वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 861–870
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 861–870
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बपार्थपारिजातः ८३१ मर्थकथनरूपव्याख्यानत्वं वेदत्वं चाव्याहतमेव । तस्माद्यथा महाभाष्यादिषु सूत्रानुकारिमाण्यं तद्व्याख्यानभाष्यं च सर्वं भाष्यमेव, रामायणमहाभारतादौ सूत्रस्थानीयं श्लोकमुक्त्वा तद्वयाख्यानभूतमुत्तरसर्गमध्यायं वा लिखति ग्रन्थकारः, स सर्वोऽपि व्याख्येयो व्याख्यानं तद्ग्रन्यरूपमेव, स्था गीताया एकादशाध्यायान्ते मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः ' इति
श्लोकस्य व्याख्यानभूत एव द्वादशाध्यायः । यथा वा तैत्तिरीयोपनिषदि ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' इति सूत्रस्थानीयं
ब्राह्मणश्चनम्, तद्व्याख्यानभूतं च ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायाम् । सोऽश्नुते सर्वान्कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ॥ ' इति मन्त्रवचनम् । ' किञ्चिज्ज्ञोऽपि कः सायणस्य विद्वत्तां प्रशंसेत्? इतिहासादिसम्बन्धे सायणस्य मनसि सन्देह एवासीत् । सायणेऽध्यात्मभावनैव नासीत् । दयानन्दवद् अष्टादशघण्टा यावत् समाधिभिर्वेदस्य मौलिक सिद्धान्तान् जानीयात्तदा सम्यग् लिखेत् ' ( पृ ० ६ ९ ) इत्यादि तत्तु प्रमत्तप्रलापप्रायमेव । संक्षेपेण त्वदीयव्याख्यानादिसम्बन्ध एव त्वदुक्तिरुप-युज्यते । त्वादृशा एव स्वयं नष्टाः परान्नाशयन्ति । मन्त्रब्राह्मणात्मकस्याक्षरराशेर्वेदत्वं तु बहुधा प्रतिपादितमेव । यत्तु - ' तस्मात् सर्वैरपि परमेश्वर एव हूयते । यद्यपीन्द्रादयस्तत्र तत्र हूयन्ते तथापि परमेश्वरस्यंवेन्द्रादि-रूपेणावस्थानाद् इति ऋग्वेदभाष्यभूमिकायां सायण: ' इति, स्वोक्तावपि सायणो न स्थितः ' ( पृ ० ६ ९ ) इति, तदपि सायणभाष्यानभिज्ञानमूलकं द्वेषमूलकमेव वा । वस्तुतस्तु दयानन्दादयः सर्वेऽपि सायणभाष्याधमर्णा एव, सायण-भाष्याभावे वैदिकस्यार्थस्य तेः किञ्चिदपि ज्ञातुमशक्यत्वात् । साधन एव पुरुषव्यापारः फलपर्य्यवसायी भवति, कुठार-गोचरोध मन निपातनरूपव्यापारस्यैव द्वैधीभावरूपे पय्र्यवसानदर्शनात् । तत एवाधिकांशसंहितामन्त्राणां ब्राह्मणांशानां च ब्रह्मज्ञानसाधनभूतधर्मबोधन एव पय्र्यवसानम् । तादृशांशव्याख्यानकाले कर्मणामेव बोधनं प्रशंसनं च युक्तमेव । अत सूक्त आदि के अनेक मन्त्रों की शब्दान्तर से व्याख्या करने वाले मन्त्र इतकी व्याख्या करते हुए भी बिना बाधा के बेद माने जाते हैं । इसलिये जैसे महाभाष्य आदि में सूत्र का अनुकरण करने वाला भाष्य तथा उसकी व्याख्या करने वाला भाष्य, सब भाष्य ही कहलाता है; रामायण, महाभारत आदि में सूत्रस्थानीय किसी श्लोक को कह कर उसकी व्याख्या में अगला सर्ग अथवा अध्याय लिखा जाता है; वह सब व्याख्येय और व्याख्यानभूत उस ग्रन्थ का ही अंग होता है; जैसे कि गीता के ११ वें अध्याय के अन्त में विद्यमान ' मत्कर्मकृत् ’ इत्यादि श्लोक की व्याख्या ही अगले बारहवें अध्याय में की गई है; अथवा जैसे तैतिरीय उपनिषद् में ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' यह सूत्रस्थानीय ब्राह्मण वचन हैं और इसी की व्याख्या ' ब्रह्म सत्य, ज्ञान, अनन्त स्वभाव है । इसको रहस्य से भावृत अवस्था में जो देख लेता है, वह विपश्चित् ब्रह्म के साथ सभी कामनाओं को पा लेता है ' इस मन्त्र के द्वारा की गई है । ' कोई अल्पज्ञ व्यक्ति भी सायण की प्रशंसा क्यों करेगा? इतिहास आदि के विषय में सायण के मन में सन्देह बना हो हुआ था । सायण में अध्यात्म भावना है ही नहीं । दयानन्द के समान १८ घंटा पर्यन्त समाधि लगाकर वेदों के मौलिक सिद्धान्तों को जब जाने, तब तो वे कुछ लिख सकते हैं ' यह कथन केवल पागल की बकवास के समान है । संक्षेप में इतना ही कहा जा सकता है कि आप लोगों की व्याख्या के संबन्ध में हो आपलोगों की बात ठीक बैठती है । ऐसे ही लोग स्वयं तो नष्ट होते ही है, दूसरों का भी नाश करते हैं । मन्त्र ब्राह्मणात्मक अक्षरराशि ही वेद है, यह बात अनेक बार कही जा चुकी है । ' इसलिये सब कोई परमेश्वर को उद्दिष्ट करके ही यागादि करते हैं । यद्यपि जहाँ - तहाँ इन्द्र आदि के लिये हवन किया जाता है, तो भी परमेश्वर ही इन्द्र आदि के रूप में अवस्थित रहता है, यह बात ऋग्वेदभाष्यभूमिका में सायण ने कही है । अपनी इस उक्ति पर भी सायण टिक न सके ', यह कथन भी या तो सायण के भाष्य को न समझने से अथवा द्वेषवश प्रयुक्त हुआ है । वास्तव में दयानन्द प्रभूति सभी साथण भाष्य के ऋणी हैं । सायण माध्य के अभाव में उनको वेद का अर्थ कुछ भी समझ में न आता । पुरुष का काम तभी पूरा होता है, जब कि तदनुकूल साधन उसे उपलब्ध हों. कुल्हाड़ी का बार - बार उठाने और गिराने के बाद ही लकड़ी के दो टुकड़े होते हैं । इसीलिये अधिकांश संहिता मन्त्रों का और ब्राह्मणों का पर्यवसान ब्रह्मज्ञान के साधनभूत धर्म के बोधन
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वेदार्थपारिजातः एवेशावास्यादिमन्त्राणां व्याख्यानमुपनिषदां च व्याख्यानमपरविद्यावोधितधर्मस्य परमं फलं परमपुरुषार्थरूप ब्रह्मापरोक्ष-ज्ञानपय्र्यवसाय्येव । दयानन्दादिभाष्यं कुत्राप्यर्थे नानान्तम्, किन्तु निर्लज्जतापूर्ण घाष्टर्य मेव तस्य सर्वत्र लक्ष्यते । ' एक लज्जां परित्यज्य त्रैलोक्यविजयी भवेत् ' ययेतत्तथा तत्र तत्र व्याख्याने दर्शयिष्यामः । ' बुद्धस्तु सायणाद्बहोः कालात् पूर्वमुत्पन्न इति सायणभाष्यप्रभावेण स कथमेवं निगदेद् यदहं हिंसाप्रधानं वेदं न मन्ये । वेदेष्वाख्यानसमयी यदामुना निरुक्तग्रन्थ एवं विद्यमानो दर्शितः, वेदेष्वाख्यानसमयो नास्तीति ' ( पृ ०७० ) तदपि वेदानभिज्ञस्यैव शोभते । मनुस्तु -- ' भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति ' ( १२१ ९ ७ ) इति स्पष्टमेवोक्तवान् । सामाजिकास्तु वैदिकैरथंवा वैर्मन्त्रैश्व स्पष्टतयाऽभिघावृत्त्या प्रतिपादितमपीतिहासमपलपन्ति तद्व्यवस्थां कर्तुमश-नुवानाः | यदि वेदः सर्वज्ञानमयः सर्वविद्यानां स्थानस्त्वयाऽप्यभ्युपेयते, तर्हि इतिवृत्तविद्यायाः प्रतिपादनात् कुतो भयम्? मानान्तरविरोधे सत्योपचारिकोऽयमाख्यानसमय इति तु सायणस्यापि सिद्धान्त एव । त्वादृशा अल्पज्ञा एव सायणभाष्याद् भ्राम्यन्ति । यथोलकाः प्रचण्ड मार्तण्डमण्डलमप्यश्धकारमयं विभावयन्ति तथैव त्वादृशाः सर्वार्था बोधनपरं सायणभाष्यमनिष्टकरमेव मन्यन्ते । मानान्तर विरुद्धस्याख्यानस्य गौणार्थत्वेऽपि मानान्तर सिद्धार्थकस्यानु-वादकत्वम्, मानान्तरासिद्धार्थकस्य मानान्तरविरुद्धार्थकस्याख्यानस्यापि स्तुत्यादौ मुख्यतात्पय्र्येऽप्यवान्तरतात्पय्र्यस्य स्वार्थेऽपि सत्त्वे बाधाभावात् । सर्वत्रैव सायणाचार्यः परमात्मपदप्राप्तिमेव परमपुरुषार्थं मन्यते । तत्साधनरूपेणैव चापविद्याया: प्रतिपाद्यं धर्ममभिप्रेति । यदुक्त ' ' दुरभिसन्धयः पाश्चात्त्याः सायणभाष्यानुसारेणैव वेदेष्वश्रद्धामुत्पादयन्ति ' ( पृ ० ७० ), तत्तुच्छम् । दुरभिसन्धयो हि सुव्याख्यानस्यापि दुष्परिणाममेवाभिलषन्ति, यथा यूयं भारतीया अनि ईसायीधर्मप्रभावाक्रान्ताः में ही होता है । ऐसे अंशों की व्याख्या के समय कर्मों का ज्ञान कराना और उन्हीं की प्रशंसा करना ठीक ही है । इसीलिये ' ईशा वास्यम् ' इत्यादि मन्त्रों और उपनिषदों का व्याख्यान अपर विद्या बोषित धर्म का परम फल हैं, इसका पर्यवसान परम पुरुषार्थ रूप ब्रह्म के साक्षात्कार में होता है | दयानन्द आदि का भाष्य किसी भी अर्थ में अत्रान्त नहीं है । यहाँ पर स्थान - स्थान में निर्लज्जता से भरी धृष्टता के ही सर्वत्र दर्शन होते हैं । ' एक लज्जा को छोड़कर त्रिलोकी को जीत लें ' इस आभाणक की यहाँ जिस प्रकार चरितार्थ किया गया है, उसका विवरण व्याख्यान में स्थान - स्थान पर दिया जायगा । बुद्ध तो सायण से बहुत पहले हुए थे । वे सायण भाव्य के प्रभाव से ऐसा कैसे कहेंगे कि मैं हिंसाप्रधान वेद को नही मानता । जब इन्होंने माना है कि निरुक्त में आख्यान की परम्परा मान्य थी तो उस परिस्थिति में यह कहना कि वेदों में आख्यानों की परम्परा नहीं है, वेदों को न जानने वाले को ही शोभा दे सकता है | मनु ने तो स्पष्ट ही कहा है कि - ' भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ वेद से ही जाना जाता है । आर्यसमाजी वैदिक अर्थवाद और मन्त्रों में स्पष्ट रूप से अभिषा वृत्ति के द्वारा प्रतिपादित इतिहास का भी अपलाप करते हैं, क्योंकि वे इस समस्या का कुछ समाधान नहीं दे पाते । यदि वेद को आप सब ज्ञान से युक्त, सब विद्याओं का उत्पत्तिस्थान मानते हैं, सो इतिवृत्त विद्या का प्रतिपादन होने पर भय क्यों? यह तो सायण भी मानते ही हैं कि दूसरे प्रमाण से विरोध उपस्थित होने पर यह इतिहास का प्रतिपादन औपचारिक माना जाता है । आपके जैसे मल्पज्ञ ही सायण भाष्य से भ्रम में पड़ते हैं । जैसे उलूक प्रचण्ड सूर्यमंडल को भी अन्धकार से भरा मानता है, उसी तरह आपके जैसे व्यक्ति ही सभी तरह के अर्थों के प्रतिपादन में समर्थ सायण भाष्य को अनिष्टकर मानते हैं | प्रमाणान्तर से विरुद्ध आरुयान के गौणार्थक होने पर भी मानान्तर से सिद्ध की अनुवादकता और मानान्तर से असिद्ध एवं मानान्तर से अविरुद्ध आख्यान का स्तुति आदि में मुख्य तात्पर्य होते हुए भी स्वार्थ में अवान्तर तात्पर्य के रहने में भी कोई बाधा नहीं हो सकती । सायणाचार्य सभी जगह परमात्मपद की प्राप्ति को ही परम पुरुषार्थ मानते हैं । अपर विद्या के प्रतिपाद्य धर्म को परमात्मपद की प्राप्ति का साधन हो मानते हैं । ' पाश्चात्य विद्वान् दुरभिसन्धिपूर्वक सायण भाष्य का सहारा लेकर ही वेदों के प्रति श्रद्धा पैदा करते हैं ' यह कथन भी गलत है । जिनके मन में खोट है, ऐसे व्यक्ति अच्छी व्याख्या से भी बुरा ही अर्थ निकालते है । जैसे कि आप लोग भारतीय
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वेदार्थपारिजाता ८३३ सनातनधर्मविरोधिनो जाताः । तथा तज्जीवातुभूतं भाष्यं निन्दथ, विज्ञानदृष्ट्या यूयमपीसायोमतानुयायिप्रेरणयैव तदनुगुण वेदव्याख्याने संलग्ना: स्थ । येषां सनातनधर्मे, अवतारवादे, परलोकवादे, जातिवादे, विवाहादिनियमे, भोजन-पानादी, स्पर्शास्पर्शादी विश्वासो भवति, ते कदाचिदीसायिमुस्लिमादीन् स्प्रष्टुमपि संकुचन्ति । किमु तेषां तद्धर्मप्रवेशे वक्तव्यम् । तस्माद् वद्धमूलस्वधर्मश्रद्धोन्मूलनेन यूयं तत्सहायका एव । मोनियर विलियम - हेमन - विलिसन - रॉथ-ह्विटनी मैक्समूलरप्रभृतयो वस्तुतः सनातनधर्मस्यैव विरोधिन: । आसामाजिकास्तु तत्सहकारिण एव, सनातनधर्म-निराकरणे जातिवादोन्मूलने सर्वविवाहादिकार्येषु समेषामेषामेकमत्यात् । मैक्समूलरस्य पत्रे यहि नखितम्-The edition of mine and translation of Veda will here after tell to a great extent on the fate of India and on the growth of millions of souls in that country. It is root of their religion and to show them what is the root is, I fell sure is the only way of uprooting all that has sprung from it, during the last three thousand years. अस्य पत्रस्यानुवादे यदुक्तं सायणभाष्यसहितस्यर्वेदस्य मयानुवादप्रकाशनं भारतीयभाग्यं सुदूरं यावत्प्र-भावं भावयिष्यतीति ( पृ ० ७२ ), तत्तु सर्वथाऽशुद्धं दुरभिसन्धिपूर्णं च । तत्र सायणभाष्यीयचर्चाया अभावात् । अन्यथा वेदार्थानुवादे नायं वेदार्थ इत्युक्त्वा विद्वांस उपेक्षेरन्नेव । तत एव त्वादृशा अपि तदनुवादं सायणसंमतं मन्यन्ते । वस्तु-तस्तु मैक्समूलरस्त्वादृशाश्च सायणभाष्योक्तमर्थमबुद्धवैव तद्विषये यत्किञ्चिदपि जल्पन्ति । मैक्समूलरस्तु तत्स्थाना-पन्नमीसायीधमं मन्यते । त्वादृशाः सामाजिका आर्यनुवास्तु वैदिकमनाम्नैव म्लेच्छधर्मं प्रतिपादयन्ति । अथ च बाह्यधर्माभासानां कृते निरर्गलद्वारं कुर्वन्ति । होते हुए भी ईसाई धर्म से प्रभावित होकर सनातन धर्म के विरोधी हो गये हैं । आप उसके प्राणभूत भाष्य की निन्दा करते हैं और उन्हीं की प्रेरणा से वैज्ञानिक दृष्टि का बहाना लेकर उनकी इच्छा के अनुकूल ही वेद की व्याख्या में लग गये हैं । जिनका सनातन धर्म में-- अवतारवाद, परलोकवाद, जातिवाद, विवाह इत्यादि के नियम, भोजन - पान आदि की शुद्धि, स्पर्शास्पर्श का विचार आदि में विश्वास है, वे कदाचित् ईसाई, मुस्लिम आदि के छूने में भी संकोच करेंगे, फिर ऐसे व्यक्तियों का उनके धर्म में प्रवेश एक असंभव बात है । इसलिये अपने धर्म में जिनकी श्रद्धा गहराई से बनी हुई है, उनकी श्रद्धा को जड़ से उखाड़ फेकने में आप उनके सहायक ही हैं । मोनियर विलियम, हेमेन, विलसन, राथ, हिदी, मैक्समूलर प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् वास्तव में सनातन धर्म के विरोधी हैं । आर्यसमाजी उनके सहायक ही हैं, क्योंकि सनातन धर्म का खण्डन करने में, जातिवाद के उन्मूलन में और सबका परस्पर विवाह आदि संबन्ध कराने में ये सब एकमत हैं । मैक्समूलर का मूल अंग्रेजी पत्र ऊपर उद्धृत किया गया है । इस पत्र का अनुवाद करते समय जिज्ञासुजी ने जोड़ा है कि --- ' सागण भाष्य के साथ ऋग्वेद के अनुवाद का जो प्रकाशन मैं कर रहा हूँ, उसमें भारतीयों के भाग्य पर सुदूरगामी प्रभाव पड़ेगा ' यह अनुवाद सर्वथा अशुद्ध और दुरभिसन्धि से भरा है । वहाँ सायण भाष्य की कोई चर्चा नहीं है । बिना सायण भाष्य की सहायता के अनुवाद करने पर यह वेद का अर्थ ही नहीं है, ऐसा मानकर विद्वान् उसकी उपेक्षा कर सकते हैं । इसीलिये तो आपके जैसे भारतीय भी उनके अनुवाद को सायणसंमत मानते हैं । वस्तुस्थिति यह है कि मैक्समूलर और आप जैसे व्यक्ति सायण भाष्य में किये ये अर्थ को बिना समझे ही उसके विषय में ऊल - जलूल बकते रहते हैं । मैक्समूलर तो वैदिक धर्म के स्थान पर ईसाई धर्म को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं । अपने को आर्य कहने वाले आपके जैसे समाजी भी वैदिक धर्म के नाम पर म्लेच्छों के धर्म का ही प्रतिपादन करते हैं । और इस तरह से बाह्य धर्मों के लिये, जो कि वस्तुतः धर्म नहीं है, अपने घर का दरवाजा खोल देते हैं । १०५
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८३४ dan पारिजात: भारतीय वैदिकधर्मं जॅकालियट गोल्डस्टूकरप्रभृतयः प्रशंसन्ति, पाश्चात्त्यानां दुर्भावनां चोद्घाटयन्ति । बेवर - रॉथ - भोटलिङ्ग - कूहनप्रभृतयो भारतीयगौरवं विनाशयितुमुद्यताः । सायणीयवेदार्थस्तु मन्त्र ब्राह्मण वेद - व्याकरण-fre क्त सूत्र- पूर्वोत्तरमीमांसा - पुराणेतिहासादिसंमत एव । ये तन्निष्ठान् भारतीयात् द्विषन्नि त एव वेदवेदिकशवः । यदुक्तम् -'यदि सायणभाष्यातिरिक्तभाष्यं पाश्चात्त्यैरुपलब्धं स्यात्तदा पाश्चात्यैस्तस्यैवानुवादः कृतः स्यात् । यदि सायणस्य भाष्यं नोपलब्धं स्यात्तदा मैक्समूलरस्य ऋग्वेदभाष्यस्योपरि लेख:, तथा ग्रिफिथस्य ऋग्यजुः-सामानुवाद:, राथस्य ह्विटनीमहाशयस्य चाथर्ववेदीय इलिशानुवादः, वैनफीमहाशयस्य सामवेदीयो जर्मनी भाषामयां- ः , कीथस्य तैत्तिरीय संहितायास्तथा ऐतरेय कौषीतकि ब्राह्मणानुवादः, हागस्य ऐतरेय ब्राह्मणानुवादः, एगलिङ्गस्य शतपथब्राह्मणानुवादः, विलसनस्य ऋग्वेदीय इलिशानुवादः, लुड्विगस्य ऋग्वेदोयजर्मनानुवादश्चावश्यमन्यथैव कृता भवेयुः । सायणीयेन वेदार्थेन सर्वेषां नेत्रेषु पट्टप्रावरणमेव कृतम् । रोजन - ग्रासमंत - ओल्डनवर्ग- बेवर- कोलब्रुक - ब्लूमफील्ड-आफरवूट- जंकोबी- स्टीवेन्सन मै कडानल - सोटलिङ्गप्रभतीनां यैर्वेदिकवाङ्मयेषु बहु परिश्रान्तं तेषां फलमन्यथैव स्यात् । एवमेव एडोल्फप्रभृतीनां श्रीतगृह्यसूत्रादिपरिश्रमस्याप्यन्यदेव फलं स्यात् ' ( पृ ०७३ ) इति तदेतदपि धूलिप्रक्षेप एव । यतः सर्वे ते सद्भावनया दुर्भावनया वा वेदार्थान्वेषण एवं प्रवृत्ता आसन् । अन्धविश्वासिनोऽप्येते नासन् । तस्मात् सायणभाष्यस्य माहात्म्यमवगम्यैवैते तदनुसारणमेवार्थं कृत्वा विकृत्य चोपस्थापितवन्तः । ये तु दुर्भावनाहीनास्तंस्तु सायणभाष्यस्य तदनुसारिणः सनातनवैदिक हिन्दुधर्मस्य च प्रशंसेव कृता । भगवद्दत्तमतखण्डनम् भगवद्दत्तानुसारेण ( पृ ० ९ ) कात्यायनस्य ऋक्सर्वानुक्रमणी पाश्चात्य लेखकानां रीत्या विक्रमाद् वर्षशतत्रयात् प्राचीना, मम मते ( भगवद्दत्तमते ) तु सेतोऽतीव प्राचीना । बृहद्देवता अस्या अपि प्राचीनो ग्रन्थः । भारतीय वैदिक धर्म की जैकालियट, गोल्डस्ट्रकर प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् प्रशंसा करते हैं और पाश्चात्यों की दुर्भावना का पर्दाफाश करते हैं । बेवर, राथ, भोटलिंग, कून् प्रभृति विद्वान् भारतीय गौरव को विनष्ट करने में लगे हैं । सायण का किया गया वेदार्थ मन्त्र, ब्राह्मण, वेद, व्याकरण, निरुक्त, कल्पसूत्र, पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा, पुराण, इतिहास आदि से समर्पित है । जो व्यक्ति इनमें निष्ठा रखने वाले भारतीयों से द्वेष रखते हैं, वे ही वास्तव में वेद और वैदिकों के शत्रु हैं । इसी तरह -- ' मदि सायण भाष्य से भिन्न कोई भाष्य पाश्चात्यों को उपलब्ध हुआ होता, तो वे उसी के आधार पर अनुवाद करते । यदि सायण का भाग्य न मिला होता तो मैक्समूलर का ऋग्वेद भाष्य के ऊपर लेख, ग्रिफिथ का ऋक्, यजुः, सामवेद का अनुवाद, राथ और टिनी के अथर्ववेद के अंग्रेजी अनुवाद, वैनफी महाशय का सामवेद का जर्मन भाषा का अनुवाद, कीथ का तैत्तिरीय संहिता और ऐतरेय एवं कौषीतकि ब्राह्मण का अनुवाद, हाग का ऐतरेय ब्राह्मण का अनुवाद, एगलिंग का शतपथ ब्राह्मण का अनुवाद विलसन का ॠग्वेद का अंग्रेजी अनुवाद, लुडविग का ऋग्वेद का जर्मन अनुवाद --- ये सब अवश्य ही किसी भिन्न ही पद्धति से किये गये होते । सायण के किये वेद के अर्थ ने इन सबकी आंखों पर पर्दा डाल दिया | रोजन, ग्रासमैन, ओल्डनवर्ग, बेवर, कोलब्रुक, ब्लूमफील्ड, आफेरन्ट, जैकोबी, स्टीवेन्सन, मैकडानल, भोटलिंग प्रभूति पाश्चात्य विद्वानों का कार्य, जिन्होंने कि वैदिक वाङ्मय में बड़ा परिश्रम किया है, दूसरी ही दिशा में हुआ होता । इसी तरह एडोल्फ इत्यादि के श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र आदि पर किये गये परिश्रम का भी फल निम्न ही हुआ होता । यह सब कथन भी सीधे आँख में धूल झोंकने के समान है, क्योंकि ये सब सद्भावना वा दुर्भावना से प्रवृत्त होकर वेदार्थ के अन्वेषण में लगे हैं । ये सब विद्वान् अन्धविश्वासी भी नहीं है । सायण भाष्य के महत्व को ठीक ' समझ करके ही इन्होंने तदनुसार ही अपने अनुवाद किये, कहीं - कहीं इन्होंने उसको विकृत भी कर दिया है । जिन पाश्चात्य विद्वानों में कोई दुर्भावना काम नहीं कर रही है, उन्होंने तो सायण भाष्य की तथा तदनुसारी सनातन वैदिक धर्म की प्रशंसा ही की है । भगवद्दत्त के मत का खण्डन भगवत ( पृ ० ९ ) लिखते है कि कात्यायन की ऋक् सर्वानुक्रमणी का काल पाश्चात्य लेखकों के अनुसार विक्रम से कोई ३०० वर्ष पूर्व का है । हमारे ( भगवद्दत्त के मत के ) अनुसार तो उसका काल इससे भी बहुत पहले का है । बृहदेवता इस सर्वानुक्रमणी
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देवार्थपारिजातः ८३५ हिन्दीभाषामये ‘ वैदिक वाङ्मय का इतिहास ' पुस्तके प्रथमे भागे तत्रैव प्रथमेऽध्याये ( पृ ० ९ ) मैकडानलस्य भूमिका-गतोद्धरणे ईसवीयकालाद् वर्षशतत्रयात् प्राचीनो बृहद्देवताग्रन्थः । तत्रैव बृहद्देवताग्रन्थेऽष्टमेऽध्याये - ' महानास्त्य ऋ at गुह्यास्ता ऐन्द्रश्चैव यो वदेत् । सहस्रयुगपर्यस्तमब्रह्म स राध्यते || १८ || ' अस्य श्लोकस्योत्तरार्धं स्वल्पेनान्तरेण भगवद्गीतायाम् ( ८११७ ), निरुक्ते ( १४/४ ), मनुस्मृतौ ( ११७३ ) चोपलभ्यते ( पृ ० १० ) । याज्ञवल्क्यस्मृति: कौटल्यार्थशास्त्रात् प्राचीना । कौटल्यार्थशास्त्रनिर्माता च कौटल्यश्चन्द्रगुप्तस्य महामात्यः । मनुस्मृतिर्याज्ञवल्क्यस्मृतेरपि प्राचीना । मनुस्मृतौ प्रथम एवाध्याये युगानां युगनाम्नां कल्पानां च विस्तरशो वर्णनमुपलभ्यते ( पृ ० १० ) । सायणमहीधरादिरीत्या ' ब्रह्मपरम्परया प्राप्तं वेदं वेदव्यासो मन्दमतीन् मनुष्यान् विचिन्त्य तत्कृपया चतुर्धा व्यस्य ऋग्यजुःसामाथर्वाख्यांश्चतुरो वेदान् पैलवैशम्पायनजेमिनिसुमन्तुम्यः क्रमादुपाददेश । ' ( पृ ० ५३ ) पारम्पर्येणैष सिद्धान्तः सर्ववैदिकसम्मतः । स्वामिदयानन्दस्तदनुयायिनोऽपरे सामाजिकाश्च तमेतं सविरूढमूलं सिद्धान्तं स्वमनीषयोद्भावित स्थशून्यैस्तर्काभासंराक्षिपन्ति । तैत्तिरीयसंहिताभाष्ये आरम्भे भट्टभास्करोऽप्येतदेवाह -- ' पूर्व भगवता व्यासेन जगदुपकारार्थमेकीभूय स्थिता वेदा व्यस्ताः शाखाश्च परिच्छिन्नाः ' ( पृ ० ५३ ) । दुर्गाचार्योऽपि - ' वेदं तावदेकं सन्तमतिमहत्त्वाद् दुरध्येयमनेकशाखाभेदेन समाम्नासिषुः सुखग्रहणाय व्या समाम्नातवन्तः ' ( नि ० १।२० वृत्तौ ) । ' जातुकर्णोऽभवन्मत्तः कृष्णद्वैपायनस्ततः । अष्टाविंशतिरित्येते वेदव्यासाः पुरातनाः । एकी वेदश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु । ' ( विष्णुपु ० ३।३।१ ९ -२० ), ' वेदश्चैकञ्चतुर्धातु व्यस्यते द्वापरादिषु ' ( मत्स्यपु ० १४४ | ११ ) ( पृ ० ५४ ) । से भी कुछ पूर्व का ग्रन्थ है । हिन्दी भाषा में लिखे गये ' वैदिक वाङ्मय का इतिहास ' नामक पुस्तक के प्रथम माग के प्रथम खण्ड के प्रथम अध्याय में भगवद्दत्त लिखते हैं कि अध्यापक मैकडोनल अपने बृहद्देवता के संस्करण की भूमिका में लिखते है कि ' बृहद्देवता ४०० ईसा पूर्व के पीछे का नहीं हो सकता ' | उस बृहद्देवता के आठवें अध्याय में लिखा है कि- ' इन्द्र देवता संबन्धी रहस्यमयी ऋचाओं को जो जपता है, वह सहल युग पर्यन्त रहने वाले ब्रह्मा के एक दिन को प्राप्त होता है । इस श्लोक के उत्तरार्ध का पाठ स्वल्प पाठान्तरों के साथ भगवद्गीता ( ८/१७ ), निरुक्त ( १४१४ ) और मनुस्मृति ( ११७३ ) में मिलता है ( १० ९ -१० ) 1 याज्ञवल्क्य स्मृति कौटल्य के अर्थशास्त्र से कहीं पहले की है । तथा कौटल्य का अर्थशास्त्र चन्द्रगुप्त के अमात्य चाणक्य की बहुत पहले की है । उस मनुस्मृति के आरंभ में युगों, युगनामों और प्रत्येक युग के ही कृति है । मनुस्मृति तो याज्ञवल्क्य स्मृति से वर्षो की संख्या का तथा कल्प आदि की गणना का बड़ा विस्तृत वर्णन है ( पृ ० १० ) । सायण, महीधर आदि मध्यकालीन ग्रन्थकारों के मत के अनुसार ब्रह्मा की परम्परा से वेदव्यास को वेद मिला और उन्होंने क्रमशः मनुष्यों को मति मन्द होती जायगी, ऐसा जानकर उन पर कृपा करने के अभिप्राय से वेद को ऋक्, यजुः साम और अथर्वणइस तरह चार भागों में बाँट दिया और उनको क्रमश: पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु नाम के अपने चार शिष्यों को पढ़ाया ( पृ ० ५३ ) | परम्परा प्राप्त यह सिद्धान्त सभी वैदिकों को मान्य है । स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायी अन्य आर्यसमाजी विद्वान् इस दृढमूल प्राचीन सिद्धान्त को अपनी कल्पना शक्ति से उद्भाबित अर्थशून्य गलत तर्कों के आधार पर निरस्त करना चाहते हैं ॥ महोवर के पूर्ववर्ती भट्ट भास्कर अपने तैत्तिरीय संहिता के भाष्य के आरंभ में लिखते हैं- ' भगवान् व्यास ने जगत् के arer के लिये एकत्र स्थित वेदों का विभाग करके उनकी शाखाएं नियत की ' ( पृ ० ५३ ) । भट्ट भास्कर से भी बहुत पहले होने वाले आचार्य दुर्ग निरुक्त ( १।२० ) की वृत्ति में लिखते हैं ' वेद पहले एक था तो यह बड़ा विशाल था । इसका अध्ययन कर पाना कठिन काम था । इसलिये इसको अनेक शाखाओं में विभक्त कर दिया कि व्यस्वरूप से इसका सुखपूर्वक अध्ययन किया जा सके ' । इस मत का प्रतिपादन पुराणों में मिलता है । विष्णुपुराग और मत्स्यपुराण में लिखा है—
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८३६ श्रीमद्भागवतादिषु चायमेव सिद्धान्तः स्थापितः । सर्वैरपि द्वैत - विशिष्टाद्वैत द्वैताद्वैत- शुद्धाद्वैत - निर्विशेषा-द्वैतवादिभिर्वेष्णवः शैवै: स्मार्तेश्च धर्माचार्यैरयमेव पक्षः समाद्रियते । यच्च दयानन्देन सत्यार्थप्रकाशस्यैकादशे समुल्लासे जल्पितम्- ' जो कोई यह कहते हैं कि वेदों को व्यासजी ने इकट्ठे किये, यह बात झूठी है । क्योंकि व्यास के पिता, पितामह प्रपितामह पराशर, शक्ति, वशिष्ठ और ब्रह्मा आदि ने भी चारों वेद पढ़े थे । ( पृ ० ५४ ) तदेतत् सिद्धान्ताज्ञानविजृम्भितम्, अनुक्तोपालम्भनात् । केनैतदुक्तं यद् व्यासेन वेदा एकत्रिता:? पूर्वाचार्यैस्त्विदमेवोक्तं यद एकत्रिता वेदा व्यासेन व्यस्ताः । ऋचो यजूंषि सामानि अथर्वाङ्गिरसो मन्त्रा ब्राह्मणानि चैतद्भागद्वयघटितो मन्त्रब्राह्मणात्मको वेदराशिरविविक्त एक एवासीदिति विष्णुपुराणादिसम्मतः सिद्धान्त एव पूर्वाचार्याणामभिप्रेतः 1 । तमेव ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' इति कात्यायनाप-स्तम्वादयोऽपि वदन्ति । महर्षिजैमिनिश्च - ' सा ऋग्यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था ' ( मी ० सू ० २११/३२ ), ' गीतिषु सामाख्या ' ( २1१1३३ ) ' शेषे यजुः शब्द: ' ( मी ० सू ० २ | १ | ३४ ) इति ऋक्सामयाजुषमन्त्राणां लक्षणानि विधाय ' शेषे ब्राह्मण-शब्द: ' ( मी ० सू ० २।१।३५ ) इति ब्राह्मणलक्षणं विदधाति । मन्त्रब्राह्मणात्मकं वेदमाश्रित्येव जैमिनिः पूर्वमीमांसाया वादरायण उत्तरमीमांसायां धर्म - ब्रह्म- विचारं प्रवर्तयतः । तत्र ऋक्सामयाजुषशब्दः केवलं मन्त्रा उच्यन्ते । ब्राह्मणारण्य-कोपनिषदादिशब्दैर्ब्राह्मणान्युच्यन्ते । ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेदशब्द मंन्त्रब्राह्मणात्मका: पृथक् पृथग् वेदराशय उच्यन्ते । तत्रैकराशि: शाखापदेन व्यवह्रियते । सर्वो वेदराशिः वेदपदेन व्यपदिश्यते । व्यासपराशरादयः सामर्थ्यातिशयात् सर्वं ब्रह्मसम्प्रदायप्राप्तं वेदराशिमधीतवन्तः । अविविक्ता अपि तत्र ऋचः सामानि यजूंषि ( मन्त्राः ), प्रत्येक द्वापर के अन्त में एक ही चतुष्पाद वेद चार भागों में विभक्त किया जाता है । यह विभाग - करण अब तक २८ बार हो चुका है । जो कोई उस विभाग को करता है, उसका नाम व्यास होता है । ( पृ ० १३-५४ ) श्रीमद्भागवत आदि पुराणों में भी यही सिद्धान्त स्थिर किया गया है । द्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत, निर्वि दोषाद्वैतवादी सभी वैष्णव, शैव और स्मार्त आचार्यों ने इस मत का समादर किया है । भगवद्दत्त ने ऊपर उद्धृत मत को पूर्वपक्ष में रख कर उतरपक्ष के रूप में स्वामी दयानन्द के मत का इस प्रकार प्रति-पादन किया है - ' दयानन्द सरस्वती स्वामी इस मत का खण्डन करते हैं । उन्होंने सत्यार्थप्रकाश समुल्लास एकादश में लिखा है-' जो कोई यह कहते हैं कि वेदों को व्यासजी ने इकट्ठा किया, यह बात झूठी है । क्योंकि व्यास के पिता, पितामह प्रपितामह, पराशर, शक्ति, वसिष्ठ और ब्रह्मा आदि ने भी चारों वेद पढ़े थे ' ( पृ ० ५४ ) | यह पूरा कथन सिद्धान्त को ठीक से न समझ पाने के कारण है । यह हमारे ऊपर जबरदस्ती का उलाहना है । जिस बात को हमने कहा नहीं, वह हमारे ऊपर थोपी जा रही है । यह हमने कब कहा कि व्यास ने वेदों को एकत्र किया? पूर्वाचार्यों ने केवल यह कहा है कि एकत्रित वेदों को व्यास ने विभक्त किया । ऋक्, यजुः, साम और अथर्व इन चार भागों में विभक्त मन्त्र भाग और ब्राह्मण भाग इन दो मोटे विभागों में विभक्त मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदराशि पहले रूप में एक में ही मिला था । इस तरह का विष्णुपुराण आदि संमत सिद्धान्त ही पूर्वाचार्यों को मान्य है । इसी बात को ' मन्त्र ओर ब्राह्मण दोनों का नाम वेद हैं इस रूप में कात्यायन, आपस्तम्ब प्रभृति आचार्य कहते हैं । महर्षि जैमिनि भी - ' जहाँ पर अर्थ के अनुसार पाद की व्यवस्था हो उसको ऋक् कहते है, गीतियाँ साम नाम से कही जाती है, अवशिष्ट भाग यजुः कहलाता है ' इस तरह से तीन सूत्रों में ऋक्, साम और यजुः मन्त्रों का लक्षण बताने के बाद ' अवशिष्ट भाग ब्राह्मण कहलाता है ' इस सूत्र के द्वारा ब्राह्मण का लक्षण कहते हैं । मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद के आधार पर ही पूर्वमीमांसा में जैमिनि और उत्तरमीमांसा में बादरायण धर्म और ब्रह्म संबन्धी विचार प्रस्तुत करते हैं । यहाँ पर ऋक्, साम और यजुः शब्द से केवल मन्त्र भाग गृहीत होता है और ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् शब्द से ब्राह्मण भाग का ग्रहण होता है । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद शब्द से मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदराशि में से एक एक का अलग अलग बोध होता है । पृथक् पृथक् प्रत्येक राशि ' शाखा ' पद से अभिहित होती है । पूरी वेदराशि ' वेद ' नाम से प्रसिद्ध है । व्यास पराशर प्रभूति ने अपना अपनी अतिशय सामर्थ्य के आधार पर ब्रह्मा के द्वारा संप्रदाय परम्परा से अतित सारी वेदराशि का अध्ययन किया । उस समय अविविक्त रूप में ऋक्, यजुः साम तथा अथर्व और अंगिरा के द्वारा
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८३७ अथर्वाङ्गिदृष्टा अथर्वमन्त्राः ब्राह्मणारण्यकादयश्व आसन्देव | अतः सम्पूर्णवेदराश्यध्ययनेन चत्वारोऽपि वेदास्ते-रधीयन्त एव सर्वेषामेव तत्र विद्यमानत्वात् । अत एव श्रीमद्भागवते युगह्रासात् शक्तिमेधादिह्रासादेव सर्ववेदस्य दुरध्येयत्वेन वेदव्यसनमुक्तम् । ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् । चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः || ' ( श्री ० भा ० ११३१२१ ) । नैतावता तदानीमृगादयो मन्त्रभेदा मन्त्रब्राह्मणभेदा वा नासन्, किन्तु सन्तोऽपि मिश्रिता एवासन् । अल्पमेधोभिर्दुर्धार्यत्वाद् होत्रोद्गात्राध्वर्यवादिकार्यसौविध्याय व्यासेन विभागः कृतः, भेदाश्च कृताः । शाखाभेदास्तु पतञ्जलिना महाभाष्येऽङ्गीकृता एव । याज्ञवल्क्येन भगवत: सूर्यात् शुक्ल-यजुर्वेदीयाः पञ्चदशशाखा उपलब्धा इत्यपि पारम्पर्यात् श्रीमद्भागवतादिपुराणेभ्यः पाणिन्यादिसूत्रेश्च विज्ञायते । एतावता भगवद्दत्तसमुद्धृतानि वचनान्यपि समाहितानि भवन्ति । तथाहि - ' यस्मिन् वेदा निहिता fare रूपा: ' ( अथर्व ० ४।३५२६ ), ' ब्रह्म प्रजापतिर्वाता लोका वेदाः सप्त ऋषयोऽग्नयः । तैर्मे कृतं स्वस्त्ययनमिन्द्रो मे शर्म यच्छतु ॥ ' ( अथर्व ० १ ९ / ९ / १२ ) अत्र वेदाः साङ्गाश्चत्वार इति सायणः । ' वेदेभ्यः स्वाहा ' ( तै ० सं ० ७१५/११/२ ) अयमेव मन्त्र: काठकसंहितायां ( ५१२ ) इत्यत्र । ' चत्वारि शृङ्गा इति वेदा का एतदुक्ता: ' ( कब्राह्मणम् ), ' आथर्वणो वै ब्रह्मणः समानः ', ' चत्वारो होमे वेदास्तानेव भागिनः करोति मूलं वै ब्रह्मणो वेदाः, वेदानामेतन्मूलं यदृत्विजः प्राश्नन्ति तद् ब्रह्मोदनस्य ब्रह्मोदनत्वम् | ' ( काठकशताध्ययनब्राह्मणे प्रारम्भे ब्रह्मोदनप्रकरणे ), ' ब्रह्म ह वै ब्रह्माणं पुष्करे ससृजे । स सर्वांश्च वेदान् ( गोपथब्राह्मणे १।१।१६ ), ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वेदश्च प्रहिणोति तस्मै । ' ( श्वेता ० ६ १८ ), ' ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्य सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ ' ( मु ० उ ० १1१ ) एवमादीनि सर्वाणि वचनानि न पूर्वप्रतिकूलानि । परिदृष्ट अथर्व मन्त्र तथा ब्राह्मण, आरण्यक आदि विद्यमान थे ही । अतः संपूर्ण वेदराशि का अध्ययन करने के कारण उन्होंने चारों वेद पढ़े थे, क्योंकि इस वेदराशि में सबका समावेश है । इसीलिये श्रीमद्भागवत में युग ह्रास के अनुसार मनुष्यों की मेधा शक्ति का भी ह्रास होने से सभी वेदों का अध्ययन इनके लिये कठिन देख कर वेदों का विभाग करने की बात कही गई है - ' इसके बाद सत्रहवें सर्ग में सत्यवती के गर्भ से पराशर के पुत्र व्यास उत्पन्न हुए । इन्होंने मनुष्यों को अल्प मेघा शक्ति को जानकर वेद रूपी वृक्ष को अनेक शाखाओं में विभक्त कर दिया ' । इसका अभिप्राय यह नहीं है कि ऋगादि सत्रों के भेद अथवा मन्त्रब्राह्मण आदि का भेद उस समय नहीं था । इसका इतना ही तात्पर्य है कि यद्यपि वे थे, किन्तु उनकी स्थिति मिश्रित यो, अर्थात् वे एक दूसरे में मिले थे । अल्पमेधा शक्ति के मनुष्य इनको धारण नहीं कर सकते, इसलिये होता उद्गाता, अध्वर्यु आदि के कार्य की सुकरता की दृष्टि से व्यास इनका विभाग कर दिया और इनकी अलग अलग शाखाएँ भी बना दीं । शाखाओं के भेद को पतंजलि ने अपने महाभाष्य में स्वीकार किया है । याज्ञवल्क्य ने भगवान् सूर्य से शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाएँ उपलब्ध कीं, यह बात भी परम्परा से, श्रीमद्भागव प्रभृति पुराणों से और पाणिनि प्रभृति के सूत्रों से भी ज्ञात होती है । इस तरह की व्याख्या के आधार पर भगवद्दस के द्वारा इनके खण्डन के लिये उद्धृत वचनों की भी ( पू ० ५४-५८ ) उपपत्ति अपने मत के समर्थन में की जा सकती है । जैसे कि ' जिस परब्रह्म में समस्त विद्याओं के भंडार वेद स्थिर है ' इस अथर्ववेद के मन्त्र से और ' ब्रह्म प्रजापति ० ' इत्यादि मन्त्र में ' वेदा:: ' बहुवचनान्त पद आया है । इस मन्त्र पर भाष्य करते हुए आचार्य सायण कहते हैं --- ' इस मन्त्र में बहुवचनान्त वेद पद से चारों वेद अभिप्रेत हैं । ' ' वेदेभ्यः स्वाहा ' यह तैत्तिरीय संहिता का मन्त्र है । यही मन्त्र काठक संहिता में भी मिलता है । कद्र ब्राह्मण में मिलता है- ' चत्वारि गाः प्रतीक वाले प्रसिद्ध मन्त्र में चारों वेदों का कथन मिलता है ' । पुनः काठक शताध्ययन ब्राह्मण के आरंभ के ब्रह्मोदन प्रकरण में अथर्ववेद की प्रधानता का वर्णन करते हुए चार ही वेदों का उल्लेख किया है — ' आथर्वणो वे ० ' इत्यादि । अर्थात् वेद चार ही हैं । अथर्व उनमें प्रथम है, इत्यादि । गोपथ ब्राह्मण के पूर्व भाग में लिखा है --- परमात्मा ने ब्रह्मा को उत्पन्न किया । उसे चिन्ता हुई कि किस एक अक्षर से मैं सारे वेदों का अनुभव करूँ ' । श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा गया है - ' जो ब्रह्मा को आदि में उत्पन्न करता है और उसके लिये वेदों को भेजता है । इसी तरह से मुण्डकोपनिषद्
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८३८ वैवार्थपारिजातः अविविक्तेष्वपि वेदेषु ते भेदा विद्यमाना आसन् यानादाय व्यासेन वेदा विभक्ताः । तेषामविद्यमानत्वे विभागोऽपि कि मूलः स्यात्? यथाद्यत्वे कस्याश्चित् सभायामविभागेन विद्यमाना ब्राह्मणक्षत्रियादयो विभज्येरन्, तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । यत्तवतं भगवदत्तेन – ' ब्रह्मा न मनुष्येतर: ' ( पृ ० ५७ ) इति, तत्तुच्छम्, ' देवानां प्रथमः सम्बभूव ' ( मुण्डको ० १1१ ) इति वचनविरोधात् । मनुष्येतरे देवा इत्यस्य देवतानिरूपणे साधितत्वात् । यदुक्तम्- ' अधिष्ठातुर्ब्रह्मणः पुत्र एव नासीत् ( पृ ० ५७ ) इति, तदपि तदुद्धृतवचनविरुद्धमेव । ' ज्येष्ठ-पुत्राय ' ( सु ० १1१ ) इति वचनस्य जागरूकत्वात् । तेन ब्रह्मणाऽऽदिसृष्टावग्न्यादिभ्यश्चत्वारो वेदा लब्धा इत्यपि निर्मूलम् । ' यो वै ब्रह्माणम् ' ( श्वे ० ६११८ ) इति वचनविरोधात् । तस्मिन् वचने परमात्मनैव ब्रह्मणे वेदाः प्रहिता इति श्रवणात् । ' ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद: ' ( पृ ० ५८ ) इत्यादिशतपथवचनं शौनकवचनं च विविधशाखा-विशिष्टेऽ fafa वेदे ऋग्वेदादीनां विद्यमानतामेवाह । तस्मात् पारम्पर्य पुराणादिसम्मतसमन्वितपूर्वोक्तवचनार्थाज्ञानविजृम्भितमेवैतत् । यथा वा- ( अत्र ) ' वेदा अवेदा ' ( भवन्ति ) ( बृ ० ३० ४।३।२२ ), ' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६ २ १ ) इति छान्दोग्यादि-दृष्ट्या सृष्टेः पूर्वकाले वेदादीनामसत्वोक्तावपि प्रतिसमं वेदानामाविर्भावनियमाद्वेदानादित्वमपि न विरुद्धयते; तथैव ' वाचा विरूपतित्यथा ' ( ऋ ० सं ० ८२७५१६ ) इत्येकवचनानुसारेण ' पूर्व पूर्वेभ्यो वच एतद्वचुः ' ( तै ० ब्रा ० ३११२ / ९ / २ ) इत्येकवचनानुसारेण च वेदानामेकत्वेऽपि प्रतिद्वापरं विभागनियमाद्विभागानादित्वमपि न विरुद्धयते । में कहा गया है – ' देवताओं में ब्रह्मा सबसे पहले पैदा हुआ । वही इस जगत् का कर्ता और उसका पालयिता है । उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र rea को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया, जो कि सब विद्याओं की जननी हैं । इस तरह के भगवद्दत के द्वारा ( १० ५४-५७ ) उद्धृत सभी der हमारे द्वारा प्रतिपादित पूर्व सिद्धान्त के विरोध में नहीं जाते, क्योंकि वेदों क t affa क्त अवस्था में भी वे भेद विद्यमान थे, जिनके सहारे वेदव्यास ने वेदों का विभाग किया । यदि वे पहले से विद्यमान न होते, तो उनका विभाग कैसे हो सकता है? जैसे आज की सभा में एकत्र हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि के अलग अलग समूह बनाये जा सकते हैं, उसी तरह से प्रकृत स्थल में भी जानना चाहिये । यहाँ पर भगत ने कहा है कि ब्रह्मा को मनुष्येवर मानना युक्तियुक्त नहीं ( पृ ० ५७ ) । किन्तु यह कथन गलत है, क्योंकि ' देवताओं में ब्रह्मा सबसे पहले पैदा हुए ' इस वचन से उनकी बात विरुद्ध पड़ती है । देवता मनुष्यों से भिन्न हैं, इस बात को हम देवताधिकरण में विस्तार से सिद्ध कर चुके है । यह कहना कि ' अधिष्ठाता ब्रह्मा के पुत्र ही नहीं है ' ( १० ५७ ) उनके द्वारा उद्धृत वचन के विरुद्ध है, क्योंकि वहीं पर अथर्वा को ब्रह्मा का ज्येष्ठ पुत्र बताया गया है । ब्रह्मा ने सृष्टि के आरंभ में अग्नि प्रभृति से चारों वेदों को प्राप्त किया, यह कथन भी यहीं पर उद्धृत ' यो वै ब्रह्माणं ' इत्यादि श्वेताश्वतर श्रुति के विपरीत है । इस वाक्य में यह स्पष्ट प्रतिपादित हैं कि परमात्मा ने ही ब्रह्मा के लिये वेदों का सन्देश भेजा । वहीं पर ( पृ ० ५८ में ) उद्धृत ' ऋग्वेदो ० ' इत्यादि वचन भी, जो कि शतपथ ब्राह्मण और शौनक संहिता में भी मिलता है, विविध शाखाओं वाले प्रविविक्त वेद में ऋग्वेद आदि विभागों की सत्ता का ही प्रतिपादन करता है । इस तरह से भगवद्दत्त का यह पूरा प्रतिपादन परम्परा और पुराण आदि की संगति से युक्त उक्त वचनों का अर्थ ठीक से न समझ पाने के कारण निरर्थक है । जैसे कि ' इस अवस्था में वेद अवेद हो जाते हैं, ' ' हे सोम्य, सृष्टि के आरंभ में अकेले, अद्वितीय सत् की ही सत्ता थी ' इन छादोग्योपनिषद् आदि के वचनों में सृष्टि से पहले वेद आदि की सत्ता के भी अभाव का वर्णन मिलता है, किन्तु प्रत्येक सर्ग में वेदों के आविर्भाव के नियम के आधार पर वेदों की अनादिता से उसका कोई विरोध नहीं होता, उसी तरह से ' वाचा ' विरूपनित्यया ' यहाँ पर परिदृष्ट एकवचन के अनुसार और ' पूर्वे पूर्वेभ्यो ' इस तैत्तिरीय ब्राह्मण के वचन के अनुसार वेदों की एकता १. शतपथब्राह्मणे ( १११५८३३ ) इत्यादिस्यलेषु ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद - शब्दाः | तत्रैव ( ११।५।६।७ ) इन्यत्र अथर्वाङ्गिरस इति शब्दः । अथर्ववेदस्य शौनकसंहितायाम् ( १०१७/२० ) इत्यत्र अथर्वाङ्गिरस इति शब्दः ।
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deforfoote: प्राचीनेतिहासः ८३ ९ भगवद्दत्तो रामायण महाभारतं च प्राचीनेतिहासत्वेनाभ्युपैति । तदनुमारेणैव कृष्णद्वैपायन ऐतिहासिकः पुरुष: । पराशरः शक्तिश्च तदीयपितृपितामहौ । तद्दृष्टघाऽन्येतिहासग्रन्थापेक्षयापि महाभारतस्य वैशिष्ट्यमस्ति । तत्र महाभारते तदुद्धृतेष्वेव वचनेषु ( पृ ० ६०-६१ ) यथा - ' समाप्ति नागमद्विद्या नापि वेदा विशाम्पते । ' ( म ० भा ० शल्यप ४०१४ ), ' वेदैश्चतुभि: ' ( म ० भा ० द्रो ० प ० ५१/२२ ) इत्यत्र बहुवचनेन वेदानां बहुत्वं ज्ञायते । तथैव-' ब्रह्मण कृत्स्नो मे वेदः श्रुतिपथं गतः ' ( म ० भा ० आ ० प ० ८१ | १४ ) इत्येकवचनेन वेदानामेकत्वमपि ज्ञायते । एवमेव ' क्षमा वेदा: ' ( म ० भा ० ब ० प ० २ ९ / ३६ ), ' ऋचो वह्नचमुख्यश्च प्रेर्यमाणाः पदक्रमैः । शुश्राव मनुजव्याघ्रो विततेष्विह कर्मसु ॥ १३१ ॥ अथर्ववेदप्रवराः पूर्वयाज्ञिकसम्मताः । संहितामीरयन्ति स्म पदक्रमयुतां तु ते || ३३ ||
( म ० भा ० आ ० ५० ६४ ) इत्यादीन्यपि वचनानि पूर्वोार्थानुगुणान्येव । प्रतिसर्ग प्रतिकल्पं पदक्रमादियुक्तानां संहिता-नामाविर्भावनियमादनादित्वोपपत्ती वाघाभावात् । तेनैवेतिहासिक पुरुषेण वेदव्यासेन विष्णुपुराणादयो ग्रन्था निर्मिता sa sa हासिक एव । तेषु पुराणेषु स्पष्टमेव व्यासकर्तृकवेदव्यसनमुक्तमिति तदपलापः सर्वथापि भगवद्दत्ताय न शोभते । यत्तु तेनैवोक्तम्- ' तदानीं पदक्रमोपेताया अथर्वसंहितायाः पाठकाले वेदानां समस्तशाखा नैव निर्मिता आसन्, मन्त्राणां व्याख्यारूपाणि पाठान्तराणि गुरुकुलेषु प्रसिद्धानि ब्राह्मणानां सामग्रीभेदा अप्यनेकास्वाचार्य-परम्परास्वेकत्रिता आसन्, एतैर्वेदपाठान्तरैरेव कालान्तरे शाखा निर्मिताः । तदानीं वेदा: प्रवक्तॄणामृषीणां नामभिनं प्रसिद्धा आसन् । त एव वेदाः सनातनकालात् प्रसिद्धाः । व्यासेनानेकेषामृषीणां साहाय्येन तेः पाठान्तरंर्वेद-शाखा निर्मिताः । शाखानुकूल्येन ब्राह्मणग्रन्थसामग्रीभेदा अपि क्रमं नीताः अथ च ब्राह्मणानि सङ्कलितानि । ब्रह्मणा-भी सिद्ध हैं । प्रत्येक द्वापर युग में नियमतः वेदों के विभाग की चर्चा होने से वेदों के इस विभाग की भी अनादिता में कोई बाधा नहीं उपस्थित हो सकती । प्राचीन इतिहास भगवद्दत्त रामायण और महाभारत को प्राचीन इतिहास ग्रन्थ मानते हैं ( पृ ० ५ ९ -६० ) | उनके मत के अनुसार कृष्णद्वैपायन वेदव्यास एक ऐतिहासिक व्यक्ति हैं । उन्हीं के शिष्य - प्रशिष्यों ने ब्राह्मण आदि ग्रन्थों का संकलन किया । उन्हीं के पिता, पितामहपराशर, शक्ति आदि हुए हैं । उन्होंने ही महाभारत की रचना की । भगवद्दत के मत के अनुसार अन्य इतिहास ग्रन्थों की अपेक्षा महाभारत की अपनी विशिष्टता है । महाभारत के निम्न वचनों को उन्होंने उद्धृत किया है ( पृ ० ६०-६१ ) --- प्राचीन काल में कृतयुग में आष्टिषेण गुरुकुल में पढ़ते थे । तब वे न ही विद्या को समाप्त कर सके और न वेदों को हीं ' । इसी तरह ' वेदैश्चतुभिः ' इस बचत में भी बहुवचन के आधार पर वेदों का बहुत्व प्रतीत होता है और ' ब्रह्मचर्येण ० ' इस उक्ति में स्थित एकवचन से वेदों की एकता भी ज्ञात होती है । ' क्षमा वेदा: ' ' ऋचो बहुच ० इत्यादि वचन भी पूर्वोक्त अर्थ के अनुगुण ही है । प्रत्येक कल्प में पद, क्रम आदि से युक्त संहिताओं का नियमतः आविर्भाव होता है, अतः इनकी अनादिता में कोई बाधा नहीं है । उसी ऐतिहासिक पुरुष desert ने विष्णुपुराण प्रभृति ग्रन्थों को भी बनाया है, इसलिये ये भी ग्रन्थ इतिहास ही माने जायेंगे । उन पुराणों में स्पष्ट हो व्यासकृत वेदों के विभाग का प्रतिपादन किया गया है । इस बात का अपलाप करना भगवद्दत्त के लिये शोभा की बात नहीं है । भगवद्दत ' ने ही आगे लिखा है उस समय ( महाराज दुष्यन्त के काल में ) भी अथर्ववेद की संहिता पद और कम सहित पढ़ी जाती थी । यह उस काल का वर्णन है, जब वेदों की संप्राप्त शाखाएं न बनी थीं, परन्तु जब मन्त्रों के व्याख्यारूप पाठान्तर आर्यावर्त के अनेक गुरुकुलों में प्रसिद्ध थे । उस समय ब्राह्मण आदि ग्रन्थों की सामग्री भी अनेक आचार्य परम्पराओं में एकत्र हो चुकी थी । इन्हीं वेदों की पाठान्तर आदि व्याख्या होकर आगे अनेक शाखाएं बनीं । तब वे वेद किसी ऋषि प्रवक्ता के नाम से प्रसिद्ध नहीं थे । यही वेद सनातन काल से चले आये हैं । व्यासजी ने अनेक ऋषि - मुनियों की सहायता से उन पाठान्तरों को एकत्र करके वेद - शाखाएं
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I वेदार्थपारिजाता नामपि वेदत्वमुपेयते, तैरेव व्यासेन वेदा विभक्ता इत्युक्ता इत्युच्यते । पुराणेष्वपि नैतद्वैपरीत्येनोक्तम्, वेदश्चतुष्पादासी-दिति तत्रोक्तम् । तदर्थस्तु एकस्य वेदस्य चतस्रः संहिता आसनित्येव ' ( पृ ० ६१-६२ ) इति, तत्तु पाश्चात्यमतान्धानु-करणमेव । बेवर - मैक्समूलरादिप्रभावित एव भगवद्दत्तो यत्किञ्चिज्ञ्जल्पितवान् । सर्वशाखाविशिष्टवृक्षस्येव सर्वशाखा-विशिष्टस्य वस्तुन एव वेदत्वेन वेदस्य नित्यत्वे तच्छाखानामपि नित्यत्वानपायात् । अत एवाद्यत्वे न शाखाव्यतिरिक्ताः केचिदा उपलभ्यन्ते । सामाजिकाभिप्रेता वेदा अपि शाकल माध्यदिन- कौथुम - शीन कशाखात्वेनैव प्रसिद्धाः | महाभाष्यकारैरपि शाखारूपेणैव वेदा उक्ताः । नहि शाखाभ्यो भिन्नाः केचिद्वेदा भाष्यकारैरुक्ताः । मन्त्रब्राह्मणानां च वेदत्वं समारोहेण साधितमेव । नहि पाठान्तरं व्याख्या भवति, सर्वत्र तयोर्भेदस्य प्रसिद्धत्वात् । पाठान्तरैः शाखा-निर्माणम्, ब्राह्मणानि निर्मितानीत्येतत्सर्वं निर्मूलमेव । पुराणानामुद्धरणानि पुराणानां प्रामाण्यचर्चा भगवद्दत्तेनाभ्युपेयते । पुराणेषु स्पष्टमेव वेदानां विभाग उक्तः । तथाहि-' परावरज्ञः स ऋषिः कालेनाव्यक्तरंहसा । युगधर्मेव्यतिकरं प्राप्तं भुवि युगे युगे || भौतिकानां च भावानां शक्तिह्रासं च तत्कृतम् । अश्रद्दधानान् निःसत्त्वात् दुर्मेघान् हसितायुषः || दुभंगांश्च जनान् वीक्ष्य सुनिदिव्येन चक्षुषा । सर्ववर्णाश्रमाणां यदृश्यों हितममोघदृक् । चातुर्होत्रं कर्म शुद्धं प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् । व्यदधाद्यज्ञसन्तत्यै वेदमेकं चतुविधम् ॥ ' ( श्रीमद्भा ० म ० पु ० ११४११४-१९ ) इत्यादिवचनें रेकस्य वेदस्य विभाग उक्तः । भगवद्दत्तोऽपि पञ्चमेऽध्यायेऽपान्तरतमस इतिहाससम्बन्धेऽधस्तनं वचनमुद्धरति ( पृ ० ६३ ) अहिर्बुध्न्य-संहिताया: -- ' अथ कालविपर्यासाद् युगभेदसमुद्भवे ॥ ५० ॥ त्रेतादी सत्त्वसङ्कोचाद्रजसि प्रविजृम्भिते । अपान्तरतमा-बनाई और ब्राह्मण ग्रन्थों की सामग्री को भी क्रम देकर तत्तत् शाखानुकूल उनका संकलन किया । कई लोग ब्राह्मण ग्रन्थों को भी बेद
कहते थे, अतः उन्होंने यही कहना आरम्भ कर दिया कि व्यासजी ने ही वेदों का विभाग किया । वेदव्यासजी ने तो ब्राह्मण आदि का et fa भाग किया था । वेद तो सदा से चले आये हैं । वस्तुतः पुराणों में भी इसके विपरीत नहीं कहा गया । वहाँ भी यही लिखा है कि वेद आरम्भ से ही चतुष्पाद था, अर्थात् एक वेद की चार ही संहिताएं थी ' ( पृ ० ६१-६२ ) । यह पूरा कथन पाश्चात्य मत का अन्धानु-करणमात्र है । बेवर, मैक्समूलर प्रभृति पाश्चात्य विद्वानों से प्रभावित होकर भगवद्दत्त मनमाना लिख गये हैं । सभी शाखाओं से विशिष्ट वृक्ष जैसे एक ही है, उसी तरह से सभी शाखाओं से विशिष्ट वेद भी वस्तुतः एक ही है और वह नित्य है | वेद जब नित्य है तो उसकी शाखाएं भी नित्य ही मानी जायेंगी । इसीलिये आजकल शाखाओं से अतिरिक्त कोई वेद उपलब्ध नहीं है । आर्यसमाजियों के अभिप्रेत वेद भी चाल, माध्यन्दिन, कोथुम, शौनक नाम की शाखाओंों के नाम से ही प्रसिद्ध हैं । महाभाष्यकार पतंजलि ने भी शाखारूप में ही वेदों का वर्णन किया है । शाखाओं से भिन्न कोई वेद भाष्यकारों ने नहीं बताये हैं । मन्त्र ओर ब्राह्मण भाग की वेदता को हमने विस्तार से सिद्ध किया है । पाठान्तर को कोई व्याख्या नहीं कहता । सर्वत्र पाठान्तर और व्याख्या को परस्पर एक दूसरे से भिन्न ही माना गया है । पाठान्तर के आधार पर शाखाओं का निर्माण हुआ, इसके बाद ब्राह्मणों का निर्माण हुआ, इस तरह का पूरा प्रतिपादन सर्वथा निराधार है । भगवद्दत्त पुराणों का उद्धरण देते हैं और उनको प्रमाण भी मानते हैं । पुराणों में स्पष्ट ही वेदों का विभाग इस तरह से बताया गया है -- ' भूत और भविष्य के ज्ञाता ऋषि वेदव्यास ने अव्यक्त के प्रवाह में पलित काल के प्रभाव से इस पृथ्वी पर प्रत्येक युग में धर्म के व्यतिक्रम की संभावना को दृष्टि में रख कर और भौतिक पदार्थों की शक्ति का ह्रास देख कर अल्पायु दुर्बुद्धि, बलहीन, मश्रद्धालु, कुलक्षण मनुष्यों की भावी सृष्टि को अपने दिव्य चक्षुओं से देख कर, सभी वर्णों और आश्रमों के लिये क्या हितकर वस्तु है? इस पर विचार किया और अपनी अमोघ दृष्टि से प्रजा के हितकारक शुद्ध चातुर्होत्र कर्म को देखा और इन यज्ञों के विस्तार के लिये एक ही वेद को चार भागों में विभक्त कर दिया ' इस तरह के श्रीमद्भागवत प्रभृति पुराणों में अनेक वचन मिलते हैं, जिनमें कि एक ही वेद के चार विभागों का वर्णन है ।