वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 841–850
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 841–850
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८११ वस्तुतस्तु निरर्थकमेवायं कतिचिन्निरुक्तवचनाभ्युद्धृत्य प्रजल्पति । सायणादिभाष्येषु नैरुक्तपक्षस्यापि समादरो भवत्यैव, नैरुक्तमन्तरा क्वचित्केवलेन लिङ्गज्ञानेन याज्ञे कर्मणि देवतानिर्णयो दुःशक एव । ' इन्द्रं न स्वा १।१७ ) इत्यनेन्द्रस्य वायोश्च श्रवणात् कस्य देवतात्वं स्यात्? तदुक्तम्- लिङ्ग-शवसा देवतावायुं पुणन्ति ' ( नि ० बाहुल्यादेव देवतापरिज्ञानं दुर्लभम् । वस्तुतो यज्ञानुष्ठानं न केवलं लिङ्गज्ञानेन सम्पद्यते, किन्तु व्याकरणनिरुक्त-कल्पमीमांसानिर्णयानुसारमेव तद्भवति । तन्निर्णयानुसार माग्नेयोयमृक् । तस्मादग्नेरेवात्र प्राधान्यम् । मन्त्रस्वरूप-मिदम् -'स्वां हि मन्द्रतम मर्कशोकवृमहे महि नः श्रोष्यग्ने । इन्द्रं न त्वा शवसा देवता वायुं पृणन्ति रावसा नृतमाः ॥ ' ( ऋ ० सं ० ६/४७ ) । भरद्वाजस्थार्षम् । हे अग्ने! त्वां हि त्वामेव मन्द्रत मृदुतमं सुखाराध्यतमं ववृमहे संभजामहे । केन साधनेन अर्कशोकैः । अर्थ इति अर्चनसाधनं मन्त्र उच्यते । शोक इति यथोक्तब्रह्मचर्यपूर्व का-ध्ययनजनितवीर्य्यमर्थाद् दीप्तिरुच्यते । अर्थात् सम्यगध्ययन जनितवीर्य्यवद्भिरर्चनसाधनैर्मन्त्रैस्त्वां भजामहे । स त्वं नो मन्त्रैः सेव्यमानः, महि महत् स्तोत्रं युष्मद्गुणानुस्मृतिसन्तान गर्भेरुपग्रथितं स्तोत्रं श्रोषि शृणु । त्वं महती देवता । सर्वा देवतास्त्वामेकमिन्द्रमिव वायुमिव च शवसा वलेन बलकृतिस्तुतिभिरभ्यर्चन्ति किं पुनस्त्वदीयैः कर्मभिः । ये के च नृलोके बलधनश्रुतैर्नृतमास्तेऽपि च त्वामेव पृणन्ति पालयन्ति पूरयन्ति वा राधसा हविर्लक्षणेन धनेन । एवं सदैव मनुष्यस्य जगतः पूज्यस्त्वं न केवलमस्माकम् । अत्रास्यदेवताश्रवणेऽप्यग्नेः प्राधान्यात् स एव मुख्या देवता । यदप्युक्तम्- ' एक एवात्मा बहुबा स्तूयते ' ( नि ० ७१४ ), एकं ब्रह्मैव मुख्यं प्रतिपाद्यम्, अग्निवाय्वादय-स्तस्यैव गुणभेदेन नामभेद: ' ( पृ ० ५७ ) इति, तदपि न विचारचार, तथात्वे पूर्वोक्तमन्त्रसिद्धान्तविरोधात् । एकस्य ब्रह्मण एव प्रतिपाद्य देवतात्वे च प्राधान्याप्राधान्यविचारानर्थक्यप्रसङ्गात् । अत्राग्नेरेव प्राधान्यम्, तस्यैव देवतात्वं वस्तुतस्तु जिज्ञासु महोदय व्यर्थ ही कुछ निरुक्त के वचनों को पकड़ कर मनमानी बात कहने लगते हैं । सायण प्रभृति भाष्य में निरुक्त के पक्ष का भी आदर किया गया है । निरुक्त के बिना कोई भी केवल लिंग - ज्ञान से यज्ञ - कर्म में देवता का निर्णय नहीं कर सकता । ' इन्द्रं न त्वा ' इस मन्त्र में इन्द्र और वायु दोनों का उल्लेख होने से इसका देवता कौन होगा? कहा गया है कि केवल ' लिंग के बाहुल्य से देवता का परिज्ञान दुर्लभ है । वस्तुतः यज्ञ का अनुष्ठान केवल लिंग - ज्ञान से नहीं होता, किन्तु व्याकरण, निरुक्त, कल्पसूत्र, मीमांसा आदि के निर्णय के अनुसार ही वह होता है । उनके निर्णय के अनुसार इस मन्त्र का देवता व्यक्ति है । इसलिये यहाँ पर अग्नि का ही प्राधान्य माना जायगा । मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है- ' स्वां हि मन्द्र ० ' इत्यादि । इस मन्त्र का ऋषि भरद्वाज है । हे अग्ने, मैं आपकी ही सुखपूर्वक माराध्य मानकर भजता है । किस साधन से? अर्क और शोक से । पूजा का साधन मन्त्र ' अर्क ' कहलाता है । शोक का अर्थ यथाविहित ब्रह्मचर्य के पालनपूर्वक अध्ययन से उत्पन्न वीर्य अर्थात् दीप्ति है । इसका अभिप्राय यह हुमा कि सम्यग् अध्ययन करने से उत्पन्न हुए दीप्ति युक्त अर्चा के साधन मन्त्रों से आपकी सेवा करता हूँ । आप मन्त्रों से सेवित होकर इस उत्कृष्ट स्तुति को, जिसमें कि आपके गुणों को अनुस्मृति, सन्तान आदि का ग्रथन है, आप सुनें । आप सबसे बड़े देवता है । सभी देवता केवल आपको ही इन्द्र और वायु के समान आपके बल और यश का वर्णन करने वाली स्तुतियों से पूजा करते हैं । आपके कर्म के विषय में क्या कहा जाय । इस मनुष्य लोक में जो कुछ बल, धन, श्रुत आदि से भरा हुआ है, वह सब हवि आदि के माध्यम से आपकी ही सेवा और पूरण के लिये है । इसी कारण आप सारे जगत् के पूज्य हैं, केवल हमारे ही नहीं । इस मन्त्र में अन्य देवताओं का नाम भी सुनाई पड़ता है, किन्तु उनमें अग्नि प्रधान है, इसलिये वही इस मन्त्र का देवता है । यह कथन भी एक ही आत्मा अनेक प्रकार से सुनी जाती है, इस वचन के अनुसार एक ब्रह्म ही मुख्य प्रतिपाद्य है, अग्नि, वायु प्रभूति गुणभेद से उसी के नाम भेद है ', विचार करने पर ठीक नहीं लगता, क्योंकि ऐसा मान लेने पर पूर्वोक मन्त्र के सिद्धान्त से उसका विरोध होगा । यदि एक ब्रह्रा हो प्रतिपाद्य है और वही एक देवता है, तो प्रधान और अप्रधान देवता का विचार व्यर्थ हो जायगा | यहाँ पर अग्नि का ही प्राधान्य है, इन्द्र और वायु देवता का नहीं, यह कथन गलत हो जायगा । ऐसी परिस्थिति में
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८१२ वेदार्थपारिजातः नेन्द्रवाय्योरित्युक्तिरयथार्थेव स्यात् । देवताज्ञानस्य दीर्लभ्यमपि न संभवति, तथात्वे परमेश्वरस्यैव सर्वमन्त्रदेवतात्व निर्णयात् । निरुक्त ेऽपि तत्रैवान्यासां देवतानां तदङ्गत्वमुक्तम् । ' एकस्यात्मनोऽन्ये देवा: प्रत्यङ्गानि भवन्ति ' ( नि ०७४ ) | दुर्गाचार्योऽपि तथैवाह -- एकोऽपि सन् देवतात्मा बहुधा स्तूयते प्रकृतिभेदेन वाऽप्रकृतिभेदेन वा वर्धमानः । निगमो s पि हि भवत्यैश्वय्र्यख्यापक: - ' रूपं रूपं मघवा बोभवीति ' ( ऋ ० सं ० ३।५३।८ ) इति । किमेकस्यैवेश्वरस्य रूपभेदेन दैवतभेदं सामाजिक अङ्गीकुर्वन्ति? न चेत्, स्पष्टमेव निरुक्ततट्टीकाविरोधः । देवतानानात्वं निगमेन प्रख्याप्यत इति दुर्गा-चार्थः । छन्दसि दृष्टानुविधिः । नानात्वे देवतासंवादः प्रमाणम् । शुनःशेपाख्याने तत्तद्देवताप्रेरणयैव तत्तद्देवतानां स्तवनं वर्णितमेव | हविर्वहनादिकर्माणि च यावदभिधानं देवतानानात्वविधिव्यवस्था । ' इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः ' ( ऋ ० १११६४/४६ ) इत्यकात्म्यं च श्रूयते । तत्रैकात्म्यपक्षमाश्रित्य समाधानं माहाभाग्यादेकस्य देवतात्मन: प्रकृतिभेदेना-प्रकृतिभेदेन वा ऐकात्म्येऽपि नानात्वमुपपद्यते । ' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ' ( ऋ ० सं ० ६।४७११८ ) इति वचनेनापी-श्वरस्य मायाभिः शक्तिभेदेभिन्नरूपता व्यज्यते । ' चेतताचेतना विकरणघमित्वादात्मानं विकुर्वतोऽस्यान्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति ' इत्यपि दुर्गाचार्य: ( ७१४ ) निरुक्तव्याख्यायामाह । अग्नीन्द्रसूर्याणां परस्परापेक्षमन्यत्वमेकेन देवतात्मना ( परमेश्वरेण ) महता अनन्यत्वम् । ततोऽप्यधिकं मृदादिदृष्टान्तेन स्पष्टयति दुर्ग: --- ' यथा घटादीनां मृदा ' इति । यथा घटशरावादीनां परस्परं भेदेऽपि मृदात्मना तेषामनन्यत्वमेवं देवातानां सम्बन्धेऽपि ज्ञेयम् । सनातन सिद्धान्तस्येयमेव रीतिः । नह्यङ्गिनमङ्गानि व्यतिरिच्यन्ते, भेदेनाग्रहणात् । न वाङ्गान्यनपेक्ष्य प्रत्यङ्गानि भवन्ति । नह्यविष्ठानमनपेक्ष्य प्रत्यधिष्ठानं भवति । स एव महानात्मानीन्द्रसूर्य्याद्यङ्गप्रत्यङ्गभावेन देवता के ज्ञान में कोई कठिनाई भी नहीं रह जायगी, क्योंकि उक्त मत के अनुसार एक परमेश्वर ही सभी मन्त्रों का देवता निश्चित हो चुका है । निरुक्त में भी वहीं पर अन्य देवताओं को उसका अंग माना है कि एक आत्मा के अन्य देवता अंग होते हैं | दुर्गाचार्य का यहाँ पर कहना है कि एक ही देवता प्रकृति - भेद से अथवा अप्रकृति - भेद से बढ़कर अनेक रूपों में विद्यमान होता है और उसकी स्तुति भाँति भाँति से की जाती है । ' रूपं रूपं मघवा बोभवीति ' इत्यादि निगम बचन भी देवताओं के ऐश्वर्य को बताने वाला है । क्या माजी एक ही ईश्वर के रूप के भेद से देवताओं का भेद मानते हैं? यदि नहीं मानते तो स्पष्ट हो इस निरुक्त के वचन से और टीका से उनका विरोध होगा । दुर्गाचार्य ने स्पष्ट कहा है कि देवताओं का नानात्व निगम में प्रसिद्ध है । छन्द में दृष्टाविधि होती है । इनके नानात्व में देवताओं का संवाद भी प्रमाण है । शुनःशेष के आख्यान में उस उस देवता की प्रेरणा से ही शुनःशेष अलग अलग देवताओं के पास जाकर उनकी स्तुति करता है । हृवि के वहन कर्म में भी भिन्न भिन्न नामों के अनुसार देवताओं के नाव की सिद्धि होती है । ' इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि उसी एक परमात्मा को कहते है ' इत्यादि मन्त्रों में इनकी एकात्मता भी सुनी जाती है । इनमें से ऐकात्म्य पक्ष को लेकर समाधान इस प्रकार किया जाता है कि एक ही देवतात्मा के महदैश्वर्य के कारण प्रकृति-भेद से अथवा प्रकृति - भेद से नानात्व हो जाता है । ' इन्द्र माया का आश्रय कर अनेक रूप धारण कर लेता है ' इस श्रुतिवचन के प्रमाण से भी एक ही ईश्वर माया अर्थात् शक्ति के भेद कारण अनेक रूपों से अभिव्यक्त होता है | चेतन, अचेतन, अधिकरण धर्मा यह ईश्वर जब विकार रूप में अपने को परिणत करता है, तब अन्य देवता उसके अंग हो जाते हैं, यह ata free की व्याख्या में ही दुर्गाचार्य ने कही है | अग्नि, इन्द्र, सूर्य आदि देवता एक दूसरे से भिन्न है, किन्तु एक महान् देवता परमेश्वर से इनका अभेद भी है । मृदादि के दृष्टान्त से दुर्गाचार्य ने इस बात को और अधिक स्पष्ट किया है कि जैसे घट, शराव आदि का परस्पर भेद रहते हुए भी मिट्टी से बने होने के कारण इन सबकी समानता है, उसी तरह देवताओं के संबन्ध में समझना चाहिये । सनातन सिद्धान्त की यही रीति है । अंग अंगों से कभी होती । इसी तरह अंगों के बिना प्रत्यंगों को भी पृथक स्थिति नहीं है । अलग नहीं रहता, क्योंकि उसकी कभी अलग प्रतीति नहीं after की बिना अपेक्षा के प्रत्यधिष्ठान नहीं बनता । वही
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वार्थपारिजाता ८१३ व्यूहमनुभवनेकोऽपि सन् बहुधा स्तूयते ( नि ० टी ० ७ ४ ) | मूल एव निरुक्त ( ७१४ ) इति स्थले देवा इतरेतरजमान इतरेतरप्रकृतयश्चोक्ताः । अत एव मनुष्यधर्माद्देवताधर्मस्य भिन्नतोक्ता । इह तु अग्नेः सूर्य्यो जायते, ' एष प्रातः प्रसुवति ' ( मै ० सं ० १२५/७ ) । सूर्याच्चाग्निः सायं जायते - ' अदितेर्दक्षो अजायत दक्षाद्वदितिः परि ( ऋ ०१० ७२१४ ) | तथैव ' किमर्थमीश्वराः सन्तो देवा जायन्ते ' इत्याशङ्क्य समाहितम् -- देवतानां जन्मकर्मसिद्धये लोकस्य कर्मफल सिद्धये अग्निवायसूर्या जायन्ते । ऐश्वय्यं प्रख्यापनाय च तेषां जन्म भवति । कुतो जायन्ते देवा:? इत्याशङ्क्य आत्मन एव ते जायन्ते । यद्यपि सर्वमेव ततो जायते, तथापि देवतानां यथा कामकारेण स्वेच्छया संकल्पवशाज्जन्म तथा नेतरेषां मनुष्यादीनामनीश्वराणाम् । किमेवंविधा देवास्तेषां स्वेच्छया जन्म सामाजिकैरभ्युपेयते? न चेत्, कथं तेषां मतं निरुक्तसंमतम्? नैरुक्तदृष्ट्या यतस्ते ईश्वरास्तस्मादात्मनः संकल्पानुविधायित्वात् । ' आत्मैवेषां रथो भवत्यात्माश्व आत्मायुद्धमात्मेषवः ' ( नि ० ७१४ ) । किं सामाजिकैरीश्वरस्याश्वरथादि-रूपेण संकल्पवशात् प्रादुर्भावोऽभ्युपेयते? दुर्गाचार्यस्तु -- ' रथादिरूपेण देवतैवात्मानं विकृत्य प्रकृतिभेदेन स्थादिसाध्यमर्थं साधयति । सा तद्रूपा सती रथादिस्तुत्या स्तूयते ' ( नि ० ७1४ ) इत्याह । नहि सामाजिकेस्तदभ्युपेयते । निरुक्ते ( ७५ ) स्थले विविधपक्षाणां सामञ्जस्यमुक्तम् । आत्मवित्पक्षेण सर्वस्यैव प्रपञ्चस्यैक्यमुक्तम् । ' पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ' ( वा ० सं ० ३१।२ ) इति । याज्ञिकपक्षेण देवतानानात्वमेव, अभिधानभेदात् स्तुतिभेदाच्च । विधिमन्त्रार्थवादविद्यावशेन देवतानानात्वसिद्धिः । वस्तुतस्तु ' तिस्र एव देवता इति नैरुक्ताः ' ( नि ० ७।५ ) इत्यनेनापि सामाजिकमतमपनुद्यते । यतोऽत्र पृथिवीस्थानस्याग्नेरन्तरिक्षस्थानस्य वायोर्द्युस्थानस्यादित्यस्य स्थानभेदेन देवतात्रैविध्यमुक्तम् । ' प्रजापतिर्वै त्रीन् एक महान आत्मा इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि अंग - प्रत्यंग भाव से व्यूहित होकर एक ही अनेक रूपों में स्तुत्यर्ह बन जाता है । निरुक्त में देवताओं की एक दूसरे से जन्य - जनकता बताई गई है, अर्थात् एक ही देवता जिसकी प्रकृति हैं, उसी से वह उत्पन्न भी हो सकता है । इसलिये मनुष्य और देवताओं का स्वभाव free fr न कोटि का है । यहाँ पर तो प्रातःकाल अग्नि से सूर्य पैदा होता है और वही सूर्य सायंकाल अग्नि को पैदा करता है । अदिति से दक्ष पैदा होता है और दक्ष से अदिति पैदा होती है । देवगण ईश्वर हैं, तब वे क्यों पैदा होते हैं? इस आशंका का समाधान यह किया गया है कि देवतानों का जन्म कर्म के फल की सिद्धि के लिये | लोक को कर्म का फल देने के लिये अग्नि, वायु, सूर्य प्रभूति देवगण पैदा होते हैं । ऐश्वर्य की प्रसिद्धि के लिये भी उनका जन्म होता है । देवता किससे पैदा होते हैं? ऐसी आशंका कर ये देवगण स्वयं अपने से ही पैदा होते हैं, यह उत्तर दिया गया है । यद्यपि सब कुछ इन्हीं से पैदा होता है, तो भी देवताओं का जैसे स्वेच्छया अपने संकल्प से जन्म होता है, उस तरह का जन्म देवताओं से भिन्न इतर असमर्थ मनुष्य आदि का नहीं होता | क्या आर्यसमाजी इस तरह के देवताओं का स्वेच्छया जन्म मानते हैं? यदि नहीं मानते तो उनका मत निरुक्त - संमत कैसे हो सकता है? निरुक्त की दृष्टि में तो यह संभव है, क्योंकि ये ईश्वर है, अतः इनमें अपने संकल्प के अनुसार बदलने की सामर्थ्य है । ' इन देवताओं की स्वात्मा ही रथ, अश्व, बायुध और बाण भी होती है ' इस निरुक्त - वचन के अनुसार क्या आर्यसमाजी ईश्वर का ही अश्व रथ आदि के रूप में अपने संकल्प के अनुसार प्रादुर्भाव मानते हैं? दुर्गावार्य के अनुसार स्थादि के रूप में देवता ही अपने को विकृत, परिणत करके रथादि के द्वारा साध्य अर्थ को सिद्ध करती है । जब वह रथादि के रूप में परिणत हो जाती है, उस समय उसकी रथादि के रूप में स्तुति की जाती है । सामाजिक तो इस बात को नहीं मानते । निरुक्त में इसी प्रसंग में ( ७१५ ) fafa पक्षों का सामञ्जस्य बैठाया है । आत्मवित् के पक्ष से सारे प्रपंच का ऐक्य ' पुरुष एवेदं ' इत्यादि श्रुति के प्रमाण से बताया गया है । याज्ञिक पक्ष से देवताओं का नानात्व नामभेद से और स्तुतिभेद से सिद्ध किया गया है । विधि, मन्त्र, अर्थवाद, विद्या आदि के भेद से aari का नानात्व सिद्ध किया गया है ।
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८१४ दार्थपारिजाता महिम्नोऽसृजताग्नि वायुं सूर्यम् ' ( मै ० सं ० ४।२।१२ ) । नहीश्वरः स्वात्मानमेव रचयतीति स्वद्रीत्योपपद्यते । निरुक्त-दृष्टाऽप्यनेके पक्षाः सन्ति । अत एव ' अपि वा पृथगेव स्युः पृथग्धि स्तुतयो भवन्ति ' ( नि ० ७१५ ) इति याज्ञिक-पक्षोपन्यासः । ' माहाभाग्यात् ' ( नि ० ७१५ ) इत्याचार्येणात्र पृथक्त्वहेतुर्न प्रत्युक्तः । इष्ट एव हि याज्ञिकपक्षे प्रत्यभिधान-मर्थभेद इति दुर्गाचार्यः । याज्ञिकपक्षे भेदी मुख्योऽभेदो गुणतः । तत्रापि स्थानैकत्वसंभोगकत्वाभ्यामेकत्वमव्याहृतम् । यथा पृथिव्यां मनुष्याः पशवो देवा इति स्यानेकत्वं पृथिव्याः पर्जन्येन च संभोगैकत्वं दृश्यते, तथैवेतरयोरपि स्थानयो-द्रष्टव्यमितरेतरोपकारित्वम् । संभोगेकत्वं समानोपकार्यता । तत्तु भिन्नस्थानानामपि भवति । यथा पृथिव्याः पर्जन्येन च वाय्वादित्याभ्यां च संभोगः । लोकेऽपि येषां समानकार्यता भवति, तेषामैक्यव्यवहारः । भेदाभेदसामञ्जस्यानुरूपों दृष्टान्त उक्तः । राष्ट्रमित्यभेदः, नरा इति भेदः । एवं पृथिव्यग्निरित्यभेदः, जातवेदा वैश्वानर इति भेद: । आत्मेत्य '. भेदः, लोकाच लोकिनश्वेति भेदः । सर्वत्रैव सामान्यविशेषधर्मो द्रष्टव्यः । पुरुषबुद्धयपेक्षातच गुणधानता, अपेक्षा च पुरुषानुरागवशादित्यपि ( नि ० ७१५ ) इत्यत्र टीकायां स्पष्टम् | आत्मनि त्रिवान गुणीकृत्य तदङ्गप्रत्यङ्गभावेन कल्पयित्कमात्मानं पश्यन्ति ब्रह्मविदः । नानैकत्वे गुणीकृत्य त्रित्वं पश्यन्ति नैरुक्ताः । त्रित्वैकत्वे गौणीकृत्य नानात्वं याज्ञिका मन्यन्ते । एवं देवतानामाकारचिन्तनेऽपि भेदः । ' पुरुषविधा: स्यु: ' ( नि ० ७१६ ) | यतश्चेतनावतामेव स्तुतयो भवन्ति । अचेतनाः पाषाणादयः, अल्पचेतनाः पश्वादयश्च न स्तूयन्ते । संवादसूक्तेषु परस्परमुक्तप्रत्युक्तानि भवन्ति । यथा -- ' कुतस्त्वमिन्द्र ' ( ऋ ० १।१६५ / ३ ) इति । तस्मात् पुरुषविधत्वमेव देवानाम् । यतो हि - पौरुषविधिकैरङ्गैः इसी तरह ' वास्तव में तीन ही देवता है, यह नैरुक्तों का मत है इस निरुक्तन्वचन से भी सामाजिकों का मत खण्डित हो जाता है | क्योंकि यहाँ पर पृथिवीस्थानीय अग्नि, अन्तरिक्षस्थानीय वायु और माकाशस्थानीय आदित्य का स्थानभेद के कारण वैविध्य उक्त है । ' प्रजापति ने अग्नि, वायु और सूर्य इन तीन महिमामंडित देवताओं की सृष्टि की ' यहाँ पर ईश्वर अपनी ही रचना करे, यह आपके मत से नहीं बन सकता । निरुक्त की दृष्टि से तो अनेक पक्ष हैं । इसीलिए ' अथवा ये पृथक ही होंगे, क्योंकि इनकी अलग - अलग स्तुतियाँ हैं ' यहाँ पर याज्ञिक पक्ष उपन्यस्त किया गया है । यहाँ पर आचार्य ने पृथक्त्व के हेतु के रूप में महाभाग्यता को उपन्यस्त नहीं किया है । याज्ञिक पक्ष में प्रत्येक अभिधान के साथ अर्थ का भेद भी इष्ट हैं । याज्ञिक पक्ष में भेद मुख्य और मभेद गौण । यहाँ पर भी स्थान की एकता और संभोग की एकता के कारण एकत्व में कोई बाधा नहीं उपस्थित होती । जैसे पृथिवी में मनुष्य, पशु और देवताओं के स्थान की एकता है, उसी तरह पृथिवी के साथ पर्जन्य के संभोग की एकता है । इसी तरह अन्तरिक्ष और आकाश में भी इतरेतर की उपकारिता समझनी चाहिये | संभोग की एकता समान उपकारकता को कहते है । यह भिन्न स्थान बालों की भी होती है । जैसे कि पृथिवी की पर्जन्य से और वायु तथा आदित्य से भी संभोग की एकता है । लोक में भी जिनका समान कार्य होता है, उनमें ऐक्य व्यवहार होता है । भेद, अभेद और सामंजस्य के अनुरूप दृष्टान्त दिये गये हैं । राष्ट्र पद अभेद का बोधक है, मनुष्य पद भेद का । इसी तरह अग्नि शब्द अभेद का बोधक है और जातवेदा वैश्वानर आदि पद भेद के । आत्मा पद अभेद का बोधक है, लोक और लौकिक यह भेद को बताते हैं । सभी जगह सामान्य और विशेष धर्मों के कारण यह होता है । पुरुष- बुद्धि की अपेक्षा के अनुसार गोण और प्रधान व्यवहार हुआ करता है । अपेक्षा पुरुष के अनुसार अनुराग. होती है । यह बात भी वहीं पर ( ७१५ ) निरुक की टीका में स्पष्ट है । अपने में त्रित्व और नानात्व को गौण करके उनकी अंग और प्रत्यंग भाव से कल्पना करके ब्रह्मवेत्ता अपने को एक ही देखता है । नानात्व और एकत्व को गौण मानकर निरुक्तकार उसमें त्रित्व बुद्धि रखते हैं और त्रित्व और एकत्व को गौण करके याज्ञिक गण इनमें नानात्व मानते हैं । इसी तरह देवताओं के आकार की चिन्ता के विषय में भी मतभेद हैं । निरुक्त का कहना है कि देवता पुरुषों के समान होते हैं, क्योंकि चेतनायुक्त प्राणी की ही स्तुति की जा सकती है । अचेतन पत्थर आदि और अल्प चेतना वाले पशु आदि की स्तुति नहीं की जाती । संवाद सूक्तों में परस्पर उक्तिप्रत्युक्तियों रहती हैं । जैसे कि ' हे इन्द्र, तुम कहाँ से आये ' । इसलिये देवता पुरुषों के
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वेदार्थपारिजातः स्तूयन्ते । तद्यथा ' ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उपस्थेयाम शरणा बृहन्ता ' ( ऋ ० ६१४७८ ) ( नि ० ७१६ ) हे इन्द्र! ऋष्वौ शत्रूणां रेषणो स्थविरस्य महतस्तव बृहन्तो महान्तौ बाहू शरणी आश्रयणीयौ नित्यं उपस्थेयाम उपतिष्ठेम । इत्यादिमन्त्रेषु इन्द्रदेवताया बाहुस्तुतिः श्रूयते । तेन पुरुषविधता विग्रहवत्त्वं विज्ञायते देवानाम् । तथैव द्रव्यविशेषसंयोगाच्च पुरुषविधत्वं साधितम् । ' आ द्वाभ्यां हरिम्यामिन्द्र याह्या चतुभिरा षड्भिर्हृय-मानः । आष्टाभिर्दशभिः सोमपेयमयं सुतः सुमख मा धस्कः ॥ ' ( ऋ ० २११८१४ ) । हे इन्द्र! यदि तावद् अस्माभि-यमानः लव द्वौ हरी संनिहितौ ततस्तावेव युक्त्वा ताभ्यामायाहि । अथ चत्वारस्ततस्तैश्चतुभिः अथ षट् ततस्तैः । अथाष्टौ ततस्तैः । अथ दश ततस्तैरायाहि । इदं सोमपेयं सोमपानकर्म प्रति । यतः सुतः, अभिषुतः सोमस्त्वदर्थम् । स एवं हे सुमख सुधनमा अन्तरा केनचित् मृधः संग्रामं कार्षीः । अविलम्वितमागच्छेत्यर्थः । अनेन अश्वयुक्तेन रथेन इन्द्रः सोमपानार्थं मखेष्वाहूतः शीघ्रं यातीति ज्ञायते । एवम् -'अपाः सोममस्तमिन्द्र प्रयाहि कल्याणीर्जायाः सुरणं गृहे ते ' ( ऋ ० ३।५३ / ६ ) | हे इन्द्र! सोमं पीतवानसि स त्वं पुनः अस्तं गृहं प्रयाहि । यस्मात्तव गृहे कल्याणोः जायाः । तत्र बृहतो रथस्य निधानं रथशाला । विमोचनं च वाजिनः । संग्रामं जिल्वागतस्य अन्यदपि यद्रमणीयम् त्सर्वं तव गृहे वर्तते । तस्मात् पुनरस्तं प्रयाहि । नह्येतत् सर्वमचेतनस्यात्पचेतनस्यापुरुषविधस्य चोपपद्यते । ' अद्धीन्द्र पिब च प्रस्थितस्य ' ( ऋ ० सं ० १० ११६/७ ) । हे इन्द्र! हविराज्यादिकमद्धि भक्षय, प्रस्थितस्य हविर्धानादुत्तरवेदि प्रति प्रस्थापितस्य सोमस्य च स्वमंशं पिब | ' आ श्रुत्कर्ण श्रधो हवं ( ऋ ० १११० / ९ ) | हे कर्ण आभिमुख्येन श्रधि शृणु त्वमाह्वानमस्माकम् । एवमादीनि कर्माणि पुरुषविधस्यैव संभवन्ति । नहि गवादयोऽद्धि शृणुहीत्युक्ताः किञ्चित् प्रतिपद्यन्ते । तस्मान्मनुष्यवदेव देवतानां कार्यकरणसंनिवेश इत्येकः पक्षः । सदृश ही है | इनकी स्तुति में भी पुरुषों के समान ही अंगों का वर्णन है । जैसे कि ' ऋष्या न इन्द्र ' इत्यादि मन्त्र में इन्द्र के बाहू की स्तुति है । मन्त्र का अर्थ इस प्रकार हैं कि हे इन्द्र, शत्रुओं को रुला देने वाले तुम्हारे जैसे महान् देवता के बलशाली बाहु शरण ग्रहण करने योग्य हैं, उनकी शरण में हम नित्य उपस्थित रहना चाहते हैं । इससे देवता की पुरुषों के समान शरीरधारिता सिद्ध होती है । इसी तरह द्रव्यविशेष के संयोग से भी देवताओं की पुरुषों के आकार से समानता साबित होती है । जैसे कि ' आ द्वाभ्यां ० ' इत्यादि मन्त्र से यह ज्ञात होता है कि सोमपान के लिये यज्ञ में आहूत इन्द्र अश्वयुक्त रथ से शीघ्र पहुँच जाता है । मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है- ' हे इन्द्र, यदि हम आपको बुलावें, उस समय आपके पास दो घोड़े हों तो उन्हीं को जोतकर हमारे पास शीघ्र आ जाओ । यदि चार हों तो उनके साथ, है हों तो उनको जोतकर, आठ हों तो उनके साथ अथवा यदि दस हों तो उनके साथ आप आवे | इस सोमरस को पीने के लिये । क्योंकि हमने तुम्हारे लिये सोम का रस निकाल लिया है । हे सुमुख सुधन इन्द्र तुम बीच में किसी से लड़ाई करने में मत लग जाना । तुम हमारे पास शीघ्र ही आजानो ' । इसी तरह का एक दूसरा मन्त्र ' अपाः सोम ० ' इत्यादि है । इसका यह अर्थ है -- हे इन्द्र, तुमने सोमपान कर लिया है । अब तुम पुनः अपने घर जाओ । क्योंकि तुम्हारे घर में कल्याणी पत्नी है, रथ को रखने के लिये बड़ी रथशाला है और घोड़ों के लिये घुड़साल है । संग्राम को जीत कर आये हुए व्यक्ति के लिये सभी रमणीय वस्तुओं का संग्रह तुम्हारे घर में हैं । इसलिये तुम पुनः अपने घर चले जाओ ' | ये सब बातें अचेतन अथवा अल्पचेतन पुरुष - भिन्न. किसी प्राणी में संभव नहीं हो सकती । इसी प्रकार ' अद्धीन्द्र ' इस मन्त्र में कहा गया है कि है इन्द्र, तुम हवि, आज्य उत्तर वैदि में स्थापित सोमरस का पान करो ' । इसी तरह से ' आ क इस मन्त्र में कहा तरफ से हमारे आह्वान को सुनो । इस तरह की बातें पुरुष के समान प्राणी में ही संभव हो आदि कहने से कुछ भी नहीं समझ सकते । इसलिये मनुष्यों के समान ही देवताओं का शरीर यह एक पक्ष है । आदि के अपने अंश का भक्षण करो, गया है कि हे कर्ण, तुम चारों सकती है । गाय आदि पशु ' सुनो ' इन्द्रिय आदि का ढाँचा होता है,
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८१६ वार्थपारिजातः अपुरुषविधा देवता इत्यपरः । ' अपां च ज्योतिषश्च मिश्रीभावकर्मणो वर्षकर्म जायते । तत्रोपमार्थेन युद्ध + वर्णा भवन्ति ' ( नि ० २/१६ ), ' तस्मादाहुर्नैतदस्ति यद्देवासुरम् ( शतपथे ११।१।६।९ ), ( न त्वं युयुत्से ' ( श ० ११।१।६।१० ) इत्याद्युक्तः । ' अपुरुषविधं तद्यथाग्निर्वायुरादित्यः पृथिवी चन्द्रमा इति ' ( नि ० ७ ७ ) । वेत्तनावत्स्तुतिमत्त्वं नहि देवानां पुरुषविधत्वे हेतु:, अक्षप्रभृत्योषधिपर्व्यन्तानामचेतनानामपि स्तूयमानत्वात् । पौरुषविधिकैरङ्गः संस्तूयन्त इत्यप्यहेतुर्देवानां पुरुषविधत्वे, ग्राव्णां तथैव स्तूयमानत्वात् । एते वदन्ति शतवत् सहस्रवदभिक्रन्दन्ति हरितेभिरासभिः । विष्ट्वी ग्रावाणः सुकृतः सुकृत्यया होतुश्चित् पूर्वे हविरद्य भासत || ( ऋ ० १० / ९ ४ १२ ) अर्बुदस्यार्षम् । एते ग्रावाणः अभिषवाख्यं कर्म कुर्वाणाः शतवत् सहस्रवद् वदन्ति शब्दबाहुल्याभिप्रायेण । अभिक्रन्दन्ति आह्वयन्ति सोमपातॄन् आगच्छतास्माभिरभिषुतं सोमं पातुम् । येयं ग्राव्णां विष्ट्वी अभिषवानुकूला किया, तथा सुकृत्या शोभनया क्रियया एते सुकृतः शोभनस्य कर्मण: कर्तारः, होतुश्चित्पूर्वे होतुरप्यग्नेः 1 मनुष्यहोतुर्वा पूर्वं प्रथमतरं हविः, एतत् सोमाख्यम् अद्यम् अदनीयं हरितेभिर्हरितवर्णैः आसभिरास्यः, आशत अश्नन्ति । अत्र सोमसंयोगमात्रमशनं ग्राव्णामुपचय्र्यंते । तथैवेन्द्रादीनामपि भावनामयं बहुमुष्ट्यादिभिः स्तुतिः स्यात् । यथैवास्यादिकल्पना दृष्टव्यभिचारित्वाद् ग्रावप्रभृ + तिषु न संभवति, रूपकमात्रं स्तुत्यर्थं हि तत्, तथैव हरिरथजायादिस्तुतयो रूपकमात्रम् । ' सुखं रथं युयुजे सिन्धुरश्विनं तेन वाजं सनिषदस्मिन्नाजौ । महान् ह्यस्य महिमा पनस्यतेऽदब्धस्य स्वयशसा विरप्शिनः ॥ ' ( ऋ ० १० १७५१ ९ ) । सिन्धुक्षितः प्रियमेधसः पुत्रस्यार्थम् । सिन्धुः नदी सुखहेतुं यतो रथमुदकमश्विनम् अशनेन व्यापनेन उदकस्थं युक्तवती, तेन वाजम् । अन्नं सनिषत् संभक्तवती उत्पादितवती । अस्मिन्नाजी संग्रामे यतो यतो गच्छति ततस्ततो व्रीह्याद्यन्नाद्यमभिनिष्पादयति । तस्मादेवास्य अदब्धस्यानुपक्षीणस्य विरप्शिनः शब्दकारिणोऽश्विन-स्योदकस्थस्य महान् महिमा महाभाग्यं पनस्यते स्तूयते स्वोतृभिः । अत्राणि रूपकोपन्यासेन स्तुतिः | ' होतुश्चित् पूर्वे हवि-दूसरे पक्ष का कहना है कि देवता मनुष्यों से भिन्न होते हैं । जल और ज्योति के मिश्रण से वर्षा होती हैं । यहाँ पर उपमा के रूप में ' युद्ध का सा वर्णन किया गया है । इसीलिये कहा गया है कि ' यह युद्ध देव और असुर के समान नहीं है ', ' तुम नहीं लड़ते हो ' इत्यादि उक्तियों युद्ध के वर्णनों में प्रमाण हैं । अग्नि, वायु, आदित्य, पृथिवी और चन्द्रमा ये अपुरुषविध हैं, अर्थात् इनका आकार पुरुषों के सदृश नहीं है | चेतन के समान स्तुति किये जाने मात्र से देवगण पुरुषों के सदृश नहीं माने जायेंगे, क्योंकि अश्व से ater पर्यन्त अचेतन द्रव्यों की भी स्तुति की गई है । पुरुषों के सदृश अंगों के रूप में देवताओं की स्तुति की जाती है, अतः दे पुरुषों के सदृश होंगे, यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि पत्थरों की भी स्तुति की गई है, ' एते वदन्ति ० ' इत्यादि ऋचा के अर्बुद ऋषि हैं । इस मन्त्र का अर्थ यह है- ' ये पाषाण सोम का रस निकालते समय सैकड़ों, हजारों तरह से बोलते हैं । इसका यह अभिप्राय है कि सिल और लोढी की रगड़ से अनेक तरह के शब्द होते हैं । ये सोमपान करने वालों को बुलाते हैं कि हमारे द्वारा निकाले गये रस को पीने आयो । पाषाणों की इस सोमरस को निकालने की सुन्दर क्रिया से ये हवन कर्ता का भला करते हैं । ये अग्नि और होता मनुष्यों से भी पहले सर्वप्रथम अदनीय सोमरूप हवि को अपने हरित वर्ण के मुँह से ग्रहण करते हैं ' । यहाँ पर सोम से संयोग मात्र हो अशन, अर्थात् भोजन पाषाणों में उपचरित है । इसी तरह इन्द्र प्रभृति में भी भावनामय बाहु, मुष्टि आदि से स्तुति की जा सकती है । जैसे कि पाषाण आदि की मुँह आदि की कल्पना प्रत्यक्ष विपरीत है, उसी तरह हरि, रथ, जाया आदि की कल्पना भी केवल स्तुति के लिये रूपकमात्र है । ' सुखं रथं ० ' इत्यादि मन्त्र में भी रूपक के माध्यम से स्तुति की गई है । इसका यह अर्थ है - ' सिन्धु नदी ने सुखपूर्वक चलने के लिये जल में व्याप्त होकर उसी को रथ बनाकर जोत लिया । उसने उससे अन्न पैदा किया । इस संग्राम में वह जहाँ - जहाँ जाती है, वहाँ वहाँ व्रीहि आदि अन्न पैदा करती है । इसीलिये जिसकी गति कहीं क्षीण नहीं होती, शोर मचाने वाले इस उदक - रथ की महिमा स्तुति गायकों के द्वारा गाई जाती है । इसी तरह ' होतुश्चित्पूर्वे ० ' इत्यादि मन्त्र में भी पाषाण की अशनशक्ति की क्रिया के
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वेदापारिजातः ८१७ रमाशत ' ( ऋ ० १० १ ९ ४१२ ) इत्यादी यथाशनशक्तिक्रियया ग्राव्णां स्तुतिः । एते ग्रावाणो वदन्ति ' इत्यादि कर्माण्य-प्यौपचारिकाण्येव तथैवेन्द्रादिष्वपि कल्पनामयान्येव कर्माणोति । ' अपि वोभयविधा: स्यु: ' ( ७/७ ) इति वचनेन निरुक्तकार: समन्वयमाह, उभयहेतुप्रामाण्यात् । अपुरुषविधाः क्षितिजलादय:, तदधिष्ठातारः पुरुषविधाः । तथा सति प्रत्यक्षागमयोरुभयोरपि प्रामाण्यमबाधितं भविष्यतीति दुर्गाचार्याशयः । ' एष चाख्यानसमय: ' ( नि ० ७।७ ) इत्यपि यास्केनोक्तम् | दुर्गाचार्योऽपि --- ' भारते चाख्यानसमयः । एष एव सिद्धान्त इत्यर्थः । पृथ्वी स्त्रीरूपेण भारावतारणाय ब्रह्माणं ययाचे ( महाभारते आदिपर्वणि ६४ अध्याये ), अग्निश्च ब्राह्मणरूपेण वासुदेवार्जुनावुभौ खाण्डवं ययाचे ( २२४-२२५ आ ० प ० महाभारते ) । तदेतत् चतुर्धा भिद्यते, मन्त्रार्थ-दर्शनादेव | पौरुषविध्यमपौरुषविष्यं कर्मार्थोभयविध्यं नित्यमौभयविध्यमेवेति । सर्वं चैतदुपपद्यते । माहाभाग्ये सत्यैश्वर्य्यात् कथमिव देवता न स्याद् अमृर्ता मूर्ता एकधा द्विधा बहुधा वेति । यथा तु वर्तमानमपश्यन् मन्त्रदृशस्तथा तथास्तुवन्, सर्वथैवादोष:, फलदर्शनात्तानावस्थादर्शनवदाख्यातॄणाम् । परिदेवना निन्दादिष्वपि चेन्द्रादीनां कामतस्तद्रूप-मवस्थितानां सा सा स्तुतिरेव न निन्दा । उक्तं च- ' होना न निन्दा स्तुतिरेव सा स्याद् देवान् मर्त्यः सम्यगभिष्टुयात् कः । शक्तिक्षयेऽप्यध्यवस्यन्ति शिष्टाः स्तोतुं न पश्यन्ति गति यतोऽत्याम् ॥ ' इति ( ७१७ नि ० टीकायां दुर्ग: ) । दुक्तम् ' यस्य मन्त्रस्य योऽर्थस्तदनुसार्येव मन्त्राणां विनियोगः । अन्यथा विनियोग उक्त एवं ' ( नि ० १।१६ ) ( पृ ० ५७ ) इति, तदपि तुच्छम् ' ऐन्द्रचा गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' इति श्रुत्या इन्द्रस्तुतिपराया अपि गार्हपत्याग्न्युपस्थाने विनियोगदर्शनात् । ( नि ० १११६ ) इत्यत्र तु लैङ्गिको विनियोगोऽर्थज्ञानमात्रेण न संभवतीत्युक्तम् । ' इन्द्रं नत्वा शवसा देवता वायुं पृणन्ति ' ( नि ० १/१७ ) इत्याद्यैन्द्रवाय्वाद्यनेकलिङ्गदर्शनादर्थज्ञानमन्तरेण प्राधान्याप्राधान्या निर्णयाज्ञानेन माध्यम से स्तुति की गई है । ये पाषाण बोलतें हैं, इत्यादि क्रियाएँ जैसे औपचारिक हैं, उसी तरह इन्द्र प्रभूति में नाना प्रकार के कर्म कल्पना प्रसूत है । इस परिस्थिति में निरुक्तकार ने समन्वय का रास्ता निकाला है कि देवता पुरुषविध और अपुरुषविध दोनों तरह के होते हैं, क्योंकि दोनों तरह के प्रमाण मिलते हैं । पृथिवी, जल नभृति अनुरुषविध और उनके अधिष्ठातागण पुरुषसदृश हैं । ऐसा होने से प्रत्यक्ष और आगम दोनों का प्रामाण्य बाधित नहीं होगा, यह दुर्गाचार्य का कहना है । ' यही महाभारत आदि का सिद्धान्त है । यह भी यास्क ने कहा है | दुर्गाचार्य ने यहां कहा है कि महाभारत में आख्यान सिद्धान्त प्रतिपादित है । पृथ्वी ने स्त्री का रूप धारण कर उसका भार हलका करने के लिये ब्रह्मा से प्रार्थना की, यह कथा महाभारत के आदिपर्व में है । अग्नि में ब्राह्मण का रूप धारण कर वासुदेव और अर्जुन से खाण्डव वन को जलाने में सहायता करने की प्रार्थना की । इस प्रकार यह देवताओं का स्वरूप मन्त्रार्थ के आधार पर चार प्रकार का होता है - एक पुरुषविध, दूसरा अपुरुषविध, तीसरा कर्मार्थोभयविध तथा चौथा नित्योभयविध | यह सब उपपन्न हो जाता है । महान् भाग्य अर्थात् ऐश्वर्य के कारण देवता अमूर्त मूर्त, एक, अनेक, दो आदि क्यों नहीं हो जायेंगी? मन्त्रद्रष्टानों ने वर्तमान में जिस रूप में देवता को देखा, उसी रूप में उसकी स्तुति की । इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि सभी प्रकार से देवताओं की उपासना करने पर फल मिलता ही है । आख्या के भेद से नाना अवस्थाओं का दर्शन होता है । परिदेवन, निन्दा आदि वाक्यों में भी इन्द्रादि के इच्छानुसार रूप धारण करने के कारण उसकी स्तुति ही होती है, निन्दा नहीं । कहा भी गया है --- देवता में कुछ कमी बताना भी उसकी निन्दा नहीं है, वह उसकी उत्कृष्ट स्तुति ही है । क्योंकि ऐसा कौन मनुष्य है, जो कि ठीक तरह से देवता की स्तुति कर सके । शिष्टगण शक्ति के क्षीण हो जाने पर भी स्तुति में निरत रहते हैं, क्योंकि वे अन्य कोई उपाय नहीं देखते । यह बात वहीं पर अपनी टीका में कही है । यह कहना कि जिस मन्त्र का जो अर्थ है, तदनुसार ही उसका विनियोग कहा गया है, यह निरुक्त का कथन है, किन्तु यह भी तुच्छ बात है, क्योंकि ' ऐन्द्री ऋचा से गार्हपत्य का उपस्थान करता है ' इस श्रुति में इन्द्र की स्तुति होने पर भी गार्हपत्य अग्नि के उपस्थान में विनियोग देखा गया है । निरुक में यहाँ पर यही कहा गया है कि ratna से लैंगिक विनियोग नहीं हो सकता | ' इन् न त्वा ' इत्यादि में इन्द्र, वायु आदि अनेक लिंगों के दर्शन से अर्थज्ञान के बिना प्रधान और अप्रधान का निर्णय न १०३
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वैवार्थपारिजातः श्रीतो विनियोग बाधितुं शक्यः, लिङ्गाद्यपेक्षया श्रुतेः प्राबल्यात् । ' श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात् ' ( मी ० सू ० ३१३/१३ ) इति न्यायात् । एतेन दयानन्दीयभाष्यं निरुक्ताद्यार्ष ग्रन्थविरुद्धमेव ज्ञातव्यम् । पाणिनिपतञ्जल्यादिविरुद्धमिति लु प्रदर्शितमेव । यत्तु ब्रह्मदत्त उक्तवान् - ' सायणभाष्यात् प्राचीन भाष्यकाराणां नैव मौलिकभेद आसीत् । सर्व एवं याज्ञिकवादस्थूणानिवद्धा एव । वहो: कालाद् वेदार्थः संकुचितरूप आसीत् । तत्र पूर्व भाष्यकारेषु स्कन्दस्वामि दुर्ग-( निरुक्तटीका ) - उद्गीथ - हरिस्वामि - उब्वट वररुचि ( निरुक्तसमुच्चय ) - भट्टभास्कर ( तै ० सं ० ते ० ब्रा ० ) - वेङ्कटमाधव. ( ऋग्भाष्य ) - आत्मानन्द ( अस्यवामीयभाष्य ) - आनन्दतीर्थ ( ऋ ० ४० सूक्तभाष्य ) - शत्रुघ्न ( मन्त्रार्थदीपिका ) - गुणविष्णु-( छान्दोग्य मन्त्रभाष्य ) - माघव ( सामवेदभाष्य ) - भरतस्वामिदेवपाल - आनन्दबोध ( कण्व शाखा ) - सायणा: ( ऋक्सामाथर्व-कण्वभाष्याणि ) । एते सर्वेऽपि यज्ञपरत्वमेव वेदव्याख्यानं युक्तं मरवत इति ( पृ ० ५ ९ ), तत्तु क्षुद्रतामूलकमेव । दयानन्दीया: ' अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' इति न्यायेन मर्वानिर्वतान् भाष्यकारान् वेदार्थानभिज्ञान् मन्यन्ते, दयानन्द एव वेदार्थज्ञ इति च ब्रुवन्ति । तदेतत् साहसमात्रं निर्लज्जता च, दुर्गाचार्यस्कन्दस्वामिसायनादिपदवीं गन्तुमसमर्थत्वात् । स हि क्षुद्रतावादनादरपूर्णशब्देदुर्गाचार्य सायणाचार्य च निर्दिशति । दुर्गाचार्यनिरुक्तव्याख्यामपि यज्ञ-पय्र्यवसायिनीमेव व्यदधात् । सायणस्तु तत्र निमग्न एव । अयं हि यानाश्रित्य किञ्चिदाध्यात्मिकाधिदेवादिवादं प्रलपति तानेव निन्दति । वस्तुतो धर्मब्रह्मपर्यवसायिन एव वेदाः । तत्राप्यवान्त रतात्पर्यरीत्याधिकांशवेदभागस्य कर्मोपासन-पर्य्यवसायित्वम् । महातात्पर्यविषया तु सर्वस्यैव वेदस्य ब्रह्मपय्र्यवसायित्वमेव । अत एव व्यासजैमिनिशवरवात्स्याय-हो पाने के कारण इससे श्रोत विनियोग का बाघ नहीं हो सकता, क्योंकि लिंग आदि की अपेक्षा से श्रुति प्रबल होती है । ' श्रुति, लिंग, वाक्य प्रकरण , स्थान और समाख्या में समवाय होने पर पूर्व की अपेक्षा पर दुर्बल होता है, क्योंकि पूर्व की अपेक्षा पर में अर्थ को कल्पना दुर्बल पड़ती जाती है ' यह मीमांसा का न्याय इसमें प्रमाण है । इससे यह जानना चाहिये कि दयानन्द का भाष्य निरुक्त आदि आर्य ग्रन्थों के विपरीत है । पाणिनि, पतंजलि आदि के भी विरुद्ध हैं, यह बात तो पहले ही कही जा चुकी है । ब्रह्म जिज्ञासु ने कहा है- ' सायण भाष्य की अपेक्षा अन्य प्राचीन भाष्यों का कोई मौलिक भेद नहीं था । ये सभी भाष्य याज्ञिक पक्ष के अनुसार ही व्याख्या करते हैं, इस प्रकार बहुत समय से वेदार्थ संकुचित हो गया था । इनमें पूर्व भाष्यकारों में स्कन्दस्वामी, निरुक्त के टीकाकार दुर्ग, उद्गीथ, हरिस्वामी, उम्वद वररुचि का निरुक्तसमुच्चय, भट्ट भास्कर का तैत्तिरीयसंहिता और तैत्तिरीय ब्राह्मण का भाष्य, वेङ्कटमाधव का ऋग्भाष्य 2 आत्मानन्द का अस्यवामीयभाष्य आनन्दतीर्थ का ऋक्सूक्तभाष्य, की मन्त्रार्थदीपिका, गुणविष्णु का छान्दोग्यमन्त्रभाष्य माघव का सामवेदभाव्य, भरतस्वामी, देवपाल के भाष्य, आनन्दबोध का काण्वशाखा का भाष्य, सायण का ऋक्, साम, अथचे, काण्वशाला का भाष्य- ये सब वेद की व्याख्या यज्ञपरक ही मानते है ' यह यह कथन भी क्षुद्रतामूलक है । दयानन्द के अनुयायी ' वहाँ तक पहुँचने में असमर्थ होने पर निन्दा करने लगते हैं ' ( अंगूर खट्टे हैं ) इस लोकोक्ति के अनुसार इन सभी भाष्यकारों को वेदार्थ के अनभिज्ञ मानते हैं और कहते हैं कि केवल दयानन्द ही वेद का सही अर्थ जानते है । उनकी यह उक्ति दुःसाहसमात्र और निर्लज्जता की हद हैं, क्योंकि वे दुर्गाचार्य, स्कन्दस्वामी, सायण प्रभृति के स्थान तक कभी नहीं पहुँच सकते । ब्रह्मदत्त जिज्ञासु अपनी क्षुद्रता दिखाते हुए दुर्गाचार्य, सायण प्रभूति का अनादर भरे शब्दों से उल्लेख करते हैं । ' दुर्गाचार्य ने free की व्याख्या यज्ञपरक ही की हैं । सायण तो उसमें पूरी तरह से डूबा हुआ है ' । इसी क्षुद्रता को आगे कर वह आयात्मिक, अधिदेव बाद की चर्चा करते हैं और यज्ञपरक व्याख्या करने वाले उक्त आचार्यों की निन्दा करते हैं । वस्तुतस्तु सभी वेद धर्म और ब्रह्म के प्रतिपादन में ही लगे हैं । अवान्तर तात्पर्य के रूप में वेद का अधिकांश भाग कर्म और उपासना के प्रतिपादन में ही पर्यवसित है और महातात्पर्य की दृष्टि से सारे वेद का ब्रह्म के प्रतिपादन में ही विनियोग हैं । इसीलिये व्यास, जैमिनि, शवर-
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वेदार्थपारिजातः ८१६ यनादिभिर्यज्ञपरत्वमेव वेदानां व्याख्यातम् । यथेकार्थत्वेनैकवाक्यताऽनेकार्थत्वेन वाक्यभेदो भवति, तथैवैकार्थ पर्य्यवसायि-त्वेवैकशास्त्रत्वम् | वेदगाम्भीर्यप्रदर्शनार्थमवान्तरतात्पय्र्य विधयाऽनेकार्थत्वप्रदर्शनं मन्तव्यम् । ' अर्थनित्यः ' ( नि ० २।११ इत्यादि तु पिष्टपेषणमेव । प्रकरणसामर्थ्याच्छब्दोऽप्यर्थान्तरं भजत इत्यादिकमपि सिद्धान्तसम्मतमेव परं नेतावता शब्दस्य मुख्यया वृत्त्या प्रकरणादिसंगतावपि बलाद् गौणो लक्ष्यो वार्थो ग्राह्यः । अत एव प्रकरणसामर्थ्यादित्युक्तम् । यत्तु ' वर्तिका वर्तते पुन: पुनरावर्तयत इत्युषा ' अत्र वर्तिकाऽभिप्रेता न चटकेति नित्यपक्षमाश्रित्य ( नि ० टीका पृ ० ३६६ ऋ ० १।११७११६ ) स्कन्देन टीका कृता ( ऋ ० मद्राससंस्करण ४७७ ) | वर्तिका चटकान युवामित्यर्थः कृतः । स च निरुक्तविरुद्ध: ( पृ ० ६३-६४ ), तदेतदज्ञानविजृम्भितम्, मीमांसकरीत्या जातौ शक्त्यङ्गी-art Terratio बोधकत्वेऽपि नित्यत्वानपायात् । अन्यथा खण्डकालस्यानित्यत्वेनोष: कालस्यापि तदन्तःपातित्वेन नित्यत्वासंभवः । यदुक्तम् ' ब्रह्मनिष्ठाया न्यूनत्वात् परमात्मपरा व्याख्या भाष्यकारैर्न कृला | आध्यात्मिकार्थप्रकाशन यो दयानन्दस्यैव ' इति, तदपि वेदार्थानभिज्ञानमूलक, दयानन्दस्यापि सायणोच्छिष्टभोजित्वात् । उव्वटसायणमहीधरादि-व्याख्यां दृष्ट्वा विकृत्य च दयानन्देन किमपि लिखितम् । यथा चैत्तथा भाष्य एव द्रष्टव्यम् । तत्र तत्र मन्त्रब्राह्मणेषु विस्तृतं भाष्यं कुर्वता सायणेन वेदार्थ उद्घाटितः । दयानन्दस्तु पारम्पर्येण मन्त्रब्राह्मणानभिज्ञो यत्किञ्चिदेवोक्तवान् । नरदेवशास्त्रिप्रभृतयः सामाजिका अपि तद्भाष्यं नादृतवन्तः । पं ० भीमसेनोऽखिलानन्दो ज्वालापूरमहाविद्यालयीयश्च भीमसेनो दयानन्दभाष्यं तन्मतं चानेकधा खण्डितवन्तः । स्वामी, वात्स्यायन प्रभृति ने वेदों को यज्ञपरक हो व्याख्या की है । जैसे एक अर्थ होने पर एकवाक्यता और अनेक अर्थ होने पर artr भेद होता है, उसी तरह एकार्थपर्यवसायी होने से पूरा वेद एक ही शास्त्र है । वेद की गंभीरता को बताने के लिए अवान्तर तात्पर्य के द्वारा अनेक अर्थी का भी प्रदर्शन यहाँ माना जाना चाहिये । ' अर्थनित्यः ' इत्यादि from area केवल पिष्टपेषण करने वाले हैं । प्रकरण के अनुसार शब्द दूसरे अर्थ में प्रयुक्त होने लगता है, ये सब बातें हम भी मानते हैं, किन्तु sent ae af भप्राय नहीं है जबरदस्ती गौण अथवा लक्ष्य अर्थ को भी पकड़ा जाय । इसी कि शब्द की मुख्य वृत्ति से प्रकरण नादि की संगति बैठ जाने पर भी लिये यहाँ पर प्रकरण को सामर्थ्य से यह शब्द जोड़ा गया है । बार बार आवृत्ति वाली उषा को वर्तिका कहा है, चटका ( चिड़िया ) नहीं किया जाता । उन्होंने इसके उद्धृत किया है, किन्तु यह कथन केवल उनके अज्ञान को जाति का बोघन होने पर भी नित्यता नहीं चली जाती । जिवाजी ने ' वर्तते इति वर्तिका ' इस व्युत्पत्ति के आधार पर safe sure it f तदिन प्रातःकाल आवृत्ति होती है । वर्तिका का अर्थ लिये नित्य पक्ष को स्वीकार करने वाले स्कन्दस्वामी को प्रमाण के रूप में उजागर करता है । मीमांसक पद्धति से जाति में शक्ति मानने से चटकाव areer aur काल के अनित्य होने से तदन्तःपाती उषाकाल की भी नित्यता नहीं बन पावेगी । यह कहना कि ' ब्रह्मनिष्ठा की न्यूनता के कारण भाष्यकारों ने परमात्मपरक व्याख्या नहीं की । आध्यात्मिक अर्थ को प्रकाशित करने का श्रेय दयानन्द को ही दिया जा सकता हैं ', यह भी वेद के अर्थ को ठीक से न समझने के कारण है । दयानन्द भी सायण के उच्छिष्ट को ही खाने वाले हैं । उन्बद, सायण, महीधर आदि की व्याख्या देखकर और उसको विकृत करके ही दयानन्द ने सब कुछ लिखा हैं । इसका प्रमाण भाष्य में ही देखना चाहिये । जहाँ - तहाँ मन्त्र और ब्राह्मणों पर विस्तृत भाष्य लिखते हुए सायण arrar किया है । दयानन्द तो परम्परा से मन्त्र और ब्रह्मण को नहीं जानते थे, इसलिये इन्होंने जो मन में आया, लिख दिया । नरदेव शास्त्री प्रभृति आर्यसमाजी मी इनका आदर नहीं करते । पं ० भीमसेन, अखिलानन्द और ज्वालापुर महा-विद्यालय के भीमसेन प्रभृति विद्वानों ने दयानन्द के भाष्य और उनके मत का अनेक तरह से खण्डन किया है ।
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II वार्थपारिजातः सायणभिन्नविद्यारण्यस्योपनिषत्सु वार्तिकसारस्तादृशो ग्रन्थोऽस्ति यस्यार्थमपि दयानन्दो नावगन्तुमशकत् उपनिषत्सु तदीयो ग्रन्थः, अनुभूतिप्रकाशः, विवरणप्रमेयसंग्रहः, पञ्चदशी इत्यादयो ग्रन्थाश्चाध्यात्मिकास्तदीयाः प्रौढप्रन्थाः । तथापि यज्ञप्रकरणे यज्ञपरं व्याख्यानं युक्तमेव । यदुक्तम्- ' यत्र स्पष्टतयाऽऽध्यात्मिकोऽर्थो व्यज्यते, तत्रापि बलादेभिः सायणादिभिर्याज्ञिकोऽर्थः प्रतिपादितः ' ( पृ ० ६४ ) इति, तत्तुच्छम, विपरीतस्यैव सुवचत्वात् । तदुदाहरणं शुक्लयजुर्वेदस्य प्रथमकण्डिकाया एव व्याख्यानम् । तत्र ' इषे वेति शाखां छिनत्ति ' इत्यादिब्राह्मणवचनैः स्वष्टमेव यज्ञाङ्गेषु शाखाच्छेदनमार्जन वत्सापाकरणादिषु ' इषे त्वा ' इत्यादिमन्त्राणां विनियोगः । तदपहाय वलादीश्वरस्तुतिपरतया सा कण्डिका व्याख्याता दयानन्देन । सायणभाष्य निन्दनं तु सामाजिकानां कृतघ्नतामूलकमेव । सायणभाष्यादर्शने सति कस्यापि वेदमन्त्रस्य तैरर्थो नागवगन्तुं शक्यते स्म । यत्तु ' श्रीतसूत्रानुसार्येव सायणीयं व्याख्यानम्, गृह्यसूत्रसम्बन्धि व्याख्यानं सायणेन न कृतमेव ' ( पृ ० ६४ ), इति, तदपि तुच्छम् श्रीतार्थव्याख्यानेनैव स्मातर्थिस्य गतार्थत्वात् । अंशतस्तु यथा पूर्वमीमांसकैः स्मृत्यादिसमन्वयः कृतस्तथा सायणेनापि कृत एव । दयानन्देन तु श्रीतोऽर्थो न कृतः 1 किमुतान्यः । आध्यात्मिकमपि व्याख्यानं तस्य वेदविरुद्धमेव । यथा चैतत्तथा तत्र तत्र दर्शयिष्यामः । दुर्गाचार्य्योऽपि तथैव मन्त्रात् व्याख्याति । जैमिनि शवर-वात्स्यायन - भट्टपाद - शङ्कराचार्यादयश्च तथैव यज्ञपरत्वेनैव वेदव्याख्यानमनुमन्यन्ते । यत्तु - ' जनमानुषेषु यजमानेषु ' इत्यत्र मनोरपत्ये यजमानरूपायां प्रजायां मनुषो मनुष्यस्याध्वय्र्योः, जनान् यजमानान् जनानां यजमानानां विशां यजमानरूपाणां प्रजानां नरः कर्मणां नेताऽध्वर्वादयः ' इत्यादि-सायणीयव्याख्यानमभिलक्ष्योक्तम्- ' मनुष्यशब्देन यजमान एवोक्त इत्यत्र को नियामक: ' ( पृ ० ६५ ), इति तत् सायण से भिन्न विद्यारण्य का उपनिषदों पर वार्त्तिकसार ऐसा ग्रन्थ हैं कि दयानन्द इसको समझ भी नहीं सकते । उपनिषदों पर ही अनुभूतिप्रकाश, विवरणप्रमेयसंग्रह, पंचदशी आदि उनके ग्रन्थ वेदों की आध्यात्मिक व्याख्या करने वाले प्रौढ़ ग्रन्थ हैं । तो भी यज्ञ के प्रकरण में यज्ञपरक ही व्याख्यान उचित है । यह कहना तो बड़ी तुच्छ बात है कि ' जहाँ पर स्पष्ट ही आध्यात्मिक अर्थ की प्रतीति होती है, ऐसे स्थलों में भी सायण प्रभूति ने जबरदस्ती याज्ञिक अर्थ का प्रतिपादन किया है, क्योंकि दयानन्द के भाष्य के विषय में भी हम इसके विपरीत कह सकते हैं कि उन्होंने ही जबरदस्ती सब जगह आध्यात्मिक अर्थ कर दिया है । शुक्ल यजुर्वेद की प्रथम कण्डिका के हो व्याख्यान हम देखें, यहाँ पर ' इषे त्वा ' इत्यादि मन्त्र से ब्राह्मण वचनों के द्वारा शाखा छेदन का विधान है, जिसका कि विनियोग यज्ञ के अंग के रूप में शाखाछेदन मार्जन, वत्स के अपाकरण आदि में किया गया है । इसको छोड़कर दयानन्द ने जबरदस्ती इस मन्त्र की व्याख्या ईश्वर-स्तुतिपरक की है । सायण भाष्य की निन्दा करना समाजियों की कृतघ्नता है । सायण भाष्य को बिना देखे वे किसी भी मन्त्र का अर्थ नहीं कर सकते थे । यह कथन भी गलत है कि ' सायण ने अपनी व्याख्या श्रौतसूत्रों के आधार पर ही की है उन्होंने गृह्यसूत्रों से संबद्ध व्याख्या कहीं नहीं की ', क्योंकि श्रीत अर्थ की व्याख्या कर देने पर स्मार्त अर्थ उसी से गतार्थ हो जाता है । कहीं कहीं पर अंशतः सायण ने भी पूर्व मीमांसकों की भांति स्मृति आदि के साथ समन्वय किया ही है । दयानन्द ने तो श्रत अर्थ ही नहीं किया, फिर दूसरे की बात ही क्या? उसकी आध्यात्मिक व्याख्या भी वेदविरुद्ध ही है । इसको आगे स्थान - स्थान पर हम स्पष्ट करेंगे | दुर्गाचार्य भी वेद मन्त्रों की इसी तरह व्याख्या करते हैं । जैमिनि शत्ररस्वामो, वात्स्यायन, कुमारिलभट्ट, शंकराचार्य प्रभृति भी इसी तरह वेदों की व्याख्या यज्ञपरक ही करते हैं । ' जनमानुषेयु यजमानेषु ' इस स्थल पर ' मनु की सन्तान, यजमानरूप प्रजा में अध्वर्युरूप मनुष्य के यजमानों की प्रजा को अध्वर्यु प्रभूति कर्म में प्रेरित करते हैं ' इस सायण की व्याख्या के संबन्ध में यह जो कहा गया है कि ' मनुष्य शब्द से यजमान ही कहा गया है, इसमें क्या प्रमाण है, यह बात वही कह सकता है, जिसको कि वेद की गन्ध भी न लगी हो । सामान्य जन की