वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 731–740
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 731–740
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वैवार्थपारिजातः ७०१ वस्तुतस्तु ब्राह्मणं वेद इत्यत्र स्वपरिगणितान्यार्षाणि प्रमाणानि दर्शितानि दर्शयिष्यन्ते च । परन्तु ब्राह्मणं न वेद इत्यत्र तु कस्याप्येकस्याप्यषेर्वचनं प्रमाणतथा नोपन्यस्तं दयानन्देन तदीयैर्वा । अनृषेरपि कस्य-चित् प्रामाणिकस्य वचनं नोपस्थापितं ब्राह्मणभागस्था वेदत्व साधनाय । यदपि - ' ब्राह्मणं न वेदो मनुष्यबुद्धिरचितत्वात् ' इत्युक्तम्, तदपि तुच्छम्, मनुष्यबुद्धिरचितत्वस्याद्याप्यसिद्धेः साध्यसमो हेतुः । महर्षिणा गोतमेन तु ' तदप्रामाण्यमनृत-व्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ' ( गो ० सू ० २।११५७ ) इति सूत्रेण स्थूणानिखननन्यायेन वेदप्रामाण्यं द्रढयितुं ब्राह्मणवाक्या-न्येवोदाहृत्य तेषां प्रामाण्यव्यवस्थापनेन वेदप्रामाण्यं दृढीकृतम् । वत्रानृतादीनामुदाहरणानि वात्स्यायनमुनिना प्रदर्शि-तानि -- तत्र ' पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत ' अत्र श्रुतौ पुत्रेष्ट्यनुष्ठानेन पुत्रप्राप्तिः श्रूयते । न च तदनुष्ठानेऽपि पुत्रोत्पत्ति-दृश्यत इत्यनृतस्योदाहरणम् । ' उदिते जुहोति ', ' अनुदिते जुहोति ', ' समयाध्युषिते जुहोति ' इत्युदितानुदित होम विधानानि दृश्यन्ते । तेषामेव तत्र निन्दावचनानि श्रूयन्ते - ' श्यावोऽस्याहुतिमभ्यवहरति य उदिते जुहोति ', ' शबलोऽस्याहृतिसभ्य-वहति योऽनुदिते जुहोति ', ' श्यावशवलावस्याहुतिमभ्यवहरतो यः समयाध्युषिते जुहोति ' इति उदित होमादीनां विधानं तेषामेव चापवादो व्याघातः । त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम् ' इति पुनरुक्ततादोषश्च । एवमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषस्यो वेदानामप्रामाण्यं शङ्कितम् । तानि च ब्राह्मणवचनाभ्येवेति तेषां वेदत्वं यदि न स्यात्तदा कथं तेषामनृतादिभिर्वेदानाम-प्रामाण्यमाशङ्कत? नहि श्रोत्रदोषैत्रस्याप्रामाण्यं शक्यशङ्कम् 1 । तस्माद् ब्राह्मणानि वेदाः, तत एव तद्गतानृतादि-दोषैर्वेदानामप्रामाण्यं शङ्कयते । प्रमाण रूप से उद्धृत किया गया हैं । ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इत्यादि चार अध्याय के ब्रह्मसूत्रों में भी प्राय: ब्राह्मण वचनों के आधार पर ही ब्रह्म के लक्षण का विचार किया गया है । ब्राह्मणभाग भी वेद ही है, इस बात की पुष्टि में अनेक ऋषियों के वाक्य प्रमाण रूप में उद्धृत किये गये हैं और आगे भी दिखाये जायेंगे । किन्तु ब्राह्मण वेद नहीं हैं, इसके प्रमाण में किसी एक भी ऋषि का वाक्य स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायी नहीं दिखा सके । ऋषि की बात छोड़े, किसी प्रामाणिक ग्रन्थकार का भी बचन उपलब्ध नहीं है, जो कि ब्राह्मण भाग को वेद न मानता हो । ब्राह्मण भाग मनुष्य की रचना होने से प्रमाण नहीं है, यह कहना भी ठोक नहीं है, क्योंकि ब्राह्मण भाग की रचना मनुष्य की बुद्धि से हुई है, यह बात आज भी सिद्ध नहीं हो सकी है, अतः इस हेतु में ' साध्यसम्म ' नाम का हेत्वाभास दोष हैं | महर्षि गौतम के ' वेद प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि इनमें असत्य, परस्पर विरुद्ध और एक ही बात बार बार दोहराई गई है ' इस न्याय-दर्शन के सूत्र में तो स्थूणानिखनन न्याय से वेद के प्रामाण्य को दृढ़ करने के लिये ब्राह्मण वाक्यों को ही उद्धृत कर उनकी प्रामाणिकता सिद्ध की गई है । न्यायभाष्यकार वात्स्यायन मुनिने अनृत आदि दोषों के उदाहरण इस प्रकार दिये हैं- ' पुत्र की कामना वाला पुत्रेष्टि याग करे ' इस प्रकार श्रुति में पुत्रेष्टि के अनुष्ठान से पुत्र की प्राप्ति सुनी गई है, किन्तु पुत्रेष्टि के अनुष्ठान के बाद भी पुत्र की प्राप्ति नहीं होती, यह अनृत का उदाहरण है । ' सूर्योदय वेला में हवन करता है, सूर्योदय से पहले ही हवन करता है, सूर्योदय वेला बीत जाने पर भी हवन करता है ' इन तीनों वाक्यों के व्याघातक ( काट करने वाला ) निम्न वाक्यों में इनको निन्दा की गई है ' काला कुत्ता उसकी आहुति को खा जाता है, जो कि सूर्योदय वेला में हवन करता है, चितकबरा कुत्ता उसकी आहुति को खा जाता है, जो कि सूर्योदय से पहले माहुति देता है, काला और चितकबरा दोनों कुत्ते मिलकर उसकी आहुति को खा जाते हैं, जो कि सूर्योदय वेला के बीत जाने पर आहुति देता है इस प्रकार पहले होम का विधान और बाद में उसकी निन्दा की गई है । यही व्याघात दोष है । ' प्रथम ऋचा की Refer की तीन तीन बार आवृत्ति करे ' यहाँ पर पुनरुक्तता दोष है । इस प्रकार अनृत व्याघात और पुनरुक्ति दोष के कारण वेद के प्रामाण्य में शंका उपस्थित की गई हैं । यहाँ पर उद्धृत सभी वाक्य ब्राह्मणों के हैं । यदि ब्राह्मण वाक्य वेद नहीं है, तो फिर इनमें अनृनता आदि दोषों के कारण वेद की अप्रामाणिकता कैसे आशंकित होगी? कान में दोष होने पर नेत्र अप्रामाणिक नहीं माने जा सकते । इसलिये मानना पड़ेगा कि ब्राह्मण भी वेद हैं, इसी लिये इनमें विद्यमान अनृतता आदि दोषों के कारण वेदों at safear ai कित होती हैं ।
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पारिजातः वस्तुतस्तु ब्राह्मणं वेद इत्यत्र त्वपरिगणितान्यार्षाणि प्रमाणानि दशितानि दर्शयिष्यन्ते च । परन्तु ब्राह्मणं न वेद इत्यत्र तु कस्याप्येकस्याप्युषेर्वचनं प्रमाणतथा नोपन्यस्तं दयानन्देन तदीयेव । अनुपेरपि कस्य -चित् प्रामाणिकस्य वचनं नोपस्थापितं ब्राह्मणभागस्य वेदत्व साधनाय । यदपि -- ' ब्राह्मणं न वेदो मनुष्यबुद्धिरचितत्वात् ' इत्युक्तम्, तदपि तुच्छम्, मनुष्यबुद्धिरचितत्वस्याद्याप्यसिद्धेः साध्यसमो हेतुः । महर्षिणा गोतमेन तु ' तदप्रामाण्यमनृत-व्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ' ( गो ० सू ० २।११५७ ) इति सूत्रेण स्थूणानिखननन्यायेन वेदप्रामाण्यं द्रदयितुं ब्राह्मणवाक्या-न्येवोदाहृत्य तेषां प्रामाण्यव्यवस्थापनेन वेदप्रामाण्यं दृढीकृतम् । तत्रानृतादीनामुदाहरणानि वात्स्यायनमुनिना प्रदर्शि तानि - तत्र ' पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत ' अत्र श्रुतौ पुत्रेष्ट्यनुष्ठानेन पुत्रप्राप्तिः श्रूयते । न च तदनुष्ठानेऽपि पुत्रोत्पत्ति-दृश्यत इत्यनृतस्योदाहरणम् । ' उदिते जुहोति ', ' अनुदिते जुहोति ', ' समयाध्युषिते जुहोति ' इत्युदितानुदित होम विधानात दृश्यन्ते । तेषामेव तत्र निन्दावचनानि श्रूयन्ते - ' श्यावोऽस्याहुतिमभ्यवहरति य उदिते जुहोति ', ' शवलो s स्याहुतिमस्य-वहति योऽनुदिते जुहोति ', ' श्यावशवलावस्याहुतिमभ्यवहरतो यः समयाध्युषिते जुहोति ' इति उदित होमादीनां विधानं तेषामेव चापवादो व्याघातः । ' त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम् ' इति पुनरुक्ततादोषश्च । एवमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यो वेदानामप्रामाण्यं शङ्कितम् । तानि च ब्राह्मणवचनान्येवेति तेषां वेदत्वं यदि न स्यात्तदा कथं तेषामनृतादिभिर्वेदानाम-प्रामाण्यमाशङ्कयेत? नहि श्रोत्रदोषनेत्रस्याप्रामाण्यं शक्यशङ्कम् । तस्माद् ब्राह्मणानि वेदाः, तत एव तद्गतानृतादि-दोषैर्वेदानामप्रामाण्यं शङ्कयते । प्रमाण रूप से उद्धृत किया गया है । ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इत्यादि चार अध्याय के ब्रह्मसूत्रों में भी प्राय: ब्राह्मण वचनों के आधार पर ही ब्रह्म लक्षण का विचार किया गया है । ब्राह्मणभाग भी वेद ही है, इस बात की पुष्टि में अनेक ऋषियों के वाक्य प्रमाण रूप में उद्धृत किये गये हैं और आगे भी दिखाये जायेंगे | किन्तु ब्राह्मण वेद नहीं है, इसके प्रमाण में किसी एक भी ऋषि का वाक्य स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायी नहीं दिखा सके । ऋषि की बात छोड़े, किसी प्रामाणिक ग्रन्थकार का भी वचन उपलब्ध नहीं है, जो कि ब्राह्मण भाग को वेद न मानता हो । ब्राह्मण भाग मनुष्य की रचना होने से प्रमाण नहीं है, यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ब्राह्मण भाग की रचना मनुष्य की बुद्धि से हुई है, यह बात आज भी सिद्ध नहीं हो सकी है, अतः इस हेतु में ' साध्यसम ' नाम का हेत्वाभास दोष है । गोतम के ' वेद प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि इनमें असत्य, परस्पर विरुद्ध और एक ही बात बार बार दोहराई गई हैं ' इस न्याय-दर्शन के सूत्र में तो स्थूणानिखनन न्याय से वेद के प्रामाण्य को दृढ़ करने के लिये ब्राह्मण वाक्यों को ही उद्धृत कर उनकी प्रामाणिकता सिद्ध की गई है । न्यायभाष्यकार वात्स्यायन मुनि ने अमृत आदि दोषों के उदाहरण इस प्रकार दिये हैं-- ' पुत्र की कामना वाला पुत्रेष्टि याग करें इस प्रकार श्रुति में पुत्रेष्टि के अनुष्ठान से पुत्र की प्राप्ति सुनी गई है. किन्तु पुत्रेष्टि के अनुष्ठान कें बाद भी पुत्र की प्राप्ति नहीं होती, यह अमृत का उदाहरण है । ' सूर्योदय वेला में हवन करता है, सूर्योदय से पहले ही हवन करता है, सूर्योदय बेला बीत जाने पर भी हवन करता है ' इन तीनों वाक्यों के व्याघातक ( काट करने वाला ) निम्न वाक्यों में इनको निन्दा की गई है ' काला कुत्ता उसकी आहुति को खा जाता है, जो कि सूर्योदय वेला में हवन करता है, चितकबरा कुत्ता उसकी आहुति को खा जाता है, जो कि सूर्योदय से पहले आहुति देता है, काला और चितकबरा दोनों कुत्ते मिलकर उसको आहुति को खा जाते हैं, जो कि सूर्योदय वेला के बीत जाने पर आहुति देता है ' इस प्रकार पहले होम का विधान और बाद में उसकी निन्दा की गई है । यही व्याघात दोष है । ' प्रथम ऋचा की और ऋचा कोन तीन बार आवृत्ति करें ' यहाँ पर पुनरुक्तता दोष हैं । इस प्रकार अनृत व्याघात और पुनरुक्ति दोष के कारण वेद के प्रामाण्य में शंका उपस्थित की गई है । यहाँ पर उद्धृत सभी वाक्य ब्राह्मणों के हैं । यदि ब्राह्मण वाक्य वेद नहीं हैं, तो फिर इनमें अनुनता आदि दोषों के कारण वेद की अप्रामाणिकता कैसे आशंकित होगी? कान में दोष होने पर नेत्र अप्रामाणिक नहीं माने जा सकते । इसलिये मानना पड़ेगा कि ब्राह्मण भी वेद हैं, इसी लिये इनमें विद्यमान अनृतता आदि दोषों के कारण वेदों की प्रामाणिकता आशंकित होती हैं ।
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बापारिजातः ७०३ तदभ्यासमन्तरेण न स्यादिति सूत्रभाष्यकाराभ्यां गोतमवात्स्यायनाम्यां ब्राह्मणवचनानामेवाक्षेप समाधानाम्यां विचार्य प्रामाण्यव्यवस्थापनाद् ब्राह्मणभागस्याक्षुण्णमेव वेदत्वम् । एवं मन्त्रब्राह्मणयोर्व्याख्यानव्याख्येयभावेऽपि न ब्राह्मणभागस्य वेदत्वम्, वैपरीत्यस्यापि दर्शनात् । तथाहि तैत्तिरीयोपनिषदि ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' इति ब्राह्मगं व्याख्येयम्, ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायाम् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता । ' इति मन्त्रस्य तद्व्याख्यानरूपत्वमुक्तम् । भाष्येष्वपि व्याख्यानव्याख्येय-भावोदृश्यते । यथा- - ' ' पश्वादिभिश्वाविशेषात् ' इति सूत्रानुकारिभाव्यमेव व्याख्येयम्, भाष्यमेव च तद्व्याख्यानमपि । यदुक्तम् -- ' यथा ब्राह्मणेषु नामोल्लेखपूर्वका इतिहासाः सन्ति न तथा मन्त्रभागेषु ' ( पृ ० ९ २ ) इति तदपि तुच्छम् उक्तोत्तरत्वात् । लौकिकं वाक्यमेवार्थपूर्वकं न वैदिकं तस्य नित्यत्वात् । यथा मन्त्रेषु सूर्यचन्द्रादिप्रतिपादकत्वेऽपि सादित्वम्, तथैव ब्राह्मणेषु कासान्चिद् घटनानां प्रतिपादनेऽपि न तेषामनादित्वनित्यत्वव्याहृतिः, अर्थपूर्वकत्व-विरहात् । ' त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् ॥ ' ( वा ० सं ० ३१६२ ) इति मन्त्रेऽपि व्यक्तिविशेषनामोल्लेखी दृश्यत एव । यदुक्तम्- ' चक्षुर्वे जमदग्निः ' ( श ० ८ | १ | २ | ३ ), ' कश्यपो वे कूर्मः ' ( श ० ७ | ५ | १ | ५ ), ' प्राणो वे कूर्म: ' ( श ० ७१५/१/७ ) इत्यादिवचनैश्चक्षुः प्राणयोरेव जमदग्निकश्यपादिसंज्ञा, न कस्यविद्देहधारिण: ' ( पृ ० ९ २ - ९ ३ ) इति तदपि तुच्छम्, यथाहि --- योषा वा अग्निर्गोतम ' ( वृ ० ६/२/१३ ) इति बृहदारण्यके गौणीवृत्त्याऽग्निशब्दप्रयोगस्तथैव चक्षुरादिषु गौणवृत्त्यैव जमदग्न्यादिशब्दप्रयोगः । यथा योषाया-भग्निपदप्रयोगेऽपि नाग्निपदार्थापलापस्तथैव चक्षुरादिषु जमदग्न्यादिपदप्रयोगेऽपि न मुख्यजमदग्न्यादीनामृषीणा-मपलापः सम्भवति । यथा वा ' वागेववेदी मतो यजुर्वेदः प्राणः सामवेद: ' ( श ० ५४/४/३/१२ ) इत्यादी वागादिषु द्वेष करते हैं । यह मन्त्र पन्द्रह सामधेनी ऋचाओं को ना बताता है । विना मन्त्र को आवृत्ति के यह हो नहीं सकता । इस प्रकार गोतम और वात्स्यायन ने ब्राह्मण वाक्यों को लेकर आक्षेप और समाधान किया है तथा वेद का प्रामाण्य सिद्ध किया है, अतः इनके प्रमाण पर भी ब्राह्मण ग्रन्थ वेद ही हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं रहता । ब्राह्मण भाग मन्त्र भाग की व्याख्या करते हैं, इससे भी ब्राह्मण भाग वेद नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि इसके विपरीत भी देखा गया है । अर्थात् तैत्तिरीयोपनिषद् में ' ब्रह्मविद् ब्रह्म को प्राप्त करता है ' इस ब्राह्मण वाक्य की ही व्याख्या ' वत्यं ज्ञानम् ’ इत्यादि मन्त्र से की गई है कि ' सत्य, ज्ञान, अनन्त स्वरूप ब्रह्म अत्यन्त छिपा हुआ रहस्य है, इसको जो जानता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ' इस प्रकार यहाँ मन्त्र ही ब्राह्मण भाग की व्याख्या करता है । इस प्रकार का व्याख्यान- व्याख्येयभाव भाष्यों में भी देखा जाता है | जैसे कि ' पश्वादिभि: ' इत्यादि स्थलों पर सूत्र के अनुसार ही भाष्य व्याख्येय होता है और भाष्य हा उस प्रकार का व्याख्यान करते 1 ' जैसे ब्राह्मणों में नामोल्लेख पूर्वक इतिहास विद्यमान है, यह बात मन्त्रभाग में नहीं है ' यह कथन भी नगण्य है, इसका उत्तर दिया जा चुका है । अर्थपूर्वक प्रवृत्ति लौकिक वाक्य में ही होती है, वैदिक में नहीं, क्योंकि वैदिक वाक्य नित्य है । जैसे मन्त्रों में सूर्य - चन्द्र आदि का प्रतिपादन होने पर भी उनमें अनित्यता नहीं मानी जातीं, उसी तरह ब्राह्मणों में भी कुछ घटनाओं का उल्लेख होने पर भी उनकी अनादिता, नित्यता आदि में कोई बाधा नहीं आती, क्योंकि यहाँ पर भी शब्द की प्रवृत्ति अर्थानुसन्धान के साथ संपृक्त नहीं है । ' जमदग्नि, कश्यप और देवताओं के बराबर हमारी आयु हो ' इस प्रकार मन्त्र भाग में भी व्यक्तिविशेष का नाम दिखाई ही पड़ता है । यह जो कहा गया है कि ' चक्षु ही जमदग्नि हैं ', ' कूर्म ही कश्यप है ', ' प्राण ही कश्यप है ' इन प्रमाणों से चक्षु और प्राण की ही जमदग्नि और कश्यप संज्ञा है, किसी देहधारी को नहीं, यह भी तुच्छ बात है । जैसे कि ' है गोतम, यह स्त्री ही अग्नि है ' इस बृहदारण्यक श्रुति में गौणी वृत्ति से स्त्री में अस्ति शब्द का प्रयोग है, उसी प्रकार चक्षु नादि में जमदग्नि आदि शब्दों का प्रयोग गौणी वृत्ति से होता है । जैसे स्त्री में अग्नि शब्द का प्रयोग करने पर भी मुख्य अग्नि का अपलाप नहीं होता, उसी तरह चक्षु आदि में जमदग्नि पद का प्रयोग होने पर भी मुख्य जमदग्नि आदि ऋषियों का अपलाप नहीं हो सकता । अथवा जैसे ' वाणी ही
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७०४ ऋग्वेदप्रयोगेऽपि न ऋग्वेदादीनामपलापः सम्भवति । निरुक्तकारोऽप्याह- ' बहुभक्तिवादीनि ब्राह्मणानि भवन्ति, अग्निर्वैश्वानरः संवत्सरो वैश्वानरो ब्राह्मणो वैश्वानर ' ( नि ० ७।२४ ) इति । न लावता मुख्यस्य वैश्वानरस्थापलापः, तथैव प्रकृतेऽपि न जमदग्न्यादिमुख्यार्थापलापः सम्भवति । यत्तु -- ' हे ईश्वर जमदग्निसंज्ञकस्य चक्षुषः कश्यपनाम्नः प्राणस्य त्र्यायुषं त्रिगुणमर्थात् त्रीणि शतानि वर्षाणि यावत्तावदायुरस्तु देवेषु विद्याप्रभावयुक्तत्रिगुणमायुर्भवति तन्नोऽस्तु तत्सेन्द्रियाणां समनस्कानां नोऽस्माकं पूर्वोक्तं सुखयुक्तमायुरस्तु । ' विद्वांसो हि देवा: ' ( ० ३ | ७ | ३ | १० ) इत्यनेन विद्वांसो मनुष्या एव देवा उच्यन्ते ' ( पृ ० ९ ३ ) इति, तदसङ्गतम् नः त्र्यायुषमस्त्वित्युक्त्यैव त्रिगुणितायुष प्रार्थनोपपत्ती जमदग्न्यादिपदप्रयोगस्य नैरर्थक्यापातात् । यावदेव मनुष्याणामायुर्भवति तावदेव व्यावहारिकचक्षुरादीनामपि भवति, मनुष्यादिमरणे तेषा-मकिञ्चित्करत्वदर्शनात् । सूक्ष्मशरीरावयवभूतानां चक्षुरादीनामिन्द्रियाणां प्राणानां च प्रलयपर्यन्तावस्थायित्वमस्ति । लेन तदीयत्र्यायुषत्वं मनुष्याणां न सम्भवत्येवेति कुतस्तदभ्यर्थनम्? विद्वांसोऽपि सामान्यमनुष्यवदेव शतायुषो भवन्ति । चक्षुषः प्राणस्य त्वदभिमतदेवानां च समानान्येवायूंषि भवन्ति । तथा तेषां त्रिगुणितायुषप्रार्थनापेक्षया मानुषत्र्यायुषप्रार्थनैव लाघवाद्युज्यते । न च त्रीणि शतान्यायूंषि सम्भाव्यन्ते, तादृशप्रार्थनावतामपि तददर्शनात् । जमदग्निर्महर्षिस्तु दीर्घायुर्भवति, कश्यपः प्रजापतिर्देवा इन्द्रादयश्च दीर्घायुषो भवन्ति तेषां त्र्यायुषप्रार्थनापि सम्भाव्यते । इह जन्मनि जन्मान्तरे वा तन्नासम्भवि । तस्मात् पूर्वोक्तमन्त्रस्य उब्वट सायणमहीधराद्यनुसारी अय-मेवार्थी युक्त: -- ' त्र्यायुषमिति यजमानो जपति ' ( का ० ५१२ ) इति यजमानस्य मुण्डनकाले जपनीयोऽयं मन्त्रः । तदर्थस्तु --- जमदग्नेर्मुनेस्त्रयाणां बाल्ययौवनस्थाविराणामायुषां समाहारस्त्र्यायुषं यथा सुचरितं सुखमयं कल्याणमयम्, तथा कश्यपस्य कश्यपनाम्नः प्रजापतेः सम्बन्धि यत् त्र्यायुषम्, तथा देवेषु इन्द्रादिषु यत् त्र्यायुपमस्ति तत्सर्व ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है, प्राण सामवेद है ' इत्यादि स्थलों में वाणी आदि में ऋग्वेद आदि पदों के प्रयुक्त किये जाने पर भी ऋग्वेद आदि का अपलाप नहीं होता । निरुक्तकार ने भी कहा है ब्राह्मणों में एक पद का अनेक अर्थों में भाक्त प्रयोग किया गया है | अग्नि भी वैश्वानर हैं, संवत्सर भी वैश्वानर है, ब्राह्मण भी वैश्वानर हैं । ऐसा होने पर भी जैसे मुख्य वैश्वानर का अपलाप नहीं होता, उसी तरह प्रकृत में भी जमदग्नि आदि के मुख्य अर्थ का अपलाप नहीं हो सकता । ' हे ईश्वर, जमदग्नि नामक चक्षु की, कश्यप नामक प्राण की व्यायुष अर्थात् तीन गुनी आयु, तीन सौ वर्ष की आयु हो, देवों में विद्या के प्रभाव से तीन गुनी आयु होती है, वह आयु इन्द्रिय - मन आदि से संवलित हम लोगों की भी सुखमय हो । ' विद्वान् ही देवता है ' इस वचन से विद्वान् मनुष्य हो देवता कहे गये हैं यह उक्ति भी असंगत है । हमारी तीन गुनी आयु हो, इतना कहने से ही तीन गुनी आयु की प्रार्थना पूरी हो जाती है, तब जमदग्नि आदि पद निरर्थक हो जायेंगे । जितनी मनुष्यों की आयु होती है, उतनी ही मनुष्य के व्यवहार साधक चक्षु आदि की भी होती है, मनुष्य की मृत्यु के बाद वे कुछ नहीं कर सकते । सूक्ष्म शरीर की अवयवभूत चक्षु आदि इन्द्र और प्राण प्रलय पर्यन्त अवस्थित रहते हैं । इनकी अपेक्षा तीन गुनी आयु मनुष्य की होती नहीं, अतः इसके लिये प्रार्थना भी कैसे की जा सकती है? विद्वान् भी सामान्य मनुष्य के समान सौ वर्ष की आयु वाले ही होते हैं । इस प्रकार चक्षु, प्राण और आपके अभिमत विद्वान् रूपी देवता --- इन सबकी आयु एक सी है । ऐसी अवस्था में इन सबको तिगुनी आयु माँगने की अपेक्षा मनुष्य की तीन गुनी आयु मांगने में ही लाघव हैं । तीन सौ वर्ष की आयु इस प्रकार की प्रार्थना करने वाले विद्वानों को भी देखी नहीं जाती । इसके विपरीत महर्षि जमदग्नि दीर्घायु वाले 1. प्रजापति कश्यप और इन्द्रादि देवगण भी चिरजीवी होते हैं । इनकी तीन गुनी आयु की प्रार्थना की जा सकती है । इस जन्म में और जन्मान्तर में यह असंभव भी नहीं है । इसलिये उक्त मन्त्र का उबट, सायण और मीर का किया हुआ अर्थ ही ठीक है कि ' त्र्यायुष इत्यादि मन्त्र का जप यजमान करता है ' कात्यायन के बताये इस विनियोग के अनुसार यजमान के मुण्डन के समय इस मन्त्र का जप किया जाता है । मन्त्र का अर्थ यह है-- जमदग्नि मुनि की बाल्य, यौवन और वार्धक्य इन तीन अवस्थाओं के समाहार को ' व्यायुष ' कहा गया है, जैसे जमदग्नि मुनि की ये तीनों अवस्थाएँ सुचरित, सुखमय,
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मैदार्थ पारिजातः ७०५ त्र्यायुषं नोऽस्माकं यजमानानामस्तु | अर्थाज्जमदग्न्यादीनां महर्षीणां देवानामिन्द्रादीनां यादृशं त्र्यायुषं कल्याणमयं सुखमयं सुचरितमस्ति तथैवास्माकमपि बाल्ययौवनस्थाबिरायुषां समाहारोऽपि सुचरितोऽस्तु । तच्च नासम्भवि, ' भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ' ( वा ० सं ० २५/२१ ) इत्यादावपि भद्रश्रवणदर्शनलक्षणस्य कल्याणमयस्य सुखमयस्य सुचरितस्यैवास्यथितत्वात् । ' विद्वांसो हि देवाः ' ( शः ३१७१३ | १० ) इति वचनं तु न विदुषां देवत्वं बोधयति, किन्तु देवानां विद्वत्त्वं बोधयति । तस्मादत्र जमदग्न्यादिनाम्नामुल्लेखो नापलापमर्हति । ' यद्देवेषु त्र्यायुषम् ' ( वा ० सं ० ३।६२ ) इत्यस्य व्याख्यानमारचयता दयानन्देन यत् ' देवेषु विद्वत्सु यावद्विद्याप्रभावयुक्तं त्रिगुणमायुर्भवतीति ' ( पृ ० ९ ३ ) यदुक्तम्, तत्रेदमुच्यते-- दयानन्दो विद्वानासीन्न वा? यद्यासीत्कुतो न शतत्रयायुर्जातः? न चेत्कथं तदुद्भाव्यं प्रामाण्यमर्हति? कि, मन्त्रेषु येषां विदुषां देवानां त्रीणि शताभ्यायूंषि निगदितानि ते मन्त्रोत्पत्तेः प्रागुत्पन्नाः पश्चाद्वा? आये मन्त्रेष्वायातमेवेतिहासत्त्वम् । यस्येतिहासो भवति तदीय-जन्मानन्तरमेव तदुल्लेखः, तादृशग्रन्थोऽपि तदीयजन्मतः पश्चादेव भवतीति दयानन्दीयसत्यार्थप्रकाशवचनात् ( सत्यार्थप्रकाशे पृ ० १२७ ) । ' किमग्ने देवेषु प्रवोचः ' इति मन्त्रभाष्ये दयानन्देनोक्तम् - ' हे अनन्तविद्यामय जगदीश्वर! देवेषु सृष्ट्यादी जातेषु पुण्यात्मसु अग्निवाय्वादित्याङ्गिरस्सु मनुष्येषु प्रवोचः प्रोक्तवान् ' इति । अयं तदीयोऽथ यदि शुद्धस्तर्हि मन्त्रेषु समायात एवेतिहासः । यद्यशुद्धोऽर्थस्तदा तदुक्तो कथं विश्वास:? तथात्वेऽपि मन्त्राणां यथा वेदत्वं तथैव ब्राह्मणभागस्यापि । किचात्रै भूमिकायां दयान देन लिखितम् -- ' ननु इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति ' ( ऋ ० सं ० १०२७५।५ ) इति गङ्गादिनदीनां वेदे प्रतिपादनं कृतमस्ति त्वया न मन्यते, अत्रोच्यते-- मन्यते तासां नदीसंज्ञेवि, ता गङ्गादयो नद्यः सन्ति । ताभ्यो यथायोग्यं जलशुद्धयादिगुणैर्यावानुपकारः स्यात् तावत्तासां मान्यं करोमि ' इति, तत्रेयं जिज्ञासा--कल्याणमय है, तथा जैसे कश्यप नाम के प्रजापति की तथा इन्द्र आदि देवताओं को तीन अवस्थाएं हैं, वही व्यायुष हमारे यजमानों की भी हो । अर्थात् जमदग्नि आदि महर्षियों की तथा इन्द्रादि देवताओं की तीन अवस्थाएँ जैसी कल्याणमय, सुखमय तथा सुचरित है, वैसी ही हमारी भी बाल्य, यौवन, स्थादिर अवस्थाएँ सुखमय हों । यह कोई असंभव बात नहीं है । ' हे यज्ञ की रक्षा करने वाले देवों, हम कान से भली बातें सुने, आँखों से भली चीजें देखें ' इत्यादि मन्त्रों में भी भली बातों के देखने सुनने के रूप में कल्याणमय, सुखमय सच्चरित्र जीवन की ही प्रार्थना की गई है । ' देवता विद्वान् है ' यह वचन विद्वानों को देवता नहीं बताता, किन्तु देवताओं की विद्वत्ता का प्रतिपादक है । इसलिये इस मन्त्र में जमदग्नि आदि के नामों का उल्लेख छिपाया नहीं जा सकता | ' देवेषु ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए दयानन्द ने जो यह कहा है कि देवों अर्थात् विद्वानों की दो प्रकार के प्रभाव वाली तीन गुनी आयु होती है, इसके उसर में हमारा कहना है कि दयानन्द विद्वान् थे कि नहीं? यदि ये तो वे तीन सौ वर्ष तक जीवित क्यों न रहे? यदि विद्वान् नहीं थे तो उनका भाष्य कैसे प्रामाणिक माना जा सकता है? दूसरी बात यह कि मन्त्रों में जिन विद्वान् रूपी देवताओं की तीन सौ वर्ष की आयु बताई गई हैं, वे मन्त्रों की रचना के पहले उत्पन्न हुए या बाद में? यदि मन्त्रों की रचना से पहले हुए तो फिर मन्त्रों में इतिहास या हो जायगा | जिसका इतिहास होता है, उसके जन्म के बाद ही उसका उल्लेख किया जाता है और वैसा ग्रंथ भी उसके जन्म के बाद की ही रचना माना जाता है | सत्यार्थप्रकाश में स्वयं दयानन्द ने इस बात को स्वीकार किया है । ' " fear देवेषु ' इत्यादि मन्त्र का भाष्य करते हुए दयानन्द ने कहा है कि ' हे are fr द्यामय जगदीश्वर सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न हुए पुण्यात्माओं को मग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा और मनुष्यों को आपने बताया ' । यदि उनका यह अर्थ ठीक है तो फिर मन्त्रों में इतिहास आ ही गया । यदि अर्थ गलत है तो फिर उनके कथन में विश्वास कैसे किया जा सकता है? इतिहास रहने पर भी मन्त्रभाग जैसे वेद माना जाता है, उसी तरह ब्राह्मणभाग भी वेद माना जायगा । यहीं पर भूमिका में दयानन्द ने लिखा है कि ' इस मे गङ्गे ' इत्यादि वेद मन्त्रों में गंगा आदि नदियों का प्रतिपादन किया गया है, उसको आप क्यों नहीं मानते? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि उनकी नदी संज्ञा हमें मान्य है । ये गंगा आदि नदियाँ हैं, उनसे ८ ९
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७०६ वेदार्थपारिजातः कि गङ्गादीनामुत्पत्तिमतामनित्यानामुत्पत्तेः प्रागयं मन्त्र आसीदनन्तरं बोनः? आद्ये तथैव जमदग्निकश्यपयाज्ञ-वल्क्यादीनामप्युत्पत्तेः प्राग् मन्त्रब्राह्मणादीनां सत्त्वे न तेषां पौरुषेयत्वमनित्यत्वं वा न सम्भाव्यते, तथा च मन्त्राणा-मर्थपरिवर्तनप्रयासो व्यर्थ एव । यदि गङ्गादीनामुत्पत्तेरनन्तरं तद्बोधकमन्त्राणामुत्पत्तिस्तदा तेषामपीतिहासत्व-मनिवार्यमेव । यदप्युक्तम्- ' तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च ' ( अथर्व ० स ० १५/३/१ ) इति मन्त्रे ब्राह्मणग्रन्थाना-मेव ग्रहणं न भागवतादीनाम् ' ( पृ ० ९ ४ ) इति, तत्रापीदं वक्तव्यं यत् मन्त्रोऽयं ब्राह्मणनिमाणात्प्राक् पश्चाद्वा निर्मितः? आद्ये मन्त्रस्येतिहासत्वमायातम् । तथात्वेऽपि चेन्मन्त्राणां वेदत्वं तहि ब्राह्मणैः किमपराद्धं यदेषां वेदत्वं न स्यात्? ' कस्य नूनं कतमस्यामृतानां मनामहे चारुदेवस्य नाम । कोनो मह्या अदितये पुनर्दात् पितरं च दृशेयं मातरं च ॥ ' ( ऋ ० सं ० १।२४।१ ), ' अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानां मनामहे चारुदेवस्य नाम । स नो मह्या ' ( ऋ ० सं ० ११२४/२ ) इत्यादिमन्त्रेषु शुनःशेषस्याख्यानमस्ति । न चास्याप्यन्योऽर्थः कर्तुं शक्यः, ऐतरेय ब्राह्मण आख्यानपरत्वेनेव तद्व्याख्या-नातू । ' हन्ताहं देवता उपधावामीति । स प्रजापतिमेव प्रथमं देवतानामुपससार कस्य नूनं कतमस्यामृतानामित्येत-यर्चा । तं प्रजापतिरुवाच । अग्निर्वै देवानां नेदिष्ठस्तमेवोपधावेति । सोऽग्निमुपससार अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानामिति । पुनश्चाग्निप्रेरणया शुनःशेषः सवितारमुपससार । तं सवितोवाच वरुणाय वै राज्ञे नियुक्तोऽसि । तमेवोपधावेति । स वरुणं राजानमुपससार उत्तराभिरेकत्रिशता । पुनश्च वरुणप्रेरणया सोऽति तुष्टाव । तत्प्रेरणया विश्वेदेवान-स्तुवत । तत्प्रेरणया चेन्द्रं तुष्टाव | इन्द्रस्तुष्टस्तस्मै हिरण्यरथं ददौ । तस्मा इन्द्रः स्तूयमानाय प्रीतो मनसा हिरण्य-रथं ददौ । पुनश्चेद्रप्रेरणया सोऽश्विनौ तुष्टाव । अश्विप्रेरणया स उषसं तुष्टाव अत उत्तरेण त्यूचेन । तस्य ह स्म ऋयुक्तायां विपाशो मुमुचे । ( ऐ ० ब्रा ० ७/१६ ) । जल - शुद्धि आदि के द्वारा जितना उपकार होता है, उसको हम मानते हैं । इस प्रसंग में यह जिज्ञासा होती है कि क्या उत्पत्तिशील, अनित्य गंगा आदि नदियों की उत्पत्ति के पहले यह मन्त्र या या बाद में रचा गया? यदि मन्त्र पहिले हो या तो इसी प्रकार जमदग्नि, कप याज्ञवल्क्य आदि की भी उत्पत्ति के पहिले मन्त्र ब्राह्मण की सत्ता मानने से उनमें पौरुषेयत्न, अनित्यत्व नादि की सम्भावना नहीं रहेगी, इस प्रकार मन्त्रों के अर्थ को बदलने का प्रयत्न करना व्यर्थ है । यदि गंगा आदि की उत्पत्ति के बाद उन मन्त्रों की उत्पत्ति हुई हैं, तो फिर इनमें भी इतिहास अनिवार्य रूप से मानना पड़ेगा । यह जो कहा गया है कि ' तमितिहासच ' इस अथर्ववेद के मन्त्र में ब्राह्मण ग्रन्थों का ही ग्रहण है, भागवत आदि पुराणों का नहीं, इस पर हम पूछते हैं कि यह मन्त्र ब्राह्मणभाग की निर्मिति के पहिले बना या बाद में? यदि पहिले बना तो मन्त्र में इतिहास मानना पड़ेगा । ऐश होने पर भी यदि मन्त्रभाग वेद है, तो फिर ब्राह्मणभाग ने क्या अपराध किया है कि उसको वेद न माना जाय? ' कस्य नूनं ', ' अग्नेर्वर्य ' इत्यादि ऋग्वेद के मन्त्रों में शुनःशेप की कथा वर्णित है । इसका दूसरा अर्थ नहीं किया जा सकता. क्योंकि ऐतरेय ब्राह्मण में इसकी कथापरक व्याख्या हो की गई है । ' मैं अपने बचाव के लिये किसी देवता के पास दौड़ चलूँ, ऐसा सोचकर वह ' कस्य नूनं ' इत्यादि मन्त्र से स्तुति करता हुआ देवताओं में प्रथम प्रजापति के पास पहुँचा । उसको प्रजापति ने कहा कि देवताओं में aa सबसे नजदीक हैं, तुम उसके पास दौड़ जाओ । तब वह ' अग्नेर्वय ' इस मन्त्र का जप करते हुए अग्नि के पास पहुंचा । फिर अग्नि के कहने पर शुनःशेप सविता के पास गया । उसको सविता ने कहा कि मैं तुमको वरुण के पास जाने की सलाह देता हूँ । इसके बाद की ३१ ऋचाओं का पाठ करते हुए वह राजा वरुण के पास गया । पुनः उसने वरुण के कहने पर अग्नि की स्तुति की । अग्नि की प्रेरणा पर विश्वेदेवों का स्तवन किया और उनके कहने पर इन्द्र की स्तुति की । इन्द्र ने सन्तुष्ट होकर उसको हिरण्यरथ दिया । फिर इन्द्र के कहने पर उसने अश्विनीकुमारों की स्तुति को और उनके कहने पर बागे को तो ऋचाओं में शुनःशेप ने उषा देवी का स्तवन किया है । अन्तिम ऋचा के उच्चारण के साथ हो वह पाशमुक्त हो गया ' ।
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darfuture: ७०७ एवमेववंशी पुरूरवसोरितिहासोऽपि ऋक्संहितायां दशममण्डले पञ्चनवतितमे सूक्ते समुपलभ्यते । ' हये जाये मनसा तिष्ठ घोरे वचांसि मिश्रा कृणवावहै तु । न नौ मन्त्रा अनुदितास एते मयस्करन् परतरे च नाहन् ' || ( ऋ ० सं ० १० | ९ ५ | १ ) हे जाये घोरे क्षणं पूर्ववदनुरागवता चित्तेन मत्पार्श्व तिष्ठ । नौ आवयोः मन्त्रा एकान्तवाच अनुदितासोऽवशिष्यन्त एव । एते मन्त्राः परतरेऽन्ति दिनेऽद्य मयस्करन् सुखकरा भवन्ति । तथा चोक्तम्- किमेता वाचा कृणवा तवाहं प्राकमिषमुषसामग्रियेव । पुरूरवः पुनरस्तं परेहि दुरापना वात इवाहमस्मि || ' ( ऋ ० सं ० १०।९ ५।२ ) केवलया वाचा कि सिद्धयति? अहं प्राक्रमिषम् त्वामतिक्रम्य गतवत्यस्मि | हे पुरूरवः, त्वमस्तं गृहं परेहि गच्छ । अहं बात इव दुरापना दुष्प्रापास्मि । शतपथे चैवमेव व्याख्यातेयमृक् । ' दुरापा अहं त्वयैतस्मि पुनर्ग ' हानिहीति हैनमुवाच ' ( श ० ११ || १ | ७ ) | अयमितिहास: शतपथे व्याख्यात: - ' उर्वशी हाप्सराः पुरूरवसमैड चकमे । तं हविन्दमानोवाच त्रिः स्म मालो तसेन दण्डेन हृतादकामां स्म मा निपयास । मोस्म त्वा नग्नं दर्शमेष वै स्त्रीणामुपचार इति । सा हास्मिज्योगुवास । अपि हास्माद् गर्भिण्यास । तावज्ज्योग्धास्मिन्तुवास । ततो गन्धर्वाः ह ससूदिरे । ज्योग्वा इयगुर्वशी मनुष्येष्ववात्सादुपजानीत, यथेयं पुनरागच्छेदिति । तस्यैहाविद्वरणा शयन उपबद्धास । ततो ह गन्धर्वा अन्यतरमुरणं प्रमेथुः । सा होवाच अवीर इन बत मेऽजन इव पुत्रं हरन्तीति द्वितीयं प्रमेयुः । सा ह तथैवोवाच । अथ हायमीक्षांचक्रे । कथं नु तदवोरं कथमजनं स्यात् यत्राहं स्यामिति । स नग्न एवानुत्पपात । चिरं तन्मेने यद्वासः पर्य्यवारयत् । ततो हि गन्धर्वा विद्युतं जनयावनुस्तं यथा दिवैवं नग्नं ददर्श । ततो हैवेयं विरोध-भूव । पुनरंमीत्येत्तिरोभूतां स आध्या जल्पन् कुरुक्षेत्रं समया चचारान्यतः प्लक्षेति विसवती तस्यैहाध्यन्तेन वब्राज | तद्ध ता अप्सरस आतया भूत्वा परिपुप्लुविरे । तं हेयं ज्ञात्वोवाच । अयं वै स मनुष्यो यस्मिन्नहमवात्समिति | ता होचु-तस्मै वाविरसामेति । तथेति तस्मै हाविरासुः । तां हायं ज्ञात्वाभिपरोवाद । हये जाये मनसा तिष्ठ धोरे इत्यादिना । ' पुरूरवो मा मृथा मा प्रपप्तो मा त्वा वृकासो अधिवास उक्षन् । न वै स्त्रेणानि सख्यानि सन्ति सालावृकाणां हृदया-न्येता || ' ( ऋ ० सं ० १०।९ ५।१५ ) | इसी तरह ऋग्वेद के १० म मण्डल के ९ ५ में सूक्त में उर्वशी और पुरूरवा का इतिहास मिलता है । ' हृये जाये मनसा ' इस मन्त्र में पुरूरवा उर्वशी से कहता है कि हे जाये, इस विपत्ति के समय में तुम पहिले की हो तरह अनुराग युक्त चित्त से मेरे पास रहो । हम दोनों को एकान्त की बातें अभी पूरी नहीं हुई हैं । आज हमारे मिलन के अन्तिम दिन यह एकान्त वार्तालाप सुखमय हो ' । इसके उत्तर में अगले मन्त्र में उर्वशी कहती हैं कि - ' केवल वार्तालाप से क्या मिलने वाला है, अब मैं तुमको छोड़कर जा रही हूँ । हे पुरूरवा, अब तुम भी अपने घर जाओ । पवन को पकड़ पाना जैसे कठिन है, उसी तरह अब मुझे नहीं पा सकते । इस मन्त्र की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण में भी इसी तरह की गई है कि ' अब तुम मुझे नहीं पा सकते, अतः अपने घर जाओ, यह बात उर्वशी ने पुरूरवा से कही ' । शतपथब्राह्मण में इस कथा की व्याख्या इस प्रकार की गई है -- ' अप्सरा उर्वशा इला के पुत्र पुरूरवा को चाहने लगी । उसके साथ रहने के लिये उसने तीन शर्तें रक्खी: - १. दिन में तीन बार से अधिक समागम न करना, २. बिना इच्छा के समागम न करना और ३ नग्न न दिखाई देना | क्योंकि ये बातें स्त्रियों के शील सम्मान के विपरीत हैं । वह दिव्य अप्सरा उसके साथ सम्मानपूर्वक रहने लगी और वह गर्भिणी हो गई । इस पर गन्धर्व परस्पर बातें करने लगे कि यह दिव्य अप्सरा उर्वशी मनुष्यों में जाकर बस गई हैं, कैसे वह वापस आ | उर्वशी के शयन स्थान में दो भेड़ें बंधी हुई थीं । गन्धवों ने उनमें से एक भेड़ चुरा ली । इस पर उर्वशी चिल्लाने लगी कि हाय मेरे पुत्र को चुरा ले जा रहे हैं, जैसे कि मैं निर्बल और असहाय होऊ । गन्धवों ने दूसरी भेड़ को भी चुरा लिया और उर्वशी ने पुनः अपनी बात दोहराई । यह सुनकर पुरूरवा विचार करने लगा कि मेरे रहते उर्वशी मला निर्बल और असहाय कैसे हो सकती है । वह शयन से उठकर नंगा ही दौड़ पड़ा । उसने सोचा कि कपड़े पहनने में देरी हो जायेगा । इसी बीच गन्धवों में बिजली चमका दो दिन के समान प्रकाश हो गया और उसमें उर्वशी ने पुरूरवा को नंगा देख लिया | इसके साथ ही वह तिरोहित हो गई । कालान्तर में इधर - उधर भटकते हुए पुरूरवा को पहचान कर उर्वशी बोली कि यह वही मनुष्य है, जिसके साथ मैं रहीं थी ।
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७०८ दार्थ पारिजाता मर्तुमुद्यतं पुरूरवसं तानि वारयत्य आहुः - हे पुरूरवः, त्वं मा मृथाः मा च प्रपप्तः पर्वतेभ्य इति शेषः । मा च त्वा वृकास: अद्य: । स्त्रैणानि सख्याति न भवन्ति । एतासां सालावृकाणामित्र घोराणि हृदयानि चेतांसि भवन्ति । शतपथेऽपि तथैवोक्तम्-- ' मैतदादृथा न वै स्त्रैणं सख्यमस्ति । पुनर्गृ हानिहीति हैवनं तदुवाच ' ( ११ / ५ / ११ ९ ) । यथा शतपथे पारीक्षितजनमेजयस्य नामोल्लेखस्तथैवाथर्व संहितायां प्राह्लादेविरोचनस्य वैवस्वतस्य मनोवैन्यस्य पृयोर्नामोल्लेखा दृश्यते । ' सोदकामत् । सोऽसुरानागच्छत् । तामसुरा उपाह्वयन्त माय एहीति ॥९ ॥
' तस्या विरोचनः प्राह्लादिर्वत्स आसीत् || २ || ' ( अथर्व सं ० ८1१३ ) | ' तस्या मनुर्वैवस्वतो वत्स आसीत् । तां पृथी वैन्योऽ-घोक् । तां कृषि च सस्यं चाघोक् ' ( अथर्वसं ० ८/१३ | ११ ), ' सोदक्रामत् । सा सप्त ऋपीनागच्छत् । ' ( अथवंसं ० ८४१३१२ ) ( तां बृहस्पतिराङ्गिरसोऽघोक् ' ( अथर्व सं ० ८ | १३ | २५ ) । किं ब्राह्मणेषु लौकिकेतिवृत्तप्रदर्शनेनेषां वञ्चकनिमितत्वम्, अथवा ब्राह्मणग्रन्थानामपौरुषेयत्वाभावः, आहोस्वित्तेषामुत्पत्तिमत्त्वमादिमत्त्वं वा सिद्धयति? नाद्यः, लौकिकेतिहासेषु व्यभिचारात् । न द्वितीयः वेदानां सर्वविद्यास्थानत्वेन सृष्ट्य त्पत्तिस्थित्यादिक्रमाभिधानवद् ौकर्याय याज्ञवल्क्यादिसंवादमुखेन ब्रह्मविद्योपदेशेऽप्यपौरुषेयत्वानपायात् । न तृतीयः, सुखावबोधार्थ ब्राह्मणेषु तदाख्यानसत्त्वेऽप्यर्थं पूर्वकत्वविरहात् । तत एवानादित्वनित्यत्वसिद्धेरुक्तत्वात् । यदुक्तम्- ' सायणाचार्यादिभिर्वेदप्रकाशादिषु यत्र कुत्रचिदपीतिहासवर्णनं कृतम्, तत्सर्व भ्रममूलकमस्ति इति, तदप्यपास्तं वेदितव्यम्, दयानन्दभाष्यस्यैव भ्रान्तिमूलकत्वात् । तच्चानुपदं ' त्र्यायुषं जमदग्नेः ' ( वा ० सं ० ३/६२ ) इति मन्त्रव्याख्यान एव स्फुटम् । अप्सराओं ने कहा कि इसके सामने हम प्रकट हो जांय, उर्वशी की स्वीकृति मिलने पर वे प्रकट हो गई । उर्वशी की पहचान कर ही पुरूरवा ने ' हये जाये ' इत्यादि वाक्य कहा । इसका निराशाजनक उत्तर सुनकर पुरूरवा को आत्मघात के लिये उद्यत देखकर अप्सराएं उसको रोकती हैं और कहती है कि ' हे पुरूरवा, तुम पर्वत से गिरकर मत मरो, भेड़िये तुम्हारे मांस को न नोंचने पावें । स्त्रियों की किसी से मित्रता नहीं होती । इनका हृदय कुत्तों के समान क्रूर होता है ' । यही बात शतपथब्राह्मण में भी कही गई है कि ' इसको आदर मत दो | स्त्रियों से मित्रता नहीं होती । अब तुम घर जाओ ' । जैसे शतपथब्राह्मण में परीक्षित के पुत्र जनमेजय के नाम का उल्लेख है, उसी तरह अथर्ववेद में प्रह्लाद के पुत्र विरोचन का वैवस्वत मनु और वैम्य पृथु का नाम मिलता है । ' वह चलकर असुरों के पास आई । उसको असुरों ने बुलाया कि हमारे पास आओ । प्रह्लाद का पुत्र विरोचन इसी का बच्चा था ', ' मनु वैवस्वत उसका पुत्र था । उस पृथ्वी को वैन्य पृथु ने दुहा, कृषि और सस्य के रूप में ', ' वह चलकर सप्त ऋषियों के पास आई ', ' उसको आङ्गिरस बृहस्पति ने दुहा ' इत्यादि । ब्राह्मणों में लौकिक इतिहास मिलने से क्या यह सिद्ध होता है कि इनकी रचना बंधकों ने की है, अथवा ब्राह्मण ग्रंथ अपौरुषेय नहीं है या किसी समय इनकी रचना की गई है, अतः ये नित्य नहीं है? पहली बात इसलिये गलत है कि लौकिक इतिहासकार भी वंचक नहीं माने जाते । दूसरी बात भा इसलिये गलत है कि वेद सब विद्याओं के उत्पत्तिस्थान है, अतः यहाँ पर सृष्टि का उत्पत्ति, स्थिति आदि के क्रम को बताने पर भी, सरलता से समझाने के लिये याज्ञवल्क्य आदि के वार्तालाप के माध्यम से ब्रह्मविद्या का उपदेश होने पर भी इनकी अपौरुषेयता अक्षुण्ण रहती है । तीसरी बात भी गलत है, क्योंकि सरलता से समझाने के लिये ब्राह्मणभाग में उपाख्यानों का उपयोग होते हुए भी उनमें अर्धपूर्वकता नहीं है और इसीलिये इनमें अनादित्व और नित्यत्व माना जाता है, यह बात पहले विस्तार से बताई जा चुकी है । Free यह भी after हो जाता है कि ' सायण आदि आचार्यों ने वेदप्रकाश प्रभृति भाष्य - ग्रन्थों में जहाँ कहीं इतिहास का afa fear है, वह अन्तिमूलक है ' । इसके विपरीत दयानन्द का भाष्य ही भ्रमिमूलक है । इसका एक उदाहरण ' च्यायुषं जमदनेः ' इत्यादि मन्त्र के व्याख्यान की समालोचना कर दिखाया जा चुका है ।
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७०६ यच्च - ' ब्राह्मणग्रन्थानामेव पुराणेतिहामादिनामास्ति, न ब्रह्मवैवर्त - श्रीमद्भागवतादीनामिति निश्चीयते ', तदपि तुच्छम् गोतमसूत्रे ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहासपुराणानां प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते ' ( ४/१/६२ ) इति वात्स्यायनेन मुनिना ब्राह्मणभिन्नानामितिहासपुराणानां प्रामाण्यसिद्धये ब्राह्मणप्रमाणस्योपस्थापितत्वात् । तत्रैव ( ४१११६२ ) विषयव्यवस्थापनाच्च यथाविषयं प्रामाण्यमुक्तम् । यथा - ' यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, लोकव्यवहारव्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्थ, लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य विषयः । तत्रैकेन न सर्व व्यवस्थाप्यते, यथाविषयं तानि प्रमाणानि, इन्द्रियवत् | ' इति । अत एव ब्रह्मयज्ञविधाने सृत्रेषु ब्राह्मणग्रन्थेषु यद् ब्राह्मणानि इतिहासान् पुराणानि कल्पान् गाथा नाराशंसी: ' इत्यादीनि वचनानि ब्राह्मणातिरिक्तेतिहासपुराणबोधकानि दृश्यन्ते । ' ऋचो यजूंषि सामान्यथर्वाङ्गिरसी ब्राह्मणानि इतिहासपुराणानि ' आश्वलायनगृह्यसूत्रे, ' ब्राह्मणानि इतिहासपुराणानि ' तैत्तिरीयारण्यके ( २१ ९ ) । अथर्ववेदेऽ-पि - ' स बृहतीं दिशमनुव्यचलत् । तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्यचलन् । इतिहासस्य पुराणस्य गाथानां नाराशंसीनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद ' ( अथर्व संहिता १५ / ६ / १०-१२ ) इति प्रमाणेन ब्राह्मणग्रन्थेयो भिन्ना एवेतिहासपुराणादयो ज्ञायन्ते । यदुक्तम् — ' एतैः प्रमाणैर्ब्राह्मणयन्थानामेव ग्रहणं जायते न श्रीमद्भागवतादीनाम् । कुतः, ब्राह्मणग्रन्थेष्व-तिहासादीनामन्तर्भावात् ' ( पृ ० ९ ४ ) । तत्र देवासुराः संयत्ता आसन् ( श ० १३ | ३ | ४ | १ ) इत्यादय इतिहासा ग्राह्याः, ' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६१२११ ), ' आत्मा वा इदमग्र आसीत्, नान्यत्किञ्चन मिषत् ' ( ऐ ० उ ० १1१1१ ), ' आपो ह वा इदमग्रे सलिलमेवास ' ( श ० ११ ११६११ ), ' इदं वा अग्रे नैव किञ्चिदासीत् ' इत्यादीनि जगत: पूर्वावस्था-कथनपराणि वचनानि ब्राह्मणान्तर्गतान्येव पुराणानि ग्राह्याणि । कल्पा मन्त्रार्थसामर्थ्यप्रकाशकाः । तद्यथा-- ' इषे त्वोर्जेत्वेति वष्ट ' तदाह यदा त्वेत्यूर्जे त्वेति यो वृष्टादूर्ग, रसो जायते तस्यै तदाह ( श ० ११७/१/२ ), ' सविता वै देवानां प्रसविता यह कहना भी कुछ अर्थ नहीं रखता कि ' ब्राह्मण ग्रन्थ हो इतिहास और पुराण कहे जाते हैं, ब्रह्मवैवर्त, श्रीमद्भागवत आदि पुराण नहीं ', क्योंकि ४१ १३६२ संख्या के न्यायसूत्र के भाष्य में वात्स्यायन मुनि ने ' ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रमाण पर इतिहास - पुराण का प्रामाण्य माना जाता है ' इस प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थों से भिन्न इतिहास - पुराण की प्रामान्य सिद्धि के लिये ब्राह्मण वचनों के प्रमाण दिये है । वहीं पर यह भी बताया है कि इनमें से प्रत्येक का विषय विभक्त हैं- ' यज्ञ मन्त्र ब्राह्मण का विषय है, लोक व्यवहार की व्यवस्था धर्मशास्त्र में की गई हैं, और लौकिक इतिहास इतिहास ग्रंथों और पुराणों में वर्णित है । इनमें से कोई एक सबकी व्यवस्था नहीं कर सकता, इन्द्रियाँ जैसे अपने - अपने विषय के ग्रहण में प्रमाण हैं, उसी तरह ये शास्त्र भी अपने - अपने विषय में प्रमाण होंगे । ' इसलिये ब्रह्मयज्ञ के प्रतिपादक सूत्रों में और ब्राह्मण ग्रन्थों में ' ब्राह्मण, इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा, नाराशंसी ' इत्यादि वचन ब्राह्मण से अतिरिक्त इतिहास पुराण के बोधक हैं । ' ऋक्, यजुः, साम, अथर्व ब्राह्मण, इतिहास, पुराण ' यह गणना वाश्वलायन सूत्र की है । तैत्तिरीय आरण्यक में ' ब्राह्मण, इतिहास, पुराण ' यह उक्ति है । अथर्ववेद में भी बताया गया है कि ' वह व्रात्य विद्या की दिशा में मुड़ा तो उसके पीछे इतिहास, पुराण, गाथा, नाराशंसी चलने लगे । जो इस बात को जानता है, वह इतिहास, पुराण, गाथा, और नाराशंसी का प्रिय खजाना हो जाता है । इन सब प्रमाणों से यह मालूम होता है कि इतिहास, पुराण आदि ग्रंथ ब्राह्मण ग्रंथों से भिन्न हैं । दयानन्द का कहना कि ' इन प्रमाणों से ब्राह्मण ग्रन्थों का ही ग्रहण होता है, श्रीमद्भागवत आदि का नहीं, क्योंकि इतिहास, पुराण आदि शब्दों का अन्तर्भाव ब्राह्मणों में ही हो जाता है । यहाँ पर ' देव और असुर तैयार थे ' आदि वाक्यों में इतिहास बताया गया है । ' सौम्य, सृष्टि के आरम्भ में केवल एक सत् ही था, दूसरा और कुछ नहीं ', ' सृष्टि के आरम्भ में केवल एक आत्मा विद्यमान थी, अन्य कुछ नहीं ', ' सृष्टि के आरम्भ में केवल जल, चारों ओर पानी ही पानी था ', ' सृष्टि के आरम्भ में कुछ भी नहीं था ' इत्यादि जगत् को पूर्वावस्था के प्रतिपादक ब्राह्मण भाग के वचन हो पुराण, पद से अभिप्रेत हैं । कल्पसूत्र मन्त्रों के अर्थ और विनियोग को बताते हैं | जैसे कि ' इषे श्वोर्जे त्वा ' इस मन्त्र का विनियोग वृष्टि के लिये है । इसका अभिप्राय है कि दृष्टि से जो रस पैदा होता
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७१० वेदार्थपारिजातः सवितृप्रसूता ' ( ० १/७/१/४ ) इत्यादयो ग्राह्याः । गाथा याज्ञवल्क्यजनकसंवादः, यथा शतपथब्राह्मणे गार्गीमैत्रेय्यादीनां परस्परं प्रश्नोत्तरकथनयुक्ताः सन्तीति । ( वस्तुतस्तत्र गार्गीमैत्रेय्यादीनां परस्परप्रश्नोत्तरकथनयुक्ता गाथास्तु न सन्त्येव । दयानन्दस्तु तदनवलोक्यैव तथोक्तवान् ) । नाराशंस्यश्च -- अत्राहुर्यास्काचार्याः -- नाराशंसो यज्ञ इति काथक्यो नरा अस्मि -नासीना शंसन्त्यग्निरिति शाकपूणिः, नरैः प्रशस्यो भवति ( नि ० ८1६ ) । नृणां यत्र प्रशंसा नृभियंत्र प्रशस्यते ता ब्राह्मण-निरुक्तान्तर्गता एवं कथा नाराशंस्यो ग्राह्या नातोऽन्या: ' ( पृ ० ९ ५ ) इति । तदपि तुच्छम् तथात्वे ब्राह्मणेभ्यः पृथगितिहासपुराणात्लेखवैयर्थ्यापत्तेः । ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहास-पुराणानां प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते ' इति वात्स्यायनमुनिवचनविरोधाच्च । तथाहि न्यायसूत्रे ( ४/१/६२ ) इत्यत्र वात्स्या यनभाष्ये- ' चातुराश्रम्यविधानाच्चेतिहासपुराणधर्म शास्त्रेषु ऐकाश्रम्यानुपपत्तिः ' इत्युक्तम् । तत्रेतिहासपुराणधर्म. शास्त्राणामप्रामाण्यमाशङ्कय समाहितम् ' तदप्रमाणमिति चेन्न प्रमाणेन प्रामाण्याभ्यनुज्ञानात् । व्याख्यातं च स्ववाक्यं भाष्यकारेण ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते । ते वा खल्बेते अथर्वाङ्गिरस एतदितिहास -पुराणमभ्यवदन्निति पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदमिति । तस्मादयुक्तमेतदप्रामाण्यमिति । अप्रामाण्ये च धर्मशास्त्रस्य प्राणभृतां व्यवहारलोपाल्लोकोच्छेदप्रसङ्गः । प्रकारान्तरेण च तेषां प्रामाण्यमुपपादितं भाष्यकारेण - ' द्रष्टृ प्रवक्तू + सामान्याच्चाप्रामाण्यानुपपत्तिः, य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खत्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य च ' इति । प्रकारान्तरेण तदेवाह -- ' विषयव्यवस्थापनाच्च यथाविषयं प्रामाण्यम्, अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयोऽन्यच्चेतिहास-पुराणधर्मशास्त्राणामिति । यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थापनं धर्म-शास्त्रस्य विषयः, तत्रैकेन न सर्व व्यवस्थाप्यत इति यथाविषयमेतानि प्रमाणानीन्द्रियवत् । एतावता महर्षिर्वात्स्यायनो है, उसके लिये इसमें प्रार्थना की गई है ', ' सविता सब देवों का जनक है, वे सब उसी से उत्पन्न है ' ये ब्राह्मण वाक्य ही ' कल्पसूत्र ' कहलाते हैं । शतपथ ब्राह्मण से प्रश्नोत्तर के रूप में दिये गये याज्ञवल्क्य - जनक संवाद, गार्गी - मैत्रेयी आदि के संवाद ' गाथा ' कहलाते है । ( वास्तव में शतपथब्राह्मण में प्रश्नोत्तर के रूप में गार्गी मैत्रेयो संवाद उपलब्ध नहीं है, दयानन्द ने बिना देखे ही यह लिख दिया है । ) यास्काचार्य ने निरुक्त में ' नाराशंसी ' पद की निरुक्ति यह दी है-- ' काथवय के मत से नाराशंस यज्ञ को कहा जाता है । शाकपूणि का मत है कि मनुष्य इसमें बैठकर अग्नि की स्तुति करते हैं । जो मनुष्यों के द्वारा प्रशंसित होता है, वह नाराशंसी कहलाता है ' । इस तरह जिनमें मनुष्यों की प्रशंसा है, जहाँ मनुष्यों के द्वारा प्रशंसा की जाती है, वह ब्राह्मण, निरुक्त आदि में afra कथा ' नाराशंसी ' कही जाती है, इससे भिन्न नहीं ' दयानन्द की यह उक्ति इसलिये व्यर्थ है कि ऐसा होने पर ब्राह्मणों से पृथक् इतिहास, पुराण आदि का उल्लेख निरर्थक हो जायगा | ' ब्राह्मण वाक्य के प्रमाण से इतिहास - पुराण की प्रामाणिकता मानी जाती है ' इस वात्स्यायन मुनि के वचन का भी विरोध होगा | ४१/६२ संख्या के न्यायसूत्र के वात्स्यायन भाष्य में ' इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्रों में चार आश्रमों का विधान होने आश्रम एक ही है, यह बात नहीं मानी जा सकती ' ऐसा कहा है । वहाँ पर इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र प्रमाण नहीं हो सकते, ऐसी शंका कर उसका समाधान दिया गया है कि यह सब प्रमाण नहीं माने जा सकते, ऐसी बात नहीं है, प्रमाण के द्वारा उनकी प्रामाणिकता सिद्ध होती है ' । अपने इस वाक्य की व्याख्या स्वयं भाष्यकार ने इस प्रकार की है-- ' प्रमाणभूत ब्राह्मण वाक्यों के द्वारा इतिहास - पुराण की प्रामाणिकता मानी जाती है । अथर्ववेद के वाक्यों में ' पुराण पाचवाँ वेद है ' इस प्रकार इतिहास - पुराण की प्रशंसा की है । इसलिये इनको अप्रामाणिक बताना गलत है । धर्मशास्त्र को यदि प्रमाण नहीं माना जायगा ता प्राणियों के परस्पर व्यवहार का ज्ञान न रहने से उच्छृंखला फैल जायगी । भाष्यकार ने प्रकारान्तर से भी इनकी प्रामाणिकता का उपपादन किया है- ' इन सबके er और प्रदका समान हैं, इसलिये भी ये अप्रामाणिक नहीं हो सकते । जो मन्त्र और ब्राह्मण के द्रष्टा हैं, वे ही इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र के प्रवक्ता हैं । इसी बात को दूसरे रूप में इस प्रकार कहा है- ' इन सबका विषय व्यवस्थित है, अतः विषय के अनुसार ये प्रमाण है | मन्त्र और ब्राह्मण का विषय भिन्न है और इतिहास, धर्मशास्त्र, पुराण का विषय भित्र । मन्त्र और ब्राह्मण