वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 621–630

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

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बंदार्थ पारिजातः ५६४ नहि नामादीनपहाय मन्त्राः सन्ति । नामादिचतुर्विधपदजातमेव कयाचित् प्रयोगानुपरिपाटघा मन्त्रा उच्यन्ते । अत एव पुरुषविद्याया अनित्यत्वादयथार्थवन्नामादिपदजातप्रयोगाद् देवतानामनागमनेन कर्मणां वैगुण्यापत्तिसंभवात् कर्मणा-वैगुण्येन फलवत्त्वा वेदे मन्त्रा आम्नाताः । पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिः, अवैगुण्येन कर्मणां फलवत्त्वाय वेदे मन्त्र आम्नात इति निष्कर्ष: । कथं पुरुषविद्याया अनित्यत्वमित्यपि दुर्गाचार्येण प्रदर्शितमेव । इह येन वाक्यविरचनानुक्रमेणार्थ-वस्त्वनुक्रमेण वोक्त्वा प्रेध्यते मनुष्य एवमेव ब्रूयास्त्वं देवदत्तम् । एतेनैव वाक्यविरचनक्रमेणाववुद्धमपि सन्तमर्थं न शक्नोति प्रतिपादयितुम् । अयमपि हि येन वाक्यानुक्रमेणाद्य वक्ति कश्विदर्थं न तेनैव क्रमेण श्वो वक्तुं शक्नोति । तस्मात् पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् कर्मफलसम्पत्यथं मन्त्रो वेदे समाम्नातः । ' अथातो देवतं तद्यानि नामानि इत्यादिनैरुक्तवाक्यविवृत्तयेऽयेत्यनन्तरं दैवतं किमुच्यते ( पृ ० ६८ ) इति शेष इति योजयित्वोक्तं दयानन्देन तदपि न युक्तम् उक्तवाक्ये शङ्कानवकाशात्, प्रत्युत अथेत्यनन्तरमता देतो. देवतं प्रकरणं व्याख्यास्याम इत्येवार्थी युक्तः । हेतुस्तु सर्वशाखासु यावन्तो मन्त्रास्तेषु यानि गुणपदानि उद्देशतो लक्षणतश्च यथायथं नघण्टुकैकपदिकयोर्द्वयोरपि प्रकरणयोर्व्याख्यातानि संविज्ञातपदानि पुनरमूनीदानीमन्या-दीनि देवपम्यन्तानि प्रधानस्तुतिभाग्देवताविषयाण्यवशिष्यन्ते । सर्वत्रापि मन्त्रेषु अत इत्येवार्थः । यद्वा अथेत्यधि-कारार्थः । अत इति क्रमे हेतौ वा । प्रकरणद्वयानन्तरमिदमावश्यकम् । समाम्नायानुक्रमप्राप्तमधिकृतं वेदितव्यमित्यर्थः । दैवतमन्तरेण देवतापदार्थो न शक्यते सम्यग् विबोद्धुम् सकलपुरुषार्थश्च तत्परिज्ञानानुबद्धा, अतो देवतं प्रकरणं व्याख्यास्याम इति वाक्यशेषः । पद्धति के नियमन के लिये मन्त्र के रूप में वेद में पढ़े गये हैं । नाम आदि को छोड़कर कोई मन्त्र नहीं बनता । नाम आदि चतुविध पद ही प्रयोग का अनुसरण करने वाली पद्धति की परिपाटी में रखने पर मन्त्र हो जाते हैं । इसीलिये पुरुष के ज्ञान के अव्यवस्थित होने से अनुचित नाम आदि के प्रयोग के कारण कर्म में देवताओं के उपस्थित न होने पर यज्ञादि कर्म में वैगुण्य की आपत्ति हो सकती है, अतः कर्म में अवैगुण्य द्वारा फलदान सामर्थ्य की अधिगति के लिये वेद में मन्त्रों का विधान कियागया हैं, यही इस का निष्कर्ष है । पुरुष विद्या की अनित्यता कैसे है? इस बात को भी दुर्गाचार्य ने समझाया हैं । लोक व्यवहार में अनेक वाक्यों की सहायता से और प्रतिपाद्य विषय वस्तु को ठीक से समझा कर ही कोई मनुष्य भेजा जाता है कि तुम देवदत्त से यह बात इस प्रकार कहना | किन्तु वह व्यक्ति पूरी तरह से समझे हुए उस अर्थ को मूल वक्ता के वाक्यों में उसी क्रम से नहीं बतला सकता । यह भी जिस वाक्यानुक्रम से आज किसी अर्थ को बता रहा है, उसी क्रम से वह कल नहीं बोल सकेगा । इस प्रकार पुरुष के ज्ञान के अनित्य होने से कर्मफल की संपत्ति के लिये वेद में मन्त्रों का पाठ किया गया है । ' reat dad ' scarfe from वाक्य की व्याख्या के लिये ' अर्थ ' इस पद के बाद ' देवतं किमुच्यत इति शेषः " याह वाक्य दयानन्द ने जोड़ा है । यह ठीक नहीं है । उक्त वाक्य में शंका के लिए कोई अवकाश नहीं है । प्रत्युत अथ अर्थात् इसके बाद, इसलिये दैवत प्रकरण की व्याख्या करते हैं, यह सीधा अर्थ यहाँ उचित हैं । यहाँ पर हेतु पद की व्याख्या यह है कि सभी शाखाओं में जितने मन्त्र हैं, उनमें आने वाले गुण पदों की उद्देश्य और लक्षणों के द्वारा यथोचित व्याख्या नैघण्टुक और ऐकपदिक इन दो प्रकरणों में कर दी गई है, अब अग्नि से आरंभ कर देवपत्नी पर्यन्त मे संविज्ञाय पद, जो कि सभी जगह मन्त्रों में प्रधान स्तुति के भजन देवताओं के लिए प्रयुक्त होते हैं, व्याख्या के लिए बचे हैं, अतः इसी कारण से अब उनकी व्याख्या में प्रवृत्त होना चाहिये | अथवा ' अर्थ ' पद यहाँ अधिकार के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है मोर ' अत: ' पद क्रम अथवा हेतु के अर्थ में दो प्रकरणों के बाद यह आवश्यक है free में ago म प्राप्त को अधिकृत किया जाय । बिना दैवत प्रकरण के देवता पद का अर्थ ठीक से समझ पाना कठिन है । सारा पुरुषार्थ देवता पद के जान लेने पर ही संभव है, अर्थात् देवला पद की ठीक तरह से अवगति हो जाने के उपरान्त ही किसी पुरुषार्थ की अधिगति हो सकती है, अतः दैवत प्रकरण की व्याख्या करेंगे, यह वाक्यशेष होगा ।

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43 देवार्थपारिजातः नवस्य प्रकरणस्य देव तमित्यभिधाने किं निमित्तमित्याह तद्यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां प्राधान्येन स्तुतिर्यासां तासां देवतानामग्न्यादिदेवपल्यन्तानां यानि नामानि तदेव दैवतं प्रकरणमित्याचक्षत आचार्याः । तथा च निरूढा संज्ञेयमस्मिन् प्रकरणे । मन्त्रे कथं देवता परीक्षणीया इति तत्प्रकारमाह-- ' सैषा देवतोपपरीक्षा ' इत्यादिग्रन्थेन । यत्त्वत्र ' यत्प्राधान्येन स्तुतिर्यासां देवतानां क्रियते तद्देवतमिति विज्ञायते । यानि नामानि मन्त्रोक्तानि येषामर्थानां मन्त्रेषु विद्यन्ते तानि सर्वाणि देवतालिङ्गानि भवन्ति । तद्यथा -- -अग्नि अ दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे । देवान् आ सादयादिह || ' ( यजु ० २२।१७ ) अत्राग्निशब्दो लिङ्गोऽस्ति । अत्र किं विज्ञेयं यत्र यत्र देवतोच्यते तत्र तत्र तल्लिङ्गो मन्त्रो ग्राह्य इति । यस्य द्रव्यस्य नामान्वितं यच्छन्दोऽस्ति तदेव तद्दैवतमिति बोद्धव्यम् । संषा देवतोपपरीक्षा अतीता आगामिनी चास्ति । अत्रोच्यते - ऋषिरीश्वर एव सर्वदृग् यत्कामो यं कामयमान इममर्थमुपदिशेयमिति स यत्कामः, यस्यां देवतायामार्थपत्यमर्थस्य स्वामित्वमुपदेष्टुमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्त तदर्थगुणकीर्तनं कृतवानस्ति स एव मन्त्रस्त-हैयतो भवति । किञ्च यदेवार्थप्रतीतिकरणं देवतं प्रकाश्यं येन भवति स मन्त्रो तद्देवतो वाच्यो भवतीति विज्ञायते । taarfrer ऋचाभिर्विद्वांसः सर्वाभिर्विद्याः स्तुवन्ति प्रकाशयन्ति, ऋच स्तुताविति धात्वर्थंयोगात् ' ( पृ ० ६८ ) । तत्तु मूलाक्षरबाह्यत्वात् परस्परविरुद्धत्वाच्च हेयमेव । क्वचिन्मन्त्रभिन्ना तत्प्रयुक्ता देवता यद्देवतास्ते मन्त्रा भवन्तीति मन्त्रव्यतिरिक्त देवताप्रतिपादनात् । क्वचिच्च छन्दसां देवतात्वाभिघातात् क्वचिच्च मन्त्राणां देवतात्वविधानाच्च ताः श्रुतयस्त्रिविधास्त्रिप्रकाराः सन्ति । एता एव कर्मकाण्डे देवताशब्दार्था सन्तीति विज्ञेयम् । यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद्देवतमित्याचक्षत इति वाक्यं तु न देवतानिर्णायकम्, दुर्गाचार्यरीत्या तस्य प्रकरणनाम-arrerana | प्राधान्येन स्तुतिर्यासामग्न्यादिदेवपत्स्यन्तानां यानि नामानि यत्र निर्णीयन्ते तदैवतं प्रकरणमाचक्षते आचार्याः । प्राधान्यस्तुतिभाजि यानि देवताभिधानानि तत्समुदायो दैवतं प्रकरणम्, तद्वद्याख्यास्याम इति दुर्गाचार्य-वचनात् । सैषा देवतोपपरीक्षा इति वाक्ये देवलोपपरीक्षाप्रतिज्ञानुपपत्तेः । नहि देवतालक्षणं ततः प्रागुपपद्यते । इस प्रकरण को ' दैवत ' नाम से कहने का क्या निमित्त है? जिन प्रधान देवताओं की यज्ञ - यागादि क्रम में स्तुति की जाती है, अग्नि से लेकर देवपत्ती पर्यन्त उन प्रधान देवताओं को नामावली यहाँ होने से इस प्रकरण को आचार्य गणों ने यह नाम दिया है । इस तरह इस प्रकरण के लिये यह रूढ संज्ञा है । मन्त्र से देवता की परीक्षा किस प्रकार की जायगी? इसके लिये ' सैषा देवतोपपरीक्षा ' इत्यादि ग्रन्थ से इसकी विधि बताई गई है । यहाँ पर कहा जाता है कि ' जिसको प्रधान मानकर जिन देवताओं की स्तुति की जाती है, उसको ' दैवत ' कहते हैं । जो नाम जिस अर्थ के मन्त्रों में रहते हैं, वे सब देवताओं के लिङ्ग होते हैं, जैसे कि ' अग्नि दूत पुरी दवे ' इस मन्त्र में अग्नि शब्द लिङ्ग हैं | इसमें क्या जानना है? जहाँ - जहाँ देवता उक्त होती है, वहाँ वहाँ उस लिंग का मन्त्र गृहीत होता है । अत: जिस द्रव्य के नाम के साथ जो छन्द है, वही उसका देवता जानना चाहिये । यह अतीत और आगामिनी देवता परीक्षा है । इस पर हमारा कहना यह है कि ऋषि अर्थात् ईश्वर सर्वद्रष्टा है । जिस कामना से जिस अर्थ को चाहता हुआ यह किसी अर्थ का उपदेश करता है, वह जिस कामना से जिस देवता को मन्त्रार्थ का स्वामी मानकर उसका उपदेश करने की इच्छा से स्तुति करता है, उस देवता के गुणों का कीर्तन करता हैं, वही मन्त्र उस देवता का हो जाता है और जिस अर्थ की प्रतीति के कारण जिस देवता की प्रतीति जिस मन्त्र से होती है, वही मन्त्र उस देवता का हो जाता है । जिनकी सहायता से विद्वद्गण विद्याओं की स्तुति करते हैं, धातु के अर्थ का सहायता से वे ही ऋचाएं उस dear को अभिहित करने लगती है ' । यह अर्थ मूल अक्षरों से नहीं निकलता और परस्पर विरुद्ध भी है, इसलिये त्याज्य है । कहीं पर मन्त्रलिंग से भिन्न अर्थात् जिस देवता के लिये मन्य प्रयुक्त हुए हैं, उन मन्त्रलिंग से भिन्न देवताओं के प्रतिपादन से, कहीं छन्दों को देवता बता देने से और कहीं मन्त्रों को देवता बताने से ये श्रुतियाँ तीन प्रकार की माननी पड़ती है । कर्मकाण्ड में ये ही देवता शब्द के अर्थ है । ' स्तुति में प्रयुक्त प्रधान देवताओं के नाम जहाँ पर हैं, वह दैवत प्रकरण है ' यह वाक्य दुर्गाचार्य के मत से देवता के स्वरूप or free नहीं है, वह केवल प्रकरण के नाम का बोधक है । अग्नि से लेकर देवपत्नी पर्यन्त देवताओं की प्रधानता से स्तुति होने

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पारिजातः लक्षणप्रमाणाभ्यामेतत्परीक्षणोपपत्त्या प्रतिज्ञानन्तरमेव तदुपपतेः । यत्काम ऋषीत्यनेन पौनरुक्त्यापाताच्च । यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुति प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति । नास्य वाक्यस्य दयानन्दीयोऽय युक्तः । ऋषयो मन्त्रद्रष्टार इति रीत्या मन्त्रदृशामेवर्षित्वमुपेक्ष्य परमेश्वरस्यैवर्षित्वे युक्तिविशेषानुपपत्तेः । किञ्च परमेश्वरस्य पूर्णकामन कामानुपपत्तेश्च इसमर्थमुपदिशेयमित्यपि न युक्तम् । यस्यां देवतायामार्थपत्यमर्थस्य स्वामित्व-सुपदेष्टुमिच्छन्नियपि, अर्थाद् यस्मिन्मन्त्रेऽर्थस्वामित्वमुपदेष्टुमिच्छन् तदर्थंगुणकीर्तनं करोति, स मन्त्रो देवताशब्दवाच्यो भवति । तच्च न संगतम्, तथात्वे मूले ततः स मन्त्रो भवतीत्युक्त तस्य कथं संगतिः? स मन्त्रस्तन्मन्त्रो भवती-त्येवार्थः फलितो भविष्यति । नह्येकत्रो देश विधेयभावः । नेदं वाक्यं मन्त्रदेवताप्रतिपादनपरम् मन्त्रदेवतयोरभेदे स तवतो भवतीति भेदमूलको बहुव्रीहिनिरालम्बन एव स्यात् । किञ्च, यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदेवत ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वच्छेति गर्त वा पद्यत इति छन्दोगानां बचनानुसारेण मन्त्राणामृषिच्छन्दो दैवतज्ञानमत्यावश्यकमुक्तम् । तत्र मन्त्रस्यैव देवतात्मन्ये कथं नाम देवताज्ञानं विधीयेतातो मन्त्रातिरिक्त व देवता ज्ञातव्या । तस्मादस्य निरुक्तवाक्यस्यायमर्थी दुर्गाचार्या-नुसारेण तत्सर्वं मन्त्राधिदैवतलक्षणमनुक्त्वा न शक्यते व्याख्यातुम्, मन्त्राधीनत्वात् सर्वस्यास्य । मन्त्रदेवतालक्षणाविदि धारविषयोक्तमिदं वाक्यं निरुक्तकारेण यदर्थवस्तु कामयमान ऋषिः, यस्यां देवतायामभिष्टुतायाम्, आर्थपत्यम् अर्थपतिभावमात्मन इच्छन् अमुष्या देवतायाः प्रसादेनाहमुष्यार्थस्य पतिर्भविष्याम्येतां बुद्धि पुरोधाय स्तुति प्रयुङ्क्त ततः स मन्त्रो भवति । एतन्मन्त्रे देवतालक्षणम् । एतेन लक्षणेन सर्वमन्त्रेषु देवता लक्ष्यते । अथवा देवताया-से इनके नामों का निर्णय जहाँ होता है, वह प्रकरण ' दैवत ' कहलाता है । प्रधानतः स्तुतियोग्य देवताओं के नामों का समुदाय जहाँ पर है, उस दैवत प्रकरण की हम व्याख्या करेंगे, यह दुर्गाचार्य का वचन है । ' सैषा देवतो ० ' इस वाक्य में देवता के परीक्षा की प्रतिज्ञा नहीं बनती तो उससे पहले देवता का लक्षण कैसे बन सकता है? लक्षण और प्रमाण से हो यह परीक्षा हो सकती है और यह प्रतिज्ञा के बाद ही होगी । ' काम ऋषि ' इस वचन के कारण यहाँ पुनरुक्ति दोष भी आवेगा । ' यत्कामः स मन्त्रो भवति ' इस वाक्य का दयानन्द का किया हुआ अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि ' मन्त्रद्रष्टा ऋषि होते हैं इस वचन के प्रमाण से मन्त्रद्रष्टानों को ऋषि न मानकर परमेश्वर को ऋषि मानना युक्तियुक्त नहीं है । परमेश्वर तो पूर्णकाम है । उसको किसी प्रकार की कोई कामना नहीं हो सकती, अतः मैं इस अर्थ का उपदेश करूँ, यह इच्छा भी वहीं नहीं हो सकती । जिस देवता के अर्थ के स्वामित्व के उपदेश की इच्छा से अर्थात् जिस मन्त्र में उसके अर्थ के स्वामित्व का उपदेश करना चाहता हो, उसके गुण का कीर्तन करने वाला वह मन्त्र देवता शब्द का वाच्य होता है, यहाँ पर भी अर्थ की सङ्गति नहीं बैठती । ऐसा अर्थ करने पर मूल के ' तद्देवत: ' इत्यादि वचन को सङ्गति कैसे बैठेगी? ' समन्त्र: ' पद का अर्थ ' मन्त्र ' में परिणत कर वह मन्त्र होता है, ऐसा अर्थ करना पड़ेगा । एक ही जगह उद्देश्यविधेयभाव नहीं बनता । यह antra और देवता दोनों का प्रतिपादक नहीं हैं । मन्त्र और देवता का अभेद मानने पर ' स तद्देवतो. ' यहाँ पर भेदमूलक बहुव्रीहि समास व्यर्थ हो जायगा । ' जो व्यक्ति किसी मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता, ब्राह्मण को बिना जाने उससे यज्ञ कराता है, अथवा उसको पढ़ाता है, वह मूढ हो जाता है, अथवा दुर्गति प्राप्त करता है ' सामवेदियों के इस वचन के अनुसार मन्त्रों के ऋषि, छन्द और देवता का ज्ञान आवश्यक है । यहाँ पर यदि मन्त्र को ही देवता माना जाय तो फिर मन्त्र में देवता के ज्ञान का विधान कैसे सम्भव होगा? इसलिये मन्त्र से अतिरिक्त ही देवता माननी पड़ेगी । इसलिये इस निरुक्त के वाक्य का यह अर्थ दुर्गाचार्य के अनुसार मन्त्र के अधिदेवत आदि अर्थों की fast arrear किये नहीं किया जा सकता । मन्त्र, देवता आदि के लक्षण का अवधारण भी मन्त्र के ही अधीन है, अतः इसी का निर्णय निरुक्त के उक्त वाक्य में किया गया है कि जिस अर्थ अर्थात् वस्तु की कामना से ऋषि जिस देवता की स्तुति से अपने में अर्थपतित्व की भावना करता है, अर्थात् यह सोचता है अमुक दे aar की स्तुति से मेरी अमुक कामना पूरी हो सकेगी, इस बुद्धि को आगे रखकर जिस देवता की स्तुति करता है, वह मात्र उसी देवता का होता है । यही मन्त्र में देवता का लक्षण है । इस लक्षण की सहायता से ७५

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* वैशर्यपारिजातः मस्यार्थस्येयं देवता दातुं समर्था इति जानानः स्तुतिं प्रयुङ्क्ते येन मन्त्रेण सा प्राधान्यस्तुतिभाग् भवेत्तस्य मन्त्रस्य देवता भवति । मीमांसकानामपि न मन्त्र एव देवता, किन्तु मन्त्रे यस्या देवतायाः स्तुतिविद्यते सा देवता शब्दरूपव भवति । देवतायाश्चेतनरूपता तेर्नाभ्युपेयते, तथात्वे ' सौयं चरुं निर्वपेत् ', ' आदित्यं चरुं निर्वपेत् ' इत्यादी सूर्यादित्ययो-रेक्येन कर्मैक्यापत्तेश्च । सिद्धान्ते च कर्मभेद एवाङ्गीकृतः । स च सूर्य्यादित्यशब्दयोर्भेदमालम्ब्यैव युज्यते । अस्तु, इतः परम् अत एव ' तद्येऽनादिष्टदेवतामन्त्रास्तेषु ' इति वाक्यमुद्धृत्य मन्त्रव्यतिरिक्तां देवतामङ्गीकृत्य पूर्वाविरुद्धमेवाह दयानन्दः । तथाहि - ' ये खल्वना दिष्टदेवता मन्त्रा अर्थात विशेषतो देवतादर्शनं नामार्थो वा येषु दृश्यते तेषु देवतोपपरीक्षा कास्तीत्यत्रोच्यते ' ( पृ ० ६ ९ ) इति भूमिकावचनम् । यदि मन्त्रव्यतिरिक्ता काचिद्देवता न स्यात्तदा कस्य लिङ्गं मन्त्रेष्वन्वेष्यते? मन्त्रा एव देवताश्चेत्तदा ते तु स्पष्टं निर्दिष्टा एव । अनादिष्टा इत्यत्र बहुव्रीहिरपि मन्त्रदेवतयोर्भेदे सत्येवोपपद्यते । एवमेव ' यद्देवतः स यज्ञो वा यज्ञाङ्गं वा तद्देवता भवन्ति ' ( नि ० ७ । ४ ) इति वाक्यस्यापीदमेव तात्पर्यं वर्णयति दयानन्दः -- ' यत्र विशेषो न दृश्यते तत्रैव यज्ञो देवता यज्ञाङ्गं वेत्येतदेव देवताख्यमिति विज्ञायते ' ( १० ६ ९ ) । अत्राकामेनापि दयानन्देन मन्त्राभिनयोर्यज्ञयज्ञाङ्गयोर्देवतास्वमभ्युपेतमेव । वस्तुतः सोऽप्य-शुद्ध एवार्थः । यद्देवत इति पदस्यार्थावबोधात् । तदर्थविचारणे तु यद्देवतोद्देश्यकं यज्ञस्य विधानं यां देवता-मुद्दिश्य हविः प्रक्षिप्यतेऽग्नौ सा देवता तस्य यज्ञस्य । सैव च तत्र विनियुक्तानामनादिष्टदेवतालिङ्गकानां मन्त्राणां देवता । एवमेव यज्ञाङ्गेऽपि । सभी मन्त्रों में देवता लक्षित होती है । अथवा इस देवता में इस अर्थ को देने की सामर्थ्य है, यह जानकर स्तुति करता है । जिस मन्त्र से उस प्रधान देवता की स्तुति की जाती है, वही उस मन्त्र की देवता होती है । मीमांसकों के मत में भी मन्त्र ही देवता नहीं होती, किन्तु मन्त्र में जिस देवता की स्तुति रहती है, वह देवता शब्दरूप ही होती है, क्योंकि वे देवता की चेतनरूपता नहीं स्वीकार करते । ऐसा मत उनका इसलिये है कि सौर्य चरु और आदित्य चरु का पृथक् निर्वाचन विहित हैं । सूर्य और आदित्य एक ही देवता है, यदि देवता को शब्दरूप न माना जाय तो यह पृथक far व्यर्थ हो जायगी । शब्दरूप देवता मानने पर सूर्य और आदित्य शब्दों के भेद के कारण शदात्मक देवता भी भिन्न होगी और इस प्रकार सौर्य और आदित्य के लिये पृथक - पृथक वरु fraut की विधि सार्थक हो सकेगी । इसके आगे ' अत एव मन्त्रस्ते ' इस वाक्य को उद्धृत कर मन्त्र से भिन्न देवता स्वीकार कर दयानन्द ने हमारी बात का समर्थन ही किया है । जैसे कि जो मन्त्र अनादिष्ट देवता वाले हैं, अर्थात् जिन मन्त्रों में देवता का स्वरूप, नाम अथवा अर्थ नहीं परिदृष्ट है, उनमें देवता की परीक्षा कैसे होगी, यह भूमिका दी गई है । यदि मन्त्र से भिन्न कोई देवता न हो तो उस परिस्थिति में किसके लिंग का अन्वेषण मन्त्रों में किया जायगा? यदि मन्त्र ही देवता है, तब तो उनका स्पष्ट निर्देश वहाँ है ही । ' अनादिष्टा: ' इस पद में बहुव्रीहि भी मन्त्र और देवता का भेद मानने पर ही सम्भव हो सकता है । इसी तरह ' वह यज्ञ अथवा यज्ञाङ्ग जिस देवता के लिये है, वही उसका देवता है ' इस निरुक वाक्य का भी स्वामी दयानन्द यही अभिप्राय बतलाते हैं । जहाँ पर कोई विशेषता नहीं देखी जाती, वहीं पर यज्ञ को अथवा यज्ञाङ्ग को देवता माना जाता है । यहाँ पर न चाहते हुए भी दयानन्द ने मन्त्र से भिन्न यज्ञ और यज्ञांग को देवता मान लिया है । वास्तव में तो यह अर्थ भी अशुद्ध है । ' यद् दैवतः ' इस पद का अर्थ उन्होंने ठीक से नहीं समझा है । यदि उसके अर्थ का विचार किया जाता है तो अर्थ यह निकलता है कि जिस देवता के उद्देश्य से यज्ञ का विधान किया जाता है, अर्थात् जिस देवता को उद्दिष्ट कर अग्नि में हृवि दी जाती है, वह उस यज्ञ की देवता है और वही उस यज्ञ में विनियुक्त उन मन्त्रों की भी देवता है, forest कि न तो कोई देवता ही विहित हैं और न जिनका कोई लिंग वहाँ मिलता है । इसी तरह यज्ञांग के विषय में भी समझना चाहिये |

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वेदार्थ पारिजातः ५६५ यतु ' ये खलु यज्ञादन्यत्र प्रयुज्यन्ते ते वै प्राजापत्याः परमेश्वरदेवताका मन्त्रा भवन्तीति याज्ञिका मन्यन्ते । अत्रैवं विकल्पोऽस्ति नाराशंसा मनुष्यविषया इति निरुक्ता ब्रुवन्ति । तथा या कामनासा कामदेवता भवतीति सकामा लोकिका जना जानन्ति ' ( पृ ० ६ ९ ), तदपि तुच्छम्, वाक्यार्थानवबोधात् । आश्चर्य जिज्ञासु-महाशयो s स्या भूमिकायास्त निर्मातुर्दयानन्दस्य च भूरि भूरि प्रशंसां कीदृशं चमत्कारं वीक्ष्य करोतीति न विद्मः । अत्रापि मन्त्रव्यतिरिक्ता परमेश्वररूपा देवताऽभ्युपेता | पूर्वमुक्तम् एता ( ऋचः ) एव कर्मकाण्डे देवताशब्दार्थाः सन्ति, अत्र तु याज्ञिकाः परमेश्वरदेवताका मन्त्रा इति याज्ञिका मन्यन्त इत्याह । ततः परमप्याह-- ' प्रायोदेवता वा, अस्ति ह्याचारो बहुलं लोके ' इति निरुक्तवाक्यमादाय भूयोऽपि तमेवार्थमतिदिशन्नाह— ' एवं देवताविकल्पस्य प्रायेण लोके बहुलमाचारोऽस्ति वचिद्देवदेवत्यं कर्म मातृदेवत्यं विद्वद्देवत्यं पितृदेवत्यं चैतेऽपि पूज्याः सत्कर्तव्याः सन्त्यतस्तेषामुपकर्तृत्वमात्रं देवतात्वमस्तीति विज्ञायते ' ( पृ ० ६ ९ ) । उपकर्तृत्वमेव मात्रादीनां देवतात्वे प्रयोजकमुक्तम् अग्रे तु द्योतकत्वम् । नोभयोरेकत्वं प्रवृत्तिनिमित्तं संभवत्यननुगमात् । नोभयोः प्रवृत्तिनिमित्तत्वमन्यथा व्यभिचारप्रसङ्गात् । एवं यज्ञदेवतो मन्त्र इति निरुक्तवाक्यव्याख्याने उक्तम् -- ' मन्त्रास्तु खलु यज्ञसिद्धये मुख्य हेतुत्वा-द्यज्ञदेवता एव सन्तोति निश्चीयते ' ( पृ ० ६ ९ ) इति, तदपि मूलविरुद्धं विसंगतं च । पूर्वं तु मन्त्रा एव देवतेत्युक्त -मिदानीं तु मन्त्राणां यज्ञदेवतात्वमुक्तम् । ' यज्ञे मन्त्रोच्चारणं किमर्थम् ' इत्याशङ्कय समाधानावसरे उक्तम्- ' यथा हस्तेन होम:, नेत्रेण दर्शनम्, त्वचा स्पर्शनं च क्रियते, तथा वाचा वेदमन्त्रा अपि पठ्यन्ते । तत्पाठेन स्तुतिप्रार्थनो-पासनाः क्रियन्ते । होमेन किं फलमित्यस्य ज्ञानं तत्पाठानुवृत्त्या वेदमन्त्राणां रक्षणम् ईश्वरस्यास्तित्वसिद्धिश्च सर्व-कर्मादावीश्वरप्रार्थना कार्य्येत्युपदेशः ' ( पृ ० ६४ ) इति । यह कहा जाता है कि जिन मन्त्रों का प्रयोग यज्ञ से अन्यत्र किया जाता है, उन मन्त्रों का प्रजापति अर्थात् परमेश्वर देवता होती है, यह याज्ञिकों का मानना है । यहाँ पर विकल्प है कि नाराशंस मन्त्रों का विषय मनुष्य है, ऐसा निरुक्तकार मानते हैं । ' तथा कामना काम देवता बाली होती है ' यहाँ पर सकाम लौकिक जन जानते हैं, यह अर्थ करना भी गलत है, क्योंकि उनको वाक्य का अर्थ ही ठीक से समझ में नहीं आया है । आश्चर्य है कि जिज्ञासु महाशय इस भूमिका की और इसके लेखक दयानन्द की भूरि - भूरि प्रशंसा किस चमत्कार को देख कर करते हैं । यहाँ पर भी मन्त्र से भिन्न परमेश्वर रूप देवता मानी गई है । पहले कहा गया है कि ये rant कर्मकाण्ड में देवता शब्द से कहे जाते हैं और अब यहाँ कहा जाता है कि याज्ञिक मन्त्रों के देवता परमेश्वर हैं । ' प्रायोदेवता वा ' लोके ' इस निरुक्त की व्याख्या करते समय पुनः वही बात कही गई है कि ' इस प्रकार देवता के विकल्प के विषय में प्रायः लोक में विभिन्न बाचार हैं — कहीं देवताओं के लिये कर्म किये जाते हैं, कहीं माता को देवता मानकर तथा इसी प्रकार कहीं विद्वानों की, पितृगणों को भी देवता मानकर कर्म किये जाते हैं । ये भी पूज्य हैं, सत्कर्तव्य, सत्कार करने के योग्य है, इससे ज्ञात होता है कि इनमें भी उपकर्तृत्व रूप देवता का लक्षण विद्यमान है ' । यहाँ पर माता आदि के देवतात्व का प्रयोजक उपकार करने की प्रवृति को माना है । आगे इसको प्रयोजक न मानकर द्योतक माना है । दोनों एक नहीं हो सकते तो अनुगम के अभाव में इनमें प्रवृत्ति की निमित्तता कैसे बनेगी और इस प्रकार ये व्यभिचरित हो जायेंगे । इसी तरह ' यज्ञदैवतो मन्त्र: ' इस निरुक्त वाक्य की व्याख्या में कहा गया है-- ' यज्ञ की सिद्धि में मुख्य कारण होने के कारण मन्त्रों का देवता यज्ञ ही है, यह मालूम पड़ता है । यह व्याख्या भी मूल के विरुद्ध है और असंगत भी है । पहले मन्त्रों को ही देवता कहकर अब मन्त्रों का देवता यज्ञ को बताया जाता है । ' यज्ञ में मन्त्रों का उच्चारण किस लिए है? ' ऐसी आशंका उपस्थित कर उसका समाधान करते हुए कहा गया है कि --- ' जैसे हाथ से होम, नेत्र से दर्शन, स्वगिन्द्रिय से स्पर्श किया जाता है, उसी तरह वाणी से वेद मन्त्र पढ़े जाते हैं । इस मन्त्रपाठ से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना होती है । तथा होम से जो - जो फल होते हैं, उनका स्मरण भी होता है । वेद मन्त्रों की बार - बार आवृत्ति करने से वेद मन्त्रों की रक्षा भी होती है । इससे ईश्वर का होना भी विदित होता है और ईश्वर की प्रार्थना के साथ ही सब कर्मों का आरंभ करना चाहिये, वह उपदेश भी मिलता है ' ।

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५६६ वेदार्थपारिजातः यदि यज्ञसिद्धिर्मन्त्रोच्चारणस्य फलं स्यात्तदा तदप्युच्येत । यज्ञकाले यथान्यैरिन्द्रियैः किञ्चित् क्रियते, तथैव वाचा मन्त्रोच्चारणम् । यथाम्येन्द्रियाणां यज्ञासाधकत्वं तथैव मन्त्रस्याप्यायातम् । प्रकृतोपकारकमेवाङ्ग भवति, न च मत्रोच्चारणं यागोपकारकमिति तद्वचनेनैव सिद्ध्यति । इदानीं तु यज्ञसिद्धये मन्त्राणां मुख्यहेतुत्वादि-त्युच्यते । यतो याज्ञदेवता एव सन्तीति निश्चीयत इत्यपि विसंगतम् । यज्ञ एव देवता येषां मन्त्राणामित्यर्थे याज्ञ-देवतापदस्यासाघुत्वापत्तेश्च । त्वद्रीत्या पुनरुक्तता च । ' स यज्ञो वा ' ( पृ ० ६ ९ ) इत्यत्रापि त्वया यज्ञस्यैव देवतात्वमुक्त-मेव । दयानन्देन यज्ञसम्बन्धिनीनां देवतानां परिगणनमपि कृतम् । तथाहि-- ' गायत्र्यादिच्छन्दोविता मन्त्राः, ईश्वराज्ञा, यज्ञः, यज्ञाङ्गम्, प्रजापतिः, परमेश्वरः, नरः कामः, विद्वान्, अतिथिः, माता, पिता, आचार्यश्चेति कर्म-काण्डादीन् प्रत्येता देवताः सन्ति । परन्तु मन्त्रेश्वरावेव याज्ञदेवते भवत इति निश्चयः ' ( पृ ० ७० ) । बृहद्देवतादिषु तु नेता देवता दृश्यन्ते । नवीनवेदिकस्यायमपूर्व आविष्कारः । किव, मन्त्राणां देवतात्वाङ्गीकारे कस्येमा देवता इति वक्तव्यम् । मन्त्राणामेव, उतान्यस्य? नान्त्यः, कस्याम्भ्यस्येति निर्वक्तुमशक्यत्वात् देवतानां मन्त्रसम्बन्धप्रतिपादकवचनविरोधाच्च । आये स्वात्माश्रय एव । नहि मन्त्राणां मन्त्र एव देवता भवन्ति, अभेदे सम्बन्धानुपपत्तेः । ननु कस्यचित्मन्त्रस्य मन्त्रस्वरूपप्रतिपादनमपि विषयो भवत्येव तथात्वे मन्त्रस्य मन्त्रान्तरं भवत्येव देवतेति चेत्, तत्तुच्छम् त्वदभ्युपगमविरोधात् । नहि त्वया मन्त्रस्य मन्त्रान्तरं देवता भवतीत्युच्यते । अवशिष्ट निरुक्तवचनाच्चार्य दुर्गाचार्यसंमतोऽर्थः यद्देवतः स यज्ञो यस्मिन्ननादिष्ट-देवतालिङ्गा मन्त्रा विनियुज्यन्ते, तद्देवता एव ते मन्त्रा भवन्ति । यथा ' आग्नेयोऽग्निष्टोमः ' इति श्रूयते । तत्र योजना-विष्कृतलिङ्गो मन्त्रो विनियुक्तः सोऽग्निदेवताक एव अर्थात् संदिग्धदेवताकेषु मन्त्रेषु प्रकरणबलाद्देवता यदि यज्ञ की सिद्धि भी मन्त्रों के उच्चारण का फल होती तो उसका भी यहाँ पर स्पष्ट निर्देश होता । यज्ञ करते समय जैसे दूसरी इन्द्रियाँ कुछ करती हैं, वैसे ही वाणी भी मन्त्र का उच्चारण करती है । जैसे इन्द्रियों यज्ञ की साधक नहीं हैं, आपके कथनानुसार उसो तरह मन्त्र लिए भी मानना पड़ेगा । प्रकृत में जो उपकारक होता है, उसी को अंग कहा जाता है | यहाँ पर आपके ही कथनानुसार यह आता है कि मन्त्र का उच्चारण यज्ञ में उपकारक नहीं है । इसके विपरीत यहाँ पर यज्ञ की सिद्धि के लिए मन्त्रों को मुख्य कारण माना गया है । इसलिये ' मन्त्र यज्ञदेवता के लिए ही है ' यह उक्ति असंगत है । ' जिन मन्त्रों का यज्ञ ही देवता है ' इस अर्थ में ' याज्ञदेवता ' इस पद की असाधुता भी हो जायगी । आपकी रीति से यहाँ पुनरुक्ति दोष भी होगा । ' स यज्ञो वा ' यहाँ पर आपने यज्ञ को ही देवता माना है । दयानन्द ने यज्ञ सम्बन्धी देवताओं का परिगणन भी किया है । जैसे कि --' गायत्री आदि छन्दों से युक्त वैदिक मन्त्र, उन्हीं में ईश्वर की आज्ञा, यज्ञ और उसके अंग अर्थात् साधन प्रजापति परमेश्वर, मनुष्य, काम, विद्वान्, अतिथि, माता, पिता और आचार्य ये अपने - अपने दिव्य गुणों से ही देवता कहाते हैं । परन्तु यज्ञ में तो वेदों के मन्त्र और ईश्वर को ही देवता माना है । बृहद्देवता भादि प्राचीन ग्रन्थों में ये देवता नहीं दिखाई देते । यह नवीन वैदिक देवताओं का मोखा आविष्कार है । मन्त्रों को यदि आप देवता मानते हैं तो ये मस्त्र किसके देवता है, यह आपको बताना होगा । ये मन्त्रों के ही देवता हैं या और किसी के? यहाँ दूसरा पक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि किसी अन्य देवता का निर्वाचन नहीं किया गया है । देवताओं का मन्त्र के साथ संबन्ध जोड़ने वाले वचनों से इसका विरोध भी होगा । पहले पक्ष में स्वात्माश्रय दोष उपस्थित होगा । मन्त्रों के मन्त्र ही देवता नहीं हो सकते, क्योंकि अभि वस्तु में संबन्ध नहीं बनता । भाई, किसी मन्त्र का विषय मन्त्र के स्वरूप का प्रतिपादन भी मान लिया जाएगा, इस अवस्था में एक मन्त्र का दूसरा मन्त्र देवता हो जायगा । यह कथन भी आपके पहले स्वीकृत सिद्धान्त के विरुद्ध है । आपने कहीं भी एक मन्त्र का दूसरे मन्त्र को देवता नहीं माना है | fre क्त की यह दुर्गाचार्य संमत व्याया अवश्य है । ' जो यज्ञ जिस देवता का होता है, इसमें यदि ऐसे मन्त्रों का पाठ है, जिनका कि देवता किसी लिंग से भी आादिष्ट ( परिज्ञात ) नहीं हैं, तो उस यज्ञ के देवता हो उन मन्त्रों के भी देवता होते हैं । जैसे कि ' अग्निष्टोम यज्ञ अग्नि देवता का है ' यह सुना जाता है । इस प्रकरण में यदि ऐसा कोई मन्त्र पढ़ा गया है कि जिसमें किसी देवता का लिंग स्पष्ट नहीं है, तो वह मन्त्र अग्नि देवता का हो

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वेदार्थपारिजात: ५६७ निर्णेतव्या । यज्ञाङ्गं वा, अर्थात् प्रातःसवने यस्तादृशो मन्त्रो विनियुक्तः स आग्नेयः, माध्यन्दिने ऐन्द्र:, सायंसवने स आदित्यो मन्त्रो ज्ञातव्यः । ननु ' उत्सन्नयज्ञो वा एष: ' ( मे ० सं ० ११११; छा ० ४।३३ ० सं ० ४१३३४ ) इत्यादिब्राह्मण-वचनैरुत्सन्नयज्ञा अपि मन्त्राः सन्ति । तेषूत्सन्तप्रकरण प्रयोगेषु वाचस्तोमप्रयोगविनियोगकल्पेषु किं ब्राह्मणस्य पितर पृच्छसि किं नु मातरं श्रुतविदस्मिन् वेद्यं स पितामह ' इत्यादिषु कथं देवतापरिज्ञानं स्यादित्याशङ्कायामाह -यज्ञादन्यत्र प्राजापत्या मन्त्रा इति याज्ञिकाः । ' अनिरुक्तो हि प्रजापति: ( मं ० [ सं ० ३ | ६ | ५ ) इति रीत्या यज्ञादन्यत्र प्रकरणादिभिर्देवताविशेषस्यानिर्णयेऽनिरुक्तः प्रजापतिरेवानिरुक्तलिङ्गानां मन्त्राणां देवतेति । नैरुक्तास्तु –'ते नाराशंसा मन्त्रा इति मन्यन्ते । नराशंसोऽग्निर्यज्ञो वा । यज्ञ इति कात्यक्योऽग्निरिति शाकपूणिः ' ( नि ० ८६ ), ' विष्णुर्वै यज्ञ: ' ( ० ४।३।७ ऐ ० ३।४ ) इति श्रुतिभ्याम्, ' अग्निहि भूयिष्ठभाग् देवतानाम् ' ( मे ० सं ० ४१३१८ ) सर्वदेवताश्रयणाच्च, अग्निर्वै सर्वा देवताः । यस्मिन् यज्ञे नाराशंसस्तस्मिन्नपि यज्ञेऽस्य सर्वस्य जगतो यज्ञ-प्रभवत्वाद्यज्ञस्य श्रैष्ठ्यं भवति । अपरिग्रहं च श्रेष्ठगामि भवति । तेन यथा यस्य क्षेत्रादिसंपत्तेनं कश्चित् स्वामी भवति, तदन्यापरिग्रहं सद्राजगामि भवति, तस्य श्रेष्ठत्वात् । अत एवानिरुक्तलिङ्गा मन्त्रा अपि यज्ञदेवताका मन्तव्याः । केचित्तु यैर्नराः प्रशस्यन्ते स नाराशंसो मनुष्यस्तुतिरूप एवेति मन्यन्ते, तत्तु न युक्तम् । नहि मनुष्याणा-मनाविष्कृतलिङ्गः स्तुतिरुपपद्यते । अनादिष्टमन्त्राणां दुर्बोधत्वान्मनुष्याणां चाल्पबुद्धित्वात् । जायगा । इसका अभिप्राय यह है कि जिन मन्त्रों का देवता संदिग्ध है, उनका निर्णय प्रकरण के आधार पर करना चाहिये | अथवा यज्ञांग के अनुसार उनका निर्णय होगा । अर्थात् प्रातः सवन में यदि इस प्रकार का मन्त्र विनियुक्त हो तो उसका देवता अग्नि, माध्यन्दिन सवन में इन्द्र और सायं सवन में आदित्य होगा । ' उत्यज्ञो वा एष: ' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य मन्त्रों का उत्सन्न यज्ञों में भी विनियोग बताते हैं । इस प्रकार के उत्सन्न प्रकरण के प्रयोगों में, जो कि वाचस्तोम प्रयोगों के विनियोग के तुल्य हैं, जैसे कि - ' ब्राह्मण के माता - पिता के बारे में क्यों पूछते हैं, यहाँ पर शास्त्रज्ञ की पूछ होनी चाहिए, वह पितामह है ' यहाँ पर देवता का परिज्ञान कैसे होगा? इस प्रकार की आशंका कर है कि यश से अम्यत्र प्रयुक्त मन्त्रों का देवता प्रजापति है, यह याज्ञिकों का कहना है, ' अनिरुक्तो हि प्रजापतिः ' यह सत्र इसी कहा बात का प्रतिपादन करता है । इस प्रकार यज्ञ से अन्यत्र प्रकरण आदि के द्वारा किसी विशेष देवता का निर्णय न होने पर अतिक प्रजापति ही अनुक्त लिंग वाले मन्त्रों का देवता माना जायगा । free कारों के मत से मन्त्र नाराशंस होते हैं । नाराशंस अग्नि अथवा यज्ञ को कहा जाता है । इसमें ' कात्यक्य के मत से for और शाकपूणि के मत से यज्ञ नाराशंस है ', ' यज्ञ विष्णु है ' यह वचन भी इसमें प्रमाण है । ' ' अग्नि देवताओं में बड़े भाग ग्रहण करने वाला है ' इस वचन से और अम्ति सब देवताओं का आश्रय है, अर्थात् वही सब देवताओं के पास उनके यज्ञीय हवि के प्राप्तव्य अंश को पहुंचाता है, अतः अग्नि सर्वदेवतामय है । जिस यज्ञ में नाराशंस है, उसमें भी सारे जगत् के यज्ञ से संभूत होने से यज्ञ की ही श्रेष्ठ रहती है । अपरिग्रह श्रेष्ठगामी होता है । इसलिये जैसे खेत - खलिहान आदि सम्पत्ति का कोई मालिक न हो तो वह राजा की हो जाती है, क्योंकि वह श्रेष्ठ है, उसी तरह जिन मन्त्रों का कोई देवता लिंग आदि से परिज्ञात नहीं है, वे मन्त्र यज्ञदेवता वाले होंगे । कुछ लोगों का कहना है कि जिन मन्त्रों में मनुष्यों की प्रशंसा होती है, वे मन्त्र नाराशंस कहलाते हैं । यह ठीक नहीं है । fair for आदि प्रमाण से मनुष्यों का अवबोध हुए बिना मन्त्रों से उनको स्तुति नहीं हो सकती, क्योंकि इस प्रकार के अनादिष्ट मन्त्रों के अर्थ की अवगति दुरूह होती है और मनुष्य अल्प बुद्धि वाला है ।

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५६८ ' अपि वा सा कामदेवता स्यात् अनाविष्कृतलिङ्गो मन्त्रः कामदेवत: स्यात्, गुणमयत्वात् । अन्यतमदेवता-विशेषप्रख्यापकस्य पदस्याभावादन्यव्यावृत्त्यसंभवः | गुणपदानां सर्वदेवताश्रयत्वादैश्वर्य्ययोगाच्च सर्वासां देवता-नाम् । अतो यथाकामं काचिदपि देवताऽनाविष्कृतलिङ्गानां कल्पयितुं शक्यते । नात्र काचित् कामाख्या देवता तेषां मन्त्राणां भवति । ' प्रायोदेवता वा ' ( पृ ० ६ ९ ) प्रायः शब्देनाधिकार उच्यते, यद्देवताधिकारेऽध्ययनपाठानुक्रमे योजना-विष्कृत लिङ्गो मन्त्रो भवति, स तद्देवत इति । यथाभ्यधिकारे वर्तमाने आग्नेय इन्द्राधिकारे चैन्द्र एव । अथवा अमृतप्रायो देवदत्त इत्युक्त ऽनृतबहुलमित्येवार्थो भवति । अतः प्रायोदेवतेत्युक्त बहुलदेवतेति स्यात् । अस्ति ह्याचारो बहुलं लोके । अस्ति हि लोके बहुलस्य भूयस्त्वेन प्रसिद्धिः । निर्दिष्टेभ्यो द्रव्येभ्यो यदवशिष्यते तत्साधारणम् । यथा कश्चिद् गृही इदं मे देवदैवत्यं द्रव्यमिदमतिथिदेवत्यमिदं पितृदेवत्यम् । तत्र निर्दिष्टेभ्यो यदन्यदवशिष्यते, तद् देवपितृमनुष्याणां साधारणम् । एवमिहाप्यादिदेवतालिङ्गान्मन्त्रराशेर्योऽन्योऽनाविष्कृतदेवतालिङ्गो मन्त्रराशिः स्यात् स साधारण्याद् बहुदेवतो वैश्वदेव एव स्यात् । कः पुनरत्र निर्णय इत्याकाङ्क्षायामाह ' याज्ञदेवतो मन्त्र: ' ( पृ ० ६ ९ ) । योऽनाविष्कृतलिङ्गो मन्त्रः स याज्ञो वा स्याद्देवतो वा । ' विष्णुर्वे यज्ञः ' इत्युक्तम् । विष्णुश्च द्वादशादित्येषु परिगण्यते । आदित्यश्च नैरुक्तानां थाने समास्तात: ( निघण्टु ५१६ ) । तस्मादादित्यदैवतः स मन्त्रः स्यात् । अथवा देवतः स मन्त्रः । देवता अस्मिन्निति । अवशिष्टं देवतात्वमग्नावेव ' अग्निर्वे सर्वा देवता: ' ( काठसं ० १०1१ ) इति श्रुतेः । अपरिग्रहं च प्रधानगामीति न्यायात् । ' अथवा वह ऋचा कामदेवता वाली होगी ' अर्थात् जिस मन्त्र का देवता स्पष्ट नहीं है, वह गुण विधि से कामदैवत हो जायगा । किसी एक विशेष देवता का स्पष्ट प्रतिपादन न होने से अन्य की व्यावृत्ति नहीं होगी, क्योंकि ऐश्वर्यशालिता आदि गुण सभी देवताओं में समान रूप से विद्यमान हैं । इसलिये जिनका देवता स्पष्ट प्रतिपादित नहीं है, ऐसे मन्त्रों की देवता अपनी इच्छा के अनुसार कल्पित की जा सकती हैं । कोई ' काम ' नाम वाली देवता उन मन्त्रों को यहीं नहीं बताई गई है । ' प्रायोदेवता वा ' यहाँ पर प्राय शब्द से अधिकार कहा गया है । जिस देवता के अधिकार में अध्ययन पाठ के अनुक्रम में at are reve for वाला होता है, उसका विनियोग उस अधिकृत देवता में होता है । जैसे कि अति के अधिकार में वर्तमान मन्त्र आग्नेय और इन्द्र के अधिकार में वर्तमान ऐन्द्र होता है । अथवा ' अनृतप्राय देवदत्त है ' ऐसा कहने पर जैसे ' बहुत झूठ बोलने वाला ' यह अर्थ निकलता है, इसी तरह ' प्रायोदेवता ' ऐसा कहने से भी ' बहुत देवता वाला ' यह अर्थ निकलता है । इसी प्रकार का व्यवहार लोक में देखा जाता है । लोक में बहुल शब्द की प्रसिद्धि भूयः अर्थ में है । निर्दिष्ट द्रव्यों में जो बच जाता है वह सर्व सामान्य हो जाता है । जैसे कोई गृहस्थ यह ror देवता के लिये हैं, यह अतिथि के लिये और यह पितृगण के लिये, ऐसा विभाग करता है और इसमें से जो बच जाता है वह देव, पितृ, मनुष्य साधारण हो जाता है । इसी तरह यहाँ पर भी विद्यमान मन्त्र समूह में से जिन मन्त्रों का देवता लिङ्ग आदि से स्पष्ट आदिष्ट है, तदितर अनादिष्ट देवता वाले मन्त्रों का साधारण, बहुत से देवताओं का समूहभूत ' विश्वेदेव ' देवता होगा | यहाँ निर्णय क्या हुआ? इस आशङ्का की निवृत्ति के लिये कहा गया है कि मन्त्र यज्ञ और देवता के लिये है । जिस मन्त्र का देवता स्पष्ट नहीं है, वह यज्ञ अथवा देवता के लिये होगा । ' यज्ञ विष्णु है ' यह कहा गया है । विष्णु की १२ आदित्यों में गणना होती है । निरुक्तकारों ने आदित्य को स्थानीय देवता माना है । इसलिये वह मन्त्र आदित्य देवता का होगा, अथवा भवशिष्ट देवता वाला वह मन्त्र होगा । अवशिष्ट देवता अग्नि माना जाता है । काठक श्रुति में कहा गया है कि अग्नि सर्वदेवमय है । अपरिग्रह प्रधानगामी होता है, ऐसा मीमांसा का न्याय है ।

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५६६ ' यद्दैवतः स यज्ञो वा यज्ञाङ्गं वा तद्देवता भवन्ति ' इत्यस्यान्यदपि व्याख्यानं दुर्गाचार्येण कृतम् । यद्देव प्रधानं हविः, यथा प्रकृतावेन्द्रसान्नाय्यं माहेन्द्रं वा ( तै ० सं ० २१६ ), तत्संस्कारपरा इषे त्वादयः । तेनाविष्कृतदेवता-लिङ्गा ऐन्द्रा एव भवन्ति माहेन्द्रा वा । यद्देवतेऽधिकारे चोदकेन मन्त्राः प्रदिश्यन्ते तद्देवता एव ते भवन्ति । यथा ' कुविदङ्ग ' ( ऋ ० सं ० १।१३१।२ ) इत्यस्य प्राजापत्यग्रहणे विनियोगात् प्राजापत्य एव स मन्त्रो भवति । यज्ञाङ्गं वा इत्याधाराद्यङ्गाभिप्रायेण । ' ऋषभोऽसि शाक्वर: ' ( ० सं ० १ | १ | १२ ) इत्यनाविष्कृत देवतालिङ्गो मन्त्रः पूर्ण सुवा-सादमन्त्रः स्रौ विनियोगात्, तस्य च प्राजापत्यत्वात् प्राजापत्यो मन्त्रोऽपि भवति । अथान्यत्र यज्ञाद् यज्ञादन्यत्रो पाकरणब्रह्मयज्ञजपप्रायश्चित्तेषु प्रजापतिदेवताका मन्त्रा ज्ञेयाः । ननु यत्र देवतोद्देश्येनाग्नी विहितद्रव्यनिक्षेपः कर्तव्यस्तत्रैव देवतान्वेषणमावश्यकं न सर्वत्रेति चेन्न देवताज्ञानस्य छन्दसा -मयातयामत्वायानिष्टवारणाय च सर्वत्रापेक्षणीयत्वात् । ' यो ह वा अविज्ञातार्षेयछन्दोदेवत ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वच्छेति गर्ने वा पतति प्रवा मीयते । यातयामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति ' इत्यार्षेयब्राह्मण-वचनात् । यस्य मते मन्त्रे मन्त्रा एव देवताः, परमेश्वर एव सर्वत्र देवता, वस्य सर्वथाप्यस्य ब्राह्मणस्यासंगतिरेव | तथा चोपाकरणादिकर्मसु प्रजापतिरूपा देवताः, अनिरुक्ततासामान्यात् । अपि ह्यदेवता देवतावत् स्तूयन्ते । पूर्वं यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुति प्रयुङ्क्ते देवतानामार्थपत्यसंवन्धाद् मन्त्रदेवतालक्षणमुक्तम् । तच्चानाविष्कृतदेवताकेष्वपि मन्त्रेषु संविज्ञातदेवतापदाभावाद् देवता कल्प्यते । तत्र कामदेवता कामाधिपतिरेव देवता विज्ञेया । ' यद्दैवतः " भवन्ति ' इस वाक्य की दुर्गाचार्य ने एक दूसरी भी व्याख्या की है । प्रधान हवि के अनुसार देवता होती है । जैसे प्रकृति याग में इन्द्र अथवा महेन्द्र को सानाम्य हवि दी जाती है । इसके संस्कार के लिये ' इषे त्वा ' इत्यादि मन्त्र है । इनके देवता प्रदर्शक लिङ्ग स्पष्ट न होते हुए भी इनका विनियोग इन्द्र अथवा महेन्द्र के लिये होता है । जिस देवता के अधिकार में विधि के द्वारा मन्त्र आदिष्ट होते हैं, वही उनकी देवता होती हैं, जैसे कि ' कुविदङ्ग ' इस मन्त्र का प्राजापत्य हवि के ग्रहण में विनियोग होने से वह मन्त्र प्रजापतिदेवता का है । ' यज्ञाङ्गं वा ' यह पद आधार आदि कङ्गों के अभिप्राय से प्रयुक्त है । ' ऋषभोऽसि शाक्वर: ' यह अस्पष्ट लिंग देवता वाला मन्त्र पूर्ण सुवासादन का भी मन्त्र हैं और इसमें ( स्रुवसंपाद्य कर्म ) विनियुक्त है । यह सुवासादन प्रजापति देवता के लिये किया जाता है, अतः यह मन्त्र प्रजापति देवता का भी है । ' retter ] यज्ञात् ' इत्यादि का अभिप्राय है कि यज्ञ से अन्यत्र उपकरण, ब्रह्मयज्ञ, जप, प्रायश्चित्त आदि में आने वाले मन्त्र प्रजापतिदेवता वाले होते हैं । यह कहना ठीक नहीं है कि जहाँ पर किसी देवता को उद्दिष्ट कर अग्नि में विहित द्रव्य की आहुति देना हो, वहीं पर देवता का अन्वेषण आवश्यक है, सब जगह नहीं, क्योंकि छन्दस् अर्थात् मन्त्रों की अयातयामता अर्थात् उनके प्रभाव की afararat के लिये और अनिष्ट के निवारण के लिये देवता के ज्ञान की आवश्यकता है । ' जो व्यक्ति मन्त्रों के ऋषि, छन्द, देवता, ब्राह्मण आदि को बिना जाने उनसे यज्ञ कराता है, अथवा उनको पढ़ाता है, वह मूढ बुद्धि हो जाता है, अनिष्ट को प्राप्त करता है, अथवा मृत्यु के मुँह में चला जाता है, इसके मन्त्र प्रभावहीन हो जाते हैं । यह आर्षेय ब्राह्मण का वचन है । जिसके मत में मन्त्र में मन्त्र ही देवता है, परमेश्वर ही सब मन्त्रों के देवता है, वहाँ पर इस ब्राह्मण की कोई संगति नहीं बैठती । इस तरह उपाकरण आदि कर्मों में किसी देवता के न कहे जाने से प्रजापति देवता होगा । कहीं पर जो देवता नहीं है, उसकी भी देवता के समान स्तुति की जाती है । पहले ' काम ऋषि: ' इत्यादि से कहा गया है कि ऋषि अर्थात् मन्त्र किसी कामना का अधिपति मानकर किसी देवता की स्तुति करता है, उसी के अनुसार उस मन्त्र का देवता होता है, यह देवता का लक्षण बताया गया है । जिन मन्त्रों के देवता नहीं बताये गये हैं, वहाँ पर किसी विज्ञात देवता के अभिधायक पद के न होने से देवता की कल्पना करनी पड़ती है और वहाँ कामदेवता अर्थात् कामना की अधिपति हो देवता जाननी चाहिये ।

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 630 का मूल पृष्ठ
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दबाब वेदार्थपारिजातः यत्तु ' देवो दानाद्वा दीपनाद्वा द्योतनाद्वा युस्थानो भवतीति ' ( नि ० ७।१५ ), ' मन्त्रा मननाच्छन्दांसि छादनात् ' ( नि ० ७११२ ) इत्यादीनां व्याख्यानावसरे निगदितम् — ' यत्स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकं परस्वत्वोपपादनं तद्दानं भवति । दीपनाद् दीपनं प्रकाशनम् । द्योतनाद् द्योतनमुपदेशादिकं च । अत्र दानशब्देनेश्वरो विद्वांसो मनुष्याश्च देवता-संज्ञाः सन्ति । दीपनात्सूर्यादयो द्योतनाद् मातृपित्राचार्यातिथयश्च द्युस्थाना: । तथा द्यौः किरणा आदित्यरश्मयः प्राण-सूर्यादयो वा स्थानं स्थित्यर्थं यस्य स द्युस्थानः । प्रकाशकानामपि प्रकाशकत्वात् परमेश्वर एवात्र देवोऽस्तीति विज्ञेय-मिति ' ( पृ ०७० ), तदपि न संगतम्, यतः ' अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ' ( ऋ ० सं ० १ | १ | १ ) अस्य मन्त्रस्य व्याख्यानप्रसङ्गेऽग्निविशेषणस्य देवमशब्दस्य व्याख्यानार्थं निरुक्तकारी यास्काचार्यो देवलक्षणं व्यनक्ति । तत्राग्निशब्दश्चतुर्दशे खण्डे व्याख्यातः - ' अग्निः कस्मादग्रणीर्भवत्यग्रं यज्ञेषु प्रणीयतेऽङ्गं नयति संनम-Hasariya भवतीति स्थौलाष्ठीविः । न क्नोपयति न स्नेह्येति । त्रिभ्य आख्यातेभ्यो जायत इति शाकपूणिः । इतादत्ताद्दग्धाद्वा नीतात् । स खल्वेतेरकारमादत्ते गकारमनर्वा दहतेर्वा नीः परस्तस्यैषेति ' । ' एकं सद्विप्रा बहुधा वर्दान्त ' । आत्मविद् दृष्ट्या अग्निशब्दस्य परमात्मैवार्थः । याज्ञिकानां दृष्ट्या लोकवेदप्रसिद्धः कर्माङ्गभूतो देवता विशेषोऽग्निविवक्षितः । विशिष्टस्थानकर्मा मध्यमोत्तमाभ्यां ज्योतिर्भ्यामन्यः पार्थिवोऽग्निरिति नैरुक्तदृष्टिः, ' अग्निः पृथिवीस्थान: ' इति निरुक्तवचनात् । अर्थात् पृथिव्येवास्य विशेषतः स्थानं नान्तरिक्षं न द्यौः । तत्रात्मवित्पक्षे सर्वमभिधानमात्मार्थमेवेति सर्वा व्युत्पत्तयस्तत्र संगच्छन्ते । याज्ञिकपक्षेऽग्रणीत्वादग्निः सर्वेष्वर्थेष्वसावात्मानमग्रं नयति सर्वत्र तथोपकरोति यथाग्रं सम्पद्यते । अथवा ' अग्निर्वै देवानां सेनानीः ' इति त्याप्यैश्वय्यैशाली देवविशेषोऽग्निः सिद्धयति । अयं यज्ञेषु प्रणीयत इति रीत्या आहवनीयादिः प्रत्यक्षसिद्धो ' दान, दीपन और द्योतन के कारण तथा स्थानीय होने से देवता कहलाता है ', ' मनन से मन्त्र तथा छादन से छन्द: पद बनता है ' इत्यादि निरुक्त वाक्यों की व्याख्या करते समय कहा गया है कि - ' अपने स्वत्व को हटाकर दूसरे के स्वत्व की स्थापना को दान कहा गया है । दीपन का अर्थ है प्रकाशन | उपदेश आदि द्योतन पद से अभिहित होते हैं । यहाँ पर दान पद से ईश्वर, विद्वान् और देवता कहलाते हैं । दीपन पद से सूर्य प्रभूति और द्योतन पद से माता, पिता, आचार्य और अतिथि देवता कहे जाते हैं । ' युस्थानः ' पद का अर्थ है कि की, अर्थात् सूर्य की किरणे अथवा प्राण, सूर्य आदि जिसके निवास का स्थान हैं ' । यह पूरा व्याख्यान असङ्गत है. क्योंकि ' अग्निमीळे ' इत्यादि मन्त्र के व्याख्यान के अवसर पर अग्नि पद के विशेषण देव पद की व्याख्या करने के लिये निरुक्तकार यास्काचार्य देवता का लक्षण कहते हैं । वहाँ पर चतुर्दश खण्ड में अग्नि पद की व्याख्या है । ' इसको अग्नि क्यों कहते हैं? इसलिये कि यह अग्रणी होता है, यज्ञ में सबसे पहले इसी का विधान होता है, जहाँ इसका विधान होता है, वहाँ पर यह अन्य विनियुक्त पदार्थों को अपना अङ्ग बना लेता है, साथ ही यह अफ्नोपन होता है, अर्थात् स्थूल दृष्टि वालों से स्नेह नहीं करता । शाकपूणि आचार्य के मत से अग्नि शब्द तीन बाख्यातों से बनता है । अर्थात् अत, बाघ और नीत पदों से अकार, मकार, और निकार का ग्रहण करके यह शब्द बनता है । ' विग का कहना है कि वह एक ही अनेक रूप धारण करता है ' इस मन्त्र के अनुसार आत्मविद् की दृष्टि से after शब्द का अर्थ परमात्मा है, यही अर्थ याज्ञिकों को दृष्टि से लोक और वेद में भी है । यज्ञ - याग अदि कर्मों का बङ्गभूत देवता विशेष अ for एक ऐसा देवता है, जिसका कि कोई विशिष्ट स्थान अथवा कर्म विवक्षित नहीं है, यह मध्यम और उत्तम ज्योति से भिन पार्थिव अग्नि है, यही नैरुक्त दृष्टि है । ' अग्नि पृथिवीस्थान देवता है ' यह निरुककार का कहना है, अर्थात् इस अग्नि का पृथिवी ही fa शेष स्थान है, अन्तरिक्ष और आकाश नहीं । इनमें आत्मविद के पक्ष में सारे नाम आत्मा के ही अवबोधक है, अतः सारी व्युत्पत्तियाँ उसी दृष्टि से की जाती हैं । याज्ञिक पक्ष में यह अति अग्रणी होने से सभी बातों में यजमान को आगे ले जाता है, सभी स्थानों पर ऐसी सहायता करता है कि वह आगे पहुँच जाता है । अथवा ' अग्नि देवताओं का सेनापति हैं इस विवाक्य के अनुसार ऐश्वर्यशाली देवता विशेष को after