वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 21–30

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 21–30

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[ ८ ] यदुक्तमर्थावबोधपर्यवसायित्वमेवास्य विधेरक्षरप्राप्ति मात्रेणफलासिद्धेः, यद्यपि विहितस्वाध्यायाध्ययनमात्रा-दर्थावबोधो न दृष्टस्तथापि निगमनिरुक्तव्याकरणादिवेदाङ्गपरिशीलनाद् भवत्येवार्थबोध ' इति, तदपि न युक्तम्-विकल्पासहत्वात् । ११- तथाहि किमर्थावबोधः स्वयमेव स्वर्गादिवत् पुरुषार्थः, अग्निहोत्राद्यनुष्ठान द्वारा वा? नाद्यः, अनुष्ठानवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । नद्वितीयः, अर्थावबोधस्यानुष्ठानहेतोः परम्परयैव पुरुषार्थहेतुत्वात् अर्थावबोधहेतुभूताया अक्षरप्राप्तेरपि परम्परयैव पुरुषार्थहेतुत्वात् विधेरक्षरप्राप्तावेव पर्यवसानात् । किञ्चानुष्ठानद्वारा स्वर्गफलोपेतेऽर्थावबोधे विधिपर्यवसानं वदतः कृत्स्नवेदाध्ययनं न सिद्ध्यति, राजसूयाश्वमेधादावनधिकारिणो ब्राह्मणस्य तत्फलत्वपर्यन्तार्थावबोधासम्भवात् । अक्षर प्राप्तिफलवादिनस्तु कृत्स्नवेदाध्ययनं सिद्धयति । ब्रह्मयज्ञे जपहेतुत्वात् ब्राह्मणोऽपि राजसूयाश्वमेधादिवेदभागे ब्रह्म-यज्ञ जपं करोत्येव । १२ - न चैवं कथमर्थावबोधसिद्धिरिति वाच्यम्, काव्यनाटकादिग्रन्थेषु वैदिकविधिमन्तरापि यथार्थबोधस्तथैव वेदेऽपि सम्भवात् । न च विघ्यर्थाभावेऽर्थावबोधप्रयुक्तमहारं किञ्चिदपि न सिद्ध्यतीति वाच्यम्, अर्थावबोधस्याध्ययनविधिप्रयुक्तयभावेऽपि ' ब्राह्मणेन निष्कारणोधर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्चे ( म ० भा ० पस्पशाह्निक ) ति विध्यन्तरप्रयुक्तत्वसम्भवात् । ' योऽर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मे, ( शा ० आ ० १४।२ ) तिच विधिरस्ति तत्र तत्र, तस्मादध्ययनविधिरक्षरप्राप्तिपर्यवसायी । अर्थावबोधस्तु विध्यन्तरप्रयुक्तः । पूर्वपक्षी के द्वारा यह जो कहा जाता है कि ' अध्ययन विधि ' का पर्यवसान ' अर्थज्ञान ' में ही होता है । क्योंकि केवल अक्षरप्राप्तिमात्र से फल की सिद्धि नहीं हो सकती । यद्यपि ' अर्थज्ञान ' भी केवल स्वाध्याय के अध्ययनमात्र से ही नहीं हो सकता तो निगम, निरुक्त, व्याकरण आदि वेदाङ्गों का परिशीलन करने पर अर्थज्ञान हो ही जाता है । ' किन्तु पूर्वपक्षी का यह आक्षेप, प्रश्नों के विविध विकल्पों के सामने टिक नहीं सकेगा । ११ – प्रथम प्रश्न तो यही है कि ' क्या अर्थज्ञान स्वर्ग आदि के समान स्वयं ही पुरुषार्थ है? अथवा अग्निहोत्र आदि के अनुष्ठान के द्वारा अर्थज्ञान में पुरुषार्थता आती है? यदि प्रथम पक्ष को स्वीकार करोगे तो ' अनुष्ठान ' की व्यर्थता होगी । यदि द्वितीय पक्ष को स्वीकार करोगे तो अनुष्ठान के हेतुभूत अर्थावबोध ( अर्थज्ञान ) में परम्परया जैसी पुरुषार्थ हेतुता रहती है, वैसी ही अर्थावबोध से हेतुभुत अक्षरप्राप्ति में भी परम्परया ही पुरुषार्थ हेतुता है इसलिये विधि का पर्यवसान अक्षरप्राप्ति में ही हो रहा है । अतः द्वितीय पक्ष भी तुम्हारे लिये ठीक नहीं है । किच-- अनुष्ठान द्वारा स्वर्गफल ( अदृष्टफल ) वाले अर्थावबोध में विधि का पर्यवसान मानने वाले तुम्हारे मत से समस्त वेद का अध्ययन नहीं हो सकेगा, क्योंकि राजसूय, अश्वमेध आदि कर्मों में अनधिकारी ब्राह्मण को उन कर्मों के फल बोधक अर्थज्ञान का होना सम्भव नहीं है? और अक्षर प्राप्तिरूपफल को माननेवाले के मत से तो समस्त वेद का अध्ययन हो पाता है । ब्रह्मयज्ञ में जप की हेतुता होने से ब्राह्मण भी राजसूय, अश्वमेधादि वेदभाग का? ( ब्रह्मयज्ञ ) जप करता ही है । - इस १२. पर यदि कोई कहे कि उससे अर्थाव बोध कंसे हो सकेगा? किन्तु उसकी यह शङ्का उचित नहीं कही जायगी, क्योंकि काव्य - नाटकादि ग्रन्थों में वैदिक विधि के बिना भी जैसे अर्थ बोध होता है, वैसे ही वेद में भी हो सकता है । यदि यह कहा जाय कि विध्यर्थ के अभाव में ( अर्थज्ञान के विधि प्रयुक्त न रहने पर ) अर्थावबोध प्रयुक्त अदृष्ट कुछ भी नहीं हो पायगा, तो यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अर्थावबोध में अध्ययन विधि की प्रयुक्ति न रहने पर भी ' ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गों वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च इस अन्य विधि से उसकी प्रयुक्ति हो सकती है । और ' योऽर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमश्नुते नाक मेति ज्ञानविधूत पाप्मा ' इस अन्यविधि से भी उसकी प्रयुक्ति का होना सम्भव है । इसलिये अध्ययन विधि का पर्यवसान अक्षर प्राप्ति में ही होता है, और अर्थाव बोध तो विध्यन्तर से प्रयुक्त होता है ।

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[ ] १३- तत्र वेदे कर्मकाण्डो ब्रह्मकाण्डश्चेति द्वौकाण्डौ । कर्मपर्यवसायीभागः कर्मकाण्डो ब्रह्मप्रधानोऽनन्यशेषो ब्रह्मकाण्डः । न च ‘ बृहदारण्यकाख्यो ग्रन्थो ब्रह्मकाण्डस्तद्व्यतिरिक्तं शतपथब्राह्मणं संहिता चेत्यनयोः कर्मकाण्डत्वम्, तत्रोभयत्राग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादिकर्मण एव प्रतिपाद्यत्वात् बृहदारण्यकेतु ब्रह्म प्रतिपाद्यते इति सायणीयकाण्वभाष्यो पोद्घातविरोध इतिवाच्यम्, बृहदारण्यकस्य अनन्यशेषब्रह्मप्रधानमन्त्रब्राह्मणोपलक्षणार्थत्वात् । ' ईशावास्यमित्यादयो-मन्त्राः कर्मस्वविनियुक्तास्तेषामकर्मशेषस्य आत्मनो याथात्म्याप्रकाशकत्वात् ' इति शाङ्करभाष्यानुरोधाच्च । यद्यपि संहिता सहस्रशो मन्त्रा ब्रह्मप्रतिपादकाः सन्ति तथापि तेषां तेषु तेषु कर्मसु विनियुक्तत्वात् कर्मशेषत्वात् न ब्रह्मप्रधानत्वं सम्भवति । तत एवातत्प्रधानत्वात् न ते द्वैतपराणि आगमवचनानि प्रत्यक्षानुमानानि च बाधितुं समर्थाः, तत्प्रधानानामेवातत्प्रधानबाधकत्वसम्भवात् तदभिप्रायेणैव ' द्वेविद्ये वेदितव्ये चैवापरा च ' ( मु ० १ । १ । ४ ) तत्रापरा-१४ - परा यामेवर्व्वेदादीनामन्तर्भावउक्तः । यया तददृश्यमग्राह्यमक्षरं गम्यते तस्या एव परत्वमुक्तम् मुण्डके । तच्वभूमि-कायमुक्तमेव । महातात्पर्य विचारे तु सर्वस्यैव वेदस्य ब्रह्मपर्यवसायित्वमेव, ' सर्वेवेदा यत्पदमामनन्ति ' ( कठोप ० १।२।१५ ) ' वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ' ( श्रीभ ० गी ० १५ १५ ) इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः । अवान्तर तात्पर्यरीत्या तु कर्माणि वेदस्य -विषयः । तदभिप्रायेणैव ' त्रैगुण्यविषया वेदा: ' ( श्री ० भ ० गी ० २१४५ ) ' दृष्टवदानुश्रविक: ' ( सां ० का ० २ ) इत्या-१३ – वेद में ' कर्मकाण्ड ' और ' ब्रह्मकाण्ड ' भेद से दो काण्ड है, उन में से कर्मपर्यवसायी भाग ' कर्मकाण्ड ' और ब्रह्म प्रधान तथा अनन्य शेष जो भाग है वह ' ब्रह्मकाण्ड ' के नाम से प्रसिद्ध है । इस पर यदि कोई कहे कि ' बृहदारण्यक नाम का ग्रन्थ ब्रह्मकाण्ड भाग और उससे भिन्न ( पृथक् ) जो शतपथ ब्राह्मण और संहिता – इन दोनों को कर्मकाण्ड भाग कहा जाय, क्योंकि इन दोनों में अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास आदि कर्म का ही प्रतिपादन किया गया । है । और बृहदारण्यक में तो ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है - यह सायण तथा काण्वभाष्य के उपोद्यात के साथ का प्रधानरूप वर्णन करने विरोध की शङ्का नहीं करनी चाहिये, क्योंकि ' बृहदारण्यक ' शब्द से अनन्यशेषरूप ' ब्रह्म ' वाले समस्त मन्त्र और ब्राह्मणों का ग्रहण किया जाता है । शाङ्करभाष्य में भी कहा गया है कि ' ईशावास्यम् ' इत्यादि मन्त्रों का विनियोग, कर्मों में नहीं है, अतः वे मन्त्र, अकर्म शेष ' आत्मा ' के स्वरूप को प्रकाशित करते हैं । संहिताओं में सहस्रशः मन्त्र ' ब्रह्म ' के पतिपादक हैं, तथापि उनमें प्रतिपाद्य ' ब्रह्म ' की प्रधानता नहीं कही जा सकी, क्योंकि अनेकानेक कर्मों में उन मन्त्रों का विनियोग बताया गया है । अतः वे मन्त्र, कर्मशेष ( कर्म के अङ्ग ) हैं, उनमें ब्रह्म की प्रधानता रहने का सम्भव नहीं है । अतएव अतत्प्रधान होने से वे मन्त्र, द्वैतपरक आगम-वचनों और प्रत्यक्ष - अनुमान आदि का बाध करने में समर्थ नहीं हैं । तत्प्रधानवचन के द्वारा ही अतत्प्रधान वचन का हो सकता है । १४ – उसी अभिप्राय से यह कहा गया है कि ' दो विद्यायें ज्ञातव्य हैं, जो ' परा ' और ' अपरा ' होती हैं । उन दोनों में से ' अपरा विद्या ' में ही ' ऋग्वेद ' आदि का अन्तर्भाव कहा गया है । मुण्डकोपनिषद् में ' परा ' उस विद्या को बताया है - जिससे अदृश्य, अग्राह्य अक्षर ' का ज्ञान होता है । यह बात भूमिका में स्पष्ट की जा चुकी है । महा तात्पर्य का विचार करने पर तो सम्पूर्ण वेद का पर्यवसान ' ब्रह्म ' में हो है । कठोपनिषद् के वचन--" समस्त वेद, जिसके स्वरूप का प्रतिपादन करते हैं " - से तथा श्रीमद् भगवद् गीता के वचन-- " सभी वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य हूँ " - से भी उपर्युक्त कथन की ही सिद्धि हो रही है । अवान्तर तात्पर्य का विचार करनेपर ' कर्म ' ही वेद के प्रतिपाद्य विषय हैं । इसी अभिप्राय को ' वेद त्रैगुण्य विषय वाले हैं ' - यह गीता की उक्ति तथा ' दृष्ट के समान ही आनुश्रविक हैं - यह ईश्वर कृष्ण को उक्ति बता रही है । इन में भी वेदों की गुण्य विषयता सकाम पुरुषों के लिये -

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[ १० ] द्युक्त यः । तत्रापि सकामानामेवावान्तरतात्पर्य विधयपि वेदानां त्रैगुण्यविषयत्वम् महातात्पर्यालोचनेन व्यवसाया-त्मिकायां बुद्धौ परिनिष्ठितानान्तु कर्मणामपि ब्रह्मार्पणबुद्ध्यानुष्ठानेन तदुपासनारूपत्वात् बुद्धिशुद्धयादि क्रमेण ब्रह्मावग-पर्यवसायित्वमेव । १५ – तद्बोधार्थी तत्राधिकारी । तत्रप्रयोजनं विषयेण जन्यते । तेन विषयप्रयोजनयोर्जन्यजनकभावः सम्बन्धः । प्रयोजनाधिकारिणोरर्थ्यमानार्थित्वम्सबन्धः । अधिकारिविषययोस्तु प्रयोजनद्वारेणोपकार्योपकारकत्वसम्बन्धः । यद्यपि ब्रह्मणोऽभ्र्भ्याहतत्वात् ब्रह्मकाण्डस्यैव प्राथम्यमुचितम्, तथापि भगवदाराधन बुद्ध्यानुष्ठीयमानकर्मभिरेव बुद्धिशुद्धिसम्भवेन तदन्तरा ब्रह्मकाण्डेऽधिकारासम्भवात् पूर्वं कर्मकाण्ड आम्नातः । नित्यनैमित्तिककाम्यप्रतिषिद्धभेदेन कर्माणि चतुविधानि । नित्यनैमित्तिकयोरननुष्ठानात् प्रतिषिद्धाचरणाच्च प्रत्यवाय उत्पद्यते । १६ – प्रत्यवायेन बुद्धिमान्धे सति नित्यानित्यवस्तुविवेक वैराग्यशमदमादीनामनुदयाद् ब्रह्मात्मतत्त्वजिज्ञासा न जायते । तस्माद्विविदिषायै यज्ञतपोदानादीनां बृहदारण्यके विधानं दृश्यते - ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञ ेन दानेन तपसाऽनाशकेने ( वृ ० उ ० ४ | ४ | २२ ) ति । वेदानुवचनयज्ञादिभिः प्रत्यक्प्रवणतालक्षणब्रह्मात्मतत्त्व वेदनेच्छा जायते इति कर्मणां तत्रैव मुख्य उपयोगः । ' प्रत्यक्प्रवणतां बुद्धेः कमनियापाद्य यत्नतः । कृतार्थान्यस्तमायान्ति प्रावृडन्ते-घना इव ॥ ' इति नैष्कर्म्य सिद्धिवचनात् । प्रकृतिप्रययौ यत्र सहार्थं ब्रूतस्तत्र प्रत्ययार्थस्यैव प्राधान्यमितिरीत्या प्रत्यया-ही अवान्तरतात्पर्यरूप से बताई गई है । महातात्पर्य के पर्यालोचन से स्पष्ट प्रतीत होता है कि जिनकी व्यवसायात्मिका बुद्ध परिनिष्ठित हो चुकी है. उनके द्वारा कर्मों का अनुष्ठान भी ब्रह्मार्पणबुद्धि से ही किया जाता है । वह कर्मानुष्ठान, भी उपासनारूप है । अतः उसका भी ' बुद्धिशुद्धि ' आदि के क्रम से ' ब्रह्मज्ञान ' में ही पर्यवसान होता है । र्थी १५ – उसका अधिकारी ' ब्रह्मज्ञाना भी होता है । और ' प्रयोजन ' की सिद्धि ' विषय ' के द्वारा होती है । अतः ' विषय ' और ' प्रयोजन ' का परस्पर ' जन्यजनकभाव ' सम्वन्ध हुआ करता है । एवं ' प्रयोजन ' और ' अधिकारी ' का ' ग्राह्य - ग्राहकभाव ' सम्बन्ध होता है । तथा ' अधिकारी ' और ' विषय ' का ' प्रयोजन ' के माध्यम से ' उपकार्योपकारकभाव ' सम्बन्ध होता है | यद्यपि ' बह्म ' के अभ्यर्हित रहने से उसके प्रतिपादक ब्रह्मकाण्ड ' का आम्नाय करना ही प्रथमतः उचित था, तथापि भगवदाराधनबुद्धि से अनुष्ठेय कर्मों के द्वारा ही ' बुद्धि ' की शुद्धि होना सम्भव है, उसकी शुद्धि के बिना ' ब्रह्म-काण्ड ' में अधिकार प्राप्त होना सम्भव नहीं है । अतः ' कर्मकाण्ड ' का आम्नाय ही प्रथमतः किया गया है । ' नित्य, नैमित्तिक, काम्य और प्रतिषिद्ध ' – इन भेदों से ' कर्म ' चार प्रकार का होता है । इनमें से ' नित्य ' तथा ' नैमित्तिक ' कर्मों का अनुष्ठान न करने से तथा ' प्रतिषिद्ध ' कर्मों का आचरण करने से ' प्रत्यवाय ' उत्पन्न होता है | १६ – ' प्रत्यवाय ' से बुद्धि के मन्द हो जाने पर ' नित्य ' और अनित्य ' वस्तु का विवेक, तथा वैराग्य, शम, दम आदि का उदय नहीं होता है । उसके अभाव में ' ब्रह्मतत्त्व ' की जिज्ञासा का उदय नहीं हो पाता है । अतः ' ज्ञान ' की इच्छा अथवा ' विविदिषा ' के लिये यज्ञ, तप, दान आदि का विधान, बृहदारण्यकोपनिषद् में किया गया है । ब्राह्मणलोग इस ब्रह्मतत्त्व ' को जानने के लिये वेदाध्ययन के द्वारा तथा यज्ञ, दान, अनशन, तप आदि के द्वारा प्रयत्न करते हैं । वेदाध्ययन, यज्ञ आदि के द्वारा प्रत्यगात्मस्वरूप ब्रह्मतत्त्व के ज्ञान की इच्छा होती है । अतः इसी ज्ञानेच्छा में कर्मों का प्रमुख उपयोग है । नेष्कर्यसिद्धि में कहा गया है कि बुद्धि को प्रत्यक् चैतन्य में प्रयत्नपूर्वक अभि-मुख करके किये गये विहित निष्कामकर्म सफल हो जाते हैं तथा कृतकृत्य होकर अन्त में अस्त हो जाते हैं, जिस प्रकार वर्षा के अन्त में मेघ अस्तङ्गत हो जाते हैं ।

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[ ११ ] र्थस्य प्राधान्यात् वेदनेच्छायां यज्ञादीनां करणत्वेनान्वयः । “ स्वर्गकामो यजेते " त्यादौ तु इच्छाविषयतया शब्दबोध्ये स्वर्गे शब्दविक्चैयाऽप्रधानेऽपि साधनान्वयदर्शनात् असिना जिघांसति, अश्वेन जिगमिषति इत्यादाविवेष्यमाणवेदन एव यज्ञा-दीनां साधनत्वेनान्वय इति च पक्षद्वयम् । १७ - पूर्वत्र कर्मादिभि: प्रत्यक्प्रवणतालक्षणायां वेदनेच्छायां जातायां मनननिदिध्यासनयुक्त नोपक्रमोपसंहा-रादिषड्विधलिङ्ग ब्रह्मात्मनि तात्पर्यावधारणलक्षणेन ब्रह्मात्मसाक्षात्कारो जायते । उत्तरत्र तु भगवदाराधनबुद्धया-नुष्ठितयज्ञादिप्रभाव एव क्रमेण बुद्धेः प्रत्यगाभिमुख्यापादनाचार्योपगमननिर्विघ्नश्रवणमनननिदिध्यासनपूर्वक ब्रह्मात्म-साक्षात्कारमापादयति । ' कार्याबृष्टिकामो यजेत ' ' चित्रया यजेत पशुकाम: ' ( तै ० सं ० २०४ | ६ | १ ) इत्यादीनि तु काम्यकर्माणि परम-पुरुषार्थसाधनाभावेऽपि स्वाभाविककामकर्मज्ञानवतां वैदिकमोर्गेफलसंवादेन श्रद्धामुत्पादयितुमाम्नायन्ते । किं बहुना -ऽऽभिचारिककर्मणामपि द्वेषक्रोधाद्यभिभूतमतीनां स्वाभाविकद्वेषक्रोधादिजनितवेगनिरोधार्थं वैदिकोपायाभिमुख्यसम्पाद-नार्थमेव विधानम् । १८ - कालातिक्रमबहुवित्तव्ययक्लेश साध्य कर्मानुष्ठानभीत्यापि वेगेऽवाधि तदनुष्ठानेन शत्रुमरणेऽपि शत्रुभिस्तदीयैरन्यैः शासकैश्च । वाधाभावः, देवता ब्राह्मणतर्पणदानादिसत्कर्मानुष्ठानादिभिहिंसादिकर्मणां मार्दवापादनम् स्थालीपुलाकन्यायेन वेदैकदेशोपदिष्टोपायसाफल्येन वैदिकोपायेषु सुदृढास्थोत्पद्यते । ततः प्रायश्चित्ताचरणम् । है " ' प्रकृति ' और ' प्रत्यय ' जहाँ साथ - साथ अपने अर्थ को प्रकट करते हैं, वहाँ ' प्रत्ययार्थ ' की ही प्रधानता होती १५ " - इस पद्धति से प्रत्ययार्थ की प्रधानता के कारण ' जिज्ञासा ' ( ज्ञान की इच्छा ) में यज्ञादि का साधनत्वेन ( साधन-रूप से ) ही अन्वय होता है । ' स्वर्गकामो यजेत ' - इत्यादि वाक्यों में तो शब्द बोध स्बर्ग, पुरुषेच्छा का विषय होने से शब्दविधया अप्रधान रहने पर भी उसी में यज्ञ ' आदिकों का साधनत्वेन ( करणत्वेन ) अन्वय होता है — यह एक पक्ष है 1 | और खड्ग से मारना चाहता है ', तथा ' अश्व से जाना चाहता है ' - इत्यादि वाक्यों के समान ' अभीप्सित ज्ञान ' में ही यज्ञादिकोंका साधत्वेन अन्वय होता है - यह दूसरा पक्ष है । 20 १७ - उनमें से प्रथम पक्ष में- कर्मादि द्वारा प्रत्यगात्म प्रवणतारूप स्वरूप के प्रति जिज्ञासा की उत्पत्ति होने पर मनन - निदिध्यासन से युक्त हुए उपक्रमोपसंहारादि षड्विध तात्पर्य निर्णायक लिङ्गों से एवं ब्रह्मात्मा में ( ब्रह्म स्वरूप में ) तात्पर्यावधारण रूप श्रवण से ब्रह्मात्मसाक्षात्कार होता है । और द्वितीय पक्ष में भगवदाराधन बुद्धि से अनुष्ठित यज्ञ का प्रभाव ही क्रमशः प्रत्यगात्मा की ओर बुद्धि को सम्मुख कराते हुए, आचार्य के समीप पहुँचाकर विघ्न वाधारहित श्रवण - मनन- निदिध्यासन पूर्वक ब्रह्मसाक्षात्कार करा देता है । वृष्टि की कामना करने वाला पुरुष २५ ‘ कारीरीष्टि ' करे, तथा पशु की कामना करने वाला ' चित्रेष्टि ' का अनुष्ठान करे । इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित काम्यकर्म, यद्यपि परमपुरुषार्थ के साधन नहीं हैं, तथापि स्वाभाविक इच्छा और कर्म का ज्ञान रखने वाले मनुष्यों की फलप्राप्ति के द्वारा वैदिक मार्ग में श्रद्धा उत्पन्न हो, एतदर्थ उनका ( काम्यकर्मों का ) श्रुति ने प्रतिपादन किया है । अधिक क्या कहा जाय! आभिचारिक कर्मों का प्रतिपादन भी द्वेष - क्रोधादि के वशङ्गत रहनेवाले मनुष्यों के स्वाभा-विक द्व ेष - क्रोधादि वेगों को अवरुद्ध करने के लिये तथा वैदिक उपायों की ओर उन्हें अभिमुख ( आकर्षित ) करने के ३० लिये ही श्रुति ने किया है । १८ - अधिक समय लगने से तथा अधिक धनव्यय के कारण एवं कष्ठसाध्य कर्मों के अनुष्ठान भय से भी जब द्वेष, क्रोधादि वेगों पर नियन्त्रण नहीं हो पाता है, उस स्थिति में उसके लिये आभिचारिक कर्मों का अनुष्ठान से श्रुति ने बताया है । उनके अनुष्ठान से शत्रुमरणरूप अभीप्सितफल की प्राप्ति भी होगी, साथ ही शत्रु तथा उसके

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[ १२ ] तात्पर्येण स्वधर्मानुष्ठानपूर्वक भगवदाराधनेऽपि प्रवृत्तिर्जायते ततः क्रमेण नैष्कर्म्य सिद्धि लभते । तदुक्तम् ' वेदोक्तमेव-कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यं लभते सिद्धि रोचनार्था फलश्र ुति: ' ( श्री ० भा ० म ० पु ० २१ | ३ | ४६ ) इति । यथा जननी वत्स गडूचीं पित्र खण्डलड्डूकं ते दास्यामोति प्रलोभ्य वालं गडूचीं पाययति खण्डलड्डूकं च प्रयच्छति तथापि गडूचीपानफलमारोग्यं न मोदकप्राप्तिः, एवमेव श्रुतिः पाशविककामकर्मज्ञाननिवृत्तिद्वारा ब्रह्मात्मसाक्षा-५ त्कारपूर्वकं नैष्कर्म्यस्वात्मावस्थान सम्पिपादयिषयैव कर्माणि विदधाति, स्वर्गादिफलश्र ुतिस्तु रोचनार्थैव । तस्मात्कर्म-काण्डगतयोः संहिताशतपथयोः प्राधान्येन नित्यकर्माण्येवाम्नातानि । १८ – संहिताग्रन्थेऽस्मिन् चत्वारिंशदध्यायाः । तेषु प्रथमद्वितीययोरध्याययोर्दशपूर्णमासौ तृतीयेऽन्वाधानाग्नि होत्राग्न्युपस्थानचातुर्मास्यानि । चतुर्थमध्यायमारभ्य नवमाध्यायपर्यन्तं षट्स्वध्यायेषु अग्निष्टोमः । दशमे वाजपेयः एकादशे राजसूयः । द्वादशमारम्य विशान्तेषु नवस्वध्यायेषु अग्निचयनम् । एकविंशद्वाविंशत्रयोविंशेषु त्रिष्वध्यायेषु सौत्रामणी । १० चतुर्विंशमारभ्य सप्तविंशपर्यन्तं चतुर्ध्वध्यायेषु अश्वमेधः । अष्टाविंशमारभ्य त्रयस्त्रिशान्तेषु षट्स्वध्यायेषु यत्र तत्र विप्र-कीर्णा लिङ्गविनियोज्या अनारभ्याधीता मन्त्राः । २० - चतुस्त्रिशपञ्चत्रिंशयोः पुरुषमेधः षट्त्रिंशे शान्तिः सप्तत्रिंशमारभ्यैकोनचत्वारिंशपर्यन्तं त्रिष्वध्यायेषु सम्बन्धी एवं अन्य शासकों से भी कोई पीड़ा नहीं हो पाएगी । और देवतापूजन, ब्राह्मणतर्पण, दानादि सत्कर्मों के अनुष्ठान से हिंसादि कर्मों की प्रवृत्ति में मृदुता भी सम्पन्न हो सकती है, अथवा अभिचार के द्वारा मारित व्यक्ति की १५ हिंसा से उत्पन्न फल ( पाप ) की उग्रता को दूर कर उसे मृदु बनाया जा सकता है । इस प्रकार स्थाली पुलाकन्याय से वेद के अ'शात्मक उपदिष्ट उपाय के सफल होने से अन्य वैदिक उपायों में भी दृढ़ आस्था उत्पन्न होगी । तदनन्तर आभिचारिक पुरुष, प्रायश्चित्त कर्मों का अनुष्ठान करेगा । साथ ही वह अपने कल्याण के लिये तत्परता से स्वधर्मानु-ठान में संलग्न होता जायगा, उससे शनैः शनैः क्रमशः भगवदाराधना में भी उसकी प्रवृत्ति होने लगेगी । उससे क्रमशः वह नैष्कर्म्य में सिद्धि प्राप्त कर सकेगा । श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि ' मानव निःसङ्ग होकर वैदिक कर्मों का 20 अनुष्ठान करता हुआ और उन्हें ईश्वरापित करता हुआ नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, विविध कर्मफलों का कथन तो आकर्षण उत्पन्न करने के लिये है । जैसे माता अपने रुग्ण बालक से कहती है कि- बेटे! कड़वी गिलोय औषधि को पीलो, तुम्हें लड्डू करके वह गिलोय औषधि पिला देती है, और उसे दूंगी ' १ - - इस प्रकार उसे आकृष्ट लड्डू भी देती है, तब भी गिलोय औषधि पीने का फल तो रोग की निवृत्ति ही है । लड्डू की प्राप्ति नहीं । १६ – उसी प्रकार भगवती श्रुति भी पाशविक काम कर्म और ज्ञान की निवृत्ति के द्वारा ब्रह्मात्मसाक्षात्कार पूर्वक नैष्कर्म्यरूप स्व - स्वरूपावस्था सम्पादित कराने की इच्छा से ही कर्मों का विधान करती है । कर्मों के द्वारा स्वर्गादि फलों का श्रवण तो आकर्षण उत्पन्न करने मात्र के लिये है । अतएव कर्मकाण्ड के अन्तर्गत संहिता और शतपथ ब्राह्मण में नित्यकर्मों का ही प्रधानरूप से विधान किया गया है । इस संहिताग्रन्थ में चालीस अध्याय है । उनमें से प्रथम और द्वितीय अध्यायों में ' दर्शपूर्णमास ' नामक दो सामुदायिक कर्म, तृतीय अध्याय में ' अन्वाधान ' अग्निहोत्र अग्न्युपस्थान ' तथा चातुर्मास्य का प्रतिपादन किया गया है । चतुर्थ अध्याय से नवम अध्याय तक यानी छह अध्यायों में ' अग्निष्टोम ' का प्रतिपादन किया गया है । दशम अध्याय में ' वाजपेय ', एकादशवें अध्याय में ' राजसूय ' का प्रतिपादन है । द्वादशवें अध्याय से बीसवें अध्याय तक यानी नौ अध्यायों में ' अग्निचयन ' का प्रतिपादन है । इक्कीसवें, बाईसवें और तेईसवें इन तीन अध्यायों में ' सौत्रामणी ' याग का विधान है । चौबीसवें अध्याय से सत्ताइसवें अध्यायतक चार अध्यायों में अश्वमेध का विधान है । २० - अट्ठाईसवें से तेतींसवें अध्याय तक छह अध्यायों में उन मन्त्रों को बताया गया है; जो विप्रकीर्ण रूप

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[ १३ ] र्ग्यः प्रवः चत्वारिंशे ब्रह्मविद्या । प्रकृतित्वान्निरपेक्षत्वाच्च प्रथमं दर्शपूर्णमासेष्टिरेव निरूपिता । यत्र प्रकर्षेणाङ्गोपदेश: सा प्रकृतिः, विकृतिषु विशेषाङ्गमात्रस्योपदेशः । अङ्गान्तराणितु प्रकृतेरतिदिश्यन्ते । सा च प्रकृतिस्त्रिधा अग्निहोत्रमिष्टिः सोमश्च । त्रिष्वप्येतेषु अन्यनैरपेक्ष्येण स्वाङ्गजात कृत्स्नमुपदिष्टम् । तत्रापि सोमयागस्य स्वरूपेणान्यनैरपेक्ष्येऽपि अङ्गेषु दीक्षणीया-दिषु दर्शपूर्णमासेष्टिसापेक्षत्वात् नेष्टेः पूर्वभावित्वम्, इष्टेश्च सोमयागनैरपेक्ष्यात् सोमात्प्राचीनत्वम् युक्तम् । यद्यप्यग्नि- ५ होत्रस्य स्वरूपाङ्गषु नास्त्यन्यापेक्षा तथाप्यग्निसिद्ध यपेक्षत्वात् आहवनीयाद्यग्नीनाश्व पवमानेपि साध्यत्वात् पवमा-नेष्टीनाच दर्शपूर्णमासविकृतित्वात् परम्परयाग्निहोत्रस्य दर्शपूर्णमासापेक्षास्तीति प्रथमभावित्वं युक्तम् । २१ - ननुदर्शपूर्णमासयोरग्निहोत्रसाध्यत्वात् अग्निसाधकमाधानं प्रथमतोवक्तव्यमिति चेन्न, अग्नीनां पवमाने-ष्टिसापेक्षाधान साध्यत्वात् । ताश्चेष्टयोदर्शपूर्णमास विकृतित्वात् साक्षादेव दर्शपूर्णमासावपेक्षन्ते । दर्शपूर्णमासौत्वग्नि-होत्रद्वारा पवमानेष्टिसापेक्षावपि न साक्षात् पवमानेष्टिमपेक्षेते । अतो निरपेक्षत्वात् दर्शपूर्णमासेष्टिरेव १० प्रथमायाति । H यद्यपि ऋक्सामवेदयोर्न सा पूर्वमाम्नाता तथापि कर्मकाण्डविषये यजुर्वेदस्यैव प्राधान्यात्तत्र तयोः प्राथम्यं युक्तमेव से स्थित हैं, अर्थात् लिङ्ग प्रमाण से विनियोज्य अनारभ्याधीतमन्त्र हैं । अर्थप्रकाशन सामर्थ्य को ' लिङ्ग ' कहते हैं । और जिन मन्त्रों को किसी कर्म के प्रकरण में नहीं कहा गया है, उन मन्त्रों को अनारभ्याधीत कहते हैं । चौंतीसवें तथा पैंतीसवें अध्यायों में पुरुषमेध ' का निरूपण किया गया है । छत्तीसर्वे अध्याय में ' शान्तिकर्म ' का विधान है । १५ सैंतीसवें अध्याय से उन्तालीसवें अध्याय तक ' प्रवर्ग्य ' का निरूपण है । चालीसवें अध्याय में ब्रह्मविद्या ' का प्रतिपादन किया गया है । इ अन्य समस्त दृष्टियों की प्रकृति होने से तथा स्वयं निरपेक्ष होने के कारण सर्वप्रथम दर्शपूर्णमासेष्टि का ही निरूपण किया गया है । जहां अपेक्षित समस्त अङ्गों का प्रकर्ष से कथन किया गया हो, उसे ' प्रकृति ' कहा जाता है । विकृतियों में केवल विशिष्ट अङ्गों का ही कथन रहता है, उनमें दूसरे सामान्य अङ्गों का प्रकृति से ही अतिदेश २० कर लिया जाता है । वह प्रकृति तीन प्रकार की होती है - ( १ ) इष्टि, ( २ ) पशु और ( ३ ) सोम । इन तीनों में अपने समस्त अङ्गों का उपदेश किया गया है, किसी अन्य कर्म से इनमें अपेक्षित अङ्गों का अतिदेश नहीं होता है । सोमयाग यद्यपि स्वरूपतः अन्यनिरपेक्ष है, तथापि उसके अङ्गभूत दीक्षणीयेष्टि आदिकों में दर्शपूर्णमासेष्टि की अपेक्षा रहने के कारण इष्टि से उसका पूर्वभावित्व नहीं है, किन्तु इष्टि को ' सोमयाग ' की अपेक्षा न रहने से वह निरपेक्ष है । अतः उसका सोम से पूर्व रहना युक्ति - युक्त है । २१ - यद्यपि अग्निहोत्र के स्वरूपसम्पादक अङ्गों में किसी अन्य की अपेक्षा नहीं है, तथापि उसमें अग्निसिद्धि अपेक्षा तो है ही तथा आहवनीयादि अग्नियों का अस्तित्व, पवमानेष्टियों से साध्य होने के कारण और वे पवमा-नेष्टियां, दर्शपूर्ण मासेष्टि की विकृतिरूप होने के कारण परम्परया अग्निहोत्र को दर्शपूर्णमास की अपेक्षा रहती है । अतः उसका प्रथमतः रखना उचित ही है । शङ्का - दर्शपूर्णमासकर्म तो अग्निहोत्र होम कर्म के द्वारा साध्य हैं । अतः अग्नि का साधक जो आधान है, उसी का प्रथम विधान होना उचित है । समा ० — उक्त आशङ्का करना ठीक नहीं है । क्योंकि अग्नियां जो हैं, वे, पवमानेष्टि की अपेक्षा रखने वाले आधा कर्म से साध्य होती है । और वे इष्टियां, दर्शपूर्णमास की विकृति होने से साक्षात् ही दर्शपूर्णमास की अपेक्षा

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[ १४ ] कर्मणामानुपूर्व्येण यजुर्वेद एववर्णनात् । तत्रतत्र विशेषापेक्षायां याज्यापुरोनुवाक्यादय ऋग्वेदेस्तोत्रादीनितु सामवेदे समाम्नायन्ते । तस्मात् कर्मणां विषये प्राधान्यात् यजुर्वेदस्य तत्र च दर्शपूर्णमासेष्टिरेव समाम्नाता । तस्यामेवेष्टो इषेत्वादयो मन्त्राः । २२- तत्र मन्त्राणां सामान्यलक्षणं जैमिनीये द्वितीयापाध्याये प्रथमपादे विचारितम् । ' तच्चोदकेषु मन्त्राख्या ५ ( मी ० सू ० २।१।२६ ) इति । विहितस्यार्थस्याभिधायको मन्त्र इत्युक्तो वसन्ताय कपिञ्जलनालभते १० ( व ० स ० २४।२० ) इत्यस्य मन्त्रस्य विधिरूपत्वादव्याप्तिः । मननहेतुर्मन्त्र इत्युक्तौ ब्राह्मणेऽतिव्याप्तिरिति न सम्भवति मन्त्रलक्षणमिति पूर्वपक्षेयाज्ञिकसमाख्यानस्यैव निर्दुष्टलक्षणत्वं सिद्धान्तितम् । तच्चसमाख्यानमनुष्ठान स्मारकत्वादिना मन्त्रत्वं गम-यति । ' उरूप्रथस्व ' ( मा ० सं ० १।२२ ) इत्यादयोऽनुष्ठानस्मारकाः, ' अग्निमीले पुरोहितम् ' ( ऋ ० सं ० १1१1१ ) इत्यादय: स्तुतिरूपाः, ‘ इषेत्वे ' ( वा ० सं ० १1१ ) त्यादस्तु शाखाच्छेदनस्मारकाः, ' अग्न आया हिवीतय ' ( सामवेद सं ० पूर्वी चक १० ११ १ ) इत्यादय आमन्त्रणोपेताः । एवमत्यन्तविजातीयेषु याज्ञिकसमाख्यान ( प्रसिद्धि ) मन्तरानान्यत्सम्भवति मन्त्रलक्षणम् । इत्युक्तम् । २३ – तत्रैव शेषे ब्राह्मणशब्द: ' ( मी ० सू ० २ । १ । ३० ) इति मन्त्रातिरिक्ते वेदभागे ब्राह्मण शब्द रखती हैं । किन्तु दर्शपूर्णमास, अग्निहोत्र के द्वारा पवमानेष्टि की अपेक्षा नहीं रखता है । अतः निरपेक्ष रहने से दर्श-पूर्णमासेष्टि को ही प्रथमतः रखना प्राप्त होता है । यद्यपि ऋग्वेद और सामवेद में दर्शपूर्णमासेष्टि को प्रथम नहीं कहा गया है, तथापि कर्मकाण्ड के विषय में यजुर्वेद की ही प्रधानता होने के कारण दर्शपूर्णमासेष्टि की प्रथमता उचित ही है । यजुर्वेद में ही कर्मों का आनुपूर्वीक्रम से वर्णन किया गया है । २२ - कर्मविशेषों में विशेष अङ्गों की अपेक्षा होने पर ' याज्या ', ' पुरोनुवाक्या ' आदि मन्त्रों को ऋग्वेद में, तथा स्तोत्र आदिको तथा स्तोत्रआदिको सामवेद में कहा गया है । अतः कर्मों के विषय में यजुर्वेद की प्रधानता १० रहने से तथा उसमें भी दर्शपूर्णमामेष्टि को ही बताया गया है । उसी इष्टि में ' इषेत्वा ' आदि मन्त्रों का विनियोग होता है । मन्त्रों के सामान्य लक्षण का विचार जैमिनीय सूत्रों के द्वितीय अध्याय के प्रथम पाद में किया गया है । अनु अर्थप्रकाशन के प्रयोजक वाक्यों को ' मन्त्र ' शब्द से कहा जाता है ( मी ० सू ० २२६ ) । विहित अर्थ के अभि-धायक को ' मन्त्र ' कहने पर ' वसन्ताय कपिञ्जलानालभते - पहले दो स्तम्भों के मध्यभाग में तीन कपिञ्जल पशुओं को ' वसन्त ' देवता के लिये बांधे यह मन्त्र, विधिरूप होने से मन्त्रलक्षण की अव्याप्ति होती है । यदि ' मनन हेतुर्मन्त्र ' – मन के हेतुको मन्त्र कहते हैं तो ' ब्राह्मण ' में अतिव्याप्ति होती है । अतः मन्त्र का लक्षण करना सम्भव नहीं हो रहा है - ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर सिद्धान्त किया गया है कि याज्ञिकों की परम्परा में ' मन्त्र ' शब्द से जिसकी प्रसिद्धि हो वही ' मन्त्र ' है । मन्त्र का यही निर्दुष्ट लक्षण सम्भवनीय है । वह याज्ञिकप्रसिद्धि कर्मानुष्ठानस्मारकत्व आदि हेतुओं से ' मन्त्रत्व ' का बोध कराती है । ' उरू प्रथस्व ' इत्यादि मन्त्र, अनुष्ठान के स्मारक होते हैं, ' अग्निमीड़ पुरोहितम् ' इत्यादि मन्त्र, स्तुतिरूप होते हैं, ' इषेत्वा ' इत्यादि मन्त्र, आमन्त्रण में विनियुक्त हैं । इस प्रकार अत्यन्त विजातीय वाक्यों में याज्ञिकविद्वानों की पारम्पर्यप्रसिद्धि के अतिरिक्त ' मन्त्र ' का कोई अन्य लक्षण नहीं बताया जा सकता । उसी प्रसङ्ग में ‘ शेषे ब्राह्मणशब्दः ’ – मन्त्र से अवशिष्ट रहे भाग को ' ब्राह्मण ' शब्द से कहा जाता है ( मी ० सू ० २ । १ । ३० ) २३ – ऋक्, साम, यजु के मन्त्रों में भी अध्यापक तथाहि, ' अग्नये मथ्यमानायानुब्रू हि ' - ( तै ० सं ० ६ । ३ ५ ३ ), प्रसिद्धि के अनुसार यद्यपि साङ्कर्य ही प्रतीत होता है-' हविर्धानाभ्यामनुब्र हि ' - ( ऐ ० ब्रा ० १२६ ) इत्यादि

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मनुब्रूहि [ १५: ] थ्य ऋक्सामयजुर्मन्त्राणामपि यद्यप्यध्यापक प्रसिद्ध या साङ्कर्यमेव 1 । तथाहि ' अग्नये, मध्यमानायानुब्रू हि ( नं ( ० [ सं ० ६ ३ | ५ | ३ ) हविर्धानाम्यां ( ऐतरेय ब्राह्मणे १।१६ ) प्रोद्यमाणाभ्यामनुब्रू हि ' ( ऐ ० ब्रा ० १।२६ ) इत्यादीनि यजूंषि ऋग्वेदेसमाख्यातानि । देवस्त्वासवितापुनात्वच्छिद्र ेण पवित्रेण वसोः सूर्यस्य रश्मिभिः ( तै ० सं ० १।२१।२ ), इति मन्त्रो यजुर्वेदे पठितः । न च स यजुर्वेदेमन्त्रः । ऋग्रूपत्वेन तैत्तिरीय ब्राह्मणे ( तै ० ब्रा ० ३।२५ ३ ) व्यवहृतत्वात् । ' एतत्सामगायन्नस्ते ' इति प्रतिज्ञाय ' हा उ ' ( तै ० आ ० ६ १०५ ) इत्यादिकं सामयजुर्वेदे गीतम् । ' अक्षितमस्यच्युतमसि X प्राणिशंसितमसि ' इति त्रीणि यजू ंषि सामवेदे समाम्रायन्ते । तथापि वृत्तपादबद्धाऋचः, गीतिरूपा मन्त्राः सामानि वृत्त-गीतिविवर्जितत्वे प्रश्लिष्टपठिता मन्त्रा यजू ंषि इति । २४ - भवत्येव व्यवस्थितं लक्षणम् । तथा च महर्षि जैमिनिः तेषामृग्यत्रार्थवशेनपादव्यवस्थान गीतिषु सामाख्या, शेषे यजुष् शब्द:, ( मी ० सू ० २1१1३२-३३-३४ ) । सम्भवति दृष्टफलकत्वे न केवलमदृष्टार्था मन्त्राः । यथा ' उरू प्रथस्त्रे ' ( मा ० सं ० १२२ ) तिमन्त्रः, भोः १० पुरोडाश त्वं उरु वैपुल्यं यथास्यात्तथा कपालेषु प्रसरेत्यर्थप्रकाशनायोच्चार्यते न केवलमदृष्टार्थम् । किन्तु ' उरू प्रथ-स्वेति ( श ० ब्रा ० १२ २८ ) प्रथयतीति ब्राह्मणवाक्येनापि तथार्थानुस्मरणसम्भवात् मन्त्रेणैवानुस्मरणीयमिति द्रव्य-देवतादिज्ञाने फलश्रवणादज्ञाने च दोषश्रवणादृष्यादयो ज्ञातव्या इत्युक्तम् । अस्या मन्त्रब्राह्मणात्मिकाया माध्यन्दिनी शाखायाः स्वयम्भुब्रह्मारभ्य पौतिमाषीपर्यन्ताः सम्प्रदायप्रवर्त्तका ऋषयो व शब्राह्मणेषु स्पष्टमाख्याताः । काण्डविशेषेषु तथा प्रोयमाणाभ्यामनुब्रूहि यजुर्मन्त्रों को ऋग्वेद में पढ़ा गया है । ' देवस्त्वा सविता ' - ( तै ० सं ० १।२ ॥ २ ) इस मन्त्र को यजुर्वेद में पढ़ा गया १५ है । किन्तु वह यजुर्वेदका मन्त्र नहीं है । क्योंकि तैत्तिरीय ब्राह्मण ( ३।२५ ३ ) में इस ऋक् शब्द से व्यवहार हुआ है । इसी प्रकार ' इस सामको वह गा रहा है'-' - यह प्रतिज्ञा करके ' हा उ ' इत्यादि साम को यजुर्वेद में गाया गया है । ' अक्षितमसि ' इत्यादि तीन यजुमंन्त्रों को सामवेद में पढ़ा गया है । इस प्रकार का ऋक्, यजु और साम में व्यवहार साङ्कर्य होने पर भी ' छन्द ( वृत्त ) और पद से जो आबद्ध हो उसे ऋक् कहना चाहिए, गीतिरूप मन्त्रों को ' साम ' कहना चाहिये और छन्द तथा गीति से रहित प्रश्लिष्ट पठित ' मन्त्रों को यजु कहना चाहिये । २० २४ - इस रीति से ऋक् यजु और साम के लक्षणों को व्यवस्थित किया गया है । इसी अभिप्राय को ध्यान में रखकर ' तेषामृग् यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था, गीतिषु सामाख्या, शेषे यजुः शब्दः ( मी ० सू ० २७।३२-३३।३४ हो । ) ' गीति आदि ' कथन किया गया है । निष्कर्ष यह है कि ' ऋ ' वह है, जहाँ अर्थ को लक्ष्य करके पाद ( चरण ) व्यवस्थित क साम, और अवशिष्टों में यजु का व्यवहार करने से कहीं भी साङ्कर्यदोष नहीं होता है - यह जैमिनि मुनि का कथन है । जहाँ मन्त्रों का दृष्टफल सम्भव होता हो वहाँ उन्हें केवल अदृष्टफलार्थ नहीं माना जाता । जैसे ' जाओ उरूप्रथस्व । इस ’ यह एक मन्त्र है, हे पुरोडाश! तुम कपालों पर जिस प्रकार विपुलता को प्राप्त कर सको उस प्रकार फैल अर्थ को प्रकाशित करने के लिये इस मन्त्र का उच्चारण किया जाता है, केवल अदृष्टफल की प्राप्ति के लिये नहीं । किन्तु ' उरुप्रथस्वेति प्रथयति ' – इस ब्राह्मण वाक्य से भी उक्त अर्थ का अनुस्मरण करना सम्भव होने के कारण ' मन्त्रे- आदि णैव अनुस्मरणीयम् ' – मन्त्रोच्चारण के द्वारा ही वह अनुस्मरण होना चाहिये - इस नियमविधि से द्रव्य के ऋषि , देवता , देवता, के स्मरण के साथ ही ' अदृष्टोत्पत्ति ' को भी मन्त्रोच्चारण का प्रयोजन मानना चाहिये । तत्तन्मन्त्रों T: छन्द के जानने का भी फल ' बताया गया है और उनके न जानने पर ' दोष ' की उत्पत्ति का होना सुना जाता है । अत तत्तन्मन्त्रों के ' ऋषि, देवता, छन्द ' का जानना भी आवश्यक है यह कहा गया है । मन्त्र - ब्राह्मणात्मक माध्यन्दिनी शाखा के ' स्वयम्भू ब्रह्मा ' से लेकर ' पौतिमाषी ' तक सम्प्रदाय प्रवर्तक ऋषियों को वंशब्राह्मण में स्पष्टतया बताया गया

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[ १६ ] मन्त्रविशेषेषु च ब्राह्मणगताख्या यिकाभिरनुक्रमणिकाग्रन्थैश्च ज्ञातव्याः । २५ – तदज्ञानेऽपि वंशोक्तानामृषीणामवगतत्वादवेदनप्रयुक्तो दोषो नास्त्येव । ऋषिविशेषाणामपि विज्ञाने फलाधिक्यमस्त्येव । अतएव वीर्यवत्तरम् भवतीति कात्यायनेन स्पष्टमेवोक्तम् । सायणरीत्या नियताक्षरपादावसानानां मन्त्राणां छन्दोज्ञानमावश्यकम् । इषे त्वेत्यादीनान्त्वनियताक्षरत्वाच्छन्दो ५ नास्त्येव । ये तु यजुषामपि छन्द इच्छन्ति तैः कात्यायनोक्तसर्वानुक्रमणिकायां पञ्चमाध्यायमभ्यस्य तद्वारेण तत्तन्मन्त्र-च्छन्दोऽनुसन्धेयम् । यजुषां षडुत्तरशताक्षरावसानानामेकाक्षरादीनां पिङ्गलेन ' देव्यैकम् ' ( पिङ्गलछन्दः सूत्र २३ ) इत्यादिनोक्तम् छन्दो बोद्धव्यम् । तदधिकानातु ' होतायक्षद्वनस्पतिमभिहि ' ( वा सं ० २१।४६ ) इत्यादीनां नास्ति छन्दः कल्पना । दर्शपूर्णमासमन्त्राणां परमेष्ठी प्रजापतिऋषिः, द्वितीयाध्यायेऽन्तिमकण्डिकाषट् के पितृयज्ञमन्त्रास्तेषां प्रजापतिऋषिः, आद्य ेऽध्याये सर्वाणि यजूंषि ' पुरा क्रूरस्य ' ( वा ० सं ० १।२८ ) इत्येका ऋक् । १७ २६ – तत्राद्यायां कण्डिकायां पञ्चमन्त्राः द्वौत्र्यक्षरो तृतीयश्चतुरक्षरः, चतुर्थो द्विषष्ट्यक्षरः, पञ्चमो नवाक्षरः, प्रथमस्य दैव्यनुष्टुप् छन्दः, मन्त्रवाक्याभिधेया देवता, यातेनोच्यते सा देवतेति । सा च मन्त्रलिङ्गादवगन्तव्या । यत्रा-ग्नीन्द्रादयश्चेतनाः प्रतिपाद्यन्ते तेष्वग्न्यादीनां देवतात्वम्, यत्र पलाशशाखाबहिजु ' ह्वादयोऽचेतनाः प्रतिपाद्यन्ते तेषु तत्तद्द्रव्याभिमानिनश्चेतना देवता ज्ञातव्याः । अतएव - मृदब्रवीत् ' आपोऽब्र ुवन् ' इत्यादिष्वचेतनद्रव्येषु चेतनोचित-व्यापारमुपपादयितु ' ' अभिमानिव्यपदेशस्तु ' ( कृ ० सू ० २ ११५ ) इति बादरायणसूत्रम् । यथा प्रथममन्त्रस्य दैव्यनुष्टुप् १५ छन्दः शाखादेवता पलाशशाखाछेदने विनियोगः । है । कतिपय काण्डविशेषों में और मन्त्रविशेषों में ऋषि आदि के उक्त न रहने पर भी उनका ज्ञान, ब्राह्मणगतं आख्या-यिकाओं से और अनुक्रमणिका ग्रन्थों से प्राप्त कर लेना चाहिये 1 । २५ - कदाचित् उन ऋषियों का ज्ञान न भी रहे तो वंशब्राह्मणोक्त ऋषियों के ज्ञात होने मात्र से भी उनके अज्ञान से होने वाला दोष नहीं हो पाता है । ऋषिविशेषों के ज्ञान से भी फल में अधिकता का होना निश्चित ही है । 20 अतएव महर्षि कात्यायन ने ऋषि आदि का स्मरणात्मक ज्ञान करते हुए किए जाने वाले वेदाध्ययन को स्पष्टतया हो वीर्यवत्तर बताया है । सायणाचार्य के मतानुसार तो नियत अक्षर वाले पादों में पूर्ण होने वाले मन्त्रों का छन्दोज्ञान होना नितान्त आवश्यक माना गया है । ' इषे त्वा ' इत्यादि मन्त्रों के अक्षर नियत न होने से उनमें छन्द होते ही नहीं हैं । जो लोग जुर्मन्त्रों में भी छन्दोज्ञान को आवश्यक मानते हों वे लोग, महर्षि कात्यायनोक्त सर्वांनुक्रमणिका के पञ्चमा-२५ ध्याय का अभ्यास करके उसके द्वारा तत्तन्मन्त्रों के छन्दों का अनुसन्धान कर लें । एक अक्षर से प्रारम्भ करके एक सौ छह अक्षरों तक के छन्दों वाले यजुर्वेद के मन्त्रों के छन्दों का ज्ञान पिङ्गल प्रोक्त ' देव्यैकम् ' ( पि ० सू ० २।३ ) इत्यादि सूत्रों की सहायता से प्राप्त कर लेना चाहिये । इनसे अधिक अक्षरों वाले ' होतायक्षेत्र वनस्पतिमभिहि: ( वा ० सं ० २१ | ४६ ) इत्यादि मन्त्रों में छन्दों की कल्पना न करे । ' दर्शपूर्णमास ' मन्त्रों का परमेष्ठी प्रजापति ऋषि है, द्वितीय अध्याय में अन्तिम छह कण्डिकाओं में जो पितृयज्ञ के मन्त्र कहे गये हैं, उनका ' प्रजापति ऋषि है, पहिले अध्याय में सभी यजुमन्त्र हैं, केवल ' पुरा रस्य ' - ( वा ० सं ० १२८ ) यह एक ऋक, है । २६ - प्रथम कण्डिका में पांच मन्त्र -, उनमें दो मन्त्र तीन अक्षरों वाले हैं, तीसरा मन्त्र चार अक्षरोंवाला है, चौथा मन्त्र बासठ अक्षरोंवाला है, और पांचवां मन्त्र नौ अक्षरों का है । प्रथम मन्त्र का छन्द ' दैवी अनुष्टुप् ' है । मन्त्रवाक्य से जो अभिधेय है वही देवता है, मन्त्र के द्वारा जो बताई जाती है वही देवता कही जाती है । उसका ज्ञान,

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[ १७ ] ननु ' अग्निमूर्धा ' ( वा ० सं ० ३।१२ ) इत्यादी अग्नेर्महाभाग्यत्वात् देवतात्वं युक्तम्, शाखादीनान्तु स्थावरत्वात् देवतात्वे कुतो देवतात्वमिति चेन्न, यस्य हि यत्र हविर्भाक्त्वंस्तुतिभाक्त्वं वा तस्य तत्र देवतात्वभितिरीत्या तत्रापि बाधाभावात् । २७- शाखाद्यधिष्ठात्र्यो देवता अपि परमेश्वरांशभूतत्वात् महाभाग्या एव । मन्त्रस्य वाच्यं देवतेति श्रुति-दर्शयति ' आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघन " इत्युपक्रम्य ऐन्द्र योऽभिरूपा ' ( श ० | २ | ३ | ६ ) इतीन्द्रस्य देवतात्वं दर्शयति । २८ - दर्शयागं चिकीर्षुः प्रातनित्याग्निहोत्रं कृत्वा दर्शयागार्थं, ' ममाग्ने वर्चः ' ( का ० ' आग्नेयोऽष्टाकपालः श्रौ ० सू ० २।१।३ ) ’ इत्यादिमन्त्रैः समिदाधानरूपमन्त्राधानं कृत्वा वत्सापाकरणं कुर्यात् । अयमभिप्राय: त्रीणि – दर्शयागे प्रधानानि हवींषि भवन्ति । ( श ० १ || ६ | २।५ ) ' ऐन्द्र ं दधि ' ( ० ५ | २ | ४ | ११ ) ' ऐन्द्र ं पय: ' ( शा ० ५। २ ) इति प्रातःकाले तत्र प्रतिपदि होमार्थं दधि सम्पादनीयम्, अमावास्यायां रात्रौ गावो दोग्धव्याः, तद्दोहनार्थममावास्यायामेव पलाशशाखा-लौकिकदोहनादूर्ध्वं स्वमातृभिः सह चरन्तो वत्साः पलाशशाखया स्वमातृभ्योऽपाकरणीयाः । तदर्थमेव छेदनम् । ' सवै पलाशशाखया वत्सानपाकरोती ' ति काण्वश्रुतेः । अर्थवादे गायत्र्या कृतं सोमवल्ल्याहरणमभिधाय पलाश-तदाह्रणवेलायां पक्षिरूपाया गायत्र्याः पक्षविशेषः सोमवल्ल्याः पर्णं च भूमावपतत् । तयोरन्यतरत् पर्णनामकः आदि मन्त्रगत लिङ्ग से कर लेना चाहिये । जहाँ अग्नि, इन्द्र आदि चेतनों का प्रतिपादन किया गया है गया , वहाँ है, अग्नि वहाँ तत्तद्-को देवतात्व हाता है, और जहाँ पलाश शाखा, वहि, जुहू आदि अचेतनों का प्रतिपादन किया द्रव्याभिमानी चेतन देवताओं को समझना चाहिये । अतएव ' मृदब्रवीत् ', ' आपोऽब्र ुवन् ' --मट्टी बोली, जल बोले इत्यादि अचेतन द्रव्यों में चेतनोचित व्यापार के उपपादनार्थ " अभिमानिव्यपदेशस्तु ' - ( ब्र ० सू ० २।१५ ) इस बादरायण सूत्र के अनुसार समझना चाहिये । जैसे प्रथम मन्त्र का ' देवी अनुष्टुप् छन्द, शाखा - देवता है, तो उस प्रथम मन्त्र का पलाश शाखा के छेदन में विनियोग किया जाता है । प्रश्न – ' अग्निमूर्धा ' - ( वा ० सं ० ३ १५ ) इत्यादि मन्त्र में ' अग्नि ' - महाभाग्यवान् होने से उसे देवता कहना तो उचित है, किन्तु वृक्ष की शाखा आदि तो स्थावर होने से उन्हें देवता कहना कैसे सङ्गत होगा? उत्तर — जहाँ जिसकी हविर्भागिता हो अथवा जहाँ जिसकी स्तुति की जाती है, वहाँ उसी प्रकार को की देवता बाधा स्वरूप नहीं माना जाता है. इस रीति के अनुसार उपर्युक्त ' शाखा ' आदि को देवता मान लेने में कोई किसी हैं । ' देवता ' भी है । शाखा आदि की अधिष्ठात्री देवताएँ भी परमेश्वर के ही अंशभूत होने से वे महाभाग्यवान् ही ऐन्द्र यो-मन्त्र के वाच्य होते है, इस बात को भगवती श्रुति स्वयं ही बता रही है - ' आशुः शिशानों ', से आरम्भ करके ' S भिरूपा ' इस वाक्य के द्वारा ' इन्द्र ' का देवतात्व प्रदर्शित किया गया है । ^ २८ - ' दर्शयाग ' का अनुष्ठान करने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति ( पुरुष ) प्रातःकाल मन्त्रों ' नित्याग्निहोत्र से समिदाधानरूप का अनुष्ठान करके ‘ दर्शयाग ' के लिये ' ममाग्ने वर्चः - ( का ० श्री ० सू ० २/४ | ३ ) आग्नेय इत्यादि अष्टाकपाल, ऐन्द्रदधि, और अन्वाधान करके ' वत्सापाकरण ' करे । इसका अभिप्राय यह है कि ' दर्शयाग ' में ' करना ऐन्द्रय: ( दूध ) – ये तीन प्रधान हवि होते हैं । प्रतिपत् तिथि में होम के अनुष्ठानार्थ ' दधि ' का अमावास्या सम्पादन के दिन होता है । उसके लिये अमावास्या तिथि की रात्रि में गौओं को दुहना पड़ता है, उनके दोहनार्थ ) को पलाश शाखा ही प्रात: काल लौकिक दोहन के अनन्तर अपनी माताओं के साथ विचरण करनेवाले वत्सों ( बछड़ों के छेदन से अपनी माताओं ( गौओं ) से दूर करना पड़ता है । इस अपाकरण ( दूर करने ) के लिये ' ही - वह पलाशशाखा पलाश की शाखा से का विधान किया गया है । काण्वश्रुति कहती है कि ' सवै पलाशशाखया वत्सानपाकरोति बतलाकर — कहा गया बछड़ों को अलग करता है । अर्थवाद में - गायत्री के द्वारा किये गये सोमवल्ली के आहरण को