वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 661–670
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 661–670
पृष्ठ 661
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वसुत्वादिजातीनां नित्यत्वाद्, वैदिकवस्वादिशब्दानां वस्वादिजातिभिरौत्पत्तिक एव सम्बन्धः सिद्ध्यति । न च व्यक्तिभि-रेव शब्दसम्बन्ध इति वाच्यम्, व्यक्तीनामानन्त्येन सम्बन्धग्रहणानुपपत्तेः । तथा च देवादिव्यक्तीनां वैदिकशब्दात्प्रभवा-म्युपगमेऽपि जातेनित्यत्वात वैदिकवस्वादिशब्देष्वनित्यत्वपौरुषेयत्वादिविरोधः सम्भवति । मन्त्रार्थवादादिम्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वावगमान्नित्याभिर्वसुत्वादिजातिभिरेव सम्बन्धो युक्तः, प्राड्विवाक - सेनापत्यादिशब्दवत् । स्थान-विशेष सम्बन्धनिमित्तत्वाच्च वैदिकनित्येरेव वस्वादिशब्देर्वस्वादयोऽभिधीयन्ते । यथा यो यः प्राड्विवाकादिपदमधिरोहति स स एव तेन तेन शब्देनाभिधायते, तथंच यो या वस्वादिस्थानमारोहति स स एव वस्वादिशब्देरभिधीयते । ननु वैदिकशब्देभ्या देवादिप्रपञ्चोत्पत्तिरेव कुत इति चेदुच्यते-- प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् । प्रत्यक्षं श्रुतिः, प्रामाण्यं प्रत्यनपेक्षत्वात् । अनुमानं स्मृतिः, प्रामाण्यं प्रति सापेक्षत्वात् । ते हि शब्दपूर्वामेव सृष्टि दर्शयतः । एत इति प्रजापति -देवानसृजता सृग्रमिति मनुष्यानिन्दव इति पितृ स्तिरः पवित्रमिति ग्रहाशाशव इति स्तोत्रं विश्वानीति शस्त्रमभिसौभ-गेत्यन्याः प्रजाः ' इति श्रुत्या ( एषा शाङ्करभाष्योद्धृता श्रुतिः ) ' स मनसा वाचं मिथुनं समभवत् ' ( वृ ० उ ० ११२१४ ) इत्यादिना च तत्र तत्र शब्दपूर्विका सृष्टिः श्रूयते । स्मृतिरपि -- ' अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा । आदी वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ ' ( म ० भा ० शा ० १० २३ २ २५ ), ' सर्वेषां स तु नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादी पृथक् संस्थाश्च निर्ममे । ' ( म ० १।२१ ) नाम रूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम् । वेदशब्दभ्य एवादी निर्ममे स महेश्वरः ॥ ' ( इति शाङ्करभाष्य उदाहृता स्मृतिः । अधुना महाभारते शान्तिपर्वणि कि गो आदि शब्दों और अयों का संबन्ध नित्य दिखाई देता है । गो आदि व्यक्तियों की उत्पत्ति होने पर भी जैसे उनकी आकृति ( जाति ) की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि वे नित्य हैं, उसी तरह वसु आदि व्यक्तियों की उत्पत्ति मानने पर भी वसुत्व आदि ariant नित्य होंगी | इस प्रकार वैदिक वसु आदि शब्दों का वसु आदि को आकृति के साथ स्वाभाविक free संबन्ध सिद्ध होता है । शब्द का व्यक्ति के साथ ही संबन्ध हो सकता है, यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि व्यक्तियों के अनन्त होने के कारण उन सबके साथ शब्द का संबन्ध जोड़ पाना असंभव है । इस प्रकार देवादि व्यक्तियों की वैदिक शब्द से उत्पत्ति मानने पर भी जाति ( आकृति ) के नित्य होने के कारण वैदिक वसु आदि शब्दों में अनित्यत्व, पौरुषेयत्व आदि दोष नहीं आयेंगे । मन्त्र, अर्थवाद आदि से देवताओं के शरीरधारी होने को बात मालूम है, अतः जैसे स्थानविशेष संबन्ध रूप उपाधि को लेकर प्राविवाक, सेनापति आदि शब्दों की प्रवृत्ति होती है, उसी भांति वसु आदि शब्दों का भी नित्य वसुत्व आदि जातियों से ही संबन्ध माना जायगा । इस प्रकार नित्य वैदिक वसु आदि शब्दों से ही बसु आदि देवता अभिहित होंगे । जैसे कि कोई भी व्यक्ति न्यायाधीश के पद पर बैठेगा, वही प्राविवाक कहलावेगा, उसी भाँति जो भी देवता वसु आदि के स्थान पर बैठेगा, वही वसु आदि शब्दों से अभिहित होगा । प्रश्न उठता है कि वैदिक शब्द से देवादि प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है, इसमें क्या प्रमाण है? उत्तर है कि प्रत्यक्ष और अनुमान इसमें प्रमाण हैं | श्रुति प्रत्यक्ष प्रमाण है, क्योंकि यह अपने प्रामाण्य के लिये किसी दूसरे प्रमाण की अपेक्षा नहीं रखती । स्मृति aar प्रमाण है, क्योंकि स्मृति अपने श्रामाण्य के लिये मूलभूत श्रुति की अपेक्षा रखती हैं । ये दोनों ही शब्दपूर्वक सृष्टि को दिखलाती है । ' एते ' इस पद से प्रजापति ने देवताओं की, ' असृग्रम् ' पद से मनुष्यों की, ' इन्दवः ' से पितरों की, ' तिरः पवित्रम् ' से ग्रहों की, ' आशवः ' पद से स्तोत्र की, ' विश्वानि ' से शस्त्र की तथा ' अभिसौभगा: ' इस पद से अन्य प्रजानों की सृष्टि की । शाङ्करभाष्य में उद्धृत इस वि तथा ' उस प्रजापति ने मन के द्वारा वेदत्रयीरूप वाणी की मिथुन भाव से भावना को इस बृहदारण्यक श्रुति के प्रमाण पर स्थल - स्थल पर शब्दपूर्वक सृष्टि का प्रतिपादन मिलता है । ' सृष्टि के आरम्भ में स्वयंभू ब्रह्मा ने अनादि, अनन्त, free और दिव्य वेदमयी art at arou क्त किया, जिससे अन्य सम्पूर्ण प्रवृत्तियाँ हुई ', ' उसने आरम्भ में सम्पूर्ण भूतों के पृथक पृथक् नाम, रूप, कर्म एवं अवस्थाओं का वेद के शब्दों से ही निर्माण किया ' इत्यादि स्मृतियाँ भी वेद से ही सृष्टि दिखलाती हैं । ' उस महेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में वैदिक शब्दों से हो भूतों के नाम, रूप और सत्कर्मों के अनुष्ठान की प्रवृत्ति का निर्माण किया ' शांकरभाष्य में उद्धृत यह स्मृति महाभारत के शान्तिपर्व के २३२ वें अध्याय में कुछ पाठभेद के साथ उपलब्ध होती है । लोक व्यवहार में यह प्रति दिन देखा जाता है
पृष्ठ 662
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३२ २३२ अध्याय इत्थमुपलभ्यते --- ' नानारूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम् || २५ || वेदशब्देभ्य एवादौ निर्मिमीते स ईश्वरः ॥ ' इति ) । लोकेऽपि कुलालादिचिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठस्तस्य वाचकं शब्द पूर्वं स्मृत्वा पश्चात्तमर्थमनु-तिष्ठति यथा, तथैव प्रजापतिरपि सृष्टेः पूर्व वैदिकैः शब्दस्तांस्तानर्थान् स्मृत्वैव तदनुगतानर्थान् ससर्जति गम्यते । तथा च श्रुतिः स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत् ' ( तै ० ब्रा ० २२२२४१२ ) इत्येवमादिका भूरादिशब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यो भूरादिलोकान् सृष्टान् दर्शयति । किञ्च - जानाति, इच्छति, करोतीति रीत्यापि यथा लोके ज्ञानेच्छापूर्विका कार्यसृष्टिः, तथैव परमेश्वरकर्तृकापि विश्वसृष्टिर्मस्तव्या । ज्ञानं च शब्दानुविद्धमेव जायते । ' न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥ ' ( वा ० १० ११ १२३ ) इति हरिवचनात् । ते च शब्दाः स्रष्टव्यस्मारका एवेति देवादिप्रपञ्चसर्जनानुकूल परमेश्वरीयज्ञाने देवादिवैदिकशब्दानामनुवेधो युक्तः । किमात्मकं पुनः शब्दमभिप्रेत्येवं शब्दप्रभवत्वमुच्यते? स्फोटमित्याह । वर्णपक्षे हि तेषामुत्पन्नप्रध्वं-सित्वान्नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यनुपपन्नं स्यात् 1 । अयमभिसन्धिः - वाचकशब्दप्रभवत्वं हि देवानामभ्युपेतव्यम्, अवाचकेन तेषां बुद्धावनालेखनात् । तत्र न तावद् वस्वादीनां वकारादयो वर्णा वाचकाः, तेषां प्रत्युच्चारणमन्यत्वेनाशक्यसंगतिग्रहत्वात्, अगृहीतसंगतेश्च वाचकत्वेऽतिप्रसङ्गात् । किञ्च वर्णाः प्रत्येकं वाक्यार्थमभिदधति, मिलिता वा? नाद्यः एकैकवर्णोच्चारणात् प्रत्ययादर्शनात् वर्णान्तरोच्चारणा-नर्थक्यप्रसङ्गाच्च । नापि मिलिताः तेषामेकवक्तृप्रयुज्यमानानां रूपतो व्यक्तितो वा प्रतिक्षणं प्रध्वंसिनां साहित्यासम्भवात् । न चान्यः प्रकारः सम्भवति । न चाग्नेयादीनाभिव संस्कारद्वारकं साहित्यमस्त्विति वाच्यम्, कुम्हार वस्तु कि आदि जिस को बनाना चाहते हैं, पहले उस वस्तु के बोधक शब्द का स्मरण करते हैं, पश्चात् उसकी रचना करते हैं, उसी तरह प्रजापति मे भी सृष्टि के प्रारम्भ में वैदिक शब्दों के माध्यम से उन उन अर्थों का स्मरण कर पश्चात् शब्द के अनुगत अर्थों की रचना की, ऐसा ज्ञात होता है । ' उसने भू ऐसा उच्चारण कर पृथ्वी की सृष्टि की ' इत्यादि श्रुतियाँ मन में प्रादुर्भूत हुए ' भू ' आदि शब्दों से उत्पन्न हुए ' भू ' आदि लोकों को दिखलाती है । लोक में देखा गया है कि मनुष्य पहले किसी वस्तु को जानता है, फिर उसको चाहता है, तदनन्तर उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करता | इस प्रकार जानने और चाहने के बाद कार्य की सृष्टि होती है । परमेश्वर की बनाई सृष्टि में भी यही नियम लागू होगा । ज्ञान की उत्पत्ति शब्द के अनुवेध ( जुड़े होने ) से ही होती हैं । वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने कहा है कि ' लोक में ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है, जिसमें कि शब्द न जुड़ा हो । सारा ज्ञान शब्द में अनुस्यूत होने के बाद ही भासित होता है । ' ये शब्द उस पदार्थ का स्मरण कराते हैं, जिनकी कि सृष्टि अभिप्रेत है । अतः परमेश्वरीय ज्ञान में, जब कि वह देवादि प्रपञ्च की सृष्टि करना चाहते हैं, देवादि वैदिक शब्दों की मनुस्यूति उचित है । यहाँ पर वैदिक शब्द से देवादि प्रपञ्च की उत्पत्ति मानी गई है । यह शब्द किस प्रकार का है? वैयाकरणों का कहना है fe शब्द स्फोट rere है । यदि शब्द को वर्णात्मक माना जायगा तो वर्णों के उत्पत्तिविनाशशील होने के कारण नित्य शब्द से देवादि it सृष्टि नहीं बन पावेगी । इसका अभिप्राय यह है कि देवादि की सृष्टि अपने वाचक शब्द से माननी चाहिये । जो शब्द वाचक नहीं है, उससे उस देवता की आकृति बुद्धि में नहीं बन पावेगी । वकार आदि वर्ण वसु आदि के वाचक नहीं हो सकते, क्योंकि प्रत्येक उच्चारण में वर्णों की भिन्नता के कारण उनका संगतिग्रह अशक्य है । बिना संगति बोध के ही यदि वर्णों को वाचक मान लिया जाय, तो किसी भी वर्ण से किसी भी वस्तु का बोध होने लगेगा | फिर आप यह बताइये कि प्रत्येक वर्ण वाक्यार्थ का बोध कराते हैं, या free र? इसमें पहला पक्ष इसलिए उचित नहीं है कि एक - एक वर्ण के उच्चारण से वाक्यार्थ का बोध नहीं होता । यदि एक ही वर्ण से araur र्थ का बोध हो सके तो फिर दूसरे वर्णों का उच्चारण व्यर्थ हो जायगा । यदि आप कहें कि सभी वर्ण मिलकर वाक्यार्थ का बोध कराते हैं, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक वक्ता के द्वारा उच्चरित वर्ण का भी रूप अथवा व्यक्तित्व प्रतिक्षण विनाशशील है, अतः इनका साहित्य बन हो नहीं सकता । इन दोनों से भिन्न अन्य प्रकार नहीं है । संस्कार के द्वारा आग्नेय आदि के साहित्य के
पृष्ठ 663
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३२ वेदार्थपारिजातः २३२ अध्याय इत्यमुपलभ्यते --- ' नानारूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम् || २५ || वेदशब्देभ्य एवादौ निर्मिमीते ईश्वर: || ' इति ) । लोकेऽपि कुलालादिचिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठस्तस्य वाचकं शब्द पूर्वं स्मृत्वा पश्चात्तमर्थमनु-तिष्ठतियथा, तथैव प्रजापतिरपि सृष्टेः पूर्व वैदिकैः शब्देस्तांस्तानर्थान् स्मृत्वैव तदनुगतानर्थान् ससर्जेति गम्यते । तथा च श्रुतिः ' स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत् ' ( तै ० ब्रा ० २२४१२ ) इत्येवमादिका भूरादिशब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यो भूरादिलोकान् सृष्टान् दर्शयति । किञ्च - जानाति, इच्छति, करोतीति रीत्यापि यथा लोके ज्ञानेच्छापूर्विका कार्यसृष्टिः, तथैव परमेश्वरकर्तृकापि विश्वसृष्टिस्तव्या । ज्ञानं च शब्दानुविद्धमेव जायते । ' न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते || ' ( वा ० १० १११२३ ) इति हरिवचनात् । ते च शब्दाः acar स्मारक एवेति देवादिप्रपञ्चसर्जनानुकूल परमेश्वरीयज्ञाने देवादिवेदिकशब्दानामनुवेधो युक्तः । किमात्मकं पुनः शब्दमभिप्रेत्येक्ष शब्दप्रभवत्वमुच्यते? स्फोटमित्याह । वर्णपक्षे हि तेषामुत्पन्नप्रध्वं-सित्वानित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यनुपपन्नं स्यात् । अयमभिसन्धिः वाचकशब्दप्रभवत्वं हि देवानामभ्युपेतव्यम्, अवाचकेन तेषां बुद्धावनालेखनात् । तत्र न तावद् वस्वादीनां वकारादयो वर्णा वाचकाः, तेषां प्रत्युच्चारणमन्यत्वेनाशक्यसंगतिग्रहत्वात्, अगृहीतसंगतेश्व वाचकत्वेऽतिप्रसङ्गात् । किञ्च वर्णाः प्रत्येकं वाक्यार्थमभिदधति, मिलिता वा? नाद्यः एकैकवर्णोच्चारणात् प्रत्ययादर्शनात् वर्णान्तरोच्चारणा-नर्थक्यप्रसङ्गाच्च । नापि मिलिताः तेषामेकवक्तृप्रयुज्यमानानां रूपतो व्यक्तितो वा प्रतिक्षणं प्रध्वंसिनां साहित्यासम्भवात् । न चान्यः प्रकारः सम्भवति । न चाग्नेयादीनामिव संस्कारद्वारकं साहित्यमस्त्विति वाच्यम्, कि कुम्हार आदि जिस वस्तु को बनाना चाहते हैं, पहले उस वस्तु के बोधक शब्द का स्मरण करते हैं, पश्चात् उसकी रचना करते हैं, उसी तरह प्रजापति ने भी सृष्टि के प्रारम्भ में वैदिक शब्दों के माध्यम से उन उन अर्थों का स्मरण कर पश्चात् शब्द के अनुगत अर्थी की रचना की, ऐसा ज्ञात होता है । ' उसने भू ऐसा उच्चारण कर पृथ्वी की सृष्टि की ' इत्यादि श्रुतियाँ मन में प्रादुर्भूत हुए ' भू ' आदि शब्दों से उत्पन्न हुए ' भू ' आदि लोकों को दिखलाती है । लोक में देखा गया है कि मनुष्य पहले किसी वस्तु को जानता है, फिर उसको चाहता है, तदनन्तर उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करता है । इस प्रकार जानने और चाहने के बाद कार्य की सृष्टि होती है । परमेश्वर की बनाई सृष्टि में भी यही नियम लागू होगा । ज्ञान की उत्पत्ति शब्द के अनुवेध ( जुड़े होने ) से ही होती है । वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने कहा है कि ' लोक में ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है, जिसमें कि शब्द न जुड़ा हो । सारा ज्ञान शब्द में अनुस्यूत होने के बाद ही भासित होता है । ' ये शब्द उस पदार्थ का स्मरण कराते हैं, जिनकी कि सृष्टि अभिप्रेत है । अतः परमेश्वरीय ज्ञान में, जब कि वह देवादि प्रपञ्च की सृष्टि करना चाहते हैं, देवादि वैदिक शब्दों की अनुस्यूति उचित है । यहाँ पर वैदिक शब्द से देवादि प्रपञ्च की उत्पत्ति मानी गई है । यह शब्द किस प्रकार का है? वैयाकरणों का कहना है कि शब्द स्फोटात्मक है । यदि शब्द को वर्णात्मक माना जायगा तो वर्णों के उत्पत्तिविनाशशील होने के कारण नित्य शब्द से देव rfe की सृष्टि नहीं बन पावेगी । इसका अभिप्राय यह है कि देवादि की सृष्टि अपने वाचक शब्द से माननी चाहिये । जो शब्द वाचक नहीं है, उससे उस देवता की आकृति बुद्धि में नहीं बन पावेगी । वकार आदि वर्ण वसु आदि के वाचक नहीं हो सकते, क्योंकि प्रत्येक उच्चारण में वर्णों की भिन्नता के कारण उनका संगतिग्रह अशक्य हैं । बिना संगति बोध के तो किसी भी वर्ण से किसी भी वस्तु का दोष होने लगेगा । फिर आप यह बताइये कि मिलकर? इसमें पहला पक्ष इसलिए उचित नहीं है कि एक - एक वर्ण के उच्चारण से वर्ण से वाक्यार्थ का बोध हो सके तो फिर दूसरे वर्णों का उच्चारण व्यर्थ हो जायगा । का बोध कराते हैं, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक वक्ता के द्वारा उच्चरित वर्ण का है, अतः इनका साहित्य बन ही नहीं सकता । इन दोनों से भिन्न अन्य प्रकार नहीं है । ही यदि वर्णों को बाचक मान लिया जाय, प्रत्येक वर्ण वाक्यार्थ का बोध कराते हैं, या वाक्यार्थ का बोध नहीं होता । यदि एक ही यदि आप कहें सभी वर्ण मिलकर वाक्यार्थ भी रूप अथवा व्यक्तित्व प्रतिक्षण विनाशशील संस्कार के द्वारा आग्नेय आदि के साहित्य के
पृष्ठ 664
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३४ दार्थपारिजातः कोऽयं स्फोट इति चेच्छृणु, गौरित्येकं पदं गामानयेत्येकं वाक्यमिति नानावर्णपदातिरिक्तैकपदवाक्यतावगतेर्वर्णा-तिरिक्तः स्फोट: सिद्धयति । न चाप्यसति बाघके एकपदवाक्यतानुभवो मिथ्येति वक्तुं शक्यम् । नाप्यौपाधिकस्तदनिर्वचनात् । तथाहि--एकधीग्राह्यता खलूपाधिरेकार्थधीहेतुता वा? नाद्यः, एकधोगोचराणां धवखदिरपलाशानामेक निर्भासप्रत्ययाभावात् । नाप्यन्यः, वर्णेष्वेकार्यधीहेतुत्वस्य निरस्तत्वात् । तद्धेतुत्वेन साहित्यकल्पने त्वन्योन्याश्रयत्व | साहित्यात्तद्धेतुत्वम्, हेतुत्वात्तु साहित्यम् । तस्मादयमबावितोऽनुपाधिश्च पदवाक्यगोवर एकनिर्भासोऽनुभवो वर्णातिरिक्त वाचकं स्फोटमेवावलम्बते । स च रत्नतत्त्ववत् पदवाक्यघटकवर्णानुभवजनित संस्कारसचिव चेतोलब्धजन्मनि चरमे चेतसि विशद भासते । अत एव नान्त्यध्वनीनामानर्थक्यं न वा पूर्वेषां ध्वनीनामानर्थक्यम्, तदभावे तज्जनितसंस्कारतत्परिपाकाभावे-नानुग्रहाभावात् । अन्त्यस्य केवलस्य चेतसोऽजनकत्वात् । न च पदप्रत्ययवत् प्रत्येकमव्यक्तामर्थबुद्धिमाघास्यन्ति प्राञ्चो वर्णाः, चरमस्तु तत्सचिवः स्फुटतरामर्थधियमाधास्यतीति वाच्यम्, व्यक्ताव्यक्तावभासितायाः प्रत्यक्षज्ञान एव नियमात् । यथा रत्नस्य प्रतीन्द्रियसन्निकर्षमभिव्यक्तावपि द्वाभ्यां तिसृभिश्चतसृभिः पञ्चभिरभिव्यक्तिभिर्जनितसंस्कारपरिपाक रूपसहकारिसहकृतान्त: करणेन जनिते चरमप्रत्यये विशद रत्नतत्त्वं चकास्ति, न प्राक्षु प्रत्ययेषु, नापि तेंविरहिते चरम-चेतसि # एवं स्फोट: प्रत्येकं ध्वनिभिरभिव्यक्तोऽपि ध्वन्यन्तरजनिताभिरभिव्यक्तिभिर्ये संस्कारा जायन्ते तत्तत्परिपाकव-चचेतःपरिणामे चरमे चेतसि चकास्ति, तदनन्तरमर्थधीर्भवति न प्राक् । न चैवमर्थोऽपि प्रत्येकं ध्वनिभिर्व्यज्यताम्, का कहना है । यह स्फोट क्या है? सुनिये । ' गौ ' यह एक पद है, ' गामानय ' यह एक वाक्य हैं, इन प्रतीतियों में नाना वर्णों और नाना पदों के अतिरिक्त एक पद है, एक वाक्य है, इस प्रकार की प्रतीति होती है, अतः वर्णों से भिन्न एक स्फोट सिद्ध होता है । एक पद और एक वाक्य की प्रतीति मिथ्या नहीं हो सकती, क्योंकि कोई दूसरी बाधक प्रतीति नहीं है । यह प्रतीति aarfan है, यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि यहाँ उपाधि का स्वरूप निर्वचन नहीं बनता । उपाधि एकबीग्राह्य मानी जावेगी या एकार्थीहेतु? ' धवखदिरपलाशा: ' इस प्रतीति का एक ही बुद्धि से ग्रहण होने पर भी यहाँ पर एकाकार प्रतीति नहीं होती, अतः पहला पक्ष नहीं बनता । दूसरा पक्ष इसलिये नहीं बनता कि वर्णों में एकार्थबुद्धिजनकता का निरास किया जा चुका है । Taeferrer शादि के तथा वर्णों के साहित्य को एकार्थ बुद्धि का कारण माना जाय तो इसमें अन्योन्याश्रथ दोष आवेगा, क्योंकि साहित्य से एकार्थता बनेगी और एकार्थधीहेतुता होने पर साहित्य बन सकेगा । इस प्रकार किसी बाधक प्रतीति के और उपाधि के भी उपस्थित न होने के कारण एक पद और एक वाक्य की प्रतीति से वर्णातिरिक्त स्फोट सिद्ध होता है । रत्नपारखी जौहरी जैसे बार - बार के अनुभव जनित संस्कार के कारण रत्नादि की परीक्षा में प्रवीण हो जाता है, उसी भाँति इस स्फोट की भी प्रतीति उस चरम वित्त में स्पष्ट रूप से होगी, जिसका कि संस्कार पद - वाक्य घटित वर्णों के अनुभवों से संस्कृत चितों के द्वारा हो चुका है । इस प्रकार न तो अन्तिम ध्वनियाँ ही निरर्थक होंगी और न पूर्वध्वनियाँ ही, क्योंकि संस्कार की उत्पत्ति में सभी ध्वनियों की सार्थकता है । इन सबके अभाव में संस्कार का परिपाक नहीं हो सकता । यह कहना ठीक नहीं है कि जैसे पदावगति से अस्पष्ट वाक्यार्थावबोध होता है, उसी भांति प्रारम्भिक वर्ण अस्पष्ट अर्थावगति में कारण होंगे और चरम वर्ण से स्पष्ट अर्थावगति होगी, क्योंकि अव्यक्त और व्यक्त अवगति केवल प्रत्यक्ष ज्ञान में हो होती है । जैसे कि रत्न का चक्षु से संनिकर्ष होने पर भी दो चार बार परख लेने के बाद ही अन्तिम रूप से उसकी कीमत आंकी जा सकती है, पहिले नहीं । यदि चित्त में पूर्व संस्कार न Fire भी उसकी कीमत ठीक से नहीं आंकी जा सकती । इसी तरह स्फोट भी यद्यपि प्रत्येक ध्वनि से अभिव्यक्त होता है, भी इन safari की अभिव्यक्ति से जनित संस्कारों से चित्त में जो परिपाक होता है, तत्परिणाम भूत अन्तिम चित्त से स्फोट की अवगति होगी । तदनन्तर ही अर्थ का ज्ञान होगा, इसके पहिले नहीं । प्रत्येक ध्वनि से अर्थ की अस्फुट अभिव्यक्ति होती है और पूर्व अभिव्यक्त अर्थ
पृष्ठ 665
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३५ पूर्वार्थव्यक्तिसंस्कारसहितमन्त्यं चेतस्तत्त्वमर्थस्य व्यनक्तिवति युक्तम्, स्फोटज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वेन तत्र रत्नतत्त्व इव व्यक्तावभासितायाः सम्भवेऽपि मानान्तरजातायां प्रत्यक्षायामर्थबुद्धी स्फुटत्वास्फुटत्वायोगात्, तस्माद्वर्णैरर्थोऽभिहित-श्चेन्नाव्यक्तः, सन्दिग्धस्तु नाभिहितः । प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् स्फोटस्य नित्यत्वम् । भेदप्रत्ययस्तु वर्णविषय एव । स्फुटत्यर्थोऽस्मादिति स्फोटः स्फुटयते वर्णेव्यंज्यत इति वा स्फोट: । तस्मादेव क्रियाकारक फललक्षण-मभिधेयभूतं जगज्जायत इति । तन, वर्णेष्वेव नित्यत्वबोधकत्वसम्भवेन तदतिरिक्तस्फोटकल्पनाया निराधारत्वात् । अत एव ' वर्ण एव तु शब्द: ' इति भगवानुपवर्षः । न च वर्णानामुत्पन्नप्रध्वंसित्वं सम्भवति, त एवेति प्रत्यभिज्ञानात् । न च प्रत्यभिज्ञानं व एव केशा इतिवद् भ्रान्तिमूलकमिति वाच्यम्, प्रत्यभिज्ञानस्य प्रमाणान्तरेणाबाधनात् । न च जातिनिबन्धनं प्रत्यभि-ज्ञानम्, व्यक्तिप्रत्यभिज्ञानात् । यदि प्रत्युच्चारणं गवादिव्यक्तिवद् अन्या अन्या व्यक्तयः प्रतीयेरंस्तदा जातिनिमित्तं प्रत्य भिज्ञानं स्यात्, न स्वेतदस्ति । तस्माद्वर्णव्यक्तय एव प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायन्ते । एवं द्विर्गोशब्द उच्चरित इति प्रतीति-र्भवति, न तु द्वौ गोशब्दाविति । ननु देवदत्तयज्ञदत्ताद्युच्चारणध्वनिभेदाद्वर्णभेद एव युक्त इति चेन्न, ध्वनिभेदेऽपि तदभिव्यङ्ग्यस्य प्रत्य-भिज्ञायमानस्य वर्णस्याभेदोपपत्तेः । अपि च, वर्णव्यक्तिभेदवादिनापि प्रत्यभिज्ञानोपपत्तये वर्णजातयः कल्पयितव्याः, तासु च परोपाधिको भेदप्रत्ययो मन्तव्यः । तदपेक्षया वरं वर्णव्यक्तिष्वेव परोपाधिको भेदप्रत्ययः, स्वरूपनिबन्धनं च प्रत्यभिज्ञानम् । इदं प्रत्यभिज्ञानं वर्णविषयकभेदप्रत्ययस्य बाधकम् । संस्कार से संस्कृत अन्तिम चित्त में अर्थ का स्पष्ट बोध होता है, यह उक्ति भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्फोट ज्ञान के प्रत्यक्ष होने के कारण यहाँ पर रत्न तस्व के समान स्फुट और अस्फुट ज्ञान की स्थिति हो सकती है, किन्तु शब्दादि प्रमाण के आधार पर हुई प्रत्यक्ष बुद्धि में यह सम्भव नहीं है, ऐसा अभी कहा जा चुका है । इसलिये वर्णों से यदि अर्थ अभिहित होगा तो वह अव्यक्त नहीं रह सकता, अर्थ संदिग्ध है तो समझा जायगा कि वह वर्णों से अभिहित नहीं है । उच्चारण की भिन्नता होने पर भी प्रत्येक उच्चारण में स्फोट की प्रत्यभिज्ञा होने से वह नित्य है । भेद प्रतीति वर्णों के कारण होती है । यह स्फोट इसलिये कहा जाता है कि इससे अर्थ स्पष्ट होता है, arrar यह वर्णों से अभिव्यक्त होता है । इसी स्फोट रूप नित्य वाचक शब्द से क्रिया, कारक और फलस्वरूप अभिधेय भूत जगत् उत्पन्न होता है । वैयाकरणों की यह उक्ति ठीक नहीं है । वर्णों में ही नित्यता और अर्थबोधकता भी बनती है, इसलिये वर्णों से अतिरिक्त स्फोट की कल्पना निराधार है । इसीलिये भगवान् उपवर्ष कहते हैं कि वर्ण ही शब्द है । वर्ण उत्पत्तिविनाशशाली नहीं है, क्योंकि ये वही वर्ण हैं, इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा होती है । ' ये वही केश हैं ' इस प्रतीति के समान उक्त प्रत्यभिज्ञा भ्रान्तिमूलक है, यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि केश प्रतीति में तो बाधक ज्ञान उपस्थित है, उस प्रकार की बाघक प्रतीति वर्णप्रत्यभिज्ञा में उपस्थित नहीं है । इसको वर्णजाति की प्रत्यभिज्ञा भी नहीं कह सकते, क्योंकि इसमें व्यक्ति की प्रत्यभिशा होती है । जाति की प्रत्यभिज्ञा तब मानी जाय, जब कि गो शब्द के उच्चारण से जैसे प्रत्येक बार भिन्न - भिन्न गो व्यक्ति की प्रतीति होती है, उसी तरह ' ग ' आदि वर्णों के उच्चारण के समय भी भिन्न - भिन्न ' ग ' वर्णों की प्रतीति हो । ऐसा होता नहीं, इसलिये प्रत्येक उच्चारण में वर्ण व्यक्ति की ही प्रत्यभिज्ञा माननी पड़ेगी । इसीलिये दो बार गो शब्द उच्चरित हुआ, यह प्रतीति होती है, न कि दो गो शब्दों का उच्चारण । देवदत्त, यज्ञदत्त आदि के उच्चारण में ध्वनियों की भिन्नता के कारण वर्णभेद माना जाना चाहिये, ऐसा भी नहीं होगा, afe afrat fre ता में भी उससे अभिव्यक्त हुए वर्णों की प्रत्यभिज्ञा होने से भेद नहीं हो सकता । जो प्रतिवादी वर्ण व्यक्तियों में भेद मानते हैं, उनको प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति के लिये वर्णों की जाति माननी पड़ेगी और भेद प्रतीति के लिये कोई उपाधि भी मानना होगा । इस गौरव की अपेक्षा वर्ण व्यक्तियों में भेद ही किसी उपाधि से माना जाय और प्रत्यभिज्ञा को स्वाभाविक माना जाय तो इसमें लाजव होगा । यह प्रत्यभिज्ञान ही वर्ण विषयक भेद प्रतीति का बाधक है ।
पृष्ठ 666
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३६ वेदार्थपारिजाता ननु तहिं कथमेकस्मिन् काले बहुभिरुच्चारयितृभिरुच्चारितो गकारी युगपदनेकरूपः स्यात्, उदात्तोऽनुदात्तः स्वरितः सानुनासिको निरनुनासिकश्चेति । तस्माद्विरुद्धधर्मवत्त्वेन नानात्वमेव युक्तं गकारादेः । न चोदात्तादयो व्यञ्जक-धर्मा न वर्णधर्मा इति वाच्यम्, व्यञ्जकानां वायूनां तत्संयोगविभागानां चाश्रावणत्वेनोदात्तादिधर्मानुपपत्तेरिति चेन्न, वानामश्रावणत्वेऽपि तद्गुणानामुदात्तादीनां श्रावणत्वे बाघाभावात् । गुणगोचरस्येन्द्रियस्य गुणिगोचरत्वे माना-भावात् । अन्यथा गन्धरसशब्दगोचराणां घ्राण - रसन - श्रोत्राणां पृथिव्युदकाकाशगोचरत्वापत्तिः । तथा चाभिव्यञ्जक-धर्मा उदात्तादयः शब्दाः संसर्गाग्रहात् शब्दधर्मत्वेनाध्यवसीयन्ते । न प्रत्यभिज्ञानावधृतैकत्वस्य शब्दस्य स्वरूपत उदात्तादयो धर्माः परस्परविरोधिनो युगपत्सम्भवन्ति । यथैकस्य मुखस्य मणि कृपाण दर्पणाद्युपाधिवशान्नानादेश-परिमाणसंस्थानभेदभ्रमः एवमेकस्यापि वर्णस्य व्यञ्जके ध्वनिनिबन्धनोऽयं विरुद्धनानाधर्मसंसर्गविभ्रमः, न तु स्वाभाविको नानाधर्मसंसर्गः । गुणगुणिनोरेकेन्द्रियग्राह्यत्वेऽपि न दोषः, ध्वनीनामेव शब्दव्यञ्जकत्वात् । तेषां च शब्दवच्छ्रावणत्वात् । कोऽयं ध्वनिर्नामेति चेत्तदाह भाष्यकारः - ' यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति प्रत्यासीदतश्च पदुमृदुत्वादिभेदं वर्णेष्वासञ्जयति ( स ध्वनिरिति शेषः ) तन्निबन्धनाश्चोदात्ता-दयो विशेषा न वर्णस्वरूपनिबन्धनाः, वर्णानां प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् । न चायमनिर्धारित विशेषवर्णत्व-सामान्यमात्रप्रत्ययो न तु वर्णातिरिक्ततदभिव्यञ्जकध्वनिप्रत्यय इति साम्प्रतम्, तस्यानुनासिकत्वादिभेदभिन्नस्य गादिव्यक्तिवत् प्रत्यभिज्ञायमानत्वाभावात् । अप्रत्यभिज्ञायमानस्य चैकत्वाभावेन सामान्यभावानुपपत्तेः । तस्माद वर्णात्मकः शब्दः शब्दातिरिक्तो वा ध्वनिः श्रावणोऽभ्युपेयः । सर्वथाप्यक्ष व्यञ्जनेषु च तत्तद्ध्वनिभेदोपधानेनानु-प्रश्न है कि एक ही समय में बहुत लोगों से उच्चारित गकार यदि एक ही है, तो वह युगपत् उदात्त, अनुदात्त, स्वरित सानुनासिक और निरनुनासिक भेद से अनेक रूप कैसे हो सकेगा? इसलिये अनेक विरोधी धर्म वाले गकारादि का नानात्व ही मानना उचित है । उदात्त आदि व्यंजक ध्वनि के धर्म हैं, वर्ण के नहीं, इस प्रकार ध्वनि की अभिव्यंजक वायु और उसके संयोग-विभाग का श्रवण प्रत्यक्ष न होने से उदात्त आदि धर्मं उपपत न हो सकेंगे । यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि वायु का श्रावण प्रत्यक्ष न होने पर भी उसके उदात्त आदि गुणों के श्रावण प्रत्यक्ष में कोई बाधा नहीं है । गुण का प्रत्यक्ष करने वाली इन्द्रिय तद्गुण-युक्त पदार्थ का भी प्रत्यक्ष करे, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । यदि ऐसा माना जाय तो गन्ध, रस और शब्द को ग्रहण करने वाली प्राण, रसन और श्रोन्द्रिय पृथिवी, जल और आकाश का भी प्रत्यक्ष करने लगेगी । इस प्रकार उदात्तादि के अभिव्यंजक धर्म होने पर भी शब्दों के साथ संसर्ग के कारण शब्दों के धर्म मान लिये जाते हैं । प्रत्यभिज्ञा के द्वारा शब्द का एकत्व सिद्ध है, अतः उसमें स्वरूपतः परस्पर विरोधी उदात्त आदि धर्म एक साथ नहीं रह सकते । जैसे एक ही मुँह का मणि, कृपाण, दर्पण आदि उपाधि के कारण नाना देश, परिमाण और आकार का भेदभ्रम उत्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार एक ही वर्ण का व्यंजक ध्वनि के भेद से नाना विरुद्ध धर्मों के संपर्क से भ्रम हो जाता है, यह संपर्क वास्तविक नहीं है । गुण और गुणी की एकेन्द्रियाह्मता में भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि शब्द की अ fairs s वनियाँ ही हैं, वायु नहीं । ध्वनियों का भी शब्द के समान श्रावण प्रत्यक्ष होता है । यह ध्वनि नाम की वस्तु क्या है? इसके उत्तर में भाष्यकार कहते हैं कि दूर से सुनने वाले और अलग - अलग वर्णों को न जानने वाले पुरुष के कान में जो प्रवेश करती है और समीप में सुनने वाले के लिए पटुत्व, मृदुत्व आदि भेदों का वर्णों में आरोप करती है, वह ध्वनि है । उदात्त आदि विशेष उससे होते हैं, वर्ण स्वरूप से नहीं, क्योंकि प्रत्येक उच्चारण में वर्ण प्रत्यभिज्ञा के विषय होते हैं । इस प्रत्यय को वर्ण से अतिरिक्त वदभिव्यंजक ध्वनि न मानकर वर्णों का ऐसा सामान्य प्रत्यय मानना, जिसकी कि विशेषता स्पष्ट नहीं हुई है, उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस प्रकार अनुनासिक आदि भेद वाले वर्ण की गादि व्यक्ति के समान प्रत्यभिज्ञा नहीं देखी गई है । जो प्रत्यभिज्ञात नहीं हैं, एकत्व के अभाव में उसका सामान्य भाव भी नहीं हो सकता । इसलिये अवर्णात्मक शब्द अथवा शब्द से अतिरिक्त safe का श्रावण प्रत्यक्ष मानना पड़ेगा । दोनों ही प्रकारों में इन्द्रिय और व्यंजक ध्वनि में ध्वनिभेद के कारण परस्पर भिन्न अनुनासिक आदि घर्मो की प्रतीति होगी । इस प्रकार यह कहना युक्तिसंगत नहीं है कि वर्णों के क्षणिक होने से संगति बोध के अभाव में वाचकता
पृष्ठ 667
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः ६३७ नासिकत्वादयो धर्माः परस्परभिन्ना भासन्ते । एतेन क्षणिकत्वेनासङ्गतिग्रहाद् वाचकत्वाभावात् स्फोटोऽभ्युपेय इत्य-पास्तम्, वर्णानां नित्यत्वेन बोधकत्वोपपत्तौ स्फोटकल्पनाया व्यर्थत्वात् । यदुक्तम्- ' प्रत्यक्षमेव स्फोटोऽनुभूयते न कल्प्यते, एकेकवर्णानुभवाहित संस्कारवत्यां बुद्धौ झटिति प्रत्यव-भासनादिति, तन्न, अस्या अपि बुद्धेर्वर्णविषयत्वात् । एकैकवर्णग्रहणोत्तरकाला हीयं गौरित्याकारा बुद्धिः समस्तः वर्ण विषया न स्फोटविषया, तस्यां बुद्धौ गकारादिवर्णानामेव प्रथनात् । यदि ह्यस्या बुद्धेर्गकारादिभ्योऽर्थान्तरं स्फोटो विषयः स्यात्, ततो दकारादय इव गकारादयोऽप्यस्या व्यावर्तेरन्, न तु तथास्ति, तस्माद् गोरित्येकं पदमित्याद्येक-विषया बुद्धिर्वर्णविषया स्मृतिरेव । radharani कबुद्धिविषयता युक्तेति चेन्न, सेना - वन - पङ्क्ति - शत सहस्रादिवदनेकस्याप्येक-बुद्धिविषयत्वसम्भवात् । तस्माद् गोरित्येकोऽयं शब्द इति बुद्धिर्नहुष्वेव वर्णेषु एकार्थावच्छेद निबन्धनौपचारिकी बनादि-प्रत्ययवत् सम्भवत्येव । नन्वेवमेकबुद्धिविषयाणामेव वर्णानां पदत्वे ' जारा ' ' राजा ' ' कपिः ' ' पिक: ' इत्यादिपद-विशेषप्रतीतिनं स्यात्, तेषामेव वर्णानां तत्र तत्र प्रत्यवभासनादिति चेन्न, उभयत्र समस्तवर्णप्रत्यवमर्शऽपि क्रमानुराधि-नोष्वेव पिपीलिकासु पङ्क्तिबुद्धिवन्नियतानुपूर्वीकेषु वर्णेष्वेव तत्तत्पदबुद्धय पपत्तेः । अत एव कमविशेषकृतैव पद-विशेषप्रतिपत्तिः । वृद्धव्यवहारे क्रमाद्यनुगृहीता गृहीतार्थविशेषसम्बन्धाः स्वव्यवहारेऽप्येके कवर्णग्रहणानन्तरं समस्तप्रत्यवमशिनि चेतसि तादृशा एव भासमानास्तं तमर्थमव्यभिचारेण प्रत्याययन्तीति वर्णवादे लाघवम्, स्फोटवादे तु दृष्टहानि दृष्ट + कल्पना च । वर्णाश्चेमे क्रमेण गृह्यमाणाः स्फोटं व्यञ्जयन्ति, स्फोटश्चार्थ व्यनक्तोति व्यक्तं गौरवम् । यत्तु स्फोटात्म-न बनने के कारण स्फोट मानना चाहिये, क्योंकि उक्त युक्तियों से वर्णों की नित्यता सिद्ध है, अतः वर्णों में ही बोधकता की उपपत्ति संभव होने से तदतिरिक्त स्फोट कल्पना व्यर्थ है । यह कहना कि स्फोट का तो प्रत्यक्ष अनुभव होता है, उसकी कल्पना नहीं करनी है, क्योंकि एक - एक वर्ण के ग्रहण से अनुभवजन्य संस्कार सहित बुद्धि में शीघ्र स्फोट का प्रत्यवभास होता है, इसलिये उचित नहीं है कि यह बुद्धि भी वर्णविषयक है । एक - एक वर्ण का ग्रहण होने के अनन्तर ' गो ' यह जो एक बुद्धि होती है, वह समस्त वर्ण विषयक है, स्फोट विषयक नहीं । क्योंकि उस बुद्धि में गकारादि वर्णों की ही अनुवृत्ति होती है । यदि इस बुद्धि का गकारादि से भिन्न स्फोट रूप अर्थ विषय हो तो दकारादि के समान गकारादि भी उस बुद्धि से व्यावृत्त हो जायेंगे । अर्थात् जैसे मकार विषयक बुद्धि में दकारादि विषयक अनुवृत्ति नहीं होती, वैसे स्फोट विषयक बुद्धि में गकारादि की भी अनुवृत्ति नहीं होगी । किन्तु ऐसा होता नहीं । इसलिए ' गो ' यह एक पद है, इस प्रकार की एकविषयक बुद्धि वर्णविषयक स्मृति ही है । वर्णों के अनेक होने से उनमें एक बुद्धि विषयता नहीं बन सकती, यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि सेना, वन, पंक्ति, शत सहस्र इत्यादि स्थलों में अनेक में एक बुद्धि विषयता देखी जाती है । इसलिए ' गौ ' यह एक शब्द है, इस प्रकार की बुद्धि वन, सेना आदि बुद्धि के समान बहुत वर्षों में एकार्थ बोधक संबन्ध से औपचारिक रूप से प्रयुक्त होती है । स्फोटवादी यहाँ कहते हैं कि यदि वर्ण ही सब मिलकर एक बुद्धि की विषयता को प्राप्त होकर पद बनते हों तो जारा, राजा, कपि, पिक, इत्यादि में पद विशेष की प्रतीति नहीं होगी, क्योंकि वे ही वर्णं इधर - उधर प्रत्यवभासित होते हैं । इस पर हमारा कहना है कि ऐसे स्थलों में सब वर्णों का ran होने पर भी जैसे क्रम के अनुसार ही पिपीलिकाओं में पंक्ति बुद्धि होती है, वैसे ही क्रम के अनुसार वर्ण भी पद बुद्धि में आरूढ़ होते हैं । इसीलिए क्रमविशेष के अनुसार ही पदविशेष की प्रतिपत्ति होती है । क्रम आदि के अनुसार गृहीत उन वर्णों का वृद्ध व्यवहार में, अर्थात् शक्तिग्रह दशा में भिन्न - भिन्न अर्थों के साथ सम्बन्ध ग्रहण किया जाता है, अतः मध्यम व्यवहार में भी एक - एक वर्ण का ग्रहण होने पर समस्त वर्णों को विषय करने वाली बुद्धि में वैसे ही अवभासित हुए उस उस अर्थ का अव्यभिचार रूप से ज्ञान कराते हैं, इस प्रकार वर्णवादी की कल्पना में लाघव है । स्फोटवादी
पृष्ठ 668
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३८ वेदार्थपारिजातः कस्य शब्दस्याभागस्य भागा वर्णाः कल्पिता एवेति, तदपि न प्रमीयमाणानां वर्णानां मिथ्यात्वे मानाभावात् । न चैकत्व-नानात्वप्रतीतेरप्येकत्वबाधकत्वोपपत्तेः । वस्तुतस्तु धीरेव afararaar धिकेति वाच्यम्, सेनावनबुद्धिवद् एकत्वनानात्वे न विरुद्धे, feeratha सतां केनचिदुपाधिकत्वव्यवहारोपपत्तेः । तस्मात् प्रत्येकवर्णानु-भवजनितभावनानिचयलब्धजन्मनि निखिल वर्णावगाहिनि स्मृतिज्ञान एकस्मिन् भासमानानामेकज्ञानविषयतया वा एकार्थीहेतुतया वा सम्भवत्येवौपचारिकमेकत्वम् । न चैकार्थधहेतुत्वेनैकत्वम् एकत्वेन चकार्थधीहेतुत्वमित्यन्यो-न्याश्रयः, अर्थप्रत्ययात् पूर्वमप्येतावन्तो वर्णा एकस्मृतिसमारोहिण इत्यस्य प्रथनात् । तत एव वृद्धस्यार्थबुद्धच पपत्तेः । तस्माच्च तेषामेकार्थधियं प्रति कारकत्वेनैकत्वनिर्णयात् । प्रत्युच्चारणं वर्गानामन्यत्वेऽपि प्रत्यभिज्ञाविषयतया वर्ण सामान्यानामभ्युपगन्तव्यत्वेन या वर्णेष्वर्थप्रतिपादनप्रक्रिया सा सामान्येषु संचारयितव्या । तस्माद्वरं शब्दनित्यत्वमेव । ततश्च नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यविरुद्धम् । नित्यादेव शब्दाज्जगदुत्पत्तिर्युक्ता नानित्यात्, तस्याप्युत्पत्तिमत्त्वेन सापेक्षत्वात् । तस्माद् नित्यो वेदः, जगदुत्पत्तिहेतुत्वादोश्वरवत् । तदाह भगवान् बादरायणः -- ' अत एव च नित्यत्वम् ' ( ब्र ० सू ० १ | ३ | २ ९ ) । अत एव नियताकृतेर्देवादेर्जगतो वेदशब्दप्रभवत्वाद् वेदशब्दे नित्यत्वमपि प्रत्येतव्यम् । तथा च मन्त्र: ' यज्ञेन वाचः पदवीय-मायन्तामन्वविन्दन्तृषिषु प्रविष्टाम् । तामाभृत्या व्यदधुः पुरुत्रा तां सप्तरेभा अभि सं नवन्ते ॥ ' ( ऋ ० सं ० १०।७१।३ ) । यज्ञेन पुण्येन वाचो वेदस्य पदवीयतां वेदग्रहणयोग्यताम्, आयन् प्राप्तवन्तः । तत ऋषिषु अतीन्द्रियार्थदर्शिषु प्रविष्टां तां वाचमन्वविन्दन् उपलब्धवन्तः । ' वाचा विरूपनित्यया ' ( ऋ ० सं ० ८२७५१६ ) इत्यत्र वेदलक्षणाया वाचः स्पष्टमेव नित्यतोक्ता । के मत में दृष्ट हानि और अदृष्ट कल्पना दोष आते हैं । क्रम से गृहीत हुए ये वर्ण स्फोट को व्यक्त करते हैं, वह स्फोट अर्थ को व्यक्त करता है, इस प्रकार कल्पना गौरव भी है । यह कहना कि स्फोटात्मक शब्द भागरहित है, वर्णं उसके कल्पित भाग हैं, इसलिये उचित नहीं है कि वर्णों की प्रतीति यथार्थ है, उसको मिथ्या नहीं बताया जा सकता । एकत्वधी को वर्णों के नानात्व में बाधक माना जाय तो नानात्व प्रतोति भी एकत्व में बाधक हो सकेगी । वास्तव में सेना, वन आदि में जैसे एकत्व और नानात्व बुद्धि परस्पर विरुद्ध नहीं है, वैसे ही वर्णों में भी समझना चाहिये । भिन्न होने पर भी किसी उपाधि के कारण एकत्व व्यवहार हो सकता है । प्रत्येक वर्ण के अनुभव जनित भावना नामक संस्कार समूह से जिसका जन्म हुआ है, उस सारे अर्थों का अवगाहन करने वाले एक स्मृति ज्ञान में भासमान हो रहे वर्णों में एकत्व का आरोप इसलिये हो सकता है कि वह एक ज्ञान के विषय हैं, अथवा एकार्थ बुद्धि के जनक हैं । एकार्थ बुद्धि की जनकता से race का बोध होगा और एकत्व से पदार्थ की हेतुता बनेगी, यह अन्योन्याश्रय दोष यहां नहीं आवेगा, क्योंकि अर्थावबोध के पूर्व भी इतने वर्ण एक स्मृति में समारूढ हैं, यह अवगत रहता है । इसी से वृद्ध व्यवहार में अर्थ बुद्धि उपपन्न हो सकती है । इस प्रकार वर्णों की एकार्थ बुद्धि के प्रति कारकता होने से उनके एकत्व का निर्णय होता है । प्रत्येक उच्चारण में भिन्न - भिन्न वर्ण होते हैं, तो भी प्रत्यभिज्ञा के प्रमाण पर वर्णगत जातियों को अवश्य स्वीकार करना होगा और वर्णों में जो अर्थ प्रतिपादन प्रक्रिया रची गई है, उसका वर्णगत जातियों में संचार करना पड़ेगा । इस कारण नित्य शब्दों से देवादि व्यक्तियों की उत्पत्ति होती है, इसमें कोई बिरोध नहीं है | नित्य शब्द से ही जगत् की उत्पत्ति होनी चाहिये, अनित्य से नहीं । यदि शब्द को अनित्य मानेंगे तो वह अपने प्रामाण्य में दूसरे की अपेक्षा करेगा । अतः वेद नित्य है, क्योंकि ईश्वर के समान वह भी जगत् की उत्पत्ति में कारण है । भगवान् बादरायण ने इसी बात को ' अत एव ' इत्यादि सूत्र में कहा है । नियत आकृति विशिष्ट देव आदि जगत् को वेद शब्द से उत्पत्ति होने के कारण वेद शब्द में frence समझना चाहिये । ' यज्ञेन वाचः ' इत्यादि मन्त्र पूर्व कल्प सिद्ध वेदमयी वाणी की उपलब्धि दिखलाता है | मन्त्र का अर्थ है पूर्व सुकृत ( पुण्य ) कर्म से वेद के लाभ की योग्यता को प्राप्त हुए याज्ञिक पुरुषों ने ऋषियों में स्थित उस वेदमयी वाणी को प्राप्त किया | ' atar faoficer ' इस मन्त्र में भी वेदरूपी वाणी को नित्यता स्पष्ट हो प्रदर्शित की गई है ।
पृष्ठ 669
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६१६ यद्यप्यभिधानाभिधेयाविच्छेद एव सम्बन्धनित्यत्वं सिद्धयति, एवमध्यापकाध्येतृपरम्पराऽविच्छेदे वेदस्य नित्यत्वं सिद्ध्यति, निरन्वयस्य जगतः प्रविलयेऽत्यन्तासतोऽपूर्वस्योत्पादे तु तत्सर्वं नोपपद्यते । नापि जीवास्तद्वासना • वासिताः, अन्तःकरणोपहितानां तेषामुपाधिप्रलये तदभावात् । न च ब्रह्मणस्तद्वासना, तस्य विद्यात्मनः शुद्धस्य तद-सम्भवात् । सृष्ट्यादावुत्पन्ना अन्तःकरणादयस्तदवच्छिन्नाश्च जीवा न पूर्वकर्माविद्यावासनावन्तोऽपूर्वत्वादिति तत्राह-' समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ' ( ब्र ० सू ० १ | ३ | ३० ) | संसारस्यानादित्वात् सत्यपि सर्वव्यवहारोच्छेदिनि प्रलये परमेश्वरानुग्रहादीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां कल्पान्तरव्यवहारानुसन्धानाद् वेदपरम्पराऽविच्छेदोपपत्तेः । यद्यपि प्राकृताः प्राणिनो न जन्मान्तरव्यवहारमनु सन्दधते, तथापि न प्राकृतवदेव सर्वैर्भवितव्यमिति नियमः श्रुतिस्मृत्यादिभिरैश्वर्यतारतम्यावगतेः । अतः परमेश्वरानुग्रहात् सुप्तप्रतिबुद्धस्यायेन प्राक्कल्पोयां वेदानुपूर्वी स्मरन्ति हिरण्यगर्भादयः । ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वं वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ' इति श्रुतेः । प्रतिवेदं चैव काण्डर्यादयः स्मर्यते । श्रुतिरपि ऋषिज्ञानपूर्वकमेव मन्त्रेणानुष्ठानं दर्शयति - ' यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वच्छेति गर्तं वा पद्यति प्रवा मीयते पापीयान् भवति यातयामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति । अथ यो मन्त्रे मन्त्रे वेद सर्वमायुरेति श्रेयान् भवति । अयातयामान्यस्य च्छन्दांसि भवन्ति । तस्मादेतानि मन्ये मत्र विद्या ' ( आर्षेयब्राह्मणम् ११६ ) इति । प्राणिनां सुखदुःखप्राप्तितत्परिहारसिद्धये धर्माधर्मज्ञानमवश्यमभ्युपेतव्यम् । यथाद्यत्वे दृष्टानुविक सुखदुःखविषय रागद्वेषौ न विलक्षणविषयौ, तथैव कल्पान्तरेष्वपि मन्तव्यौ । तथा च धर्माधर्मफलोत्तरा निष्पद्यमाना यद्यपि सम्बन्ध की नित्यता तभी हो सकती है, जब कि अभिधान और अभिधेय का सम्बन्ध कभी विच्छिन्न न हो । इसी तरह वेद की नित्यता भी तब सिद्ध होगी, जब कि अध्यापक और अध्येता की परम्परा न टूटे । जगत् का निरन्वय विनाश हो जाने पर और अत्यन्त असत् अपूर्व जगत् की उत्पत्ति मानने पर यह सब सम्भव नहीं हो सकता । इस अवस्था में विद्यमान जीवों में वासना रूप में ये विद्यमान रहेंगे, ऐसा भी नहीं हो सकता, क्योंकि अन्तःकरणों से उपहित जीवों की उपाधि के भी विनाश हो जाने से ये वासनाएं कहाँ रहेंगी । ब्रह्म में वासना की अवस्थिति नहीं मानी जा सकती, क्योंकि विद्या स्वभाव शुद्ध ब्रह्म में वासनाएं नहीं रह सकतीं । सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न हुए अन्तःकरण एवं उनसे युक्त जोव पूर्व कर्म से उत्पन्न अविद्या की वासनाओं से युक्त इसलिये नहीं हो सकते कि ये तो एकदम नये हैं । इस आक्षेप के समाधान के लिये ' समाननाम ' इत्यादि सूत्र की अवतारणा होती है । संसार अनादि है, अतः प्रलयावस्था में सब प्रकार के व्यवहार के लुप्त हो जाने पर भी परमेश्वर के अनुग्रह से युक्त सामर्थ्यशाली हिरण्यगर्भ आदि देवताओं में कल्पान्तर के व्यवहार का अनुसन्धान रहने से वेद की परम्परा विच्छिन्न नहीं होती । पामर प्राणियों में जन्मान्तर के व्यवहार का अनुसन्धान नहीं देखा जाता, तो इसका मतलब यह नहीं है कि पामर प्राणियों के समान हो सब कोई हों । ऐश्वर्य प्रत्येक प्राणी में कम - वेशी देखा गया है, यह बात श्रुति और स्मृति से भी सिद्ध हैं । अतः जैसे सोकर उठा व्यक्ति पहले की बातों को याद रखता है, उसी तरह हिरण्यगर्भ प्रभृति देवतागण परमेश्वर के अनुग्रह से पूर्वकल्प की वेदानुपूर्वी को याद कर लेते हैं । ' जो सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और जो उसकी बुद्धि में वेदों का आविर्भाव करता है यह श्रुति इसमें प्रमाण है । प्रत्येक वेद में काण्ड आदि के द्वष्टा ऋषियों का स्मरण किया गया है । ' यो ह वा ' इत्यादि श्रुति भी ऋषि के ज्ञान के साथ ही मन्त्र से अनुष्ठान दिखलाती है । इसका अर्थ है कि जिसे मन्त्र के छन्द, ऋषि, देवता तथा विनियोग का ज्ञान नहीं है, वह यदि किसी को यज्ञ कराता है अथवा पढ़ाता है तो स्थाणु हो जाता है, नरक में जाता है, अथवा मर जाता है । वह पापपुंज से लिप्त हो जाता है, उसका वेदाध्ययन निष्प्राण हो जाता है । इसके विपरीत जो प्रत्येक मन्त्र के ऋषि, देवता और छन्द के विनियोग को जानता है, वह पूरी आयु पाता है, कल्याणभागी होता है, इसका अध्ययन प्राणवान् होता है । इसलिये प्रत्येक मन्त्र के ऋषि आदि का ज्ञान अवश्य रखना चाहिये । प्रत्येक प्राणी को सुख को प्राप्ति के लिये धर्म के विधान का तथा दुःख के परिहार के लिये अधर्म के निषेध का ज्ञान erate होना चाहिये । जैसे आजकल ऐहिक और पारलौकिक सुख - दुःख में राग और द्वेष होते हैं, अन्य विषयों में नहीं, उसी तरह
पृष्ठ 670
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६४० वैवार्थपारिजातः सृष्टिः पूर्वसृष्टिसदृश्यैव निष्पद्यते । तथा च स्मृति: - ' तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सुष्ट्यां प्रतिपेदिरे । तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः । हिंस्राहिंसे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते । तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥ ' ( म ० भा ० शा ० १० २३२।१६-१७ ), ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥ ' ( ऋ ० सं ० १०1१ ९ ०1३ ), ' अग्निर्वा अकामयत । अन्नादो देवानां स्यामिति । स एतमग्नये कृत्तिकाभ्य: पुरोडाश-मष्टाकपालं निरवपत् ' ( तै ० ब्रा ० ३ | १ | ४ | १ ) इति नक्षत्रेष्टिविधावग्निरेवाग्नये निरखपद् इति समाननामरूप-दन्तावग्नी श्रूयेते ' ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः । शर्वयन्ते प्रसूतानां तान्येवेभ्यो ददात्यजः ॥ यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ ', ' यथाभिमानिनोऽतीता-स्तुल्यास्ते साम्प्रतैरिह | देवा देवैरतीतहि रूपैर्नामभिरेव च ॥ ' इति । ( ' अधुना इमे श्लोका इत्थं महाभारते उपलभ्यन्ते - ' ऋषीणां नामधेयानि याव वेदेषु सृष्टयः || २५ || " शर्वर्यन्ते सुजातानामन्येभ्यो विदधात्यजः || २६ || ' यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्रह्मरादिषु || ४० || ' ( म ० भा ० शा ० प ० २३२ विष्णुपुराण १।५।६४-६६ ) । ) इत्यादिशाङ्करभाष्योद्धृतश्रुतिस्मृतिभिः प्रतिसगं समाननामरूपवतां देवर्ष्यादीनामुत्पत्तिज्ञानाद् वेदपार-स्पर्यस्याविच्छेद एव ज्ञायते । तस्मन्नास्यां सृष्टावन्य एव वेदाः, अन्य एव चैषामर्थाः, अन्य एव वर्णाश्रमाः, धर्माच्चानर्थोऽधर्माच्चार्थ इति । नहि कदाचिदपि पिपासुर्दहनमादाय पिपासामुपशमयति । देवतासम्बन्धे - ' ज्योतिषि भावाच्च ' ( ब्र ० सू ० १।३।३२ ) इत्यत्रादित्यादिज्योतिषि देवताशब्द-प्रयोगात् तेषां च जडत्वावगमादन्नादित्याग्न्यादिदेवतानां यज्ञेषु न वोपासनास्वधिकारः, द्युस्थानं ज्योतिर्मण्डलमहर्निशं कल्पान्तर में भी मानना चाहिये | इसलिये धर्म और अधर्म के फलभूत होने वाली उत्तरोत्तर सृष्टि उत्पन्न हुई पूर्व सृष्टि के सदृश ही निष्पन्न होती है । इसमें यह स्मृति भी प्रमाण है कि ' प्राणियों में जिन प्राणियों ने जो - जो कर्म प्रथम सृष्टि में किये उन कर्मों को पुनः पुन: उत्पन्न होकर प्राप्त करते हैं । हिंसा - अहिंसा, मृदुता क्रूरता, धर्म - अधर्म, सत्य - असत्य इत्यादि धर्मों से भासित ये प्राणी उत्पन्न होकर पुनः उन्हीं भावों को प्राप्त करते हैं और वे ही उनको रुचिकर होते हैं ', ' ब्रह्मा ने पूर्व कल्प के समान ही सूर्य, चन्द्रमा, शुलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग की रचना की ', ' अग्नि ने कामना की कि मैं देवों के मध्य में अन्नभक्षक होऊं । उसने कृत्तिका नक्षत्रों के afanta after के लिये आठ कपालों में बनाया गया पुरोडाश ( हविष्य ) अर्पित किया यह श्रुति नक्षत्रेष्टि विधि में अग्नि ने ही अग्नि को हविष्य अर्पित किया, इस प्रकार दोनों अग्नियों के नामरूप की समानता को दिखलाती है । ' पूर्वकल्प में जो जो ऋषियों के नाम थे और उनकी जो वेदविषयक दृष्टि थी, प्रलय के अन्त में पुनः उनके उत्पन्न होने पर ब्रह्मा उन्हीं नामों और शक्तियों को उन ऋषियों को देता है । जैसे वसन्त आदि ऋतुओं के बदलने पर उनके नव पल्लव आदि चिह्न प्रकट होते हैं और दिखाई देते हैं, वैसे ही सृष्टि के आदि में पदार्थ दिखाई देते हैं । चक्षु आदि इन्द्रियों के अभिमानी देवता जो अतीत कल्प में थे, वे ही इस कल्प में भी हैं । अतीत देवताओं के नामरूप के समान ही इनके नामरूप भी हैं । ' ( ये श्लोक कुछ पाठ भेद के साथ महाभारत में उपलब्ध हैं । इनका स्वरूप मूल में दिया गया है ) शाङ्कर भाष्य में उद्धृत इन श्रुति और स्मृति वाक्यों से ज्ञात होता है कि प्रत्येक सर्ग में समान नामरूप वाले ही देवता एवं ऋषिगण उत्पन्न होते हैं, अतः देवपरम्परा कभी विच्छिन्न नहीं होती । इसलिये इस सृष्टि में न तो वेद ही भिन्न है, न इनके अर्थ ही free है और न वर्णाश्रम ही भिन्न हैं । न कोई ऐसी बात ही है कि धर्म से अनर्थ हो और अधर्म से इष्टसाधना होने लगे । ऐसा कभी नहीं हो सकता कि प्यासा आदमी आग से अपनी प्यास बुझा सके । देवता के संबन्ध में ' ज्योतिषि भावाच्च ' इस सूत्र में बताया गया है कि आदित्य आदि ज्योति में होता है और यह ज्ञात है कि ये जड़ हैं, इसलिये आदित्य, अग्नि आदि देवताओं का यज्ञ अथवा उपासना में देवता शब्द का प्रयोग अधिकार नहीं होगा ।