वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 631–640
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 631–640
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वैवार्थ पारिजातः ६०१ यज्ञाग्निरेवाग्निपदार्थः । अङ्गं नयति संनममानः । यत्रायं संनमयति साधनत्वेन वैदिके लौकिके वा कर्मणि तत्रात्मानमेव प्रधान कृत्य सर्वमन्यदात्मनोऽङ्गतां नयति । अथवा तृणे काष्ठे वा यत्र संनमयत्याश्रयति तदात्मनोऽङ्गतां नयति, आत्म-सात्करोति । एतादृशोऽग्निः प्रत्यक्ष आहवनीयादिरेव | अक्नोपनं निरुक्षीकरणं निस्नेहनमपि तत्रैव संभाव्यते । एति दहति देवेभ्यो हवींषि नयति । एतदर्थानुकूलाः सर्वा आग्नेय्य ऋचः । नहि तादृशेऽनो देवशब्दस्य त्वत्कृता अर्थाः संगच्छन्ते । नहि स्थानत्वं तस्य संभवति, तस्य पृथिवीस्थानत्वात् । नह्यादित्यरश्मिषु प्राणसूर्यादिषु वा तदीयं स्थानं संभवति । तेन निरुक्तविरुद्ध एव त्वदर्थः । द्योतनस्योपदेशपरत्वमपि नार्थः द्योततेर्दीप्त्यर्थकत्वात् । नहि मनुष्या देवसंज्ञा भवन्ति, देवतानां माहाभाग्यान्मनुष्याद् वैशिष्टघबोधनात् । तस्माद् दुर्गाचार्योक्त एवार्थी युक्तः । देवो दानादैश्वर्यशालित्वादसौ यजमानेभ्योऽभीष्टं ददातीत्यग्निर्देवः । दीपनाद् दीपयति प्रकाशयति तेजोमयत्वात् । द्योतनात् स्वयं प्रकाशकत्वादपि देवोऽग्निः । सामान्यं हि द्यौः स्थानं देवतानां तयोस्तु कर्माधिकारस्थाने विशिष्टे पृथिव्यन्तरिक्षे | recast निर्वचनभेददर्शनार्थं वा । यत्तु -- ' न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति || ' ( कठ ० ५।१५ ) इत्युक्तरीत्या परमेश्वर एवोपास्य: ' ( पृ ० ७१ ) इत्युक्तम्, तदपि न, सगुणस्य तस्य परमेश्वरस्योपास्यत्वेऽपि निर्गुणस्योपास्यत्वानुपपत्तेः मनोबुद्धयविषयत्वात्, ' नेदं यदिदमुपासते ' ( केनोपनिषदि ) इति विरोधाच्च । कथं तं भान्तमनुभातीति तु नोक्तम् । शुद्धो मन्त्रार्थस्त्वेवम्-- तत्र सर्वभासकभास के सच्चिदानन्दात्मके कहा जाता है । ' यज्ञ में आगे प्रणयन होता है ' इस निर्वाचन के अनुसार आहवनीय आदि प्रत्यक्षसिद्ध यज्ञाग्नि ही यहाँ पर अग्नि पद का अर्थ है । ' अङ्गं नयति संनममान: ' इसका अर्थ है कि जिस वैदिक अथवा लौकिक कर्म में साधन के रूप में इसका संनमन होता है, यहाँ पर यह अग्नि अन्य सारी वस्तुओं को अपना अंग बना लेता है । अथवा तृण अथवा काष्ठ में जिसको यह अपना आश्रय बनाता है, उसको अपना अंग बना लेता है, आत्मसात् कर लेता है । ऐसा अग्नि प्रत्यक्षसिद्ध माहवनीय ही हो सकता है | अक्नोपन अर्थात् स्नेहभाव, चिक्कणता आदि को दूर कर रूक्षता ( रूखापन ) का संपादक भी वहीं हो सकता है । यह अग्नि ही यज्ञ में आकर हवि ग्रहण करता है और उसको देवताओं के पास ले जाता है । इस अर्थ से अनुकूलता रखने वाली सारी आग्नेय ऋचायें है । इस अग्नि में आपके द्वारा किये गये देव शब्द के अर्थों की संगति नहीं बैठती । वह अग्नि स्थानीय नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ पर वह पृथिवी-स्थानीय देवता है । आदित्यरश्मि, प्राण, सूर्य आदि में भी उसका स्थान नहीं है, इस प्रकार आपका किया गया अर्थ fr रुक्त प्रतिपादित अर्थ का विरोधी है । द्योतन का अर्थ उपदेश करना भी नहीं होगा, क्योंकि त् धातु का अर्थ दीप्ति है | मनुष्य कभी देवता पद से नहीं कहे जाते । देवता महाभाग्यशाली हैं, अतः उनमें मनुष्यों की अपेक्षा वैशिष्ट्य रहता है । इसलिए इस निरुक्त प्रकरण का दुर्गाचार्य का किया गया अर्थ ही ठीक है । दान के कारण देव है । अग्नि अपने ऐश्वर्य के बल से यजमान को अभीष्ट फल देता है, अतः वह देव है । दीपन के कारण भी वह देव है, तेजोमय होने से वह सब वस्तुओं को प्रकाशित करता है । द्योतन अर्थात् स्वयं प्रकाश होने से भी अग्नि देव है । देवताओं का सामान्य स्थान आकाश है, किन्तु पृथिवी और अन्तरिक्ष भी कर्म और अधिकार के संपादक होने से इनके स्थान हैं । इन सबका अर्थ अन्ततः एक ही है, किन्तु भिन्न - भिन्न निर्वचन दिखाने की दृष्टि से ये भेद किये गये हैं । ' वहाँ पर न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और तारागण ही । यह विद्युत् भी वहाँ प्रकाशित नहीं होती, तो यह अग्नि कैसे प्रकाशित होगी? उस ब्रह्म, परमात्मा के प्रकाशित होने पर ही अन्य सब कुछ प्रकाशित होता है । उसी के प्रकाश से ' मे सूर्य - चन्द्र आदि सब पदार्थ प्रकाश ग्रहण कर प्रकाशित होते हैं । ' इस काठक श्रुति के अनुसार परमेश्वर ही उपास्य है, यह बात कही गई है । किन्तु यह ठीक नहीं है । यद्यपि सगुण परमेश्वर की उपासना हो सकती है, किन्तु मन और बुद्धि का विषय न होने से निर्गुण की उपासना संभव नहीं । ' जिसकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्म ( परमात्मा ) नहीं है ' इस श्रुति वचन से उक्त अर्थ का विरोध भी है । इस मन्त्र का शुद्ध अर्थ यह है- ' सभी प्रकाशों के प्रकाशक सच्चिदानन्दात्मक उस ब्रह्म के विषय में सूर्य - चन्द्र आदि प्रकाश नहीं ७६
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६०२ वेदार्थपारिजातः ब्रह्मणि सूर्यादयो न भान्ति तेषां पराग्वस्तुप्रकाशकत्वात् । तं भारतमनु ते भान्ति । यथाऽऽलोकादौ भासमाने एव नील-पीतादीनि रूपाणि भान्ति, तथैव स्वप्रकाशरूपिणि ब्रह्मणि भासमान एव सूर्य्यादीनां भानम् । अत एवान्तरप्रकाशा-संसर्गे निद्रादों सत्यपि सूर्ये न तद्भानं संभवति, यथा वा दर्पणे भासमान एव तद्गतप्रतिबिम्बभानं भवति, तथा चिद्रूपे दर्पणे भासमान एव प्रतिबिम्वस्थानीयाः सूर्य्यादयो भान्ति, अधिष्ठानस्फूर्त्यैव कल्पितानां स्फूर्तिमत्त्वात् । यत्तु ' नैतद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्शत् ' ( यजु ४०१४ ) इत्यत्र देवशब्देन मनःषष्ठानीन्द्रियाणि गृह्यन्ते । तेषां शब्दस्पर्शरूपरसगन्धानां सत्यासत्ययोश्चार्थावद्योतकत्वादिति ( पृ ० ७१ ), तदपि न युक्तम्, इन्द्रियेषु हि देवगतद्योतनगुण-योगाद् गौणमेव देवत्वम्, शौर्यक्रौर्यगुणयोगाद् देवदत्तादिषु सिंहपदप्रयोगवत् । मन्त्रार्थस्तु - एतत्परमात्मतत्वं देवा इन्द्रियाणि नाप्नुवन् न प्रकाशयन्ति, तस्य रूपादिराहित्येन तेषामविषयत्वात् । तस्य तेभ्यः पूर्वमेव अर्शत् सर्वत्र प्राप्तत्वात् । दयानन्दस्तदीयाश्च कण्वशाखाया वेदत्वं न मन्यन्ते । ' अर्शत् ' इति पाठस्तु काण्वशाखीय एव । तदभिमते वेदे तु ' अत् ' इत्येव पाठः । यदपि चोक्तम्- ' स्तुतिर्हि गुणदोषकीर्तनम् ' इति, तदपि तुच्छम्, गुणवर्णन एवं स्तौते: प्रसिद्धत्वात् । दोषकीर्तनं तु निम्दैव भवति । अन्यथा परमेश्वरस्तुतेस्त्वयाप्यङ्गीकारात्तत्र दोषा अपि कीर्तितव्याः स्युः । न च तत्रास्ति दोषलेशोऽपि तस्यासङ्गत्वेन नित्यनिरस्तसर्वदोषत्वात् । यत्तु परत्वयं नियम: कर्मकाण्डं प्रत्यस्ति, उपासनाज्ञानकाण्डयोः कर्मकाण्डस्य निष्कामभागेऽपि च परमेश्वर एवेष्टदेवोऽस्ति । कस्मात्? तत्र तस्यैव प्राप्तिः प्रार्ध्यते ' ( पृ ० ७२ ), तदपि निःसारम् । कोऽयं नियम इत्यस्या-निरूपितत्वात् । पूर्वं तु गुणकीर्तनरूपा स्तुतिः प्रकृता ततः पूर्वं परमेश्वरस्य मुख्यदेवत्वम् । किञ्च त्वद्रीत्या तु वायु-कर सकते, क्योंकि ये तो बाहरी वस्तुओं के प्रकाशक हैं । उस ब्रह्म के प्रकाशित होने के बाद ही वे प्रकाशित होते हैं । जैसे आलोक के प्रकाशित होने पर ही नील, पीत आदि रूप दिखाई देते हैं, उसी तरह स्वयंप्रकाश स्वरूप ब्रह्म के प्रकाशित होने पर ही सूर्य - चन्द्र आदि का भान होगा । इसीलिए इस भीतरी प्रकाश से संपर्क न रहने के कारण हो निद्रा आदि अवस्थाओं में सूर्य के रहते हुए भी उनका भान नहीं होता । अथवा जैसे दर्पण के रहने पर ही दर्पण में वर्तमान प्रतिबिम्ब का भान होता है, उसी तरह चिद्रूप दर्पण के प्रकाशित होने पर ही प्रतिबिम्बस्थानीय सूर्य आदि प्रकाशित होते हैं । अधिष्ठान की स्फूर्ति से ही शिष्ट अन्य कल्पनाएँ उद्भूत हो सकती हैं । सबसे आगे पहुँचे हुए इस परमात्मा तक इन्द्रियाँ नहीं पहुंच सकती ' यहाँ पर देव शब्द से मन सहित पाँच ज्ञानेन्द्रिय परिगृहीत हैं । क्योंकि शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और सत्य - असत्य इत्यादि अर्थो का इनसे प्रकाश होता है । ' यह कथन भी ठीक नहीं है । इन्द्रियों में देवगत द्योतन गुण के योग से गौण देवत्व है, जैसे कि शौर्य, क्रौर्य आदि गुणों के रहने से देवदत्त आदि के लिये सिंह पद का गौण प्रयोग किया जाता है | मन्त्र का अर्थ यह है - इस परमात्मतत्व को देव अर्थात् इन्द्रियां नहीं प्रकाशित कर सकतीं । उसके रूप आदि से रहित होने से वह उन इन्द्रियों का विषय नहीं हो सकता । वह परमात्मा उन इन्द्रियों से पहले ही सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । दयानन्द और उनके अनुयायी काण्व शाखा को वेद नहीं मानते । ' अर्शत् ' यह पाठ काण्व शाखा का है । उनके अभिमत वेद ' अ ' यह पाठ है । यह कहना भी कि गुण और दोष का कीर्तन स्तुति है, ठीक नहीं है । स्तुति पद से केवल गुणों ar aur at सर्वत्र अभिप्रेत है । दोष का वर्णन करना तो ' निन्दा ' पद से अभिहित होता है । यदि परमात्मा की स्तुति की गई है, तो उनके दोषों का वर्णन भी यहाँ होना चाहिये था । सब दोषों से रहित होने से दोष के लवलेश की भी आशंका नहीं है । अन्यथा आपकी व्याख्या के अनुसार यहाँ परमात्मा में तो उसके असंग होने से, सदा ' परन्तु यह नियम कर्मकाण्ड में ही है । इस नियम के साथ कि केवल परमेश्वर ही उपासना काण्ड, ज्ञानकाण्ड तथा sers के निष्काम भाग में सबका इष्टदेव है, स्तुति, प्रार्थना, पूजा और उपासना करने योग्य है, क्योंकि वहाँ पर उसी की प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है ' यह कथन भी निःसार है । यह नियम क्या है, इसका पहले निरूपण नहीं किया गया है । पहले गुणकीर्तन रूप
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@arquitar: ६०३ जलशुद्धयादिरेव कर्मफलम्, न स्वर्गपशुपुत्रादिकं न वेष्टविषयभोगप्राप्ति: । अतस्तत्र ( सकामकर्मकाण्डभागे, इष्ट-भोगप्राप्तये परमेश्वरः प्रार्थ्यत इति रिक्तं वचः । किञ्च इष्टभोगप्राप्तिरग्निहोत्रादिकर्मणां फलम् । परमेश्वर-प्रार्थनाया वा कर्मणां फलत्वे त्वदीयपूर्वोक्तिविरोधः । ईश्वरप्रार्थना फलं चेत्तदा तस्या एव फलं न सकाम कर्मफलमिति सर्वथाप्यसम्बद्धमेवैतत् । यदपि -- ' अत्र प्रमाणम् -- माहाभाग्याद् देवताया एक एवात्मा बहुधा स्तूयते । एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति । कर्मजन्मानः, आत्मजन्मान: । आत्मैवेषां रथो भवत्यात्माश्व आत्मायुधमात्मेषव आत्मा सर्व देवस्य ' ( नि ० १४ ) | कस्मिन्नर्थे इदं प्रमाणमिति तु दयानन्द एव जानीयात् । पूर्वं तु परमेश्वर एवेष्टदेवोऽस्ति । सकामे कर्मकाण्डेऽपि स एव प्रार्थ्यते । नैवेश्वरार्थत्याग: ववापि भवतीति वेदाभिप्रायोऽस्तीति । प्रकृतप्रमाणभूतवचनें त्वात्मनो माहाभाग्यमन्येषां देवानां तत्प्रत्यङ्गत्वम् । तेषां कर्मजन्मत्वं भक्तिजन्मत्वं तेषां रथादीनामात्मरूपत्व-मुक्तम् । कथमत्र प्रमाणप्रमेयभाव इति विद्वांस एव विवेचयन्तु । अत्रात्मनो बहुधा स्तुतिरुच्यते । त्वद्रीत्या स्तुती दोषकीर्तनमप्यावश्यकं कथं परमेश्वरे तत्संभाव्यते । यदपि तद्व्याख्यान उक्तम्- ' सर्वासां व्यवहारोपयोगिदेवतानां मध्य आत्मन एव मुख्यदेवतात्वमस्ति । कुतः? आत्मनो महाभाग्यादर्थात् सर्वशक्तिमत्त्वादिविशेषणत्वात् । न तस्याग्रे कस्यापि देवतात्वं गण्यं भवितु-मर्हति । कुतः? सर्ववेदेष्वेकस्या द्वितीयस्यासहायस्य सर्वत्र व्याप्त्यस्यात्मन एव बहुधा बहुप्रकारैरुपासना विहितास्ति । अस्मादन्यै ये देवा उक्ता वक्ष्यन्ते च ते सर्वे एकस्यात्मनः परमेश्वरस्य प्रत्यङ्गानि अङ्ग अङ्ग प्रत्यवन्तीति निरुक्त्या तस्यैव सामर्थस्यैकैकस्मिन् देशे प्रकाशिताः सन्ति । ते व कर्मणा जायन्ते तस्मात्कर्मजन्मानः आत्मन ईश्वरस्य सामर्थ्या-ज्जातास्तस्मादात्मजन्मानश्च भवन्ति । अत्रेतेषां देवानामात्मा परमेश्वर एव रथो रमणाधिकरणम् । स एवाश्वा स्तुति का प्रकरण है । उससे भी पहले परमेश्वर ही मुख्य देवता हैं, इसका विचार हैं । दूसरी बात यह है कि आपकी पद्धति से कर्मकाण्ड का फल वायु, जल आदि की शुद्धि है, स्वर्ग, पशु, पुत्र, इष्ट विषय का भोग आदि नहीं । यतः सकाम कर्मकाण्ड भाग में इष्ट भोग की प्राप्ति के लिये परमात्मा की प्रार्थना की जाती है, यह कहना व्यर्थ है । इष्ट भोग की प्राप्ति अग्निहोत्र आदि कर्मों का फल है । ईश्वर की प्रार्थना को ही यदि कर्मों का फल माना जाय तो आपके पूर्व कथन से उसका विरोध होगा । ईश्वर की प्रार्थना ही यदि फल है, तब यह उसी का फल होगा, सकाम कर्म का फल नहीं, यह बात सर्वथा असंबद्ध है । पुनः कहा गया है कि ' महाभाग्याद् ० ' इत्यादि fr रुक्त वचन इसमें प्रमाण है । इसका यह अर्थ है कि ' देवता के परम ऐश्वर्यशाली होने से एक ही परमात्मा की अनेक रूपों में स्तुति की जाती है । एक परमात्मा के हो अन्य देवतागण अंग होते हैं । इनका कर्मों का फल देने के लिये और सृष्टि के सम्पादन के लिये अलग - अलग विभाग होता है । इस देव का आत्मा ही रथ होता है, आत्मा ही घोड़े, आत्मा ही आयुध और आत्मा हो बाज आदि सब कुछ होता है । ' यह किस अर्थ में प्रमाण है, इसको दयानन्द ही जान सकते हैं । पहले परमेश्वर को ही इष्टदेव माना गया है । सकाम कर्मकाण्ड में भी उसी को प्रार्थना है । ईश्वर अर्थ का त्याग कहीं नहीं होता, यही वेद का अभिप्राय हैं । प्रकृत में जिस वचन का प्रमाण दिया जाता है, इसमें परमात्मा की परम ऐश्वर्यता और अन्य देवताओं की उसके प्रति अंगता प्रतिपादित है । उनकी कर्मजन्यता, शक्तिजन्यता और स्थादि की आत्मरूपता कही गई है । इस बीच यहाँ पर प्रमाणप्रमेयमाव कहां से आ गया, विद्वान् लोग ही इस पर विचार करें | यहां पर परमात्मा की अनेक प्रकार से स्तुति की जाती है । आपकी पद्धति से स्तुति में दोष का कीर्तन भी आवश्यक है, भला परमेश्वर में दोष कैसे हो सकता है? उक्त निरुक्त वाक्य की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि ' सभी व्यवहार के उपयोगी देवताओं की उपासना कभी नहीं करनी चाहिये, किन्तु एक परमेश्वर की ही करनी उचित है । इसका निश्चय वेदों से अनेक प्रकार से किया गया है कि एक अद्वितीय परमेश्वर के ही प्रकाश, धारण, उत्पादन करने से वे सब व्यवहार के देव प्रकाशित होते हैं । इनका जन्म और कर्म ईश्वर के सामर्थ्य से होता है और इनका रथ अर्थात् जो रमण का स्थान अश्व अर्थात् शीघ्र सुखप्राप्ति का कारण, आयुष अर्थात् सब शत्रुओं के नाश करने का हेतु और
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** dereafterat गमनहेतवः, स आयुधं विजयावहम्, इषवो बाणा दुःखनाशका स एवास्ति । तथा चात्मैव देवस्य सर्वस्वमस्ति, अर्थात् सर्वेषां देवानां स एवोत्पादको धाताऽधिष्ठाता मङ्गलकारी वर्तते । नातः परं किश्विदुत्तमं वस्तु विद्यत इति वोध्यम् ' ( पृ ० ७२ ), तदप्यसंगतम् । पूर्वं तु त्वया मन्त्रा एव देवतापदवाच्या इत्युक्तम् 1 । इदानीं तु गौणा मुख्या बहुविधा देवता अङ्गीक्रियन्ते । ' स्तूयते ' इत्यस्य उपासना विहिताऽस्तीति कुतो ज्ञायते । किमीश्वरोपासनायामीश्वरदोषाणामप्युपासनं भविष्यति । अत्रान्ये देवास्तस्यात्मन: प्रत्यङ्गानि भवन्ति इत्यपि त्वदीयपूर्वापरोक्तिविरुद्धम् । किश्व, न केवलं देवा एव सर्वमपि जगत् कर्मजन्म आत्मजन्म च भवति, तत्र देवेषु को विशेषः? त्वद्रीत्या ईश्वर एव देवानां रथाश्वादयो भवन्ति । ईश्वर आयुधेषुरूपोऽपि भवति । किश्व त्वद्रीत्या नहि परमेश्वर एव सर्वोपादानम्, येन तस्य तद्रूपता स्यात्, प्रकृतेरुपादानत्वाङ्गीकारात् । तथा च कथं परमेश्वरस्यैव रथाश्वादिरूपता । दुर्गाचार्यादिसंमतस्त्वस्य निरुक्तवाक्यस्यार्थ इत्थं ज्ञातव्यः - ' यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्य-मिच्छन् स्तुति प्रयुक्ते, तद्देवतः स मन्त्रो भवति ' इत्युक्तम् । यत्र स्फुटमदेवता देवतावत् स्तूयन्ते तत्र मन्त्रदेवता -लक्षणं न संघटते । यथाश्वप्रभृतीन्योषधिपर्यन्तानि ( निघण्टु ५३ ) । एतस्मिन्नर्थेऽश्वादीनि सत्त्वानि, अक्षादीनि द्रव्याणि । अश्वादीनि नातीतमनागतं च जानन्ति, हिताहितमपि न प्रतिपद्यन्ते । तानि कथमभिष्टुतानि स्तोतुरर्थ -स्याधिपतित्वं करिष्यन्ति । स्तुतिनिन्दे अपि न जानन्ति । अश्वादिषु कथञ्चिद्विज्ञानवत्वेऽप्यक्षादिषु तदपि न संभवति । किञ्च यथा लोके मनुष्याणामनित्यानामश्वादयोऽर्था भवन्ति तथैव देवतानामपि चेन्द्राग्निसूर्यप्रभृतीनामुपकरणं हरिरोहिद्धरित्प्रभृतयोऽश्वाः । तस्मादुभयेषामप्युपकरणोपकर्तव्यतासामान्यान्मनुष्याश्ववदनित्यत्वमेव देवता-दीनामिति शङ्कायाः समाधानार्थमुच्यते -- माहाभाग्याद् देवताया एकस्त्वात्मा बहुधा स्तूयते यस्मात्तस्मात् सर्वं eg अर्थात् जो बाण के समान सब दृष्ट गुणों को छेदन करने वाला शस्त्र हैं, सो एक परमेश्वर ही है । क्योंकि परमेश्वर ने जिस जिसमें जितना जितना दिव्य गुण रक्खा है, उसका उतना ही उन द्रव्यों का देवपन है, अधिक नहीं । इससे क्या सिद्ध हुआ कि केवल परमेश्वर ही उन सबका उत्पादन, धारण और मुक्ति को देने वाला है ' ( पृ ० ७३ ) | यह सब असङ्गत है । पहले आपने मन्त्रों को ही देवता कहा है और अब गौण, मुख्य भेद से बहुविध देवता का प्रतिपादन करते हैं । ' स्तूयते ' इसका अर्थ ' उपासना विहित है ' यह कैसे ज्ञात हुआ? श्वर की उपासना में उसके दोषों की उपासना भी विहित होगी । यहाँ पर दूसरे देवता उस परमात्मा के अंग - प्रत्यंग है, यह कथन भी बाकी पहले और बाद की उक्तियों के विरुद्ध है । आपके मत से न केवल देवताओं का, अपि तु सारे जगत् का ही कर्मजन्म और नात्मजन्म होता है, तो फिर देवताओं में क्या विशेषता धाई । आपकी व्याख्या के अनुसार ईश्वर ही देवताओं का रथ आदि होता है । ईश्वर आयुवरूप, बाणरूप भी माना गया है । आपकी पद्धति से परमेश्वर ही सबका उपादान नहीं है कि उसकी बाण आदि आयुष की उपादानता हो, प्रकृति को ही सबका उपादान माना गया है । तब फिर परमेश्वर की ही रथ, अश्व आदि स्वरूपता कैसे होगी । इस fro क्त वाक्य का दुर्गाचार्य प्रभूति के द्वारा स्वीकृत अर्थ इस प्रकार होगा - जिस किसी वस्तु को चाहता हुआ ऋषि अर्थात् मन्त्र जिस देवता की स्तुति करने से उसके प्रसाद से मुझे अमुक वस्तु मिल जायगी, इस प्रकार अपने में अर्थपतित्व मानकर उसकी स्तुति करता है, वही उस मन्त्र का देवता है, यह कहा गया है । जहाँ पर यह स्पष्ट है कि यह देवता नहीं है, तो भी उसकी देवता के समान स्तुति की जाती हैं, वहाँ पर मन्त्र देवता वाला लक्षण सङ्गत नहीं होता, जैसे कि अश्व से लेकर ओषधि पर्यन्त नामों के विषय में कहा जा सकता है । इस प्रसङ्ग में अश्व प्रभृति प्राणियों और मक्ष प्रभूति द्रव्यों का उदाहरण है । अश्व प्रभृति अतीत और अनागत को नहीं जानते और न हित तथा अहित का ही निर्णय कर मकते हैं । इनकी स्तुति करने पर ये कैसे स्तावक को अर्थ का अधिपतित्व प्रदान करेंगे । ये स्तुति और निन्दा को भी नहीं जानते । अश्व आदि पशुओं में यह विज्ञान मान भी लिया जाय तो अक्ष आदि में वह भी नहीं है । दूसरी बात यह कि जैसे लोक में अनित्य मनुष्यों के अश्व प्रभृति विषय भी अनित्य होते हैं, उसी तरह इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि के उपकरणभूत अव हरि, रोहित, हरित आदि होंगे । इसलिये उपकरण और उपकार्य गुणों की समानता के कारण मनुष्यों के अश्वों के समान ये देवताओं के अश्व भी अनित्य होंगे । इस शङ्का के समाधान के लिये कहा जाता है कि देवता के परमैश्वर्य सम्पन्न होने से एक
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वेदार्थपारिजातः संगतमेव । भज्यत इति भाग ऐश्वर्यम्, महांश्चासो भागो महाभागस्तस्य भावो माहाभाग्यम् । ' अणिमा महिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यमेव च । ईशित्वं च वशित्वं च यत्रकामावसायिता ॥ ' महतंश्वर्येण भज्यते, महदेतदैश्वयं भजत इति वा महाभागा देवता । माहाभाग्यादेव हेतोरेकः सन् देवतात्मा बहुधा प्रकृतिविकृतिभेदेन स्तूयते । तथा च मन्त्र-वर्णः -- ' रूपं रूपं मघवा बोभवीति ' ( ऋ ० सं ० ३।५३।८ ) । अत्र देवतात्मनो नानात्वमपि श्रूयते । देवतालक्षणं च यथालक्ष्यं प्रवर्तते । दृष्टानुविधानाच्छन्दसः । संवादसूक्तानि च कयाशुभादीनि । मरुदादि-संवादव्यपदेशाच्च देवतानानात्वव्यवस्था । न च तन्निराकरणं युक्तम् । तिस्र एव देवता अग्निः पृथिवीस्थानः, वायुर्वेन्द्रो वान्तरिक्षस्थानः, सूर्यो स्थान: । तेषां हविर्वहन रसानुप्रदान रसादानानि कर्माणि च तेषां त्रित्वं गमयन्ति । ' इन्द्र मित्रं वरुणमग्निमाहुः ( ऋ ० सं ० १११६४।४६ ) एवमादयो मन्त्रास्तेषामेकात्म्यं चाहुः । तदप्यशक्य-निराकरणम् । माहाभाग्यादेव सर्वत्र समाधानम् । तथाहि - एकस्य देवतात्मनः माहाभाग्यात् प्रकृतिरूपेणकात्म्यम्, अप्रकृतिरूपेण नानात्वम् । चेतनाचेतनविकरण धर्मित्वादात्मानं विकुर्वतोऽस्यान्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति । तथा arrot द्रसूर्याणां परस्परापेक्षया भिन्नत्वम्, एकेनात्मना देवतात्मना महताऽनन्यत्वं च । यथा घटशरावोदञ्चना-दीनां परस्परं भेदो मृदात्मना चाभेद इति तद्वत् । नहि प्रकृतिमनपेक्ष्य विकारा भवन्ति, न वाधिष्ठानमनपेक्ष्य प्रत्यधिष्ठानानि । तस्मादग्नीन्द्रसूर्या एकस्यात्मनोऽङ्गानि जातवेदोवायुभगप्रभृतीनि शकुन्यश्वप्रभृतयश्च प्रत्यङ्गानि भवन्ति। स एव महान् देवतात्मा माहाभाग्यान्निरतिशयैश्वय्यैवत्त्वादग्नीन्द्रसूर्याद्यङ्गप्रत्यङ्गभावेन व्यूहमतु-भनेको s पि सन् बहुधा स्तूयते । तत्र सत्त्वानामश्वादोनां स्तवैः प्रकृतिरेव स्तूयते । ही आत्मा की अनेक रूपों में स्तुति की जाती है । अतः सब कुछ सही है । ' भव्यते ' इस व्युत्पत्ति से भाग शब्द का अर्थ ऐश्वर्य होगा, महान् ऐश्वर्य महाभाग होगा, इस प्रकार का जिसका स्वभाव है, वह महाभाग्य कहलावेगा | अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और यत्रकामावसायिता इन महान् ऐश्वर्यो में जो विभक्त है, अथवा जो इन ऐश्वर्यो को प्राप्त करता है, वह देवता महाभाग कहलाता है | इसी गुण के कारण वह देवता एक होते हुए भी प्रकृति, विकृति के भेद से अनेक प्रकार से स्तुतियोग्य होता है । ' इन्द्र अनेक रूपों में प्रतिभासित होता है ' ऋग्वेद के इस मन्त्र में देवता के अनेक रूप भी बताये गये है । लक्ष्य के अनुसार ही लक्षण प्रवृत्त होता है । यही स्थिति देवता के लक्षण की भी है । वेद में भी लौकिक दृष्टान्त के अनुसार इन्द्र, मरुत् आदि के नाम से व्यपदिष्ट होने से नाना देवताओं की तीन ही देवता हैं अग्नि पृथिवीस्थान, वायु अथवा इन्द्र अन्तरिक्ष ग्रहण करना और रस को वापस करना तीन काम उनकी तीन ही विधि विवेचित होती है । ' कवाशुभा ' प्रभृति संवाद सूक्त भी व्यवस्था में प्रमाण हैं । इनका निराकरण नहीं किया जा सकता । स्थान और सूर्य स्थान हैं । इनके हवि का वहन करना, रस को संख्या के गमक हैं । ' इसको इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि कहते हैं ' इस तरह के मन्त्र उनकी एकता के प्रतिपादक हैं । इनका भी निराकरण नहीं हो सकता । देवता का पारमैश्वर्य ही इनका समाधान है, इसका यह अभिप्राय है कि एक ही देवता में पारमैश्वर्य के कारण प्रकृतिरूप से एकात्मता है और विकृति रूप से नानात्व | वेतन, अचेतन सब विकार हैं । जब एक देवता विकरणधर्मा बनकर अपने में से अन्य देवताओं को उद्भूत करता है तो वे उसके प्रत्यंग बन जाते हैं । इससे अग्नि, इन्द्र और सूर्य की परस्पर भिन्नता रहते हुए भी एक महान देवता के रूप में अभिन्नता है । जैसे कि घट, शराव आदि का परस्पर भेद होते हुए भी इन सबके मिट्टी के बने होने से अभिन्नता है । प्रकृति की अपेक्षा के बिना विकार नहीं होते और न अधिष्ठान को छोड़कर प्रत्यधिष्ठान की ही सत्ता है । इसलिये अग्नि, इन्द्र, सूर्य एक महान आत्मा के अङ्ग हैं और जातवेद, वायु, भग तथा शकुनि, अश्व आदि उस महान् आत्मा के प्रत्यंग होते हैं । इस प्रकार यह महान् देवतात्मा निरतिशय ऐश्वर्यशाली होने से अग्नि, इन्द्र, सूर्य आदि अङ्ग - प्रत्यङ्ग भाव से नानात्व का अनुभव करते हुए भी एक ही रहता है | यहाँ अश्व प्रभृति प्राणियों की स्तुति एक प्रकार से उस महान् आत्मा की ही स्तुति है ।
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६० वार्थपारिजातः तत्रापि केचित् परमेश्वर एव मुख्यो देवता । केचित्तु प्राणात्मको हिरण्यगर्भ एव, स एव महानात्मा सत्तालक्षणस्तत्परं तद्ब्रह्म स भूतात्मा सैषा भूतप्रकृतिः ' ( नि ० १४१३ ) इति वचनात् । ' कतम एको देवः स ब्रह्म इत्याचक्षते । ब्रह्मरूपोप्येकदेव:, ' एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ' इति श्वेताश्वतरश्रुतेः । तथा च अपरब्रह्मरूपो हिरण्यगर्भ एको देवः, परब्रह्मरूपः परमात्मैको देवः । प्रकृतिभूमभी ऋषयः स्तुवन्ति । प्रक्रियन्तेऽस्यां सर्वे विकारा इति प्रकृतिः । एको देवतात्मा, तस्याः प्रकृतेर्भूमा बहुत्वम् । अनेकधा स्थावरजङ्गम-रूपेण विपरिणामः । प्रकृतेर्भूमानि बहुत्वानि यानि सत्त्वानां तैरनन्यविषयत्वं पश्यन्तः कार्यकारणयोरनन्यत्वात् कारणमहिमभिस्तान्यश्वादीन्यभिष्टुवन्ति देवात्मविदः । तद्यथा - ' द्यौस्ते पृष्ठं पृथिवी सघस्थमात्मान्तरिक्षम् ' ( मै ० सं ० २२७/२ ) | आत्मैव सर्वं स्थावरजङ्गममित्यवेक्ष्याश्वमेधे ' मूलेभ्यः स्वाहा शाखाम्यः स्वाहा ' ( मै ० सं ० ३ | १२ | ७ ) । तथा च तेन तेन वैशेषिकेण स्थावरजङ्गमात्मना प्रकृते रभिन्नेनावस्थानेनावस्थितो महान देवतात्म-वेज्यते, अदेवताया यागानर्हत्वात् । तेन नादेवता देवतावत् स्तूयन्ते, किन्तु महान् देव एव विविधरूपेण स्तूयते, प्रकृति-सार्वनाम्यात्तदुपपत्तेः । नमनं नतिर्वा नाम, सर्वत्वेन नाम सर्वनाम, तस्य भावः सार्वनाम्यम् । यस्मान्माहाभाग्यात् प्रकृतिः सर्वत्वेन परिणता तस्मान्नैता अदेवता देवतावत् स्तूयन्ते । यच्च - हरिरोहिद्धरिवादीनामिन्द्रादीनां मनुष्यत्ववत्प्रतीतिरिति तन्न, देवताधर्मस्य मनुष्यधर्मविपरीत-स्वात् । मनुष्याणामनैश्वर्याद् देवतानां चैश्वर्य्यात् । दयानन्दस्तदीयाश्च विदुषो मनुष्याणां देवत्वमङ्गीकुर्वन्ति, चैतद्विरुद्धमेव । कथं तदेवाह --- इतरेतरजम्मान: । देवा ऐश्वर्याद् इतरेतरप्रकृतयः, नहि मनुष्याणामियं शक्ति रनैश्वर्यात् | मनुष्याणां हि पिता पुत्रं जनयतीति पिता प्रकृतिः, न पुत्रः पितरं जनयितुं शक्नोति । देवतानां त्वग्नेः यहाँ पर कुछ आचार्य परमेश्वर को ही मुख्य देवता मानते हैं और अन्य आचार्य प्राणात्मक हिरण्यगर्भ को । ' यह सत्ता लक्षण महान आत्मा है । उससे आगे ब्रह्म की स्थिति है । वह भूतात्मा, सब भूतों की प्रकृति है ' यह वचन इसमें प्रमाण है । ' वह एक देव कौन है? ब्रा ' यह भी कहा जाता है । ब्रह्म रूप भी एक देव है । ' यह एक देव सब प्राणियों में छिपा हुआ है, सर्वव्यापी है, सब भूतों का अन्तरात्मा है ' यह श्वेताश्वतर श्रुति इसमें प्रमाण है । इस तरह अपर ब्रह्म रूप एक देव है और परब्रह्म रूप परमात्मा भी एक देवता है । ऋषिगण प्रकृतिभूमा के रूप में इसकी स्तुति करते हैं । एक देवतात्मा यहाँ प्रकृति कही गयी है, क्योंकि इसमें से ही सर्व विकार निकलते हैं, पर देवतात्मा रूप प्रकृति मनेकधा स्थावर जंगम रूप से परिणत होती है । प्रकृति से प्राणियों की जो raar frore होती है, उस अनन्तता को प्रकृति से अभिन्न देखते हुए देवात्मवित् कार्य और कारण की अभिन्नता होने से कारण की महिमा का आरोप कर अश्व प्रभूति सत्वों की भी स्तुति करते हैं । जैसे कि ' आकाश तुम्हारा पृष्ठ हैं, पृथिवी घर और अन्तरिक्ष ear se netrita त में किया गया है । सब स्थावर जंगम पदार्थ आत्मा ही हैं, यही देख कर अश्वमेध यज्ञ में मूल और शाखा के लिए भी हवि दी जाती है । इस तरह उस उस विशेष स्थावर - जंगम रूप को धारण करने पर भी उसके प्रकृति अभि होने के कारण एकात्मना अवस्थित वह महान् देव ही सर्वत्र पूजिव होता हैं, क्योंकि जो देवता नहीं होता, वह याग के योग्य नहीं है । इस प्रकार जो देवता नहीं है, उसकी देवता के समान पूजा नहीं होती, किन्तु एक महान् देवता ही विविध रूपों में स्तुत होता है । प्रकृति सार्वनाम्य से भी इसकी उपपत्ति होती है । नमन अथवा नति को नाम कहते हैं, सब तरह से नाम को सर्वनाम कहा जाता है और इस सर्वनाम के स्वभाव की सार्वनाम्य कहा गया है । इसका अभिप्राय यह हुआ कि यतः यह परम ऐश्वर्यशालिनी परमात्मा रूप प्रकृति ही सभी रूपों में परिणत होती है, अतः इन सबका नमन अदेवता के रूप में न होकर देवता के रूप में ही है । हरि, रोहित, हरित आदि इन्द्रादि के अश्वों की प्रकृति मनुष्य लोक के अश्वों के सदृश मानना भी गलत है, क्योंकि देवता और मनुष्यों के धर्म free - free होते हैं । मनुष्यों में ऐश्वर्य का अभाव है, जब कि देवगण ऐश्वर्यशाली हैं । दयानन्द एवं तदनुवर्ती विद्वान् मनुष्यों को ही देवता मानते हैं । यहाँ का प्रतिपादन उनके मन के विरुद्ध ही है । कैसे? यही यहाँ बताया गया है कि इनका जन्म एक दूसरे से भी होता है । देवगण अपने ऐश्वर्य के कारण इतरेतरप्रकृति होते हैं । मनुष्यों में यह सम्भव नहीं है,
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६०७ सूर्यो जायते ' एष प्रात: प्रसुवति ' ( मंत्रा ० १ ५/७ ), तेन सूर्यस्याग्निः प्रकृतिः । सूर्याच्चाग्निः सायं जायते, तस्मादग्नेः सूर्य्यः प्रकृतिः । अदितेर्दक्षो दक्षाच्चादिति: ( ऋ ० १७२/४ ) | ' कोष्ठयादग्नेर्नाद इस्ट्रो बलादिन्द्रान्मथ्यमानोऽग्निः ' इत्यध्यात्मेऽपि । तासां माहाभाग्यादनन्तैश्वर्यादेव न मनुष्याणामिवागन्तवोऽश्वादयः तेषामनागन्तुकस्यात् । किमर्थं तर्हीींश्वराः सन्तो देवा जायन्त इत्यस्य समाधानायोच्यते - कर्मजन्मान: | लोकस्य कर्मफल-सिद्धयेऽग्निवायुसूर्या जायन्ते एतेभ्य ऋते कर्मफलासिद्धेः । तस्मादैश्वय्यं प्रख्यापनाय लोकानुजिघृक्षया कर्मफल-सिद्धये देवा जायन्ते । दयानन्दस्तु कर्मणा जायन्त इत्याह तन्न युक्तम्, सर्वस्यैव कर्मजन्यत्वेन वशेष्यानुपपतेः । कुतस्ते जायन्त इत्याशङ्कयाह निरुक्तकारः -- भात्मजन्मानः । आत्मा योऽसी एक आत्मा बहुधा स्तूयते, स स्थितावुपात्तसर्वभूतिः, प्रलये चोपरतसर्वभूतिर्भवति । स एव सर्गकाले षोढात्मानं विभज्य जगद्भावमुपगच्छति । तस्मादेव जायन्ते देवाः । यद्यपि सर्वमपि तस्मादेव जायते, तथापि न कामकारेण । देवास्तु तमेवात्मानं पश्यन्तो योगेन कामकारेण जायन्ते, आत्मनैव वा जायन्त इत्यात्मजन्मानः । लोकानुग्रहाय स्वेच्छयैव देवाः सूर्य्यादयः स्वेनैव जायन्ते, तेषां संकल्पानुविधायित्वात् । न तदनीश्वराणां संभवति । अत एवैषां देवानामेकदेवतात्मनोऽङ्गभूतानामात्मैव रथः, आत्मैवायुधम् आत्मैवेषवः, आत्मा सर्व देवस्य । न चैवं मनुष्याणां संभवति । नहि मनुष्यस्यात्मैवाश्वादयो भवन्ति । एतेनापि मनुष्यादिभ्यो भिन्ना ऐश्वर्यवन्तो देवाः । तस्मादश्वादीनि सत्त्वान्यक्षरथप्रभृतीनि द्रव्याण्यदेव-तेति यदुक्तम्, तन्न युक्तम्, देवता एवेमाः । रथादिरूपेण देवतैवात्मानं विकृत्य प्रकृतिभेदेन रथादिसाध्यमथं सम्पादयति । क्योंकि वे अनीश्वर है | मनुष्यों में पिता पुत्र को पैदा करता है, अतः पिता पुत्र की प्रकृति है । पुत्र पिता को पैदा नहीं कर सकता । इसके विपरीत देवताओं में अग्नि से प्रातःकाल सूर्य पैदा होता है, इससे सूर्य की प्रकृति अग्नि हुई । वही अग्नि सायंकाल सूर्य से पैदा होती है, तो उस समय सूर्य अग्नि की प्रकृति है । इस प्रकार इनमें एक दूसरे को पैदा करने की सामर्थ्य है । ऋग्वेद में अदिति से से दक्ष र दक्ष से अदिति की उत्पत्ति बताई गई है । ' कोष्ठयादग्ने ' यहाँ अध्यात्म में भी यही बात कही गई हैं । इनके माहाभाग्य अर्थात् अनन्त ऐश्वर्यशाली होने के कारण ही सूर्य के अश्व मनुष्यलोक की तरह नश्वर न होकर अविनाशी होते हैं । यदि देवगण निरतिशय ऐश्वर्यशाली हैं, तो फिर ये पैदा क्यों होते हैं, इसका उत्तर निरुक्त में ' कर्मजन्मानः ' इत्यादि पद से दिया गया है । लोक में कर्म के फल को देने के लिए अग्नि, वायु, सूर्य आदि उत्पन्न होते हैं, क्योंकि इनके बिना कर्मफल नहीं प्राप्त हो सकता | इसलिए ऐश्वर्य के प्रख्यापन के लिए, लोक का कल्याण करने के लिए और कर्म का फल देने के लिए देवगण जन्म लेते हैं | दयानन्द का कहना है कि पे देवगण अपने कर्मों के अनुसार उत्पन्न होते हैं, यह ठीक नहीं है । यह सिद्धान्त तो सभी पर लागू है, इससे देवताओं में किसी प्रकार की विशेषता नहीं प्रतीत होती । ये देवगण कहाँ से पैदा होते हैं? इस आशंका का उत्तर निरुक्तकार ने ' आत्मजन्मानः ' पद से दिया है । यह आत्मा, जो कि एक होते हुए भी अनेक प्रकार से स्तुतियोग्य होता है, स्थिति काल में सब प्राणियों की उत्पत्ति करता है और प्रलय काल में सब प्राणियों को अपने में समेट लेता है । वहीं सृष्टि काल में अपने को छः रूप में विभक्त कर इस जगत् के रूप में परिणत हो जाता है । उसी से देवगण भी पैदा होते हैं । यद्यपि सब कुछ उसी से पैदा होता है, किन्तु यह मनमाने तरीके से नहीं होता | इसके विपरीत देवगण योगावस्था में अपने को ही देखते हुए इच्छानुसार अपने आप ही पैदा होते हैं । इसीलिये ये आत्मजन्मा कहलाते हैं । लोक पर अनुग्रह करने के लिये अपनी इच्छा से सूर्य प्रभृति देवता अपने आप ही पैदा होते हैं, क्योंकि इनमें सङ्कल्प मात्र से कार्य करने की सामर्थ्य है | अनीश्वरों में यह नहीं हो सकती । इसलिये इन देवताओंों का, जो कि एक ही देवता के अभूत है, आत्मा हो रथ, आत्मा ही आयुष, आत्मा ही बाण और आत्मा ही सब कुछ है । ऐसा मनुष्यों में नहीं हो सकता । अश्व प्रभृति ही मनुष्य की आत्मा नहीं हो सकते | इससे भी मनुष्य आदि से भिन्न ऐश्वर्यशाली देव सिद्ध होते हैं । इसलिये अश्व प्रभृति प्राणी और भक्ष, रथ प्रभृति द्रव्य देवता नहीं है, यह कहना ठीक नहीं । ये भी देवता ही हैं । रथादि के रूप में देवता हो अपने को बदल कर प्रकृति के भेद से रथ आदि के
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६०८ सा तद्रूपा सती रथादिस्तुत्या स्तूयते । तत्स्तुतिसमवेतमर्थमाशासितं स्तोतुस्तेनैव रूपेण साधयितुमलम् । ' माहाभाग्या-देकस्या अपि बहु नामधेयानि ' ( नि ० ७ ५ ) । तासामग्न्यादीनां तिसृणां देवतानामैश्वर्य्ययोगादात्मानमनेकधा विकुर्वती-नामेकैकस्याः प्रतिविकारं नामप्रतिलम्भस्तेनैव रूपेण धारयन्त्यात्मानम् । देवस्येत्यावृत्तिरादरार्थी । अतो ' यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुति प्रयुङ्क्त ' ( नि ० ७११ ) इत्यस्य मन्त्रदेवतालक्षणस्य सर्वत्राव्याहतत्वाद् युक्तमेव लक्षणत्वम् । प्रकृतमनुसरामः । तस्मिन्नेवार्थेऽन्यदपि प्रमाणमुपस्थापयति दयानन्दः -- ये त्रिशति त्रयस्परो देवासः बहिरासदन | विन्नह द्वितासनन् । ' ( ऋ ० सं ० ६ २३५३१ ), ' त्रयस्त्रिशता स्तुवत भूतान्यशाम्यन् । प्रजापतिः परमेष्ठ्यधिपतिरासीत् ॥ ' ( २० १४:३१ ), ' यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा निधि रक्षन्ति सर्वदा । निधि तमद्य को वेद यं देवा अभिरक्षथ || यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे गात्रा बिभेजिरे । तान् वै त्रयस्त्रिशद् देवानेके ब्रह्मविदो विदुः ॥ ' ( अथर्व १०/२३/४/२३, २७ ), ' स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिशस्त्वेव देवा इति । कतमे ते त्रयस्त्रिदित्यष्टो बसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिंशदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयत्रिंशाविति ॥ कतमे वसव इति । अग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसवः । एतेषु हीदं सर्वं वसु हितमेते हीदं सर्वं वासयन्ते, तद्यदिदं सर्वं वासयन्ते तस्माद्वसव इति ॥ कतमे रुद्रा इति? दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदास्मा-म्मर्त्याच्छरीरादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति । तद्यद्रीदयन्ति तस्माद्रा इति ॥ कतम आदित्या इति? द्वादश मासाः संवत्सरस्यैत द्वारा सम्पाद्य प्रयोजन को पूरा करते हैं । वह देवता ही स्थादि रूप में परिणत हुई है, अतः रथादि स्तुति से वह देवता ही स्तुत होती है । उस रथ आदि की स्तुति के प्रसङ्ग में जिस फल की आशा की जाती है, वह उसके देवता रूप के अङ्गीकार करने पर हो सम्भव हो सकती है । महाभाग्य के कारण एक ही देवता के अनेक नाम हैं । उन अग्नि प्रभृति तीन देवों का, जो कि ऐश्वर्य के कारण अपने को अनेक रूपों में विभक्त करते हैं, एक - एक का प्रत्येक विकार के अनुसार एक नया नाम रख दिया जाता है और उसी नाम और रूप में वे अपनी अलग सत्ता भी रखते हैं । निरुक्त में ' देवस्य ' इस पद की आवृत्ति आदर द्योतन के लिये की गई है । इसलिये निरुक्त में ' काम ऋषि ' यहाँ पर किया गया मन्त्र और देवता का लक्षण सभी तरह से निर्दृष्ट होने के कारण सभी मानों में सही लक्षण है । ra हम प्रकृत विषय पर जाते हैं । इसी विषय में दयानन्द ने अन्य अनेक प्रमाण दिये है । जैसे कि ---तीस संख्या से आगे तीन अर्थात् तैतीस देवता हमारे यज्ञ में हवि ग्रहण करने हेतु इस कुशा के आसन पर आकर बैठें । हवि देने वाले हमको पहचानें और हमको दो प्रकार का घन - सोना और पशु - प्रदान करें । प्रजापति ने तैतीस माध्यमों से बन गये । स्तुति को तो सारे प्राणी शान्त हो गये और इस प्रकार सत्यलोक में प्रजापति परमेष्ठी जिसकी निधि अर्थात् खजाने की तैंतीस देवता सदा रक्षा करते हैं, उस निधि को कौन जानता है, जिसकी कि देवता रक्षा करते हैं । जिसके तैतीस देवगण शरीर और उसके अंगों का विभाजन करते हैं, उन तैंतीस देवताओं को कुछ एक ब्रह्मविद् हो जानते हैं । उसने कहा कि यह तो देवताओं की महिमा है कि वे अनेक रूपों में दिखाई देते हैं, वास्तव में तो देवता तैंतीस ही हैं । तैंतीस कौन - कौन से हैं? मठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य इस प्रकार ये इकतीस हुए । इन्द्र और प्रजापति मिलकर ये तैंतीस होते हैं । आठ वसु कौन - कौन से है? अग्निं, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यौ चन्द्रमा और नक्षत्र ये आठ वसु हैं । इन्हीं में यह सारा धन रक्खा हुआ है, ये ही सबको बसाते हैं । ये जो सबको यथा स्थान बसा देते हैं, अतः वसु कहलाते हैं । एकादश रुद्र कौन - कौन से हैं? पुरुष में निवास करने वाले ये दस प्राण और ग्यारहवीं आत्मा । ये जब इस मर्त्य शरीर से निकलते हैं, तो संबन्धियों को रुला देते हैं । ये रुला देते हैं, अतः रुद्र कहलाते हैं ।
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वैवार्थपारिजातः आदित्याः । एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति तद्यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति । कतम इन्द्रः? कतमः प्रजापतिः? स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिः । कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति । कतमो यज्ञः? पशव इति || कतमे ते त्रयो देवा इतीमे एव त्रयो लोकाः । एषु हीमे सर्वे देवा इति । कतमौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्च । कतमो -s ध्य इति? योऽयं पवत इति ॥ तदाहु: -- यदयमेक एव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति? यदस्मिन्निदं सर्वमध्यानत्तेना-ध्य इति । कतम एको देव इति? स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते । एतान्यपि प्रमाणानि न दयानन्दमतपोषकाणि । सतु मन्त्रा एव देवतापदवाच्या इति वक्ति, क्वचित्परमेश्वरः क्वचिद् मनुष्या एव देवाः । इह तु तद्विपरीतमेवानेके देवा उक्ताः । समासव्यासरूपेण तेषामेकत्वमनेकत्वं च निगदव्याख्यातम् । व्याख्यातानि च कतिचिद्वचनानि तेन । अथैषामर्थ: --वेदमन्त्राणामेवार्थी ब्राह्मणग्रन्थेषु प्रकाशित इति द्रष्टव्यम् । शाकल्यं प्रति याज्ञवल्क्योक्तिस्त्रयस्त्रित्वेव देवाः सन्ति । अष्टौ वसवः, एकादश रुद्राः, द्वादशादित्याः, इन्द्र:, प्रजापतिश्च । तत्र वसवः - अग्निः पृथिवी, वायु, अन्तरिक्षमादित्यः, द्यौः, चन्द्रमा, नक्षत्राणि च । एतेषामष्टानां वसु-संज्ञा कृतास्ति | आदित्यः सूर्यलोकस्तस्य प्रकाशोऽस्ति । द्यौः सूर्यसन्निधौ पृथिव्यादिषु वा । अग्निलोकोऽस्त्यग्निरेव । कुत एते वसव इति? यद्यस्मादेतेष्वष्टस्वेव इदं सर्वं वसु वस्तुजातं हितं घृतमस्ति । किन्व } सर्वेषां वासाधि करणानीमे एव लोकाः सन्ति । हि यतश्चेदं वासयन्ते सर्वस्यास्य जगतो वासहेतवस्तस्मात् कारणादग्न्यादयो वसु-संज्ञकाः सन्ति । येऽस्मिन् देहे प्राणः, अपानः, व्यानः समानः, उदानः, नागः " कूर्मः, कृकलः, देवदत्तः, धनञ्जयश्चेमे दश प्राणाः, एकादशम आत्मा, सर्वे मिलित्वैकादश रुद्रा भवन्ति । कुत एते रुद्रा इत्यत्राह -- यदा मरणधर्मकाच्छरी-द्वादश आदित्य कौन - कौन से हैं? वर्ष के बारह मास हो द्वादश आदित्य हैं । ये इस सारे जगत् को लेकर चलते हैं । यह जो लेकर चलते हैं, अतः आदित्य कहलाते हैं । यह इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है? यह स्तनयित्नु अर्थात् विद्युत् ही इन्द्र है और यज्ञ प्रजापति हैं । स्तनयित्नु का हो दूसरा नाम अशनि अर्थात् वज्रपात है और ये पशु ही यज्ञ कहलाते हैं । ये तीन देवता कौन से हैं? ये तीन लोक ही तीन देवता है, क्योंकि इन्हीं तीन लोकों में सब देवता रहते हैं | दो देवता कौन से हैं? अन्न और प्राण ये दो देवता हैं । एक और आधा देवता कौन? यह जो बहता है, अर्थात् पवन । इस प्रसंग में कहते हैं कि यह तो एक ही है, फिर इसको आधा और एक कैसे कहते हैं? इस पवन में ही यह सब निहित है, अतः यह अध्यर्थं कहलाता है । एक देवता कौन सा है? वह एक देवता ' ब्रह्म ' नाम से अभिहित होता है । ये सब प्रमाण भी दयानन्द केमत को पुष्ट नहीं कर सकते । वे कहीं कहते हैं कि मन्त्र हो देवता है और कहीं वे परमेश्वर को तथा मनुष्य को देवता मानते हैं | इसके विपरीत यहाँ पर अनेक देवों का प्रतिपादन किया गया है । संक्षेप और विस्तार से are rara और अनेकत्व का उल्लेख करते हुए व्याख्या की है । कुछ वचनों की उन्होंने स्वयं व्याख्या की है fare set अर्थ किया जाता है | वेद मन्त्रों का हो अर्थ ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रकाशित किया है, यह जान लेना चाहिये । शाकल्य को याज्ञवल्क्य कहते हैं कि तैंतीस ही देवता हैं | आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, इन्द्र और प्रजापति । इनमें वसु ये हैं ---- अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यौ चन्द्रमा और नक्षत्र | इन आठ को ' वसु ' नाम दिया गया है । सूर्यलोक और उसका प्रकाश आदित्य कहलाता है । द्यौ सूर्य के पास अथवा पृथिवी प्रभूति में स्थित है । अग्निलोक ही after है । इनको वसु क्यों कहा जाता है? क्योंकि इन आठ में ही यह सब पदार्थ विद्यमान है । इन लोगों में ही सब प्राणियों का निवास होता है और क्योंकि ये ही इस सारे जगत् को बसाते हैं, इसलिये ये अग्नि प्रभृति आठ देवता ' वसु ' कहलाते हैं । जो इस देह में प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय ये दस प्राण हैं और ग्यारहवां आत्मा ये सब मिलकर एकादश रुद्र होते हैं । ये रुद्र क्यों कहलाते हैं? जब ये मरणशील शरीर से निकलते हैं तो मृतक के सम्बन्धियों : III
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६१० वेदार्थ रिजातः रादुत्क्रामन्तो निःसरसः सन्तोऽथेत्यनन्तरं मृतकसम्बन्धिनो जनान् रोदयन्ति तस्मादेते रुद्राः । चैत्राद्याः फाल्गुनान्ता द्वादश मासा आदित्या विज्ञेयाः । कुतः? हि यतः, एते सर्व जगदाददाना:, अर्थादा समन्ताद् गृह्णन्तः प्रतिक्षणमुत्पन्नस्य वस्तुन आयुषः प्रलयं निकटमानयन्तो यन्ति । चक्रवद् भ्रमणेनोतरोत्तरं जातस्य वस्तुनोऽवयवशिथिलतां परिणामेन प्रापयन्ति । तस्मादादित्यसंज्ञा कृतास्ति । इन्द्रः परमैश्वर्य्ययोगात् स्वनयित्नुरशनिर्विद्युदिति । प्रजापतिर्यज्ञः पशव इति । प्रजापालनहेतुत्वात् पशूनां यज्ञस्य च प्रजापतिरिति गौणी संज्ञा । एते त्रयस्त्रिशदेवा भवन्ति । देवो दानादित्यादिनिरुक्त्या ह्येतेषु व्याव हारिकमेव देवत्वं योजनीयम् ' । ' यो लोकास्त्रयो देवाः । केत इत्यत्राह निरुक्तकार: --- ' धामानि त्रयाणि भवन्ति, स्थानानि नामानि जन्मनीति ' ( नि ० ९ ।२८ ), ' त्रयो लोका एत एव । वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ' ( श ० ब्रा ० १४ | ४ | ३ | ११ ) एतेऽपि त्रयो देवा ज्ञातव्याः । द्वौ देवावन्नं प्राणश्च । अध्यर्धी ब्रह्माण्डस्थ: सूत्रात्माख्यः सर्वजगतो वृद्धिकरस्वाद् वायुर्देवः । किमेते सर्व एवोपास्याः सन्तीत्याह —–नेव, किन्तु स ब्रह्म यत्सर्वजगकर्तृ सर्वशक्तिमत् सर्वस्येष्टं सर्वाधारं सर्वव्यापकं सर्वकारणम् अनादि सच्चिदानन्दरूपमजं न्यायकारीत्यादिविशेषणं ब्रह्मास्ति स एवैको देवश्चतुस्त्रिशो वेदान्तसिद्धान्तप्रकाशित: परमेश्वरो देवः स एव सर्वैरुपास्यः । ये वेदोक्तमार्गपरायणास्ते सर्व-देव तस्योपासनं चक्रुः कुर्वन्ति, करिष्यन्ति च । अस्माद्भिन्नस्येष्टकरणेनोपासनेन चानार्यत्वमेव मनुष्येषु सिद्धच -तीति निश्चय: ' ( पृ ० ७५ ) इति, तदपि न युक्तम्, तात्पर्यानवबोधात्, प्रकरण विरोधाच्च । मन्त्रार्थस्तु ये त्रिशति त्रिशत्संख्यायाः परः परस्तात् त्रयः त्रयस्त्रिशद्देवता इत्यर्थः । ये देवास: देवा बहिः अस्मदीययज्ञसम्बन्धिनि वर्हिषि हविःस्वीकरणार्थमासदन आसीदस्तु । अथानन्तरं ते देवा विदन् हविषां प्रदातृ-को रुला देते हैं, इसलिये इनको रुद्र कहते हैं । चैत्र से लेकर फाल्गुन पर्यन्त बारह महीने आदित्य कहलाते हैं | क्यों? इसलिये कि ये बारह मास सारे जगत् को चारों तरफ से समेट कर अपने साथ प्रतिक्षण उत्पन्न हुई वस्तु की आयु को प्रलय के निकट ले चलते हैं । चक्र के समान परिवर्तनशील इस जगत् में एक के बाद दूसरी पैदा हुई वस्तु के अ arat क्रम से शथिलता को पैदा कर ये उनमें परिवर्तन करते रहते हैं । इसलिये इनकी ' आदित्य ' संज्ञा है । परम ऐश्वर्य से संयुक्त होने से इन्द्र हो स्तनयित्नु, अशति, विद्युत् कहलाता है । और पशु प्रजापति कहलाते हैं । इनकी यह गौण संज्ञा है । ये ही ३३ देवता है । ' देवो दानात् ' अनुसार इनमें व्यावहारिक देवत्व मानना चाहिये । प्रजा का पालन करने के कारण यज्ञ इत्यादि निरूक प्रदर्शित निर्वचन के तीन लोक हैं, तीन देवता है । वे कौन है? इसका उत्तर निरुक्तकार ने दिया है - ' धाम तीन होते हैं- स्थान, नाम और जन्म | ' ये ही तीन लोक है । वाणी ही पृथिवी लोक है, मन अन्तरिक्ष लोक और प्राण द्युलोक हैं । इन्हीं को तीन देवता मानना चाहिये | दो देवता अन्न और प्राण हैं । एक और आधा अर्थात् डेढ देवता वायु है, क्योंकि यह सूत्रात्मा के रूप में सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर सारे जगत् की वृद्धि करता है । क्या इन सबकी उपासना करनी चाहिए? नहीं, केवल एक ब्रह्म ही सारे जगत् का कर्ता, सर्वशक्तिमान् सर्वाभिलषणीय, सर्वाधार, सर्वव्यापक, सर्वकारण, अनादि, सत् चित् आनन्द स्वरूप, अज, न्यायकारी आदि विशेषणों सेयुक्त है । यह एक देव ही बीती सर्वा वेदान्त सिद्धान्त में प्रकाशित परमेश्वर है । इसी की सबको उपासना करनी चाहिये । जो aaf क्त वेद प्रकाशित मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे सदा इसी एक देव ब्रह्म की उपासना पहले करते थे, आज भी करते हैं और आगे भी करेंगे । इससे भिन्न को इष्ट मानने से अथवा उसकी उपासना करने से मनुष्यों में अनार्यता ही दृष्टिगोचर होगी ' यह सब व्याख्यान भी उचित नहीं हैं । वे इस पूरे प्रकरण का तात्पर्य नहीं समझ सके हैं और की गई व्याख्या प्रकरण के विरुद्ध भो है । मन्त्रों का सही अर्थ इस प्रकार है जो तीस संख्या से आगे तीन जोड़ने से तैंतीस बनते है, ये देवगण हमारे यज्ञ ist हवि को ग्रहण करने के लिए कुशा के आसन पर बैठें । इसके बाद ये देवगण हवि देने वाले हमको जाने और दो प्रकार के