वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 151–160

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 151–160

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 151 का मूल पृष्ठ
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[ १३८ ] १ - मूल संहितापाठेनापि विदितशाब्दन्यायस्य कर्मकाण्डपरत्वं मन्त्राणामनायासेन ज्ञायते । नहि नवचित्कि -चित् क्वचित् किञ्चित् प्रतिपादयन् प्रकीर्णप्रायः संग्रहात्मकः सङ्गतिहीनो वेदः । यथा स्वामिदयानन्देन व्याख्यायते । मन्त्रा हि परस्परं सङ्गतिसापेक्षाः सन्ति । तथाहि पूर्वं यजमानः वाचं यच्छेति वाङ नियमनं श्रुतम् अत्र च वाग्विसर्गः । एवं पूर्वं व्रतं चरिष्यामीति व्रतग्रहणमन्ते व्रतमचारिषमित्यादिना स्पष्टमेव पूर्वापर सम्बन्धो द्योत्यते । दयानन्दरीत्या तून्मत्त-प्रलापवत् क्वचिन्मनुष्येभ्यो विद्युद्विद्योपदेशः क्वचिद्गृहनिर्माणोपदेशः क्वचिद्वायुशुद्धिप्रयोगादिकम् । २- अस्तु प्रकृतमनुसराम: - ' हविरावपत्यग्नेस्तनूरिति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २/४ | ६ ) उलूखले हविः प्रक्षिपेत् । हविः त्वमग्नेः आहवनीयस्य तनूः शरीरमसि । यतस्तत्र क्षिप्तं हविरग्निर्भवति तेन हविरग्नेस्तनूः । ३- - अथवा अग्नि शब्देन यस्यै देवतायै हविगृह्यते सा लक्षणया बोध्यते । तस्या अपि हविस्तनुर्भवति । कीदृशं तत्? वाचो विसर्जनम् । यष्मिन् हविषि प्रक्षिप्तेऽध्वर्यु णा वाग्विसृज्यते तदिदं वाचो विसर्जनम् । ४- यद्वा अपां प्रणयनकाले नियमिताया यजमानवाचो हविरावपनकाले विसर्गो भवति । तस्मादिदं हनिर्वाचो विसर्जनमुक्तम् । ' यां वाअमू ७ हविर्ग्रहीष्यन् वाचं यच्छत्यत्र वै तां विसृजते ' इति ( श ० १ | १ | ४ | ८ ) अतो देवनीतये देवानां तर्पणाय त्वां गृह्णामि आवपामीत्यर्थः । १ - मूल संहिता के पाठ से भी शब्दार्थ मर्यादा को जानने वाले विद्वान् की समझ में आ सकता है कि मन्त्रों का अर्थ कर्मकाण्ड परक है यानी मन्त्रों का तात्पर्य कर्मकाण्ड के प्रतिपादन में है । उसमें किसी प्रकार की आयास करने की आवश्यकता नहीं है । ऐसा नहीं है कि यह वेद क्वचित् कुछ और क्वचित् कुछ प्रतिपादन करता हो । प्रकीर्णप्राय यानी केवल संग्रहात्मक, सङ्गतिहीन यह वेद नहीं जैसी व्याख्या स्वामी दयानन्द ने की है । क्योंकि वेद के मन्त्रों में सर्वदा परस्पर सङ्गति की अपेक्षा रहती है । जैसे पहले वाङ नियमन श्रुत है, और यहाँ पर वाग्विसर्ग है । इसी प्रकार पहिले व्रत का आचरण करूंगा और अन्त में व्रत का आचरण किया । इस कथन से पूर्वापर सम्बन्ध स्पष्ट ही प्रकट हो रहा है । स्वामी दयानन्द की व्याख्या में तो उन्मत्त - प्रलाप जैसा लगता है । कहीं तो मनुष्यों लिये विद्युद्विद्या का उपदेश दिया जा रहा है, तो कहीं पर गृह निर्माण का उपदेश दिया गया है, और कहीं शुद्धि प्रयोग आदि बताये जा रहे हैं । २- अस्तु प्रकृत प्रसङ्ग की ओर ध्यान दिया जाय लिये कहा है । हे हविः! तुम आहवनीय अग्नि के शरीर हो । इसलिये हविष को अग्नि का शरीर ( तनू ) कहा गया है ॥ कात्यायन श्रौतसूत्र ने उलूखल में हविः प्रक्षेप करने के क्योंकि उसमें प्रक्षिप्त हुआ हवि, अग्नि रूप हो जाता है, ३ – अथवा अग्नि शब्द से जिस देवता के लिये हविष् का ग्रहण किया गया है, उस देवता को भी लक्षणा से afra fa या जा सकता है । इस हविष् को उस देवता का भी शरीर कह सकते हैं । वाचोविसर्जन का स्वरूप क्या उसका स्वरूप यह है कि हवि को जिसमें डालने पर अध्वर्यु के द्वारा वाग्विसर्जन किया जाता है, वह यहाँ पर वाचो-विसर्जन है । ४ — अथवा अपाम्प्रणयन के समय यजमान की नियमित वाणी का हविरावपन के समय विसर्ग होता है । इसलिये इस हवि को वाचोविसर्जन कहा गया है । शतपथ ने भी इसी बात को बताया है । कात्यायन ने दो सूत्रों के द्वारा बताया है कि हविर्ग्रहण के समय नियमित की हुई अपनी वाणी को अध्वर्यु खोलता है और यजमान, अपाम्प्र-न काल में अपनी नियमित वाणी को खोलता है ।

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[ १३६ ] ५— कात्यायनस्तु– ' वाचं विसृजते ' ( का ० श्र ० सू ० २।४।७ ) ' यजमानश्च ' ( का ० श्रो ० सू ० २२४ ८ ) इति सूत्राभ्यां हविर्ग्रहणकाले गृहीतां वाचमध्वर्यु विसृजते यजमानश्चापां प्रणयनकाले नियमितां वाचं विसृजेदित्याह । ' हविष्कृता वा ' ( का ० श्रौ ० सू ० २२४६ ) हविष्कृन्मन्त्रेण वा वाग्विसर्गः इति । ' नानावी जेष्वन्त्ये सामर्थ्यात् ' ( का ० श्रौ ० सू ० २ | ४ | १० ) इति च द्वितीयस्य हविष उलूखलप्रक्षेपे यतवाक्त्वनियमादन्त्ये हविरावपनकाले वाग्वि-सर्गः कार्यः । ६ -- ' वृहद्ग्रावेतिमुसलमादत्ते'- ' - ' स इदमित्यवदधाति ' ( का ० श्र ० सू ० २ | ४ | ११ -१२ ) स इदमित्यात्तं मुसलमुलूखले स्थापयेत् । हे मुसल त्वं यद्यपि वानस्पत्यो दारुमयस्तथापि दाढर्चेन पाषाणसदृशोऽसि तथा दीर्घत्वेन महानसि । हे मुसल स त्वं देवेभ्योऽग्न्यादिदेवोपकारार्थमिदं हव्यं ब्रीहिरूपं शमीष्व शमय भक्षण विरोधयुग्रतुषापनयनेन शान्तं कुरु । तस्यैव पदस्य व्याख्यानं सुशमि शमीष्व सुष्ठु यथा भवति तथा शमीष्व शमय ( शमु उपसमे ) व्यत्ययेन-विहितस्य शपोलुक् । ' तुरुस्तुशम्यमः सार्वधातुके ' ( पा ० सू ० ७ ३६५ ) इतीडागमः । सा च शान्तिर्द्विधा बाह्यवस्तू-पनयनादेका, सा प्रथमावघातेन सम्पद्यते । अन्तःस्थितस्येषद्रव्यवर्णस्य मालिन्यापनयनादपरा सेयं फलीकरणेन निष्पद्यते । तमेतमुभयविधं तण्डुलसंस्कारं कुरु । अत एव कण्वो व्याचष्टे ' हव्यं संस्कुरु संस्कृतमित्येवैतदाहेति ' काण्व-संहिता व्याख्याने सायणाचार्यः । ७ - हविष्कृदेहीति त्रिराह्वयति ' ( का ० श्री ० सू ० २।४।१३ ) अध्वर्युर्ह विष्कण्डनं कुर्वन् हविष्कृदेहीति मन्त्रेण त्रिवारं हविष्कर्त्री यजमानपत्नीमग्नीधं वाह्वयति । अध्वर्यु स्त्रिवारं मन्त्रं पठेत् । कण्डनं च त्रिवारं कुर्यात् । सायणस्तु -यजमानस्य पत्नी यः कोऽपि वा देवानामर्थे भक्तया ब्रीहीन् सम्यगवहन्ति तत्सम्बोधनाह्वानं क्रियते हविष्कृदेहि अत्रा-गच्छ । य एव देवानां हविष्कृतस्तानाह्वयति त्रिह्वयति । ' त्रिषत्या हि देवा: ' ( तै ० सं ० ६ ३ १०1१ ) इति तैत्तिरीयश्रुतेः । त्रिस्त्रिवारं देवाः सत्यं मन्यन्ते इत्यर्थः । ' अतः पत्म्य वहन्त्यन्यो वा इति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २ | ४ | १४ ) इति कात्यायनोऽपि । ५ -- अथवा हविष्कृत् मन्त्र से वाग्विसर्ग करने के लिये भी कहा है । और उलूखल में द्वितीय हवि के प्रक्षेप के समय वाणी का जो संयमन किया था उसे अन्तिम हविरावपन के समय खोल दे । ६ -- कात्यायन कहते हैं कि ' स इदम् ' इस मन्त्र से गृहीत किये हुए मुसल को उलूखल में स्थापित करे । हे मुसल! तुम यद्यपि दारुमय ( वानस्पत्य ) हो तथापि अपनी दृढ़ता के कारण पाषाण के समान हो, तथा दीर्घ ( लम्बे ) होने से महान् हो । हे मुसल! तुम अग्नि आदि देवताओं के उपकारार्थ इस व्रीहि रूपी द्रव्य को भक्षणविरोधी उग्र-से शान्त तुषापनयन करके शान्त करो । ' शमीष्व ' पद की ही सुशमि शमीष्व व्याख्या की गई है कि अच्छी तरह करो । ' शमु ' उपशमे धातु है । व्यत्यय से शप् का लुक् और ' तुरुस्तुशम्यमः सार्वधातुके ' सूत्र से ईडागम हुआ है । वह शान्ति दो प्रकार से हो सकती है । पहिला प्रकार -- तो बाह्यतुषापनयन से, जो प्रथम अवघात से होता है । दूसरा प्रकार -- अन्तःस्थित मालिन्य के अपनयन से, जो फलीकरण से होता है । एवञ्च दोनों प्रकार से तण्डुलों का सस्कार करो इसी को सायणाचार्य ने काण्व संहिता की व्याख्या में कहा है । ७ -- कात्यायन ने कहा है कि हविष्कण्डन करते हुए अध्वर्यु ' ' हविष्कृदेहि ' इस मन्त्र से तीन वार हविष्कर्त्री यजमान पत्नी को अथवा अग्नीध को बुलावे । अध्वर्यु तीन बार मन्त्र पढ़े और कण्डन भी तीन बार करे । सायण का कहना है कि यजमान की पत्नी अथवा जो कोई देवताओं के लिये भक्तिपूर्वक व्रीहियों का अवहनन कर सके उसे सम्बोधित कर आह्वान करे -- ' हविष्कृदेहि ' ' हविः करोति ' इति हविष्कृत् इस व्युत्पत्ति से जो हवि को करता है उसे हविष्कृत् कहते हैं । हे हविष्कृत्! यहाँ आओ । जो भी देवताओं के लिये हविनिर्माण करने वाले हों उन्हें तीन बार बुलाना चाहिये । क्योंकि तीन बार कही गई बात को देवता सत्य मानते हैं ।

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[ १४० ] ८- स्वामिदयानन्दस्तु - " विद्वभिर्यज्ञो देववीतये वाचो वेदवाण्या उच्चारणेन हविषो विसर्जनम् अग्नेर्मध्ये क्रियते । सोऽग्निः संयोगेन विस्तृतो भूत्वाग्नेभौतिकस्य तनूः शरीरवदसि भवति । अतोऽहं सर्वोजनस्त्वां तं गृह्णामि । हे विद्वन् यस्य हविषः संस्काराय बृहद्ग्रावा वानस्पत्यश्चास्यस्ति तदिदं हविर्देवेभ्यो विद्वद्भ्यः सुशमि शमीष्व कुत: ये मनुष्या वेदादीनि शास्त्राणि पठन्ति पाठयन्ति च तानेवेयं वाक् हविष्कृदेहि । हविष्कृदेहीत्याह " । ( पृ ० ८१ ) ६- तत्राध्याहारव्यत्ययादिबाहुल्यमेव दोषः । एवमध्याहारेण स्तुतिवाक्यानां निन्दापरत्वमपि योजयितुं शक्यते । वाच इत्यनेन विसर्ग इत्यस्य श्रुत सम्बन्धमुपेक्ष्य उच्चारणेन इत्यश्रुतेन सम्बन्धकल्पनमसङ्गतमेव । हविषोविसर्जनमित्यस्य सम्बन्धाय ' अग्नेर्मध्य ' इत्यध्याहारोऽपि अप्रामाणिक एव । सर्वो जन इत्यस्याप्यध्याहार एवं विध एव । १० - किश्व त्वन्मते होमेन देवानां विदुषां कथं भोगप्राप्तिर्भवति । तेषां तु घृतान्नादिदानेनैवाधिका तृप्ति-भवति । देवानामुत्तमगुणानामपि प्राप्तिर्होमापेक्षया सत्सङ्गादिभिरेवाधिक सम्भवति । हविषो ग्रावभिः पाषाणैः कथं संस्कारो भवति? सुगन्ध्यादिपदार्थयुक्त इति कस्य पदस्यार्थः? सुशमिशब्दस्य दुःखनाशकमुत्तमपदार्थसम्पादयितृ इत्यर्थः कृतः, शमीष्वेत्यस्य सर्वसुखानां प्राप्त्यर्थं सर्वदुःखानां निवृत्त्यर्थं वारं वारं सम्पादयस्वेत्यादिकोऽर्थो विहितः तत्सर्वं सर्वथा निर्मूलमेव । ये वेदादिशास्त्राणि पठन्ति तेषामेव होमदानयोग्यपदार्थविधात्री वेदवाणी लभ्यते इति कस्य पदस्यार्थः? एहीत्यस्य पुरुषव्यत्ययेनैतीत्यर्थे स्वीकृतेऽपि हविष्कृदिति पदस्य तथाविधोऽर्थः कथमुपलभ्यते? नहि 5 -- किन्तु स्वामी दयानन्द ने यह व्याख्या की है कि " विद्वान् लोग वेद वाणी का उच्चारण कर हवि का विसर्जन करते हैं । अर्थात् अग्नि में डालते हैं । तब वह अग्नि हवि के संयोग मे विस्तृत होकर भौतिक अग्नि की तनू यानी शरीर के समान ' असि ' की व्याख्या ' भवति ' अर्थात् होता है । इसलिये मैं और सभी लोग तुम्हारा ग्रहण करते हैं । हे विद्वन्! जिस हवि के संस्कारार्थं वृहद्यावा और वानस्पत्य वह है, वही यह हवि देवताओं के लिये, विद्वानों के लिये उपशमन करे, क्योंकि जो मनुष्य वेद - शास्त्रों को पढ़ते - पढ़ाते हैं, उन्हीं को यह वाणी ' हविष्कृद् एहि, हविष्कृ-देह ' ऐसा कहती है । " ( पृ ० ८१ ) E -- पहिले तो इस व्याख्या मे व्यत्यय - अध्याहार इतनी अधिक मात्रा में ग्रहण किया गया है, जो दोषावह हो गया है । इस प्रकार अध्याहार करके तो स्तुतिवाक्यों को निन्दापरक भी लगाया जा सकता है । ' वाचः ' के साथ ' विस ' के श्रुतसम्बन्ध की उपेक्षा करके अश्रुत जो ' उच्चारण ' है, उसके साथ सम्बन्ध की कल्पना करना असङ्गत ही है । हविर्विसर्जन का सम्बन्ध करने के लिये ' अग्नेमध्ये ' का अध्याहार करना भी अप्रामाणिक ही है । ' सर्वोजन: ' का अध्याहार करना भी उसी तरह अप्रामाणिक है । १० - कि आपके मत से होम के द्वारा देवता यानी विद्वानों को भोग की प्राप्ति कैसे हो सकेगी? उनकी तो घृत, अन्न, आदि के दान से ही अधिक तृप्तिं हुआ करती है । देवताओं में उत्तम गुणों की प्राप्ति भी हौम की अपेक्षा सत्सङ्गादि से ही होना अधिक सम्भव है । हवि का संस्कार पाषाणों से कैसे हो सकता है? ' सुगन्धी आदि पदार्थ से युक्त ' यह अर्थ, किस शब्द का है? ' सुशमि ' शब्द का अर्थ, दुःखनाशक उत्तम पदार्थ का सम्पादयिता - यह अर्थ कर दिया है, ' शमीष्व ' का अर्थ, सर्व सुखों की प्राप्ति के लिये एव सर्व दुःखों की निवृत्ति के लिये बार - बार सम्पादन करो - किया है । किन्तु यह अर्थ, सर्वथा निर्मूल ही है । ' जो लोग वेदादि शास्त्रों को पढ़ते हैं, उन्हीं को होम-दानादि योग्य पदार्थ का विधान करने वाली वेदवाणी प्राप्त होती है ' - यह किस पद का अर्थ है? ' सहि में पुरुष -' व्यत्यय करके ' एति ' अर्थ स्वीकृत करने पर भी ' हविष्कृत् ' पद का भी तथाविध अर्थ कैसे प्राप्त होता है? पुनरुच्चारण करने से उतना अर्थ की प्राप्ति होना सम्भव नहीं है । यह जो कहा है कि हविष्कृत् ' पद से यज्ञ सम्पादनार्थ ब्राह्मण

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[ १४१ ] पुनरुच्चारणेन तावानर्थः सम्भवति । यदुक्तम् ( हविष्कृत् ) अत्र यज्ञसम्पादनाय ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राणां चतुविधा वेदाध्ययनसंस्कृता सुशिक्षिता वाक् गृह्यते ' ( पृ ० ७८ ) इति, तदपि न काश्विद्राजाज्ञामनुसरति इति कृत्वा तथार्थत्वे प्रमाणाभावात् । त्रैवर्णिकेतरेषामुपनयनविधानाभावात् । वेदाध्ययनस्यापशूद्राधिकरणादौ निषिद्धत्वाच्च । ११ – भावार्थे तु “ ये चैवं सर्वेषां प्राणिनां सुखाय पूर्वोक्त त्रिविधं यज्ञं नित्यं कुर्वन्ति तान् सर्वे मनुष्या हविष्कृदेहि हविष्कृदेहीति सत्कुर्युः । " ( पृ ० ८१ ) तदेतदपि पूर्वोक्तविरुद्धमेव, उभयत्र स्थलेऽर्थ भेदनिरूपणात् । तत्र हविष्कृत् शब्दस्य वेदवाणीत्यर्थः कृतः, इह तु त्रिविधयज्ञकर्ता हविष्कृदुच्यते इत्युभयत्रार्थो भिद्यते । सुगन्धादिद्रव्यहोम-द्वारा वायुवृष्टिशुद्धिस्तु प्रायेण सर्वत्रैवावर्त्यते । १२ - यत्तु - " बहूलं छन्दसि ' - ( पा ० सू ० २ | ४ | ७३ ) इति श्यनो लुगित्युक्त्वा, महीधरेण शपो लुगित्यशुद्धं व्याख्यात " मिति कथनं, तदप्यशुद्धमेव, सूत्रार्थानवबोधात् । अत एव विवरणकारो ब्रह्मदत्तः शपोलुकि श्यन्नभाव इति व्याचष्टे । महाभाष्यकाररीत्या च सामान्येन शपः प्राप्तिः । शपः स्थान एव श्यन्नाद्या आदेशा भवन्ति । तस्माच्छपो लुकि श्यनादिप्राप्तिरेव न भवति । यदपि सुशमि इति ( पा ० सू ० ३।२।१४१ ) इत्यनेन शमेघिनुण् इत्युक्त्वा, इदमपि उन्महीधराभ्यामन्यथा व्याख्यातमित्युक्तं तदपि चापलमेव सुष्ठु शान्तं यथा भवति तथा शमीष्व इत्यर्थमन्तरा द्विविधायाः शान्तेरसिद्धेः । तात्पर्यानुरोधी स्वरव्यत्ययस्त्विष्ट एव । १३ – यत्तु केनचिदुक्तं शतपथानुसारि दयानन्दीयं व्याख्यानं तत्तु मूढजनप्रतारणमेव । तथाहि - ' अयह विरा-बपति । अग्नेस्तनूरसि वाचोविसर्जनमिति यज्ञो हि हविः तेनाग्नेस्तनर्वाचो बिसर्जनमिति यां वा अमू ७ हविग्रहीष्यन् क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रों की वेदाध्ययन संस्कृता, सुशिक्षिता चतुविधा वाणी का ग्रहण किया गया है, किन्तु यह कथन भी कोई राजाज्ञा नहीं है । उक्त अर्थं करने में कोई प्रमाण नहीं है । त्रैवणिकों के अतिरिक्त लोगों का उपनयन संस्कार विहित नहीं है, और अपशूद्राधिकरण आदि में विद्याध्ययन का निषेध भी किया गया है । ११ - भावार्थ बताते समय पृष्ठ ८१ पर जो कहा है कि ' जो लोग, समस्त प्राणियों के सुख के लिये पूर्वोक्त त्रिविध यज्ञ का नित्य अनुष्ठान करते हैं, उनका सत्कार, सभी मनुष्य हविष्कृदेहि- हविष्कृदेहि ' कह कर किया करें । ' किन्तु यह कथन भी पूर्वोक्त के विरुद्ध ही है । क्योंकि दोनों जगह भिन्न - भिन्न अर्थ का निरूपण किया गया है । वहाँ पर ' हविष्कृत् ' शब्द का वेदवाणी अर्थ किया है, किन्तु यहाँ पर ' त्रिविध यज्ञकर्ता ' अर्थ ' हविष्कृत् ' शब्द का बता रहे हैं- -इस कारण अर्थभेद हो गया है । सुगन्धि द्रव्यादि के द्वारा होम करने से वायु- वृष्टि -शुद्धि का होना तो प्रायः सर्वत्र ही आप बार - बार बता रहे हैं । १२ यह जो आपने कहा है कि ' बहुलं छन्दसि ' इस पाणिनि सूत्र से ' श्यन् ' का लुक् होता है, किन्तु महीधर ने जो ' शप् ' का लुक् बताया है, वह अशुद्ध है " - आपका यह कथन भी अनुचित ही है, क्योंकि पाणिनि सूत्र के अर्थ का ज्ञान आपको नहीं है । विवरणकार ब्रह्मदत्त ने व्याख्या करते हुए स्पष्ट कहा है- ' शपो लुकि श्यन्नभावः । महा-कार की रीति से सामान्यतः ' श ' की प्राप्ति होती है । ' शप् ' के स्थान में ' श्यन् ' आदि आदेश होते हैं । तस्मात् ' श ' का लुक् होने पर तो ' श्यन् ' -आदि की प्राप्ति का सम्भव ही नहीं है । और जो यह कहा है कि " सुशमि इस प्रयोग में पाणिनि ३ २ | १४१ से ' शम् ' धातु से ' घिनुण् ' होता है । उव्वट - महीधर ने अन्यथा व्याख्या की है । " यह सब कहना चपलता से खाली नहीं है । क्योंकि ' सुष्ठु शान्तं यथा भवति तथा शमीष्व ' इस अर्थ के सिवाय द्विविध शान्ति सिद्ध नहीं हो सकती । तात्पर्यानुरोधी स्वरव्यत्यय तो इष्ट है ही । १३ - दयानन्दी व्याख्या किसी तत्सजातीय बन्धु ने शतपथ ब्राह्मणानुसारी होने की बात कही है । इस बात को कहकर मूढ़ जनों की प्रतारणा ही उसने की है । शतपथ ( १ ||| ४८ ) ब्राह्मण, जो ऊपर मूल में दिया गया है,

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[ १४२ ] वाचं यच्छत्यत्र वै तां विसृजते तद्यदेतामत्र वाचं विसृजते । एष हि यज्ञ उलूखले प्रत्यष्ठादेष हि प्रासारि तस्मादाह वाचो विसर्जनमिति । ( श ० १ | १ | ४ | ८ ) अत्र स्पष्टमग्नेस्तनूरसीति मन्त्रेण हविरावपनं विधीयते । किमेतद्द्यानन्दे-नोक्तम्? यज्ञो हीति यस्मात् यज्ञो यज्ञसाधनं हविः, अतोऽग्नेः शरीरमेव हविः । दयानन्दस्तु वाचो वेदवाण्या उच्चारणेन हविषोऽग्नेर्मध्ये प्रक्षेपमुक्त्वान् । किमयमर्थोऽत्र प्रतिपाद्यते? अत्र तु नियमिताया वाचो विसर्जनमेवोच्यते । अथ वाचं यच्छति इति । या वाग् नियमिता तामेवानेन मन्त्रभागेन विसृजते । अतो विसृज्यते हविरनेनेति विसर्जनं हविरिति मन्त्रपाठस्य एतद्वाग्विसर्जनमुपपादयति तद्यदिति । एतां वाचं विसृजते यत्तद्युक्तमेव । हि यस्मादेष यज्ञः यज्ञसाधनं हविः ( लाङ्गलं जीवनमित्यत्र जीवनसाधनत्वात् यथा लाङ्गले जीवनपदं प्रयुज्यते तद्वत् ) उलूखले प्रत्यष्ठात् प्रतिष्ठित-मभूत् । यस्माच्चैष यज्ञः प्रासारि प्रासारितोऽभूत् अतो हेतोर्वाङ. नियमनस्य प्रयोजनं नास्ति इति तविसर्जनमेव युक्तमित्यर्थः । १४ - सपदि पुरा मानुषीं वाचं व्याहरेत् ततो वैष्णवीमृचं वा यजुर्वा जपेत् । यज्ञो वै विष्णुस्तद् यज्ञं पुनरा-रभते तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिर्देववीतये त्वा गृह्णामीति देवानवदत्यु हि ह वर्गृह्यते । श ० || १ | ४ | ६ ) हविरावपनात् पूर्वं लौकिकमानुष वाग्न्याहारे प्रायश्चित्तमाह - यदि मानुषीं वाचं व्याहरेत् दद विष्णुविचक्रमे इत्यादिकां वैष्णवी मृचं वैष्णवं यजुर्वा जपेत् विष्णुरेव यज्ञस्ततो वैष्णवमन्त्रजपेन पुनर्यज्ञमारभते । देववीतये इति मन्त्रशेषस्याभिप्रायमाह-देवानवदतीति । यष्टव्यान् देवान् अवत् अवतु तर्पयत्वित्यर्थः । अनेनैवाभिप्रायेण हविर्गृह्यते । अत: हे हविर्देववीतये त्वा गृणामति देववीतये देवानां तृप्तये इति मन्त्रगतपदाभिप्रायः । सर्वथापि सिद्धान्तानुसारि शतपथव्याख्यानं न दयानन्दी-यव्याख्यानस्य गन्धोऽप्यत्र दूरतोऽपि भाति । १५ – अथमुसलमादत्ते । वृहद्गोवासि वानस्पत्य इति वृहद्ग्रावाह्येष वानस्पत्यो ह्येष तदवधाति स इदं देवेभ्यो हविः शमीष्व सुशमि शमीष्वेति स इदं देवेभ्यो हविः स १७ स्कुरु साधु सस्कृत संस्कुवित्येवैतदाहं ' ( शठ १ | १ | ४ | १० ) । शतपथी श्रुतिर्मुसलादानं विधत्ते तदनुगुणञ्च मन्त्रमपि व्याख्याय सस्करोति वृहद्ग्रावासि वानस्पत्य इति । यद्यपि वानस्पत्यो मुसलस्तथापि सोमसंस्कारकग्राववत् हविः संस्कारकत्वसाम्यात् तत्र ग्रावत्वं गौणम्, दीर्घत्वाच्च वृहत्त्वम् इति मुसलस्य वृहद्ग्रावाभिधेयता प्रसिद्धेत्यर्थः । तस्य मुसलस्योलूखले प्रक्षेपणं समन्त्रकं विधत्ते श्रुतिः-तदधाति । स इदं देवेभ्य इत्यादि मन्त्रेण । शमीष्वेतिमन्त्रपदस्यार्थमाह - देवेभ्यः इदं हविः सस्कुरु शमीष्व दोषोप-उसको पढ़ने से स्पष्ट हो जायगा कि ' अग्नेस्तनूरसि ' मन्त्र से ' हविरावपन ' का विधान किया गया है । क्या यह वाक्य, दयानन्द ने कहा है? ' हवि ' को यज्ञ साधन कहा गया है, इसलिये वह ' यज्ञ ' स्वरूप ही है । अतः ' हवि ' को अग्नि का शरीर ही समझना चाहिये । दयानन्द ने तो कहा है कि वेदमन्त्र का उच्चारण कर हवि को अग्नि में डाल देना चाहिये । ' क्या यह अर्थ यहाँ प्रतिपादित किया गया है? यहाँ तो नियमित की गई वाणी का विसर्जन ही बताया जा रहा है । १४ - हविरावपन के पूर्व लौकिक मानुष वाणी का उच्चारण करे तो उसे प्रायश्चित्त के रूप में वैष्णवी ऋचा का अथवा वैष्णव यजुर्मंन्त्र का जप करने के लिये कहा गया है । क्योंकि विष्णु ही यज्ञ रूप है. इसलिये वैष्णव मन्त्र के जप करने से यज्ञ का पुनः आरम्भ माना जाता है । ' देववीतये ' इस मन्त्रशेष के अभिप्राय को बता रहे हैं-' यष्टव्य देवताओं को वह तृप्त करे । इसी अभिप्राय से हविग्रहण किया जाता है । यह शतपथ में किया गया व्याख्यान सर्वथैव सिद्धान्तानुसारी है । दयानन्दी व्याख्या का गन्ध भी इसमें नहीं है । १५ - शतपथी श्रुति ने मुसलादान का विधान किया है । वह ' मुसल ' वानस्पत्य अर्थात् दारुमय है, तथापि सोमसंस्कारक ग्रावा की तरह हविः संस्कारकता के साम्य को देखकर उससे ग्रावत्व गौण समझना चाहिये । दीर्घ होने के कारण उसे वृहत् बताया गया है । इसी कारण मुसल की वृहद्ग्रावाभिधेयता प्रसिद्ध है । उस मुसल का

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[ १४३ ] शमनेन संस्कुरु । सुशमि शमीष्वेतिमन्त्रस्य तात्पर्यमाह साधु संस्कृतं संस्कुवित्येवैतदाह - साधुयथास्यात्तथा बाह्यान्तः-स्थूल तुषसूक्ष्ममालिन्यापनयनाय नयनेन संस्कुवित्यर्थः । एतावता उव्वटमहीधरयोरर्थ एव समर्थितो भवति । सुष्ठु दुखं शमितु ं शीलं धर्मः साधुकरणं वा यस्य तत्, दुःखनाशकमुत्तमपदार्थानां सुप्रापकं हविरित्यर्थः समर्थ्य ' ते सुशमीत्यस्य शमीष्वेति क्रियाविशेषणतयैव साधु संस्कृतं संस्कुरु सुशमि शमीष्व साधु यथा संस्कृतं तथा संस्कुवित्येवार्थः । सायणेनापि काण्वसंहितायां तथैव व्याख्यातम् । १६ - ' अथ हविष्कृतमुद्वादयति । हविष्कृदेहीति वाग्वै हविष्कृद् वाचमेवैतद्विसृजते वागुवै यज्ञः । तद् यज्ञ-मेवैतत्पुनरुपह्वयते ( श ० १ | १ | ४ | ११ ) अत्रापि स्पष्टं शतपथश्रुत्या हविष्कृदेहीतिमन्त्रेण हविष्कृदाह्वान विधीयते । उद्धादयति - उच्चैराह्वयतीत्यर्थः । मन्त्रकाण्डे द्विराम्नानादत्रापि द्विः पाठः । सूत्रेण त्रिराह्वानमुक्तम् । त्रिषत्याहि देव । ' ( तै ० सं ० ६ । ३ । ११ । १ ) इति तैत्तिरीयश्रुतेः । १७ – हविष्कृच्छब्दार्थमाह- वाग्वैहविष्कृत् इति । निर्वापादौ मन्त्ररूपाय वाचो हविष्करणसाधनत्वात् वागेव हविष्कृत् । अतस्तामनेनैव मन्त्रेणाह्वयन् हविर्ग्रहणकाले नियमितां वाचं विसृजेत् । अत एव कात्यायनेन अग्ने-स्तनूरसीति मन्त्रेण हविष्कृदेहीति मन्त्रेण वा वाग्विसर्जनं कर्त्तव्यमिति विकल्पेन सूत्रितम् । ' अग्नेस्तनूरसीति वाचं विसृजेत् ' ( का ० श्री ० सू ० २२६१ ) ' हविष्कृता वा ' ( का ० श्री ० सू ० २२६३ ) ' वागुवै यज्ञः ' ( श ० १ | १ | ४ | ११ ) या वाग्हविष्कृत् सैव खलुयज्ञः कुतः तस्य तन्निर्वर्त्यत्वात् । तत् तथा सति एतेन वागात्मिकाया हविष्कृत आह्वानेन यज्ञमेव पुनराह्वयते इति शतपथे सायणाचार्योऽपि तथैव व्याख्याति । १८- शतपथवचनस्यार्थमबुद्धवैव स्वामी दयानन्दः हविष्कृदेहीत्यस्यानुपपन्नमेव यं कश्विदर्थमुक्तवान् । ' तानि वा तानि । चत्वारि वाच एहीति ब्राह्मगस्यागह्याद्रवेति वैश्यस्य च राजन्यबन्धोश्चाधावेति शूद्रस्य स यदेव ब्राह्मणस्य तद तद्धि यज्ञियतमेतदुह वै वाचः शान्ततमं यदेहीति तस्मादेहीत्येव ब्रूयात् ( श ० १ १ ४।१२ ) ब्रह्मक्षत्रादिवणभेदो-उलूखल में समन्त्रक प्रक्षेपण करना श्रुति ने बताया है । ' शमीष्व ' इस मन्त्र पद का अर्थ कहते हैं - देवताओं के लिये इस हवि का संस्कार करो । ' शमीष्व ' अर्थात् दोषोपशमन करते हुए संस्कार करो । ' सुशमि शमीष्व ' इस मन्त्र का तात्पर्य बताया है कि साधुतया संस्कृत हो, ऐसा संस्कार करो । साधु यथास्यात्तथा बाह्यान्तःस्थूलतुषसूक्ष्ममालिन्य के अपनयनार्थ आँख से देखकर संस्कार करो । सायण ने भी काण्व संहिता मे ऐसी ही व्याख्या की है । १६ – शतपथ ( १।१।४।११ ) में भी स्पष्ट कहा है कि ' हविष्कृदेहि ' इस मन्त्र से हविष्कृत् का आह्वान किया जाता है । ' उद्वादयति ' का अर्थ है - उच्चैः आह्वयति । मन्त्र काण्ड में दो बार आम्नात रहने से यहाँ पर भी दो बार उसका पाठ किया गया है । तैत्तिरीय श्रुति के आधार पर सूत्रकार ने त्रिराह्वान के लिये बताया है | १७- ' हविष्कृत् ' शब्द के अर्थ को बताया है - निर्वाण आदि में मन्त्र रूपा वाणी, हविष्करण का साधन होने से ' बा ' को ही हविष्कृत् कहा गया है । अत: उस वाणी रूप हविष्कृत् को इसी मन्त्र से बुलाते हुए हविग्रहण के समय अपनी नियमित वाक् का विसर्जन करे । अत एव कात्यायन ने विकल्प प्रदर्शित कर ' अग्नेस्तनूरसि ' मन्त्र से अथवा ' हविष्कृदेहि ' मन्त्र से वाग्विसर्जन करने के लिये कहा है । जो वाक् रूप हविष्कृत् है, वही तो यज्ञ है, क्योंकि यज्ञ की निष्पत्ति, उस वाक् से ही हो पाती है । एवञ्च इस वागात्मिका, हविष्कृत् के आह्वान से मानो यज्ञ का ही पुनराह्वान किया जाता है । इस शतपथ की व्याख्या के अनुसार सायणाचार्य ने भी वैसी ही व्याख्या की है । १८ - शतपथ श्रुति के अर्थ की अनभिज्ञता के कारण स्वामी दयानन्द ने ' हविष्कृदेहि ' का मनगढन्त अर्थ कर दिया है, जो अनुपपन्न है । ब्रह्म क्षत्रादि वर्ण भेद के आधार पर हविष्कृदाह्वान मन्त्र में कुछ विशेष विवक्षा से शतपथ ने बताया है कि वाणी के चार रूप होते है । वैश्य के लिये ' हविष्कृदागहि ' यह मात्र है, क्षत्रिय ( राजन्यबन्धु )

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[ १४४ ] पजीवनेन हविष्कृदाह्वानमन्त्रे विशेषविवक्षयोच्यते । चत्वारि वाच इति । वाचः सम्बन्धीनि चत्वारि रूपाणि सन्ति । कानि तानीत्याह - ' वैश्यस्य हविष्कृदागहि ' इति मन्त्रः राजन्यबन्धोः क्षत्रियजातेः हविष्कृदाद्रवेति हविष्कृदाधावेति शूद्रस्य ' आपस्तम्बस्तु राजन्यवैश्ययोर्वैपरीत्येनासूत्रयत् - ' हविष्कृदेहीति ब्राह्मणस्य हविष्कृदागहीति राजन्यस्य हवि -कृदाद्रवेति वैश्यस्येति हविष्कृदाधावेति शूद्रस्य ' ( आपस्तम्ब श्री ० सू ० १ | १ | ६ ) । १६ – एवं पूर्वपक्षतया ब्राह्मणादिवर्णप्रयुक्त विशेषमुपन्यस्य स्वमतं निगमयति स यदेव ब्राह्मणस्य एहीति । एतत्खलु यज्ञियतमम् अतिशयेनयज्ञार्हम् ' इड एह्यादित एहि ' ( वा ० सं ० ३।२७ ) इत्यादावन्यत्रापि यज्ञे प्रयोगात् । एतदुह वाचः आगहि आद्रवेत्यादेः सकाशात् एहीत्येवातिशयेन शान्तम् । प्रार्थना वाहत सर्वत्र प्रयोगात् आद्रवादीनाम् निकृष्टप्रेषणरूपत्वाच्चेत्यर्थः । नात्र हविष्कृदेहीत्यनेन यज्ञसम्पादनाय ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य-शूद्राणां चतुविधा वेदाध्ययन संस्कृता सुशिक्षिता वाक् गृह्यत इति सिद्धयति वेदाध्ययनसंस्कृतायाः शिक्षिताया वाच-श्चातुर्विध्यायोगात् । २० - प्रकृते हविष्कृदेहि इत्यत्रैव वर्णभेदेन एहि, आगहि, आद्रव, आधावेति भेद: कार्य इति पूर्वपक्षं कृत्वा स्वमतेन एहीत्येव सर्वत्र प्रयोक्तव्य इत्याह श्रुतिः । अर्थात् ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्र षु वर्णभेदेन हविष्कृदागहि हविष्कृदाद्रव विदाधावेति प्रयोगभेदमकृत्वा हविष्कृदेहीति ब्राह्मणस्यैव सर्वत्र प्रयोगः कार्यः । यज्ञियतमत्वाच्छान्ततमत्वाच्च ॥ तस्माच्छतपथानुसारि तद्व्याख्यानमिति कथनं साहसमात्रम् । २१ - यत्तु केनचिदुक्त ' मनेनैव शूद्राणामपि वेदाध्ययनयज्ञादावधिकारः सिद्धयतीति ( पृ ० ७६ हि ० ) तत्सत्यम्, ' निषादस्थपति याजये ( मै ० सं ० २ २ ४ ) दित्यत्र शूद्राणामप्यधिकाराभ्युपगमात् । तत्रापि हविष्करणाय हविष्कृदेही -के लिये ' हविष्कृदाद्रव ' यह मन्त्र है, और शूद्र के लिये ' हविष्कृदांधाव ' यह मन्त्र है । किन्तु आपस्तम्ब ने राजन्य और वैश्य के लिये कुछ विपरीत बताया है - ' ब्राह्मण के लिये ' हविष्कृदेहि ', राजन्य के लिये ' हविष्कृदागहि ओर वैश्य के लिये ' हविष्कृदाद्रव ', तथा शूद्र के लिये ' हविष्कृदाधाव ' यह मन्त्र है । १६ - इस प्रकार पूर्व पक्ष के रूप में ब्राह्मणादि वर्ण प्रयुक्त विशेष का उपन्यास करके स्वमत को सिद्धान्त रूप में कहा है । क्योंकि यही यज्ञिय मत है, अर्थात् अधिकतया यज्ञ के योग्य है । वाजस ० संहिता ( ३।२७ ) में और अन्यत्र भी यज्ञ में प्रयोग किया जाता है । ' आगहि आद्रव ' इत्यादि से ' एहि ' पद ही अतिशय शान्त है । प्रार्थना वाक्यों में सर्वत्र ' एहि ' का प्रयोग किया जाता है । और ' आद्रवादि ' पदों का प्रयोग, निकृष्ट प्रेषण के रूप में किया जाता है । श्रुति वाक्यों के इस विवेचन से यह सिद्ध नहीं हो रहा है कि ' हविष्कृदेहि ' से यज्ञ सम्पादनार्थं ब्राह्मण क्षत्रिय - वैश्य-शूद्रों की चार प्रकार की वेदाध्ययन से संस्कृत हुई सुशिक्षिता वाणी का ग्रहण किया जाय । क्योंकि वेदाध्ययन से संस्कृत हुई शिक्षित वाणी चार प्रकार की नही हुआ करती । २० --- प्रकृत प्रसङ्ग में ' हविष्कृदेहि ' में ही वर्ण भेद से ' एहि, आगहि, आद्रव, आधाव ' - यह भेद करना चाहिये - ऐसा पूर्व पक्ष करके अपने मत के अनुसार ' एहि ' का ही सर्वत्र प्रयोग करने के लिये श्रुति ने बता दिया है । अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रों में वर्ण भेद से ' हविष्कृदाग हि ', ' हविष्कृदाद्रव ', ' हविष्कृदाधाव ' इन प्रयोगों को न करके ' हविष्कृदेहि ' इस ब्राह्मण का ही सर्वत्र प्रयोग करना चाहिये । क्योंकि उसी में यज्ञियतमत्व और शान्ततमत्व है । तस्मात् दयानन्द स्वामी की व्याख्या को शतपथानुसारी बताना साहसमात्र है । २१ - - यह जो किसी ने पृ ० ७६ पर कहा है कि ' इसी से शूद्रों को भी वेदाध्ययन यज्ञ आदि में अधिकार का होना सिद्ध होता है । ' यह ठीक कह रहे हो, क्योंकि ' निषादस्थपति याजयेत् ' यहाँ पर शूद्रों का भी अधिकार माना गया है । वहाँ भी हविष्करण के लिये ' हविष्कृदेहि ' यह आह्वान इष्ट है । किन्तु इसने मात्र से सभी कर्मों में

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[ १४५ ] त्याह्वानस्येष्टत्वात् । न चैतावता सर्वकर्मस्वधिकारः, राजसूयादी ब्राह्मणनामप्यनधिकारात् । वेदाध्ययनं तूपनयन-सापेक्षयमित्युक्तमेव । ‘ वसन्ते ब्राह्मणमुपनयोत ग्रीष्मे राजन्यं शरदि वैश्यमिति त्रयाणामेवोपनयनविधानात् । चतुर्थस्य तदभावादेव अध्ययनानधिकारोऽपि सिद्ध एव । २२ -- ऐतरेय ब्राह्मणे द्वितीयपञ्जिकायां एकोनविंशे खण्डे यच्च - ' ऋषयो वै सरस्वत्यां सत्रमासत ते कवष-मैलूषं सोमादनयन् दास्याः पुत्रः कितवोऽब्राह्मणः कथं नो मध्येऽदीक्षिष्टेति । ---- - एतदपोनप्त्रीयमपश्यत् प्रदेवत्रा ब्रह्मणे गातु रेत्विति ( ऋ ० सं ० १०1३०1१ ) तेनापां प्रियं धामोपागच्छत् । ' ( ऐ ० ब्रा ० २१६ ) इति दासीपुत्रस्या-ब्राह्मणस्य अपोनप्त्रीय सूक्तदर्शनात् वेदे तस्याधिकारो व्यक्तः । इत्थमेव शाङ्खायनब्राह्मणेऽपि १२/३ ' माध्यमाः सर-स्वत्यां सत्रमासत । तद्वापि कवषो मध्ये निषसाद तं हेम उपोदु दस्या वै त्वं पुत्रोऽसि न वयं त्वया सह भक्षयिष्याम इति । सह क्र ुद्धः प्रद्रवत् सरस्वतीमेतेन सूक्तेन तुष्टाव तं हेयमन्वियाय तत उहेमे निरागा इव मेनिरे तं हान्वावृत्योचु-ऋषे नमस्ते अस्तु ' ( शाङ्खायनब्राह्मणम् १२।३ ) छागलेयोपनिषद्यपि प्रारम्भ एव ॐ ऋषयो वै सरस्वत्यां सत्रमासत । तेऽथ कवषमैजूषं दास्याः पुत्र इति दीक्षायाच्छिन् ' महाभारतेऽपि शान्तिपर्वणि ३२७ अध्याये श्लोक ४६ – श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः । वेदस्याध्ययनं हीदं तच्च कार्यं महत्स्मृतम् ॥ ' महाभारते वनपर्वणि अध्याये १३४ श्लोक ११ – ' चत्वारोवर्णा यज्ञमभि-संवन्ति । ( वृहद्धारीत स्मृतौ ६ । २५७ ) ' मन्त्राधिकारिणः सर्वे ' लघुविष्णुस्मृतौ तु अ ० ४ श्लोक ६ ' पश्च- । यज्ञविधानं तु शूद्रस्यापि विधीयते । ' इत्यादिकं तत्तु तत्तदर्थानवबोधविजृम्भिता भ्रान्तिरेव ऐलूषकवषस्य शूद्रत्वासिद्धेः नह्यब्राह्मणत्वेन शूद्रत्वं सम्भवति, क्षत्रियवैश्ययोरप्यब्राह्मणत्वप्रसिद्धेः । विद्यातपोभ्यां हीनस्य जन्मना ब्राह्मणस्यापि दासीशब्द-मुख्यब्राह्मणत्वाभावेनाब्राह्मणत्वोपपत्तेश्च । नापि दास्याः पुत्रत्वेनाब्रह्मणत्वम् विनतायामपि पणविशेषेण प्रयोगात्, दास्या विनतायाः पुत्रस्य गरुडस्य शूद्रत्वायोगात् । तेन ऐलूषः कवषो जन्मना ब्राह्मणोऽपि सन् बहुकालपर्यन्तं -व्रात्यं एवासीत् । तस्मात्तस्य दास्याः पुत्रत्वाब्राह्मणत्वाद्यभिधानम् । चातुर्वर्ण्य संस्कृतिविमर्शे " नापि कस्यचित् सूक्तदर्श नेन तज्जातीयस्य वेदाध्ययनाधिकारसिद्धिः, देवशुन्याः सरमाया अपि सूक्तदर्शनेऽपि तज्जातीयानां वेदाध्ययनाधिकारा-सिद्धेः " इत्यादि स्थितम् । उसका अधिकार सिद्ध नहीं हो पाता है । इतना ही नहीं, राजसूय आदि यागों में ब्राह्मणों को भी अनधिकारी कहा गया है । वेदाध्ययन तो उपनयन सापेक्ष है. यह कही चुके हैं । त्रैर्ऋणिकों के लिये हो उपनयन का विधान किया गया है । चतुर्थ को उपनयन का अधिकार न होने से ही उसे अध्ययन का अनधिकार ( अधिकार न होना ) है, यह स्पष्ट होता है । होने का उल्लेख २२- ऐतरेय ब्राह्मण, ऋक् संहिता में दासी पुत्र अब्राह्मण को अपोनपुत्रीयसूक्त के दर्शन है, इसलिये वेद में उसका अधिकार होना स्पष्ट हो रहा है । इसी प्रकार शाङ्खायन ब्राह्मण और छागलेयोपनिषद् तथा, महाभारत और वृहत् हारीत स्मृति, एव लघु विष्णुस्मृति आदि के वचनों को बताकर शूद्र के अध्ययनाधिकार कर्माधिकार के उल्लेख की बात जो की जाती है, वह उन वचनों के अर्थ का ज्ञान न हो पाने से बुद्धि में भ्रम हो रहा है । एलूष, कवष को शूद्र समझना भ्रम है क्योंकि उनका शूद्रत्व, सिद्ध नहीं है । अब्राह्मण होने मात्र से उसमें शूद्रत्व की सम्भावना नहीं की जा सकती । क्योंकि ' क्षत्रिय, वैश्य ' का अब्राह्मणत्व तो प्रसिद्ध ही है, किन्तु उन्हें शूद्र नहीं कहा जाता । विद्या और तप से होन रहने पर जन्मना ब्राह्मण में भी मुख्य ब्राह्मणत्व के न रहने से उसे अब्राह्मण विनता कहा जाता है । दासी का पुत्र होने से भी उसको अब्राह्मण नहीं कहा जा सकता । जैसे पण विशेष के कारण को भी ' दासी ' शब्द से कहा जाता था । किन्तु उस दासी विनता के पुत्र गरुड़ को शूद्र नहीं कहा जाता है । उसी प्रकार ऐलूष कवष जन्मत: ब्राह्मण होते हुए भी दीर्घ काल तक वह व्रात्य ' ही था । इसलिये उसे दासीपुत्र, तज्जातीय अब्राह्मण आदि कहा गया है । चातुर्वर्ण्य संस्कृति विमर्श में कहा है कि ' किसी को सूक्त का दर्शन हो जाने मात्र से व्यक्तियों को वेदाध्ययन अधिकार नहीं मिल जाता । देवताओं की कुतिया सरमा को भी सूक्त का दर्शन हो गया था, तथापि तज्जातीय कुतियों को वेदाध्ययन करने का अधिकार प्राप्त नहीं हो पाया ।

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[ १४६ ] २३ - अध्यात्मपक्षेऽपि हे जीवात्मन् त्वमग्नेः सच्चिदानन्दतनोः परमेश्वरस्य तनुश्चिदानन्दरूप एवासि | कीदृशं स्वरूपं वाचो विसर्जनम् तत्तादृश सर्वा अपि वाचो विसृज्यन्ते वाचः सर्वस्या अपि विसर्जनं यस्मात् । ' ओमित्येवं ध्यायथ ' ( मु ० २।२'६ ) अन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतु: ' ( मु ० २ २ ५ ) यच्छेवाङ मनसी प्राज्ञ: ' ( काठ ० १ | ३ | १३ ) इत्यादि श्रुतिभ्यः । देवस्य परमात्मनः वीतये सन्तुष्टये त्वामहं गृह्णामि शिष्यत्वेन गृहीत्वोपदिशामि ग्राह्यामि वा, जीवाभयप्रदानस्य परमात्मतुष्टिहेतुत्वात् । त्वं वृहद्ग्राववदविचलः कूटस्थ एवासि न कर्ता भोक्ता संसारी किन्तु वानस्पत्यः संसारवृक्षस्य सम्बन्धी मूलरूपश्वासि । सर्वसंसारकारणभूतः परमात्मैवासि ' तत्त्वमस्या ' ( छा ० ६ ८७ ) दि श्रुतेः । न केवलं त्वमेव किन्तु इदं सर्वं विश्वमपि स एव ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( छा ० ३ १४ १ ) तिश्रुतेः । २४ - ननु सर्वस्य परमात्मत्वेन प्रपञ्चस्य विनश्वरत्वं मम संसारित्वं परमात्मनो भोक्तृभोग्याभ्यां चेतना -चेतनाभ्यां च सामानाधिकरण्यं कथं सम्भवतीतिचेच्छृणु मुख्यसामानाधिकरण्यबाधसामानाधिकरण्याभ्यां तदुपपत्तेः । सोऽयं देवदत्त इतिवत् भोक्तृपरमात्मनोर्भागत्यागलक्षणया सामानाधिकरण्यं रज्जुरियं न सर्प इतिवत् भोग्यपरमात्मनो-बधसामान्याधिकरण्यम् । ननु कथं तन्नानुभूयते इति चेत् तदर्थं देवेभ्योऽग्नीन्द्रादिभ्यो हविः शमीष्व संस्कुरु सुशमि साधु-संस्कृतं यथास्यात्तथा शमीष्व सम्यगान्तरबाह्यमलापनयनेन संस्कुरु आत्मानमेव हविष्ट्वेन शमीष्व साधु यथा स्यात्तथा बाह्यान्तरस्थूलसूक्ष्म प्रत्यक्षयोग्यान् कामादीन् वासनामयांश्च दोषानपनोद्य भगवद्भोग्यतया संस्कुरु । ' अहमन्नमहमन्न ' ( तै ० ३ | १० | ६ ) मित्यादिना जीवो भगवद्भोग्यत्वेन स्वात्मानं समर्पयति । तदनन्तरं भगवन्तं भोक्तुं समर्थो भूत्वा ' अहमन्नादोऽहमन्नाद ' ( तै ० ३ | १० | ६ ) इति स्वात्मानं परमानन्दमयं भगवद्भोक्तृत्वेन जानाति । भगवांश्च ' तस्य हवि -देहि हविष्कृदेहीति रीत्या स्वागतं करोति । २३ – अध्यात्म पक्ष में भी हे जीवात्मन्! सच्चिदानन्द तनू परमेश्वर अग्नि की तुम तनू ( शरीर ) हो, अर्थात् सच्चिदानन्द रूप ही हो । वाणी के विसर्जन का स्वरूप कैसा है? सभी वाणियों का विसर्जन किया जाता है । } परमात्मा की सन्तुष्टि के लिये मैं तुम्हारा ग्रहण करता हूँ । शिष्य बनकर तुम्हारा ग्रहण करके उपदेश अथवा ग्रहण करवाता हूँ । जीव को अभय प्रदान करना परमात्मा की तुष्टि का कारण है । तुम बृहद्ग्राव के समान अविचल कूटस्थ ही हो । किन्तु वानस्पत्य अर्थात् संसार वृक्ष के सम्बन्धी मूल रूप हो । सर्व संसार कारणभूत परमात्मा ही हो । इस कथन में ' तत्त्वमसि ' श्रुति प्रमाण है । केवल तुम ही परमेश्वर स्वरूप नहीं हो, अपितु यह सम्पूर्ण विश्व भी परमेश्वर रूप है, क्योंकि ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' श्रुति कह रही है । २४ - यदि यह कहो कि सब कुछ परमात्म स्वरूप है तो प्रपञ्च का विनश्वरत्व, मेरा संसारित्व, परमात्मा का भोक्तृ - भोग्य, और चेतन और अचेतन से सामानाधिकरण्य कैसे सम्भव हो सकता है? इस आशङ्का का उत्तर सुनो-मुख्य सामानाधिकरण्य और बाधसामानाधिकरण्य से उसकी उपपत्ति हो सकती है । ' सोऽयं देवदत्तः ' के समान भोक्ता और परमात्मा का भाग त्याग लक्षणा से सामानाधिकरण्य, और ' रज्जुरियं न सर्पः ' की तरह परमात्मा का बाध-सामानाधिकरण्य का सम्भव हो सकता है । तो फिर उसका अनुभव क्यों नहीं होता? यह कहो तो उसका उत्तर यह है कि अग्नि - इन्द्र आदि देवताओं के लिये ' हविः शमीष्व ' हवि को सम्यक्तया संस्कृत वनाने के लिये उसका संस्कार करो, अर्थात् बाह्य आभ्यन्तर मलापनयन करते हुए उसका संस्कार करो । अभिप्राय यह है कि आत्मा को ही हवि समझ कर अच्छी तरह संस्कृत बनाने के लिये स्थूल सूक्ष्म प्रत्यक्ष योग्य कामादि और वासनामय दोषों को दूर कर भग-वोग्य वह बन सके ऐसा संस्कार करो । तब वह जीव भगवद्भोग्य बनकर अपने आपको भगवान् के अर्पण करता है । तदनन्तर भगवान् का भोग करने में समर्थ होकर ' अहमन्नाद: अहमन्नाद्यम् ' इस श्रुति के अनुरोध से परमानन्दमय अपने को भगवद्भोक्ता के रूप में समझता है और भगवान् ' हविष्कृदेहि- हविष्कृदेहि ' इस रीति से उसका स्वागत करते हैं ।

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[ १४७ ] I I कुक्कुटोऽसि मधुजिह्वः इषमूर्जमावद त्वया वय 5 संघात संघातं जेष्म व॒र्षवृद्धमसि॒ प्रति त्वा व॒र्षवृद्ध ं वेत्तु परापूत रचः परापूताऽचरातयः । अपहृत ॐ रक्षो वायुर्वी विविनक्तु देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्व-1

च्छिद्रेण पाणिना । वा ० सं ० ११६ ॥

अर्थ - हे शम्यासंज्ञक यज्ञायुध! तुम राक्षसों के लिये कुक्कुट स्वरूप हो । ( अर्थात् राक्षस कहाँ कहाँ हैं, उनको खोज खोजकर उन्हें मारने के निमित्त जो सर्वत्र गमन करता है उसे कुक्कुट कहते हैं । ) तथा तुम देवताओं के मधुजिह्व नाम के भृत्य ( सेवक ) हो । जिसकी जिह्वा मधुर भाषण करने वाली है उसे मधुजिह्व कहते हैं ) । हे यज्ञपात्र! तुम राक्षसों का पराजय करो, और ऐसा शब्द करो कि जिससे यजमान को अन्न और रस प्राप्त हो, तब हम तुम्हारी सहायता से राक्षसों के साथ युद्ध करके युद्ध में विजय प्राप्त करेंगे । हे शूर्प! तुम वर्षा के जल से वृद्धिङ्गत हुए तुम्हें शूर्प आत्मीय के रूप में पहिचाने । ( व्रीहि और शूर्प दोनों ही वर्षा के जल से वृद्धि को प्राप्त होने के कारण परस्पर सम्बन्धी हैं ) । शूर्प से व्रीहि को पखाड़ने पर तद्गत राक्षस रूप और शत्रु रूप हविःप्रतिकूल भाग दूर किया गया । शूर्प से पखाड़ने पर उड़कर दूर जा गिरे हुए तुष रूपी राक्षस दूर उड़ गये । हे व्रीहियों! शूपं की वायु तुम्हें तुम्हारी सूक्ष्मता से दूर करे । सुवर्ण की अंगुठियाँ आदि आभूषणों को धारण करने वाले देवगण प्रेरक बन कर अपनी अञ्जलि से तुम्हारा ग्रहण करें ॥१६ ॥

१ – आह्वयत्याहन्त्यन्यो दृषदुपले ' कुक्कुटोऽसी ' ति त्रिः शम्यया द्विर्हषदं सकृदुपलाम् ' ( का ० श्री ० सू ० २।४।१५ ) अत्र पत्नीमग्नीधं वा अध्वयों आह्वयति सति अन्योऽग्नीत् शम्यया दृषदुपले कुट्टयति तत्र विशेषः द्विषदं सकृदुपलां शम्यया हन्यात् ' कुक्कुटोऽसीति मन्त्रेण मन्त्रस्तु त्रिः प्रयोज्यः । पेषण साधने द्वे शिले दृषदुपले समाहन्ति । द्विषदम् सकृदु-पलां त्रिः सञ्चारयन् नवकृत्वः सम्पादयति । २ - हे शम्यारूप यज्ञायुधविशेष त्वं कुक्कुटो मधुजिह्वोसि । असुराः क्व क्वेत्येवं वदन्तः समुपयन्ति । तान् हन्तुमन्विच्छन् यः पुमानटति सर्वत्र सञ्चरति स कुक्कुटः । क्व शब्दस्य सम्प्रसारणे अटतेश्चाकारस्य पूर्वरूपत्वेन १ - - कात्यायन श्रौत सूत्र के अनुरोध से अध्वर्यु जब यजमान पत्नी को अथवा अग्नीध को बुलाता है तब अग्नीत् ' शम्या ' से दृषद् और उपल पर प्रहार करता है । अर्थात् दो बार दृषद् पर और एक बार उपला पर प्रहार करता है, प्रहार करते समय ' कुक्कुटोसि ' मन्त्र को तीन बार कहता है । अर्थात् पेषण की स धनभूत दृषद् उपल रूप दो शिला हैं, उस पर प्रहार करता है । २ - हे शम्यारूप यज्ञायुध विशेष! तुम असुरों के लिये और देवताओं के लिये कुक्कुट हो, और मधुजिह्व हो । असुर लोग कहाँ - कहाँ हैं - ऐसा कहते हुए उन्हें मारने की इच्छा से जो सर्वत्र सञ्चार करता है, वह कुक्कुट है । इस