वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 871–880

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 871–880

पृष्ठ 871

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वेदार्थपारिजात * नाम मुनिर्वाक्सम्भवो हरेः || ५३ || कपिलश्च पुराणर्षिरादिदेवसमुद्भवः । हिरण्यगर्भो लोकादिरहं पशुपतिः शिवः || ५४ || उदभूत्तत्र धीरूपमृग्यजुः सामसङ्कुलम् । विष्णुसङ्कल्पसम्भूतमेतद्वाच्यायनेरितम् || ५८ || ' एतेन वचनेनाप्यय-मर्थः सिद्ध्यति । ' तेन भिन्नास्तदा वेदा मनोः स्वायंभुवेऽन्तरे ' ( म ० भा ० शा ० प ० ३४ ९ १४२ ) अत्र भिन्ना बेदा इत्यस्य विभक्ता बेदा इत्येवार्थ: । एतावता त्वद्रीत्यापि वेदविभागः सिद्धयत्येव । शाखाविभागः कृत इति तु मूलासंस्पृष्टस्त्वदी-योऽर्थः । मूले तु वेदा भिन्ना: ( विभक्ताः ) इत्येवोक्तम् । एतावता कृष्णद्वैपायनेनापि कदाचिद्विभागः कृतः स्यात्तदा को विरोध:? मुख्यार्थमुपेक्ष्य गौणार्थानुसरणं तु दयानन्दादेव सामाजिके: शिक्षितम् । तच्च शाब्दन्यायविरुद्धमेव । अन्यच्च सामाजिकानामयं दुश्चिकित्स्यो रोगो यत्ते दयानन्द कांश्चित्सामाजिकॉश्च बहुवचनेन स्मरन्ति व्याहरन्ति च । क्वचित् स्वामिदयानन्दखण्डनमपि कुर्वन्ति, तथापि बहुवचनेनैव स्मरन्ति । अन्यांश्च परमाचार्यानाप्येकवचनेनैव स्मरन्ति । यदपि च ' महाभारतयुद्धात् कतिचिद्वर्षेभ्यः प्रागु एको ब्रह्मा बभूव सत्पुत्रो वशिष्ठ आसीत् ' ( पृ ० ६४ ) इत्यादिकम्, तत्तु निर्मूलमेव । पूर्वं तस्य देववरिष्ठत्वोक्त ' । पुराणेभ्यस्तस्य सृष्टिहेतुत्ववर्णनात् । उपर्युद्धृते रहिय-संहितावचनैरयमेव सिद्धान्तः पुष्यति । भगवद्दत्तप्रभूतयः सामाजिका विद्वांसः सर्वत्रैवार्धजरतीयमनुसरन्ति । स्वानुकूलानि वाक्यानि प्रमाणत्वेनो कुर्वन्तोऽपि विरुद्धान्यप्रमाणानि क्षेपकाणि वा ब्रुवन्ति । अत्र तु प्रामाण्येनाभिमताद्वायुपुराणादेव तदुद्धृतान्येव वचनानि ( पृ ० ६५,६७ ) तम्मतं खण्डयन्ति । ' वेदद्रुमश्च यं प्राप्य सशाखः समपद्यत । ' ( वायु ० पु ० ११४५ ), ' भवस्तो बहुलाः भगवद्दल अपने ग्रन्थ के पांचवें अध्याय के आरम्भ में अपान्तरतमा का इतिहास बताते हुए अहिर्बुध्यसंहिता के निम्न वचन को प्रमाण के रूप में उद्धृत करते हैं ( १० ६३ ) - ' कालचक्र के परिवर्तन के कारण युगभेद की प्रवृत्ति होने पर त्रेता युग में सत्व गुण का जब संकोच और रजोगुण की वृद्धि हुई तो उस समय वाक् का पुत्र वाच्यायन अपरनाम अपान्तरतमा उत्पन्न हुए थे । विष्णु की आज्ञा से अपान्तरतमा, कपिल और हिरण्यगर्भ आदि ने क्रमश: चग्यजुःसाम लक्षण वेद, सांख्य शास्त्र और योग आदि का विभाग किया ' । इस वचन से भी हमारे द्वारा प्रतिपादित मत को हो पुष्टि होती हैं । ' अपान्तरतमा ऋषि वेदाचार्य अथवा जिनको atra कहा जाता है, उन्होंने मनु के स्वायम्भुव के अन्तर में वेदों का विभाग किया ' इस महाभारत के वचन का भी अभिप्राय यही हैं कि as a fart कया । इस तरह से आपके द्वारा उद्धृत प्रमाणों के आधार पर भी वेदों का विभाग सिद्ध हो जाता हैं । उक्त aur or ' शाखाओं का विभाग किया ' इस तरह का अर्थ मूल से बिलकुल सम्बद्ध नहीं है । मूल में ' वेदों का विभाग किया ' केवल इतना ही कहा गया है । इसी तरह से कृष्ण द्वैपायन ने भी किसी समय वेदों का विभाग किया हो, तो इनमें विरोध का प्रद्ध ही कहीं उठता है? मुख्यार्थ को छोड़कर गोणार्थ को स्वीकार करने की बात आर्यसमाजियों ने स्वामी दयानन्द से ही सीखी है । यह बात शब्दशास्त्र के नियम के विरुद्ध है । आर्यसमाजियों की यह बड़ी भारी लाइलाज बीमारी है कि वे लोग स्वामी दयानन्द और कुछ अन्य आर्यसमाजियों को बहुवचन से सम्बोधित करते हैं । ये लोग स्वामी दयानन्द के मत का खण्डन करते समय भी उनको बहुवचन से ही सम्बोधित करते हैं । इसके विपरीत अन्य महान् आचार्यो को एकवचन से सम्बोधित करते हैं । Tree ने आगे कहा है कि --- ' भारत युद्ध से कई सौ वर्ष पहले भी एक ब्रह्मा थे । उनके पुत्र का नाम वसिष्ट था ' ( पृ ० ६४ ) इस तरह का सारा कथन भी निर्मूल है, क्योंकि अभी यहीं पर कुछ पहले ब्रह्मा की taarat में श्रेष्ठता का वर्णन किया जा चुका है । पुराणों में ब्रह्मा को ही सृष्टि का कर्ता माना गया है । ऊपर उद्धृत अहिर्बुध्न्यसंहिता के वचनों से भी यही बात पुष्ट होती है । भगवद्दत प्रभृति सभी सामाजिक विद्वान् सब जगह ' आधा तीतर भाषा बढेर ' वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं । ये लोग अपने अनुकूल वाक्यों को तो प्रमाण रूप में स्वीकार कर लेते हैं, किन्तु विरोधी वचनों को अप्रमाण अथवा क्षेपक मान लेते हैं । यहाँ पर भगवद्दस के द्वारा प्रमाण रूप से स्वीकृत वायुपुराण आदि के वचनों से ही उनका मत खण्डित हो जाता है । जैसे कि जिस वेदव्यास को प्राप्त कर यह वेदरूपी वृक्ष नाना शाखाओं वाला हो गया ', ' आपके शिष्य - प्रशिष्य अनेक हों और वेद का आप लोग विस्तार करें, १०६

पृष्ठ 872

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८४२ वेदार्थ पारिजाता सन्तु वेदो विस्तार्यतामयम् || ४४ || ( शा ० प ० ३२७ ), ' शैलादस्मान् महीं गन्तुं काङ्क्षितं नो महामुने । वेदाननेकधा यदि ते रुचितं प्रभो ॥४ ॥ ' ( म ० भा ०, शा ० प ० ३२८ ) इति । महर्षेर्व्यासस्य जीवनकाल सम्वन्धेऽपि तदीयकल्पना

कल्पनामात्रमेव, महर्षेस्तस्य ततोऽप्यधिकजीवित्वात् । भगवद्दत्तोद्धरणानुसारेणाश्वघोषोऽपि तथैवाह - ' सारस्वतश्चापि जगाद नष्टं वेद पुनयं ददृशुर्न पूर्वम् । व्यासस्तथैनं बहुधा चकार न यं वशिष्ठः कृतवान्न शक्ति: ॥ ( बुद्धचरिते ११४७ ) ( पृ ० ६ ९ ) । अत्रायं भगवद्दत्तो व्यासमेव सारस्वतमाह, तत्तु न युक्तम्, तस्य नष्डवेदद्रष्टृत्वेन पृथनिर्देशात् । व्यासस्य तु वेदविभाजकत्वमाह सः । पुराणानुसारेणाऽष्टाविंशति संख्याका व्यासाः कल्पभेदेन भवन्ति, पराशरादयश्च कल्पान्तरे व्यासा आसन्नित्यर्थेन सङ्गतिसिद्धेः । तेन न व्यासकाल एव तत्पित्रादयो व्यासा आसन् । महाभाष्यकारोऽपि वेदा बहुधा भिन्ना इत्याह पस्पशायाम । ' पदप्रकृतीनि सर्वचरणानां पार्षदानि ' ( नि ० १।१७ ) अत्र चरणशब्देन शाखा गृह्यते । यथा पदान्येव संहत्यमानानि संहिता भवति । तस्मात् पदान्येव प्रकृतिः संहिता विकारः । तथैव पदप्रकृतीनि सर्वचरणानां पार्षदानि, सर्वेषां चरणानां पार्षदानि सर्वेषां चरणानां सर्वशाखान्तराणामित्यर्थं इति दुर्गाचार्य: । पार्षदानि प्रातिशाख्यानि स्वचरणपर्षद्येव यैः प्रतिशाखानियतमेव पदावगृह्यप्रगृह्याप्रगृह्यक्रमसंहितास्वरलक्षणमुच्यते तानीमानि पार्षदानि । तस्यां तस्यां शाखायां शाखीयसमूहरूपायां पर्षदि पदादिस्वरातं नियमाः प्रातिशाख्येषु प्रसिद्धयन्ति । ' शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ' ( ब्र ० सू ० १।२।२० ) अत्राप्युभयेऽपि शाखिनः काण्वा माध्यन्दि-नाश्चान्तर्यामिणो भेदेनैनं शारीरं पृथिव्यादिवदविष्ठानत्वेन नियम्यत्वेन चाधीयते । ' यो विज्ञाने तिष्ठन् ' ( बू ० ३।७।२२ ) इति काण्वाः, ' य आत्मनि तिष्ठन् ' ( श ० १४/६/७/३० ) इति माध्यन्दिताः । " हे महामुने व्यासजी, अब हम इस पर्वत से पृथ्वी पर जाना चाहते हैं और यदि आपकी रुचि हो तो वेदों की अनेक शाखाएं आप बनायें ' ( पृ ० ६५-६७ ) | महर्षि व्यास के जीवन काल के सम्बन्ध में भी भगवद्दत्त की कल्पना ( पु ० ६७-६९ ) कोरी कल्पना ही हैं, क्योंकि महर्षि व्यास अधिक काल पर्यन्त जीवित रहे हैं । भगवद्दत कथनानुसार अश्वघोष भी व्यास के विषय में उनके ही मत का प्रतिपादन करते हैं । बुद्धचरित में अवघोष ने कहा है कि ' जो काम वसिष्ठ और शक्ति न कर सके, वह उन्हीं के वंशज व्यास ने किया । सारस्वत व्यास ने ही वेद की शाखाओं का प्रवचन किया ' । ‘ यहाँ पर भगवद्दत्त ( पृ ० ६ ९ ) व्यास को ही सारस्वत मानते हैं, यह ठीक नहीं है । क्योंकि नष्ट हुए वेदों के द्रष्टा के रूप में उनका अलग से निर्देश है । अश्वघोष ने भी वेदों का विभागकर्ता ही व्यास को माना है । पुराणों के अनुसार कल्प के भेद से २८ व्यास होते हैं । पराशर प्रभूति भी कल्पान्तर में व्यास थे, इस अर्थ से उनकी सङ्गति बैठ जाती है । इससे व्यास के समय में ही उनके पिता, पितामह प्रभूति भी व्यास नहीं हो सकते । महाभाष्यकार पतंजलि ने भी पस्पशाह्निक में वेदों के अनेक विभागों की बात कही है । ' पदप्रकृतीनि सर्वन्चरणानां पार्षदानि ' इस निरुक्त वचन में चरण शब्द से शाखा का ग्रहण किया जाता है । जैसे कि पदों के इकट्ठा हो जाने को संहिता कहते हैं, इस लिये पद ही प्रकृति है और संहिता विकार है, उसी तरह से सब चरणों में पार्षद पदप्रकृति है | यहाँ पर चरण शब्द का अर्थ शाखान्तर किया जाता है, यह दुर्गाचार्य का कथन है । पार्षद प्रातिशाख्य को कहते हैं । इसका विग्रह इस तरह से हैं कि अपने चरण की परिषद् में ही अर्थात् जो अपनी शाखा में ही नियत रहकर पदों का नवग्रह आदि करके उनके क्रम, संहिता, स्वर आदि का लक्षण बताते हैं, उनको पार्षद अर्थात् प्रातिशाख्य कहते हैं । उस उस शाखा में, अर्थात् शाखासमूहरूप पत् में जिसकी सहायता से पदादि स्वरान्त नियमों का विश्लेषण किया जाता है, वह शास्त्र प्रातिशाख्य के नाम से प्रसिद्ध है । ' शरीराश्चोभयेऽपि ० ' इस वादरायण सूत्र में काण्व और माध्यन्दिन दोनों ही शाखाओं के अध्येतागण अन्तर्यामी से frea इस शरीर आत्मा को पृथिव्यादि अधिष्ठान के समान और नियम्य मानते हैं । जैसे कि ' यो विज्ञाने तिष्ठन् ' यह काण्व श्रुति है मोर ' य आत्मनि तिष्टन् ' यह माध्यन्दिन श्रुति है ।

पृष्ठ 873

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वार्थपारिजाता ८४३ " ' अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ' ( ब्र ० सू ० ३।३।५५ ) | अर्थात् ' ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १ | १ | १ ), ' लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत ' ( छा ० २१२११ ), ' उक्थमुक्थमिति वै प्रजा वदन्ति तदिदमेवोक्तम् ', ' इयमेव पृथिवी ', ' अयं वाव लोकः ', ' एषोऽग्निश्चितः ' इत्येवमाद्या य उद्गीथादिकर्माङ्गावबद्धाः प्रत्ययाः प्रतिवेद शाखाभेदेषु विहितास्ते तत्तच्छाखागतेष्वेवोद्गीथादिषु भवेयुरथवा सर्वशाखागतेष्विति विशयः । तत्र स्वशाखागतेष्वे-वेद्गीथादिषु विधीयेरन्निति । कुतः? सन्निधानात् । सामान्यविहितानां विशेषाकाङ्क्षायां सन्निकृष्टेनैव स्वशाखागतेन विशेषेणाकाङ्क्षादिनिवृत्तेः । तदतिलङ्घनेन शाखान्तरविहितविशेषोपादाने कारणाभावात् । तस्मात् प्रतिशाखं व्यवस्था । एवं प्राप्ते ब्रवीति - ' अङ्गाववद्वास्तु ' इति । तुशब्दः पूर्वपक्षं व्यावर्तयति । नैते प्रतिवेदं स्वशाखास्वेव व्यवतिष्ठरेन् अपि तु सर्वशाखास्वनुवर्तेरन् । कुतः? उद्गीथादिश्रुत्यविशेषात् । सन्निधानात्तु श्रुतिर्बलीयसी । न च सामान्याश्रयः प्रत्ययो नोपपद्यते, तस्मात् स्वरादिभेदे सत्यप्युद्गीथत्वाद्यविशेषात् सर्वशाखागतेष्वेवोद्गीथादिष्वेवं जातीयकाः प्रत्ययाः स्युः ( शाङ्करभाष्यम् ) । अत्र प्रसिद्ध वेदेष्वेव शाखापदप्रयोगः । चरणपदप्रयोगोऽपि वेदशाखास्वेव दृश्यते, गृह्यग्रन्थानां प्रातिशाख्यलक्षणवत् प्रतिचरणं पाठव्यवस्थोपलभ्यते । तद्यथा -- ' वासिष्ठं बह्वचैरेव गृह्यते, शङ्खलिखितोक्तं च वाजसनेयिभिः ' ( १ | ३ | ११ ) इति । तन्त्रवार्त्तिकेऽपि चरणपदेन शाखैव गृह्यते । ' अनृचो माणवे बह्वचश्चरणाख्यायाम् ' ( पा ० सू ० ५/४/१५३ ) इति महाभाष्येऽपि तथैव । ' अनुवादे चरणानाम् ' ( पा ० सू ० २/४/३ ) । वरणानां शाखाध्येतृवाचिनामित्यर्थः ' इति तत्त्वबोधिनी । चरणानां द्वन्द्व एकवत् स्यात् सिद्धस्योपन्यासे - उदगात् कठकालापं प्रत्यष्ठात् कठकौथुमम् । ' अङ्गावबद्धास्तु ० ' इस बादरायण सूत्र का अभिप्राय यह है कि ' ओमित्येतदक्षरमुपासीत ' इत्यादि ऊपर उद्धृत श्रुतियों में उद्गीथ प्रभूति कर्मों से संबद्ध विधियां प्रत्येक वेद की शाखा के अनुसार पृथक् पृथक् निहित हैं | ये विधियों उस उस शाखा में प्रतिपादित उद्गीथ प्रभृति के ही अंग होंगे अथवा सभी शाखाओं में प्रतिपादित उद्गीथ आदि के? इस संशय के उपस्थित होने पर पूर्वपक्षी का मत इस तरह से उपस्थित किया गया है कि समिधि के आधार पर अपनी शाखा में प्रतिपादित उद्गीथ आदि के है ये अंग होने चाहिये । सामान्य रूप से विहित कर्मों के संबन्ध में विशेष आकांक्षा के उपस्थित होने पर सन्निकृष्ट स्वशाखागत कर्मों से उनकी विशेष आकांक्षा की निवृत्ति हो जाती हैं । उसका उल्लंघन कर शाखान्तर विहित विशेष कर्मों से उसका संबन्ध जोड़ने में कोई सहायक कारण सामग्री उपलब्ध नहीं है । इसलिये प्रत्येक शाखा में विहित इस तरह के कर्मों की केवल उस शाखा में वर्णित विधियों से ही अंगता बन सकती है । पूर्वपक्षी के इस मत का खण्डन करने के लिये ही इस सूत्र की प्रवृत्ति हुई है । इस सूत्र में विद्यमान ' तु ' शब्द उक्त पूर्वपक्ष के मत का निराकरण आरंभ करने के अभिप्राय से उक्त है । ये कर्म प्रत्येक वेद को अपनी अपनी शाखा तक ही सीमित नहीं रहेंगे, अपितु सभी शाखाओं में वर्णित कर्मों से इनकी अंगता मानी जायगी, क्योंकि उद्गीथ आदि श्रुति सभी शाखाओं में समान है । fafe की अपेक्षा श्रुति बलवती मानी जाती है । सर्व शाखा सामान्य उद्गीथ आदि की प्रतीति न होती हो, ऐसी बात नहीं है । इसलिये स्वर आदि के भेदों की विद्यमानता में भी उद्गीथ आदि कर्मों का स्वरूप सभी शाखाओं में समान हैं, अतः सर्वशाखा गत उद्गीथ आदि में इस तरह की fafaaf संबद्ध रहेंगी । इस सूत्र की शांकरभाष्य संमत व्याख्या यही है | यहाँ पर वेद के नाम से प्रसिद्ध संहिता ग्रन्थों के लिये भी शाखा पद का प्रयोग किया गया है । चरण पद का प्रयोग भी वेद की शाखाओं के लिये ही किया गया है । प्रातिशाख्य ग्रन्थों की ही तरह गृह्यसूत्र ग्रन्थों में भी प्रत्येक वरण के अनुसार पाठ की व्यवस्था उपलब्ध होती है । जैसा कि तन्त्रवात्तिक में बताया गया है कि ' सिष्ठ सूत्र को ॠग्वेदी ही प्रमाण मानते हैं और शंखलिखित सूत्र को वाजसनेयी ' | यहाँ पर चरण पद से शाखा का ही ग्रहण किया है । ' अनुची माणके ' इत्यादि महाभाष्य में भी इसी बात का समर्थन मिलता है । ' अनुवादे चरणानाम् ' इस पाणिनि सूत्र में विद्यमान चरण शब्द का अर्थ तत्वबोधिनीकार ने शाखा at asar किया है | सिद्ध का उपन्यास करने पर चरणों का द्वन्द्र एकवत् होता है, जैसे कि उदगातु कठकालापम् प्रत्यष्टात् कठकौथुमम्, इन उदाहरणों narare, rani मम् का द्वन्द्व एकवचन में पर्यवसित हो जाता है ।

पृष्ठ 874

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८४४ ' अव्ययात्त्यप् ' ( पा ० सू ० ४।२।१०४ ), ' गहादिभ्यश्च ' ( पा ० सू ० ४।२।१३८ ), ' गोत्रचरणाद्वज् ' ( पा ० सू ० ४।३।१२६ ), वा ० ' चरणाद्धर्माम्नाययोः ' इति वक्तव्यम् । उदाहरणम् -- ( गो ० औपगवकम्, च ० काठकम् ) । ' जाते रस्त्रीविषयादयोपधात् ' ( पा ० सू ० ४।१।६३ ) इत्यत्र महाभाष्ये जातिलक्षणम्- ' गोत्रं च चरणैः सह ' इति व्याख्यायां गोत्रमित्यपत्यमित्यर्थः । चरणशब्देन शाखाध्यायिनो गृह्यन्ते इति कैयटः । ' तस्येदम् ' ( पा ० सू ० ४ | ३ | १२० ) इत्यत्र वार्तिकम् - ' चरणाद्धर्माम्नाययोः । अत्र महाभाष्यम्- ' चरणा-द्वर्माम्नाययोरिति वक्तव्यम् । कठानां धर्म आम्नायो वा काठकम् । कालापकम् । मौदकम् । पैप्पलादकम् | ' चरणे ब्रह्मचारिणि ' ( पा ० सू ० ६ | ३ | ८६ ) अत्र सूत्रे वरणशब्दः शाखावाचीति नागेशः । चरणः शाखेति सिद्धान्तकौमुदी । अत्र सूत्रे महाभाष्यम् - ' अत्र कि निपात्यते । ब्रह्मण्युपपदे समानपूर्वे व्रते कर्मणि चरेणिनिव्रं तलोपश्च । ब्रह्मण्युपपदे समानपूर्व व्रते कर्मणि चरेणिनिः प्रत्ययो व्रतलोपश्च निपात्यते । समाने ब्रह्मणि व्रतचारीति सब्रह्मचारी | ' महादिभ्यश्च ' ( पा ० सू ० ४/२/१३८ ) अत्र वार्तिकम् - चरणसम्बन्धेन निवासलक्षणोऽण् । भाष्यम् चरणसम्बन्धेन निवासलक्षणोऽण् वक्तव्यः । त्रयः प्राच्याः । श्रय उदीच्याः । श्रयो माध्यमाः । सर्वे निवासलक्षणाः । अत्र कैयट: -- पृथ्वीमध्यं निवास एषां चरणानामित्यत्रार्थे माध्यमाश्चरणा इति भवतीत्यर्थः । चरणाः कठादयः । भाष्यम् -- गहादिषु पृथिवीमध्यस्य मध्यमभावो वक्तव्यः । पृथिवीमध्ये भवो मध्यमीयः । ' शेषाद्विभाषा ' ( पा ० सू ० ५।४।१५४ ) अत्र भाष्यम् -- अनृचो माणचे वहृचश्चरणाख्यायाम् । 1 यदुक्तम् —'भारद्वाजसत्याषाढादिशाखाः सौत्रशाखाः, नैताश्चरणेषु परिगण्यन्ते, एतासां स्वतन्त्रसंहिता -ब्राह्मणाभावात् । अतश्चरणशब्दापेक्षया किञ्चित् सङ्कोचेन शाखाशब्दप्रवृत्तिः ' ( पृ ० ७१ ) इति, तदपि तुच्छम्, ' अव्ययात् त्यप् ', ' महादिभ्यश्च ', ' गोत्रचरणाद् बुन् ', ' चरणाद्धर्माम्नाययोः ' इत्यादि सूत्रों और वार्तिक में भी इसी तरह एक aar का विधान है, जैसे कि औपगवकम्, काठकम् इत्यादि । ' जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् ' इस पाणिनि सूत्र के महाभाष्य में ' गोत्रं च चरणैः सह ' इसकी व्याख्या में जाति का लक्षण गोत्र अर्थात् अपत्य किया गया है । यहाँ पर कैयट का कथन है कि चरण शब्द शाखा के अध्येताओं के लिये प्रयुक्त हैं । ' तस्येदम् ' इस पाणिनि सूत्र पर ' चरणाद्वर्माम्नाययोः ' यह वातिक है । इसकी महाभाष्यकार ने इस तरह से व्याख्या की है-- ' यहाँ पर चरणवाची शब्दों से धर्म और आम्नाय के अर्थ में प्रत्यय का विधान मानना चाहिये । जैसे कि कठ चरण के अध्येताओं का धर्म अथवा आम्नाय काठक कहलावेगा । इसी तरह से कालापक, मोदक, पैप्पलादक शब्दों की भी निष्पत्ति और अर्थ समझना चाहिये | ' मरणे ब्रह्मचारिणि ' इस सूत्र में चरण शब्द शाखा का बोधक है, यह नागेश का कथन है | सिद्धान्तकौमुदी में भी इसका यही अर्थ किया गया है । इस सूत्र का महाभाष्य इस तरह से है - ' इस सूत्र में किसका निपात किया जाता है । ब्रह्म अर्थात् बंद वाचक शब्द के उपपद में रहने पर व्रत अर्थात् कर्म की समानता के बोधन में विवि प्रत्यय का और व्रत के लोप का विधान निपात द्वारा सिद्ध किया जाता है । जैसे कि समान ब्रह्म अर्थात् वेदशाखा में अध्ययन के व्रत का आचरण करने वाला ' ब्रह्म-चारी ' कहलाता है ' । ' महादिभ्यश्च ' इस सूत्र पर वातिक है-- ' चरणसंबन्धेन निवासलक्षणोऽन् । इस पर भाष्य इस प्रकार से है- ' चरण के संबन्ध से निवास लक्षण अणु प्रत्यय का विधान करना चाहिये । त्रयः प्रायाः, त्रय उदीच्याः त्रयो माध्यमा: --- इन सब उदाहरणों में यह निवास लक्षण भण् प्रत्यय विहित हैं । यहाँ पर कैयट कहते हैं कि पृथिवी का मध्यभाग जिन चरणों का निवास स्थान है, वे चरण माध्यम कहलाते हैं, इसी अर्थ में यहाँ पर प्रत्यय का विधान हैं । कठ आदि चरण कहलाते हैं । भाष्य में भी कहा गया है -- गहादि गण में पृथिवी मध्य के स्थान में मध्यम भाव का विधान करना चाहिये । पृथिवी के मध्य भाग से जो पैदा होता है, उसको ' मध्यमीय ' कहते हैं । ' अनूची माणवे बह्वचश्चरणाख्यायाम् ' यह भाष्य ' शेषाद्विभाषा ' इस सूत्र पर है । यहाँ पर भगवद्दत्त कहते हैं कि ' अनेक शाखाएँ केवल सोत्र शाखाएँ हैं । यथा -- भारद्वाज, सत्याषाढ आदि शाखाएँ । इन्हें कोई विद्वान् चरणों में नहीं गिनता । न इनकी स्वतन्त्र संहिता है और न ब्राह्मण । अतः चरण शब्द की अपेक्षा शाखा शब्द कुछ

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वैवार्थ पारिजातः ** तासां संहितादिविलोपेन तदनुपलब्धेः । ' पृष्टश्च गोत्रचरणं स्वाध्यायं ब्रह्मचारिणम् ' ( शान्तिपर्व १७०२ कुम्भघोण, संस्करणम् ) | अत्रापि चरणपदेन शाखैव गृह्यते । स्वाध्यायपदेन कियदध्ययनमित्येव प्रश्नः । काः शाखा इति प्रश्ने वेदावयवा एवेत्युत्तरम् । यदुक्तम् -'शाखानां वेदत्वेऽनेकसूत्राणां वेदत्वापत्ति: ' ( पृ ० ७२ ) इति, तन्न, तेषां सूत्रत्वप्रसिद्ध व मन्त्र-ब्राह्मणानुपलब्धेश्च वेदत्वानुपपत्तेः । येषां सूत्राणां मन्त्रसंहिताब्राह्मणानि चोपलभ्यन्ते, न तानि सूत्राणि वेदत्वेन गण्यन्ते, तथैव सत्याषाढादिसूत्राणामपि वेदत्वानापत्तिः समानैव । नृसिंहतापिन्यादीनां तु वेदत्वमेव, मौक्तिकोपनिषदि परिगणन-दर्शनात् । यदुक्तम् -'ऋग्यजुःसामाथर्वाणश्चत्वारो वेदाः साङ्गाः सशाखाश्चत्वारः पादा भवन्ति ' इत्यत्राङ्गानि शाखाश्च वेदेभ्यः पृथक्कृता: ' ( पृ ० ७२ ) इति, तदतीव तुच्छम् ' तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत || ' इति मन्त्र छन्दोम्यः पृथगृगादिनिर्देशेन तेषामछन्दस्त्वेनावेदत्वापत्तेः । तस्माद् ब्राह्मणवशिष्ठन्यायेन ( ब्राह्मणा आगता वशिष्ठोऽप्यागत इति विशेषाभिप्रायेण ) यथा वशिष्ठस्प पार्थक्येोक्ति-स्तथैव प्रश्नेऽपि शाखानां पृथगुल्लेख: । ' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदुग्वेद: ' ( वृ ० २ | ४ | १० ) इत्यादिस्थलेषु ऋग्वेदादिवत् सूत्रश्लोकादीनां ब्राह्मणविशेषाणामपि परमेश्वरनिःश्वसितत्वेन नित्यत्वमपौरुषेयत्वं चोक्तम् । बृहज्जा-बालोपनिषद्यपि तदभिप्रायेणैव जाबालोपनिषदध्ययनेन ऋचोऽधीते स यजूंष्यधीते स सामान्यधीते सोऽथर्वणमधीते स शाखा अधीत इत्युक्तम् । संकुचित अर्थ में प्रयुक्त हुआ है ' ( पृ ० ७१ - ७२ ) यह सब व्यर्थ की बकवास है । इन शाखाओं की संहिताएँ अब लुप्त हो गई हैं, इसलिये वे अब उपलब्ध नहीं होती । अर्थात् इन शाखाओं के भी संहिता और ब्राह्मण ग्रन्थ कभी विद्यमान थे । ' पृष्व गोत्रचरण ' इस महाभारत वचन में बताया गया है कि ' राक्षस ने उस ब्राह्मण से उसका गोत्र, चरण, शाखा और ब्रह्मचर्य पूछा । स्वाध्याय का अर्थ यहाँ शाखा प्रतीत होता है और चरण से यह पृथक गिना गया है ' ( पृ ० ७२ ) । भगवद्दत्त का यह प्रतिपादन भी गलत है, यहाँ पर भी चरण पद से शाखा का ही ग्रहण होता है । यहाँ पर स्वाध्याय पद से यही पूछा गया है कि आपने fear asarn faer | किन शाखाओं का अध्ययन किया? इस प्रश्न के उत्तर में वेद के ों को ही गिनाना पड़ेगा । कहा गया है कि- ' यदि शाखाएँ वेदावयव ही मानी जाएँ तो अनेक सूत्र ग्रन्थ भी वेद बन जायेंगे ' ( पृ ० ७२ ), यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि सूत्र ग्रन्थ इसी नाम से प्रसिद्ध है और इनकै मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग भी उपलब्ध नहीं होते, अतः इनको वेद नहीं कहा जा सकता । जिन सूत्रों के मन्त्र, संहिता और ब्राह्मण भाग उपलब्ध होते हैं, वे सूत्र भी वेद रूप से परिगणित नहीं होते । इसी तरह से सत्याषाढ प्रभृति सूत्र ग्रन्थ भी वेद नहीं माने जायेंगे, यह ठीक ही है । नृसिंहतापिनी प्रभृति उपनिषद् तो वेद माने हो जायेंगे, क्योंकि मौक्तिकोपनिषद् में वह परिगणित है । कहा गया है कि ' ऋक्, यजुः साम और अथर्व चार वेद हैं । ये अंगों के साथ और शाखाओं के साथ चार पाद होते हैं ' इस उपनिषद् के प्रमाण पर यहाँ शाखाओं को वेदों से पृथक कर दिया गया है ' ( पृ ० ७२ ) यह कथन भी एकदम गलत है, क्योंकि यदि हम ऐसा मानें तो ' तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत: ' इस मन्त्र में छन्दस् से पृथक् ऋगादि का निर्देश होने में वे छन्द नहीं माने जायेंगे और फलतः वे वेद भी न माने जा सकेंगे । इसलिये ब्राह्मणवशिष्ट न्याय ( ब्राह्मण आ गये साथ ही वसिष्ट भी आ गये हैं ) के अनुसार, जैसे उक्त न्याय में विशेष अभिप्राय से वसिष्ठ का अलग से निर्देश किया जाता है, उसी तरह से प्रकृत स्थल में भी शाखाओं का rar उल्लेख विशेष अभिप्राय से किया गया गया है । ' इस महान् भूत ब्रह्म के निःश्वासभूत यह ऋग्वेद आदि है ' इत्यादि श्रुतियों में ऋग्वेद आदि की तरह सूत्र, श्लोक प्रभृति ब्राह्मण वचन भी परमेश्वर के निःश्वासभूत है, अतः वे भी निश्य और अपौरुषेय हो माने जायेंगे । बृहज्जाबालोपनिषद् में भी इसी अभिप्राय से ' जाबालोपनिषद् के अध्ययन से ऋक्, यजुः साम और अथर्ववेद के अध्ययन का और शाखाओं के अध्ययन का फल मिलता है ' इस तरह से शाखा का पृथक ग्रहण किया गया है ।

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८४६ वेदार्थ पारिजातः अत्रैवं ज्ञातव्यम् -- ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' ( श ० ११/५/६/३ ) इति वचनेनाधीयते गुरुपारम्पर्येणेत्यध्यायः, स्वस्याध्यायः स्वाध्यायः स्वशाखीयो वेदः, तत्सम्वन्धिन्यो वेदान्तरशाखाश्च ऋक्सामयजुरथर्वाङ्गिरसादिशब्देनोच्यन्ते । शेषास्तु शाखा: शाखाशब्देनोच्यन्ते । अन्यथा शाखाभ्यो भिन्ना वेदा उपलभ्येरन् । न च कैश्चिन्महर्षिभिः शाखाभ्यो भिन्ना वेदा उच्यन्ते । सामाजिकवेदा अपि माध्यन्दिनादिशाखात्वेनैव प्रसिद्धाः । यत्तु -- ' नहि मैत्रायणी शाखा काटकस्यात्यन्तविलक्षणा ' ( बालक्रीडा ११७ ) इति विश्वरूपवचनेन यदि शाखा वेदाः स्युस्तदा मैत्रायणीशाखाया अत्यन्त विलक्षणत्वनिषेधो नोपपद्यते ' ( पृ ० ७३ ) इति कृत्वा शाखानां वेदभिन्नत्वसाधनम्, तदेतत् कुशकाशावलम्बनमात्रम्, शाखानां वेदत्वेऽप्यनेकसाधम्र्येणात्यन्तविलक्षणत्वनिषेधे वाघाभावात् । यथा ऋग्यजुषादिगतपुरुषसूक्ताना मत्यन्तवैलक्षण्याभावेऽपि स्वतन्त्र वेदत्वमिति तद्वत् । ' सर्वास्ता ह चतुष्पादाः सर्वाश्चैकार्थवाचिका: । पाठान्तरे पृथग्भूता वेदशाखा यथा तथा ॥ ' ( वायुपु ० ६११५ ९ ) ( पृ ० ७३ ) इति वचनमपि न नः प्रतिकूलम्, पुरुषसूक्तानामिवैकार्थत्वेऽपि पाठभेदेन पृथग्भूतत्वस्यैव शाखानामेकार्थत्वेऽपि पाठभेदेन पृथक्त्वोपपत्तेः । किञ्च पुराणसंहितास्वपि परमतात्पर्यस्यैक्येऽपि यथावान्तरा अनेके कर्मव्रतोपासना कथाभेदाः सरित, तथैव शाखास्वप्यवान्तरा अनेके भेदाः सन्ति । काण्वमाध्यन्दिनादिमन्त्रब्राह्मणेषु तैत्तिरीयादिमन्त्रब्राह्मणेष्वपरिगणिता भेदाः सत्येव । अत उक्तवचनेनापेक्षिकमेवैक्यं मन्तव्यम् । अत एव पाठभेदेन शाखा निर्मिता इति बालजनप्रतारणमेव । पद - क्रम - जटा - मालादिविकृतिभिः शुद्धपाठरक्षणायैव परमप्रयत्नवत्सु वैदिकधौरेयेषु वेदेषु पाठभेदकल्पना पाश्र्चात्य-यहाँ पर यह समझ लेना चाहिये कि ' स्वाध्यायोऽभ्येतव्य: ' इस शतपथ श्रुति में निर्दिष्ट स्वाध्याय शब्द जो गुरु - परम्परा से पढ़ा जाता है, उसको अध्याय कहते हैं, अपना अध्ययन अर्थात् अपनी शाखा का अध्ययन स्वाध्याय है ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार स्वाध्याय शब्द से अपनी शाखा वाला वेद कहलाता है । अपनी शाखा से संबद्ध अन्य वेदों की शाखाएँ ऋक्, साम, यजु और अथर्वा -गिरस प्रभृति शब्दों से कही जाती है । अन्य शाखाएँ केवल ' शाखा ' पद से अभिहित होती हैं । यदि हम ऐसा न मानें तो शाखाओं से भिन्न देवों की उपलब्धि होनी चाहिये, किन्तु किसी भी महर्षि ने शाखाओं से भिन्न वेदों की सत्ता के विषय में कुछ भी नहीं कहा हैं । सामाजिकों के अभिप्रेत वेद भी माध्यन्दिन प्रभृति शाखाओं के नाम से ही प्रसिद्ध हैं । ' इसी प्रकार यदि सब शाखाएं वेदावयव ही होतीं, तो याज्ञवल्क्य स्मृति की बालक्रीड़ा टीका में विश्वरूप यह न लिखते कि-- ' मैत्रायणी शाखा काक से बहुत भिन्न नहीं है ' ( पृ ० ७३ ) | भगवदत्त ने इस तरह से शाखाओं को वेद से भिन्न सिद्ध करने का प्रयत्न किया है । यह भी बाढ़ में बहते व्यक्ति के लिये तिनके का सहारा लेने की तरह है, क्योंकि शाखाओं को वेद मानने में और अनेक समानताओं के आधार पर इनमें अत्यन्त विलक्षणता का निषेध करने में कोई बाधा नहीं हैं । जैसे ऋग्वेद और यजुर्वेद प्रभृति में विद्यमान पुरुष सूक्त में अत्यन्त विलक्षणता न होने पर भी इनको स्वतन्त्र माना जाता है, उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये | भगवद्दत द्वारा उद्धृत- ' उस चतुष्पाद एक पुराण की अनेक संहिताएं बनीं । उनमें पाठान्तरों के अतिरिक्त अन्य कोई भेद नहीं था । यह पाठान्तरों का भेद वैसा ही था, जिसके कारण कि वेदशाखाएं बनीं है ' ( पृ ० ७३ ) वायुपुराण का यह कथन भी हमारे सिद्धान्त के प्रतिकूल नहीं पड़ता, पूर्वोक्त विभिन्न बेदों में विद्यमान पुरुषसूक्त मन्त्रों का अर्थ यद्यपि एक ही है, किन्तु पाठभेद के कारण वे अलग - अलग हैं, उसी तरह से सभी शाखाओं के मन्त्रों के अर्थ यद्यपि एक ही हैं, तो भी पाठभेद के आधार पर इनमें भिन्नता मानी जायगी । दूसरी बात पुराणों की विभिन्न संहिताओं में परम तात्पर्य की एकता रहने पर भी जैसे कर्म, व्रत, उपासना आदि के प्रतिपादक अनेक अवान्तर तात्पर्य माने जाते हैं, उसी तरह से वेदों की शाखाओं में भी अनेक अवान्तर भेद विद्यमान हैं । काण्व और म rofer प्रभृति शाखाओं के मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग में तथा तैत्तिरीय प्रभृति शाखाओं के मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग में अपरिगणित भेद विद्यमान हैं । अतः उक्त वचन से आपेक्षिक एकता का ही प्रतिपादन किया जा सकता है । इस तरह से पाठभेद के आधार पर शाखाओं के निर्माण की बात अबोध व्यक्तियों को ठगने के लिये ही कही गई है । पद, क्रम, जटा, माला प्रभृति विकृतियों के

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वेदार्थपारिजातः eg लाङ्गूलानामेव शोभते । वाल्मीकीय रामायणे च ' हृदयेष्ववतिष्ठन्ते वेदा ये नः परं धनम् ' ( अयो ० ४५/२५ ) इति । ' व्याख्यानार्थमेव पाठभेदाः कृता: ' ( पृ ० ७३ ) इत्यपि बालभाषितम्, व्याख्यानार्थं मूलपाठेषु नानुन्मत्तः कश्चित् पाठभेदं करोति, न वा तथा वक्ति । यदुक्तम्- ' पुराणवचनानि तदेव समर्थयन्ते । यथा - ' प्राजापत्यां श्रुतिनित्या तद्विकल्पास्त्विमे स्मृताः । ' ( वायुपुराणे ६१।७५ ) अत्र प्रजापतेः कुलपरम्पराप्राप्ता नित्या श्रुतिः शाखास्तु तद्विकल्पा एव ' ( पृ ० ७३ ) इति, तदतीय मन्दम्, श्लोकस्यार्थान्तरप्रतिपादकत्वात् । प्रजापतौ भवा प्राजापत्या श्रुतिर्नित्या । तेन देवमनुष्यादिगतश्रुत्य नित्यत्वेऽपि न हानिः । बहुधा भिन्नाः शाखास्तु यथाकालं भिद्यन्ते लुप्यन्ते च । यथाद्यत्वे ऋग्वेदादीनामनेकाः शाखा लुप्ताः । पञ्चदशशाखा याज्ञवल्क्येनाविर्भूताः । एते शाखाभेदा: प्रजापतिहृदयस्थश्रुतेरेव विकल्पा भेदा इत्यर्थः । ' तेन प्रोक्तम् ' ( पा ० सू ० ४।३।१०१ ) इति सूत्रे काशिकाविवरणपञ्जिकाकर्तुजिनेन्द्रबुद्धेः ' तेन व्याख्यानं तदध्यापितं वा प्रोक्तमित्युच्यते ' ( पृ ० ७४ ) इति प्रोक्तस्य व्याख्यानमपि न सिद्धान्तप्रतिकूलम्, किन्तु त्वत्प्रतिकूलमेव । सूवेदत्वेन तवाभिमता: कौथुमादिशाखा अपि व्याख्यातत्वेन पौरुषेयत्वमापद्येरन् । सामाजिकास्तु पुराणानां प्रामाण्यं नाभ्युपगच्छन्ति । भगवद्दत्तः स्वार्थसिद्धये तेषां प्रामाण्येऽर्धजरतीय-मनुसरति । स्वाभीष्टमङ्गीकरोति विपरीतं मुञ्चति । तथाहि वायुपुराण एवोनषष्टितमेऽध्याये -- ' प्रतिमन्वन्तरं वैषा श्रुतिरन्या विधीयते ' ( ५६ ) इति वचनमस्ति । तेन प्रतिमन्वन्तरमन्यान्या श्रुतिर्निर्मीयत इत्युच्यते । अत एव -'ऋचो यजूंषि सामानि यथावत्प्रतिदैवतम् । आभूतसम्प्लवस्थायि वयेकं शतरुद्रियम् || ५७ ॥ शतरुद्रियं वर्जयित्वा प्रतिदेवत-आधार पर शुद्ध पाठ की रक्षा में परम प्रयत्न करने वाले वैदिक मूर्धन्य विद्वानों के रहते वेदों में पाठभेद की कल्पना पाश्चात्य विद्वानों के पुछल्ले लोगों के लिये ही शोभा की बात हो सकती है । इसीलिये वाल्मीकीय रामायण में कहा गया है कि - ' वेद हमारे हृदयों में विराजमान हैं, वे हमारे लिये सर्वोत्कृष्ट धन है ' । ' मूल पुराण के पाठान्तर जिस प्रकार जान - बूझ कर व्याख्यानार्थ ही किये गये थे, वैसे ही वेदसंहिताओं के पाठान्तर भी जान - बूझ कर व्याख्यानार्थ ही किये गये ' ( पृ ० ७३ ) यह भी बच्चों की सी बात है, क्योंकि कोई भी समझदार आदमी व्याख्या करते समय मूलपाठ में न तो पाठभेद ही करता है और न इस तरह की कोई बात ही कहता है । ' इसी विचार की पुष्टि में पुराणों का दूसरा वचन है - ' प्रजापति की कुल परम्परा वाली श्रुति तो नित्य है, पर शाखाएँ उसी का विकल्प मात्र हैं ' ( पृ ० ७३ ) यह कथन भी अत्यन्त दुर्बल है, क्योंकि उक्त श्लोक का अर्थ कुछ दूसरा ही है । प्रजापति में प्रादुर्भूत श्रुति प्राजापत्य कहलाती है । यह श्रुति नित्य हैं । इससे देवमनुष्य प्रभृति में प्रादुर्भूत श्रुति को अनित्य मानने में भी कोई दोष नहीं है । अनेक प्रकार से भिन्न शाखाएँ तो समय के अनुसार प्रादुर्भूत होती रहती हैं और लुप्त होती रहती हैं । जैसे कि आजकल ऋग्वेदादि की अनेक शाखाएँ लुप्त हो गई हैं । शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाएँ याज्ञवल्क्य के चित्त में आविर्भूत हुई थीं । ये शाखाभेद प्रजापति के हृदय में आविर्भूत उस नित्य श्रुति के ही विकल्प, अर्थात् भेदोपभेद हैं, यही उक्त वायुपुराण के वचन का सही अर्थ है । ' पाणिनीय सूत्र ' ' तेन प्रोक्तम् ' पर टीका करते हुए काशिका - विवरण- पंजिका के कर्ता जिनेन्द्रबुद्धि लिखते हैं- ' व्याख्या करने अथवा पढ़ाने को प्रवचन कहते हैं | शाखा प्रोक्त हैं । अतः व्याख्यान या अध्यापन के कारण ये ऐसा कहाती हैं ' ( पृ ० ७४ ) ' प्रोक्त ' पद की इस तरह की व्याख्या भी हमारे प्रतिकूल न जाकर आपके ही प्रतिकूल पड़ती है, क्योंकि आपके द्वारा मूलवेद के रूप में स्वीकृत कौथुम प्रभूति शाखाएं भी व्याख्यान और प्रवचन आधार पर पौरुषेय माननी पड़ जायेंगी, क्योंकि प्रवचन परम्परा आजकल चली आ रहीं हैं । द्वारा ही वे भी आर्यसमाजी विद्वान् पुराणों का प्रामाण्य स्वीकार नहीं करते । भगवद्दत्त अपने अभिमत की सिद्धि के लिये उनका प्रामाण्य स्वीकार करने में ' अर्धजरतीय ' न्याय का अनुसरण करते हैं । जो अपने मतलब की बात है, उसको मान लेते हैं और जो अपने मत के विरुद्ध पड़ती है, उसको छोड़ देते हैं । क्योंकि वायुपुराण के ही ५ ९ अध्याय में - ' प्रत्येक मन्वन्तर में यह श्रुति भित्र रूप में निर्मित होती है ' यह वचन मिलता । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रत्येक मन्वन्तर में भिन्न भिन्न प्रकार की श्रुतियों का निर्माण किया जाता है । इस लिये वायुपुराण के ही ' ऋचो यजूंषि ० ' इस वचन में बताया गया है कि एक शतरुद्रिय को छोड़कर प्रत्येक

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८४८ वेदार्थपारिजातः माविर्भूतानि ऋगादीन्याभूतसम्प्लवस्थायीनि । अत एव प्रतिमन्वन्तरमन्यान्या श्रुतिनिर्मीयते । उत्पत्तिरत्र प्रादुर्भाव एव । तदपि तत्रैवोक्तम् । ' अथर्वयजुषां साम्नां वेदेष्विह पृथक् - पृथक् । ऋषीणां तप्यतामुत्रं तपः परमदुश्चरम् || ६ || मन्त्राः प्रादुर्बभूवुर्हि पूर्वमन्वन्तरेष्विह । परितोषाद् भयाद् दुःखात् सुखाच्छोकाच्च पञ्चधा ॥ ६१ || ' तत्रैव भृगुमरीच्य-ङ्गिरः पुलहादीनामृषीणां मन्त्रकर्तृत्वमुक्तम् । अत एव ऋषिजातय उक्ता: - ' परं हि ऋषते यस्मात् परमर्षिस्ततः स्मृतः || ८० || ', ' ईश्वराः स्वयमुद्भूता मानसा ब्रह्मणः सुताः ॥८१ ॥ एते मन्त्रकृतः सर्वे काश्यपांस्तु निबोधत ' ( वायुपु ०

५ ९ ।१०२ ), ' इत्येते चात्रयः प्रोक्ता मन्त्रकारा महर्षय: ' ( वायुपु ० ५ ९ ।१०४ ) इति । तत्रैव षष्टितमेऽध्याये वेदानां नाशोऽप्युक्तः - ' वेदे नाशमनुप्राप्ते यज्ञो नाशं गमिष्यति । यज्ञे नष्टे देव-नाशस्ततः सर्वं प्रणश्यति || ६ || आद्यो वेदश्चतुष्पादः शतसाहस्रसंज्ञितः । पुनर्दशगुणः कृत्स्तो यज्ञो वै सर्वकामधुक् || ७ || ' तत्रैव मनुकर्तृको वेदविभाग उक्त: - '- ' एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा मनुर्लोकहिते रतः । वेदमेकं चतुष्पादं चतुर्धा व्यभजत्प्रभुः || ८ || ' सत्रैव व्यासकृतो विभागोऽप्युक्तः-- ' तस्मिन् युगे कृतो व्यासः पाराशर्यः परन्तपः । द्वैपायन इति ख्यातो विष्णो-रंशः प्रकीर्तितः ॥११ ॥ ब्रह्मणा चोदितः सोऽस्मिन् वेदं व्यस्तुं प्रचक्रमे ॥ अथ शिष्यान् स जग्राह चतुरो वेदकारणात्

|| १२ || जैमिनि च सुमन्तुं च वैशम्पायनमेव च ॥ पैलं तेषां चतुर्थ तु पञ्चमं लोमहर्षणम् || १३ || ऋग्वेदश्रावकं पैलं जग्राह विधिवद् द्विजम् || १४ || ' अत्रैव शाखाविस्तार उक्तः । अत्रैव शाकल्योऽपि वर्णित: - ' शाकल्यः प्रथमस्तेषां तस्मादन्यो रथान्तरः || ३१ || तस्य जनकसभायां याज्ञवल्क्येन शास्त्रार्थः । शाकल्यस्य याज्ञवल्क्यशापेन नाशः । ' शाकल्यस्तमविज्ञाय सद्योमृत्युमवाप्नुयात् || ५ ९ || ' शाकल्ये मृते -- ' मेरुपृष्ठं समासाद्य तैस्तदा स्विति मन्त्रितम् । यो देवता में आविर्भूत ऋगादि वेद प्रलयकाल पर्यन्त स्थिर रहते हैं । इसी लिये प्रत्येक सम्वन्तर में भिन्न भिन्न श्रुतियों के निर्माण की बात कही जाती है । उत्पत्ति से अभिप्राय प्रादुर्भाव से है । यह बात भी वहीं कही गई है- ' अब, यजुः साम इन वेदों की पृथक् पृथक उपलब्धि के लिये ऋषिगण जब परम दुश्वर उग्र तप कर रहे थे, तब पूर्व मन्वन्तरों में मन्त्रों का प्रादुर्भाव हुआ था । परितोष, भय, दुःख, सुख और शोक में पाँच कारण मन्त्रों के प्रादुर्भाव के माने गये हैं । वहीं पर भृगु, मरीचि, अङ्गिरा, पुलह प्रभूति ऋषियों को मन्त्रों का कर्ता माना गया है । इसी के आधार ऋषियों की एक जाति मानी गई हैं --- ' परमर्षि इसलिये कहे जाते हैं कि इनसे पर अर्थात् सर्वोत्कृष्ट ज्ञान वेद का प्रादुर्भाव होता है ', ' ब्रह्मा के मानसपुत्र ईश्वर इस प्रकार से हैं कि ये स्वयं अपनी इच्छा से उत्पन्न होते हैं ', ' ये सब मन्त्रों के निर्माता हैं । अब मैं कश्यप ऋषि के पुत्रों का वर्णन करता हूँ, सी सुनो ', ' इस तरह से अत्रि वंश के सम्पन dr after or a र्णन किया गया ' | वायुपुराण के हो ६० वें अध्याय में वेदों के नाश की बात भी कही गई है ' वेद के नष्ट हो जाने पर यज्ञ भी नष्ट हो जायेंगे । यज्ञों के नष्ट हो जाने पर देवताओं का नाश हो जायगा और तब अन्ततः सब कुछ नष्ट हो जायगा ', ' पहले वेद के चार विभाग थे, तब उसमें एक लाख मन्त्र थे । फिर यह पूरा वेद दश गुणित हो गया, जिसमें कि सब कामनाओं की पूर्ति करने वाले यज्ञों का विधान था । वायुपुराण में मनु के द्वारा किये गये वेद विभाग का भी वर्णन मिलता है-- ' ऐसा कहने पर तथास्तु कहते हुए मनु ने लोक के कल्याण के लिये चार पाद वाले वेद को चार विभागों में बांट दिया ' । वही व्यासकृत भाग भी वर्णित है - ' उस कृत युग में शत्रुओं के लिये तापकारी पराशर के पुत्र व्यास द्वैपायन के नाम से प्रख्यात हुए । ये विष्णु के अंश से प्रादुर्भूत हुए थे । इन्होंने ब्रह्मा के कहने पर यहाँ वेदों का विभाग किया और अपने चार शिष्यों को इन व्यस्त वेदों को पढाया । इनके नाम जैमिनि, सुमन्तु, वैशम्पायन थे । इनमें चतुर्थ नाम पैन है, जिन्होंने कि ऋग्वेद को सुना । इनके पंचम शिष्य लोमहर्षण थे । इन शिष्यों को उन्होंने विधिवत् वेद और पुराण पढायें । वायुपुराण में यहीं पर वेद की शाखाओं का विस्तार से वर्णन है । यहीं शाकल्य का भी वर्णन है -----' में पहला शाकल्य था और दूसरा रथन्तर था । इस शाकल्य का जनक की सभा में याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ होता है और शाकल्य याज्ञवल्क्य के शाप से नष्ट हो जाते हैं । वायुपुराण में यह बात भी इस तरह से वर्णित है - ' शाकल्य में याज्ञवल्क्य के प्रभाव को नहीं जाना, फलतः उनकी तत्काल मृत्यु हो गई । शाकल्य की मृत्यु के बाद -- ' सुमेरु पर्वत के शिखर पर इकट्ठा होकर उन्होंने इस तरह

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 879 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः ८४७ नोऽत्र सप्तरात्रेण नागच्छेद् द्विजसत्तमाः । स कुर्याद् ब्रह्मवध्यां वै समयो नः प्रकीर्तितः || १३ || ( अ ० ६१ ) वैशम्पा यनस्तत्रानागमनाद् ब्रह्मवध्यादोषमवाप्तवान् । तत्प्रायश्चित्ताय तेन शिष्या आशप्ताः । याज्ञवल्क्य उक्तवान् - ' अहमेव चरिष्यामि तिष्ठन्तु मुनयस्त्विमे || १७ || ( अ ० ६१ ) | गुरुः क्रुद्धस्तमुवाच --- ' यत्त्वया मत्तोऽधीतं ' सर्व प्रत्यर्पयस्व में || १८ || ( अ ० ६० ) ' एवमुक्तः स रूक्षाणि यजूंषि प्रददौ गुरोः || १ ९ || ( ६१ ) • ततः स ध्यानमास्थाय सूर्यमाराधयद् द्विजाः | सूर्ये ब्रह्म यदुच्छिन्नं खं गरदा प्रतितिष्ठति ॥ ( २० ) ततो यानि गतान्पूर्वं यजूंष्यादित्यमण्डलम् । तानि तस्मै ददौ तुष्टः सूर्यो वै ब्रह्मराये | अरूपाय मार्तण्डो याज्ञवल्क्याय धीमते || २१ || ( अ ० ६१ ) । तत एव तदध्येतारो वाजिनो वाजसनेयिनो वा जाताः । ' यजूंष्यधीयते यानि ब्राह्मणा येन केन च । अश्वरूपाय दत्तानि ततस्ते वाजिनोऽ-चीर्णं ते वरका:...... • " इत्येते वाजिनः प्रोक्ता

भवन् ॥२२ ॥ ( अ ० ६१ ) । यैर्ब्रह्महत्याव्रतं दशपञ्च च संस्मृताः ॥२६ ॥

तत्रैव जैमिनिशिष्याननध्यायेष्वधीयावान् शतक्रतुर्जघानेत्यप्युक्तम् । ' अनध्यायेष्वधीयानान् ताञ्जघान शतक्रतुः || २ ९ || ( अ ० ६१ ) | राणाघनीयकौथुमादिशाखानां प्रचार उक्तः । एवं बहुधा शाखा भेदानुक्त्वा ' सर्वमन्वन्तरेष्वेवं शाखाभेदाः समाः स्मृताः ॥ ( ७४ ) ( अ ० ६१ ) इति । तत्र पूर्वोक्तरीत्या शाखानामुत्पत्तिनाशादिश्रवणाद् वेदानामनित्यत्वं प्राप्तम्, तदपाकरणायोक्तम्-- ' प्राजा-पत्या श्रुतितित्या तद्विकल्पास्त्विमे स्मृताः । अनित्यभावाद्देवानां मन्त्रोत्पत्तिः पुनः पुनः ॥ ' ( वायुपुराणे ६१।७५ ) । भगवद्दत्तस्तुत्तरार्धं स्वविरुद्धत्वाद् गोपयामास । तत्रानेनेदमुक्तम् ' तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ' ( ऋ ० सं ० १० / ९ ० / ९ ), ' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् ' ( बृ ० उ ० २/४/१० ), ' वाचा विरूपनित्यमा ' ( ऋ ० सं ० से मन्त्रणा की कि सात रात्रि बीत जाने पर भी हम से जो व्यक्ति यहाँ नहीं पहुँचेगा, उसको ब्रह्महत्या का पाप लगेगा ' । नियत अवधि में वैशम्पायन वहाँ नहीं आ पाये, फलतः उनको ब्रह्महत्या का दोष लगा । इसका प्रायश्चित करने के लिये उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, तो याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- ' मैं अकेला ही प्रायश्चित कर लूँगा, इन सब मुनियों को कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है । इस पर गुरु क्रुद्ध होकर उससे कहा कि जो कुछ तुमने मुझसे पढ़ा है, उसे तुम मुझे वापस कर दो । गुरु के ऐसा कहने पर याज्ञ-वल्क्य ने अपने गुरु को जो कुछ उनसे पढ़ा था, वापस कर दिया । ऐसा करने के उपरान्त याज्ञवल्क्य में ध्यान लगाकर, चित्त को एकाग्र कर सूर्य की आराधना की । इस संसार में वेद का जो भाग उच्छित हो जाता है, वह सूर्यमण्डल में जाकर ठहर जाता है । याज्ञवल्क्य के द्वारा सूर्य की आराधना करने पर, जो यजुर्मंन्त्र आदित्यमण्डल में जाकर स्थिर हो गये थे, उनको सूर्य ने संतुष्ट होकर याज्ञवल्क्य को सौंप दिया । ब्रह्मराति याज्ञवल्क्य उस समय अश्व का रूप धारण किये हुए ये । उसी अवस्था में मार्तण्ड सूर्य ने यह वैद उनको सौंपा । इस लिये इस वेद के अध्येतागण वाजिन् अथवा वाजसनेयिन कहलाते हैं । जो ब्राह्मण जिस किसी से भी इन यजुर्मन्त्रों का अध्ययन करते हैं. वे बाजिन् नाम से अभिहित होते हैं, क्योंकि सूर्य ने अश्व रूप को धारण किये याज्ञवल्क्य को इनका प्रथम उपदेश किया था । जिन्होंने ब्रह्महत्या का प्रायश्चित किया, वे चरक कहे जाते हैं । सूर्यप्रदत्त यजुर्मन्त्रों का अध्ययन करने वाले वाजिन् १५ प्रकार के कहे जाते हैं । वायुपुराण में ही यह भी बताया गया है कि इन्द्र ने अनध्याय के दिनों में अध्ययन करने वाले जैमिनि के शिष्यों का वध कर दिया था । यहीं पर राणायनीय, कौथुम प्रभृति शाखाओं का प्रचार कहां है, यह भी बताया गया है । अन्त में अनेक प्रकार के शाखा - भेदों को बताकर वायुपुराण में कहा गया हैं कि ये शाखा - भेद सभी मन्वन्तरों में एक ही तरह के होते हैं । इस पूरे प्रकरण के सन्दर्भ में पूर्वोक्त रीति से शाखाओं के उत्पत्ति और विनाश का वर्णन होने से वेदों की अनित्यता प्राप्त होती है । इस आपत्ति के परिहार के लिये कहा गया है कि- ' प्राजापत्य श्रुति नित्य है और बाद में इसी श्रुति के अनेक भेदोपभेद हो जाते हैं । देवताओं की स्थिति अनित्य होने से इनसे संबद्ध मन्त्रों की उत्पत्ति बार बार होती रहती है । इस वायुपुराण के श्लोक के उत्तरार्ध को अपने मतलब का न समझ कर भगवदत्त ने उसको उद्धृत नहीं किया । ' उस सर्वहुत यज्ञ से ऋक् और साम की उत्पत्ति हुई ', ' इस महान् भूत ब्रह्म का निःश्वासभूत यह वेद है ', ' अपरिणामी नित्य बाणों से वेद को उत्पत्ति हुई है ', ' अनादि-J १०७

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वैवार्थपारिजात ८७५२६ ), ' अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा । ' ( म ० भा ०, शा ० प ० २३२/२५ ), ' अत एव च नित्यत्वम् ' ( ब्र ० सू ० १1३1२ ९ ) | परमेश्वरे तदीयज्ञाने श्रुतिर्मन्त्रब्राह्मणलक्षणाऽनन्ता स्थिता, ' अनन्ता वै वेदाः ' ( तै ० ना ० ३ । १०।११।४ ) इति श्रुतेः । तत एव ब्रह्मणा प्रजापतिना प्राप्ता तहृदये स्थिता प्राजापत्या श्रुतिः । सापि नित्या, मन्वन्तरीयस्यायिनित्यापेक्षया ब्रह्मणः कल्पान्तस्थायित्वात् । ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ' ( ० ६ १८ ) । ततोऽग्निवाय्वादित्यादिक्रमेण ऋगादयो व्यक्ताः । ततो मनुव्यासादिभिः शाखाभेदेन भिन्नाः । तत्र लोके शाखालोपदर्शनाद् वेदानामनित्यत्वशङ्का सम्भवति । तत्पूर्वमेकधा समाहितम् -- सूर्ये ब्रह्म यदुच्छिन्नं खं गत्वा प्रतितिष्ठति । ' उच्छिन्नं ब्रह्म ( वेदः ) खं गत्वाऽऽदित्ये प्रतितिष्ठति । ततो यान्यध्वं गतानि यजूंषि तान्येव सूर्यो देव-रात ददौ । अपरं समाधानमिदं यल्लोके प्रचलितशाखानामुच्छेदेऽपि प्राजापत्या प्रजापती विद्यमानाऽनन्ता श्रुति-राकल्पान्तं स्थिता । प्रजापती शुद्धे परमात्मनि स्थिता श्रुतिनिरतिशयनित्यैव । तथा च तेषु तेषु कल्पेषु मन्वन्तरेषु ब्रह्मणा मनुष्यासादिभिः सैव नित्या श्रुतिविकल्प्यते । शाखाभेदेन भिद्यते । तत: शाखाभेदास्तद्विकल्पास्तद्भेदा एव । द्रष्टार एव ऋषयो भवन्ति । उच्चारणे स्वातन्त्र्यात् तेषां कर्तृत्वं व्यवह्रियते । ते प्रथमोच्चारयितारो न भवन्ति, पूर्वोच्चारण-सापेक्षत्वात् । तत एव ते द्रष्टृत्वाद् ऋषय उच्यन्ते । पूर्वानुपूर्वीसव्यपेक्षोच्चारयितृत्वेन वस्तुतस्ते द्रष्टार एव न कर्ता | उच्चारयितृभेदेन ध्वनिभेदादानुपूर्वीणां भेदेऽपि सर्वासामानुपूर्वीणामीश्वरमारभ्यास्मदादिपर्यन्तोच्चरिताना-मैकरूप्यादानुपूर्व्या ऐक्यान्नियतत्वेन परमेश्वरे सदैव स्थितत्वेन नित्यता च । यत्तु -- ' महाभाष्ये ' तेन प्रोक्तम् ' ( पा ० सू ० ४।३।१०१ ) इत्यत्र ' महि न्छन्दांसि क्रियन्ते । नित्यानि च्छन्दांसीति । यद्यप्यर्थो नित्यो या त्वसौ वर्णानुपूर्वी साऽनित्या । तद्भेदाच्चैतद्भवति काठकं कालापकं मोदकं पैप्पलादक-free यह नित्य वाणी स्वयम्भू ब्रह्मा से उत्पन्न हुई ', ' इसी लिये वह नित्य है ' ये सब उक्त बात के ही समर्थक प्रमाण हैं । परमेश्वर के ज्ञान में मन्त्र ब्राह्मणात्मक अनन्त श्रुतियां विद्यमान है, ' अनन्ता वै वेदा: ' यह श्रुति इस नाव में प्रमाण हैं । इसी लिये उक्त वायुक पुराण के वचन का अभिप्राय यह है कि ' ब्रह्मा अर्थात् प्रजापति के द्वारा उसके हृदय में प्राप्त आविर्भूत श्रुति नित्य है, क्योंकि एक मन्वन्तर पर्यन्त रहने वाले नित्य पदार्थ की अपेक्षा से ब्रह्मा कल्पान्त तक रहता है, अतः अधिक स्थायी अर्थात् नित्य है । ' जो पहले ब्रह्मा को बनाता है और उसमें वेदों का संचार करता है यह श्वेताश्वतर श्रुति इसमें प्रमाण है । इसके बाद अग्नि, वायु, आदित्य आदि के क्रम से ऋगादि की अभिव्यक्ति होती है । तब इनका शाखा विभाग मनु, व्यास प्रभृति ने किया । इन शाखाओं का लोप हो जाता है, यह बात लोक में प्रसिद्ध है, अतः वेदों के अनित्यता की शंका का उठना स्वाभाविक है । इसका एक समाधान यह दिया जा चुका है कि ब्रह्म अर्थात् वेद का जो भाग यहां नष्ट हो जाता है, वह जाकर सूर्यमण्डल में अवस्थित हो जाता है । इसलिये इस तरह के यजुर्मंन्त्र जो सूर्यमण्डल में जाकर एकत्र हो गये थे, उन्हीं को सूर्य ने देवराति याज्ञवल्क्य को दिया था । इसका दूसरा समाधान यह है कि लोक में प्रचलित शाखाओं के उच्छित हो जाने पर प्रजापति के हृदय में आविर्भूत अनन्त श्रुतियां कल्पपर्यन्त अवस्थित रहती हैं और शुद्ध परमात्मा में स्थित श्रुति तो निरतिशय नित्य है । अतः इस पूरे प्रकरण का यह निष्कर्ष निकलता है कि arar ae पों में और मन्त्रन्तरों में ब्रह्मा और मनु - व्यास प्रभूति उसी नित्य श्रुति का विस्तार करते हैं । शाखा भेद करते हैं । इस तरह से शाखा भेद और विकल्प उसी नित्य वेद के भेद हैं । ऋषि इनके द्रष्टा मात्र होते हैं । उच्चारण की स्वतन्त्रता के आधार पर वे इनके कर्ता माने जाते हैं । वे इनके प्रथम उच्चारयिता नहीं होते, क्योंकि उनका उच्चारण भी पूर्व उच्चारण की अपेक्षा रखता है । इसी लिये rathavar ' ऋषि ' कहलाते हैं । पूर्व आनुपूर्वी की सहायता से ही वे वेदों को प्रथम उच्चारण करते हैं, अतः वस्तुतः ये उनके द्रष्टा ही कहे जाते हैं, कर्ता नहीं । उच्चारयिता के भेद के साथ ध्वनि का भेद यद्यपि लगा हुआ है, अतः आनुपूर्वी का भी भेद यद्यपि वहीं रहेगा, तथापि ईश्वर से लेकर अस्मदादि पर्यन्त उच्चारित यह आनुपूर्वी एक सी ही है, इसी आधार पर इसकी एकता मानी जाती है । और यह परमेश्वर में सदा विद्यमान रहती है, अतः यह नित्य मानी जाती है । ' तेन प्रोक्तम् ' इस पाणिनि सूत्र के भाष्य में पतंजलि ने कहा है कि ' छन्द कृत नहीं है, छन्द नित्य हैं । यद्यपि अर्थ नित्य हैं, पर वर्णानुपूर्वी अनित्य है । उसी अनित्य वर्णानुपूर्वी के भेद से काठक, कालापक, मोदक, पैप्पलादक आदि भेद हो गये हैं ।