमुच्चार्येत । अथ न विनष्टः, ततो बहुश उपलब्धत्वाद् अर्थावगम इति युक्तमिति । यह जो आपने कहा —- शब्द, अनित्य होता ही नहीं, अन्यथा ' गो ' शब्द का यह अर्थ है, यह अभिज्ञा अनित्य शब्द से कैसे हो सकती है? किन्तु शब्द के नित्य मानने पर शब्द और अर्थ में ' ज्ञाप्यज्ञापकभाव ' विद्यमान रहता है, जिससे उपर्युक्त अभिज्ञा का
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१२४ वेदार्थपारिजातः रुभयोरपि विद्यमानतायामतन्त्रत्वात् । ज्ञापकस्य शब्दस्य विद्यमानतायां तन्नित्यत्वस्य कारणत्वऽपि ज्ञाम्यस्यायस्य सत्ते तस्याकारणत्वात् । अत एवातीतानागतानामपि शब्दज्ञाप्यत्वं भवति । नित्यत्वे सति ज्ञाप्यज्ञापकभावोऽप्युपपद्यत इत्येव वक्तव्यम् । यच्च तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यमिति कणादमुनिसूत्रं शब्दनित्यत्वं साधयितुमुदाजहार ( पृ ० ३६ ), तत्पहासास्पदमेव, वैशेषिकैनैयायिकेश्च शब्दानित्यत्वाभ्युपगमात् । यच्चास्यायमर्थः -- तद्वचनात् तयोर्धर्मेश्वरयो-वचनाद् धर्मस्यैव कर्तव्यतया प्रतिपादनादीश्वरेणोक्तत्वादाम्नायस्य वेदचतुष्टयस्य प्रामाण्यं सर्वेनित्यत्वेन स्वीकार्यमिति ( पृ ० ३६ ), तत्तु धाष्टर्थ मेव, काणादेः शब्दानित्यत्वस्य सिद्धान्तितत्वात् । उपस्कारकृच्छङ्करमिश्ररीत्या तु तदित्यनुप-क्रान्तमपि प्रसिद्धिसिद्धतयेश्वरं परामृशति । यथा ' तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ' इति गोतमसूत्रे तदिति-पदेतानुपक्रान्तोऽपि वेदः परामृश्यते । तद्वचनात् तेनेश्वरेण वचनात् प्रणयनाद् आम्नायस्य वेदस्य प्रामाण्यम्, गुणवद्र-क्तकत्वेनैव तैर्वचनस्य प्रामाण्याभ्युपगमात् । यद्वा तदिति सन्निहितं धर्ममेव परामृशति । तथा च तस्य धर्मस्य वचनात् प्रतिपादनादाम्नायस्य वेदस्य प्रामाण्यम् । यद्धि वाक्यं प्रामाणिकमर्थं प्रतिपादयति तत्प्रमाणमेव यत इत्यर्थः । ईश्वरस्तदाप्तत्वं व साधयिष्यते, इत्यपि शङ्करमिश्राः । अत्रेश्वरोक्तत्वाद्वेदस्य प्रामाण्यमेव साधितम्, न वेदनित्यत्वम्, नित्यत्वबोधकपदाभावात् । न च शब्दो नित्यः, प्रामाण्यादिति प्रामाण्यहेतुनैव शब्द नित्यत्वसिद्ध्या वेदस्यापि परमेश्वरोक्तत्वात् प्रामाण्येन नित्यत्वं सेत्स्यतीति वाच्यम्, त्वद्रीत्या विप्रलम्भकवाक्ये हेतोः स्वरूपासिद्धत्वात् । पक्षे हेत्वभावस्यैव स्वरूपासिद्धत्वात् । वञ्चकवाक्यस्या-होना सुसंगत प्रतीत होता है- वह भी ठीक नहीं है । आपको यह समझना चाहिये कि शब्द का नित्यत्व और ज्ञाप्यज्ञापकत्व ये दोनों et fantar में प्रयोजक नहीं है । विद्यमानता में यद्यपि ज्ञापक शब्द की नित्यता कारण हो सकती है, तथापि ज्ञाप्य अर्थ की विद्यमानता में वह कारण नहीं है । इसीलिये अतीत -- अनागत अर्थ भी शब्द से ज्ञाप्य हो पाते हैं । अतः ' शब्द के नित्य रहने पर ज्ञाप्य-ज्ञापक भाव भी उत्पन्न हो जाता है -- यही आपको कहना चाहिये । शब्द की नित्यता सिद्ध करने के लिये कणादमुनि का सूत्र ' तद्वचनादान्नायस्य प्रामाण्यम् ' - ( क ० सू ० ) जो आपने प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है, वह तो उपहास के ही योग्य है, क्योंकि वैशेषिक और नैयायिकों ने तो शब्द को अनित्य माना है । ऊपर जो sire सुनि का सूत्र और उसका अर्थ किया गया है-- ' तद्वचनात् ' तयोः --- धर्म और ईश्वर इन दोनों में से ' वचनात् ' कर्तव्यरूप से धर्म का ही ' प्रतिपादनात् ' ईश्वर के द्वारा कथन करने से ' आम्नायस्य ' चारों वेदों को ' प्रामाण्यम् ' निरयरूप में स्वीकार सभी को करना चाहिये | इस प्रकार उद्धरण देकर उसका ऐसा अर्थ करना केवल घृष्टता ( दुःसाहस ) मात्र है । क्योंकि कणाद मुनि ने तो शब्द की after का सिद्धान्त स्थिर किया है । उपस्कारकार शङ्कर मिश्र की पद्धति से भी यद्यपि यहाँ ईश्वर का कोई प्रसङ्ग नहीं है, तथापि विश्व प्रसिद्धि से ही उसकी सत्ता सदा स्थिर होने से ' तत् ' शब्द के द्वारा उसी का परामर्श किया जाता है । जैसे - वेदप्रामाण्यमनृत-व्याघातपुनरुक्तदोषेम्य: ' इस गौतम सूत्र में ' तत् ' शब्द से वेद का उपक्रम न रहने पर भी उसका परामर्श किया गया है । ' तत्'-तेन ईश्वरेण उस ईश्वर के द्वारा ' वचनात् प्रणयन किया होने से ' आम्नायस्य ' वेदस्य वेद का प्रामाण्य है । नैयायिकों ने वेदों का प्रामाण्य गुणवान् वक्ता के द्वारा रचित होने से स्वीकार किया है । अथवा ' तत् ' शब्द से समीपस्थ ' धर्म ' का हो परामर्श किया गया है । उसी को बता रहे हैं- ' तस्य ' धर्मस्य - धर्म का ' वचनात् ' प्रतिपादन किया होने से ' आम्नायस्य ' वेदस्य = वेद का प्रामाण्य है । क्योंकि जो वाक्य प्रामाणिक अर्थ का प्रतिपादन करता है, वह प्रमाण हो माना जाता है, उसे कोई अप्रमाण नहीं कहता । ईश्वर और उसकी आप्तता को सिद्ध करेंगे इस प्रकार की व्याया भी शङ्कर मिश्र ने की है । यहाँ पर ईश्वरोक्त होने से वेदों का प्रमा हो बताया गया है, वेद का नित्यत्व नहीं, क्योंकि वह नित्यत्व का atre कोई पद नहीं है । यदि कोई यह तर्क करें कि- ' शब्दो नित्यः प्रामाण्यात् ' शब्द नित्य है, उसका प्रामाण्य होने से -- तो ' प्रामाण्य ' शब्द की free ता सिद्ध हो जाती है, उसी तरह वेद भी ईश्वर के द्वारा उक्त होने से उसका प्रामाण्य होने के कारण उसकी
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वेदार्थपारिजाता ५.२५ प्रमाणत्वेन तद्विरोधिप्रमाणत्वं तत्र न सम्भवत्येव । न च वचकवाक्यगताः शब्दा अनित्या आप्तवाक्यगताच नित्या इति स्थापनायां किञ्चिन्मानम् | ' सतो लिङ्गाभावात् नित्यवैधम्र्म्यात्, अनित्यश्चायं कारणतः, न चासिद्धं विकारात्, अभिव्यक्तौ दोषात् संयोगाद्विभागाच्च शब्दाच्च शब्दनिष्पत्तिः लिङ्गान्वानित्यः शब्दः ( २२१२६-३२ ) इमानि कणादसूत्राणि तु शब्दानित्यत्वमेव साधयन्ति । किरणावल्यादिभिरपि शब्दस्यानित्यत्वमेव साधितमितीहैवान्यत्र प्रपञ्चितम् | सत्यामप्येवं वास्तविक्या स्थिती दयानन्दः कणादमुनिनाम्ना शब्दनित्यत्वं साधयतोति सूत्रानभिज्ञानमूलक-मेवेति मन्तव्यम् । एतस्य यत्किचित्प्रलपनं साहसमात्रमेव । यच्च ' तथा स्वकीये न्यायशास्त्र गोतममुनिरण्यत्राह - ' मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्णमाप्तप्रामाण्यात् ' ( २।११६८ ) । अस्यायमर्थः -- तेषां वेदानां नित्यानामीश्वरोक्तानां प्रामाण्यं सर्वैः स्वीकार्यम् । इत्यादि ' ( पृ ० ३७ ), तदपि न्यायसिद्धान्तानभिज्ञानमूलकं साहसमेव, शब्दानित्यत्ववादिनां नये नित्यानामिति विशेषानुपपत्तेः । निरुक्तसूत्रे नित्यत्वबोधकपदाभावाच्च । यच्च ' कुत आप्तप्रामाण्यात् । धर्मात्मभिः कपटच्छ्लादिदोषरहितैर्दयालुभिः सत्योपदेष्टृभिर्विद्यापार-महायोगिभिः सर्वैर्ब्रह्मादिभिराप्तर्वेदानां प्रामाण्यं स्वीकृतम्, अतः ' ( पृ ० ३७ ) इति, तदप्यसङ्गतम्, आप्त ह्मादिभि-वेदानां प्रामाण्यं स्वीकृतमतो वेदानां प्रामाण्यमिति त्वदुक्तार्थस्याशुद्धत्वात् । न च वेदानां प्रामाण्यमाप्तरङ्गीकृतमतः, किन्त्वाप्तोपदेशत्वादेव वचनमात्रे प्रामाण्यम् । वेदाश्चाप्तोपदेशात्मका अत: प्रमाणम् | ' वेदाः प्रमाणम्, आप्तोपदेश-freear f सद्ध हो हो जायगी । किन्तु यह तर्क ठीक नहीं है । आपकी रीति से ही विप्रलंभक वाक्य में हेतु स्वरूपासिद्ध हो जाता है । पक्ष पर हेतु का न रहना ही उसकी स्वरूपासिद्धि है । जिस हेतु में ' स्वरूपासिद्धि ' नाम का दोष हो उस हेतु को असद्हेतु कहते हैं, उस असद हेतु से ' साध्य ' की सिद्धि नहीं हो पाती । वञ्चक के वाक्य में अप्रामाण्य ( प्रमाण न होने से उसके विरोधी ' प्रामाण्य ' का उसमें रहना कभी सम्भव नहीं हो सकता । यदि यह कहे कि वञ्चक के द्वारा उच्चारण किये गये वाक्य शब्द after हैं और आप्त के द्वारा उच्चारण किये गये वाक्य के शब्द नित्य हैं । किन्तु ऐसा सिद्धान्त बनाने में कोई प्रमाण नहीं है । क्योंकि ' सतो लिङ्गाभावात् नित्यवैधर्म्यात्, अतिस्यश्चार्य कारणतः न चाऽसिद्धं विकारात्, अभिव्यक्ती दोषात् संयोगाद्विभागाचच शब्दाच्च शब्दनिष्पत्तिः, लिङ्गाच्चा-नित्यःशब्द: - - ( क ० सू ० १२१२६-३२ ) ये काणाद सूत्र तो शब्द की अनित्यता को ही बताते हैं । किरणावली आदि ग्रन्थों में भी शब्द की अनित्यता को ही सिद्ध किया गया है, उसे हमने यहीं अन्यत्र बताया है । इस वास्तविक स्थिति के रहने पर भी दयानन्द स्वामी का कणाद मुनि के नाम पर शब्द की नित्यता सिद्ध करना कणाद सूत्रों की अनभिज्ञता को ही सिद्ध करता है । इस प्रकार असद्धान्तों का प्रलाप करना केवल साहस ही है । इसके अतिरिक्त जो यह कहा है- ' तथा स्वकीये न्यायशास्त्रे गोतम मुनिरप्यत्राह - ' मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्य-माप्तप्रामाण्यात् ' ( २११।६८ ) इसका अर्थ इस प्रकार किया है — ' ईश्वरोक, नित्य उन वेदों का प्रामाण्य सबको स्वीकार करना चाहिये । ' वह कथन भी न्याय दर्शन के सिद्धान्तों का ज्ञान न होने के कारण ही है । दर्शन के सिद्धान्त का ज्ञान न रखते हुए भी स्वकपोल-कल्पित प्रलाप को ही किसी दर्शन के सिद्धान्त के नाम पर कह देना साहसमात्र है | शब्द को अनित्य मानने वालों के पक्ष में दया-मन्दोक्त ' नित्यानाम् ' इस विशेष को उपपत्ति नहीं लगेगी और उक्त गोतमसूत्र में frerea का बोधक कोई पद भी नहीं है । जो यह कहा है- ' कुत श्राप्तप्रामाण्यात् । धर्मात्मभिः कपटच्छलादिदोषरहितै दयालुभिः सत्योपदेष्टुभि विद्यापारोहा-योगिभिः सर्वैर्ब्रह्मादिभिराप्तैर्वेदानां प्रामाण्यं स्वीकृतम्, अतः / क्यों? आप्तप्रामाण्य होने से । कपट, छल आदि दोषों से रहित, fear, दयालु, सत्य का उपदेश करने वाले, विद्या के पारंगत, महान योगी, ब्रह्मा आदि समस्त आप्तों के द्वारा वेदों का प्रामाण्य स्वीकार किया गया है, इस कारण । ' वह भी संगत नहीं है । ब्रह्मा आदि वाप्तों में वेदों का प्रामाण्य स्वीकार किया है, इसलिये वेदों को प्रमाण माना जाता है । इस प्रकार अर्थ करना नितान्त अशुद्ध है, क्योंकि वेदों का प्रामाण्य बाप्तों ने स्वीकार नहीं किया है, किन्तु आप्तों ने उसका उपदेश किया है, उनके उपदेश करने के कारण ही उसके वचन मात्र ( शब्द मात्र ) प्रमाण माने गये हैं । अर्थात् वेद आप्तोपदेश रूप होने से प्रमाण कहे जाते हैं । वेद के प्रामाण्य से वेदाः प्रमाणम्, आप्तोपदेशत्वात्, मन्त्रायुर्वेदवत् ' यह अनुमान हो
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५३६ वेदार्थ पारिजातः त्वात् मन्त्रायुर्वेदवत् ' इत्यनुमानमेव वेदप्रामाण्ये प्रमाणम् । तदेव स्पष्टयति वात्स्यायनो मुनि: -- ' आप्ताः खलु साक्षात्कृतधर्माण: हन्त वयमेतेभ्यो यथादर्शनं यथाभूतमुपदिशामस्त इमे श्रुत्वा प्रतिपद्यमाना हेयं हास्यन्त्यधिगन्तव्य-मधिगमिष्यन्ति इत्येवमाप्तोपदेशः प्रमाणम्, एवमाप्ताः प्रमाणम् ' इति । तस्मात् सूत्रभाष्योभयविरुद्धमेव दयानन्दीयं व्याख्यानम् । यदपिच-- - " किंवत्, मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवत् यथा सत्यपदार्थविद्याप्रकाशकानां मन्त्राणां विचाराणां सत्यत्वेन प्रामाण्यं भवति यथा चायुर्वेदोक्तस्यैकदेशोक्त्योषधसेवनेन रोगनिवृत्या तद्भिन्नस्यापि भागस्य तादृशस्य प्रामाण्यं भवति, तथा वेदोक्तार्थस्यैकदेशप्रत्यक्षेणेतरस्यादृष्टार्थविषयस्य वेदभागस्यापि प्रामाण्यमङ्गीकार्यम् ' ( पृ ० ३७ ) इति, तदप्यसङ्गतम्, यतस्त्वया सत्यत्वेन हेतुना वेदानां प्रामाण्यमित्यापादि । तथा च सत्यत्वसिद्धी प्रामाण्यसिद्धिः, प्रामाण्यसिद्धया च सत्यत्वमिति कुतो नान्योन्याश्रया? किञ्च मन्त्राणामित्यस्य विचाराणामिति कथमर्थः? भाष्यविरोधश्च । किञ्च त्वद्रीत्या मन्त्रायुर्वेदवदित्युदाहरणं निरर्थकमेव । यतो मन्त्रायुर्वेदेष्वेकदेशोक्तार्थस्य प्रामाण्यदर्शनेन तद्धिनभागस्य स्थालीपुलाकन्यायेनैव प्रामाण्यं भवति, स्थालीगत पुलाकान्तराणामिव भागान्तरस्यापि प्रत्यक्षार्हृत्वात् । न च वेदे तथा सम्भवति, वेदोक्तार्थस्यैकदेशप्रत्यक्षवद् अदृष्टार्थविषयस्य वेदभागस्य प्रत्यक्षत्वासम्भवात् । प्रमाण हैं । इसी आशय को वात्स्यायन मुनि ने स्पष्ट किया है । - ' आप्ताः खलु साक्षात्कृतधर्माणः । हन्त वयमेतेभ्यो यथादर्शनं यथाभूतमुप-दिशामस्त इमे श्रुत्वा प्रतिपद्यमाना हेयं हास्यन्ति, अधिगन्तव्यमधिगमिष्यन्ति इत्येवमाप्तोपदेशः प्रमाणम्, एवमाप्ताः प्रमाणम् ' -' आत ' उन्हें कहा जाता है, जिन्होंने धर्म का साक्षात्कार ( अनुभव ) किया हो, वे आप्त अपना हर्ष व्यक्त करते हुए कहते हैं - हम अपनी इन सन्तानों को अपने अनुभव के अनुसार यथाभूत ( ठीक ठीक ) ज्ञान का उपदेश देते हैं, इन उपदेशों को सुनकर और उसे अच्छी तरह समझकर उसमें जो त्याज्य ( अग्राह्य ) मालूम हो उसे त्याग दें ( ग्रहण न करें ) और जो ग्राह्य मालूम पड़े उसे ग्रहण करें, इस प्रकार का आप्तोपदेश प्रमाण माना जाता है, इसलिये जाप्तों को प्रामाणिक कहते हैं । तात्पर्य यह है कि ऋषियों ने अपने उपदेश ar किसी पर aara a हीं डाला है, किन्तु सबके समक्ष अपने अनुभव को उपस्थित कर दिया है, उसमें से अपनी सदसद्विवेकनी बुद्धि से अच्छी तरह विचार कर जो उचित समझो, उसे अपनाओ और जिसे उचित न समझो, उसे मत अपनाओ । इस प्रकार स्पष्ट कहने वाले के अतिरिक्त और कौन दूसरा प्रामाणिक कहलाने योग्य हो सकता है । अत: दयानन्द का व्याख्यान, सूत्र तथा भाष्य दोनों के विरुद्ध होने से उसे प्रामाणिक नहीं कह सकते । यह जो दयानन्द स्वामी ने कहा है- ' किंवत् मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवत् यथा सत्यपदार्थविद्याप्रकाशका मन्त्राणां विचाराणां सत्यत्वेन प्रामाण्यं भवति । यथा वायुर्वेदोक्तस्यैकदेशोक्त्योषधसेवनेन रोगनिवृत्त्या तद्भिन्नस्यापि विभागस्य तादृशस्य प्रामाण्यं भवति, तथा वेदोक्तार्थस्यैकदेशप्रत्यक्षेणेतरस्यादृष्टार्थविषयस्य वेदभागस्यापि प्रामाण्यमङ्गीकार्यम् ' इति । = वेद का प्रामाण्य किस प्रकार है? उत्तर में कहा --मन्त्र और आयुर्वेद के प्रामाण्य की तरह । जैसे सत्य पदार्थ के ज्ञान कराने वाले मंत्रों का प्रामाण्य इसलिये होता हैं कि उनके विचार नितान्त सत्य हैं, अथवा जैसे- आयुर्वेद के किसी विभाग में बताई गई औषधि के सेवन से रोग की निवृत्ति होती देखी जाती है, अतः उसके अतिरिक्त औषधि प्रतिपादक भाग को भी प्रामाणिक माना जाता है । उसी तरह वेदोक्त अर्थ के एकदेश के प्रत्यक्ष कर लेने से उससे भिन्न अदृष्टार्थविषय वाले वेद भाग का प्रामाण्य भी स्वीकार कर लेना चाहिये । स्वामी दयानन्द का उपर्युक्त ser भी ठीक नहीं है, क्योंकि दयानन्द ने ' सत्यत्व ' को हेतु बताकर वेद का प्रामाण्य सिद्ध करने की चेष्टा की है । किन्तु इस रीति से वेद का प्रामाण्य यदि सिद्ध किया जाय, तो ' अन्योन्याश्रय ' दोष का सामना करना पड़ेगा, वे नहीं समझ पाये । क्योंकि – सत्यत्व के सिद्ध होने पर प्रामाण्य को सिद्ध किया जा सकेगा और प्रामाण्य के सिद्ध होने पर terer की सिद्धि हो सकेगी । इस प्रकार ' अन्योन्याश्रय ' दोष होगा । दूसरी बात यह भी है कि ' मंत्राणाम् ' का अर्थ ' विचाराणाम् ' अर्थात् मंत्र का विचार अर्थ कैसे हो सकता है? ऐसा अर्थ करने पर भाष्य से विरोध होगा । fear - स्वामी दयानन्द ने जो ' मंत्रायुर्वेदवत् ' यह उदाहरण दिया है, वह व्यर्थ ही है । क्योंकि मंत्र तथा आयुर्वेद एकदेश में उक्त अर्थ का प्रामाण्य देखकर उनके अन्य भाग का भी प्रामाण्य स्थालीपुलाक न्याय से ही कहना होगा । जैसे- स्थाली के
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वैवार्थपारिजाता ५२७ किञ्च, career कस्य वेदोक्तार्थस्य प्रत्यक्षता? न च चित्रा- कारीर्यादिकर्मणां प्रत्यक्ष फलकत्वेन तद्बोधकवेदभागस्य प्रत्यक्षार्थता, तेषां त्वदभिमतेषु मन्त्ररूपेषु वेदेषु विधानाभावात् । नापि कश्चिददृष्टार्थको वेदभाग-स्त्वन्मते, अग्निहोत्रादीनामपि वायुशुद्धिरूपदृष्टफलाङ्गीकारात् । त्वदुद्धृतं वात्स्यायनभाष्यं तु नायुर्वेदोक्तस्यैकदेशो-तौषधसेवनेन रोगनिवृत्त्या तद्भिन्नभागस्य तादृशस्य प्रामाण्यवद् वेदोक्तार्थस्य एकदेशप्रत्यक्षेणेतरस्यादृष्टार्थविषयस्य वेदभागस्य प्रामाण्यं वक्ति । किन्तु य एवाप्ता वेदार्थानां द्रष्टारः प्रवक्तारश्च त एवायुर्वेदप्रभृतीनां द्रष्टारः प्रवकार इत्यायुर्वेदप्रामाण्यवद् वेदप्रामाण्यमनुमातव्यम् । ये वेदानां द्रष्टारः प्रवक्तारश्च त एवायुर्वेदस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च । आयुर्वेदस्य च फलसंवादित्वेन सर्वैरभ्युपेयत एव प्रामाण्यम्, तथैव वेदानामपि प्रामाण्यमनुमेयम्, द्रष्टृ - प्रवक्त " सामान्यात् । मन्त्रायुर्वेदत्रिषये यदीयवचनानां सर्वथापि प्रामाण्यं दृष्टम्, तद्दृष्ट - प्रोक्तवेदानामपि प्रामाण्यमङ्गीकार्य द्रष्टृप्रवक्त सामान्यात् । वेदानां नित्यत्वसाधनप्रसङ्गे प्रामाण्यसाधनमत्रकृतप्रक्रिया | सत्यत्वेन वेदप्रामाण्यसिद्धौ ब्रह्मादिभिः स्वीकृतत्वादेव वेदानां प्रामाण्यमित्युपक्रमोपसंहारविरोधश्च दयानन्दीयवचनेषु स्पष्ट एव । कतिपय पुलाक ( चावल कण ) के समान, उसके अन्य पुलाक भी प्रत्यक्ष करने योग्य रहते हैं, किन्तु वेदों में वैसा होना संभव नहीं, क्योंकि वेदोक्त अर्थ का एकदेश जैसा प्रत्यक्ष है, वैसे वेद का अदृष्टार्थ विषयक अन्य भाग प्रत्यक्ष होना संभव नहीं । किञ्च -स्वामी दयानन्द ही बतायें कि उनकी अपनी पद्धति से चित्रेष्टि, कारीरीष्टि के बोषक वेदार्थ की प्रत्यक्षता है, यह नहीं कह सकोगे, विधियाँ तो होती ही नहीं । जिसमें विधियाँ होती हैं उस ' ब्राह्मण ' भाग को अदृष्ट फल तो है ही नहीं । अग्निहोत्रादि कर्मों का भी वायुशुद्धिरूप दृष्ट फल ही दृष्टार्थक कह नहीं सकते । आपने जो वात्स्यायन भाष्य का उद्धरण प्रस्तुत किया है, सिद्ध नहीं हो पा रहा है । वात्स्यायन भाष्य का औषधियों के सेवन से रोग ही कौन सा वेदार्थ प्रत्यक्ष है? प्रत्यक्ष फल वाली क्योंकि आपका वेद तो केवल ' मन्त्र रूप ' है, उसमें आप वेद मानते नहीं | आपके मन में कोई भी वेदार्थ आपने माना है । यतः आप किसी भी वेदार्थ को उससे भी अदृष्टार्थविषयक वेद भाग का प्रामाण्य उद्धरण प्रस्तुत कर आपने यह कहा था कि आयुर्वेद के किसी भाग में कही गई निवृत्ति होती देखकर आयुर्वेद के उस भाग को जैसे प्रमाण माना जाता है, उसी तरह आयुर्वेद के अन्य भाग में भी प्रामाण्य मान लिया जाता है । ठीक उसी प्रकार से वेदार्थ के एकदेश के प्रत्यक्ष हो पाने से, प्रत्यक्ष न होने वाले अन्य वेदार्थ को भी प्रमाण माना जा सकता है । किन्तु आपका यह अभिमत वात्स्यायन भाष्य से सिद्ध नहीं हो पा रहा है । आपके द्वारा उद्धृत किया हुआ वात्स्यायन भाष्य तो यह कह रहा है कि जो आाप्त वेदार्थो के द्रष्टा तथा प्रवक्ता हैं, वे ही आयुर्वेदादि के भी द्वष्टा और प्रवक्ता हैं, इस कारण से आयुर्वेद के प्रामाण्य के समान वेद के प्रामाण्य का भी अनुमान कर लेना चाहिये । जो वेदों के द्रष्टा और प्रवक्ता हैं, वे ही आयुर्वेद के द्रष्टा और प्रवक्ता हैं । आयुर्वेद में फल संवादिता होने से अर्थात् आयुर्वेद का फल प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ने से सभी की उस आयुर्वेद में प्रमाण बुद्धि होती है, उसी तरह वेदों में भी प्रमाण बुद्धि होनी चाहिये, क्योंकि आयुर्वेद और वेद दोनों के द्रष्टा और प्रवक्ता एक ही हैं । मंत्र और आयुर्वेद के विषय में जिनके वचन ( वाक्य ) पूर्ण रूप से प्रमाण माने गये हैं, उसी तरह दर्शन किये गये या प्रवचन किये गये वेदों के वाक्यों को भी पूर्ण रूप से प्रमाण मानना चाहिये, क्योंकि दोनों के द्रष्टा और प्रवक्ता free fee नहीं हैं, अपि तु एक ही हैं । स्वामी दयानन्द के प्रतिपादित वचनों में उपक्रम - उपसंहार का विशेष भी स्पष्ट दिखाई देता है । उसी तरह प्रकृत ( प्रारंभ ) कुछ और है, प्रतिपादन कुछ और ही है । जैसे- प्रसंग ( प्रकृत ) तो है वेदों के frerea को सिद्ध करने का और करने लगे प्रामाण्य का साधन, अतः यह ' अप्रकृत प्रक्रिया ' नाम का दोष है, जो ' विनायकं प्रकुर्वाणो रचयामास वानरम् ' की उक्ति को चरितार्थ कर रहा है । उपक्रम ( प्रारम्भ ) तो यह किया कि ' सत्यत्व ' हेतु से वेदों का प्रामाण्य होता है और उपसंहार में बता रहे हैं कि ब्रह्मादिकों से स्वीकृत होने से वेदों का प्रामाण्य है, अतः स्पष्ट है कि उपक्रम कुछ है और उपसंहार कुछ और ही है । उपक्रम और उपसंहार दोनों में एकता होनी चाहिये ।
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वेदार्थपारिजातः यच्चैतत्सूत्रस्योपरि भाष्यकारेण वात्स्यायनमुनिनाप्येवं प्रतिपादितमित्युक्त्वा द्रष्टृप्रवक्तसामान्याच्चानु-मानमिति प्रसङ्गे नित्यत्वाद्वेदवाक्यानां प्रमाणत्वे तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यादित्युक्तम् ( पृ ० ३७ ) इति वात्स्यायन-सिद्धान्ततयोद्धृतम्, तत्तु कपटपाटवमज्ञानविजृम्भितं वा पूर्वपक्षवाक्यस्योत्तरपक्षत्वेनोपन्यासात् इत्ययुक्तमिति स्थान इत्युक्तमिति विपरीतोपन्यासाच्च । तत्र हि मीमांसकमतेन वेदवाक्यानां नित्यत्वादेव प्रामाण्यं न त्वाप्तप्रामाण्यादित्या-शक्य तस्यायुक्तत्वं प्रतिपाद्य तत्रैवोत्तरग्रन्थेनोपपत्ति प्रदर्शयति वात्स्यायनमुनिः । शब्दस्य वाचकत्वादर्थप्रतिपत्तौ प्रमाणत्वं न नित्यत्वात् । नित्यत्वे हि सर्वस्यैव सर्वेण वचनाच्छन्दार्थव्यवस्थानुपपत्तिः । नानित्यत्वे वाचकत्वमिति चेन्न, अनाप्तोपदेशादर्थविसंवादोऽनुपपन्नः । नित्यत्वाद्धि शब्दः प्रमाणमिति । अनित्यः स इति चेत्, अविशेषवचनम् । अनाप्तोपदेशो लौकिको न नित्य इति कारणं वाच्यमिति । यथानियोगं चार्थस्य प्रत्यायनाय नामधेयशब्दानां लोके प्रामाण्यम् । नित्यत्वात् प्रामाण्यानुपपत्तिः । यत्रार्थे नामधेयशब्दो नियुज्यते लोके तस्य नियोगसामर्थ्यात् स प्रत्यायका भवति, न नित्यत्वात् । एवमाप्तोक्तत्वाच्छन्दस्य प्रामाण्यम्, तत्त्वादेव वेदानां प्रमाणता । वेदानां नित्यत्वं तु सम्प्रदायप्रयोगाभ्यासाविच्छेदादेव, न शब्दस्य नित्यत्वादिति । न्यायवात्तिकेऽपि पौरुषेयत्वमसिद्धं नित्यत्वादिति चेत्, अथ मन्यसे नित्यानि वेदवाक्यानि नित्यत्वान्चेषां प्रामाण्यम् तस्मात् पौरुषेयत्वमसिद्धम्, न असिद्धत्वात् । सिद्धे नित्यत्व एतद्युक्तम्, तत्तु न सिद्धमतो न युक्तमेतत् । इसके अतिरिक्त और भी इस सूत्र पर भाष्यकार वात्स्यायन मुनि ने भी इसी प्रकार कहा है, यह कहकर ' द्रष्टृप्रवक्त-सामान्याच्चानुमानम् ' इस प्रसङ्ग में ' नित्यत्वाद् वेदवाक्यानां प्रमाणत्वे तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्याद् इत्युक्तम् ' इस वाक्यांश को वात्स्यायन सिद्धान्त के नाम पर उद्धृत करना तो स्वामी दयानन्द का केवल कपट पाटव ही है, या उन्होंने अपना अज्ञान प्रकाशित किया है, क्योंकि पूर्वपक्ष के वाक्य को स्वामी दयानन्द ने उत्तरपक्ष समझकर उसका उपन्यास किया है । तथा वात्स्यायन सिद्धान्त के नाम पर उद्धृत किये हुए उपर्युक्त वाक्य में वस्तुतः ' इत्ययुक्तम् ' है, किन्तु स्वामी दयानन्द ने वास्तविक पाठ को अपनी अज्ञता के कारण अशुद्ध समझकर ' इत्युक्तम् ' लिख दिया । वात्स्यायन मुनि ने तो उस प्रसङ्ग में मीमांसकों की दृष्टि से वेद वाक्यों का प्रामाण्य तो उनके नित्य होने से ही है, आप्त की प्रामाणिकता से नहीं । इस प्रकार आशङ्का कर ( मीमांसकों के कथन की अयुक्तता बताकर ) अग्रिम ग्रन्थ से उसकी अयुक्तता का उपपादन वात्स्यायन मुनि ने किया है । अर्थ ज्ञान होने में शब्द को जो प्रमाण माना जाता है, यह उसके वाचक होने के कारण माना जाता है, शब्द के नित्य होने के कारण नहीं । नित्य होने के कारण यदि शब्द को प्रमाण माना जाय तो सभी अर्थ सभी शब्दों से प्रतिपादित होने के कारण किस शब्द का कौन सा अर्थ है, यह ज्ञात न हो सकेगा, तब शब्दार्थ व्यवस्था की उपपति नहीं बन पायेगी | इसलिये ( वाच्यवाचकभाव रूप शब्दार्थ व्यवस्था की उपपत्ति के लिये ) यदि शब्द को अनित्य माना जाय, तो वह भी ठीक नहीं होगा | अर्थ की विसंवादिता अनाप्त के उपदेश ( कथन ) से बन ही जाती है । अतः शब्द अपनी नित्यता के कारण ही प्रमाण है । शब्द को अनित्य मानने में कोई कारण नहीं है । अनाप्तोपदेश लौकिक है, वह नित्य नहीं है, इस कथन में कोई कारण ( हेतु ) प्रदर्शित करना होगा, कारण प्रदर्शन के बिना प्रतिज्ञामात्र से कोई बात मानी नहीं जाती । यथानियोग अर्थ का बोध कराने के लिये संज्ञा ( नामधेय ) शब्दों का लोक व्यवहार में प्रामाण्य देखा जाता है । शब्द की यदि नित्य मानेंगे तो प्रामाण्य की उपपत्ति नहीं हो सकेगी । जिस अर्थ में संज्ञा शब्द की नियुक्ति की जाती है, उसी का वह शब्द नियोग के कारण लोक में बोधक हुआ करता है । नित्य होने के कारण वह अर्थ का बोधक होता है, सो नहीं । इसी प्रकार आप्तोच्चरित होने से शब्द में प्रामाण्य हुआ करता है, अतः आप्तोच्चरित होने से वेद में भी प्रामाण्य हैं और वेद की नित्यता तो उसके सम्प्रदाय और उसके अनुष्ठानाभ्यास का विच्छेद न होने के कारण ही है, शब्द की नित्यता के कारण नहीं । न्यायवार्त्तिक में भी-- ' पौरुषेयत्वम् असिद्धं नित्यत्यात् इति चेत् ' ऐसा प्रारम्भ करके ' सम्प्रदायाविच्छेदा शित्यत्वोपचारः ' कह कर उपसंहार किया है । अर्थात् वेद वाक्यों को नित्य माना गया है और उनके नित्य होने से ही उनमें प्रामाण्य रहता है, इसलिये उन्हें पौरुषेय नहीं कहा जा सकता, अर्थात् उनकी पौरुषेयता असिद्ध है । किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि जिस ' नित्यत्व ' हेतु से को सिद्ध करने की चेष्टा की जा रही है, वह हेतु ही स्वयं ' असिद्ध ' है । नित्यत्व हेतु की सिद्धि जब हो जाय, तब उपर्युक्त कथन
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वैवार्थपारिजाता I यदि न नित्यानि कथं प्रमाणानि? प्रमेयप्रतिपादकत्वात्, न नित्यत्वात् । उपसंहारे च सम्प्रदायाविच्छेदान्नित्यत्वोपचार इत्युक्तम् । तस्मान्न्यायरीत्या वेदानां नित्यत्वप्रतिपादनं दयानन्दस्य छद्मपूर्णाष्ट्यमेव । यदुक्तम्- ' पतञ्जलिमुनिरप्याह - ' स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ' ( १११६ ) । यः पूर्वेषा सृष्ट्यादावुत्पन्नानामग्न्यादीनां प्राचीनानामस्मदादीनां भविष्यतां च सर्वेषां गुरुः, तदुक्तत्वाद्वेदानामपि सत्यार्थवत्त्व-नित्यत्वे वेद्ये ' ( पृ ० ३८ ) इति, तदपि न युक्तम्, वेदनित्यत्वप्रक्रमे ईश्वरनित्यत्वसाधनस्य प्रकरणविरुद्धत्वात । योगशास्त्रे ' क्लेश - कर्म विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ' इतीश्वरस्वरूपं तस्य निरतिशयसार्वश्यं चोपपाद्य पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदादिति तस्य सार्वकालिकत्वं सर्वगुरुत्वं चोपपादितम् । नात्र सूत्रे वेदनित्यत्वप्रतिपादन-मुक्तम्, गृणाति तत्त्वं योगं योगोपायं चेति गुरुरिति व्युत्पत्तेरेव प्रकृतोपयोगित्वात् । अत एव योगभाष्यकारेण वेदचर्चा कृता । दयानन्दोद्धृतसूत्रे ' स ' ' एष ' इति पदद्वयं च न सूत्राङ्गम्, तस्य सूत्रोत्थानिकारूपत्वात् । यच्च ' एवमेव स्वकीये सांख्यशास्त्रे पञ्चमाध्याये कपिलाचार्योऽप्याह -- ' निजशक्त्यभिव्यक्तेः स्वतः प्रामाण्यमिति । अस्यायमर्थ: -वेदानां निजशक्त्यभिव्यक्तेः पुरुषसहचारिप्रधानसामर्थ्यात् प्रकटत्वात् स्वतः प्रामाण्य-नित्यत्वे स्वीकार्ये ' ( पृ ० ३८ ) इति, तदपि न विचारसहम्, नित्यत्वस्यासौत्रत्वात् । अत एव तत्र विज्ञानभिक्षुणोक्तम्-' नन्वेवं यथार्थवाक्यार्थज्ञानपूर्वकत्वात् शुकवाक्यस्येव वेदानामपि प्रामाण्यं न स्यात्, तत्राह - निजशक्त्यभिव्यक्तेः स्वतः प्रामाण्यम् । प्रामाण्याशङ्कायां सूत्रस्योत्थानात् तत्प्रतिपादन एवं सूत्रसार्थक्यात् । अत्रापि वेदानां नित्यत्व-को संगत कहा जा सकेगा, किन्तु नित्यत्व ही अभी सिद्ध नहीं हो पा रहा है । अतः नित्यत्व के बल पर जो कुछ कहा गया है, वह ठीक नहीं है । यदि शब्द को नित्य न कहेंगे तो उसे प्रमाण कैसे कहा जायगा? इसका उत्तर तो यह है कि उसे नित्य होने के कारण प्रमाण नहीं माना जाता, अपितु प्रमेय का प्रतिपादक होने से प्रमाण माना जाता है । अविच्छिन्न सम्प्रदाय के कारण उसमें नित्यत्व का व्यवहार औपचारिक रूप से किया जाता है, ऐसा उपसंहार में कहा गया है । अतः न्यायशास्त्र की पद्धति से वेदों की नित्यता का प्रतिपादन करना तो स्वामी दयानन्द की धृष्टता तथा छद्मपूर्ण खेल ही है । उसी तरह वेद की सत्यता और नित्यता में पतन्जलि मुनि का जो उद्धरण दिया है, वह भी ठीक नहीं है । स्वामी दयानन्द लिखते हैं- ' पतञ्जलिमुनिरप्याह स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनाऽनवच्छेदात् ' - ( यो ० सू ० १११६ ) यः जो, पूर्वेषां सृष्ट्यादौ उत्पन्नानाम् सृष्टि के आदि में उत्पन्न हुए, अग्न्यादीनां प्राचीनानां अग्नि आदि प्राचीनों के, तथा अस्मदादीनां भविष्यतां च सर्वेषाम् आगे उत्पन्न होने वाले हम जैसे सभी का, गुरुः- गुरु है, तदुक्तत्वात् = उसके द्वारा उक्त होने से, वेदानामपि वेदों को भी, सत्यार्थ-वस्वनित्यत्वे सत्यार्थपरिपूर्णता एवं नित्यता, वेद्ये = जाननी चाहिये । उपर्युक्त उद्धरण के अनौचित्य को देखिये- स्वामी दयानन्द ने उपक्रम ( प्रारम्भ ) तो वेद की मित्यता के प्रतिपादन से किया है, किन्तु सिद्ध करने लगे ईश्वर की नित्यता, अतः यह प्रतिपादन प्रकरण-विरुद्ध हो गया है । योगशास्त्र में ' क्लेश - कर्म विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः - ( यो ० सू ० ) इस सूत्र में ईश्वर का स्वरूप और उसकी निरतिशय सर्वज्ञता का उपपादन कर ' पूर्वेषामपि गुरुः कालेनाऽनवच्छेदात् ' -- - इस सुत्रांश से उसकी सार्वकालिकता और सर्वगुरुता का उपपादन किया गया है । वेद की नित्यता का प्रतिपादन इस सूत्र से नहीं किया गया है । ' गृणाति तत्त्वं योगं योगोपायं चेति गुरुः ' गुरु शब्द की यही व्युत्पत्ति प्रकृत में उपयुक्त है । यही कारण है कि योग भाष्यकार ने वेद की चर्चा की है । स्वामी दयानन्द ने उद्धृत किये योगसूत्र में ' स ' ' एव ' ये दो पद पतञ्जलि के योगसूत्र में अङ्गभूत नहीं । वे पद तो सूत्र की उत्थानिका के रूप में हैं । इसी प्रकार सांख्यशास्त्र की अपनी पुस्तक के पांचवें अध्याय में कपिलाचार्य के नाम पर वेद के स्वतः श्रामाण्य और उ ent freear का उल्लेख किया गया है, वह भी विचार की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा है । स्वामी दयानन्द लिखते हैं कि कपिलाचार्य ने भी कहा है -- ' निजशक्त्यभिव्यक्तः स्वतः प्रामाण्यमिति । इसका अर्थ यह है कि --- निज शक्ति से अभिव्यक्त होने के कारण अर्थात् पुरुष में रहने वाली प्रधान शक्ति के प्रकट होने से वेदों का स्वतः प्रामाण्य और उनकी नित्यता स्वीकार करनी चाहिये | किन्तु यह अर्थ विचार की कसौटी पर इसलिये नहीं उतर पाता कि ' नित्यत्व ' का सूत्र के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । यही कारण है कि विज्ञानभिक्षु ने यहाँ पर इस प्रकार अवतरणिका दी है- शुकवाक्य की प्रामाणिकता यथार्थं वाक्यार्थज्ञानपूर्वक होने से जैसे नहीं मानी जाती, ६७
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५३० वेदार्थपारिजातः प्रतिपादकं किञ्चिदपि पदं नास्त्येव । न च निजशक्त्यभिव्यक्तेस्तन्नित्यत्वसिद्धिः, सवस्थव जगतस्तदीयनिजशक्त्य-भिव्यक्त्या त्वद्रीत्या नित्यत्वापातात् । विज्ञानभिक्षुरीत्यापि वेदानां निजा स्वाभाविकी या यथार्थज्ञानजननशक्ति-स्वस्था मन्त्रायुर्वेदादावभिव्यक्तेरुपलम्भादखिलवेदानामेवं स्वत एव प्रामाण्यं सिद्धयति न वक्तृयथार्थज्ञानमूल-स्वादित्यर्थः । तथा च न्यायसूत्रम् -'मन्त्रायुर्वेदवच्च तत्प्रामाण्यम् ' | नेतावदेव नापीरुषेयत्वान्नित्यत्वमङ्कुरादिवदिति कपिलसूत्रेऽपौरुषेयत्वान्नित्यत्वमाशङ्क्याङ्कुरादिदृष्टान्तेन नित्यत्वं प्रतिषिद्धमेव । तथा च कपिलसूत्रेण वेदनित्यत्वप्रतिपादनं प्राकृतजनप्रतारणमात्रमेव । ' अस्मिन् विषये स्वकीयवेदान्तशास्त्रे कृष्णद्वैपायनो व्यासमुनिरप्याह -- ' शास्त्रयोनित्वात् ' ( १ | १ | १३ ) । अस्यायमर्थः — ऋग्वेदादेः शात्रस्यानेक विद्यास्थानोपबं हितस्य प्रदीपवत् सर्वार्थावद्योतनः सर्वज्ञकल्पस्य योनिः कारणं ब्रह्म । नहीदृशस्य शास्त्रस्य वेदादिलक्षणस्य सर्वज्ञगुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः सम्भवोऽस्ति । यद्यद्विस्तरार्थं शास्त्रं यस्मात्पुरुषविशेषात् सम्भवति, यथा व्याकरणादिपाणिन्यादेज्ञेयैकदेशार्थमपि स ततोऽप्यधिकतर विज्ञान इति प्रसिद्ध लोके । किमु वक्तव्यम् ' ( पृ ० ३ ९ ) इति । इदं वचनं शङ्कराचार्येणास्य सूत्रस्योपरि स्वकीयव्याख्याने गदितम् । अतः किमागतम् - सर्वज्ञस्येश्वरस्य शास्त्रमपि नित्यं सर्वार्थज्ञानयुक्तं च भवितुमर्हति तदपि न सङ्गतम्, सूत्रस्यास्य ऋग्वेदादिलक्षणस्य शास्त्रस्य ब्रह्मकारणकत्वेन वेदकारणत्वेन परमेश्वरसार्वश्यसिद्धिपर्यवसायित्वेन वेदनित्यत्वा-प्रतिपादनात् उत्पत्तिमतः कस्यापि नित्यत्वानुपपतेश्च । वैसे ही वेद वाक्य की भी प्रामाणिकता नहीं मानी जायगी, ऐसी आशङ्का होने पर सांख्यसूत्रकार ने उत्तर दिया ' निजशक्त्यभिव्यक्तः स्वतः प्रामाण्यम् ' । अर्थात् वेद के प्रामाण्य में जब आशङ्का उत्पन्न हुई, तब उस आशङ्का को दूर करने के लिये उक्त सूत्र कहा गया है, अतः वेदप्रामाण्य के प्रतिपादन में हो सूत्र की सार्थकता सिद्ध हो पाती है । यहीं पर वेदों की नित्यता का प्रतिपादक कोई भी शब्द नहीं है और न ही निजशक्ति की अभिव्यक्ति से उसके नित्यत्व की सिद्धि हो हो पा रही है, क्योंकि समस्त जगत् ही उसकी अपनी शक्ति से ही अभिव्यक्त हुआ है, अतः आपकी पद्धति से उसे भी नित्य कहना होगा | विज्ञानभिक्षु की पद्धति से भी वेदों की अपनी स्वाभाविक जो यथार्थज्ञानजनन शक्ति, उसकी उपलब्धि मन्त्र - आयुर्वेद आदि में होने से समस्त वेदों का स्वतः प्रामाण्य, अर्थात् स्वभावतः ही प्रामाण्य सिद्ध हो जाता है, वक्ता के यथार्थ ज्ञान के कारण नहीं | इसो अभिप्राय को न्यायसूत्रकार ने - ' मन्त्रायुर्वेदवच्च तत्प्रामाण्यम् ' ( न्या ० सू ० ) इस सूत्र से बताया है । इतना ही नहीं, कपिलाचार्य ने भी ' नाझीरुषेयत्वानित्यत्वमङ्कुरादिवत् ' ( सां ० सु ० ) इस सूत्र से वेद के अपौरुषेय होने के कारण उसके freete की आवका कर उसका प्रतिषेष अंकुरादि के दृष्टान्त से किया है । अत: कापिलसूत्र का उद्धरण देकर वेद की नित्यता का प्रतिपादन करना साधारण लोगों की आँख में धूल झोकना है । इसी विषय पर अपनी पुस्तक में स्वामी दयानन्द के कृष्णद्वैपायन व्यास मुनि के वेदान्तशास्त्र का भी उद्धरण दिया है--' कृष्णद्वैपायन व्यास मुनि ने भी कहा है- ' शास्त्रयोनित्वात् ' ( न ० सू ० ११११३ ) | स्वामी दयानन्द इसका अर्थ इस प्रकार करते हैं--ate for स्थानों से उपबू हित होने से प्रदीप की तरह समस्त अर्थों के प्रकाशक, अत एव सर्वकल्प ऋग्वेद आदि शास्त्र का एक मात्र कारण ब्रह्म ही है, क्योंकि इस प्रकार के सर्वज्ञता आदि गुणों से परिपूर्ण कहे जाने वाले ऋग्वेदादि शास्त्र का सम्भव सर्वज्ञ के सिवा अन्य किसी से नहीं हो सकता । जो - जो विस्तृत अर्थ वाला शास्त्र जिस किसी पुरुष विशेष से किया जाता है, चाहे वह ज्ञेयविषय के एक • विभाग का ही क्यों न हो, किन्तु उसका निर्माता उस बोध्य विषय से कहीं अधिक विषय का ज्ञाता होता है, जैसे व्याकरण आदि शास्त्र के निर्माता पाणिनि आदि मुनि स्वस्वनिर्मित शास्त्र से कहीं अधिक ज्ञान सम्पन्न थे, यह सर्वत्र प्रसिद्ध है, उसे कहने की आवश्यकता नहीं । ' ये शब्द आचार्य शंकर ने इस सूत्र की अपनी व्याख्या में कहे हैं । इससे निष्कर्ष क्या निकला? सर्वंश ईश्वर का शास्त्र भी free है और समस्त अर्थ के ज्ञान से भरा हुआ है, किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है । उक्त सूत्र का तात्पर्यं तो परमेश्वर की सर्वज्ञता बताने में है, क्योंकि ब्रह्म ही ऋग्वेदादि शास्त्र का कारण हैं । अतः वेद का कारण होने से परमेश्वर में सर्वज्ञता की सिद्धि बनायास ही