वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 561–570

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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५३१ यच्च ' अत एव च नित्यत्वम् ' ( १३३ / ३ ९ ) अत ईश्वरोक्तत्वान्नित्यधर्मकत्वाद् वेदानां स्वतः प्रामाण्यं सर्वविद्यात्वं सर्वेषु कालेष्वव्यभिचारित्वान्नित्यत्वं च सर्वैर्मनुष्यैर्मन्तव्यमिति सिद्धम् ' ( पृ ० ३ ९ ) । ब्रह्मकार्यस्योत्पत्तिमतः शास्त्रस्य वेदादेः पदवाक्य कदम्बात्मकस्य पौर्वापर्यरूपानुपूर्वी मूलकत्वेन पौर्वापर्यस्य च नित्येषु विभुषु वर्णेष्वसम्भवेन कण्ठताल्वादिजनितवर्णाभिव्यक्तीनामेव तत्सम्भवेन तासां चानित्यत्वेनानित्यत्वेऽप्यतीतानागतेषु सर्वेष्वपि कल्पेषु आनुपूर्व्याः सर्वदा ऐकरूप्यात् प्रवाहरूपेण नित्यत्वमेव । सूत्रार्थवर्णनं त्वशुद्धमेव, पूर्वापरविरुद्धत्वात् । तत्र देवताधिकरणे देवानामिन्द्रादीनां विग्रहवत्त्वसाधनेन विग्रहवतामनित्यत्वेन वेदार्थभूतानामिन्द्रादिदेवतानामनित्यत्वेन तदर्थकशब्दानामध्यागन्तुकत्वेन शब्दार्थसम्बन्धाना-मोत्पत्तिकत्वासिद्ध्याऽपौरुषेयत्वानुपपत्या प्रामाण्यस्वतस्त्वानुपपत्तिरिति शब्दे विरोधमाशङ्क्य ' शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ' ( ११३१२८ ) इति सूत्रेण प्रत्यक्षानुमानाम्यां श्रुतिस्मृतिभ्यां वेदिकशब्देभ्यः प्रपञ्चसृष्टिमुक्त्वार्थसृष्टेः प्राग् वैदिकशब्दानां सत्तां प्रसाध्य विग्रहवतामिन्द्रादिदेवानामनित्यत्वेऽपि वैदिकशब्दानां तत्तज्जातिवाचकत्वेन वा प्राड्विवाकादिशब्दवदिन्द्रादिशब्दानां स्थानवाचकत्वेनोत्पत्तिकत्वं साधितम् । अत एव वैदिकशब्देभ्यो देवादिसृष्टिसिद्धेरेव वैदिकशब्दानां नित्यत्वमौत्पत्तिकत्वं प्रवाहरूपेण सार्वकालिकत्वमुपपादितम् । तदनाकलनादेव दयानन्दस्तु पूर्वापरविरुद्धं यत्किञ्चिदाह । नहि नित्येश्वरोक्तत्वान्नित्यधर्मकत्वं नित्यधर्मकत्वाच्च स्वतः प्रामाण्यं सम्भवति, निर्मितानां कार्यभूतानामानुपूर्वीविशिष्टानां नित्यत्वविरोधात् । वर्णनित्यत्वेन तथात्वे हो जाती है । इस सूत्र के द्वारा वेद की नित्यता का प्रतिपादन नही किया जा रहा है । उत्पत्तिमान् किसी भी वस्तु की नित्यता उपपन नहीं हो सकती । ' अत एव च नित्यत्वम्'- ( १1३1३ ९ ) सूत्र का जो अर्थ स्वामी दयानन्द ने किया है, वह भी अशुद्ध किया हैं । तथाहि-' अत: ' ईश्वरोक्त होने से, नित्य होने के कारण वेदों का स्वतः प्रामाण्य और उन्हें समस्त विद्यास्वरूप तथा सभी कालों में उनकी अव्यभिचारिता के कारण सभी मनुष्यों को चाहिये कि वेदों की नित्यता को स्वीकार करें । ऋग्वेदादि शास्त्र ब्रह्म से उत्पन्न होने के कारण उसके कार्य हैं, वे ऋग्वेदादि शास्त्र पद - वाक्य समूह रूप हैं, अतः उन्हें पौर्वापर्यरूप मानुपूर्वीमूलक कहना होगा, किन्तु नित्य तथा विभु वर्णों में पौर्वापर्य का होना संभव न होने से कण्ठ तालु आदि स्थानों से उत्पन्न होने वाले वर्णों की अभिव्यक्ति में ही उसका ( पौर्वापर्य का ) होना सम्भव हो सकता है । यद्यपि अभिव्यक्तियों के अनित्य होने से आनुपूर्वी की भी अनित्यता होगी, तथापि भूत भविष्य सभी कल्पों में आनुपूर्वी की सदा सर्वदा एकरूपता होने से प्रवाह की तरह उसे नित्य ही कहा जा सकता है । इस प्रकार सूत्रार्थ करना पूर्वापरविरुद्ध होने से अशुद्ध है । सूत्रार्थ करते समय देवताधिकरण में इन्द्रादि देवतानों को शरीरधारी सिद्ध किया गया है और जो शरीरधारी होते हैं, वे अनित्य होते हैं, यह नियम है | अतः वेदार्थरूप इन्द्रादि देवताओं के अनित्य सिद्ध होने से उनके वाचक शब्दों में भी वह ( अनित्यता ) आ ही जायगी, तब शब्द अर्थ के सम्बन्ध की औत्पत्तिकता ( नित्यता ) सिद्ध न हो सकेगी, उसके सिद्ध न हो सकने पर वेद के अपौरुषेयत्व की उपपत्ति नहीं होगी, उसके न होने पर उनका स्वतः प्रामाण्य नहीं बनेगा । इस प्रकार शब्द में विरोध की आशंका कर ब्रह्मसूत्रकार ने -- ' शब्द इति चेज्ञातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ' ( ११३३२८ ) सूत्र के द्वारा बताया कि प्रत्यक्ष और अनुमान अर्थात् श्रुति और स्मृति से यानी वैदिक शब्दों से प्रपञ्च की सृष्टि हुई है । अतः अर्थ सृष्टि के पूर्व वैदिक शब्दों की सत्ता ( अस्तित्व ) सिद्ध हो जाती है, उसके सिद्ध हो जाने से शरीरधारी इन्द्रादि देवताओं की अनित्यता रहने पर भी वैदिक शब्दों की तत्तज्जातिवाचकता होने से अथवा प्राड्विवाकादि शब्दों की तरह इन्द्रादि शब्दों की स्थानवाचकता होने से re पत्तिकता ( नित्यता ) को सिद्ध किया गया है । इसी कारण वैदिक शब्दों से देवादिकों की सृष्टि होने से ही वैदिक शब्दों की faraat ( औपत्तिकता ) प्रवाह रूप से सार्वकालिकता का उपपादन किया गया है । किन्तु इस यथार्थता का आकलन न कर सकने के कारण ही स्वामी दयानन्द ने पूर्वापर विरुद्ध जो मन में आया उसे कह डाला । वैदिक शब्दों की नित्यता नित्य ईश्वर के द्वारा उक्त होने से नहीं है और न ही उनके नित्य होने से उनका स्वतः प्रामाण्य ही है । निर्मित होने से कार्य कोटि में समझे जाने वाले आनुपूर्वी विशिष्ट वर्णों में नित्यता हो ही नहीं सकती, क्योंकि नित्यता और उत्पत्तिमत्ता दोनों में विरोध है । यदि वर्णों को नित्य माना जाय

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५३२ वार्थपारिजातः त्वनातवाक्यानामपि प्रामाण्यस्वतस्त्वापत्तेः । न च कणादगोतमादयः प्रामाण्यस्वतस्त्वमभ्युपगच्छन्ति, गुणवद्वक्तु-कत्वेन तैर्न केवलं समेषामेवाप्तवाक्यानां परतः प्रामाण्यमभ्युपगम्यते, किन्तु समेषामेव प्रत्यक्षादीनां प्रमाणानां प्रामाण्यपरतस्त्वमेवाभ्युपगम्यते । पूर्वोत्तरमीमांसकानां रीत्यापि न नित्यत्वात्, किम्त्वपौरुषेयत्वेनापास्तसमस्त पुंदोष-शङ्काकलङ्कपङ्कत्वादेव स्वतः सिद्धमेव प्रामाण्यमनपोदितत्वात् स्थिरं भवति तेषां मते समेषामेव प्रमाणानां प्रामाण्यस्वतस्त्वाम्युपगमात् । कारणदोषबाधज्ञानाच्चाप्रामाण्यनिश्चयेनाप्रामाण्यस्य परतस्त्वाम्युपगमाच्च । आश्चर्यमिदं यद् दयानन्देन ' यद्यद्विस्तरार्थं शास्त्रं यस्मात्पुरुषविशेषात् सम्भवति यथा व्याकरणादिपाणिक म्यादेर्शयैकदेशार्थमपि, स ततोऽप्यधिकतर विज्ञानः ' इति शाङ्करभाष्यस्यार्थोऽशुद्ध एव कृत इति विदाङ्कन्तु बुधास्त-पाण्डित्यम् | ' किन्तु वेदविस्तार के लिये किसी जीव विशेष पुरुष से अन्यशास्त्र बनाने का सम्भव होता है । जैसे पाणिनि आदि मुनियों ने व्याकरणादि शास्त्रों को बनाया है, उनमें विद्या के एकदेश का प्रकाश किया है । सो भी वेदों के आश्रय से बना सके हैं । ' ( पृ ० ४० ) सर्वथापि भाष्यार्थानवबोधमूलकोऽशुद्ध एवायमर्थः । किन्तु यद्यद्विस्तरार्थं शास्त्रं यस्मात् पुरुषविशेषाद् भवति स पुरुषविशेषस्ततो विस्तरार्थाच्छास्त्राद् अधिकतर विज्ञानो भवति । तनिर्मातृ-निर्मितशास्त्रं यावद्विस्तरार्थज्ञानजनकं भवति, तन्निर्माता ततोऽप्यधिकज्ञानवात् भवति, स्वनिष्ठस्य सर्वस्य ज्ञानस्य वक्तुमशक्यत्वात् । यथा व्याकरणादिशास्त्रं पाणिन्यादेज्ञेयस्यैकदेशार्थमपि यावदर्थविस्तरबोधकं पाणिम्यादिस्ततोऽप्य-fue विज्ञानवान् विज्ञायते तथैव परमेश्वरोऽपि सर्वविद्यास्थानोपबृंहितवेदविस्तरार्थज्ञानादप्यधिकज्ञानवान् मन्तव्यः । अत एव वेदः सर्वार्थावद्योतितत्वात् सर्वज्ञगुणान्वितत्वाच्च सर्वज्ञकल्पः, अर्थात् ईषदसमाप्तसर्वज्ञः असम्पूर्णः सर्वज्ञः, तो अनाप्त पुरुष के कहे गये वाक्य भी स्वतः प्रमाण माने जाने लगेंगे । कणादयोतम आदि महर्षियों ने भी प्रामाण्य के स्वतस्त्व को स्वीकार नहीं किया है । उन्होंने आप्त वाक्यों में परतः प्रामाण्य को माना है, क्योंकि आप्त गुणवान् वक्ता होता है, बक्ता के गुणवान् होने से उसके उच्चरित वाक्य में प्रामाण्य माना गया है । केवल आप्त वाक्यों में हो परतः प्रामाण्य स्वीकार किया गया हो ऐसी बात नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आदि सभी प्रमाणों में परतः प्रामाण्य को ही उन्होंने स्वीकार किया है । पूर्वोत्तर मीमांसकों की पद्धति से भी aara artis का प्रामाण्य शब्द - नित्यत्व के कारण नहीं हैं, अपितु वेद वाक्यों के ( आप्त वाक्यों के ) अपौरुषेयत्व के बल पर माना गया है, क्योंकि अपौरुषेयता के कारण रचयिता पुरुष के किसी दोष का उनमें स्पर्शमात्र भी होने की संभावना नहीं की जा सकती । मीमांसकों ने तो सभी प्रमाणों को स्वतः प्रमाण ही माना है । किन्तु जब कभी कारणगत दोष या बाधक ज्ञान हो जाय, तब उनमें अप्रामाण्य परतः होता है, यह उनका अपना सिद्धान्त है । स्वामी दयानन्द ने शांकर भाष्य के किसी एक अंश ' यद् यद् विस्तारार्थ शास्त्रं यस्मात् पुरुषविशेषात् सम्भवति, यथा व्याकरणादिपाणिन्यादेर्ज्ञेयैकदेशार्थमपि स ततोऽप्यधिकतर विज्ञान: ' का अत्यन्त अशुद्ध अर्थ किया है, जिसके देखने से विद्वानों को उनके ऊटपटांग पाण्डित्य का पता चल जाता है । शांकर भाष्य के उपर्युक्त अंश का स्वामी दयानन्द अर्थ करते है - ' किन्तु वेद विस्तार के लिए किसी जीव विशेष पुरुष से अन्य शास्त्र बनाने का संभव होता है । जैसे -- पाणिनि आदि मुनियों ने व्याकरणादि शास्त्रों को बनाया है, उनमें विद्या के एकदेश का प्रकाश किया है । सो भी वेदों के आश्रय से बना सके हैं । ' इस प्रकार का अशुद्ध अर्थ तो भाष्यार्थ न समझ सकने वाला अनपढ़ व्यक्ति ही कर सकता है । उपर्युक्त उद्धरण का वास्तविक शुद्ध अर्थ इस प्रकार होता है - जिस पुरुष विशेष के द्वारा free fret fa स्तृत गभीर अर्थ के शास्त्र का निर्माण किया जाता है, तो वह पुरुष विशेष स्वयं के रचे हुए विस्तृतार्थक शास्त्र की अपेक्षा अधिक ज्ञानवान् रहता है । किसी रचयिता के द्वारा रचा हुआ शास्त्र, जितना विस्तृत अर्थ का ज्ञान करावेगा, तो उसके रचयिता का ज्ञान उस शास्त्र की अपेक्षा निश्चित रूप से कहीं अधिक ही होगा, क्योंकि स्वबुद्धिस्थ समस्त ज्ञान का कथन कर पाना संभव नहीं है । जैसे व्याकरणादि शास्त्र अपने रचयिता महर्षि पाणिनि के ज्ञेयविषय के यत्किञ्चित् अंश से युक्त होने पर भी जितने विस्तृत अर्थ का बोधन करते हैं, उससे कहीं अधिक अर्थ के ज्ञाता पाणिनि हैं, यह समझ में आता है । वैसे हो परमेश्वर को भी समस्त farerana हित वेद से होने वाले विस्तृत अर्थ के ज्ञान से कहीं अधिक ज्ञान सम्पन्न समझना चाहिये | अतः समस्त अर्थों का

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वैवार्थपारिजातः ५३३ परमात्मा तु सम्पूर्णः सर्वशः । अत एव हिन्दीटीकायाम् -'शङ्कराचार्येण वेदानां नित्यत्वमम्युपगम्यैवास्य सूत्रस्यार्थः कृत: ' इति यदुक्तम्, तदपि सर्वथाऽशुद्धम्, तद्रोत्या ब्रह्मातिरिक्तस्य सर्वस्यैव ब्रह्मकार्यत्वेनानित्यत्वात् । अनित्यत्वेऽपि ब्रह्मकार्यत्वेऽपि तदानुपूर्व्याः परिवर्तने ईश्वरस्याप्यस्वातन्त्र्यम् | पूर्वकल्पीयानुपूर्वी सव्यपेक्षानुपूर्वीनिर्माणकर्तृत्वेन वेद कर्तृत्वमीश्वरस्य, न निरपेक्षानुपूर्वीनिर्मातृत्वेन स्वतन्त्रोच्चारयितृत्वेन प्रथमोच्चारयितृत्वेन वा । अत एव वेदानामपौरुष-त्वत्पत्तिकत्वं सार्वकालिकत्वं नित्यत्वं च । यच्च - वेदस्य प्रामाण्यसिद्ध्यर्थमन्यत्प्रमाणं न स्वीक्रियते किन्त्वेतत्साक्षिवद्विज्ञेयम्, वेदानां स्वतः प्रमाण-स्वात् सूर्यवत् । यथा सूर्यः स्वप्रकाशः सन् संसारस्थाने महतोऽल्पांश्च पर्वतादीन् त्रसरेण्वन्तान् प्रकाशयति, तथा वेदोऽपि स्वयंप्रकाशः सन् सर्वा विद्याः प्रकाशयतीति ' ( पृ ० ३ ९ ), तदपि बालभाषितम्, सूर्यस्यापि स्वसजातीयप्रकाशा * नपेक्षत्वेऽपि विजातीयमनश्चक्षुरादिप्रकाशसापेक्षत्वेन स्वप्रकाशत्वाभावात् । तथैव वेदानामप्यध्यापयि त्रध्येतृ सापेक्ष-त्वेन स्वस्याप्युत्पत्तिमत्त्वेन परमात्मसापेक्षत्वेन स्वप्रकाशत्वासम्भवात् । किञ्च यदि वेदानां स्वतः प्रामाण्यं प्रमाणान्तरानपेक्षं तहिं किमर्थ नित्यत्वसाधनाय त्वत्प्रयासः? किमिति बोद्धजेनादिभिरपि तत्प्रामाण्यं नाङ्गीक्रियते । विद्यमानत्वादेव यस्य संशयविपर्ययविपरीतप्रमाऽज्ञानाविषयत्वमेव हि स्वप्रकाशत्वम् । न चैतद् दृश्यते वेदे, संशय-विपर्ययाज्ञानादिविषयत्वात् । नैयायिकवैशेषिकादिभिरन्येषां प्रमाणानामिव वेदानामपि परतः प्रामाण्यमास्थीयते । तत एव परमाप्तसर्वेश्वरप्रोक्तत्वेन हेतुना तैर्वेदानां प्रामाण्यमङ्गीकियते । त्वयापि सर्वज्ञेश्वरात्तदुत्पत्तिसाधनेन तेषां Here at सर्वज्ञता के गुण से युक्त होने के कारण वेद को सर्वज्ञकल्प ही समझना चाहिये, अर्थात् करीब करीब सर्वज्ञ यानी सर्वज्ञता की सम्पूर्णता से कुछ ही न्यून उसे स्वीकार करना ही होगा । परमात्मा तो सम्पूर्ण सर्वज्ञ है, यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है । इसी लिये दयानन्द ने अपनी हिन्दी टीका में जो यह लिखा कि ' शङ्कराचार्य ने वेदों की नित्यता को स्वीकार करके ही इस सूत्र arraftar है ', वह भी सर्वथा अशुद्ध ही है । उस रीति से ब्रह्मातिरिक सभी कुछ ब्रह्मकार्य होने से अनित्य है । अनित्य तथा ब्रह्म का कार्य होने पर भी उसकी आनुपूर्वी के परिवर्तन करने में ईश्वर भी स्वतंत्र नहीं है । ईश्वर को जो वेद कर्ता कहते हैं, वह पूर्व कल्प की आनुपूर्वी के अनुसार मानुपूर्वी निर्माण करने के कारण है । स्वतंत्रता पूर्वक आनुपूर्वी निर्माण करने के कारण, या स्वतंत्रता पूर्व उच्चारण करने के कारण, या प्रथम उच्चारण करने के कारण नहीं । इसीलिये वेदों को अपीरुषेयता स्वाभाविक है, तथा सार्व-कालिकता और नित्यता भी । स्वामी दयानन्द का जो यह कहना है कि वेद के प्रामाण्य की सिद्धि के लिये किसी अन्य प्रमाण का स्वीकार नहीं किया जाता, किन्तु उसे साक्षी की तरह समझना चाहिये, क्योंकि वेद तो सूर्य की तरह स्वतः प्रमाण हैं । जैसे सूर्य स्वप्रकाश होने से संसार के बड़े छोटे पर्वत से लेकर नसरेणु तक के सभी पदार्थों को प्रकाशित करता है, वैसे ही वेद । भी स्वयंप्रकाश होता हुआ सभी विद्या को प्रकाशित करता है ' - वह भी बालभाषित के ही समान है । स्वामीजी ने जो सूर्य का दृष्टान्त दिया है, वह ठीक नहीं है । उन्हें यह समझना चाहिये था कि सूर्य को अपने सजातीय प्रकाश की अपेक्षा न रहने पर भी विजातीय मन चक्षु आदि के प्रकाश की अपेक्षा होती ही हैं, अतः उसे स्वप्रकाश नहीं कहा जा सकता । उसी तरह वेदों को अध्येता अध्यापयिता की अपेक्षा रहने से और आपकी रीति से वेदों की उत्पत्ति होने के कारण उन्हें परमात्मा की अपेक्षा होने से वेदों को स्वप्रकाश कहना संभव नहीं । दूसरी बात यह है कि प्रमाणान्तर की अपेक्षा न रहने से यदि वेदों का स्वतः मानते हो तो उसके नित्यत्व को क्यों सिद्ध कर रहे हो? क्या बौद्धों ने और जैनों ने वेदों के प्रामाण्य को स्वीकार किया है? वेदों का स्वतः प्रामाण्य रहने से ही वे संशय, विपर्यय, विपरीत प्रभा, ज्ञान के विषय नहीं हो पाते, क्या यही उनकी स्वप्रकाश्यता है? तुम्हारे कथनानुसार वेद में यह सब कुछ दृष्टिगोचर नहीं हो पाता, वे तो संशय, विपर्यय, अज्ञानादि के विषय होते हैं । मैयायिक - वैशेषिक आदि ने तो अन्य प्रमाणों की तरह वेदों का भी परतः प्रामाण्य ही माना है । परतः प्रामाण्य स्वीकार करने से ही उन्होंने परमाप्त सर्वेश्वर के द्वारा वेदों के उक्त होने से उनका

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वेदार्थपारिजातः परमेश्वरोत्पन्नत्वेनैव प्रामाण्यमङ्गीक्रियते । वस्तुतस्तु प्रामाण्यस्वतस्त्वपरतस्त्वकथानभिज्ञत्वादेव त्वया यत्किञ्चित् स्वोक्तिविरुद्धमपि प्रलप्यते । यच्च -- ' अत एवेश्वरः स्वयं स्वप्रकाशितस्य वेदस्य स्वस्य च सिद्धिकरं प्रमाणमाह ' ( पृ ० ४० ), तदपि वदतो व्याघातानातिरिच्यते । यतो यस्य सिद्धिकरं प्रमाणमुच्यते, न तत् स्वप्रकाशम्, तथात्वे च त्वद्रीत्या परमेश्वरोऽपि न स्वप्रकाशः किमु तदुक्तो वेदः । वस्तुतस्तु ' यत्साक्षादपरीक्षाद् ब्रह्म ' ( बृ ० ३ | ४ | १ ) इति रस्याऽवेद्यत्वे सत्यपरोक्ष-स्वात्प्रत्यगात्मरूपेण ब्रह्मणः स्वप्रकाशत्वम्, तस्यैव संशयाद्यविषयत्वात् । चार्वाकोऽपि न नाहमस्मीति प्रत्येति, न वा तत्र सन्दिग्धे विपर्येति वा । प्रमाणमात्रस्य प्रमाणान्तरापेक्षप्रामाण्ये तस्याप्येवं तस्याप्येवमित्यपेक्षायामनवस्थाप्रसङ्गात् प्रामाण्यस्वतस्त्वमिष्यते । तेन प्रत्यक्षानुमानयोरिव वेदस्यापि प्रामाण्यस्वतस्त्वमेव । कारणदोषबाधज्ञानाभ्यामेव प्रमाणानामप्रामाण्येन प्रामाण्यस्वतस्त्वमपोद्यते । वेदस्यापीरुपेयत्वेन कारणाभावादपास्तपुरुषाश्रितश्रमप्रमादकरणा-पाटवादिदोषाशङ्काकलङ्कत्वेन प्रत्यक्षानुमानानधिगतालौकिकार्थगमक वेदार्थस्यालौकिकत्वेन तद्बाधस्यापि प्रत्यक्षानु-मानागोचरत्वेन कारणदोषबाधज्ञानाभावादप्रामाण्यसंशयाद्यभावादेव वेदानां प्रामाण्यस्वतस्त्वमनपोदितमेव भवति । यत्तु –'स पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदद्याच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ' ( वा ० सं ० ४०३८ ) । अस्यायमभिप्रायः यः पूर्वोक्तः सर्वव्यापकत्वादिविशेषणयुक्त ईश्वरोऽस्ति स पर्यंगात् परितः सर्वतो गतवान् प्राप्तवान् एकः परमाणुरपि तद्व्याप्त्या विना नास्ति । तज्जगत्कर्तृ शुक्रमनन्तबलवद् अकार्य स्थूल सूक्ष्म - कारण शरीर त्रयरहितम्, अत्रणं नैवेतस्मिन् छिद्रं कर्तुं शक्नोति, परमाणरपि स्वीकार किया है । उसी प्रकार आपने भी वेदों को उत्पत्ति परमेश्वर से बताकर, तदुत्पन्न होने से ही उनका प्रामाण्य स्वीकार किया है । सच पूछा जाय तो प्रामाण्य के स्वतस्त्व या परतस्त्व की कहानी से परिचित न होने के कारण ही आपने अपने पूर्वोक्त कथन के विरुद्ध भी प्रलाप कर डाला । उसी तरह जो बापने यह कहा है कि ' इसीलिये ईश्वर ने स्वयं प्रकाशित वेद और अपने को सिद्ध करने के लिये प्रमाण बताया है । वह भी स्वोक्ति विरुद्ध ही है, क्योंकि जिसकी सिद्धि के लिये प्रमाण बताया जाय, वह स्वप्रकाश कैसे हो सकता है? उसे भी यदि स्वप्रकाश कहें तो तुम्हारी रीति के अनुसार तो परमेश्वर भी स्वप्रकाश नहीं हो सकेगा, तब उसका कहा हुआ वेद स्वप्रकाश कैसे हो पायगा? वस्तुतस्तु ' यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म ' - ( बृह ० ३१४११ ) की रीति के अनुसार ade और अपरोक्ष होने से ब्रह्म को प्रत्यगात्मता के कारण स्वप्रकाशता है, क्योंकि उसके प्रति किसी को संशयादि नहीं होते । Farah को भी ' नाहमस्मि मैं नहीं हैं ' ऐसी प्रतीति नहीं होती और न अपने में उसे सन्देह या विपर्यय ही होता है । सभी प्रमाणों को अपना प्रामाण्य प्राप्त करने में यदि अन्य प्रमाण की अपेक्षा रहे तो प्रामाण्यप्रापक अन्य प्रमाणों को भी अपने प्रामाण्य के लिये अन्य प्रमाण की अपेक्षा, उसी तरह उन्हें भी अन्य प्रमाण की अपेक्षा, इस प्रकार की अनवस्था होने लगेगी । किन्तु इष्ट तो प्रामाण्य का स्वतस्त्व है, अतः प्रत्यक्ष अनुमानादि प्रमाणों की तरह वेदों का प्रामाण्य भी स्वतः ही है । प्रामाण्य के स्वतस्त्व का विनाश उसी परिस्थिति में होता है, जब कारणदोष या बाघज्ञान हो जाय, अन्यथा नहीं | प्रमाणों का अप्रामाण्य कारणदोष या बावज्ञान पर ही अलम्बित है | वेद तो अपौरुषेय हैं, उनका निर्मातारूप कारण कोई नहीं है, अतः निर्माता के भ्रम, प्रमाद, करणों की अपटुता आदि दोषों की शंका करने का अवसर ही प्राप्त नहीं होता । प्रत्यक्ष या अनुमान से गम्य न होने वाले अलौकिक अर्थ का बोधक यह वेदार्थ है, अतः वह भी raf क है, इसलिये उसका बाघ भी प्रत्यक्ष, अनुमानादि लौकिक प्रमाणों से न होने के कारण कारणदोष या बाघ ज्ञान का सर्वथा अभाव रहता है । उसी कारण अप्रामाण्य का सन्देह तक न हो पाने से वेदों का स्वतःप्रामाण्य अबाधित रूप से स्थिर रहता है । अब जो — ' स पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समान्यः ॥ ' ( वा ० सं ० ४०१८ ) इस मन्त्र का यह अभिप्राय जो पहिले बता चुके है- सर्वव्यापकत्व आदि विशेषणों से युक्त ईश्वर है । स पर्यंगात् वह चारों ओर प्राप्त हुआ, एक परमाणु भी उसके व्याप्त हुए बिना नहीं है । वह जगत्कर्ता नित्य बल सम्पन्न है, स्थूल, सूक्ष्म, कारण इन तीन शरीरों से रहित हैं, न उसमें छिद्र ही किया जा सकता है, परमाणु भी छिद्र रहित

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वेदार्थ पारिजातः ५३५ छेदरहितत्वादेवाक्षतम्, अस्नाविरं तन्नाडीसम्बन्धरहितत्वाद् बन्धनावरणविमुक्तम्, शुद्धं तदविद्यादोषेभ्यः सर्वदा पृथग्वर्तमानम्, अपापविद्धं नैव तत् पापयुक्तं पापकारि कदाचिद् भवति । कविः सर्वज्ञः, मनीषी यः सर्वेषां मनसामीषी साक्षी ज्ञातास्ति । परिभूः सर्वेषामुपरि विराजमानः, स्वयंभूः यो निमित्तोपादानसाधारणकारणत्रयरहितः स एव सर्वेषां पिता, नह्यस्य कश्चिद् जनकः, स्वसामर्थ्येन सदैव सदा वर्तमानोऽस्ति । एवंभूतः परमात्मा स्वकीयाभ्यः शाश्वतीभ्यो निरन्तराभ्यः समाम्यः प्रजाभ्यो याथातथ्यतो यथार्थस्वरूपेन वेदोपदेशेन अर्थात् व्यदधाद् विधत्तवान् । अर्थाद् यदा यदा सृष्टि करोति तदा तदा प्रजाभ्यो हिताय सर्वविद्यासमन्वितं वेदशास्त्रं स एव भगवानुपदिशति । अत एव नैव वेदानामनित्यत्वं केनापि मन्तव्यम्, तस्य विद्यायाः सर्वदैकरसवर्तमानत्वात् ' ( पृ ० ४१ ) इति, तदपि कल्पनालोऽर्थस्ताविकार्थशून्यः । तथाहि --- अकाय मित्यनेन स्थूलसूक्ष्मकारणशरीरत्रय सम्बन्ध रहितत्व सिद्धी अत्रणमित्यस्य व्यर्थतेव स्थूलशरीर एव व्रणादिसम्भवात् । अस्नाविरमित्यादिपदव्यर्थतैव । स्थूलशरीर एव स्नाय्वादिसम्बन्धात् । समाभ्य इत्यस्य प्रजाभ्य इति काल्पनिक एवार्थः । एवं यथार्थस्वरूपेण वेदोपदेशेन अर्थान् व्यदधाद् अर्थाद् यदा यदा सृष्टि करोति तदा तदा सर्वविद्यासमन्वितं वेदशास्त्रमुपदिशतीत्यपि वेदाक्षराद् बहिर्भूतोऽर्थः, तद्बोधकपदाभावात् । श्रीशङ्कराचार्यसम्मतस्त्वयमस्य मन्त्रस्यार्थः -- स प्रकृतः परमात्मा परितः सर्वतोऽगात् । सर्वकारणत्वात् सर्वत्र पूर्णो व्यापकः, शुक्रं दीप्तिमत् स्वप्रकाशमिति यावत्, अकायं सूक्ष्मदेहरहितम्, अत्रणं व्रणरहितमक्षतम्, अस्नाविरं स्तावा शिरादि तद्रहितम्, एतत्पदद्वयेनार्थात् स्थूलदेहराहित्यं सूचितम् । शुद्धमविद्यालक्षणकारणदेहरहितम् । एवं परमात्मनः स्थूल सूक्ष्म- कारणदेहशून्यत्वेऽपि भक्तानुग्रहार्थमप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दलक्षणं स्थूलसूक्ष्मशरीर-वत्त्वमप्यस्त्येव । नन्वकायमिति विरोधादेव तदयुक्तमिति चेन्न अनुदरी कन्येत्यादावल्पार्थत्ववत् प्रकृतेऽपि नत्रो होने से ही अक्षत है, नाडियों से सम्बन्धित न होने से बहू बन्धन -- आवरण से विमुक्त है, अविद्यादि दोषों से सदा पृथक रहता है और न ही वह पाप से युक्त है -- अर्थात् कभी भी वह पापाचरण नहीं करता, वह सर्वज्ञ तथा सभी के मनों का साक्षी ज्ञाता है, सबके ऊपर विराजमान रहता है । जो निमित्त, उपादान, साधारण कारण तीनों से रहित है, वही सबका पिता है, उसका कोई जनक नहीं है । यह अपनी शक्ति के साथ हो सर्वदा वर्तमान रहता है । इस प्रकार का परमात्मा अपनी निरन्तर होने वाली प्रजा के लिये यथार्थ स्वरूप से aatur के द्वारा पदार्थों का निर्माण करता है । अर्थात् जब - जब वह सृष्टि करता है, तब - तब प्रजा के हित के लिये समस्त विद्याओं से युक्त बेदशास्त्र का उपदेश वही भगवान् देता है । इस कारण कोई भी वेदों को अनित्य न समझे, क्योंकि उसकी विद्या ( ज्ञान ) सर्वदा किया है, वह भी वास्तविक अर्थ नहीं है । उसीको एक रूप ही रहती है । यह कल्पना बहुल ( कपोलकल्पित ) अर्थ दयानन्द ने बताते हैं -- मन्त्र के ' अकायम् ' पद से ही यदि स्थूल सूक्ष्म - कारण इन तीन शरीरों से सम्बन्धशून्यता सिद्ध हो जाय तो अगला ' अवणम् ' पद ही व्यर्थ हो जायगा, क्योंकि स्थूल शरीर में ही व्रण आदि का सम्भव होता है । उसी तरह ' अस्नादिरम् ' आदि पद भी व्यर्थ होगा, क्योंकि स्नायु आदि का सम्बन्ध स्थूल शरीर से ही रहता है । उसी तरह ' समाम्यः ' का अर्थ ' प्रजाभ्यः ' जो किया है, वह भी इन्हीं का कपोल कल्पित अर्थ हैं । उसी प्रकार ' यथार्थस्वरूप से वेदोपदेश के द्वारा अर्थों का निर्माण किया, अर्थात् जब - जब सृष्टि करता है, तब - तब सर्वविद्यासमन्वित वेदशास्त्र का उपदेश करता है ' यह अर्थ वेद के अक्षरों से तो निकलता नहीं है, क्योंकि एक अर्थ का बोध कराने वाला कोई पद नहीं है । इस उपर्युक्त मन्त्र का श्रीशङ्कराचार्यसम्मत यह अर्थ है-- ': ' प्रकृत परमात्मा ' परितः सर्वतः अगात् ' सबका कारण होते से सर्वत्र पूर्ण व्यापक है, ' शुक्रम् ' दीप्ति से युक्त अर्थात् स्वप्रकाश है । ' अकायम् ' सुक्ष्म देह से रहित है, ' अव्रणम् ' व्रण से रहित यानी अक्षत है, ' अस्नाविरम् ' शिरा आदि स्नायुओं से रहित है, इन दो पदों से स्थूलदेह शून्यता सूचित की गई है । ' शुद्धम् ' अविद्यालक्षण-कारण देह से रहित, इसी प्रकार परमात्मा का स्थूल सूक्ष्म - कारण शरीर न रहने पर भी भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये अप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दलक्षण स्थूल सूक्ष्म शरीर तो रहता ही है । यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि ' अकायम् ' से सूक्ष्मदेहरहित होना पहले बताया

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५३६ वैवार्थपारिजातः भौतिक देहनिषेधपरत्वमेव मन्तव्यम् । तत्रोदरसत्त्वप्रत्यक्षविरोधादेवाल्पार्थता गृह्यत इति चेदिहापि ' नमो हिरण्यबाहवे ' ' नीलग्रीवाः शितिकण्ठा: ' इत्यादिश्रुतिशतविरोधादेव तथार्थस्वीकारे बाधाभावात् । दिव्यशरीरवत्त्वेन विविधलीला -परायणत्वेऽपि, अपापविद्धं धर्माधर्मविर्वाजितम् । दिव्यदेहे रावणादिभिः संग्रामे विविधवाणादिकृतव्रणवत्त्वप्रतीतावपि वस्तुतोऽव्रणम्, मायादिदर्शितब्रह्मादिवदारोपितमेव तत्सर्वम्, वस्तुतस्तस्याव्रणत्वादस्नाविरत्वादपापविद्धत्वाच्च । कविः क्रान्तदर्शी, अतीतानागतवर्तमानद्रष्टा, मनीषी मनस ईषिता प्रेरयिता ( इषु प्रेरणे ), ' केनेषितं पतति प्रेषितं मनः ' इति श्रुतेश्च । परिभूः परि उपरि भवतीति परिभूः सर्वनियामकत्वात् । स्वयम्भूः येषामुपरि भवति यश्चोपरि भवति, स सर्व स्वयमेव भवतीति स्वयम्भूः । मूले मूलाभावादमूलं मूलमिति श्यायेन सर्वमूलस्य मूलान्तरानपेक्षत्वेन कारणान्तराकाङ्क्षासिद्धेः । तथाविधः परमेश्वरो याथातथ्यतो यथा पूर्वकल्पे सूर्यचन्द्रादयो यथासन् तथैव सर्वेषु कल्पेषु, अर्थात् सूर्यचन्द्रादिपदार्थान् व्यदधाद् विरचितवान् । ननु सूर्यादयो नित्या एव न केनचिनिर्मिता इत्याह-शाश्वतीभ्यः समाभ्यः, निरन्तराभ्यः समाम्यो वर्षेभ्यः, बहुसंवत्सरकालायेत्यर्थः । ' आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाध्यते । ' भूतसंप्लवपर्यन्तं बहुसंवत्सरपर्यन्तावस्थायित्वमेव हि तेषाममृतत्वं शाश्वतकालावस्थायित्वम्, परमेश्वरा-दुत्पन्नत्वेन तेषामपि प्रलयघोष्यात् । यच्च ---- ' यथा शास्त्रप्रमाणेन वेदा नित्याः सन्तीति निश्चयोऽस्ति, तथा युक्त्यापि । तद्यथा - नासत आत्मलाभः, न सत आत्महानम्, योऽस्ति स भविष्यति इति न्यायेन वेदानां नित्यत्वं स्वीकार्यम् । कुतः? यस्य मूलं है और अब सूक्ष्मशरीर का होना बताया जा रहा है, यह विरुद्ध कथन कैसे? किन्तु इसका समाधान ' अनुदरी कन्या ' इस प्रयोग में जैसे नन् का अर्थ अल्प = स्वल्पता किया जाता है, उसी तरह प्रकृत में भी नन् का तात्पर्य भौतिक देह के निषेध में ही समझना चाहिये । यदि कहें कि ' अनुदरी कन्या ' इस प्रयोग में कन्या के उदर का तो प्रत्यक्ष है । नन् का अर्थ निषेध करने में प्रत्यक्ष के साथ विरोध होगा, इसलिये वहीं नम का अर्थ अल्प किया जाता है, तो प्रकृत में भी ' नमो हिरण्यबाहवे ', ' नीलग्रीवाः शितिकण्ठा: ' इत्यादि सैकड़ों श्रुतियों से विरोध होने से ही उपर्युक्त अर्थ के स्वीकार करने में कोई अड़चन नहीं है । दिव्य शरीर के द्वारा विविध लीला परायण रहने पर भी अपापविद्ध अर्थात् धर्माधर्म के स्पर्श से भी शून्य है, रावणादि राक्षसों से संग्राम करते समय विविध बाण आदि शस्त्रास्त्रों से faar देह में व्रणों की प्रतीति होने पर भी वस्तुतः उनका देह व्रण से रहित है, माया के कारण व्रणयुक्त देह की प्रतीति हो रही है, अतः देह पर व्रण आदि सब आरोपित ही हैं । वास्तव में वह तो अवण, अस्नाविर तथा अपापविद्ध है । ' कवि: ' क्रान्तदर्शी अर्थात् अतीतानागतवर्तमान काल का द्रष्टा है, ' मनीषी ' मन का ईषिता यानी प्रेरयिता = प्रेरक है ( इपू प्रेरणे ) ' केनेषितं पतति प्रेषितं मनः ' इस श्रुति से भी उक्त अर्थ का समर्थन हो रहा है । ' परिभू: ' -- परि उपरि भवसीति - ऊपर होता है, इसलिये उसे परिभू: कहते हैं, क्यों हम हैं । स्वयंभूः - जिनके ऊपर होता है, और जो ऊपर होता है वह सब स्वयं ही होता है, इसलिये उसे स्वयंभू कहते हैं । ' मूले मूलाभावात् अमूलं मूलम् ' -- मूल का मूल न होने से अमूल हो मूल है-- इस न्याय से समस्त के मूल को किसी अन्य मूल की अपेक्षा न होने से कारणान्तर की आकांक्षा नहीं है । ऐसा परमेश्वर यथार्थरूप से, अर्थात् जैसे पूर्व कल्प में सूर्य चन्द्र आदि थे, उसी तरह सभी कल्पों में सूर्य चन्द्र आदि पदार्थों की उसने रचना की । यदि कोई यह सन्देह करे कि सूर्य - चन्द्रादि तो नित्य पदार्थ हैं, अत: उनकी रचना किसी के द्वारा नहीं हुई हैं । इस सन्देह का निरसन इस प्रकार होगा - शाश्वतीभ्यः समाम्यः = निरन्तर अनेक वर्षों तक, अर्थात् अनेक संवत्सरात्मक काल के लिये । ' थाभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते । ' भूतसंप्लव होने तक, अर्थात् बहु संवत्सरपर्यन्त स्थान ही उनका अमृतत्व है, वहीं उनकी शाश्वतकालावस्थायिता है, क्योंकि परमेश्वर से उत्पत्ति होने के कारण उनका प्रलय होना निश्चित है । इसी प्रकार स्वामी दयानन्द ने जो यह कहा --- ' जैसे शास्त्रप्रमाण से वेदों की नित्यता का निश्चय होता है, उसी तरह युक्ति से भी होता है । उसी को बताते हैं, जैसे --- असत् = अविद्यमान वस्तु की स्वरूप से सत्ता नहीं रहती और न विद्यमान वस्तु के

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वेदार्थपारिजातः ५३७ नास्ति, तस्य नैव शाखादयो भवितुमर्हन्ति, वन्ध्यापुत्रविवाहवत् । पुत्रो भवेच्चेत्तदा वन्ध्यात्वं न सिद्धघेत, स नास्ति चेत् पुनस्तस्य विवाहदर्शने कथं भवतः? यदीश्वरे विद्यानन्ता न भवेत् कथमुपदिशेत् स नोपदिशेच्चेन्नैव कस्यापि मनुष्यस्य विद्यासम्बन्धी दर्शनं च स्याताम्, निर्मूलस्य प्ररोहाभावात् । नहि निर्मूल किश्विदिह दृश्यते ' ( पृ ० ४२ ) इति, तदतीव स्थवीयः, स्वदुक्तरीत्या सत्कार्यवादाश्रयणेन वेदानामिव घटपटादेरपि नित्यत्वापत्तेः । नहि तदपि निर्मूलम्, सांख्यैः सत्कार्यवादिभिर्मृत्तिकायां तत्सत्ताङ्गीकारात् । घटादेरिव वेदानामपि नित्यत्वमिष्यते पुनः किमर्थं शास्त्रतर्कप्रमाणा-स्वेषणायासः क्रियते, कार्यमात्रस्य स्वकारणे सत्त्वाविशेषात् । यच्च - ' यस्यानुभवस्तस्यैव संस्कारः, यस्य संस्कारस्तस्यैव स्मरणं... सृष्ट्यादावीश्वरोपदेशाध्यापनाभ्यां विना नैव कस्यापि विद्याया अनुभव: स्यात् ' ( पृ ० ४२ ) इत्यादिना पूर्वोक्तस्यैव पिष्टपेषणं कृतम्, तस्य निराकरण-मिहैवान्यत्र द्रष्टव्यम् । सिद्धान्ते मीमांसकदृष्ट्याऽनाच्च विच्छिन्न पारम्पर्येण वेदाध्ययनाध्यापनपारम्पर्यमभ्युपगम्यते । सृष्टिप्रलयाङ्गीकर्तृ ब्रह्ममीमांसकमते परमात्मैव पूर्वकल्पीय वैदिकसम्प्रदायं प्रवर्तयति । तदनुग्रहेण सुप्त प्रतिबुद्धन्यायेनापि चिषयः पूर्वकल्पीय वेदं स्मरन्ति । यदप्युक्तम्- ' यन्नित्यं वस्तु वर्तते तस्य नामगुणकर्माण्यपि नित्यानि भवन्ति, तदाधारस्य नित्यत्वात् । नेवाधिष्ठानमन्तरा नाम - गुण - कर्मादयः स्थिति लभन्ते तेषां पराश्रितत्वात् । यन्नित्यं नास्ति, तस्यैतान्यपि नित्यानि न भवन्ति ' ( पृ ० ४३ ) इति, तदपि प्रमाणविरुद्ध बालभाषितमेव । नित्यस्याप्यात्मनो ज्ञानादिगुणानां दार्शनिकरनित्यत्वाभ्यु-पगमात् नित्येष्वपि परमाणुषु गन्धादिगुणानामनित्यत्वाभ्युपगमाच्च । कर्मणां नित्यत्वं तु न केनाप्यङ्गीक्रियते, देहेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिचेष्टालक्षणकर्मणां क्षणभङ्गुरत्वानुभवाच्च । स्वरूप का लोप होता है | अतः जो है, वह अवश्य ही रहेगा- इस नियम के अनुसार वेदों की नित्यता को स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि जिसका मूल न हो उसकी शाखा आदि हो ही नहीं सकती, वन्ध्यापुत्र के विवाह की तरह, यदि पुत्र हो तब वन्व्यात्व नहीं बन सकता, औरयदि पुत्र न ' तो उसका विवाह कैसे सोचा जायगा? यदि ईश्वर में अनन्त विद्या न हो तो वह कैसे उपदेश दे सकेगा? वह यदि उपदेश न देता तो किसी भी मनुष्य का विद्या के साथ सम्बन्ध और उसका ज्ञान न हो पाता, क्योंकि निर्मूल से अंकुर नहीं होता, अतः इस लोक में कुछ भी निर्मूल नहीं दिखलाई देता । ' वह तो बहुत हो थोथा प्रतीत हो रहा है । तुम्हारी कथित रीति से सत्कार्यवाद का सहारा लेने पर वेदों की तरह घटपटादिकों को भी नित्य कहना पड़ेगा | सत्कार्यवादी सांख्यों ने मृत्तिका में उसकी सत्ता स्त्रीकार की है, अतः उसे भी निर्मूल नहीं कहा जा सकता । घटपटादिकों की तरह ही वेदों की नित्यता को यदि मानते हो तो शास्त्र, तर्क, प्रमाणों के अन्वेषणार्थं कष्ट क्यों किया जा रहा है? क्योंकि कार्यमात्र की अपने अपने कारण में समानरूप से सत्ता रहती ही है । जो कहा गया है कि ' जिसका अनुभव होता है, उसी का संस्कार होता है और जिसका संस्कार होता है, उसी का स्मरण होता है ' " सृष्टि के आरंभ में ईश्वर के उपदेश और अध्यापन के बिना किसी को भी विद्या का अनुभव होना संभव न होगा ' । इस कथन से पूर्वकथन का ही पिष्टपेषण मात्र किया गया है, उसका निराकरण यहीं पर अन्यत्र दिखाई देगा । मीमांसकों की दृष्टि से सिद्धान्त यह है कि वेद के अध्ययन - अध्यापन की परंपरा तो अनादि अविच्छित परम्परा है । सृष्टि और प्रलय को स्वीकार करने वाले ब्रह्म मीमांसकों के मत से परमात्मा ही पूर्व कल्प के वैदिक सम्प्रदाय का प्रवर्तन करता है । उसी के अनुग्रह से सुप्त प्रतिबुद्ध न्याय से कतिपय ऋषियों को भी पूर्वकल्पीय वेद का स्मरण हुआ करता है । यह जो कहा है -- ' जो वस्तु नित्य होती है, उसके नाम, गुण, कर्म भी नित्य होते हैं, क्योंकि उनका आधार नित्य है । नाम, गुण, कर्म आदि पराश्रित होने के कारण उनकी स्थिति अधिष्ठान के बिना नहीं हुआ करती । जो वस्तु नित्य नहीं है, उसके गुण - कर्म - नाम आदि भी नित्य नहीं हैं'- - वह भी बालभाषित के समान प्रमाण विरुद्ध ही है । आत्मा free वस्तु है, किन्तु उसके ज्ञानादि गुणों को दार्शनिकों ने अनित्य माना है । उसी तरह परमाणु नित्य हैं, किन्तु उनके गन्धादि गुणों को अनित्य माना गया है । ६८

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यच्च ' सदकारणवन्नित्यम् ' ( ४/१ ) इति कणादसूत्रस्यार्थनिरूपणप्रसङ्गेनोक्तम्- ' यत्कार्य कारणादुत्पद्य विद्यमानं भवति तदनित्यमुच्यते । तस्य प्रागुत्पत्तेरभावात् । यत्तु कस्यापि कार्यं न भवति, किन्तु सदैव कारणरूपभव -तिष्ठति तन्नित्यमिति ' ( पृ ० ४४ ), तदपि पूर्वापरविरुद्धमेव । पूर्वं तु नासत आत्मलाभो न सत आत्महानमित्युक्तमिदानीं तद्विरुद्धं यत्कार्य कारणादुत्पद्य विद्यमानं तदनित्यं तस्य प्रागुत्पत्तेरभावादित्युच्यते । ‘ यद्यत् संयोगजन्यं तत्तत्कत्रपेक्षं भवति । कर्तापि संयोगजन्यश्चेतहिं तस्याप्यन्योऽन्यः कर्तास्तीत्यागच्छेत् । तथा चानवस्था । यत्संयोगेन प्रादुर्भूतं नैव तस्य परमाण्वादीनां संयोगकारणे सामर्थ्यम्, तस्मात्तेषां सूक्ष्मत्वात् । यथा सूक्ष्मत्वादग्निः कठिनं स्थूलमयः प्रविश्य तस्यावयवानां पृथग्भावं करोति । यथा जलमपि पृथिव्याः सूक्ष्मत्वात् तत्कणान् प्रविश्य संयुक्तमेकपिण्डं करोति छिनत्ति च तथा परमेश्वरः संयोगविभागाभ्यां पृथग्भूतो विभुरस्त्यलो नियमेन रचनं विनाशं च कर्तुमर्हति । न चान्यथा । यथा संयोगवियोगान्तर्गतत्वान्नास्मदादीदां प्रकृतिपरमाण्वादीनां संयोगवियोगकरणे सामर्थ्यमस्ति तथेश्वरेऽपि भवेत् ' ( पृ ० ४४ ) इति यदुक्तम्, तदपि निःसारम्, तथेश्वरेऽपि भवेदित्यसम्बद्धं च | आकाशात्मादीनां सूक्ष्मत्वेऽपि प्रकृतिपरमाण्वादीनां संयोगकोरणे सामर्थ्यानुपलम्भेन सूक्ष्मत्वस्य तदप्रयोजकत्वात् । न चास्मदादीनां संयोगवियोगान्तर्गतत्वम्, तथात्वेऽस्मदादीनामनित्यत्वापत्तेः । न चेष्टापत्तिः, ' अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराण: ' इत्यादिवचनशतविरोधात् । तस्माच्छास्त्रगम्यसामर्थ्यविशेषादेवेश्वरः सर्वं रचयति सूक्ष्मत्वविभुत्वादिभिः । अत एव सत्यसामर्थ्यस्येश्वरस्य सकाशाद् वेदानां प्रादुर्भावेऽपि न नित्यत्वम्, सर्वस्यैव जगतस्तत्सामर्थ्येनाविर्भावात् त्वद्रीत्या निर्मूलस्य प्ररोहासम्भवात् जगतोऽपि परमेश्वरे सदैव वर्तमानत्वात् । कर्मों की नित्यता तो किसी ने भी नहीं मानी है । देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि के चेष्टा लक्षण कर्मों को क्षण विनाशिता का अनुभव तो सभी को है । अब जो ' सदकारणवन्नित्यम् ' ( ४१ ) इस कणादसूत्र के अर्थ निरूपण प्रसंग से कहा है- ' जो कार्य कारण से उत्पन्न होकर विद्यमान रहता है, उसे अनित्य कहा जाता है, क्योंकि अपनी उत्पत्ति के पूर्व उसका अभाव रहता है, किन्तु जो किसी का कार्य नहीं होता, बल्कि सदैव कारण रूप से ही रहता है, उसे नित्य समझना चाहिये ' - वह भी पूर्वापर विरुद्ध ही है, क्योंकि पहले यह fear था कि असत् वस्तु की स्वरूपसत्ता नहीं और सत् वस्तु के स्वरूप का विनाश नहीं, अब उसके विरुद्ध लिख रहे हैं कि जो कार्य, कारण से उत्पन्न होकर विद्यमान रहे, वह अनित्य है, क्योंकि उत्पत्ति से पूर्व उसका अभाव रहता है । ' जो वस्तु जिसके संयोग से जन्म होती है, उसे उसके कर्ता की अपेक्षा रहती है । यदि कर्ता भी संयोग से बन्य हो तो Sent at a aaf होगा । यह अर्थात् प्राप्त है, तब अनवस्था होगी । जिसके संयोग से जो प्रादुर्भूत हुआ उसमें परमाणु आदि के संयोग करने की सामर्थ्य ही नहीं है, क्योंकि उसकी अपेक्षा उनकी सूक्ष्मता है । जो अति सूक्ष्म होने से कठिन और स्थूल अयःपिण्ड में fry होकर उसके अवयवों को पृथक करता है । जैसे जल भी पृथ्वी की अपेक्षा सूक्ष्म होने से उसके कणों में प्रविष्ट होकर उसका संयुक्त एक पिण्ड तैयार कर देता है और टुकड़े भी कर देता है । उसी तरह परमेश्वर संयोग विभाग से पृथक और व्यापक है, अतः नियम से रचना और विनाश करने में समर्थ है, अन्यथा नहीं | जैसे संयोग - वियोग के अन्तर्गत होने से हम लोगों में तथा प्रकृति परमाणु आदि में संयोग वियोग करने का सामर्थ्य नहीं होता, वैसे ही ईश्वर में भी होगा ' यह जो कहा, वह भी सारहीन है । ' उसी तरह ईश्वर में भी होगा ' यह भी असम्बद्ध है । आकाश, आत्मा आदि के सूक्ष्म होने पर भी उनमें प्रकृति परमाणु आदि के संयोग कराने का सामर्थ्य उपलब्ध न होने से स्पष्ट कि सूक्ष्मता उसमें प्रयोजक नहीं हैं और न अस्मदादि भी संयोग - वियोग के अन्तर्गत है । अस्मादिकों को अन्तर्गत मानने पर अनित्यता का प्रसंग आवेगा । उसे इष्टापत्ति भी नहीं कह सकते, क्योंकि ' अजो नित्यः शास्वतोऽयं पुराण: ' इत्यादि सैकड़ों वचनों से विरोध होगा । अतः यही कहना होगा कि शास्त्रगम्य सामर्थ्य विशेष से ही ईश्वर सबकी सूक्ष्म विभु के रूप में रचना करता है । इसलिये सत्य सामर्थ्य सम्पन्न ईश्वर से वेदों का प्रादुर्भाव होने पर भी उनकी नित्यता नहीं कही जा सकती, क्योंकि सम्पूर्ण जगत् का आविर्भाव ही उसके सामर्थ्य से हुआ है । आपकी रीति के अनुसार निर्मूल का प्ररोह संभव न होने से जगत् की सत्ता श्री परमेश्वर में सदा रहती है ।

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वेदार्थपारिजातः ३- वेवविषयविचारविषय: तत्र वेदविषयस्य विचारों विषयो यस्य स इति बहुव्रीहिः, वेदविषयविचारस्य विषय इति षष्ठीतत्पुरुषो वा? आद्येऽन्यपदार्थः कः? ग्रन्थः, ग्रन्थभागः, उपक्रमों वा? नाद्यः समग्रग्रन्थस्य वेदविषयविचाराविषयीकरणात् । तत्र वेदविषयविचारातिरिक्तप्रतिपादनस्यापि सत्त्वात् । आद्यपक्षाङ्गीकारे ऋग्वेदभाष्यभूमिकायां वेदविषयवचारविषय ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाग्रन्थ इत्यर्थः । अत्र केन किं श्लिष्यत इति । भूमिकायामिति सप्तम्याः कोऽर्थः? सर्वस्थापि सप्तम्यर्थस्य भेटितत्वान्नात्मनि स्वस्यावस्थितिः सम्भवति, आत्माश्रयत्वात् । न द्वितीयः, ग्रन्थभागस्य विचार-विषयत्वाभावात् । सार्थकस्य वाक्यसन्दर्भस्यैव ग्रन्थत्वात् । तदीयो भागोऽपि तद्रूप एव । तस्य च प्रतिपाद्योऽर्थ एव विषयो न तद्विचारस्तद्विषयः, विचारस्य मानस क्रियारूपत्वात् । न तृतीयः, उपक्रमस्यैव तद्विषयत्व उपसंहारस्थापि तद्विषयत्वापातात् । अन्यथोपक्रमोपसंहारयोर करूय्यानुपपत्तेः । प्रकरणार्थकत्वेऽपि द्वितीयविकल्पोक्तदूषणम् । तत्पुरुषा-ङ्गीकारे द्वितीयविषयपदविन्यासो व्यर्थ एव । तस्माद्वेदविषयविचारः प्रस्तूयत इत्येव युक्तमासीत् । संवत् २०२४ संस्करणे ' अथ वेदविषयविचारः ' इति पाठः परिवर्तितः । यच्च ' चत्वारो वेदविषयाः सन्ति, विज्ञानकर्मोपासनाज्ञानकाण्डभेदात् ' ( पृ ० ४७ ) इति, तदपि न विचाररमणीयम्, वेदविषया वेदप्रतिपाद्यविषया इति तदर्थः । काण्डपदं तु प्रकरणपरम् । नहि वेदेषु विज्ञानप्रकरण कर्मप्रकरणं ज्ञानप्रकरणं वा प्रतिपाद्यमस्ति । तस्मात् काण्डपदनिवेशो व्यर्थ एव । तस्माच्चत्वारो वेदविषया विज्ञान - कर्मो-पासना- ज्ञानभेदादित्येवोचितम् । तत्रापीदं विचारणीयं यत् ' दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम् ', ' अपरा ऋग्वेदो ३- वेद विषय विचार विषय इस शीर्षक में भी यह प्रश्न उपस्थित होता है कि यहाँ पर विग्रह कौन सा किया गया है, क्या ' वेदविषयस्य विचारो विषयो यस्य सः इस प्रकार बहुव्रीहि करना चाहिये? अथवा ' वेदविषयविचारस्य विषय: ' इस प्रकार षष्ठी तत्पुरुष करना चाहिये? यदि पहिला बहुव्रीहि किया जाय तो उसमें अन्य पदार्थ कौन है? क्योंकि बहुव्रीहि में अन्य पदार्थ की प्रधानता रहती है । यहाँ अन्य पदार्थ ग्रन्थ है, या ग्रन्थ भाग है, या उपक्रम है? अन्य पदार्थ ' ग्रन्थ ' को नहीं कह सकते, क्योंकि समग्र ग्रन्थ को वेद विषय विचार का विषय नहीं किया गया है, क्योंकि उसमें वेद विषय विचार के अतिरिक्त विषय का भी प्रतिपादन किया गया है । प्रथम पक्ष को स्वीकार यदि करें तो TR ऋग्वेदभाष्यभूमिकायां का अर्थ होगा ' वेद विषय विचार विषय ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थ में, किन्तु ऐसा अर्थ होने पर किससे किसका सम्बन्ध प्रतीत होता है, अर्थात् सब असम्बद्ध हो प्रतीत हो रहा है । ' भूमिकायाम् ' इस सप्तमी faraf का क्या अर्थ होगा? सप्तमी के जितने भी अर्थ होते हैं, वे सभी भेद घटित होने से अपने में अपनी अवस्थिति सम्भव ही नहीं हो सकती, क्योंकि ' आत्माश्रय ' दोष होगा । द्वितीय पक्ष भी ठीक न होगा, क्योंकि ग्रन्थ का कोई एक भाग तो विचार का विषय नहीं है | सार्थक वाक्यसन्दर्भ को ही ग्रन्थ कहा जाता है । उसका एक भाग भी ग्रन्थरूप ही कहलायेगा । उसका प्रतिपाद्य अर्थ ही विषय कहलायेगा, उस अर्थ का विचार तो ग्रन्थ का विषय नहीं होगा । विचार सो मानसक्रिया रूप है । तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि उपक्रम रहने पर उपसंहार को भी उसका विषय कहना होगा । अन्यथा उपक्रम - उपसंहार की एकरूपता नहीं बन पावेगी । ' प्रकरण ' अर्थ मानने पर भी द्वितीय विकल्पोक्त दूषण प्राप्त होगा । यदि तत्पुरुष समास कहें तो दूसरे ' विषय ' पद का उल्लेख करना ही व्यर्थ है । अतः ' वेदविषयविचारः प्रस्तूयते ' इतना लिखना ही उचित था । संवत् २०२४ के संस्करण में ' अथ वेदविषयविचारः ' ऐसा पाठ परिवर्तन किया गया है । यह जो कहा है कि ' वेद के चार विषय है - विज्ञान, कर्म, उपासना और ज्ञान ' । वह भी विचार की कसोटी पर नहीं उतर पा रहा है । ' वेदविषया: ' का अर्थ वेद प्रतिपाद्यविषय ' है । ' काण्ड ' पद तो प्रकरणपरक है । किन्तु वेदों में विज्ञानप्रकरण, कर्मप्रकरण या ज्ञानप्रकरण नामसे कोई भी प्रतिपाद्य नहीं है । इसलिये ' काण्ड ' पद का विवेश जो किया गया है, वह व्यर्थ ही है । अतः यह कहना उचित होगा कि विज्ञान, कर्म, उपासना और ज्ञान ये चार विषय वेदों के हैं । इस प्रसंगपर यह भी विचार करने योग्य *

पृष्ठ 570

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 570 का मूल पृष्ठ
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Fa वेदार्थपारिजातः यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः ’, ' यस्मादुचोऽपातक्षन् यजुर्यस्मादपाकषन् । सामानि यस्य लोमानि अथर्वाङ्गिरसो मुखम् ॥ ' इत्यादिप्रसिद्धक्रमानुसारेण यथासंख्यमेव विज्ञानादिविषयप्रतिपादकत्वं मन्तव्यम् । तेन ' विज्ञानमृचां विषयः, कर्म ' यजुषा-मुपासना साम्नां ज्ञानमथर्वणो विषय इत्यायातम् ' इत्यादि, तदपि न रमणीयम् यतो हात्र विज्ञानपदार्थः कः? ज्ञान-शब्दार्थश्व कः? नामभेद एव तयोर्विषयभेदं व्यनक्ति । ननु ' मोक्षे धर्ज्ञानमित्याहुविज्ञानं शिल्पशास्त्रयो: ' इति कोशमनुसृत्य मोक्षविषया धीरेव ज्ञानं शिल्पविषया शास्त्रविषया च घीविज्ञानमुच्यत इति चेन्न $ तत्रादिमो विज्ञानविषयो हि सर्वेभ्यो मुख्योऽस्ति, तस्य परमेश्वरादारभ्य तृणपर्यन्तपदार्थेषु साक्षाद्बोधान्ययत्वात् । तत्रापीश्वरानुभवो मुख्योऽस्ति । कुतः? अत्रैव सर्वेषां वेदानां तात्पर्यमस्ति, ईश्वरस्य खलु सर्वेभ्यः पदार्थेभ्यः प्रधानत्वादिति स्वात्मवचनविरोधात् । अस्मिन् वाक्ये परमेश्वरस्यैव सर्ववेदतात्पर्य-विषयतया प्राधान्योक्त्या तद्धियोऽपि प्राधान्यमुक्तम् । विषयप्राधान्याद्वियः प्राधान्यं स्वाभाविकमेव । ईश्वरधियश्च मोक्षविषयत्वाज्ज्ञानरूपत्वमेव भवतीति न तस्या विज्ञानरूपत्वम्, मोक्षविषयापा धियो s न्यस्या एव शिल्पविय: शास्त्र f यश्च मोक्षघीत्वात् । यच्च विज्ञानविषयस्य मुख्यत्वे तस्मिन् विज्ञानस्य परमेश्वरादारभ्य तृणपर्यन्तपदार्थेषु साक्षाद् बोधावयत्वाद् इत्यस्य हेतुत्वमुक्तम्, तत्तु निरर्थकमेव साध्यासाधकत्वात् । विज्ञानस्य ब्रह्मादितॄणान्तेषु पदार्थेषु साक्षाद्बोधास्वयत्वम् । को वास्य वाक्यस्यार्थ इति दयानन्दस्तदनुयायिनो वा नेव निरूपयितुं शक्नुवन्ति । साक्षाद्बोधान्वयत्वादित्यपि किम्? साक्षाद्बोधो हि प्रत्यक्षमेव भवति? तथा च विज्ञानस्य साक्षाद् बोधावयत्वं साक्षाद्द्बोधहेतुत्वात् साक्षाद्द्बोधसम्बन्धित्वाद्वा? नोभयथापि तत्सम्भवति । तथाहि-- सम्बन्धिता च विषयतयैव वक्तव्या । न च स्वस्यैव विषयता सम्भवति, न वा स्वस्यैव हेतुता सम्भवति, भेदसापेक्षत्वात् । न च है कि ' दोह यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजुःसामलक्षणम् ' । ' अपरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद: ', ' यस्मादुचोऽपातक्षन् यजुर्यस्मादपाकषन् । सामानि यस्य लोमा अथर्वाङ्गिरसो मुखम् ॥ ' इस प्रसिद्धक्रम के अनुसार वेदों के द्वारा विज्ञानादि विषयों का प्रतिपादन यथासंख्य ही समझना चाहिये | अतः ऋचाओं का विषय ' विज्ञान ', यजुस् का विषय ' कर्म ', सामन् का विषय ' उपासना ' और अथर्वन् का ' ज्ञान ' है, यह fros र्ष निकला । ' किन्तु यह कथन भी उचित नहीं है, क्योंकि यहाँ विज्ञान शब्द का तथा ज्ञान शब्द का अर्थ क्या है? ये दो भिन्न नाम हो उनके विषयों की भिनता को व्यक्त कर रहे हैं । यदि कहें कि ' मोक्ष धीनिमित्याहुविज्ञानं शिल्पशास्त्रयो: ' कोश के अनुसार मोक्षविषयक घी को ज्ञान और शिल्प-विषयक तथा शास्त्रविषयक घी को विज्ञान कहा जाय, तो वह भी ठीक न होगा, क्योंकि पहिला जो विज्ञानविषय है, वह सबसे मुख्य हैं, परमेश्वर से लेकर तृण तक के पदार्थों का साक्षात् बोध कराने का उसमें सामर्थ्य है । उसमें भी ईश्वर का अनुभव मुख्य है, क्योंकि सभी वेदों का तात्पर्य उसी में हैं । सभी पदार्थों में ईश्वर प्रधान हैं, इस अपने ही पूर्वोक्त कथन से विरोध होगा । इस वाक्य में समस्त वेदों के तात्पर्य का विषय परमेश्वर के होने से ही उसकी प्रधानता है, अतः उसकी घी की भी प्रधानता कही गई है । विषय की प्रधानता होने से घी ( ज्ञान ) की प्रधानता का होना स्वाभाविक ही है । ईश्वरी मोक्षविषयक होने से उसकी ज्ञानरूपता ही हो सकती है, विज्ञानरूपता नहीं । शिल्पविषया धी तथा शास्त्रविषय घी से अन्य जो मोक्षविषया भी है, वही मोक्ष धी है । are विज्ञानविषय को मुख्यता सिद्ध करने के लिए ' विज्ञानस्य परमेश्वरादारम्य तृणपर्यन्तपदार्थेषु साक्षाद् बोधान्वयत्वात् ' को हेतु बनाना निरर्थक ही है, क्योंकि उसमें साध्य को सिद्ध करने की सामर्थ्य नहीं है । ' विज्ञानस्य ब्रह्मादितॄणान्तेषु पदार्थेषु साक्षाद् aternarrat ' इस वाक्य का क्या अर्थ है? उसे दयानन्द या उसके अनुयायी कोई भी बता नहीं सकते । ' साक्षाद्वोघान्वयत्वात् ' में भी क्या साक्षा को ही प्रत्यक्ष कहते हैं । यदि कहते हों तो बताओ कि साक्षात् बोध का हेतु होने साक्षाद् बोधान्वयत्व है, या साक्षात् बोध का सम्बन्धी होने से है? दोनों दृष्टियों से वह सम्भव नहीं, क्योंकि सम्बन्धिता तो विषयता को लेकर ही कहनी होगी ।