वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 721–730
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 721–730
पृष्ठ 721
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
छन्दस्यानामिष्टकानां पशुरूपत्वं दर्शितम् । द्वादश उपदधाति द्वादशाक्षरा वे जगती 1 । अथातो निरुक्तान्येव छन्दांस्युपद-घातीत्युक्त्वा पङ्क्तिश्छन्द उष्णिक्छन्दो बृहतीच्छन्दोऽनुष्टुप्छन्दो विराट्छन्दो गायत्री छन्दस्त्रिष्टुप्छन्दो जगतीछन्द इत्येतानि निरुक्तानि विराडष्टमानि छन्दांस्युपदधाति पृथिवी छन्दोऽन्तरिक्षं छन्द इति । यान्येतद्देवत्यानि छन्दांसि तान्येवै-तदुपदधाति । अग्निर्देवता वातो देवतेत्येता वै देवताश्छन्दांसि तान्येवैतदुपदधाति । एता वै देवता वै छन्दांसि । अग्निवात-सूर्यादिदेवताः खलु छन्दांसि । अग्नेर्गायत्र्यभवद् इति वाक्यादेव ताभ्यश्छन्दसामुत्पत्तेः । अत्रोत्पादकोत्पाद्यानामभेद-विवक्षया देवतानां छन्दस्त्वव्यपदेशः, न सर्वार्थाविद्योतकत्वाच्छन्दसां देवतात्वम्, प्रकरणविरोधात् । अथवा पशवः छन्दांसीति रीत्या छन्दसामेव पशुत्वमपि वक्तव्यं स्यात् । गायत्र्यादिच्छन्दोऽत्वितानां देवतात्वं तु पूर्वं निराकृतमेव । तस्मात् पौर्वापर्यज्ञानशून्यत्वादेव छन्दोनामभिर्बहु जल्पितम् । यच्च ' छन्दोमन्त्रनिगमा: पर्यायवाचिनः सन्ति ( पृ ० ६० ) इत्युक्तम्, तदतोव मन्दम्, तथात्वे ' मन्त्रे श्वेतवहोक्थशस्पुरोडाशो ण्विन् ' ( पा ० सू ० ३२२२७१ ), ' अब यज: ' ( पा ० सू ० ३१२१७२ ), ' विजुषे छन्दास ' ( पा ० सू ० ३।२ / ७३ ) इति क्रमेण पठितेषु सूत्रेषु मन्त्रपदानुवृत्त्या कार्यसिद्धया विजुषे छन्दसीत्यत्र छन्दोग्रहणस्य वैयर्थ्यापातात् । तस्मान्मन्त्रपदेन केवलमन्त्रभागस्य ग्रहणम्, ब्राह्मणपदेन केवलब्राह्मणभागस्य, छन्दोवेदनिगमश्रुत्यादिशब्देस्तु मन्त्र-भगब्राह्मणयोरुभयोरपि ग्रहणमित्येव युक्तम् । अधिकं तुपरिष्टाद् वक्ष्यते । वेदसंज्ञा विचार: यदुक्तम्- ' कोऽयं वेदो नाम, मन्त्रभागसंहितेत्याह ' ( पृ ० ११ ), तदपि तुच्छम् मन्त्रभागशब्देनैव मन्त्रभागे-तरस्य ब्राह्मणभागस्य सिद्धत्वात्, भाग उत्यंशस्य वाचकः शब्दः । अंशोऽवयवो भाग इति पर्यायाः । कस्य भाग इत्या-जगती छन्द बारह अक्षर वाला है ' । इनके बाद ' निरु छन्दों से उपधान करते हैं । ऐसा कहकर पंक्ति, उष्णिकू, बृहती, अनुष्टुप् विराट्, गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती इन छन्दों की निरुक्ति कर कहा गया है कि ' विराट के साथ आठ छन्दों का उपधान करता है, पृथिवी छन्द, अन्तरिक्ष छन्द आदि इसी देवता वाले छन्दों से उनका उपधान करता है, अर्थात् अग्निदेवता, वातो देवता इत्यादि भन्नों में बताये गये देवताओं को इन छन्दों से उपधान करते हैं । ये अग्नि, वायु, सूर्य प्रभूति देवता ही छन्दोमय हो जाते हैं । यहीं बात ' अग्नि से गायत्री छन्द की निष्पत्ति हुई ' इत्यादि वाक्यों से कही गई है । यहाँ पर उत्पाद्य और उत्पादक को अभिन्न मानकर ही देवताओं को छन्द कहा गया है, सभी अर्थो की अवधकता छन्दों में नहीं हैं, अतः वे इस रूप ' देवता नहीं कहे गये है, क्योंकि इस तरह प्रकरण से विरोध हो जायगा । अन्यथा ' छन्द पशु है ' इस श्रुति के अनुसार उनको पशु भी मानना पड़ेगा | गायत्री प्रभृति छन्दों से युक्त मन्त्रों का देवतात्व पहले ही मिराकृत कर दिया गया है । इसलिये पूर्वापर सम्बन्ध का बिना ज्ञान हुए ही छन्द के नाम पर बहुत कुछ कह दिया गया है । यह कहना कि ' छन्द, मन्त्र और निगम शब्द पर्यायवाची है ' बड़ी गलत बात है । ऐसा मानने पर ऊपर उद्धृत तीन मन्त्र पद की अनुवृत्ति से ही कार्य की सिद्धि हो जाने पर तृतीय सूत्र में छन्दः शब्द का केवल मन्त्र भाग का ग्रहण होता है, ब्राह्मण पद से केवल ब्राह्मण भाग का और छन्द, ब्राह्मण भाग दोनों का ग्रहण होता है, यही कहना ठीक हैं । इस सम्बन्ध में आगे पाणिनि सूत्रों में, जो कि क्रम से पढे गये हैं, ग्रहण व्यर्थ हो जाता है । इसलिये मन्त्र पद से वेद, निगम, श्रुति इत्यादि शब्दों से मन्त्र और विस्तारपूर्वक कहा जायगा । वेद संज्ञा का विचार ' वेद किनका नाम है? मन्त्र संहिताओं का ( पू ० ९ १ ) यह उक्ति भी ठीक नहीं है । मन्त्र भाग शब्द से हो मन्त्र भाग से इतर ब्राह्मणभाग की भी सत्ता अपने आप सिद्ध हो जाती है । भाग यह अंशवाचक शब्द है । अंश, अवयव, भाग इन सबका एक
पृष्ठ 722
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
** वैवार्थपारिजातः काङ्क्षाया अवयवनसंगिनं चान्तराऽनिवृत्तेः । एतेन मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्यांशिनो द्वी भाग मन्त्रभागो ब्राह्मण-भागवचेति भागान्तरस्यापि सिद्धेः अन्यथा भागपदतैरर्थस्यापत्तेः J फलस्य धान्यराशेरयममुका भाग इत्युक्तेर्भागान्तर-सिद्धेस्तन्नान्तरीयकत्वात् । अत एव जेमिनिना - ' तच्चोदकेषु मन्त्राख्या ' ( मो ० सू ० ११११३१ ), ' शेषे ब्राह्मणशब्दः ' ( मी ० सू ० १1१1३२ ) । अर्थान्मन्त्रातिरिक्तषु वेदभागेषु ब्राह्मणशब्द इति जैमिनिता महर्षिणोक्तम् । ' विधिमन्त्रयोरे-कार्थ्यमैक्यशब्दात् ' ( मी ० सू ० १ | १ | ३० ) अर्थाद् ब्राह्मणभाग मन्त्रभागयारे स्यशब्दादर्थाद् वेदशब्दादेकार्थ्यमेव तात्पर्य-मुक्तम् । नहि नारङ्गादिफलस्यैको भागो नारङ्गोऽपरो भागः कलिन्दो भवति । ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' इति कात्यायनोक्तिरीत्या मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयत्वप्रसिद्धेः । किं ब्राह्मण rai deed नास्ति? यत्तु ब्राह्मणानां वेदसंज्ञाभावे ' पुराणेतिहाससंज्ञकत्वाद् वेदव्याख्यानाद् ऋषिभिरुक्तत्वाद् अनीश्वरोक्त-स्वात् कात्यायनभिन्नै पिभिर्वेदसंज्ञायामस्वीकृतत्वान्मनुष्यबुद्धिरचितत्वाच्च ' ( पृ ० ९ १ ) इति हेतव उक्ताः, तदपि तुच्छम्, व्यभिचारित्वादसाधकत्वादसिद्धत्वाच्च । तथा ह्यनुमानप्रयोग: - ' ब्राह्मणं न वेदः, पुराणेतिहाससंज्ञकत्वात् ' इति, तच्चायुक्तम्, हेतोरसिद्धत्वात् । ऐतरेयशतपथादिब्राह्मणेषु पुराणेतिहाससंज्ञकत्वासिद्धेः । विष्णुपुराणादिषु रामायण-महाभारतादिषु पुराणेतिहासत्यप्रसिद्धेः । यदि तु पुरातनार्थप्रतिपादकत्वेन ऐतिहासिकार्थप्रतिपादकत्वेन च पुराणत्वमिति-हासत्वं चोच्यते, तदापि न तादृशस्य पुराणेतिहाससंज्ञकत्वस्य वेदसंज्ञकत्वस्य च विरोधः, वेदसंज्ञकस्यापि ब्राह्मणभागस्य पुराणेतिहाससंज्ञकत्वसम्भवात् । अप्रयोजकण्चायं हेतुः । पुराणेतिहाससंज्ञकत्वमस्तु ब्राह्मणभागस्य वेदसंज्ञकत्वाभावो ही अर्थ है । यह किसका भाग है? यह प्रश्न जब उठना है तो वह अंशी, अवयवी को जाने बिना समाहित नहीं होता । इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि ब्राह्मण स्वरूप अंशी वेद के दो भाग हैं एक मन्त्र भाग दूसरा ब्राह्मण भाग । इस प्रकार मन्त्र भाग के अतिरिक्त ब्राह्मण भाग भी वेद का ही अंश हो जाता है । अन्यथा भाग पद का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा । फल का, धान्यराशि का यह अमुक भाग हैं, ऐसा कहने पर उसका दूसरा भाग अगत्या सिद्ध हो जाता है । इसीलिये जैमिनि ने ' सच्चोदकेषु मन्त्राख्या ', ' शेषे ब्राह्मण शब्द: ' इन दो सूत्रों से मन्नातिरिक्त वेद भाग को ब्राह्मण शब्द से जाना है । ' विधिमन्त्रयो ० ' इस सूत्र से ब्राह्मण भाग और मन्त्र भाग को एक ही वेद शब्द से बोधित माना है । नारंगी का एक भाग तो नारंगी और दूसरा भाग कलिन्द नहीं हो जाता । ' मन्त्र और ब्राह्मण दोनों का नाम वेद है ' इस कात्यायन की उक्ति के आधार पर मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद माने जाते हैं । क्या ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं हैं? ' ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हों का नाम इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी भी है । वें श्रोत नहीं है, किन्तु महर्षि लोगों के किये वेदों के व्याख्यान है । एक कात्यायन को छोड़ के किसी अन्य ऋषि ने उनके वेद होने में साक्षी नहीं दी है और वे देहधारी पुरुषों के बनाये हैं । इन हेतुओं से ब्राह्मण ग्रन्थों को वेद की संज्ञा नहीं दी जा सकती ' ( १० ९ २ ) एक बात की पुष्टि में दिये गये ये हेतु भी व्यभिचरित और प्रसिद्ध होने से साध्य की सिद्धि नहीं कर सकते । आप यह कहेंगे कि ब्रह्म वेद नहीं है, क्योंकि इसकी पुराण - इतिहास संज्ञा है । यह अनुमान ठीक नहीं है, क्योंकि यहाँ हेतु असिद्ध है । ऐतरेय, शतपथ आदि ब्राह्मणों को पुराण अथवा इतिहास नहीं कहा जाता, विष्णुपुराण, रामायण, महाभारत आदि को ही पुराण - इतिहास कहा जाता | यदि पुरातन अर्थ के प्रतिपादक होने से, ऐतिहासिक अर्थ के प्रतिपादक होने से इनको पुराण और इतिहास कहा जायगा, तो इस तरह की संज्ञा से वेद संज्ञा का कोई विरोध नहीं है, वेद संज्ञा के रहते हुए भी ब्राह्मण भाग की पुराण - इतिहास संज्ञा भी हो सकती है । यह हेतु अप्रयोजक भी है, क्योंकि इस शंका के उपस्थित होने पर कि ब्राह्मण भाग की पुराण- इतिहास संज्ञा तो रहे, किन्तु वेद संज्ञा का अभाव न रहे, इसमें क्या दूषण है? तो इस शंका का समाधायक तर्क यहाँ उपलब्ध नहीं है । इन दोनों संज्ञाओं में इस तरह
पृष्ठ 723
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
देवार्थपारिजातः ६६३ मास्तु किं दूषणमिति व्यभिचारनिवर्तकतकभावात् । न चानयोः संहयोः क्वचिद्विरोधो दृष्टचरो येन तत्साधर्म्यादन विरोधोऽनुमीयेत । यद्यच्येतेतिहासाभिधेयेषु महाभारतादिषु पुराणाभिधेयेषु श्रीमद्भागवतादिषु वेदस्वव्यवहाराभावात् पुराणेतिहाससंज्ञकत्वं वेदसंज्ञकत्वविरोधीति, तदपि न क्षोदक्षमम् त्वा तदनभ्युपगमात् । स्वीक्रियतां वा महाभारत-श्रीमद्भागवतादिषु पुराणेतिहासत्वं वेदसंज्ञाविरोधित्वं च । तथा च पुरातनार्थप्रतिपादकत्वं ब्राह्मणभागस्य न वेदसंज्ञा-विरोधित्वं वेदस्य त्रैकादिकार्थप्रतिपादकत्वस्य ' भूतं भवद् भविष्यच्च सर्व वेदात् प्रसिद्ध्यति ' ( म ० १२।९ ७ ) इति मनुस्मृतेः प्रामाण्यं व्याहरमाणेन त्वयाऽप्यङ्गीकृतत्वात् । अन्यथा कालिकार्थप्रतिपादकत्वेन पुरातनार्थप्रतिपादकस्य वेदस्याप्युक्त-हेतुनाऽवेदत्वापत्तिर्दुर्वारा । यथा चैकस्यापि कम्बुग्रीवादिमतोऽर्थस्य घटत्वं कलशत्वं चेति नानाभिधानत्वं न विरुद्धयते, तथैकस्यापि ब्राह्मण प्रन्थस्य वेदत्वं पुराणेतिहासत्वादिकं च न विरुद्धयते । वेदव्याख्यानादित्ययमपि हेतुर्न ब्राह्मणभागस्य वेदसंज्ञकत्वाभावं साधयितुमलम्, हेतोरनैकान्तिकत्वात् । तथाहि — वेदपदव्यपदेश्यवास्य कदम्वस्य पदान्तरेणार्थकथनमेव वेदव्याख्यानं भवति । तच्च वेदमन्त्रेष्वपि लभ्यते । यजुर्वेदोयस्य पुरुषसूक्तमन्त्रार्थस्यग्वेदीय पुरुषसूक्तमन्त्रेणाथर्वमन्त्रेण च कथनात् । स भूमि सर्वतः स्पृत्वाऽस्य तिष्ठद् दशाङ्गुलम् ' ( वा ० सं ० ३१1१ ), ( स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ' ( अथर्व ० १ ९ ६ २ ), ' त्रिपादूर्ध्व-सुदेत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ ' ( वा ० सं ० ३११४ ), ' एतावानस्य महिमा ' ( वा ० सं ० ३१1३ ), ' तावन्तो अस्य महिमानः ' ( अथर्व १ ९ ।६।३ ), ' ऊरू तदस्य यद्वैश्यः ' ( वा ० सं ० ३१।११ ), ' मध्यं ' तदस्य यद्वंश्यः ' ( अथर्व ० सं ० १६ / ६ / ६ ), ' ततो विराडजायत ' ( वा ० सं ० ३११५ ), ' विराङग्रे समभवत् ' ( अथर्व ० स ० १ ९।६।९ ), ' उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ' ( वा ० सं ० ३१।१ ), ' उतामृतत्वस्येश्वरो यदन्येनाभवत्सह ' ( अथर्व ० सं ० १ ९ / ६१४ ) | एवमेव मन्त्रेष्वपि शब्दभेदो द्रष्टव्य: । ' प्रजापते न त्वदेतान्यभ्यो विश्वा जातानि परितो बभूव ' ( ऋ ० सं ० ८७१५ ), ' प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परिता वभूव ' ( मा ० सं ० २३३६५ ), ' नवो नवो भवसि जायमानोऽह्नां केतुरुपसामेष्यग्रम् | भागं देवेभ्यो विदधास्यायन् प्र चन्द्रमस्तिरमे दीर्घमायुः ( अथर्व ० [ सं ० ७/८६२ ), ' नवो नवो भवति जायमानोऽह्नां केनुरुषसामेत्ययम् । भागं देवेभ्यो विदधात्यायन् प्रनन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः ॥ ' का कोई विरोध दृष्टिगोचर नहीं होता, जिसके कि सहारे यहाँ विरोध का अनुमान हो । यदि आप कहें कि इतिहास के रूप में प्रसिद्ध महाभारत आदि में और पुराण के रूप में प्रसिद्ध श्रीमद्भागवत आदि में वेद शब्द का व्यवहार नहीं होता, अतः पुराण - इतिहास संज्ञा de संज्ञा की धनी है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि आप ऐसा नहीं मानते | आप इस बात को मानते हैं कि श्रीमद्भागवत, महाभारत आदि पुराण - इतिहास है और इनका वेद संज्ञा से विरोध है, वो भी ब्राह्मण भाग का पुरातन अर्थ के प्रतिपादक होने के कारण वेद संज्ञा से विरोध नहीं होगा । वेद तीनों काल के अर्थ का प्रतिपादक है, इस बात को आपने भी ' भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ वेद से ज्ञात होता है ' इस मनुस्मृति की उक्ति को प्रमाण मानते हुए स्वीकार किया है । अन्यथा त्रैकालिक अर्थ का प्रतिपादक वेद जब पुरातन अर्थ का प्रतिपादन करने लगेगा, तो आपकी युक्ति से वह भी वेद नहीं रह जायगा । जैसे कम्बुग्रीवादि से युक्त एक ही पदार्थ के घट कलश आदि अनेक नामों से कहे जाने पर कोई विरोध उपस्थित नहीं होता, उसी तरह एक ही ब्राह्मण ग्रन्थ के वेद होने में और पुराण - इतिहास होने में भी कोई आपत्ति नहीं होगी । वेद का व्याख्यान होने से भी ब्राह्मण भाग की वेदभिनता सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि यह हेतु अनैकान्तिक हेत्वाभास से दुष्ट है | वेद पद से कहे जाने वाले वाक्यसमूह का दूसरे पों से अर्थ का कथन ही यहाँ वेदव्याख्यान कहा गया है । यह तो वेद मन्त्रों मैं भी उपलब्ध है । यजुर्वेदीय पुरुषसूक्त के मन्त्रों का अथर्ववेद के पुरुषसूक्त के सत्रों में तथा अन्यत्र भी aureure मिलता है । जैसे कि ' स भूमि सर्वतः स्पृत्वा ' इस यजुर्मंन्त्र का ' स भूमि विश्वतो वृत्वा ' यह व्याख्यान है । इसी तरह ' त्रिपादूर्ध्व ० ' इत्यादि में भी समझना चाहिये । ऊपर मूल में यजुर्वेद और अथर्ववेद के मन्त्रों को तुलनात्मक तालिका दी गई है । इसी तरह ऋग्वेद के मन्त्रों में भी शब्द भेद के द्वारा मन्त्रों का व्याख्यान मिलता है । इसके भी उदाहरण ऊपर दिये गये हैं । इस सब स्थलों में विलक्षण पदों से
पृष्ठ 724
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६६४ देदार्थ पारिजातः ( ऋ ० सं ० १० ८५११ ९ ) । अत्र मन्त्राणां विलक्षणपदघटितत्वेनैकस्य मन्त्रस्यैवार्थो विलक्षणपदघटितमन्त्रान्तरेण कथ्यते । तथा च कथं नामैकान्तिकत्वं वेदव्याख्यानादिति हेतोः । किञ्च, स्मर्यमाणकर्तृकत्वमुपधिरप्यत्र हेतौ तेन सोपाधिकत्व-मपि । यत्र यत्र महाभारतादौ वेदत्वाभावस्तत्र तत्र स्मर्यमाणकर्तृकत्वमस्ति । वेदव्याख्यानत्वं पूर्वोक्तमन्त्रेष्वप्यस्ति, स्मर्यमाणकर्तृकत्वं तत्र नास्ति । तथा च साध्यव्यापक साधनाव्यापकस्य स्मर्यमाणकर्तृकत्वस्योपाधेः सत्त्वेन हेतोः साध्यासाधकत्वेनोपाध्यभावात् पक्षे साध्याभावानुमानत्वसम्भवात् । ' ऋषिभिरुक्तत्वात् ' इत्ययमपि हेतुरहेतुरेव । ब्राह्मणानि न वेदा ऋषिभिरुक्तत्वादित्येव हि प्रयोगः । स च न युक्तः, ऋष्युक्तत्वस्य ऋगादिमन्त्रसाधारणत्वात् । अपरिगणितैर्महर्षिभिगादयो मन्त्रा अपि पठ्यन्ते । तथा च ऋष्युक्तत्वादेव नहि तेऽवेदा भवन्ति । यदि तु ऋष्युक्तत्वपदेन ऋषिप्रणीतत्वमभिप्रेतम्, तदापि न ब्राह्मणेभ्य इतरे वेदाः सिद्धयन्ति तेषामपोरुषेयत्वेन ऋषिप्रणीतत्वासिद्धचा हेतोः स्वरूपासिद्धत्वात् । यच्च - ' याज्ञवल्क्यजनकादिसंवादानां ब्राह्मणेषु सत्त्वात् तेषामृषिप्रणीतत्वमिति ', तदप्यनवगतवेदसम्प्रदायस्यैव शोभते, वेदेष्वतीतानागतवर्त मानसन्निकृष्ट विप्रकृष्टादिसकलार्थ वेदकत्वेऽपि वेदत्वानपायात् । लौकिकान्येव वाक्यानि प्रमा-णान्तरेणार्थमुपलभ्य प्रयुज्यन्ते, वैदिकानि तु वाक्यानि नित्यानि प्रमाणान्तरेणार्थज्ञाननैरपेक्ष्येण पूर्वानुपूर्वी सव्यपेक्षमेवो-च्चार्यन्ते । तथाहि प्रातिशाख्ये कात्यायनो लौकिकानामर्थ पूर्वकत्वादित्याह । तेनार्थपूर्वको लौकिकपदप्रयोगः । वैदिकानां पुननित्यानां वाक्यानां नार्थ पूर्वकः प्रयोगः सङ्गच्छते । ततश्च वस्तुसद्भावमनपेक्षमाणा वेदा लोकवृत्त मवगमयन्तो याज्ञवल्क्य-जनकादिसंवादमभिदधीरन् यदि, तदापि न काचित् क्षतिः । लोकेऽपि सुखावबोधार्थाख्यायिका भवति वस्तुवृत्तानपेक्षा । अन्यथा ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' ( ऋ ० सं ० १० १ ९ ०१३ ) इत्यादिमन्त्राणामुर्वशीपुरूरवोयमयम्यादि-after एक मत्र की अन्य विलक्षण पदों से व्याख्या की गई है । इस तरह ' वेदव्याख्यानात् ' यह हेतु एकान्त रूप से ब्राह्मण भाग में ही न रह कर मन्त्र भाग में भी रहता है, अतः अनैकान्तिक हेत्वाभास से दुष्ट है । दूसरा दोष इसमें स्मर्यमाणकर्तृक रूप उपाधि भी है, अतः यह हेतु सोपाधिक है । जहाँ जहाँ महाभारत आदि में वेद का अभाव सिद्ध है, वहाँ वहाँ सब जगह उनका कर्ता मालूम है । वेद की व्याख्याता पूर्वोक्त मन्त्रों में हैं, किन्तु उनका कोई कर्ता प्रतीत नहीं है | अतः उक्त हेतु सोपाधिक है । फलतः साध्य में व्यापक और साधन में अव्यापक स्मर्यमाणकर्तृक उपाधि के होने हेतु साध्य की सिद्धि नहीं कर सकेगा और उपाधि के रहते से पक्ष में साध्याभाव का अनुमान संभव हो सकेगा । ब्राह्मण ऋषियों के द्वारा उक्त है, यह हेतु भी गलत है । यहाँ पर अनुमान इस प्रकार बनेगा --- ब्राह्मण वेद नहीं है, क्योंकि वे ऋषियों के द्वारा उक्त हैं । यह ठीक नहीं है, क्योंकि ऋग आदि के मन्त्र भी तो समान रूप से ऋषियों के द्वारा उक्त है । अपरिगणित महर्षिगणों के द्वारा ऋक् आदि के मन्त्र पढ़े गये हैं । इस तरह ऋषि के द्वारा उक्त होने से वे वेद से बाहर नहीं हो जाते । यदि ' ऋयुक्त ' पद से ' ऋषि के द्वारा प्रणीत ' यह अर्थ अभिप्रेत है, तो भी वेद ब्राह्मण से भिन्न नहीं सिद्ध होते, क्योंकि ये सब अपौरुषेय हैं, अत: इनमें ऋषिप्रणीतता की सिद्धि के अभाव में हेतु स्वरूपासिद्ध हो जायगा । ' ब्राह्मण ग्रन्थों में याज्ञवल्क्य जनक आदि का संवाद निकद्ध है, अतः ये ऋषि प्रणीत है यह उक्ति भी वेद के सम्प्रदाय को न समझने वाले को ही शोभा दे सकती है, क्योंकि वेद में अतीत, अनागत, वर्तमान, सन्निकृष्ट विप्रकृष्ट आदि सकल अर्थो को rastana रहने पर भी उसका वेदत्व नष्ट नहीं होता | लौकिक वाक्यों का ही प्रयोग दूसरे प्रमाणों से अर्थ की उपलब्धि के बाद होता है । वैदिक वाक्य तो निश्य हैं, दूसरे प्रमाणों से अर्थज्ञान के बिना भी पहले की आनुपूर्वी के अनुसार इसका उच्चारण होता है । अपने प्रातिशाख्य में कात्यायन ने लौकिक वाक्यों का प्रयोग अर्थज्ञान पूर्वक बताया है । इसलिये लौकिक पदों का प्रयोग उनके अर्थ-ज्ञान के बाद ही होता है । वैदिक वाक्य तो नित्य हैं, इसलिये उनके प्रयोग में अर्थज्ञानपूर्वकता नहीं बन सकती । इस प्रकार वस्तु की सत्ता की बिना अपेक्षा किये वेद लोकवृत्त को बताते हुए याज्ञवल्क्य जनक आदि के संवाद को कहते हैं, इसमें कोई दोष नहीं है । लोक मैं भी अनेक आख्यायिकाएं ऐसी हैं, जिनका कि वस्तुस्थिति से कोई संबन्ध नहीं रहता । यदि ऐसा न माना जाय तो ' धाता ने सूर्य
पृष्ठ 725
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः ६६५ संवादपराणां च मन्त्राणामवेदत्वापत्तिः स्यात् । यथैव जनकयाज्ञवल्क्यादिसंवादस्य ब्राह्मणेषु दर्शनाद् जनककालानन्तर-कालवृत्युत्पतिमत्त्वं ब्राह्मणानां परिकल्प्यते तथैव मन्त्राणामपि सूर्यचन्द्रो वैश्यादिकालानन्तरकालोत्पत्तिकत्वेनानित्य-स्वमेवापद्येत । तस्माद्यथा सूर्यचन्द्राद्युत्पत्तिवोधकोऽपि मन्त्रो न तदुत्पत्तिकालोत्तरकालोत्पत्तिमान्, वेदवाक्यानामर्थ-पूर्वकत्वनियमविरहात्, तथैव ब्राह्मणवाक्यानामप्यर्थपूर्वकत्वाभावात् सुखावबोधार्यं याज्ञवल्क्यजनकादिसंवादबोधनेऽपि नानित्यत्वम् । यथा पाश्चात्त्या वेदेषु नदी पर्वत - वन पशु- मनुष्यादीनां विविधतामदर्शनादेव तदनन्तरकालिकत्वं कल्पयन्ति, तामेव सरणिमनुसरन्ति ब्राह्मणभागेषु सामाजिका इति पाश्चात्त्या इव तेऽप्यपाकरणीयाः । किञ्च, ' लौकिकानां हि साधूनामर्थं बागनुवर्तते । ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ॥ ' ( उत्तर-रा ० ० १ १० ) इति रीत्या यदा विशिष्टानामृषीणामप्यर्थनिरपेक्षभविष्यदादिवक्तृत्वसामर्थ्यं भवति, तदा परमेश्वर निःश्वासभूतेषु वेदेषु भूतभव्यभविव्यबोधकत्वे का नामानुपपत्तिः? ' भूतं भव्यं भविष्यच्च सर्व वेदात् प्रसिद्धयति ' ( म ० १२१ ९ ७ ) इति मनुस्मरणात् । वेद इन्द्रवस्वादिपदानां प्राड्विवाकाश्वित् स्थानविशेषबोधकत्वेन जननमरणवतामपि संवादादिवर्णने न वेदानां पौरुषेयत्वमित्यपि देवताधिकरणे प्रोक्तमेव । तस्मान्न मन्त्रब्राह्मणभागयोऋ षिप्रणीतत्वं न वा तेन तयोः पौरुषेयत्वमवेदत्वं च सिद्धयति, चोद्यपरिहारयोः समानत्वात् । ब्राह्मणानां यद्यप्यृषिकृतत्वं न श्रूयते, तथापि मन्त्राणामृषिकृतत्वं ब्राह्मणेषु मन्त्रेषु चोक्तमेव । तथाहि - ' सूर्य ऋषिमंत्रकृत् ' ( ऐ ० ब्रा ० ६१ ), ' यत्र धीरा वाचमकत ' ( ऋ ० सं ० १० / ७१।२ ), ' ऋषि: कुत्सो भवति कर्ता स्तांमानित्योपमन्यवः ' ( नि ० ३३२ ), ' ऋषे मन्त्रकृतां स्तोमैः ' ( ऋ ० सं ० ९ / १४ / २ ) इत्यादिवाक्यैर्मन्त्राणामृषिकृतत्वेन मन्त्राणामेवावेदत्वापत्तिस्त्वद्रोत्या | सिद्धान्ते तु ' वाचा विरूपनित्यया ' ( ऋ ० सं ० ८७५/६ ) इति मन्त्रानुरोधेन दर्शतं सम्प्रदायप्रदर्शनमेव तेषां मन्त्रकर्तृत्वम् । और चन्द्रमा को पहले की भांति बनाया ' इत्यादि मन्त्रों को, उर्वशी- पुरूरवसंवाद, यम यमी संवाद इत्यादि के प्रतिपादक मन्त्रों की वेदता नहीं बन पावेगी । जैसे जनक - याज्ञवल्क्य के संवाद को ब्राह्मणों में देख कर यह कल्पना की जाती है कि ये ब्राह्मण जनक के काल के बाद में बने, उसी तरह मन्त्रों की भी रचना सूर्य, चन्द्र, उर्वशी आदि के समय के उपरान्त होने से उनकी अनित्यता माननी पड़ेगी । इसलिये जैसे सूर्य, चन्द्र आदि की उत्पत्ति के बोधक मन्त्र की उत्पत्ति बाद में नहीं मानी जाती, क्योंकि वे araat st अर्थज्ञानपूर्वकता नहीं मानी जाती, उसी प्रकार ब्राह्मण वाक्यों को भी अर्थज्ञानपूर्वकता के न मानने से और लौकिक आख्यानों के समान जनक - याज्ञवल्क्य आदि के संवादों की चरितार्थता सुखपूर्वक वैदिक वस्तु को समझाने में होने से अनित्यता नहीं मानी जायगी । जैसे पाश्चात्य विद्वान् वेदों में नदा, पर्वत, वन, पशु, मनुष्य आदि के भांति भांति के नाम देखकर वेदों को उनके बाद की रचना मानते हैं, उन्हीं का अनुसरण करने वाले आर्यसमाजी उन्हीं की पद्धति को स्वीकार कर ब्राह्मण भाग के विषय में वही बात कहते हैं, अतः पाश्चात्य मत के समान इस मत का भी खण्डन आवश्यक है । ' लौकिक सज्जन व्यक्तियों की वाणी अर्थका अनुधावन करती है । इसके विपरीत आद्य प्राचीन ऋषियों की वाणी का अर्थ अनुगमन करता है ' इस भवभूति की उक्ति के अनुसार जब विशिष्ट ऋषियों की वाणी भी बिना अर्थ की अपेक्षा के भूत, वर्तमान ओर भविष्य का rate कराती है तो परमेश्वर के निःश्वासभूत वेदों को भूत, वर्तमान और भविष्य अर्थ का अवबोधक मानने में क्या आपत्ति हो सकती है? मनुस्मृति में स्पष्ट बताया गया है कि भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ वेद से सिद्ध होता है । यह हमने देवताधिकरण में बताया है कि प्राड्विवाक, न्यायाधीश आदि शब्दों की भांति इन्द्र, वसु आदि शब्द स्थानविशेष में स्थित व्यक्ति के वाचक हैं, अतः इनके जनन - मरशील मानने पर भी, इनमें संवाद का वर्णन होने पर भी वेब की पौरुषेयता नहीं सिद्ध होगी । इस तरह से मन्त्र और ब्राह्मण भाग की न तो ऋषिप्रणीतता मानी जायगी न हो वे पौरुषेय होंगे और न उनकी aafnant ही सिद्ध हो सकेगी, क्योंकि जो आक्षेप आप ब्राह्मणभाग पर लगाते हैं, वह मन्त्रभाग पर भी लागू होता है और उस आक्षेप के मन्त्रभाग पर लागू होने पर आप उसका जो समाधान देते हैं, वही ब्राह्मणभाग के आक्षेप का भी उत्तर हो जाता है । ब्राह्मणों की ऋषिप्रणोवता यद्यपि नहीं सुनी जाती, तो भी मन्त्रों की ऋषिप्रणीतता ब्राह्मण और मन्त्रभाग दोनों में श्रुत है । ऊपर दिये गये मन्त्रों के आधार
पृष्ठ 726
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६६६ वेदार्थपारिजातः यदपि - ब्राह्मणानि न वेदा अनीश्वरोक्तत्वादिति, तदपि तुच्छम् ऋष्युक्तखण्डनेनैव खण्डितत्वात् पुन-रुक्ततारूपनिग्रहस्थानाच्च । यदि स्वीश्वरानुक्तत्वमेव तदर्थः, तदापि न तत्सनातनिनामनिष्टकरम्, वेदेषु तैरीश्वर-विरचितत्वानङ्गीकारात् । नैयायिकादयो यूयं सामाजिकाश्च परमेश्वरनिर्मितत्वं वेदस्याङ्गीकुरुथ, कृतकानां नित्यत्व-व्याहतत्वात्, ईश्वरेणापि पूर्वकल्पीयां वेदानुपूर्वीमनुसृस्यैवोत्तरकल्पीय वेदानुपूर्व्या उपदिष्टत्वाच्च । यदपि कात्यायनभिन्नै षिभिर्वेदसंज्ञायामस्वीकृतत्वाद् ब्राह्मणभागस्यावदत्वमाशङ्कितम्, तदपि तुच्छम्, यस्य कस्याप्राप्तत्वेन प्रामाण्याविशेषात् । अन्य ऋ षिभिरनुक्तत्वेऽपि कात्यायनेन महर्षिणा मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञास्वी-कारेण ब्राह्मणानामवेदत्वशङ्कापरिहारसम्भवात् । ' बुद्धिरादैच् ' ( पा ० सू ० १1१1१ ), ' वृद्धाच्छ: ' ( पा ० सू ० ४।२ । ११४ ) इत्यादिभिः पाणिनिनैव वृद्धयादिसंज्ञाया उक्तत्वेऽपि यथा तत्संज्ञायां न विप्रतिपत्तिः, तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । ननु मा भूत्पाणिन्युपज्ञे व्याकरणे पाणिनिकृतसंज्ञासु कस्यचिद्विप्रतिपत्तिः, वेदसंज्ञायां तु न तथा कात्यायनोपज्ञतेति चेत्र, अस्मिन् विषये दयानन्दस्य सर्वथानभिज्ञताख्यापनात् । तथाहि - मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमिति रीत्याऽऽपस्तम्बमहर्षिणा मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञास्वीकारात् 1 । अन्येरपि महर्षिभिर्वेदसंज्ञा स्वीकृता । यथा बौधायनगृह्यसूत्रे ( २ | ६ | ३ ), बौधायन-धर्मसूत्रे ( २१ ९ १७ ) च । आपस्तम्बश्रौतसूत्रे ( २४ | ११३१ ), सत्याषाढश्रीतसूत्रे ( १ | १ | ७ ), कात्यायनपरिशिष्टप्रतिज्ञासूत्रे ( २ ) च ' बेदं च समाप्य स्नायात् ' इति प्रसङ्गे, एवं ' विधिविधेयस्तर्कश्च वेदः ' इति पारस्करगृह्यसूत्रे च मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञा स्वीकृतानेकैर्महर्षिभिः । तस्मात् कात्यायनभिन्नैर्महर्षिभिर्वेदसंज्ञाया अस्वीकृतत्वाद् इति कथनं दयानन्दस्य दुःसाहसं धूलिप्रक्षेप मज्ञजनप्रतारणपरायणत्वं च सूचयति । ' शेषे ब्राह्मणशब्द: ' ( मी ० सू ० २1१1३० ) इत्याद्यनेकै: सूत्र जैमि पर मन्त्रों की ऋषिप्रणीतता सिद्ध है, अतः आपकी पद्धति से तो मन्त्रभाग को ही वेदभिन्नता सिद्ध हो जायगी । हमारे मत में तो ' बाचा विरूपनित्यया ' इस श्रुति के आधार पर दर्शन पद का अर्थ संप्रदाय प्रदर्शन होगा, यही उनकी मन्त्रकर्तृता मानी जायगी । अमीश्वरोत्व हेतु से ब्राह्मण भाग की afr नता मानना भी गलत है । ' ऋष्युक्त ' हेतु के खण्डन से यह भी खण्डित हो जाता है । इसमें एक नया दोष पुनरुक्तता रूप निग्रहस्थान भी है । ईश्वर के द्वारा नहीं कहे गये, इस अर्थ के कहने पर भी सनातनियों के मत से दोष नहीं आवेगा, क्योंकि वे तो स्वयं ही उसको ईश्वर विरचित नहीं मानते । नैयायिक तथा आप लोग वेद को ईश्वर कृत मानते हैं । कृतकता नित्यता को नष्ट कर देती है, अतः यही मानना उचित है कि ईश्वर भी पूर्व कल्प की वेदानुपूर्वी का अनुसरण कर उत्तर कल्प की वेदानुपूर्वी का उपदेश देता है । एक कात्यायन को छोड़कर किसी अन्य ऋषि ने ब्राह्मण भाग के वेद होने में साक्षी नहीं दी है, यह कथन भी दमदार नहीं है, क्योंकि एक भी आप्त ऋषि का प्रामाण्य अव्याहत है । दूसरे ऋषियों के न कहने पर भी केवल कात्यायन महर्षि के द्वारा मन्त्र और ब्राह्मण की वेद संज्ञा मान लेने पर ब्राह्मणों की career की आशङ्का निर्मूल हो जायगी । केवल पाणिनि ही वृद्धि आदि संज्ञाओं का उपदेश देते हैं, एतावता एक ऋषि के उक्त होने पर भी जैसे वहाँ पर कोई विवाद नहीं उठता, उसी तरह यहाँ भी समझना चाहिये । प्र है कि टाध्यायो व्याकरण शास्त्र का तो स्वयं पाणिनि ने ही सर्वप्रथम उपदेश दिया है, अतः वहाँ तन्निर्दिष्ट परिभाषाएं rate प्रमाण मानी जायगी, किन्तु वेद संज्ञा का तो सर्वप्रथम उपदेश कात्यायन ने नहीं किया है, अतः यह तो विवाद का विषय बना हो रहेगा । इस पर हमारा कहना है कि इस विषय को दयानन्द ने ठीक से नहीं समझा है, क्योंकि ' सत्य और ब्राह्मण का नाम वेद है ' इस कथन के अनुसार आपस्तम्ब महर्षि ने भी मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद माना है | इसी तरह अन्य ऋषियों ने भी दोनों को वेद माना । जैसे कि बौधायन गृह्यसूत्र में और बौधायन धर्मसूत्र में । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र में, सत्याषाढ श्रौतसूत्र में, कात्यायन परिशिष्टवर्ती प्रतिज्ञासूत्र में और ' वेद को समाप्त कर स्नातक ब ' इस प्रसङ्ग में आये ' विधि, विधेय और तर्क को वेद संज्ञा है ' इस पारस्करगृह्यसूत्र में अनेक ऋषियों ने मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद माना है । इसलिये कात्यायन से भिन्न किसी महर्षि ने ब्राह्मण को वेद नहीं माना है, दयानन्द का यह कथन केवल उनके
पृष्ठ 727
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
येवार्थपारिजातः ६६७ निनापि मन्त्रातिरिक्तषु वेदभागेषु ब्राह्मणशब्दः प्रयुक्तः । ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ' ( कणादसूत्रे ६।१1१ ) इति सूत्रेण कणाद महर्षिरपि ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादिवाक्यानां निर्दोषस्वतन्त्रसर्वज्ञपुरुष कर्तृकत्वमाह । ' ब्राह्मणे संज्ञाकर्म सिद्धिलिङ्गम् ' ( वैशेषिकसूत्रे ६।११२ ) इति सूत्रेण यथा पिता लोके स्वपुत्रस्य विष्णुमित्रादिनामकरणं करोति, तथैव ब्राह्मणभागे ' उद्भिदा यजेत ', ' अभिजिता यजेत ' इत्यादिभिरुद्भिदादिनामकरणं करोति परमेश्वरः । तस्मात् परमेश्वरकर्तृक एव ब्राह्मणग्रन्थः । किं बहुना, मनु व्यास - पाणिनि पतञ्जलिप्रभृतयः सर्वेऽप्यास्तिका ब्राह्मणभागस्य वेदसंज्ञामङ्गीकुर्वन्ति । शावरभाष्यस्य प्रामाण्यमङ्गीकरोति दयानन्दः सत्यार्थप्रकाशे | ' शेषे ब्राह्मणशब्द: ' ( मि ० सू ० २ | १ | ३० ) इत्यत्र शावरभाष्ये ' मन्त्राश्च ब्राह्मणं च वेदः, तत्र मन्त्रलक्षण उक्ते परिशेषसिद्धत्वाद् ब्राह्मणलक्षणमवचनीयम् ' इत्युक्तम् । यत्तु केनचित्सामाजिकेनोक्तम्- ' प्रतिज्ञापरिशिष्टं कात्यायनमहर्षिप्रोक्तमित्यमनुतोऽपि ग्रन्थकारस्य दुर्जन-तोषन्यायेन प्रोक्त ' स्वीकृत्येदमुक्तम् ' ( कात्यायनभिन्नैरित्यादि ) । तत्तु दयानन्दोक्तिविरुद्धमेव तेन तत्रास्वारस्यानभि-व्यञ्जनात् । यदपि तेनैव ' दयानन्देन कृष्णयजुषः श्रौतसूत्राणि नैव दृष्टानीति नैव वक्तुं शक्यते, स्वकीय ग्रन्थेष्वा-पस्तम्बादिवचनानामुद्धृतत्वात् किन्तु तस्यायं विशिष्टोऽभिप्रायो यन्मन्त्ररूपाणामृग्यजुःसामाथर्वश्रौतसूत्रप्रवक्तृषु कात्यायनभिन्नैषिभिःसामाथर्वश्रौतसूत्रकारैर्ऋषिभिरेतादृशस्य वचनस्यानुक्तत्वमिति तत्तुच्छमेव तद्वचन-विरुद्धत्वात् । नह्यापस्तम्बबौधायनपारस्करादयो नर्षयः, त्यद्रीत्यापि तद्वचनानामार्षत्वेनैवोद्धतत्वात् । किञ्च नहि मनुष्यास जैमिनिपाणिनिप्रभृतयः सर्वेऽपि कृष्णयजुः शाखिन एव । यत्तु -- ' कृष्णयजुषः सर्वासु संहितासु मन्त्रब्राह्मणयोः सम्मिश्रणं प्रत्यक्षमिति हेतोस्तत्सूत्रकाराणां परिभाषाप्रकरणे तादृश्याः पारिभाषिक्या वेदसंज्ञायाः करणं न दोषः, दुःसाहस, धूलिप्रक्षेप और अनजान आदमी को ठगने की प्रवृति का परिचायक है । ' शेष वेद के लिये ब्राह्मण शब्द प्रयुक्त होता है ' इत्यादि अनेक सूत्रों से जैमिनि ने भी मन्त्र से अतिरिक्त वेद भाग के लिये ब्राह्मण शब्द का प्रयोग किया है । ' वेद की वाक्य - रचना बुद्धि-पूर्वक है ' इस सूत्र में महर्षि कणाद ने ' स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे ' इत्यादि वाक्यों का कर्ता निर्दोष, स्वतन्त्र, सर्वज्ञ पुरुष को माना है । ' ब्राह्मण भाग में परिदृश्यमान संज्ञाशब्द सर्वज्ञ पुरुष की सिद्धि में हेतु है ' इस सूत्र से प्रतीत होता है कि जैसे लोक में पिता अपने पुत्र का विष्णुमित्र आदि नाम रखता है, उसी तरह ब्राह्मण भाग में ' उद्भिद् याग से यजन करें ', ' अभिजित् याग से यजन करें ' आदि स्थलों में परमेश्वर हो इन नामों की रचना करता है । इसलिये ब्राह्मण भाग भी परमेश्वर का ही रचा हुआ है । मनु, व्यास, पाणिनि, पतंजलि प्रभृति सभी आस्तिक ब्राह्मण भाग को भी वेद ही मानते हैं । सत्यार्थप्रकाश में दयानन्द ने शावर भाष्य को प्रमाण माना है । ' शेष ' इत्यादि उक्त मीमांसा सूत्र के शावर भाष्य में ' मन्त्र और ब्राह्मण वेद हैं, मन्त्र के लक्षण के कह देने पर परिशेष सिद्ध होने से ब्राह्मण के लक्षण के कथन की आवश्यकता नहीं है ' ऐसा कहा गया है । यह जो किसी आर्यसमाजी ने कहा है कि ' प्रतिज्ञापरिशिष्ट कात्यायन मुनि का बनाया हुआ है, यह न मानते हुए भी ग्रंथकार ने ' तुष्यतु दुर्जन: ' इस न्याय से उसकी बात को मानकर ' कात्यायन भिन्न ' शादि वाक्य कहा है, यह बात दयानन्द के कथन के विरुद्ध है, क्योंकि उन्होंने कहीं भी अपने अस्वारस्य की अभिव्यक्ति नहीं की है । उसी व्यक्ति का यह कथन भी ' दयानन्द ने कृष्ण यजुर्वेद के श्रौतसूत्र नहीं देखे थे, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उन्होंने अपने ग्रन्थों में आपस्तम्ब आदि के वचनों को उद्धृत किया है | इस प्रसङ्ग में उनका विशिष्ट अभिप्राय यह है कि मन्त्र रूप ऋक्, यजुः साम और अथर्ववेद के श्रौतसूत्रकारों में कात्यायन से भिन्न अन्य ऋषियों ने ऐसा नहीं कहा ', व्यर्थ है, क्योंकि यह दयानन्द की उक्ति के विरुद्ध 1 आपस्तम्ब, बौधायन, पारस्कर आदि ऋषि नहीं है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आपने भी आर्षवचन के रूप में ही उनको उद्धृत किया है । मनु, व्यास, जैमिनि, पाणिनि प्रभूति सभी कृष्णयजुर्वेद के ही अध्येता नहीं थे । यह जो कहा गया है कि कृष्ण यजुर्वेद की सभी संहिताओं में मन्त्र और ब्राह्मण का संमिश्रण प्रत्यक्ष है, अतः उस वेद के सूत्रकारों का परिभाषा प्रकरण में वेद की इस प्रकार की परिभाषा करना अनुचित नहीं है । ८८
पृष्ठ 728
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
I darniture: पारिभाषिक संज्ञा स्वस्मिन् ग्रन्थ एव प्रवर्तते न ततोऽन्यत्रेति न सामान्यरूपेण ब्राह्मणानां वेदत्वबोधनाय सो समर्था ' इति, तदपि कुशकाशावलम्बनम्, तथात्वे मन्त्राणामपि वेदसंज्ञाऽसिद्धघापातात् । अन्यैर्ऋ षिभिस्तु मन्त्राणामिव ब्राह्मणानामपि तत्र तत्र वेदत्वमुक्तमेव । किञ्च, कात्यायनादिभिर्यज्ञपरिभाषाऽपि कृता । सैव च सर्वेष्वास्तिकग्रन्थेष्वभिमता | कृष्णयजुषः संहि-तासु मन्त्रब्राह्मणयो: सम्मिश्रणदर्शनादपि मन्त्रब्राह्मणयोरुभयोरपि वेदत्वमेव सिद्ध्यति, वेदत्वाविशेषात् । व्यासकतु का-विभागात् पूर्व सर्वो s पि मन्त्रब्राह्मणात्मको वेदराशिरेक एवासीत् । तत एव मन्त्रसंहिताभागो ब्राह्मणभाग इति व्यवहारः, तथा ' शेषे ब्राह्मणशब्द: ' ( मी ० सू ० २/१/३० ) इत्यादीनि प्रमाणानि च सङ्गच्छन्ते । किञ्च, कौषीतकि-सूत्ररीत्यापि मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदत्वं सुश्लिष्टम् । कौशिकसूत्रमथर्ववेदीयम् । तत्रापि -- ' आम्नायः पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च ' ( १३३ ) इति मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञा निर्विवादा | ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनाम प्रोक्तमृगादिषु । ' ( ४/२७१ ) इति शुक्र-नीतिरपि मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदत्वं मनुते । वस्तुतस्तु स्वामिदयानन्देन आपस्तम्बादिसूत्राणि पूर्वोक्तानि च सूत्राणि न दृष्टानीत्येव वक्तुं युक्तम् । यथा कणादसूत्राणि तेन यद्यप्युद्धृतानि } तथापि शब्दानित्यत्वप्रतिपादकानि कणादसूत्राणि तेन नैव दृष्टानीत्येव वक्त सुशकम्, यतो हि कणादसिद्धान्तविरुद्ध शब्दनित्यत्वं कणादनाम्ना तेन प्रतिपादितम् । एवमेवापस्तम्बादिसूत्रग्रन्थाः कदाचिद् दृष्टा भवेयुरपि तथापि पूर्वोद्धृतानि सूत्राणि तु दृष्टान्येव । तत एव कात्यायनभिन्नैर्ऋ षिभिर्मन्त्र-ब्राह्मणयोर्वेदत्वं नोक्तमित्युक्तम् । यदा सामाजिकानां समक्षं सनातनिभिवधायनापस्तम्वादिनानासूत्राण्युपस्थापितानि तदानीमिदमेवोचितमासीत्, यतैरपि ब्राह्मणानामपि वेदत्वमङ्गीक्रियेत, दयानन्दस्य भ्रान्तिः स्वोक्रियेत, परं तैस्तु कात्यायनेन मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदत्वमुक्तमिति दयानन्दीयं सत्यमपि वचनमन्यथा कृतम् । पारिभाषिक संज्ञा अपने ग्रन्थ में ही लागू हो सकती है, इसलिये वह अम्यत्र भी सामान्य रूप से ब्राह्मण भाग को भी वेद बताने में समर्थ नहीं हो सकती, यह बात नदों में बहते हुए व्यक्ति के किनारे में उगे हुए कुश अथवा काश को पकड़ने के बराबर है, क्योंकि ऐसा मानने पर मन्त्रों की भी वेद संज्ञा न बन पावेगी । अन्य ऋषियों ने अनेक स्थलों पर मन्त्रों के समान ब्राह्मणों को भी वेद ही माना है । एक बात और है । कात्यायन आदि ने यज्ञ की परिभाषा भी की है । उसी को सभी आस्तिक ग्रन्थों में माना गया है । कृष्ण यजुर्वेद की संहिताओं में मन्त्र और ब्राह्मण का संमिश्रण होने से भी मन्त्र और ब्राह्मण भाग वेद माने जायेंगे | व्यास के द्वारा किए गए विभाग से पहले सारा मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदराशि एक ही था । उसके बाद ही यह मन्त्र संहिता भाग है, यह ब्राह्मण भाग है, इस प्रकार का व्यवहार और ' अवशिष्ट भाग में ब्राह्मण शब्द प्रयुक्त होता है ' इत्यादि मीमांसा सूत्रों की सङ्गति बैठती है । अपि च, atrife सूत्र के प्रमाण से भी मन्त्र और ब्राह्मण भाग की वेदता स्पष्ट है । अथर्ववेद के कोशिक सूत्र में ' मन्त्र ओर ब्राह्मण आम्नाय अर्थात् वेद हैं ' इस प्रकार मन्त्र और ब्राह्मण की निर्विवाद रूप से वेद संज्ञा मानी गई है । ' मन्त्र और ब्राह्मण का ॠग्वेद आदि में वेद नाम बताया गया है इस प्रकार शुक्रनीति भी मन्त्र और ब्राह्मण को वेद मानती है । वास्तव में यही कहना उचित है कि स्वामी दयानन्द यहाँ पर उद्धृत आपस्तम्ब आदि सूत्रों को नहीं देख पाए थे । जैसे ff उन्होंने कणाद के सूत्रों को उद्धृत किया है, तो भी शब्द की अनित्यता के प्रतिपादक कणाद सूत्रों पर उनकी दृष्टि नहीं गई, यह आसानी से कहा जा सकता है, क्योंकि कणाद के सिद्धान्त के विरुद्ध शब्दनित्यता का उन्होंने कणाद के नाम से प्रतिपादन किया है । इसी तरह आपस्तम्ब आदि सूत्र ग्रन्थों को कदाचित् उन्होंने देखा भले ही हो, तो भी पूर्वोद्धृत सूत्रों को वे नहीं देख पाये । इसीलिए उन्होंने कह दिया कि कात्यायन से भिन्न अन्य किसी ऋषि ने मन्त्र और ब्राह्मण को वेद नहीं माना है । जब आर्यसमाजियों के सामने सनातनियों ने बौधायन, आपस्तम्ब आदि नाना सूत्रों को प्रमाण रूप में उपस्थित कर दिया, तो उनके लिये यही उचित था कि वे भी ब्राह्मणों की वेदता स्वीकार कर दयानन्द को भ्रान्ति को मान लेते, किन्तु उन्होंने तो कात्यायन ने ही वेद और ब्राह्मण को वेद माना है, दयानन्द के इस तथ्य को भी तोड़ मरोड़ दिया है ।
पृष्ठ 729
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दार्थपारिजातः ६६६ यत्तु ' परिभाषाप्रकरणोक्तत्वात् तद्ग्रन्थेष्वेव सा संज्ञाऽङ्गीकार्य नान्यत्र ' इति कथनम्, तदपि तुच्छम् यत्र हि वृद्धिगुणादिशब्दा अन्यार्थेषु प्रसिद्धाः सन्ति, तत्रैव गुणवृद्ध्यादिसंज्ञानां सङ्कोचः । वेदशब्दस्तु केवले मन्त्रे न क्वापि प्रसिद्धः । धात्वर्थानुरोधेन तु ज्ञानमेव तदर्थ: । ' वेदं कृत्वा बेदिं करोति ' इत्यादौ तु कुशमुष्टौ वेदशब्दः प्रसिद्धः । तस्मा-मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमिति वैदिकानामेव संज्ञा । यथा कोशादिभिः सास्नादिमद्व्यक्तिविशेषस्य गौरिति नामकरणम्, तथाऽनादिसिद्धनामनामिसम्बन्धी महर्षिभिर्वोध्यते । अन्यथाऽनेन कृष्णयजुर्वेद एव मन्त्राणामपि वेदसंज्ञापि कृष्णयजुर्वेद एव स्यात् । अपौरुषेयवाक्यत्वादेव मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञा । अपौरुषेयवाक्यत्वं च सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाण-कर्तृ कत्वमेव | ' तुल्यं साम्प्रदायिकम् ' ( मीमांसासूत्रे ११२८ ) इत्यनेन सम्प्रदायाविच्छेदादेवार्थवादानामपि प्रामाण्य-मुक्तम् | यदि ह्यापस्तम्बबौधायनादयो नर्षयः कृष्णयजुर्वेदो न वेदस्तर्हि तद्रीत्या कथङ्कारं कृष्णयजुर्वेदीयमन्त्रब्राह्मणयो-रपि वेदत्वं स्यात्? परमेतत्तु सामाजिकानां मस्तिष्कविकारमात्रम् । ते हि प्रामाणिकग्रन्थानामपि क्षेपकत्वं घोषयन्ति । सर्याक्रमकारैस्तु वैदिकप्रसिद्ध यनुरोधेनैव काण्व माध्यन्दिनीयमन्त्राणां ब्राह्मणानां च निर्णयः कृतः । प्रसिद्ध नुरोधेनैव ' वसन्ताय कपिञ्जलानालभते ' ( वा ० सं ० २४/२० ) इत्यादीनां विधायकानामपि मन्त्रधर्मेण पठनात् त्वमङ्गीयते, तत्सम्बन्धिब्राह्मणान्तराभावाद् ब्राह्मणत्वमपि । यदपि तेनैवोक्तम् -- ' यज्ञकर्मेसु कृष्णयजुःशाखिनां प्राधान्यम्, तत एव कृष्णयजुःशाखाप्रसिद्धमन्त्रब्राह्मण-लक्षणं शुक्लयजुः शाखिभिरपि याज्ञिकंगृहीतम् । तत एव कात्यायनपरिशिष्टे कात्यायननाम्ना केनचिन्मन्त्रब्राह्मणयो वेदनामधेयमिति सूत्र लिखितम् ' इति, तदपि निराधारतया प्रलाप एव, यज्ञकर्मणां सर्वास्वेव शाखासु प्राधान्यदर्शनात् । तदेतत् सत्यं ' मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि ' इति मन्त्रेण स्पष्टं ज्ञायते । ऋषिभि ' परिभाषा प्रकरण में उक्त होने से यह परिभाषा उन्हीं ग्रन्थों में स्वीकार्य है, अन्यत्र नहीं ' यह कथन भी व्यर्थ है, क्योंकि जहाँ पर वृद्धि, गुण आदि संज्ञा दूसरे अर्थों में प्रयुक्त होती हो, वहीं पर इनके अर्थ का संकोच किया जा सकता है | वेद शब्द केवल मन्त्रभाग के लिये कहीं प्रसिद्ध नहीं है । धातु के अर्थ के अनुसार वेद शब्द का अर्थ केवल ज्ञान है । ' वेद के बाद वैदि बनाता है ' यहाँ पर कुशमुष्टि के लिये वेद शब्द प्रयुक्त हैं । इस लिये ' मन्त्र और ब्राह्मण का नाम वेद है ' यह केवल वैदिक संज्ञा है । जैसे कोश आदि के द्वारा सास्ना आदि से युक्त प्राण विशेष का नाम ' गौ ' रखा जाता है, उसी तरह ये महर्षिगण नाम और नामी के अनादि सिद्ध सम्बन्ध को बताते हैं | इसके उपरान्त भी यदि इसको कृष्ण यजुर्वेद की ही संज्ञा मानते हैं, तो फिर मन्त्रों की वेद संज्ञा भी केवल कृष्ण यजुर्वेद के मन्त्रों की ही माननी पड़ेगी । अपौरुषेय वाक्य होने से ही सन्न और ब्राह्मण वेद हैं । अपौरुषेय पद का अर्थ यह है कि सम्प्रदाय का बिच्छेद न होने पर भी जिसका कर्ता न सुना गया हो । ' तुल्यं साम्प्रदायिकम् ' इस मीमांसा सूत्र में सम्प्रदाय की अविच्छिन्न प्रवृत्ति रहने के कारण ही अर्थवाद वाक्यों का प्रामाण्य माना गया है । यदि आपस्तम्ब, बौधायन आदि ऋषि नहीं हैं, कृष्ण यजुर्वेद यदि वेद नहीं है, तो उनके प्रमाण पर कृष्ण यजुर्वेद के सम्त्र और ब्राह्मण भाग भी बेद कैसे माने जायेंगे? यह सब आर्यसमाजियों की अजीब दिमागी उपज है कि वे प्रामाणिक ग्रन्थों में भी अपने विचार के विरोधी अंशों को प्रक्षिप्त मान लेते हैं । सर्वानुक्रमणी के रचयितागण वैदिक प्रसिद्धि के अनुसार ही काण्व और माध्यन्दिन शाखीय मन्त्रों और ब्राह्मणों के सम्बन्ध में निर्णय करते हैं । प्रसिद्धि के अनुसार ही ' वसन्त के लिये कपिजलों का आलमन करता है ' इस प्रकार के faaree वाक्य मन्त्रों के बीच में पढ़े जाने से मन्त्र और साथ ही इसकी व्य renr करने वाले दूसरे ब्राह्मण वाक्य के न उपलब्ध होने से ब्राह्मण भी कहलाते हैं । पुनः वही कहते हैं कि यज्ञ कर्म में कृष्ण यजुर्वेद शाखा का प्राधान्य है, इसीलिये कृष्ण यजुर्वेद की शाखा में प्रसिद्ध ' मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद है ' यह लक्षण शुक्ल यजुर्वेद के याज्ञिकों ने भी मान लिया । इसीलिये कात्यायनपरिशिष्ट में कात्यायन के नाम से किसी ने इस सूत्र की रचना कर दी । यह कथन भी निराधार है । यज्ञ कर्म का प्राधान्य सभी शाखाओं में समान है । इस तथ्य की जानकारी ' पुरातन कवियों ने मत्रों में जिन यज्ञ कर्मों को देखा, उनका विस्तार त्रेतायुग में बहुत हुआ ' इस मन्त्र से मिलती है । जैमिनि ने ' वेद
पृष्ठ 730
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दार्थपारिजातः त्रेषु तानि कर्माण्यपश्यत् कवयः । जैमिनिना ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् ' ( मी ० सू ० ११२११ ) इत्याम्नायस्य क्रियार्थत्वमेवोक्तम् । श्रीतसूत्रकारास्तु पूर्वमीमांसारीत्या सर्वशाखोपसंहारन्यायेनानुष्ठानक्रमं निर्णीय सूत्राणि रचयन्ति । तस्मादेव माध्यन्दिनीयशाखायामनुपलभ्यमानाः शाखान्तरेषूपलभ्यमाना मन्त्रा अपि श्रौतसूत्रेषू-लिख्यन्ते । प्रयोगेषु तेषामनिवार्यमेवोच्चारणम् । यदुक्तम्- ' ऋक्सामयजुः शब्दैर्मत्राणामेव ग्रहणं न ब्राह्मणानाम् ' इति, तदपि तुच्छम् ऋगादिशब्दानां मन्त्रबोधकत्वेऽपि ऋग्वेदयजुर्वेदसामवेदशब्दे मन्त्रब्राह्मणात्मकशब्दराशीनामेव ग्रह-णात् । एतच्च पूर्व निर्णीतमेव । किञ्च, ' चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ' ( मी ० सू ० १११।२ ), ' जन्माद्यस्य यतः ' ( ब्र ० सू ० १1१/२ ) इत्यादिभि -ब्रह्मणोर्लक्षणमुक्तम् । तदेव लक्षणं सर्वेरप्यास्तिकैर्गृह्यते । एवमेव मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमित्येव लक्षणं सर्वे-रख्यास्तिकैर्गृह्यते । लक्षणप्रणयनात् प्राग् धर्मब्रह्मणोरस्तित्वं नासीदिति यथा न वक्तुं शक्यते, तथैव लक्षणप्रणयनात् प्राग् मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदत्वं नासीदित्यपि न वक्तुं शक्यते । मन्त्राणां वेदत्वं येन लक्षणेन वक्ष्यते ततः पूर्व मन्त्राणामपि त्वद्रीत्याऽवेदत्वप्रसक्तिरनिवार्येव स्यात् । अत एव ' सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे ' इत्यादिमहाभाष्यवचनसङ्गतिः । महाभाष्य-रीत्या तु— ' चत्वारो वेदा बहुधा भिन्ना एकविंशतिघा बाहवृचम्, एकशतमध्यर्युशाखा:, सहस्रवर्मा सामवेदः, नवधा अथर्वणो बेदः ' इत्येवमनेकशाखोपबृंहिता मन्त्रब्राह्मणात्मका वेदाः । अग्निहोत्रादिधर्माणां ज्ञाने ' अग्निहोत्रं जुहुयात् ' ( शां ० ब्रा ० २२८ ) इत्यादिब्राह्मणवाक्यान्येव प्रमाणानि । तेषां च श्रुतित्वं मनुरप्याह - धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ' ( मनु ० १।१३ ) | ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' ( मी ० सू ० १1१1१ ), ' अन्वाहार्ये च दर्शनात् ' ( मी ० सू ० ) इत्यादिभिर्द्वादशलक्षण्यां धर्मविचारप्रसङ्गे प्रायेण ब्राह्मण-वचनात्येव विचारितानि । ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' ( ब्र ० स ० १1१1१ ) इत्यादिब्रह्मसूत्रगर्तः सूत्रश्चतुर्लक्षण्यां ब्राह्मण-वचनान्येवाश्रित्य ब्रह्मविचारः कृतः । यज्ञानुष्ठान के लिये है, इसलिये भिन्नार्थक वाक्य अनर्थक है ' इस सूत्र में आम्नाय अर्थात् वेद की उपयोगिता यज्ञानुष्ठान में हो बताई है । श्रत्रकार पूर्वमीमांसा की पद्धति से सब शाखाओं का उपसंहार कहाँ पर होता है, इस बात का निर्णय कर तदनुसार अनुष्ठान क्रम को रखकर सूत्रों की रचना करते हैं । इसीलिये अन्य शाखाओं के भी वे आवश्यक मन्त्र इन श्रौतसूत्रों में उद्धृत मिलते हैं, जो कि अपनी शाखा में उपलब्ध नहीं हैं, क्योंकि प्रयोगों में उनका उच्चारण अनिवार्य है । ' ऋक्, साम, यजुः शब्द से मन्त्रों का ही ग्रहण होता है, ब्राह्मणों का नहीं ' यह कहना भी व्यर्थ है, क्योंकि ऋक् आदि शब्द यद्यपि केवल मन्त्रों के ही बोधक हैं, तो भी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद शब्दों से मन्त्रब्राह्मणात्मक पूरी वेदराशि परिगृहीत होती है । इसका निर्णय पहिले ही किया जा चुका है । ' चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ' इस मीमांसा सूत्र में धर्म का और ' जन्माद्यस्य यतः ' इस वेदान्त सूत्र में ब्रह्म का लक्षण बताया गया है । इन्हीं लक्षणों को सभी आस्तिक जन मानते हैं । इसी तरह मन्त्र और ब्राह्मण दोनों का नाम वेद है, यह लक्षण भी सभी आस्तिकों को मान्य है । लक्षण बनाने से पहले धर्म और ब्रह्म की सत्ता नहीं थी, ऐसी बात जैसे नहीं कही जा सकती, उसी तरह लक्षण बनाने से पहले मन्त्र और ब्राह्मण वेद नहीं थे, यह भी नहीं कहा जा सकता । जिस लक्षण से आप मन्त्रों को वेदता कहेंगे, आपकी रीति से तो उससे पहले मन्त्रभाग भी वेद नहीं माना जायगा । इसीलिये महाभाष्य में कहा गया है कि शब्द और aar iva free हैं । महाभाष्य में यह स्पष्ट बताया गया है कि चारों वेद अनेक शाखाओं में विभक्त है । ऋग्वेद की २१, यजुर्वेद की १०१, सामवेद की १००० और अथर्ववेद की ९ शाखाएँ हैं । इससे सिद्ध है कि मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद अनेक शाखाओं में विभक्त है । ' afa करें ' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य हो अग्निहोत्र आदि का ज्ञान कराते हैं । मनु ने इन ब्राह्मण वाक्यों को भी वेद ही माना है कि ' धर्म को जो जानना चाहता है, उसके लिये श्रुति ही सर्वश्रेष्ठ साधन है । द्वादश अध्याय वाले पूर्वमीमांसा दर्शन में ' अथातो धर्म जिज्ञासा ', ' अन्वाहायें च दर्शनात् ' इत्यादि सूत्रों में जहाँ धर्म के लक्षण का विचार किया है, प्रायः सर्वत्र ब्राह्मण वाक्यों को ही