वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 651–660
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 651–660
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वेदार्थपारिजातः ६३१ देवताधिकरणे निरुक्ते च अग्न्यादित्यादिदृश्यज्योतिर्व्यतिरिक्तानां विग्रहवतीनामैश्वर्यशालिनीनां देवतानां प्रतिपादनाच्च । ताग्न्यादित्यादीनां ज्योतिषां विग्रहवत्वं त्वन्मतेऽपि सम्भवति, दृश्यजडातिरिक्तचेतनानामख्या-दित्यादीनां त्वयानभ्युपगमात् । किञ्च नहि दृश्यज्यातिषा शरीरवत्त्वं सम्भवति, चेष्टावत्त्वे सत्यन्त्यावयवित्वं शरीरमिति तल्लक्षणासङ्गतेः । कथञ्चिदभ्युपगमेऽपि तेषां शरोरवत्त्वे तद्भिन्नस्यान्यस्य शरीरिणोऽङ्गीकारापत्तेः । नहि विग्रहस्यैव विग्रहवत्त्वं सम्भवति, तस्य भेदघटितत्वात् । वस्तुतस्तु निरुक्तादी पुरुषविधत्वेनंव विग्रहवत्त्वमुक्तम् । ' तत्रषा व्यवहारोपयोगित्वमात्रमेव देवतात्वम् ' ( पृ ० ७ ९ ) इति यत्, तदपि तुच्छम्, व्यवहारोपयोगिषु घटादिषु देवतात्वाभावात् । एवमोश्वरस्यापि व्यवहारो-पयोगित्वमविशिष्टमेव तस्य जगद्व्यवहारप्रवर्तकत्वेन सर्वव्यवहारास्पदत्वात् । यदपि परमिष्टापयोगित्वेनवोपास्यः ' ( पृ ० ७ ९ ) इति, तदपि यत्किश्वित्, अग्न्यादावपोष्टापयोगित्वाविशेषात् । वस्तुतस्तु स्वामिदयानन्दो वायबलकुरा-नाद्यनार्यग्रन्थः प्रभावितत्वादेव मतमिदमास्थितो यद् ईश्वरातिरिक्तः कश्चनोपास्यो नास्तीति । मन्त्रब्राह्मणात्मकेषु वेदेषु पृथिव्यरस्यादित्यादीनामप्युपासनविधानात् । तेषामपि नमस्कारस्तुतिहविर्दानिध्यानभावेन वर्णनात् । ' नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे ' ( वा ० सं ० ३६/२१ ) इति विद्युदधिष्ठातृदेवतादीनां नमस्कारादिप्रति-पादनात् । यथा लोके राजाश्रयणाय तदमात्या अपि आदरणीया भवन्ति तथैवेश्वरोपासनाय तदङ्गभूतानि देवतान्त-रायप्युपास्यान्येव | दयानन्दाऽपि सस्कारविधौ सूर्यचन्द्रादीनामर्घ्यदाननमस्कारादिकमुक्तवानेव । तद्रीत्यापि कस्मैचिज्जडा प्रह्वीभावो मस्तकावनामस्तस्य पूजनं च मूर्तिपूजवास्ति ( सत्यार्थप्रकाशे नानकमतखण्डने ) | देवताषिकरण और निरुक्त में अग्नि, आदित्य आदि दृश्य ज्योति से भित्र ऐश्वर्यशालिनी शरीरधारिणी देवताओं का प्रतिपादन मिलता है | आपके मत में अग्नि, आदित्य आदि ज्योतियाँ विग्रहृधारिणी हो नहीं सकती, क्योंकि आप परिदृश्यमान जड अग्नि, आदित्य के मंडल से अतिरिक्त चेतन अग्नि, आदित्य को नहीं मानते । इन दृश्य ज्योतियों का शरीर नहीं हो सकता, क्योंकि उनमें शरीर का लक्षण नहीं घटता, जो कि चेष्टा वाला होते हुए अन्त्यावयवा माना जाता है । यदि किसी तरह उनका शरीर मान भी लिया जाय तो फिर उससे भिन्न कोई शरीरी मानना पड़ेगा । विग्रह ही विग्रहवान् तो नहीं होता, क्योंकि ये दोनों वस्तुएं भेद से ही घटित होती हैं । वस्तुतस्तु निरुक्त प्रभुति में देवताओं का पुरुषों का सा शरीर माना गया है । अतः ' इनमें से पृथिव्यादि का देवपन केवल हार के लिये है ' ( पृ ० ७ ९ ) यह कथन भी निःसार है, क्योंकि व्यवहार के उपयोगी घट प्रभृति में हम देवपन नहीं मानते । इसी तरह ईश्वर में भी व्यवहारोपयोगिता समान है । ईश्वर सारे जगत् के व्यवहार का प्रवर्तक है, अतः वही सभी व्यवहारों का आश्रय है । इसी तरह ' परमेश्वर ही सब मनुष्यों का इष्ट है, अतः उसी की उपासना करनी चाहिये ' ( पृ ० ७१ ) यह कथन भी कुछ नहीं, afafe प्रभृति में भी तो इष्टसाधनता विद्यमान है । वस्तुतस्तु स्वामी दयानन्द बाइबिल, कुरान आदि अनार्य ग्रन्थों से प्रभावित होने के कारण ' यह मानने लगे हैं कि ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई उपास्य नहीं है । मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद में तो पृथिवी, अग्नि, आदित्य प्रभृति की भी उपासना विहित है । इनके प्रति भी नमस्कार, स्तुति, आहुति, दान, ध्यान, भावना आदि का विधान है । ' विद्युत को नमस्कार है, स्तनयित्नु को नमस्कार ' इत्यादि यजुर्मन्त्र में विद्युत् की अधिष्ठातृ देवता को नमस्कार किया गया । जैसे लोक में राजा का आश्रय लेने के लिये उसके मन्त्री प्रभूति का भी आदर किया जाता है, उसी तरह ईश्वर की उपासना के लिये दंगभूत अन्य देवताओं की भी उपासना की जाती है । दयानन्द ने भी संस्कारविधि में सूर्य - चन्द्र प्रभृति के लिये अर्घ्यदान, नमस्कार आदि का विधान किया ही है । उनके मत से तो किसी जड पदार्थ के प्रति मस्तक झुकाकर प्रणाम करना मूर्तिपूजा के समान ही माना जायगा । ( देखिये सत्यार्थप्रकाश नानकमत खण्डन )
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१२२ वेदार्थपारिजातः यच्च -- ' इदानीन्तनाः केचनार्या बहवो यूरोपखण्डनिवासिनश्च वदन्ति यत् पुरा ह्यार्या भौतिकदेवतानां पूजका आसन् । ताः सम्पूज्य सम्पूज्य बहुकालानन्तरं परमात्मानं पूज्यं विदुः ' ( पृ ० ८० ) इत्याशङ्क्योक्तम्- ' तर्थदार्याणा मासृष्टिप्रारम्भमनेकै रिन्द्रवरुणाग्न्यादिभिर्नामभिर्वेदोक्तरीत्यैव ईश्वरस्योपासनानुष्ठानावगमात् ' इति, तदप्यर्धसत्यम्, आर्या यद्यप्यनादिकालात् परमेकमेवाद्वितीयं मध्यन्ते तथाप्यधिकारिभेदाद् ईश्वराङ्गप्रत्यङ्गभूतानामन्यासामपि देवतानामुपासन मूरीकुर्वन्त्येव । ' तदेवाग्निस्तदादित्य ) ' ( वा ० सं ० ३२1१ ), ' इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ ' ( ऋऋ ० सं ० १ | १६४ | ४६ ) इत्यादि. मन्त्रैरिन्द्रमित्रादीनामभेदस्तु प्रकृतिविकारभेदेनोक्त एव । यथा घटशरावादय: स्वरूपेण भिन्ना अपि मृदात्मना अभिना एव, तथैव परस्परं भिन्ना अपीन्द्रादयः प्रकृतिभूतपरमात्मनाऽभिन्ना एव । तत्राने मन्त्रा उपनिषद्वाक्यानि च समुद्धृतानि । तानि च न व्याख्यातानि } अत एव मयापि न व्याख्या -यस्ते । वेदाधिकारिभिः परमेश्वरो निर्गुणः सगुणश्चोपास्यते स्म साम्प्रतमप्युपास्यते । मैक्समूलरादीनां रीत्या पूर्व सर्वे मानवा असभ्या आरण्यका ज्ञानशून्याश्चासन् । क्रमेण तेषु ज्ञानं विकसति स्म । एष एव सिद्धान्तस्तेर्वेदेष्वारोपितः । बृहदारण्यकस्य तृतीयेऽध्याये चतुर्थब्राह्मणे ' यत्साक्षादपरीक्षाद् ब्रह्म ' ( ३ | ४ | १ ) सर्वान्तरात्मभूतं परमतत्त्वं प्रदर्शितम् । ' एक त आत्मा सर्वान्तरः ' ( बृ ० ३।४।१ ), ' अतोऽन्यदातंम् ' ( बृ ० ३१४१२ ) । पञ्चमे ब्राह्मणे ब्रह्मप्राप्तियोग्यतासिद्धये विवेकवैराग्यादिसाधनान्युक्तानि । ' एवं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति । ' ( बृ ० ३।५।१ ) आगे - ' कितने ही आजकल के आर्य और यूरोपवासी, अर्थात् अंगरेज आदि लोग इसमें ऐसी शंका करते हैं कि वेदों में पृथिव्यादि भूतों की पूजा कही है । भार्य लोग पहले भूतों की पूजा करते थे । उन्हें पूजते बहुत काल पीछे उन्होंने परमेश्वर को भी पूज्य जाना था ' ( १० ८० ) ऐसी आशंका उठाकर ' उनका यह कहना मिथ्या है, क्योंकि आर्य लोग सृष्टि के आरंभ से आज पर्यन्त इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि नामों से वेदोक्त प्रमाण के आधार पर एक परमेश्वर की ही उपासना करते चले आये हैं ' ( पृ ० ८० ), इस कथन में भी आधी सचाई है । आर्य यद्यपि अनादि काल से परमेश्वर को एक ही अद्वितीय मानते हैं, तो भी अधिकारी के भेद से ईश्वर की अंग - प्रत्यंग भूत अन्य देवताओं की उपासना भी स्वीकार करते ही है । ' वही अग्नि है, वही आदित्य है, ' इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि और स्वर्ण के पंख वाला गरुड, यह सब एक ही उस भगवान् की महिमा है । ब्राह्मण एक ही उस भगवान् को अग्नि, यम, पवन आदि नामों से पुकारते है ' इत्यादि मन्त्रों में इन्द्र, वरुण आदि में प्रतिपादित अभेद इनमें परस्पर प्रकृति और विकार के संबन्ध का सूचक है । जैसे घट, शराव आदि परस्पर स्वरूप से भिन्न होते हुए भी मिट्टी के रूप में अभिन्न हैं, उसी तरह इन्द्र प्रभृति arr परस्पर भिन्न होते हुए भी प्रकृतिभूत परमात्मा से अभिन ही हैं । यहाँ पर स्वामी दयानन्द ने अनेक मन्त्र और उपनिषदों के वाक्य उद्धृत तो किये हैं, किन्तु उनकी व्याख्या नहीं की । इसलिये हम भी इसको छोड़ देते हैं । वेद के अधिकारी विद्वान् परमेश्वर की निर्गुण और सगुण रूप में उपासना करते थे और अब भी करते हैं । मैक्समूलर आदि पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में सभी मानव पहले असभ्य, जंगली और अज्ञानी थे । धीरे धीरे उनमें ज्ञान का विकास हुआ । इसी सिद्धान्त को वे वेदों पर भी आरोपित करना चाहते हैं । परम तत्व को मिथ्या है ' | बृहदारण्यक के तृतीय अध्याय के चतुर्थ ब्राह्मण में ' जो साक्षात् अपरोक्ष, अर्थात् प्रत्यक्ष है, वह ब्रह्म है ' इस प्रकार सबकी अन्तरात्मा से अभिन्न माना है । ' यह तुम्हारी आत्मा सबके भीतर निवास करती है ', ' इससे भिन्न सब कुछ पञ्चम ब्राह्मण में इस ब्रह्म की प्राप्ति की योग्यता के संपादन के लिए विवेक, वैराग्य आदि साबन बताये हैं --- ' इस प्रकार उस आत्मा को जानकर ब्राह्मणगण पुत्रैषणा, वित्तेषणा और लोकैषणा से ऊपर उठकर भिक्षावृत्ति अर्थात् संन्यास स्वीकार कर लेते हैं ' ।
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वेदार्थपारिजाता ६२३ षष्ठे ब्राह्मणे ब्रह्मणः सर्वान्तरत्वं निर्णेतुं सर्वं ब्रह्मकार्यं विचारितम् । ' अथ हैनं गार्गी वाचक्नवी पप्रच्छ..... यदिदं सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं च कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्च ' ( वृ ० ३।६।१ ) याज्ञवल्क्येन ' वाय ' इत्युक्त्वा वायोरान्तरत्वं कारणत्वं चोक्तम् । कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यादिप्रश्नोत्तरपारम्पर्येण ब्रह्मलोके सर्वेषामोतत्वं प्रोतत्वं चोक्तम् । ब्रह्मलोकः कस्मिन्नोतः प्रोत इति गार्गीप्रश्ने मूर्वपातभयप्रदर्शनेन तां रुरोध याज्ञवल्क्यः । वार्तिकसारे तदभिप्राय इत्थं वर्णितः- पञ्चीकृतानां भूतानां सूक्ष्मताण्डे समाप्यते । एतावदेव तर्केण गम्यं न तु ततः परम् ॥ अण्डारम्भकभूतानामपञ्चीकृतभूतगम् ॥ सूत्रं कारणमित्येतदागमेनैव गम्यते । अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् । ' इति । तत्रैव सप्तमे ब्राह्मणे आरुणिरुद्दालकः पारम्पर्यमाश्रित्य सूत्रमन्तर्यामिणं च पप्रच्छ, याज्ञवल्क्यश्चोत्तरं ददौ । ' स होवाच वायुर्वे गौतम तत्सूत्रं वायुना व गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दधानि भवन्ति । तस्माद्वे गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यसंसिषतास्याङ्गानीति वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दृब्धानि भवन्ति ' ( ३/७/२ ), ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवा न वेद यस्य पृथिवी शरीरम् ' ( बृ ३।७।३ ) इत्यादिनाऽन्तर्यामिणं चोक्तवान् । ' सूत्रबद्धं दारुयन्त्रं पुरुषो नर्तयेद्यथा । अन्तर्यामी जगत्तद्वत् सूत्रबद्धं नियच्छति ॥ सूत्रान्तर्यामिणी सर्व जगत्यनुगतावतः । तौ विद्वानखिलं वेदेत्यतो ज्ञातव्यता तयोः ॥ ' अत्र वायुपदेन पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतसमष्टिलिङ्गात्मैव विवक्षितः । तत्र बुद्धिप्राधान्येन हिरण्यगर्भपदप्रयोगः · क्रियाशक्तिप्राणप्राधान्येन सूत्रात्मपदप्रयोगः तेन सूत्रात्मना सर्व जगद् धृतम् । अस्यापञ्चीकृत भूतकार्यत्वात् सौक्ष्म्यम्, अत एवात्राण्डारम्भकभूतान्योतानि प्रोतानि च । सूत्रादप्यान्तरं तत्त्वमन्तर्यामिकारणरूपम् | सर्वात्मत्वद्योतनायैव पृथिव्यादिषु बहुषूपाधिषु नियामकत्वेनान्तर्यामी वर्णितः । ब्राह्मण में ब्रह्म की सर्वान्तरता की सिद्धि के लिए यह सब कुछ ब्रह्म का ही कार्य है, यह विचार किया गया है । ' अब वाचक्नवी गार्गी ने पूछा- यह बताया गया है कि यह सब कुछ जल में ओत - प्रोत है, मेरी यह जानने की जिज्ञासा है कि यह जल किसमें ओत - प्रोत है ' ऐसा पूछने पर याज्ञवाल्क्य ने कहा कि वायु में, ऐसा कह कर उन्होंने जल की अपेक्षा वायु की आन्तरिकता ओर कारणता बताई है । इसके आगे यह वायु किसमें ओत - प्रोत है, इत्यादि प्रश्नोत्तर परम्परा से अन्त में ब्रह्मलोक में सबकी ओत - प्रोता दिखाई गई है । ब्रह्मलोक किसमें ओत - प्रोत है, गार्गी के यह पूछने पर याज्ञवल्क्य ने उसको रोक दिया कि इस प्रकार के अतिवादी प्रश्न करने से प्रश्नकर्ता को शिरःपात का भय उपस्थित हो सकता है । इसका अभिप्राय वार्तिकसार में इस प्रकार समझाया गया है— ' पञ्चीकृत भूतों की सूक्ष्मता अणु में समाप्त हो जाती है । तर्क यहीं तक पहुँच सकता है, इससे आगे नहीं । अणु के आरम्भ भूतों का कारण आगमशास्त्र में सूत्र को माना है, जो कि अपञ्चीकृत भूतों में वर्तमान है । जो भाव अचिन्त्य है, उनकी सिद्धि वर्क से नहीं हो सकती ' । वहीं सप्तम ब्राह्मण में आरुणि उद्दालक प्रसंग प्राप्त सूत्र और अन्तर्यामी के विषय में पूछते हैं और याज्ञवल्क्य उसका उत्तर देते हैं ---- ' उसने कहा कि हे गौतम, यह सूत्र वायु है । इस वायु रूपी सूत्र से ही यह लोक और दूसरा लोक तथा सारे प्राणी बँधे हुए हैं । इसीलिए हे गौतम, जब वायु इस शरीर को छोड़ देता है तो उसकी प्रेत संज्ञा हो जाती है, अतः वायु के सूत्र से ही यह सब कुछ संदृब्ध है ', ' जो पृथिवी में रहता हुआ भी पृथिवी से सूक्ष्म है, जिसको पृथ्वी नहीं जानती, पृथिवी जिसका शरीर हैं ' इत्यादि वाक्यों में अन्तर्यामी का निरूपण किया गया है । ' जैसे डोरी में बंधी हुई गुड़िया को आदमी नचाता है, उसी तरह अन्तर्यामी ईश्वर सूत्रात्मा से जुड़े हुए इस सारे जगत् का नियन्त्रण करता है । इस प्रकार सूत्रात्मा और अन्तर्यामी सारे जगत् में अनुगत हैं । इनको जानने वाला सब कुछ जान जाता है, अतः इनको जानने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये ' यहाँ पर वायु पद से अपंचीकृत पञ्च महाभूत की समष्टि f गात्मा विवक्षित है । यहाँ पर बुद्धि की प्रधानता में हिरण्यगर्भ क्रियाशक्ति प्राण के प्राधान्य में सूत्रात्मा का प्रयोग होता है । इस सूत्रात्मा से यह सारा जगत् घृत है । यह अपंचीकृत भूत का कार्य होने से सूक्ष्म है, इसीलिये इसमें अण्डारम्भक भूत ओत - प्रोत हैं । सूत्र से भी आन्तर तत्व अन्तर्यामी है । इसकी सर्वात्मा को बताने के लिये ही पृथिव्यादि अनेक उपाधियों में अन्तर्यामी को नियामक रूप में माना गया है ।
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६२४ देवार्थपारिजाताः अष्टब्राह्मणे ब्रह्मतत्त्वं निरूपितम् - सूत्रात्मताऽन्तर्यामिता च यत्रौतप्रोततां गता । गार्गीप्रश्नः - ' सा होवाच दूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवो इमे कस्मिस्तदोतं च प्रोतं चेति ' ( वृ ० ३३८६ ) | याज्ञवल्क्यस्योत्तरम् -- ' आकाश एव तदोतं च प्रोतं च ' ( बृ ० ३।८।७ ) । यद्दिव ऊर्ध्वं पृथिव्या अधो विद्यमानं सूत्रात्मतत्त्वं तस्मिन्नेव द्यावापृथिवी भूतं भवद् भविष्यञ्च ओतं प्रोतम् । तत्कस्मिन्नोतं प्रोतमिति गार्ग्यः प्रश्नस्याशयः । याज्ञवल्क्यस्तु व्याकृतं सूत्रात्मतत्त्वमव्याकृते कारणे ब्रह्मण्योतं च प्रोतं च । अत्राकाशपदेन न वियन्मात्र विवक्षितम् । किन्तु ' आकाशो वै नामरूपयोनिर्वहिता ' ( छा ० ८ | १४ | १ ) इत्यादिश्रुतिषु कारणं मायाविशिष्टं ब्रह्मव विवक्षितम् । ' मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । ' ( श्वे ० ४।१० ) इति श्रुतेः । उत्तरेण विस्मिता गार्गी याज्ञवल्क्यं प्रणनाम । याज्ञवल्क्यस्य दृढनिश्चयजिज्ञासया पुनर्गार्गी पूर्वपृष्टमेव पप्रच्छ । याज्ञवल्क्यश्च दृढनिश्चयेन तथैव प्रतिवचनं ददौ । पुनश्च गार्गी पप्रच्छ - ' कस्मिन्नु खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्च ' ( बृ ० ३1८1७ ) तदुत्तरं च याज्ञवल्क्य आह-- स होवाचैतद्वै तदक्षरं गागि ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलमनण्व ह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायम-तमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ' ( वृ ० ३२८१८ ), ' एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गागि सूर्याचन्द्रमसो विद्युतौ तिष्ठतः ' ( बृ ० ३1८1 ९ ) । उत्तरं श्रुत्वा ' सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्येध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्येध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेतेति, ततो ह वाचक्नव्युपरराम ' ( बृ ० ३।८।१२ ) । अत्र पूर्वांशेनाशेषविशेषातीतं निषेधशेष निषेधसाक्षिभूतं स्वप्रकाशं प्रत्यक्चेतन्याभिन्नपरब्रह्मात्मतत्वमतद्वयावृत्तिमुखेनोक्तम् । यद्यपि सर्वसाक्षिणि चित्स्वरूपे निरुपाध विवादानास्पदे नास्त्येव प्रमाणापेक्षा, तथापि प्रमाणापेक्षायाः सर्वनियामकत्वेनान्तर्यामिणोऽक्षरस्य सिद्धिः । विवादगोचरा जगत्स्थितिनियन्तृपूर्वा, व्यवस्थितत्वात्, राजनियत-earer ब्राह्मण में ब्रह्मव का निरूपण है, जिसमें कि सूत्रात्मा और अन्तर्यामी ओत - प्रोत हैं । यहाँ पर गार्गी ने पूछा है कि- ' है याज्ञवल्क्य, जो स्वर्ग से ऊपर और पृथ्वी के नीचे तथा पृथिवी और अन्तरिक्ष के बीच में विद्यमान हैं, यह सब किसमें श्रोत - प्रोत है ' । याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि ' यह सब आकाश में ही ओत - प्रोत है । जो स्वर्ग से ऊपर और पृथिवी के नीचे सूत्रात्म-विद्यमान है, उसी में द्यावापृथिवी, भूत, वर्तमान, भविष्य ओत - प्रोत हैं । वह सुत्रात्मा किसमें ओत - प्रोत है, यही गार्गी के प्रश्न का तात्पर्य है । याज्ञवल्क्य के उत्तर का अभिप्राय यह है कि व्याकृत सूत्रात्मक तत्त्व अव्याकृत ब्रह्म में मोत - प्रोत है । यहाँ पर आकाश पद से केवल विन्मात्र विवक्षित नहीं है, किन्तु ' आकाश नाम और रूप का नियामक है ' इस छान्दोग्य श्रुति के अनुसार मायाविशिष्टब्रह्म free है । ' मायाको प्रकृति और उसके स्वामी को महेश्वर जाने ' यह श्वेताश्वतर श्रुति भी इसमें प्रमाण है । इस उत्तर से विस्मित गार्गी ने याज्ञवल्क्य को प्रमाण किया । याज्ञवल्क्य के दृढ निश्चय को जानने के अभिप्राय से फिर वही बात पूछी और याज्ञवल्क्य ने भी अपने दृढ निश्चय के अनुसार उसका वही उत्तर दिया । फिर गार्गी ने पूछा कि ' यह आकाश किसमें ओत - प्रोत है । इसका उत्तर याज्ञवल्क्य ने इस इस प्रकार दिया कि - हे गागि, ब्राह्मणगण उस अक्षर ब्रह्म को इस प्रकार बताते हैं कि वह न तो स्थूल है, न अणु, न ह्रस्व है, न दीर्घ, वह अलोहित, अस्नेह, अच्छाय, तम से रहित, वायु और आकाश से भिन्न असंग, तेज, प्राण, सुख और मात्रा से रहित तथा आन्तर और बाह्य भेद से रहित है । न वह किसी को खाता है और न कोई उसको खाता है ', ' हे गागि, इस अक्षर ब्रह्म की आज्ञा में ही सूर्य और चन्द्र भी कार्यरत हैं । इस उत्तर को सुनकर - ' वह बोली कि आप जैसे ब्राह्मणों का जिस पर अनुग्रह हो जाय, उसको आप नमस्कार करने मात्र से मुक्त कर सकते हैं । शास्त्र चर्चा में आपको कोई जीत नहीं सकता, इतना कह कर वह चुप हो गई ' । यहाँ पर पूर्वांश से सारे विशेषों से रहित, निषेध से बचा हुआ, निषेध का साक्षी, स्वप्रकाश, प्रत्यक चैतन्य से अभिन्न परब्रह्म तत्त्व तद्भिन्न सब पदार्थों की व्यावृत्ति के माध्यम से बताया गया है । यद्यपि सबके साक्षीभूत, चित्स्वरूप, निरुपाधि, विवाद के अविषय इस परब्रह्म में प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, तो भी प्रमाण को सर्वनियामकता के कारण अन्तर्यामी अक्षर की भी सिद्धि इससे होती हैं । विवाद विषय इस जगत् की स्थिति किसी
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वेदार्थ पारिजातः ६२५ लोकस्थितिवत् । सेव्याद्राज्ञो यथा सेवाफलप्राप्तिर्भवति, तथैव दानयागादिक्रियाफलं यस्माद् भवति स परमेश्वरः । एवमादिभिरनेकैरनुमानैरपि परमेश्वरः साधितः । परमेश्वरोऽन्तर्याम्येव मायोपाधिराहित्येना शेष विशेषातीतमक्षरं ब्रह्म भवति । तदभिप्रायेणवोक्तम्- ' तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्टृश्रुतं श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञात् नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ...... नान्यदतोऽस्ति मस्तु नान्यदतोऽस्ति विज्ञातु ' ( वृ ० ३२८ | ११ ) इत्यादिभिरद्वितीयस्वप्रकाशाखण्ड बोधरूपत्वं निगदव्याख्यातम् । नवमब्राह्मणे तस्यैवान्तर्यामिणः प्राणरूपेण वर्णनम् । तस्यैव चाग्न्यादिरूपेण नानात्वमानन्त्यं प्राणरूपेण चैकत्वमुक्तम् । तत्रापि ' कतमी तो द्रो ' ( बृ ० ३१ ९ १८ ) इति प्रश्न:, ' अन्यं चैव प्राणश्चेति ' ( वृ ० ३ | ९ | ८ ) इति उत्तरितम् । ' कतमोऽध्यर्ध: ' ( वृ ० ३१ ९ १८ ) इत्यस्योत्तरं ' योऽयं पवत इति ' ( वृ ० ३१ ९ १८ ) इति । एकस्मिन् पवमाने Marat सर्वस्यात्वाद्वायोरध्यर्धत्वम् । ' कतम एको देव: ' ( बृ ० ३ / ९ / ९ ) इत्यस्य ' प्राण: ' ( बृ ० ३।९ १ ९ ) इत्युत्तरम् | ' स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ' ( बृ ० ३१ ९ / ९ ) सर्वदेवतात्मकत्वात् सर्वतोऽपि महानयम् तस्माद् ब्रह्म त्यच्छब्देन कथ्यते । यदिति परोक्षवाचकः शब्दः । इदमेव देवतानां नानात्वमेकत्वं च । अनन्तानां देवतानां निवित्संख्या विशिष्टेष्वस्तर्भवति । त्रयस्त्रिशतामपि प्राणेऽन्तर्भावोऽत एकस्य प्राणस्यैव नानारूपगुणशक्तिभेदेनानन्तसंख्याविस्तारः । रुद्राध्याये - असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् । तेषां सहस्रयोजनेव धन्वानि तमसि । ' ( वा ० सं ० १६/५४ ) अन्तर्यामिरूपेण कारणब्रह्मेव प्राणशब्देनात्रोक्तम् । अव्याकृतरूपेण सूत्रात्मा च वायुशब्देनोक्तः । प्राणवायुशब्दाभ्यामयमेव भेदो ज्ञातव्यः । सुत्राकार-विशिष्टत्वात् कारणादधिकत्वात् सूत्राकारविकारस्य स्वातन्त्र्याभावाच्चार्धत्वमेव । तस्य तेन सार्धैकरूपत्वादध्यता ज्ञेया । तदुक्तं वार्तिककारैः - ' सूत्राकारविकारोऽयं कारणादधिकस्तु सः । अस्वतन्त्रतयाश्च वायोरध्यर्धता मता ॥ ' व्यवस्थित नियता के कारण है, जैसे कि राजा के द्वारा नियन्त्रित प्रजा की स्थिति व्यवस्थित होती है । राजा से सेवक को उसकी सेवा का फल मिलता है, उसी तरह परमेश्वर से भी दान त्याग आदि क्रियाओं के फल की प्राप्ति होती है । इस प्रकार के अनेक अनुमानों से भी परमेश्वर सिद्ध होता है । परमेश्वर अन्तर्यामी होते हुए भी माया की उपाधि से शून्य होने से सारी विशेषताओं से अतीत अक्षर ब्रह्म है । इसी अभिप्राय से कहा गया है कि हे गागि! यह अक्षर ब्रह्म बिना दर्शन के द्रष्ट्रा, बिना श्रवण के श्रोता, बिना मनन के मन्ता, बिना विज्ञान के विज्ञाता होता है, इससे भिन्न कोई द्रष्टा, मन्दा, विज्ञाता नहीं हैं । यहाँ पर ब्रह्म को अद्वितीय, स्वप्रकाश, अखण्डबोध रूपता शब्दों से ही स्पष्ट है । नवम ब्राह्मण में उसी अन्तर्यामी का प्राण के रूप में वर्णन है । अग्नि आदि के रूप में उसकी अनन्तता और नानात्व का और प्राण के रूप में उसकी एकता का निरूपण हुआ है । वहाँ पर प्रश्न होता है कि ' ये दो कौन है '? उसका उत्तर है कि ' अन्न और प्राण ' । ' आधा और एक कोन है? इस प्रश्न का उत्तर है कि ' जो यह बहता है । एक प्रवहमान पवन के सामने सब कुछ भाषा प्रतीत होता है, अतः पवन को ' ' कहा गया है । ' एक देव कोन है ' इस प्रश्न का उत्तर है ' प्राण ' । ' इसी को त्यद् ब्रह्म कहा जाता है । ' यह ब्रह्म सर्वात्मक होने से सबसे महान् है, इसलिये इस ब्रह्म को ' त्यत् ' शब्द से कहा जाता है । यह परोक्ष वाचक शब्द है । इसी कारण देवताओं में नानात्व और एकत्व दोनों की स्थिति होती है । अनन्त देवताओं का निवित्संख्या विशिष्ट देवों में अन्तर्भाव होता है और तैंतीस देवताओं का प्राण में } इसलिये गुण, शक्ति के भेद से एक ही प्राण के नाना रूपों का अनन्त संख्या में विस्तार हो जाता है । इसीलिये रुद्राध्याय के ' असंख्याता सहस्राणि ' इस मन्त्र में असंख्य रुद्रों की चर्चा है । अन्तर्यामी रूप से कारण ब्रह्म को ही प्राण शब्द से कहा गया है और अव्याकृत रूप से सूत्रात्मा ही वायु शब्द से अभिहित है । प्राण और वायु शब्द की भिन्नता का यही रहस्य है | सूत्राकार से विशिष्ट होने से कारण से अधिक होने से वह एक ओर सूत्राकार के विकार की स्वतन्त्रता न होने से यह आषा है । इस आधे रूप के साथ रहने से पवन की सार्धेकता, मध्यर्धता मानी जाती है । वार्तिककार ने यही बात कही है कि यह सुत्राकार विकार कारण से अधिक है, किन्तु अस्वतन्त्र होने से आषा है, अतः पवन की अध्यर्धता मानी गई है । दो आदि संख्याओं में भी Le
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६२६ वेदार्थपारिजातः द्विसंख्यादिष्वपि कारणावस्थापेक्षयाऽधिकत्वात् तदपेक्षयाऽस्वातन्त्र्येण होनत्वाच्चाध्यर्धता सम्भाव्यते । तस्माद्वायोश्च-राचरसम्पूर्णप्रपञ्चसमृद्धिहेतुत्वादेव श्रुतिर्वायोरध्यर्धतामभिप्रेति । तदयुक्तम्- ' ईदृगध्यर्धतान्येषु द्विसंख्यादिष्वपीक्ष्यते । अतोऽधिक समृद्धयं श्रुतिरध्यर्धतां जगी । ' वार्तिकसारे नवमब्राह्मणार्थे- ' अनन्तेष्वपि देवेषु योऽयं देव उपास्यते ' । ' रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ' इति शिवमहिम्नस्तोत्रे | यद्यपि -- साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म ' ( वृ ० ३ | ४ | १ ) इति श्रुत्या परंब्रह्मापरोक्षमेव, तथाप्यनाद्यविद्यामायादि-योगेनापरोक्षमपि ब्रह्म परोक्षवदवभासते । श्रवणमनननिदिध्यासनैस्तदेव ब्रह्म स्वात्मतयाऽपरोक्षं भवति । श्रवणादि योग्यताप्राप्त्यर्थं तदुपासनमपेक्षितम् । देवतास्वरूपनिरूपणम् ' शब्दादेव प्रमित: ' । ईशानो भूत-( ब्र ० सू ० १1३1२४ ) इत्यत्र- - ' ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः भव्यस्य स एवाद्य स उ श्व एतद्वै तत् ॥ ' ( का ० २ | ४ | १३ ) इति श्रुतिमधिकृत्य संशय: --किमत्र विज्ञानात्मा प्रतिपादितः किं वा परमात्मेति । परमात्मनोऽनन्तस्य नाङ्गुष्ठपरिमाणत्वमुपपद्यते । उपाधिमत्त्वाद्विज्ञानात्मन एव कयाचिदपेक्ष-याङ्गुष्ठपरिमाणत्वं सम्भाव्यते । ' अथ सत्यवतः कायात्पाशबद्धं वशंगतम् । अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात् ॥ ' ( म ० भा ० व ० प ० २ ९ ७ | १७ ) इति विज्ञानात्मनो जीवस्याङ्गुष्ठपरिमाणत्वं स्मर्यते च । नहि परमेश्वरो बलाद्यमे-नाक्रष्टुं शक्यः । तेन विज्ञानात्मंव पूर्वोक्तश्रुतिनिर्दिष्ट इति पूर्वपक्षय्य सिद्धान्तितम् -- परमात्मैवात्राङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः, ईशानो भूतभव्यस्येति शब्दात् । नहि परमेश्वरादन्यस्य भूतभव्यनियन्तृत्वं सम्भवति । कारणावस्था की अपेक्षा से आधिक्य होने पर और स्वतन्त्रता के अभाव में हीनता आने पर अध्यता बन सकती है, किन्तु श्रुति केवल वायु की ही अध्यता का प्रतिपादन करती है, क्योंकि वायु ही सचराचर सारे जगत् प्रपंच की समृद्धि का कारण है । यही बात tet में कही गई है-- ' इस प्रकार की अध्यर्धता दो संख्या आदि में भी बन सकती है, किन्तु अधिक समृद्धि वाला गुण वायु में ही देखकर श्रुति वहीं इस अध्यर्धता का प्रतिपादन करती हैं । ' नवम ब्राह्मण के अर्थ के प्रतिपादक वार्तिकसार में कहा गया है कि--' अनन्त देवताओं की विद्यमानता में भी इस एक प्राणमय देव की उपासना विहित है । ' शिवमहिम्नस्तोत्र में भी यही बात कही गई है कि --- रुचि की विभिन्नता के कारण मनुष्य टेढ़े - सीधे रास्ते से चलते हैं, किन्तु वे सब एक ही भगवान् के पास पहुँचते हैं, जैसे कि सारी नदियों का जल समुद्र में पहुँचता है । ' यद्यपि ' जो साक्षात् अपरोक्ष, अर्थात् प्रत्यक्ष है, वह ब्रह्म है ' इस श्रुति के प्रमाण पर ब्रह्म प्रत्यक्ष ही है, तो भी अनादि after traft के कारण वह परोक्ष हो जाता है । श्रवण, मनन, निदिध्यासन के द्वारा उस ब्रह्म का स्वात्मतया प्रत्यक्ष बोध होता है । श्रवणादि की योग्यता के अर्जन के लिये उसकी उपासना करनी पड़ती है । देवता स्वरूप निरूपण ब्रह्मसूत्र के ' शब्दादेव प्रमित: ' इस सूत्र में कठोपनिषद् के ' अङ्गुष्ठमात्रः ' इत्यादिक वाक्य को लेकर यह संदेह उपस्थापित किया गया है कि यहाँ पर जीवात्मा प्रतिपादित है या परमात्मा? श्रुति का यह अभिप्राय है कि ' जो अंगुष्ठ परिमाण पुरुष शरीर के मध्य में स्थित है, वह धूम रहित ज्योति के समान है, भूत - भविष्यत् का शासक है, वही आज ( वर्तमान काल में ) है और वही कल ( भविष्यत् मैं भी रहेगा । यहाँ वह ब्रह्म तत्त्व है । ' अनन्त आयाम और विस्तार वाला परमात्मा अंगुष्ठमात्र परिमाण हो, यह युक्त नहीं है । जीवात्मा तो उपाधि युक्त है, अतः किसी कल्पना से वह अंगुष्ठ परिमाण हो सकता है । महाभारत वनपर्व के इस श्लोक में भी कि ' इसके बाद यमराज ने सत्यवान् के शरीर से अपने पाशों में बाँधे गये, अत एव वशीभूत अंगुष्ठमात्र पुरुष को बलपूर्वक खींच लिया ' विज्ञानात्मा जीव को ही अंगुष्ठमात्र परिमाण वाला माना गया है । यमराज का यह सामर्थ्य नहीं है कि वह परमात्मा को बलपूर्वक खींच ले जाय । इसलिये उक्त श्रुति में जीवात्मा ही निर्दिष्ट है । इस प्रकार पूर्वपक्ष की उपस्थापना करने के बाद उक्त सूत्र में यह सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि परमात्मा ही अंगुष्ठ परिमाण पुरुष हो सकता है, क्योंकि इस श्रुति में पुरुष को भूत और भव्य का स्वामी बताया गया है | परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई विज्ञानात्मा पुरुष भूत और भव्य का नियन्ता नहीं हो सकता ।
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वेदार्थपारिजातः ६२७ कथं सर्वगतस्य परमेश्वरस्याङ्गुष्ठपरिमाणत्वमिति चेत्तत्राह बादरायणो महर्षिः -- ' हृद्यपेक्षया तु मनुष्या-धिकारत्वात् ' ( १।३।२५ ) हृदयापेक्षत्वात्तदुपाधिकस्य परमेश्वरस्योपपद्यत एवाङ्गुष्ठपरिमाणत्वमिति । ननु पशुपक्ष्या-दीनां हृदयस्यानियतपरिमाणत्वात् कथमङ्गुष्ठपरिमाणत्वमिति चेन्न शक्तत्वादथित्वादपर्युदस्तत्वादुपनयनादि-शास्त्राच्च शास्त्रस्य मनुष्याधिकारत्वात् ( जं ० सू ६ । ११४ - ५ ) मनुष्याणां च नियतपरिमाणकायत्वात् तदयमपि नियतपरिमाणमङ्गुष्ठपरिमाणम्, तदुपाधित्वात् सर्वगतस्यापि परमेश्वरस्याङ्गुष्ठपरिमाणत्वमुपपद्यते । ' तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् ' ( १।३।२६ ) इति मनुष्यादुपरि ये देवास्तानप्यधिकरोति शास्त्रमिति बादरायणाचार्यो मन्यते, तेषामप्यथित्वादिसम्भवात् । मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्यो विग्रहवत्वाद्यवगमात्तेषां सामर्थ्यमपि विज्ञायते । न चोपनयनशास्त्रेणाधिकारो निवर्त्यते तेषां स्वयंप्रतिभातवेदत्वेन तदनपेक्षणात् । वेदाध्यय नार्थमेवोपनयनविधानात् । ' न देवानां देवताम्तराभावात् ', ' न ऋषीणामार्षेयान्तराभावात् ' ( जै ० सू ० ६ १ ६-७ ) इति यदनधिकारकारणमुक्तं तदपि न ब्रह्मविद्यासु सम्भवति, विद्यास्वधिक्रियमाणानामिन्द्राद्युद्देश्येन किञ्चित्कृत्याभावात् । तस्माद् देवादीनामपि विद्यास्वधिकार: केन वार्यते? देवाद्यधिकारेऽप्यगुष्ठमात्र श्रुतिः स्वाङ्गुष्ठापेक्षया न विरुध्येत । यदपि विग्रहवत्वाभ्युपगमेनेन्द्रादीनां कर्माङ्गभावेन बहुषु यागेषु युगपदेकस्येन्द्रस्य स्वरूपतः सन्निधानानु-पपत्तिरूप विरोध इति, तदपि न, अनेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् । किञ्चैकस्यानेककायत्वमदर्शनाद् बाधाद् वा नोपपद्यते? सर्वगत परमात्मा अंगुष्ठ परिमाण कैसे हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर महर्षि बादरायण ने ' हृयपेक्षया ' इत्यादिक ' सूत्र से दिया है । मनुष्य हृदय में ही परमात्मा का ध्यान करता है । इसलिये मनुष्य के हृदय का परिमाण परमात्मा में आरोपित कर लिया जाता है । यहाँ यह शंका होती है कि पशु - पक्षी आदि सबका हृदय एक परिमाण का तो होता नहीं, तब फिर हृदय की अंगुष्ठ परिमाणता कैसे सिद्ध होगी? सिद्धान्ती का कहना है कि आचार्य जैमिनि के मीमांसासूत्र के प्रमाण से शास्त्र में केवल मनुष्य ही after होता है, क्योंकि वही समर्थ है, कामना विशेष से युक्त है, शुत्युक्त कर्मानुष्ठान में अनिराकृत है और शास्त्र उसके उपनयन आदि का विधान करता है | मनुष्यों का शरीर निश्चित परिमाण वाला होता है, इसलिये उनके हृदय का परिमाण भी उचित रूप में fara अंगुष्ठमात्र होना चाहिये और मनुष्य के हृदय में अवस्थित होने के कारण परमात्मा की ओपाधिक अंगुष्ठपरिमाणता युक्ति सिद्ध होगी । आचार्य बादरायण का कहना है कि मनुष्यों से श्रेष्ठ देवता आदि भी शास्त्र में अधिकृत हैं, क्योंकि देवताओं में भी afree आदि अधिकार के कारण विद्यमान है । मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण और लौकिक अनुभव से भी यह अवगत होता हैं कि वे शरीरधारी हैं, अतः उनमें सामर्थ्य विद्यमान है । उपनयन आदि शास्त्र से उनका अधिकार निवृत्त नहीं होता, कारण कि उपनयन वेद के अध्ययन के लिये होता है । ऐश्वर्यवशात् देवताओं को बिना पढ़े ही वेद का ज्ञान स्वयं हो जाता है, अतः उनको वेदाध्ययन के लिये उपनयन की आवश्यकता ही नहीं है । ' देवताओं का यागादि कर्म में अधिकार नहीं है, क्योंकि अन्य देवताओं का अभाव है, अर्थात् इन्द्र से पृथक् अन्य इन्द्र का अभाव है और ऋषियों का भी भागादि कर्म में अधिकार नहीं है, क्योंकि दूसरे ऋषि का अभाव है ' इस प्रकार पूर्व मीमांसा में देवताओं और ऋषियों का कर्म में अनधिकार बताया गया है । इसका अभिप्राय यह है कि यदि देवताओं और ऋषियों का यागादि कर्म में अधिकार माना जायगा तो दूसरे इन्द्र के अभाव में याग कर्ता इन्द्र किसको उद्दिष्ट कर हवि देगा और इसी प्रकार यदि ऋषि को यह अधिकार दिया जाता है तो वह आर्षेय प्रवरण में दूसरे ऋषि के अभाव में किसका प्रवरण करेगा? सिद्धान्त का कहना है कि यह बात ब्रह्मविद्या में लागू नहीं हो सकती, क्योंकि ब्रह्मविद्या में अधिकृत इन्द्र आदि के लिये स्वयं अपने की उद्दिष्ट कर कोई कर्म नहीं करना पड़ता । अतः देवादि का भी ब्रह्मविद्या में अधिकार कौन रोक सकता है? देवादि के अधिकार होने पर भी अंगुष्ठमात्र श्रुति अपने अंगुष्ठ की अपेक्षा से विरुद्ध नहीं होगी ।
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६२८ वेदार्थपारिजातः नाद्यः, श्रुतिस्मृतिभ्यां तद्दर्शनात् । नहि लौकिकेन प्रमाणेनादृष्टत्वाद् आगमेन दृष्टमदृष्टं भवति J तथात्वे यागादीनां स्वर्गादिसाधनत्वाभावापातात् । ननु मनुष्यशरीरस्य मातापितृसंयोगजन्यत्वनियमादसति पित्रोः संयोगे कुतः शरीरान्तर-सम्भवः? सम्भवे वा अनग्नितो धूमः स्यादिति बाघदर्शनादेव तदनुपपत्तिरिति चेन्न, देवताशरीरस्य मातापितृसंयोगजत्व-साधने शरीरत्वहेतोरनैकान्तिकत्वात् । स्वेदजोद्भिज्जानां शरीराणामतद्धेतुत्वात् । न च देहादीनामिच्छामात्रनिर्माणत्व-मदृष्टचरमिति वाच्यम्, भूतोपादानत्वेनेच्छामात्रनिर्माणत्वासिद्धेः । भूतवशिनां देवादीनां नानाकार्यचिकीर्षाविशाद् भूत-Portrait भूतानां संयोगेन नानाकायसमुत्पादात् । दृष्टाश्च वशिन इच्छावशाद्वश्यैर्भूतैर्व्यवहरन्तः । यथा विषविद्याविद इच्छामात्रेण विषशकलप्रेरणम् । नतु विषविद्याविदो विषशकलादिदर्शनेनाधिष्ठानं दृष्टम्, व्यवहित विप्रकृष्टभूतादर्शनाद् देवादीनां कथमधिष्ठानमिति चेन्न, काचाभ्रपटलविहितस्य विप्रकृष्टस्य च भोमशनैश्चरादेर्दर्शनेन व्यभिचारात् । तथाहि देवादीनामससक्ता दृष्टयः काचपाटलादिवन्महीमहीधरादिभिर्देव व्यवधीयन्ते । न चास्मदादिवत्तेषां शरीरित्वेन व्यवहित विप्रकृष्ट दर्शनासम्भवोऽनुमातुं शक्यः आगमविरोधिनोऽनुमानस्यानुदयात् । अन्तर्धानमप्यञ्जनादिना मनुष्याणामिव तेषां नानुपपद्यते । तेन ऋतुदेशे सन्निहितानामप्यदर्शनं नानुपपद्यते । अत एव ' कति देवा: ' इत्युपक्रम्य ' त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रा ' ( बृ ० उ ० ३।९ ११ ) इति या वैश्वदेवशस्त्रस्य निविदि कति देवा इति शाकल्यप्रश्नस्य याज्ञवल्क्येन निविर्देवोत्तरं दत्तम् । निविन्नाम शस्य-> यहाँ शंका उपस्थित होती है कि यदि देवताओं को शरीरधारी माना जायगा, तो उनको उद्दिष्ट कर एक ही समय में किये गये अनेक यागों में एक साथ कैसे अपने स्वरूप से उपस्थित हो सकेंगे? इसका यह समाधान है कि श्रुतियों में यह देखा गया है कि एक ही समय में एक ही देवता अनेक शरीर धारण कर सकती है । एक व्यक्ति के अनेक शरीर नहीं हो सकते, इसमें आप अदर्शन और बाघ ये दो हेतु देते हैं । इनमें पहला हेतु इसलिये ठीक नहीं है कि श्रुति और स्मृति के प्रमाण पर यह सिद्ध है कि एक व्यक्ति के अनेक शरीर हो सकते हैं | आगम अर्थात् शास्त्र में प्रतिपादित वस्तु का लौकिक प्रमाण से बाघ नहीं हो सकता । यदि ऐसा मान लिया जाय तो फिर यागादि में स्वर्गादि की साघनता भी सिद्ध नहीं हो सकेगी । आपका यह कहना भी उचित नहीं है कि मनुष्य का शरीर माता - पिता के संयोग से ही उत्पन्न होता है, अतः माता - पिता के अभाव में दूसरा शरीर कैसे उत्पन्न हो सकता है । यदि यह हो सकता है तो फिर बिना ही अग्नि के घूम की सत्ता भी माननी पड़ेगी । अतः बाब हेतु से एक देवता के अनेक शरीर उपपन्न नहीं हो सकते, क्योंकि देवताओं का शरीर भी माता - पिता के संयोग से उत्पन्न हैं, किन्तु इसको सिद्ध करने में शरीरत्व हेतु अनैकान्तिक दोष से ग्रस्त है । स्वेदज, उद्भिज्न जीवों के शरीर माता - पिता के संयोग के बिना ही होते देखे गये हैं । अनेक देहों की इच्छामात्र से निर्मिति कहीं नहीं देखी गई । इसके लिये पंच महाभूतों का उपादान आवश्यक है, यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि देवतागण भूतवशी हैं । जब वे नाना शरीरों की रचना करने लगेंगे, उस समय भूतों में स्वाभाविक क्रिया होगी और उनके संयोग से नाना शरीरों का निर्माण संभव हो सकेगा । भूतवशी योगिगण अपनी इच्छानुसार बशीभूत द्रव्यों से व्यवहार करते देखे गये हैं, जैसे कि विषविद्या में प्रवीण refer की इच्छामात्र से विषशकल प्रेरित होता है । विषविद्या प्रवीण विषशकल को देखता रहता है, इसलिये यहां अधिष्ठान देखा जाता है । व्यवहित और विप्रकृष्ट भूतों के न दिखाई देने से देवताओं की अधिष्ठाता दृष्ट नहीं है, यह उक्ति इसलिये ठीक नहीं है कि are ( शीशा ) मोर अपटन ( मेघमंडल ) से व्यवहित वस्तुओं का तथा सुदूरवर्ती मंगल, शनि आदि ग्रहों का प्रत्यक्ष होता है, अतः उक्त हेतु व्यभिचरित है । क्योंकि देवताओं की दृष्टि अप्रतिहत होती है, इसलिये उनको का और अपटल से व्यवहित वस्तुओं के ही समान पृथ्वी पर्वत आदि से व्यवहित वस्तुओं का भी दर्शन होता है । हमारे ही समान यदि देवतागण शरीरी हैं तो उनको भी व्यवहित, विप्रकृष्ट आदि वस्तुओं का दर्शन नहीं होना चाहिये, इस प्रकार का अनुमान आगमविरोधी होने के कारण प्रामाणिक नहीं माना जा सकता । मनुष्य जैसे अंजन आदि के प्रयोग से अन्तर्हित हो जाता है, उसी भाँति देवताओं के शरीरधारी रहने पर भी याग प्रदेश में उपस्थित होते पर उसका sa
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बदार्थ पारियात ६२६ मानदेवतासंख्यावाचकानि मस्त्रपदानि । वैश्वदेवस्य निविदि यावत्संख्याका देवास्त एतावन्तः । अनम्यशक्तेर्भगवतोऽ-नन्तानन्तकार्योत्पादानुकूलाः शक्तयस्तदवच्छिन्नाश्चतना देवा अप्यनन्ता एव । तेषामनन्तदेवानां निवित्संख्याविशिष्टेषु देवेष्वन्तर्भावः । ते च षडधिकत्रिशताधिकत्रिसहस्रसंख्याकाः । पुनश्च शाकल्येन ' कतमे से ' इति संख्येयेषु पृष्टेषु याज्ञवल्क्येनोक्तम् -'महिमान एवंनामेते त्रयस्त्रिशस्वेव देवा: ' ( वृ ० उ ० ३१ ९ १२ ) इति । त्रयस्त्रिशतोऽपि षडाद्यन्त-भविक्रमेण ' कतम एको देव इति प्राण: ' ( बु ० उ ० ३।९ १ ९ ) इति प्राणैकरूपतां देवानां दर्शयत् तस्यैर्वकस्य युगपदनेक-रूपतां दर्शयति । तथा च यथः प्राणस्येवाध्यर्धद्वित्रिषट्त्रिंशदादिरूपता, तथैव तेष्वप्येकस्यानेकरूपता सम्भवत्येव । ' आत्मनो व शरीराणि बहूति भरतर्षभ । योगी कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् || प्राप्नुयाद्विषयान् कश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् । संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ॥ ' अधुना च महाभारते शान्तिपर्वणि ३०० अध्याये एतच्छुलोकद्वयमधस्तनेन रूपेणोपलभ्यते - ' आत्मनां च सहस्राणि बहूनि भरतर्षभ । योगः कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ॥२६ ॥ प्राप्नुयाद्विषयान् कैश्चित्पुनश्चग्रं तपश्चरेत् । संक्षिपेच्च पुनस्तात सूर्यस्तेजोगुणानिव
|| २७ || इत्येवजातीयका देवताधिकरणस्थशाङ्करभाष्योद्धृतस्मृतिः प्राप्ताणिमाद्येश्वर्याणां योगिनामपि युगपदनेक-शरीरसम्बन्धं दर्शयति । तेनाजानसिद्धानां देवानां युगपदनेकशरीरप्रतिपत्तिः कंमुतिकन्यायसिद्धा । तथा च देवता बहुरूपैरात्मानं प्रविभज्य बहुषु यागेषु युगपदङ्गतां गन्तुं शक्नोत्येव । यद्यपि श्राद्धेष्वनेकेष्वेको ब्राह्मणो नाङ्गभाव-मुपगच्छति, तथापि तमेवैकमुद्दिश्य बहुभिर्नमस्कारः क्रियत एवं यथा, तथंव स्वस्थानस्थितामेका देवतामुद्दिश्य बहुभिर्यजमानैर्नानादेशावस्थितैर्युगपद्धविस्त्यज्यते । असन्निहिताया अपि देवताया अङ्गभावः सम्भवत्येव । तस्याश्च युगपद्वित्रकृष्टाने कर्थोपलम्भसामर्थ्यमुक्तमेव । एवं च विग्रहवत्वेऽपि देवानां न कर्मणि किञ्चिद्विरोधः । बृहदारण्यक उपनिषद् में शाकल्य ने प्रश्न किया है कि वैश्वदेव शस्त्र की निविद् में कितने देवता है? इस प्रश्न के उत्तर में याज्ञवल्क्य ने निविद की भाषा में ही उत्तर दिया है कि उसमें तीन सौ तीन और तीन हजार तीन अर्थात् तीन हजार तीन सौ छः देवता है । किसी कर्म में स्तुत्य देवताओं को संख्या बताने वाले मंत्र निविद् नाम से जाने जाते हैं । वैश्वदेव की निविद में इतने ही देवता स्तुत्य हैं । अनन्त शक्ति संपन्न भगवान् की अनन्त कार्यों की उत्पत्ति में समर्थ अनन्त शक्तियाँ हैं और उन शक्तियों में अनुस्यूत देवतागण भी अनन्त हैं । उन अनन्त देवताओं का नि facier के देवताओं में aan होता है । इनकी संख्या तीन हजार तीन सौ छः है! शाकल्य ने जब पुनः प्रश्न किया कि वे कौन - कौन से हैं, तो याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि वस्तुतः ३३ हो देवता हैं । अन्य देवतागण इन्हीं की महिमा का विस्तार है । ३३ देवताओं का ६ में अन्तर्भाव बतला कर अन्त में एक प्राण में ही सभी देवताओं का समावेश कर दिया गया है और बताया गया है कि यह प्राणरूप देवता ही एक साथ अनेक रूप धारण कर लेता है । इस प्रकार जैसे एक प्राण के ही डेक, दो, तीन, छः तीस आदि भेद होते हैं, उसी प्रकार उनमें से किसी एक के भी अनेक रूप ( शरीर ) हो ही सकते हैं । ' हे भरतर्षभ योगी योगबल से अपने अनेक शरीर बना सकता है और उनसे सारी पृथ्वी पर घूम सकता है । कुछ शरीरों से वह विषय सुख का उपभोग करता है तो अन्य शरीरों से उग्र तपस्या करता है । सूर्य जैसे अपनी किरणों की समेट लेता है, उसी भांति वह योगी उन सब शरीरों को समेट कर पुनः एक कर लेता है । ' इस अभिप्राय के ये दो कुछ पाठभेद के साथ महाभारत के शान्तिपर्व के ३०० वें अध्याय में मिलते हैं । उक्त श्लोक देवता करण के शांकरभाष्य में उद्धृत हैं । यह स्मृति जब अणिमादि सिद्धि संपन्न योगियों के एक साथ अनेक शरीर संबन्ध को दर्शाती है, तो फिर इसमें कहने की बात ही क्या है? अतः देवतागण अपने आजानसिद्ध देवतागण एक साथ अनेक शरीर धारण कर सकेंगे, को अनेक रूपों में विभक्त कर एक साथ अनेक याथों में अंगभाव को प्राप्त ब्राह्मण एक साथ भोजन नहीं कर सकता, तो भी एक ही ब्राह्मण को जैसे उसी तरह अपने स्थान में स्थित एक देवता को नाना स्थानों में अवस्थित अनेक कर ही सकते हैं । यद्यपि अनेक श्राद्धों में एक अनेक व्यक्ति एक साथ नमस्कार कर सकते हैं, यजमान एक साथ हवि दे सकते हैं । देवता के
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६३० daru रिजातः ननु शब्दे विरोधः? अर्थाद् देवताया विग्रहवत्वेनानित्यत्वापत्त्या तस्या न नित्येन वैदिकेन शब्देनौत्तिकः सम्बन्धः सम्भवति, तदभावे च न वेदानां प्रामाण्यम्, शब्दस्यार्थेनौत्पत्तिकं सम्बन्धमाश्रित्यैवान्पेक्षत्वेन वेदानां प्रामाण्य-व्यवस्थापनात् । अयमभिप्रायः - गोत्वादिवत् पूर्वावमर्शाभावादुपावेरप्येकस्याभावात् पाचकादिवद् आकाशादिशब्दा वस्वादिशब्दाश्च व्यक्तिवाचका एव । देवतानां नित्यत्वे सत्येव वैदिकैः शब्दः स्वाभाविकः सम्बन्धः सम्भवति । विग्रहवत्त्वे स्वनित्यत्वात्ततः पूर्वं वस्वादिशब्दो न स्वार्थेन सम्बन्धुमर्हति स्वार्थस्यैवाभावात् । उत्पन्ने तु वस्त्रादी वस्वादिसम्बन्धः प्रादुर्भवन् देवदत्तादिशब्दसम्बन्धवत् पुरुषबुद्धिप्रभव इति तत्पूर्वको वाक्यार्थ प्रत्ययोऽपि पुरुषबुद्धयधीन एव स्यात् । पुरुष-बुद्धिश्च मानान्तरापेक्षैव । तथा च मानान्तरापेक्षमेव प्रामाण्यं नानपेक्षतयेति चेन्न, ' शब्द इति चेन्नातः प्रभवात्प्रत्यक्षानु-मानाभ्याम् ' ( ब्र ० सू ० १।३।२८ ) इत्यतो वैदिकशब्दाद् देवादिजगतः प्रभवात् । ननु ' जन्माद्यस्य यतः ' ( ब्र ० सू ० १११/२ ) इति सूत्रे ब्रह्मप्रभवत्वं जगतो निर्धारितम्, कथमिह वैदिक-शब्दप्रभवत्वमुच्यते इति चेन्न तत्र देवादिजगत: कर्तृत्वोपादानत्वाभ्यां ब्रह्मकारणकत्वेऽपि वैदिकशब्दस्य निमित्तत्वे बाधाभावात् । नन्वेवमपि वस्वादित्यरुद्रादीनामुत्पत्तिमत्त्वेनानित्यत्वात् तद्वाचिनां शब्दानामप्यनित्यत्वात् शब्दार्थ-सम्बन्धानामीत्पत्तिकत्वं भज्यत एव लोके पुत्र उत्पन्न एव पित्रादिभिर्नामकरणदर्शनादिति चेन्न, गवादिशब्दार्थ सम्बन्ध -नित्यत्वदर्शनात् । तथा च गवादिव्यक्तीनामुत्पत्तिमत्त्वेऽपि गोत्वादिजातीनां नित्यत्ववद्वस्वादिव्यक्तीनामुत्पत्तिमत्वेऽपि असंनिहित रहने पर भी उसका याग के प्रति अंगभाव संभव है और उसमें एक साथ दूर की अनेक वस्तुओं की प्राप्ति का सामर्थ्य विद्यमान हैं, यह बताया जा चुका है । इस प्रकार देवताओं के शरीरधारी होने पर भी कर्म में किसी प्रकार का विरोध नहीं आवेगा । यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि देवताओं के शरीरधारी होने पर भी कर्म में भले ही कोई दोष न आवे, शब्द में तो विरोध उपस्थित होगा, क्योंकि देवता के शरीरधारी होने पर वह अनित्य होगी और इस कारण से उसका नित्य वैदिक शब्द के साथ स्वाभाविक संबन्ध नहीं बन पावेगा । फलतः वेदों की प्रामाणिकता भी सिद्ध न हो सकेगी, क्योंकि शब्द का अर्थ के साथ स्वाभाविक संबन्ध मान करके ही वेद का प्रमाणान्तर निरपेक्ष प्रामाण्य स्थापित किया जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि गोरव आदि जाति-वाचक शब्दों के साथ जैसे अनन्त गो व्यक्तियों का परामर्श होता है, उस प्रकार का परामर्श न होने के कारण तथा किसी उपाधि के भी न रहने के कारण पाचक आदि शब्द के समान आकाश आदि शब्द और वसू आदि शब्द भी व्यक्तिवाचक हैं | देवता के नित्य होने पर ही वैदिक शब्द के साथ उसका स्वाभाविक संबन्ध बन सकता है । देवता के शरीरधारी होने पर वह अनित्य होगी, क्योंकि वसु आदि देवतागण के तत्तत् शरीर ग्रहण करने के पूर्व उनकी अविद्यमानता के कारण वसु आदि शब्द का उससे संबन्ध ही नहीं बन पावेगा । वसु आदि के शरीर ग्रहण करने के बाद वसु आदि शब्द का संबन्ध उसी प्रकार पुरुष बुद्धि से उत्पन्न माना जायगा, जिस प्रकार कि देवदत्त आदि शब्द का होता है । इस प्रकार के शब्दों के माध्यम से होने वाला वाक्यार्थ का परिज्ञान भी पुरुष - बुद्धिजन्य ही माना जायगा | पुरुष - बुद्धि दूसरे प्रमाण की अपेक्षा रखती है । इस प्रकार देवता के शरीरधारी मानने पर शब्द का प्रमाणान्तर - सापेक्ष प्रामाण्य मानना पड़ेगा, निरपेक्ष नहीं । इस प्रश्न का समाधान ' शब्द इति ' इत्यादि सूत्र से किया गया है । इसका अभिप्राय है कि वैदिक शब्द से ही देवादि जगत् की उत्पत्ति होती है, यह बात श्रुति और स्मृति के प्रमाण से सिद्ध है । यहां शंका उपस्थित होती है कि ' जन्माद्यस्य ' इत्यादि सूत्र में यह निश्चय किया गया है कि जगत् की ब्रह्म से उत्पत्ति होती है, तो यहां यह कैसे कहते हो कि वैदिक शब्द से जगत् उत्पन्न होता है? इसका उत्तर यह है कि ब्रह्म देवादि सृष्टि का कर्ता और उपादानकारण है तथा शब्द निमित्तकारण है । इस प्रकार दोनों वाक्यों में परस्पर कोई विरोध नहीं है । पुनः शंका उपस्थित होती है कि वसु, आदित्य, रुद्र यादि उत्पन्न होते हैं, अतः अनित्य है और इसीलिये aaree शब्द भी अनित्य है । इस प्रकार शब्द और अर्थ के संबन्ध की स्वाभाविक नित्यता टूट जाती है, क्योंकि लोक व्यवहार में देखा गया है कि पुत्र के उत्पन्न होने के बाद ही पिता आदि उसका नामकरण करते हैं । इसका उत्तर है