वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 891–900

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 891–900

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वैवार्थपारिजातः ८६१ तदनुल्लेखात् । संहितामन्त्राणां सत्वेऽपि शङ्कराचार्यादिभिर्बहूनां मन्त्राणामनुल्लेखदर्शनात् । ऐ ० ६।३ बुडिल आश्वत-राल्लेखेनापि न महिदासस्य तदपेक्षयार्वाचीनत्वं विज्ञायते $ वेदशब्दानां व्यक्तिषटनापूर्वकत्वस्य निराकरणात् । अन्यथा मन्त्राणामप्यर्वाचीनत्वप्रसङ्गः । यैस्तकैः पाश्चात्यैर्मन्त्राणामर्वाचीनत्वं साध्यते, तैरेव सामाजिकैर्ब्राह्मणानामर्वा-चीनत्वं साध्यते । आख्यायिकानां सुखावबोधार्थकत्वेन घटनाभिर्नामभिश्च मन्त्राणामिव ब्राह्मणानामपि कालनिर्धारण-मशक्यमेवेत्युक्तमेव । एतेन ' एलिङ्गानुसारेण शतपथस्थ ( १२-१०-११ ) इति कानिचित् काण्डानि नवीनानि ' इत्यप्यपास्तम् ( पृ ० १० ), निर्मूलत्वात् । यत्तु भगवद्दत्तेन ' अनुसूर्लक्ष्यलक्षणं सर्वसादेद्विगोश्चल: । इकन्पदोत्तरपदात् शतषष्टेः पिकन् पथः ॥ ' ( म ० भाष्य ० ४/२/६० ) अत्र शतपथषष्टिपथोल्लेखेन प्रथमकाण्डमारभ्य नवमं यावत् षष्टघध्यायदर्शनेन च नवकाण्ड-पर्यन्तमेव षष्टिपथनाम्नैवायं ग्रन्थ आसीदिति बेवरमतं समर्थितम् ( पृ ० ९ ), तत्तु तस्य ब्राह्मणद्वेषमूलकमेव । शतपथान्त-षष्टिपथसिद्धावपि शतपथाभावासिद्धेः । पाश्चात्त्याः प्रसिद्धाया ऋक्संहिताया अपि दशमस्य मण्डलस्य बहूनां सूक्तानां चार्वाचीनत्वं जल्पन्ति तत्त्वशुद्धमेव । घटनानामाद्युल्लेखेन मन्त्रब्राह्मणादिग्रन्थानां कालनिर्धारणासम्भव एव, नामादिसृष्टेरेव वैदिकशब्दपूर्वकत्वात् । एवमेव कालैण्ड मतमप्यसङ्गतमेव । ' ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससंग्रहम् । चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह || १६ || सूर्यस्य चानुभावेन प्रवृत्तोऽहं नराधिप ॥२२ ॥ कर्तुं शतपथं चेदमपूर्वं च कृतं मया ॥ २३ ॥ ' ( म ० भा ० शा ० प ० ३१८ ) इति महा-ate प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् और भगवद्दत्त ऐतरेय ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मणों की अपेक्षा प्राचीन हैं, इस बात को सिद्ध करने

के लिये कहते हैं ऐतरेय में श्वेतकेतु अथवा प्रसिद्ध आरुणि का उल्लेख नहीं है ( पृ ० ६-७ ) । किन्तु यह गलत बात है, क्योंकि श्वेतकेतु की स्थिति रहने पर भी उनका उल्लेख यहाँ न किया गया हो, ऐसा संभव हो सकता है । परमेश्वर शब्द प्राचीन है, किन्तु उसका भी कुछ प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख नहीं है । अनेक संहिता मन्त्रों की विद्यमानता में भी उनका उल्लेख शंकराचार्य प्रभृति ने नहीं किया है, तो क्या उन मन्त्रों का इससे अभाव सिद्ध किया जा सकता है? ऐतरेय ब्राह्मण में बुडिल आश्वतराश्वि का उल्लेख होने पर भी महिदास को उससे अर्वाचीन नहीं सिद्ध किया जा सकता ( पृ ० ७ ), क्योंकि वेद के शब्द व्यक्तियों के इतिहास से संबद्ध हैं, इस बात का निराकरण हम कर चुके हैं । अन्यथा इसी प्रमाण से मन्त्रों की भी अर्वाचीनता सिद्ध होने लगेगी । जिन तर्कों के सहारे पाश्चात्य विद्वान् मन्त्रों की अचीनता की सिद्ध करते हैं, उन्हीं के आधार पर आर्यसमाजी ब्राह्मणभाग की अर्वाचीनता को सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं | आख्यायिकाएँ वैदिक अर्थ को स्पष्ट रूप से समझाने के लिये हैं, इनका घटनाओं से और व्यक्तियों के नामों से कोई संबन्ध नहीं है. इस तरह से इनके आधार पर मन्त्रभाग की ही तरह ब्राह्मणभाग का भी काल निर्धारण कथमपि संभव नहीं हो सकता । एगलिंग प्रभृति कुछ पायास्थ विद्वानों का कहना है कि शतपथ ब्राह्मण के कुछ काण्ड नवीन हैं ( पृ ० १० ) । इस बात का खण्डन भी उक्त तर्कों के सहारे हो जाता है । पाश्चात्य विद्वानों की इस तरह की बातें सर्वथा निर्मूल हैं । भगवद्दत्त ने अपने इतिहास में ( ५० ९ ) व्याकरण महाभाष्य में उद्धृत ' अनुसूर्लक्ष्यलक्षणे ० ' प्रभृति कारिका के आधार पर कहा है कि ' इसमें पथ और षष्टिपथ का कथन मिलता है | अब यह आश्चर्य की बात है कि इस तपन के प्रथम नो काण्डों में ६० ही अध्याय हैं । बेवर ने यह सुझाया है कि संभवत: प्रथम नी काण्ड ही कभी षष्टिपथ माने जाते जाते थे । इस तरह की उक्तियां इन लोगों के केवल ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रति द्वेषबुद्धि को ही व्यक्त करती हैं । शतपथ ब्राह्मण के अन्तर्गत षष्टिपथ की सिद्धि भले ही हो जाय, किन्तु इससे शतपथ के अभाव की सिद्धि कैसे हो सकती है? पाश्चात्य विद्वान् प्रसिद्ध ऋक्संहिता के दसवें मण्डल के अनेक सूक्तों को अर्वाचीन सिद्ध करते हैं । इस बात को भगवद्दत्त भी क्या अशुद्ध नहीं मानते? घटना, नाम आदि के उल्लेख के आधार पर मन्त्रभाग अथवा ब्राह्मणभाग दोनों का ही काल - निर्धारण कथमपि संभव नहीं हो सकता । इन नामों की सृष्टि भी वैदिक शब्दों के आधार पर ही की जाती है । इसी पद्धति से कालैण्ड प्रभृति अन्य पाञ्चात्य विद्वानों के मत भी असंगत ही माने जायेंगे | furnace ने परिशेष, संग्रह और रहस्य युक्त संपूर्ण शतपथ ब्राह्मण को परम प्रसन्न मुद्रा में बनाया ', ' हे नराधिप! भगवान् सूर्य की कृपा से मैं इस कार्य में प्रवृत्त हुआ ', ' मैं इस शतपथ के निर्माण में प्रवृत्त हुआ और इसको पूरा भी कर सका '

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८६३ वेदार्थपारिजातः भारतानुसारेण व्यासस्य दृष्ट्या शतपथस्य प्रामाणिकत्वम् । याज्ञवल्क्यस्य शतपथकर्तृत्वं तु ऋषीणां मन्त्रकर्तृत्वमिव-पचारिकमेव ॥ ६ - ९ काण्डेषु शाण्डिल्यस्यैव नाम दृश्यते न याज्ञवल्क्यस्य । तेन तद्भिन्नव्यक्तिकर्तृकमिति बेवर-एगलिङ्गमतं श्रान्तमेव, महाभारतवचनविरोधात् । वाजसनेविशाखायामग्निरहस्ये शाण्डिल्यतामाङ्किता विद्या विज्ञाता | ' समान एवं चाभेदात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।१ ९ ) इत्यत्र -- ' वाजसनेयिशाखायामग्निरहस्ये शाण्डिल्यनामाङ्किता विद्या विज्ञाता ' इति शाङ्करभाष्यम् । श्रीमच्छङ्करभगवत्पादानुसारेण तद्विद्यायाः शाण्डिल्यनाम्ना प्रसिद्धेरेव तदुल्लेखो न तत्प्रोक्तत्वेन । अतस्तदपि याज्ञवल्क्यत्रोक्तमेव । यथा काठके नाचिकेताग्निविद्या नचिकेतोनाम्ना प्रसिद्धा आस्नाता | साच कठप्रोक्ता, तद्वत् । भगवद्दत्तोऽत्र परमादरणीयं विश्ववन्द्यमाचार्यरत्नं शङ्कराचार्यमपि ' शङ्कर लिखता है ( पृ ० १ ) इत्येवंविधया निम्नस्तरीयभाषया एकवचनेन स्मरति । एतेन विवेचनेन ' शतपथे कुबेर - वैश्रवणोल्लेखः, अनेकेषामृषीणां राज्ञां च वर्णनं दृश्यते । तेन तत्रत्याः काश्चन सामग्रचः प्राचीनाः काश्चन नवीना: ' इति यदुक्तं भगवद्दत्तेन ( पृ ० १२ ), तदपि तुच्छम्, अनाद्यनन्ते वेदे प्राचीनावचीनसर्ववस्तुप्रतिपादनेऽपि दोषाभावात् सृष्टेः शब्दपूर्वकत्वसिद्धान्तात् । पाश्चात्यास्तु संहितासम्बन्धेष्वपि तथैव प्रलपन्ति । अङ्ग - वङ्ग- कलिङ्गादिदेशविशेषेषु प्रचारस्त्वाधुनिकप्रचाराभिप्रायेण । कृष्णयजुर्वेदीय संहिताब्राह्मणादीनामपि विषये भगवद्दत्तादीनां प्रलापा ( पृ ० १३-१४ ) उपेक्षणीया एव, शाकल्या दिशाखानामिव तेषामपि वेदत्वाविशेषात् । यत्तु केनचित् ताण्डयादिषु स्वराभावादवेदत्वमुच्यते, तदपि तुच्छम्, महाभारत के इन सब वचनों के आधार पर केवल यही सिद्ध होता है कि व्यास शतपथ ब्राह्मण को वेद के समान ही प्रमाण मानते हैं । यहाँ पर याज्ञवल्क्य को शतपथ का कर्ता उसी तरह से औपचारिक रूप में स्वीकार किया गया है, जैसा कि ऋषियों को औपचारिक रूप मन्त्रों का कर्ता माना जाता है । ' शतपथ के चार ( ६ - ९ ) काण्डों में शाण्डिल्य का नाम बहुधा जाता है । इन अध्यायों में याज्ञवल्क्य का नाम आता ही नहीं । इनसे पहले और पिछले अध्यायों में याज्ञवल्क्य का ही मत प्रायः मिलता है । इससे बेवर, एकलिंग आदि परिणाम निकालते हैं कि ये काण्ड भिन्न व्यक्ति को रखे हो सकते हैं ( पृ ० १० ), किन्तु उनका यह कथन भी सर्वथा भ्रान्त है । इसमें स्पष्ट हो महाभारत का विरोध परिलक्षित होता है । ' समान एवं चाभेदात् ' इस बादरायण सूत्र के शांकरभाष्य में कहा गया है कि ' वाजसनेयी शाखा के अग्निरम्य प्रकरण में शाण्डिल्य नाम की विद्या परिज्ञात होती है ' । श्रीशंकरभगवत्पाद के कथनानुसार इस विद्या का शाण्डिल्य के नाम से उल्लेख उसी नाम उसकी प्रसिद्धि के कारण है, इसका मतलब यह नहीं है कि इस विद्या का प्रवचन शाण्डिल्य ने किया है । वास्तव में इस विद्या का भी प्रवचन याज्ञवल्क्य ने ही किया है । जैसे कि काठकोपनिषद् में नाविकेत अग्निविद्या fear के नाम से प्रसिद्ध है, किन्तु उसके प्रवक्ता कठ ही माने जाते हैं, उसी तरह से यहां भी समझना चाहिये | भगवद्दत्त यहाँ पर ( पृ ० १० ) परमादरणीय, विश्ववन्द्य, आचार्यरत्न, शंकराचार्य को भी ' शंकर लिखता है ' इस तरह की निम्न स्तर की भाषा में एकवचन में उद्धृत करते हैं! उपर्युक्त विवेचन से भगवद्दत्त के इस मत का भी खण्डन हो जाता है कि शतपथ ब्राह्मण में कुबेर- वैश्रवण का उल्लेख है, तथा अनेक ऋषियों एवं राजाओं का वर्णन मिलता है, इससे यह सिद्ध होता है कि शतपथ ब्राह्मण की कुछ सामग्री प्राचीन और कुछ नवीन है ( पृ ० १२ ) | वेद अनादि और अनन्त हैं । इसमें प्राचीन और अर्वाचीन सभी तरह की वस्तुओं का प्रतिपादन मिलने पर भी कोई आक्षेप लागू नहीं हो सकता, क्योंकि हमारे मत से सारी सृष्टि शब्दपूर्वक है, अर्थात् ईश्वर द्वारा वेद में विद्यमान शब्दों के उच्चारण के साथ ही तत्तत् वस्तुओं को सृष्टि मानी जाती है । पाश्चात्य विद्वान् संहिताओं के संबन्ध में भी इसी तरह के आक्षेप करते हैं, जिस तरह के आक्षेप कि आर्यसमाजी ब्राह्मण ग्रन्थों के संबन्ध में करते हैं । अंग, वंग, कलिंग प्रभूति देशों में माध्यन्दिन शतपथ ब्राह्मण के विशेष प्रचार को बात ( पृ ० १२ ) आधुनिक प्रचार को दृष्टि में रखकर कही गई है । इस तरह कृष्णयजुर्वेद संहिता, ब्राह्मण प्रभूति के विषय में भगवद्दत्त प्रभृति ( पृ ० १३-१४ ) के प्रताप सर्वथा उपेक्षणीय हैं, क्योंकि शाकली प्रभूति शाखाओं की तरह ये भी समान रूप से वेद - ग्रन्थ माने जाते हैं । कुछ लोग ताण्ड्य प्रभृति

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dar पारिजातः ८६५ शतपथ - ताण्ड- भाल्लविनां ब्राह्मणस्वर: ( ३१२५ ) इति भाषिकस्वरसिद्धेः । ' द्वितीयप्रथमो एनौ तण्डिभाल्लविनां स्वरौ । तथा शातपथावेनों स्वरौ वाजसनेयिनाम् ॥ ' ( १११३ ) इति नारदीय शिक्षावचनाच्च । ( पृ ० १५ ) यदुक्तम्- ' लोहितोष्णीषा लोहितवाससो निवीता ऋत्विजः प्रचरन्ति ' ( पृ ० १५ ) षड्विशब्राह्मणे ( ३८/२२ ), तस्माद् ब्राह्मणोऽहोरात्रस्य संयोगे सन्ध्यामुपास्ते ( षड्विशब्राह्मणे ४१५१४ ) इति प्रथमं सन्ध्यावर्णनम् । नित्येषु मन्त्र-ब्राह्मणात्मकेषु वेदेषु प्राथम्याप्राथम्यानुपपत्तेः । गुणोपसंहारन्यायेन सर्वशाखागुणसमन्वयेनेव सन्ध्यादिकर्म -निर्णयाच्च । यदपि --- ' पुष्ये चानुमतिर्ज्ञेया सिनीवाली तु द्वापरे । खार्वायां तु भवेद्रका कृतपूर्वे कुहुर्भवेत् ॥ ' ( विंश-ब्रा ० ४।६।५ ) पुष्यः कलिः । खार्वा त्रेता युगानां प्राचीननाम्नासत्रे बोल्लेख: ' ( पृ ० १७ ) इति । ' कलिः शयानो भवति सञ्जिानस्तु द्वापरः । उत्तिष्ठस्त्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरन् ॥ ' ( ऐ ० ब्रा ० ७ १५ ), इत्येतरेये ' कृताय सभाविनम्, त्रेताय आदिनवदर्शम्, द्वापराय वहि: सदम्, कलये सभास्थाणुम् ' ( तै ० ब्रा ० ३ | ४ | १६ | १ ) तंत्तिरीयेऽपि च युगनामोल्लेखात् । ' उज्जहारागमाम्भोधेर्यो धर्मामृतमञ्जसा । न्यायनिर्मथ्य भगवान् स प्रसीदतु जैमिनिः ॥ सामाखिलं सकल-वेदगुरोर्मुनीन्द्राद् व्यासादवाप्य भवि येन सहस्रशाखम् । व्यक्तं समस्तमपि सुन्दरगीतरागं तं जैमिनि तलवकारगुरु नमामि ॥ ' इति परम्परागतान् ऐतिह्यदर्शकान् श्लोकान् प्रशंसति भगवद्दत्तः, ( पृ ० २२ ), दयानन्दश्च जैमिनिसूत्राणि शाबरभाष्यं च प्रमाणत्वेनाङ्गीकरोति, तथापि तदुक्तं धर्मं वेदार्थपद्धति च नाङ्गीकरोति । यज्ञानां वायुजलादिशुद्धि-मेव फलं मनुते । ' वैदिक वाङ्मय का इतिहास --- ग्रन्थे द्वितीयभागे सप्तमेऽध्याये लिखति भगवद्दत्तः -- ' शबर, पितृभूति, शङ्कर, कुमारिल, भवस्वामी, देवस्वामी, विश्वरूप, मेधातिथि, कर्क, धूर्तस्वामी, देवत्रात, वाचस्पतिमिश्र, रामानुज, ब्राह्मणों में स्वर के अभाव में उनकी अवेदता को सिद्ध करना चाहते हैं ( पृ ० १५ ) | किन्तु यह बात भी गलत है, क्योंकि भाषिक सूत्र मैं लिखा है कि ' aar के समान हो ताण्ड्य और भाल्लवियों का ब्राह्मण स्वर था । ऐसा हो नारद शिक्षा में भी लिखा है- ' इनमें से aft और मालवियों के द्वितीय और प्रथम स्वर बनते हैं और ये ही वाजसनेयी यजुर्वेदियों के शतपथ ब्राह्मण के स्वर है ' । a ने कहा है कि ' लाल पगड़ियों वाले और लाल कपड़े वाले ( लाल किनारे की धोतियों वाले ) निवीत ऋत्विग् होते हैं ' इस वचन से उस समय के ऋत्विजों के देश का परिचय मिलता है । इसी तरह से सायं प्रातः सन्ध्या का वर्णन भी प्रथम बार इसी ( षडविंश ) ब्राह्मण में मिलता है - ' तस्माद् ब्राह्मण ० ' इत्यादि ' ( पृ ० १६-१७ ) | यह कथन भी गलत है, मन्त्रब्राह्मणात्मक नित्य वेदों में प्राथम्य और अप्राथम्य का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । सन्ध्या प्रभृति कर्म का निश्चय गुणोपसंहार न्याय और सर्व शाखा गुणसमन्वय न्याय के आधार पर होता है । यह भी कहा गया है- ' युगों के प्राचीन नाम प्रथम बार इसी ( षड्विंश ) ब्राह्मण के पुष्ये चानुमविज्ञेया ० ' इस श्लोक में मिलते हैं । यहाँ पर पुष्य शब्द से कृत युग का और खार्वा शब्द से त्रेता का बोध होता है ' ( पृ ० १७ ), किन्तु यह कथन भी गलत है, क्योंकि ' कलिः शयानों भवति ' इस ऐतरेय ब्राह्मण के वचन में तथा ' कृताय सभावितम् ० ' इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति में भी चारों युगों के नाम उल्लिखित है । आगे ( पृ ० २२ में ) भगवद्दत्त जैमिनीय ब्राह्मण में प्राप्त --- ' वेद के समुद्र से धर्मरूपी अमृत को जिसने न्यायों से मन्थन करके निकाला, वह भगवान् जैमिनि मेरे ऊपर प्रसन्न हों । सारे वेदों के गुरु मुनिश्रेष्ठ व्यास से समस्त सामों का ज्ञान प्राप्त करके जिसने संसार में सहस्र शाखाओं को प्रकाशित किया और साम के सब गान निकाले, तलवकार के गुरु उस जैमिनि को मेरा नमस्कार हो ' इन परम्परागत श्लोकों की इतिहास के are etat के रूप में प्रशंसा करते हैं । स्वामी दयानन्द जैमिनिसूत्र और शावर भाष्य को प्रमाण मानते हैं, तो भी उनके द्वारा प्रतिपादित धर्म और वेदार्थ की पद्धति को स्वीकार नहीं करते । वे वायु, जल प्रभूति की शुद्धि को ही यक्षों का फल मानते हैं । ' वाङ्मय का इतिहास ' नामक ग्रन्थ के द्वितीय भाग के सातवें अध्याय में भगवद्दत लिखते हैं- ' शबर, पितृभूति, शंकर, कुमारिल, भवस्वामी, देवस्वामी, विश्वरूप, मेधातिथि, कर्क, धूर्तस्वामी, देवत्रात, वाचस्पति मिश्र, रामानुज, उव्वट, मस्करी,

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८६४ वेदार्थपारिजातः उवट, मस्करी, सायण प्रभृति सब ही बड़े बड़े आचार्य मन्त्र ब्राह्मण दोनों को वेद मानते आये हैं । गत ३००० वर्ष में आर्यावर्त के किसी विद्वान् को इस बात का सन्देह नहीं हुआ कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं हैं । इतने काल से आर्यों के हृदयों में ब्राह्मणों की श्रुतियों का उतना ही मान रहा है, जितना संहिताओं के मन्त्रों का । आर्यों के समस्त श्रोत कर्म इन दोनों को तुल्य मान कर ही होते चले आये हैं । ' ( पृ ० ९९ ) । एवं मन्वानोऽपि भगवद्दत्तो ब्राह्मणानां वेदत्वं विरुद्धीति कौतुकमेव । ' मोच्चैरिति होवाच - कणिनी वै भूमिरिति ' ( तलवकार ब्राह्मणे १।१२६ ) ( पृ ० २२ ) | समस्ते जगति नोच्चैर्वक्तव्यं यतो भूमेरपि श्रोत्रं भवतीति 1 इत एव प्रसृतमिति नाश्चर्यम्, वेदस्यैव सर्वव्यवहारमूलत्वात् । गोपथ-ब्राह्मणस्यार्वाचीनत्वसाधकाः पाश्चात्त्या अपि भ्रान्ता एव । मन्त्रब्राह्मणकल्पानामेकत्र वसिष्ठाद्याश्रमाणां प्राचीन-साम्राज्यानां वर्णनं च न तस्याधुनिकत्वापादकम्, नित्येषु मन्त्रेष्विव नित्येषु ब्राह्मणेष्वपि तदविरोधात् । ' यस्यै देवतायै हविगृहीतं स्यात्तां ध्यायेद्वषट्करिष्यन् ' ( ऐ ० ब्रा ० ३1८1१ ) इदं सर्वशाखासु सर्वकर्मसूपयुज्यते । ( पृ ० २४ ) यदपि ब्राह्मणभाष्यकाराणां सायणाचार्यस्य च सम्बन्धे प्रलपति भगवद्दत्त: - ' सायणादयः शब्दार्थमेव कुर्वन्ति । ब्राह्मणानां रहस्यानि, ईश्वरीयसृष्टेराधिदैविकतत्वानि न स्पष्टयन्ति ' ( पृ ० ५२ ) इति, तत्तु नितरामज्ञान-मूलकम्, तैत्तिरीयारण्यकेंतरेयारण्यकादिषु मन्त्रसंहितासु ब्रह्मविद्याविषये च बाहुल्येन विवरणदर्शनात । यत्तु ' वैदिक वाङ्मय का इतिहास ' ग्रन्थे द्वितीयभागे पञ्चमाध्याये विभिन्न ब्राह्मणेषु वर्णितानामृषीणां राज्ञां चैतिहासिककालादि-कल्पनम्, तदपि वृथा श्रमेण कालयापनमात्रम्, आख्यायिकानां सुखावबोधार्थत्वेन स्वार्थे तात्पर्याभावेन कालाद्यसिद्धेः । सायणप्रभृति सभी बड़े बड़े आचार्य मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद मानते आये हैं । गत तीन हजार वर्ष में आर्यावर्त के किसी को इस बात का सन्देह नहीं हुआ कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं हैं । इतने काल से आर्यों के हृदयों में ब्राह्मणों की श्रुतियों का उतना ही मान रहा है, जितना संहिताओं के मन्त्रों का । आर्यों के समस्त श्रोत कर्म इन दोनों को तुल्य मान कर ही होते चले आये हैं ' ( पृ ० ९९ ) । यह आश्चर्य की ही बात है कि ऐसा कहते हुए भी भगवद्दत्त ब्राह्मण ग्रन्थों को वेद मानने के विरोध में ही अपनी सारी शक्ति लगा देते हैं । इसी ( जैमिनीय ब्राह्मण ) ब्राह्मण में वह उक्ति पाई जाती है, जो कि सारे संसार की भाषाओं में किसी न किसी रूप में विद्यमान है । अर्थात् ' मोवैरिति होवाच कणिनी वै भूमिरिति ' ( इसी ब्राह्मण को सलवकार ब्राह्मण भी कहते हैं ) । इसका अर्थ यह है कि --- ऋषि अपनी पत्नी से कहते हैं कि ऊँचे मत बोलो । भूमि के भी कान होते हैं ( पृ ० २२ ) | वेद से ही इस तरह की बात सब जगह फैली हो, इसमें आचर्य की बात क्या है? क्योंकि वेद हो तो जगत् के सारे व्यवहार का मूल है । गोपथ ब्राह्मण की अर्वाचीनता के साबक पाश्चात्य विद्वान् भ्रान्त ही माने जायेंगे । यहाँ पर मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पों का एक साथ उल्लेख है, वसिष्ठ आदि के आश्रमों का और प्राचीन साम्राज्यों का वर्णन मिलता है । इन सब कारणों से इसकी आधुनिकता नहीं सिद्ध की जा सकती ( पृ ० २४ ) | नित्य मन्त्रों की तरह नित्यब्राह्मण ग्रन्थों में भी इस तरह की बातों की ऐतिहासिकता के विषय में कोई प्रमाण नहीं है । ' यस्यै देवतायै ० ' इस गोप वाक्य का सभी शाखाओं और सभी कर्मों में समान रूप से उपयोग होता है । ब्राह्मण ग्रन्थों के भाष्यकारों और विशेष कर सायणाचार्य के संबन्ध में भगवद्दत्त कहते हैं- ' ये सब भाष्यकार प्रायः एक ही ढंग का अर्थ करते हैं । इनमें से जितने पुराने हैं वे तो शब्दार्थमात्र करके ही सन्तुष्ट रहते हैं । हाँ, सायण आदि नवीन भाष्यकार कहीं कहीं व्याख्यान भी करते हैं । पर इनमें ब्राह्मणों के रहस्यों का तात्पर्य बहुत कम दिखाया गया है । ईश्वरीय सृष्टि के आधिदैविक तत्त्वों के निदर्शन का, जो ब्राह्मणों में सर्वत्र मिलता है, वे भाष्यकार स्पष्टीकरण नहीं करते ' ( पृ ० ५२ ) | यह सारा कथन अज्ञान -मूलक है, क्योंकि तैत्तिरीय आरण्यक ऐतरेय आरण्यक प्रभृति में और मन्त्र संहिताओं में ब्रह्मविद्या के विषय में विस्तार से विवरण मिलते हैं । ' वैदिक वाङ्मय का इतिहास ' नामक ग्रन्थ के द्वितीय भाग के पाँचवें अध्याय में ( पृ ० १४-६५ ) विभिन्न ब्राह्मणों में वर्णित ऋषियों और राजाओं का ऐतिहासिक काल - निर्धारण बड़े प्रयत्न से किया गया है । यह सब वृथा श्रम करके समय बिताना मात्र है । यहाँ पर वर्णित आख्यायिकाएँ सुविधापूर्वक अर्थ को समझाने के लिये हैं, उनका स्वार्थ में कोई तात्पर्य नहीं है, अतः उनसे समय का

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वेदार्थ पारिजातः ८६५ नित्यवैदिक शब्दानुसारिण्यस्तु घटना भवन्त्योऽपि न वार्यन्ते, अपरिमिते काले तदसम्भवाभावात् । तेन जनक- उद्दालक-श्वेतकेत्वादीनां समसामयिकत्वादिसाधनायासो निर्मूल एव । ' मिया वै सत्रमासत । त उत्थाय सप्तविंशति कुरुपञ्चालेषु वत्सतरात् अतन्वत । तान् वको दाभि-रब्रवीद् यूयमेवैतान् विभजध्वमिममहं धृतराष्ट्रं वैचित्रवीर्यं गमिष्यामि ' ( काठकसंहिता १०१६ ) इति वचनेन सिद्ध्यति यन्महाभारतकाले ब्राह्मणग्रन्थसङ्कलनमासीदिति । तथाहीममेवार्थं महाभारते व्यास आह- ' ययौ राजंस्ततो रामो बकस्याश्रममन्तिकात् । यत्र तेथे तपस्तीव्रं दाल्भ्यो बक इति श्रुतिः || ३२ || ' ( शल्यपर्व ४१ ), ' यत्र दाम्यो बको राजन् पश्वयं सुमहातपाः । जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्र कोपसमन्वितः || १ || तानब्रवीद् aht दाभ्यो विभजध्वं पशूनिति || ५ || ( शल्यपर्व ४२ ) न चायं धृतराष्ट्रो महाभारतकालात् कश्चिदतिप्राचीन इति साम्प्रतम्, महाभारते युधिष्ठिरसमये तस्य वर्तमानत्वात् । ' अथाब्रवीद् बको दात्म्यो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । सन्ध्यां कौन्तेयमासीनमृषिभिः परिवारितम् ॥ ' ( व ० प ० २६४ ) ( पृ ० ७७-७८ ) इत्यादि प्रदार्य भगवद्दत्तो यन्महाभारतकाले ब्राह्मणारण्यकादीनां सङ्कलनं साधयति, तदत्यल्पमेव, यतो महाभारतकाले व्यासेन तच्छिष्यैश्च सर्ववेदशाखा सङ्कलनस्यापि स्मरणात् । यथा वेदानामपौरुषेयत्वमाधुनिकत्वं च तथैव केषाञ्चिद् ब्राह्मणानां महाभारतकाले सङ्कलितत्वेऽपि दोषविरहात् । अत एव महाभारतोद्धृतेन ' दात्म्यो वक इति श्रुतिः ' इति वचनेन बकदाल्भ्यबोधकब्राह्मणवचनस्य श्रुतित्वमुक्तम् । न च महाभारतकालिकबकदाल्भ्यस्य चर्चादर्शनात् तद्ग्रन्थस्य कथं नित्यत्वमिति वाच्यम्, मन्त्रेष्वपि गौतमजामदग्न्यादीनां चर्चाया विद्यमानत्वेन पौरुषेयत्वापत्तेः । वेदस्य घटनापूर्वकत्वाभावेन घटनायाश्च वेदपूर्वकत्वेन समाधानं तूभयत्र समानमेवेत्यन्यत्र प्रपञ्चितमेव । एतेन पारिक्षितस्य जनमेजयस्य ब्राह्मणे वर्णनमपि समाहितं वेदितव्यम् | ' दिवोदासो भैमसेनिरुणिमुवाच ' ( काठकसंहिता ७१८ ) । तित्तिरि महिदास ऐतरेय जैमिनि तलवकारादीनामपि समाधानं वेदितव्यम् । निर्धारण नहीं किया जा सकता । नित्य वैदिक शब्दों का अनुसरण कर होने वाली घटनाओं का निषेध हम नहीं करते, अपरिमित काल में यह असंभव भी नहीं है । इसलिये जनक, उद्दालक, श्वेतकेतु प्रभृति को समसामयिकता जैसी बातों को सिद्ध करने का सारा प्रयास सर्वथा निर्मूल है । " ब्राह्मण ग्रन्थों का संकलन महाभारत काल में हुआ, इसमें एक और प्रमाण है । काठक संहिता के आरंभ का यह वचन है --- ' नैमिष्या वै सत्रमासत ० ' । इसी कथा का उल्लेख महाभारत शल्यपर्व में भी है- हे राजन्, तब बलराम जी बक के आश्रम के समीप गये, जहाँ दास्य नक ने तीव्र तप किया, ऐसा श्रुति में कहा है । वहीं पर अध्याय ४२ में भी बक दात्म्य की चर्चा है — ' यत्र दात्म्यो बको ० ' इत्यादि । इससे निश्चय होता है कि काठक संहिता में विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र का वर्णन है । कोई ऐसी कल्पना कर सकते हैं कि धृतराष्ट्र वैचित्रवीर्य कोई पुरातन काल का राजा हो सकता है, पर यह कल्पना असत्य है । काठक संहिता में धृतराष्ट्र वैचित्रवीर्य के साथ जिस ऋषि ' बक दात्म्य ' का कथन है, वह महाराज युधिष्ठिर के समय में विद्यमान थे । जैसा कि महाभारत वनपर्व के ' अ eraratgato ' इस श्लोक से ज्ञात होता है ' ( पृ ० ७७-७८ ) । इतना सब कहने के बाद भगवदत्त महाभारत काल में ब्राह्मण, आरण्यक आदि के संकलन की बात सिद्ध करते हैं । यह अधूरी बात है, क्योंकि महाभारतकाल में व्यास और उनके शिष्यों ने सभी वेद की शाखाओं का भी संकलन किया था । जैसे वेदों के लिये अपोरुषेयता और आधुनिकता दोनों संगत है, उसी तरह से कुछ ब्राह्मणों को महाभारतकाल में संकलित माना जाय तो भी कोई दोष नहीं है । इसी लिये महाभारत में उद्धृत ' दात्म्यो बक इति श्रुति: ' इस वचन में an arora के बोधक ब्राह्मण ग्रन्थ के वाक्य को श्रुति के नाम से संबोधित किया गया है । कोई प्रश्न करें कि जब महाभारतकाल के काय की जब इस ग्रन्थ में चर्चा है, तो वह नित्य कैसे माना जा सकता है? तो इसका उत्तर यह है कि मन्त्रों में भी तो गौतम, जमदग्नि प्रभुति की चर्चा है, तब क्या उनको आप पौरुषेय एवं अनित्य मानेंगे? यदि आप कहें कि वेदों में किसी घटना का afa नहीं है, किन्तु घटनाएँ ही वेदमूलक हैं, तो यही समाधान ब्राह्मण ग्रन्थों पर भी लागू होगा । इस बात को अन्यत्र हमने विस्तार पूर्वक बताया है । पारिक्षित जनमेजय का ब्राह्मण ग्रन्थों में प्राप्त वर्णन भी इसी पद्धति से समाघातव्य है । ' दिवोदास भैमसेनि आरुणि १० ९

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बेवार्थपारिजातः पुराणेतिहासेषु केचिन्मन्त्रब्राह्मणगताः पुरुषाः क्वचित्काल्पनिकाः क्वचिच्चैतिहासिका उच्यन्ते । क्वचि चच मन्त्रब्राह्मणगता ऐतिहासिकाश्च तुल्यनामानो भवन्ति । तेनैव मन्त्रब्राह्म णगतानामप्यैतिहासिकत्वभ्रान्तिः । मन्त्र-ब्राह्मणगता आख्यायिकास्तु सुखावबोधार्था एवं नैतिहासिक्यः, तासां मन्त्रब्राह्मणगतानामाख्यायिकानां काल्पनिकत्वात् । अन्यास्तु सम्भवन्त्येतिहासिक्य: | महिदासस्य ऐतरेय ब्राह्मणे, याज्ञवल्क्यस्य शतपथे वर्णनदर्शनाच्च । एतद्ध स्म वैतद्विद्वानाह महिदास ऐतरेय: ' ( ऐ ० ब्रा ० २२११८ ), ( तदु होवाच याज्ञवल्क्यः ' ( ० १ ३ ४ २१, २।३।१।२१ ) इत्यादिषु नाम्नां कल्पितत्वमेतिहासिकानां ततो भिन्नत्वमेव च वेदितव्यम् । नन्वेवं यमनचिकेतआदीनां काल्पनिकत्वे कथं शङ्कराचार्यस्वान् आचार्यान् मत्वा प्रणमति । ' नमो वैवस्वताय ' इत्यादि । इति चेन्न, आख्यायिकाया भूतार्थवादत्वेन तदनुसारिणां यमादीनां सत्त्वेऽपि बाधाभावात् । आख्यायिकानां घटनापूर्वकत्वाभावाच्चापौरुषेयत्वं चोपपद्यते । एतेन शतपथस्यान्ते वंशसूच्यां पञ्चचत्वारिंशदाचार्याणां नामान्युल्लि-ख्यन्ते । तेषां समेषामन्ते वयं पदोल्लेखः । तत्र वयंपदेनान्तिमा एव गृह्यन्ते यैः शतपथे खिलभागो योजितः । यैव समस्ते याज्ञवल्क्यप्रोक्ते शतपथे ब्राह्मणे प्रक्षेपः कृतः, ते वा वयंपदेन गृह्यन्ते । प्रक्षेपस्त्वल्पः । खिलभागस्तु तैरेव योजितः, ये भारतोत्तरशतद्वयशतत्रयवर्षकालिका याज्ञवल्क्योत्तरभाविनः । ब्राह्मणकालनिर्णये तैरेव प्रक्षेपैरैतिहासिकी बाघतिष्ठते । यथा छान्दोग्योपनिषदि जैमिन्युपनिषदि महिदासायुषसम्बद्धः प्रक्षेपैः । ' तद्यथा-- एतद्ध स्म वै तद्विद्वा-नाह महिदास ऐतरेयः । स ह षोडशं वर्षशतमजीवत ' ( छा ० ३ | १६ | ६ ), ' एतद्ध स्म तद्विद्वान् ब्राह्मण उवाच महिदास ऐतरेयः स ह षोडशशतं वर्षाणि जिजीव ' ( जै ० उपनिषद्ब्राह्मणे ) ( ४/२/११ ) ( पृ ० ८७ ) इति तदव्यपास्तं वेदितव्यम् । से बोला ' ( पृ ० ७ ९ ) इसका भी समाधान इसी पद्धति से किया जाना चाहिये और तित्तिरि, महिदास ऐतरेय, जैमिनि, तलवकार प्रभूति नामों का भी ।, पुराणेतिहास ग्रन्थों में मन्त्र और ब्राह्मण भाग में वर्णित कुछ पुरुष कहीं काल्पनिक और कहीं ऐतिहासिक माने जाते हैं । कहीं मन्त्र और ब्राह्मण भाग में वर्णित और ऐतिहासिक पुरुष समान नाम वाले होते हैं । इसी से मन्त्र और ब्राह्मण भाग गत पुरुषों की ऐतिहासिकता की भ्रान्ति होने लगती है । मन्त्र और ब्राह्मण आग में वर्णित आख्यायिकाएँ उनका अर्थ सरलता से समझाने के लिये af हैं, उनमें कोई ऐतिहासिकता नहीं है, क्योंकि ये मन्त्र और ब्राह्मणभाग में पठित आख्यायिकाएँ काल्पनिक है । कुछ ब्राह्मण गत आख्यायिकाएँ ऐतिहासिक भी हो सकती हैं । महिदास का ऐतरेय ब्राह्मण और याज्ञवल्क्य का शतपथ ब्राह्मण में वर्णन मिलता है । ' एतद्ध स्म " " महिदास ऐतरेयः ' और ' वदु होवाच याज्ञवल्क्यः ' इत्यादि ब्राह्मण वाक्यों में नाम कल्पित ही हैं, अतः ऐतिहासिक महिदास और याज्ञवल्क्य इनसे भिन्न ही माने जाने चाहिये ।, प्रश्न हैं कि यम - नचिकेत आदि भी यदि काल्पनिक व्यक्ति हैं, तो शंकराचार्य उनको आचार्य मानकर कैसे प्रणाम करते हैं - ' नमो वैवस्वताय ' इत्यादि । इसका उत्तर यह है कि आख्यायिकाएँ भूतार्थवाद की द्योतक हैं, अतः तदनुसारी यमादि की स्थिति मैं भी कोई बाधा नहीं है और ये आख्यायिकाएँ घटनाओं के आधार पर नहीं लिखी जाती, अत: इनकी अपौरुषेयता भी बनी रहती है । इस सिद्धान्त को मान लेने से भगवदत्त की इस बात का भी खण्डन हो जाता है कि ' माध्यन्दिन शतपथ के अन्त में जो बंशसूची दी गई है, उससे याज्ञवल्क्य के उत्तरवर्ती ४५ आचार्यो के नाम मिलते हैं । उन सबके अन्त में पैंतालीसवें नाम के स्थान में वयं लिखा है | ' ' पद से fafe ष्ट वे अन्तिम लोग थे, जिन्होंने शतपथ के साथ विल भाग जोड़ा या सारे ही याज्ञवल्क्य प्रज्ञाह्मण में प्रक्षेप किया | हमारा अपना विचार है कि उन्होंने प्रक्षेप थोड़ा ही किया होगा । खिल तो अवश्य उन्हीं के हैं । ये लोग महाभारत काल से दो तीन सौ वर्ष पीछे के हो सकते हैं । ब्राह्मणों का काल निर्णय करने में जो कहीं कहीं ऐतिहासिक अड़चन आ पड़ती है, वह इन्हीं प्रक्षिप्त भागों से संबन्ध रखने वाली मानी जा सकती है | छान्दोग्य उपनिषद् और जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण के महिदास की आयु से संबन्ध रखने वाले वाक्य ऐसे हो प्रक्षेपों में से हो सकते हैं ' ( पृ ० ८७ ) । जैसे कि - ' एतख स्म ' इत्यादि उक्त

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नेवार्थपारिजातः ८६७ परम्पराप्राप्तेषु ब्राह्मणेषु प्रक्षेपकल्पनाया निर्मूलत्वात् । छान्दोग्यजैमिन्युपनिषद्ब्राह्मणे महिदासबोधकवाक्यस्य प्रक्षिप्तत्वे मानाभावाच्च । दृढतराभिर्युक्तिभिर्मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य सर्वस्यैव वेदस्य नित्यत्वसाधनेन मन्त्र-गतानां नाम्नां घटनानां चाख्यायिकारूपत्वेन नैतिहासिकत्वम्, वैदिकशब्दानुसारेण सृष्ट्यभ्युपगमेन क्वचिन्नाम्नां घटनानां चैतिहासिकत्वेऽपि वैदिकशब्दानां नित्यत्वेन तत्पूर्वत्वं घटनानां न युक्तम् । खिलकाण्डानामपि न प्रक्षिप्तत्वं न वा पश्चाद्भावित्वम्, नित्यत्वादेव । अत एव वायुपुराणादौ खिलसंहितानामेव सम्प्रदायवर्णनम् । अत एव भगवत्पादैः शङ्कराचार्यवंशब्राह्मणभाष्य उक्तम्-- ' अथेदानीं समस्त प्रवचनवंश ' ( पृ ० ८७ ) इति । ' सान्निध्यात्खिलकाण्डस्य वंशो -मिति शङ्कां निवर्तयन् वंशब्राह्मणतात्पर्यमाह ' इत्यानन्दगिरिः । ब्राह्मणस्य नित्यत्वेन सर्वस्यैव ब्राह्मणस्य स्वयम्भु-ब्रह्मण एव पारम्पर्येण प्राप्तत्वात् । नहि प्रवक्तृसामान्यस्य वंशब्राह्मणे वर्णनम्, तथात्वे साम्प्रतिकानामपि प्रवक्तॄणां तन्त्र सन्निवेशापत्तिर्दुर्वारा । अत एव यथा नहीदानीन्तनान् प्रवक्तृनाश्रित्य काठकादिसंहिताऽऽख्यायते, अन्यथा काठकादि-संहितानामेवेदानीन्तनान् प्रवक्तृनाश्रित्य सुशर्मादिभिः प्रोक्तत्वात् सोशर्मणीत्याद्याः समाख्याः सम्भवेयुः । तथैव वंश-ब्राह्मणेऽपि न परम्परायामागता अपि सर्वे प्रवक्तारः समायान्ति, किन्तु वेदगतकठादय इव पोतिमाष्यादिशब्दा अपि free सामान्य वाचका एव । तत्र तत्र कल्पे वसिष्ठादय इव तेऽपि भवन्ति । ' यथा कुशल प्रवक्तृत्वेन रामश्रोतृकत्वेनैव वाल्मीकिना रामायणं निर्मितम्, सूतप्रवक्त्तृकत्वेन महा-भारतवर्णनम्, तथैव स्वयम्भुब्रह्मादिपौतिमाषीपुत्रपर्यन्तप्रवक्तृकश्वेन शतपथो नित्य एव । यदा सर्वोऽपीतिहासो डिण्डिम-घोषेण शतपथस्य याज्ञवल्क्यप्रोक्तत्वं वर्णयति, तदा तत्र वयंपदेन तद्भिन्ना अन्ये आचार्याः कथङ्कारं गृह्येरन्? ' अतो-ऽवश्यमेभिराचार्यैर्यथाकालं तत्र प्रक्षेपा योजिताः । अयं वंशस्तु प्रक्षिप्तो मन्तव्य: ' ( पृ ० ८७-८८ ) इति यदाह भगवदत्त-ग्रन्थों के वाक्य | इन परम्परा प्राप्त ब्राह्मण वाक्यों में प्रक्षेप की कल्पना सर्वथा निराधार है । उक्त दोनों स्थलों पर महिदास के बोधक arra के प्रक्षिप्त होने में कोई प्रमाण नहीं है । अत्यन्त दृढ युक्तियों से मन्त्र ब्राह्मणात्मक सारे वेद की नित्यता सिद्ध की जा चुकी हैं और यह भी बार बार कहा जा चुका है कि मन्त्र ब्राह्मणगत नाम और घटनाएँ आख्यानात्मक हैं, अतः ये इतिहास के अंग नहीं बन सकते । वैदिक शब्दों के सहारे से ही सृष्टि का निर्माण होता है, अतः कहीं कहीं पर इन नामों और घटनाओं की ऐतिहासिकता मान भी ली जाय, तो भी वैदिक शब्दों के नित्य होने से इन घटनाओं को वैदिक मन्त्रों और ब्राह्मणों से प्राचीन नहीं माना जा सकता । इसी आधार पर खिल काण्डों को भी न तो हम प्रक्षिप्त ही मान सकते हैं और न यही माना जा सकता है कि इनकी रचना बाद में हुई, क्योंकि ये सब नित्य हैं । इसी लिये वायुपुराण आदि में खिल संहिताओं के संप्रदाय का वर्णन मिलता है । इसी लिये भगवत्पाद शंकराचार्य ने वंशब्राह्मण के भाष्य में समस्त प्रवचन वंश का उल्लेख किया है ( पृ ० ८७ ) । ' खिल काण्ड की संनिधि कारण यह उसके वंश का वर्णन है, इस शंका की निवृत्ति के लिये आचार्य वंशब्राह्मण के तात्पर्य को समझाते हैं यह आनन्दगिरि का कथन है । ब्राह्मणभाग की free ता प्रतिपादित है, अतः सभी ब्राह्मण ग्रन्थ स्वयम्भू ब्रह्मा से ही परम्परा के द्वारा प्राप्त हुए हैं । वंशनाह्मण में सामान्य प्रवक्ताओं का वर्णन नहीं है, यदि ऐसा होता तो आजकल के प्रवक्ताओं के नाम भी उसमें जुड़ जाने को आपत्ति उठ खड़ी हो सकती है । इसी लिये आजकल के प्रवक्ताओं के नाम के आधार पर काठक संहिता प्रभूति की नई आख्या नहीं बनाई जा सकती । अन्यथा कादि संहिता की तरह आजकल के प्रवक्ताओं के नाम के आधार पर सुशर्मा प्रभृति के द्वारा प्रोक्त होने से सोशर्मणी प्रभूति समाख्याएँ इन संहिताओं की बनने लगेगी । इसी तरह से ब्राह्मण में भी परम्परा में आये सभी प्रवक्तानों का समावेश नहीं होता, किन्तु वेद-कठादि के समान पौतिमाष्य प्रभृति शब्द भी नित्य सामान्य के वाचक है, व्यक्ति के नहीं । उन उन कल्पों में वसिष्ठ प्रभृति की तरह इनका भी प्रादुर्भाव होता रहता है । बाल्मीकि ने अपनी रामायण में कुश और लव को उसका प्रवक्ता और राम को उसके श्रोता के रूप में चित्रित किया है | महाभारत के प्रवक्ता भी सूत को माना जाता है । इसी तरह से स्वयम्भू ब्रह्मा से लेकर पौतिमाषी पुत्र पर्यन्त ऋषियों की प्रवक्त-परम्परा में शतपथ ब्राह्मण भी नित्य ही माना जायगा । ' जब सारा इतिहास उच्च स्वर से कहता है कि शतपथ ब्राह्मण याज्ञवल्य प्रोक्त है तो उसके प्रवक्ता ' वयं ' पद से अभिप्रेत अनेक आचार्य कैसे हो सकते हैं? अवश्य इन आचार्यों ने समय समय पर इस ब्राह्मण

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८६८ स्तदपि मन्दम्, मन्त्राणां ब्राह्मणानां चेतिहासाविषयकत्वस्योक्तत्वात् । वैदिकग्रन्थानां प्रवचनं त्वध्यापनमेव । अत एवानेकाचार्य प्रवक्तृकत्वमेकस्य ग्रन्थस्य नानुपपन्नम् । ' आख्या प्रवचनात् ' ( मी ० सू ० १ | १ | ३० ) इत्यादिजैमिनिसूत्रः शावर भाष्यादिभिश्च तत्समर्थितमेव | अन्यथा freitut नक्यादिसमाख्याभिस्त्वदभिमतानां बेदानामपि शाकल्यः शौनकादिकर्तृत्वेनाधुनिकत्वापत्तिर्दुर्निवारैव स्यात् । ' मस्त्रकृताम् ' ( ऋ ० सं ० ६ ११४/२ ) इत्यादिमन्त्रेश्च मन्त्राणां सकर्तृकत्वेनानित्यत्वापत्तिरपि तथैव स्यात् । जैमिनिव्यासादिभिस्तु नित्यवेद रूपत्वेनैव मन्त्रब्राह्मणारण्यकोपनिषदादीनां विचारः कृतः, सुत्राणां श्रुतिकुसुमग्रथनार्थत्वात् । तेन ब्रह्मसूत्रेषु ब्राह्मणारण्यकादीनां सङ्कलनात्तेषां महाभारतका लि + कत्वमित्यपि निर्मूलमेव । एवमेव ' तदु ह बाह्लिकः प्रातिपेयः शुश्राव कौरव्यो राजा ' ( पृ ० ९ ० ) ( शत ० १२।९ ।३।३ ) इत्यनेनापि शतपथस्य महाभारतकालिकत्वसाधनमनभिज्ञतामूलकमेव, मन्त्रेषु उर्वशीपुरूरवसोर्वर्णनान्मन्त्राणां तत्कालिकत्वापत्तेः । तेषामन्यार्थता तू नात्रापि दण्डवारिता । अत एव - ' कौशल्यां च य आशीभिर्भक्तः पर्युपतिष्ठति । आचार्यस्तैत्तिरीयाणामभिरूपश्च वेदवित् ॥ १५॥ '

.... ' पशुका मिश्च सर्वाभिर्गवां दशशतेन च । ये च मे कठकालापा बहवो दण्डमानवाः || १८ || ' ( वा ० रा ० अयोध्याकाण्ड ३२ ) इति श्रीरामकालिके वाल्मीकीये रामायणे दाक्षिणात्य संस्करणे कठकालापादीनामुल्लेखः, बङ्गीये पश्चिमोत्तरीये च संस्करणे- ' आचार्यस्तैत्तिरीयाणाम् ' ( पृ ० ९ ० ) इति पाठोऽस्त्येव, तस्माद् भगवद्दत्तादिसामाजिकानां पाश्चात्त्यनानां ब्राह्मणादिवेदग्रन्थानां कालनिर्धारणमशुद्धमेव । प्रक्षिप्तत्वकथनेन तु सामाजिक: पाश्चात्त्यशिष्यत्वमेवात्मनः प्रख्या में प्रक्षेप किये होंगे, चाहे वे प्रक्षेप थोड़े ही हो । हो सकता है कि इस विचार को कई लोग स्वीकार न करें, पर यह वंश तो उनको भी प्रक्षिप्त मानना ही पड़ेगा ' ( पृ ० ८७-८८ ) | भगवद्दत्त का यह कथन भी गलत है, क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मण भाग में कोई इतिहास afra नहीं है, यह बात बार बार कही जा चुकी है । वैदिक ग्रन्थों का प्रवचन उनका अध्यापन ही है । इसी लिये एक ही ग्रन्थ के ate आचार्यों को प्रवचन कर्ता मानने में कोई दोष नहीं है । इस बात का समर्थन ' आख्या प्रवचनात् ' यह मीमांसा सूत्र और उसके भाष्यर कार शबर स्वामी करते हैं । यदि ऐसा न माना जाय तो शाकली, शौनकी आदि समाख्याओं के आधार पर आपके अभिमत वेदों को भी शाकल्य, शौनक आदि की रचना मानकर अनित्यता की आपत्ति का निवारण नहीं किया जा सकता । इसी तरह से ' मन्त्रकृताम् ' इत्यादि मन्त्रों के आधार पर मन्त्रों की सकर्तृकता की सिद्धि होने से अनित्यता की आपत्ति आवेगी । जैमिनि, व्यास प्रभृति ने मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषद् का विचार उनको नित्य वेद मान कर ही किया है, क्योंकि सूत्र ग्रन्थ श्रुति रूपी कुसुमों को गूँथ कर उनकी माला बनाते हैं । इसी लिये ब्रह्मसूत्रों में ब्राह्मण, आरण्यक आदि का संकलन होने से उनकी रचना महाभारत काल में हुई यह कथन भी सर्वथा निर्मूल है ( पृ ० ८ ९ - ९ ० ) । इसी तरह से ' प्रतीप के तीसरे पुत्र बाह्लोक का वर्णन शतपथ ब्राह्मण में मिलता है- ' तदु ह ० ' इत्यादि । यह व्यक्ति महाभारतकालीन ही है और इसका उल्लेख करने से शतपथ भी लगभग उसी काल का ठहरता है ( पृ ० ९ ० ), यह कथन भी बक्ता की अनभिज्ञता का ही सूचक हैं । मन्त्रों में उर्वशी और पुरूरवा का वर्णन मिलता है, तो इस आधार पर उन मन्त्रों की तात्कालिकता मानी जायेंगी । उनका यदि कोई भिन्न ही अर्थ किया जाता है, तो उसी तरह का अर्थ यहाँ भी कर दिया जाता है, तो इसको रोकने के लिये कौन डंडा लेकर खड़ा है । इसी लिये -- ' कौशल्या च ० ' इत्यादि वाल्मीकीय रामायण के श्लोकों में तैत्तिरीय, कठ, कालापक आदि आचार्यो का उल्लेख है, इस पर जो शंका उठाई जाती है कि श्रीरामकालिक रामायण में इनका उल्लेख कैसे हो सकता है? यद्यपि कठ - कालापक का उल्लेख दाक्षिणात्य संस्करण में ही है, किन्तु तैत्तिरीयों का उल्लेख बंगीय और पश्चिमोत्तरीय संस्करण में भी है । इसी तरह के उद्धरणों के आधार पर भगवद्दत्त प्रभृति आर्यसमाजी और पाश्चात्य विद्वान् ब्राह्मणादि ग्रन्थों का काल निर्धारण करते हैं, जो कि गलत है । किसी भी अंश को प्रक्षिप्त मान लेने में आर्यसमाजियों ने अपने को पाश्चात्यों को पूरा चेला बना दिया है । इसी लिये आर्यसमाजियों

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anurfootn ८६६ पितम् । तत एव सामाजिकानां रीत्या महाभारत- रामायण- पुराण - मनुस्मृत्यादिषु सर्वेषु ग्रन्थेषु प्रक्षेपसम्भवात् प्रामाण्यं दुर्घटमेव | सनातनिसिद्धान्तरीत्या तु समेषामेषां प्रस्थानां प्रामाण्यमेव । पूर्वोक्तप्रन्थेषु गौतमकणादव्यासजैमिनिवात्स्या यनादिभिर्ब्राह्मणानां वेदत्वमनादित्वं प्रामाण्यं चाव्याहतमेवाङ्गीक्रियते । अत एव ब्राह्मणभाषा वेदभाषैव । यत्तु ' ब्राह्मणभाषा लौकिकभापा ' ( पृ ० ९ ६ ), तदपि सामाजिकानां भाषाविज्ञानजनिता भ्रान्तिरेव प्रामाणिकराचार्यैस्तेषां ' वेदत्वाभ्युपगमात् । इतिहास:, धर्मशास्त्रम्, आयुर्वेद:, अनुशासनानि, विद्या, वाकोवाक्यम्, पुराणम्, गाथाः, नाराशंस्यः, उपनिषद:, सूत्राणि, अनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि, आख्यानानि भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पजनविद्या, शिक्षा, कल्पः, व्याकरणम्, निरुक्तम्, छन्दः, ज्यौतिषम्, उपाङ्गग्रन्थाः, माहेश्वरयोगशास्त्रम्, बार्हस्पत्यार्थशास्त्रम्, न्यायशास्त्रम्, प्राचेतसकल्पः, महाभारतम्, रामायणम् - इत्यादयो ग्रन्था वैदिकवाङ्मयत्वेन परिगण्यन्ते । ( पृ ० ९ २ - ९ ५ ) भगवद्दत्तेन सर्वे चैते ब्राह्मणसम्मता इति स्वीक्रियते, तथापि ब्राह्मणानां प्रामाण्यस्वतस्त्वं नैवाभ्युपगम्यते । तेन केवल माडम्बरमेव तत्सर्वमिति । यदुक्तम्- ' एवमिमे सर्वे वेदा निर्मिताः सकल्पाः सरहस्याः सब्राह्मणाः सोपनिषत्का: सेतिहासा: साम्बा-ख्यानाः सपुराणाः सस्वराः ससंस्काराः सनिरुक्ताः सानुशासनाः सानुमार्जनाः सवाकोवाक्याः ' ( गोपथब्राह्मणे, पू ० २२ ९ ) अत्र ब्राह्मणकारः स्वयं कथयति यत् कल्पादयो न वेदाः, किन्तु वेदार्थसाहाय्याय तैः सार्धं निर्मिताः । यदा ब्राह्मणकारा एव एतेषां वेदत्वं नाङ्गीकुर्वन्ति चेत्कथं वयं तेषां वेदत्वं मन्यामहे ' ( पृ ० ९९ -१०० ) इति, तदपि न्याय्य मार्गाद्दवीयः, एते वेदा न सन्ति वेदार्थसाहाय्याय निर्मिता इति वाक्यस्य पूर्वोक्तवचनवहिर्भूतत्वात् । ब्राह्मणकारः कथयतीत्यपि निर्मूलम्, तस्यापौरुषेयत्वेन पुरुषकर्तृकत्वायोगात् । सवशिष्ठा ब्राह्मणाः सत्कर्तव्या इत्युक्तौ यथा न वशिष्ठस्याब्राह्मणत्वं तथैव सब्राह्मणाः सोपनिषत्का वेदा इत्युक्तावपि ब्राह्मणादीनामवेदत्वासिद्धेः । तेन ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायेन ब्राह्मणवशिष्ठ की पद्धति से महाभारत, रामायण, पुराण, मनुस्मृति आदि सभी ग्रन्थों में प्रक्षेप होने से इनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है । सनातनियों की दृष्टि से तो इन सभी ग्रन्थों का प्रामाण्य अव्याहत हैं । पूर्वोक्त ग्रन्थों में गोतम, कणाद, व्यास, जैमिनि, वात्स्यायन प्रभृति आचार्यो ने ब्राह्मण ग्रन्थों को अनादि वेद माना है और इनका अव्याहत प्रामाण्य भी स्वीकार किया है । इसलिये ब्राह्मणों की भाषा वेद की हो भाषा है | भगवद्दत्त ने ब्राह्मणों की भाषा को लौकिक भाषा माना है ( पृ ० ९ ६ ), किन्तु यह गलत हैं, आर्यसमाजियों में भाषाविज्ञान के अध्ययन यह भ्रम कैसा है । हमारे यहाँ के सभी प्रामाणिक आचार्यों ने ब्राह्मणों को वेद ही माना है । इतिहास - पुराण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, अनुशासन, विद्या, वाकोवाक्य, गाथा, नाराशंसी, उपनिषद्, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, आख्यान, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पजनविद्या, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष, उपांग ग्रन्थ, माहेश्वर का योगशास्त्र, बृहस्पति का अर्थशास्त्र, न्यायशास्त्र, प्राचेतस कल्प, महाभारत, रामायण इत्यादि ग्रन्थ वैदिक वाङ्मय के अंग के रूप में गिनाये गये हैं ( पृ ० ९ २ - ९ ५ ) । इन सबका प्रामाण्य ब्राह्मण ग्रन्थों में स्वीकृत है, तो भी भगवद्दत्त ब्राह्मणों को स्वतः प्रमाण नहीं मानते । इसलिये उनका यह पूरा प्रतिपादन आडम्बर मात्र है । ' एवम सर्वे वेदा: ' इस गोपथ ब्राह्मण के वचन को उद्धृत करके भगवद्दत कहते हैं कि - ' यहाँ ब्राह्मणकार स्वयं कह रहे हैं कि कल्प, रहस्य, ब्राह्मण, उपनिषत्, इतिहास, अन्वाख्यान, पुराण, स्वर [ ग्रन्थ ], संस्कार [ अन्य ], निरुक्त, अनुशासन, अनुमार्जन और वाकवाक्य आदि ग्रन्थ वेद नहीं है । वे वेदार्थ की सहायता के लिये उनके साथ निर्मित हुए थे । जब ब्राह्मणकार स्वयं इन्हें वेद नहीं मानते तो फिर हम क्यों इन्हें वेद माने ' ( पृ ० ९९ -१०० ) । यह बात भी ओचित्य से बहुत दूर है, क्योंकि उक्त गोपथ ब्राह्मण ' के वचन से यह बाहर की बात है कि ' ये वेद नहीं हैं, किन्तु वेदार्थ की सहायता के लिये उनके साथ निर्मित हुए थे ' । ' ब्राह्मण-कार कहते हैं ' यह भी निर्मूल है, क्योंकि ये सब अपौरुषेय हैं, अतः इनमें पुरुषकर्तृकता का संबन्ध हो ही नहीं सकता । वसिष्ठ के साथ ब्राह्मणों का सत्कार करना चाहिये, ऐसा कहने पर जैसे वसिष्ठ अब्राह्मण नहीं माने जाते, उसी तरह से ब्राह्मण और उपनिषदों के

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 900 का मूल पृष्ठ
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८७० वैवार्थपारिजाता न्यायेन वा वशिष्ठस्य ब्राह्मणविशेषत्ववद् ब्राह्मणादीनां वेदविशेषत्वेन सब्राह्मणा वेदा इत्युक्तेः सार्थक्यात् । एते ब्राह्मणग्रन्था एव ब्राह्मणानां वेदभिन्नत्वं कथयन्तीति कथनं मूढजनप्रतारणमेव, अन्यथा बेदा निर्मिता इत्युक्तवचनेन पौरुषेयत्वमपि स्यात् । यदि परमेश्वरेण निर्मिता इत्युक्त्या वेदानामपौरुषेयत्वम्, तहि सब्राह्मणाः सोपनिषत्का वेदा ईश्वरेण निर्मिता इति ब्राह्मणादीनामपि परमेशनिर्मितत्वेनापौरुषेयत्वसिद्धिः । यत्तु —- ' आचार्या आरण्यकं वेदत्वेन न मन्यन्ते स्म ' उक्तं च शौनकेन सुरूप कृत्स्नभूतय ' ( ऐतरेयारण्य के २५ ) इदं वचनं सायणेन स्वीये ऋक्संहिताभाष्ये ( ११४११ ) इति मन्त्रस्योपोद्घात उद्धतम् । एतेन स्पष्टं ज्ञायते यत् सायणोऽप्येतरेय ब्राह्मणस्येममंशं शोनककृतं स्वीकरोति ' ( पृ ० १०० १०१ ) इति, सदतीव तुच्छम्, उपरिनिर्दिष्ट वचनेनारण्यकस्यावेदत्वासिद्धेः । शौनकस्य प्रवक्तृत्वात् तेनोक्तमिति कथनमपि नासङ्गतम्, मन्त्राणामृषिकर्तृकत्व-श्रवणवत् । किच, ' ऋचो यजूंषि सामानि यथावत्प्रतिदैवतम् । आभूतसम्प्लवस्थायि वयेकं शतरुद्रियम् || ' ( वायु-पुराणे ५ ९ ( ५७ ) प्रतिकल्पमृगादीनां लोपाभिप्रायेणैषोक्तिः । शतरुद्रियं तु तदानीमपि न नश्यति, तदधिष्ठातरि ब्रह्मणि विद्यमानत्वात् । ' प्राजापत्या श्रुतिनित्या ' ( वायु ० पु ० ६ ९ ।७२ ) ऋगादीनामपि प्रजापती सत्वेन नित्यत्वमेव । लोकेऽ-नुपलब्ध्यभिप्रायेणैवाभूतसम्प्लवस्थायित्वव्यवहारः । ' ग्राम्यारण्यं समन्त्रं च ऋग्ब्राह्मणयजुः स्मृतम् । तथा हारिद्र बीयाणां खिलान्युपखिलानि च । तथैव तैत्तिरीयाणां परक्षुद्रा इति स्मृतम् । ' ( वायुपुराणे ६१।६५-६६ ) । सामाजिकास्तु दयानन्दग्रन्यानामपि प्रामाण्यमुपेक्षन्ते । दयानन्देन ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकायां वेदाम्नाय -श्रुत्यादिशब्दानां वेदपरत्वमङ्गीकृतम् । भगवद्दत्तस्तु - ' विविधाश्चोपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुतीः || ' ( मनु ० ६१२ ९ ), साथ वेद की चर्चा करने से ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों से भिन्न नहीं हो जाते । इसलिये ब्राह्मणपरिव्राजक न्याय से अथवा ब्राह्मणव सि न्याय से जैसे वसिष्ठ में ब्राह्मण्य का वैशिष्ट्य प्रतीत होता है, उसी तरह से ब्राह्मणादि ग्रन्थों को भी विशेष के रूप में ही स्वीकार किया जाता है, इस तरह से ' ब्राह्मण सहित वेद ' यह उक्ति सार्थक होती है । ये ब्राह्मण ग्रन्थ ही ब्राह्मणों को वेद से अलग बताते हैं, यह बात केवल अज्ञ जनों को ठगने के लिये है, क्योंकि ' वेदा निर्मिता: ' इस वाक्य से आपकी पद्धति से वेदों की पौरुषेयता क्यों न सिद्ध हो जायगी | यदि इसका परिहार इस तरह से किया जाता है कि इनको परमेश्वर ने बनाया तो ब्राह्मण और उपनिषद् ग्रन्थों के साथ वेदों को ईश्वर ने बनाया, इस तरह का अर्थ करने से ब्राह्मणादि भी परमेश्वर निर्मित होने से अपौरुषेय हो सिद्ध होंगे । .... आचार्य आरण्यकों को वेद नहीं मानते । एक आरण्यक को स्पष्ट हो एक ऋषि का बनाया हुआ माना गया है । सायण ऋग्वेदभाष्य ( ११४११ ) के उपोद्घात में लिखते हैं- ' उक्तं च शौनकेन ' । यह वाक्य ऐतरेय आरण्यक ( ५१२१५ ) में मिलता है । इससे पता चलता है कि बहुत पुराने काल में ही नहीं, प्रत्युत सायण तक भी ऐतरेय आरण्यक के इस अंश को शौनक कृत मानते हैं ' ( पृ ० १०००१०१ ) | यह कथन भी गलत है, क्योंकि ऊपर निर्दिष्ट वचन से आरण्यक ग्रन्थों की अवेदता नहीं सिद्ध हो पाती । शौनक इस भाग के प्रवक्ता है, इस आधार पर ' तेनोक्तम् ' यह कथन असंगत नहीं है, जैसे मन्त्रों की ऋषि कर्तृकता के माने जाने पर भी उसमें कोई दोष नहीं उद्भावित किया जाता । अपि च, ' ऋक्, यजु और साम इन तीनों की स्थिति प्रलय पर्यन्त प्रत्येक अलग अलग देवता में रहती है । एक शतरुद्रिय Store इसका अपवाद है ' वायुपुराण की यह उक्ति प्रत्येक कल्प में वेद लुप्त हो जाते हैं, इसी अभिप्राय को व्यक्त करने के लिये कही गई है । शतरुद्रिय अध्याय तब भी लुप्त नहीं होता, क्योंकि इस अध्याय की स्थिति उन देवताओं के भी rear ब्रह्मा में रहती है और यह स्पष्ट ही प्रतिपादित है कि प्राजापत्य श्रुति नित्य होती है । ऋगादि की भी स्थिति प्रजापति में रहती है, अतः वे भी नित्य हैं | लोक में उनके उपलब्धि न होने से उनकी स्थिति प्रलय काल पर्यन्त ही बताई गई है । ' ग्राम्य और आरण्य साम, मन्त्रों सहित ऋग्वेद का ब्राह्मणभाग, यजुर्वेद, हारिद्रव शाखा के खिल तथा और उपखिल तथा इसी प्रकार से तैत्तिरीय शाखा के अंश ये सब नित्य वेद के ही अन्तर्गत हैं " ।