वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 641–650

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

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६११ नस्मान् जानन्तु द्विता द्विप्रकारं धनं हिरण्यादिकं पश्वादिकं च असनन् अस्मभ्यं प्रयच्छन्तु ॥ अनेन पौनः-पुन्यं लक्ष्यते । पुनः पुनरस्मभ्यं धनादिकं ददतु । अहेत्यव्ययपदमनुग्रहार्थम्, अनुग्रहदृष्ट्याऽस्मान् जानन्त्वित्यर्थः । ' तद्वै प्रजापतिः सर्वाणि भूतानि पाप्मनो मृत्योर्मुक्त्याऽकामयत प्रजाः सृजेय प्रजायेयेति स प्राणानब्रवीद् युस्माभिः सहेमाः प्रजाः प्रजनयानीति । ते वे केन स्तोष्यामह इति मया चैव युस्माभिश्चेति । तथैव ते प्राणैश्चेति प्रजापतिना चास्तुवन् ' ( श ० ब्रा ० ८ ४१३११-२ ) इति श्रुत्यनुसारेण प्रजापतिर्वागादिभिः परमात्मानं स्तुत्वा प्रजाः सृष्टवान् । मन्त्रा इमे - एकया तिसृभि: सृष्टिपदाभिधेयेष्ट कोपधानम् । त्रयस्त्रिशतास्तुक्त भूतान्यशाम्यन् प्रजापतिः परमेष्ठ्यासील्लोकं ता इन्द्रमित्यस्य यजुर्मन्त्रस्य त्वयमर्थ: - ' नवविंशत्या स्तुवत ' इत्यत्र ' दश हस्त्या अङ्गुलयो दश पाद्या नव प्राणाः ' ( ८/४/३/१७ ) इति श्रुत्यनुरोधेन करपादाङ्गुलीभिर्नवभिरिद्ररूपः प्राणः स्तुतिरुक्ता । तथेव ' दशहस्त्या अङ्गुलयो दश पाद्या दश प्राणा आत्मैकत्रिंश: ' ( ८ | ४ | ३ | १८ ) इति श्रुत्यनुसारेण एकत्रिशत्स्तुतिरुक्ता । तथैव ' दश हस्त्या अङ्गुलयो दश पाद्या दश प्राणा द्वे प्रतिष्ठे आत्मा त्रयस्त्रिशः " ( ४४३ | १ ९ ) इति शतपथ-श्रुत्यनुरोधेनात्रायं निष्कर्ष: - प्रजापतिरेकया वाचा सहात्मानमस्तुवत स्तुतवान् । वचनव्यत्ययः । प्रजा अधीयन्त उदपाद्यन्त प्राजापत्यार्थमस्थाप्यन्तेति । सृष्टानां प्रजापतिरेवाधिपतिरासोत् । तिसृभिः प्राणोदानव्यानंरस्तोत् । ब्रह्म ब्राह्मणजातिः सृष्टा प्रजापतिश्च ब्रह्मणस्पतिरभूत् । पञ्चभिः प्राणैरस्तुवत ततो भूतानि सुष्टानि, सप्तभिः सप्तर्षयः, नवभिः पितरः । एवं क्रमेण त्रयस्त्रिशता दश हस्त्याभिर्दश पाद्याभिरङ्गुलिभिर्दशभिः प्राणैर्द्वाभ्यां प्रतिष्ठाभ्याम् आत्मना च स्तुतवान, ततः सर्वाणि भूतान्यशाम्यन्, शान्ता अभूवन् । परमे सत्यलोके परमेष्ठी प्रजापतिः सर्वेषां भूतानां पतिरासीत् । नात्र त्रयस्त्रिशत्संख्यानां देवानां प्रतिपादनम्, पूर्वोक्तशतपथवचनविरोधात् । घन - सुवर्ण और पशु को हमें दें । ' द्विता ' इस पद से पौनःपुन्य लक्षित होता है, अर्थात् हमको बार - बार धन दें । ' अह ' यह अव्यय पद अनुग्रह के अर्थ में है, अर्थात् अनुग्रह की दृष्टि से हमें देखें । ' उस प्रजापति ने सब प्राणियों को पाप और मृत्यु से छुड़ाने की कामना की कि प्रजा की सृष्टि करूँ । उसने प्राणों से कहा कि तुम्हारी सहायता से मैं इस प्रजा की सृष्टि करूँ । प्राणों ने पूछा कि हम किससे स्तुति करेंगे तो प्रजापति ने उत्तर दिया कि मुझसे और तुमसे । इसीलिए प्राणों से और प्रजापति से स्तुति की जाती है ' इस शतपथ श्रुति के अनुसार प्रजापति वाग आदि के द्वारा परमात्मा की स्तुति कर प्रजा की सृष्टि करते हैं । ये मन्त्र एक, तीन आदि के क्रम से ' सृष्टि ' पद से अभिहित होने वाली इष्टकाओं के उपस्थान के लिये हैं । ' श्रयस्त्रिशता ० ' इस यजुर्मंन्त्र का यह अर्थ है - ' नवविशति अर्थात् उन्तीस से स्तुति की ' यहाँ पर ' दस हाथ की अंगुलियाँ, दस पैर की अंगुलियों और मो प्राण ' इस श्रुति के प्रमाण से हाथ और पैर की अंगुलियों और नौ छिद्र रूप प्राणों से स्तुति कही गई है । इसी तरह ' दस हाथ की अंगुलियों, दस पैर की अंगुलियां, दस प्राण और इकतीस आत्मा ' इस श्रुति के प्रमाण से इकतीस से स्तुति की गई है । इसी तरह ' दस हाथ की अंगुलियों, दस पैर की अंगुलियों, दस प्राण, दो प्रतिष्ठा और तैतीस आत्मा ' इस श्रुति के प्रमाण से प्रस्तुत मन्त्र का यह निष्कर्ष है कि प्रजापति ने एक वाणी के साथ अपनी स्तुति की । यहाँ पर बहुवचन एकवचन में परिणत हो जाता है । उसने प्रजा पैदा की, प्राजापत्य प्रयोजन के लिए उपस्थापित की । सृष्ट प्रजा का प्रजापति हो अधिपति था । प्राण, उदान और व्यान इन तीन को सहायता से प्रजापति ने स्तुति को और ब्राह्मण जाति को सृष्टि कर स्वयं ब्रह्मणस्पति हो गया । पञ्च प्राणों से स्तुति कर पंच महाभूतों की, सात से सप्तर्षियों की ओर नौ से पितरों की सृष्टि की । इसी क्रम में दस हाथ की अंगुलियों, दस पैर की अंगुलियों, दस प्राणों, दो प्रतिष्ठा और एक आत्मा की सहायता से उसने स्तुति की । इसके बाद सारे प्राणी शान्त हो गये । परम सत्यलोक में परमेष्ठी प्रजापति सब प्राणियों का अधिपति था । इस प्रकार यहाँ पर तैंतीस देवताओं का प्रतिपादन नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर पूर्वोक्त शतपथ श्रुति से उसका विरोध होगा ।

पृष्ठ 642

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६१२ वेदार्थपारिजाता अथर्वायां तु त्रयस्त्रिशद्देवा यस्य स्कम्भस्याङ्गे गात्राणि भवन्तीत्युक्तम् । एतेनापि देवतानां विशिष्टैश्वर्य शालिनीनां हिरण्यगर्भरूपा मुख्यदेवता अन्यास्तदङ्गभूताः सिद्धयन्ति । तुंसर्वथा त्वत्प्रतिकूलान्येव । तानि सर्वाणि वचनानि त एव विषयाः काण्वशाखीये शतपथेऽपि चतुर्दशे काण्डे बृहदारण्यके समायान्ति । तत्र तृतीयाध्याये नवमब्राह्मणगतानीमानि वचनानि । तत्राद्यम्-' अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ । कति देवा याज्ञवल्क्येति । स हैतया निविदा प्रतिपेदे । यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति । स होवाच कत्येव देवा द्वाविति कत्येव ' अध्यर्ध इत्योमिति कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति । इत्योमिति । कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ' इत्यादिभिर्देवता ब्राह्मणं प्रवर्तते । हे याज्ञवल्क्य! कति देवाः सन्ति? याज्ञवल्क्यस्तु एतया निविदा प्रतिपेदे | अर्थाद् वैश्वदेवस्य शस्त्रस्य निविदि यावन्तो देवाः श्रूयन्ते तावन्त इत्युक्तम् । निविन्नाम देवतासंख्यावाचकानि मन्त्रपदानीति श्रीमच्छङ्करभगवत्पादाः । का सा निवित्? इत्याकाङ्क्षायां निवित्पदानि प्रदर्श्यन्ते । त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रा, अर्थात् षडधिक त्रिशताधिकत्रिसहस्रलक्षणा मध्यमा संख्या, व्यासविवक्षया तेषामानन्त्यात् । शाकल्यः समासापेक्षया पुनः पृच्छति -- कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति । याज्ञवल्क्यस्तु समासापेक्षयैव त्रयस्त्रिंशदित्याह । एवं प्रश्नोत्तरैः षट् त्रयो द्वौ अध्यर्ध: ( अर्धाधिकः ), एक एव देव इत्युक्तम् । ततः शाकल्यः संख्येयस्वरूपं पृच्छति -- कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति । याज्ञवल्क्यस्तु त्रयस्त्रिशतां देवानामेते त्रयश्च त्री च शतेत्यादयो महिमानो विभूतय एव । परमार्थतस्तु त्रय-त्रिदेव देवा इत्याह । कतमे ते त्रयस्त्रिंशदिति प्रश्ने- अष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्ते एकत्रिंशदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिशत्संख्यापूरणौ तदभिप्रायेण त्रयस्त्रिशदित्युक्तम् । कतमे वसव इति तेषां प्रत्येकं स्वरूपं पृच्छ्यते । तत्राह - अग्निश्च पृथिवी, वायुः, अन्तरिक्षम्, आदित्यः, द्यौः, चन्द्रमा, नक्षत्राणि । प्राणिनां कर्मफलाश्रयत्वेन कार्यकारणसंघातरूपेण तन्निवासत्वेन च विपरिणमन्तो सर्व जगद वासयन्ति च तस्माद्वसव उच्यन्ते । अथर्ववेद के ऊपर उद्धृत दो मन्त्रों में भी उस आधारभूत परमेश्वरकाय के ये तैंतीस देवता अंग रूप से प्रतिपादित हैं । इस प्रकार यहाँ पर विशिष्ट ऐश्वर्यशाली देवगण में हिरण्यगर्भ मुख्य देवता और अन्य अंग देवता कही गई हैं । शतपथ वचन तो सर्वथा आपके प्रतिकूल हैं । ये सब वचन और विषय काण्वशाखीय शतपथ के १४ काण्ड के बृहदारण्यक में भी विद्यमान हैं । वहाँ पर तृतीय अध्याय के नवम ब्राह्मण में ये वचन विद्यमान हैं । वहाँ का पहला वचन ' अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः ' इत्यादि है | यह देवताब्राह्मण कहलाता है । इसका यह अभिप्राय है कि ' हे याज्ञवल्क्य! कितने देवता हैं? इस प्रश्न का उत्तर याज्ञवल्क्य इस निविद् से देते हैं । अर्थात् वैश्वदेव शस्त्र की निविद् में जितने देवता सुने गये हैं, उतने ही देवता हैं । भगवान् शङ्कराचार्य ने कहा है कि देवताओं की संख्या बताने वाले मन्त्रपद ' निविद ' नाम से कहे जाते हैं । यह निविद् क्या है? इस आशङ्का की निवृत्ति के लिये frface बताये जाते हैं । ' त्रयश्च त्री च ' यहां पर देवताओं की मध्यम संख्या ३३०६ बताई गई है, विस्तार करने पर यह संख्या अनन्त हो जायगी । शाकल्य संक्षेप की दृष्टि से पुनः पूछते हैं कि हे याज्ञवल्क्य! कितने देवता हैं और इसका उत्तर भी याज्ञवल्क्य संक्षेप की दृष्टि से ही देते हैं कि इनकी संख्या तैतीस है ।इसी प्रकार के प्रश्न और उत्तर में यह संख्या छ, तीन, दो, अध्यर्ध अर्थात् आधे के साथ एक ( डेढ ), और अन्त में एक बताई गई है । इसके बाद शाकल्य संख्येय देवता के स्वरूप को पूछते हैं कि इन ३३०६ देवताओं का क्या स्वरूप है! याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि यह सब तैतीस देवताओं की ही विभूतियाँ है । वास्तव में देवता तैंतीस ही हैं । ये तैतीस कौन - कौन से है? इस प्रश्न के उत्तर में आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य में इकतीस देवता हैं । ३३ संख्या की पूर्ति करने वाले इन्द्र और प्रजापति हैं, इसीलिये इनको ' त्रयस्त्रिशी ' इस द्विवचन से कहा गया है । ' कतमे वसव: ' इस प्रश्न से उन आऊ वस्तुओं में से प्रत्येक का स्वरूप पूछते हैं । अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यौ चन्द्रमा और नक्षत्र ये उनके नाम बताये गये हैं । ये वसुगण प्राणियों के इसके उत्तर में अग्नि, पृथिवी, वायु, कर्मों के फल का माश्रय लेकर कार्य-

पृष्ठ 643

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** कतमे रुद्रा इति प्रश्नस्योत्तररूपेणाह - दशेमे पुरुषे प्राणाः । अत्र पञ्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च बुद्धीन्द्रियाण्येव दश प्राणाः, न प्राणापानादयः । आत्मेति मनो गृह्यते, तथैव श्रोशङ्कराचार्यैर्व्याख्यातत्वात् । षष्ठेऽध्याये बृहदारण्यके-' ते मे प्राणा अहंश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुः । तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति । तद्धोवाच यस्मिन् वा उत्क्रान्ते इदं शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति । वाग्घोच्चक्राम चक्षुर्होच्चकाम ' इत्यादी वागादीनामेव प्राणशब्देन ग्रहणात् । ' तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति, प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति ' ( बृहदारण्यक ० ४।४।२ ) इत्यत्र वायुरूपस्य नासिक्यप्राणस्योत्क्रमणानन्तरं वागादीनामेव प्राणानामुत्क्रमणमुक्तम् । ते यदास्माच्छरीदादुत्क्रामत्यथ रोदयन्ति मृतकसम्बन्धिन इति रुद्रा उच्यन्ते । संवत्सरात्मा कालस्तस्यावयवभूता मासाः पुनः पुनः परिवर्तमानाः प्राणिनामायूंषि कर्मफलं चाददाना यान्ति, तस्मादादित्या उच्यन्ते । अन्यत्तु स्तनयित्नुर्वज्र वीर्यं बलं यत्प्राणिनः प्रमापयति स इन्द्रः । इन्द्रस्य हि तत्कर्म तेन न विद्युन्मात्र-स्येन्द्रत्वम् । यद्वा अशनिरिन्द्रस्य परमेशता परमैश्वर्यम् । यज्ञः प्रजापतिः । कतमो यज्ञ इति प्रश्नस्योत्तरम् - पशव इति । यज्ञस्य साधनानि पशवः, यज्ञस्यामूर्तत्वात् साधनातिरिक्तरूपाभावाद्यज्ञस्य पश्वाश्रयत्वाच्च पशवो यज्ञ इत्युच्यते, कारणे कार्योचारात् । दयानन्दस्तु ' प्रजापालन हेतुत्वात्पशूनां यज्ञस्य च प्रजापतिरिति गौणो संज्ञा ' ( पृ ० ७५ ) इत्याह, तत्तूपेक्ष्यमेव । प्रकृते पशूनां यज्ञत्वमेवोक्तं न प्रजापतित्वम् । प्रजापतिस्तु सूत्रात्मत्वात्समष्टिकर्मरूप एव सर्वेषां कर्मणां तदाश्रयत्वाच्च । कर्मसु यज्ञ एव श्रेष्ठतमं कर्म । तस्माद्यज्ञस्य प्रजापतिरूपत्वं युक्तमेव । द्रव्यं देवता च कर्मणो रूपं कारण की परम्परा के रूप में, उनमें सब प्राणियों के निवास के रूप में परिणत होकर सारे जगत् को बसाते हैं मोर स्वयं भी बस कर कहलाते हैं । ' कत में रुद्रा: ' इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं— ' पुरुष में वर्तमान ये दस प्राण ' इत्यादि । यहाँ पर पञ्च कर्मेन्द्रियाँ मोर पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हो दस प्राण हैं, प्राण, अपान आदि नहीं । आत्मा शब्द से मन गिना जाता है । ऐसी ही व्याख्या शङ्कराचार्य ने की है । बृहदारण्यक के छठे अध्याय में ' मैं ही बड़ा हूं, आपस में इस विवाद के उठ खड़े होने पर ये प्राण ब्रह्म के पास गये और उनसे पूछा हममें कौन बड़ा है? ब्रह्म ने कहा कि जिसके निकल जाने पर यह शरीर अपवित्र मान लिया जाता है, वही तुम में बड़ा है । पहले arit free, फिर चक्षु निकला ' इत्यादि श्रुति में वाणी प्रभूति हो प्राण शब्द से गृहीत हैं । ' उस आत्मा के उत्क्रमण करते समय, अर्थात् शरीर छोड़ते समय प्राण उसके पीछे चला और प्राण के निकल जाने पर अन्य सब प्राण भी उसके साथ निकल जाते हैं । इस बृहदारण्यक श्रुति में वायुरूप नासिकावर्ती प्राण के उत्क्रमण के बाद बाग आदि प्राणों का उत्क्रमण बताया गया है । ये वाक् प्रभृति प्राण जब इस शरीर से निकलते हैं तो मृतक के सम्बन्धी जनों को रुला देते हैं, इसलिए ये रुद्र कहलाते हैं । सवत्सर रूपी काल और उसके अवयव भूत मास बार - बार परिवर्तित रूप में चक्र के समान आते जाते हुए प्राणियों की आयु और कर्म को भी अपने साथ लेते जाते हैं, इसलिए ' आदित्य ' नाम से अभिहित होते हैं । स्तन को कहते है, इसकी सहायता से जो अपने वीर्य बल से प्राणियों को मार डालता है, वह इन्द्र कहलाता है । यह इन्द्र का कार्य है, अतः केवल विद्युत् को इन्द्र नहीं कहा जा सकता । अथवा अशनि का अर्थ इन्द्र का परम ऐश्वर्य है । यज्ञ प्रजापति है । ' कतमो यज्ञः ' इस प्रश्न के उत्तर में पशुओं को यज्ञ कहा गया है । पशु यज्ञ के साधन हैं । यज्ञ अमूर्त है, साधन के अतिरिक्त इसका कोई स्वरूप नहीं है और यज्ञ पशु पर काश्रित है, अतः कहा जाता है कि पशु यज्ञ है | यहाँ पर कारण में कार्य का arraft प्रयोग होता है । दयानन्द ने यहाँ कहा है कि प्रजा का पालन कर सकने के कारण पशु और यज्ञ को यहाँ पर गौण रूप से प्रजापति कहा गया है, यह ठीक नहीं । प्रस्तुत स्थल में पशु को यज्ञ कहा गया है, प्रजापति नहीं । समष्टि कर्मरूप सूत्रात्मा ही प्रजापति है । वह इसलिये भी प्रजापति है कि सभी प्राणियों के कर्म तदाश्रित हैं । कर्मों में यज्ञ ही सर्व श्रेष्ठ कर्म है । इसलिये यज्ञ को प्रजापति रूपता ठीक ही है । द्रव्य और देवता यही कर्म का स्वरूप है, द्रव्य और देवता से ही कर्म के स्वरूप का निरूपण होता है । इनमें देवता

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वेदार्थपारिजातः भवति, ताभ्यामेव तनिरूपणात् । तत्रापि देवता त्वतीन्द्रिया एव भवति । द्रव्यस्येन्द्रियगम्यत्वाद् युक्तमेव पशनां यज्ञनिरूपकत्वाद्यज्ञरूपत्वम् । aa vfsfor: पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च षडेते हीदं सर्व षडिति । अग्न्यादयो ये agar पठितास्त एत्र चन्द्रमसं नक्षत्राणि च वर्जयित्वा षड् भवन्ति । एतेष्वेव सर्वेऽन्तर्भवन्ति । कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोकाः । पृथिवीं चाग्नि चैकीकृत्यैको देवः, अन्तरिक्षं च वायुं चैकीकृत्य द्वितीयः 3 दिवं चादित्यमेकीकृत्य तृतीयः । अत एव तिस्र एव देवता इति केचिन्नेरुक्ताः । कतमो द्वौ इत्यस्योत्तरम् अन्नं च प्राणश्च । अनयो: सर्वेषामन्त-र्भावः । कतमोऽध्य इत्यस्योत्तरं योऽयं पत्रत इति । तदाहुर्यदयमेक इवेव पवते, कथमध्यर्थः, अर्धाधिक इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्याध्नत्तेनाध्यर्थः । तत्राहुः केचिच्चोदका यदयं वायुरेक एव पवते, अत्र कथमिवाध्यर्ध:? इवेत्यस्य कथमित्यनेन संबन्धः । तस्योत्तरम् - अस्मिन् वायो इदं सर्वमध्याद् ऋद्धि प्राप्नोति तस्मात् स अध्यर्ध इत्युच्यते । एको वायुर सर्वमिदं तस्मादर्धाधिकैको देवः । प्राणस्यातृत्वादेकत्वमन्नस्य भोग्यत्वादर्घत्वमिति । दयानन्देन तु मौनमेबावलम्बितमत्र । कतम एको देव इति प्राण इत्युत्तरम् । स ब्रह्मेति स प्राणो ब्रह्म, सर्वदेवात्मकत्वात्तन्महत् । तेन स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते । त्यदिति परोक्षाभिधायकेन शब्देनेति श्रीशाङ्करभाष्यम् । तस्य परोक्षत्वात् प्रतिपत्तौ प्रयत्नगौरवार्थ कथयतीत्यानन्दगिरिः । दयानन्दस्तु ब्रह्मपदेनात्र परमात्मानमेव मनुते । तच्च न युक्तम्, स इत्यनेन सामानाधि करण्यात् । नहि प्राण एवं परमात्मा, तस्यापरब्रह्मत्वात् । समष्टिसूक्ष्मप्रपञ्च विशिष्टश्चेतनो हिरण्यगर्भः । सूक्ष्म-शरीरे बुद्धेः प्राधान्याद्धिरण्यगर्भत्वम्, प्राणस्य प्राधान्यात् सूत्रात्मत्वम् । यदि ब्रह्मपदार्थः परमात्मैवेष्यते, तदा कथं तेन अतीन्द्रिय है, द्रव्य ही इन्द्रियगम्य है । अतः साक्षात् पशु के द्वारा हो यज्ञ के स्वरूप का अवबोध होने से पशु को यज्ञ मानना उचित ही है । ' कतमे षट् ' इस प्रश्न के उत्तर में अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्यौ ये छ: पदार्थ गिनाये हैं । ये ही सब कुछ हैं । अग्नि प्रभृति का पहले वसुओं में परिगणन किया गया है । इनमें से चन्द्रमा और नक्षत्रों को निकाल देने से छः होते हैं । इन्हीं में सबका अन्तर्भाव हो जाता है । वे तीन देवता कौन से हैं? ये तीन लोक ही तीन देवता है । पृथिवी और अग्नि को मिलाकर पहला, अन्तरिक्ष और वायु को मिलाकर दूसरा, धौ और आदित्य को मिलाकर तीसरा लोक बनता है । इसलिये कुछ निरुक्तकार तान ही देवता मानते हैं । दो देवता कौन से हैं? इसका उत्तर है अन्न और प्राण । इन्हीं दो में सबका अन्तर्भाव हो जाता है । डेढ देवता कौन सा है? इसका उत्तर है पवन । ' तत्राहुः तेनाध्यर्ध: ' इस श्रुति का यह अभिप्राय है कि कुछ लोग पूछते हैं कि पवन तो अकेला ही बहता है, तो इसको डेढ किस प्रकार कहा गया है? इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है कि इस पवन के बहने से हो यह सब कुछ ऋद्धि, समृद्धि की ओर बढ़ता है, इसलिये इसको ' अध्यर्ध ' ( डेढ ) कहा जाता है । पवन एक है और आधे में सब कुछ है, इसलिये यह देवता एक न कहला कर डेढ कहा गया है । प्राण की सर्वत्र व्याप्ति के कारण एकता है और उसमें आधा भाग भोग्य अन्न का है । दयानन्द ने तो इसकी व्याख्या न कर मौन ही धारण कर लिया है । एक देवता कौन सा है? इसका उत्तर है कि प्राण । यह प्राण ही ब्रह्म है । यह ब्रह्म सर्वदेवात्मक होने से महान् है । इसलिये यह ब्रह्म ' स्यत् ' कहा जाता है । श्रीशांकरभाष्य में ' स्यत् ' को परोक्ष का अभिधायक शब्द माना है । आनन्दगिरि का कहना है कि ब्रह्म के परोक्ष होने के कारण उसको जानने के लिये विशेष प्रयत्न की अपेक्षा है, यही ' त्यत् ' शब्द से जाना जाता है । दयानन्द तो यहाँ पर ब्रह्म पद से परमात्मा का ग्रहण करते हैं । यह ठीक नहीं है, क्योंकि यहाँ पर तत्पद से सामानाधिकरण्य है । प्राण ही परमात्मा नहीं है, क्योंकि वह अपर ब्रह्म है । सूक्ष्म प्रपंच का समष्टिभूत चेतन हिरण्यगर्भ कहा जाता है । सुक्ष्म शरीर में जब बुद्धि का प्राधान्य रहता है, तो वह हिरण्यगर्भ और प्राण के प्राधान्य में सूत्रात्मा कहलाता है । यदि ब्रह्म पद का अर्थ परमात्मा

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वेदार्थपारिजात: ६१५ प्राणस्य सामानाधिकरण्यम् । नहि सोऽयं देवदत्त इतिवत्तयोः सामानाधिकरण्यं संभवति, भिन्नयोस्तदसंभवात् । नापि मृद्घट इतिवत्कार्यकारणभावमूलकं सामानाधिकरण्यम्, मृद्घः योरिवोपादानोपादेयतानङ्गीकारात् । नापि सर्पों रज्जु-रिति बाधसामानाधिकरण्यं संभवति, सामाजिकैस्तयोरधिष्ठानावेयभावानङ्गीकारात् । दयानन्दस्तु ' किमेते सर्व एवोपास्याः सन्तीति ' प्रश्नमुत्थाप्य ' नैव किन्तु ' इत्युक्त्वा ' स ब्रह्म ' इति प्रतोकमुद्धृत्य ' यत्सर्वजगत्कर्तृ सर्वशक्तिमत् सर्वस्येष्टं ब्रह्मास्ति स एवैकश्चतुस्त्रिशो वेदोक्तमिद्धान्त प्रकाशितः परमश्वरो देवः सर्वमनुष्यं रुपास्य: ' ( पृ ० ७५ ) इति वक्ति । तत्र स इतिपदेन प्रकृतः कतम ए देव इति प्रकृतं प्राणमुपेक्ष्य परमात्मग्रहणं निर्मूलमेव । ' कतमो एको देव इति? स ब्रह्म त्यदित्याचअते ' इत्यत्र कतम उपास्य इति प्रश्नस्योत्थापयितुमशक्यत्वाद्वैदिकशब्द बाह्यत्वाच्च । ब्राह्मणस्य प्रथमप्रघट्टक एव - ' कत्येव देवा याज्ञवल्क्य, त्रयस्त्रिदित्यमिति कत्येव षडित्योमिति य इत्यमिति कत्येव द्वावित्योमिति कत्येव अध्यर्ध इत्योमिति कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्येक इत्योमिति ' । एवं क्रमेण संख्या-सम्बन्धीनि प्रश्नप्रतिवचनानि दृश्यन्ते । तदनन्तरं संख्येयस्वरूपसम्बन्धीनि प्रश्नप्रतिवचनानि द्वितीये प्रघट्टके कतमे त्रयस्त्रिंशदिति प्रश्नस्य प्रतिवचनरूपेण अष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्या इन्द्रश्च प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिशावित्युक्तम् । तृतीये कतमे वसव इति प्रश्नस्योत्तरम् । चतुर्थे कतमे रुद्राः, पञ्चमे कतम आदित्याः, षष्ठे कतम इन्द्रः कतमः प्रजा-पतिरित्येतेषामुत्तरम् । सप्तमे कतमे षड् इत्यस्योत्तरम् । अष्टमे कतमे त्रयः कतमो द्वो कतमोऽध्यर्थ इत्येषां प्रश्ना-नामुत्तरम् । नवमे कतम एको देव इत्यस्य प्रश्नस्योत्तरम् । नात्र मध्ये कस्मादेतत् किमेते सर्व एवोपास्या सन्तीति प्रश्नः संभाव्यते, प्रकृतपरित्यागाप्रकृतप्रक्रिययोः प्रसङ्गात् । माना जाता है, तो उसके साथ प्राण का सामानाधिकरण्य कैसे बनेगा | ' यह वही देवदत्त है ' यहाँ जैसे ' यह ' और ' वह ' शब्द से बोधित देवदत्त का सामानाधिकरण्य बनता है, वैसा सामानाधिकरण्य प्राण और परमात्मा के भिन्न होने से नहीं बन सकता । मिट्टी और घड़े के समान कार्यकारणमूलक सामानाधिकरण्य भी नहीं बन सकता, क्योंकि उस तरह का उपादान और उपादेय भाव प्राण और परमात्मा का नहीं बनता । सर्प और रज्जु के समान यहाँ पर बाध सामानाधिकरण्य भी नहीं बन सकता, क्योंकि आर्यसमाजियों ने प्राण और परमात्मा में अधिष्ठान और अधिष्ठेय भाव भी नहीं माना है । दयानन्द ने तो यहाँ पर ' क्या इन सबकी उपासना करनी चाहिये ' ऐसा प्रश्न कर ' नहीं किन्तु ' ऐसा कह कर ' ब्रह्म ' इस प्रतीक को उद्धृत कर ' जो सब जगत् का कर्ता, सर्व शक्तिमान्, सबका इष्ट, सबकी उपासना के योग्य, सत्रका धारण करने वाला, सबमें व्यापक और सबका कारण है वही ब्रह्म है । वहां अकला चौतीसवां देव वेदादि शास्त्रों में प्रकाशित है । इसी परमेश्वर देव की सब मनुष्यों को उपासना करनी चाहिये ' ऐसा कहा है । यहाँ पर ' स ' इस पद से प्रकृत में कोन एक देवता है? प्रसंग से प्राप्त प्राण को छोड़कर परमात्मा का ग्रहण करना निर्मूल है । ' एक देव कौन? वह ब्रह्म त्यत् कहलाता है ' यहाँ पर किसकी उपासना करनी चाहिये? यह प्रश्न हो उपस्थित नहीं होता और ऐसा करना वैदिक शब्दों में बाहरी अर्थ की खींचतान करना ही माना जायगा । नवें ब्राह्मण के पहले प्रघट्टक में ही ' हे याज्ञवल्क्य! कितने देवता है? तैंतीस हाँ । कितने देवता हैं? छः, हाँ । तीन, हाँ । कितने हैं? दा, हाँ । कितने हैं? डेढ, हाँ । हे याज्ञवल्क्य, कितने देवता है? एक, हाँ । ' इस क्रम से संख्या संबन्धी प्रश्न और उत्तर विद्यमान है । उसके बाद द्वितीय प्रघट्टक में संख्येय के स्वरूप के संबन्ध में प्रश्न और उत्तर दिये गये हैं । कितने? तैंतीस इस प्रश्न के उत्तर में आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह वादित्य, इन्द्र और प्रजापति ये तैंतीस है, ऐसा उत्तर दिया गया है । तीसरे में कितने हैं? इस प्रश्न का उत्तर है । चतुर्थ में कितने हैं? पाँचवें में आदित्य कितने हैं, छठे में इन्द्र कैसा है? और प्रजापति कैसा है? इन प्रश्नों के उत्तर हैं । सप्तम में छः कौन से हैं? इसका उत्तर है । अष्टम में तीन, दो और डेढ़ कौन कौन से हैं? इन प्रश्नों का उत्तर है । नवे प्रघट्टक में एक देव कौन है? इसका उत्तर है । इस बीच में अकस्मात् ही क्या इन सबकी उपासना करन चाहिये? यह प्रश्न नहीं उठ सकता । इस प्रकार प्रकृत बात का परित्याग और अप्रकृत का परिग्रहण का दोष दयानन्द की व्याख्या में आता है!

पृष्ठ 646

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६१६ बेदार्थपारिजातः किञ्च स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ' इति वाक्यस्य व्याख्यानमेव तेन न कृतम् । मध्ये ' धामानि त्रयाणि स्थानानि नामानि जन्माति ' इत्यादीनि निरुक्तवाक्यानि समुत्थाप्य तद्वयाख्यानमकृत्वैव कतमे ते त्रय इत्यादिव्याख्यान-मारब्धम् । तदेतत्सर्वं सर्वथोच्छुङ्खलं शाब्दन्याय बहिर्भूतं चेति विद्वांसो विवेचयन्तु । तत्रापि ' त्यदित्याचक्षते ' इति वचनं न स्पृष्टमेव, तच्च मन्ये तदज्ञानादेव | शाङ्करभाष्यतट्टीकानुसारेण तु त्यदिति परोक्षाभिधायकेन शब्देन परोक्षत्वप्रतिपत्ती प्रयत्नगौरवमेव सूच्यते । शाङ्करभाष्यरीत्याऽनन्तानां देवानां निवित्संख्याविशिष्टेषु देवेष्वन्त-र्भाव: । तेषामपि त्रयस्त्रिंशदादिषूत्तरोत्तरे यावदेकस्मिन् प्राणे ( अन्तर्भावः ) । प्राणस्यैकस्यैव सर्वोऽनन्तसंख्याको विस्तरः । एवमेकश्चानन्तश्चावान्तरसंख्याविशिष्टश्च प्राण एव । तत्र च देवस्यैकस्य नामरूपकर्मगुणशक्तिभेदोऽधि-कारभेदात् । तत एव निरुक्तकारो यास्को दुर्गाचार्यश्च प्राणात्मकस्य महत आत्मनो हिरण्यगर्भस्य सुत्रात्मन एव महिमानः सर्वे देवा इति प्रदर्शितवन्तौ । वस्तुतो वेदेषूपनिषत्सु परापरभेदेन ब्रह्मोपासनद्वैविध्यं दृश्यते । विरादिरण्यगर्भादिरूपेणापरं ब्रह्म तत्र तत्रोपास्यते । किं बहुना, गौण्या वृत्त्या अन्नं ब्रह्म प्राणो ब्रह्मेत्यादिष्वपि ब्रह्मपदप्रयोगो दृश्यते । परंब्रह्मापि निराकार-निर्गुणब्रह्मरूपेण सगुण निराकारब्रह्मरूपेण सगुणसाकारब्रह्मरूपेण चोपास्यते । अग्न्यादित्यादयोऽपि देवा अदेवतावद -चेतनाः प्रतीयमाना अप्यैश्वर्य्यवन्तश्चेतना विग्रहवन्तश्च भवन्तीत्यपि प्रतिपादयिष्यते । बृहदारण्यके विरोपासना-पेक्षया प्राणोपासनस्य माहात्म्यातिशयः प्रोक्तः । तस्य च ब्रह्मलोकप्राप्तिफलकत्वेऽपि निष्कामस्य शुद्धब्रह्म-साक्षात्कारयोग्यताप्राप्तिरेव मुख्यं फलम् । ' सब्रह्म त्यदित्याचक्षते ' इस वाक्य की उन्होंने व्याख्या ही नहीं की । बीच में ही ' घाम तीन हैं -- स्थान, नाम और जन्म ' इस निरुक्त के वाक्य को उद्धृत कर बिना उसकी व्याख्या किये हो वे तीन कौन से हैं? इसकी व्याख्या कर दी । यह सब सर्वथा कोई क्रम न होने के कारण उच्छृंखल व्याख्या है और शाब्दिक नियम पद्धति के विरुद्ध भी है, विद्वद्गण इसकी परीक्षा करें । यहाँ पर भी ' eferred ' इस वचन की व्याख्या नहीं की गई, लगता है वे इसका अर्थ न समझ सके | शांकरभाष्य और उसकी टोका के अनुसार ' स्यत् ' इस परोक्ष के बोधक शब्द से परोक्ष के ज्ञान के लिये बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है, यह सूचित होता है । शांकरभाष्य के अनुसार अनन्त देवों का निचित् संज्ञक मन्त्रपदों में बताई संख्या में अन्तर्भाव हो जाता है । इनका भी तैंतीस में और क्रमशः होते होते एक प्राण में इन सबका अन्तर्भाव हो जाता है । यह सारा अनन्त संख्या का विस्तार केवल एक प्राण का ही है । इस प्रकार एक, अनन्त और अवान्तर संख्या वाला भी केवल प्राण ही है । एक ही देव का नाम, रूप, कर्म, गुण और शक्ति का भेद अधिकार के भेद की दृष्टि से हैं । इसीलिये निरुककार यास्क और उसके भाष्यकार दुर्गाचार्य ने यह बताया है कि प्राणात्मक महान् आत्मा के ही, जो कि हिरण्यगर्भ और सूत्रात्मा शब्दों से भी जाना जाता है, ये सब देवता महिमा है । वस्तुतस्तु वेद और उपनिषद् में पर और अपर भेद से दो प्रकार की ब्रह्म की उपासना देखी जाती है । विराट्, हिरण्यगर्भ आदि के रूप में अपर ब्रह्म की जहाँ तहाँ उपासना विहित है । इतना ही नहीं, गौणी वृत्ति से ' अन्न ब्रह्म है, प्राण ब्रह्म है ' इत्यादि स्थलों में अन्न आदि के लिये ब्रह्म शब्द प्रयुक्त हैं । परब्रह्म भी निराकार, निर्गुण, ब्रह्मरूप से, सगुण निराकार ब्रह्मरूप से और सगुण साकार ब्रह्मरूप से उपासित होता है । अप्ति, आदित्य प्रभृति देवता यद्यपि अचेतन होने के कारण देवता नहीं प्रतीत होते, तो भी ये ऐश्वर्यशाली, चेतन और शरीरधारी भी होते हैं, यह मागें बताया जायगा । बृहदारण्यक उपनिषद् में अन्य उपासना के बजाय प्राण की उपासना का विशेष माहात्म्य बताया है । प्राण की उपासना का फल यद्यपि ब्रह्मलोक की प्राप्ति भी है, तो भी निष्काम उपासना से शुद्ध ब्रह्म का साक्षात्कार कराना इसका मुख्य फल है ।

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वेवार्थपारिजातः यच्च त्रयो लोकास्त्रयो देवाः ' के ते इत्यत्राह निरुक्तकारः - ' धामानि त्रयाणि भवन्ति, स्थानानि नामानि जन्मानि च ' ( पृ ० ७५ ) इति निरुक्तवाक्यमुद्धतम्, तत्तु सर्वथा प्रसङ्गशून्यमेव । के त इत्यस्य प्रश्नस्य ' अग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं च आदित्यश्च द्योश्च ' इति शतपथवाक्यैरेवोत्तरितत्वात् । वस्तुतस्त्विदं निरुक्तवचनं धामस्वरूपनिरूपणाय प्रवृत्तम्, ततः पूर्व नवमाध्यायस्याष्टाविंशे खण्डे - ' या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा । मर्न नु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च । ( ऋ ० १० ९ ७ | १ ) इत्यस्य मन्त्रस्य व्याख्यानं प्रवृत्तम् । तथाहि या ओषधय पूर्वा जाता: ( प्रथमजाता: ) । कुतः पूर्वा इत्यपेक्षायामाह - देवेभ्यः । कियति काले इत्याकाङ्क्षायामाह - त्रियुगं पुरा । कलिद्वापरत्रेताभ्यः पूर्वमादिकल्पे आधे कृतयुगे देवानामपि जीवनहेतुत्वात्ततः पूर्वमेवमुत्पद्यते ततो देवा उत्पद्यन्ते । अहं तासां बभ्रुवर्णानां कपिलवर्णानां वर्णव्यापत्या हरणानां क्षुदादिहत्रीणां भरणानां भूतग्रामभर्त्रीणां वा शतं धामानि सप्त च सप्ताधिकं शतं धामानि मने यथावज्जाने । अत्र धामपदस्य कोऽर्थ इति जिज्ञासायामुक्तम्-- ' धामानि त्रयाणि भवन्ति, स्थानानि नामानि जन्मानि च ' इति । इह तु धामपदेन जन्मवाभिप्रेतम् । सप्तशतमोषधिजातयोऽत्र मन्त्रेऽभिताः । पूर्वोक्तशतपथीयवाक्यप्रसङ्गे सर्वथाऽनुपयुक्तमेव निरुक्तवचनम् । एवं ' त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोक: ' ( शत ० १४१४ ) इति वचनमपि नात्रोपयोगि, तद्वचनस्य वाङ्मनः प्राणेषु पृथिव्यादिदृष्टिविधायकत्वात् । यथा पश्चाग्निविद्यायां योषादिष्वग्निबुद्धिस्तद्वत् । यच्चोक्तम्- ' देवशब्दे दिवु धातो । कोडाविजिगीषाव्यवहा रद्युतिस्तुतिमोदमदकान्तिगतिरूपाः सर्वेऽर्थाः सगच्छन्ते । इयांस्तु भेदः - अन्या देवता: परमेश्वरप्रकाश्याः, परमेश्वरस्तु स्वयंप्रकाशः । तत्र क्रीडा - विजिगीषा-व्यवहार - स्वप्न - निद्रा - मदरूपा व्यवहारवृत्तयो भवन्ति । तत्सिद्धिहेतवोऽग्न्यादयो देवताः सन्ति । तत्रापि नैव सर्वथा ' तीन लोक ही तीन देवता है ' वे कौन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में निरुक्तकार ने कहा है- पाम तीन होते हैं- स्थान, नाम और जन्म । ' इस प्रकार दयानन्द का यहाँ पर निरुक्त वाक्य को उद्धृत करना सर्वथा अप्रासंगिक है । वे तीन देव कौन से हैं? इस प्रश्न का उत्तर – ' अग्नि और पृथिवी, वायु और अन्तरिक्ष, आदित्य और द्यौ ' इस शतपथ श्रुति से हो जाता है । वस्तुतस्तु यह निरुक्त का वचन घास के स्वरूप के निरूपण के लिये प्रवृत्त हुआ है । इससे पहले नवम अध्याय २८ खण्ड में ' या ओषधीः ० ' इत्यादि ऋङ्मन्त्र का व्याख्यान हुआ है । जैसे कि - ' जो ओषधियां पहले पैदा हुई हैं । किससे पहले? इस प्रश्न के उत्तर में बताया गया कि देवताओं से पहले । कितनी पहले औषधियाँ पैदा हुई? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है कि तीन युग पहले | कॉल, द्वापर और त्रेता युग से पहले आदिकल्प अर्थात् पहले कृत युग में देवताओं की स्थिति थी । अतः पहले औषधी raar ear है और उसके बाद देवता पैदा होते हैं । मैं उन कपिलवर्ण वाली क्षुधा तथा रोग आदि की निवृत्ति करने वाली और प्राणिमात्र का भरण - पोषण करने वाली औषधियों के साल अधिक सो अर्थात् १०७ स्थानों को ठीक से जान लूँ । ' यहाँ पर ' घम ' शब्द का क्या अर्थ है? इस जिज्ञासा के उत्तर में कहा गया है कि- ' घाम तीन है- स्थान, नाम और जन्म | यहाँ पर ' धाम ' शब्द का अर्थ जन्म अभिप्रेत है । इस मन्त्र में १०७ जाति, अर्थात् प्रकार की ओषधियाँ चर्चित है । पूर्व उद्धृत शतपथ श्रुति के प्रसंग में इस निरुक्त वाक्य को उद्धृत करना सर्वथा अनुपयुक्त हैं । इसी तरह ' ये ही तीन लोक हैं --- वाक् पृथ्वीलोक हैं, मन अन्तरिक्ष लोक हैं और प्राण द्युलोक है ' यह शतपथ वचन भी यहाँ उपयुक्त नहीं है, क्योंकि यहाँ पर केवल वाकू, मन और प्राण में पृथिवी आदि की दृष्टि का विधान है । जैसा कि पचाग्निविद्या में योषा ( स्त्री ) प्रभृति में अग्नि की बुद्धि आरोपित की जाती है । यह कहा गया है कि ' देव शब्द से दिवु धातु के सभी क्रीडा, विजिगीषा, व्यवहार, चुति, स्तुति, मोद, मद, कान्ति, गति रूप अर्थ संगत होते हैं । इतना फरक हैं कि अन्य देव परमेश्वर से प्रकाशित होते हैं और परमेश्वर स्वयंप्रकाश है । इनमें क्रोडा, विजिगीषा, व्यवहार, स्वप्न अर्थात् निद्रा और मद, ये व्यवहार की ही विभिन्न वृत्तियाँ हैं और इनकी सिद्धि देने वाले अति प्रभृति ७८ I

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६१८ दार्थपारिजातः परमेश्वरस्य त्यागो भवति । तस्य सर्वत्रानुषङ्गितया सर्वोत्पादकाधारकत्वात् ' ( पृ ० ७७ ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, tant योगरूढत्वाङ्गीकारात् । अन्यथा द्यूतपरायणा मत्तादयोऽपि देवशब्दव्यपदेश्याः स्युः । सर्वोत्पादका-धारकत्वादिति प्रयोगस्तु निरर्थको गौरवावहश्च, सर्वोत्पादकत्वात् सर्वाधारत्वाच्चेत्येवं प्रयोगस्य सुवचत्वात् । यच्च ' द्युतिस्तुतिमोदकान्तिज्ञानप्राप्त्यायस्तु परमेश्वर एव यथावत् संगच्छते । अतोऽन्यत्र तत्सत्तया गौण्या वृत्त्या वर्तन्ते ' ( पृ ० ७७ ) इति, तदपि न वेदान्तदृष्ट्या सजातीयविजातीयस्वगतभेदशून्येऽसङ्गे नित्ये निर्गुणे तद्भिन्नद्युतिस्तुति-गुणाद्यसंभवात् । सगुणे त्वचिन्त्यानन्तकल्याणगुणाः सत्येव । तत्सत्तया अभ्यत्र द्युत्यादयो भवन्तीति तु न विचारसहम्, अन्यगुणैरन्यस्य गुणवत्त्वासंभवात् । वेदान्तिदृष्ट्या तु यथा रज्जुसत्तया तत्र कल्पिताः सर्पादयः सत्तावन्तः, अधि-ष्ठानसत्तातिरिक्तकल्पित सत्तानङ्गीकारात्; तथैव सर्वस्यैव जगतो ब्रह्मणि कल्पितत्वाद् ब्रह्मसत्तास्फूर्तिभ्यामेव सत्तावस्वं स्फूर्तिमत्त्वं च युक्तमेव । न च त्वया प्रपञ्चस्य ब्रह्माध्यस्तताऽङ्गीक्रियते । यच्च ' वेदेषु जडचेतनयोः पूजाभिधानाद् वेदाः संशयास्पदं प्राप्ताः सन्तीति ' ( पृ ० ७८ ) संशयोत्थापक-वाक्यम्, तदपि न युक्तम्, विकल्पानुपपत्तेः । किमत्र वेदेषु जडचेतनयोः पूजाभिधानात् परमेश्वरस्यैवोपासनं कर्तव्यमिति सिद्धान्तस्य संदिग्धत्वमापाद्यते, आहोस्वित् पूजाभिधानाद् वेदाविरुद्धाभिधायित्वेन तेषां प्रामाण्यस्य संदिग्धत्वमापाद्यते । कुतः, वेदेषु यत्र यत्रोपासना विधीयते तत्र तत्र देवतात्वेनेश्वरस्यैव ग्रहणादित्युत्तरोपसंहारेण प्रथमपक्ष एव प्रतीयते । परन्तु वाक्यं तु न तदनुरूपम् । तथा च तादृशसिद्धान्तस्यैव संशयास्पदत्वमागतं न वेदानां संशयास्पदता, वेदानां विरुद्धाभिधायित्वेऽपि तेषां प्रामाण्यस्यैव संशयास्पदता न वेदानाम्, तेषां स्वरूपस्य संशयानास्पदत्वात् । देवगण हैं । यहाँ पर ' सर्वथा परमेश्वर का त्याग नहीं होता । वह सर्वत्र अनुस्यूत है, अत एव सभी की उत्पत्ति और धारकता में कारण है, यह भी कुछ नहीं है । देव शब्द यहाँ पर योगरूढ माना गया है । अन्यथा जुबाड़ी और नशे में मतवाले लोग भी देवता मान लिये जायेंगे । परमात्मा सर्वोत्पादकों का आधार है, यह कहना भी निरर्थक है । यही सबका उत्पादक है, इतना ही कहना काफी है, इसके साथ आधार शब्द को जोड़ने में गौरव दोष है | अतः ' सर्वाधारत्वाच्च मात्र इतने शब्दों का प्रयोग पर्याप्त 1 ' धुति, स्तुति, मोद, कान्ति, ज्ञान, प्राप्ति इत्यादि परमेश्वर में ही यथावत् संगत होते हैं । परमेश्वर से भिन्न प्राणी में उसी की सत्ता के कारण गौण प्रयोग होता है । ' यह भी ठीक नहीं है । वेदान्त की दृष्टि से सजातीय, विजातीय स्वगत इन तीनों भेदों से रहित, असंग, नित्य, निर्गुण ब्रह्म में उससे भिन्न द्युति, स्तुति इत्यादि गुणों की सत्ता ही नहीं है । सगुण ब्रह्म में तो अचिन्त्य, अनन्त, कल्याणदायक गुण हैं हो । उस परमात्मा की सत्ता से दूसरी जगह बुति प्रभृति गुण होते हैं, यह बात तर्क से सिद्ध नहीं हो सकती । एक के गुण से दूसरा गुणवान् नहीं हो सकता । वेदान्त की दृष्टि से तो यह उसी प्रकार संगत हो जाता है, जैसे कि रज्जु की सत्ता से उसमें कल्पित सर्प प्रभृति की सत्ता मान ली जाती है । यहाँ पर अधिष्ठान से अतिरिक्त कल्पित वस्तु की पृथक् सत्ता नहीं मानी जाती । इस तरह सारे जगत् की कल्पना ब्रह्म में की जाती है, अतः ब्रह्म की सत्ता में उसकी सत्ता और ब्रह्म की स्फूर्ति से जगत् में भी स्फूर्ति मानना उचित ही है । आप तो प्रपच का ब्रह्म में अध्यास मानते नहीं । ' वेद में जड़ और चेतन की पूजा का विधान करके वेद संशय की स्थिति में डाल दिये गये हैं ' इस प्रकार की शंका उठाने वाला यह वाक्य भी ठीक नहीं है, क्योंकि यहाँ कोई विकल्प नहीं बनता । यहाँ पर वेद में जड़ और चेतन की पूजा का विधान होने से परमेश्वर की ही उपासना करनी चाहिये, इस सिद्धान्त में सन्देह होता है, अथवा पूजा का विधान होने से वेद विरोधी बात कहने के कारण उनके प्रामाण्य में संदेह होता है? वेद में जहां - जहां उपासना विहित है, वहाँ वहाँ ईश्वर ही देवता के रूप में परिगृहीत है, इस प्रकार का आगे उपसंहार होने के कारण प्रथम पक्ष ही यहाँ मालूम पड़ता है, परन्तु वाक्य उसके अनुरूप नहीं है । इस प्रकार उक्त सिद्धान्त ही संशयास्पद बन जाता है, इसमें वेद संशयास्पद नहीं बनते । वेदों के विरुद्धाभिधायी होने पर भी उनका प्रामाण्य ही संदिग्ध होगा, वेदों की संदिग्धता नहीं होगी । क्योंकि उनका स्वरूप तो सदा संशय से मुक्त है ।

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वेदार्थपारिजातः ६१६ यच्च ' मैवं भ्रमि ' इत्यारभ्य ' ईश्वरेण सर्वेषु पदार्थेषु स्वातन्त्र्यस्य रक्षितत्वात् । यथा चक्षुषि रूपग्रहण-शक्तिस्तेन रक्षितास्ति, अतश्चक्षुष्मान् पश्यति नैवान्धश्चेति व्यवहारोऽस्ति । अत्र कश्चिद् ब्रूयान्नेत्रेण सूर्यादिभिश्च विनेश्वरी रूपं कथं न दर्शयतीति यथा तस्य व्यर्थेयं शङ्कास्ति तथा पूजाविषयेऽपि ज्ञेया । यतः पूजा सत्कारः प्रियाचरण-मनुकूलाचरणं चेत्यादयः पर्य्यायाः सन्ति । इयं पूजा चक्षुषोऽपि सर्वैर्जनः क्रियते । एवमग्न्यादिषु यावदर्थेद्योतकत्वं विद्या-क्रियोपयोगित्वं चास्ति तावद्देवतात्वमस्ति ' ( पृ ० ७८ ) इति, तदप्यसंबद्धमेव, वाक्यानां परस्पराकाङ्क्षाराहित्यात् । पदार्थेषु स्वातन्त्र्यं परमेश्वराधीनं भवेत्तदा कथं स्वातन्त्र्यम् । पदार्थेषु स्वातन्त्र्यं चेत्कथं परमेश्वराघानता । नहि स्वातन्त्र्यं पारतन्त्र्यं चैकत्र संभवति, व्याहतत्वात् । चक्षुषि रूपग्रहणशक्तिः परमेश्वरेण रक्षिता स्यात्तदा तल्लोपो न स्यात् । दृश्यते च क्वचिल्लोपोऽपि । ईश्वरः स्वतन्त्रः सर्वशक्तिमांश्चेत्तदा नेत्रेण सूर्यादिभिश्च विना रूपं कथं न दर्शयतीयं शङ्का व्यर्थेनास्तीत्यत्र हेतुस्तु नोपन्यस्तः, निराकरण हेतुमन्तरा शङ्कायास्तादवस्थ्यपातात् । यथा त्वद्रीत्या सर्वशक्तिमत्त्वेनैव कण्ठताल्वादिमन्तरापीश्वरो वेदमुच्चारयति, तथैव कुतो न सर्वशक्तिमत्त्वेन चक्षुरन्त रापि जनान् रूपं दर्शयतीति शङ्काया अनपनोदनात् । किञ्च त्वद्रीत्या मन्त्रात्मका एव वेदा न च तत्रेश्वरोपासनविधानं न वाऽचेतनोपासनविधानं वास्ति, पूजादिविधानस्य ब्राह्मणेष्वन्तर्भावात् । तेषु च परमेश्वरस्यान्यादीनां चोपासनं समानमेव विहितम् । उपास्यमभि-लक्ष्य तदाकारां वृत्ति संपाद्य दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारतथा यदासनं तदेवोपासनम् । सति चैवं कथमीश्वरोपासनमेव मुख्यं नादित्याद्युपासनं मुख्यम् । वेदेषु यत्रोपासना विधीयत इति यदुक्तं तदपि न संगतम्, मन्त्रेषु विधानासंभवादेव । ' ऐसा भ्रम मत करो ' इससे आरम्भ कर ' ईश्वर ने सब पदार्थों के बीच में स्वतन्त्र गुण रक्खे हैं । जैसे कि आँख में उसने रूप को देखने की शक्ति रक्खी है, इसीलिये आँख वाला ही देखता है, अन्धा नहीं, ऐसा व्यवहार है । यहाँ पर यदि कोई पूँछे कि आँख और सूर्य प्रभृति प्रकाश के बिना ही ईश्वर रूप क्यों नहीं दिखाता? जैसे उसकी यह शंका व्यर्थ है, उसी तरह पूजाविषयक यह शंका भी है । क्योंकि पूजा शब्द के सत्कार, प्रियाचरण, अनुकूलाचरण आदि शब्द पर्याय है । सभी मनुष्य आँख की भी इसी प्रकार की पूजा करते हैं । इसी प्रकार अग्नि आदि पदार्थों में जितना जितना अर्थ का प्रकाश, दिव्यगुण, क्रियासिद्धि और उपकार लेना संभव है, उतना उतना उनमें देवपन मानने में कुछ भी हानि नहीं हो सकती । ' यह सब बात असंबद्ध है, क्योंकि ये वाक्य परस्पर आकांक्षा से रहित है । पदार्थों की स्वतन्त्रता यदि परमेश्वर के अधीन हैं, तो फिर स्वतन्त्रता कैसी? पदार्थों में स्वत्रन्त्रता यदि है तो फिर परमेश्वर के अधीन क्यों रहेंगे? स्वातन्त्र्य और पारतन्त्र्य दोनों एक जगह नहीं रह सकते, क्योंकि ये परस्पर विरोधी हैं । आँख में देखने की शक्ति परमेश्वर द्वारा रक्षित हो तो फिर उसका लोप नहीं होना चाहिये, किन्तु इसका लोप तो कहीं कहीं देखा जाता है । ईश्वर स्वतन्त्र और सर्व शक्तिमान् है तो फिर आँख और सूर्य प्रभृति के बिना रूप को क्यों नहीं दिखलाता, यह शंका व्यर्थ ही है, इसमें कोई कारण नहीं बतलाया गया । कारण सहित यदि शंका का समाधान नहीं किया जाता तो वह बनी ही रह जाती है । जैसे आपके मत से सर्व शक्तिमान् होने से ईश्वर कण्ठ तालु आदि स्थान के बिना ही वेद का उच्चारण करता है, उसी तरह सर्व शक्तिमान होने से ही वह बिना चक्षु के भी मनुष्यों को रूप के देखने में समर्थ क्यों नहीं कर देगा, इस प्रकार की शंका का परिहार यहाँ नहीं होता । दूसरी बात आपके मत से वेद मन्त्रात्मक ही हैं । इनमें ईश्वर की अथवा अचेतन की उपासना का विधान नहीं है । पूजा aft or faara ब्राह्मण भाग में हुआ है । इनमें परमेश्वर और अग्नि प्रभूति की उपासना समान रूप से बताई गई हैं । उपास्य को लक्षित कर, उपास्य के आकार की ही अपनी चित्तवृत्ति को बनाकर दीर्घकाल पर्यन्त निरन्तर सरकार पूर्वक उसमें स्थिर रूप से बैठना ही उपासना कहलाती है । ऐसी अवस्था में ईश्वर की उपासना ही मुख्य होगी, आदित्य आदि की उपासना नहीं, यह कैसे बन सकता है । ' वेदों में जहाँ उपासना का विधान है ' आपका यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि मन्त्रों में तो कोई विधि नहीं है ।

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 650 का मूल पृष्ठ
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६२० पारिजातः चक्षुरादयस्तु भृत्यवन्मनुष्याज्ञावशंवदा एव । न तेषां पूजा भवति, पूज्येष्वेव पूजासंभवात् । भृति ददानोऽपि नहि भृत्यं पूजयतीति वदति लोकः । वस्तुतस्तु ब्राह्मणभागेष्यपि क्वचिदपि न जडस्य पूजोक्ता, किन्तु तत्तदधिष्ठातृ-दैवतस्यैवोपासनविधानादिति निरुक्ता दिसिद्धान्तनिरूपणेन पूर्वमुक्तमेव । यदपि ' मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव ', ' त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ' ( पृ ० ७८-७९ ) इति देवतोपासनप्रमाणमुक्तमिति, तदपि ब्राह्मणवचनमेव । एवमेव तैत्ति-रीयोपनिषद्यपि ' नमो ब्रह्मणे नमो वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ' अत्र मन्त्रे मित्र-वरुणमेन्द्र बृहस्पति विष्णुब्रह्मवायूनां संस्तवनं दृश्यते । मातृपित्राचाय्र्यातिथ्यादिषु तु पूज्यत्वातिशयाद्देवबुद्धिरेव कर्तव्या । यथा मात्रादयः सशरीरा देवताः, तथा ब्रह्मापि सशरोरम्, ' नमो हिरण्यबाहवे ' इत्यादिभिस्तस्य हिरण्य. शरीरत्वप्रतिपादनात् । आत्मस्वरूपापेक्षया त्वग्न्यादित्यादयो देवा अपि निःशरीरा ब्रह्मरूपा एव । यदपि तथैव पूर्वोक्तासु देवतास्वग्निपृथिव्यादित्यचन्द्रमोनक्षत्राणि चेति पञ्च वसवो विग्रहवत्यः । एव-मेकादश रुद्रा द्वादशादित्या मनःषष्ठानि ज्ञानेन्द्रियाणि वायुरन्तरिक्षं द्यौर्मन्त्राश्चेति शरीररहिताः । तथा स्तनयित्नु-विधियज्ञौ च सशरीराशरीरे देवते स्तः ' ( पृ ० ७६ ) इति, तदपि लुच्छम्, शास्त्रार्थानवबोधात् । अन्तर्यामिब्राह्मणे परमेश्वरस्य पृथिवीजलतेजोवाय्वाकाशदिगादिसर्व शरीरकत्वमुक्तम् । तथैव तत्र प्राणवाक्चक्षुर्मनोविज्ञानादिशरीरत्वं च परमात्मनो निगदव्याख्यातम् । ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरी ....... यो दिवि...... " य आदित्ये यो यमयति एष ते आत्माऽन्तर्याम्यमृतः । योऽप्सु योऽन्तरिक्षेयो वायो दिक्षु... य आकाशे..यश्चन्द्रतारके यः सर्वभूतेषु यः प्राणेयो वाचि यश्चक्षुःषु यो मनसियो विज्ञाने... ' ( वृ ० उ ० ३१७/३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । aria आदि तो मनुष्य के नौकर के समान उसी के अधीन हैं । उनकी पूजा नहीं होती, क्योंकि पूजा तो पूज्य की होती है । यह लोक व्यवहार में देखा गया है कि वेतन देने पर भी मनुष्य भृत्य ( नौकर ) की पूजा नहीं करता । वास्तव ब्राह्मण भाग में भी कहीं पर जड़ की पूजा का विधान नहीं है, किन्तु उस उस जड़ वस्तु की अधिष्ठाता देवता की हो सर्वत्र उपासना विहित है, यह बात निरुत आदि के सिद्धान्त का निरूपण करते समय हमने पहले ही कही है । ' माता को देवता मानो, पिता, आचार्य और अतिथि को देवता मानो ', ' तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, तुमको ही मैं प्रत्यक्ष कहूँगा ये वचन देवता की उपासना में प्रमाण बताये गये हैं । ये वचन ब्राह्मण भाग के हैं । इसी तरह तैसिरीय उपनिषद् में भी ' ब्रह्मा को नमस्कार करता हूँ, वायु को नमस्कार करता हूँ । आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं । आपको ही में प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूंगा ' इस मन्त्र में मिश्र, अरुण, अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति, विष्णु, ब्रह्मा और वायु की स्तुति है । माता, पिता, आचार्य, अतिथि में अत्यन्त पूजनीय हैं, इसलिये इनमें देवता बुद्धि करनी ही चाहिये । जैसे माता प्रभृति सशरीर देव हैं, वैसे ही ब्रह्मा भी है । ' नमो हिरण्यबाहवे ' इत्यादि उसको सुवर्णमय शरीर वाला बतलाते हैं । आत्मस्वरूप की अपेक्षा से तो अग्नि, आदिस्य प्रभृति भी निःशरीर, ब्रह्मरूप ही हैं । ' इसी तरह पूर्वोक्त देवताओं में अग्नि, पृथिवी, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र ये पांच वसुगण के देवता विग्रहधारी हैं । एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, मन के साथ पांच ज्ञानेन्द्रियां, वायु, अन्तरिक्ष, वो और मन्त्र इनके शरीर नहीं होता । इसी तरह स्तनयित्नु ar र्थात् बिजली और विधियज्ञ मूर्तिमान् और अमूर्तिमान् भी हैं । यह कथन भी सारहीन है । कहने वाले ने शास्त्र के अर्थ को ठीक से नहीं समझा है । अन्तर्यामी ब्राह्मण में परमेश्वर की पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, दिगादिरूपता, अत एव सर्वशरीरता कही गई है | इसी तरह वहां पर परमात्मा की प्राण वाकू, चक्षु, मन, विज्ञानादिशरीरवा भी शब्द द्वारा प्रतिपादित है । जैसे कि ' जो पृथिवी मैं स्थित होकर उसका मान्तर भाग बनता है, जिसको पृथिवी भी नहीं जानती, जिसका शरीर पृथिवी है, जो उसके अन्दर स्थित होकर पृथिवी का नियमन करता है, यही तुम्हारा अन्तर्यामी आत्मा है । इसी तरह जो जल में अन्तरिक्ष में...... बायु में... स्वर्ग में • शादित्य में........ दिशाओं में... आकाश में चन्द्र और तारामों में जो सब प्राणियों में जो प्राण में.... जो वाणी में... " " जो चक्षुओं में जो मन्त्र में जो विज्ञान में..... इत्यादि श्रुतियों में उक्त अर्थ ही कहा गया है ।