वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 131–140
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 131–140
पृष्ठ 131
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ ११८ ] ५ – ये पदार्थाः संयोगेन विकारं प्राप्नुवन्ति अग्निच्छिन्नाः पृथक पृथक परमाणवो भूत्वा वायौ विहरन्ति शुद्धा भवन्ति । यथा यज्ञानुष्ठानेन वायुजलानामुत्तमे शुद्धिपुष्टी जायेते न तथान्येन भवितुमर्हत: ( पृ ० ६६ ), इति भावार्थनिरूपण उक्तम्, तदपि चिन्त्यम्, इदानोन्तु काष्ठजैरिङ्गालजंराग्नेयतैलादि ( पेट्रोल, डीजल आदि ) पदार्थैर्यथाग्नि-योगे पदार्थाश्छिन्ना: परमाणवो भूत्वा वायौ विहरन्ति न तथान्यदा, किमयमपि यज्ञ:? न च घृतादिहोमे वैशिष्ट्यम्, परमाणुत्वे समेषामवैशेष्यात् । यदि परमाणुत्वेऽपि घृतादीनामुपकारकत्वं तदा दुर्गन्धयुक्तानां पदार्थानामग्निनापरमाणु-त्वापत्त्याऽपकारकत्वमपि स्यात् । शिल्पविद्यया विमानानि साधयित्वा कामनासिद्धि कुर्युः कारयेयुर्वा " ( पृ ० ६६ ) इत्यादिक ं तु सर्वथोदक्षरमेव । ' शतपथे वृत्रस्य सूर्यलोकस्य युद्धाख्यायिकयाऽस्यमन्त्रस्य व्याख्याने मेघविद्योक्त ति ( पृ ० ६६ ) कथनन्तु मूढजनप्रतारणमेव । वृत्रेन्द्रयुद्धस्य नैरुक्तदृष्ट्या मेघसूर्ययुद्धरूपेण वर्णनेऽप्येतिहासिकानां दृष्ट्या -वृत्रासुरेन्द्रदेवयुद्धवर्णनमपि नापलापमर्हति ब्राह्मणेषु महाभारते श्रीमद्भागवतादौ ता प्रतिपादनात् । ६ - यत्तूक्तम् - ' नैतदस्ति यद्देवासुरम् ' ( श ० ११ १/६ / ६ ) तत्रोपमार्थेन युद्धवर्णाभवन्ति ( नि ० २।१६ ) इति प्रमाणैरिन्द्रवृत्रयुद्धापलापाय यतितं ( पृ ० ६६-६७ ) तत्तुच्छम्, तथात्वेतवापसिद्धान्तापातात् । त्वद्रीत्या सूर्य मेघसंग्राम एव युद्धं तच्चास्त्येवेति कुतो नैतदस्तीति वक्तुं शक्यते वृत्रो मेघ इति नैरुक्ताः त्वाष्ट्रोऽसुर इत्यं तिहासिका इत्युक्त्या निरुक्तेऽपि ऐतिहासिक पक्ष आहतः । तत्र नरुक्तपक्षे युद्धोपपत्तिरपेक्षिता । अपां ज्योतिषश्च मिश्रीभावकर्मणो वर्षकर्म-जायते । उपमार्थं युद्धवर्णाभवन्ति । अपां च मेघोदरवर्तिनां ज्योतिषश्च वैद्युतस्योद्भूतवृत्तेमिश्रीभावकर्मणो वर्ष कर्म जायते । वैद्युतेन ज्योतिषा वाय्वावेष्टितेन्द्राख्येनोपतप्यमाना आपः प्रस्यन्दन्ते । वर्षभावाय प्रकल्पन्ते । तथाचोदक तेजसो-रितरेतरप्रतिद्वन्द्वभूतयोरुपमार्थे रूपककल्पनया युद्धरूपकाणि भवन्ति । न ह्यत्र यथाभूतं युद्धमस्ति । अत्रैव मन्त्रा ब्रह्मवादाश्च सङ्गच्छन्ते । मन्त्रस्तावत् - यदचरस्तन्वा वावृधानो वलानीन्द्रः प्रब्रुवाणो जनेषु । मामेत्सा ते यानि युद्धान्याहुनद्यशत्रु न पुरा विवित्से । ( ऋ ० १० ५४ २ ) वामदेवपुत्रस्य वृहदुक्थस्यार्षं त्रैष्टुभम् । हे इन्द्र त्वं नाना प्रकारम् लन्वा वावृधानः शरीरेण विग्रहवान् भूत्वा यदचरः जनेषु आत्मीयानि बलानि प्रब्रुवाणः प्रकथयन्निब, किं त्वं तथैव? न मायेत्सा यानि युद्धान्याहुः सा माया । ऐश्वर्ययोगात्तथावान्यथा वाभवति । न ते तव निज रूपम् । ५ - – जो पदार्थ. किसी के संयोग से विकार को प्राप्त करते हैं, अग्नि से छिन्न पृथक पृथक परमाणु होकर वायु में बिहार करते हैं, वे शुद्ध होते हैं । जैसे यज्ञानुष्ठान से वायु, जल आदि की उत्तम शुद्धि और पुष्टि होती है, वैसी किसी किसी अन्य साधन से नहीं होती है । ऐसा भावार्थ निरूपण करते समय कहा है । किन्तु वह भी चिन्तनीय है, आजकल तो काष्ठ, इङ्गाल से उत्पन्न आग्नेय तैलादि पदार्थों से जिस प्रकार अग्नि सम्बन्ध होने पर छिन्न- भिन्न हुए पदार्थ, परमाणु बनकर हवा में विहार करते हैं, वैसे अन्य समय में नहीं । क्या यह यज्ञ भी वैसा ही है? घृत से होम - करने में किसी प्रकार की कोई विशेषता तो नहीं है । क्योंकि सब के परमाणु तो समान हो होंगे । यदि परमाणुओं के होने में भी घृतादिद्रव्य उपकारक हों तो अग्नि सम्बन्ध से दुर्गन्धी पदार्थों के जो परमाणु होंगे, उनसे अपकार भी होगा । " शिल्पविद्या से विमानों को बनाकर अपनी इच्छाओं को पूर्ण करेंगे अथवा करवायेंगे ” यह सब कथन, कपोल-कल्पित ही है । मन्त्र के किसी शब्द अथवा अक्षर से ऐसा अर्थ नहीं निकल रहा है । पुनः " शतपथ ब्राह्मण " में वर्णित वृत्र की ( सूर्यलोक की ) युद्धाख्यायिका के सहारे मन्त्र का व्याख्यान कर उससे मेघविद्या निकली है, यह बताना तो केवल मूर्ख लोगों की प्रतारणा करना मात्र है । वृत्र और इन्द्र के युद्ध का निरुक्त की दृष्टि से मेघ और सूर्य के युद्धरूप में वर्णन करने पर भी ऐतिहासिकों की दृष्टि से वृत्रासुर और इन्द्रदेव के युद्ध का जो वर्णन उपलब्ध है, उसका अपलाप नहीं किया जा सकता । क्योंकि ब्राह्मणग्रन्थों में, महाभारत, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों में उसका वर्णन उपलब्ध हो रहा है । ६ - यह जो कहा है कि ' इन्द्र और वृत्र के युद्ध का अपलाप निरुक्त और शतपथ के आधार पर किया गया है ' - किन्तु यह कहना भी निःसार है । क्योंकि उनकी आड़ में यदि ऐतिहासिक तथ्य का अपलाप करते हैं तो आपका
पृष्ठ 132
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ ११६ ] 1. ऐतिहासिका अपि यानि युद्धान्याहुः सापि तव मायव किं कारणम् नाद्य तव शत्रुरस्ति न पुरा कश्चिदासीत् । यावद्वीर्य क्वचिदस्ति सर्वं तत् त्वमेव । ' वीय ' वै प्राणो वीर्य मिन्द्र: ' ( मै ० सं ० १-६६ ) कुतस्ते शत्रुर्येन युद्धये था । एतच्च त्वमपि विवित्ले वेत्स्येव । एतस्मिन् मन्त्रे युद्धस्य मायामात्रत्वमुक्तम् । शतपथे च - ' तस्मादा हुनैतदस्ति यद्देवासुरमिति ' ( 10 99191912 ) ७ -- सामाजिकानां दृष्ट्या नहि परमेश्वराद्भिन्नः कश्चिदैश्वर्यशाली देव: स्तूयते यस्य कोऽपि शत्रुरेव न भवेत् । इन्द्रमेघयोस्तु वस्तुत्वात्तत्सङ्घर्षोऽपि वस्तुभूत एवेति कुतो मायामयत्वं तस्यापि । नन्वैतिहासिकदृष्ट्या युद्धे ऽभ्यु-पगम्यमाने तत्प्रतिपादकस्य वेदस्यानित्यत्वापत्तिरिति चेन्न, ऐतिहासिकदृशां वा सर्ववृत्तान्तानामेव शीतोष्णवर्षाद्या-वर्तवत् यथाकालं वर्तमानानामनाद्यनन्तानां वेदेन कर्म कालेऽनोतरूपेण प्रतिपादनाददोषादिति त्वदुद्धृतहरिस्वामिभाष्य-वचनस्यैव समाधानरूपत्वात् । ' दासपत्नीरहिगोपा तिष्ठन्निरुद्धा श्रापः पणिनेव गावः । T अपां विलमपि हितं यदासीद् वृत्रं जघन्वां प्रपद्ववार ॥ ' ( ऋ ० सं ० १ | ३२ || १ ) दासः कर्मकरः । तं हि ता अधिष्ठाय पान्ति रक्षन्ति सहिकर्मणा श्रान्तस्तासु पीतासु विश्रान्त आप्यायितो भवति । अहिना वृत्रेण मेघेन गोपा गुप्ता अतिष्ठन् निरुद्धास्ता यथा केनचित् पणिना वणिजा वीथ्यन्तरे विक्रयार्थं गावोनिरुद्धास्तिष्ठेयुस्तद्वत् । तासां यद्विलं निर्गमनद्वार मेघेनापिहितं यदेन्द्रस्तं निजघ्निवान् अहन् हत्वा अपववार अपावृतवान् तदाऽपावृते द्वारे ता आपः प्रस्यन्दिरे वर्ष भावेनेति । एवं नैरुक्तदृष्ट्या मेघेन्द्रयोरेव सङ्घर्षे युद्धप्रवादाः | ऐतिहासिकदृष्ट्या तु देवराज इन्द्रस्त्वाष्ट्रश्च वृत्रोऽसुरस्त्वष्ट्रा संवर्धितः ' इन्द्रशत्रोवर्धस्वेतिस्वरदोषेण तत्पुरुषाबोधनात् इन्द्रस्य शातयिता न जातः किन्तु बहुब्रीहिस्वरेणेन्द्र एव वृत्रस्य शातयिता जातः । प्रावरणशक्त: प्रतिनिधिवृत्रो वीर्य-प्रकाश प्रतिनिधिरिन्द्रः पुराणमहाभारतादौ तयोर्युद्धवर्णनविस्तरः । अपसिद्धान्त कहलायगा । आपकी रीति के अनुसार तो सूर्य और मेघ का संग्राम ही युद्ध है, तब ' युद्ध नहीं है ' कहना कैसे सम्भव होगा? निरुक्त में भी ऐतिहासिक पक्ष को माना है । ७ - - सामाजिकों की दृष्टि से परमेश्वर से भिन्न कोई अन्य ऐश्वर्यशाली देवता तो है नहीं, जिसकी स्तुति की जिसका कोई शत्रु ही न हो । इन्द्र और मेघ तो वास्तविक हैं, इसलिये उनका सङ्घर्ष भी वास्तविक ही कहना होगा, तब उस सङ्घर्ष को भो मायामय कैसे कहा जायगा? यह जो आपको शङ्का हो रही है कि युद्ध को ऐतिहासिक मानने पर, उसके प्रतिपादक वेद को अनित्य कहना होगा । किन्तु ऐसी शङ्का करना भी निस्सार है । ऐतिहासिक लोग सभी वृत्तान्तों को शीत, उष्ण, वर्षा के आवर्त के समान यथा समय होने वाले अनादि - अनन्त उन सभी घटनाओं का अतीत रूप से उल्लेख कर्म के समय वेद में किया गया है । किञ्च आपसे उद्धृत किये हुए हरिस्वामी के भाष्य का का वचन ही आपकी शङ्का का समाधान कर सकता है । हरिस्वामी ने भी महाभारतादि पुराणों में दोनों के युद्धवर्णन की घटना को ऐतिहासिक कहा है ।
पृष्ठ 133
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १२० ] ८- दयानन्दोयच्छन्दो निरूपणे तु तदीयो ब्रह्मदत्त एवाशुद्धि मनुते । ( वा ० सं ० १119 कण्डिकाविवरणे ) प्रति-मन्त्रमक्षराणां सख्यादानं कृत्वा कारयित्वा वा छन्दांसि ( दयानन्देन ) निर्दिष्टानि । तत्रापि लेखकृतामक्षरसंख्यानं गृहीत्वैव छन्दसां नामानि निरूपितानि । तदेवं क्वचिद् गणकानां प्रमादवशादशुद्धयः समजनिषत । एवभूताः प्रमादा मन्त्रसंख्याने-ऽपि सन्ति । तत्सम्बन्धेऽनेकान्युदाहरणानि दत्तानि एवमेव बाहुलकेनान्या सामप्यशुद्धानां समाधानं क्रियते । श्रूयते भीम-सेनपण्डितेन तन्नाम्ना बहवोऽशा लिखिताः । ६ - युष्मा इन्द्रो वृणीते - अत्र दयानन्दः - यथायमिन्द्रो वृत्रतुर्ये युष्मास्ताः पूर्वोक्ता अप: अवृणीत वृणीते यथा ता इन्द्र ं वायुमवृणीत वृणते तथैव ताः अपो यूयं वृत्रतुर्ये प्रोक्षिता वृणीध्वम् । यथा ता आपः शुद्धा: स्थ भवेयुः, एतदर्थ-महं यज्ञानुष्ठाता देव्याय कर्मणे देवयज्यायै अग्नये जुष्टं त्वां तं यज्ञ प्रोक्षामि एवमग्नीषोमाभ्यां जुष्टं त्वां तं यज्ञ ' प्रोक्षामि एवं यज्ञशोधितास्ता आपः शुन्धध्वं शुन्वन्ति यज्ञे तासामशुद्धा गुणा पराजघ्नुः, तस्मात् तासामिदं शोधनं शुन्धामी ' ( पृ ०७३ ) ति, १० – तत्रोच्यते, प्रथमं तु स्वामिदयानन्दः किमप्यदृष्टं प्रत्यक्षानुमानागम्यं पुण्यादिकं नाभ्युपगच्छति । तत एव दृष्टार्थतयैव मन्त्रं व्याख्याति । यज्ञादिकमपि जलवायुशुद्धयादावेवोपयुज्यते दृष्टमार्गेणैव । तथा च प्रत्यक्षानुमानातिरिक्त-वेदप्रामाण्यमेव तद्रीत्या दुर्घटम्, अनधिगतगन्तृत्वाभावात् । यथा नैयायिकानामनुमानखण्डग्रन्थोऽतीव सूक्ष्मविचारपूर्णो-ऽपि न शब्दप्रामाण्य कोटिमाटीकते । यथावाधुनिकानां विज्ञानग्रन्थाः साधारणमानवागम्य सूक्ष्मत मपदार्थ विवेचकास्तथापि तन्मूलं न शब्दाः किन्तु सूक्ष्मगवेषणानि तदुपयुक्तानि यन्त्राण्येव तत्र मूलमिति तेऽपि न शब्दप्रामाण्यकोटिमुपगच्छन्ति }८- स्वामी दयानन्द कृत छन्दोनिरूपण में तो उन्हीं के अनुयायी ब्रह्मदत्त ने ही अशुद्धि निकाल दी है, यानी ब्रह्मदत्त ने दयानन्द कृत छन्दोनिरूपण को अशुद्ध ही माना है । उसे वा ० सं ० १ | ११ कण्डिका के विवरण में देखा जा सकता है । इसी प्रकार की गलतियाँ मन्त्रों के परिगणन में भी है । ६ -- ' युष्मा इन्द्रो वृणीते ' में दयानन्द कहते हैं कि ' जैसे इन्द्र, वृत्रासुर युद्ध में उन पूर्वोक्त जलों का वरण करता है और वे जल, जैसे इन्द्र, वायु का वरण करते हैं, उसी तरह तुम लोग वृत्रयुद्ध में उन प्रोक्षित जलों का वरण करो | जिससे वे जल शुद्ध हो सकें । इसी प्रयोजनार्थ मैं यज्ञानुष्ठाता इस देवप्रीत्यर्थ याग के लिये अग्नि तथा अग्नीषोम को रुचिकर लगने वाले यज्ञ का प्रोक्षण करता हूँ । इस प्रकार यज्ञशोधित हुए वे जल अपने अशुद्धियों को दूर कर पाते हैं । इसलिये मैं तुम्हारे अङ्गों को प्रोक्षण के द्वारा शुद्ध करता हूँ । १० ---- दयानन्द इस व्याख्यान पर यह सोचना होगा कि दयानन्द तो प्रत्यक्ष या अनुमान से अवगत होने वाले पुण्य आदि तो प्रथमतः मानते ही नहीं हैं उसी कारण मन्त्र की व्याख्या दृष्टार्थपरक ही उन्होंने कर डाली । दृष्टप्रयोजन समझकर ही उन्होंने यज्ञादिकों का उपयोग भी जल, वायु की शुद्धि में ही समझा है । अतः प्रत्यक्षानुमानातिरिक्त वेद की प्रामाण्यसिद्धि होना ही उनकी प्रक्रिया से सम्भव नही है । क्योंकि प्रामाण्य का स्वरूप तो अनधिगतार्थ गन्तृत्व होता है । यहाँ पर उसके न रहने से वेद के प्रामाण्य की सिद्धि आपकी दृष्टि से हो नहीं सकेगी । जैसे नैयायिकों का अनुमानखण्डग्रन्थ, अत्यन्त सूक्ष्मविचार से पूर्ण रहने पर भी उसे शब्दप्रामाण्य की कोटि में नहीं रखा जाता । अथवा जैसे आधुनिक वैज्ञानिकों के विज्ञानग्रन्थ, जो साधारण मनुष्यों बोधगम्य नहीं हैं, क्योंकि उन ग्रन्थों में सूक्ष्मतम पदार्थों का विवेचन किया गया है, तथापि उनका मूलभूत प्रमाण तो सूक्ष्म गवेषणाओं और तदुपयोगी यन्त्रों को ही कहा जाता है । अतः उन वैज्ञानिक ग्रन्थों को भी शब्दप्रामाण्य की कोटि में नहीं कहा
पृष्ठ 134
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १२१ ] तथैव वेदा अपि न धर्मग्रन्थाः किन्तु विविधप्रकीर्ण विचारसंग्रहात्मका एव । कुरान, वायवल, जेन्दावस्तादयोऽपि तदनुया-यिनां रीत्या प्रत्यक्षानुमानागम्यार्थबोधकत्वादेव तेषां धर्मग्रन्थत्वं किं बहुना शब्दप्रामाण्यमनभ्युपगच्छन्तो बौद्धादयोऽपि धर्मतत्त्वज्ञानाय बुद्धादीनां सर्वज्ञत्वं साधयन्ति । तत एव वेदमन्तरापि योगजधर्मप्रभावात् सार्वश्यं प्राप्य ते धर्मतत्त्वं प्रत्यक्षेण पश्यन्तीति तेषामभिमानः । ११ -- किश्च बोद्धाः शब्दार्थानां स्थायिसम्बन्ध नाभ्युपगच्छन्ति यथेच्छं शब्दानां प्रयोगदर्शनात् । तथैव दयानन्दोऽपि व्यत्ययादिना पुरुषलिङ्गविभक्तिवचनानि विपरिणमय्य यथेष्टश्च विग्रहं कृत्वा यत्र क्वाप्यर्थे स्वैरितया मन्त्रान् व्याख्याति । अत्रैव प्रसङ्गे धर्मकीर्तिनोक्तमग्निहोत्रं जुहुयादित्यस्य श्वमासं भक्षयेदिति नार्थोऽत्र प्रमा? शब्दानां यथेष्टप्रयोगे स्वातन्त्र्यात् । सिद्धान्ते मीमांसकरीत्या शब्दार्थानामनादिसिद्धम्, नैयायिकानां रीत्या च सर्गादारभ्य परमेश्वरेण प्रचालितं सम्बन्धमाश्रित्य स्वैरचारिता परिहियते । परन्तु दयानन्दीयैः कथं स्वैरित्वं परिहरिष्यते स्वैरित्वं-मन्तरा तदभिमतव्याख्यानासम्भवात् । १२ — यथा प्रथमान्वये यथा सूर्योऽपावृणीते आपश्च वायुं बृणते तथैव यूयं ता अपो वृत्रतुर्ये प्रोक्षिता वृणी-ध्वम् । अत्र वृणीध्वं कस्य पदस्यार्थः? अध्याहारश्चेत् किं मूलं तत्र? प्रोक्षिता आप का भवन्ति? हिन्दीटीकायां तु सेक्तार इत्यर्थः कृतः । निष्ठाप्रत्ययान्तस्य तस्य कथं सोऽर्थः? यथा ता आपः शुद्धाभवेयुस्तदर्थमहं यज्ञानुष्ठाता देव्याय कर्मणे देवयज्यायै अग्नये जुष्टं तं यज्ञ ं प्रोक्षामि इत्यस्य वाक्यस्य कोऽर्थः? कर्म च पदार्थव्याख्याने उत्क्षेपणमपक्षेपणमा-कुञ्चनंप्रसारणं गमनमिति वैशेषिकसम्मतमुक्तम्, तादृशैरुत्क्षेपणादिभिः कथमपां शुद्धिः स्यात्? तासां देव्यत्वश्च द्विविभ-जाता । उसी तरह वेदों को भी धर्मग्रन्थ न कहकर विविध प्रकीर्घ विचारों के संग्रह रूप ही कहना होगा । कुरान, बायबल, जेन्दावेस्ता आदि ग्रन्थों को भी तत्रन्मतानुयायिकों की रीति के अनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान के द्वारा ज्ञान न हो सकने वाले अर्थों का बोधन करने के कारण ही थर्मग्रन्थ कहा गया है । किं बहुना शब्दप्रमाण को न मानने वाले बद्ध आदि लोग भी धर्मतत्त्व के ज्ञानार्थ बुद्ध आदि व्यक्तियों की सर्वज्ञता सिद्ध करने में प्रयत्नशील रहें हैं । उनका कहना है कि वेद का सहारा लिये बिना भी योगज धर्म के प्रभाव से सर्वज्ञता प्राप्त कर बुद्धादि व्यक्तियों ने धर्मतत्त्व का प्रत्यक्ष किया है । ११ – किश्व बौद्ध लोग शब्द और अर्थ के स्थायी सम्बन्ध को नहीं मानते हैं, क्योंकि शब्दप्रयोग उनकी अपनी इच्छा के अनुसार किये गये दिखाई पड़ते हैं । उसो तरह दयानन्द ने भी कहीं पर व्यत्यय आदि का सहारा लेकर पुरुष, लिङ्ग, विभक्ति, वचनों में विपरिणाम करके और अपनी इच्छाओं के अनुसार यथेष्ट विग्रह करके स्वच्छन्द होकर मन्त्रों का व्याख्यान किया है । इसी प्रसङ्ग में धर्मकीर्ति ने कहा है कि ' अग्निहोत्रं जुहोति ' का, श्व - मांस भक्षयेत् ' यह अर्थ नहीं किया जाता, यह ज्ञान कैसे हुआ? क्योंकि शब्दों का यथेष्ट प्रयोग करने में स्वातन्त्र्य है । सिद्धान्त की दृष्टि से मीमांसकों के सिद्धान्त के अनुसार शब्दार्थ अनादिसिद्ध हैं, नैयायिकों के अनुसार सृष्टिकाल के आरम्भ से ही परमेश्वर के द्वारा प्रचलित हुए सम्बन्ध का आश्रय करके स्वच्छन्दचारिता का परिहार किया जाता है । किन्तु दयानन्दी लोगों के द्वारा स्वच्छन्दता का त्याग कैसे किया जा सकता है? क्योंकि स्वच्छन्दता का यदि वे त्याग करेंगे तो उन्हें स्वाभिमत व्याख्यान करना सम्भव नहीं हो सकेगा । १२ – जैसे प्रथमान्वय में ' यथा सूर्य: अपावृणीते आपश्च वायुं वृणते, तथैव यूयं ता आपः वृत्रतुर्ये प्रोक्षिता वृणीध्वम् ' । यहाँ पर ' वृणीध्वम् ' यह किस पद का अर्थ है? यदि अध्याहार करते हैं, तो अध्याहार करने में क्या मूल है? प्रोक्षित आप् ( जल ) कौन से हैं? हिन्दी टीका में तो ' सेक्तारः ' अर्थ लिखा है । उस निष्ठाप्रत्ययान्त ' प्रोक्षित ' का आपका लिखा अर्थ कैसे " सकेगा? जैसे ' वे जल शुद्ध हो सकें, तदर्थं मैं यज्ञानुष्ठाता देव्यकर्म देवयज्या के लिये
पृष्ठ 135
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १२२ ] त्वमुक्तम् । तथाचानाशे केषाञ्चिदपि पदार्थानामुत्क्षेपणेन तेषामेव क्षेपणेन तेषामेव प्रसारेणाकुञ्चनेन तत्रगमनेन चापां शुद्धिर्भवति । अत्र चतुर्थीविद्यते । तेन तादृशकर्मार्थं देवयज्यायै विदुषां सत्क्रियार्थं च यज्ञ प्रोक्षामीत्युक्तम् किं सेवितं यज्ञ-प्रोक्षणेन तादृशानि दिव्यानि कर्माणि विदुषां सत्क्रिया स्वतां भविष्यति । अग्नये परमेश्वराय भौतिकावयवाय जुष्टं सेवितमित्युक्त पदार्थव्याख्याने, तत्र केन किं श्लिष्यते, अग्नये इति चतुर्थ्यन्तस्य जुष्टमित्यनेन कः सम्बन्धः? अग्नीषोमाभ्यामित्यपि चतुर्थी चेत् संवापत्तिः, जुष्टमित्यस्य कर्ता क:? अग्निरेव चेत् कथ चतुर्थी? अन्यश्चेत् कथमग्निना तत्सम्बन्ध:? यज्ञ ं प्रोक्षामीत्यस्य कोऽर्थः? पदार्थोक्ती सेचयामीत्युक्तम् । हिन्द्यां तु करोमीत्युक्त तंत्र कतरः पक्षः शुद्धः? किञ्च यज्ञोऽपि कर्मैव तथा च कर्मार्थमेव कर्म कर्त्तव्यम् । तत्रैव हिन्द्यां - अग्नीषोमाभ्यां वर्षणनिमित्त प्रीतिदम् प्रीत्या सेवनयोग्यच यज्ञ प्रोक्षामि मेघमण्डल प्रेष्यामीत्यर्थः कृतः । कथञ्च प्रोक्षणस्य प्रेषणमर्थः । एतादृशेऽर्थे स्वैरित्वमन्तरा किं वक्तु ं शक्यते? पराजघ्नुरित्यस्य पराहता विनष्टा इत्यर्थः कृतः । स च सकर्मकस्य धातोः कथं सम्भवति? ' कुरु कर्मैव-तस्मात्त्वम् ( श्री ० म ० गी ० ४।१५ ) इत्यत्र किमुत्क्षेपणादि कुरु इत्यर्थं प्रत्येति कश्चित्? किन्तु शास्त्रविहितमग्निहोत्रा-दिकं कुवित्येवार्थो युक्तः । चेष्टामात्रस्य कर्मणः स्वभाव प्राप्तत्वेनाविधेयत्वात् । १३ - यदपि च हे यज्ञानुष्ठातारः यत् यस्मादिन्द्रो वृत्रतुयें यस्मा इन्द्रमवृणीत वृणीते यस्माच्चेन्द्रण वृत्रतुर्ये ताः प्रोक्षिताः स्थ भवति । तस्माद्यूयं त्वा त यज्ञ सदा वृणीध्वं एवं च सर्वोजनोह देव्याय कर्मणे देवयज्यायै अग्नये त्वा तं यज्ञ प्रोक्षामि तथा चाग्नीषोमाभ्यां जुष्टं त्वा तं यज्ञ ं प्रोक्षामि । एवं कुर्वन्तो यूयं सर्वान् पदार्थान् जयांश्च शुन्धध्वं अग्निजुष्ट उस यज्ञ का प्रोक्षण करता हूँ ' इस वाक्य का क्या अर्थ होगा? पदार्थ का व्याख्यान करते समय उत्क्षेपण, अपक्षेपण, आकुञ्चन, प्रसारण, गमन आदि वैशेषिक शास्त्रसम्मत कर्म को कहा है, उन उत्क्षेपणादि कर्मों से जल की 1 शुद्ध किस प्रकार होगी? उनका दैव्यत्व ' द्विविभवत्व ' रूप बताया है । तथा च आकाश में किसी भी पदार्थ के उत्क्षेपण से, उन्हीं के अपक्षेपण से, उन्हीं के प्रसारण से, उन्हीं के आकुश्चन से, उनके वहाँ गमन से जल की शुद्धि होती है । यहाँ पर चतुर्थी विभक्ति है । उस कारण तादृश कार्यार्थ देवयज्या के लिये और विद्वानों के सत्क्रियार्थ यज्ञ का प्रोक्षण करतां हूँ, यह कहा गया है । क्या यज्ञ के प्रोक्षण करने से तादृश दिव्यकर्म और विद्वानों की सत्क्रिया स्वतः होगी । पदार्थ-व्याख्यान में कहा है कि भौतिक अवयवों वाले परमेश्वर अग्नि के लिये सेवित हुआ ' कहा है । अब बताईये यहाँ किसका किससे सम्बन्ध हो रहा है? अग्नये इस चतुर्थ्यन्त का ' जुष्टम् ' का क्या सम्बन्ध है? ' अग्नीषोमाभ्याम् ' इसे भी चतुर्थी कहें तो भी वही दोषापत्ति है । ' जुष्टम् ' का कर्ता कौन होगा? यदि अग्नि ' को कर्ता कहें तो फिर उसमें चतुर्थी कैसे? यदि किसी अन्य को कर्ता कहें तो अग्नि से उसका क्या सम्बन्ध? ' यज्ञ ' प्रोक्षामि ' का क्या अर्थ होगा? पदार्थोंक्ति में ' सेचयामि ' कहा है, किन्तु हिन्दी करते समय करोमि कह बैठे, तो आप ही सोचिये कि कौन सा पक्ष आपका शुद्ध? fara ' यज्ञ ' भी कर्म ही है । तथा च कर्म के लिये ही कर्म कर्तव्य है । वहीं पर हिन्दी में ' अग्नीषोम ' के लिये वर्षण में निमित्त ' प्रीति ' प्रदायक और प्रीतिपूर्वक सेवन करने योग्य यज्ञ को प्रोक्षामि ' का अर्थ मेघमण्डल में भेजता हूँ, किया है । ' प्रोक्षण ' का अर्थ ' प्रेषण ' कैसे होगा? तात्पर्य यह है कि इस प्रकार के अर्थ का प्रतिपादन करने में स्वैराचार के सिवाय और क्या कारण हो सकता है? उसी तरह ' पराजघ्नुः ' का अर्थ ' पराहता: विनष्टाः ' किया है । सकर्मक धातु का ऐसा अर्थ कैसे किया जा सकता है? ' कुरु कर्मैव तस्मात् त्वम् ' यहाँ पर क्या कुछ भी उत्क्षेपणादि करो, ऐसा अर्थ किसी को ज्ञात होता है? किन्तु शास्त्रविहित अग्निहोत्रादि कर्म करो, यही अर्थ सभी को प्रतीत होता है, जो उचित माना है | चेष्टा मात्र कर्म तो स्वभावतः ही प्राप्त होने से वह विधेय कोटि में नहीं माना जाता है । १३ – उसी प्रकार आपने जो हिन्दी में सारांश के रूप में पृ ० ७५ पर दिया है, वह भी ठीक नहीं है । कोन सा वह कारण है, जिससे सूर्य ने जल को और जल ने वायु को वरण किया? यदि ' यज्ञ ' को कारण कहें तो क्या सूर्य और जल भी ' यज्ञ ' किया करते हैं? और उनका किस प्रकार का यज्ञ है? वैसा यज्ञ क्या मनुष्य भी कर सकते हैं?
पृष्ठ 136
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १२३ ] शोधयत । यद्वोऽशुद्धा दोषास्ते सदैव पराजघ्नुर्निवृत्ता भवेयुः । तस्मात् कारणादहं वो युष्माकमिदं शोधनं शुन्धामि ' ( पृ ० ७३ ) इति, तदपि तादृगेव, “ यस्मात्कारणात् वृत्रयुद्धे मेघवधाय इन्द्रः सूर्यो अगे वृणीते स्वीकरोति जलवायु स्वीकरोति तथा यस्मात् सूर्योवृत्रतुर्येमेघस्य त्वरणाय पूर्वोक्ता आपः प्रोक्षिताः सेक्तारः कृताः तस्माद्यूयं तद् यज्ञ वृणीध्वम् । एवं वयं सर्वे देव्याय कर्मणे देवयज्यायै परमेश्वरप्राप्तये जुष्टं प्रीतिदं प्रीत्या सेवनयोग्यं यज्ञ ं प्रोक्षामि सेवे । अग्नीषोमाभ्यां प्रकाशितं जुष्टं यज्ञ मेघमण्डले प्रेषयामः । एवं सर्वान् पदार्थान् अपदार्थांश्च शुन्धध्वं यथा व: अशुद्धया-दयोदोषा निवृत्ता भवेयुः तथैवाहं वेदप्रकाशकः वः युष्माकं शोधनं शुद्धिप्रकार शुन्धामि सम्यक् वर्धयामि " ( पृ ० ७५ ) हिन्दी सहितस्य निष्कर्षः । तत्राप्युच्यते - किं तत्कारणं येन सूर्योऽपः आपो वायुं वृणते? यज्ञ एव चेत् किं सूर्य आपश्चापि यज्ञ कुर्वन्ति? कीदृशस्तेषां यज्ञः? तादृशं यज्ञ मनुष्या अपि कतु शक्नुवन्ति किम्? मेघवधस्तु प्रयोजनं सूर्यकर्तृकायां वरणस्य प्रोक्षिताः सेक्तारः कृता इत्यपि निष्ठाप्रत्ययप्रतिकूलमेव । वरणस्य ग्रहणमर्थोऽन्यो वा? नान्यो-निरूपणात् । ग्रहणार्थत्वे तु सूर्येण कुत्रत्यस्य जलस्य ग्रहणं क्रियते? भूमिष्ठस्य समुद्रस्थस्य मेघस्थस्य वा? नान्त्यौ, तथात्वे मेघवधासम्भवात् । मेघस्थस्यापि तन्न सम्भवति सूर्याकृष्टजलैरेव मेघोत्पत्तेः । एममेव जलेन वायोग्रहण कीदृशं कथञ्च वायुग्रहणेन मेघनाश:? तस्य धूमज्योतिः सलिलमरुतां सन्निपातरूपत्वात् । येन कारणेन सूर्येणापो वृताः, अद्भिश्च वायुर्वृतः, तेन कारणेन यूयमुक्तं यज्ञ ं वृणीध्वमित्यस्य किं तात्पर्यम्? नहि तत् पूर्वं यज्ञ उक्तम् । किञ्च पूर्वं तु मेघवधो मेघत्वरणं प्रयोजनमुक्तमत्र तु दैव्यं कर्म, देवयज्या प्रयोजनमुच्यते । तदेतत् कर्णस्पर्शे करिचालनमनुहरति । प्रोक्षामीत्यस्य सेवन कथमर्थः? अग्नीषोमाभ्यां च यज्ञः कथं प्रकाश्यते । अग्नये जुष्टमिति वा अग्नीषोमाभ्यामित्यपि चतुर्थी किन्न-स्यात्, अन्यथा वैरूप्यापत्तेः । मेघमण्डल प्रेषण पदार्थस्तुकथं? अन्ते शुन्धामीत्यस्य सम्यग्वर्धन कथमर्थः? भावार्थनिरूपणे त्वतीवाराजकता शाब्दन्याये दृश्यते । तथाहि परमेश्वरेणाग्निसूर्यो वेदादर्थ निर्मितो यदिमों सर्वेषां पदार्थानां मध्ये प्रविष्टो जलोषधिरसान् छिन्तः, वायु प्राप्य मेघमण्डलं गत्वाऽगत्यच शुद्धिसुखकारका भवेयुः । मेघवध को प्रयोजन कहें तो सूर्यकर्तृक अपावरण को ' प्रोक्षिताः ' सेक्तारः = सेचन करने वाले कहा है यह अर्थ करना भी निष्ठाप्रत्यय के प्रतिकूल ही है । ' वरण ' का अर्थ ग्रहण है या कोई अन्य अर्थ है? अन्य अर्थ तो हो नहीं सकता, क्योंकि उसे आपने बताया नहीं है । ग्रहण अर्थ मानने पर आप ही कहिये कि सूर्य के द्वारा कहाँ के जल का ग्रहण किया जाता है? क्या भूमिस्थित या समुद्रस्थित, अथवा मेघस्थित जल का वह ग्रहण करता है? समुद्र स्थित या मेघ स्थित जल का तो ग्रहण नहीं कर सकता, अन्यथा मेघवध का सम्भव नहीं हो सकेगा । क्योंकि सूर्याकृष्ट जल से ही मेघ की उत्पत्ति होती है । उसी प्रकार जल से वायु का ग्रहण करना भी सम्भव नहीं है । वायु का ग्रहण करने से मेघ का विनाश भी कैसे होगा? क्योंकि ' मेघ ' तो धूम, ज्योति, सलिल और मरुत् पदार्थों का सन्निपात स्वरूप है । ' जिस, कारण सूर्य के द्वारा जल का वरण, और जल के द्वारा वायु का वरण किया गया है उसी कारण तुम लोग तथाकथित यज्ञ का वरण करो ' – इस कथन का क्या अभिप्राय है? उसे यज्ञ में पहिले कहीं कहा नहीं है । किश्व पहिले तो मेघवध प्रयोजन बताया किन्तु यहाँ पर दैव्यकर्म ( देवयज्या ) को प्रयोजन कह रहे हैं । यह तो ऐसा ही हुआ कि जैसे कर्ण स्पर्शनिमित्त करिचालन किया जाय । ' प्रोक्षामि ' का अर्थ ' सेवन ' कैसे होगा? ' अग्नोषोम ' के द्वारा ' यज्ञ ' का प्रकाशन कैसे होगा? ' अग्नयेजुष्टम् ' के समान ' अग्नीषोमाभ्याम् ' यह चतुर्थी क्यों नहीं है? अन्यथा वैरूप्य प्रसङ्ग होगा । मेघ-मण्डल प्रेषण को प्रेषण पदार्थ कैसे जान लिया? अन्त में शुन्धामि का सम्यग्वर्धन अर्थ कैसे किया? पृष्ठ चौहत्तर पर जो भावार्थ निरूपण किया है, उसमें तो अराजकता का साम्राज्य ही दिखाई देता है । उसमें प्रदर्शित अर्थों का परस्पर कोई ताल - मेल ही नहीं है । पहिले तो मेघों के वध और त्वरण के लिये सूर्य के द्वारा जल का और जल के द्वारा वायु का वरण कहा है । सूर्य और अग्नि के द्वारा समस्त पदार्थगत जलौषधिरसच्छेद को बताया है । सर्वपदार्थों के अन्तर्गत आत्मा, काल, दिक् आदि भी आते हैं । उनमें जल, औषधि, रस का होना सम्भव ही नहीं है, क्योंकि वे निरवयव हैं । यदि सूर्य और अग्नि, सर्व पदार्थों में प्रविष्ट होकर जल, औषधि, और रसों का छेदन ( भेदन कर सकते हैं, तो उनमें
पृष्ठ 137
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १२४ ] तस्मान्मनुष्यैरुत्तमसुखलाभायाग्नौ सुगन्ध्यादिपदार्थानां होमे वायुवृष्टिजलशुद्धिद्वारा दिव्यसुखानामुत्पादनाय सम्प्रीत्या नित्यं यज्ञः करणीयो यतः सर्वे दोषा नष्टा भूत्वाऽस्मिन् विश्व सततं शुद्धा गुणाः प्रकाशिता भवेयुः । एतदर्थमहमीश्वर इदं शोधनमादिशामि । यूयं परोपकारार्थानि शुद्धानि कर्माणि नित्यं कुरुत । एवं रीत्या वाय्वग्निजलग्रहणप्रयोगाभ्यां शिल्पविद्ययाऽनेकानि यानानि यन्त्रकलाश्च संपाद्य पुरुषार्थेन सदैव सुखिनो भवते ' ( पृ ० ७४ ) ति, एतेषामर्थानां परस्परं समन्वयोऽपि नास्ति । पूर्वं तु मेघानां वधाय त्वरणाय च सूर्येणापामद्भिः वायुवरणमुक्तम् । सूर्याग्निभ्यां सर्वपदार्थगत-जलौषधिरसच्छेद उक्तः । सर्वपदार्थेषु आत्मकालदिगादयोऽपि भवन्ति । न तेषु जलौषधिरसाः सम्भाव्यन्ते निरवयवत्वात् यदि सूर्याग्नी सर्वपदार्थेषु प्रविश्य जलौषधि रसान् छेत्तु भेत्तु ं शक्नुतस्तदापरमाणुत्वापत्त्या तेषां स्वतः शुद्धिर्भविष्यति । मेघमण्डलगमनस्य किं प्रयोजनम्? सुगन्ध्यादिपदार्थानामग्नौ किमर्थं होमः । होममन्तरापि तयोस्तत्कार्यं कर्तुं शक्तत्वात् अन्यथासुगन्धितपदार्थानामेव प्रभावेण शुद्धिसुखादयो वक्तव्याः स्युः । किञ्च सुगन्धिपदार्था यथा छिन्द्यन्ते तथा दुर्गन्धि-पदार्था अपि छिद्यन्ते । सर्वेषां परमाणुत्वेऽविशेषापत्त्या व्यर्थ एवाग्नौ तत्प्रक्षेपः । यदि तथात्वेऽपि तद्वैशिष्ट्येनोपकारस्तदा तद्वदेव दुर्गन्धपदार्थकृतापकारोऽपि किन्नस्यादित्यलं परच्छिद्रप्रकाशेन । १४ – सिद्धान्ते श्रुति - सूत्रपरम्परानुरोधेन सरलः सुगमः सुबोधश्चायमर्थः - अपां प्रशंसार्थमुच्यते - हे आपः वज्रात्मनाव्यक्ताः । ‘ ततो देवा एतं वज्रं ददृशुर्यदपोवत्रो वा आपो वज्रो हि वा आपस्तस्मात् येनंतायन्ति निम्नं कुर्वन्ति यत्रोपतिष्ठन्ते निर्दहन्ति ( श ० १ | १ | १ | १७ ) इति न केवलं प्रसिद्धिबलाद् वज्रत्वं किन्तुपपत्ति १७ बलादपि । तथाहि येन पथा यन्ति तं निम्नं गतं कुर्वन्ति यत्र गत्वोपतिष्ठन्ते तृणगुल्मादौ तत् निर्दहन्ति निःसार कुर्वन्ति । वृत्रं ( मेघं ) हन्तुकाम इन्द्र: साहाय्यकरणार्थं युष्मान् प्रार्थयामास । यूयञ्च वृत्रशरीरनिरुद्धा विस्र भगमनार्थ वृत्रहन्तुमिन्द्र प्रार्थितवत्य ईदृग्विधपरस्परप्रार्थनं यूष्मानिति मन्त्र भागेनाहेति ब्राह्मणं स्पष्टं वक्ति - यूयमिन्द्रमवृणीध्वं वृत्रतुर्य इति । ' एता उहीन्द्रमवृणत वृत्रेणस्पर्धमानमेताभिह्यनमहंस्तस्मादाह यूयमिन्द्रमवृणीध्वं वृत्रतुयं इति । हे आप: यूयं प्रोक्षिता: स्थ: असंस्कृता नान्यसंस्कारक्षमाः । अन्यस्याद्भिः प्रोक्षणंभवति नापामन्येनेतिरे नैव मानसोपचारेण प्रोक्षिता: स्थ इति-मन्त्रेण प्रोक्षिताः संस्कृता भवतेत्यर्थः । ' अग्नये त्वे ' ति हविः प्रोक्षति । हे हविः अग्नये देवताविशेषाय जुष्टमभिरुचितं त्वां प्रोक्षामि । अग्नये इति ' रुच्यर्थानां प्रीयमाण: ' ( पा ० सू ० १/४ | ३ ३ ) इति चतुर्थी । अग्नीषोमाभ्यां जुष्टमभिरुचितं त्वा प्रोक्षामि प्रोक्षणेन शोधयामि । ' हविः प्रोक्षतीति ' ( श ० १ । १ । ३ । १० ) इति श्रुतेः । हे यज्ञपात्राणि दैव्याय अग्न्यादिदेवता-सम्बन्धिने कर्म यूयं शुन्धध्वं शुद्धानि भवत । मन्त्रसहकृत पूत जल प्रोक्षणप्रभावात् कर्मैव विशिष्यते देवयज्याय देवसम्ब-न्धिन्य ' दर्शादिक्रियाय । ननु शुद्धा एव वथं किमिति शुन्धामस्तत्राह - वो युष्मान् यदशुद्धा निम्नजातीयास्तक्षवृषलादयः युष्माकं सम्बन्ध्यङ्ग छेदनतक्षणादिकाले पराजघ्नुः पराहतं कृतवन्तः स्वकीयहस्तस्पर्शादिरूपमशुचित्वं कृतवन्तः, तदिदं युष्माकमङ्ग शुन्धामि प्रोक्षणेन शुद्धं करोमि । ब्राह्मणं चैतदेव वक्ति -- ' यस्य देवताय हविर्भवति तस्य मेध्य ं करोति ' ( श ० १।१।३।११ ) ' यज्ञपात्राणि प्रोक्षति देव्याय कर्मणे शुन्धध्वं देवयज्याया इति दैव्याय हि कर्मणे शुन्धति देवयज्याय परमाणुत्वापत्ति होने से उनकी स्वत एव शुद्धि हो जायगी । मेघमण्डल में जाने का क्या प्रयोजन? सुगन्धित पदार्थों का अग्नि में होम किसलिये? होम के बिना भी उस कार्य को करने में सूर्य और अग्नि समर्थ हैं । अन्यथा सुगन्धित पदार्थों के प्रभाव से ही शुद्धि, सुख आदि का होना कहना होगा । किञ्च सुगन्धि पदार्थों का छेदन जैसे किया जाता है वैसे ही दुर्गन्धि पदार्थों का भी छेदन किया जा सकता है । सभी समान रूप से परमाणु रूप हो जाने से उनका अग्नि में प्रक्षेपण करना व्यर्थ ही है । यदि सुगन्धित पदार्थों के परमाणुरूप हो जाने पर भी उनके अपने वंशिष्ट्य से कुछ उपकार होता है, ऐसा कहें तो उसी तरह दुर्गन्धि पदार्थों से अपकार भी क्यों नहीं हो सकेगा? ऐसे कितने ही दोष, दयानन्दी व्याख्या में भरे पड़े हैं, कहाँ तक उन्हें कहा जाय? १४ - अतः सिद्धान्तभूत अर्थ, जो श्रुति, सूत्र, शिष्ट वैदिक विद्वानों की परम्परा के अनुसार चला आ रहा है,
पृष्ठ 138
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १२५ ] शुद्धः पराजघ्नुरिदं वस्तच्छुन्धामीति तद्यदेवैषान्नशुद्धस्तक्षावान्यो वाऽमेध्यः कश्चित् पराहन्ति तदेवैषामेतदद्भि-For करोति तस्म दाह यद्वोऽशुद्धीः पराजघ्नुरिदं वस्तच्छुन्धामीति ' ( श ० १ | १ | ३ | १२ ) नात्र दयानन्दोक्तार्थस्य गन्धोऽपि दृश्यते । तस्मात् सायणादिसम्मतमेव व्याख्यान युज्यते । १५ - अध्यात्मपक्षे तु हे प्रकृतिपुरुषौ युवां पवित्रे स्वभावशुद्धे स्थः भवथः । अशुद्धयस्तु औपाधिक्य एव । कुत इति चेत् यतो वैष्णव्यो विष्णोर्व्यापनशीलस्य परमात्मनः सम्बन्धिनौ स्तः लिङ्गव्यत्ययः । ' भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ' ( श्री ० म ० गी ० ७/४ - ५ ) अत्र मनःपदेनाहङ्कारः, बुद्धिपदेन महत्तत्त्वम्, अहङ्कारपदेना-व्यक्त ं ग्राह्यम् । ' महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । ' ( श्रो ० म ० गी ० १३५ ) इति गीतावचनान्तरात् । भगवतः सूर्यस्य सर्वोत्पादयितुः परमेश्वरस्य वा प्रसवे प्रेरणे अहं वेदपुरुषः वो युष्मान् अच्छिद्रण निर्दोषेण पवित्रेण पावनेन कर्मणा उत उच्चैः पुनामि शोधयामि । वैदिककामकर्मज्ञानानामादरेणैव पाशविक ( स्वाभाविक ) कामकर्मज्ञानानां निवृत्तिसम्भवात् । यथा विषेण विषान्तरमुपशाम्यति तथैव वैदिककामकर्मज्ञानः पाशविककामकर्मज्ञानानि शाम्यन्ति । नन्वेवं दोषाणामागन्तुकोपशान्ती सत्यामपि पुनस्तदुद्भवः सम्भवति, नह्य ध्रुवैः प्राप्यते ध्रुवमिति चेत्तत्राह - सूर्यस्य वेदान्तशास्त्ररूपमार्तण्डस्य रश्मिभिस्तज्जनितैविवेकविज्ञान र्वः युष्मान् उत्पुनामि समूलमेव दोषानुन्मूलयामि । तथात्वे प्रकृतेः पुरुषस्य चाधिष्ठानं ब्रह्मात्मत्वमेव सम्पद्यते । ' एकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६।२।१ ) ' नेह नानास्ति किश्वने ( बृ ०४।४ । १६ ) त्यादि श्रुतिशतेभ्यः । १६ – य स्वभावशुद्धमेवौपाधिकैर्दोषैर्दुष्ट शोध्यते । यथा स्वच्छमेव वस्त्रमिङ्गालादिसंसर्गेण मलिनं क्षारादि-ना शोध्यते न तु स्वतोमलिनमिङ्गालादिकं, तस्य यावत्सत्त्वं क्षारशतैरपि स्वच्छत्वासम्भवात् । हे जीवात्मपरमात्म चैतन्ये युवां पवित्रे स्वभावशुद्धे स्थः । तयोरेकस्य संसारित्वेन प्रसिद्धस्याशुद्धिरप्युपाधिसम्बन्धनिमित्ता यतो युवां वैष्णव्यो व्यापन-वही सुगम और सुबोध होने से ग्राह्य है । एवञ्च सायणाचार्य सम्मत व्याख्या ही समुचित है । १५ - अध्यत्मपक्ष में इस प्रकार अर्थ होगा- हे प्रकृति - पुरुषों! तुम दोनों स्वभाव से ही शुद्ध हो । अशुद्धियाँ तो पधिक ही है । क्योंकि प्रकृति - पुरुष दोनों ही व्यापक परमात्मा के सम्बन्धी हैं । यह बात लिङ्गव्यत्यय से समझनी चाहिये | भगवान् स्वयं कह रहे हैं कि भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन और बुद्धि, अहङ्कार- ये मेरी अष्टधा प्रकृति है । तथा " अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् || " तथा ' महा-भूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ॥ ' इति ॥ भगवान् सूर्य अथवा सर्वोत्पादयिता परमेश्वर की प्रेरणा होने पर में वेदपुरुष, तुम लोगों को निर्दोष पवित्र कर्म के द्वारा अच्छी प्रकार पवित्र करता हूँ । वैदिक काम्य कर्मों के अनुष्ठान से ही पाशविक ( स्वाभाविक ) कर्मों से निवृत्त होना सम्भव हो सकता है । जैसे एक विष से अन्य विष की शान्ति की जाती है । उसी तरह वैदिक काम्यकर्मों के ज्ञान से पाशविक काम्यकर्मों का ज्ञान शान्त किया जा सकता है । यदि कोई यह शङ्का करे कि दोषों की आगन्तुक शान्ति हो जाने पर भी पुनः उन दोषों का उद्भव हो सकता है, क्योंकि असे ध्रुवका प्रक्षालन नहीं हो सकता । उस शङ्का का समाधान इस प्रकार होगा -- वेदान्तशास्त्रस्वरूप सूर्य की रश्मियों से उत्पन्न विवेक ज्ञान के द्वारा तुम्हारे समस्त दोषों का समूल उन्मूलन मैं कर देता हूँ । इस प्रकार निर्दोष हो जाने पर प्रकृति और पुरुष के अधिष्ठानरूप ब्रह्मात्मभाव की प्राप्ति हो जाती है । इसमें प्रमाणभूत एकमेवाद्विती-यम् ', ' नेह नानास्ति किञ्चन ' इत्यादि सैकड़ों श्रुतिवचन हैं । १६ - स्वभाव से शुद्ध रहने वाली वस्तु ही औपाधिक दोषों से दुष्ट होने पर शोधित की जाती है । जैसे स्वच्छ वस्त्र ही इङ्गालादि के संसर्ग से मलिन होने पर शोधित किया जाता है । स्वत एव मलिन रहने वाले इङ्गाल को सैकडों क्षारद्रव्यों से निरन्तर स्वच्छ करते रहने पर भी इङ्गाल का स्वच्छ होना कभी भी सम्भव नहीं है ।
पृष्ठ 139
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १२६ } शील परब्रह्मसम्बन्धिनी स्थः । हे जीवात्मनः वो युष्मान् अच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिश्चोत्पुनामि शोधयामि । कर्मभिः स्वान्तः शुद्धिविवेक वैराग्यादिजननद्वारा सूर्यस्य वेदान्तस्य विवेकविज्ञान रश्मिभिर्ब्रह्मात्मभावमापादयामि | हे देव्य आपः अज्ञानान्धकारविजिगीषवः गङ्गाद्याः सरितः परमपावन्यो भगवच्छक्तयः कथासरित: भक्तिरसामृतनिर्झरि-यशच अद्यास्मिन्न व अग्रे प्रशस्ते दिने शोधयामि इमं भगवदुन्मुखमात्मानं नयत भगवदात्मभावं प्रापयत । कीदृशं यज्ञ-पति यजमानं भगवदाराधनबुद्धया यज्ञादिकुर्वाणम् । पुनः कीदृशं यज्ञस्य पालक दक्षिणादिना सुधातु यज्ञादिपोषकं पुनः कीदृशं यज्ञ विष्णोरशत्वाद्विष्णुरूपम् ' द्वासुपर्णा सयुजा सखाया ' ( ऋ ० सं ० १।११६४ / २० ) इत्यादिश्रुतेः । इन्द्र-यजमानो शिष्यशासकाविह संबोद्धयौ शेष पूर्ववत् । ' युष्मा इन्द्रो वृणीतेति । ' ( श ० १ २ ३८ ) हे जीवात्मनः युष्मान् इन्द्रः परमेश्वरो वृत्रतुर्ये वृत्रस्यावरकस्या-ज्ञानस्य तु वधे अज्ञानवर्धनिमित्तेनावृणीत वृतवान् स्वोयत्वेन स्वीकृतवान् । १७ - ननु तस्याप्त समस्त कामत्वेन पूर्णकामत्वात् कुतोऽस्मान् वृतवानिति चेत्तत्राह - यूयमिह जन्मन्यमुष्मिन् जन्मनि वा इन्द्र परमैश्वर्यशालिनं भगवन्तं वृत्रतुर्येऽनाद्यज्ञानावरणवृत्रवधार्थं वृतवन्तः । यथा स्वयम्वरा राजकन्या यमेव वृणुते तस्मा एव स्वस्वरूपं दर्शयति स्वात्मानं निवेदयति नान्यस्मै तथैव भगवान् यं वृणुते तमेव स्वात्मानं दर्शयति प्रावरणापनयेन प्रापयति च नान्यथा प्रवचनश्रवणादिभिरुपाय शतैरपि स लभ्यः । तेन यमेव वृणुते तस्यैवाज्ञानं वृत्रं नाशयति । ' नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू १७ स्वाम् || ' ( मु ं ० ३।२।३ ) इतिश्रुतेः । हे जीवात्म - परमात्म चैतन्यों! तुम स्वभाव से ही शुद्ध हो । उन दोनों में से एक, जो संसारी के रूप में प्रसिद्ध है, उसकी अशुद्धि भी उपाधि के सम्पर्क से है, क्योंकि तुम दोनों व्यापनशील परब्रह्म से सम्बन्ध रखते हो । हे जीवात्माओं! सूर्य की पवित्र रश्मियों से मैं तुम्हारा शोधन करता हूँ । वेदविहित कर्मों के अनुष्ठान से अन्तःकरण की शुद्धि होने पर विवेक वैराग्यादि को उत्पन्न कराकर वेदान्तरूपी सूर्य की विवेकज्ञानरूप रश्मियों के द्वारा ब्रह्मात्मभाव को तुम्हें प्राप्त कराता हूँ । हे जल देवता! अज्ञानान्धकार को जीतने की इच्छा रखने वाली गङ्गा आदि नदियाँ परम पवित्र भगवच्छक्ति रूप कथासरिताएं और भक्तिरसामृत की निर्झरणियाँ सबको आज इसी प्रशस्त दिन शुद्ध करता हूँ । इस आत्मा को, जो भगवान् की ओर मुख लगाये हुए है, उसे भगवदात्मभाव को प्राप्त कराओ । कैसे यजमान के लिये यह कहा जा रहा है, तो कहते हैं कि जो यजमान भगवदाराधनबुद्धि से यज्ञादि का अनुष्ठान करता हो तथा दक्षिणा देकर यज्ञ का पालन करता हो, यज्ञ का पोषण करता हो, क्योंकि यह यज्ञ विष्णु का अंश होने से विष्णु-रूप हैं । उसकी विष्णुरूपता ' में ' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया: ' यह श्रुति प्रमाण है । इन्द्र और यजमान शिष्य और शासक यहाँ पर सम्बोधनीय हैं, अन्य सब पूर्ववत् ही समझना चाहिये । शतपथ ब्राह्मण भी कह रहा है कि हे जीवात्माओं! परमेश्वर इन्द्र ने आवरक अज्ञान के वधार्थ आत्मीय के रूप में तुम लोगों को स्वीकार किया है । १७ - परमैश्वर्यशाली इन्द्र तो पूर्णकाम आप्तकाम है, हमारा स्वीकार उसने क्यों किया? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि तुम लोगों ने इस जन्म में अथवा जन्मान्तर में परमैश्वर्यशाली भगवान् इन्द्र का अनादि अज्ञानावरणरूप वृत्र के वधार्थ वरण किया था । जैसे स्वयम्वरा राजकन्या स्वयं जिसका वरण करती है, उसी के सामने अपना स्वरूप प्रदर्शित करती हुई आत्मसमर्पण करती है । दूसरे को नहीं । उसी तरह भगवान् जिसको स्वीकार करते हैं, उसी को अपना स्वरूप दिखाते हैं अर्थात् आवरण हटाकर अपने को अर्पित करते हैं । उस परमेश्वर की प्राप्ति का अन्य कोई साधन नहीं है । सैकडों प्रवचन श्रवण आदि उपायों के करते रहने पर भी वह सुलभ नहीं होता है । एवश्व जिसको वह अपनाता है, उसी के अज्ञानरूपी वृत्र का वह नाश करता है । ' नायमात्मा प्रवचनेन ' इत्यादि वचनों के द्वारा मुण्डको -पनिषद् भी यही बता रही है ।
पृष्ठ 140
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १२७ ] १८ - ननु योहि यस्य प्रियो भवति स तस्य वरणीयो भवति । न च तस्य कश्चिदपि प्रियो द्वेष्यो वा, ( न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो नोपेक्षणीयादरणीय पक्षः, श्री ० भा ० म ० पु ० ८ ५ | २२ ) इतिस्मृतेस्तस्य सर्वसमत्वात् । समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ' ( श्री ० म ० गी ० ६ २६ ) इति वचनादिति चेन्न, सर्वसमस्य सम्पूर्णकामस्यापि भक्ति-परवशत्वेन वरणीयगुणयुक्तभक्तवरणसम्भवात् । ये सर्वनंरपेक्ष्येण भगवन्तं वृणते भगवानपि तान् वृणोत्येव ‘ ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ( श्री ० म ० गी ० ४ । ११ ) इति भगवत एवोक्तः । १६-- ननुपरिष्टादुद्धृतस्य ' न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ' ( श्री ० म ० गो ० ६ २६ ) इति श्रीमद्भगवद्गीतावचनस्य का गतिरिति चेत्तत्तुच्छम्, ' ये भजन्ति तु मां भक्तया मयि ते तेषु चाप्यहम् ' ( श्री ० म ० गी ० ६ २६ ) इत्युत्तरार्धेनेव तत्समाधानात् । तथा च सर्वनरपेक्ष्येण भगवत्प्रेप्सयैव भगवन्तं भजन्ति नित्यप्राप्तस्य प्राप्तिरज्ञानवृत्रवधेनैव सम्भवति । वृत्रवधार्थं ये भगवन्तं वृणते भगवानपि वृत्रवधार्थं तान् वृणोति । वृत्रो यथा जीवनां शत्रुस्तथैव परमेश्वरस्यापि शत्रुः भगवत्स्वांशभूतजीवानां दुःखहेतुत्वात् । अज्ञानवशादेव जीवाः स्वपरप्रेमास्पदमपि भगवन्तमपलपन्ति वैमुख्यश्च भजन्ति । तच्चाज्ञानं जीवनिष्ठब्रह्माकारवृत्त्यैव बाध्यते इति तदर्थं जीवानां साहाय्यमपेक्षितम् । तादृशी वृत्तिर्भगवदनु-ग्रहसापेक्षैव जायते । भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते -- अर्थात् भक्तिरेव ज्ञानाकारेण परिणमते । ' सनो बुद्धया शुभया संयुनक्तु ' ( श्वे ० ३३४ ) ' ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ' ( श्री ० म ० गी ० १०।१० ) इत्यादिवचनेभ्यः । १८- यदि कोई यह प्रश्न करें कि, जो जिसका प्रिय होता है, वह उसका अपना आत्मीय होता है, ऐसा लोक व्यवहार में देखते हैं, किन्तु भगवान् का तो न कोई द्वेष्य होता है, और न कोई प्रिय होता है । भागवतकार कहते हैं कि भगवान् न किसी को बध्य समझते हैं, और न रक्षणीय, या उपेक्षणीय अथवा आदरणीय समझते हैं, उनके लिये तो सभी समान होते हैं । सभी के प्रति उनका समान भाव रहता है । भगवान् ने स्वयं कहा है ' समोऽहं सर्वभूतेषु न मे योऽस्ति न प्रियः । ' इस प्रश्न पर समाधान यह है कि यद्यपि भगवान् आप्तकाम पूर्णकाम, सर्वसम हैं, तथापि भक्ति परवश होने के कारण वरणीय गुणों से युक्त भक्त का वरण किया जाना बहुत सम्भव है । जो भक्त, किसी की अपेक्षा न कर सर्वसङ्ग परित्याग करके भगवान् का ही एकमात्र वरण करके उसकी शरण लेते हैं, तब भगवान् भी उन्हीं को आत्मीय भाव से स्वीकार कर लेते हैं । कहा भी है- ' ये यथा माम्प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । ' १६ - यदि यह शङ्का हो कि ऊपर उदूधृत किये वचन - ' न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः - को चरितार्थता कैसे होगी? यह शङ्का निस्सार है, क्योंकि उक्त शङ्का का समाधान ' समोऽहं सर्वभूतेषु ' - के उत्तरार्ध ' ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषुचाप्यहम् ' से ही कर दिया गया है । तथा च सर्व निरपेक्ष होकर एकमात्र उस परमेश्वर की प्राप्ति कामना से ही जो लोग उसका भजन करते हैं, उनको उस नित्य प्राप्त रहने वाले परमेश्वर की प्राप्ति का होना अज्ञान रूप वृत्र के वध से ही हो सकती है । एवश्व वृत्रवधार्थ जो लोग भगवान् का वरण करते हैं तो भगवान् भी उस वृत्र वधार्थ उनका वरण करते हैं, यानी उनको अपना लेते हैं । वृत्र जैसे जीवात्माओं का शत्रु है, वैसे ही वह परमेश्वर का भी शत्रु है, क्योंकि भगवान् के अपने अंशभूत जीवात्माओं के दुःख का वह कारण है । अज्ञान के कारण ही यह जीवात्मा अपने अत्यन्त प्रेमास्पद रहने वाले परमेश्वर का भी अपलाप करता है, और उससे विमुख हो जाता है । उस अज्ञान का बाध, जीवनिष्ठ ब्रह्माकारवृत्ति से ही हो सकता है अतः उसके लिये जीव के साहाय्य की अपेक्षा रहती है । उस प्रकार की वृत्ति होना भी भगवदनुग्रह सापेक्ष ही है । ' भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते ' अर्थात् भक्ति ही ज्ञान के आकार में परिणत हो जाती है । यह बात श्वेताश्वतर उपनिषद् तथा श्रीमद्भगवद्गीता के वचनों से भी अवगत होती है । इसलिये-