वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 851–860

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 851–860

पृष्ठ 851

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पदार्थपारिजातः ८२१ सर्वथानाघ्रातवेदार्थ गन्धस्यैव शोभते, जनसामान्यस्य वेदाध्ययनतदर्थानुष्ठानानधिकारादेव ' स्वाध्यायोध्येतव्य ' इति विधिना ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत तमध्यापयीत ' इत्यध्यापन विधिना वाध्ययनं विधीयते । ' वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत, ग्रीष्मे राजन्यम्, शरदि वैश्यम् ' इति श्रुतिभिरेकवाक्यतयोपनयनस्य वेदाध्ययनाङ्गता ज्ञायते । तस्माद्येषां त्रैवर्णिकाना-मुपनयनं विहितं तेषामेव वेदाध्ययनमपि विहितम् । न च त्रैवर्णिकेतराणां नराणामप्युपनयनं वेदाध्ययनं वा विहितम् । तस्मान्नरा मनुष्या मत्या इत्यादयः सर्वेऽपि शब्दा अधिकृतनरपरा एवं ज्ञातव्याः । एवमेव यज्ञप्रसङ्गेन आयातो नर इति प्रकरणवशादेवाध्वर्यादय ऋत्विजो गृह्यन्ते । अवश्यं क्वचिन्तरमात्रा अपि नरादिशब्देन व्यपदिश्यन्ते - - यथा य ' न कर्म लिप्यते नरे ( यजु ० ४०।२ ) | विस्तरेण च पूर्वमीमांसायामुत्तरमीमांसायां च त्रैवर्णिकानामेव वेदाध्ययनतदर्थानुष्ठाना-दिष्वधिकारो निर्णीतः । किञ्च, ' ऋचां त्व: पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्करीषु । ब्रह्मा स्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत्वः ॥ ' ( ऋ ० १०।७१।११ ) इत्यृत्विक् कर्मणां विनियोगमाचष्टे । ' ऋचामेकः पोषमास्ते पुपुष्वान् होतचंनी गायत्रमेको गायति शक्करीषूद्गाता ' गायत्रं गायतेः स्तुतिकर्मणः ' ( नि ० १1८ ), ' ब्रह्मेको जाते जाते विद्यां वदति ब्रह्मा सर्वविद्यः ' ( नि ० १1८ ), ' एकोऽध्वर्युः ' ( नि ० ११८ ) इत्यादिवचनैनिरुक्तकारयास्क एवं ऋगादिवेदा नामात्विज्यसंबन्धं प्रतिपादयति, टीकाकारो दुर्गाचार्योऽपि तथैव व्याख्याति । तथाहि --- ' बृहस्पतेरार्षम् । ऋत्विक्कणां विनियोगमनयर्चाचष्टे । य एते चत्वारो महत्विजः, एतेषां त्वः एकः ऋचां पोषं पुष्टि पुपुष्वान् पुनः पुनः भृशं वा देवतायाथात्म्यानुचिन्तनसन्तान गर्भस्थान करणानुप्रदानवतीर्यथाकालमृचोऽधीयानः । स हि तासां पोषः । कलम एक एतत्कर्म कुर्वन्नास्त इत्यपेक्षायामाह होता । ' यदूचा होत्रं क्रियते ' ( श ० ११ | ४ | २ | ७ ) इति श्रुतेः । स्वः एकः शक्करीषु ऋक्षु गायत्रं गायति । कतम इत्याह - उद्गाता । उद्गातरि सामगानकर्म विनियुक्तम्, ' साम्नोद्गीथम् ' ( ऐ ० ब्रा ० २५/८ ) इति श्रुतेः । ब्रह्मा त्वो ब्रह्मानामैको ऋत्विग् जाते जाते प्रायश्चित्तं विद्यां वदति विद्यात्रयहेतुत्वात् । वेद के अध्ययन और उसके अर्थ के अनुष्ठान में अधिकार नहीं है, ' स्वाध्याय करें ' इति विधि वाक्य से, अथवा ' आठ वर्ष के ब्राह्मण का उपनयन करे, उसको पढावे ' इस अध्यापन विश्व से अध्ययन का विधान होता है । ' वसन्त में ब्राह्मण का उपनयन करे, ग्रीष्म में क्षत्रिय का, शरद् में वैश्य का ' इन श्रुतियों से एकवाक्यता होने से उपनयन की वेदाध्ययन की अंगता जानी जाती है । इसलिये जिनकों का उपनयन विहित है, उन्हीं का वेदाध्ययन भी विहित है । इस तरह त्रैवणिक से भिन्न मनुष्यों का उपनयन तथा अध्ययन विहित नहीं है । इसलिये नर, मनुष्य मय आदि सभी शब्द अधिकृत मनुष्य को ही बतायेंगे । इसी तरह यज्ञ के प्रसंग में ' मनुष्य आ गया ' ऐसा कहने पर प्रकरण के बल से अध्वर्यु प्रभूति ऋत्विजों का ही बोध होगा यह अवश्य है कि कहीं कहीं मानवमात्र नर आदि शब्दों से कहे जाते हैं, जैसे कि ' मनुष्य कर्म से लिप्त नहीं होता ' इस ईशावास्य उपनिषद् के वाक्य में । पूर्वमीमांसा और उत्तर मीमांसा में विस्तार से त्रैणिकों का ही वेद के अध्ययन और वेदार्थ के अनुष्ठान में अधिकार बताया गया है । ' ऋत्व: ' इस ॠचा में ऋत्विक के कर्मों का विनियोग बताया गया है । एक होता ऋग्वेद की ऋचाओं से कर्मों और यजमान को पुष्ट करता है । उद्गाता शकवरी में गायत्र सूक्त का पाठ करता है । गायत्र शब्द की निष्पत्ति स्तुतिकर्मा गायति धातु से होती है | ब्रह्मा उचित अवसरों पर सबको निर्देश करता है, क्योंकि वह सभी विद्याओं में निष्णात है । एक शब्द से अध्वर्यु का बोध होता है ' इत्यादि वचनों से निरुक्तकार यास्क ही ऋगादि वेदों के साथ विभिन्न ऋत्विग् जनों के सम्बन्ध को बताते हैं, टीकाकार दुर्गाचार्य भी इसी तरह की व्याख्या करते हैं । जैसे कि इस ऋचा का ऋषि बृहस्पति है । इस ऋचा से ऋत्विम् जनों के कर्मों का विनियोग कहा गया हैं । यह जो चार बड़े ऋत्विक् हैं. इनमें से एक ऋचाओं की पुष्टि बार बार अथवा पूरी तरह से करता है, क्योंकि वह देवता के यथार्थ स्वरूप के चिन्तन के साथ सन्तान, गर्भस्थान, करण, अनुप्रदान वाली ऋचाओं का समयानुसार पाठ करता है । यही ऋचाओं की पुष्टि है । इस कर्म को कौन करता है? इसके उत्तर में बताया गया है कि ' होता ', क्योंकि ऋचाओं के द्वारा होत्र कर्म किया जाता है । एक शक्री ऋचाओं में गायत्र का गान करता है । यह कौन है? उद्गाता । उद्गाता के लिये साम का गाना निश्चित है । ' साम्नोद्गीथम् ' यह ऐतरेय श्रुति इसमें प्रमाण है । ब्रह्मा नाम का ऋत्विक् प्रायश्चित उपस्थित होने पर इतर ऋत्विग् जनों को उसका उपाय बताता है ।

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II वेदार्थपारिजातः विद्यां विज्ञानं वदतीतरेभ्य ऋत्विग्भ्यः । स पुनः सर्वविद्यः । येनासौ सर्वं वेदितुमर्हति । नह्य सर्ववित्तमधिकारं शक्नुया. न्निर्वर्तयितुम् । तदुक्तमेव --- ' अथ केन ब्रह्मत्वमित्यनया त्रय्या विद्यया ' ( श ० ११०४/२/७ ) इति । त्वः एकः यज्ञस्य मात्रां विमिमीते । यज्ञस्येतिकर्तव्यतां विमिमीते अध्वर्युः । शक्वरीति ऋचां बोधकः शब्दः । तद्यदाभिरभिष्टुत इन्द्रो वृत्रं हन्तुमशकत्तत्तदेतच्छ्क्वरीणां शक्वरीत्वम् | ' ब्रह्मा परिवृढः श्रुततः ' ( नि ० १1८ ) । स हि त्रयीं विद्यां वेद । ' अध्वरं युनक्ति यः सोऽध्वरस्य नेता प्रापयिता सोऽध्वर्युः ' इत्यादिनिरुक्ततट्टीकाकर्तृभिः स्पष्टमेव ऋक्सामयजुषां तत्सम्बन्धिनामृत्विजां च यागेषु मुख्योपयोग उक्तः । तथा च तत्सम्बधिनो नरमर्त्यादिशब्दाः कथं साधारण मनुष्यादिकं परामर्शयितुमर्हन्ति? आश्चर्यमिदं यत् स्कन्दस्वामिदुर्गाचार्य्याद्याचार्याणां वचनान्याश्रित्यैवायं स्वपक्षं स्थापयितुमीहते, परं सत्यवसरे तदीयान् सिद्धान्तानेव भृशं विरुणद्धि । तेषामवेदार्थज्ञत्वकथनेऽपि नैव संकुचति । सायणाचार्य भाष्यसम्बन्धे यद्बह्वनर्गलमुक्त तत्तु तस्य क्षुद्रतैव । ' यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि । तवेत्तत् सत्यमङ्गिरः || ' ( ऋ ० १ | १ | ६ ) इत्यस्य मन्त्रस्यार्थः कृतः--प्रियतम देव शरणागत कल्याणकारित्वं त्वदीयं व्रतम् । स्वयमेवास्य प्रशस्ति लिखति कीदृग्वृदयग्राहिसुन्दरोऽयमर्थः संतप्तहृदयज्वालाहर आत्मसमर्पणस्य प्रभुप्रेम्णः प्रभुभक्त रसोमनिष्ठाया अद्भुतं दृश्यम् । एतेनैव सर्वचित्तवृत्तिनिरोधो जायते । आत्मस्वरूपावस्थितिसाधनभूतोऽयं मन्त्रः । ' ईश्वरप्रणिधानाद्वा ' इति योगसूत्रेणापीदमेवोक्तम् । दयानन्दीये भाष्येऽयमेवार्थः स्फुटीकृतः । सायणाचार्यो यचाध्यात्मिकमर्थं जानीयात् तदा यादृशोऽर्थी कृतो न तथा कुर्यात् ' ( पृ ० ६५ ) इत्यादि, तत्तु केवलं प्रतारणमात्रम्, तदर्थस्यापि सायणोक्तार्थमाश्रित्यैवान्यथाकल्पनानतिरिक्तत्वात् । सायणोक्तस्यैव प्रामाणिकत्वात् । तथाहि-- ' अङ्ग ' इत्यभिस्वीकारार्थी निपातः । अङ्ग इत्यस्यैवार्थे मम प्रियतम इति । यह सब विद्याओं का जानकार होता है । इसीलिये यह सब कुछ जानता है । जो सब कुछ नहीं जानता, वह सब अधिकार को नहीं प्राप्त करता । यही बात इस शतपचति में कही गई है कि ' ब्रह्मत्व किससे मिलता है? इस त्रयी विद्या को जानने से । ' एक ऋत्विग् यज्ञ की मात्रा, इतिकर्तव्यता का मापन करता है, वह अध्वर्यु है । शक्वरी शब्द ऋचाओं का बोधक है इन ऋचाओं से स्तुति किये जाने पर इन्द्र वृत्र को मारने में समर्थ हो गया, इसलिये इनको शक्वरी कहा जाता है | ' ब्रह्मा शास्त्रों के परिज्ञान के कारण श्रेष्ठ है, वह तीनों वेदों को जानता है । जो यज्ञ की योजना करता है, यज्ञ को पूरा करता है, उसको अध्वर्यु कहते है ' इत्यादि वाक्यों से निरुक्तकार और उसके टीकाकारों ने स्पष्ट हो ऋक्, साम, यजुः का और इनके परिज्ञाता ऋत्विजों का याग कर्म में मुख्य उपयोग बताया है । इसलिये इनसे संबद्ध नंर, मर्त्य आदि शब्द भी साधारण मनुष्यों के लिये क्यों प्रयुक्त होंगे । यह आश्चर्य की ही बात है कि जिज्ञासुजी स्कन्दस्वामी, दुर्गाचार्य प्रभूति के वचनों के सहारे ही अपना पक्ष स्थापित करना चाहते हैं, किन्तु अवसर आने पर उन्हीं के सिद्धान्तों का भरसक विरोध भी करते हैं । वह उनको वेद का अर्थ नहीं आता, यह कहने में भी संकोच नहीं करते । सायणाचार्य के भाष्य के संबन्ध में जो बहुत सी अनर्गल बातें कहीं है, वह तो क्षुद्रता की हद है । ' द दाशुषे ' इस मन्त्र का यह अर्थ किया है कि ' हे प्रियतम, देव! आपका व्रत शरणागत के लिये कल्याणकारी हैं ' । इसके बाद वे स्वयं ही इस अर्थ का प्रशस्तिगान करते हैं कि कैसा हृदयग्राही सुन्दर अर्थ है । दुःख से संतप्त हृदय की ज्वाला को दूर कर देने वाला, आत्मसमर्पण, ईश्वर के प्रेम और प्रभु की भक्ति की असीम निष्ठा का यहाँ पर अदभुत दृश्य है । इससे सभी प्रकार की चित्त की वृत्तियों का निरोध होता है । इस मन्त्र से साधक की स्वात्मस्वरूप में अवस्थिति होती है । योगदर्शन के ' ईश्वरप्रणिधानाद्वा ' इस सूत्र में यही बात कही गई है । दयानन्द के भाष्य में भी यही अर्थ स्पष्ट किया गया है । सायणाचार्य भी यदि आध्यात्मिक अर्थ को जानते होते तो जैसा उन्होंने अर्थ किया है, वैसा न करते ' यह सारा कथन केवल वंचनामात्र है । सायण के अर्थ का सहारा लेकर ही यहाँ पर उसमें कुछ परिवर्तन कर दिया गया है । वास्तव में प्रामाणिक सायण का अर्थ ही है । जैसे कि -

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वार्थपारिजातः ८२३ तत्र न नव्यः कश्चनार्थः । हे अग्ने दाशुषे हविर्देत्तवते यजमानाय तत्प्रीत्यर्थं यद् भद्रं वित्तगृह प्रजापशु रूपं कल्याणं करिष्यसि तद् भद्रं तव इत् तवैव सुखहेतुरिति शेषः । हे अङ्गिः, अग्ने! एतच्च सत्यं न त्वत्र विसंवादोऽस्ति । यजमानस्य वित्तादिसम्पत्ती सत्यामुत्तरऋत्वनुष्ठानेऽग्नेरेव सुखं भवति । भद्रमित्यस्य प्रजापश्वादिरूपार्थी ब्राह्मण-प्रमाणको न तदम्यूहः । तदाह भद्रशब्दार्थं शाटचायनिनः समामनन्ति । ' यद्वै पुरुषस्य चित्तं तद्भद्रं गृहा भद्रं प्रजा भद्रं पशवो भद्रम् ' इति । कर्मकाण्डप्रसङ्गे तदेव भद्रं काम्यतेऽपि । यत्र विशेषोल्लेखो न भवेत्तत्र भद्रशब्दस्य कल्याणसामान्यवाचकत्वेऽपि यत्र स्पष्टमेव भद्रस्य श्रौतो व्याख्योपलभ्यते, तत्र तदुपेक्ष्य कल्याणसामान्यपरत्वमसङ्ग-तमेव । सामान्यस्यापि विशेषपर्यवसायित्वमेव । यत्र श्रुत्यैव विशेषो निर्दिश्यते तत्र कल्पनाप्रसरस्यानवकाश एव । यज्ञप्रसङ्ग ' ' दाशुषे ' इत्यस्य हविर्दत्तवते इत्यर्थो युक्तः, नात्मसमर्पणम् । आत्मसमर्पणं तु यज्ञादिफलमेव भवति । पुरुषव्यापारस्तु साघनगोचर एव भवति न फलगोचरः, साधनगोचरव्यापारेण फलस्यानायास सिद्धत्वात् । सायणाचार्योऽग्निशब्देनात्र देवताविशेषमभिप्रेति । ' एकं सद्विप्राः ' इति मन्त्रोऽग्निशब्द परमात्मपरमभिप्रैति । अग्नि-देवतापि न भौतिकाग्निरूपः, किन्तु चेतनो माहेश्वय्र्थ्यशीलः परमेश्वराङ्गभूतः । अग्निस्तुतेरपि ब्रह्मपर्यवसायित्वमेव, निरुक्तादौ परमेश्वरस्यैव विभिन्नदेवादिरूपेण माहाभाग्यदाविर्भूतत्वात् । यद्यप्यन्यन्तर्यामिपरत्वमप्यस्य मन्त्रस्य सायण-संमतमेव, तथापि प्रथमोपस्थितत्वाद्देवविशेष एव ग्राह्यः । इहाग्निशब्दो देवताविशेषमेव गमयति । न च सोऽपि परमेश्वरपर एव, ' अङ्गारेष्वङ्गिरा ( नि ० ३।१७ ) इति निरुक्तवचनविरोधात् ' येऽङ्गारा आसंस्तेऽङ्गिरसोऽभवन् ' ( ऐ ० ब्रा ० ३।३४ ) इत्यैतरेय ब्राह्मणविरोधाच्च । एवं सायणभाष्यस्य ब्राह्मणानुसारित्वेऽपि स्वकाल्पनिकार्थस्य समर्थनाभिनिवेशो निरर्थक एव । विनियोगोऽपि न विस्मर्तव्यः । ' अग्निमीळे ' इति सूक्तं प्रातरनुवाके आग्नेये ऋतौ विनियुक्तम् । ' अवानो अग्न इति, अग्निमीळेऽग्नि दृतम् ' ( ४११३ ) इत्याश्वलायनोक्तत्वात् । तथा च देवताविशेष अङ्ग यह निपात चतुरस्र स्वीकृति के लिये है । मेरे प्रियतम, इसी शब्द का अर्थ है । इसमें कोई नवीनता नहीं है । हे अग्ने, हवि देने वाले यजमान के लिये, उसकी प्रीति के लिये जो तुम भट्ट अर्थात् धन, घर, सन्तान, पशु आदि देकर उसका कल्याण करोगे, वह सब तुम्हारे ही सुख के लिए होगा । है अग्नि, यह सब सच है, इसमें कोई विवाद नहीं है । यजमान के पास जब धन - धान्य आदि सम्पत्ति हो जाती है, तो उसके बाद वह यागादि का अनुष्ठान करता है । इस प्रकार इससे अग्नि को ही सुख मिलता है । भद्र शब्द का प्रजा, पशु आदि अर्थ ब्राह्मणों के प्रमाण पर किया जाता है । इसको जिज्ञासुजी ने नहीं माना है । कहा गया है- शाट्यायन के अनुयायी भद्र शब्द का अर्थ इस प्रकार करते हैं पुरुष का जो धन है, वह भद्र है । गृह, प्रजा, पशु ये सब भद्र हैं । कर्मकाण्ड के प्रसंग में इन्हीं सब भद्रों को कामना भी की जाती है । जहाँ पर विशेष उल्लेख न हो वहां भद्र शब्द का अर्थ कल्याण सामान्य भी हो सकता है, किन्तु जहाँ स्पष्ट ही भद्र शब्द की श्रीती व्याख्या उपलब्ध है, वहाँ उसकी उपेक्षा कर कल्याण सामान्य अर्थ करना ठीक नहीं है । सामान्य का पर्यवसान भी विशेष में हो होता है । जहाँ पर श्रुति से ही विशेष का भान हो जाता है, वहाँ पर कल्पना का घोड़ा दौड़ाना ठीक नहीं है । यज्ञ के प्रसंग में ' दाशुषे ' पद का अर्थ ' हवि देने वाले ' यही उचित है, ' आत्मसमर्पण ' नहीं । आत्मसमर्पण यज्ञ आदि का फल होता है । पुरुष का व्यापार साधन के लिये होता है, फल के लिये नहीं । साधन के लिये किये गये व्यापार से फल अनायास सिद्ध हो जाता है । सायणाचार्य यहाँ पर अग्नि शब्द से देवताविशेष का ग्रहण करते हैं । ' एकं सद्विप्राः ' यह मन्त्र अग्नि शब्द को परमात्मा का बोधक मानता है । अग्नि देवता भौतिक अग्नि रूप नहीं है, किन्तु चेतन, महान ऐश्वर्यशाली, परमेश्वर का अंगभूत ही है । अग्नि की स्तुति का भी पर्यवसान ब्रह्म में ही होता है । निरुक्त आदि में बताया गया है कि परमेश्वर ही महान् ऐश्वर्य के कारण विभिन्न देवताओं के रूप में आविर्भूत होता है । यद्यपि इस मन्त्र के अग्नि शब्द से अन्तर्यामी परमात्मा की बोधकता की सायण संगत है, तो भी प्रथम उपस्थित होने से देवविशेष, अग्नि देवता की ही यहाँ बोधकता मानी गई है । उसको भी परमेश्वर ही नहीं माना जा सकता, क्योंकि मूल में उद्धृत निरुक्त और ऐतरेय ब्राह्मण के वचन से इसका विरोध होगा । यहाँ पर स्पष्ट ही अग्नि का पृथक् विशेष रूप से वर्णन है । इस प्रकार सायण भाष्य के ब्राह्मणानुसारी होने पर भी अपने काल्पनिक अर्थ के समर्थन के लिये अभिनिवेश निरर्थक

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मैदार्थपारिजातः एवात्राग्निपदार्थः । तथा च सायणीयमेव व्याख्यातं विजयते । न चास्मिन्नर्थं आध्यात्मिकसम्पत्तेरवर्णनं दूषणम् परमात्म-पराणां सूक्तानामाध्यात्मिकतत्त्वपरत्वेनान्यत्र बहुधा व्याख्यातत्वात् । मनुष्याणामधिकृतानां प्रथमं कर्माधिकारित्वमेव, उपासनातत्त्वज्ञानयोस्तदनन्तरभावित्वात् । तेन हविर्दानमेव प्राथमिकं देवाराधनम् । नाम्यानि शुभानि कर्माणि, तैर्न कल्याणमिति व सायणो वक्ति । आध्यात्मिकयज्ञोऽपि प्राथमिकद्रव्ययज्ञानन्तरभाव्येव, गौणप्रधानयोः प्रधाने कार्यसं प्रत्यय इति न्यायात् । ज्ञाने तु यज्ञत्वारोप एव हविरन्यादीनां तत्र काल्पनिकत्वात् । ' ब्रह्मार्पणं ब्रह्मविर्ब्रह्म ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ ' ( श्री ० भ ० गी ० ४।२४ ) इति ब्रह्मणि गीतायामन्याद्यारोप-स्मरणात् । हविःप्रदानस्वरूपं किमित्यज्ञानादेव नोक्तं सायणेनेत्युक्तिरेवाज्ञानमूलिका, ' ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् ' ( ऋ ० सं ० १ | १६४ / ३ ९ ) इत्यादिमन्त्रव्याख्याने तस्याध्यात्मज्ञानवैशद्यप्रसिद्धेः । ' आध्वर्यवस्य यज्ञेषु प्राधान्याद् व्याकृतः पुरा । यजुर्वेदोऽथ होत्रार्थमृग्वेदो व्याकरिष्यते ॥ ' ( पृ ० ६६ ) इति सायणस्योक्तिः पूर्वोक्त ' ऋचां त्वः पोष मास्ते ' इत्यादिमन्त्रमूलिकैव । यजुर्वेदस्याध्वर्युवेदत्वेनैव प्रसिद्धिः । पुरोऽनुवाक्या याज्यानुवाक्याघटितस्यर्वेदस्य stanivru योग इत्यपि स्पष्टमेव । यदुक्तम् — ' सायणभाष्यपठनेन वेदेषु श्रद्धा नोत्पद्यते । सायणभाष्यं पठित्वा परमात्मबुद्धिपूर्विका वेदकृतिरिति कस्यापि बुद्धि भवति । वेदेषु केषाञ्चिदुच्चतमानां सिद्धान्तानां मानवसमाजसम्बन्धिनीनामुत्कृष्टभावनानां च विविधा -न्यावश्यकानि ज्ञानानि प्रतिपादितानीति जिज्ञासुः सायणभाष्या नैराश्यं भजते ' ( पृ ० ६६ ) इति, तदपि निरर्गलम्, प्रमात्मकज्ञानस्य बस्तुतन्त्रत्वेन पुरुषानधीनत्वात् । भाष्यकारस्य व्याख्येयग्रन्थस्य यथार्थविवरणमेव कर्तव्यम् । न श्रद्धोत्पादनाय न वा स्वाभीष्टसिद्धान्तानां स्वाभिमतोत्कर्षभावानां वा तत्र संनिवेशाय भाष्यं क्रियते । ' यत्परः शब्दः है । इस प्रसंग में विनियोग को भी नहीं भुलाया जा सकता । ' अग्निमीळे ' यह सूक्त भाश्वलायन के मत के अनुसार प्रातरनुवाक के आग्नेय याग में विनियुक्त है । इस प्रकार अग्निपद का अर्थ यहाँ देवताविशेष ही है, अतः सायण के अर्थ की ही जीत मानी जायगी । इस अर्थ में आध्यात्मिक सम्पत्ति का वर्णन नहीं है, अतः यह अर्थ दुष्ट है, यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि जो सूक्त परमात्मा का बोधक है. उनकी विस्तृत व्याख्या आध्यात्मिक दृष्टि से ही की गई है । अधिकार प्राप्त होने के बाद मनुष्यों का पहला काम यागादि का अनुष्ठान है, उपासना और तत्त्वज्ञान उसके बाद ही हो सकते हैं । इस प्रकार हवि देना ही देवता की आराधना की पहली सीढ़ी है । अन्य शुभ काम नहीं है, उनसे कल्याण नहीं होता, यह सायण का कहना नहीं है । आध्यात्मिक यज्ञ भी srafts द्रव्य यज्ञ की सम्पत्ति के बाद ही हो सकता है, गुण और प्रधान की एक साथ उपस्थिति में प्रधान कार्य की निष्पत्ति हुआ करती है । ज्ञान में यज्ञ शब्द आरोपित हैं, क्योंकि यहाँ पर हवि, अग्नि आदि की भावना की जाती है | ' ब्रह्मार्पण ' इत्यादि गीता के श्लोक में ब्रह्म में ही अग्नि आदि का आरोप किया गया है । हवि देने का स्वरूप क्या होगा, इसका परिज्ञान न होने से सायण उसको नहीं बता सके, यह कथन भी जिज्ञासुजी के अज्ञान are a है, क्योंकि ' ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या के प्रसंग में सायण के आध्यात्मिक ज्ञान की बिराद जानकारी मिलती है । ' यज्ञों में अध्वर्यु के कर्म का प्राधान्य है । इसलिये उसकी पहले व्याख्या की गई, अब होत्र कर्म के लिये ऋग्वेद की व्याख्या की जाती है । सायण की यह उक्ति ' ऋचां स्व: ' इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रों के सिद्धान्त का ही अनुसरण करती है । यजुर्वेद की प्रसिद्धि अध्वर्युवेद के रूप में है । यह भी स्पष्ट है कि पुरोनुवाक्या, याज्यानुवाक्या घटित ऋग्वेद का उपयोग होत्र कर्म के लिये होता है । यह कहना कि --- ' सायण के भाष्य के पढने से वेदों में श्रद्धा नहीं उत्पन्न होती । सायण भाष्य के पढने से किसी को भी यह मालूम नहीं होता कि वेद की रचना परमात्मा ने बुद्धिपूर्वक की है । वेदों में कुछ उच्च सिद्धान्तों और मानवसमाज संबन्धी उत्कृष्ट भावनाओं के लिये विविध, आवश्यक ज्ञान का प्रतिपादन किया गया है । इस संबन्ध में जिज्ञासुजनों को सायण भाष्य से निराशा होती है, एकदम निरर्गल है । प्रमात्मक ज्ञान वस्तुतन्त्र है, वह पुरुष के अधीन नहीं होता । भाष्यकार को व्याख्येय ग्रन्थ का यथार्थ विवरण ही करना रहता है । श्रद्धा उत्पन्न करने के लिये अथवा अपने अभीष्ट सिद्धान्तों का तथा अपनी अभिमत उत्कृष्ट भावनाओं का इसमें संनिवेश करने के लिये भाष्य नहीं किया जाता । ' शब्द जिस अर्थ को सरलता से बताता है, वही शब्दार्थ है '

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पारिजातः स शब्दार्थः ' इति रीत्या प्रमाणैरुपक्रमोपसंहारादिभिर्लिङ्गेरेव तात्पर्यनिर्धारणं भवति । वेदास्तु नित्यत्वादेव न कस्यापि बुद्धिप्रसूता इति परमेशबुद्धिपूर्वकत्वासिद्धिभूषणमेव न दूषणम् । यत्तु ' ऋषीणां विचाराः संस्कृतयस्तदभीष्टभावनाश्च सायणाचार्येण यथा सारहीनसंकुचितदरिद्रतापूर्णया त्योपस्थापिताः तेषां यदि स्वीकृतिस्तदा भारतीयानामुच्चभावनाः, वेदानां प्रामाणिकता, दिव्यज्योतींषि च हेयतामुपगच्छन्ति । सायणभाव्यानुसारेण वेदास्तात्कालिक्येका पर्यनुयोज्याऽन्धपरम्परैव सिद्ध्यति । यस्याः कारणं सायणस्य मिथ्याधारणैव ' ( पृ ० ६६ ), इति तत्तु सूर्योपरि ष्ठीवनायितं पातकमेव | कतिचिन्मुष्टिमेयानास्तिकान् कुपुरुषानपहाय सर्वेषामपि चिरन्तन वैदिक सनातनधर्मानुयायिनां बहुमतमेव सायणभाष्यम् । सायणभाष्येणैव श्रौतस्मार्त-कर्मणामुपासनानां तत्त्वज्ञानस्य च यथार्थस्वरूपं व्यज्यते । दयानन्दीयं भाष्यं तु भाष्यपदाभिलपनार्हमपि नास्ति । सायणभाष्य इन्द्राग्न्यादीनां चेतम्यविशिष्टार्थपरत्वं तिरस्कृत्य भौतिकार्थपरत्वमेवोपपादितमिति त्वनाघ्रातसायण-भाष्यगन्धस्यैव शोभते । नह्येष स्थाणोरपराधो यदेतमन्त्रो न पश्यति । सायणरीत्या पलाशशाखादीनामपि चैतन्य-विशिष्टत्वेनैव संबोधना तोपपादिता, किमुताग्नीन्द्रादीनां महाभाग्यवत देवानाम् । यदुक्तम् - ' अग्ने पूर्वा अनूषसो विभावसो दीदेथ विश्वदर्शनः । असि ग्रामेष्वविता पुरोहितोऽसि यज्ञेषु मानुषः ॥ ( ऋ ० सं ० १/४४ | १० ) अस्मिन् मन्त्रेऽग्नेविभावसुत्वं विश्वदर्शनोयत्वं ग्रामरक्षकत्वं यज्ञे पुरोहितत्वं मानुषत्वं चोक्तम्, भौतिकेऽग्नौ कथमेतानि विशेषणानि संभाव्यन्ते ' ( पृ ० ६७ ) इति, तत्तु सायणार्थचीर्थमेव कृतम् । नहि सायणाचार्यो भौतिकाग्निपरं मन्त्रं व्याचष्टें, किन्तु दिव्यदेवपरमेव तु व्याचष्टे । तथाहि सायणव्याख्यानम् - ' हे विभावसो विशिष्टप्रकाशनरूप धनवत् अग्ने! विश्वदर्शनः सर्वैर्दर्शनीयस्त्वं पूर्वा उषसः अनु अतीतानुषः कालाननुलक्ष्य दीदे r दीप्तवानसि । तादृशस्त्वं ग्रामेषु जननिवासस्थानेषु अविता असि, रक्षको भवसि । यज्ञेषु अनुष्ठेयकर्मसु पुरोहितः इस उक्ति के आधार पर उपक्रम, उपसंहार आदि प्रमाणों से ही तात्पर्य का निर्धारण होता है । वेद तो मित्य होने से ही किसी की बुद्धि से पैदा नहीं हुए हैं, इस प्रकार इनमें परमेश्वर को बुद्धि का भी उपयोग नहीं हुआ है । वेद के लिये यह भूषण ही है, दूषण नहीं । इसी प्रकार ' ऋषियों के विचार, संस्कृति और उनकी अभीष्ट भावना को सायणाचार्य ने ऐसी सारहीन, संकुचित, दखिता भरी रीति से उपस्थापित किया है कि यदि उनको हम मान लें तो भारतीयों की उच्च भावनाएँ, वेदों की प्रामाणिकता और उनको दिव्य ज्योति हैठी हो जायगी । सायण भाष्य के अनुसार बेद उस समय की एक अन्ध परम्परा के ही पोषक सिद्ध होते हैं । इसका कारण केवल सायण की मिथ्या धारणा है ' यह कथन भी सूर्य के ऊपर थूकने के समान एक पातक ही है । कुछ इने - गिने बाधे नास्तिक पुरुषों को छोड़कर सभी चिरन्तन वैदिक सनातन धर्मानुयायी जनों के सायण आदर के पात्र हैं । सायण भाष्य के सहारे ही श्रोत - स्मार्त कर्मों और उपासनाओं का तथा तत्त्वज्ञान का यथार्थ स्वरूप स्पष्ट होता है । दयानन्द का भाष्य तो भाष्य कहलाने लायक भी नहीं है । सायण भाष्य में इन्द्र अग्नि प्रभृति के चैतन्य विशिष्ट अर्थ का तिरस्कार कर केवल भौतिक अर्थ ही किया गया है, यह ear उसी को शोभा देता है, जिसको कि सायण भाष्य की गन्ध भी नहीं मिली है । साथण की रीति से पलाश की शाखा बादि में भी data faf शष्टता को ही संबोधित किया गया है, फिर महा भाग्यशाली इन्द्र, अनि आदि देवताओं के विषय में तो कहना क्या है? यह कहा गया है कि ' अग्ने पूर्वा ० ' इत्यादि मन्त्र में अग्नि को विभावसु, विश्वदर्शनीय, ग्रामरक्षक, यज्ञ में पुरोहित और मनुष्य स्वभाव का बताया है, भौतिक अस्ति में ये विशेषण कैसे संगत होंगे ', यहाँ पर सायण के अर्थ को ही चुरा लिया गया है । सायण ने इस मन्त्र की व्याख्या भौतिक अग्नि के पक्ष में नहीं की है, किन्तु दिव्य देव अग्नि के पक्ष में की है । सामण भाष्य इस प्रकार है ' है विभावसो, विशिष्ट अर्थ प्रकाशन रूप धनवान् अग्ने, तुम सबके दर्शनीय हो, तुम अतीत उषाकाल में चमकते रहे हो । अपनी दीप्ति से तुम गाँवों में रहने वाले मनुष्यों के रक्षक हो । अनुष्ठेय यज्ञ में वेदि की पूर्व दिशा में अवस्थित होकर तुम ऋत्विक और १०४

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८२६ वेदार्थपारिजातः de: पूर्वस्यां दि r यवस्थितः मानुषः असि ऋत्विग्यजमानानां मनुष्याणां हितोऽसि । नात्र भौतिको वा जडोऽग्निः स्तूयते किन्त्वाहवनीयान्यधिष्ठातृदेवतरूप एवाग्निः स्तूयते, तस्यैव संवोधनार्हत्वात् । हितकारित्वमपि तस्यैव संभवति । नहि त्वद्रीत्याऽग्नेः परमेश्वरस्य वा मानुषत्वं पुरोहितत्वं वा संभवति, जडत्वनिराकारत्वाम्युपगमात् । सनातनधर्मरीत्या तु देवानां यज्ञेऽग्नेः पुरोहितत्वं होतृत्वं मानुषत्वं चाङ्गीकृतम्, माहाभाग्याद्देवानां यथेष्टरूपधारित्व-संभवात् । तस्मादत्रापि सायणार्थं एव विजयते । यदपि -- ' स्वमग्ने प्रमतिस्त्वं पितासि नस्त्वं वयस्कृत्तव जामयो वयम् । संत्वा राय: शतितः सं सहस्रिणः सुवीरं यन्ति व्रतपामदाभ्य ' ( ऋ ० सं ० १।३१।१० ) अत्राग्नेः प्रकृष्टमतित्वं पितृत्वं सुवीरत्वम् असंख्यधनवत्त्वमुक्तम् । एतानि विशेषणानि रूढिवादानुसारेण कथं भौतिकेऽग्नौ संभवन्ति ' ( पृ ० ६७ ) इति, तदपि सायणभाष्याज्ञान-विजृम्भितम्, सायणार्थस्यैव तत्रापि वरिष्ठत्वात् । तथाहि सायणभाष्यम् - ' हे अग्ने! त्वं प्रमतिः अस्मदनुग्रहरूप-प्रकृष्टमतियुक्तोऽसि । ( न केवलं मतिमान्, किन्त्वनुग्रहार्दमतियुक्तः ) त्वं नः अस्माकं पिता पालकोऽसि । त्वं वयस्कृत् आयुष्यप्रदोऽसि । त्वदीयमते कथमप्यग्नेरायुष्प्रदत्वं न संभवति । परमेश्वरो राजा वा नाग्निपदार्थः, प्रथमस्य सर्वसमत्वात् कर्मफलप्रदत्वाच्च । द्वितीयस्यात्पशक्तित्वात् । वयमनुष्ठातारः तव जामयः बन्धवः । हे अदाभ्य! केनापि अहिंसनीय अग्ने! सुवीरं शोभनपुरुषयुक्तं व्रतपां कर्मणः पालकं त्वां शतिनः शतसंख्यायुक्ता रायः धनानि संयन्त सम्यक् प्राप्नुवन्ति । तथा सहस्रिणः सहस्रसंख्याका रायः संयन्ति । महाभाग्यवतो देवस्याग्नेरियं स्तुतिः, न केवलस्य भौतिकस्याग्नेरिति वुद्ध्यस्व । न केवले परमेश्वरे संगच्छन्ते मन्त्रोक्तानि विशेषणानि । निरङ्कुशैश्वर्यस्य तस्य सीमिते-श्वर्य्यवर्णनमस्तुतिरेव | अग्निरूपदेवविशेषरूपधारकस्य तु तस्य संगच्छन्ते विशेषणानि । त्वया तु न परमेश्वरस्था-स्यादिदेवरूपधारकत्वमुपगम्यते, तस्मादत्रापि सायणभाष्यमेव विजयतेत्तमाम् । यजमान का हित साधन करते हो ' । यहाँ पर भौतिक अथवा जड़ अग्नि की स्तुति नहीं की गई है, आहवनीय अग्नि का अधिष्ठाता अग्निदेव ही स्तुति का विषय है, क्योंकि संबोधन के योग्य वह देव अग्नि ही हो सकता है, वहीं किसी का कल्याण भी कर सकता है । आपके मत से परमेश्वर after मनुष्य अथवा पुरोहित नहीं हो सकता, क्योंकि आप तो उसको जड़ तथा निराकार मानते हैं । सनातन धर्म की पद्धति से तो देवताओं के यज्ञ में अग्नि को पुरोहित, होता और मनुष्य माना गया है । देवता महा भाग्यशाली हैं, अत: वह अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण कर सकता है । इस प्रकार यहाँ पर भी विजय सायण के द्वारा किये गये अर्थ की ही होती है । इसी तरह ' स्वमग्ने ० ' इत्यादि मन्त्र में अग्नि को प्रकृष्टमति, पिता, सुवीर, असंख्य धन संपन्न कहा गया है । ये विशेषण रूढ़िवाद के अनुसार भौतिक में कैसे अन्वित होंगे, इस कथन में भी सायण भाष्य को अज्ञानता की ही प्रतीति होती है, क्योंकि यहाँ पर भी सायण का भाष्य ही ठीक है । वह इस प्रकार है- ' हे अग्ने, तुम हमारे अनुग्रह के योग्य उत्कृष्ट मति से संपन्न हो, ( ह केवल मतिमान् हो नहीं, किन्तु उसकी बुद्धि अनुग्रह से भरी हुई भी है ), तुम हमारे पालक पिता हो, लंबी वायु देने वाले हो ' । आपके मत से अग्नि कभी भी आयुदाता नहीं माना जा सकता | परमेश्वर अथवा राजा अग्नि पद का अर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि परमेश्वर तो सबके लिये समान है और वह कर्म का फल देता है । राजा अल्पशक्ति है, अतः वह भी आयुदाता नहीं हो सकता । ' हम अनुष्ठान करने वाले आपके बन्धु है । हे अग्ने, आपको कोई भी मार नहीं सकता । आप पराक्रम से युक्त है । यज्ञ के प्रतिपालक हैं, अतः आपके पास अनेक प्रकार की संपत्ति आती है । महाभाग्यशाली अग्नि देवता की यह स्तुति है, केवल भौतिक अग्नि की नहीं, यह आपको समझना चाहिये । परमेश्वर में ये विशेषण संगत नहीं होते । निरंकुश ऐश्वर्य वाले परमात्मा की सीमित ऐश्वर्यशील के रूप में स्तुति नहीं मानी जायगी । अस्तिरूप देवविशेष का रूप धारण करने वाले के लिये ये विशेषण उचित ही है । आप तो परमेश्वर को अग्नि आदि का रूप धारण करने वाला मानते नहीं, अत: यहाँ पर भी सायण भाष्य की ही विजय होती है ।

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वेदार्थपारिजातः ८२७ यदुक्तम्- ' बलादिमे मन्त्राः सायणेन यज्ञभाषा: भाष्यन्ते ' ( पृ ० ६७ ) इति, तत्तुच्छम्, विपरीतस्यैव सुवचत्वात् । यज्ञाङ्गपर्यवसायिन एते मन्त्रा इति त्वाश्वलायनादयः सूत्रकाराः प्रतिपादयन्ति । त्वया तु बलादिमे मन्त्रा राजमन्त्रिपुरोहितादिभाषा भाष्यन्ते । अनुक्रमणिकाकार: कात्यायनः ' त्वमग्ने द्वधना हिरण्यस्तूप आग्नेयं त्रिष्टुबस्त्या-ष्टमी षोडश्यो च ' इति प्राह । प्रातरनुवाके आग्नेये कती आश्विनशस्त्रे च ' त्वमग्ने प्रथमः ' इति सूक्तम् । आश्वलायनश्च ' स्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरा ऋषिचित् सहोजा अमृतो नितुन्दते ' ( आश्व ० श्री ० सू ० ४११३ ) इति सूचितवान् । ' त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरा इत्याग्निमारुतम् ' ( आश्व ० श्री ० ७।७ ) इति । ' तृतीयेनाभिप्लविकेनोक्तं तृतीयसवनम् ' ( आश्व ० श्र ० ९ 1 ९ ) इत्यतिदिष्टत्वाद् वाजपेये आग्निमारुते एतत्सूक्तं जातवेदस्य निविद्धानीयम् | यदपि यज्ञपरस्यार्थस्य निम्नतमत्वमुक्तम्, तत्तु नास्तिक्यं मौर्यमेव वा, ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म ( श ० ११७१५ ) इति श्रुतिविरुद्धत्वात् । जैमिनि - गौतम वात्स्यायनादिभिर्महर्षिभिर्मन्त्रब्राह्मणस्य यज्ञररत्वोक्तेश्च । सायण-भाष्यस्य दुर्भाग्यपूर्ण: परिणामस्त्वादृशानां नास्तिकानामेव कृते, तेन स्वदभिप्रेतस्यार्थस्य समूलकार्ष कषितत्त्वात् । यदपि -- ' सायणभाष्येण प्राचीनासु मिथ्याधारणासु सुप्रामाणिकतामुद्राङ्कनम् । वेदार्थविषये श्रान्ति-कारकेषु मुख्योऽयं सायणाचार्य: । यद्यप्यन्येऽपि भाष्यकारा: प्राचीना मिध्याधारणावशाद् यज्ञपराण्येव व्याख्यानानि कृतवन्तः । सर्वेऽप्येते वेदार्थस्य यथार्थप्रक्रियाया लोपकास्तादृशा एव, तथापि तेषु क्वचित्क्वचित्केषाञ्चित् सिद्धान्तानां निर्देशो लभ्यते । सायणेन तु ते निर्देशा अपि विलोपिताः ' ( पृ ० ६८ ) इति, तदेतदपि प्रमत्तप्रलाप एव निर्मूलत्वादा-सिद्धान्तविरुद्धत्वाच्च | सायणभाष्यं तु प्रचण्डमार्तण्डमण्डलवदेव त्वादृशानुलूकातपवर्जयन् राजत एव । वेदाब्जभास्करेण सायणाचार्येण वेदसिद्धा एव प्राचीनाः सिद्धान्ता लब्धप्रतिष्ठा धारणाश्च समर्थिताः, याः सर्वदैव त्वादृशैर्नास्तिक-रगम्या एव । यह कथन भी तुच्छ हैं कि ' सायण इन मन्त्रों की जबर्दस्ती यज्ञ की भाषा में व्याख्या करते हैं, क्योंकि इसके विपरीत भी कहा जा सकता है । ये मन्त्र यज्ञ के अंग के रूप में पर्यवमित होते हैं, यह बात आश्वलायन प्रभृति सूत्रकार भी कहते हैं । आप तो जबर्दस्ती इन मन्त्रों की राजमन्त्री, पुरोहित आदि की भाषा में व्याख्या करने लगते हैं । अनुक्रमणिकाकार कात्यायन द्वा ' इत्यादिसूत्र के द्वारा प्रात: अनुवाक में आग्नेय ऋतु तथा आश्विन शस्त्र में ' स्वमग्ने प्रथम: ' इस सूत्र का विनियोग बताया है । आश्वलायन ने भी ' स्वमग्ने प्रथम अंगिरा ' इत्यादि सूत्र में यही बात कही है । ' तृतीयेनाभि ० ' इत्यादि सूत्र में नहीं बताया गया हैं कि अतिदेश के द्वारा वाजपेय से अग्निमारुत सूक्त के स्थान पर यह अग्निदेवताक सूक्त मिबद्ध होना चाहिये | यज्ञपरक अर्थ को fre कोटि का बताना नास्तिकता और मूर्खता के ही लक्षण हो सकते हैं । यह बात ' यज्ञ सर्वश्रेष्ठ कर्म है ' इस श्रुति के विपरीत है । जैमिनि गीतम, वात्स्यायन प्रभृति महर्षियों ने मन्त्र और ब्राह्मणात्मक वेद की यज्ञपरकता ही बताई है । सायण भाष्य का दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम आप जैसे नास्तिकों के लिये ही हो सकता है, क्योंकि उसने आपके अभिप्रेत अर्थ को जड़मूल से उखाड़ फेंका है । ' सायण भाष्य से प्राचीन मिथ्या धारणाओं पर प्रामाणिकता की मुहर लग गई है । वेदार्थ के विषय में भ्रान्ति फैलाने वालों में साथण हो मुख्य है । यद्यपि अन्य प्राचीन माष्यकारों ने भी मिथ्या धारणा के कारण गलत व्याख्यायें लिखी है, अतः ये सभी वेदार्थ की यथार्थ प्रक्रिया का लोप करने वाले हैं, तो भी उनमें कहीं - कहीं कुछ प्राचीन सिद्धान्तों का भी निर्देश मिल जाता है । सायण ने तो इस निर्देशों को भी नष्ट कर दिया ' यह कथन भी पागल का प्रलाप कहा जायगा, क्योंकि एक तो इसमें कोई प्रमाण नहीं है, दूसरे यह बात सिद्धान्त के भी विपरीत है । सामण भाष्य तपते हुए सूर्यमंडल के समान है, इसके सामने आपके जैसे लक्ष्मीवाहन टिक नहीं सकते । वेदरूपी कमल को विकसित करने वाले भास्कर के समान सायणाचार्य ने वेदसिद्ध प्राचीन सिद्धान्तों को ही प्रतिष्ठित किया है और प्राचीन धारणाओं का समर्थन किया है, जो कि आपके जैसे नास्तिकों के लिये सदा अगम्य रहेंगी ।

पृष्ठ 858

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वेदार्थ पारिजातः अयं जिज्ञासुर्भास्कराभं सायणाचार्यमेकवचनेन ( सायणाचार्य वेदार्थ तक नहीं पहुंचा, पृ ० ६८ ) स्मरति । autari दयानन्द ( महान् दयानन्द का प्रादुर्भाव, पृ ० ७४ ) इति स्मरति । आध्यात्मिकाधिदैविकमर्थम जानानस्य सायणस्य भाष्यं तृतीयांशमेव वेदार्थस्य व्यञ्जयति तावतैव तस्यानभिज्ञतापूर्णता स्पष्टं सिद्धयतीति वक्ति । एवमेव त्रिविधवेदार्थप्रक्रियाया अवहेलनं हिमालयाभामनवधानतां द्योतयतीति प्रलपति ( पृ ० ६८ ) । तत्सर्वं सायणभाष्यान-भिज्ञस्यैव शोभते } । सायणभाष्याभिज्ञानां तु तत्र यथावसरं यथास्थान माध्यात्मिकमाधिदैविकं भूतं भव्यं भविष्यच्च सर्वमेव लक्ष्यते । वेदानभिज्ञस्य दयानन्दस्य भाष्ये तु काचिदप्यर्थप्रक्रिया नोपलभ्यते । संगतिस्तु तद्भाष्येऽन्वेषणेनापि नोपलब्धुं शक्या । उम्मत्त इव क्वचिम्मन्त्रे यत्किञ्चिद्वदति । क्वचिद्राजा क्वचिन्मन्त्री क्वचित्पुरोहितः क्वचित्सैनिका + स्तदीया देवताः । ईश्वरोऽपि तदीयः क्वचित् किमपि वदति । नहि सर्वत्र मन्त्रेषु दयानन्दोऽपि त्रिविधानर्थानुपपाद-यति । अनेकार्थत्वेन वाक्यभेदापत्तिश्च मीमांसकसंमतो दोषः । यदपि ' ऋग्वेदभाष्योपोद्घाते यज्ञेष्वाध्वर्यवादिकर्मनिरूपणाय वेदभाष्यं करोमीति सायणेनोक्तम् । साम-वेदभाष्यभूमिकायां चोक्तम् -- ' यज्ञो ब्रह्मा च वेदेषु द्वावर्थी काण्डयोर्द्वयोः । अध्वर्युमुख्यैर्ऋत्विग्भिश्चतुभिर्यज्ञसंपदः ॥ ' अत्र वेदस्य यज्ञब्रह्मपरत्वमुक्तम्, काण्वसंहिताभाष्ये च कर्मकाण्डब्रह्मकाण्डी वेदे द्वी काण्डौ स्तः । बृहदारण्यकाख्यो ग्रन्थ ब्रह्मकाण्डः, तद्वद्यतिरिक्तं शतपथब्राह्मणं संहिता चेत्यनयोः कर्मकाण्डत्वम्, तत्रोभयत्राधानाग्निहोत्रदर्शपूर्ण मासा-दिककर्मण एव प्रतिपाद्यत्वात् । सायणेन न केवलं शतपथे, किन्तु संहितायामपि दर्शपूर्णमासादिकर्मण एव प्रतिपादन मुक्तम् । तदेतद् भास्कर स्कन्दस्वाम्यभिमतत्रिविधार्थप्रक्रियाविरुद्धमेव ' ( पृ ० ६८-६९ ) इति, तदेतदपि सायणभाष्या-क्षरानभिज्ञानमूलकमेव, ब्रह्मविद्वेषमूलकमेव वा । ऋग्वेदभाष्यभूमिकायामपि वेदस्य धर्मब्रह्मपरत्वोक्तः । तथा व ऋग्वेदभाष्योपोद्घात एव धर्मब्रह्मणी वेदैकवेद्ये इत्युक्तम् । शास्त्रादेव प्रमाणाज्जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्माधिगम्यते । जिज्ञासु महाशय सूर्य के समान तेजस्वी सायणाचार्य को एक वचन से स्मरण करते हैं ( सायणाचार्य वेदार्थं तक नहीं पहुँचा ) और जुगनू की मानिन्द दयानन्द को ' महान् दयानन्द का प्रादुर्भाव ' इस तरह से स्मरण करते हैं । वे यह भी कहते हैं कि आध्यात्मिक और आधिदैविक अर्थ को न जानने के कारण सायण वेद के तृतीय अंश को ही स्पष्ट कर सके, इसीसे इनकी अनभिज्ञता और अपूर्णता स्पष्ट होती है । इसी तरह त्रिविध वेदार्थ प्रक्रिया की अवहेलना करके सायण ने हिमालय के समान बड़ी भूल की है, इस तरह की सारी बकवास, जो सायण के भाष्य को ठीक से न समझ सकता हो, उसी को शोभा देती है । जो सायण के भाष्य को ठीक से समझते हैं, उनको अवसर के अनुसार उचित स्थान पर आध्यात्मिक, आधिदैविक, भूत, भव्य, भविष्य सब तरह का अर्थ मालूम हो जाता है । वेद के अनभिज्ञ दयानन्द के भाष्य में तो कोई भी अर्थ प्रक्रिया उपलब्ध नहीं होती । उनके भाष्य में परस्पर संगति खोजने पर भी नहीं मिलती, उम्मत्त के समान किसी मन्त्र में कुछ भी कह देते हैं । कहीं राजा, कहीं मन्त्री, कहीं पुरोहित, कहीं सैनिक उनके देवता हैं । उनका ईश्वर भी कहीं कुछ भी कह देता है । सभी मन्त्रों में दयानन्द भी विविध अर्थ नहीं बताते । अनेक अर्थ करने पर मीमांसकों के मत के अनुसार वाक्य भेद का दोष आता है । ' ऋग्वेद भाष्य के उपोद्घात में सायण ने कहा है कि यज्ञ में अध्वर्यु आदि के कर्म के निरूपण के लिये वेद भाष्य कर रहा हूँ और सामवेद भाष्य को भूमिका में कहा है कि वेदों में दो काण्डों में यज्ञ और ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है । अध्वर्युं प्रभृति चा. ऋत्विों से सारी यज्ञ की संपत्ति निष्पन्न होती है । यहाँ पर वेद को यज्ञ और ब्रह्मपरक कहा है । काण्व संहिता के भाष्य में कहा है कि वेद में कर्मकाण्ड और ब्रह्मकाण्ड ये दो काण्ड हैं । बृहदारण्यक ग्रन्थ में ब्रह्मकाण्ड का और उससे भिन्न शतपथ ब्राह्मण और संहिता में कर्मकाण्ड का प्रतिपादन है, क्योंकि इन दोनों स्थानों में आधान अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास आदि कर्मों का विधान है । इस तरह सायण ने न केवल शतपथ ब्राह्मण में, किन्तु संहिता में भी दर्शपूर्णमास आदि कर्म का ही प्रतिपादन माना है । यह बात भास्कर, स्कन्द-स्वामी आदि की after fafaa वेदार्थ प्रक्रिया के विरुद्ध है ' यह सब कथन भी सायण भाष्य का अक्षर - बोध न होने के कारण है, अथवा इसके मूल में ब्राह्मण द्वेष की भावना काम कर रही है । सायण ने ऋग्वेदभाष्य की भूमिका में भी वेद को धर्म और ब्रह्म दोनों का प्रतिपादक माना है । उसने ऋग्वेद भाष्य के उपोद्घात में ही धर्म और ब्रह्म केवल वेद से ही जाने जा सकते हैं, यह बात कही

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 859 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः ८२६ श्रुतिश्च भवति ' नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ' ( तै ० ब्रा ० ३।१२ / ९ / ७ ) इति । ' रूपलिङ्गादिराहित्यात्र मानान्तर योग्यता | तस्मादनन्यलभ्यत्वाद्धर्मं ब्रह्मणोर्वेदविषयत्वम् । तदुभयज्ञानं वेदस्य साक्षात्प्रयोजनम् " " सम्बन्धस्तु वेदस्य धर्म-ब्रह्मभ्यां प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावः । इत्येवमादि सायणभाष्यमदृष्ट्वैव यत्किञ्चित् प्रलपति ब्रह्मदत्तः । सायणभाष्यस्य सर्वाण्यक्षराणि प्रमाणमूलकानि न दयानदस्येव भङ्गोल्लासमयानि । यद्यपि संहितामन्त्रेष्वपि ब्रह्मविष्णुरुद्राग्निरूपेण ब्रह्मणः प्रतिपादनमस्ति, तथापि तेषां मन्त्राणां तेषु तेषु कर्मसु विनियुक्तत्वात् कर्मोपासनापरत्वेन तत्रानभ्यषत्वस्त्रप्रधानत्वाभ्यां ब्रह्मप्रतिपादनं नास्त्येव । अन्यपरत्वे तु तत्वानाम्यतत्प्रधानेभ्यो बलीयांसीति म्यायात् कर्मपरेरागमेः प्रत्यक्षानुमानैश्च विरोधेऽतत्प्रधानानि ब्रह्मबोध -कानि वाक्यानि बाधितानि भवेयुः । अतो यानि कर्मस्वविनियुक्तानि कर्मानङ्गानि मन्त्रब्राह्मणवचनानि तान्येवानन्य-शेषाणि स्वप्रधानानि बलीयांसि । तानि च कर्तृत्वभावत्वनानात्वबोधकानि शास्त्रवाक्यानि प्रत्यक्षानुमानानि च बाधन्ते । शुक्लयजुर्वेदीय माध्यन्दिनोसंहितायाः काण्वसंहितायाश्च ईशावास्यमित्यादयो मन्त्रा बृहदारण्यको ग्रन्थश्च स्वप्रधाना एव । नवीशावास्यमित्यादयो मन्त्रा अपि कर्मक्षेत्राः, मत्रत्वात् इषे त्वादिमन्त्रवदिति कर्मशेषत्वमेव तेषामपि सिद्ध्यतीति चेन्न, विनियोजक श्रुत्यादिप्रमाण सत्त्वस्योपाधित्वात् । इषे त्वेत्यादी साध्यव्यापकत्वमुपाधेः, ईशावास्य-मित्यादी साधनस्य मत्वस्य सत्खेऽपि विनियोजक प्रमाणसत्त्वस्योपाधेरसत्त्वेन साधनाव्यापकत्वं च । न च लिङ्गादि-वलात्तेषामपि देहादिभिनकर्तृवाचकत्वेन कर्मोपासनाद्य देवतावोधकत्वेन वा कर्माङ्गत्वमव्याहतमेवेति वाच्यम्, | शास्त्र के प्रमाण से ही यह ज्ञात होता है कि ब्रह्म जगत् के जम्मादि का कारण है | श्रुति का कथन है कि ' उस बृहद् मा को वेद का अनभिज्ञ नहीं जान पाता । रूप और लिंग आदि के न होने से अन्य प्रमाण यहाँ प्रवृत्त नहीं हो सकते । इसलिये धर्म और ब्रह्म की अधिगति अन्य प्रमाणों से न हो सकने के कारण वेद ही इनको जानने का एकमात्र साधन है । वेद का साक्षात् प्रयोजन धर्म और ब्रह्म का परिज्ञान ही है | वेद का धर्म और ब्रह्म के साथ प्रतिपाद्यप्रतिपादक संबन्ध है । सायण भाष्य के इन अंशों को बिना देखे ब्रह्मदत्त मनमाना बकवास करते हैं । सायण भाष्य के सभी अक्षर प्रमाणमूलक हैं, दयानन्द की भाँति ये सब भांग के नशे में नहीं दिये गये हैं । raft संहिता मन्त्रों में भी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि के रूप में ब्रह्म का प्रतिपादन है, तथापि उन उन मन्त्रों का उन उन कर्मों में विनियोग होने से कर्म और उपासनापरकता के कारण अनन्यशेष और अपनी प्रधानता के रूप में यहाँ पर ब्रह्म का प्रति-पादन नहीं हो सकता । अन्यपरता के होने से ' तप्रधान अस्थान से बलवान् होते हैं ' इस नियम के अनुसार कर्मपरक आगम वचनों और प्रत्यक्ष एवं अनुमान प्रमाणों से विरोध उपस्थित होने पर अतप्रधान ब्रह्मबोधक वाक्य बाधित हो जायेंगे । इसलिये जो मन्त्र और ब्राह्मण वचन कर्म में विनियुक्त न होने के कारण कर्म के अंग नहीं हैं, वे ही ब्रह्म के प्रति arra शेष तथा अपनी serial के कारण बलीयान हैं । इस तरह के वाक्य कर्तृत्व, भोक्तृत्व, नानात्व आदि के बोधक शास्त्र वाक्यों को और प्रत्यक्ष एवं अनुमान प्रमाण को बाधित कर देते हैं । शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन संहिता और कापत्र संहिता के ' ईशा वास्यम् ' इत्यादि मन्त्रों में और बृहदारण्यक उपनिषद् में ब्रह्म की ही प्रधानता है । ' ईशावास्यम् ' मन्त्र भी कर्मशेष है, योंकि वे भो ' इषे त्वा ' इत्यादि के समान ही मन्त्र हैं, अतः ये भी कर्म केही अंग माने जायेंगे, ब्रह्म के नहीं, यह कथन इसलिये उचित नहीं हैं कि यहाँ पर ' विनियोजक श्रुत्यादिप्रमाणसच ' यह उपाधि है । ' इषे त्वा ' इत्यादि में उक्त उपाधि साध्य में व्याप्त हैं, किन्तु ' ईशा वास्यम् ' इत्यादि में साधन मन्त्रत्व के रहने पर भी विनियोजक श्रुत्यादिप्रमाणत्व रूप उपाधि के न रहने से यह हेतु साधन में व्याप्त नहीं है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि लिंग आदि के ar से देहादि से भिकर्ता के बोधक होने से अथवा कर्म एवं उपासना के अंगभूत देवताओं के बोधक होने से इनमें भी कांगता

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 860 का मूल पृष्ठ
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८३० वैवार्थपारिजातः तेषामकर्मशेषस्यात्मनो याथात्म्यप्रतिपादकत्वेन तदनुपपत्ते । अत एबोपोद्घाते बृहदारण्यको ग्रन्थो ब्रह्मकाण्ड उक्तः । ईशावास्य मित्यादीनामकर्मशेषाणामपि बृहदारण्यकमुपलक्षणं वेदितव्यम्, मन्त्रब्राह्मणात्मकस्याक्षरराशेर्वेदत्वाभ्युपगमात् । न केवलं सायण एव, उपनिषदपि परापराविद्यारूपेण धर्मब्रह्मपरत्वेन धर्मपरमेवाधिकांशं वेदभागमुक्त्वा ब्रह्मवोधकभागस्य परविद्यात्वं वक्ति । ' द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च । तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेद सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्त छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षर-मधिगम्यते ' ( मु ० ११११४- २ ) | साधनभूतधर्मज्ञानहेतुत्वात् षडङ्गसहितानां कर्मकाण्डपराणां मन्त्राणां ब्राह्मणानां चा-परविद्यात्वमुक्तम् । परमपुरुषार्थभूत ब्रह्मज्ञानहेतुत्वादुपनिषदां पविद्यात्वमुक्तमित्यपि तत्रैव सायणेन स्पष्टीकृतम् । अत एव ' सायण: कर्मपरमेव वेदं मन्यते न ब्रह्मपरमनध्यात्मविदेव सः ' इत्यादि बहुजल्पनमज्ञजनप्रतारणमेव । नह्येष स्थाणोरपराघो यदेनमन्धो न पश्यति । उपनिषत्सु मन्त्रा अध्यायात्येव । ' सायणभाष्यं वेदार्थविषये दुर्लङ्घ्योऽत्युच्च -प्राचोर एव संवृत्तस्तं चार्यो दयानन्द उल्लङ्घितवान् ' ( पृ ० ६ ९ ) इति, तदपि स्वदौर्जन्यमेव व्यञ्जितम् । त्वादृशैर्जन्म-शतैरपि सायणभाष्यावगाहासंभवात् । यत्तु ' शतं हिमाः ' इत्येतद् व्याख्येय मन्त्रस्य प्रतीकम् । शतपथब्राह्मणस्य मन्त्रव्याख्यानरूपत्वाद् ब्राह्मणं पश्चाद्भावि । व्याख्येय मन्त्रप्रतिपादकसंहिताग्रन्थः पूर्वभावित्वात् प्रथमं भवति । सायणः काण्वभूमिकायां शतपथस्य मन्त्रव्याख्यानरूपत्वमङ्गीकृत्यापि ऋगादिभाष्यभूमिकायां मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमित्येव रटति ' ( पृ ० ६ ९ ) इति, तदपि भाष्याविकमूलकमेव, व्याख्येयत्वस्य व्याख्यानत्वस्य च वेदत्वाप्रयोजकत्वात् । सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्य-माणकर्तृकत्वस्यैव वेदत्वप्रयोजकत्वस्यासकृदुक्तत्वात् । अत एव पुरुषसूक्ताद्यनेकेषां मन्त्राणां शब्दान्तरेण मन्त्रान्तराणा-fant बाधा के सिद्ध हो जायगी, क्योंकि ये मन्त्र अकर्मशेष आत्मा की यथार्थता के प्रतिपादक हैं, अत: इनकी कर्मागता नहीं बन सकती । इसीलिये उपोद्वात में बृहदारण्यक को ब्रह्मकाण्ड कहा गया है । ' ईशा वास्यम् ' इत्यादि अकर्मशेष मन्त्रों को भी बृहदारण्यक को उपलक्षण मानना चाहिये, क्योंकि मन्त्र ब्राह्मणात्मक पूरी शब्दराशि को वेद कहा जाता है । केवल सायण ही नहीं, उपनिषद् भी पर और अपर विद्या के रूप में धर्म और ब्रह्म का प्रतिपादन करती हैं और afrain der को धर्म का प्रतिपादक बता कर ब्रह्मविद्या के बोधक भाग को पर विद्या के नाम से संबोधित करती है | ' ब्रह्म aari का कहना है कि परा और अपरा के नाम से दो विद्याएँ जाननी चाहिये | इनमे अपरा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष को कहा जाता है । परा उस विद्या को कहते हैं, जिससे कि अक्षर ब्रह्म की गति होती हैं ' । ब्रह्मज्ञान के साधनभूत धर्मज्ञान में कारण होने से छः अंगों सहित संहितामन्त्रों और ब्राह्मणों को, कर्मकाण्ड के प्रतिपादक होने के कारण, अपर विद्या कहा गया है, परम पुरुषार्थभूत ब्रह्मज्ञान का कारण होने से उपनिषद् पर विद्या के नाम से कही गई है, यह बात भी वहीं सायण ने कही है । इसलिये ' सायण वेदों को कर्मपरक ही मानते हैं, ब्रह्मपरक नहीं, अतः वह अध्यात्म पक्ष को नहीं जानते थे ' इत्यादि उक्तियाँ अल्पज्ञ लोगों को ही भ्रम में डाल सकती है । यह स्थाणु ( ठूंठ ) का अपराध नहीं है कि उसकी अन्धा नहीं देख पाता । उपनिषदों में भी मन्त्र आते ही हैं । ' साथण भाष्य वेदार्थ के विषय में दुर्लध्य ऊँची दीवार बन गई, इसको स्वामी दयानन्द ने लांघा ' यह भी अपनी दुर्जनता की ही अभिव्यक्ति है । आपके जैसे व्यक्ति सैकड़ों जन्मों में भी सायण के भाष्य को नही समझ सकते | ' शतं हिमा: ' यह व्याख्येय मन्त्र का प्रतीक है । शतपथ ब्राह्मण मन्त्रों की व्याख्या करता है, अत: ब्राह्मण बाद की रचना है, व्याख्य मन्त्रों के प्रतिपादक संहिता ग्रन्थ पूर्वभावी होने से पहले के हैं । सायण काण्व संहिताकी भूमिका में शतपथ ब्राह्मण की मन्त्र-व्याख्यान रूपता को मान कर भी ऋगादिभाष्यभूमिका में मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद मानने की रट लगाता है, यह कथन भी भाष्य को न समझ पाने के कारण हैं, क्योंकि व्याख्येयत्व और व्याख्यानत्व वेदस्व के प्रयोजक नहीं है । संप्रदाय के विछिन न होने पर भी इसका कर्ता किसी की स्मृति में नहीं है, यही बात वेदत्व की प्रयोजक है, यह बार बार कहा जा चुका है । इसी लिये पुरुष-