वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 31–40

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 31–40

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[ १८ ] वृक्षो जातः । अतः सोमसम्बन्धात् गायत्रीसम्बन्धाच्च पलाशवृक्षः प्रशस्य इत्युक्तम् । ' गायत्र्ये वा सोमस्य वा रा ० ज्ञस्तत्पतित्वा वर्णोऽभवत् तस्मात्पर्णो नाम तद्यदेवात्र सोमस्य त्यक्तं तदिहाप्यसदिति तस्मात्पर्णशाखया वत्सानपा-करोती ( श १ | ७ | १।१ ) ति शतपथश्रुतेः । २६ -- ' तृतीयस्यामितो दिवि सोम आसीत् । तं गायत्र्याहरत् । तस्य पर्णमच्छिद्यत तत् पर्णोऽभवत् तत्पर्णस्य ५ पर्णत्वम् ब्रह्म वै पर्णः यत्पर्णशाखया वत्सानपाकरोति ब्रह्मणैवैनानपाकरोति ' ( तै ० ब्रा ० - ३ | २ | १ | १ ) इति तैत्तिरीयाः । पर्णमात्रस्य कुतः पलाशवृक्षत्वमिति न शङ्कितव्यम् विधातुरचिन्त्यशक्तित्वात् । अन्यथा वीजादेव कथं वृक्षो भवतीत्यप कथं न संशयः? तथात्वेऽपि न सर्वत्र पर्णाद् वृक्षत्वप्रसङ्गः । ईश्वरसङ्कल्पस्य फलबल कल्प्यत्वात् । दुसी कात्यायनश्च तथैव बिनियुक्त ' पर्णशाखां छिनत्ति, शामीली वेषेत्वेत्यूर्जे त्वेति वा, छिनोति वोभयोः साकां-क्षत्वात्, सन्नमयामीति वोत्तरे ' ( का ० श्री ० सू ० ४।२।१ - ३ ) पलाशशाखा शमीशाखा वात्र कल्पिता । तच्छेदने इषे त्वा, १७ ऊर्जे त्वेति चतौ मन्त्रौ विकल्पितौ । तयोः क्रियापदसापेक्षत्वात् अर्थावबोधाय छिनद्मीति पदमध्याहर्त्तव्यम् । तदप्युक्त-मुव्वाचार्येण - अतिरिक्त पदं त्याज्यं हीनं वाक्ये निवेशयेत् । विप्रकृष्टं तु सन्दध्यादानुपूर्व्यं च कल्पयेत् ॥ लिङ्ग धातु विभक्ति च योज्यं वाक्यानुलोमतः । यद्यत् स्याच्छान्दसं वाक्ये तत्तत्कुर्यात्तु लौकिकम् ॥ ३० -- तत्र लौकिकोऽध्याहारो यथा ' भूताय त्वा नारातये ' ( वा ० सं ० १1११ ) अत्र मन्त्रे परिशेषयामि इति, ' पिनष्टि प्राणाय त्वेति प्रतिमन्त्र ' ( का ० श्र ० सू ० २।५।६ ) प्राणाय त्वा ' ( वा ० सं ० १।२० ) पिनष्मि इति । अनुषङ्गस्तु मन्त्रावयव एव । यथा - ' ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः ' । ( वा ० सं ० २।२५ ) इत्ययमंशः है कि उसके आहरण काल में पक्षी का रूप धारण की हुई गायत्री का पङ्ख और सोमलता का पत्र भूमि पर गिर पड़ा । उनमें से एक पर्ण नामक पलाश वृक्ष हो गया । अतः सोम तथा गायत्री का सम्बन्ध होने के कारण ' पलाश - वृक्ष ' को ' प्रशंसनीय कहा गया है । वहाँ जो कुछ सोम का अंश छूटा, वह ' पर्ण ' हुआ । ' इसलिये पर्णशाखा से बछड़ों को पृथक् करता है - ऐसी शतपथश्रुति है । २६ — यहाँ से तीसरे स्वर्ग में ' सोम ' विद्यमान था । गायत्री ने उसका आहरण किया । उसका पर्ण टूट गया । वही ' पर्ण ' बना, यही उस पर्ण का पर्णत्व है । ' ब्रह्म ' ही पर्ण है । पर्ण की शाखा से वत्सों के अपाकरण का अर्थ है कि ' ब्रह्म से ही उनका अपाकरण करना " ऐसा तैत्तिरीय श्रुति बता रही है । एक पत्ता टूटकर उसका पलाशवृक्ष कैसे बन गया? ' - - यह शङ्का नहीं करनी चाहिये, क्योंकि विधाता की शक्तियाँ अचिन्त्य हैं । अन्यथा अणुमात्र बीज से महान् वृक्ष कैसे निकल आया? यही संशय क्यों नहीं करते? वैसा मान लेने पर भी सर्वत्र ' पूर्ण ' से बृक्ष की उत्पत्ति का प्रसङ्ग नहीं आवेगा । क्यों कि ' फल ' को देखकर ईश्वर का यहाँ ऐसा करने का ही सङ्कल्प था, यह कल्पना है । कात्यायन महर्षि ने ऐसा ही विनियोग बताया है - ' पर्ण की शाखा का अथवा शामीली वृक्ष की शाखा का छेदन करता है ' । यहाँ पर पलाश अथवा शामीली ( शमी ) वृक्ष की शाखा की कल्पना की गई । उसके छेदन में ' इषेत्वा ' और ' उर्जेत्वा ' इन दो मन्त्रों का विनियोग विकल्प से किया गया है । उन दोनों मन्त्रवाक्यों को क्रियापद की अपेक्षा होने से ' छेदन करता हूँ ' इस क्रियापद का अर्थज्ञान के लिये अध्याहार करना चाहिये । उब्बटाचार्य ने ऐसा करने का निर्देश देते हुए कहा है कि " अतिरिक्त पद को छोड़ देना चाहिये तथा न्यून पद का निवेश करना चाहिये, जो पद विप्रकृष्ट ( दूर ) हो उसे समीप लाकर पौर्वापर्य का निश्चय करना चाहिये । ३० - वाक्य के अनुरोध से लिङ्ग, धातु तथा विभक्ति की योजना करनी चाहिये । वाक्य में जो छान्दस ( वैदिक ) हो, उसे लौकिक बना लेना चाहिये । लौकिक अध्याहार का उदाहरण, जैसे-- ' भूताय त्वा ', इस मन्त्र में ' परिशेषयामि ', तथा ' प्राणायत्वा ' इस मन्त्र में ' पिनष्मि ' का अध्याहार किया गया है । ' अनुषङ्ग ' तो मन्त्र का अवयव ही होता है । जैसे -- ' अस्मादन्नात् ' आदि विष्णुक्रम के मन्त्रों में जो ' ततो निर्भक्तो योऽमान् द्वेष्टि ' अंश पढ़ा गया है,

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[ १६ ] अस्मादन्नान्निक्तिः । अस्यै प्रतिष्ठायै निर्भक्त इत्यादिविष्णुक्रममन्त्रेषु दिवि विष्णु ' ( वा ० सूत्रकारेण सं ० २०२५ वाक्यपूर्तिः ) रित्यादिषु कृता परि- । पठितमिहाभिसम्बद्धयते अपरिपूर्ण त्वेतत् वाक्यस्य । इह त्वन्यशाखापरिपठितेनाख्यातेन इषे त्वे ' ति छेदनार्थो मन्त्रः । ' ऊर्जे त्वे'ति छिनद्मीत चोभयोः साकांक्षत्वात् सन्नमयामीति वोत्तर इति । सोऽयमेकः पक्षः । ' रेकमन्त्रत्वमाश्रित्य तं छेदने विनि-सन्नमनार्थो मन्त्रः । सन्नमनमृजूकरणम् । तदिदं पक्षान्तरम् । बौधायनस्तूभयोर्वाक्यो किञ्चिदाश्रित्य विनियोगभेदमाह । ५ युङ्कं । तामाच्छिनत्तीषे त्वोर्जे त्वेति । आपस्तम्बस्तु तदभिसन्धाय मन्त्रभेदपक्षमपि त्वेति सन्नमयत्यनु-सन्नयतः पलाशशाखां शमीशाखां वा हरति इषे त्वोर्जे त्वेति तामाच्छिनत्यपि वेषेत्वेत्याच्छिनत्त्यूर्जे मष्ट वेति । ३१ – सन्नयतः सान्नाय्यनामकं दधिरूपं हविः कुर्वत इत्यर्थः । काण्वास्तु मन्त्रभेदं विनियोगभेदं चाश्रित्य तस्मा-तामाच्छिन्नीषे तिवृष्टये तदाह यदिषे त्वेत्यूर्जे त्वेत्यनुमाष्टि यद् वृष्ट्या असो जायते तस्मा उ एतदाह तद्वृष्टि - १ दाहोर्जे त्वेतोति । तां पर्णशाखां इषेत्वेति मन्त्रेणाध्वर्युः साकल्येन छिन्द्यात् छेदनकाले इषे त्वेति यद्वाक्यमाह प्रभूत-सिद्ध्यर्थं ऊर्जे त्वेति मन्त्रेण तां शाखामनुमृज्यात् । अनुमार्जनं आनुलोम्येन तस्य संल्लग्नघुल्याद्यपनयनम् प्राणिनामुपकारो । यदि भवति । वृष्टेः सकाशात् ब्रोहियवाद्यभिबृद्धि हेतु रूजं शब्दाभिधेयः समीचीनजलात्मको रसो जायते । तदा तदर्थमेवाध्वर्यु राह । किमाहेत्याशङ्कय तस्मादाहोर्जे त्वेति वाक्येन तदेव स्पष्टीक्रियते उसका सम्बन्ध यहाँ भी वाक्य की अपरिपूर्णता को दूर करने के लिये किया जाता है । अन्य शाखा में पठित क्रियापद से सूत्रकार ने वाक्य की पूर्ति की है । ' इषेत्वा ' और ' उर्जेत्वा ' में दोनों ही पद साकाङक्ष हैं । अतः ' छिनद्भि ' पद से १५ अथवा सन्नयामि ' पद से इनकी पूर्ति की जाती है- यह एक पक्ष है । ' इषेत्वा ' यह मन्त्र छेदनार्थ है और ' उर्जेत्वा यह मन्त्र, सन्नमनार्थ है । ' सन्नमन ' का अर्थ ऋजूकरण है - यह दूसरा पक्ष है | किन्तु बौधायन तो दोनों मन्त्रवाक्यों को एक ही ' मन्त्र ' मानकर उसका ' छेदन ' में विनियोग बताते हैं-' तामाच्छिनत्तीषेत्वोर्जेत्वेति ' अर्थात् ' इषेत्वोर्जेत्वा ' से उसका छेदन करता है । और आपस्तम्ब तो पूर्वोक्त का अभि-सन्धान करते हुए मन्त्र भेद पक्ष का भी कुछ आश्रय लेकर दोनों का भिन्न - भिन्न विनियोग बताया है । ' सान्नाय्य ' हवि के २० निर्माणार्थ ' पलाश ' या ' शमी ' की शाखा का हरण करता है । ' इषेत्वोर्जेत्वा ' मन्त्र से उसका छेदन करता है, अथवा ' इषेत्वा ' मन्त्र से उसका छेदन और ' उर्जेत्वा ' से उसका सन्नमन अथवा अनुमार्जन करता है । ३१ – ' सन्नयतः ' का अर्थ है - ' सान्नाय्य ' नामक पयोदधिरूप हवि का सम्पादन करनेवाले का । काण्वशाखा-ध्यायी मन्त्रभेद और विनियोग भेद का आश्रय लेकर उसका ( शाखा का ) छेदन करते हैं । ' इषेत्वा ' इस मन्त्र का उच्चारण ' वृष्टि ' के लिये है । इसी अभिप्राय को काण्वशाखी इस प्रकार बताता है - ' इषेत्वा, उर्जेत्वा ' से जो २ अनुमार्जन करता है, वह वृष्टि से उत्पन्न होनेवाले ' रस ' के लिये है । अध्वर्यु ' उस पर्णशाखा का ' इषेत्वा ' इस मन्त्र को बोलकर पूर्णशाखा का छेदन करे । छेदन करते समय ' इषेत्वा ' इस वाक्य का उच्चारण ' वृष्टि ' के लिये किया जाता है । ' उर्जेत्वा ' इस मन्त्र उस शाखा का अनुमार्जन करे । शाखा को झुका कर उस पर लगी हुई धूलि आदि को स्वच्छ करना चाहिये । यदि उर्ज ' पद का अर्थ, प्रभूत ( पर्याप्त ) वर्षा से व्रीहि - यव आदि की अभिवृद्धि में हेतुभूत ' समीचीन जलात्मक रस ' तो ' उर्जेत्वा ' का उच्चारण करने से प्राणियों का उपकार होता है । इसलिये ' अध्वर्यु ' कह रहा है | क्या कह रहा है? इस प्रश्न के उत्तर में ' उर्जेत्वा ' इस वाक्य से उसी को स्पष्ट किया गया है ।

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[ २० ] तत्र प्रथमा 1 1 ३२ – हरि ÷ ओम् । इषै त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्व-I मन्या इन्द्राय भाग प्रजावतीरन मीवा अयक्ष्मा मा वस्तेन ईशत माघ २७ सो ध्रुवा अस्मिन् गोपतो स्यात जी1 " बह्मी यजमानस्य प॒शून्पाहि || १ || ( वा ० सं ० १1१ ) मन्त्रार्थस्तु ~ - हे शाखे इषे इष्यमाणायै वृष्ट्ये त्वा त्वां छिन । ५ इष्यते कां सर्वेहि ब्रीह्यादिधान्यनिष्पत्तये इतोट् ( इषु इच्छायाम् ) इषे इति तादर्थ्ये चतुर्थी । ननु यद्येषणा-क्रियायोगादिह वृष्टिरभिधीयते न तु रूढया तदानीं यद्धिरण्यादि किश्विदिष्यते तत्सर्व मिडुच्येत, तथा सति संव्यवहारो-च्छेदः स्यादिति चेन्न, यतो हि सिद्धेशब्दार्थसम्बन्धे पश्चादभिधानाभिधेयभावं क्रियाद्वारकं प्रकाशयितु ं व्युत्पत्तिः क्रियते । इह तु ' वृष्ट्यैतदाह यदाषेत्वा ' ( श ० १।७।१२ ) इति श्रुत्यैवेट्पदेन वृष्टिरभिधेयेत्युक्तम्, तथापि व्युत्पत्तिद्वारेण शब्दानां परिज्ञानमभ्युदयहेतुरिति श्रुतिर्दर्शयति । " तत्प्रणीतानां प्रणीतात्वं प्रतिह तिष्ठति य एवमेतत्प्रणीतानां प्रणी-१० तात्वं वेद ' ( श ० १२६ / ३८ ) इति । एवमेव पुरुषशब्दव्युत्पत्ति प्रकृत्याह -- ' स यत्पूर्वोऽस्मात् सर्वस्मात् सर्वान् पाप्मन औषत् तस्मात् पुरुष ओषति हवै सतं योऽस्मात्पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ' ( श ० १४/४/२२ ) ऊर्जे त्वेति मन्त्रः शाखा-संनमने विनियुक्तः । १५ 1. उसी को स्पष्ट कहनेवाला यह प्रथम मन्त्र है -( प्रथमा कण्डिका ) ३२ -- हरिः ÷ ॐ । ' इषेत्वोर्जेत्वा इत्यादि ॥ १ ॥ ( वा ० सं ० ११ ) ।

मन्त्रार्थ - हे शाखे | इषे ] अभीष्ट वर्षा के लिये [ त्वा ] तुम्हें काटता हूँ । ' इषे ' पद की निष्पत्ति ' इषु इच्छायाम् ' धातु से बने हुए इट् ' शब्द से हुई है । जो धातु के अर्थ में ही विहित चतुर्थी विभक्ति के एक वचन का रूप है । व्रीहि आदि धान्यों की निष्पत्ति के लिये सभी के द्वारा वृष्टि की कामना की जाती है । अत: ' इट् ' शब्द से ' वृष्टि ' का ग्रहण किया गया है । शङ्का -- यदि एषणा क्रिया के सम्बन्ध से यहाँ पर जिसकी इच्छा की जा रही है, उस ' वृष्टि ' का ग्रहण किया गया है, तो उस ' वृष्टि ' रूप अर्थ का ग्रहण, ' रूढि ' से हुआ नहीं कहा जायगा । अर्थात् उस अर्थ को ' रूढ्यर्थ ' न कहकर ‘ यौगिक ' कहा जायगा । क्योंकि उक्त अर्थ को यौगिक व्युत्पत्ति से ग्रहण किया गया है । तब तो अन्य सुवर्ण ( हिरण्य ) आदि वस्तुओं की भी एषणा ( अभिलाषा ) होती है, अत: उनका भी यहाँ ग्रहण हो सकने से उन्हें भी ‘ इट् ' शब्द से कहना होगा । तब तो शब्दों के सुनियत व्यवहार का ही उच्छेद होने लगेगा । समा ० -- उक्त आशङ्का के समाधानार्थ एक अन्य सिद्धान्त समझना होगा कि ' शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध ) नित्य हुआ करता है, उस नित्य सम्बद्ध अर्थ को ही बाद में ' क्रिया ' के द्वारा ' वाच्य वाचकभाव ' ( अभिधानाभिधेयभाव प्रकाशित करने के लिये व्युत्पत्ति की जाती है । यहाँ तो ' वृष्ट्य ' इत्यादि शतपथ ब्राह्मण के द्वारा ही ' इट् ' पद से ' वृष्टि ' को बताया जा रहा है -- कह दिया गया है, तथापि व्युत्पत्ति के द्वारा शब्दों का ज्ञान प्राप्त करना अभ्युदय-कारक होता है, इस बात को भगवती श्रुति बता रही है -- ' तत् प्रणीतानाम्प्रणीतात्वं " - - वह प्रणीता का प्रणीतात्व है, जो उसको जानता है वह प्रतिष्ठित होता है इसी प्रकार ' पुरुष ' शब्द की व्युत्पत्ति के सन्दर्भ में कहा गया है -- “ स यत्पूर्वोऽस्मात् " इत्यादि । ' पुरुष ' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की गई है - - ' पुरा ओषत् ' इति पुरुषः । ' पुरा ' सब से पहिले सभी पापों को ' औषत् ' भस्म कर दिया, इसलिये इसे ( पुरा ओषत् ) ' पुरुष ' कहते हैं ।

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[ २१ ] ३३ -- शाखैव देवता | हे शाखे त्वा त्वां सन्नमयामि इति वाक्यशेषः । ऋकरोमीत्यर्थः । किमर्थम् ऊर्जे राय ( ऊर्ज बलप्राणनयोः ) इति धातोर्निष्पन्नत्वात् । ऊर्जइति वृष्टिगतो बलात्मको रसः सर्वान् मनुष्यपश्वादीन् बलयति पानादिना दृढशरीरान् करोति, प्राणयति प्रकर्षेण चेष्टयति वेति व्युत्पत्तिभ्यामूर्जपदेन वृष्टिगतो जलात्मको रस उच्यते । तस्मै रसाय त्वामनुमाज्मि । श्रत्याप्ययमेवार्थो दृढीक्रियते । ' यो वृष्टादू सो जायते तस्मै तदाह ' ( श ० १ / ७ / -१२ ) इति श्रुतेः । उक्तमन्त्रद्वयपाठेनाध्वर्यु रिष्यमाणमन्न वलकरमाज्यक्षीरादिरसं च यजमानें सम्पादयत्येव ' इषे ५ वोर्जेत्याह । इमे वोर्ज यजमाने दधाति । ' ( तै ० ब्रा ० ३।२1१1३ ) इति तित्तिरिवचनात् । न चात्र प्रत्यक्षविरोधः, अर्थवादस्य प्रशंसारूपगुणवादत्वाङ्गीकारात् । यदा कदाचिदन्नरसयोर्यत्सम्पादनं तस्यैतन्मन्त्रफलत्वाङ्गीकारेण भूतार्थ-वादत्वमपि सम्भवत्येव । यद्वा तथाभूतमन्त्रसंस्कृतसान्नाय्यहविर्दानेनाग्ने मो जायते धूमादभ्रमभ्राद् वृष्टिर्जायते । ३४ – श्रुतिश्चात्र भवति - ' अग्ने वैधूमोजायते धूमादभ्रमभ्राद् वृष्टि: ' ( श ०५।३।५।१७ ) तथा - ' इतः प्रदानाबद् वृष्टिरितोह्यग्निवृष्टिवनुते स एतैः स्तोकैरेतांस्तोकान्वनुते त एते स्तोका वर्षन्ति ' ( श ० ३८ २ २२ ) इति । 90 ‘ वायवःस्थ ' इति मन्त्रेण वत्सं शाखयोपस्पृशति । ' मातृभिर्वत्सानसंसृज्य वत्सं शाखयोपस्पृशति वायवः स्थेति ' ( का ० श्री ० सू ० ४ | २ | ७ ) इति कात्यायनवचनात् । अस्य मन्त्रस्य वायुर्देवता । वान्ति गच्छन्तीति वायवो गन्तारः वत्सा यूयं वायवः स्थ भवत । यथा वायुर्वृष्टिद्वारेण गवामाप्यायक एवं यूयम् प्रस्तुतिद्वारेणाप्यायका भवथेत्यर्थः । वत्सा यूयं मातृभ्यः सकाशात् अन्यत्र गन्तारो भवथ । मातृभिः सहगमने सायं पयोलाभासम्भवात् । अथवा यथा ३३ -- इस ' पुरुष ' शब्द की व्युत्पत्ति को जो जानता है वह भी ज्ञान और उपासना के अथवा ज्ञान बल से १५ उन सभी को अभिभूत कर देता है, जो इस ज्ञानी से पूर्व ' प्रजापति ' बनना चाहता है । ऊर्जेत्वा ' - यह मन्त्र, ' शाखा के सनमन ' में विनियुक्त है । ' शाखा ' हो उस मन्त्र की देवता है । हे शाखे! मैं तुम्हें, ' सन्नमयामि ' = ऋजु करता हूँ अर्थात् सीधा करता हूँ - यह अंश, उर्जेत्वा ' का ' वाक्यशेष ' कहलाता है अर्थात् पूरक अश है । किसलिये सन्नमन किया जा रहा है? तो कहा ' ऊर्जे ' रस के लिये । ' ऊर्क ' पद की निष्पत्ति ' ऊर्ज बल प्राणनयो: ' धातु मे होती है । ' ऊर्ज ' अर्थात् वृष्टिगत बलात्मकरस, सम्पूर्ण मनुष्य, पशु आदिकों को यानी पानादि क्रियाओं के द्वारा उनके शरीरों को ५० सुदृढ़ करता है, बलवान् बनाता है । अतः उसे ' ऊर्ज ' कहा गया है । " प्राणयति प्रकर्षेण चेष्टयति वा ' इस द्विविध व्युत्पत्ति के बल पर ' ऊर्ज ' पद का अर्थ ' वृष्टिगत जलात्मक रस ' किया जाता है । उस रस की प्राप्ति के लिये हे शाखे! तुम्हारा मैं अनुमार्जन करता हूँ । “ यो वृष्टात् " इत्यादि श्रुति से भी इसी अर्थ को पुष्ट किया गया है । उक्त दोनों मन्त्रों के उच्चारण से ' अध्वर्यु ', अभीष्ट बल का प्रदान करने वाले आज्य, क्षीर आदि रस को यजमान के लिये सम्पादित करता है । तित्तिरि का भी इसी प्रकार वचन है? इस कथन का ' प्रत्यक्ष ' से भी कोई विरोध नहीं है । क्योंकि अर्थवादवाक्यों २५ को प्रशंसारूप गुणवाद के रूप में स्वीकार किया जाता है । जब कभी यजमान के शरीर में अन्न और रस का सम्पादन होगा, वह इसी मन्त्र के उच्चारण का फल है, ऐसा स्वीकार किये जाने पर वह भूतार्थवाद भी हो सकता है । अथवा इस प्रकार मन्त्र के द्वारा संस्कारयुक्त ' सान्नाय्य हवि के प्रदान में ' अग्नि ' से ' धूम ' होता है, ' धूम ' से ' मेघ ' उत्पन्न होते हैं । ' मेघ ' से ' वृष्टि ' होती है । 1 बै वृष्टिः " ३० ३४ - इस बात को श्रुति ने भी बताया है - जैसे, " अग्नेर्वै धूमो जायतेः " तथा " इतः प्रदानाद् इत्यादि । " वायवः स्थ " इस मन्त्र से वत्स ( बछडे ) का शाखा से स्पर्श कराता है, " मातृभिर्वत्सान् " इत्यादि कात्या-यनवचन भी उक्तार्थ को पुष्ट कर रहा है । इस मन्त्र की देवता - ' वायु ' है । ' वान्तिगच्छन्तीति वायवो गन्तारः ' -गमन क्रियाशील होने से उसे ' वायु ' कहा जाता है । हे वत्सों! तुम वायु हो जाओ । जैसे वायु, वर्षा के द्वारा गौओं को तृप्त करता है, वैसे ही तुम भी ' प्रस्तुति ' के द्वारा गौओं के तृप्तिकारक बनो । अथवा " हे वत्सों! तुम माताओं के समीप ' अन्यत्र चले जाओ । " माताओं के साथ जाने से सायंकाल दूध की प्राप्ति नहीं होगी । अथवा पादप्रक्षालन ३५ तथा निष्ठीवन ( थूकना ) आदि से अपवित्र हुई भूमि को वायु जिस प्रकार शुद्ध करके पवित्र बनाता है, वैसे ही बछड़े

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[ २२ ] वायुः पादप्रक्षालननिष्ठीवनादिभिरुपहतां भूमि शोधयित्वा पुनाति एवं वत्सा अपि पुनन्ति तस्माद्वायुसादृश्यम् । अनुलेपनहेतुभूत गोमयादिदानेनभूमि ३५ - - यद्वा मनुष्याणामिव स्वनिवासाय गृहनिर्माणसामर्थ्याभावात् । निरावरणेऽन्तरिक्षे पशूनां देवता । तस्यान्तरिक्षस्य वायुरधिपतिः । स च वायुरेतान् पशून् स्वावयवानिव सञ्चरणादन्तरिक्षमेव-५ तथाविधपालनायपशून् वायवे समर्पयितुं वायुरूपत्वमापाद्य वायवः स्थेति मन्त्रः पालयतोति पशूनां वायुरूपत्वम् । ' वायवः स्थेत्याह । वायुर्वाऽन्तरिक्षस्याध्यक्षः अन्तरिक्षदेवत्याः खलुवैपशवो वायवएवैनान्परिददाति प्रवर्तते इति सर्वमेतदाह तित्तिरि: -१३ ) इति । तेन वायुरूपत्वमुच्यते । अथवा तृणभक्षणायाहनि तत्र तत्रारण्ये ' ( तै ० ब्रा ० ३।२-समागमनाय पशून् प्रकर्षेणाकारयितुं वायुरूपत्वमुच्यते । चरित्वा सायंकाले वायुवेगेन यजमानगृहे ३६ – प्रवा एनानेतदाकरोति । यदाह वायवः स्थेति ' ( तै ० ब्रा ० ३ । २ । १ । १७ मन्त्रेण वत्सानां मातरो या गावः सन्ति तासां मध्ये गामेकां पृथक्कृत्य तां शाखयोपस्पृशेत् ४ ) ( देवो वः सविता प्रार्पयतु ' इति व्याकृत्यैन्द्र ं भवति माहेन्द्र ' वा ' ( का ० श्र ० सू ० ४ | २ | ६ | १० ) इति कात्यायनस्मरणात् । ' देवो व ' इति मातृणामेकां गावः सन्ति तासां मध्ये गामेकां व्याकृत्य पृथक्कृत्य देवो व इति मन्त्रेण शाखयोपस्पृशेत् । तदर्थस्तु वत्सानां मातरो या रूपं हविरेन्द्र माहेन्द्र वा भवति । एकस्यैव वत्सस्यैकस्या एव गोः शाखयोपस्पर्शनेन सर्वेषां । तथा सति गोसम्बन्धि दधि-संस्कार: सिद्धयति बहुवचनसामर्थ्यात् । मन्त्रार्थस्तु सविता षूप्रेरणे सुवति स्व स्वव्यापारे वत्सानां सर्वासां गवां च १५ द्योतमानः परमेश्वर: । ' देवो वो दानाद्वा दोपनाद्वा द्योतनाद्वा ' ( नि ० ६ । १५ ) इति यास्क: । प्रेरयतीति सविता । देवः ३७-- हे गाव:! यो युष्मान् प्रार्पयतु प्रभूतघासजलाद्युपेतं वनं गमयतु | किमर्थं श्रेष्ठतमाय कर्मणें । कर्महि भी अनुलेपन के साधनभूत गोमय आदि का प्रदान करके भूमि को पवित्र करते हैं, इस रीति से वत्स और वायु सादृश्य है । का ' ३५ - अथवा मनुष्यों की तरह अपने निवास के लिये गृहनिर्माण करके रहना पशुओं के लिये 20 होता, वे निरावरण अन्तरिक्ष में घूमते रहते हैं । अतः पशुओं की देवता - ' अन्तरिक्ष ' सम्भव नहीं पति - ' वायु ' है । वह वायु इन पशुओं का पालन अपने अङ्गावयवों के समान करता है ही । है । उस अन्तरिक्ष का अधि-इस प्रकार के पालन के लिये पशुओं को वायु के अर्पित करने के लिये, उन्हें वायु के रूप अतः प्रस्तुत पशु भी करके वायुरूप " ही हैं । इस मन्त्र की प्रवृत्ति हुई है । इस सम्पूर्ण विषय को तित्तिरि ने ' वायवः स्थ ' मन्त्र से कहा है- वायवस्थ " अध्यक्ष है, और अन्तरिक्ष, पशुओं की देवता है, इसलिये ' पशु ', वायुरूप हो हैं । वह वायु, " वायु, अन्तरिक्ष का २५ है । " इसी कारण पशुओं को वायुरूप कहा जाता है । अथवा दिन में तृणभक्षणार्थ ' वन ' इन में पशुओं यत्र का पालन करता सायंकाल यजमान के घर वायुवेग से पहुंचने के लिये उन्हें समुचित प्रकर्ष के साथ बुलाने के लिये - पशुओं तत्र विचरण को करके कहा गया है । वायुरूप ३६ - कात्यायन महर्षि ने भी अपने श्रौतसूत्र में बताया है कि वत्सों की माताएँ जो गौएँ हैं, उनमें से एक ' गौ ' को पृथक् करके ' देवो व: ' इस मन्त्र से ' शाखा ' के द्वारा उसका स्पर्श करे । ऐसा करने से गौ का दधिरूप पदार्थ ' ऐन्द्र ' ( इन्द्रदेवता सम्बन्धी ), या ' माहेन्द्र ' ( महेन्द्रदेवता सम्बन्धी ) बन जाता है । एक ही ' वत्स हविः ही ' गौ ' का शाखा से स्पर्श करने पर सभी ' वत्सों ' का तथा सभी ' गौओं ' का संस्कार सिद्ध हो जाता है, क्योंकि ' अथवा विधि- एक वाक्य में ' बहुवचन ' का निर्देश किया गया है । अथवा पूजार्थ को सूचित करने के लिये भी बहुवचन का निर्देश हो सकता है । " देवो वः सविता प्रार्पयतु - श्रेष्ठतमाय कर्मणे । ” ३७ – हे गौओं! प्रकाशमान परमेश्वर तुम्हें श्रेष्ठतम कर्म के लिये प्रचुर घास, जल आदि से पहुँचावे । " ' सविता ' पद की निष्पत्ति ' षू प्रेरणे ' धातु से होती है । ' सुवति स्वव्यापारे प्रेरयति इति सविता युक्त ' - वन अपने में

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[ २३ ] चतुर्विधम्- अप्रशस्तम् यथा लोकशास्त्रविरुद्धं वधबन्धचौर्यादिकं ( २ ) प्रशस्तं यथा लौकिकैः श्लाघनीयं बन्धुवर्ग-पोषणादिकम् ( ३ ) श्रेष्ठं यथा स्मृतिभिः श्लाघनीयं वापीकूपतडागादिकं ( ४ ) श्रेष्ठतमम् यथा वेदः श्लाघनीयं यज्ञरूपम् । ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म ' ( श ० १/७/१५ ) इति श्रुतेः । हे अघ्न्याः, गावः, गोवधस्योपपातकत्वाद् गावो हन्तुमयोग्या अन्या उच्यन्ते । एतावता गोवधः सर्वथा वेदविरुद्ध एव । ३८ - तथाविधा यूथम् । इन्द्राय भागं इन्द्रदेवतामुद्दिश्य सम्पादयिष्यमाणदधिहेतुभूतं क्षीरम् आप्यायध्वम् ५ समन्तात् वर्धयर्ध्वम् । सर्वास्वपि गोषु प्रभूतं क्षीरं कुरुत । ( ओप्यायी वृद्धौ ) । वो युष्मानपहतु स्तेनश्चौरो मा ईशत ईश्वरः समर्थो माभूत् । अघशंसः, अघेन तीव्रपापेन भक्षणादिना शंसो घातको व्याघ्रादिरपि मा ईशत हन्तु समर्थो माभूत् । कथंभूता युष्मान् प्रजावतीः बह्वपत्या, जीवद्वसा वा । अनमीवा: ( अमरोगे ) इति धातुः । अमीवा व्याधि-विशेषः, तद्रहिताः कृमिदष्टत्वादिस्वल्प रोगरहिताः । अयक्ष्माः क्षयादिप्रबल रोगरहिताः । अथवा अयनम् अयः गमनम्, अयक्ष्मायां पृथिव्यां घासादिभक्षणार्थं यासां ता अयक्ष्मा अनिवारितप्रचाराः । किञ्च यूयं गोपतौ गवां युष्माकं पत्याव- १० स्मिन् यजमाने ध्रुवाः शाश्वतिकी: बह्वीः बहुविधा: स्यात भवत । ' यजमानस्य पशूनित्यग्न्यगारस्यान्यतरस्य पुरस्तात् शाखामुपगूहति ' ( का ० श्र ० सू ० ४।२।११ ) इति रीत्या -पलाशशाखामुन्नतप्रदेशे स्थापयित्वा प्रार्थयते हे पलाशशाखे, त्वमुन्नतप्रदेशे स्थिता प्रतीक्षमाणा सती यजमानस्य पशूनरण्ये सञ्चरतश्चोरव्याघ्रादिभयात् पाहि रक्ष । यद्यप्यचेतना शाखा, तथापि तदभिमानिनीं देवतामुद्दिश्यैवं वक्तु ं शक्यते । १५ है अपने व्यापार में जौ प्रेरित करता है, उसे ' सविता ' कहते हैं । तथा प्रकाशमान परमेश्वर को ' देव ' कहते हैं । ' दान, दीपन और द्योतन के कारण ' देव ' कहे जाते हैं - ऐसा यास्क ने कहा है । ऊपर कहचुके हैं कि परमेश्वर श्रेष्ठतम कर्म के निमित्त शाद्वल वनभूमि पर गौओं को प्रेषित करे । अतः कर्म के सम्बन्ध में भी जो ज्ञातव्य है, उसे समझना आवश्यक है । ' कर्म ' चार प्रकार के होते है - ( १ ) अप्रशस्त, जैसे लोक तथा शास्त्र के विरुद्ध वध, वन्ध, चौर्य आदि । ( २ ) प्रशस्तजैसे - -समाज के द्वारा प्रश ंसित बन्धुवर्गों का पोषण आदि । ( ३ ) श्रेष्ठ, जैसे - स्मृतियों के द्वारा श्लाघनीय श्य वापी, कूप, तडागादि का निर्माण करना । ( ४ ) श्रेष्ठतम, जैसे- ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म ' ( श ० प ० १ | || ५ ) इत्यादि वेदवाक्यों के द्वारा प्रश ंसित यज्ञादि । गोवध का उपपातकों में परिगणन होने से उन्हें ( गौओं को ) न मारने योग्य बताया है । अतएव उनके लिये ' अघ्न्याः ' पद का प्रयोग किया गया है । इसलिये ' गोवध ' सर्वथा वेद-विरुद्ध ही है । ३८ – हे अवध्य गौओं! तुम सब इन्द्र देवता के उद्देश्य से सम्पादित होने वाले ' दधि ' के हेतुभूत ' दुग्ध ' ५ को बढ़ाओ । सभी गौओं में प्रचुर दुग्ध की उत्पत्ति हो । तुम्हारे अपहरण में चोर समर्थ न होने पावें । भक्षणरूप तीव्र पाप के कारण घातक कहलाने वाले वृक, व्याघ्र, चाण्डाल आदि भी तुम्हें मारने में समर्थ न हो सकें । तुम प्रजावतीं अर्थात् अनेक बछड़ोंवाली अथवा जीवित बछड़ोंवाली हो । हे गौओ! तुम कृमि - कीटादि के दश ( काटने ) से उत्पन्न होने वाले स्वल्प रोगों से तथा यक्ष्मा ( क्षय ) आदि प्रबल रोगों से सर्वथा रहित रहो । अथवा ' अयक्ष्मा ' – अयनं अयः गमनं क्ष्मा पृथिवी । अतः पृथिवी पर ग्रास - तृण आदि के भक्षणार्थं तुम्हारा भ्रमण अप्रतिहत रहे । तथा हे गौओं! तुम ३० सभी अपने गोपति यजमान के लिये स्थायो एवं विविध प्रकार के लाभ पहुँचाती हुई बनी रहो -' यजमानस्य पशून् ' इत्यादि कात्यायनोक्त रीति से पलाशशाखा के ऊंचे स्थान पर स्थापित करके उस की प्रार्थना की जाती है कि पलाशशाखे! तुम ऊंचे स्थान पर स्थित होकर देख - भाल करती हुई, इस यजमान के, विचरणार्थ गये हुए पशुओं की वन में चोरों से तथा हिंसक सिंह आदि घातक प्राणियों के भय से रक्षा करना । पलाशशाखा यद्यपि अचेतन है, तथापि उसकी अभिमानिनी अधिष्ठात्री देवता से यह प्रार्थना की जाती है ।

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[ २४ ] ३६ - यथा शास्त्रज्ञा: शालग्रामादी शास्त्रदृष्ट्या विष्णवादिसन्निधिमभिप्रेत्यैव तं सम्बोधनावाहनादिभिः षोडशोपचारैरर्चन्ति तद्वदत्रापि बोध्यम् । अनया शाखादेवतया रक्षितत्वादेव गावो निरुपद्रवाः सायंकाले पुनः समा-गच्छन्ति । तदुक्तं तित्तिरिणा - ' यजमानस्य पशून् पाहीत्याह । पशूनां गोपीथाय । तस्मात् सायं पशव उप समावर्तन्ते ' ( तै ० ब्रा ० ३।२।१५ ) इति । तथैव काण्वश्रुतिः ' पलाशशाखा आहवनीयागारस्य गार्हपत्यागारस्य वा पूर्वार्ध उपगूहतीति ५ यजमानस्य पशून् पाहीति ब्रह्मणैवैतद्यजमानस्य गुप्तये परिददाति ' एतद्ब्राह्मणैव एतेन मन्त्रेणेव रक्षार्थ शाखाभिमानि-देवतायै समर्पयतीत्यादि । कात्यायनोऽपि ' यजमानस्य पशू नित्यग्न्यमारस्यान्यतरस्य पुरस्ताच्छाखामुपगुहति ' ( का ० श्री ० सू ० ४ | २ | ११ ) इति ( ४० - अयमभिप्रायः देवताराधनरूपो यागोभवति । देवताश्चानन्तशक्तिपरमेश्वरांशत्वात् महाभाग्याः परमै -श्वर्यवन्तो दिव्याश्च भवन्ति । ताभ्यो दास्यमानेन हविषापि दिव्येनैव भाव्यमिति । तेन लौकिकेभ्योऽविलक्षणानामपि १० दुग्धदध्नां दिव्यत्वापादनाय गवां वत्सानाञ्च संस्कारः क्रियते । किं बहुना तत्संस्कारार्थमुपादीयमानपलाशादिशाखानां छेदनानुमार्जनादयोऽपि स्वाध्यायाध्ययनसंस्कृतैर्मन्त्रः सस्क्रियन्ते । अतएव व्रजुसीमन्तिन्यश्च श्रीकृष्णोद्देशेन निर्मथ्य-मानदधिनवनीतादीनां सौष्ठवमाधुर्यं सौरस्यापादनाय भक्तिभावनासंस्कृतान्त घासादिखादनादिभिर्धेनवो वत्साश्च संराध्यन्ते । पात्राण्येधांसि पयःपाकोपयुक्ताग्नीन् संस्कृत्य तथाविधेनातञ्चनेनामृततुल्यं मधुमधुरं दधिनिर्मथ्य श्रीकृष्णागमनं प्रतीक्षन्ते । १५ ४१ – इष् शब्दगतो इकारो धातुस्वरेण प्रतिपदिकस्बरेणोदात्तः । ' चतुर्थ्येकवचनस्य ' ' अनुदात्तौ सुप्पिता ' ३६ - जैसे शास्त्रज्ञ विद्वान् शिलाविशेष में शास्त्रदृष्टि से विष्णु सन्निधान मानते हुए उन्हें उस शिला में सम्बोधित करते हैं, उनका आवाहन और षोडशोपचारों से पूजनादि सम्पन्न करते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये । इस शाखा की अभिमानिनी अधिष्ठात्री देवता से सुरक्षित होती हुई ही गौए, विविध वाधाओं से मुक्त होकर सायंकाल पुनः आजाती हैं । तित्तिरि ने ' यजमानस्य पशून् ' इत्यादि से, काण्व श्रुति ने ' पलाशशाखा ' आदि से, कात्या-20 यन ने ' यजमानस्य पशून् ' इत्यादि से इसी का विवरण किया है । ४० - इसका अभिप्राय यह है कि ' याग ', - देवता की आराधना स्वरूप है । देवता, परमेश्वर के अंश होने के कारण महाभाग्यवान्, परम ऐश्वर्यशाली, तथा दिव्य है । उनको जो हवि ' दिया जाय, वह भी दिव्य ही होना चाहिये | अतएव जो ' दुग्ध ' और ' दधि ' लौकिक दुग्ध, दधि के समान ही है, उनमें दिव्यता लाने के लिये गौओं तथा बछड़ों का संस्कार किया जाता है । और तो क्या! उनके संस्कार के लिये उपयोग में आने गाली पलाशवृक्ष की २५ शाखाओं का छेदन तथा उनका मार्जन आदि भी ' स्वाध्याय ' ( स्वकुल परम्परागत वेदशाखा ) के अध्ययन से सुसंस्कृत मन्त्रों के द्वारा सम्पादित होता है । ' स्वाध्यायः ' में ' स्वश्चासौ अध्यायः स्वाध्याय: ' ऐसा कर्मधारय समास किया जाता है । ' तत्पुरुषसमास ' नहीं करना चाहिये । अस्तु । इसीलिये उपर्युक्त कथन के अनुसार ही ब्रजाङ्गनाओं ने भी भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के उद्देश्य से निर्मित होने वाले दधि, नवनीत आदि में सौष्ठव, माधुर्य और सरसता का लोकोत्तर समावेश करने के लिये भक्ति और भावना से ३० परिप्लुत हुए अन्न, तृण आदि को खिला कर ध ेनु ( गौओ ) और उनके वत्सों ( बछड़ों ) की आराधना की थी । वे गोपिकाएं खिलाने के पात्रों को, काष्ठों को, दूध गरम करने वाले अग्नि को सुसंस्कृत कर और उसी प्रकार आतञ्चन ( जामन ) के द्वारा अमृततुल्य मधु से मधुर दधि का मन्थन करके भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के आगमन की प्रतीक्षा किया करती थी । त्वां ४१- - ' ईषेत्वा ' में ' इष ' शब्दगत ' इ ' कार, उदात्त है । ' म ' अनुदात्त है । किन्तु संहिता में ' त्वा ' स्वरित है । इसी प्रकार उत्तर मन्त्रों में स्वर प्रक्रिया कर लेनी चाहिये, उसके परिज्ञानार्थ महीधर भाष्य को देखना उचित है ।

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[ २५ ] ( पा ० सू ० ३ | १1४ ) वित्यनुदात्तत्वे प्राप्ते तदपवादेन ' सावेकाचरस्तृतीयादिविभक्ति ' ( पा ० सू ० ६ । १।१६४ ) रित्युदात्त-त्वम् । तस्मिन् सति अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' ( पा ० सू ० ६ | | | १५४ ) इति पूर्व इकारोऽनुदात्तः । यद्यप्येकशब्देन द्वयोरनु-दात्तयोरन्यतरो यः कोऽपि वक्तु ं शक्यते तथापि सति शिष्टस्वरो बलीयानिति ( ६।१।१५४ स्थलीयेन ) न्यायेन विभक्तिगत उदात्त एव प्रबलः । तथा सति अनुदात्तादिकमुदात्तान्तमिदं सम्पन्नम् । त्वा शब्दस्य प्रातिपदिकस्वरेण यद्य-प्युदात्तत्वं प्राप्तं तथापि अनुदात्तं सर्वमपादादौ ' ( पा ० सू ० ८ | १ | १८ ) इत्यस्य सूत्रस्यानुवृत्तौ सत्यां ' त्वामौ द्वितीयाया ' ५ ( पा ० सू ० ८।१।२३ ) इति त्वादेशविधानादयं शब्दोऽनुदात्तः । संहिताया ' मुदात्तादनुदात्तस्य स्वरित ' ( पा ० सू ० ८ | ४ | ६६ ) इति त्वा शब्दस्य स्वरितत्वम् । ' ऊर्जेत्वा ' इत्यत्रापि यथोक्तरीत्या स्वरो ज्ञेयः । मन्त्रद्वयस्य संहितायामूर्ज इत्युकारस्य ' स्वरितात् संहितायामनुदात्ताना ' ( पा ० सू ० १ २ ३६ ) मिति प्रचयाभिधेयमैकश्रुत्यं प्राप्तम् । तदपवादकत्वेन उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतर: ' ( पा ० सू ० १ | २ | ४० ) इत्यत्यन्त नीचोऽनुदात्तो भवति, तथाग्रिम त्वा शब्दस्य स्वरितत्वम् एवमुत्तरेषु मन्त्रेषु स्वरप्रक्रियोहनीया विशेषतो महीधरभाष्यं द्रष्टव्यम् । ४२ - ' इषेत्वोर्जेत्वा ' ( वा ० सं ० १1१ ) इत्यत्र स्वामी दयानन्दः - " इषे अन्नविज्ञानयोः प्राप्तये । इषमित्यन्ननामसु पठितम् । ( निघण्टु २।७।१४ ) ' इषतीति गतिकर्मसु पठितम् ' ( निघण्टु २ | १४ | १०० ) त्वा विज्ञानस्वरूप परमेश्वर ं ऊर्जे पराक्रमोत्तम रस लाभाय ' ऊर्ज, रसः ' ( श ० ५।१।२15 ) त्वा अनन्तपराक्रमानन्दरसघनम् ' वायवः ' सर्व क्रियाप्राप्ति-हेतवः स्पर्शगुणा भौतिकाः प्राणादयः । वायुरिति पदनामसु पठितम् ( निघण्टु ५।४।१ ) अनेन प्राप्तिसाधका वायवो-गृह्यन्ते । वा गतिगन्धनयोरित्यस्मात् ( कृ वा ० पा ० उ ० ११ ) अनेनाप्युक्तार्थो गृह्यते ' स्थ ' सन्ति । अत्र पुरुषव्यत्ययेन १५ प्रथमपुरुषस्य स्थाने मध्यमपुरुषः । ' देवः ' सर्वेषां सुखानां दाता सर्व विद्याविद्योतकः । ' देवो दानाद्वा दीपनाद्वा द्योतनाद्वा नोभवतीति वा ( नि ० ७ १५ ) ' व: ' युष्माकम् ' सविता ' सर्वजगदुत्पादको, जगदीश्वरः ' प्रार्पयतु ' प्रकृष्टतया संयोजयतु । ' श्रेष्ठतमाय ' अतिशयेन प्रशस्त: श्रेष्ठः सोऽतिशयितः श्रेष्ठतमः तस्मै यज्ञाय ' कर्मणे ' कतु योग्यत्वेन सर्वो-पकारार्थाय ' आप्यायध्वम् ' आप्यामहे वा । अत्र पक्षे व्यत्ययः । ' अघ्न्या ' इति गोनामसु पठितम् । ( निघण्टु २1११1१ ) ' इन्द्राय ' परमैश्वर्ययोगाय ' भागं ' सेवनीयं भगानां धनानाम् ज्ञानानां वा भाजनम् ' प्रजावती: ' भूयस्यः प्रजा वर्तन्ते यासु २० ताः । अत्र भूम्न्यर्थे मतुप् । अनमीवाः ' अमीवो व्याधिर्न विद्यते यासु ताः । ' अमरोगे ' इत्यस्मात् औणादिक ईवन् प्रत्ययः । ' अयक्ष्मा ' न विद्यते यक्ष्मा रोगराजो यासु ताः । यक्ष इत्यस्मात् अतिस्तु ० उ ० १।१४० अनेन मनुप्रत्ययः । ' मा ' इति निषेधार्थे । ' वः ' ताः अत्र पुरुषव्यत्ययः । ' स्तेन; ' चोरः । ' ईशत ' ईष्टाम् समर्थो भवतु । लोडर्थेलङ ' बहुलं छन्दसि ' ( पा ० सू ० २।४।७३ ) इति शपोलुगभावः । ' मा ' निषेधार्थे । ' अघशंस ' योऽघं पापं शंसति सः । ४२५ – ' इषेत्वोर्जेत्वा ' इस मन्त्र पर स्वामी दयानन्द ने लिखा है कि ( इषे ) अन्न, विज्ञान की प्राप्ति के लिये ( त्वा ) २५ विज्ञान स्वरूप परमेश्वर से ( ऊर्जे ) पराक्रमरूप उत्तम रस के लाभार्थं ( त्वा ) अनन्त पराक्रम आनन्दरस घनरूप । ( वायव ) समस्त क्रियाओं की प्राप्ति के हेतु भौतिक स्पर्श गुण प्राण आदि, - इससे प्राप्ति के साधक वायु आदि का ग्रहण होता है । ( स्थ ) हैं । यह पुरुषव्यत्यय से प्रथमपुरुष के स्थान में मध्यम पुरुष का प्रयोग है | ( देव: ) समस्त सुख का प्रदाता, समस्त विद्याओं का द्योतकं, ( वः ) तुम लोगों के लिये ( सविता ) समस्त जगत् का उत्पादक जग-दीश्वर ( प्रार्पयतु ) प्रकृष्टरूप से संयोजित करे । ( श्रेष्ठतमाय ) यज्ञ ( कर्मणे ) काम के लिये, ( आप्यायध्वम् ) ३० हम आप्यायित हों । यहाँ पक्ष में व्यत्यय है । ( अघ्न्या: ) बढ़ाने योग्य, मारने के अयोग्य, गौएँ, इन्द्रियाँ, पृथिवी आदि तथा पशु | ( इन्द्राय ) परमैश्वर्य के साथ योग के लिये, ( भागम् ) सेवनीय, धन या ज्ञान के भाजन, ( प्रजावती: ) front बहुत हैं । ( अनमीव: ) व्याधि से रहित । ( अयक्ष्मा: ) जिनमें यक्ष्मा नामक रोगराज नहीं है, [ अयक्ष्मा शब्द ' यक्ष ' से ‘ मन् ' प्रत्यय होकर सिद्ध है ] यहाँ ' मा ' निषेधार्थं क है । [ ' वः ', ' ताः ', - यहां पुरुष में परिवर्तन है ] ' स्तेन: ' अर्थात् चौर, ' ईशत् ' अर्थात् समर्थ ' बने । ' लोट् ' के अर्थ ' में ' लङ ' लकार का प्रयोग है । ' श ' के लुक् ३५. का ' बहुलंछन्दसि ' सूत्र से अभाव हुआ है । ' मा ' निषेधार्थ क है । ' अघशंसः ' का अर्थ है पाप की प्रशंसा या कथन करने

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[ २६ ] ह्य ' ध्रुवा ' निश्चलसुखहेतव: । ' अस्मिन् ' प्रत्यक्षे । गोपतो यो गवां पतिः स्वामी तस्मिन् । ' स्यात् ' भवेयुः । वह्वीः बह्नः । ' वाछन्दसि ' ( पा ० सू ० ६ । १०६ ) अनेन पूर्वसवर्णदीर्घः । ' यजमानस्य ' यः परमेश्वरं सर्वोपकारं धर्मं च यजति तस्यविदुष. गोऽश्वहस्त्यादीन् श्रियः प्रजा वा । ' श्रीहिपशव: ' ( श ० १ | ८ | १ | ३६ ) ' प्रजावै पशव: ' ( श ० १ | ६ | १ | १७ ) | ( पृ ० ८ - १० ) हे मनुष्याः अयं सविता देवो भगवान् वायवः स्थ यान्यस्माकं वो युष्माकं च प्राणान्तःकरणेन्द्रियाणि सन्ति तानि ५ श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्रार्पयतु । वयमिषेऽनायोत्तमे च्छायै सवितारं देवं त्वा त्वां तथोर्जे पराक्रमोत्तम रसप्राप्तये भागं भजनीयं त्वा त्वां सततमाश्रयामः । एवं भूत्वा यूयमाप्यायध्वं वयं चाप्यायामहे । हे परमेश्वर भवान् कृपयाऽस्माकमि-न्द्राय परमैश्वर्यप्राप्तये श्रेष्ठतमाय कर्मणे चेमाः प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा अघ्न्या गाः सदैव प्रार्पयतु । हे परमात्मन् भवत्कृपयास्माक ं मध्ये कश्चिदघशंसः स्तेनो मेशत हतु समर्थो न भवेत् यतोऽस्मिन् गोपतौ पृथिव्यादिरक्षणमिच्छुकस्य धार्मिकमनुष्यस्य समीपे बह्वीर्बह्व्यो गावो ध्रुवाः स्यात् भवेयु ' ' ( पृ ० २१ ) रिति । १० ४३ – तदत्रोच्यते, सर्वथाऽविचारितरमणीयोऽयमर्थः मन्त्रगत पदार्थवैपरीत्यात् तत्र - तंत्र विपरिणामास्तु तेनैव दर्शिताः । ४४ - निर्मूलमेव स्वाभिप्रायेण विपरिणाममभ्युपगम्यमाने लौकिकानां वैदिकानाञ्चार्थानां मूलाभिप्रायवैपरीत्य-मेवापद्यते । प्रथमेन त्वा इति पदेन विज्ञानस्वरूपः परमात्मेत्युच्यते द्वितीयेनानन्तपराक्रमः परमेश्वर इत्यत्र किंमूलमिति मूलभाष्यकृता किमपि नोक्तम् । विवरणकृता निरर्थक ' बहु ब्रुवाणेनापि नात्र किमप्युक्तम् । ४५ - भाष्यारम्भ एव दयानन्देनोक्तम् -- ' अथोत्तमकर्म सिद्धयर्थमीश्वरः प्रार्थनीय इत्युपदिश्यते ' इति! वाला | ' ध्रुवा ' निश्चल सुख के हेतु । ' अस्मिन् ' अर्थात् प्रत्यक्ष | ' गोपतो ' जो गौओं का पति अर्थात् स्वामी है, उसमें । हे मनुष्यों! यह भगवान् सविता देव, हमारे और तुम्हारे प्राण, अन्तःकरण, इन्द्रियां आदि को श्रेष्ठतम कार्य के लिये । प्रकर्ष रूप से अर्पित करे । हम उत्तम इच्छारूपी अन्न के लिये, उत्तम रस या पराक्रम प्राप्त करने के लिये भजने योग्य आपका निरन्तर भजन करते हैं । ऐसा होने पर आप और हम आप्यायित होंगे । हे परमेश्वर! आप कृपया हमें. परमैश्वर्ष की प्राप्ति के लिये तथा श्रेष्ठतम कर्म के लिये प्रजावती अनमीवा और अयक्ष्मा, अघ्न्या गौओं को सदैव अर्पित कीजिये । हे परमात्मन्! आपकी कृपा से हमारे बीच में कोई अघशंस ( पापप्रशंसक ), स्तेन ( चोर ) हरण करने में समर्थ न हो । इस गोपति में जो पृथिवी आदि की रक्षा का इच्छुक है, जो धार्मिक मनुष्य है, उसके समीप बहुत गए ध्रुव रहें ' - पृ ० २३ पर । ४३ - स्वामी दयानन्द के द्वारा किये गये मन्त्रार्थ पर विचार किया जाय तो वह मन्त्रार्थं सर्वथा अविचारित है, केवल आपातत: ( सरसरी निगाह में यानी ऊपर - ऊपर से ) ठीक सा भासित होता है, क्योंकि उस अर्थ में मन्त्र ' के पदों ( शब्दों ) के अर्थ, मन - माने किये गये हैं, अर्थात् व्याकरण की विशुद्ध प्रक्रिया के विपरीत किये गये हैं । कितनी जगह त्रिपरिणाम ( निर्धारित विभक्ति, वचनों को अनिर्धारित अर्थों में बताना ) किये गये हैं । ४४ - बिना कारण के ही अपनी इच्छा के अनुसार अर्थ की कल्पना कर उस की सिद्धि के लिये विपरिणाम मानने पर लौकिक और वैदिक अर्थ, अपने मूल अभिप्राय से बिपरीत दिशा का बोध कराते हैं! जैसे — प्रथम ' त्वा ' पद से - ' विज्ञान स्वरूप परमात्मा को और द्वितीय ' त्या ' पद से - ' अनन्त पराक्रमवाले परमेश्वर को स्वामी दयानन्द जी ने बताया है । किन्तु एक ही ' त्वा ' पद के दो स्थलों पर दो अर्थों को बताने का कारण क्या है? इस प्रश्न पर मूल भाष्यकार कुछ नहीं कह रहा है । भाष्य के विवरण कर्ता ने निरर्थ के बहुत बातें की है, लेकिन उपर्युक्त प्रश्न पर उत्तर कुछ नहीं दिया । ४५ - भाष्य के आरम्भ में ही स्वामी दयानन्दजी ने कहा है कि ' उत्तम कर्म की सिद्धि के लिये ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिये ' - यह उपदेश दिया जा रहा है । विवरणकार ने उपर्युक्त कथन की इस तरह व्याख्या की है--

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 40 का मूल पृष्ठ
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[ २७ ] विवरणकृता चेत्थं विब्रियते - ' इतोऽग्रे यत्र यत्र मन्त्रभूमिकायामुपदिश्यत इति क्रियापदं प्रयुज्यते तस्य सर्वस्य कर्तेश्वर एव बोध्यः, कुत:? वेदानां तेनैवोक्तत्वात् ' तथा चेश्वर एव मन्त्राणामुपदेष्टा वक्ता वा । तथा चेश्वर एव कथमीश्वरम् प्रार्थयते? ४६ - एवमेव ' वायव ' इति शब्देन प्रकरणहेतुश्चान्तराणि मुख्यार्थमपहाय लाक्षणिकोऽर्थः प्राणादिगृहीतः, ततो-ऽपि दूर ' गरवा तेनैव शब्देन इन्द्रियरूपार्थग्रहणे शाब्दन्याये बलात्कारः । ५ ४७ —– ' स्थ ' इत्यत्र मध्यमपुरुषस्थाने प्रथमपुरुष कल्पनम् ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म ' इति श्रुति स्पृष्ट्वापि श्रेष्ठतम-शब्दस्य कर्मसामान्यपरत्वयोजनम् च प्रमाद एव । ४८ - पूर्वमुक्तं मन्त्रस्यास्य परमेश्वरो वक्ता । तदभ्युपगमे ईश्वरः कथमेवं कथयेत् यत् हे मनुष्याः सविता देवो यान्यस्माकं युष्माकञ्च वायवः प्राणान्तःकरणानि सन्ति, तानि श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्रार्पयतु । परमेश्वरस्य स्वं प्रत्येव स्वस्य प्राणान्तःकरणादीनां सत्कर्म प्रेरणाय प्रार्थना कथमिव युज्यते? श्रुतिषु ' अप्राणोह्यमनाः शुभ्र: ' ( मुण्ड ० २1१1२ ) १० इत्यादिभिरमनस्त्वमप्राणत्वमुक्तम् । ' इसके आगे जहाँ जहाँ मन्त्र की भूमिका के उपदेश क्रियापद का प्रयोग होगा, वहाँ वहाँ सब का कर्ता ईश्वर को ही समझना चाहिये, क्योंकि वेदों का वक्ता वही है । इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि ईश्वर ही मन्त्रों का उपदेष्टा या वक्ता है । यह सुनकर कोई विचारशील व्यक्ति यह पूछ सकता है कि ईश्वर ही ईश्वर से कैसे प्रार्थना कर सकता है? प्रार्थना १५ तो दूसरे से की जाती है, स्वयं से ही स्वयं कोई भी प्रार्थना नहीं करता । ४६ - इसी प्रकार एक जगह स्वामी दयानन्दजी ने मन्त्रगत ' वायवः ' पद से प्रकरण और कारण के बिना ही ' मुख्यार्थ ' का परित्याग करके प्राण आदि ' लाक्षणिक अर्थ का ग्रहण किया है । तदनन्तर उस लाक्षणिक अर्थ से भी दूर हटकर उसी शब्द से ' इन्द्रिय ' अर्थ का ग्रहण किया है । इससे शब्दार्थ मर्यादा का उल्लंघन और उसके साथ बल-प्रयोग ही स्पष्ट हो रहा है । ४७ - इसी प्रकार एक जगह स्वामी दयानन्दजी ने मन्त्रगत ' स्थ ' पद में ' मध्यम पुरुष ' के बजाय ' प्रथमपुरुष ' २० Street की है, जिसे व्याकरण के विरुद्ध ही कहा जायगा । इसी प्रकार स्वामीदयानन्दजी ने ' यज्ञो वै ' इस मन्त्र में ' श्रेष्ठतम कर्म को ' कर्मसामान्य ' के रूप में प्रदर्शित किया है, यह प्रदर्शन नितान्त प्रमादपूर्ण ही कहा जायगा । ४८ - स्वामी दयानन्दजी ने पहिले कहा है कि इस मन्त्र का वक्ता परमेश्वर है । ऐसा मान लेने पर ईश्वर १५ यह कैसे कहेगा कि ' हे मनुष्यों! हमारे और तुम्हारे प्राण ' अन्तःकरण ' हैं, उन्हें सविता देवता, श्रेष्ठतम कर्म के लिये अर्पित करे । ईश्वर की अपने ही लिये अपने प्राण ' अन्तःकरण ' आदि की सत्कर्मों के लिये प्रार्थना करना कैसे संगत होगा? स्वामी दयानन्दजी ने ' इषे ' का अर्थ ' अन्न और विज्ञान की प्राप्ति के लिये ' किया है । किन्तु यह अर्थ भी उचित नहीं है, क्योंकि काण्वश्रुति के द्वारा ' इषे ' का अर्थ ' वृष्टि के लिये किया गया है । स्वामी दयानन्दजी ने यह कहा है कि ' जिस पद की जिस धातु से जिस प्रत्यय के द्वारा जिस अर्थ में व्याक - ३० रण, निरुक्त भाष्यकारादिकों ने जो व्युत्पत्ति प्रदर्शित की है, तदनुसार उसी धातु से उसी प्रत्यय के साथ उसी अर्थ में उस पद को व्युत्पन्न करने का कोई अनिवार्य नियम नहीं है, अपितु जिस - जिस धातु से जिस - जिस प्रत्यय के साथ जिस अर्थ को प्रकाशित करने में ' पद ' समर्थ हो सके, वैसा निर्बंचन किया जा सकता है । ' यह कथन तो सर्वथा विपरीत