वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 171–180

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 171 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १५८ ] पात्रीमुख ' मिति तैत्तिरीयश्रुतेः । यद्युवैवानो भवति जघनेन गार्हपत्यं स्वयं निदधाति स्पयोपरि पात्री पात्र्यां पुरोडा-शीयानावपतीत्यर्थः । पूर्वार्धं पात्र्या अभिमृशति धूरसीत्यादि । पात्र्या उत्तरतः पश्चाद्वा दक्षिणतो वा यथासम्भवं प्राङ्मुख उपविष्टो हविरीक्षणमपद्रव्यनिरसनमालभनं वा कृत्वा अप उपस्पृश्य हविरालभ्य ग्रहणं शेषभिमर्शनम् प्राङीक्षणं च कृत्वा ह ७ हन्तामित्यनेन मन्त्रेणोत्तिष्ठति । तत उत्तरतो गत्वा श्रपणस्य पश्चादासादयति । ततः समप्रमाणौ साग्रो अनन्तर्गभौं अक्षारिताग्नौ कुशी ' पवित्रस्थ ' ( वा ० सं ० १ | १२ ) इति मन्त्रेण कुशैः छुरिका स्थानीयै-श्छिनत्ति । ४ - अथवा तथा विधांस्त्रीन् कुशान् अनेनैव मन्त्रेणानूहितेन कुशैछिनत्ति । ततोऽग्निहोत्रहवण्यां स्वयमेवो-दकमासिच्य सविना व इति मन्त्रेण ताभ्यां पवित्राभ्यामुत्पुनाति उत्क्षिपति । पवित्रयोर्हविग्रहण्यां स्थापनम् । ततः सव्यहस्तेऽग्निहोत्रहवणौ निधाय सव्यहस्तस्थामेव संल्लग्नामेव दक्षिणहस्तेनोदिङ्गयति ऊर्ध्वं चालयति । ततः ' प्रोक्षिता: स्थे ' ( वा ० सं ० १।१३ ) ति मन्त्रेण प्राणीतेन जलेन तासां सकृत्प्रोक्षणम् ' प्रोक्षिताः स्थेति तासां प्रोक्षणमिति ' ( का ० श्र ० सू ० २ | ३ | ३५ ) इतिरीत्या सायणादिरीत्या तु मानसोपचारैरेव तासां प्रोक्षणम् । ततो ब्रह्मन् हविः प्रोक्षिष्यामीति ब्रह्माणं पृच्छति - ततो ब्रह्मा प्रोक्ष यज्ञं धेहीत्यन्तमुपांशु जपित्वा - ओम् प्रोक्षेत्युच्चैः प्रस्तौति I । ततो-ssa रग्निहोत्रहवण्याः सकाशादुदकं हस्तेनादाय शूर्पस्थे हविषी प्रोक्षति अग्नये त्वा जुष्टमिति प्रथमम् अग्नीषोमाभ्यां त्वष्टमिति द्वितीयम्, ततः सर्वाणि पात्राणि देव्याय कर्मणे इति मन्त्रेण प्रोक्षति । अत्र बहूदकमादाय प्रोक्षणं कार्यम् मन्त्र से पात्री के समीप जाकर ' धूरसि देवानामसि. विष्णुस्त्वा क्रमताम् इन तीन मन्त्रों का जप, पात्री के बिल से करना चाहिये. ' बिलं पात्रीमुखम् ' इस तैत्तिरीय श्रुति के अनुसार पात्री के पूर्वार्धभाग का स्पर्श कर जप करना चाहिये । यदि शक हो तो गार्हपत्य के पश्चिम भाग में स्पय को स्थापित करे, उस पर पात्री को रखे, उस पात्री में, पुरोडाशीय पदार्थों को रखे । ' धूरसि ' मन्त्र से पात्री के पूर्वार्ध का स्पर्श करे । पात्री के उत्तर या पश्चिम अथवा दक्षिण भाग में यथा सम्भव प्राङमुख बैठकर हविरीक्षण अपद्रव्य निरसन आलम्भन ( स्पर्श ) करे । तब हवि का स्पर्श करते हुए उसका ग्रहण करे और अवशिष्ट हवि का अभिमर्शन ( स्पर्श ) करे । तदनन्तर पूर्व की ओर देखकर ' ह २७ हन्ताम् ' मन्त्र कहते हुए उठे, और उत्तर की ओर से जाकर गार्हपत्य के पश्चात् भाग में उस गृहीत हवि को रख दे | तदनन्तर समान प्रमाण के साग्र, अनन्तर्गर्भ, अक्षारिताग्र दो कुशों ( दर्भों ) को छुरिका के स्थान में तीन कुशों से ' पवित्रस्थ ' मन्त्र को कहकर काट 1 ४ - अथवा उसी प्रकार के तीन कुशों को इसी अनुहित मन्त्र से तीन कुशों के द्वारा काट दे । उसके बाद अग्निहोत्रहवणी में स्वयमेव जल डालकर ' सविता व ' मन्त्र से उन दो पवित्रों से उस जल का उत्पवन ( उत्क्षेपण ) करे । तदनन्तर उन दो पवित्रों को हविर्ग्रहणी में रख दे । उसके बाद सव्य हाथ में अग्निहोत्रहवणी को रखकर दक्षिण हाथ से उसके जल का उद्दिङ्गन करना चाहिये यानी ऊपर की ओर उछालना चाहिये । उसके बाद ' प्रोक्षिताः स्थ ' मन्त्र से प्रणीता पात्र के जल से उनका सकृत् प्रोक्षण करना चाहिये । किन्तु सायण के अनुसार मानसोपचार से ही उनका प्रोक्षण करने के लिये कहा गया है । तदनन्तर ' ब्रह्मन् हविः प्रोक्षिष्यामि ' इस प्रकार ब्रह्मा से पूछता है । तब ब्रह्मा ' प्रोक्ष यज्ञ घेहि ' तक उपांशु कहकर ' ॐ प्रोक्ष ' ऐसा ऊँचे स्वर में कहता है । तब अध्वर्यु ' अग्निहोत्रहवणी पात्र से जल को हाथ में लेकर शूर्प स्थित हवि पर प्रोक्षण करता है । ' अग्नये त्वा जुष्टम् ' मन्त्र से प्रथम हवि को ' अग्नीषोमा-भ्यां त्वा जुष्टम् ' मन्त्र से द्वितीय हवि को तदनन्तर ' दैव्याय कर्मगे ' मन्त्र से समस्त पात्रों को प्रोक्षण करे । बहुत सा जल लेकर प्रोक्षण करना चाहिये, जिससे प्रोक्षण के जल कण सभी पात्रों का स्पर्श कर सकें । प्रत्येक पात्र पर प्रोक्षण की आवृत्ति का पक्ष युक्ततर है, क्योंकि प्रोक्षण ' करना पात्रों का संस्कार है । प्रत्येक के संस्कारार्थं संस्कार की आवृत्ति करना उचित ही है । पात्रों को न्युज ( मुँह के बल लिटाकर ) स्थापित करे । ' उत्तानानि कृत्वा त्रिः प्रोक्षति ' सत्रान्तरों सकृत् ( एक बार ) समन्त्रक और दो बार तूष्णीम् प्रोक्षण पत्रों को उत्तान करके करे । तद-के अनुसार

पृष्ठ 172

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 172 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १५६ ] यथा प्रोक्षणी विन्दवः सर्वाणि पात्राणि स्पृशेयुः । प्रतिपात्रं प्रोक्षणावृत्तिपक्षो युक्ततरः प्रोक्षणस्य पात्र संस्कारत्वात् प्रति-संस्कारं संस्कारावृत्तिर्युक्त व । पात्राणि न्युब्जान्यासादनीयानि । ' उत्तानानि कृत्वा त्रिः प्रोक्षतीति सत्रान्तरेषु सकृन्मन्त्रेण द्विस्तूष्णीम् । ततोऽसञ्चरे प्रणीताहवनीयान्तराले गार्हपत्याहवनीयान्तराले वा प्रोक्षणीनां निधानं कार्यम् उभयत्र सञ्चरणनि-षेधात् । ततोऽध्वर्युः शर्मासीति मन्त्रेण कृष्णाजिनं हस्तेन गृह्णाति । तत आसादितपात्रेभ्यः परतो गत्वा अवधूतमितिमन्त्रेण कृष्णाजिनमधूनोति । उदकोस्पर्शनम् । तत उत्तरेण गार्हपत्यमुत्करदेशे प्रत्यग्ग्रीवं कृष्णाजिनमास्तृणाति । ' अदित्यास्त्व-गसी ' तिमन्त्रेण सव्येन हस्तेनाविमुक्त कृष्णाजिने दक्षिणेन हस्तेन उलूखलमाहृत्य कृष्णाजिनस्योपरि निदधाति । अद्रिरसि वानस्पत्य इति मन्त्रेण ग्रावासि पृथुबुध्न इत्यनेन वा प्रतित्वादित्यास्त्वग्वेत्त्विति उभयोर्मन्त्रयोः शेषः कार्यः ततः शूर्पे पृथक् स्थापितं हविद्वयं मिश्रीकृत्य सव्येनाविमुक्तोलूखलमध्ये अग्नेस्तनूरितिमन्त्रेण शूर्पेणैव हविरावपति । ततोऽध्वर्यु जमानयोर्वाग्विसर्गः । ततोऽध्वर्यु ': ' बृहद्ग्रा वे ' तिमन्त्रेण मुसलंहस्तेन गृह्णाति स इदं देवेभ्य इति । उलूखल-मध्ये प्रवेशयति । ततः स्वयमेव कण्डने प्रवृत्तः कण्डनं कुर्वन्न ेव हविष्कृदेहि हविष्कृदेहीति त्रिः हविः कर्त्री पत्नी हविषः कण्डनकर्त्तारमग्नीधं वाह्वयति । अत्रोभयोर्वाग्विसर्गः । यदैव हविष्कृदेहीत्याह्वानं तदैवाग्नीत् कुक्कुटोऽसीति मन्त्रेण शाद्विषदं कुट्टयति । उपलां शम्यया सकृत्कुट्टयति । तदनन्तरं पत्नी वा आग्नीध्रो वा कण्डनं करोति ' वितुषी भूतेषु ब्रीहिषु " अध्वर्यु वर्ष वृद्धयसीतिमन्त्रेण हस्तेन शूर्पं गृह्णाति । ततः त्वा वर्षवृद्धमिति मन्त्रेण कण्डितहविरुलूखला-निष्कास्य तूष्णीं शूर्पे निदधाति ततः परापूतं रक्ष ' इति मन्त्रेण शूर्पेण निष्पुनाति तुषान् पृथक्करोति । ततोऽप उपस्पृश्य वायुर्वा " इति मन्त्रेण तण्डुलान् कण्डितान् ब्रींहीश्च विविनक्ति । ततः कण्डितान्निःसार्य अकण्डितान् पुनरप्युलूखले प्रवेश्य कण्डनं कृत्वा पुनर्निष्कास्य शूर्पे कृत्वा तुषान् पृथक्कुर्यात् । ततः सर्वांस्तुषान ' पहर्तामिति मन्त्रेणोत्कर देशे निरस्येत् । नन्तर प्रणीता और आहवनीय के अन्तराल ( बीच ) में अथवा गार्हपत्य और आहवनीय के अन्तराल में प्रोक्षणी पात्र को स्थापित करे, क्योंकि उभयत्र सञ्जरण का निषेध किया गया है । उसके बाद अध्वर्यु ', ' शर्मासि ' मन्त्र से कृष्णाजिन का हाथ से ग्रहण करे । तदनन्तर आसादित पात्रों के आगे जाकर ' अवधूतम् ' मन्त्र से कृष्णा जिन को दिलावे, और जलस्पर्श करे । तब गार्हपत्य के उत्तर उत्कर देश में कृष्णाजिन को प्रत्यक् ग्रीव करके बिछावे । ' अदित्यास्त्वगसि मन्त्र से ' मन्त्र से सव्यहस्त से स्पृष्ट उस कृष्णाजिन पर दक्षिण हस्त से उलूखल को लेकर रखे । ' अद्रिरसि वानस्पत्यः ' अथवा ' ग्रावासि पृथुबुध्नः ' मन्त्र से भी उलूखल की उस पर स्थापना कर सकते हैं । दोनों मन्त्रों के साथ ' प्रतित्वा-दित्यास्त्ववेत्तु ' यह शेष जोड़ना चाहिये । उसके बाद शूर्प पृथक् - पृथक् रखे हुए दोनों हवियों को परस्पर यजमान मिश्रित करके सव्य हाथ से पकड़े हुए उलूखल में ' अग्नेस्तनूः ' मन्त्र से शूर्प से ही हवि डालता है । तब अध्वर्यु और विसर्ग होता है यानी अपना मौन तोड़ते हैं । उसके बाद अध्वर्यु बृहद्वा ' मन्त्र से मुसल को हाथ से ग्रहण करता है । ' स इदं देवेभ्यः ' मन्त्र से उलूखल में उसे रखता है । उसके बाद स्वयं ही कण्डन में प्रवृत्त हुआ अध्वर्यु ause करता हुआ ही ' हविष्कुदेहि, हविष्कृदेहि ' ऐसा तोन बार हविः कर्त्री पत्नी को अथवा कण्डन करने वाले aria को बुलाता है । इस समय दोनों का वाग्विसर्ग होता है जब भी ' हविष्कृदेहि ' यह आह्वान किया जाता है, अभी अग्नीत् ' कुक्कुटो s सि ' मन्त्र से शम्या से दो बार दृषद् को बजाता है । और शम्या से उपला को सकृत् ( एक बार ) बजाता है । तदनन्तर पत्नी अथवा अग्नीध कण्डन करता है । व्रीहियों के निस्तुष हो जाने पर अध्वर्यु ' ' वर्षवृद्धमसि ' मन्त्र से हाथ में शूर्प का ग्रहण करता है । तब ' त्वा वर्षवृद्धम् ' मन्त्र से कण्डित हवि को उलूखल से निकाल कर तुष्णीं ( अमन्त्रक ) शूर्प में रखता है । तदनन्तर ' परापूतं रक्षः ' मन्त्र से उसको शूर्प से फटकता है यानी पखाड़ता है, और षों को अलग करता है । तब जल स्पर्श करता है । ' वायुर्वा ' मन्त्र से तण्डुल और कण्डित व्रीहियों को अलग - अलग करता है । कण्डितों को निकाल देता है, अकण्डितों को पुनरपि उलूखल में डालकर पुनः उनका कण्डन करके पुनः उन्हें निकालकर शूर्प में डालकर तुषों को ' अपहतम् ' मन्त्र से उत्कर में डाल दे । फिर जल स्पर्श करे । तब शूर्प में स्थित तण्डुलों को पात्री में डालकर ' देवो वः सविता ' मन्त्र से उनका अभिमन्त्रण करता है । अर्थात् तण्डुलों को अनामिका के अग्रभाग से स्पर्श करते हुए या देखते हुए मन्त्र को पढ़ता है ।

पृष्ठ 173

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 173 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६० ] उदकोपस्पर्शः ततः शूर्पस्थान तण्डुलान् पात्र्यां प्रक्षिप्य ' देवो वः सविते'तिमन्त्रेणाभिमन्त्रयति तण्डुलाननामिकाग्रेण स्पृशन् विलोकयन् वा मन्त्रं पठति । ततस्त्रिः फलीकरोति त्रिः कण्डनेन सूक्ष्मकणिकाभ्यो वियोज्योज्वलान्-करोति । पूर्व हविरुलूखलमध्ये न्युप्य कण्डनं निष्कास्य शूर्पेण निष्पूय कणानि दधाति । तथैव पुनर्वास्त्रयमेव-फलीकरणम् । 1 धृष्टिरस्यपाग्नेऽग्निमामादं जहि निष्क्रव्याद 8 सेधा देवयजं वह । I I ध्रुवमसि पृथिवीं दृ ंह ब्रह्मवनि त्वा चत्रवनि सजात वन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय ॥ वा ० सं ० १।१७ ॥ अर्थ - हे उपवेष! तुम प्रगल्भ हो । आमात् ( अपक्व पदार्थ को भक्षण करने वाला लौकिक ), क्रव्याद ( प्रेतमांस को भक्षण करने वाला चिताग्नि ) और तीसरा यज्ञीय अग्नि । इस प्रकार से अग्नि के तीन भाग हैं । हे गार्हपत्य अग्ने! तुम आमात् अग्नि का त्याग करो और क्रव्यात् अग्नि को दूर करो और तीसरे यज्ञिय अग्नि को समीप में ले लो । हे कपाल! तुम स्थिर हो उस कारण पृथ्वी को स्थिर करो । ब्राह्मण, क्षत्रिय और यज्ञमान कुल के लोग पुरोडाश की निष्पत्ति के लिये जिसका स्वीकार करते हैं, ऐसे हे कपाल! तुम्हें मैं अङ्गारों पर रखता हूँ । उससे मेरे शत्रुओं का वध हो ॥ १७ ॥

१ – ( वा ० सं ० १।१७ ) ' धृष्टिरसीत्युपवेषमापाय ' ( का ० श्रौ ० सू ० २।४।२५ ) अपाग्न इत्यङ्गारान् प्राचः करोति । पलाशशाखाया मूलदेशे छिन्नः काष्ठभागोऽङ्गारापोहनसमर्थो हस्ताकृतिकाष्ठ उपवेषः । मूलतः शाखां परिवास्योपवेषं करोतीत्यापस्तम्ब: । ' धृष्टिरसी'ति मन्त्रेणाग्नीदङ्गारान् खरस्य पूर्वभागे अपाग्न इति प्रेरयेत् गार्हपत्य-खरस्थाने खरस्यापरार्धे कपालोपधानविधानात् । हे उपवेष त्वं धृष्टिरसि प्रगल्भोऽसि ( त्रिवृषा प्रागल्भ्ये ) तत्रापाग्न इत्यङ्गारान् प्राचः करोति । तत्र त्रयोऽग्नयो भवन्ति । प्रथम आमात् आममपक्वमत्तीत्यामाल्लोकिकोऽग्निः, द्वितीयः क्रव्याद् शवदाहे क्रव्यं मांसमत्तीति क्रव्यात् चिताग्निः तृतीयो यागयोग्यः । तथाविधांस्त्रीनङ्गारान् गार्हपत्यात्प्राग्भागे पृथक् कृत्य तेषां मध्ये यागयोग्प्रताहीनौ द्वावग्नी आमात् क्रव्यात्सज्ञौ वारयितुं गार्हपत्यं प्रत्युच्यते – हे गार्हपत्य उसके बाद तीन बार फलीकरण करता है । अर्थात् तीन बार कण्डन करके सूक्ष्म कणिकाओं से अलग करके उन्हें उज्ज्वल करता है । हवि को उलूखल में डालकर कण्डन करके उसे निकाल कर शूर्प से फटक कर कणों को अलग करता है, तथैव पुनः दो बार करने को त्रिःफलीकरण कहते हैं । १ – कात्यायन श्रौतसूत्र कहता है कि ' अपाग्न ' मन्त्र से अङ्गारों को पूर्व की ओर कर ले । पलाश की शाखा का उसके मूल भाग से काटा गया काष्ठ भाग, जो अङ्गारों को सरकाने में समर्थ हाथ के आकार का होता है, उसे ' उपवेष ' कहते हैं । ' मूलतः शाखाम्परिवास्य उपवेषं करोति ' - ऐसा आपस्तम्ब ने भी कहा है । ' वृष्टिरसि ' मन्त्र से उपवेष को लेकर अग्नीत् अङ्गारों को खर के पूर्व भाग में ' अपाग्न ' मन्त्र से सरकावे । क्योंकि गार्हपत्य खर स्थान में खर के पश्चिम भाग में कपालों के उपधान का विधान किया गया है । हे उपवेष! तुम धृष्टि यानी प्रगल्भ हो, अर्थात्

पृष्ठ 174

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 174 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६१ ] अग्ने आमदमग्निमपजहि परित्यज तथा क्रव्यादमग्न निःषेध निःशेषेण दूरं गमय आदेवयजमित्यङ्गारान् आहृत्य कपालेनाच्छादयति ध्रुवमसीति ( का ० श्र ० सू ० २।४।२६ ) आदेवयजमिति मन्त्रेण पूर्वस्यां दिशि अपोढानामङ्गाराणां मध्ये एकमङ्गारमुपवेषेण पुरोडाशश्रपणस्थाने आनीय स्थापयित्वा ' ध्रुवमसी ' तिमन्त्रेण तस्याङ्गारस्योपरि एकं कपालं स्थापयेदग्नीन् । २ - मन्त्रार्थस्तु - हे गार्हपत्य देवयजं देवा इज्यन्तेऽस्मिन्निति देवयाट् तं देवयजं देवानां यजनयोग्यमग्नि तृतीयमङ्गारमावह समीपमानय । प्राग्भागे त्रीनङ्गारात् पृथक्कृत्य मध्ये यागयोग्यताहीनौ आमात्क्रव्यात्संज्ञौ द्वावग्नी वारयितुं गार्हपत्यं प्रत्येवमुक्ति: । ' व्यवहिताश्चे ( पा ० सू ० १ ४ ८२ ) ति क्रियापदोपसर्गयोर्व्यवधानम् । तस्मात् अहि निषेध | सोपसर्गयोर्जहति सेधत्योर्निषेधार्थकत्वम् देवा इज्यन्तेऽस्मिन्निति देवयाट् तं कपालेनाच्छादयति--' त्रिभिः कपालैस्त्रींल्लोकान् यजमानो जयति चतुर्थेन दिशो यश्चैषु संस्क्रियते पुरोडाशः सोऽयाधारवशात् त्रिलोक-विग्रहो भूत्वा देवताः प्रीणाति यदु वा आत्मसमितमन्न तदवति तन्नहिनस्ति इति श्रुतेः इत्युव्वाचार्यः । हे कपाल त्वं ध्रुवमसि स्थिरं भवसि । अङ्गारोपरि वर्तमानमपि इतस्ततो न पतसि । पृथिवीं भूमिं दृ १७ ° ह दृढीकुरु । पुरोडाश-पाकवेलायां त्वया व्यवधाने सति भूमेरत्यन्तदाहकृतम् शैथिल्यं न भविष्यति । किञ्च ब्रह्मवनित्वादिविशिष्टैस्त्वा-पदधामि देवयागहेतावङ्गारे स्थापयामि किमर्थं द्विषतो भ्रातृव्यस्य यागविघातरूपं द्वेषं कुर्वतोऽसुरस्य पाप्मनो वा बधाय हिंसार्थम् । ' व्यन् सपत्ने ' ( पा ० सू ० ४ | १ | १४५ ) इत्याद्युदात्तत्वात् भ्रातृव्यशब्दः शत्रुवाची । कथं भूतं त्वां ब्रह्म ब्रह्मणा ब्राह्मणेन वन्यते पुरोडाशनिष्पत्त्यर्थं सम्यक् स्वीक्रियते ( वनषण संभक्तौ ) इति ब्रह्मवनि:, तथा क्षत्रवनिः क्षत्रेण वन्यते इति क्षत्रवनिः, सजातवनिः समानकुले जाता यजमानस्य ज्ञातयः सजातास्तैर्वन्यत इति सजात-तीव्र अङ्गारों को इधर - उधर सरकाने में तुम समर्थ हो । तीन प्रकार के अग्नि होते हैं । पहिला ' आमात् ' नाम का अग्नि है । ' आमम् अपक्वम् अस्ति इति आमात् ' यह उसकी निरुक्ति है । इस ' आमात् ' अग्नि को लौकिकाग्नि कहते हैं । दूसरा ' क्रव्याद् ' नाम का अग्नि है । शवदाहे क्रव्यं मांसम् अत्तीति क्रव्यात् ' यह उसकी निरुक्ति है । इस ' क्रव्यात् ' अग्नि को चिताग्नि कहते हैं । तीसरा अग्नि, याग के योग्य होता है । ' देवा: इज्यन्ते अस्मिन् असौ देवयाट्, तं देवयजम् ' इस fro क्ति से यह तृतीय अग्नि ' देवयाट् ' नाम का है । इस प्रकार के तीनों अङ्गारों को गार्हपत्य के पूर्व भाग में पृथक् करके उनमें से यागयोग्यता से रहित दो अग्नि हैं, उन्हें कोई ' अमात् ' ' क्रव्यात् संज्ञक न समझ ले, इसलिये गार्हपत्य प्रति कहा जा रहा है कि हे गार्हपत्य! अग्ने! ' आमाद् ' अग्नि का परित्याग कर दो, तथा ' क्रव्याद् ' अग्नि को सम्पूर्णतया दूर कर दो । ' आदेवयजम् ' इस मन्त्र से पूर्व दिशा में सरकाए हुए अङ्गारों में से एक अङ्गार को उपवेष से पुरोडाशश्रयण करने के स्थान में लाकर स्थापन करे और ' ध्रुवमसि ' मन्त्र से उस अङ्गार के ऊपर एक कपाल को अग्नीत् रख दे | २- मन्त्रार्थ इस प्रकार है - हे गार्हपत्य! देवयज के योग्य तृतीय अङ्गार ( अग्नि ) को समीप में ले आओ । उस देवय'ट् अग्नि को कपाल से आच्छादित किया जाता है । हे कपाल! तुम स्थिर रहते हो । अर्थात् अङ्गार के ऊपर रहते हुए भी इधर - उधर गिरते नहीं हो । पुरोडाश को परिपक्व करते समय तुम्हारे द्वारा व्यवधान किये जाने भूमि में अत्यन्त दाहकृत शिथिलता नहीं हो पाती । किञ्च ब्रह्मवनित्वादि विशिष्ट गुणों से युक्त होने के कारण देवयाग हेतुभूत अङ्गार पर तुम्हारी स्थापना कर रहा हूँ । जिससे तुम, याग विधात रूप द्वेष रखने वाले शत्रुभूत पापी असुर का विनाश कर पाओ । मन्त्र प्रयुक्त भातृव्य ' शब्द का अर्थ ' शत्रु ' है । क्योंकि ' व्यन् सपत्ने ' इस पाणिनि सूत्र से आद्युदात्त होने से भ्रातृव्य शब्द, शत्रुवाचक होता है । ब्रह्मवनि आदि शब्दों की निक्ति इस प्रकार है - ' ब्रह्मणा ब्राह्मणेन वन्यते पुरोडाशनिष्पत्त्यर्थं सम्यक् स्वीक्रियते इति ब्रह्मवनिः ' । वन षण संभक्तौ धातु से ' वनिः ' की निष्पत्ति होती है | तथा ' क्षत्रेण वन्यते इति क्षत्रवनिः ' और ' सजातवनि: ' अर्थात् समान कुले जाता यजमानस्य ज्ञातय: सजाता: तैर्वन्यते इति सजातवनिः । हे कपाल! उपर्युक्त गुणों से विशिष्ट रहने वाले तुम्हारा मैं उपधान कर रहा हूँ । अथवा

पृष्ठ 175

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 175 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६२ ] वनि:, तम् । हे कपाल इत्थंभूतं त्वामहमुपदधामि । ब्रह्म एव वा यद्वनोति संभजते तत्कपालं ब्रह्मवनि । एवं क्षत्रवनि सजातवन्यपि । ३ - दयानन्दस्वामिरीत्या तु- हे अग्ने परमेश्वर त्वं धृष्टिरसि अतो निष्क्रव्यादमामादं देवयजमग्नि सेध | एवं मङ्गलाय शास्त्राणि शिक्षयित्वा दुःखमपजहि सुखं चावह । हे परमेश्वर त्वं ध्रुवमसि अतः पृथिवीं दृ १७ ह । त्वं ध्रुवमसि । हे अग्नेयत ईदृशो भवान् तस्मादह भ्रातृव्यस्य वधाय ब्रह्मवनि क्षत्रवनि सजातवनि त्वामुपदधामि । अन्वयान्तरश्च हे यजमान हे विद्वन् यतोऽयमग्नि धृष्टिरस्यस्ति तथा चामान्निष्क्रव्यात् देवयजं यज्ञमावहति तस्मात्त्व-मिममामादं निष्क्रव्याद् देवयजमानि मावह । अन्येभ्यस्तमेवं सेध शिक्षय तदनुष्ठानेन दोषानपजहि । यतोऽयमग्निः सूर्यरूपेण ध्रुवं ध्रुवोऽस्यस्ति तस्मादयमाकर्षणेन पृथिवीं दृ १७ ह धरति । कस्मात् त्वं तमहं ब्रह्मवनि क्षत्रवनि सजात-वनिं भ्रातृव्यस्य वधायोपदधामि-४ - भावार्थ: - सर्वशक्तिमतेश्वरेण यतोऽयमामात् दाहकस्वभावोग्नी रचितः ततो नायं भस्मादिकं दग्धु समर्थो भवति । येनेमान् पदार्थान् पक्त्वाऽदन्ति स आमात् । येनोदरस्थमन्न पच्यते येन च मनुष्या मृतं देह दहन्ति स क्रव्यात् संज्ञोऽग्निर्येनायं दिव्यगुणप्रापको विद्युदास्यश्च रचितस्तथा येन पृथिवीधारणाकर्षण प्रकाशक: सूर्यो रचितः, यश्च ब्रह्मादिभिर्वेदविद्भिर्ब्राह्मणैः क्षत्रियैः समानजन्मभिर्मनुष्यैश्च वन्यते संसेव्यते तथा यः सर्वेषु जातेषु पदार्थेषु वर्तमानः परमेश्वरो भौतिकोऽग्नि र्वा स एव सर्वेरूपास्यो भौतिकश्च क्रियासिद्ध्यर्थं सेव्यः । ५ - अत्रापि व्यत्ययबाहुल्यम् दोषः । सति सम्भवे यथाश्रुतार्थ ब्याख्यानमेव युक्तम् । अग्निपदस्यापि क्वचि ब्रह्म ही जिसका वनन ( संभजन ) करता है, उस कपाल को ' ब्रह्मवनि ' कहते हैं - ' ब्रह्म एव वा यद्वनोति संभजते तत्कपालं ब्रह्मवनि । इसी प्रकार ' क्षत्रवनि ' और ' सजातवनि ' की निरुक्ति समझनी चाहिये । ३ – किन्तु दयानन्द स्वामी के अनुसार मन्त्र का अर्थ होता है कि हे अग्ने परमेश्वर! तुम धृष्टि हो अतः निष्क्रव्याद् आमाद् देवयज अग्नि को प्राप्त करो । एवं मङ्गल करने के लिये शास्त्रों की शिक्षा देकर दुःख को दूर करो और सुख को दो । हे परमेश्वर! तुम ध्रुव हो । अतः पृथ्वी को दृढ़ करो । हे अग्ने! तुम ध्रुवादि गुणों से विशिष्ट हो, इसलिये मैं भ्रातृव्य के नाशार्थ ब्रह्मवनि - क्षत्रवनि - सजातवनि के रूप में तुम्हारा उपधान करता हूँ । अन्य प्रकार से भी अन्वय प्रदर्शित किया है - हे यजमान! हे विद्वन्! जब कि यह अग्नि ' वृष्टिरसि ' धृष्टि है, तथा आमात् निष्क्रव्यात् होकर भी ' देवयजं ' यज्ञ को सम्पन्न करता है, अत: तुम इस आमाद् निष्क्रव्याद् देवयज अग्नि को सम्पन्न करौ । तथा अन्य लोगों के लिये उसे इस प्रकार बताओ ( इस प्रकार से उसकी शिक्षा दो ) कि उसके अनुष्ठान से दोषों को दूर करो । क्योंकि यह अग्नि सूर्य के रूप में ध्रुवोऽसि ध्रुव है । इसी कारण यह अग्नि, आकर्षण के द्वारा पृथिवी का धारण दृढ़ता से करता है । क्योंकि तुम उसे और मैं ब्रह्मवनि, क्षत्रवनि, सजातवनि को भ्रातृव्य के वधार्थ स्थापन करता हूँ । ४- भावार्थ यह बताया गया है कि सर्वशक्तिमान् ईश्वर के द्वारा इस आमात् दाहक स्वभाव के अग्नि की रचना की गई है, उस कारण यह हम लोगों को दग्ध करने में समर्थ नहीं है, जिससे इन पदार्थों को पकाकर खाते हैं वह आमात् है, और जिससे उदरस्थित अन्न को पकाया जाता है, और जिससे मनुष्य मृत देह को जलाते हैं, वह क्रव्यात् है अग्नि है, जिसने इस दिव्य गुण के प्रापक और विद्युत् संज्ञक अग्नि की रचना की है, तथा जिसने पृथिवी के धारण, आकर्षण, प्रकाशक सूर्य की रचना की है, और जो ब्रह्मादि वेदवेत्ता ब्राह्मणों के क्षत्रियों के समान जन्म वाले मनुष्यों के द्वारा वनन यानी सम्यक् प्रकार से सेवन किया जाता है, तथा जो उत्पन्न हुए सभी पदार्थों में व्याप्त रहने बाला परमेश्वर अथवा भौतिक अग्नि है, उसी की सबको उपासना करनी चाहिये, और भौतिक अग्नि की अपनी क्रिया-सिद्धि के लिये सेवा करनी चाहिये । ५ – यहाँ भी व्यत्ययबाहुल्य का दोष हो गया है । जहाँ तक सम्भव हो यथाश्रुत व्याख्यान करना ही उचित

पृष्ठ 176

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 176 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६३ ] त्परमात्मपरत्वेऽपि सर्वत्र तथाव्याख्यानमनुचितमेव । निष्क्रव्यादमित्यत्र निरूपसर्गो निरर्थक एव । ' व्यवहिताश्च ’ ( पा ० सू ० १ | ४ | ५ ) इति क्रियापदोपसर्गयोर्व्यवधानस्मरणात् । अपेत्यस्य जहीति क्रियापदेन निरित्यस्य सेधेति क्रिया-पदेन सम्बन्धो युक्तः । संस्कृतपदार्थे क्रव्यं पक्वं मांसमतीत्युक्तम् - तच्च व्याख्यातम् आमादितस्य प्रतिद्वन्द्वितया । संस्कृतभाषापदार्थयोरपि येन च मनुष्या मृतं देह दहन्ति सक्रव्यादित्युक्तः । यद्यपि क्रव्यं पक्वं मांसमत्ति तस्मान्निर्गत-मित्युक्तम् तथा तस्य कोवार्थ इति नोक्तम् । क्रव्यादग्नेनिर्गतः कोऽग्निः? आमादं जहि निष्क्रव्यादं सेध शास्त्राणि शिक्षयेति केन किं श्लिष्यते? देवान् विदुषो दिव्यगुणान् वा यजति संगतान् करोति येन यज्ञेन तं देवयजं यज्ञम् आवह प्रापय प्रापयति । प्रथमान्वये तु निष्क्रव्यादमामादं देवयजमग्नि सेधेत्युक्तम् । येन त्रिविधानामग्नीनां शिक्षणं प्रार्थयते इति विज्ञायते तस्य कीदृशी शिक्षा भवतीति नोक्तम् । मङ्गलाय शास्त्राणि शिक्षयित्वा दुःखमपजहि । तत्र मङ्गलाय शास्त्रा-णीति कुतो लब्धमित्यपि नोक्तम् । उपस्थितं कर्म त्यक्त्वा सुखमावहेति कर्मयोजनमपि प्रमाद एव । हे परमेश्वर त्वं ध्रुवसत्यपि चिन्त्यम् । किञ्च वोस्यतः पृथिवीं दृह इत्यनेन कः सम्बन्ध:? अत इत्यनेन हेतुत्वं विज्ञायते प्रकृते तदीयस्य ध्रौव्यस्य पृथिव्या ध्रौव्ये कथञ्चिदुपयोगेऽपि पृथिव्यास्तत्स्थानां मनुष्याणां सुखवर्धने तु कथं तदुपयोग इति विद्वांसो विदाङ्क ुर्वन्तु । ६ - यच्च ध्रुवमित्यस्य निश्चलसुखमसीत्यर्थः कृत इति तत्तु निर्मूलमेव । यत ईदृशो भवांस्तस्मदाह भ्रातृव्यस्य वधाय ब्रह्मवनि क्षत्रवनिमुपदधामि हृदये इदमपि तथाविधमेवासङ्गतम् हेतुहेतुमद्भावानुपपत्तेः । ब्रह्म-ब्राह्मणं विद्वांसं वनतीति व्युत्पत्त्या धात्वर्थानुसारेण ब्राह्मणं भजतीत्येवार्थः । भाषार्थे तु ब्राह्मणादि प्राणिमात्रसुखदात्रि-त्युक्तम् । यः प्राणिमात्रसुखदाता तस्य भ्रातृव्यवधाय हृदय उपधानमपि विरुद्धमेव । ' है । ' निष्क्रव्यादम् ' में ' निर् ' उपसर्ग निरर्थक ही है । ' व्यवहिताश्च ' इस पाणिनि सूत्र ने क्रिया पद और उपसर्ग में व्यवधान बताया है । ' अपेत्य ' का ' जहि ' इस क्रिया पद के साथ ' निर ' का ' सेध ' इस क्रिया पद साथ सम्बन्ध करना उचित है । संस्कृत पदार्थ में ' क्रव्यं पक्वं मांसमत्ति ' कहा है, और उसकी व्याख्या की है ' अमात् ' की प्रतिद्व द्वितया । संस्कृत भाषा और पदार्थ में भी ' जिससे मनुष्य, मृत देह को जलाते हैं, वह क्रव्यात् है ', कहा है । यद्यपि ' क्रव्यं पक्वं मांसम् अत्ति, तस्मात् निर्गतम् ' यह कहा गया है, वैसे ही उसका क्या अर्थ है? यह नहीं बताया है । क्रव्यादग्नि से निर्गत कौन सा अग्नि है? ' आमादं जहि निष्क्रव्यादं सेध, शास्त्राणि शिक्षय ' इनमें किससे क्या सम्बद्ध है अर्थात् किसी का किसी से कोई मेल नहीं है । देवताओं को अथवा दिव्य गुणों से सम्पन्न विद्वानों को ' यजति ' सङ्गत करता है जिस यज्ञ से, उस देवयजम् ' यज्ञ को ' आवह प्रापय प्रापयति ' प्राप्त कराता है । पहिले अन्वय में तो ' निष्क्र-व्यादमामादं देवयजमग्नि सेध ' कहा है । जिससे त्रिविध अग्नियों के शिक्षण की प्रार्थना की गई है. यह ज्ञात हो रहा है, किन्तु उसकी कैसी शिक्षा है, यह नहीं बताया । ' मङ्गलाय शास्त्राणि शिक्षयित्वा दुःखमपजहि ' यह जो कहा, उस में ' मङ्गलाय शास्त्राणि ' यह अर्थ कहाँ से लब्ध हुआ, इसे नहीं बताया । उपस्थित कर्म का परित्याग कर ' सुखमावह ' इस प्रकार कर्म की योजना करना भी नितान्त प्रामादिक ही है । ' हे परमेश्वर! तुम ध्रुव हो ' - यह कथन भी विन्त्य है । कि ' ध्रुवोऽसि अतः पृथिवीं दृह ' इससे क्या सम्बन्ध है? अतः कहने से हेतुत्व ज्ञात होता हैं । प्रकृत में उसकी ध्रुवता का पृथिवी की ध्रुवता में कथञ्चित् उपयोग हो सकने पर भी पृथिवी और उस पर रहने वाले मनुष्यों के सुखवर्धन में उसका कैसे उपयोग हो सकता है? इस पर विद्वान् लोग स्वयं विचार करें । ६ --- और जो ' ध्र ुवम् ' का ' निश्चल सुखमसि ' अर्थ किया है, वह तो निर्मूल ही है । क्योंकि ' ऐसे आप हैं, इसलिये मैं भ्रतृभ्य के वधार्थं ब्रह्मवनि, क्षत्रवनि का हृदय में उपधान करता हूँ ' यह कहना भी उसी तरह असङ्गत है, क्योंकि हेतुहेतुमद्भाव नहीं बन पा रहा है । ' ब्रह्म ब्राह्मणं वनति ' इस व्युत्पत्ति से धात्वर्थ के अनुसार ' ब्रह्मणं भजति ' यही अर्थ होता है । किन्तु भाषार्थ करते समय ' ब्राह्मणादि प्राणिमात्र के सुखदाता ' कह दिया है । जो प्राणिमात्र को सुख देने वाला है, उसका मैं हृदय में उपधान करू ' यह कहना भी विरुद्ध हो है ।

पृष्ठ 177

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 177 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६४ ] ७- द्वितीयेऽर्थेऽपि यतः सोऽग्नि धृष्टिरस्ति तथा चामान्निष्क्रव्याद् देवयजं यज्ञमावहति तस्मात्त्वमिममामादं निष्क्रव्यादं देवयजमावह, अन्येभ्यस्तमेवं सेध शिक्षय तदनुष्ठानेन दोषमपजहि एतावतेदं ज्ञायते यदामाद् - निष्क्रव्याद् चिदस्ति स देवयजं यज्ञमावहति त्वं तमावह । अत्र तु देवयजं यज्ञमिति पदद्वयमपि तद्विशेषणत्वेनैवोरीकृतम् अनुष्ठानं कस्य भविष्यति? यज्ञस्यामादो वा? यज्ञस्यैव चेत् कथमावहतीत्यनेन तत्सम्बन्ध:? यतोऽयमग्निः सूर्यरूपेण ध्रुवोऽस्ति स आकर्षणेन पृथिवीं धरति । ८- भावार्थे तु परमेश्वरेणाग्नीरचित इत्यप्युक्तम् तत्कस्य पदस्यार्थः? आकर्षणमपिकस्य विद्युदाख्योग्निः कस्य पदस्यार्थ इत्यपि दुरधिगम एव । हिन्द्यां तु विद्वन् हे यजमानयतोऽयं भौतिकोऽग्निस्तीक्ष्णमितितथा निकृष्टान् पदार्थान् वर्जयित्वा उत्तमपदार्थैविदुषां दिव्यगुणानां वा प्रापकं यज्ञं प्रापयति तस्मात्त्वं निष्क्रव्याद् दग्धान् भस्मादिपदार्थां स्त्यक्त्वाऽपक्वदाहक विदुषां दिव्यगुणानाश्च प्रापकं प्रत्यक्ष विद्युद्र पमग्निमावह । तथा तज्जिज्ञासुभ्य: शास्त्रीया शिक्षा? सेध शिक्षय । तदनुष्ठानेन दोषमपर्जाह । यतोग्निः सूर्यरूपेण ध्रुवः निश्चलोस्ति अतः स आकर्षणशक्त्या पृथिवीं तत्स्थान् प्राणिनश्च दृहति । अत एवाह ब्रह्म दिजीवमात्रस्य सुखदुःखानां पृथक् पृथक् प्रापकं भौतिकमग्निं भ्रातृव्यस्य दुष्टानां शत्रूणां वा वधाय हवनवेद्यां विमानादि यानेषु वा स्थापयामि इति, - तदपि निर्मूलमेव निकृष्टान् पदार्थान् वर्जयित्वा इति निष्क्रव्याद् पदस्य कथमर्थः? यदि तु तस्मा-निर्गतं निष्क्रव्यादमिति घ्युत्पत्त्या सोऽर्थो लभ्यत इति, तदप्यसङ्गतम् यस्मिन् यस्य सत्त्वं भवेत् तस्मादेव तस्य निर्गमनं भवति यथा तिलात्तैलस्य निर्गमनम् । नहि सिकतायाः सकाशात् तैलनिर्गमनं सम्भवति । क्रव्याद्रूपेऽग्नो यद्यामादग्निस्तिष्ठेत्तत एव तस्मात्तस्य निर्गमनं भवेत् । न च तत्सम्भवति आमाद्र पेग्नावपि न क्रव्यादग्निर्भवति येन ७- द्वितीय अर्थ में भी ' जब कि वह अग्नि ' धृष्टि ' है, तथा च आमाद् निष्क्रव्याद्, देवयज्ञ का रूप धारण करता है, इसलिये तुम इस ' आमाद् ' निष्क्रव्याद् देवयज यज्ञ का वहन करो, अन्यों के लिये तुम ऐसी शिक्षा दो, उसके अनुष्ठान से दोष को दूर करो । यह कहने से प्रतीत होता है कि निष्क्रव्याद् कोई है, वह यज्ञ का वहन करता है, उसे तुम वहन करो । यहाँ तो ' देवयजम् ' और ' यज्ञम् ' दोनों ही पदों को विशेषण रूप में माना है, तब अनुष्ठान किसका होगा? यज्ञ का या आमाद् का? यज्ञ का ही अनुष्ठान यदि होगा तो ' आवहति ' के साथ उसका सम्बन्ध कैसे होगा? क्योंकि यह अग्नि, सूर्य के रूप में ध्रुव है, वही आकर्षण के द्वारा पृथिवी पर भी है । ८ - भावार्थ में कहा गया है कि परमेश्वर ने अग्नि की रचना की है, किन्तु यह किस पद का अर्थ है? आकर्षण भी किसका? ' विद्युत् नाम का अग्नि ', यह किस पद का अर्थ है? हिन्दी अर्थ करते समय कह दिया है कि हे विद्वन्! हे यजमान! जब कि यह भौतिक अग्नि, तीक्ष्ण समझकर उन तीक्ष्ण निष्कृष्ट पदार्थों को छोड़कर उत्तम पदार्थों से विद्वानों के अथवा दिव्य गुणों के प्रापक यज्ञ के प्रति पहुँचाता है इसलिये तुम निष्क्रव्यादं ' दग्ध हुए मत्स्यादि पदार्थों को त्यागकर अपक्व पदार्थ के दाहक और दिव्य गुण सम्पन्न विद्वानों के प्रापक प्रत्यक्ष विद्युद्रूप अग्नि को वहन करो । तथा उसे जानने की इच्छा रखने वालों के लिये शास्त्रीय शिक्षा का शिक्षण दो । इस प्रकार अनुष्ठान कर दोष को दूर करो । क्योंकि अग्नि, सूर्य के रूप में ' ध्रुव ' निश्चल है । अत: वह आकर्षण शक्ति से पृथिवी को और उस पर रहने वाले प्राणियों को दृढ़ करता है । अतएव मैं ब्रह्मादि जीव मात्र के सुख - दुखों को पृथक् पृथक् प्राप्त कराने वाले भौतिक अग्नि की स्थापना भ्रातृव्य के अर्थात् दुष्टों अथवा शत्रुओं के वधार्थ हवन की वेदी में अथवा विमानादि यानों में स्थापना करता हूँ । " -- यह कथन भी निर्मूल है । क्योंकि ' निकृष्टान् पदार्थान् वर्जयित्वा ' यह अर्थ ' निष्क्रव्याद् ' पद का कैसे होगा? यदि ' तस्मान्निर्गतं निष्क्रव्यादम् ' इस व्युत्पत्ति से वैसा अर्थ करते हो, तो वह भी सङ्गत नहीं होगा । क्योंकि जिसमें जिसकी सत्ता ( सत्त्व ) हो, उसी से उसका निर्गमन हो सकता है । जैसे तिलों से तैल का निर्गमन होता है । सिकता ( वालु - रेत ) से तैल का निर्गमन कदापि नहीं होता है । क्रव्याद् रूप अग्नि में यदि आमाद् अग्नि, स्थिर रहे तो

पृष्ठ 178

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 178 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६५ ] तस्मात्तस्य निर्गमनं सिद्धयेत । न च यथा नीरूपो वायुर्भवति न च तत्र रूपं भवति कथं तहि निर्गतं रूपं यस्मात्स नीरूपो वायुरुच्यते तथैव च निर्गता गुणा यस्मात् स निर्गुण इति वाच्यम् तत्र तु निरस्तं बाधितं रूपं यस्मात् स वायुर्नीरूपः, नित्यनिरस्ता बाधिता गुणा यस्यात्स निर्गुण इति व्युत्पत्तेरभ्युपगमात् । १० – सिद्धान्ते तु वायोस्तेजस उत्पत्ते रूपस्यापि तत उद्गमः सम्भवत्येव । सर्वकारणात् परमेश्वरात् गुणा-नामप्युद्भवात् भवत्येव निर्गुणत्वोपपत्तिः, न तथा प्रकृते आमाद्यग्नौ क्रव्यादः सम्भवति येन ततः स निर्गच्छेत् ताव-तापि आमादग्निरन्नादिपाचक एव भवति, विद्युदाख्यः कथं तेन ग्रहीतुं शक्यः? शक्तिमता परमेश्वरेण भौतिकोग्नि-निर्मितः । स चादग्धं दहति । नैतावदेव किन्तु दाह्यमेव दहति नादाह्यमात्मानम्, वाय्वाकाशादिकमपि न दहति तदपि वक्तव्यम् । बाह्यः कोष्ठ्य च दहति मांसञ्चास्ति तेनैव दिव्यगुणप्रकाशिका विद्युद्युत्पद्यते तेनैव पृथिवीधारकः सूर्यो निर्मितः । या वेदविद्भिर्ब्राह्मणैः धनुर्वेदविद्भिश्च क्षत्रियैस्तथा प्राणिमात्रेण सेव्यते तथा यः सर्वव्यापकः स एव सर्वो-पास्य:, यश्च क्रियासिद्धयर्थं भौतिकोग्निर्यथा योग्यं सेव्यः यद्यपि न भौतिकोग्निः सूर्यादिकमुत्पादयति, कथञ्चित्तदभ्यु-पगमेऽपि न प्रकृतमन्त्रेण तादृशोऽर्थो बोध्यते पदानां वाक्यानाञ्च तद्विपरीतार्थावबोधकत्वात् । ११ - वस्तुतस्तु श्रुतिसूत्रपारम्पर्यशून्यत्वादेव वेदनाम्ना निरर्थकमितस्ततो बुद्धिभ्रमणमिति नास्ति तिरोहितं विदुषाम् । शतपथव्याख्यानमत्रापि चर्चितं तेनेति शतपथव्याख्यानमपि उपस्थाप्यते । १२ – स वै कपालान्येवान्यतर उपदधाति । दृषदुपलेऽन्यतरद्वा । एतदुभयं सहक्रियते । तद्यदेतदुभयं उसी से उसका निर्गमन सम्भव हो सकेगा । किन्तु वह कभी सम्भव नहीं है । आमाद् अग्नि में ' क्रव्याद् ' नाम का अन नहीं रहता है, जिससे उसका निर्गमन उससे सम्भव हो सके । यदि यह शङ्का करो कि जैसे ' वायु ' नीरूप होता है, क्योंकि उसमें रूप का होना सम्भव ही नहीं है, तब ' निर्गतं रूपं यस्मात् स नीरूपौ वायुः ' यह कैसे कहा जाता है? उसी तरह ' निता गुणा यस्मात् स निर्गुणः ' यह कह सकते है । किन्तु ऐसी शङ्का करना उचित नहीं है । वहाँ तो ' नित्य निरस्त ( बाधित ) है रूप जिससे, वह वायु ' नीरूप ' कहा गया है । उसी तरह नित्य निरस्त ( बाधित ) हैं गुण, जिससे उसे निगुण कहा गया है । नीरूप वायु और निर्गुण की यही व्युत्पत्ति की जाती है, यही सबको मान्य है । १० - सिद्धान्त में तो वायु से तेज की उत्पत्ति होने के कारण ' रूप ' की भी उससे उत्पत्ति का होना सम्भव हो ही सकता है । सर्वकारणभूत परमेश्वर से गुणों का भी उद्भव होने से ' निर्गुणत्व ' की उपपत्ति हो ही जाती है । उस प्रकृत आदि अग्नि में क्रव्याद को सम्भावना नहीं है, जिससे उससे वह निर्मित हो सके । तावतापि आमाद् अग्नि अन्न आदि का पाचक ही होता है, उससे विद्युत्संज्ञक अग्नि का ग्रहण करना कैसे शवक्य हो सकता है? शक्तिमान् परमेश्वर ने भौतिक अग्नि का निर्माण किया है । वह अग्नि, अदग्ध का दहन करता है । इतना ही नहीं है, अपितु वह दाह्य ( जलाने के योग्य पदार्थ ) को ही जलाता है । वह अदाह्य आत्मा को नहीं जलाता है । वह वायु आकाश आदि को भी नहीं जलाता है । उसे भी बताना चाहिये था । बाह्य कौष्ठ्य को जलाता है और मांस को खाता है, उसी से दिव्य गुण की प्रकाशिका विद्युत् उत्पन्न होती है, उसी ने पृथिवी के धारक सूर्य का निर्माण किया है | वेदविद् क्षत्रियों का तथा समस्त प्राणिमात्र का वही सेवनीय है । तथा जो सर्वव्यापक है, वही सबका उपास्य है, क्रिया सिद्धयर्थं जो भौतिक अग्नि है वह यथायोग्य सेव्य है, यद्यपि भौतिक अग्नि, सूर्य आदि का उत्पादक नहीं है । यथा कथञ्चित् उसे वैसा मान भी लें तो भी प्रकृत मन्त्र से वैसा अर्थ अवगत नहीं हो रहा है, क्योंकि प्रकृत मन्त्र के पद और वाक्यों से तद्विपरीत अर्थ का बोधन होता है । ११ - वस्तुतस्तु श्रुति सूत्र की परम्परा का ज्ञान न होने से ही वेद के नाम पर निरर्थक प्रलाप करके जनता की बुद्धि में भ्रम पैदा कर दिया गया है, इसे विद्वान् लोग अच्छी तरह से जान चुके हैं । यहाँ शतपथ व्याख्या की भी उन्होंने चर्चा की है, जो प्रलाप मात्र है I । तदर्थ हम शतपथ व्याख्या को भी उपस्थित कर दे रहे हैं । १२ – “ सवैकपालान्येवान्यतर उपदधाति... " " सहक्रियते । " ( श ० १ ० १ १ २ १ - २ ) इस शतपथ

पृष्ठ 179

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 179 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६६ ] शिरोहवा एतद्यज्ञस्य यत्पुरोडाशः स चान्येवेमानि शीर्ष्णः कपालानि एतन्येवास्य कपालानि मस्तिष्क एव पिष्टानि तद्वा एतदेकमङ्गमेक 25 संह करवावेति तस्माद्वा एतदुभयं सहक्रियते । ' ( श ० १।१।२1१-२ ) १३ - अत्र कपालोपधानपेषणयोर्युगपदनुष्ठानं विधत्ते श्रुतिः । तथैव कात्यायनोऽपि ( का ० श्र ० सू ० २।१०८ ) अन्यतरः ऋत्विजां मध्ये एकः आग्नीध्रः स कपालानामुपधाता अन्यतर: अध्वर्युः सपेषणार्थं दृषदुपले उपदध्यात् । उक्त तद्वा एतदुभयं सहक्रियते । एककर्तृकत्वे तु पर्यायेणैवानुष्ठानं स्यान्न सहानुष्ठानम् । एतच्चोभयं सहानु-म् अतो विभिन्नावेव कर्तारौयुगपत्कुर्यातामित्यर्थः । सहानुष्ठानमुपपादयितुमनुवदति तद्यदिति - शिरोह वा एतद्यज्ञस्य यत्पुरोडाशः । पुरोडाशस्य यज्ञाशिरस्त्वमुक्तं तदुपपादयति स दान्येवेमानि मस्तिष्कः एव शिरः । कपालान्तर्गतं मांसं मस्तिष्कः । तद्वा एतत्कपालं मस्तिष्करूपं मिलितं सच्छिरः संज्ञकमेकमङ्ग प्रसिद्धं लोके । तथात्रापि । शिरः कपालमस्ति कपाल पिष्टयोः सहप्रयोगात् पुरोडाशात्मकस्य यज्ञशिरस एकीकरणं सेत्स्यति । १४ - स य: कपालान्युपदधाति स उपवेषमादत्ते वृष्टिरसीति स यदेनेनाग्निवृष्ण्वेवोपचारति तेन धृष्टिरथ यदेनेन यज्ञ उपालभते उपेव वा एनेनैत द्ववेष्टि तस्मादुपवेषोनाम ' ( श ० १ | १२ | ३ ) कपालान्युपदधतः कृत्यमाह— उपवेषमाह धृष्टिरसीति । अङ्गारविभजनार्थं काष्ठमुपवेषः । धृष्टिशब्दार्थं निर्वक्ति धृण्वे वेति इति । क्रियाविशेषण-मेतत् । अनेधृष्णु यथास्यात्तथा अग्निना व्यवहरतीत्यर्थः । ( त्रिधृषा प्रागल्भ्ये ) स्वा ० ( ३३ ) इत्यस्मात् धृष्णोत्यनेनेति धृष्टिः करणे क्तिनि सिद्धयति । अत एतदुपवेषस्य संज्ञान्तरम् । तथा चान्यत्र श्रूयते धृष्टिरुपवेष इति । १५ – अथेत्यादिनोपवेषस्य निर्वचनम् । अथ यज्ञे एतेन काष्ठेन यदङ्गारादिकमुपालभते प्राप्नोति तत् एतत् वेषेण वेवेष्टी ( विष्लृ व्याप्ती ) इत्यस्मात् करणसाधनो घञन्त उपवेषशब्दः । सर्वथापि सिद्धान्तानुसारि-व्याख्यानमेव पोषयति श्रुतिः । तेन प्राचोऽङ्गारानुदति । अग्निमामादं जहि निष्क्रव्याद २७ ' से घेत्ययं वा आमाद्येनेदं मनुष्या पक्त्वा अश्नन्ति । येन पुरुषं दहन्ति स क्रव्यादेतां वेवैतदुभावतोपहन्ति ' ( ० १ १ २ ४ ) अग्निगताशुद्धय शस्य ' निरसनं विधत्ते श्रुतिः तेन प्राचोऽङ्गारानुगृहति । तेनोपवेषेण प्राचस्त्रीन् प्राग्दिग्गतानुगृहति । मन्त्रगतयोरामात्क्रव्यात्-शब्दयोविवक्षितार्थमाह - आममपक्वमत्तीत्यामात् मनुष्याणामोदनादिपाक हेतु रग्निरामादुच्यते । क्रव्यं पललमत्तीति क्रव्यात् शवदहनोग्निः । तावेतामामात्क्रव्यादौ एतेनापहन्ति आमादमपजहि क्रव्याद निःसेधेति मन्त्रवाक्यद्वयेन निरस्यतीत्यर्थः । के द्वारा भगवती श्रुति ने कपा लोपधान और पेषण का युगपदनुष्ठान का विधान किया है । उसी तरह कात्यायन ने भी बताया है । पुरोडाश को यज्ञ का शिर बताया है । कपाल और पिष्ट का सहप्रयोग करने से पुरोडाशात्मक यज्ञ शिर का एकीकरण सिद्ध होगा । १३ – जो कपालों का उपधान करता है, वही ' धृष्टिर सि ' मन्त्र से ' उपवेष ' का ग्रहण करता है । अङ्गार विभजन जिस काष्ठ से किया जाता है, उसे ' उपवेष कहते हैं । ' त्रिधृषा प्रागल्भ्ये ' धातु से धृष्णोति अनेनेति घृष्टि: ' इस कारण व्युत्पत्ति आधार पर करण अर्थ में ' क्तिन् ' प्रत्यय लगाकर ' धृष्टि ' शब्द निष्पन्न होता है । अतः ' धृष्टि ' शब्द ' उपवेष ' का ही नामान्तर है । ' उपवेषेण वेवेष्टि इत्युपवेष: ' इस व्युत्पत्ति के आधार पर ' विष्व्याप्तौ ' धातु से करण साधन घञन्त ' उपवेष ' शब्द निष्पन्न होता है । १४ - सर्वथापि सिद्धान्तानुसारी व्याख्यान का ही समर्थन श्रुति करती है । उसने अग्निगत अशुद्धि रूप अंश के निरसन का विधान किया है । मन्त्रगत ' आमात् ' ' क्रव्यात् ' शब्दों के विवक्षित अर्थों को बताया है । अपक्व को खाने वाले अग्नि को आमात् अर्थात् मनुष्यों के भक्षण किये हुए ओदनादि पदार्थों का पाक करने वाला अग्नि आमात् ' शब्द से कहा जाता है । और ' क्रव्यं पललम् अत्ति इति क्रव्यात् ' अर्थात् शव को जलाने वाले अग्नि को ' क्रव्यात् ' कहते हैं । दो मन्त्रों से आमात् और क्रव्यात् नामक अग्नियों का निरसन बताया गया है ।

पृष्ठ 180

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 180 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६७ ] १५-- अथाङ्गारमास्कौति आदेव यजं वहेति यो देवयाट् तस्मिन् हविषि श्रपयाम तस्मिन् यज्ञं तनवामहा इति तस्माद्वा आस्कौति ' ( श ०१।१।२५ ) एवमयज्ञियमग्नि मन्त्रेण निर्हृत्य शुद्धादग्नेः पुरोडाशश्रपणार्थमङ्गाराहरणं विधत्ते श्रुतिः । आस्कौति विभजतीत्यर्थः । ( स्कुञ् आप्रवणे क्रयादिः, धातु ३६ ) इत्थं कुर्वतामभिप्रायमाह यज्ञं देवान् तन-जतीति देवयाट् योग्निः तस्मिन् हवि २७ ° षि श्रपयामः हविः श्रपणादिकं करवामहै इत्यनेनाभिप्रायेण तस्मिन् वामहै तस्मात्कारणात् देवयजमग्निमास्कौति । एतदेव सायणादिभिः स्पष्टीकृतं निःषेधे स्वस्वभाष्येषु ' ति मन्त्राभ्यां । निरस्य त्रीनङ्गारानुपवेषेण ' देवयजमा-प्राग्गतान् पृथक्करोति । तेषां मध्ये द्वावामात्क्रव्यात्संज्ञो । ' आमादं जहि क्रव्यादं वहे ' ति मन्त्रेण यज्ञियमग्नि हविः श्रपणार्थ मास्कौति आहरति । १६ – तं मध्यमेन कपालेनाभ्युपदधाति । देवा हवे यज्ञं तन्वानास्ते असुरराक्षसेभ्यः आसङ्गाद्विभयाचक्रुः । नेन्नोऽधस्तान्नाष्ट्राः रक्षा २७ स्युपोत्तिष्ठानीत्यग्निहि रक्षसामुपहन्ता तस्मादेवमुपदधाति । तद्यदेष एव भवति नान्य विधत्ते एष हि यजुष्कृतो मेध्यस्तस्मान्मध्यमेन कपालेनोपदधाति ' ( श ० १।१।२६ ) तस्मिन्नङ्गारे मध्यमकपालस्योपधानं श्रुतिः अङ्गारस्योपरि विहितं कपालोपधानं प्रशंसति - यज्ञं तन्वाना देवा असुरराक्षसासङ्गाद् भीता जाता: । नोऽस्माकं कपालोपधानं कृतवन्तः । एवं कृ हविषो भागेन राक्षसादय उपतिष्ठेयुरित्यनेनाभिप्रायेणाङ्गारस्योपरि सत्युक्तभयनिवृत्तिमाह - यतोग्नी रक्षसामपहन्ता किश्व ' आदेव यजमाहेति यजुर्मन्त्रेण मेध्यः कृतोऽयमग्निरत प्रशस्यो उक्तमन्त्रेण स्थापितस्यैवाङ्गारस्योपरि कपालोपधानं प्रशंसति । यजुषा यन्त्रेण संस्कृतत्वादेष एव हि कपालोपधाने नान्य इति । १७ - स उपदधाति ध्रुवमसि पृथिवीं दृ १७ हेति । पृथिम्या एव रूपेणैतदेव दृ हत्येतेनैव द्विषन्तं भ्रातृव्यमवबाधते ब्रह्मवनित्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधायेति बह्वीर्वै यजुःष्वाशीस्तद्ब्रह्म च क्षत्रं चाशास्त उभेवीर्ये ' सजातवनीति भूमा वै सजातास्तद् भूमानमाशास्त उपदधामि भ्रातृव्यस्य वधायेति यदि नाभिचरद्यद्युअभिचरेदमुष्य । वधायेति ब्रूयादभिनिहितमेव सव्यस्य पाणेरङ्ग ुल्या भवति । अग्रे विहितमुपधानमनूद्य मन्त्रं विधत्ते ' स उपदधातीति कुर्वन्तं पृथिवीं दृ ७ हे ' ति पृथिवीसम्बन्धश्रवणात् तत्सम्बन्धिरूपेणेव कपालं दृढं करोति । दृढेन चैतेन कपालेन विद्वेषणं शत्रु बाधते । १८- - एतन्मन्त्रशेषमनूद्य व्याचष्टे बाह्मवनीति । यजुःषु बहुविधा खलु आशीः फलप्रार्थना भवति च अतो क्षत्रं चाशास्ते बहुविधं ब्राह्मक्षत्रादिसंभजनमनेन प्रतिपाद्य मन्त्रगत ब्रह्मक्षत्रशब्दयोर्लक्षणया तद्वीर्यवत्त्वं विवक्षित्वा व्याचष्टे -ब्रह्म अथात उभेवीर्ये आशास्ते ब्रह्म वीर्यं क्षत्रवीर्यं चास्मान् सम्भवत्विति प्रार्थयते सजातवनीत्यनेन भूमानमाशास्ते कुतः समानं जायन्ते इति व्युत्पत्त्या सजाता ज्ञातयो भवन्ति । तेषु बहुभावस्य दर्शनात् धर्मिवाचिना सजातशब्देन तद्धर्मो विवक्षितः । अभिचरतो विशेषं वक्तु नित्यपक्षमनुवदति - यद्यु अभिचरेत्तदा भ्रातृव्यस्य वधायेति स्थाने अमुष्य वधायेति षष्ठ्यन्तं शत्रोर्नाम निर्दिश्य ब्रूयात् । उपहितस्य कपालस्योपरि सव्यस्यपाणेरङ्ग ुल्या अभिनिधानं विधत्ते श्रुतिः । १५ – और पुरोडाशश्रपण के लिये शुद्ध अग्नि के आहरण का विधान श्रुति ने किया है । इसी अर्थ को सायणादि आचार्यों ने अपने - अपने भाष्यों में स्पष्टतया बताया है । १६ - उस शुद्ध अग्नि पर मध्यम कपाल के उपधान का विधान श्रुति ने किया है । अङ्गार पर विहित का भय दूर हो गया, क्योंकि हुए कपालोपधान की प्रशंसा की गई है अङ्गार पर कपालोपधान करने से देवताओं अग्नि राक्षसों का अपहन्ता है । किञ्च ' आदेवयजं वह ' इस यजुर्मन्त्र से इस अग्नि को पवित्र किया जाता है, अतः उक्त मन्त्र से स्थापित किये गये अङ्गार पर ही किये गये कपालोपधान की प्रशंसा की गई है । एवञ्च यजुर्मन्त्र से संस्कृत होने के कारण यह ही कपालोपधान में प्रशस्य है, अन्य नहीं ।