वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 141–150
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 141–150
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[ १२८ ] २० -- हे जीवाः तस्मादमृतवर्षिण्या भगवदीयकृपादृष्ट्या प्रोक्षिताः शुद्धा भवत । अहं वेदपुरुषस्त्वा त्वां ( जात्य-भिप्रायेणैकवचनम् ) कर्मोपासनादिभिजुष्ट सेवितं कर्मादियुक्तं त्वामग्नये ब्रह्मात्मसाक्षात्काररूपज्ञानाग्नये प्रोक्षामि शुद्धं करोमि । परमात्मकृपावत् शास्त्रकृपाया अपि तत्त्वज्ञानहेतुत्वात् । तदर्थं च त्वां अग्नीषोमाभ्यां भगवद्विप्रलम्भ सम्भोगाभ्यां जुष्टं सेवितं त्वां प्रोक्षामि । सर्वथा अनात्मतादात्म्यवासनादाहेन भगवदात्मतादात्म्य रसास्वादजननेन युक्त कृत्वा अखण्डानन्दरसानुभवयोग्यं करोमि । हे अन्तःकरणबाह्यकरणानि यूयं दैव्याय कर्मणे देवस्य स्वप्रकाशस्य परमात्मन उपासनोपयोगिने कर्मणे श्रुतिस्मृतिलक्षणाय वर्णाश्रमधर्माय तदनुष्ठानाय शुन्धध्वम् शुद्धानि भवत । देवयज्यायै परमा-त्मार्चनरूपायै षोडशोपचारराजोपचारचतुःषष्ट्य पचारलक्षणायें क्रियायै च शुन्धध्वम् । शुद्धदेहेन्द्रियमन्तरा तदसम्भवात् । ' वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान् विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोषकारणम् ॥ ' ( विष्णुपुराण ३ शवाई ) ' आहार-शुद्ध सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः ' ( छा ० उ ० ७२६२ ) ' कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते । ' ' ज्ञानमुत्प-द्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः । ' ( म ० भा ० शा ० प ० १०४८ ) इत्यादिवचनेभ्यः । वः युष्मान् यदशुद्धाः शास्त्र-निषिद्धाविषयाः कामचार - कामवाद कामभक्षादयः पराजघ्नुः पराहतमशुचित्वं चक्र स्तदहं शुन्धामि परमात्माभिमुख्या-पादनेन शोधयामि । २१ – यद्वा हे सैनिकाः । इन्द्रो राजा वृत्रतुर्ये राज्यावरोधकशत्रुवधे युष्मान् वृणुते साहाय्यकरणार्थं प्रार्थयते यूयं चेन्द्र ं राजानं वृणीध्वं शत्रुवधे निमित्ते राजाश्रयमन्तरा युद्धस्य विहितत्वात् । अतएव महाभारते दुर्योधनोऽश्वत्थामा-नमन्तेऽभिषेकेण राजानं कृतवान् । तदेवाश्वत्थामाकृपाचार्यकृतवर्माण युयुधुः अस्त्रशस्त्रादियुद्धोपकरणप्राप्त्यर्थश्व सैनिका राजानमाश्रयन्ते । हे सैनिका यूयं प्रोक्षिता: पाण्डव सेनया स्थ राष्ट्ररक्षार्थं वृत्र ( शत्रु ) वधार्थं प्रोक्षिता अभि-षिक्ता: स्थ | आचार्य दीक्षावत् राजाभिषेको भवति पुत्रकदीक्षावत् युवराजाभिषेकः । सभार्य दीक्षावत्सेनापतिदीक्षाभवति साधकदीक्षावत् सैनिकदीक्षाभवति । अग्नयेऽग्निवदमिततेजःप्राप्तये त्वा शौर्यादिगुणैर्जुष्टं सेवितं त्वामहं पुरोहितः पुनः २० – वे जीवों! अमृत वर्षा करने वाली भगवत्कृपादृष्टि से तुम शुद्ध ( प्रोक्षित ) हो जाओ । मैं वेदपुरुष, ब्रह्मात्मसाक्षात्कार रूप ज्ञानाग्नि के लिये कर्मानुष्ठान में तत्पर रहने वाले तुम्हारी शुद्धि करता हूँ । भगवत्कृपा के समान ही शास्त्रकृपा भी तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति में कारण हुआ करती है । अतः उसके लिये, भगवद्विप्रलम्भ और सम्भोग का सेवन करने वाले तुम्हारा प्रोक्षण मैं कर रहा हूँ । अभिप्राय यह है कि सभी प्रकार से अर्थात् अनात्म-तादात्म्य की वासना का दाह कर भगवदात्मतादात्म्य के रसास्वाद से युक्त करते हुए अखण्डानन्द रस का अनुभव करने योग्य तुम्हें बना रहा हूँ । हे अन्तःकरण और हे वाह्य इन्द्रियों! तुम सब स्वप्रकाश परमात्मा की उपासना के उपयुक्त कर्म के लिये अर्थात् श्रुति स्मृति लक्षण वर्णाश्रम धर्म के लिये और उसके अनुसार अनुष्ठान के लिये शुद्ध हो जाओ । देवयज्या के लिये अर्थात् परमात्मार्चनरूप षोडशोपचार, राजोपचार चतुःषष्टि - उपचाररूप क्रिया के लिये शुद्ध हो जाओ । क्योंकि देह और इन्द्रियों के शुद्ध हुए बिना उसका होना सम्भव नहीं है । इसी बात को विष्णु पुराण, छान्दोग्य उपनिषद् और महाभारत शान्तिपर्व के वचनों ने भी कहा है । तुम्हें, शास्त्रनिषिद्ध विषयों ने अर्थात् कामाचार - कामभक्ष आदि ने अपवित्र कर दिया है, इसलिये मैं परमात्मा की सम्मुखता सम्पादनार्थ शुद्ध बना रहा हूँ | २१ – अथवा हे सैनिकों! राजा इन्द्र वृत्रयुद्ध के समय राज्यावरोधक शत्रुओं के वध के लिये तुम्हारा वरण करता है, यानी सहायता के लिये तुम्हारी प्रार्थना करता है अत: तुम भी राजा इन्द्र को स्वीकार करो, क्योंकि शत्रु-वध के लिये राजा का आश्रय अवश्य करना चाहिये, उसका आश्रय किये बिना युद्ध करना विहित नहीं है । अतएव महाभारत युद्ध में दुर्योधन ने अन्त में अश्वत्थामा को अभिषिक्त करके राजा बनाया था, तभी अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा ने युद्ध किया ।
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[ १२६ ] प्रोक्षामि । मन्त्रवारिप्रोक्षणेन वीर्यवन्तं करोमि । अग्नीषोमाभ्यामग्निवत्तेजस्वित्वाय सोमवल्लोक प्रेमास्पदत्वाय दुष्टनिग्र-हाय शिष्टपरिपालनाय च ताभ्यामभिरुचितं त्वा त्वामहं मन्त्रशुद्धेन वारिणा प्रोक्षामि । तेन यद्वो युष्माकमङ्गमशुचिका-मादयो दोषाः पराजघ्नुस्तदहं शुन्धामि प्रोक्षणेन तेजस्वि करोमि । २२ – हे वैज्ञानिका शिल्पिनः राजा राष्ट्रपतिर्वा युष्मान् वृत्रतुर्ये अवरोधकशत्रुवधे परमाणूद्जनास्त्राद्या-विष्काराय दारिद्रयादिशत्रुवधे उत्पादनोपकरणाविष्काराय अन्धकारवृत्रवधे प्रभूतविद्युदादिनिर्माणाय ऊर्जासङ्कट-निवारणायाप्रतिम सौय्यू जजननाय च वृणुते यूयं तदर्थमपेक्षितोपकरण धनादिप्राप्त्यर्थमिन्द्रं राजानं वृतवन्तः । एतदर्थं यूयं प्रोक्षिता अभिषिक्ता अधिकृता भवत । अग्नये अग्निवत्तेजस्विज्ञानप्राप्तये अग्नीषोमाभ्यां संहारकपालक दुष्टशोषक-शिष्टपोषकगुणाभ्यामभिरुचिचितमभीप्सितं त्वामहं प्रोक्षामि । सदाचार्य नियन्त्रिता एवं वैज्ञानिका दुष्टनिग्रहशिष्टानुग्रहादि कार्येषु सक्षमा भवन्ति । अन्यथा त्वनियन्त्रितमहायन्त्राणीव विनाशहेतवः सन्तोऽनर्थायैव भवन्ति । त्वां देव्याय कर्मणे दिव्याय कर्मणे प्रजापालनाय देवयज्यायै प्रजापालनद्वारा परमेश्वराराधनलक्षणायें क्रियायै यूयं शुन्धध्वं शुद्धा भवत । अत एव यद्वो युष्माकं मनोऽशुद्धा भौतिकाः संस्काराः पराजघ्नुरशुद्धं कृतवन्तः तदहं शास्त्रीय सिद्धान्तसदाचारोपदेशेन शुन्धामि शोधयामि सच्छास्त्रसंस्कारयुक्त ' करोमीति । एवमेव बहवोप्यर्था वक्तुं शक्यन्ते पूर्वोक्तमुख्यार्थाविरोधेन ॥ बा ० सं ० १1१३ ) ॥ और अस्त्र शस्त्रादि युद्ध सामग्री की प्राप्ति के लिये सैनिक लोग राजा का आश्रय किया करते हैं । हे सैनिकों! तुम भी राष्ट्र की रक्षा के निमित्त अर्थात् वृत्र शत्रु के वधार्थं अभिषिक्त ( प्रोक्षित ) हो जाओ । आचार्य दीक्षा के समान राजा का अभिषेक होता है । पुत्रक दीक्षा के समान युवराज का अभिषेक होता है । सभार्य दीक्षा के समान सेनापति की दीक्षा दी जाती है । साधक दीक्षा के समान सैनिकों की दीक्षा होती है । अग्नि की तरह अमित तेज की प्राप्ति के लिये शौर्यादि गुणों से युक्त हुए तुम्हारा पुनः प्रोक्षण मैं ( पुरोहित ) करता हूँ । अर्थात् अभिमन्त्रित जल से तुम्हारा प्रोक्षण करके तुम्हें मैं वीर्यवान् बनाता हूँ । अग्नीषोम के समान अर्थात् अग्नि की तरह तेजस्वी बनाने के लिये और सोम की तरह समस्त लोगों के प्रेमास्पद बनने के लिये, और दुष्टों का निग्रह करने के कारण तथा शिष्ट जनों का परिपालन करने के कारण अग्नीषोम दोनों के प्रिय बने हुए तुम्हारा मन्त्र शुद्ध जल से प्रोक्षण कर रहा हूँ । उस प्रोक्षण के करने से तुम्हारे अङ्गों में स्थित अशुभ कामादि दोष दूर हो जायेंगे, तदर्थ मैं तुम्हारे अङ्गों को तेजस्वी बना रहा हूँ | २२ -- अथवा हे वैज्ञानिक शिल्पियों! राजा या राष्ट्रपति ने वृत्रतुर्य अर्थात् अवरोधक शत्रओं के वधार्थं परमाणु उद्जनास्त्रादि के आविष्कार के लिये तथा दारिद्रयादिशत्रु के वधार्थ उत्पादनोपयोगी उपकरणों का आविष्कार करने के लिये तथा अन्धकार रूपी वृत्र के वधार्थ प्रभूत विद्युत् आदि का निर्माण करने के लिये ऊर्जा सङ्कट निवा-रणार्थ अप्रतिम सौरी ऊर्जा का निर्माण करने के लिये तुम लोगों को नियुक्त ( वरण ) किया गया है अत: तुमने भी उसके अपेक्षित उपकरण धनादि के प्राप्त उस राजा को स्वीकार किया है । तदर्थं तुम लोग अधिकृत हो जाओ । अग्नि के समान तेजस्वी ज्ञान की प्राप्ति के लिये, तथा संहारक - पालक- दुष्टशोषक - शिष्ठपोषक गुणों वाले अग्नीषोम देवताओं को प्रिय लगने वाले तुम्हारा मैं प्रोक्षण कर रहा हूँ, जिससे तुम वैज्ञानिक लोग सर्वदा आचार्यों से नियन्त्रित होकर ही दुष्ट निग्रह - शिष्टानुग्रहादि कार्यों को करने में सक्षम हो सको । अन्यथा अनियन्त्रित महायन्त्रों की तरह विनाश के निमित्त बनकर अनर्थ के ही निमित्त बन जाओगे । प्रजापालन रूप दिव्य कर्म के लिये और प्रजापालन द्वारा परमेश्वराराधन रूप देवयज्या लक्षण क्रिया के लिये तुम शुद्ध हो जाओ । तुम्हारे मन भौतिक संस्कारों के पड़ने से अशुद्ध हो गये हैं इसलिये उन्हें मैं सच्छास्त्र संस्कार से युक्त बना रहा हूँ । इसी तरह अनेक अर्थों को बताया जा सकता है । कोई भी अर्थ किया जाय, तथापि ध्यान यही रखना पड़ेगा कि मुख्यार्थ के साथ विरोध न हो पाये ।
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[ १३० ] शर्मास्यवधूत... रक्षोऽव॑धूता॒ऽअरा॑त॒योऽदित्या॒प्वग॑सि॒ प्रति त्वादि॒तर्व॑तु । श्रद्भि॑िरसि वानस्प॒त्यो ग्रावा॑सि पृथुव॑ध्न॒ ङ ं प्रति॒ त्वादि॑त्या॒स्त्वग्वेत्तु ॥ वा ० सं ० ११४ ॥ अर्थ - हे कृष्णाजिन! तुम उलूखल धारण करने में सुख हेतु हो । इस कृष्णाजिन पर स्थित राक्षस को दूर कर दिया गया है ( उस पर की धूल दूर कर दी गई है ) तथा प्रतिबन्धक शत्रु भी पृथ्वी पर कम्पित हो गये हैं । हे कृष्णाजिन! तुम भूमिदेवता की त्वचा हो । भूमि तुम्हें अपनी त्वचा समझती है । हे उलूखल! यद्यपि तुम काष्ठ से निर्मित हो तथापि पाषाण के समान हो । तुम्हारा मूलभाग ( नीचे का भाग ) विपुल है । इस प्रकार तुम पाषाण के सदृश हो । पृथ्वी की त्वचा अर्थात् नीचे बिछा हुआ मृगचर्म तुम्हें अपने आत्मीय के रूप में पहिचाने अर्थात् यह उलूखल मेरा ही अंशभूत है ऐसा समझे ॥ १४ ॥
१ - ' शर्मासीति कृष्णाजिनादानम् ' ( का ० श्री ० सू ० २ | ४ | १ ) हे कृष्णाजिन त्वमुलूखलस्य धारणार्थं शर्मासि सुखहेतुरसि । अजिनस्य चर्मेति मनुष्यप्रसिद्धं नाम । शर्मेति देवं नामं । तेन शर्मासीत्युक्तिः सोऽयमर्थः । ` तदास्ते शर्मा-सीति कृष्णस्य वा एतच्च में ' त्यादिना काण्वब्राह्मणेन स्पष्टीकृतः । ' अपेत्य दात्रेभ्योऽवधूनोत्यवधूतमिति ' ( का ० सं ० २४२ ) अध्वर्युस्तत्कृष्णाजिनमासादितेभ्यः दात्रेभ्योऽपेत्य पृथक्कृत्य उत्करे गत्वा तत्र तदवधूनोति । तल्लग्नधूल्यादिकं कृष्णाजिनकम्पनेन उत्करे पातयतीत्यर्थः । ( धूञ् कम्पने ) कृष्णाजिनेन गूढं रक्षः अवधूतम् - कृष्णाजिनकम्पनेन भूमौ-पातितम् । एवमेवारातयोऽपि पातिताः । ' प्रत्यग्ग्रीवमास्तृणात्यदित्यास्त्वगिति ' ( का ० श्र ० सू ० २/४/३ ) प्रतीच्यां ग्रीवा यस्य तत् प्रत्यग्ग्रीवं कृष्णाजिनमास्तृणुयादध्वर्यु ': । आपस्तम्बश्च - ' अदित्यास्त्वगसीत्युत्तरेण गार्हपत्यमुत्करदेशे वा प्रतीचीनग्रीवमुत्तरत्नोम्नोपस्तृणातीति ' इति । हे कृष्णाजिन त्वमदित्या भूमिदेवतायास्त्वगसि ततोऽदितिभूमिस्त्वां मदीयं त्वगित्येवं वेत्तु जानातु । ननु किमर्थमन्यचर्मापहाय कृष्णाजिनग्रहणाग्रहः इति चेन्न, ब्राह्मणेनैव तस्य चोद्यस्य समाधीयमानत्वात् । तथाहि - ' अथकृष्णाजिनमादत्ते । यज्ञस्य व सर्वत्वाय यज्ञोह देवेभ्योऽपचक्राम । स कृष्णो मृगो भूत्वा चचार तस्य देवा अनुविद्य त्वचमेवावच्छायाजह: । ( ० १ । १ । ४ । १ ) २- यज्ञस्य सर्वत्वाय अवयवकात्स्यय कृष्णाजिनादानं श्रुतिविधत्ते - ' अथ कृष्णाजिनमिति । कुतस्तेनावयव-कात्स्न्यमिति तदेवोपपादयितुं पुरावृत्तमुपन्यस्यति यज्ञोहेति । केनापि निमित्तेन यज्ञः पुरा देवेभ्योऽप रक्तोऽन्यत्र जगाम । १ - हे कृष्णाजिन! तुम उलूखल के धारणार्थ सुखहेतु हो । अजिन का ' चर्म ' यह मानुष नाम है और ' शर्म ' यह देव नाम है । कृष्णाजिन में छिपे हुए राक्षस को कृष्णाजिन को झटकारने से भूमि पर गिरा दिया, उसी प्रकार शत्रुओं को भी गिरा दिया । हे कृष्णाजिन! तुम अदिति रूप भूमिदेवता के स्वरूप हो । इसलिये वह का अदिति ही ग्रहण रूप भूमि तुम्हारा ग्रहण कर मेरी यह त्वक् है, ऐसा समझे । किसी अन्य चर्म का त्याग कर कृष्णाजिन, ऐसा करने में ब्राह्मणवचन प्रमाण है । कृष्णाजिन के ग्रहण करने से ' यज्ञ ' अपने समस्त अवयवों से पूर्ण हो पाता है का कहना है । २ - यज्ञ की सर्वावयव पूर्ति में एक इतिहास बताया जाता है । पहिले किसी समय कारणवश यह यज्ञपुरुष देवताओं से अननुरक्त होकर अन्यत्र चला गया । उस समय अपने वेष को छिपाने के लिये वह कृष्णमृग बन गया ।
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[ १३१ ] तदानीं स्वकीयवेषप्रच्छादनाय कृष्णमृगोऽभूत् । देवास्तु तद्विज्ञाय तस्य मृगस्य त्वचमवच्छायाच्छिद्य जगृहुस्तस्मात् धज्ञस्य सर्वत्वाय कृष्णाजिनादानमुचितमेव । छो छेदन इत्यस्मात् क्त्वोल्यप् । ३ – तस्य कृष्णाजिनस्य यज्ञरूपतां वक्तु त्रयीमयत्वमाह - ' तस्य यानि शुक्लानि कृष्णानि च लोमानि तान्यृचां च साम्नां च रूपम् यानि शुक्लानि तानि साम्ना यं रूपं यानि कृष्णानि तान्यृचाम् यदि वेतरथा यान्येव कृष्णानि तानि सामना रूपं यानि शुक्लानि तान्यृचाम् यान्येव बभ्रूणीव हरीणि तानि यजुषा १७ रूपम् । सैषा त्रयी विद्या यज्ञः । तस्या एतच्छपमेषवर्णस्तद्यत् कृष्णाजिनं भवति यज्ञस्मैव सर्वत्वाय तस्मात्कृष्णाजिनमधिदीक्षन्ते यज्ञस्यैव सर्वत्वाय तस्मादध्यवहननमधिपेषणं भवत्यस्कन्न २७ हविरसयिति तद्यदेवात्र तण्डुलो वा पिष्टं वा स्कन्दान्तद्यज्ञे यज्ञः प्रतितिष्ठा-दिति तस्मादध्यव हननमधिपेषणम् भवति ( श ० १1१/४/२ - ३ ) शुक्लकृष्णलोम्नां संग्रहात् ऋक्सामात्मकतामुक्त्वा विभज्यापि केषाञ्चिद्रीत्या यानि शुक्लानि तानि साम्नां यानि कृष्णानि तानि ऋचामन्येषां शाखिनां रीत्या तद्वपरीत्येन • यान्येव बभ्रुणि पिङ्गलवर्णानि हरीणि हरितवर्णानि तानि यजुषां रूपम् । ४ -- एवं कृष्णाजिनस्य त्रयीमयत्वमुक्तम् । यैषा ऋग्यजुः सामात्मिका त्रयी विद्या संवेयं यज्ञस्तत्साध्यत्वात् य एष शुक्लकृष्णादिलक्षणो वर्ण एतत्तस्यास्त्रय्याः शिल्पं चित्रं रूपम् । अत एव सोमप्रकरणे वक्ष्यते ' शिल्पे स्थ ' ( वा ० सं ० ४६ ) यस्मात् कृष्णाजिनं त्रयीमयं तस्मादेव सोमाङ्गभूता दीक्षापि कृष्णाजिनस्योपरि क्रियते । तस्मादेव च कृष्णाजिन-परिवहनं पेषणं च कर्त्तव्यम् । तथा सति तद्धविः अस्कन्न स्कन्नरहितं असद् भवति । यदि भूम्यामेवावहननादिकं कुर्यात् तदावश्यमुलूखलात् भूम्यां हविः पतनं स्यात् । तदा स्कन्नदोषः स्यात् । तदेव विवृणोति अवहननसमये तण्डुलः पेषणसमये पिष्टं वात्र कृष्णाजिने यदि नाम स्कन्दात् स्कन्देत् लेट्यडागमः । तत्खलु यज्ञ एव प्रतितिष्ठेत न तु तस्य स्कन्नदोषोभवतीत्यर्थः कृष्णाजिनेऽवरुद्धत्वेन भूमिस्पर्शाभावात् । ५ -- सव्याशून्येतिदधात्युलूखलमद्रिरसि ग्रावासीति वा, प्रतित्वेत्युभयो: ' ( का ० श्री ० सू ० २।४।४ - ५ ) सव्या-देवताओं के द्वारा पहिचाने गये उस मृग की त्वचा को देवताओं ने काट - काट कर ग्रहण किया, इसलिये यज्ञ की सर्वा-वयव पूर्णता के लिये कृष्णाजिन का आदान ( ग्रहण ) करना उचित ही है । ३ - उस कृष्णाजिन की यज्ञस्वरूपता को बताने के लिये उसके त्रयीमयत्व को ब्राह्मण बता रहा है । उसके शुक्ल जो ' और कृष्ण लोम हैं, वे ऋक् और साम हैं । कुछ लोगों ने ऐसी भी व्याख्या की है कि जो शुक्ल लोम हैं, वे ऋक् रूप हैं । अन्य शाखाओं के अनुसार ऐसा भी कहा गया है कि जो पिङ्गल वर्ण जैसे हरित वर्ण के लोम है, वे यजु के स्वरूप हैं । ४ इस प्रकार कृष्णाजिन का त्रयीमयत्व कहा गया है । यह जो ऋग्यजुः सामात्मिका त्रयी विद्या है, वही यह यज्ञ है, क्योंकि उसी त्रयी विद्या से वह साध्य होता है । और जो यह शुक्ल कृष्णादि वर्ण हैं, वह उस त्रयी का शिल्प यानी चित्ररूप है । उस कृष्णाजिन के त्रयीमय रहने से ही सोमाङ्गभूत दीक्षा भी उसी पर की जाती है । और उसी कारण कृष्णाजिन के ऊपर ही अवहनन तथा पेषण भी करना चाहिये । वैसा करने पर वह हवि अस्कन्न ( स्कन्न-दोष से रहित ) रहता है । यदि भूमि पर ही अवहनन किया जायगा तो अवश्य ही उलूखल से भूमि पर हवि गिरेगा, तब स्कन्न दोष होगा । अवहनन करते समय तथा तण्डुल पेषण करते समय वह पिष्ट यदि कृष्णाजिन पर गिर जाय तो: भी उसे यज्ञ में ही प्रतिष्ठित ( स्थित ) समझा जाता है, उसे स्कन्न दोष नहीं लगता । क्योंकि कृष्णाजिन पर उसके अव-रुद्ध हो जाने से उसे भूमि का स्पर्श नहीं हो पाता । ५ - वाम हस्त से स्पर्श किये गये कृष्णाजिन पर ' अद्रिरसि ' अथवा ' ग्रावासि ' इन दोनों में से किसी एक मन्त्र
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[ १३२ ] शून्ये वामहस्तेन स्पृष्टे कृष्णजिने अद्रिरसि ग्रावासीत्यन्यतरमन्त्रेण उलूखलं स्थापयेत् । मन्त्रद्वयेऽपि " प्रतित्वादित्यास्त्वग्वेत्तु ” इतिमन्त्रः संयोजनीयः । मन्त्रार्थस्तु हे उलूखल त्वं यद्यपि वानस्पत्यो दारुमयस्तथापि दृढत्वादद्रिरसि पाषाणोऽसि आह-जाति विदारयति आदृणात्यनेन वेत्यद्रिः । पृथुबुध्नः स्थूलमूलमुसलघातोपद्रवेण चाञ्चल्यराहित्याय मूलस्य स्थूलत्वं युक्तमेव । हे उलूखल तथाविधस्त्वं ग्रावासि दाढर्थेन पाषाणसदृशोऽसि । अदित्यास्त्वगधस्तादास्तीर्णा कृष्णाजिनरूपा भूमेर्यात्वगस्ति सा त्वां प्रतिगृह्य वेत्तु स्वकीयत्वेन जानातु । ६ - कण्वश्रुतौ तु विस्पष्ट मन्त्रस्वरूपे स प्रतिगृह्णात्वद्विरसि वानस्पत्य प्रतित्वादित्यास्त्वग्वेत्त्विति वा ग्रावासि पृथुन: प्रतित्वादित्यास्त्वग्वेत्त्विति वेति दारुमयस्यैवोलूखलस्य पाषाणत्वमौपचारिकमिति तित्तिरिर्दर्शयति- ' अद्विरसि वानस्पत्य इत्याह । ग्रावाणमेवैनत् करोती'ति ( तै ० ब्रा ० ३।२।५२८ ) शतपथे याज्ञवल्क्यस्तु निष्कर्षमाह - ' तत्प्रतीचीन-ग्रीवमुपस्तृणाति अदित्यास्त्वगसि प्रतित्वादितिर्वेत्त्वतीयं वै पृथिकदितिस्तस्या अस्यै त्वग्यदिदमस्यामधि किश्व तस्मा-दाहादित्यास्त्वगसीति प्रतित्वादितिर्वेत्त्विति प्रतिहि स्वयं जानीते तत्संज्ञामेवैतत् कृष्णाजिनाय च वदति मेदन्योऽन्य १ ९ ° हिसात इत्यभिनिहितमेव सव्येन पाणिना भवति । ( श ० १ १ ४ ५ ) अत्र समन्त्रकं प्रतीचीन ग्रीवत्वविशिष्टस्य कृष्णा-जिनस्यास्तरणं विहितम् । इयं पृथिवी अदितिरखण्डनीया ( दोऽवखण्डने ) इति व्युत्पत्त्या अदितिशब्देन पृथिव्येव मन्त्रे विवक्षितेत्युक्तम् । कथमन्यदीया त्वगन्यस्य त्वग् भवतीत्याशङ्कयाह - तस्या अस्यै त्वगिति । अस्या भूमेरधि उपरिभागे यदिदं किमपि वस्त्ववस्थितं तस्य अस्य पृथिव्यं सा त्वगिव कृष्णाजिनमप्युपर्यवस्थानात् तस्यास्त्वगिति ततत्तुतिः । मन्त्रस्य प्रतित्वेत्यादिकं व्याचष्टे - अदितिस्त्वामात्मीयां त्वचं वेत्तु जानातु । स्वः स्वकीय जनमात्मीयजनं प्रति सञ्जानीते परस्परानुकूल्यं प्रकटयितुं संज्ञां करोति । तत् कृष्णाजिनभूम्योः समानज्ञानता मेवायं मन्त्रभागो वदति । संज्ञानस्य प्रयोजनमाह - परस्परानुकूल्यज्ञानाभावे ह्यन्योन्य हिंस्यात् नंव तादृश्यन्योन्यहिंसा भवत्वित्यभिप्रायेणैवाह-सव्येन पाणिना स्पृष्ट एव कृष्णाजिने दक्षिणेन पाणिनोलूखलमाहरतीत्यस्याप्यभिप्रायमाह - ' नेदिह पुरा नाष्ट्रा रक्षा S * स्याविशानिति – ब्राह्मणो हि रक्षसामपहन्ता तस्मादभिनिहितमेव सव्येन पाणिना भवति । ( श ० १ | १ | ४ | ६ ) यदि ह्युलूखलनिधानात् प्रागेव कृष्णाजिनस्पर्शमुत्सृजेत् । तत् तदा इहास्मिन् कृष्णाजिने राक्षसादिकं प्रविशेत्, लन्न भवेदिति हेतोः सव्याशून्य उलूखलमाहरेत् । शतेर्लोट बहुवचन आडागमे झेरन्त । देशे ' इतश्च लोपः परस्मैपदेषु ' ( पा सू ० ३ | ४ | १७ ) ७ – सव्येन स्पर्शेऽपि कुतो न रक्षांसि प्रविशन्ति - इति तत्राह - हि यस्माद् ब्राह्मणो रक्षसामपहन्ता भवति से उलूखल को रखे 1 । दोनों मन्त्रों के साथ ' प्रतित्वादित्यास्त्वग्वेत्तु ' इस मन्त्र को जोड़ लेना चाहिये । हे उलूखल! तुम यद्यपि काष्ठमय हो तथापि दृढ़ होने से अद्रि यानी पाषाण के समान हो । तुम मूलभाग में स्थूल हो, क्योंकि मुसल प्रहार के उपद्रव से चाञ्चल्यराहित्य के लिये मूल भाग की स्थूलता आवश्यक ही है । हे उलूखल! तुम अपनी दृढ़ता के कारण ग्रावा के समान यानी पाषाण के समान हो । अदिति की त्वक् तुम्हारे नीचे बिछाई गई है, जो कृष्णाजिनस्वरूपा है, उसे वह ( भूमि ) अपनी जाने । ६ - इस प्रकार कृष्णाजिन और भूमि की समान जातीयता मन्त्र के द्वारा बताई गई है । समान जातीयता बताने का प्रयोजन यह है कि परस्पानुकूल्यज्ञान न होने पर एक दूसरे परस्पर की हिंसा भी कर सकते हैं । वैसी परस्पर अन्योन्य हिंसा न हो इस अभिप्राय से कहा गया है कि सव्य ( वाम ) हाथ से स्पृष्ट हुए कृष्णाजिन पर ही दक्षिण हाथ से उलूखल को रखता है । यदि उलूखल के रखने के पूर्व ही यदि अपने वाम हस्त को कृष्णाजिन से हटा ले तो उस कृष्णाजिन में राक्षसादिक प्रविष्ट हो जायेंगे । उनका उसमें प्रवेश न हो सके इसलिये बाँये हाथ से उसे स्पर्श किया रहे और दाहिने हाथ उस पर उलूखल को रखे यह कहा गया है । ७ – सव्य हाथ से स्पर्श करने पर भी उसमें राक्षसों का प्रवेश क्यों नहीं हो सकेगा? इस पर कहा गया है ।
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[ १३३ ] मन्त्रप्रभावात् तस्मात्तेन स्पृश्यमानं राक्षसादि न प्रवेष्टु ं शक्नोति - इत्यर्थः । एवं सायणोव्वटमहीधराणां मन्त्रव्याख्या-नानि श्रुतिसूत्रप्रमाण सिद्धान्येव । यथाकथञ्चित्तु नैकविधानि व्याख्यानानि कतु शक्यानि । ८- स्वामिदयानन्दस्तु हे मनुष्या युष्मद्गृहं शर्मासि भवतु । तस्माद् गृहाद्रक्षोऽवधूत मरातयोऽवधूता भवन्तु । तव गृहमदित्यास्त्वगस्त्विति सर्वो जनः प्रतिवेत्तु । यो वानस्पत्योऽद्रि: ( असि ) पृथुबुध्नो ग्रावा मेघो अस्ति वर्तते । एतद्विद्यामदितिर्जगदीश्वरस्तुभ्यं प्रतिवेत्तु कृपया वेदयतु । विद्वानप्यदित्यास्त्वग्वत्त्वात् व्यवहार प्रतिवेत्तु " ( पृ ० ७७ ) । ६ - आश्चर्यमेतद् यत् शतपथव्याख्यानस्थलं निर्दिशन्नपि तद्विपरीतमेव व्याख्याति मन्त्रम् । तथाहि - ' कृष्णा-जिनमादत्ते । शर्मासीति चर्म वा एतत् कृष्णस्य तदस्य तन्मानुष 25 शर्म देवत्रा तस्मादाह शर्मासीति तदवधूनोत्यवधूत १७ रक्षः.... तन्नाष्ट्रा एवैत्तद्रक्षा २७ स्यतोऽपहन्त्यति नत्येव पात्राण्यवधूनोति यद्वयस्यामेध्यमभूत् । चर्म तद्वयस्यैतद- वा इति । वधूनोति । ' ( ० १ | १ | ४ | ४ ) अत्र स्पष्टमेव चर्मादानमनुद्य मन्त्रं विधाय शर्मशब्दस्य तात्पर्यं वक्ति यदेतत् कृष्णमृगस्य चर्म अजिनं अस्य यज्ञस्यैतदजिनं तत् लोकप्रसिद्धच मंशब्दाभिधेयं सन्मानुषं मनुष्यसम्बन्धि रूपं भवति । अर्थात् कृष्णाजिनस्य चर्मेति मनुष्यप्रसिद्धं नाम । एतदेव देवला देवसुखकरत्वात् शर्मेत्युच्यते -- अतो वैदिके कर्मणि शर्मासीत्युक्तया तत्स्तुतिरूपपन्ना | देवत्रेति ' देवमनुष्य पुरुष पुरुमर्त्येभ्यो द्वितीयासप्तम्योर्बहुलम् ' ( पा ० सू ० ५ | ४ | ५६ ) इति त्रा प्रत्ययः । पूर्वमपि कृष्णाजिनमादत्ते ' इति कृष्णाजिनादानं विहितम् तत्रैव यज्ञो देवेभ्योऽपचक्राम । स कृष्णमृगो भूत्वा चचार । इति पुरावृत्तकथनेन त्रयीमयो यज्ञएव कृष्णमृगो भूत्वा चचार तदीयचर्मादानं यज्ञस्य काय विहितम् । तत्रैव तस्य शुक्लकृष्णादिलोम्नां मृगादित्वमुक्तम् । तदुपरि सोमदीक्षाया अवहननपेषणादीनाञ्च गुणवत्त्वमुक्तम् सर्वमेतदपलप्य किमप्यन्यथैवायं महात्मा व्याख्याति । ' अवधूत 28 रक्ष ' इति मन्त्रेण कृष्णाजिनस्यैवावधूननं विहितम् । अवधूननेन रक्षः प्रकृतिसम्पर्कादिमेध्ययज्ञियांशनिरास उक्तः । किं गृहस्याधूननं सम्भवति? पुरुषव्यत्यय-मन्तरा तु पदमेकमपि नायं गन्तु ं प्रभवति । यद्यपि गृहनामसु शर्म इति पठितम् तथापि कृष्ण | जिनादानप्रसङ्ग तदर्थस्य कथं सङ्गति:? १० --- यद्यप्युक्तम् -- ' ईश्वरेणाज्ञाप्यते मनुष्यैः शुद्धायाः सर्वतोऽवकाशयुक्तायाः पृथिव्या मध्ये सर्वेष्वृतुषु कि ब्राह्मण अपने मन्त्र के प्रभाव से राक्षसों का विनाश कर देता है, इसलिये उससे स्पृष्ट होने पर राक्षसों का प्रवेश उसमें नहीं हो सकता । इसी प्रकार सायण, उव्वट, महीधर के मन्त्र व्याख्यान, श्रुति - सूत्र प्रमाण सिद्ध ही होते हैं । यथाकथंचित् अनेक प्रकार के व्याख्यान भी किये जा सकते हैं । ८ - स्वामी दयानन्द ने तो यह अर्थ किया है कि हे मनुष्यों! तुम्हारा घर बने, उस घर से राक्षस और शत्रुगण निरस्त हों । तुम्हारा घर अदिति की त्वचा रूप है, ऐसा सब लोग समझें । जो वानस्पत्य अद्रि है, पृथुबुध्न ग्रावा मेघ है । इस विद्या को अदिति यानी जगदीश्वर कृपा करके तुमको समझा दें । विद्वान् भी अदिति की त्वचा से युक्त होने के कारण व्यवहार को जानें ( पृ ० ७७ ) । -- आश्चर्य की बात तो यह है कि शतपथ की व्याख्या का स्थल निर्देश करते हुए भी उसके विपरीत मन्त्र की व्याख्या कर रहे हैं । ' अवधूत 25 रक्ष: ' इस मन्त्र में कृष्णाजिन का ही अवधूनन विहित किया है । अवधूनन से अमेध्य यज्ञियांश का निरास बताया गया है । किन्तु स्वामी दयानन्द ने गृह का अवधूनन करना बताया है, तो क्या गृह का अवधूनन कभी सम्भव हो सकता है? पुरुषव्यत्यय के विना एक पद भी वह चलने में समर्थ नहीं होगा । यद्यपि गृहनामों में ' शर्म ' भी पठित है, तथापि कृष्णाजिन के आदान प्रसङ्ग में वह अर्थ कैसे सङ्गत हो सकेगा? १० -- यह जो पृ ० ७७ पर कहा गया है कि ईश्वर आज्ञा देता है कि मनुष्य, सर्वतः अवकाश युक्त पृथिवी पर
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( १३४ ) सुखदायकं गृहं रचयित्वा तत्र सुखेन स्थातव्यम् । तस्मात् सर्वे दुष्टा मनुष्या दोषाश्च निवारणीयाः, तत्र सर्वाणि साधनान्यपि साधनीयानि तत्रैव वृष्टिहेतुर्यज्ञोऽनुष्ठातव्यः सुखानि च सम्पादनीयानि । एवं कृते वायु- वृष्टि जल शुद्धिद्वारा जगति महत्सुखं सिद्धयति ' ( पृ ० ७७ ) इति, ११ - तदपि तुच्छम्, सर्वस्यैतस्य रागप्राप्तस्य विधेयत्वासम्भवात् । किश्व हेतुमन्तरा असीति मध्यमपुरुषस्य प्रथमपुरुषत्वेन विपरिणामोऽपि निर्मूलः । एवं लटो लोट्त्वेनापि परिणामोऽपि स्वच्छन्दतै अन्यथा शर्मासि गृहोऽसीति कथं सङ्गतिः स्यात्? तत एव तव सर्वत्र व्यत्यय एव शरणम् । अवपूर्वस्य धूनोतेः कम्पनं निराकरणं वार्थो भवति दूरी-कृतं विचालित मित्यर्थोऽपि स्वच्छन्दतेव । किं त्वत्कथनेनैव दुष्टस्वभावाः शत्रवश्च दूरीभूता भविष्यन्ति? सिद्धान्ते तु यजमानवृतस्य यज्ञानुष्ठातुरध्वर्योः श्रुतिविहितकर्माङ्गत्वेन मन्त्रोच्चारणप्रभावात् रक्षसामरातीनाञ्चावधूननं सम्भवति । तत्सर्व त्वया नाभ्युपेयते तत्कथं कथनमात्रेण तेषामपकरणं भविष्यति? किं च गृहं कथमदित्यास्त्वग्भविष्यति । को वाभिप्रायस्त्वत् कथनात् सर्वो जनः गृहं पृथिव्यास्त्वग्वत् वेत्तु किमित्यस्य प्रयोजनम् । वानस्पत्योऽद्रिः पृथुबुध्नो मेघ इति कीदृशी विद्या? यामीश्वरोदास्यति? कोऽयं वानस्पत्यो मेघः? पृथु विस्तीर्णं बुध्नमन्तरिक्षं निवासार्थं यस्य । पृथुबुनो मेघ इति द्रविडप्राणायामेन पृथुबुध्नपदेन मेघग्रहणेऽपि प्रकृते किमायातम् मेघोऽन्तरिक्षे वसतीति सर्वोऽपि जानात्येव । तस्य वानस्पत्यरूपता त्वद्याप्यसिद्धैव । वायुजलवृष्टिशुद्धयर्थं होमोपदेशस्तु त्वद्रीत्यानेकेषु मन्त्रेषु परमेश्वरेण-दत्त एवेति किमित्याम्रो डनेन? श्रुतिसूत्रानुसारेण तु शर्मासीति मन्त्रेणाध्वर्युः कृष्णाजिनमादत्ते हे कृष्णाजिन त्वमुलूखलस्य धारणार्थं शर्मासि सुखहेतुरसि । चर्मेति तव मानुषं नाम । शर्मेति तव दैवं नाम । अवधूतं रक्षोऽवधूता अरातय इति मन्त्रेण कृष्णाजिन-मध्वर्यु: पात्रेभ्योऽपसृत्य अवधूनोति । कृष्णाजिनकम्पनेन तत्र गूढं रक्षो यज्ञविघ्नकारकमवधूतं भूमीपतितं भवति । अरातयोऽदानशीला रिपवोऽपि तत्प्रभावेणैव कम्पिता भवन्ति । अदित्यास्त्वगसीत्यादिमन्त्रभागेनाध्वर्युः प्रत्यग्ग्रीवं कृष्णाजिनमास्तृणाति । मन्त्रार्थस्तु हे कृष्णाजिन त्वमदितेभूमिदेवतायास्त्वग्ररूपमसि ततोऽदितिभूमिदेवता त्वां मदीयेयं त्वगिति जानातु । यज्ञरूपकृष्ण मृगस्येदम जिनधारणमजिनमितिभावनासह्कृत विहितमन्त्रोच्चारेण कृष्णाजिनभूम्यो: परस्पराभेदापादनं निर्विघ्नयज्ञादृष्टसिद्ध्यर्थम् । ततोऽद्विरसि वानस्पत्य ग्रावासि पृथुत्रुध्न्येत्युभाभ्यां मन्त्राभ्यां॑ प्रतित्वादित्यास्त्वग्वेत्त्वितियुक्ताभ्यां विकल्पेन सव्यपाणिना स्पृष्टे कृष्णाजिने उलूखलं स्थापयत्यध्वर्युः । १२ - मन्त्रार्थस्तु हे उलूखल त्वं यद्यपि वानस्पत्यस्तथापि दृढत्वात् अद्रिः पाषाणः किं भूतः पृथुमूलः स्थूलमूलः, हे उलू-खल तथाविधस्त्वं ग्रावासि दाढयन पाषाणतुल्योऽसि । अदित्यास्त्वगधस्तादास्तीर्णा कृष्णाजिनरूपा भूमेर्यात्वगस्ति सा त्वां प्रतिवेत्तु स्वकीयत्वेन जानातु । अत्र प्रमाणानि उपपत्तयश्च पूर्वमेवोक्तानि । श्रुतिसूत्रपारम्पर्यपद्धत्यनुसारेणायमेवार्थः । दे । उसमें सभी साधनों को जुटा ले । उसी में वृष्टि के हेतुभूत यज्ञ का अनुष्ठान करे और सब सुखों का सम्पादन करे । ऐसा करने से वायु - वृष्टि जल की शुद्धि द्वारा जगत् में महान् सुख हो सकेगा । ' ११ - - किन्तु यह दयानन्दीय व्याख्या सारहीन है, क्योंकि यह सभी रागप्राप्त होने से विधेय नहीं हो सकते । किश्व किसी कारण प्रदर्शन के बिना पुरुष विपरिणाम करना भी निर्मूल है । लकार में विपरिणाम करना भी स्वच्छ-न्दता का ही सूचक है । अन्यथा ' शर्मासि गृहोऽसि ' यह सङ्गति कैसे होगी? इस प्रकार सर्वत्र आपने व्यत्यय की ही शरण ली है । अवपूर्वक धूनोति का कम्पन अथवा निराकरण अर्थ होता है. किन्तु उसका अर्थ ' दूरीकृतं विचालितं ' अर्थ आपने बताया है, यह सब आपकी स्वच्छन्दता ही है । क्या आपके कथनमात्र से ही दुष्टलोग और शत्रुगण दूर हो जायेंगे? सिद्धान्त में तो यजमान के द्वारा वरण किये गये यज्ञानुष्ठाता अध्वर्यु में श्रुतिविहित कर्म का अङ्गत्व होने से उसके मन्त्रोच्चारण के प्रभाव से राक्षस और शत्रुओं का अवधूनन होना सम्भव हो सकता है । किन्तु आप तो यह सब कुछ स्वीकार कर नहीं रहे हैं । तो कैसे उनका अपाकरण होगा? क्या आपके कथनमात्र से होगा? किश्व गृह, अदिति की कैसे होगा? उसी तरह वानस्पत्योऽद्रिः पृथुत्रुघ्नः मेघः यह कैसी विद्या है? जिसे ईश्वर देगा | कौनसा यह वानस्पत्य मेघ है? मेघ अन्तरिक्ष में रहता है, यह सभी जानते हैं, उसकी वानस्पत्यरूपता तो अद्यापि सिद्ध हो नहीं है । अत: श्रुति - सूत्र के अनुसार ही अर्थ करना उचित है । तथापि ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' इस कठोपनिषद् के अनुसार तथा ' सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति ' के अनूरोध से अन्यान्य अर्थ भी किये जा सकते हैं ।
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( १३५ ) तथापि ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' ( कठोप ० १२ १५ ) ' सर्व वेदात्प्रसिद्धयति ' ( म ० १२६७ ) इत्याद्यनुरोधेनान्ये-ऽप्यर्थाः कत्तु ं शक्यन्ते । ‘ अथोलूखलं निदधाति । अद्रिरसि वानस्पत्यो ग्रावासि पृथुबुध्न इति वा तद्यथैवादः सोम ं राजान ग्रावभिरभिषुण्वन्त्येवमेवैतदुलूखलमुसलाभ्यां दृषदुपलाभ्या २७ हविर्यज्ञमभिषुणोत्यद्भय इति वै तेषामेकं नाम तस्मादाहाद्रिरसीति वानस्पत्य इति वानस्पत्योऽह्येष ग्रावासि पृथुबुध्न इति । ग्रावा ह्येष पृथुबुध्नो ह्येष प्रतित्वादित्या स्त्वग्वेत्त्विति तत्संज्ञामेवैतत् कृष्णाजिनायत्त वदतिनेदन्योन्य १७ हि नसात् इति ( श ० १ | १ | ४/७ ) अत्र स्पष्टमुलूखल ---विधाने अद्रिरसीति मन्त्रविनियोगो ज्ञायते । अद्रिरसि ग्रावासीति मन्त्रविकल्पोऽपि । लुप्तविभक्तिकः, अदः शब्दः । सप्तमी ज्ञातव्या । अमुत्र सोमयागे यथा सोमस्य ग्रावभिरभिषवः एवमेवात्रोलूखलादिभिर्ब्रह्यादिकमभिषुणोति । वितु-षीकरणादिभिः संस्करोति । अद्रय इति साधारणं नाम । अतो नामसाम्यात् उलूखलादिसाध्यमवहननादिकं ग्रावसा । येनाभिषवेण तुल्यमित्यर्थः । हे उलूखल त्वं ग्रावासीति मन्त्रेणोलूखले ग्रावत्वारोपो मन्त्रेण विवक्षितः । प्रति त्वा अदिस्त्यास्त्वग्वेत्त्विति तत्संज्ञामेव कृष्णाजिनाय वदति यतोन्योऽन्यं हिंसा माभूत् पृथिवीकृष्णाजिनयोरिवैकत्व प्रत्यायनार्थम् । १३ – वेदपुरुषः प्रार्थयते यत् हे राजराजेश्वरि चिदानन्दमयि भगवति संसारतापतप्तानां प्राणिनां त्वमेव शर्मासि शर्म गृहमाश्रयः शरणमसि । ' शरणं गृहरक्षित्रोरितिकोषात् ' त्वमेव शर्म आश्रयः शरणमसि त्वदन्यस्य शरण्य-स्याभावात् । यद्वा शर्म सुखरूपासि त्वदन्यस्यातिपरिगृहीतत्वात् दुःखरूपत्वात् ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( वृ ० उ ० ३।४।२ ) इति श्रुतेः । ' नापे सुखमस्ती ' ( छा ० ७ २३ ) त्यादिश्रुतिभ्यः । न चानेन शतपथादिश्रुतिविरोधः, तासामपि भगवदाराधन-रूपदर्शपूर्णमासादिप्रतिपादनद्वारा तत्रैव पर्यवसानात् । १४ - ननु तथापि संसारे भगवत्प्राप्तिविघ्नकराणि रक्षांति दानादिधर्मविमुखा अरातयोऽपि सन्त्येव तेषु जीवत्सु कथं ममाश्रयणेन मम शरणग्रहणं सम्भवति? मम सुखरूपत्वेऽपि कथं जीवानां सुखहेतुत्वमिति चेत्तत्राह-अवधूतमिति - त्वच्छरणाश्रयणेनैव अवधूतं कम्पितं निरस्तं रक्षः विनायकानीकपनिकर तेनैव चारातयोऽपि निरस्त-से उसके मन्त्रोच्चारण के प्रभाव से राक्षस और शत्रुओं का अवधूनन होना सम्भव हो सकता है । किन्तु आप तो यह सब कुछ स्वीकार कर नहीं रहे हैं । तो कैसे उनका अपाकरण होगा? क्या आपके कथनमात्र से होगा? किव गृह, अदिति की त्वक् कैसे होगा? उसी तरह वानस्पत्योऽद्रिः पृथुबुध्नः मेघ: यह कैसी विद्या है? जिसे ईश्वर देगा । कौनसा यह वानस्पत्य मेघ है? मेघ अन्तरिक्ष में रहता है, यह सभी जानते हैं, उसकी वानस्पत्यरूपता तो अद्यापि सिद्ध ही नहीं है । अत: श्रुति - सूत्र के अनुसार ही अर्थ करना उचित है । तथापि ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' इस कठोपनिषद् के अनुसार तथा ' सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति ' के अनुरोध से अन्यान्य अर्थ भी किये जा सकते हैं । १२ - मन्त्रार्थ इस प्रकार है - हे उलूखल! यद्यपि तुम बानस्पत्य अर्थात् लकड़ी के हो तथापि दृढ़ होने से अद्रि ( पाषाण ) हो । जिसका मूलभाग स्थूल है । हे उलूखल! ऐसे तुम ग्रावा दृढ़ता के कारण पाषाणतुल्य हो अदित्यास्त्वक् = नीचे बिछी हुई कृष्णाजिनरूप जो भूमि की त्वक् है वह तुम्हें स्वकीय रूप से जाने | इसमें प्रमाण और युक्तियाँ पहले ही कह चुके हैं । श्रुति सूत्र और परम्परा प्राप्त पद्धति के अनुसार यही अर्थ है तथापि सर्वे वेदायत्पदम् • ( कठोप ० १ | २ | १५ ) " सर्वं वेदात् " ( म ० १२६७ ) इत्यादि वचनों के अनुरोध से अन्य भी अर्थ किये जा सकते हैं । " अथोलूखलं हिनसात्त इति " ( श ० १ १/४/७ ) इस मन्त्र निदधाति.... वदति नेदन्योन्य 28 स्पष्ट जाना जाता है कि " अद्रिरसि इस मन्त्र का विनियोग उलूखल के निधान ( रखने ) में है | अद्रिरसि और ग्रावासि इन दोनों मन्त्रों के विकल्प का भी ज्ञान इसी मन्त्र से होता है मन्त्र में अदस शब्द लुप्तविभक्तिक है, इसमें सप्तमी विभक्ति जाननी चाहिये । जैसे उस सोमयाग में पत्थर से सोम का अभिषव होता है इसी प्रकार इस योग में उलूखल आदिकों से व्रीहि आदि को कूटता है । वितुषी करणादि अर्थात् छिलके उतारने आदि के द्वारा उनका संस्कार करता है । अद्रय: यह साधारण नाम है । इसलिये नाम की समानता से उलूखल से होने योग्य अवहननादि ( कुट्टन आदि ) ग्रा ( पाषाण ) से साध्य अभिषव के तुल्य है, ऐसा अर्थ समझना चाहिये । हे ' उलूखल! त्वं ग्रावासि ' इस मन्त्र से उलूखल में ग्रावत्व ( पाषाण रूपता ) का आरोप विवक्षित है ।
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( १३६ ) तेजस्का हतप्रभा भवन्ति त्वयामिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो ॥ ' ( श्री ० भा ० म ० पु ० १० | २ | ३३ ) ' तस्य हनदेवाश्च नाभूत्या ईशते ' ( बृ ० १ | ४ | १० ) एषांन्न प्रियं यदेनं मनुष्यां विद्युः ' ( बृहदा ० १ | ४ | १० ) ' स्वौको विलङ्घय व्रजतां परमं पदं ते ( श्री ० भा ० म ० पु ० ) ' लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः । येषामिन्दीवर-श्यामो हृदयस्थोजनार्दनः ॥ ' ( गरुड़पुराण प्रे ० क ० ३५ ४४ ) हे जीवात्मन् त्वमदित्या अखण्डसंविच्छरीराया भगवत्या-स्त्वगसि त्वगिव त्वक्स्वरूपमेवासि । अदितिः सा करुणार्णवहृदया स्वा त्वां स्वकीयत्वेन वेत्तु जानातु स्वीकरोतु सत्य-सङ्कल्पायास्तस्या तथा ज्ञानलक्षणसङ्कल्पेनैव सर्वानर्थव्रातनिवारणसम्भवात् । १५ - नन्वहमनर्थ शतसंकुलो जीवः कथं परमैश्वर्यशालिन्या राजराजेश्वर्या अभिन्नोभविष्यामीत्याशङ्कयाह— त्वमद्रिरासे । पर्वतकूटवन्निर्विकारः कूटस्थोऽसि । अनर्थव्रातोपप्लुत त्वं तु तवौपाधिकमेव रूपम् । स्वाभाविकं तु निर्वि कारमेव । त्वं वानस्पत्यः पृथुमूलो ग्रावासि । वनस्पतिरूध्वंमूलोऽवाक्शाखोऽश्वत्थरूपः संसारवृक्षस्तत्सम्बन्धी ग्रावा पाषाणवदभेद्यपरमात्मरूप एवासि । कथंभूतः पृथु विस्तीर्णमपरिच्छिन्नमनन्तं ब्रह्म व बुध्नमूलं यस्य सः पृथुबुध्नः ब्रह्मरूपः संसारवृक्षमूलरूप एवासि त्वम् । ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६८७ ) इत्यादि श्रुतिभ्यः । १५ - ननु पूर्वं स्त्रीत्वेन निर्दिश्यान्ते कथ पुंस्त्वव्यपदेश इति चेन्न तत्त्वस्योभयरूपत्वेऽप्यनुभयरूपत्वात् । ' त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वश्वसि त्वं जातो भवसि ( श्वेताश्वता ४ | ३ ) नैवस्त्री न पुमानेष न प्रति त्वा अदित्यास्त्वग्वेत्तु यह मन्त्र कृष्णाजिन ( कृष्णमृगच में ) की वह संज्ञा ही बतला रहा है । जिससे परस्पर हिंसा न हो । पृथिवी और कृष्णाजिन की एकता की तरह उलूखल और ग्रावा में एकत्व की प्रतीति कराने के लिये । १३ - वेदपुरुष प्रार्थना करता है कि हे राजराजेश्वरि! हे चिदानन्दमयि भगवति! सांसारिक ताप से तप्त हुए प्राणियों के लिये तुम ही शरण हो अर्थात् उनके आश्रय स्थान गृह रूप तुम ही हो । क्योंकि तुम से अतिरिक्त कोई दूसरा उनके लिये शरण्य यानी आश्रय लेने योग्य नहीं है । अथवा तुम ही सुख रूप हो । क्योंकि ' अतोऽन्यदार्तम् ' इस श्रुति ने बताया है कि तुमसे भिन्न जो भी है, वह सब आति ( पीड़ा - दु: ख ) से युक्त है यानी दुःख रूप ही है | यह कहने से शतपथादि श्रुति से विरोध की सम्भावना नहीं करनी चाहिये । क्योंकि उन शतपथ श्रुतियों का भी तात्पर्य भग-वदाराधन रूप दर्शपूर्णमासादि प्रतिपादन द्वारा उस परा भगवती जगदम्बा में ही है । १४ -- यहाँ यह शङ्का उठ सकती है कि यद्यपि श्रुति का तात्पर्य भगवती जगदम्बा में ही है, तथापि संसार भगवत्प्राप्ति में विघ्न पैदा करने वाले राक्षस, तथा दानादि धर्म से विमुख शत्रु भी हैं ही तो उनके जीवित रहते मेरा यानी भगवती का आश्रय करके मुझ भगवती की शरण लेना कैसे सम्भव हो सकता है? मेरे सुख रूप होने पर भी जीवों के लिये मैं सुख की हेतुभूत कैसे हो सकती हूँ? इस आशङ्का पर श्रुति कह रही है ' अवधूतमिति ' । उस भगवती जगदम्बा का आश्रय लेने से ही समस्त राक्षस समूह निरस्त हो जाते हैं, उसी से शत्रुगण भी तेजोहीन हतप्रभ हो जाते हैं । भागवतकार कहते हैं ' स्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो । उसी तरह वृहदा-रण्यक उपनिषद् ने भी कहा है । गरुड पुराण में भी कहा गया है कि " लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः । येषा-मिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः " । हे जीवात्मन्! तुम अखण्ड संवित् ( ज्ञानमय ) शरीर वाली भगवती अदिति की त्वचारूप ही हो । वह अदिति, करुणार्णवहृदया है, वह तुम्हें अपने आत्मीय रूप में स्वीकार करे । वह सत्यसङ्कल्पा है, उसके ज्ञानलक्षण सङ्कल्प से ही समस्त अनर्थ समूहों का निवारण होना सहज सम्भव है । १५ - जीवात्मा प्रश्न करता है कि मैं तो सैकडों अनर्थों से व्याप्त हूँ । अतः उस परमैश्वर्यशालिनी राज-राजेश्वरी जगदम्बा से अपने को अभिन्न कैसे समझू? उस पर श्रुति उत्तर देती है -- ' त्वमद्विरसि ' इति । हे जीवात्मन्! तुम पर्वतकूट ( पर्वत शिखर ) के तुल्य निर्विकार कूटस्थ हो । अनर्थ समूह से उपप्लुत होना तो तुम्हारा औपाधिक स्वरूप ही है! स्वाभाविक स्वरूप तो तुम्हारा निविकार ही है । तुम वानस्पत्य पृथुमूल ग्रावा हो । ऊर्ध्वमूल ( ऊपर की ओर जड़ ) और अवाक् शाखा वाला ( नीचे की ओर शाखा वाला ) वनस्पति जो अश्वत्थ रूप संसार वृक्ष है, तत्सम्बन्धी ग्रावा यानी पाषाणवत् अभेद्य परमात्म स्वरूप ही तुम हो । और तुम पृथुत्रुघ्न ' हो, अर्थात् विस्तीर्ण अपरिच्छिन्न अनन्त जो ब्रह्म है, वही बुध्न ' अर्थात् मूल है जिसका ऐसे तुम हो । अभिप्राय यह है कि ब्रह्म रूप जो संसार वृक्ष मूल है, तद्रूप ही तुम हो । ' तत्त्वमसि ' यह छान्दोग्य श्रुति, इस बात को बता रही है ।
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( १३७ ) चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते || ' ( श्वे ० ५ १० ) तस्माददितेर खण्डसंवित्सुखतन्वाः पवाम्बाया-स्तदभिन्ना तदोया त्वक् त्वां स्वरूपत्वेन वेत्तु जानातु । तस्यास्तथा वेद तस्यैव कृतार्थताहेतुत्वात् । १६ - यद्वा हे राजन् सेनापते वा त्वं शर्मासि प्रजारक्षकत्वेन सुखहेतुरसि । त्वत्प्रतापानलेन रक्षोजातिनिरस्ता । अरातयो दानादि धर्मविमुखा अपि अवधूता निरस्ता एव । त्वमदित्याः प्रवाहरूपेणाखण्डितायाः प्रजायास्त्वगसि त्वगिव प्रियो रक्षकश्चासि । तथैव त्वामदितिः प्रजा स्वकीयत्वेन वेत्तु जानातु कदाचिदपि बाधकं बहिरङ्ग नावगच्छतु । त्वम-द्रिवदविचलोऽसि दाढर्येन वानस्पत्यः महावृक्षसम्बन्धी विस्तीर्ण मूलवदाश्रयणीयोऽसि शत्रुप्रयुक्तशस्त्रास्त्रकुण्ठी-करणाय ग्रावासि । यथा ग्रावसु प्रयुक्तं क्षुरादितैक्ष्ण्यं कुण्ठितं भवति तथैव शत्रुकृतशस्त्रास्त्राणि कुण्ठितानि भवन्त्व-त्यर्थः । ( वा ० सं ० १।३४ ) अ॒ग्नेस्त॒नूर॑सि वा॒चो वि॒सर्जनं॑ वानस्पत्य.ड़ सऽइ॒दं दे॒वेभ्यो॑ ह॒वि. शमीष्व हविष्कृदेहि ॥ वा ० सं ० १ । १५ ॥ दे॒ववी॑तये॒ त्वा गृह्णामि बृ॒हद्द्रवासि सुशमि शमी । हविष्क्रुदेहि अर्थ -- हे हविद्रव्य! तुम आहवनीय अग्नि के शरीर हो और यजमान की वाणी के विसर्जन स्थान हो अर्थात् हविर्दान के समय वाग्विसर्जन यानी मौन धारण करे । अतः देवताओं के सन्तोषार्थ मैं तुम्हें उलूखल में डाल रहा हूँ । हे मुसल! यद्यपि काष्ठ से निर्मित हो तथापि अपनी दृढ़ता के कारण पाषाण के समान हो और दीर्घ होने के कारण महान् हो । अग्नि आदि देवताओं पर दोष, हविद्रव्य से बिलकुल दूर हो जाँय उपकार करने के लिये तुम इस हविद्रव्य के तुष आदि को दूर कर ऐसा कर दो । हे हविद्रव्य निष्पन्न करने वाले! इधर आओ । हे हविद्रव्य को निष्पन्न करने वाले इधर आओ । ( इसी प्रकार तीसरी बार भी कहना चाहिये ) || १५ || १६ -- यदि कोई यह शङ्का करे कि पहिले तो स्त्रीत्वेन ( स्त्री के रूप में ) निर्देश किया और अब पुंस्त्व ( पुरुष ) के रूप में व्यवहार कैसे किया गया? उसका समाधान यह है कि ' तत्त्व ' उभय रूप होने पर भी अनुभय रूप है । " त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ” तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार या कुमारी है और तू ही वृद्ध होकर दण्ड के सहारे चलता है तथा तू ही प्रपञ्च रूप से उत्पन्न होने पर अनेक रूप हो जाता है । इस प्रकार श्वेताश्वतर उपनिषद् ने बताया है तथा आगे भी उसी ने कहा है कि " नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥ ” यह विज्ञानात्मा न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है । यह जो - जो शरीर धारण करता है, उसी उसी से सुरक्षित रहता है । अतः अखण्ड संवित्सुखमय शरीर वाली अदिति जो पराम्बा है, उससे अभिन्न उसकी अपनी त्वचा के रूप में तुम्हें वह समझ ले I । उसके उस प्रकार समझने में ही तुम्हारी कृतार्थता है । १६ -- अथवा हे राजन्! या हे सेनापते! ' त्वं शर्मासि ' अर्थात् तुम प्रजा के रक्षक होने के कारण सुख के साधन रूप हो । तुम्हारी प्रतापाग्नि - से राक्षस जाति का निरास हो गया । दानादि धर्म से विमुख रहने वाले शत्रुगण भी निरस्त हो ही गये हैं । तुम प्रवाह रूप से अखण्डित प्रजारूप अदिति की त्वचा के समान त्वक् स्वरूप हो यानी प्रिय और रक्षक हो । तथैव अदिति अर्थात् प्रजा, तुम्हें अपना स्वकीय समझे । कदाचिदपि तुम्हें वह अपना बाधक अर्थात् बहिरङ्ग न समझे । तुम अद्रि यानी पर्वत की तरह अविचल रहो । तुम अपनो दृढ़ता के कारण वानस्पत्य हो, अर्थात् महान् वृक्ष से सम्बन्धित विस्तीर्ण मूल की तरह आश्रयणीय यानी आश्रय करने योग्य हो । शत्रुओं के द्वारा प्रयुक्त किये गये शस्त्रास्त्रों को कुण्ठित करने में ग्रावा यानी पाषाण के तुल्य हो । जैसे पाषाण पर प्रयुक्त किये गये क्षुरादि की तीक्ष्णता कुण्ठित हो जाती है, उसी तरह शत्रुकृत शस्त्रास्त्र सब तुम पर कुण्ठित हो जाते हैं ।