वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 881–890
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 881–890
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वेदार्थपारिजातः ६५१ मिति ' अत्र वर्णानुपूर्व्या अनित्यत्वकथनं शाखानां पाठान्तराभिप्रायेणैव, अर्थस्य नित्यत्वकथनेन पाठान्तराज्येक मूलपर्यव-सामीनि व्याख्यानान्येव ' ( पृ ० ७४ ) इति, तदसङ्गतम्, तथात्वे ' नित्यानि च्छन्दांसि यद्यप्यर्थो नित्यः ' इत्यनयोरसङ्ग-त्यापत्तेः । छन्दोऽर्थं तेन प्रोक्तम् ' इदं सूत्रं भवतु । ' कृते ग्रन्थे ' इत्यनेन न तत्र प्रत्ययो भवति, छन्दसोऽकृतत्वाद् इत्युक्तौ छन्दसामेव नित्यत्वं साधितं भाष्यकारेण आनुपूर्व्या अनित्यत्वसाधनेन, नाच्छन्दसाम् | अन्यथा कर्णस्पर्श कटिचालन-प्रसङ्गापातात् । तेन न काठकादिशाखानां छन्दोभिन्नत्वं वक्तुं शक्यम् । किञ्च छन्दःपदेन शाकलो - शौनकी - कौथुमी माध्यन्दिनी - संहिता गृह्यन्ते न वा? न चेत्तद्वेदत्वस्य दत्त-जलाञ्जलिता स्यात् । गृह्यन्ते चेत्तत्र प्रत्ययार्थं तेन प्रोक्तमिति सूत्रं भवत्विति कुतस्तत्प्रत्याख्यानावसरः? यतस्तासां नित्यत्वात् ' कृते ग्रन्थे ' इति सूत्रेण न निर्वाहः । तथा च महाभाष्यमसङ्गतमेव स्यात् । तस्मादिदं मन्तव्यं काठकादिकं शक्यादिशाखानामप्युपलक्षणम्, न्यायस्य तुल्यत्वात् । तेषामप्यानुपूर्वीणामनित्यत्वस्येष्टत्वात् । नहि नित्यानां विभूनां च वर्णानामानुपूर्वी संभवति, तस्याः परिच्छिन्ना नित्यधर्मत्वात् । तस्माद् वर्णाभिव्यक्तीनामेव पौर्वापर्य रूपानुपूर्वी मन्तव्या । अत एवाचायच्चारितानुपूर्व्या भिन्नैव माणवकोच्चारितानुपूर्वी, शिक्षकमात्रविक्षेपाद भिन्न-astrafa क्षेपवत् । ऐक्यरूप्याच्च तासां नियतत्वरूपं नित्यत्वमितीहैवान्यत्र च विस्तराः । ' ages न्याहुः । होता यो विश्ववेदस इति ' ( श ० ११४/३/३५ ) इत्यादीनामपि निन्दार्थवादत्वेन स्व-शाखास्तुतावेव तात्पर्यम् । ' होता यो विश्ववेदसः ' ( पृ ० ७४ ) इत्यस्य पाठस्य कस्याञ्चिदपि शाखाणामनुपलम्भाच्च! शाखान्तरीयैस्तत्पाठस्यापि तथैवानादरणीयत्वोक्त श्वेत्यस्यापीहैवान्यत्र विस्तरा । भगवद्दत इस पर अपना निष्कर्ष इस तरह से व्यक्त करते हैं - ' इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि वर्णानुपूर्वी के अनित्य कहने से पतंजलि का अभिप्राय शाखाओं के पाठान्तरों से ही हैं । परन्तु क्योंकि यह अर्थ को नित्य मानता है, अतः पाठान्तर एक ही मूल अर्थ को कहने वाले व्याख्यान हैं ' ( पू ० ७४ ), यह बात भी असंगत है, क्योंकि ऐसा कहने पर ' छन्द नित्य हैं, यद्यपि अर्थ नित्य है ' इन दोनों वाक्यों की परस्पर संगति नहीं बैठेगी । वेदों के लिये ' लेन प्रोक्तम् ' इस सूत्र का विधान नाना जाय, ' कृते ग्रन्थे ' इस सूत्र से वहां प्रत्यय नहीं होगा, क्योंकि वेद अकृत है, ऐसा कह कर आपके मत के अनुसार भाष्यकार ने आनुपूर्व की अनित्यता को सिद्ध करके एक तरह से वेद की हो निरयता को सिद्ध किया, वेद भिन्न साहित्य की नित्यता को नहीं । यह कार्य कान पकड़ने पर कमर मटकाने के समान है । इसलिये काठकादि शाखाओं की वेदभिनता नहीं सिद्ध की जा सकती । आप यह बताइये कि छन्दः पद से शाकली, शौनकी, कौथुमी और माध्यन्दिनी संहिताओं का बोध होता है या नहीं? यदि नहीं तो इनको वेद मानने की बात को तिलांजलि दे देनी पड़ेगी । यदि वेदों में इनकी गणना होती है, इनमें प्रत्यय का विधान करने के लिये ' तेन प्रोक्तम् ' इस सूत्र की आवश्यकता रहेगी, तब उसका प्रत्याख्यान कैसे किया जा सकता है, क्योंकि ये नित्य है, अतः ' कृते ग्रन्थे ' इस सूत्र से वहीं प्रत्यय नहीं हो सकता । इस तरह से महाभाष्य में असंगति मा जायगी । इसलिये यहाँ पर यह समझना चाहिये कि काठकादि पद शौनकी आदि शाखाओं के भी उपलक्षक हैं, क्योंकि इन सबकी स्थिति एक ही तरह की है । इन सबकी मनु-पूर्वी सदा अनित्य ही मानी जाती है । नित्य और विभु वर्णों की कोई आनुपूर्वी नहीं हो सकती, क्योंकि आनुपूर्वी परिच्छिन्न और अनित्य वस्तु का धर्म है । इसलिये वर्णों की अभिव्यक्ति में ही पौर्वापर्य रूप आनुपूर्वी मानी जाती है । इसी लिये आचार्य के द्वारा उच्चारित आनुपूर्वी से भिन्न ही आनुपूर्वी माणवक अर्थात् शिष्य के उच्चारण में रहती है, जैसे कि नृत्य शिक्षक के अंगचालन से भिन्न ही अंगचालन नर्तकी का होता है । इनकी समानता के आधार पर इनमें नियतता रूप नित्यत्व माना जाता है, इस बात को इसी ग्रन्थ में अन्यत्र विस्तार से समझाया गया है । भगवद्दत्त ने ' दु हैकेन्वाहु: ' इत्यादि शतपथ श्रुति को उद्धृत कर अपने मन्तव्य को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है ( पृ ० ७४ ) । वस्तुतः यह निन्दार्थवाद है, इसका विनियोग अपनी शाखा की स्तुति में होता है । ' होता यो विश्ववेदसः यह पाठ किसी अन्य शाखा में उपलब्ध नहीं होता और यह पाठ शाखान्तर के अनुवतियों के लिये स्वीकार्य नहीं हो सकता, इस बात को भी हमने इसी ग्रन्थ में अन्यत्र स्पष्ट किया है ।
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८५२ वार्थपारिजातः यदपि ' तत्र नाट्यशास्त्रशब्देन चेदिह ग्रन्थस्तद्ग्रन्थस्येदानीं करणं न तु प्रवचनम् । तद्धि व्याख्यानरूपं करणाद्भिन्नम् | कठेन प्रोक्तमिति यथा ( पृ ० ७५ ) इति भरतनाट्यशास्त्रभाष्यकर्तुः प्रसिद्धस्य आचार्याभिनवगुप्तस्य वचनम्, तदपि त्वत्प्रतिकूलमेव, प्रवचनस्य करणाद्वित्वे काठकस्य चाकृतत्वान्न ' कृते ग्रन्थे ' इत्यनेन निर्वाहः । तथा च तेन प्रोक्तमित्यस्य प्रत्याख्यानमसङ्गतमेव स्यात् । तस्मादत्र वाक्येऽव्यापनापरपर्याय प्रवचनरूपमेव व्याख्यानमेष्टव्यम्, तस्यैव करणाद्भिन्नत्वसम्भवात् । अत एव ' आख्या प्रवचनात् ' इति जैमिनिसूत्रानुसार्येवाभिनवगुप्तवचनम् । कठेन प्रोक्त काठकमिति कठप्रवक्तृकत्वेन काठकमिति समास्योपपत्ती कठेन कृतं काठकमिति समाख्यामूलकपौरुषेयत्वस्य जैमिनिना निराकरणात् । ' सचिविदम् ' ( ऋ ० सं ० १०/७११६ ), ' सखिविदं सखायम् ' ( तै ० आ ० १।३।१ तथा २।१५।१ ) इत्यादीनां समाधानमुक्तमिति तत्रैव कणेहत्यालोचनीयम् यत्तु ' वैदिक वाङ्मय का इतिहास ' इति ग्रन्थस्य प्रथमे भागे सप्तमेऽध्याये पुराणवचनाश्रयेण बहु जल्पितम्, तत्सर्वपार्थमेव । तेन पुराणानां प्रामाण्यानभ्युपगमात् । स्वेच्छ्या पाठभेदकल्पनाच्च । महाभाष्यकारस्तु ' शाकल्यसंहितामनु प्रावर्षत् शाकल्येन सुकृतां संहितामनुनिशम्य देवः प्रावर्षत् ( पा ० सू ० ११४१८४ ) इत्यत्र शाकल्येन संहिता प्रोक्ता इत्येवार्थं कृतवान्, न तु शाकल्येन कृतेति नित्यत्वात् । भगवद्दत्तेन- ' वैदिक वाङ्मय का इतिहास ' नामके ग्रन्थे यत्किञ्चिदपि लिखितम्, ये ग्रन्था यानि च वचनानि समुद्धृतानि प्रायेण सर्वाणि सनातनिनां ग्रन्थाः ग्रन्थस्थवचनानि च । सनातनिग्रन्थानामभावे पेटिकापरिमिता अपि ग्रस्थान स्थास्यन्ति । मन्त्राणां ब्राह्मणानामारण्यकोपनिषदामपि समेषां प्रामाण्यं तेनान्यैश्च सामाजिकेर्नाभ्युपेयते । ' यदि नाट्यशास्त्र शब्द से यहाँ ग्रन्थ का ग्रहण है, तो उसका कर्तृत्व अभिप्रेत है, प्रवचन नहीं । प्रवचन व्याख्यान होता है और करण पृथक होता है, जैसे कठ का व्याख्यान है ' ( पु ० ७५ ) भगवदत्त भरत नाट्यशास्त्र के प्रसिद्ध भाष्यकार अभिनव गुप्त की इस उक्ति को अपने पक्ष के समर्थन में उद्धृत करते हैं, किन्तु इससे उनके पक्ष का समर्थन नहीं हो पाता, क्योंकि प्रवचन यदि करण भिन्न और काठकादि शाखाएँ कृत नहीं है, तब वहाँ पर ' कृते ग्रन्थे ' इस सूत्र से प्रत्यय नहीं हो सकेगा । इस परिस्थिति में ' तेन प्रोक्तम् ' इस सूत्र का भाष्यकार द्वारा किया गया प्रत्याख्यान असंगत हो जायगा | इसलिये इस वाक्य में अध्यापन, प्रवचन और व्याख्यान एक ही अर्थ में प्रयुक्त माने जाने चाहिये, क्योंकि यह अध्यापनरूप व्याख्यान या प्रवचन ही करण से भिन्न हो सकता है । इसलिये यहाँ का अभिनव गुप्त का वचन ' आख्या प्रवचनात् ' इस जैमिनि सूत्र का अनुवर्तन करने वाला है । कठ ने जिसका प्रवचन किया, वह aron कहलाती है, इस तरह से इस नाम की व्युत्पत्ति जब हो सकती है, तो कठ ने जिसको बनाया वह काठक है, इस नाम के आधार पर इन शाखाओं की पीरुषेयता का निराकरण जैमिनि ने किया है । ' सचिविदम् ', ' सखिविदं सखायम् ' इत्यादि उद्धरणों के आधार पर भगवद्दत ने ( १०७५ ) जिन शंकाओं को उठाया है, उनका समाधान हम कर चुके हैं । मनोयोगपूर्वक उनका अवलोकन वहीं करना चाहिये । ' वैदिक वाङ्मय का इतिहास ' इस ग्रन्थ के प्रथम भाग के सप्तम अध्याय में ( पू ० ७७ से ) पुराणों के वचनों के सहारे बहुत कुछ कहा है । वह सब व्यर्थ है, क्योंकि एक तो वे पुराणों को प्रमाण नहीं मानते, दूसरे वे उनका मनमाना पाठभेद गढ़ लेते हैं । भगवदत्त ने ( पृ ० ९ १ ) महाभाष्यकार के इस वचन को अपने मत के प्रमाण में उद्धृत किया है कि- शाकल्य ' के द्वारा प्रकार की गई संहिता के पाठ की समाप्ति के बाद बादल बरसा ' । वस्तुतः भाष्यकार ने यहाँ पर शाकल्य ने संहिता का प्रवचन किया, यही अर्थ किया है, शाकल्य ने संहिता को बनाया, यह नहीं, क्योंकि संहिता तो नित्य है । भगवद्दत्त ने ' वैदिक वाङ्मय का इतिहास ' नामक ग्रन्थ में जो कुछ लिखा है, जिन ग्रन्थों के जिन वचनों को उद्धृत किया है, प्रायः वे सब सनातनियों के मान्य ग्रन्थ हैं या उनके वचन हैं । सनातनियों के इन ग्रन्थों के अभाव में एक आलमारी में रखने लायक ग्रन्थ भी उनके पास नहीं रहेंगे । सभी संहिताओं, ब्राह्मणों और आरण्यक उपनिषदों का वे तथा अन्य आर्यसमाजी प्रामाण्य
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वेदार्थपारिजातः प्रायो येषां पुराणानामवहेलनैव क्रियते, ताभ्येवाश्रित्य ग्रन्थेऽस्मिन्ननेकानि पृष्ठानि रञ्जितानि । शाखानामृषीणां संबन्धे सामाजिका मूलग्रन्था न सन्त्येव । ' ऋषयः ', ' ऋषिका: ', ' ऋषिपुत्राः ', ' महर्षयः ' ( पृ ० २४६ ) आदिभेदा वायुपुराणादिभ्य एव ज्ञातव्याः । भगवदत्तेन विकृति नीत्वैव ते प्रकाशिताः । दयानन्दप्रभृतयः सर्वेऽपि सामाजिकाः प्रकृतिप्रत्ययनैरपेक्ष्येण स्वरितयैव वाक्यानि व्याचक्षते । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति ( म्या ० भा ० ४।१।६२ ) । वेदार्थी ब्राह्मणग्रन्थेषु लभ्यते, अतो वक्तुं शक्यते यद् ऋषयो वेदार्थरूपस्य ब्राह्मणस्य द्रष्टारा | सर्वश्रेषो-sa वचनानुगत एव । ' थ एवाप्ता वेदार्थानां द्रष्टारः प्रवक्तारश्च त एवायुर्वेदप्रभृतीनामिति ' ( न्या ० सू ० २।२।६७ ) । नोभयोरुपर्युयोर्वाक्ययोरैकाथ्यं ज्ञातव्यम्, यतो हि पूर्वस्मिन् वाक्ये मन्त्रब्राह्मणयोर्द्रष्टृत्वं येषामृषीणां तेषामेवेतिहास -पुराणस्य द्रष्टृत्वं प्रवक्तृत्वं चोक्तमुत्तरस्मिस्तु वेदार्थद्रष्टृणामायुर्वेदादिप्रवक्तृत्वमुक्तम् । मन्त्रार्थज्ञत्वमृषीणामुक्तमेव । पाश्चात्यरीत्यैव भगवद्दत्तोऽपि भारतीय ग्रन्थगतपुरुषादीनां नामानि दृष्ट्वा भारतीयग्रन्थानां कालं निर्धारयति, परन्तु मन्त्रब्राह्मणादीनां सम्बन्धे तदसंगतमेव, तेषां नित्यत्वेनार्थपूर्वकत्वाभावात् । गोत्रकृत ऋषयो देवाश्च मन्त्रब्राह्मणसूत्रेतिहासपुराणादिभ्यो ज्ञायन्ते । सिद्धान्ते खेते जातिविशेषा अभ्युपेयते । सामाजिकास्तु देवानपि मनुष्यानेव मन्यन्ते, कर्मणैव वर्णव्यवस्थामङ्गीकुर्वन्ति, केषाञ्चिदपि ब्राह्मणत्वमृषित्वं चाङ्गी-कुर्वन्ति । चतुर्दशेऽध्याये भगवद्दत्तः पुराणादीनि प्रशंसति, महाभारताद्याख्यानमप्याश्रयते, परन्तु सर्वथाऽपि स्वैरमाच-नहीं स्वीकार करते । प्रायः जिन पुराणों की वे सदा अवहेलना करते हैं, उन्हीं के सहारे इस ग्रन्थ के अनेक पृष्ठ रंगे गये हैं । शाखाओं और ऋषियों से संबद्ध मूल ग्रन्थ आर्यसमाजियों के यहाँ हैं हो नहीं । ऋषि, ऋषीक, ऋषिपुत्र, महर्षि ( पृ ० २४०-२४१ ) आदि भेदों का ज्ञान वायुपुराण प्रभृति ग्रन्थों से ही हो सकता है । भगत ने इन वचनों को विकृत रूप में उपस्थित किया है । दयानन्द प्रभूति सभी आर्यसमाजी विद्वान् प्रकृति प्रत्यय का बिना विचार किये इन वाक्यों का मनमाना अर्थ करते हैं । न्यायभाष्यकार के इस वचन की ओर उनका ध्यान जाना चाहिये कि जो ऋषिगण मंत्र मोर ब्राह्मण के द्रष्टा है, प्रवक्ता है, वे ही इतिहास - पुराण और धर्मशास्त्र के भी प्रवक्ता है । ब्राह्मण ग्रन्थों में वेद का अर्थ भी उपलब्ध होता है, अतः कहा जा सकता है कि ऋषि लोग वेदार्थरूप ब्राह्मण ग्रन्थों के द्रष्टा हैं । यह व्यर्थ सर्वथा प्रमाणों द्वारा समर्थित भी है । न्यायभाष्यकार कहते हैं कि जो आप्तगण वेदार्थ के द्रष्टा और प्रवक्ता हैं, वे ही आयुर्वेद प्रभूति ग्रन्थों के भी प्रवक्ता हैं । ( १० २५१ ) उक्त दोनों वाक्यों का एक ही अर्थ है, यह न समझ लेना चाहिये, क्योंकि पहले arte में जो ऋषि मन्त्र ब्राह्मण के द्रष्टा है, वे ही ऋषि इतिहास - पुराण के द्रष्टा और प्रवक्ता बताये गये हैं और दूसरे वाक्य में वेदार्थ के द्रष्टा ऋषियों को आयुर्वेद आदि शास्त्रों के प्रवक्ता बताया गया है । ऋषिगण मन्त्रों के अर्थ के ज्ञाता है, यह बात पहले ही बताई जा चुकी है । पाश्चात्य विद्वानों की पद्धति से ही भगवद्दत्त भी भारतीय ग्रन्थों में विद्यमान व्यक्तियों के नामों को देखकर उनके समय का निर्धारण करते हैं, किन्तु मन्त्र ब्राह्मण वादि के संबन्ध में यह बात उचित नहीं मानी जा सकती, क्योंकि वे नित्य हैं, उनमें अर्थपूर्वकता नहीं है, अर्थात् किसी वस्तु को देखकर उनकी रचना नहीं की गई है, किन्तु उन उन वस्तुओं और व्यक्ति आदि का नाम वेदों के आधार पर ही निर्धारित किया गया है । गोत्रों के प्रवर्तक ऋषियों और देवताओं का ज्ञान मन्त्र, ब्राह्मण, सूत्र, इतिहास, पुराण प्रभृति ग्रन्थों से होता है । सिद्धान्ततः ये विशेष जातियाँ मानी जाती हैं । आर्यसमाजी देवताओं को भी मनुष्य जाति का ही मानते है, ये वर्णव्यवस्था का आधार कर्म को मानते हैं । इनके मत से कोई भी ब्राह्मण अथवा ऋषि हो सकता है । चतुर्दश अध्याय ( ० २३ ९ से ) में भगवद्दत पुराणों की तथा महाभारत की प्रशंसा करते हैं, महाभारत के अनेक आख्यानों को प्रमाणरूप में स्वीकार भी करते हैं, परन्तु उनका अर्थ
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८५४ रत्यर्थे । अन्तरिक्षस्थात् ऋषीन कृष्णो ददर्श । तदर्थं तु पर्वतेभ्योऽवतरन्तो दृष्टा इति करोति । यदुक्तम्- ' सर्वदेव ऋषियुगो भवति ' इति, तत्तुच्छम्, ' ऋषिषूत्क्रामत्सु ' इति निरुक्तेन ऋष्युत्क्रमणकालो ज्ञायते । मनुस्मृतिदृष्ट्या ' आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतक्र्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः || ' ( ११५ ) मेघातिथ्यादिरीत्या तस्या महाराच्या अनन्तरं स्वयंभूः स्वेच्छया कृतशरीरपरिग्रहो भगवानव्यक्त इदं सर्वं जगद् व्यञ्जयन् तमोनुदः प्रादुरासीत् । ' ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतादि वृत्तोजाः प्रादुरासीत्तमो -नुदः ॥ ' ( ११६ ) वेदान्तवेद्यः परमात्मैव स इति । ' योऽसावतीन्द्रियोऽग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः । सर्वभूतमयोऽ-चिन्त्यः स एव स्वयमुद्दों ॥ ' ( १७ ) सोऽभिध्याय स्वाच्छरीराद्विविधाः प्रजाः सिसुक्षुरादावपः ससर्ज तासु वीर्य-मवासृजत् - ' सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात्सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादी तासु वीर्यमवासृजत् ॥ ' ( ११८ ) । ततो हैममण्डमभवत्- ' तदण्डमभवद्वैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः || ' ( १ ९ ), ' तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवात्मनो ध्यानात् तदण्डमकरोद् द्विधा || ' ( १1१० ) | ' ताभ्यां स सकलाभ्यां च दिवं भूमि च निर्ममे । मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् || ' ( १ | १३ ) । स च मनस्तत्पूर्व-महङ्कारं तत्पूर्वमपि महान्तं ततोऽपि पूर्वं त्रिगुणमव्यक्तं निर्माय तन्मात्रा इन्द्रियाणि च निर्माय तैः सर्वभूतानि निर्म ( १ ) १५-१६ ) । सर्वाणि भूतानि तेषां नामानि कर्माणि च पृथक् पृथग् वेदशब्देभ्य एव निर्ममे । ' सर्वेषां स तु नामानि कर्माणि च पृथक पृथक । वेदशब्देभ्य एवादी पृथक्संस्थाश्च निर्ममे ॥ ( १/२१ ) । स एव ' कर्मात्मनां च देवानां करने में बड़ी मनमानी करते हैं । कृष्ण ने अन्तरिक्ष में स्थित ऋषियों को देखा, इसका अर्थ वे पर्वत से उतरते हुए ऋषियों को देखा, ऐसा करते हैं । भगवद्दत्त कहते हैं कि --- सामान्यतः तो ऋषिकार्य की समाप्ति कभी भी नहीं होती । तप से योग से, ज्ञान से, वेदाभ्यास से कोई व्यक्ति कभी भी ऋषि बन सकता है ' ( पृ ० २५६-२५७ ) यह कथन सर्वथा अनुचित हैं, ' ऋषिषत्क्रामत्सु ' इस निरुक्त वाक्य से ऋषियों का उत्क्रमण काल ज्ञात हो जाता है, अर्थात् उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि एक ऐसा काल आता है, जब कि ऋषियों की परम्परा समाप्त हो जाती है । मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में सृष्टि - प्रक्रिया इस तरह से वर्णित है - सृष्टि से पहले सब कुछ अन्धकार में निमग्न था, ह क्या है; इसका किसी को ज्ञान नहीं था और न उसका कोई लक्षण ही किया जा सकता था । इसका स्वरूप अप्रतर्य, अविज्ञेय था । ऐसा लगता था मानों सब कुछ चारों तरफ से सुनसान है । मेधातिथि प्रभूति टीकाकारों के अनुसार उस महारात्रि के बाद स्वयम्भू भगवान् ने स्वेच्छया शरीर धारण कर स्वयं अव्यक्तावस्था में रहकर इस सारे जगत् को अभिव्यक्त कर और अन्धकार को नष्ट कर स्वयं उस रूप में प्रकट हुए । ' तब इन्द्रियों से प्रकाशित न होने वाले, स्वयं सारी सृष्टि करने में समर्थ, अपनी इच्छा से शरीर धारण करने वाले और प्रकृति के प्रेरक भगवान् आकाश आदि महाभूतों को प्रकाशित करते हुए प्रकट हुए । यह वेदान्तवेद्य परमात्मा ही थे । ' यह परमात्मा इन्द्रियों से ग्रहण करने के अयोग्य, शरीर रहित, सूक्ष्म रूप, नित्य, सब प्राणियों का आत्मा और चिन्तन करने के aritra है । वही अपने आप प्रकट हुआ । उस परमात्मा ने अनेक प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से ध्यान करके अपने शरीर से पहले जल को उत्पन्न किया और उस जल में शक्तिरूप बीज डाला, तब सुवर्णमय अण्ड की उत्पत्ति हुई । ' वह बीज सूर्य के समान कान्ति बाला सुवर्ण का अंडा हो गया और उसमें सब लोकों के कर्ता ब्रह्मा स्वयं उत्पन्न हुआ । वह भगवान् ब्रह्मा उस अण्डे में एक वर्ष तक रहे, तब अपने ध्यान से उस अंडे के दो टुकड़े कर दिये । उन दोनों टुकड़ों से उस ब्रह्मा ने स्वर्ग और पृथिवी को बनाया और बीच में आकाश, आठों दिशा और जल के स्थिर स्थान, अर्थात् समुद्र को बनाया | फिर ब्रह्मा ने अपने अव्यक्त अंश से संकल्प-freearers ar को और मन की उत्पत्ति के पहले ' मैं ' इस अभिमान से युक्त, काम करने में समर्थ अहंकार को उत्पन्न किया । अहंकार से पूर्व आत्मा के सहायक महत्तत्त्व को और सत्त्व, रज तथा तम इन तीनों गुणों को तथा अन्ततः धीरे धीरे रूप, रस, गन्ध आदि विषयों को ग्रहण करने वाली पाँच इन्द्रियों को उत्पन्न किया । इन सबकी सहायता से ब्रह्मा ने अन्ततः सभी प्राणियों की सृष्टि की । उस परमात्मा ने सभी प्राणियों के अलग - अलग नाम और उनके पृथक - पृथक कार्य वेद के शब्दों के आधार पर हो जानकर बनाये ।
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श्रदार्थपारिजाता सोऽसृजत् प्राणिनां प्रभुः । साध्यानां च गणं सूक्ष्मं यज्ञं चैव सनातनम् ॥ ' ( १।२२ ) इति रीत्या मनुष्याणां देवानां च गणमसृजत्, यज्ञं यज्ञार्थं देवानां गणमसृजत्, ततः साध्यानां गणमसृजत् । एतेन देवा हविर्भुजो मनुष्येभ्यो भिन्ना एवेति विज्ञायते । तत्र मेधातिथिः - काश्चिद्देवता यागादिकर्मणीव स्वरूपत इतिहासे श्रूयन्ते यथेन्द्रो रुद्रो विष्णुरिति । अन्यास याग एव देवतात्वं न स्वरूपतः, यथा -- अक्षा ग्रावाणी रथाङ्गानि । स एव प्रजानां कृतेऽग्निवायुरविभ्यः सनातनं वेदं प्रादुर्भावितवान् । ' अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दुद्दोह यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजुः सामलक्षणम् ॥ ' ( १।२३ ) । सामाजिकास्तु ब्रह्मा अग्निवायुरविभ्यो वेदमधीतवान निति वर्णयन्ति तत्तुच्छम्, ' वेदशब्देभ्य एवादी ' ( १/२१ ) इति श्लोके ततः प्रागेव स्रष्टुर्ब्रह्मणः सकाशान्नामरूपादीनां निर्माणश्रवणात् । तस्यैव ब्रह्मणो मुखबाहूरुपादतो ब्राह्मणादीनामुत्पत्तिरुक्ता । ' लोकानां तु विवृद्धधर्थं मुखबाहूरु-पादतः । ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत् || ( १/३१ ) इति वचनात् । एतावता गुणकर्मादिभिः समाजेनैव ब्राह्मणादयो निर्मीयन्त इत्यपास्तम् । स विराडात्मनो देहं द्विधा कृत्वाऽर्धेन पुरुषोऽर्धन नार्यभवत् । स तस्यां विराज-मसृजत् । स एव मनुः ' द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् । अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ॥ ( १/३२ ) ' तं मां वित्तास्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमा: ' ( १।३३ ) । तदनन्तरं सुदुश्वरं तपस्तप्त्वा प्रजापतीनसृजत् । ' अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । पतीन् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश || मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं ऋतुम् । प्रचेतसं वशिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ॥ ' ( १ ३४-३५ ) । एतेऽमितौजसो महर्षयः सप्तान्यान् मनूनसृजन् भूरितेजसो देवान् देवनिकायान् स्वर्ग ब्रह्मलोकादीनि उसी ब्रह्मा ने कर्मात्मक देवताओं के समूह को, अन्य प्राणियों को तथा सूक्ष्म साध्य गणों को बनाया और उसी ने सनातन ज्योतिष्टोम प्रतियों को उत्पन्न किया । यहाँ पर उद्धृत मनुस्मृति के इस अन्तिम श्लोक से ज्ञात होता है कि ब्रह्मा ने मनुष्यों बोर देवताओं के गणों को उत्पन्न किया । यज्ञ के लिये पहले देवताओं के गण को और बाद में साध्यों के गण को उत्पन्न किया । इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यज्ञ में प्रदत्त हविष्यान्न के भोक्ता देवगण मनुष्यों से भिन्न ही हैं । यहाँ पर मनुस्मृति के व्याख्याकार मेधातिथि का कहना है कि कुछ देवता यागादि कर्मों की ही तरह स्वरूपतः इतिहास - पुराण ग्रन्थों में भी वर्णित है । जैसे कि इन्द्र, रुद्र और विष्णु । कुछ देवता केवल यज्ञों के लिये ही है, स्वरूपतः उनकी कोई स्थिति नहीं हैं । जैसे कि अक्ष, ग्रावा और रथांग | मनुस्मृति की यह सृष्टि प्रक्रिया आगे इस तरह से चलती है- ' उसी ब्रह्मा ने प्रजा के कल्याण के लिये, यज्ञ की सिद्धि के लिये ऋक्, यजु और साम इन सनातन वेदों को अग्नि, पवन और सूर्य से क्रमपूर्वक प्रकट किया । इस श्लोक का कार्यसमाजी यह अर्थ करते हैं कि ब्रह्मा ने अग्नि, पवन और सूर्य से वेद का स्वयं अध्ययन किया । यह बात गलत है, क्योंकि इससे पहले ही ' वेदशब्देभ्य एवादी ' इस श्लोक में स्रष्टा ब्रह्मा वेद के शब्दों के आधार पर जगत् के सभी पदार्थों के नाम - रूप आदि का निर्माण करते है, यह बात कही जा चुकी है । मनुस्मृति में उसी ब्रह्मा के मुख, बाहू, जंघा और पाद से ब्राह्मण आदि वर्णों की उत्पत्ति वर्णित है ---' ब्रह्मा ने लोकों की वृद्धि के लिये मुख, बाहु, जंघा और चरण से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को क्रम से बनाया ' | मनु के इस वचन के प्रमाण से गुण - कर्मादि के आधार पर समाज में ही ब्राह्मणादि वर्णों का अपने आप निर्माण कर लिया जाता है, इस उक्ति का खण्डन हो जाता है । वह ब्रह्मा अपने शरीर को दो भागों में बाँट कर आधे से पुरुष और आधे से नारी बन गया और पुरुष के रूप में उसने विराट् की सृष्टि की । इसी बात को मनु ने इस तरह से कहा है- ' प्रभु ब्रह्मा अपने देह को दो खंडों में विभक्त कर आधे से पुरुष और आधे से स्त्री बन गया और उसने स्त्री में विराट् पुरुष को उत्पन्न किया ' । यहाँ पर मनु कहते है कि हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, उस विराट् पुरुष ने तप करके जिसको उत्पन्न किया, इस सारे जगत् के स्रष्टा के रूप में विद्यमान मैं वह मनु ही हूँ ' । इसके बाद मनु ने कठिन तपस्या करके प्रजापतियों की सृष्टि की । जैसा कि वहीं बताया गया है - ' मैंने प्रजा को उत्पन्न करने की इच्छा से बड़ा कठिन तप करके पहले प्रजापति नामके दस महर्षियों को उत्पन्न किया । इनके नाम ये हैं- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद ' । इन अत्यन्त तेजस्वी महर्षियों ने अन्य सात मनुओं की,
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II वेदार्थपारिजातः स्थानानि महर्षीश्चासृजन् । ' एते मनूंस्तु सप्तान्यानसृजन् भूरितेजसः । देवान् देवनिकायांश्च महर्षीश्चामितौजसः ॥ ' ( १।३६ ) । एतावता मनुष्येभ्यो विशिष्टा देवा ऋषयश्च । ' यक्षरक्षः पिशाचांश्च गन्धर्वाप्सरसोऽसुरान् । नागान् सर्पान् सुपर्णाश्च पितॄणां च पृथग्गणान् ॥ ' ( ११३७ ) | यक्षरक्षः पिशाचा गन्धर्वाप्सरसोऽसुरा नागाः सुपर्णाः पितृगणा अपि मनुष्यभिक्षा एव । यक्षादीनां स्वरूपभेदश्चेतिहासप्रमाणक एव । यक्षा वैश्रवणानुचराः, रक्षांसि विभीषणादयः, एतेभ्योऽपि क्रूस्तराः पिशाचाः । हिंस्रास्तु सर्व एव । छद्मना केचित्प्राणिनां जीवमाकर्षन्त्यदृष्ट्या शक्त्या व्याधींश्च जनयन्तीत्यैतिहासिका मन्त्रवादिनश्चेति मेधातिथिः । गन्धर्वा देवानुचरा गीतनृत्तप्रधानाः । अप्सरसो देवगणका उ drere: | असुरा देवशत्रवोवृत्रविरोचनहिरण्याक्षप्रभृतयः । नागा वासुकितक्षकादयः । सर्पाः प्रसिद्धाः । सुपर्णा गरुत्मत्प्रभृतयः पक्षिविशेषाः । पितरः सोमपाज्यपादिनामान: । स्वस्थाने देववद्वर्तन्ते, ' देवतातिथिभृत्यानां पितॄणामात्म-नश्च यः । न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्वसन्न स जीवति || ' ( म ० ३।७२ ) इत्यत्र देवतापित्रादीनां दानमानादिक-मुक्तम् । तेषामर्चनप्रकारोऽप्युक्तः । ' स्वाध्यायेनार्चयेतर्षीन् होमैर्देवान् यथाविधि । पितृन् श्राद्धैश्च नृनन्तैर्भूतानि बलिकर्मणा || ' ( ०३३८१ ) अत्र नृभ्यो भिन्नानामृषिदेवादीनां स्वाध्यायहोमादिभिरर्चनमुक्तम् । नहि मनुष्याणां होमेन प्रयोजनम् । अत्र जीवन्तः पित्रादय एव न पितरः तेषां तर्पणार्थं ब्राह्मणादीनां तर्पणविधानात् । ' एकमप्या-शयेद्विप्रं पित्रर्थे पञ्चयाज्ञिके । न चैवानाशयेत् कञ्चिद् वैश्वदेवं प्रति द्विजम् ॥ ' ( म ० ३१८३ ) | ' तस्माच्च देवा बहुधा संप्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्राणापानी व्रीहियवी तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च || ” ( मुण्डक ० २११७ ) अत्र देवा मनुष्येभ्यः पृथगेवोत्पन्नाः । नहि कश्चिद्विद्वानेवोत्पद्यते, विद्वत्वस्य तद्भवीयप्रयत्नसाध्यत्वात् । साध्याश्च देवविशेषाः । देवनिकायों की, स्वर्ग - ब्रह्मलोक प्रभूति स्थानों की और महर्षियों की सृष्टि की, जैसा कि मनुस्मृति में कहा गया है- ' इन महातेजस्वी महर्षियों ने अन्य सात मनुओं को, देवताओं तथा देवताओं के रहते योग्य स्थानों को और बड़े तेजस्वी महर्षियों को उत्पन्न किया ' । इस वचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि देवता और ऋषिगण मनुष्यों की अपेक्षा विशिष्ट जाति के प्राणी हैं । इन प्रजापतियों ने यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, नाग, सर्प, सुपर्ण तथा पितरों के गणों को अलग अलग उत्पन्न किया | इस श्लोक से यह भी स्पष्ट होता है कि यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, नाग, सुपर्ण और पितृगण भी मनुष्यों से भिन्न हैं । यक्ष प्रभृति का भिन्न - भिन्न स्वरूप इतिहास - पुराण प्रभृति ग्रन्थों से ज्ञात होता है । यक्ष कुबेर के अनुचर हैं । विभीषण प्रभृति राक्षस कहे जाते हैं । पिशाच इन दोनों से अधिक क्रूर होते हैं । ये सभी हिंसक प्राणी हैं । यहाँ पर मेधातिथि का कहना है कि इनमें से कुछ धोखे से प्राणियों को मार डालते हैं और अपनी अदृष्ट शक्तियों की सहायता से रोग - पीड़ा आदि पैदा कर देते हैं । इस विषय में इतिहासविद् और मन्त्रवादी तान्त्रिकगण प्रमाण हैं । गन्धर्व देवताओं के अनुचर हैं । इनका प्रधान कार्य गीत, नृत्य आदि है । उर्वशी प्रभूति देवताओं की गणिकाएँ अप्सरा कहलाती है । देवताओं के शत्रु वृत्र, विरोचन, हिरण्याक्ष प्रभृति असुर कहे जाते हैं । वासुकि, तक्षक प्रभृति नाग हैं । सर्वलोक में ये आज भी प्रसिद्ध हैं । सुपर्ण गरुड प्रभृति पक्षी कहे जाते हैं । सोमपा, आज्यपा प्रभूति पितृगण इतिहास - पुराणों में प्रसिद्ध हैं । ये पितृलोक में देवताओं के समान रहते हैं । ' जो व्यक्ति देवता, अतिथि, सेवक, पितर और आत्मा इन पाँचों को अन्न नहीं देता, वह स्वास लेता हुआ भी नहीं जीता है, अर्थात् यह मरे के समान है ' इस मनुस्मृति के श्लोक में देवता पितर प्रभूति के दान और मान ( सरकार ) की बात कही गई है । एक अन्य श्लोक में उनकी पूजा की विधि भी बताई गई है - ' वेदपाठ से ऋषियों को, होम से देवताओं को श्राद्ध से पितरों को, अन्न से मनुष्योंको और बलिकर्म से भूतों को विधिपूर्वक पूजना चाहिये ' । यहाँ पर मनुष्यों से free ऋषि, देवता प्रभृति का स्वाध्याय, जीवित पिता प्रभृति ही पितर नहीं हैं, हवन आदि से क्योंकि पितरों अर्चन उक्त है । मनुष्यों का होम से कोई प्रयोजन नहीं है । यहाँ पर केवल को तृप्ति के लिये ब्राह्मण प्रभृति को तृप्त करने का विधान मनुस्मृति में है ' पंचयज्ञ में पितरों के निमित्त एक ही ब्राह्मण को जिमावे | इसमें वैश्वदेव के निमित्त किसी ब्राह्मण को भी न जिमावे | मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है कि उस ब्रह्म से अनेक देवताओं की उत्पत्ति हुईं, साध्यगण, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण, अपान, व्रीहि, यव, तप, अद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधियज्ञों की उत्पत्ति भी उसी ब्रह्म से हुई । यहाँ पर देवताओं की उत्पत्ति मनुष्यों से पृथक वर्णित है । कोई भी
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८३७ मानवधर्मशास्त्रे ब्रह्मावर्त - ब्रह्मर्षिदेश मध्यदेश- आर्यावर्तादिदेशानां माहात्म्यातिशयवर्णनात् तद्भित-देशानां म्लेच्छदेशेषु परिगणनाद् वहिर्देशादार्या अत्रागता इति मतमपास्तमेव । पौण्ड्र चोल - द्रविड काम्बोज - यवन - पारद-पह्नव चीन किरात दरद- खसादिजातयः क्षत्रिया एवं ब्राह्मणादर्शनेन शूद्रत्वं गताः । अयं प्रसङ्गो मनुधर्मशास्त्रे द्वितीये-s ध्याये सप्तदशं श्लोकमारभ्य त्रयोविंशं यावत् तथा दशमेऽध्याये ( ४३-४४ ) इत्यत्र द्रष्टव्यः | ' अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता । मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् || ' ( वा ० रा ० ११५ | ६ ) इत्याषेतिहासानु -सारेणातीव प्राचीनकालाद् वर्णाश्रमिणामार्याणामावासभूमिर्भारतमासीदिति ज्ञायते । यत्तु कैश्चित् -'अथर्ववेदे - आलिंगी - विलिगी- उरुगूल - ताबुवम्'- --- शब्दाः चालडियन भाषागताः, तत्सङ्गाद्वेदे सन्निविष्टा: ' ( पृ ० ४० ) इति, तथा यच्च भाषाविज्ञानदृष्ट्या वेदगता जेन्दावेस्तागताश्च पाश्चात्त्याः शब्दा इति तत्तुच्छम् निर्मूलत्वात् । वस्तुतो यस्य यूनानदेशस्य सभ्यतामनुसृत्य पाश्चात्यैरितिहासादिकं परिकल्प्यते, तस्य प्रामाणिका इतिहासा: सर्वथापि नोपलभ्यन्ते । वर्तमाना यूनानदेशीया भाषा कदा प्रचलिता, कदा कदा तत्र कानि कानि परिवर्तनानि जातानीति कः स्पष्टं वक्तुं शक्नोति । भारत एवं विक्रमात् पूर्वस्मिन् ३०७ ९ बत्सरे महाभारतकाले संस्कृतग्रन्था महाभारतादयों निर्मीयन्ते स्म । अग्निवेशीयच रकसंहिता आपस्तम्बबौधायनादिसूत्रग्रन्थाः प्रचलिता आसन् । संस्कृतभाषा तु ततोऽपि वहोः कालात् पूर्वं प्रचलितासीत् । एतेन ' ऋग्वेदे ( ६/७५ | १७ ) इत्यत्र समागतो वाणशब्दोऽनार्यभाषाया वेदे समागतः ' ( पृ ० ४३ ) इत्यादि, तदपि निर्मूलम् वैदिकभाषाया एवास्य शब्दस्य तत्र प्रसारसिद्धेः । अस्या भाषायास्तु पञ्चसहस्रवत्सरेभ्यः पूर्वमेव ' अत एव च नित्यत्वम् ' ( ब्र ० सू ० १ | ३ | २ ९ ) इति ब्रह्मसूत्रान्नित्यत्वमेव साधितम् । प्राचीने ' वाचा विरूपनित्यया ' ऋ ( ० सं ० ८२७५३६ ) इति ऋग्वेदे वैदिक-वाङ्मयस्य नित्यत्वमेवोक्तम् । व्यक्ति विद्वान् नहीं उत्पन्न होता । विद्वत्ता उस जन्म में किये गये प्रयत्न से प्राप्त होती है | साध्य शब्द से यहाँ पर देवताविशेष बोधित होते हैं । मानव धर्मशास्त्र में ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षिदेश, मध्यदेश, आर्यावर्त प्रभृति देशों का बड़ा माहात्म्य वर्णित है और इनसे भिन्न देशों का म्लेच्छ देशों में परिगणन किया गया है । इससे इस मत का खण्डन हो जाता है कि आर्य लोग बाहर से यहाँ आये थे । पौण्ड, चोल, द्रविड, काम्बोज, यवन, पारद, पह्लव, चीन, किरात, दरद, खस प्रभृति जातियां पहले क्षत्रिय थीं । ब्राह्मणों का संपर्क न होने से ये शूद्रों के समान आचरण वाली हो गई । यह प्रसंग मनु के धर्म - शास्त्र के दूसरे अध्याय के १७ वें श्लोक से लेकर २३ श्लोक तक और दसवें अध्याय के ४३-४४ श्लोकों में देखा जा सकता है । ' वहाँ पर अयोध्या नाम की लोकविश्रुत नगरी थी, जिसका कि मानव-इतिहास ग्रन्थ रामायण के प्रमाण पर ज्ञात होता है कि अत्यन्त प्राचीन श्रेष्ठ मनु ने स्वयं निर्माण कराया था ऋषि वाल्मीकि के इस काल से वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाले आर्यों की निवास भूमि यह भारत देश ही थी । ' कुछ लोगों का कथन है कि अथर्ववेद के मलिगी, बिलिंगी, उरुगूल और साबुन शब्द चालडियन भाषा के हैं । उन्हीं के संसर्ग से ये शब्द गेंद में आयें ' ( पृ ० ४० ), यह भी कहा जाता है कि भाषाविज्ञान की दृष्टि से वेद, जेन्दावेस्ता और पाश्चात्य भाषाओं के अनेक शब्द एक से हैं ' ( पृ ० ४० ) | यह बात भी निराधार है । वस्तुतः जिस यूनान देश की सभ्यता का सहारा लेकर पाश्चात्य विद्वान् इतिहास की परिकल्पना करते हैं, उसका कोई भी प्रामाणिक इतिहास नहीं मिलता, वर्तमान यूनान देश की भाषा कब प्रचलित हुई? nana उसमें fra fa स तरह के परिवर्तन हुए? इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर कौन दे सकता है? भारत में ही यह विशेषता है कि यहाँ पर विक्रम से ३०७ ९ वर्ष पूर्व भी महाभारत काल में महाभारत जैसे संस्कृत के ग्रन्थ निर्मित होते थे । उस समय अग्निवेश की चरकसंहिता, आपस्तम्ब, बौधायन प्रभृति के सूत्र ग्रन्थ प्रचलित थे । संस्कृत भाषा तो इससे भी बहुत पहले प्रचलित थी । इन सब प्रमाणों के रहते ' ॠग्वेद के ऊपर अंकित मन्त्र में आया बाण शब्द अनार्य भाषा से वेद में लिया गया है ' ( पृ ० ४३ ) इत्यादि कथन सर्वथा निर्मूल हैं । इसके विपरीत इससे यही सिद्ध होता है कि वैदिक भाषा से यह शब्द वहाँ भी प्रचलित हुआ । आज से पाँच हजार
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CALC अस्थिशास्त्र प्राणिशास्त्र विकाशवादादिविषये सुभृशो विचारस्त्वस्मन्निमिते हिन्दी भाषामये ग्रन्थे मार्क्स -वावरामराज्याख्ये मनोहत्य द्रष्टव्यः । यदुक्तम्- ' ग्रन्थवाचिव्राह्मणशब्दस्य वेदे मन्त्रसंहितासु नोपलम्भः सम्भवति ब्राह्मणग्रन्थस्य पश्चात् प्रकाशितत्वात् ' ( पृ ० १ ) इति, तत्तुच्छम्, मन्त्रब्राह्मणादिशाखाग्रन्थेभ्यो भिन्नस्य वेदग्रन्थस्याद्याप्यसिद्धत्वात् । तैत्ति हाब्राह्मणादि ( ० सं ० ३ | १ | ९ | ३० तथा ३ | १२ | १; शतपथ ० ४।६।९ ।२० ) स्वदुद्धरणरीत्या ब्राह्मणशब्द-दर्शनात् | ' ब्राह्मणं ब्रह्मसङ्घाते वेदभागे नपुंसकम् ' इति मेदिनीकोषे ( ६७ ) ब्राह्मणस्य वेदभागत्वाङ्गीकाराच्च । ' मन्त्राः ब्राह्मणाः प्रोक्तास्तदर्थं ब्राह्मणं स्मृतम् । कल्पना च तथा कल्पाः कल्पश्च ब्राह्मणस्तथा ॥ ' ( विष्णुधर्मोत्तर ० ३।१७ ) | यदुक्तम्- ' मन्त्रैः सार्धं ब्राह्मणानां प्रवचनं कृतम्, तेषां मन्त्राणां व्याख्यानाद्यर्थं ब्राह्मणं ज्ञातव्यमिति तद्व्याख्यानं कृतम् ' ( पृ ० १ ) इति तत्तुच्छम्, व्याख्यानमित्यस्य कपोलकल्पितत्वात् । श्लोकार्थस्त्वयं यद् ब्राह्मणैः सार्धं मन्त्राः प्रोक्ताः । मन्त्राणां विनियोगार्थं ब्राह्मणं स्मृतम् । ब्राह्मणैरेव प्राधान्येन मन्त्राणां विनियोगात् । कल्पाः कल्पसूत्राणि चकल्पा भवन्ति, ब्राह्मणमूलकत्वात् । गौण्या वृत्या कल्पोऽपि ब्राह्मण उच्यते । ब्राह्मणेन तुल्यो ब्राह्मण इत्यर्थः । ' य इमे ब्राह्मणा प्रोक्ता मन्त्रा वै प्रोक्षणे गवाम् । एते प्रमाणं भवत उताहो नेति वासव ॥ ' ( म ० भा ० उद्यो ० १० १० १७११० ) । यदुक्तम्- ' ब्राह्मणं ब्रह्मसङ्घाते वेदभागे नपुंसकम् ' इति रीत्या सर्व ब्राह्मणं नपुंसकलिङ्ग दृश्यते । उक्तस्थलद्वये पुल्लिङ्गोऽपि ब्राह्मणशब्दो दृश्यते ' ( पृ ० १-२ ) इति, तन्न, पूर्ववचने ब्राह्मणव्याख्यानभूतकल्पेष्वेव पुल्लिङ्गब्राह्मणशब्दप्रयोगात् । महाभारतवचने तु य इमे ब्रह्मणा प्रोक्ता मन्त्राः ' ( म ० भा ० 1 उ ० प ० १७।९ ) इत्येव पाठो न तु ब्राह्मणा इति पाठ इति कृत्वा दोषविरहात् । ब्राह्मणेन प्रोक्ता विधयो ब्राह्मणा इत्यर्थो वा । वर्ष पहले वर्तमान बादरायण ने इस भाषा की नित्यता को ' अत एव च नित्यत्वम् ' इस सूत्र से सिद्ध किया है । उससे भी प्राचीन ॠग्वेद के ' ater fastent ' इस मन्त्र में वैदिक वाङ्मय की नित्यता बताई गई है । अस्थिशास्त्र, प्राणिशास्त्र, विकासवाद आदि के विषय में हमने अपने हिन्दी भाषा में निर्मित ग्रन्थ ' मार्क्सवाद और रामराज्य ' में बड़े विस्तार से विचार किया है । इस विषय को मनोयोगपूर्वक वहीं देखना चाहिये । यहाँ कहा गया है कि ' वेद अर्थात् मन्त्र संहितानों में ग्रन्थवाची ब्राह्मण शब्द का अभाव है । ब्राह्मणों का प्रवचन मन्त्रों के प्रकाश के पीछे हुआ । इसलिये मन्त्रों में इस शब्द का अस्तित्व मिलना भी न चाहिये ' ( पृ ० १ ) । यह बात एकदम निराधार है, मन्त्र,. ब्राह्मण, शाखा से भिन्न वेद नाम का कोई ग्रन्थ आज प्रसिद्ध नहीं है । तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण प्रभृति में आपके ही दिये गये उद्धरणों के प्रमाण पर ब्राह्मण शब्द विद्यमान है । मेदिनीकोष में स्पष्ट हो ब्राह्मण को वेद का भाग माना गया है । विष्णुधर्मोत्तर पुराण में कहा गया है कि - ' ब्राह्मण ग्रन्थों में मन्त्रों के साथ ब्राह्मणों का प्रवचन मिलता है, इसी लिये उनको ब्राह्मण कहा जाता है ' । भगवद्दत्त ने इसका अर्थ इस प्रकार किया है- ' मन्त्रों के साथ ब्राह्मणों के प्रवचन किये गये । उन्हीं मन्त्रों के ( व्य स्थान आदि के लिये ब्राह्मण जानना चाहिये ' ( पृ ० १ ), किन्तु यह अर्थ गलत है, क्योंकि यहाँ पर व्याख्यान की बात कपोल कल्पित है । इस श्लोक का सही अर्थ इस प्रकार से है- ' ब्राह्मणों के साथ मन्त्रों का भी प्रवचन किया गया है । मन्त्रों के विनियोग को ब्राह्मण Ward हैं, क्योंकि प्रधानतः ब्राह्मण ग्रन्थों से ही सन्नों का विनियोग मालूम होता है कि अमुक मन्त्र का अमुक कार्य में विनियोग होता है । कल्प अर्थात् कल्पसूत्र भी ब्राह्मणमूलक होने के कारण कल्पना अर्थात् विनियोग के बोधक होते हैं, अतः गोणी वृत्ति से कल्पसूत्र भी कहे जा सकते हैं । क्योंकि ये कल्पसूत्र विनियोग बताने में ब्राह्मणों के समान ही है । भगवद्दत्त ने ( पृ ० २ ) ' जो ये ब्राह्मण और मन्त्र गोध में पढे गये, हे वासव! ये आपको प्रमाण हैं या नहीं ' इस महाभारत के वचन को उद्धृत कर कहा है कि ' ब्राह्मणं ब्रह्मसंघाते वेदभागे नपुंसकम् ' इस मेदिनीकोष के प्रमाण पर सभी ब्राह्मण ग्रन्थ नपुंसक लिंग से ही बोधित होते हैं, किन्तु विष्णुधर्मोत्तर और महाभारत में ब्राह्मण शब्द पुल्लिंग में भी देखा गया है ( पृ ० १-२ ) यह aar भो गलत है, क्योंकि पहले उदाहरण में ब्राह्मणों के व्याख्यानभूत कल्पों के लिये ही ब्राह्मण शब्द का पुल्लिंग में प्रयोग हुआ है । महाभारत के वचन में तो ' ब्रह्मणा प्रोक्ताः ' यह पाठ हैं, ' ब्राह्मणाः प्रोक्ताः ' यह नहीं । इस तरह से ग्रन्थवाची ब्राह्मण शब्द के लिये
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वैवार्थपारिजातः यदुक्तम् - ब्राह्मणान्तर्गतविद्यानां विषयाः संक्षेपेणैकस्मिन्नथर्व पुराण मन्त्रे संगृहीताः । यथा- - ' ' तमितिहासश्च च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्यचलन् ' ( अथर्व ० १५/६/११ ) एतेन मन्त्राणामनन्तरं ब्राह्मणादीनां प्रकाशनान्मन्त्रेषु त तद्विषयाणामुल्लेखसम्भवः ' ( पृ ० २ ) इति, तदपास्तम्, मन्त्रब्राह्मणयोरुभयोरप्यनादित्वात् । पौर्वापर्य च मन्यस्त्येव । यदुक्तम् -- ' ब्राह्मणशब्दस्यार्थो भाष्यादिषु स्यान्नैव लिखितः, सायणाचार्यस्तु मन्त्रभिन्नं ब्राह्मणं लिखितवान् ' इति, तदसङ्गतम्, ' शेषे ब्राह्मणशब्द: ' ( पृ ० मी ० सू ० २/११३० ) इति जैमिनिनापि तथैवोक्तत्वात् । यदुक्तम्-' व्याकरणे ब्राह्मणशब्दस्य ब्रह्मसम्बन्धीत्यर्थः । ' ब्रह्म व मन्त्र: ' ( श ० ७ | १ | १ | ५ ), ' वेदो ब्रह्म ' ( जै ० उ ० ४१२५१३ ), ' ब्रह्म air: ' इति पाठस्तु नास्त्येव, किन्तु ' ब्रह्म वे मन्त्र: ' इत्येव पाठ: । ' वेदो ब्रह्म ' इति पाठो जैमिनीयोपनिषद्-ब्राह्मणे नास्त्येव । तेनैतरेयादयो ग्रन्था मन्त्रव्याख्यानरूपास्तस्माद् ब्राह्मणशब्देनोच्यन्ते । ब्रह्मणां वेदानां व्याख्यानानि ब्राह्मणानि इति दयानन्दसम्मतम् ( पृ ० २-३ ) इति, तदसङ्गतम्, तादृशव्याख्यानस्य निर्मूलत्वात् । ब्रह्मशब्दो जगत्कारणे ब्रह्मण्यपि वर्तते, ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते..... तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म ' ( तै ० उ ० ३११ ) इति श्रुतेः ' जन्माद्यस्य यतः ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | २ ) इति ब्रह्मसूत्राच्च ब्रह्मपर्यवसायित्वाद्वेदेऽपि ब्रह्मपदप्रयोगः । मन्त्र-वेदश्च ब्राह्मणात्मक एव । गीतायामपि --- कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ' इत्यत्र मन्त्रब्राह्मणत्मके वेदे ब्रह्मपदं प्रयुक्तम् । न च मन्त्र एव, मन्त्रेषु कर्मणा विधानादर्शनात् । ब्राह्मणेष्वेव तु तद् दृश्यते । यज्ञक्रियाव्याख्यानं ब्राह्मणमिति यद्यप्यर्थतः सत्यम्, तथापि न ब्राह्मणशब्दार्थः, कल्पेष्वपि तद्व्याख्यान-दर्शनात् । ' दुरारोहणं रोहति, तस्योक्तं ब्राह्मणम् ' ( ऐ ० ब्रा ० ६।२५ ) इत्यपि न ब्राह्मणशब्दार्थनिरूपणम्, तत्तदर्थ-कहीं भी पुगि प्रयोग नहीं मिलता, अतः उक्त दोष का कोई प्रसंग ही नहीं है । भगवद्दत्त संमत पाठ में भी ' ब्राह्मण ग्रन्थों से निष्पाद्य fafa ब्राह्मण कहलाती है ' इस तरह की व्युत्पत्ति के आधार पर पुल्लिंग प्रयोग की गतार्थता की जा सकती है । यह भी कहा गया है कि- ' ब्राह्मणों में जो विषय संगृहीत हैं, उन्हीं विषयों का कथन अथर्ववेद के एक मन्त्र में मिलता है- ' तमितिहासच ० ' इस मन्त्र में किसी ग्रन्थविशेष का संकेत नहीं है । सामान्य रूप से विद्याविशेपों का वर्णन है । इन्हीं इतिहास, पुराण, गाथा, नाराशंसी आदि का संग्रह ब्राह्मण ग्रन्थों में मिलता है । इस तरह से मन्त्रों के बाद ब्राह्मणों का प्रकाशन होने से मन्त्रों में ब्राह्मणों के विषयों का समावेश नहीं मिल सकता ' ( पृ ० २ ) यह कथन भी गलत है, क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को ही अनादि माना जाता है । इस तरह का पौर्वापर्य तो मन्त्रों में भी विद्यमान है । भगवद्दत ने पुनः लिखा है कि- ' संस्कृत के ग्रन्थकारों, भाष्यकारों, वार्तिककारों और टीकाकारों ने ब्राह्मण शब्द का अर्थ कहीं शायद ही लिखा हो । सायण प्रभृति भाष्यकार लक्षणमात्र करके ही सन्तुष्ट हो गये है । अपने ऋग्वेदभाष्य की भूमिका में सायण कहते हैं- ' जो परम्परा से मन्त्र नहीं वह ब्राह्मण है और जो ब्राह्मण नहीं वह मन्त्र है ' ( पृ ० २ ), किन्तु यह भी गलत आक्षेप है, क्योंकि ' शेषे ब्राह्मणशब्द: ' इस सूत्र में महपि जैमिनि ने भी ब्राह्मण शब्द का यही अर्थ किया है । पुनः कहा गया है- ' व्याकरण की रीति से ब्राह्मण शब्द का अर्थ ब्रह्म अर्थात् मन्त्र या वेद संबन्धी है । जैसे कि ' ब्रह्मवै मन्त्र: ' और ' वेदो ब्रह्म ' यहाँ पर । इसलिये ये ऐ ate आदि ग्रन्थ ब्रह्म अर्थात् वेदों का व्याख्यान हैं, इसी से इनका नाम ब्राह्मण रखा है । इस अर्थ में स्वामी career की भी संमत है कि --- ब्राह्मण ग्रन्थ ब्रह्म अर्थात् वेदों के व्याख्यान है ( पृ ० २-३ ) | यह भी असंगत उति है । इस तरह की व्याख्या सर्वया निराधार है । ब्रह्म शब्द जगत् के कारणभूत ब्रह्म के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है । ' जिससे इन सब भूतों की उत्पत्ति होती है उसको तुम जानो, यही ब्रह्म है ' यह तैत्तिरीय श्रुति इसमें प्रमाण है । ' जिससे इस जगत् की सृष्टि आदि होती है, वह ब्रह्म है ' इस बादरायण सूत्र से भी उसी ब्रह्म की सिद्धि होती है । सारे वेदों का पर्यवसान ब्रह्म में ही होता है, इसी लिये वेदों को भी ब्रह्म कह दिया जाता है और यह वेद मन्त्र और ब्राह्मण, उभयात्मक है । गीता में ' सारे कर्म अर्थात् यज्ञ प्रभूति को तुम ब्रह्म से उद्भूत जानो ' यहाँ पर मन्त्र - ब्राह्मणात्मक वेद के लिये हो ब्रह्मपद प्रयुक्त हुआ हैं, केवल मन्त्रों के लिये नहीं, क्योंकि मन्त्रों में कर्मों का विधान नहीं मिलता, यह तो ब्राह्मण ग्रन्थों में ही विहित है । ' ब्राह्मणों में यज्ञ संबन्धी क्रिया की व्याख्या मिलती है ' ( पृ ० ३ ), यह कथन यद्यपि अर्थ की दृष्टि से ठीक हैं, तथापि इससे ब्राह्मण शब्द के अर्थ की प्रतीति नहीं होती, क्योंकि इस तरह की व्याख्या कल्पसूत्रों में भी मिलती है । ' दूरोहणं रोहति तस्योकं
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८६० वेदार्थपारिजातः बोधकब्राह्मणानामिव मन्त्राणामपि दर्शनात् । ' तदुक्तमृषिणा ' इत्यादिभिर्ब्राह्मणोक्ते ऽर्थे मन्त्राणामप्युल्लेखदर्शनात् । ' तदेषाम्युक्ता - ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० उ ० २1१ ), ' तदेष श्लोको भवति ' ( वृ ० २१२ ), ' यद्गौरिवीतं तस्योक्तं ब्राह्मणम् ' ( ऐ ० ८१२ ) इत्यत्रापि गौरिवीतसामवोधकं ब्राह्मणमित्येवार्थः । यथैव तत्तदर्थवोधका मन्त्रा भवन्ति तथैव ब्राह्मणान्यपीति ( पृ ० ३-४ ) । एवमेव श्रोतगृह्यादिसूत्रेषु ' विज्ञायते ' इत्युक्त्वा ब्राह्मणोद्धरणेनापि न ब्राह्मणस्य व्याख्यानरूपत्वं सिद्ध्यति, प्रमाणभूतवचनेनावगम्यत इत्येव तदर्थः ( पृ ० ४ ) । द्विविधं ब्राह्मणम् - कर्मब्राह्मणं कल्पब्राह्मणमित्यादिकं तु तदवान्तरभेदनिरूपणमेव । ' अनुब्राह्मणादिति: ' ( पा ० ४२६२ ), ' अनुब्राह्मणं च भवति - अष्टावेतानि हवींषि । अथ राजसूयस्यानुब्राह्मणमित्यादिशिक्षाव्यवहार-दर्शनादेते ब्राह्मणानामवान्तरभेदा एव । वस्तुतस्तु मन्त्रभागेऽपि स्पष्टमेव ब्राह्मणग्रन्थरूपवेदस्योल्लेखो दृश्यते । तत्र ब्राह्मणमेव सन्त्रोपलक्षकमपि । तथाहि - ' यद्यन्तरिक्षे यदि बात आस यदि वृक्षेषु यदि वोलपेषु । यदश्रवत् पशव उद्यमानं तद्ब्राह्मणं पुनरस्मानुपेतु || ' ( अथर्व ३ का ० ७७६८।१ ) मेघादियुक्त अन्तरिक्षे यदि वा ब्राह्मणं अस यच्चोपले वृक्षंषु चास यश्चाद्यमानं व्यक्त पठ्यमानं ग्राम्या आरण्याश्च अश्रवत् अशृण्वन् तन्निस्तेजो यातयाममनध्या-याध्ययनेनोपहतं तदेतद् ब्राह्मणं त्वत्प्रसादात्तेजस्वि सन्नस्मान् उपैतु । ब्राह्मणपदमंत्र मन्त्रब्राह्मणवेदोपलक्षणार्थम् | ' पुन-मैरिन्द्रियं पुनरात्मा द्रविणं ब्राह्मणं च पुनरग्नयो विष्ण्या यथास्थामा कल्पयन्तामिव ( ७ / ६ ९ ।१ ) अत्रापि ब्राह्मणशब्दो ब्राह्मणभागोपलक्षितमन्त्रब्राह्मणपरः मन्त्रौ चात्रेवान्यत्र व्याख्यातौ । तु कथप्रभृतिभिर्भगवदत्तेन च ऐतरेय ब्राह्मणस्येतरब्राह्मणापेक्षया प्राचीनत्वं श्वेतकेतोरारुणेश्चानुल्लेखो हेतुत्वेनोच्यते ( पृ ० ६ ), ततुच्छम्, श्वेतकेत्वादीनां सत्त्वेऽपि तदनुल्लेख सम्भवात् । परमेश्वरशब्दस्य प्राचीनत्वेऽपि ब्राह्मणम् ' इस ऐतरेय वचन में भी ब्राह्मण शब्द के अर्थ का निरूपण नहीं किया गया है, क्योंकि उस उस पद के अर्थबोधक ब्राह्मण क्यों की तरह मन्त्र वाक्य भी कभी कभी व्याख्यानात्मक मिलते हैं । ' तदुक्तमुषिणा ' इत्यादि वाक्यों की सहायता से ब्राह्मणों के द्वारा प्रतिपादित fars में सत्रों को भी प्रमाण रूप से उद्धृत किया जाता है । ' तदेषाऽभ्युक्ता ', ' तदेष श्लोको भवति ' इत्यादि वाक्यों के सहारे भी ब्राह्मण भाग की पुष्टि के लिये उद्धृत किया जाता है । ' यद्गोरिवीत तस्योक्तं ब्राह्मणम् ' यहाँ पर गौरिवीत नामक साम का बोधक ब्राह्मण, यही अर्थ होता है । इस तरह से जैसे ब्राह्मण वाक्य मन्त्र वाक्यों के अर्थ के बोषक होते हैं, उसी तरह से सत्र वाक्य भी ब्राह्मण वाक्यों की व्याख्या करते हुए मिलते है ( पृ ० ३-४ ) । इसी तरह से श्रीतसूत्र और गृह्यसूत्रों में तथा निरुक्त प्रभृति ग्रन्थों में ' इति विज्ञायते ' ऐसा कहकर ब्राह्मण ग्रन्थों की उद्धृत किया जाता है ( पृ ० ४ ), किन्तु इससे भी ब्राह्मण ग्रन्थ व्याख्यानात्मक हैं, यह सिद्ध नहीं किया जा सकता । उसका केवल इतना ही अर्थ है कि यह बात ब्राह्मणों के प्रमाणभूत वचनों से भी ज्ञात होती है । ' ब्राह्मण ग्रन्थ दो प्रकार के होते हैं - एक कर्म ब्राह्मण और दूसरा कल्प ब्राह्मण ' ( पृ ० ४-५ ) इत्यादि कथन भी केवल उनके अवान्तर भेद को ही प्रदर्शित करते | ' अनुब्राह्मण से इनि प्रत्यय होता है ', ' इस विषय में अनुब्राह्मण का प्रमाण है कि यहाँ पर आ आहुतियाँ दी जाती है ', ' यह राजसूत्र का प्रतिपादक अनुब्राह्मण है ' ( पृ ० ५ ) इन सब वाक्यों में भी ब्राह्मणों के अवान्तर भेद ही प्रदर्शित हैं, क्योंकि शिक्षा और व्यवहार में ऐसा ही देखा जाता है । वस्तुतस्तु मन्त्रभाग में भी स्पष्ट हो ब्राह्मण ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है और वे भी वेद ही माने जाते हैं । यहाँ पर ब्राह्मण शब्द हो मन्त्रभाग का भी द्योतक माना जाता है । जैसे कि--' यद्यन्तरिक्षे ' इस अथर्ववेद के मन्त्र में आया ब्राह्मण शब्द मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदभाग का उपलक्षक है । इस श्रुति का अर्थ इस प्रकार है— ' आकाश के मेघाच्छ रहने पर आंधी चलने पर जो मैंने ब्राह्मण का उच्चारण किया, शून्य गृह और वृक्षों के झुंड में जो मैंने उच्चारण किया, स्पष्ट रूप से उच्चारित मेरे वेदभाग को जो ग्राम्य और आरण्य प्राणियों ने सुना, इन अनध्याय प्रसंगों में अध्ययन करने से मेरा स्वाध्याय निस्तेज, निष्प्रभाव हो गया है, वह ब्राह्मण आपके प्रसाद से तेजस्वी बन जाय ' । इसी तरह से ' पुनर्मेत्विन्द्रियम् ' इस अथर्ववेद के मन्त्र में भी ब्राह्मण शब्द ब्राह्मण और मन्त्र भाग दोनों का उपलक्षक हैं । इन मन्त्रों की इसी ग्रन्थ में अन्यत्र विस्तार से व्याख्या की गई है । -