वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 181–190

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 181 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६८ ] १६ – हे अग्ने विशिष्टैश्वर्यशालिन् अग्ने वैश्वानर हे परमेश्वर वा त्वं धृष्टिः प्रगल्भोऽसि, अप्रधृष्यस्वभावत्वात् । केनोपनिषद्रीत्याग्निरन्यापेक्षया प्रगल्भोऽपि परमेश्वरापेक्षयां प्रधृष्य एव जातः । तृणदाहेऽप्यसमर्थत्वात् । परमेश्वरस्त्व-ग्रप्यग्निः ' सूर्यस्यापि भवेत्सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः ' ( वा ० रा ० २॥ ) इति बाल्मीकीय रामायणवचनात् स एव सर्वथा धृष्टिः प्रगल्भः । त्वमेव कृपया आमादं लौकिकमग्निमपजहि क्रव्यादं श्मशानाग्निश्च निःषेध निःशेषेण दूरं गमय देवयजञ्चाग्निमावह सर्वेषां त्वदाज्ञावशवर्तित्वात् । तस्मिन्न ेव यज्ञियेऽग्नौ त्वदंशभूतानां देवानां तव च हवींषि श्रपयामः । तत्रैव च त्वदाराधनलक्षणं यज्ञं श्रौतं स्मार्तं च तनवामहै । २० - हे ब्रह्मन् त्वं ध्रुवमसि पृथिवीं दृ २७ ह दृढ़ीकुरु त्वत्कृपयैव पृथिव्या भारापनोदनेन तस्या दृढीभावो भवति । हिरण्यकशिपु रावणादिवधेन भगवतैव रक्षिताऽवतिष्ठते इति पुराणादिषु प्रसिद्धम् । ब्रह्मणा क्षत्रेण च वननीयम् संभजनीयं सजातैस्तज्ज्ञातिभिः सर्वैरभृतपुत्रैर्जीवैश्च वननीयं ब्रह्मवनिक्षत्रवनिसजातवनि त्वा त्वामहम् उप सामीप्येन स्वात्मत्वेन धारयामि निश्चिनोमि किमर्थमित्याह - भ्रातृव्यस्य वधाय कामक्रोधादिवैरिवर्गस्य वधाय समूलोन्मूलनाय स्वात्मानन्दहर्तृत्वेन तस्यैव सर्वापकारकत्वात् । २१ - यद्वा राष्ट्ररक्षणाय राजानं वीरं सेनापति वा आह- प्रतापानल पूर्णतेजस्विन् त्वं धृष्टिः प्रगल्भः शत्रुभिरप्रधृष्योऽसि । आमादमपक्वमेबात्ति अकालेऽपक्वमतरुणं वालमत्ति हन्तीव्यामात् तं क्रूरं शत्रुमपजहि विनाशय । तथा क्रव्यादं हतप्रायं वृद्धं हन्तीति क्रव्यात् तमपि निःशेषेण सेध मृत्युमुखं गमय । हे तेजोनिधान त्वं नैश्चल्येन धैर्येण च ध्रुवमसि । पृथिवीश्व दृ १७ ह दृढ़ीकुरु समृद्धया वर्धय । ब्रह्मवनि ब्रह्मब्राह्मणं वनति संभजते इति ब्रह्मवनि ब्राह्मण संभजन परायणमत एव ब्रह्मवीर्येण संभजनीयं क्षत्रवनि क्षत्रवीर्येण संभजनीयं तथा सजातवनि-• १६ - हे अग्ने! विशिष्ट ऐश्वर्यशालिन्! अग्ने! वैश्वानर अथवा हे परमेश्वर! तुम प्रगल्भ ( धृष्टि ) हो, क्योंकि तुम्हारा स्वभाव अप्रधृष्य है । केनोपनिषद् के अनुसार अन्य की अपेक्षा अग्नि प्रगल्भ रहने पर भी परमेश्वर की अपेक्षा वह प्रधृष्य ही है, क्योकि वह तिनका जलाने में भी असमर्थ है । किन्तु परमेश्वर तो अग्नि का भी अग्नि है । वाल्मीकि रामायण में भी इसी बात को बताया गया है । अतः वह ही सर्वथा प्रगल्भ ( धृष्टि ) है । तुम ही कृपा करके आमाद लौकिक अग्नि का त्याग करो और क्रव्याद जो श्मशानाग्नि है, उसे निःशेषतया दूर कर दो । सभी प्राणी तुम्हारी आज्ञा के वशवर्ती हैं, इसलिये तुम देवयज नामक अग्नि को यहाँ प्राप्त करा दो । उसी यज्ञिय अग्नि में तुम्हारे लिये और तुम्हारे अंशभूत देवताओं के लिये हवियों को हम पका सकें, और उसी अग्नि में त्वदाराधन लक्षण श्रोत- स्मार्त यज्ञ का हम अनुष्ठान कर सकें । २० – हे ब्रह्मन्! तुम ध्रुव हो, पृथिवी को दृढ़ कर दो । तुम्हारी कृपा से ही पृथिवी का भारापनोदन हो हो पाता है । उसी कारण उसका दृढ़ीभाव हो पाता है । हिरण्यकशिपु - रावण आदि महान् दैत्यों का वध करके भगवान् ने ही पृथिवी की रक्षा करके उसे स्थिर किया है, यह सब कथाएँ पुराणों में प्रसिद्ध हैं । ब्रह्म और क्षत्र के द्वारा वननीय अर्थात् सेवनीय, और सजातीय सभी जीवधारी अमृत पुत्रों से सेवनीय होने वाले तुमको मैं अपने आत्मा के रूप में समझता हूँ । जिससे तुम हमारे काम क्रोधादि जो शत्रु वर्ग ( भ्रातृव्य ) हैं, उनको समूल उन्मूलन कर सको, क्योंकि इन शत्रुओं ने हमारे आनन्द को नष्ट कर दिया है, इसलिये ये काम क्रोधादि ही हम सभी के महान् अपकारकर्ता शत्रु हैं । २१- अथवा राष्ट्र की सुरक्षा ' के लिये राजा को, वीर को या सेनापति को कहा जा रहा है- हे प्रतापानल! पूर्ण तेजस्विन्! तुम प्रगल्भ ( धृष्टि ) हो, अर्थात् शत्रुओं के द्वारा अप्रवृष्य हो । ' आमादं ' यानी अपक्व को ही ' अत्ति ' भक्षण करता है, अर्थात् असमय में ' अपक्व ' जो तरुण नहीं है ऐसे बालक को ' अत्ति हन्ति ' नष्ट करता है, इसलिये उसे आम कहा गया है ऐसे उस क्रूर शत्रु का विनाश करो । तथा ' क्रव्यादं ' यानी हत ( मृत ) प्राय वृद्ध को जो मारता है, उसे ' क्रव्याद् ' कहा गया है । उस क्रव्याद् को भी मृत्यु के मुख में पहुँचा दो । हे तेजोनिधान! तुम

पृष्ठ 182

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 182 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १६ ] सर्वप्राणिमात्रेण वननीयं भजनीयं त्वा त्वामहं भ्रातृव्यस्य शत्रो राष्ट्रद्रोहिणो वधाय निर्मूलनाय उपदधे राष्ट्ररक्षणाद-संग्रामभूमी स्थापयामि । I अग्ने ब्रह्म गृभ्णीष्व धरुणमस्यन्तरिक्षं दृह ब्रह्मवनि त्वा 1 I चलवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय । धर्त्रमसि दिवं ह ह ब्रह्मवनि i I त्वा क्षत्रवनिं सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय । विश्वाभ्यस्वाशाभ्य उपदधामि चित स्थोचितो भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ॥ वा ० सं ० १ । १८ ॥ अर्थ – हे अग्ने! हमारे द्वारा अनुष्ठित उत्तम कर्म को तुम स्वीकार करो । हे द्वितीय कपाल! पुरोडाश को तुम धारण करने वाले हो, इस कारण अन्तरिक्ष को दृढ़ करो । ब्राह्मण, क्षत्रिय और यजमानकुलोत्पन्न पुरुष पुरोडाश-निष्पत्त्यर्थ जिसको स्वीकार करते हैं ऐसे तुम्हें, शत्रु वध करने के लिये मैं अङ्गारे पर रखता हूँ । हे तृतीय कपाल! तुम पुरोडाश के धारक हो उस कारण द्युलोक को दृढ़ करो । क्षत्रिय और यजमान कुलोत्पन्न पुरुष पुरोडाश निष्पत्त्यर्थं जिसको स्वीकार करते हैं ऐसे तुम्हें शत्रु का वध करने के लिये मैं अङ्गारे पर रखता हूँ । हे चतुर्थ कपाल! समस्त दिशाओं की दृढ़ता के लिये मैं अङ्गारे पर तुम्हारी स्थापना करता हूँ । हे कपालो! तुमको समीप में तथा ऊर्ध्व भाग की ओर से एकत्र किया गया है । भृगुसंज्ञक और अङ्गिरसंज्ञक देवर्षियों के तपोरूपी अग्नि से तुम तप्त हो जाओ || १८ || १ – सव्याङ्ग ल्या शून्येऽङ्गारं निदधात्यग्रे ब्रह्मति ' ( का ० श्र ० सू ० २४ २६ ) वामहस्तस्यानामिकया स्पृष्टे कपाले अङ्गारान्निदध्य । दग्नीत् । एतच्चाङ्गारनिधानं कपालसंस्कारकमतः प्रतिकपालं नावर्तनीयम् । गृभ्णीष्वेति-मन्त्रशेषः । निधीयमानाङ्गाररूप हे अग्ने प्रौढ कमदानीमस्माभिरनुष्ठीयमानं गृभ्णीष्व । नाशकानां रक्षसां वधेनास्मान-नश्चल्य के ( धैर्यं के ) कारण ध्रुव हो, अतः पृथिवी को दृढ़ करो अर्थात् समृद्ध करो । तुम ब्रह्मवनि ' ब्रह्म ब्राह्मणं वनति-संभजते ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ब्राह्मण सेवा परायण हो, अतएव ब्रह्म वीर्य के द्वारा संभजनीय ( आराधनीय ) हो, तथा तुम क्षत्रवनि अर्थात् क्षत्रवीर्य से संभजनीय हो, तथा तुम सजातवनि सर्वप्राणिमात्रेण वननीयं ' अर्थात् समस्त प्राणियों से भजनीय हो, अतः मैं भ्रातृव्य अर्थात् राष्ट्रद्रोही शत्रु के वधार्थ यानी निर्मूलनार्थ राष्ट्र की रक्षा के हेतु ग्राम भूमि में तुम्हारी स्थापना करता हूँ । १ - कात्यायन श्रौत सूत्र में कहा गया है कि अग्नीत् नाम का ऋत्विक् अपने वाम हस्त की अनामिका से स्पृष्ट हुए कपाल पर अङ्गारों को स्थापित करे । यह अङ्गारनिधान, कपाल संस्कारक है, अत: प्रत्येक कपाल पर अङ्गार निधान की आवृत्ति नहीं होगी । ' गृभ्णीष्व ' ऐसा मन्त्रशेष समझना चाहिये । निधीयमान अङ्गार रूप हे अग्ने! इस समय हमारे द्वारा अनुष्ठीयमान जो प्रौढ़कर्म हो रहा है, उसे स्वीकार करो । कर्म के विनाशक राक्षसों का वध

पृष्ठ 183

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 183 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १७० ] नुगृह्णीष्व । अतएव काण्वशतपथे ' अग्निर्हिनाष्ट्राणां रक्षसां हन्तेति । यद्वा ब्राह्मणं सव्यांगुलिदानेन संसक्तं मामनुगृह्णीष्व अनुगृहाण | २ - धरुणमिति पश्चात् ( का ० श्र ० सू ० २ | ४ | ३० ) धरुणमितिमन्त्रेण मध्यमस्य कपालस्य पश्चात् द्वितीयं कपालं प्रथमोपहितेन कपालेन संश्लिष्टमुपदध्यात् । हे द्वितीय कपाल, धरुणं पुरोडाशस्य धारकमसि । अतस्तमन्तरिक्षं दृढीकुरु । पुरोडाशकपालवेलायामुत्पन्नया ज्वालया अन्तरिक्षलोकस्योपद्रवो यथा न स्यात्तथा कुरु । यद्यप्येतत्कपालं ज्वालान्तरिक्षयोर्मध्ये व्यवधायकं न भवति तथाप्यन्तरिक्षदाढ्यार्थं कपालदेवता प्रार्थ्यते । ३ - ' पुरस्ताद्धर्त्रमिति ' ( का ० श्री ० सू ० २ | ४ | ३ ३ ) मध्यमस्य कपालस्य पुरस्तात् धर्त्रमिति तृतीयं कपालं संश्लिष्टमुपदध्यात् ' धर्त्रमसि दिवः ब्रह्मवनि ' हे तृतीय कपाल, विधारकोऽसि ज्वालाग्रेण दाहाभावाय दिवं द्युलोकं कुरु । ' विश्वाभ्य इति दक्षिणतः ' ( का ० श्र ० सू ० २।४।३२ ) प्रथमकपालस्य दक्षिण भागे संश्लिष्ट चतुर्थं कपालं विश्वाभ्यः सर्वाभ्य आशाभ्यो दिग्भ्यः दिग्दाढर्याय त्वामुपदधामि । पुरोडाशनिष्पत्त्यर्थं ब्रह्मणा वन्यते ब्रह्मवनि तथैव क्षत्रेण वन्यते क्षत्रवनि समानकुले जातैर्वन्यते इति सजातवनि इति पूर्ववत् त्वा भ्रातृव्यस्य शत्रोर्वधायोपदधामि । सर्वासु श्रुतिषु य इमे लोका: श्रूयन्ते । पृथिव्यादिलोकत्रयप्रसिद्धम् । कस्याञ्चित् भूर्लोकभुवर्लोकस्वर्लोक महर्लोकजनलोक तपोलोक सत्यलोकेति सप्तानां लोकानां समाहारः श्रूयते । अतो महर्लोकादयः स्वर्गलोकस्यावयवा उतान्यच्चतुर्थ-स्थानमिति विशेष निश्चयात् लोकविशेषनामधेयमनुच्चार्य साधारण्येनाशाभ्य इति श्रुतम् । ४- समं विभज्य द्व े दक्षिणतः एवमुत्तरतश्चितः स्थेति ' ( का ० श्री ० सू ० २।४।२३ ) अष्टासु कपालेषु चतुर्थ्यो-करके हम पर अनुग्रह करो । अत एव काण्व शतपथ ब्राह्मण में ' अग्निर्हि नाष्ट्राणां रक्षसां हन्ता कहा गया है । अथवा 2 सव्यांगुलि के स्पर्श द्वारा संसक्त हुए मुझ ब्राह्मण पर अनुग्रह करो । २ – ' धरुणमिति पश्चात् ' इस श्रीत सूत्र के अनुसार ' धरुणमसि ' मन्त्र से मध्यम कपाल के पश्चात् भाग में द्वितीय कपाल को प्रथमोपहित कपाल से संश्लिष्ट करके रखे । हे द्वितीय कपाल! तुम पुरोडाश के धारक हो । अतः उस अन्तरिक्ष को दृढ़ कर दो । अर्थात् पुरोडाश कपालपाक के समय उत्पन्न होने वाली ज्वाला से अन्तरिक्ष लोक को किसी प्रकार का उपद्रव जिस तरह न हो पाये वैसा करो । यद्यपि यह कपाल, ज्वाला और अन्तरिक्ष दोनों के मध्य में व्यवधायक नहीं है, तथापि अन्तरिक्ष की दृढ़ता के लिये कपालाधिष्ठात्री देवता की प्रार्थना की जा रही है । ३ - ' पुरस्ताद्धर्मम् इति ' इस सूत्र के अनुसार मध्यम कपाल के ( प्रथम कपाल के ) पूर्व भाग में ' धमसि ' इस मन्त्र से तृतीय कपाल को मध्यम कपाल से संश्लिष्ट करके रखे । हे तृतीय कपाल! तुम विधारक हो, अपनी ज्वाला के अग्र भाग से दाह न होने देने के लिये द्युलोक को दृढ़ कर दो । ' विश्वाभ्य इति दक्षिणतः ' इस सूत्र के अनुसार प्रथम कपाल के दक्षिण भाग में संश्लिष्ट करके विद्यमान चतुर्थ कपाल की स्थापना, समस्त दिशाओं की दृढ़ता के लिये कर रहा हूँ । पुरोडाशनिष्पत्ति के लिये ब्रह्मवनि, क्षत्रवनि, सजातवनि रूप वाले तुम्हारी स्थापना, शत्रुवध के लिये कर रहा हूँ । सभी श्रुतियों में ये तीन लोक ही सुनाई पड़ते हैं । पृथिवी आदि तीन लोक प्रसिद्ध ही हैं । किसी श्रुति में भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक- - इन सात लोकों का समाहार श्रुत होता है । अतः महर्लोक आदि क्या स्वर्गलोक के अवयव ( भाग ) हैं, अथवा कोई अतिरिक्त अन्य चतुर्थ स्थान है? इसका निश्चय न होने से लोक विशेष का का कोई नाम न बताकर सामान्य रूप से ' आशाभ्यः ' कह दिया गया है । ४ - ' समं विभज्य द्वे दक्षिणतः एवमुत्तरतश्चितः स्थेति ' सूत्र के अनुसार आठ कपालों में से अवशिष्ट जो चार कपाल हैं, उनका समविभाजन करके दो दक्षिण की ओर दो उत्तर की ओर ' चितः स्थ ' इस मन्त्र की आवृत्ति करते

पृष्ठ 184

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 184 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १७१ ] S वशिष्टानि चत्वारि समं विभज्य द्वे दक्षिणतो द्वे उत्तरतः चितः स्थेति मन्त्रावृत्त्या प्रादक्षिण्येन एवं चतुर्थात्पूर्वमपरं चतुर्थात्परं तत उत्तरतः पश्चादेकं पूर्वं द्वितीयमुपदध्यात् । ' तूष्णीं वा ' ( का ० श्री ० सू ० २२४१३४ ) पुरोडाशार्थं कपाल-चतुष्टयस्य स्थापितत्वात् प्रकृतेऽष्टकपालानां विहितत्वात् वाशिष्टं यत्कपालचतुष्टयं तद् द्वेोधा विभज्य दक्षिणोत्तरयो-दिशो: चितः स्थेति मन्त्रेणोपदध्यात् । उर्ध्वं चित इति मन्त्रशेषः । ( चिञ् चयने इति क्विबन्तस्य रूपम् ) हे कपाल-विशेषाः, यूयं चितःस्थ मध्यमकपालस्योपचयकारिणोभवथेत्यर्थः । तथैवोर्ध्वचितः उत्तरकपालोपहितानां द्वितीयादि-कपालानामप्युपकारिणो भवत । ' भृगूणामित्यङ्गारैरभ्यूहति ' ( का ० श्री ० सू ० २ | ४ | ३७ ) अङ्गारैः कपालान्याच्छादयेत । हे कपालानि, यूयं भृगूणां भृगोरपत्यानि बहवो भृगवस्तेषां भृगुनामकानामेवमङ्गिरसामङ्गिरोनामकानां च देवर्षीणां तपोरूपेणानेनाग्निना तप्यध्वम् तप्तानि भवन्तु । अस्याग्नेस्तदीयतपोरूपत्वं भावयेदित्यर्थः । सर्वथापि दिव्यानां देवानां कृते पुरोडाशादिपाकाय न भौतिकोऽग्निः किन्तु दिव्यानां महर्षीणां तपोरूपेणाग्निना तत्पाक इति । तदुक्त तित्तिरिणा-' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वमित्याह देवतानामेवैतानि तपसा तरन्तीति । ' ५- आधुनिकस्तु, हे अग्ने, त्वं धरुणमसि कृपयास्मत्प्रयुक्तं ब्रह्म गृह्णीष्व । तथास्मासु अन्तरिक्षमक्षयं विज्ञानं ह वर्धय । अहं भ्रातृव्यस्य वधाय ब्रह्मवनि क्षत्रवनि सजातवनि त्वामुपदधामि हे सर्वधातः, त्वं सर्वेषां लोकानां धमसि । कृपयास्मासु दिवं ज्ञानप्रकाशं दृ ७ ह वर्धय । अहं भ्रातृव्यस्य वधाय ब्रह्मवनि क्षत्रवनि सजातवनि त्वामुप-दधामि त्वां सर्वव्यापकं ज्ञात्वा विश्वाभ्य आशाभ्य उपदधामि । हे मनुष्या यूयमप्येवं विदित्वा चितः स्थ ऊर्ध्वचितः कपालानि कृत्वा भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् । इति सर्वत्र व्यत्ययबाहुल्यपूर्णमेवास्य व्याख्यानम् । यद्यत्र परमात्मा भौतिकोऽग्निर्वा सम्बोध्यस्तदा आकाशस्थान् पदार्थान् अन्तरात्मस्थं ज्ञानं वा दृढीकुरु करोति वेति, तथापि नहि धरुणमसि धर्त्रमसीतिशब्दभेदेन वस्तुभेदो भवति । अतएव कथमेकस्यैवान्तरिक्षस्य दिवो वर्धकत्वं स्यात् । एव हुए प्रदक्षिण तथा चतुर्थ कपाल से पूर्व और दूसरे को चतुर्थ से पर स्थापित करे, तदनन्तर अवशिष्ट दो कपालों में से एक को उसके उत्तर की ओर और दूसरे को तुष्णीम् ही रख दे | अभिप्राय यह है कि पुरोडाश के लिये चार कपालों की स्थापना हो चुकी है, किन्तु प्रकृत में आठ कपालों का विधान किया गया है, अतः अवशिष्ट जो चार कपाल हैं, उनका द्विधा विभाजन करके दक्षिण और उत्तर दिशा में दो - दो कपालों का ' चितः स्थ ' मन्त्र से उपधान करे । ' ऊर्ध्व चितः स्थ ' यह मन्त्रशेष है । ' चिञ् ' ' चयने ' धातु से क्विप् प्रत्यय करके ' चित् ' रूप बनता है । हे कपाल विशेषों! तुम मध्यम कपाल के उपचयकारी हो । तथैव उत्तर कपालोपहित द्वितीय कपालों के भी उपकारी हो जाओ । ' भृगूणा-मित्यङ्गारैरभ्यूहति ' सूत्र के अनुसार अङ्गारों से कपालों को आच्छादित करे । हे कपालों! तुम, भृगुओं के अङ्गिरस् नाम के देवर्षियों के तपोरूप इस अग्नि से तप्त हो जाओ । इस अग्नि को उनके तपोरूप समझो । सर्वथापि देवताओं के लिये पुरोडाश के पकार्थ, भौतिक अग्नि नहीं है, किन्तु दिव्य महर्षियों के तपोरूप अग्नि से उसका पाक होगा । इसी बात को तित्तिरि ने भी कहा है । ६ - कोई आधुनिक उक्त मन्त्र की व्याख्या इस प्रकार करता है - हे अग्ने! तुम धरुण हो, कृपया अस्मत्प्र-युक्त ब्रह्म का ग्रहण करो । तथा हम लोगों के विज्ञान की वृद्धि करो । मैं भ्रातृव्य के वधार्थं ब्रह्मवनि, क्षत्रवनि और सातवनि रूप वाले तुम्हारी स्थापना करता हूँ । मैं सर्वधातः! तुम सम्पूर्ण लोगों के धर्वमसि ' धारक हो । कृपया हममें ज्ञान का प्रकाश अच्छी तरह वृद्धिङ्गत कर दो । मैं भ्रातृव्य के वधार्थं ब्रह्मवनि - क्षेत्रवनि - सजातवनि गुणों से विशिष्ट हुए तुम्हारी स्थापना करता हूँ, तुम्हें सर्वव्यापक समझकर समस्त दिशाओं के लिये तुम्हारी स्थापना करता हूँ । हे मनुष्यों! तुम भी ऐसा जानकर कपालों को ऊर्ध्वचित् करके भृगु और अङ्गरिसों के तप से तप्त हो जाओ । ' इस प्रकार सर्वत्र व्यत्यय बाहुल्य पूर्ण ही इसका व्याख्यान है । यदि यहाँ पर परमात्मा अथवा भौतिक अग्नि, सम्बोध्य होता तो आकाशस्थित पदार्थों को अथवा अन्तरात्मा में स्थित ज्ञान को दृढ़ करो अथवा करता है - यह अर्थ होता है तथापि ' धरुणमसि धर्वमसि ' इस शब्द भेद से वस्तु भेद नहीं होता है । अत एव एक ही अन्तरिक्ष का

पृष्ठ 185

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 185 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १७२ ] ब्रह्मणो वेदस्य ब्रह्माण्डस्य मूर्तद्रव्यस्य वा प्रकाशकत्वं ब्रह्मवनित्वं सम्भजनार्थस्य वनेविभाजकत्व प्रकाशकत्वाद्यर्था-नुपपत्तेः । ६ - वस्तुतस्तु ब्रह्मणा ब्राह्मणेन वन्यते पुरोडाशनिष्पत्त्यर्थं सम्भज्यते व्रियत इति ब्रह्मवनि तथैव, क्षत्रेण वन्यते सजातैर्यंजमानसमानकुलेजातैस्तज्जातीयैर्वन्यत इति क्षत्रवनि, सजातवनि त्रिभिः कपालैस्त्रीन् लोकान् यजमानो जयति चतुर्थेन दिशो जयति । यश्चैव पुरोडाशोऽत्र संस्क्रियते सोऽप्याधारवशात् त्रिलोकीविग्रह एव भूत्वा देवताः प्रीणाति, तदर्थमेव कपालानां देवता तर्पणहेतुत्वे सर्वाभीष्टप्रदत्वमग्नौ तदुपधानेन शत्रूणामसुराणां पाप्मनां तापकत्वेन सर्वानिष्ट-निवारकत्वमपि सिद्ध्यति । एवं ब्राह्मणसूत्रयाज्ञिकपद्धत्यनुसारेण मन्त्राणां तेषां तेषु तेषु कर्मसु विनियोगवशादेव मन्त्रार्थसङ्गतिः, न स्वाभ्युहितविद्वद्राजादिप्रशंसापरत्वे तत्तदुपदेश परत्वे वा मन्त्रार्थसङ्गतिः सम्भवति । ७ – चितामूर्ध्वचिताश्च को भेद इति न स्पष्टम् । कानि च तानि कपालानि यान्यग्नौ धार्यन्ते? भृगवः के इति न स्पष्टम् । तेषामङ्गिरसाञ्च तपः कीदृशमित्यपि न स्पष्टम् । ८ - यदपि च - हे ' विद्वन् येनाग्निना धरुणं ब्रह्मान्तरिक्षं गृह्यते दृह्यते च तं त्वं होमार्थं शिल्पविद्यासिद्ध्यर्थञ्च गृभ्णीष्व दृ ं ह च । तथैवाहमपि भ्रातृव्यस्य वधाय त्वा तं ब्रह्मवनि क्षत्रवनि सजातवनि उपदधामि । एवं यो वायुर्धत्र सर्वलोकधारकोऽस्ति दिवं च दृहति तमहं यथा भ्रातृव्यस्य वधाय ब्रह्मवनि क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि तथैव त्वमप्येतं तस्मै प्रयोजनायोपह ह । दिवोवर्धकत्व कैसे होगा? एवं वेद, ब्रह्माण्ड अथवा मूर्तद्रग का प्रकाशकत्व, ब्रह्मवनित्व और सम्भजनार्थक वनि का विभाजकत्व प्रकाशकत्व आदि अर्थ करना अनुपपन्न है । ६ – वस्तुतस्तु ' ब्रह्मणा ब्राह्मणेन वन्यते पुरोडाशनिष्पत्त्यर्थं सम्भज्यते व्रियते इति ब्रह्मवनि तथैव ‘ क्षत्रेण वन्यते सजातैर्यजमान समानकुले जातैस्तज्जातीयैर्वन्यत इति क्षत्रवनि ', सजातवनि त्रिभिः कपालैः त्रीन् लोकान् यजमानो जयति चतुर्थेन दिशो जयति । ' जो पुरोडाश यहाँ संस्कृत किया जा रहा है, वह भी आधारवशात् त्रिलोकी स्वरूप होकर ही देवताओं को सन्तुष्ट करता है । उसी के लिये कपालों को देवता सन्तोष का कारण होने से सर्वाभीष्ट-प्रदत्व है । अग्नि पर उसका उपधान करने से शत्रुओं का पापी असुरों का वह तापक हो जाता है । अत एव सर्वानिष्ट-निवारकत्व होना भी उसका सिद्ध हो जाता है । एवं ब्राह्मण, सूत्र तथा याज्ञिक पद्धति के अनुसार उन मन्त्रों की उन-उन कर्मों में विनियोगवशादेव मन्त्रार्थ की सङ्गति लग जाती है । किन्तु किसी विद्वान् या राजा की प्रशंसा परक या तत्तदुपदेश परक अर्थ कल्पना करने पर मन्त्रार्थं सङ्गति का लगाना सम्भव नहीं है । ७ - ' चित और ऊर्ध्वं चित ' में क्या भेद है? उसे स्पष्ट नहीं किया है । कौन से वे कपाल हैं, जिन्हें अग्नि पर धारण कराया जाता है? भृगु कौन हैं? यह भी स्पष्ट नहीं किया है । उनका और अङ्गिरसों का कैसा तप है? यह भी स्पष्ट नहीं किया है । ८- और जो यह कहा गया है कि ' हे विद्वन्! जिस अग्नि से ब्रह्म अन्तरिक्ष का ग्रहण किया जाता है और उसे दृढ़ किया जाता है उसे तुम होम के लिये और शिल्प विद्या की सिद्धि के लिये ग्रहण करो और उसे दृढ़ करो । तथैव मैं भी भ्रातृव्य के वधार्थ ब्रह्मवनि - क्षत्रवनि - सजातवनि गुणों से सम्पन्न हुए तुम्हारी स्थापना करता हूँ । इस प्रकार उस अग्नि का धारण करने पर वह अग्नि, सुख देगा । एवं जो वायु, सम्पूर्ण लोक का धारक है और स्वर्ग को दृढ़ करता है, उसे मैं जिस प्रकार भ्रातृव्य के बधार्थ ब्रह्मवनि आदि गुणों वाले अग्नि का उपधान करता हूँ, उसी तरह तुम भी इसे उस प्रयोजन के लिये अच्छी तरह स्थापन करो ।

पृष्ठ 186

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 186 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १७३ ] 4 - हे शिल्पविद्याचिकीर्षो विद्वन् येन वायुना पृथिवी द्योः सूर्यलोकश्च धार्यते दृह्यते च तं त्वं जीवनार्थं शिल्प विद्यार्थं च धारय ह ह च । ब्रह्मवनीत्यादि पूर्ववत् । १० - हे मनुष्या यथा वायुविद्या त्वा तमग्नि वायुश्व विश्वाभ्य आशाभ्य उपदधाति तथैव यूयमप्युपधत्त । यथार्थं शिल्पविद्यार्थं च ऊर्ध्वचित कपालानि धारितवन्तः सन्तो भृगूणामङ्गिरसाश्च तपसा तप्यध्वं तापयत च । अत्र कथं भौतिकाग्निना सर्वधारकघेदोऽन्तरिक्षं वा धार्यंत इति दृष्टान्त एवासिद्धः । तथा युष्माभिर्होमार्थं शिल्पविद्यार्थ-इति तु लोकसिद्धमेव । किश्व तथाहमपि भ्रातृव्यस्य वधाय ब्रह्मवन्यादिविशिष्टं गृह्णामीत्यत्राह पदार्थः कः? वायुना कथं सूर्यलोको दृह्यते कथं कीदृशी वायुविद्या कथञ्च वायुना शत्रुनाश:? शिल्पविद्या च सामाजिक र्वर्ध्यते इति सर्वं शब्दमात्रम् । ११ – वस्तुतस्तु पाश्चात्यानां प्रभावात् पुराणेतिहाससमराङ्गणसूत्रधारादिवर्णित विविधयानादिप्रभावित-त्वादेव मन्त्रेषु तादृशार्थाभासयोजनमुपहासास्पदमेव । ये पुराणेतिहासानां प्रामाण्यमेव नोरीकुर्वन्ति तेषां कृते समराङ्गण-सूत्रधारप्रामाण्यस्य तु कथैव का, भृग्वङ्गिर आदयो न व्यक्तिविशेषा इत्युक्त्वापि के ते इति नोक्तम् । १२ - यत्तु केनचित् कपालपदेन पारदरसयुक्ता घटा वायुयानचालनायस्थापनीयाः । अग्नितापप्रभावात् घटस्थ-पारदसोत्थानात् वायुयानगमनं सिद्धयतीत्युक्तम्, तदपि तुच्छम्, कपालशब्दस्य घटबोधकत्वाभावात् । मूले मन्त्रे तु कपाल-शब्दोऽपि नास्त्येव । ९ ३ - माध्यमिको देवगण इति नैरुक्ता: ( नि ० ११।१३ ) कथं तस्य गणस्य पतयः, कथं च तेन कपालस्य - हे शिल्पविद्या को चाहने वाले विद्वान्! जिस वायु से पृथिवी, द्यौ और सूर्यलोक धारण किया जाता हैं और दृढ़ बनाया जाता है, उसे तुम जीवनार्थ और शिल्प विद्या के लिये धारण करो और दृढ़ बनाओ । ब्रह्मवनि आदि पूर्ववत् ही समझना चाहिये । १० - हे मनुष्यो! जैसे वायुविद्या उस अग्नि और वायु को सम्पूर्ण दिशाओं के लिये धारण करती है, तथैव तुम भी धारण करो । अर्थ के लिये और शिल्पविद्या के लिये ऊर्ध्वचित कपालों को धारण करवाया था, तथा भृगु और अङ्गिरसों के तप से सन्तप्त हो जाओ, और तपाओ । यहाँ पर भौतिक अग्नि के द्वारा सर्वधारक वेद या अन्तरिक्ष धारण कैसे किया जा सकता है? अतः दृष्टान्त ही असिद्ध है । तथा तुम लोग होम के लिये, शिल्प विद्या के लिए अग्नि को ग्रहण करो - इस प्रकार का ग्रहण तो लोकसिद्ध ही है । किश्व - उसी तरह ' अहमपि ' -- मैं भी भ्रातृव्य धार्थं ब्रह्मवन्यादि विशिष्ट का ग्रहण करता हूँ यहाँ पर ' अहम् ' पदार्थ क्या है? वायु से सूर्य लोक को कैसे दृढ़ किया जाता है? कौन सी वह वायु विद्या है? वायु से शत्रुनाश कैसे होता है? और ' सामाजिकों के द्वारा शिल्पविद्या का वर्धन किया जाता है ' - यह सब शब्द मात्र ही है । ११ – वस्तुतस्तु पाश्चात्यों के प्रभाव में आकर तथा पुराण, इतिहास, समराङ्गण सूत्रधारादि के द्वारा वर्णित विविध यान आदि के पढ़ने मात्र से मोहित होकर मन्त्रों में भी उसी प्रकार अर्थाभासों की योजना कर देना उपहासा-स्पद ही है । जो लोग पुराण - इतिहास आदि के प्रामाण्य का स्वीकार ही नहीं करते, उनके लिये समराङ्गण सूत्रधार के प्रामाण्य के विषय में कहना ही क्यों है? भृगु - अङ्गिरा आदि कोई व्यक्तिविशेष नहीं हैं, यह कह तो दिया है, किन्तु वे कौन थे? इसे नहीं कहा । १२ यह जो किसी ने कहा है कि ' कपाल ' शब्द से पारद के रस से पूर्ण घटों को वायुयान के चलाने के लिये स्थापित करना चाहिये । अग्नि के ताप के प्रभाव से घटस्थित पारदरस के उत्थान से वायुयान उड़ने लगता है । किन्तु यह कथन सारहीन है । क्योंकि ' कपाल ' शब्द ' घट ' का बोधक नहीं है । और मूल मन्त्र में तो ' कपाल ' शब्द का उल्लेख तक नहीं है | १३ - ' माध्यमिको देवगण इति नैरुक्ताः ' - उस गण के ' पति ' कैसे? और उससे कपाल का ' ताप ' कैसे?

पृष्ठ 187

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 187 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १७४ ] तापः? ‘ वायुरापश्चन्द्रमा ' ( गो ० ब्रा ० पू ० २२६ ) ' अङ्गिरा उ ह्यग्निः ' ( श ० १ | ४ | १ | २५ ) ' अङ्गिरा वा अग्निः ' ( ० ६।४।४.४ ) एतेषामपि तपः कीदृक्, कथञ्च तेन कपालतापः इति वक्तव्यम् । १४ - यत्तु - ' अङ्गिरस्तम: ' ( ऋ ० सं ० १।१०० ४ ) इत्येव बहुषु मन्त्रेषु दर्शनात् नेयं व्यक्तिविशेषस्य संज्ञा, अन्यथा तमप्प्रत्ययानुपपत्तिः स्यादिति तन्न युवतमादिव्यक्तिष्वपि तमप्प्रत्ययदर्शनेनादोषात् । सायणादिरीतिस्तु, शतपथादिश्रुत्यनुसारिण्येव । तद्रीत्या तु शम्या दृषदुपलाद्यधिष्ठातृदेवतानां चेतनत्वात् ऐश्वर्यवत्त्वाच्च ते सम्बोधनार्हाः सन्त्येवेत्यसकृदावेदितमेव । १५ – शतपथे तु दयानन्दीयव्याख्यान विरुद्धं सायणादिव्याख्यानानुसार्येव व्याख्यानं दृश्यते तथाहि - ' अथा-ङ्गारमभ्यूहति ' अत्र समन्त्रकं कपालस्योपर्यङ्गाराभ्यूहनं विधत्ते श्रुतिः । अग्ने ब्रह्मतिमन्त्रनिर्देशः । किं कारणमित्य-पेक्षायामाह -पुरापुरोड शाधिश्रयणात् प्राक् इह नष्ट्रा रक्षांसि नाविशेयुरित्येतदर्थं तत्रारभ्यूहनं युक्तम् । यतोग्नी रक्षसामपहन्ता । एतावता मन्त्रस्य कपालानामुपर्यङ्गाराभ्यहने विनियोगः । तत्प्रयोजनश्व स्पष्टमेवोक्तं भवति । तेन मन्त्रार्थोऽपि तदनुगुण एव । अथ यत्पश्चात् तदुपदधाति धरुणमस्यन्तरिक्षं दृ? S हेत्येतेनैव द्विषन्तं भ्रातृव्यमवबाधते । ब्रह्मवनि क्षत्रवनि सजातवनि भ्रातृव्यस्य वधायेति पश्चात्कपालस्योपधानं विधत्ते । मध्यमकपालस्योपधानानन्तर्यम-थशब्दार्थः । धरुणमस्यन्तरिक्षं दृ ७ ह । तथा प्रार्थनयान्तरिक्षस्यैव रूपेणैतत्कपालं दृहति । एतेनैव द्विषन्तं भ्रातृव्य-बाधते ब्रह्मवनित्वा उपदधामि । अथ यत्पुरस्तात्तदुपदधाति धर्त्रमसि दिवः दृ & ंह..... " इति मध्यमकपालस्य पूर्वदेशे स्थाप्यस्याप्रधानं विधत्ते । दिवः सम्बन्धिना रूपेण एतत् १७ तृतीयं कपालं दृढीकरोति । अथ यद्दक्षिणतस्तदुपदधाति विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य उपदधामीति । स यदिमांल्लोकानत्ति चतुर्थमस्ति वा न वा ते वैतत् द्विषन्तं भ्रातृव्यमवबाधते । अनद्धा वैतद्यद्विश्वा आशास्तस्मादाह विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य उपदधामीति । तूष्णीं वैवैतराणि कपालान्युपदधाति चितः स्थोध्वंचित इति वा । दक्षिणभागस्थितस्य कपालस्योपधानं विधत्ते । मन्त्रस्य तात्पर्यमाह - पूर्वं हि त्रिभिरुपहितैः कपालः पृथिव्यादिलोकत्रय-सकाशात् शत्रोर्बाध उक्तः । इदानीं तु इमान् त्रींल्लोकानतिक्रम्य यत् चतुर्थं स्थानं तदस्ति वा न वेति सन्दिग्धमेव लोकत्रयवत्प्रसिद्ध्यभावात् अतो मन्त्रे लोकवाचिनं शब्दविशेषं परित्यज्य विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्यः इति सर्वशब्दपर्यायस्य विश्वशब्दस्य प्रयोगः । तेन सन्दिह्यमानात् सर्वस्मादेव स्थानात् द्विषन्तं शत्रु स यजमानश्चतुर्थकपालोपधानेन बाधते । विश्वाभ्य इति मन्त्रस्य लोकत्रयातिरिक्तपरत्वमुपपादयति - अनद्धा वा इति । लोकत्रयातिवर्तिनः सद्भावोऽसद्भावश्च अनद्धा वै अस्माकमप्रत्यक्ष एव । यद् विश्वा आशा तदव्यनद्धा अप्रत्यक्षमेव लोकत्रयवत् तत्प्रसिद्ध्यभावात् । अतोऽप्रत्यक्ष-बादिना विश्वाभ्य आशाभ्य इति पदद्वयेन लोकत्रयातिरिक्तं सकलमेवाप्रत्यक्षं विवक्षितम् । एवं कपालचतुष्टयस्य मन्त्रे-गोपधानं विधाय अवशिष्टकपालोपधाने पक्षद्वयमाह - तूष्णीं चितः स्थेति मन्त्रेण वा । ' वायुरापश्चन्द्रमा: ', ' अङ्गिरा उ ह्यग्निः ', ' अङ्गिरा वा अग्नि: ' इनका भी तप कैसा? और उससे कपाल का तप होना कैसे? यह सब बताना चाहिये था । १४ - यह जो कहा है कि ' अङ्गिरस्तमः ' इतना ही अनेक मन्त्रों में दृष्ट होने से यह किसी व्यक्ति विशेष की संज्ञा नहीं है, अन्यथा ' तमप् ' प्रत्यय अनुपपन्न होगा । किन्तु यह कहना भी उचित नहीं है, ' युवतम ' आदि व्यक्तियों में भो तमप् प्रत्यय का होना देखा जाता है, अतः कोई दोष नहीं है । सायणादि आचार्यों की रीति तो शतपथादि श्रुति का ही अनुसरण करती है । उनकी रीति के अनुसार तो शम्या - दृषद- उपल आदि यज्ञीय पदार्थों की अधिष्ठातृ देवता चेतन और ऐश्वर्यशाली होती हैं, अतः वे सम्बोध्य होती हैं, इस बात को कई बार कहा जा चुका है । १५. - शतपथ में तो दयानन्दीय व्याख्यान के विरुद्ध सायणादिव्याख्यानानुसारी ही व्याख्यान दिखाई देता है । उपहित कपालों पर अङ्गारों से अभ्यूहन का विधान किया गया है । भृगु और अङ्गिरसों के तप का जो विशेषण है,

पृष्ठ 188

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 188 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १७५ ] अथाङ्गारभ्यूहति । भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वमिति एतद्वै तेजिष्ठ तेजो यद्भृग्वङ्गिरसां तपसा सुतप्तान्यसन्निति । तस्मादेवमभ्यूहति ( श ० १/२ | १ | ८ | १३ ) उपहितेषु कपालेषु अङ्गारैरभ्यूहनं विधत्ते - भृगूणा-मङ्गिरसां तपसो यद्विशेषणम् तद् व्याचष्ट एतद्वेति । यद् भृग्वङ्गिरसां महर्षीणां तपोविशेषजनितं तेजः एतत्खल्वग्न्यादितेजोऽन्तरात् तेजिष्ठं तेजस्वितमम् अतिशयेनदीप्तं, तेजस्विशब्दादिष्ठनि ' विन्मतो लुक् ( पा ० सू ० ५।३।६५ ) इति लुक् । १६ – मन्त्रस्याभिप्रायमाह - एतान्युपहितानि कपालानि भृग्वङ्गिरसां तपसा सुष्ठ्वतिशयेन तप्तानि भवेयु-रनेनाभिप्रायेण असन् इति पश्चमलकारेरूपम् । एतावता भृग्वङ्गिरसो व्यक्तिविशेषा न सन्तीत्यपास्तम्, शतपथश्रुत्यैव भृग्वङ्गिरसां सुतप्तानां तेजिष्ठत्वप्रतिपादनात् । नचाङ्गिरस्तममितितमप् प्रत्ययानुपपत्तिः, अन्वर्थसंज्ञामङ्गिरसां बहूनां मध्येतिशयितार्थेऽपि तमप्प्रत्यये बाधाभावात् । तथैवात्रोक्तं सायणाचार्येण -१७ - अध्यात्मपक्षे तु – हे अग्ने तेजस्विन् ब्रह्मचारिन् ब्रह्मवेदं गृभ्णीष्व गुरुपारम्पर्येणाधीष्व । वेदतात्पर्य -विषयभूतं मुख्यमपिब्रह्म वेदान्तविचारेणावगच्छ । त्वं धरुणमसि वेदस्य तत्प्रतिपाद्यस्य परमतत्त्वप्राप्तिसाधकस्य श्रौतस्मार्तकर्मणः धरुणमसि धारणसामर्थ्यं वीर्यमसि । धर्मधर्मिणोरभेदात्, तदध्ययनेन तदर्थानुष्ठानेन चान्तरिक्षं तत्रत्यं देवसमूहं च दृह वर्धय दाढ व सम्पादय । अहं वेदपुरुषो भ्रातृव्यस्य वधाय कामादि निरासाय त्वा त्वां ब्रह्मवनि ब्रह्मसम्भजनशील त्वां क्षत्रवनि सजातवन क्षत्रादि सर्वजनसंभजनीयं त्वा उपदधामि सम्पादयामि । धर्त्रमसि यमनिय मादीनां विविधोपासनानाञ्च धारयित्रसि तत्सामर्थ्यवानसि । तेनदिवं द्युलोकं तत्रत्यांश्च दृ १७ ° ह दृढी कुरु ब्रह्मचर्य -लक्षणेन ब्रह्मवीर्येण तत्पूर्वकोपासनैरेव ब्रह्मलोकप्राप्तिसम्भवात् । तेन भ्रातृव्यस्यानैश्वर्यलक्षणस्य वधाय त्वा ब्रह्मवनि क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि । ' विद्याश्वाविद्याश्व यस्तद्व दोभय २७ सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते । इतिमन्त्रवर्णात् । उसकी व्याख्या करते हैं । महर्षि भृगु अङ्गिरसों के तपोविशेष से उत्पन्न जो तेज है, वह अग्नि आदि अन्य तेजों से तेजस्वितम है, यानी अतिशय दीप्तिमत् है । अतिशय अर्थ में ' तेजस्वि ' शब्द से ' इष्ठन् ' प्रत्यय किया गया है । १६ -- मन्त्र का अभिप्राय बताते हैं- ये उपहित कपाल भृगु अङ्गिरसों के तप से सम्यक् प्रकार से अतिशय तप्त हों, इस अभिप्राय से ' आसन ' यह पञ्चम लकार का रूप है । इस विवेचन से ' भृगु और अङ्गिरसों ' को व्यक्ति विशेष न कहने का खण्डन हो जाता है । शतपथ श्रुति ने ही सुतप्त भृगु अङ्गिरसों का तेजष्ठित्व बताया है । तथा ' अङ्गिरस्तमम् ' में तमप् प्रत्यय का होना अनुपपन्न भी नहीं है । अन्वर्थ संज्ञा वाले अनेक अङ्गिरसों के मध्य में अतिशयित अर्थ के बोधनार्थ तमप् ' प्रत्यय के होने में कोई बाधक नहीं है । उसी तरह यहाँ पर सायणाचार्य ने कहा भी है । १७ - अध्यात्म पक्ष में तो - हे अग्ने तेजस्विन् ब्रह्मचादिन्! ' ब्रह्म ' यानी वेद का गुरु परम्परा से अध्ययन करो । समस्त वेद का तात्पर्य जिसमें है उस ब्रह्म को वेदान्त वाक्यों का विचार कर समझो । तुम, वेद प्रतिपाद्य परमतत्त्वप्राप्तिसाधक श्रोत स्मार्त कर्म के धारण करने में सामर्थ्य रूप वीर्य हो । धर्म और धर्मी का अभेद होने से वेद के अध्ययन तथा तदर्थानुष्ठान से अन्तरिक्ष और वहाँ के देव समूह का वर्धन करो और उनको सुदृढ़ बनाओ । मैं वेद पुरुष, भ्रातृव्य के वधार्थ यानी कामादि के निरासार्थ ब्रह्म सम्भजनशील, क्षत्रादि सर्वजन सम्भजनीय, अर्थात् ब्रह्मवनि, क्षत्रवनि, सजातवनि गुणों से युक्त हुए तुम्हारा सम्पादन करता हूँ । तुम यमनियमादि और विविध उपास-नाओं के धारण करने वाले हो अर्थात् उसे धारण करने का सामर्थ्य तुममें है । उस कारण द्युलोक तथा वहाँ के निवासियों को दृढ़ करो । ब्रह्मचर्य लक्षण ब्रह्मवीर्य से और तत्पूर्वक उपासनाओं से ही ब्रह्मलोक की प्राप्ति का होना सम्भव है । अत: अनैश्वर्य लक्षण भ्रातृव्य के वधार्थ, ब्रह्मवनि - क्षत्रवनि - सजातवनि गुण विशिष्ट रहने वाले तुम्हारी स्थापना करता हूँ । ' विद्याश्वाविद्याश्च यस्तद्वेदोभय २७ ° सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते । ' यह मन्त्रवर्ण है ।

पृष्ठ 189

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 189 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १७६ ] १८ - यद्वा ब्रह्मचारी अग्निमेव परमात्मानं वा प्रार्थयते -- हे अग्ने देव परमात्मन् वा त्वं ब्रह्मवेदं गृभ्णीष्व कृपया मां ब्रह्मवेदं ग्राह्य, वेदप्रायं ब्रह्म वा मां ग्राह्य प्रापय । तत्प्रापणेन मामनुगृह्णीष्व वा । त्वं धरुणमसि, तद्वानसी-स्यर्थः । अग्निदेवतानुग्रहेणैव वेदाविद्यामेधाप्राप्तिश्रवणात् । ' यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मेधयाद्य मामग्ने मेधाविनं कुरु ' इति मन्त्रवर्णात् । परमेश्वरानुग्रहस्तु सर्वकल्याण हेतुः प्रसिद्ध एव । त्वमन्तरिक्षं दृ १७ ° ह । अग्नेर्वैश्वानर विरारूपत्वेनान्तरिक्षादिदाढर्य हेतुत्वमपि प्रसिद्धमेव । भ्रातृव्यस्य वधाय ब्रह्मवनि ब्रह्मसंभजनीयं सजातवनि प्राणिमात्र-भजनीयं त्वामहमुपदधामि हृदये धारयामि । हे अग्ने त्वं धर्वमसि सर्वधारयित्रसि हिरण्यगर्भरूपत्वात् । तेन दिवं ह ह । भ्रातृव्यस्य बधाय ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि त्वा सजातवनि त्वोपदधामि किश्व विश्वाभ्य आशाभ्यो दिग्भ्यः सर्वाभ्य: कामनाभ्यो वा त्वोपदधामि । हे चितः सामान्यज्ञानवन्तो जीवा यूयमूर्ध्व चितः स्थ परमात्मज्ञानवन्तो भवथ । ऊध्व ब्रह्म सर्व कारणत्वात् व्यापकत्वात् सूक्ष्मत्वाच्चोत्कृष्टं ब्रह्म । तच्चेतन्ति जानन्तीत्यूर्ध्वचितः स्थ । तदर्थं भृगूणामङ्गि-रसाश्व प्रसिद्धेन तपसा तप्यध्वम् । तज्जातीयेन तपसैव निष्कल्मषेण बुद्धिशुद्धिविवेक राग्यशमदममुमुक्षुत्वादि सम्पत्तौ चेतृत्व सम्भवति । १६ -- नात्र दयानन्दोक्तमर्थं मनागपि शतपथश्रुतिः स्पृशति । शर्मास्यवधूत ं रक्षोऽवधूताऽयरातयोदित्यास्त्वगसि प्रतित्वादितिर्वेत्तु । धिषणासि पर्वतीं प्रति त्वादित्यास्त्वग्वेत्तु दिवः स्कम्भनीरसिं धिषणासि पार्वतेयी प्रति त्वा पर्वती वेत्तु ॥ वा ० सं ० ११६ ॥ । १८ - अथवा ब्रह्मचारी, अग्नि या परमात्मा की प्रार्थना कर रहा है - हे अग्निदेव अथवा परमात्मन्! तुम वेद का ग्रहण करो और कृपया मुझे वेद का ग्रहण करवाओ । अथवा वेदप्राय ब्रह्म, मुझे प्राप्त करवाओ । उसे प्राप्त कराकर मुझ पर अनुग्रह करो । तुम उसे धारण करने में समर्थ हो । अग्नि देवता के अनुग्रह से ही वेदादि विद्या ग्रहण करने की मेधा की प्राप्ति होती है, यह श्रुत है इसी बात को मन्त्र वर्णात्मक श्रुति ने बताया है । परमेश्वर का अनुग्रह ही समस्त कल्याणों की प्राप्ति में हेतु है, यह प्रसिद्ध ही है । हे अग्ने! तुम ब्रह्मवनि, क्षत्रवनि, सजातवनि हो, इसी कारण मैं तुम्हें अपने हृदय में धारण करता हूँ । हे अग्ने! तुम हिरण्य गर्भ स्वरूप हो, अत एव सबके धारक हो । इसी कारण तुम द्युलोक को दृढ़ कर दो । भ्रातृव्य के विनाशार्थं मैं तुम्हारी स्थापना करता हूँ । किञ्च समस्त दिशाओं के लिये अथवा समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिये मैं तुम्हारी स्थापना करता हूँ । हे चितः! सामान्य ज्ञान से सम्पन्न जीवों! तुम सब परमात्मा के ज्ञान को प्राप्त कर लो । यह ब्रह्म समस्त सृष्टि का कारण है, सर्वत्र व्यापक है, सूक्ष्म है, अत: सर्वोत्कृष्ट है । ऐसे उस ब्रह्म को जानकर तुप सब ऊर्ध्व चित् हो जाओ । तदर्थं भृगु और अङ्गिरसों प्रसिद्ध तप के अनुसार तप करो । उस प्रकार के निष्कल्मष तप से ही बुद्धि शुद्धि, विवेक, वैराग्य, शम, दम, मुमुक्षुत्व आदि सम्पत्ति के होने पर ही ऊर्ध्वं चेतृत्व का होना सम्भव हो सकता है । १८- इस विषय में दयानन्दोक्त अर्थ का स्पर्श भी शतपथ श्रुति से नहीं उपलब्ध हो रहा है ।

पृष्ठ 190

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 190 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ १७७ ] अर्थ - कृष्णाजिन! तुम दृषद् ( सिल ) धारण करने में सुखहेतु हो । इस कृष्णाजिन पर संलग्न रहने वाला राक्षस दूर किया गया । तथा प्रतिबन्धक शत्रु भी भूमि पर कम्पित हो गये । हे कृष्णाजिन! तुम भूमि देवता की त्वचा हो । तुम्हें भूमि देवता अपनी त्वचा समझे । हे दृषद्! ( हे सिला! ) तुम पर्वत पर उत्पन्न हुई हो और पर्वत समान इस पेषण कर्म को धारण करती हो । भू देवी की कृष्णाजिन रूपी त्वचा तुम्हें अपनी आत्मीय समझे । हे शम्ये! तुम द्युलोक का स्तम्भन करती हो । हे उपल! तुम पेषण कर्म करते हो । तुम दृषद् ( सिल ) की अपेक्षा लघु ( छोटी ) हो, उस कारण दृषद् की कन्या जैसी शोभा दे रही हो अतः दृषद् का पाषाण तुम्हें अपनी कन्या के रूप में पहिचाने ॥ १ ॥

१ – कृष्णाजिनमादत्ते पूर्ववत् ' ( का ० श्रो ० सू ० २५ २ ) अध्वर्युः फलीकरणानन्तरमेव कृष्णाजिनमादत्ते । कृष्णाजिनं प्रति पूर्ववत् । अवहननमिव आदानमवधूननं सन्याशून्यकरणम् चेत्येतेषां विधिर्भवति । तच्चैतत्पेषणार्थत्वात् तदपेषणे न भवति । मन्त्रास्तु व्याख्यातप्रायाः । ' तस्मिन् दृषदं धिषणासीति ' ( का ० श्री ० सू ० २५ ३ ) सव्याशून्ये तस्मिन् कृष्णाजिने दृषदं स्थापयेदध्वर्युः धिषणासीति मन्त्रेण । हे पेषणाधारभूते शिले त्वं पर्वती पर्वतात्मिकासि धीः कर्म-बुद्धिर्वा तदुभयं सीदति सनोति वेति कर्माङ्गत्वात् दृषद् धिषणोच्यते । कृष्णाजिनरूपा भूमेस्त्वगियं प्रतिवेत्तु च कृष्णाजिनाय प्रतिगृह्य त्वदवस्थानमनुजानातु । वेत्त्वित्यस्याभिप्रायं कण्व आह प्रतित्वादित्यास्त्वग्वेत्त्विति संज्ञामेवैतत् दृषदे च वदति नेदन्योऽन्यं हिनसाते इतीति । एतदेतेन मन्त्रेण दृषदश्च कृष्णाजिनस्य च संज्ञामेव वदति किमर्थं परस्पर-ते हिंसां नैव कुरुतामित्येतदर्थम् । ' पश्चाच्छभ्यामुपोहत्युदीचीं दिव इतीति ' ( का ० श्री ० सू ० २।५।४ ) दिव इति मन्त्रेण दृषदः पश्चाद् भागे उदगग्रां शम्यां द्वादशाङ्ग ुलां दृषदोऽधस्तात् प्रवेशयेदध्वर्युः । तेन पश्चाद्भागे उच्चा अग्रतो निम्ना दृषद् भवतीति । मन्त्रार्थस्तु – हे काष्ठमयि शम्ये त्वं दिवो द्युलोकस्य स्कम्भनीरसि, अध: पतनवारणाय स्तम्भनकारिणी भवसि ' अन्तरिक्षेण हीमे द्यावापृथिव्यौ वी विष्टब्धे ' ( श ० १ २ १/१६ ) इति श्रुतेः । व्यत्ययेन द्वितीयाबहुवचनम् । कण्वशाखायां तु स्कम्भन्यसीतिपाठः । शम्यायां द्युलोकस्तम्भन हेतुत्वं दर्शयति श्रुतिः ' द्यावापृथिवी- पृथिव्यो सहास्ताम्, ते शम्यामात्रमेकमहता ७ शम्यामात्रमेकमहरिति ' ( तै ० २ ) पुरा प्रजापतिना सृष्टे यागस्यावकाशो द्यावा न जतुकाष्ठवत् परस्परं संश्लिष्टे अभूताम् । प्रतिदिनं तथेति विवक्षया वीप्सोक्ता । तयोः पुनः संश्लेषे २।४५ ५ ) पेषणार्थं स्यात् ततो विश्लेषाय दिव: स्कम्भन्यसीति मन्त्रः । दृषदुपलां धिषणासीति ' ( का ० श्रो ० सू ० १ - कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुरोध से अध्वर्यु, फलीकरण के अनन्तर ही कृष्णाजिन का ग्रहण करता है । जिस प्रकार अवघात के लिये कृष्णाजिन का प्रयोग बताया गया था, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये । अर्थात् विधियाँ पेषणार्थं होने से आदान, अवधूनन, सव्याशून्य करणत्व आदि सब विधियां यहाँ पर भी की जाती हैं । ये सब जहाँ पेषण नहीं हैं, वहाँ ये विधियाँ नहीं होती हैं । मन्त्र तो व्याख्यातप्राय ही हैं । ' तस्मिन् दृषदं धिषणासीति ' इस मन्त्र ' से इस । सूत्र के अनुसार सव्य हस्त से अशून्य उस कृष्णाजिन पर अध्वर्यु दृषद् को स्थापित करे ' धिषणासि हे पेषणाधारभूते शिले! तुम पर्वतात्मिका हो । ' धी: कर्म बुद्धिर्वा तदुभयं सीदति सनोति वा इस निरुक्ति के अनुसार त्वचा है कर्म का अङ्गभूत रहने से ' दृषद् ' को धिषणा कहा जाता है । अदिति रूप भूमि की यह कृष्णाजिन रूपा ऐसा समझे । तदनन्तर सूत्रकार कहते हैं कि ' दिव: ' इस मन्त्र से दृषद् के पश्चात् भाग में अधस्तात् द्वादशांगुल वाली शम्या को उदगग्र रखे । इस प्रकार दृषद् के नीचे शम्या को प्रविष्ट करने से वह दृषद् पश्चात् भाग में ऊँची और अग्र भाग में निम्न ( नीची ) हो जाती है । हे काष्ठमयि शम्ये! तुम द्यु लोक को अध: पतन से रोकने वाली हो अतः स्तम्भनकारिणी हो । पहले किसी समय प्रजापति के द्वारा स्पर्श किये जाने पर द्यौ और पृथिवी, जतु - काष्ठ के समान परस्पर एक दूसरे से चिपक गई । उनके परस्पर चिपक जाने से याग के लिये कहीं जगह ( अवकाश ) ही नहीं रही । अत: ' दिव: स्कम्भन्यसि ' मन्त्र से उनका परस्पर विश्लेषण किया जाता है । तदनन्तर सूत्र कहता है कि पेषणाथ दृषद् के समान उपला को भी स्थापित करे । हे उपले! उपरितन शिले! तुम पेषण व्यापार की धारिका हो । तुम