वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 211–220

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 211–220

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[ १६८ ] स्थितः । पुरोडाशश्रपणेन मनुष्यस्य कर्तृत्वमपितु नाकस्थस्य महाभाग्यस्य सवितुरेव । दिव्ये लोके दिव्येन लोकेन दिव्याग्नौ पुरोडाशस्य श्रपणात् तदुत्कर्षः ततश्च यजमानस्यापि दिव्य लोकजन्मलाभः सेत्स्यति । ११ – स्वामिदयानन्दस्तु — " हे मनुष्य यथाहं जनयत्यं सर्वसुखोत्पादिकार्य राज्यलक्ष्म्यं त्वां तं यज्ञं संयौमि मिश्रयामि अग्नौ प्रक्षिप्य वियोजयामि वा तथैव भवद्भिरपि संपूयताम् । अस्माभिर्यदिदं संस्कृतं हविरग्नेर्मध्ये प्रक्षिप्यते तदिदं विस्तीर्णं भूत्वा अग्नीषोमयोर्मध्ये स्थित्वेषे अन्नाद्याय भवति । यो विश्वायुविश्वमायुर्यस्मात् उरुप्रथा धर्मो यज्ञो यस्यास्ति तमेतमुरु प्रथस्व । यथाऽयं मया उरु प्रथ्यते तथैव प्रतिजनस्तमुरु प्रथस्व । एवं कृतवते ते तुभ्यमयं यज्ञपति-रग्निः सवितादेवो जगदीश्वरश्चोरु सुखं प्रथताम् । ते तव त्वचं मा हिंसीत् नैव हिनस्ति । स खलु त्वां वर्षिष्ठेऽधिना के तं प्रथयतु सुखयुक्तं करोतु । ” इति, १२ -- तदपि कल्पनामात्रम्, सर्वसुखोत्पादिकायै लक्ष्म्यै कोऽयं त्रिविधो यज्ञः? तेन च यज्ञेन के राज्यलक्ष्मीः प्राप्ताः । संस्कृतं हविरग्निमध्ये प्रक्षेपेण नश्यति । तद्विस्तीर्णं भूत्वा अग्नीषोमयोर्मध्येस्थित्वेषो भवति ' इत्याद्यपि निर्मूलम्, तन्मते धर्माधर्मापूर्वरूपस्यादृष्टस्यानभ्युपगमात् । १३ - यदपि - हे मनुष्य यथाहं मनुष्यो यो विश्वायुरुरुप्रथा धर्मो यज्ञोऽस्ति तं जनयत्या इषे संयौमि तत्सि -द्वयर्थमग्नेर्मध्ये इदमग्नीषोमयोर्मध्ये संस्कृतं हविः संवपामि प्रक्षिपामि तथा त्वमप्येतं कुरु, प्रथस्व बहु विस्तारय यतोऽयमग्निस्तव त्वचं न हिंस्यात् । यथा च देवः सविता वर्षिष्ठेधिनाके यं यज्ञं श्रपयेत् तथा भवानपि त्वा तं संयोतु ' इति । १४ - तदपि न सङ्गतम्, मन्त्राक्षराणां तादृशार्थाननुगतत्वात् । अग्निः कस्य त्वचं न दहेत् कणश्व न दहेत् इत्यपि न स्पष्टम् । में भी दिव्य अग्नि पर पुरोडाश का श्रपण होने से उसका उत्कर्ष सूचित होता है, उससे देवता की तृप्ति का उत्कर्ष, और उस से यजमान को भी दिव्य लोक में जन्मलाभ होना सम्भव हो सकेगा । ११ - स्वामी दयानन्द इस प्रकार व्याख्या करते हैं - ' हे मनुष्य! जैसे मैं समस्त सुखों को उत्पादन करने वाली राज्यलक्ष्मी के लिये उस यज्ञ को मिश्रित करता हूँ अथवा अग्नि में प्रक्षेप करके विनियोग करता हूँ, उसी तरह आप लोग भी अच्छी तरह उसे पवित्र करें । हम लोग जो इस संस्कृत हवि को अग्नि में डालते हैं, तो वह विस्तीर्ण होकर अग्नीषोम के मध्य में स्थित होकर अन्नाद्य के लिये होता है । जो विश्वायु ( विश्वमायुर्यस्मात् ) उरुप्रथा धर्मवान् यज्ञ जिसका है उसको खूब विस्तीर्ण करो । जैसे मैं इसे विपुलतया विस्तीर्ण करता हूँ, तथैव प्रत्येक मनुष्य उसे खूब विस्तीर्ण करे । इस प्रकार करने वाले तुम्हारे लिये यह यज्ञपति अग्नि सविता देव जगदीश्वर विपुल सुख विस्तार में से करे । तुम्हारी त्वचा को वह ऐसा करने पर नष्ट नहीं करेगा । वह तुम्हें अत्यधिक वृद्ध ( श्रेष्ठतम ) नाक सुख युक्त करें । " १२ - किन्तु यह व्याख्या केवल काल्पनिक है । सर्वसुखोत्पादिका लक्ष्मी के लिये कौन सा यह त्रिविध यज्ञ है? जिस यज्ञ से राज्य लक्ष्मी की प्राप्ति बताई जा रही है । संस्कृत हवि का अग्नि में प्रक्षेप करने पर विनाश होता है । वह विस्तीर्ण होकर अग्नीषोम के मध्य में स्थित हुआ अन्नाद्य के लिये होता है ' - इत्यादि कथन भी निर्मूल है । क्योंकि तुम्हारे मत में अपूर्व रूप धर्माधर्म, जिसे अदृष्ट कहा जाता है, उसकी स्वीकार नहीं किया गया है । १३ - यह जो तुमने कहा है कि ' हे मनुष्य! जैसे मैं मनुष्य, जो विश्वायु उरुप्रथा धर्मवान् यज्ञ है, उसे इट् के लिये ( जनयत्यं इषे ) संयवन करता हूँ, तत्सिद्धयर्थं अग्नि में अर्थात् अग्नीषोम के मध्य में इस संस्कृत द्वि को डालता हूँ, तथा तुम भी उसे करो, बहुत विस्तार करो, जिससे यह अग्नि, तुम्हारी त्वचा को नष्ट नहीं करेगा । जैसे सविता देव वर्षिष्ठ नाक में जिस यज्ञ का श्रपण करेगा, तथा आप भी उसका संयवन करे । ' १४ - किन्तु यह कथन भी असङ्गत है, क्योंकि मन्त्र के अक्षरों से तुम्हारे किये अर्थ का कोई सम्बन्ध ही

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[ १६ ] १५ – सिद्धान्ते तु पुरोडाशविषयाः श्रपणमन्त्रा एते । तथा च हे जलौषधिरूपपदार्थद्वय जनयत्यै यजमानस्य प्रजोत्पादनार्थं संयोमि अनयोर्द्र व्ययोमिश्रणं करोमि । तथैव शुक्रशोणितमिश्रणेन यजमानस्य प्रजोत्पत्तिर्भवति । विधि-प्रयुक्तः कर्मभिर्विशिष्टम दृष्टमुत्पद्यते तेनैव शास्त्रसिद्धोऽर्थः सम्पद्यतेऽस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा । स्तुत्यर्था चोक्ति-स्तथाविधा सम्भवति । ' प्रजा एवैतेन दधारे ' ति तित्तिरिश्रुतेः । कात्यायनाद्यनुसारेण मिश्रीकृतं पिण्डसमूहं द्वेधा विभज्य भागद्वयोपेतान् पिष्टान् पृथगेव स्पृशेद् । इदं पिष्टस्य प्रथमार्धमग्निसम्बन्धि भवत्विति शेषः । इदं द्वितीयार्धमग्नीषोमयोः सम्बन्धि भवतु समं विभज्याहरिष्यन्नारभते ' ( का ० श्र ० सू ० २०५ १५ ) इति कात्यायनसूत्रात् । १६ – इषे त्वे त्याज्यमधिश्रयतीति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २।५।१७ ) आज्यस्य प्रविलापनार्थं तत्पात्रस्याग्नावधि श्रयणम् । हे आज्य त्वामिषे इष्यमाणवृष्टिसिद्ध्यर्थमधिश्रयतीति शेषः । ' धर्मोऽसीति पुरोडाशम् ' ( का ० श्रौ ० सू ० २।५।१६ ) अधिश्रयतीत्यनुवृत्तिः । विश्वायुरितिमन्त्रशेषः । घर्मशब्दोऽत्र दीप्यमानं प्रबयं ब्रूते । हे पुरोडाश त्वं श्रप्य-माता धर्मोऽसि दीप्यमानत्वात् प्रवर्ग्योऽसि । तथा विश्वायुः विश्व पूर्ण यजमानसम्बन्ध्यायुर्यस्मात् स त्वं विश्वायुः । ' विश्वमेवायुर्यजमाने दधातीति । ' तित्तिरिश्रुतेः । उरु प्रथा इति प्रथयति यावत्कपालम् कपालेष्वधिश्रितं पुरोडाशं कपाल परिमाणमनतिक्रम्य सर्वेषु कपालेषु संश्लेषयितुं प्रसारयेत इत्यत्रापि हे पुरोडाश त्वं स्वभावत उरुप्रथा उरु विस्तीर्णं यथा स्यात्तथा प्रथस्व तथा ते यज्ञपतिः उरु प्रथतां प्रख्यातो भवतु । ' अग्निष्टमित्यद्भिरभिमृशति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २।५।२१ ) हे पुरोडाश श्रपणाय प्रवृत्तोऽग्निस्ते त्वचं त्वक्सदृशमुपरितनं भागं मा हिसीत् मा विनाशयतु । अत्रातिदाहेन मषीभावो विनाशः सोऽस्य माभूत् । अवघातपेषणाभ्यां य उपद्रव आसीत् श्रपणेन च योभविष्यति तत्सर्वमुदकस्पर्शेन शाम्यति इत्यर्थः । तदेतत् सर्वं शतपथे स्पष्टम् । नहीं बैठ रहा है । अग्नि किसकी त्वचा को दहन नहीं करेगा और क्यों नहीं दहन करेगा? इसे भी स्पष्ट नहीं किया है । १५ – तथा च हे जलौषधि रूप पदार्थद्वय! यजमान के लिये प्रजोत्पादनार्थ इन दो द्रव्यों का मैं मिश्रण कर रहा हूँ । तथैव शुक्र शोणित के मिश्रण से यजमान की प्रजोत्पत्ति होगी । विधि प्रयुक्त कर्मों से विशिष्ट अदृष्ट की उत्पत्ति होती है । उसी से शास्त्रसम्मत अर्थं सम्पन्न होता है चाहे वह इस जन्म में हो या जन्मान्तर में हो । उस प्रकार की उक्ति का स्तुत्यर्थ होना भी सम्भव हो सकता है । क्योंकि तित्तिरि श्रुति ' प्रजा एवैतेन दधार ' कहती है । कात्यायन अनुसार मिश्रीकृत पिण्ड समूह का द्वेधा विभजन करके दोनों भागों से युक्त पिष्ठों को पृथक् - पृथक् स्पर्श करे । पिष्ट का यह प्रथमार्ध, अग्नि से सम्बन्धित हो, और यह द्वितीयार्ध अग्नीषोम से सम्बन्धित हो, क्योंकि ' समं विभज्याहरिष्यन्नारभते ' यह कात्यायन सूत्र इसमें प्रमाण है । १६ – ' इषेत्वे त्याज्यमधिश्रयति ' सूत्र के अनुसार आज्य का प्रविलापन करने के लिये उसके पात्र को अग्नि पर चढ़ावे । हे आज्य! तुम्हें इष्यमाण वृष्टि सिद्धयर्थं अधिश्रित किया जा रहा है । ' धर्मोऽसीति पुरोडाशम् ' सूत्र में ' अधिश्रयति ' की अनुवृत्ति की जाती है । ' विश्वायुः ' यह मन्त्र शेष है । यहाँ पर ' धर्म ' शब्द, दीप्यमान प्रवर्ग्य को बता रहा है । हे पुरोडाश! श्रप्यमाण होने से तुम धर्म रूप हो, और दीप्यमान होने से तुम प्रवर्ग्य हो । तथा यजमान सम्बन्धि पूर्ण आयु जिससे प्राप्त होती है, वही तुम विश्वायु रूप हो । क्योंकि तित्तिरि श्रुति कह रही है - ' विश्वमे वायु-जमाने दधाति ' इति । कपाल पर अधिश्रित पुरोडाश को कपाल परिमाण का अतिक्रमण किये बिना सभी कपालों से संश्लिष्ट करने के लिये उसे फैलाना चाहिये । यहाँ पर भी पुरोडाश! तुम स्वभाव से ही उरुप्रथ हो जाओ, अर्थात् जिस तरह से विस्तीर्ण हो सको उस तरह फैलो तथा तुम्हारा यज्ञपति खूब प्रख्यात हो । ' अग्निष्टमित्यद्भिरभिमृशति ' सूत्र के अनुसार हे पुरोडाश! श्रपणार्थ पवित्र हुआ अग्नि तुम्हारी त्वचा को यानी त्वक् सदृश तुम्हारे ऊपरी भाग को नष्ट न करे । अर्थात् अत्यधिक दाह से मष भाव अर्थात् विनाश इसका न हो पाये । अवघात और पेषण के द्वारा जो उपद्रव हुआ था और श्रवण से जो उपद्रव होगा, वह सब, उदक के स्पर्श मात्र से शान्त हो जायगा । इस सम्पूर्ण अभि-प्राय को शतपथ ने स्पष्ट रूप से बताया है ।

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[ २०० ] १७- ' अथ सौयौति जनयत्यै त्वा संयोमीति । यथा श्रियेऽन्नाद्याय इमाः प्रजा यजमानाय यच्छेदेवं वैतत् संयौ-धन्नु संयोति यथा वा अधिवृत्त्योऽग्नेरधिजायेतैवं वैतत् संयौति ' ( श ० १ | १ | २ | ३ ) आसिक्तजलेन पिष्टानां समन्त्रकं मिश्रीकरणं विधत्ते - अथ संयौति । मन्त्रतात्पर्यकथनेन संयवनं प्रशंसति - यथा खल्विमाः प्रजा यजमानाय ( षष्ठ्यर्थे चतुर्थी ) यजमानस्य श्रिये सम्पदर्थमन्नाद्यर्थं च नियच्छेदेवमेतदनुकूलमेव तत्पिष्टसंवनमित्यर्थः । मन्त्रगतस्य जनयत्य पदस्य जननायेत्यर्थः । तमुपजीव्य प्रशंसति अधिवर्जनं पुरोडाशस्याग्नावधिश्रयण करिष्यन् खलु संयोति - यथा खल्वधिश्रितः पुरोडाशोऽग्नेः सकाशात् जायेत एव तदनुगुणं संयवनम् । १८ - अथ द्वेधाकरोति - यदि द्वे हविषी भवतः पौर्णमास्यां ने द्वो हविषी भवतः स यत्र पुनर्न स ७ हरिष्यन्-स्यात् तदभिमृशतीदमग्निरिदमग्नीषोमयोरिति नाना वा एतदग्रे हविर्गृह्णन्ति तत् सहावघ्नन्ति तत् सं पिबन्ति । तत् पुनर्नाना करोति तस्मादेवमभिमृशत्यधिवृणक्त्येवैव पुरोडाशमधिश्रयत्यसावाज्यम् ' ॥ ( श ० १।१।२ / ४ ) द्वेघेत्यादि-विभागविधिः - कुत्र हविर्द्धयमिति तद्दर्शयति । पौर्णमासीशब्देन तत्कालानुष्ठेयं कर्म विवक्षितम् तत्र ह्याग्नेयोऽष्टाकपालः, अग्नीषोमीय एकादशकपाल:, इति द्वो हविषी विहिते इत्यर्थः । -१६ – एवं द्वेधा विभज्य विभक्तयोरभिमर्शनं विधत्ते -- स खल्वध्वर्युः यत्र यस्मिन् काले तत् हविद्वयं पुनर्न हरिष्यन् स्यात् - संहरणमेकीकरणम् तत्करिष्यन् न भवेत् तत् तदानीमिदमग्नेरित्येकं भागमभिमृशति - इदमग्नीषोमयो-रित्यपरम् । तावेतौ यथासंख्यमाग्नेयाग्नीषोमीयपुरोडाशावित्यर्थः । कथमनयोर्द्वित्वं कुत्र वातयोः संहरणं यद् व्यावृत्तये संहरिष्यनितिविशेष्यते तत्सर्वं दर्शयति नाना वा एतदित्यादिना । अग्नेनिर्वापसमये अग्नये जुष्टं निर्वपामि अग्नी-षोमाभ्यां जुष्टं गृह्णामि इति पृथक् पृथक् देवतादेशनात् ग्रहणस्य नानात्वम् । अवहननादिसंस्कारे सहैवानुष्ठिते सति तत्स हरणं भवति । तद्धविरस्मिन् समये पुनरनेन मन्त्रेण यथास्वं विभजतीत्यर्थः । इतः परमेकीकरणं न भवतीति तदेवा-संहरणम् | १७ - आसक्ति जल से पिष्ट का समन्त्रक मिश्रीकरण का विधान किया जाता है । मन्त्र के तात्पर्य कथन में संवन की प्रशंसा की गई है - जैसे यह प्रजा, यजमान की सम्पत्ति, और अन्न आदि के लिये नियन्त्रित कर सके, तदनुकूल ही वह पिष्ट संयवन है । मन्त्रगत ' जनयत्ये ' पद का अर्थ ' जननाय ' है । उसी को उपजीव्य बनाकर प्रशंसा की गई है । पुरोडाश का अग्नि पर अधिश्रयण करते हुए संयवन करता है । जिस प्रकार अधिश्रित हुआ पुरोडाश, अग्नि में से हो सके, तदनुगुण ही संयवन करना है । १८ – तदनन्तर शतपथ ' द्वेधा ' इत्यादि से विभाग का बता रहे हैं - ' पौर्णमासी ' शब्द से तत्काल में अनुष्ठेय कर्म की कपाल ' और दूसरा ' अग्नीषोमीय एकादश कपाल ' इस प्रकार दो विधान कर रहा है । ये दो हवि कहाँ होते हैं? उसे विवक्षा की गई है । उस कर्म में एक ' आग्नेय अष्ट्रा हवियों का विधान किया गया है । १६ - इस प्रकार द्वेधा विभाजन करके उनके अभिमर्शन ( स्पर्श ) का विधान किया गया है । जिस समय उन दो हवियों का एकीकरण नहीं किया जायगा उस समय ' इदमग्ने: ' इस प्रकार कहकर एक भाग का स्पर्श किया जाता है और ' इदमग्नीषोमयोः ' कहकर दूसरे भाग का स्पर्श किया जाता है । ये दोनों हवियाँ यथासंख्य अग्नि और अग्नी-षोम देवता के पुरोडाश समझे जाते हैं । ऐसी स्थिति में इनका द्वित्व कैसे समझा जायगा? इन दोनों का संहरण कहाँ बताया गया है? जिसकी व्यावृत्ति करने के लिये ' न संहरिष्यन् ' यह विशेषण आप दे रहे हैं । हमारे इसी अभिप्राय का शतपथ ने ' नाना वा एतत् ' कहकर समर्थन किया है 1 । अग्नि के लिये निर्वाप करते समय ' अग्नये जुष्टं निर्वपामि, अग्नीषोमाभ्यां जुष्टं गृह्णामि ' इस प्रकार पृथक् - पृथक् देवता का कथन करने से यहाँ ग्रहण का नानात्व स्पष्ट है । अवह्ननादि संस्कारों को सदैव अनुष्ठित किये जाने पर वह संहरण होता है । अर्थात् इसी समय उस हवि के पुन: इस मन्त्र से यथास्व तत्तद् देवताओं के लिये विभाग किये जाते हैं । इसके बाद एकीकरण नहीं किया जाता, इस को ' अस हरण ' कहते हैं ।

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[ २०१ ] २० - पुरोडाशकपालस्याज्याधिश्रयणस्य च समानकालतां विवक्षुः कर्तृभेदमाह - अधिवृणक्तीति । एषो -ऽध्वर्युः पुरोडाशमधिवृणक्ति अग्नेरुपर्यं धिश्रयति । अथैक आज्यं निर्वपति इति प्रागाज्य शब्दपर्यायेणैकशब्देन य आग्नीध आज्यनिर्वापकर्तृ तथा प्रतिपादितः सोऽत्र ' असा ' वित्यदस्शब्देन विप्रकृष्टवाचिना परामृश्यते ॥ पुरोडाशाधिश्रयणसमये असावाग्नीध्र: आज्यमधिश्रयेदित्यर्थः । २१ - तद्वा एतत् उभय १७ सह क्रियतेऽर्धो वा एष आत्मनो यज्ञस्य यदाज्यमर्थोयदि हविर्भवति स यश्चा-सावर्धो य उ चायमर्धस्ता उभावग्निं गमयावेति तस्माद्वा एतदुभय १७ सह क्रियते एवमुहैष आत्मा यज्ञस्य सन्धीयते । ( श ० १ | २ | २५ ) उभयोः पुरोडाशाधिश्रयणाज्याधिश्रयणयोः सहानुष्ठानमुपपादयति - अर्धो वा एष इत्यादि । आज्यं यज्ञशरीरस्यार्श्वभागः । उपस्तरणाभिधारयोः प्रयाजादीनाश्च तत्साध्यत्वात् । इतरोऽर्धः पुरोडाशादिर्हविः सहाधिश्रयणेना-धंद्वयमेकीकृत्याग्नि प्रापयावेत्यध्वर्योराग्नीघ्रस्य चाभिप्रायः । एवमुहेति आज्यहविषोरुभयोः सहाधिश्रयणे सत्यर्धद्वयस्यैकी -करणात् यज्ञशरीरं सन्धीयते । २२ – सोऽसावाज्यमधिश्रयति इषे त्वेति । वृष्टय तदाह यदाहेषेत्वेति । तत्पुनरुद्धासयति ऊर्जेत्वेति । यो वृष्टाद्र्ग्रसो जायते तस्मै तदाह ( श ० १ | २ | २ | ६ ) विहितमाज्याधिश्रयणमनूद्य मन्त्रं विधत्ते सोऽसाविति । इष्यते इति इट् इति व्युत्पत्त्या इट्शब्देन वृष्टिविवक्षिता । वृष्टयं तदाहेत्यादि । ऊर्जेत्वेत्युद्वासयति । तस्माद् वृष्टादुदकात् जायमानो यो बलको रसः स अर्कशब्देन विवक्षितः । २३ - अथ पुरोडाशमधिवृणक्ति धर्मोऽसीति यज्ञमेवैतत् करोति यथा घर्मं प्रवृज्यादेवं वृणक्ति विश्वायुरिति तदायुर्दधाति ' ( श ०१२ / २ / ७ ) अधिवृणक्ति अग्ना उपरि वृणक्ति वर्जयति श्रपणार्थं स्थापयतीत्यर्थः । यज्ञमेवैतदिति । घर्मोऽसीति धर्मतादात्म्यस्तवनात् घर्मस्य च सोमयागाङ्गत्वात् तदात्मकमेवैतत्करोति । धर्मस्य यत् प्रवृञ्जनं सोमे तत्सदृशमेव पुरोडाशस्य प्रवृञ्जनमित्यर्थः । विश्वायुरितिमन्त्रे तदायुर्दधाति । २० - पुरोडाश कपाल और आज्याधिश्रयण की समान कालता को बताने की इच्छा से कर्तृ भेद को बता रहे हैं - वह अध्वर्यु ' ' पुरोडाशमधिवृणक्ति ' अर्थात् अग्नि के ऊपर उसे अधिश्रित करता है, और ' अथैक आज्यं निर्वपति ' कहकर अन्य शब्द के पर्याय ' एक ' शब्द से जिस आग्नीध्र को आज्य निर्वापकर्ता के रूप में प्रतिपादित किया था, उसी का यहाँ पर ‘ असौ ' इस ‘ अदस् ' शब्द जो विप्रकृष्ट का वाचक है, उससे परामर्श किया गया है । अर्थात् पुरोडाश के अधिश्रयण काल में वह आग्नीध्र आज्य का अधिश्रयण करे । २१ – ' तद्वा एतत् उभय २७ • सह क्रियतेऽर्धो वा एष ' - ( श ० प ० १ २ २ ५ ) इस शतपथ ब्राह्मण के द्वारा पुरोडाशाधिश्रयण दोनों के सहानुष्ठान का उपपादन किया जा रहा है । आज्य यज्ञ शरीर का अर्ध भाग है, क्योंकि उपस्तरण, अभिघार और प्रयाज आदि उसी के द्वारा सम्पादन किये जाते हैं । दूसरा अर्ध भाग पुरोडाशादि हवि है, अधिश्रयण के साथ अर्धद्वय को एक करके अग्नि के प्रति प्राप्त करावे, यह अध्वर्यु और आग्नीध्र का अभिप्राय है । आज्य और हवि दोनों का एक साथ होने पर अर्धद्वय का एकीकरण करने से यज्ञ शरीर को जोड़ा जाता है । २२ - ' सोऽसावाज्यमधिश्रयति ' - ( श ० १ | २ | २६ ) इस ब्राह्मण के द्वारा, विहित आज्याधिश्रयण का अनुवाद कर मन्त्र का विधान किया गया है । ' इष्यते इति इट् ' इस व्युत्पत्ति के बल पर ' इट् ' शब्द से वृष्टि की विवक्षा की गई है । ' उर्जेत्वा ' मन्त्र से उद्वासन किया जाता है । उस वर्षा के जल से होने वाला जो बलकारक रस है, उसे ' ऊर्क ' शब्द से विवक्षित किया गया है । २३ - अथ पुरोडाशमधिवृणक्ति: ' - ( श ० १ २ २ ७ ) इस ब्राह्मण के द्वारा अग्नि पर श्रवण के लिये स्थापन करना बताया गया है । ' धर्मोऽसि ' मन्त्र से धर्म के साथ तादात्म्य का स्तवन करने से और धर्म सोमयाग का अङ्ग होने से इसे तदात्मक ही करता है । धर्म का जो प्रवृञ्जन सोम में है, तत्सदृश ही पुरोडाश का प्रवृञ्जन कहा गया है । ' विश्ववायु ' मन्त्र से उसमें आयु की स्थापना करता है ।

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| २०२ । २४ - तं प्रथयति उरु प्रथा उरु प्रथस्वेति प्रथयत्येवैनं कुरुते मानायैवैतदाशिषमाशास्ते । ' ( श ० १२/२८ ) तं प्रथयति यज्ञपतिः प्रथतामिति यजमानो वै यज्ञपतिस्तद्यज-प्रथयत्येवैतदित्यादिना विहितस्य प्रशंसा प्रथयति पृथु विस्तीर्ण उपहितेषु कपालेषु पुरोडाशं प्रथयति विस्तारयतीत्यर्थः । प्रजापशुधनादिभिः प्रथनं भवतीति फलोक्त्या तत्प्रशंसेव प्रभूतं करोतीत्यर्थः । पुरोडाशस्योरु प्रथनेन यजमानस्यापि व्युद्धं वैतत् यज्ञस्य यन्मानुषं नेद् व्यृद्धं यज्ञे करवाणीति तस्मान्न । तं न सत्रा सत्रा पृथु कुर्यात् मानुष ७ ह कुर्यात् । यत्पृथु कुर्यात् पृथु कुर्यात् ( श ० १ | राह ) २५ - पुरोडाशस्य स्वाभिमतपरिमाणविधित्सया परिमाणान्तरं त्वात् अत्रातिशयार्थः । सत्रा पृथुमतिपृथु न कुर्यात् । विपक्षे निषेधति तन्नेति । सत्रेति निपातोऽनेकार्थ-मानुषं को दोष इति तत्राह - व्यृद्धं विगता ऋद्धिर्यस्मात्तत् तस्मादति बाधकमाह मानुष २७ ह तत् यदति पृथुकरणम् । नन्वस्तु तन्न युक्तमित्यर्थः । पृथुकरणेन यज्ञे विगतद्धिकरणमेव भवति । यज्ञे २६-- अश्वशफमात्रं कुर्यादित्युहैक आहुः कस्तद्वेद तैव कुर्यात् । ' ( ० १ २ २ १० ) पक्षान्तरमुपन्यस्यति । अयमपि यावानश्व फो यावन्तमेव स्वयं मनसा न सत्रा पृथुं मन्ये-शफः । स्वाभिमतं पुरोडाशपरिमाणमाह- यावन्तमिति पक्षो दुर्ज्ञातत्वान्न साधुरित्याह- कस्तद्व ेद यावानश्व-दैवतसौविष्टकृतेडाद्यवदानपर्याप्तं मन्येत तावत् परिमाणविशिष्ट यावत्परिमाणविशिष्टमेव स्वयं मनसैवातिपृथु न मन्येत किन्तु कुर्यादित्यर्थः । २७ - तमद्भिरभिमृशति सकृद्वा त्रिर्वा तद्यदेवास्यात्रावयन्तो रापस्तमद्भिः शान्त्या शमयति । ' ( श ० १ २ २ ११ ) पुरोडाशस्याद्भिरभिमर्शनं पिषन्तो क्षण्वन्ति वा विहन्ति शान्ति-पिंषन्तो वा क्षण्वन्ति सकृद्वा त्रिर्वा हिंसन्ति विवृहन्ति ( वृहू उद्यमने विधत्ते तमिति । तद्यदेवास्यावघ्नन्तो ) विश्लेषयन्ति शान्तिरापः दातृष्णादिशमनहेतुत्वे-२४ -- ' तं प्रथयति उरुप्रथा ' - ( श ० प ० १ २ २ ८ ) इस शतपथ हुए ( उपहित ) कपालों पर पुरोडाश का विस्तार करता है - अर्थात् ब्राह्मणोक्त ' तं प्रथयति ' का अर्थ - रखे से विहित की प्रशंसा की गई है । ' प्रथयति ' का अर्थ ' पृथु पुरोडाश को फैलाता है । और ' प्रथयत्येवं नमेतत् ' ( अधिक विस्तार ) करने से यजमान का भी प्रजा, पशु, धन ' = आदि विस्तीर्ण अर्थात् प्रभूत करता है । पुरोडाश का उरु प्रथन कथन के द्वारा उसकी प्रशंसा ही प्रतीत होती है । के द्वारा विस्तार ( प्रथम ) होता है, इस प्रकार फल २५- ' तं न सत्रा पृथु कुर्यात् ' - ( श ० प ० १२२६ ) के द्वारा करने के लिये परिमाणान्तर का निषेध किया गया है । अर्थात् पुरोडाश के स्वाभिमत परिमाण का विधान निपात ( अव्यय ) अनेकार्थक होने से उसका ' अतिशय ' अर्थ पुरोडाश का अति विस्तार न करे । यहाँ पर ' सत्रा ' ( अत्यधिक विस्तृत ) न करे । विपक्ष में ( वैसा न करने पर ) है बाधक । ' तं न सत्रा पृथु कुर्यात् ' अर्थात् पुरोडाश को अति पृथु उसके बता रहे हैं- जो अति पृथुकरण है, वह मानुष मानुष हो जाने में क्या दोष है? ऐसी जिज्ञासा होने पर कहते है । करने से यज्ञ में विगर्ताद्धकरण ही होता है । अर्थात् यज्ञ, ऋद्धि हैं-- ' व्यृद्ध ' विगतद्धक होता है अति विस्तार विस्तार करना उचित नहीं है । शून्य हो जाता है । इसलिये यज्ञ में पुरोडाश का अति २६ -- ‘ अश्वशफमात्रं कुर्यादित्युहैक आहु: ' - -( श ० प ० ११२ / २ / १० ) इस ब्राह्मण ' द्वारा एक अन्य पक्ष को उपस्थित कर रहे हैं । किन्तु यह पक्ष भी दुर्ज्ञेय होने से समीचीन का खुर ) इतने परिमाण है । अतः स्वाभिमत पुरोडाश परिमाण नहीं को है । क्योंकि कौन जानता है कि अश्वशफ ( घोड़े का है ऐसी कल्पना करके उसे ( पुरोडाश को ) अति पृथु ( अत्यधिक बताते हैं-- स्वयं अपने मन से ही इतने परिमाण के अवदान के लिये जितना पर्याप्त हो उतने परिमाण से युक्त उसका विस्तृत विस्तार ) न करे, किन्तु दैवत सौविष्टकृत इडा आदि करे । २७ - - ' तमद्भिरभिमृशति सकृद्धा ' - - ( श ० प ० १ २ का विधान किया गया है । अवहनन या पेषण करने वाले एक २ ११ बार इस अथवा ब्राह्मण के द्वारा जल से पुरोडाश के अभिमर्शन तीन बार जो हिंसा करते हैं, अथवा

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[ २०३ ] नापां शान्तिरूपता । तदद्भिः शान्त्या शमयति । अद्भिरभिमर्शनेन तत्संदधाति हननाद्युपद्रवकृत हिंसा निवारणेन तत्सन्धा-नमेव करोति । माहि सोऽभिमृशति । अग्निष्ट त्वचं माहि ७ सीदित्यग्निना वा एनमेनदभितप्स्यन् भवत्येष ते त्वचं सीदित्येवमेवैतदाह ( श ० १/२/२/१२ ) २८ - सोऽभिमृशतीत्यादि विहिताभिमर्शनानुवादेन मन्त्रविधानम् । अग्निष्टे त्वचं तपनं मा हि करिष्यन् ७ सीदितिमन्त्रेणा- ते त्वचं मा हिंसाप्रार्थनं युक्तमिति व्याचष्टे – अग्निना वा एनमेतदभितप्स्यन् भवति । अभितः सर्वतः । दयानन्दीयं व्याख्यानं हि सीत् मषीभावं नोत्पादयत्वित्यर्थः । सर्वथापि शतपथब्राह्मणरीत्यैव सायणादिव्याख्यानम् तु न मनागपि शतपथाभिप्राय स्पृशति । २६-- तं पर्यग्निं करोति अच्छिद्रमेवैनमेतदग्निना परिगृह्णाति । नेदेनं नाष्ट्रा रक्षांसि प्रमृशन्तीत्यग्निहि रक्षसामपहन्ता तस्मात्पर्यग्नि करोति । ' ( श ० १।२।२।१३ ) पर्यग्निकरणं विधत्ते--परितोऽग्निर्यस्य स पर्यग्निः परितोऽग्निमन्तं पुरोडाशं करोतीत्यर्थः । वेष्टनं तस्य कृतं प्रयोजनमाह भवतीत्यर्थः -- । अच्छिद्रमेवेति । अग्निना निर्विघ्नमेवैतत्क्रियते । राक्षसादिसंस्पर्शाभावार्थं प्राकारवन्नी रन्ध्रमग्निना देव एव ३० -- त ं श्रपयति देवस्त्वा सविता श्रपयत्विति । न वा एतस्य मनुष्यः श्रपयिता । देवो शतं ह्य वेदानीति े ष तदेनं तस्माद्वा सविता श्रायति वर्षिष्ठेऽधिनाक इति । देवत्रा एतदाह यदाह वर्षिष्ठेधिनाक इति । तमभिमृशति अभिमृशति ( ० १ || २ | १४ ) विश्लेषण ( पृथक् - पृथक् ) करते हैं, उपद्रव कृत हिंसा का निवारण कर कहा गया है । उसे शान्ति रूप जल से उनको जोड़ ही देता है । शमन करते हैं, अर्थात् जल से अभिमर्शन कर हननादि दाह तृष्णादि के शमन के कारण जल को शान्ति रूप अभिमर्शन २८ - ' सोऽभिमृशति अग्निष्टे त्वचं ' - ( श ० प ० १।२।२।१२ ) सोऽभिमृशति ' इत्यादि अहिंसा से विहित प्रार्थन ( इच्छा ) का अनुवाद करके मन्त्र का विधान किया गया है । ' अग्निष्टे त्वचं मा हिंसीत् ' इस मन्त्र तपाने से वाला तुम्हारी त्वचा में करना उचित है । इस प्रकार अग्रिम अंश से उसकी व्याख्या कर रहे हैं - चारों ओर से अनुसरण करते हुए ही मी भाव ( कालापन ) उत्पन्न न करे । इस प्रकार सभी तरह से शतपथ ब्राह्मण की रीति ब्राह्मण का के अभिप्राय का स्पर्श सायणादि भाष्यकारों का व्याख्यान है । किन्तु दयानन्द स्वामी का व्याख्यान तो शतपथ तक नहीं कर रहा है । २६ - ' तं पर्यग्निं करोति अच्छिद्रमेवैनमेतद् ' - ( श ० प ० १ २ २ १३ ) ब्राह्मण हैं । ' तं के पर्यग्निं द्वारा पर्यग्निकरण करोति ' अर्थात् का विधान किया जा रहा है । परितः चारों ओर है अग्नि जिसके, उसे पर्यग्नि कहते को चारों ओर से अग्नि परिवेष्टित पुरोडाश को चारों ओर से अग्निमान् ( अग्नि से युक्त ) करता है । उस पुरोडाश किया जाता है । अर्थात् राक्षसादि के करने का प्रयोजन बता रहे हैं कि उसे ( पुरोडाश को ) अग्नि के द्वारा विघ्नरहित जिस तरह हो सके उस तरह द्वारा उसे स्पर्श न होने देने के लिये प्राकार ( परकोटे ) की तरह रन्ध्र ( छिद्र ) रहित अग्नि से उसे वेष्टित किया जाता है । ३० ' तं श्रपयति देवस्त्वा सविता ' - ( श ० प ० १ | २ | २ | १४ ) इस ब्राह्मण से समन्त्रक श्रपण वह का देवता विधान से किया जा रहा है । इस दिव्य पुरोडाश का श्रपण करने वाला ( श्रपयिता ) मनुष्य नहीं है कि , क्योंकि वृद्धतम अर्थात् उत्कृष्ट-सम्बन्धित है । सविता देव ही उसे पकाता है । देवताओं के प्रति ही यह कहा जा रहा निवास है करने वाले देवताओं के तम या वृहत्तम स्वर्ग में सविता देव श्रपण करें । तथा च उस लोक ( स्वर्ग लोक ) में

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[ २०४ ] समन्त्रकं श्रपणं विधत्ते-- देवस्त्वा सविता श्रपयतु न वा एतस्य दिव्यस्य पुरोडाशस्य यतो देवसम्बन्धित्वाद्देवो ह्येष तत् तस्मादेनं सविता श्रपयति वर्षिष्ठेऽधिनाक इति । मन्त्रपाठे मनुष्यः देवत्री श्रपयिता हि दाह-- वर्षिष्ठे वृद्धतमे उत्कृष्टतमे वृहत्तमे वा नाके स्वर्गे देवः सविता श्रपयत्विति मन्त्रार्थः । तथा च तल्लोकनिवासिनो देवान् प्रत्येवैत-देवान् प्रत्येवैतद्वचनम् । ' देवमनुष्य पुरुष पुरुमयेभ्य: ' ( पा ० सू ० ५ | ४ | ५६ ) इति द्वितीयार्थे त्राप्रत्ययः । यद्वषिष्ठेधिनाक इति तदाह तमभिमृशतीति श्रवणानन्तरं तस्याभिमर्शनं विधत्ते अभिमृशतोऽभिप्रायमाह जानामीत्यर्थः । तस्माद्वा अभिमृशति -- शृतमिति शृतं पक्वं वेदानि ३१ - परमेश्वरपरत्वे तु हे भगवन्निवेदनीयदिव्य हविः जनयत्यै परमेश्वरप्रीत्युत्पत्त्यै भिरोषधीभिर्मधुमतीरापः मधुमतीभिरद्भिर्मधुमतीरोषधीः सम्मिश्रयामि घृतदुग्धमधुशर्करा चूर्णादिमिश्रणेन त्वा त्वां संयौमि मधुमती -त्मकं नैवेद्यं सम्पादयामि । तत एवैकमर्धमग्नेविप्रलम्भशृङ्गारसा रसर्ब स्वस्थ भगवतः कृष्णस्य दिव्यरसा-द्वितीयं चार्धमग्नीषोमयोः उद्बुद्धोद्वेलितसम्प्रयोगविप्रयोगात्मकोभयविधशृङ्गाररससमुद्रसा केवलधर्मिणो भागोस्तु रस्तु । विप्रलम्भात्मके राधारूपो धर्मोऽव्यक्तः । सम्भोगशृङ्गारे तूभयोरभिव्यक्तिरित्युभयरूपता रस । र्वस्वयो राधाकृष्णयो-३२ - इषे इष्यमाणायै प्रेमरसवृष्टय त्वा विभजामीति शेषः । हे सर्वेश्वर तृप्तिहेतुनैवेद्य त्वं धर्मोसि सोमाङ्गयप्रवर्ग्यरूपोऽसि प्रवर्ग्यस्य सोमयागपुरकत्ववत् तवापि भगवदाराधनापूरकत्वात् । विश्वायुरसि त्वं साफल्योपेतमायुर्यस्मात् तत् अतिप्रियवस्तुनोभगवदर्पणेनैव जीवनसाफल्यं भवति तदभावेतु व्यर्थ मेवायुह्रियते विश्वं । सम्पूर्ण किं न जीवन्ति भस्त्रा: किन्न श्वसन्त्युत । न खादन्ति न मेहन्ति कि ग्रामपशवोऽपरे ॥ ' ( श्री ० भा ० म ० पु ० २ | ३ | ‘ तरवः इति श्रीमद्भागवतवचनेन भगवत्सम्बन्धविधुरस्य जीवनस्य भस्त्रादिश्वसनवद् वैयर्थ्यनिःसारत्वादिप्रतिपादनात् १८ ) प्रथास्त्वं स्वभावतो भगवत्सम्बन्धित्वात् प्रख्यात वैभवोऽसि । इदानीमुरु प्रथस्व सम्यक् प्रख्यातो । उरु भावितमधुना भगवदुपासनाङ्गत्वेन लोके वेदे च प्रख्यातो भव । यथा काष्ठादिष्वव्यक्तरूपेण व्यापकोऽप्यग्निर्दाहकत्व- भव । भगवद्भावनया प्रति ही यह वचन है । ' देवत्रा उ ' यहाँ पर ' देवमनुष्य पुरुष पुरुमर्त्येभ्यः ' - ( पा ० सू ० ५।४५६ ) सूत्र द्वितीया के अर्थ में ' त्रा ' प्रत्यय किया गया है । इसलिये ' देवत्रा ' का अर्थ देवान् प्रति ' किया गया है । इस यद्वषिष्ठेऽधिनाक पाि इति एतत् आह तमभिमृशति ' से श्रपण के पश्चात् उसके अभिमर्शन का विधान हुआ है । अभिमर्शन ( स्पर्श ) करने वाले का अभिप्राय बता रहे हैं - यह ( पुरोडाश ) शृत अर्थात् पक्व हो गया है ऐसा मैं जान रहा हूँ । उसकी जानने के लिये वह उसका अभिमर्शन ( स्पर्श ) करता है । परिपक्वता ३१ - इसी मन्त्र का परमेश्वरपरक अर्थ इस प्रकार कर सकते हैं - भगवान् को अर्पण करने योग्य हे दिव्य हवि! परमेश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये मधुमती ओषधियों के साथ मधुमान् ( मधुर ) जल को मधुर साथ मधुमती ( मधुर ) ओषधियों को मिला रहा हूँ, घृत, दुग्ध, मधु, शर्करा चूर्णादि के मिश्रण से दिव्यरसात्मक जल नैवेद्य के का सम्पादन कर रहा हूँ । उसी में से एक अर्ध भाग अग्नि का अर्थात् विप्रलम्भ शृङ्गार सार सर्वस्व भगवान् श्रीकृष्ण रूप केवल धर्मी का रहे, और द्वितीय अर्ध भाग, अग्नीषोम का अर्थात् उबुद्ध और उद्वेलित सम्प्रोग - विप्रयोगात्मक उभयविध शृङ्गार रस में राधा रूप धर्म अव्यक्त है, किन्तु सम्भोग शृङ्गार रस में तो दोनों की अभिव्यक्ति रहने से उभयरूपता है । ३२ - ' इषे ' अर्थात् अर्थात् अभिलषणीय प्रेम रस की वृष्टि के लिये मैं तुम्हें विभक्त कर रहा हूँ । सर्वेश्वर की तृप्ति के हेतुभूत हे नैवेद्य! ' त्वं धर्मोऽसि ' - तुम धर्म रूप हो अर्थात् तुम सोम के अङ्गभूत प्रवर्ग्य रूप हो, क्योंकि जैसे सोमयाग का पूरक होता है, तद्वत् तुम भी भगवदाराधना की पूर्णता करने वाले हो । तुम ' विश्वायुरसि प्रवर्ग्य हो अर्थात् सम्पूर्ण आयु सफलता से युक्त जिसके कारण होती है । अत्यन्त प्रिय वस्तु को भगवदर्पण करने से ही ' विश्वायु जीवन की सफलता होती है, उसके अभाव में तो आयु व्यर्थ ही क्षीण होती रहती है । श्रीमद्भागवतकार कहते हैं - ' तरवः किं न जीवन्ति ' वृक्ष क्या जीवित नहीं रहते, ' भस्रा: किन्न श्वसन्त्युत ' अथवा लोहार सुनार के यहाँ की धोनी ( चमड़े की

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[ २०५ ] प्रकाशकत्वरूपेणाभिव्यज्य काष्ठादिकमात्मसात्करोति तथैव भगवानव्यक्तरूपेण सर्वव्यापकोऽपि सगुण साकाररूपेणाभि-व्यज्य ध्येय रूपेण सर्वान्तनिविश्य सर्वमात्मसात्करोति । ३३ - वस्तुतो ब्रह्म व मायया तद्रूपेण विवर्तते । यथा व्यक्ताग्निना काष्ठेन संश्लिष्टं काष्ठान्तरमपि व्यक्ता-ग्निकं भवति तथैव व्यक्तेन भगवता सम्बद्धं सर्वमपि व्यक्तभगवत्सत्ताकं भगवद्रूपमेव भवति । यथा लवणखनौ निपतितं सर्वमपि लवणमेव भवति तथैव व्यक्तभगवत्सम्बन्धेन सर्वमप्यवधूय बाह्योपाधि भगवद्भावमेवोपगच्छति तथैव यज्ञपतिरुपासनात्मकयज्ञानुष्ठाताप्युरु प्रथताम् । अग्निः प्राकृतोऽग्निस्ते त्वचं मा हिंसीत् त्वत्स्पर्शेन तव प्राकृतत्वं मापा -तु किन्तु विशिष्टः सविता देवः भृगूणामङ्गिरसाञ्च तपोरूपेणाग्निना विरहरूपेण दिव्याग्निना वर्षिष्ठे सर्वोत्कृष्टे प्राकृते स्वर्गेत्वा श्रपयितु पाकेन रसात्मकं करोतु । I I 1 1 I मार्मा संविथात मेरुर्यज्ञोऽतमेरुर्यजमानस्य प्रजा भूयात् । विताय वा द्विताय वैकताय त्वा ॥ वा ० सं ० १ । २३ ॥ अर्थ —- हे पुरोडाश! तुम डरो मत, तुम विचलित न होना । याग हेतुभूत जो पुरोडाश है वह ग्लानि से रहित रहे । यजमान की प्रजा भी ग्लानि रहित रहे । हे पात्र्यांगुलित्रक्षालनोदक! मैं तुम्हें त्रित, द्वित, और एकत संज्ञक देवता की ओर ले चलता हूँ ॥२३ ॥

----बनी हुई ) क्या श्वास नहीं लेती है? ' न खादन्ति, न मेहन्ति किं ग्रामपशवोऽपरे ' -- गाँव में रहने वाले पशु, क्या खाना, पीना, मलोत्सर्जनादि नहीं करते? ( श्री ० भा ० म ० पु ० २/३ | १८ ) इस श्रीमद्भागवत के वचन से स्पष्ट बताया गया है कि भगवत्सम्बन्धविधुर ( भगवत्सम्बन्धशून्य ) जीवन, भस्त्रा ( धोकनी ) के श्वास के समान व्यर्थ है, निःसार है । ' उरुप्रथास्त्व ' तुम स्वभावतः ही भगवत्सम्बन्धी हो, उस कारण तुम्हारा वैभव ( ऐश्वर्य ) प्रख्यात है । अब इस समय भी तुम ' उरु प्रथस्व ' अच्छी तरह प्रख्यात हो जाओ । अर्थात् यद्यपि भगवद्भावना से भावित ( युक्त ) रहने का तुम्हारा स्वभाव ही है, तथापि इस समय भगवदुपासना में अङ्ग बनकर लोक ( संसार ) व्यवहार में और वैदिक व्यवहार में भी अपने को प्रख्यात करो । जैसे काष्ठ आदिकों में अव्यक्त रूप से रहता हुआ भी व्यापक अग्नि दाहकत्व - प्रकाशकत्व रूप से अभिव्यक्त होकर काष्ठादि को आत्मसात् कर लेता है, उसी तरह अव्यक्त रूप में रहने वाला सर्वव्यापक भगवान् भी सगुण - साकार ध्येय रूप से अभिव्यक्त होकर और सबके भीतर प्रविष्ट होकर सबको आत्मसात् करता है । ३३- वस्तुत: ब्रह्म ही माया के द्वारा तत्तद्रूप से विवर्त को प्राप्त होता है अर्थात् अतात्त्विक परिणत होता है । जैसे व्यक्त ( प्रकट ) हुए अग्निमय काष्ठ से संश्लिष्ट हुआ काष्ठान्तर भी व्यक्ताग्निक अर्थात् अग्निमय हो जाता है, उसी तरह व्यक्त हुए भगवान् से सम्बद्ध हुआ सभी कुछ व्यक्त भगवत्सत्ताक अर्थात् भगवद्रूप ही हो जाता है । जैसे लवण ( नमक ) को खान में गिरा हुआ सभी कुछ लवणमय हो जाता है, उसी तरह व्यक्त हुए भगवान् के सम्बन्ध से बाह्योपाधिको निरस्त कर सब कुछ भगवद्भाव को ही प्राप्त हो जाता है । उसी तरह ' यज्ञपति ' अर्थात् उपासना रूप यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला भी विपुल प्रसिद्धि को प्राप्त करे । ' अग्निः ' अर्थात् प्राकृत अग्नि, तुम्हारी त्वचा की हिंसा न करे, यानी तुम्हारा स्पर्श कर तुम्हें प्राकृत न बना दे, किन्तु विशिष्ट सविता देव भृगु और अङ्गिरसों के तपोरूप अग्नि से यानी विरह रूप दिव्य अग्नि से सर्वोत्कृष्ट अप्राकृत स्वर्ग में तुम्हारा श्रपण करे, अर्थात् तुम्हें पकाकर रसात्मक करे ।

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[ २०६ ] १ - ‘ माभेरित्यालभते ' ( का ० श्री ० सू ० २२५ | २४ ) माभेरितिमन्त्रावृत्त्या पुरोडाशमालभेत शृतावृतज्ञानार्थ-त्वादस्याभिमर्शनस्य चरावपि प्राप्तिः, न धानासू तत्र दर्शनादेव पाकज्ञानसम्भवात् । हे पुरोडाश त्वं माभेः भयं मा कार्षीः । मा च संविक्थाः चलनं च मा कार्षीः । न भेतव्यं न चलितव्यं ( ओविजी भयचलनयो: ) अतमेरुरिति शृता-भिवासयति भस्मना वेदेनोपवेषेण वा ( का ० श्री ० सू ० २२५/२५ ) तो पुरोडाशौ अतमेरुरितिमन्त्रेण वेदेन ( कुश-मुष्टिना ) उपवेषेण ( काष्ठमयेन वा ) भस्म गृहीत्वा तेनाच्छादयेत् । यज्ञो यागहेतुः पुरोडाशो भस्माच्छादनेन अतमेरुः ग्लानिरहितो भवतु । तमु ग्लानावित्यस्माद्धातोस्त मेरुशब्दो निष्पद्यते । तमेरुग्लानिः तद्भिन्नोऽतमेरुरग्लानिरित्यर्थः । तथैव यजमानस्य पुत्रपौत्रादिप्रजा अतमेरुग्लानिरहिता भवतु । २ - ' पात्र्याङ्ग लिप्रक्षालनमा १४ येभ्यो निनयत्यभितप्य प्रत्यगस ४ स्यन्तमानत्रिताय त्वेति प्रति मन्त्रम् । ' ( का ० श्रौ ० सू ० २५ २६ ) पिष्टलिप्त पात्रीप्रक्षालनजलं पिष्टलिप्ताङ्ग लिजलञ्च पात्रस्थमेव गार्हपत्यादाहृतेनोल्मुन तापयित्वा पूर्वत आरभ्य प्रत्यक्संस्थ उत्करसमीपे भूमौ परस्परमसंलग्नमाप्त्येभ्यस्तिसृभ्यो देवताभ्यो निनयेत् अध्वर्युः त्रिताय त्वेति प्रतिमन्त्रम् । आप्त्यानां देवता तदुद्देश्येन त्यागश्च कार्यः त्रिष्वपि मन्त्रेषु निनयामीत्यध्याहारः इति सूत्रार्थः । ७ ३ - मन्त्रार्थस्तु – हे पात्र्याङ्ग ुलिप्रक्षालनोदक त्रितनाम्नेदेवाय त्वा त्वां निनयामीति शेषः । एवं द्विताय देवाय एकताय देवाय त्वा निनयामि । अत्रायमितिहासो ज्ञातव्य: - 9 - कुतश्चिद्धेतोर्भीतोऽग्निः अपः प्राविशत् । ततो १ – ‘ माभेरित्यालभते ’ ( का ० श्रौ ० सू ० २५ | २४ ) ' माभेर्मा ' मन्त्र की आवृत्ति के द्वारा पुरोडाश का स्पर्श करे | यह अभिमर्शन ( स्पर्श ) पुरोडाश की परिपक्वता अपरिपक्वता के ज्ञानार्थ बताया गया है, अत: अभिमर्शन ( स्पर्श ) to में भी प्राप्ति होती है । किन्तु धानाओं में नहीं, क्योंकि उनको देखने मात्र से ही उनकी पक्वता का ज्ञान हो जाता है । पुरोडाश! तुम भय मत करो, और चञ्चल भी मत हो अर्थात् इधर - उधर खिसको भी मत, यानी न डरो और न खिसको, ( ' ओविजी ' धातु भय और चलन अर्थ में हैं ) । ' अतमेरुमिति वेदेनोपवेषेण वा ' - -( का ० श्री ० सू ० २५ २२ ) यह श्रौत सूत्र बता रहा है कि ' अतमेरुर्यज्ञो ' ( १।२३ ) मन्त्र की आवृत्ति ( दो बार कहते हुए ) करते हुए पक्व हुए दो पुरोडाशों को वेद ( कुशमुष्टि ) अथवा उपवेष ( काष्टमय हस्त ) से भस्म लेकर उससे आच्छादित करे । ' चह ' पर अभिवासन ( भस्म से आच्छादन ) नहीं किया जाता । ' यज्ञः ' अर्थात् याग का हेतुभूत पुरोडाश, भस्म के आच्छादन से ' अतमेरु: ' ग्लानिरहित हो जाय । ' तमुग्लानौ ' धातु से ' तमेरु ' शब्द की निष्पत्ति होती है । तमेरुः = ग्लानि, उससे भिन्न ' अतमेरु: ' - अग्लानि है । तथैव यजमान की पुत्र - पौत्रादि प्रजा भी ग्लानिरहित हो । २-- ' पात्र्यांगुलि प्रक्षालन ' " प्रति मन्त्रम् ' - ( का ० श्र ० सू ० २।५।२६ ) पिष्ट लिप्त ( आटे से सनी हुई ) पात्री के जल को तथा पिष्टलिप्तांगुलि प्रक्षालन जल को उसी पात्री में गार्हपत्याग्नि से लाये हुए उल्मुक ( जलती हुई ) से तपाकर पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा तक उत्कर के समीप भूमि पर परस्पर संलग्न न करते हुए तीन; आरत्य नामक तीन देवताओं के लिये त्याग दे, क्योंकि ' आप्त्य ' में देवतात्व है, अतः उन तीन देवताओं के उद्देश्य से त्याग करना चाहिये । तीनों मन्त्रों में ' निनयामि ' का अध्याहार किया जाता है । यह सूत्रार्थ है । ३ - मन्त्रार्थ इस प्रकार है - हे पात्र्याङ गुलिप्रक्षालनोदक! त्रित नामक करता हूँ । उसी प्रकार द्वित नामक देव के लिये और एकत नामक देव के लिये प्रसङ्ग का इतिहास जानने योग्य है । किसी कारण से भयभीत होकर अग्नि ने जल में उसका अन्वेषण कर उसे पकड़ा, तब अग्नि ने जल में अपना वीर्य छोड़ा, उससे ये देव के लिये मैं निनयन तुम्हारा ' तुम्हारा निनयन करता हूँ । इस प्रवेश किया, तब देवताओं ने आप्त्य संज्ञक देव उत्पन्न हुए,

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[ २०७ ] देवास्तं ज्ञात्वा जगृहु: । तदग्निना वीर्यमप्सुमुक्तम् । तत आप्त्या उत्पन्नाः त्रितद्वितैकता संज्ञाः । ते देवैः सहचरन्तो यज्ञे पात्रीप्रक्षालनजललक्षणं भागलेमिरे ( श ० १ | २ | ३ | १ ) ४- स्वामिदयानन्दस्तु — ' हे विद्वन् त्वमतमेरुः सन् यज्ञस्यानुष्ठानान्माभेः भयं माकुरु । एतस्मान्माविचल एवं यज्ञं कृतवतस्तेऽतमेरुः प्रजाभूयात् । अहं त्वा तमग्नि यज्ञाय त्रिताय त्वाद्विताय त्वा एकताय सुखाय संयौमि । ईश्वरः प्रतिमनुष्यमाज्ञापयति - आशीश्च ददाति नैवकेनापि मनुष्येण यज्ञसत्याचारविद्याग्रहणस्य सकाशात् भेतव्यम् विचलितव्यं वा । कस्मात् युष्माभिरेतैरेव सुप्रजाः शारीरिकवाचिकमानसानि निश्चलानि सुखानि प्राप्तु ं शक्यानि ' इत्याह । ५ – तत्रेदं वक्तव्यम् — तेन विद्वानत्र संबोध्यते, तत्र कि मूलम्? यज्ञानुष्ठाने प्रवृत्तस्य भयोद्वेगशङ्काया अप्राप्तेश्च तथोक्तिनिर्मूलैव । किञ्च यज्ञस्यानुष्ठानादतमेरुः प्रजा कथं भविष्यति? यदपि अहं त्वा तमग्नि यज्ञाय त्रिताय द्विताय एकता संयोमीत्युक्तम् तदपि निर्मूलम् मूले यज्ञाय संयोमीति पदयोरभावात् । पूर्वमन्त्रतः संयोमीत्यस्यानुवृत्ता-वपित्रिताय त्रयाणामग्निकर्म हविषां भावाय द्विताय द्वयोर्वायुवृष्टिजलशुद्धयोर्भावाय एकताय एकस्य सुखस्य भावाय त्वा तं संयमि निश्चलं करोमीति यदुक्तं तदपि निर्मूलम् एकस्य ब्रह्मणो भावाय द्वयोर्ध मंत्रह्मणोर्भावाय त्रयाणां धर्मार्थकामानां भावाय इत्यस्याप्यर्थस्य सम्भवेन दयानन्दोक्तऽर्थे विनिगमनाविरहात् । ६ - सिद्धान्ते तु त्रितादिदेवता विशेषग्रहणे प्रमाणमुक्तमेवशतपथ ब्राह्मणेऽयं मन्त्रो व्याख्यात इत्युक्त्वापि द्वि-जिनके त्रित, द्वित और एकत नाम हैं । उन्होंने देवों के साथ घूमते हुए यज्ञ पात्री प्रक्षालन जल रूप भाग को पाया ( श ० प ० १ २ | ३ | १ ) । ४ - स्वामी दयानन्द ने उक्त मन्त्र का अर्थ इस प्रकार किया है - ' हे विद्वन्! तुम अतमेरु होते हुए यज्ञ के अनुष्ठान से भय मत करो । इससे विचलित मत हो । इस प्रकार यज्ञ करने वाले तुम्हारी प्रजा अतमेरु हो । मैं ' त्वा ' अर्थात् उस अग्नि को यज्ञ के लिये त्रिताय त्वा द्विताय त्वा एकताय यानी सुख के लिये मिश्रित करता हूँ । ईश्वर प्रत्येक मनुष्य को आज्ञा देता है, और आशीर्वाद देता है । कोई भी मनुष्य यज्ञ सत्य, आचार, विद्याग्रहण करने से न डरे अथवा विचलित न हो । क्योंकि इन्हीं से सुप्रजा को अर्थात् शारीरिक, वाचिक, मानसिक निश्चल सुखों को प्राप्त करना तुम्हारे लिये सम्भव हो सकता है । ' ५ - दयानन्द स्वामी के द्वारा किये गये अर्थ पर हमारा यह वक्तव्य है -- स्वामी दयानन्द ने यहाँ पर विद्वान् को सम्बोधित किया है, किन्तु विद्वान् को सम्बोधित करने में मूल क्या है? यज्ञानुष्ठान में प्रवृत्त हुए मनुष्य के लिये भय, उद्वेग की शङ्का प्राप्त ही नहीं है, अतः भय, उद्वेग की शङ्का करना निर्मूल ही है । किश्व यज्ञ के अनुष्ठान करने से प्रजा अतमेरु कैसे हो सकेगी? यह जो दयानन्द स्वामी ने कहा है कि ' अह त्वा तमग्नि यज्ञाय त्रिताय द्विताय एकता संयोमि ' -- वह भी निर्मूल है । क्योंकि मूल ग्रन्थ में ' यज्ञाय और संयौमि ' दोनों पद नहीं हैं । पूर्व मन्त्र से ' संयम ' पद की अनुवृत्ति करने पर भी ' त्रिताय ' = अग्नि, कर्म और हवि इन तीनों के भाव के लिये ( विद्यमानता के लिये ) ' द्विताय ' = वायु शुद्धि और वृष्टि जल की शुद्धि के भाव के लिसे ( शुद्धता के लिये ), ' एकताय ' - एक सुख के भाव के लिये ( सुख की सत्ता के लिये ) ' त्वा ' = तं उसे संयोमि = निश्चल करता हूँ " यह जो कहा वह भी निर्मूल है, क्योंकि एकस्य = ब्रह्म भाव के लिये, द्वयो: धर्म और ब्रह्म के भाव के लिये, त्रयाणां धर्म, अर्थ, काम तीनों के भाव के लिये --- इस अर्थ की भी सम्भावना की जा सकती है । अत: दयानन्दोक्त अर्थ में विनिगमना ( युक्ति ) नहीं है । ६ - सिद्धान्त में तो त्रितादि विशेष देवताओं का ग्रहण करने में हम प्रमाण बता ही चुके हैं । दयानन्द स्वामी ने ' शतपथ ब्राह्मण में इस मन्त्र का व्याख्यान किया गया है ' ऐसा कहकर भी उसके विरुद्ध ही मन्त्र का व्याख्यान उन्होंने कर दिया है ।