वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 231–240

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 231–240

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 231 का मूल पृष्ठ
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[ २१८ ] ११ – विहितं जपमनूद्य मन्त्रं विधत्ते स इति । इन्द्रस्य दक्षिणो बाहुरतिशयेन वीर्यवान् वृत्रासुरवधकारित्वात् अतः स एव त्वमसीति स्पयस्य स्तुतिः द्वितीयं भागमनूद्य व्याचष्टे सहस्रं भृष्टयोऽश्रयः, यद्वा भर्जनानि हिंसाविशेषा वृधादीनि येन क्रियन्ते स वज्रः सहस्रभृष्टिः । यः शततेजा अपरिमितदीप्तिः तादृशो वज्रः स त्वमेवासीति पय-स्तुतिः वज्रस्मां प्रसिद्धि द्योतयितुं वै शब्दः । तमुक्तविधं वज्रं यं वृत्रवधार्थमिन्द्रः प्राहरत् । १२ - तदात्मकमेवानेन मन्त्रभागेन स्पयं करोति वायुरसि तिग्मतेजा इति । एतद्वै तेजिष्ठं तेजो यदयं योऽयं पवते । एषहीमांल्लोकांस्तिर्यङ नु पवते । स श्यत्येवैनमेतद्विषतो वध इति यदिनाभिचरेत् यद्यु अभिचरेद-मुष्य वध इति ब्रूयात्तेन स २७ शितेन नात्मानमुपस्पृशति न पृथिवीं नेदनेन वज्रेण स शितेनात्मानं वा पृथिवीं वा हिनसानीति । तस्मान्नात्मानमुपस्पृशति न पृथिवीम् ' ( श ० १ । २ । ४ । ७ ) १३ – तृतीयभागमनूद्य व्याचष्टे - यः तिग्मतेजा वायुः स एव त्वमसीति स्तुतिः । वायोस्तिग्मतेजस्त्वमुप-पादयति योऽयं वायुः पवतेऽन्तरिक्षे चरति एतत्खलु तेजसां मध्ये तेजस्वितमं तेज: इममेवातिशयमुपपादयति एष हीति । अग्न्यादितेजोऽन्तरं कुत्रचिदेव परिच्छिन्नमेषहि वायुरिमाल्लोकाननुक्रमेण तिर्यग्वृत्तिः पवते युगपद् व्याप्नोति । एतत्प्र-योजनमाह -स ंश्यतीति । एतत् एतेनोक्तविधवायुतादात्म्यप्रतिपादनेन स्फ्यात्मकं वज्र संश्यति तीक्ष्णीकरोत्येवेति । अभिचाप्रयोगे द्विषतो वध इत्यस्य स्थाने अमुष्य देवदत्तादेर्वध इति शत्रोर्नाम निर्दिशेदित्यर्थः । एतेन मन्त्रजपात्तीक्ष्णी-कृतेन स्पयेनात्मनोऽन्यस्य वा संस्पर्श न कुर्यादित्याह - तेन नात्मानमुपस्पृशति न पृथिवीमित्यादिना । अन्यथा संशितेन वात्मानं पृथिवी वा हिनसानि हिंसितं करवाणि । तस्मान्नात्मानमुपस्पृशति न पृथिवीमिति । १४ -- अध्यात्मपक्षे —- आचार्यो योग्यं शिष्यं कर्मोपासनादौ प्रवर्तयन्नाह - हे शिष्य अहं सवितुः परमेश्वरस्य सर्वोत्पादयितुर्देवस्य स्वप्रकाशस्य परमात्मनोऽस्मिन् प्रसवे संसारे त्वा त्वामश्विनोर्देवभिषजोरध्यात्माधिदैवाद्यारोग्य-सम्पादकयोस्तयोभिषक्तमयोब्रह्मविद्वरिष्ठयोश्च यशस्विभ्यां बाहुभ्यां पूष्णो हिरण्यपाणेः सूर्यस्य ज्योतिर्मयाभ्यां पाणिभ्यां देवेभ्य: देवश्च देवश्च देवश्च देवास्तेभ्यः, कर्मकाण्डसाध्यचान्द्रमसदेवभावप्राप्तये उपासना साध्यहिरण्यगर्भपद-प्राप्तये ज्ञानसाध्यब्रह्मात्मभावप्राप्तये च आददे सर्वविधपुरुषार्थसाधनाय त्वां दीक्षयामि । कीदृशं त्वामध्वरकृतं श्रौतस्मार्त धर्मानुष्ठायिनं अध्वरं करोतीत्यध्वरकृत त्वमिन्द्रस्य परमेश्वर्यशालिनो भगवतो दक्षिणो बाहुः शत्रुनिरोध-भक्तरक्षणप्रतिष्ठापनदक्षो बाहुरिव दक्षिणो बाहुरसि तदन्तरङ्गसखासि । ' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि-१२ - ' वायुरसि तिग्म तेजा ' इस मन्त्रभाग के ' स्पय ' को तदात्मक ही करता है । " एतद्वै तेजिष्ठ तेजो यदयं योऽयं पवते " - ( श ० १ २०४१७ ) मन्त्र के तृतीय भाग का अनुवाद करके व्याख्या की जा रही है - जो तिग्म तेज वाला ( प्रखर तेज वाला ) वायु है, वही तुम हो, यह स्तुति की गई है । वायु की तिग्म तेजस्विता का उपपादन करते हैं - जो यह वायु अन्तरिक्ष में चलता है, वही निश्चय से समस्त तेजों में तेजस्वितम तेज है । इसी अतिशय का उपपादन ' एष हीति ' से किया है । अग्नि आदि अन्य तेज कहीं किसी स्थान पर ही परिच्छिन्न है, किन्तु तेजस्वितम वायु, क्रमशः इन लोकों को तिर्यग् वृत्ति होकर युगपत् व्याप्त करता है । इसका प्रयोजन ' स २७ श्यतीति ' से बताते हैं | इस प्रकार वायु से तादात्म्य प्रतिपादन के द्वारा ' स्पय ' रूप वज्र को वह तीक्ष्ण करता ही रहता है । अभिचार प्रयोग में ' द्विषतो वध ' के स्थान पर ' अमुष्य देवदत्तादेर्वध: ' इस प्रकार से शत्रु के नाम का निर्देश करना चाहिये मन्त्र जप से तीक्ष्ण किये गये ' स्पय ' का अपने से या अन्य किसी दूसरे से स्पर्श न करे । इस बात को तेन नात्मानमुपस्पृशति न पृथिवीम् ' से बताया है । अन्यथा उस तीक्ष्ण वज्र से अपने को अथवा पृथिवी को हिंसित ( नष्ट ) करेगा । १४ - अध्यात्म पक्ष में – आचार्य अपने सुयोग्य शिष्य को कर्म, उपासना आदि में प्रेरित करते हुए कह रहा है - हे शिष्य! मैं समस्त संसार को उत्पन्न करने वाले स्वप्रकाश परमात्मा सविता देव से निर्मित इस संसार में आध्यात्मिक आधिदैविक आरोग्य के सम्पादक और ब्रह्मविदों में वरिष्ठ देववैद्य अश्विनी कुमारों के यशस्वी बाहुओं

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[ २१६ ] व्यजात्रे । ' ( ऋ ० सं ० १।१६४ | २० ) अथर्व ० ६ २० तथा निरु ० १४ | ३० इत्यादि श्रुतेः । कीदृशो बाहुः सहस्रभृष्टिः सहस्र ं भृष्टयो असुररक्षसां भर्जनानि यस्मात्स तथोक्तः । देवासुरसङ्ग्रामे विष्णुरूपेण श्रीरामावतारे श्रीकृष्णावतारे च भगवद्दक्षिणबाहु कोटिकोटिसंख्यकानामसुररक्षसां संहारो जातः । शततेजाः शतं तेजांसि यस्य स बहुधा-दीप्यमानोऽङ्गदकङ्कणादिभी रोचमानो भगवदंशो जीवोऽपि भगवत्सख्येन तदभिध्यानात्तदनुग्रहादाविर्भूतं श्वर्यो नरावतारार्जुन इव सहस्रभृष्टिः शततेजा भवति । त्वं तिग्मतेजा वायुरसि तिग्मानि तेजांसि यस्य स तथोक्तः । यथा वायुर्वह्नि प्रदोप्य तीव्रां ज्वालामुत्पादयन् तिग्मतेजाभवति तथैव त्वमपि तत्प्रसादात् साधनादियोगाच्च तिग्मतेजा असि । १५ - यद्वा परमैश्वर्यो हिरण्यगर्भो वायुरसि तदुपासनेन तदभेदात् । द्विषतो वधः हन्तीति वधः द्विषतो हन्तेत्यर्थः । शास्त्राचार्योपदेश संस्कार संस्कृतस्य शास्त्रनिष्ठस्य द्विषतां हन्तृत्वं तिग्मतेजो हिरण्यगर्भसायुज्यं परमेश्वरस-खित्वं चानायासेन सिद्धयतीत्यर्थः । 1 पृथिवि देवयजन्योषध्यास्ते मूलं मा हि ॐ सिषं व्रजं गच्छ गोष्ठानं I वर्षतु ते द्योवंधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्या ं शतेन पाशैर्योऽस्मान्द्वेष्टि यं

च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौक् । वा ० सं ० १ । २५ ॥

से तथा सूर्य के ज्योतिर्मय हाथों से समस्त देवताओं को कर्मकाण्ड साध्य चान्द्रमस देवभाव को प्राप्त कराने के हेतु, तथा उपासना साध्य हिरण्यगर्भ पद की प्राप्ति कराने के लिये और ज्ञानसाध्य ब्रह्मात्मभाव की प्राप्ति कराने के लिये तथा सर्वविध पुरुषार्थों की प्राप्ति कराने के लिये तुम्हें दीक्षा दे रहा हूँ । क्योंकि तुम श्रोत- स्मार्त धर्म के अनुष्ठान करने वाले हो, तुम परमैश्वर्यशाली भगवान् इन्द्र के दक्षिण बाहु हो, अर्थात् शत्रुनिरोध और भक्तरक्षण तथा उनका प्रतिष्ठापन करने में कुशल ( निपुण ) बाहु के तुल्य दक्षिण बाहु हो यानी उसके अन्तरङ्ग सखा हो । ' द्वा सुपर्णा सयुजा ' श्रुति ने भी यही कहा है । बहु की विशेषता बताते हैं - कि वह ' सहस्रभृष्टि: ' है । हजारों असुर, राक्षसों को भूज देने वाला है । देवासुर संग्राम में विष्णु रूप से, श्रीरामावतार में और श्रीकृष्णावतार में भगवान् के दक्षिण बाहु ने ही करोड़ों - करोड़ों असुर, राक्षसों का संहार किया है । उसी तरह तुम भी ' शततेजाः ' हो, अर्थात् अङ्गद- कङ्कणादि आभूषणों बहुविध किरणों से झिलमिल करते हुए यानी देदीप्यमान रहते हो । भगवान् का अंशभूत यह जीव भी सख्य भाव से भगवान् का ध्यान ( चिन्तन ) करते रहने से उनके अनुग्रह को प्राप्त कर ऐश्वर्य को प्राप्त किये नरावतार अर्जुन की तरह सहस्रभृष्टि और शतश: तेजों से परिपूर्ण है । हे शिष्य! तुम प्रखर तेज वाले वायु के स्वरूप हो । जैमे वायु, अग्नि को प्रदीप्त करके उससे तीव्र ज्वालाओं को उत्पन्न करता हुआ प्रखर तेज का होता है, उसी तरह तुम भी उसके प्रसाद और साधना आदि करने के कारण प्रखर तेज से सम्पन्न हो । १५ - अथवा परमैश्वर्यशाली हिरण्यगर्भ वायु की उपासना करते रहने से उसके साथ तुम्हारा अभेद हो गया है, इसलिये तुम तद्रूप ही हो । तुम शत्रुओं के विनाशक हो । शास्त्र और आचार्य के उपदेश से उत्पन्न संस्कारों के कारण संस्कृत हुए एवं शास्त्रनिष्ठ रहने वाले तुम शत्रुविनाशकत्व, तिग्मतेजस्त्व, हिरण्यगर्भसायुज्य, परमेश्वरसखित्व आदि स्पृहणीय गुण अनायास ही स्थित हैं ।

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[ २२० ] अर्थ - हे देवयाग साधनभूते पृथ्वि! तुम्हारी ओषधि रूप तृण के मूल को मैं नष्ट नहीं करूँगा । हे पुरीष! ( स्फ्य के प्रहार करने पर निकली हुई मृत्तिका को पुरीष कहते हैं । ) तुम गौओं के निवास स्थान में जाओ । हे वेदि! तुम्हारे लिये द्युलोकाभिमानी देवता वृष्टि करे । हे सवितृ देव! जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं उस शत्रु को सीमा की भूमि पर शत रज्जुपाशों से बांध दो और उसे अन्धतामिस्र नरक से मुक्त कभी भी मत होने दो || २५ || १ - पृथिवी देवयजनीति तृणेऽन्तर्हिते प्रहरतीति ' ( का ० श्री ० सू ० २२६६ ) तृणान्तहितायां भूमी स्पयेन ( वज्र ेण ) प्रहारं कुर्यात् । तृण एव प्रहरणमिति सम्प्रदायः । हे पृथिवि देवयजनि देवा इज्यन्ते यस्यां सा देवयजनी तत्सम्बुद्धी हे देवयजन ते तव ओषध्यास्तृणरूपाया मूलमहं मा हिंसिषम् माविनाशिषम् ' वज्र ं गच्छेति पुरीषमादत्ते ' ( का ० श्री ० सू ० २।६।१७ ) व णोद्धृतां मृदं गृह्णीयात् । २ - हे पुरीष त्वं वज्र ं गच्छ । व्रजन्ति गच्छन्ति स्थातुं गावो यत्र स देशो व्रजस्तम् । कीदृशं गोष्ठानं गवां स्थानमिदानीं स्थितिर्यस्मिन् तत् गोयुक्तं तदीयं स्थानं गच्छ । गोयुक्तं गोष्ठ गोत्रजं गच्छेत्यर्थः । ' वर्षतु त इति वेदि प्रेक्षते ' ( का ० श्रौ ० सू ० २ ६ ११ ) वर्षतु इतिमन्त्रेण वैदि प्रेक्षते इति । ३ – मन्त्रार्थस्तु — हे वेदे ते तुभ्यं त्वदर्थं द्यौः द्युलोकाभिमानी देवो वर्षतु जलसेकं करोतु ( वृष सेचने ) सेचनेन खननजनितदुःखशान्तिर्भवतु । ' वधानेत्युत्करे करोति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २।६।१२ ) गृहीतां मृदमुत्करे क्षिपेत् । हे देव सवितः योऽस्मान् द्वेष्टि वयं च मं द्विष्मस्तमुभयविधं शत्रु परमस्यामन्तिमायां पृथिव्यां बधान | उत्करे क्षिप्तायां मृदि निगूढस्यास्तत्र बन्धनं कुरु । भूमेरन्तिमप्रदेशेऽन्धतामिस्रो नरकस्तत्र शत्रु वधान । अन्धेतमसि वधानेति यदाह परमस्याम् ' इति श्रुतेः । कैर्बन्धनं कर्तव्यमित्यपेक्षायामुच्यते शतेनपाशैः शतसंख्याकाभिर्बन्धनरज्जुभिरस्मद्वेष्टृणाम-१ - पृथिवि देव यजन्योषध्यास्ते मूलं मा हि ७ सिषं - ( वा ० सं ० १।२५ ) ' पृथिवि देवयजनीति ' -( का ० श्री ० सू ० २२६ १ ) सूत्रकार कह रहे हैं कि तृण से ढकी हुई भूमि पर ' स्पय ' ( वज्र से प्रहार करे । तृण पर ही प्रहार करने का सम्प्रदाय है हे पृथिवि! तुम देवयजनी हो । देवों का यजन जिस पर होता है, उसे देवयजनी कहते हैं । इसलिये हे देवयजनि पृथिवि! तुम्हारे तृण रूप ओषधि के मूल को मैंने नष्ट नहीं किया है । ' व्रजं गच्छेति ' – ( का ० श्री ० सू ० २६ | १७ ) इस सूत्र के अनुसार वज्र से उद्धृत की हुई मृत्तिका को ग्रहण करे । २ - हे पुरीष! तुम व्रज में जाओ । ' व्रजन्ति गच्छन्ति स्थातुं गावो यत्र स देशो व्रजः । ' जहाँ रहने के लिये जाती हैं, उस स्थान को ' व्रज ' कहते हैं । व्रज ( गो - स्थान ) की विशेषता बताते हैं कि इस समय गौएँ जहाँ स्थित हैं, अर्थात् गायों से युक्त जो गोव्रज ( गोष्ठान ) है, वहाँ जाओ । यानी अन्य गौओं से रहित व्रज में मत जाओ । ' वर्षतु त इति ' ( का ० श्र ० सू ० २२६ । ११ ) सूत्र के अनुसार ' वर्षतु ' मन्त्र से वेदि का प्रेक्षण करे । ३ - मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है - हे वेदे! तुम्हारे लिये द्युलोक का अभिमानी देव जल से सिञ्चन करे यानी वर्षा करे । ( सेचन करने के अर्थ में ' वृष ' धातु है ) । सेचन करने से खनन करने के कारण ( खोदने से ) जो दुःख ( कष्ट ) तुम्हें हुआ होगा उसकी शान्ति हो जायगी । ' वधानेत्युत्करे करोति ' - ( का ० श्रौ ० सू ० २२६ । १२ ) सूत्र के अनुसार पूर्व ग्रहण की हुई मृत्तिका को उत्कर में डाल दे । हे सविता देव! जो हमसे द्वेष करता है, और हम जिससे द्वेष करते हैं, उस उभयविध शत्रु को अन्तिम पृथिवी पर बाँध दो । अर्थात् उत्कर में प्रक्षिप्त मृत्तिका में निगूढ़ हुए शत्रु को वहीं पर बाँध दो । भूमि के अन्तिम प्रदेश में अन्धतामिस्र नरक है वहाँ पर शत्रु को बाँध दो । ' अन्धे तमसि धान ' इत्यादि अन्य श्रुतियाँ भी यही बता रही है । उस शत्रु को जो हमसे द्वेष करता है, और जिससे हम द्वेष करते हैं- सैकड़ों रस्सियों से बाँधकर उस अन्धतामिस्र नरक में डाल दो जिससे वह कभी भी छुटकारा न पा सके ।

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[ २२१ ] स्मद्विष्टानाञ्च शत्रूणां बन्न्धनं कृत्वा अन्धतामिस्र नरके तथा क्षिप यथा कदाचिदपि न मुच्येरन् । तदेवाह - अतो मा मौक् अतः अस्मात् अन्धतामिस्रनरकात्तं शत्रुसमूहं मा मोक् कदाचिदपि मा मुच । ४ -- स्वामिदयानन्दस्तु - अहं सवितुर्देवस्य हे देव सवितः परमात्मन् तव कृपयाहं देवयजनि देवयसाधिकरणा- ब्रजं मेघं यस्तेऽस्था: । पृथिवि भूमे ओषध्याश्च मूलं वृद्धिहेतु मा हिंसिषम् । मया पृथिव्यां योऽयं यज्ञोनुष्ठीयते वयं द्विष्मस्तं स शत्रु शतेन गच्छतु । गत्वा गोष्ठानं वर्षतु । द्यौर्वर्षतु । हे वीर त्वं परमस्यां पृथिव्यां योऽस्मान् द्वेष्टि यं च पाशैर्बंधान वन्धय । तमतो बन्धनात् कदाचिन्मा मौक् मा मोचय । ५- भावार्थस्तु -- ईश्वर आज्ञापयति-- विद्वद्भिर्मनुष्यैः पृथिव्या राज्यस्य तस्यां त्रिविधस्य यज्ञस्य ओषधीनाञ्च हिंसनं कदाचिन्नैव कार्यम् । योऽग्नौ हुतस्य द्रव्यस्य सुगन्ध्यादिगुणविशिष्टो धूमो मेघमण्डलं गत्वा वायुसूर्याभ्यां छिन्न-स्याकर्षितस्य धारितस्य जलसमूहस्य शुद्धिकरोभूत्वा अस्यां पृथिव्यां वायुजलौषधिशुद्धिद्वारा महत्सुखं सम्पादयति निवर्त्य तस्मात्स यज्ञः केनापि कदाचिन्नैव त्याज्यः । ये दुष्टामनुष्यास्तस्यां पृथिव्यामनेकैः पाशैर्बद्ध्वा दुष्टकमभ्यो कदाचित्ते न मोचनीयाः । अन्यत्र परस्परं द्वेषं विहाय अन्योन्यस्य सुखोन्नतये सदैव प्रयतितव्यम् ' इत्याद्याह, तदपि मेघं निःसारम्, अस्पष्टत्वात् । तथाहि-- ओषध्या मूलं किं यस्य हिंसनं निषिध्यते? एवमेव मयानुष्ठितो यज्ञो व्रजं । गच्छत्वित्यपि निःसारम् मूलमन्त्रे यज्ञपदाप्रयोगात् । न वा मनुष्यस्येच्छामात्रेणाज्ञया वा किञ्चिद्वस्तु मेघं गच्छति अग्नौ प्रहुतं वस्तु मेघमण्डलं गच्छत्येवेति चेत् तदापि लोट: प्रयोगो व्यर्थ एव तस्याभिप्रायाननुसारित्वात् । सुगन्ध्यादि-विशिष्टस्य धूमस्य मेघमण्डलगमने तस्य वायुसूर्याभ्यां छिन्नता आकर्षणञ्चापि प्रमाणविधुरमेव । तस्य जलसमूहशुद्धि-इसी बात को ' अतो मा मोक् ' से कहा गया है, अर्थात् इस अन्धतामिस्र नरक से उस शत्रु समुदाय को कभी भी मुक्त मत करो । ४ - स्वामी दयानन्द ने प्रस्तुत मन्त्र का अर्थ कुछ और ही मनमानी ढंग से किया है । स्वामीजी कह रहे हैं - अहं सवितु देवस्य हे देव सवितः परमात्मन्! तुम्हारी कृपा से मैं देवयजनि देवयज्ञ के अधिकरणभूत तुम्हारा हूँ । पृथिवि हे भूमे! वृद्धि के हेतुभूत ओषधि के मूल को मैं नष्ट न करूँ । मेरे द्वारा की पृथिवो वर्षा करे पर । जो द्यौ: इस वर्षा यज्ञ करे का । अनुष्ठान किया जा रहा है, वह व्रजं मेघ को प्राप्त हो । और उसे प्राप्त होकर गोष्ठान रस्सियों से बाँधो । वीर! तुम इस पृथिवी पर जो हमसे द्वेष करता है और हम जिससे द्वेष रखते हैं, उस शत्रु को सौ उसे इस बन्धन से कभी भी मुक्त मत करो । ५ - अभिप्राय यह है - ईश्वर की आज्ञा है कि विद्वान् मनुष्यों को पृथिवी अर्थात् राज्य का और उसमें होने वाले तीन प्रकार के यज्ञों का तथा ओषधियों का कभी भी विनाश नहीं करना चाहिये । अग्नि में हवन किये हुए द्रव्य का जो सुगन्धी धूम है, वह मेघमण्डल में जाकर वायु तथा सूर्य के द्वारा धारण किये हुए जल समूह को शुद्ध करता है और इस पृथिवी पर वायु जल ओषधि की शुद्धि करते हुए वह महान् सुख को देता है । इसलिये उस यज्ञ का त्याग कभी भी और कोई भी न करे । जो दुष्ट मनुष्य हैं उन्हें इस पृथिवी पर अनेक रस्सियों ( पाशों ) से बाँधकर और दुष्ट कर्मों से ( उन्हें ) परावृत्त कर कभी भी उन्हें बन्धन से मुक्त न करे । अन्यत्र परस्पर द्वेष का त्याग कर परस्पर की खोन्नति के लिये सर्वदा ही प्रयत्न करते रहना चाहिये । ' इत्यादि, कथन भी अस्पष्ट होने के कारण सारहीन है । उसी अस्पष्टता को देखिये - जिसके हिंसन ( विनाश ) का निषेध किया जाता है, क्या उसे ओषधि का मूल ( जड ) कहते हैं? इसी प्रकार ' मेरे द्वारा अनुष्ठित हुआ यज्ञ मेघ की ओर जाय ' यह कथन भी मूल मन्त्र में ' यज्ञ ' पद का प्रयोग न होने से सारहीन है । और यह भी सोचना चाहिये कि क्या कोई भी वस्तु, मनुष्य को इच्छा से अथवा उसकी आज्ञा से मेघ में पहुँच जायगी? यदि यह कहें कि अग्नि में हुत वस्तु, मेघमण्डल में प्राप्त हो ही जायगी, तब भी ' लोट् लकार के प्रयोग को उसके अभिप्राय का अनुसरण व करने से व्यर्थ कहना ही होगा । सुगन्धि से विशिष्ट धूम का मेघमण्डल में गमन होने पर वायु और सूर्य के द्वारा उसकी छिन्नता एवं आकर्षण बताना भी प्रमाण रहित है ।

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[ २२२ ] करत्वं ततो महत्सुखसम्पादकत्वञ्चासिद्धमेव । दुष्टान्तं पाशशतैर्बन्धनमपि शासनाधीनमेव, न तस्य सामान्य मनुष्येच्छानु-विधायित्वम् । ६ - शतपथश्रुतिस्तु सिद्धान्तपक्षीयमेव व्याख्यानं द्रढयति-' देवाश्च वाऽसुराश्च उभये प्राजापत्या: पस्पृधिरे । ते हस्म यद्देवा असुरान् जयन्ति ततो हस्मै वैतान् पुनरुत्तिष्ठन्ति । ( ० १ २ ४ ८ ) ते ह देवाऊचुः । जयामो वा असुरांस्ततस्त्वेव नः पुनरुपोत्तिष्ठन्ति कथं न्वेतानप-जय्यं जयेमेति । ' ( श ० १ २ ४ ६ ) ' सहाग्निरुवाच । उदञ्चो वैतः पलाय्य मुच्यन्त इत्युदञ्चो हस्मै वैषां पलाय्य मुच्यन्ते । '. ( श ० १ | २ | ४ | १० ) ७ - स्तम्बयजुर्हरणं विधित्सुस्तस्यासु र निर्हरणलक्षणं प्रयोजनं वक्तुमाख्यायिकामाह - तत्रादितेः पुत्रा देवा दितेः पुत्रा असुरा अत उभये प्राजापत्या: । प्रजापतेद्वेस्त्रियो दितिरदितिश्च । ते प्रजापतेः पुत्राः पस्पृधिरे स्पर्धां कृत-वन्तः । यदा ते देवा असुरान् जयन्ति ततोऽनन्तरक्षणमेव एनान् देवानभिलक्ष्य पुनरसुरा उत्तिष्ठन्ति । ' उदोऽनूर्ध्वकर्मणि ' ( पा ० सू ० १।३।२४ ) इति पर्युदासादिह चोर्ध्व कर्मत्वात् आत्मनेपदाभावः । ८- अथ देवैः कृतजयोपायचिन्तनमुपन्यस्यति - ते हेति । अनपजय्यं जेतुमशक्यं । एनानसुरान् केन प्रकारेण पुनरुत्थानरहितं जयेमेति विचारितवन्तः । अथाग्निनोपदिष्टं जयप्रकारं दर्शयति सहेति । नः अस्माकं सकाशात् उदङ, -मुखाः सन्तः पलाय्यमुच्यन्ते । अग्निनोक्तं वाक्यं सत्यमिति श्रुतिः स्वयमेवानुवदति उदश्वोति । सहाग्निरुवाच -अहमुत्तरतः पर्येम्यथ यूयमित उपसरोत्स्यथ तान् संरुध्यैभिश्च लोकैरभिनिधास्यामो यदुचेमांल्लोकानतिचतुर्थं तत पुस २७ हास्यन्त इति ' ( श ० १ २ | ४ | ११ ) ६ -- एवमुत्तरतोऽवस्थितान् असुरान् जेतुमग्निरेवोपायान् देवान् प्रत्युपदिशति । सहेति --- अहमुत्तरतः पर्येष्यामि यूयमतः अस्माद् वेदिलक्षणात् स्थानात् उपसंरोत्स्यथ । उपसंरुद्धान् प्रतिबन्धगतानसुरान् करिष्यथ । अथान्तरमेव उसका जल समूह शुद्धिकरत्व और उससे महत्सुख सम्पादकत्व भी अत्यन्त असिद्ध है । उसी प्रकार दुष्ट मनुष्यों को सैकड़ों पाशों से बाँधना भी शासन के अधीन रहता है, वह सामान्य मनुष्य की इच्छा पर निर्भर नहीं है । ६ - शतपथ श्रुति ने सिद्धान्त पक्ष की व्याख्या का ही समर्थन किया है । ' देवाश्च वाऽसुराश्च ' ( श ० १ | २ | ४ ८-६१० ) । ' ७ - स्तम्बयजुर्हरण के विधान करने का इच्छुक असुर निर्हरण लक्षण प्रयोजन बताने के लिये एक आख्या-यिका बता रहा है- अदिति के पुत्र देव और दिति के पुत्र असुर ( दैत्य ) हैं, अतः दोनों प्राजापत्य हैं । प्रजापति की दो स्त्रियाँ - एक दिति और दूसरी अदिति । प्रजापति के वे पुत्र आपस में स्पर्धा करने लगे । जब देव असुरों को जीतते हैं, तब उसके अनन्तरक्षण में ही उन देवताओं को लक्ष्य कर असुर पुनः उठ खड़े होते हैं । ' उदोऽनुध्वं कर्मणि ' ( पा ० सू ० १।३।२४ ) इस सूत्र से पर्युदास ( निषेध ) किये जाने के कारण और यहाँ पर ऊर्ध्वं कर्म होने से आत्मनेपद का अभाव है । ८- इसके बाद देवताओं ने अपने विजय का जो उपाय सोचा, उसे उपस्थित करते हैं— जीतने के लिये जो अशक्य है उसे ' अनपजय्य ' कहते हैं । इन असुरों को किस प्रकार से हम बिना उत्थान के पुनः जीत सकेंगे, यह विचार देवता करने लगे । तब अग्नि के द्वारा उपदिष्ट जय प्रकार को दिखाते है । ' सहेति ' । हमसे उत्तर की ओर मुख करके पलायन करने से मुक्त हो सकोगे । अग्नि के द्वारा उक्त वाक्य सत्य है, ऐसा श्रुति कहती है ( रा ० १ | २ | ४ | ११ ) । ६ – इस प्रकार उत्तर की ओर अवस्थित असुरों को जीतने के लिये अग्नि हो देवों को अनेक उपायों को बता रहा है । मैं उत्तर दिशा से जाऊँगा, तुम इस वेदिस्थान से असुरों को प्रतिबद्ध करो । उसी समय हम पुरोवर्ती

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[ २२३ ] मेभिः पुरोवर्तिभिः पृथिव्यादिभिस्त्रिभिर्लोक: अभिनिधास्यामः अभितः सर्वतो निरुद्धगतीन् निहितान् करिष्यामः । ear अभितो नितरां क्षिप्तान् त्याजितान् करिष्यामः । इमांल्लोकानतिक्रम्य यच्चतुर्थं लोकजातमस्ति अस्माकमप्रत्यक्षम् तेनापि त्याजितान् करिष्यामः । ततोऽनन्तरमसुराः पुनर्न संहास्यन्ते सङ्गता न भविष्यन्ति विशीर्णा बाधिता एव भवेयु -रित्यर्थ: । ( ओहाङ, गतौ ) जुहोत्यादिः । १० -- ' सोऽग्निरुत्तरतः पर्येत् । अथेम इत उप समरुन्धस्तान्त्स ७ रुध्येभिश्च लोकैरभिन्यदधुर्यदु चेमांल्लो-कान तिचतुर्थं ततः पुनर्न समजिहत । तदेतनिदानेन यत् स्तम्बयजुः । श ० १।२।४।१२ ) इत्थमग्निनोक्तं वाक्यं श्रुत्वा तथैव तेर्देवैः कृतमिति अग्निदेवसंवादरूपात् प्रतिनिवृत्य श्रुतिः स्वेनैव रूपेणैवाह । अग्निरुतरतः उत्तरस्यां दिशि पर्येत् पर्यगच्छत् । देवाश्चेत: वेदिः स्थानात् उपसमरुन्धन् तानुपरुद्धान् कृतवन्तः । संरुध्य चैभिर्लोकैर्न्यदधुः । यदु चेमां-ल्लोकानतिचतुर्थं तेन चन्यदधुः । ततः पुनर्न समजिहत । असुरा असङ्गता वाधिताएव जाता इत्यर्थः । अग्निवाक्ये हि चिकीर्षितोपदेशनात् भविष्यदर्थवाचिनो लृटः प्रयोगः । श्रुतिवाक्ये तु निर्वृत्तार्थप्रतिपादनात् भूतानद्यतनवाचिनो लङः प्रयोगः । यदत्र स्तम्बयजुर्हरणं करिष्यत एतन्निदानेन मूलकारणेन निरूप्यमाणं सत् देवैः कृतं तत् असुरनिरसनम् अतो यज्ञविघातकासुरनिर्हरणार्थं विधिः परिकल्पनीयः सयोऽसावग्नीदुत्तरतः पर्येति अग्नीदेवैष निदानेन तानध्वर्यु -रेवेत उपस ंरुणद्धि । तान् संरुध्यैभिश्च लोकैरभिनिदधाति । यदु चेमांल्लोकानतिचतुर्थं ततः पुनर्न सहिते येन वैनान् देवा अबाधन्त तेनैवैतानप्येतहि ब्राह्मणे यज्ञेऽवबाधन्ते । ' ( श ० १ | २ | ४ | ३ ३ ) ११ – स्तम्बयजुर्हरणसमये योऽसावाग्नीध्रो वेदेरुत्तरतः परीत्यवर्तते एष निदानेन मूलकारणेन निरूप्यमाणो-ऽग्निरेव योऽग्निः पुराऽसुरान्निरोद्धुमुदक् पर्येत् तदात्मक एवाग्नीघ्र इत्यर्थः । ननु तत्रोपसंरोधका देवास्तत्स्थानीय-ऋत्विजां मध्येक इति तं दर्शयति तानध्वर्यु रेवैत उपरुणद्धि - येनोपायेन पुरा देवा असुरानबाधिषत तेनैवोपायेन यज्ञानुष्ठानसमये तद्विघातिनोऽसुरा बाधितव्या इति निगमयति - तस्मादप्येतसुरान् संजिहते । येन ह्येवैनान् देवा अवाबाधन्ते तेनैवैनानप्येतहि ब्राह्मणा यज्ञेऽवबाधन्ते । ' य उ यजमानायारातीयति यश्चैनं द्वेष्टि तमेवैतदेभिश्च लोकै-पृथिवी आदि तीन लोकों से सब ओर उनकी गति को प्रतिबद्ध कर देंगे । अथवा तीनों लोकों को उनसे छुड़वा देंगे । इन तीनों लोकों के बाद जो चतुर्थ लोक है, जो हमसे भी प्रत्यक्ष नहीं है, उससे भी उन्हें हटा देंगे । तब ये असुर पुनः आपस में मिल नहीं पायेंगे । अर्थात् विशीर्ण हुए वे असुर अवश्य ही बाधित होंगे । ( ओहाङ गतौ जुहोत्यादिः ) गति अर्थ में जुहोत्यादिगण का ' ओहाळ ' धातु है । १० - ' सोऽग्निरुत्तरतः ' ( ० १ २ ४ १२ ) इस प्रकार अग्नि के वाक्य को सुनकर उन देवों ने उसी प्रकार किया । इस अग्नि और देवों के सम्वाद रूप से प्रतिनिवृत्त होकर श्रुति अपने ही रूप से कह रही है । अग्नि उत्तर दिशा की ओर गया, और देवों ने वेदिस्थान से उन असुरों को अवरुद्ध किया । तब पृथिवी आदि तीन लोकों ने तथा चतुर्थ लोक ने भी उन असुरों को छिन्न - भिन्न कर दिया । तब वे पुनः परस्पर सङ्गत न हो सके । इस प्रकार जब वे परस्पर सङ्गत न हो पाये तब वे बाधित हो ही गये । अग्नि के वाक्य में चिकीर्षित का उपदेश होने से भविष्यदर्थ वाचक ' लृट् लकार का प्रयोग हुआ है । किन्तु श्रुति वाक्य में निवृत्त अर्थ का प्रतिपादन होने से भूतानद्य-तनवाची ' लङ ' लकार का प्रयोग किया गया है । यहाँ पर जो स्तम्बयजुर्हरण करने के लिये कहा गया है, उसी से देवों ने असुरों का निरसन किया है । असुरों के निरसन करने में वह स्तम्बयजुर्हरण ' ही मूल कारण है । अतः यज्ञ के विघातक असुरों के निर्हरण ( निरसन ) के लिये ही विधि की कल्पना करनी चाहिये । ११ - स योऽसौ अग्नीदुत्तरत: ' ( ० १ | २ | ४ | १३ ) अर्थात् स्तम्बयजुण के समय जो यह ' आग्नीध्र ' है, वह वेदि के उत्तर में स्थित है, इस कारण वह आग्नीध्र ' अग्नि ' रूप ही है, जो अग्नि पूर्व ही असुरों को अवरद्ध करने के लिये उत्तर दिशा में गया था । इस कारण आग्नीध्र को तदात्मक ही कहा गया है । यज्ञानुष्ठान के समय उन उपसंरोधक देवों के स्थानापन्न हुए ऋत्विजों में से कौन सा वह है? उसे ' तानध्वर्यु ' रेवंत ' से बताया है- पूर्व समय में

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[ २२४ ] भिनिदधाति यदु चेमांल्लोकानतिचतुर्थमस्या एव सर्व 28 हरत्यस्या ७ हि सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः । कि १७ हि हरेद्यदन्त-रिक्ष ७ हरामि दिन हरामीति हरेत्तस्मादस्या एव सर्व ७ हरति । ( ० १ | २ | ४ | १४ ) १२ – न केवलं स्तम्बयजुषोऽसुरहरणं प्रयोजनं किन्तु शत्रुहरणमपि इत्याह य उ इति । अरातिरिवाचरती-त्यतीयति यश्चैनं यजमानं द्वेष्टि साक्षाद्बाधते तदुभयविधशत्रुमेभिर्लोकैरभिनिदधाति अन्यत् पूर्ववत् । पृथिव्या एव सकाशात् स्तम्बयजुर्हरति नान्तरिक्षादेरित्यभिप्रेत्याह - सर्वेलोका इति । पृथिव्यादिभिस्त्रिभिर्लोकंस्तदतिरिक्त ेन चान्येन चतुर्थेन लोकेनासुरान्निरस्यन्न सावध्वर्यु रस्याः पृथिव्याः सकाशात् सर्वं स्तम्बयजुर्ह रति । नान्तरिक्षादेः । हि यस्मादस्यां भूम्यामिमेऽन्तरिक्षादयः सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः तस्मात् स्तम्बयजुर्हरणस्य प्रथमपर्यायवत् द्वितीयादि-पर्यायाणामपि पृथिव्या एवं सकाशात्तद्धरणं युक्तमित्यर्थः । एतदेव व्यतिरेकमुखेनोपपादयति- यदि अन्तरिक्षं हरामि दिवं हरामि इत्येवं स्तम्बयजुर्हरेत् तथा किं नाम हरेत् । अन्तरिक्ष द्युलोक् यो र्तव्यस्य स्तम्बस्याभावात् न तत्र तद्धरणं सम्भवतीत्यर्थः । प्रागुक्तनिगमन स्तम्बयजुड़े रणान्तम् । प्रहरणादिपुरीषनवापान्तं कर्म स्तम्बयजुः शब्देनोच्यते । १३ – ' अथ तृणमन्तर्धाय प्रहरति नेदनेन न वज्रेण स ७ शिते पृथिवी 28 हिनसानीति तस्मात्तृणमा-धाय प्रहरति । ( श ० १।२४ / १५ ) स प्रहरति पृथिवि देवयजन्योषध्यास्ते मूलं माहि 25 सिषमित्युत्तरमूलामिव वा एनामेतत्करोत्याददानस्तामेतदाहौषधीनां ते मूलानि मा हि ७ सिषमिति व्रजं गच्छ गोष्ठानमित्यभिनिधास्यन्ने-जिस उपाय से देवों ने असुरों को बाधित किया था, उसी उपाय से यज्ञानुष्ठान के समय यज्ञविघातक असुरों को बाधित करना चाहिये । निष्कर्ष यह निकला कि जिस उपाय से देवों ने उन असुरों को बाधित किया, उसी उपाय से यज्ञ में ब्राह्मण भी उनका बाध करते हैं । १२ -- ' य उ यजमानायारातीयति ' ( ० १ २ | ४ | १४ ) इससे यह कहा जा रहा है कि स्तम्बयजु का प्रयोजन केवल असुर निर्हरण ही नहीं है, किन्तु शत्रुहरण भी उसका प्रयोजन है । ' अरातिरिव आचरति इति अरातीयति ' ' उपमानादाचारे ' सूत्र से ' क्यच् ' प्रत्यय किया गया है । शत्रु की तरह आचरण करने वाले को ' अरातीयति ' कहते हैं । जो इस यजमान को साक्षात् पीड़ित करता है । दोनों प्रकार के शत्रुओं की गति को तीनों लोक प्रतिवद्ध कर देते हैं । अन्य सब अर्थ, पूर्व की तरह ही है । पृथिवी आदि तीन लोकों से तथा उसमे भिन्न चतुर्थ लोक से असुरों को निरस्त करने वाला यह अध्वर्यु, इस पृथिवी से सम्पूर्ण स्तम्बयजु का हरण करता है । अन्तरिक्ष से नहीं, क्योंकि इस भूमि में ही ये अन्तरिक्षादि समस्त लोक प्रतिष्ठित हैं । इस कारण स्तम्बयजुर्हरण के प्रथम पर्याय की तरह द्वितीयादि पर्यायों में भी पृथिवी से ही उसका हरण करना उचित है । इसी को व्यतिरेक मुख से बताते हैं । यदि अन्तरिक्ष को हरण करता हूँ तो दिव ( स्वर्ग ) को ही हरण कर रहा हूँ इस बुद्धि से स्तम्बयजु का हरण करे, तब क्या हरण करेगा, क्योंकि अन्तरिक्ष और द्युलोक में हर्तव्य स्तम्ब के न होने से वहाँ उसका हरण करना सम्भव नहीं है । पूर्वोक्त निगमन स्तम्बयजुर्ह रणान्त है । प्रहरण से लेकर पुरीषनिवापान्त कर्म को ' स्तम्बयजुः ' शब्द से कहा जाता है । १३ – ' अथ तृणमन्तर्धाय प्रहरति ' ( ० १ २ ४ १५ - १६ ) श्रुति ने तृणान्तर्धान विशिष्ट ' स्पय ' से ग्रहण का विधान किया है । तृण से ढके हुए स्पयरूपापन्न तीक्ष्ण वज्र से पृथिवी हिंसित होगी । इसलिये हिंसा निवृत्त्यर्थं तृण को बीच में रखकर उस पर प्रहार करना चाहिये । इस प्रकार विहित प्रहरण का अनुवाद करके मन्त्र का विधान किया गया है । ' ओषध्यास्त इति इस मन्त्र भाग की व्याख्या करते हैं ' स्पय ' को ग्रहण करने वाला अध्वर्यु इस पृथिवी को उपरि भाग पर अवस्थित मूल से युक्त हुई सी करता है । यह जो प्रहरण है, वह उत्तर मूल पर है । उसकी हिंसा की आशङ्का होने पर उसके अभाव की इससे प्रार्थना की गई है । मन्त्रगत ओषधि शब्द की जाति के अभिप्राय से एकवचनान्तता को ध्यान में रखकर व्याख्या करते हैं । प्रहरण से निष्पन्न तृण सहित पांसु ( धूलि ) के उपादान ( ग्रहण ) का अनुवाद कर ' व्रजं गच्छ ' के द्वारा व्याख्या की गई है । यह अध्वर्यु चारों ओर पटकता हुआ उन

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[ २२५ ] वैतदनपक्रमि कुरुते तद्धयन पक्रमि यद् व्रजेऽन्तस्तस्मादाह व्रजं गोष्ठानमिति वर्षतु ते द्यौरिति । यत्र वै अस्यै खनन्तः क्रूरीकुर्वन्त्युपघ्नन्ति शान्तिरापस्तदद्भिः शान्त्या शमयति तदद्भिः सन्दधाति तस्मादाह वर्षतु द्यौरिति वधान देवसवितः परमस्यां पृथिव्यामिति देवमेवैतत् सवितारमाहान्धे तमसि वधानेति यदाह परमस्यां पृथिव्यामिति शतेन पाशैरित्य-तदाह योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौगिति ब्रूयात् ( श ० १ | २ | ४ | १६ ) १४ – तृणान्तर्धानविशिष्टेन स्पयेन ग्रहणं विधत्ते श्रुतिः - तृणानन्तर्धाने हि तीक्ष्णेन स्पयरूपान्नेन वज्रेण पृथिवी हिंसिता स्यात् । तस्मात्तद्धिसानिवृत्तये तृणमन्तर्धाय तदुपरि प्रहर्तव्यमित्यर्थः विहितं प्रहरणमनूद्य मन्त्रं विधत्ते- - स प्रहरतीति । ओषध्यस्त इति मन्त्रभागं व्याचष्टे -- उत्तरमूलामिति । स्फ्यमाददानोऽध्वर्यु: एनां पृथिवीम् उत्तरमूलां उपरिभागावस्थितमूलयुक्तामिव खल्वेतत्करोति । उत्तरमूलत्वेन प्रहरणम् । तद्धिसाशङ्कायां तदभावोऽनेन-प्रार्थ्यते । मन्त्रगतौषधिशब्दस्य जात्यभिप्रायेणैकवचनान्ततामभिप्रेत्य व्याचष्टे ओषधीनामिति । प्रहरण निष्पन्नस्य तृणस्य पांसोरुपादानमनूद्य व्याचष्टे व्रजं गच्छेति । अभिनिधास्यन् अभितो निक्षेप्स्यन् खल्वध्वर्यु: एतत् असुरजातम् अनपक्रम अपक्रमणरहितमितस्ततो गमनरहितं कुरुते । तत्खलु अनपक्रमि यत् व्रजे गोष्ठेऽन्तनिरुध्यते अतोऽस्य मन्त्र-प्रयोगस्यापक्रमणाभावः प्रयोजनमित्यर्थः । नोपस्पृशेत् पृथिव्यात्मानौ । तेन स्तम्बयजुर्ह रिष्यन् वेद्यां तृणं निदधाति । उदक पृथिव्यो वर्मासीति ' ( का ० श्री ० सू ० २२६ ७ ८ ) स्तम्बयजुर्हरणं करिष्यन्नध्वर्युस्तेन वज्र ेण पृथिवीमात्मानञ्च न स्पृशेत् । १५ - यस्मिन् देशे वेदिनिर्मापयिष्यते तस्मिन् देशे वेद्यामध्वर्यु रुदगग्रं तृणं स्फ्येनसह गृहीतं निदध्यात् । ' पृथिवि देवयजनीति तृणेऽन्तर्हिते प्रहरति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २२६६ ) व्रजं गच ेति पुरीषमादत्ते ' ( का ० श्री ० सू ० २।६।१० ) व्रजं गच्छेति मन्त्रेण पुरीषं मृदं गृह्णीयात् । ' वर्षतु त इति वेदि प्रेक्षते ' ( का ० श्री ० सू ० २६।११ ) ' वधानेत्युत्करे करोति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २२६ १२ ) वर्षतु स इति मन्त्रेण वेदि प्रेक्षते, वधानेत्यनेन मृदमुत्करे क्षिपेत् । शतपथादिश्रुत्यनुसारीण्येवेमानि सूत्राणि, तदनुसार्येव च मन्त्रभाष्यम्, तदेव युक्तम् । पृथिव्यै वर्मासीति काण्वपाठः । त्या हे तृण त्वं पृथिव्या वेदिस्थानरूपाया भूमेर्वर्मासि कवचस्थानमसि । यथा कवचेन शस्त्रप्रहारोपद्रवः परिह्रियते तथा स्पयेन वेदिखननावसरे भूम्युपद्रवस्तृणेन परिहियते । पृथिवि देवयजनीति तृणेऽन्तर्हिते प्रहरति हे देव यजनि देवागाश्रयभूते पृथिवि ते त्वदीयाया ओषध्यास्तृणरूपाया मूलं मा हि १७ सिषम् मा विनाशयामि । अत्रदेवयजनीति असुरों को इधर - उधर चलने के अयोग्य कर देता है । ' अनपक्रमि ' उसे कहते हैं, जो गोष्ठ के भीतर निरुद्ध किया जाता है । अत: इस मन्त्र प्रयोग का प्रयोजन ' अपक्रमणाभाव ' है । ' नोपस्पृशेत् पृथिव्यात्मानौ । तेन स्तम्बयजुर्ह रिष्यन् का ० श्री ० सू ० २।६।७ - ८ ) सूत्र कहता है कि स्तम्बयजुर्हरण करने वाला अध्वर्यु उस वज्र से पृथिवी और अपने को स्पर्श न करे । १५ --जिस स्थान पर वेदि का निर्माण होगा, उस स्थान पर वेदि में स्पय के साथ ग्रहण किये हुए तृण को उदग्र ( उत्तर की ओर तृण का अग्र भाग करके ) रख दे । ' पृथिवि देवयजन ' ( का ० श्रौ ० सू ० २ ६ १०- ११-१२ ) सूत्रों ने बताया है कि ' पृथिवि देवयजनि ' मन्त्र कहते हुए तृणान्तर्निहित पृथिवी पर प्रहार करे । ' व्रज गच्छ ' मन्त्र से मृत्तिका का ग्रहण करे । ' वर्षतु त ' मन्त्र से वेदि को देखे । ' बधान ' मन्त्र से मृत्तिका को उत्कर में डाल दे | ये सब सूत्र शतपथादि श्रुति का ही अनुसरण करते हैं । और तदनुसारी ही मन्त्र भाष्य है, अतः वही उचित है । ' पृथिव्यै वर्मास ' यह काण्व पाठ है । उसके अनुसार हे तृण! तुम वेदिस्थानरूप भूमि के कवच हो । जैसे - कवच के द्वारा शस्त्र प्रहार से होने वाले उपद्रव का परिहार किया जाता है, वैसे ही ' स्पय ' के द्वारा वेदिखनन के समय भूमि को होने वाले उपद्रव ( कष्ट ) का तृण से परिहार किया जाता है । ' पृथिवि देवयजनि ' मन्त्र से तृगान्तर्हित पृथिवी पर जब प्रहार किया जाता है, तब वह कहता है कि हे देवयागाश्रयभूते पृथिवि! तुम्हारी तृण रूप ओषधि के मूल को मैं नष्ट नहीं कर रहा हूँ । पृथिवी को ' देवयजनि ' विशेषण देकर यह बताया गया है कि वान्ति, लोहित आदि के कारण होने

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[ २२६ ] विशेषणेन वान्तिलोहिताद्यापादिताशुचित्वं निवार्यते । तदुक्तम् यज्ञेनमादेवा अभिभविष्यन्तीति स पृथिवीमभ्यवमीत् । अमेध्योऽभवत् तित्तिरिणा- ' विषाद्वै नामासुर आसीत् । सोऽबिभेत् । पृथिवीमनुधावतु | अमेध्याभवत् पृथिवि देवयजनीत्याह - मेध्यामेनां देवयजनीं । अथो करोति यदिन्द्रो वृत्रमहनत् तस्य लोहितम् त्या, ओषधीनामहिंसाया इति ' ( तै ० १ | १ || ३ ) विषमत्तीति विषात् । अतएवायं । ओषध्यास्तेमूल माहि २७ सिषमि-भवशङ्कया पृथिवीमभ्यवमीत् । तेन वृत्रलोहितेन च पृथिव्या अशुचित्वं जातम् । देवयजनीतिमन्त्रेण विषात् नामासुरो तन्निवार्यते यज्ञेन देवकृताभि-। १६ – सर्वथापि शतपथादिश्रुतिसूत्रानुसार्येव मन्त्रव्याख्यानं युक्तम् स्पयस्य प्रहारेण निष्पन्ना धूलिः पुरीषम् हे पुरीष त्वं व्रजं गच्छ व्रजन्ति । दयानन्दीयं व्याख्यानन्तु तन्न स्पृशत्येव । गच्छ । गोष्ठाने गवां स्थानम् गोभिरूपेतं देशं गोष्ठानं गच्छ । हे वेदि ते गावो यत्रावस्थातुं यस्मिन् देशे स व्रजः । तं सेचनं करोतु खननाद्युपद्रवपरिहारो वर्षणस्य प्रयोजनम् । वधानेति मृदमुत्करे त्वदर्थं द्यौद्युलोकाभिमानी देवो वर्षतु जल तृणधान्यादिपरित्यागप्रदेश: । हे देव सवितः परमस्यामन्तिमायां पृथिव्यां करोति । उत्करो नाम वेदेरुत्तरभागे वंधानास्मद्विरोधिनः स्फ्यानीतायां धुल्यां निगूढस्य बन्धनं कुरु । भूमेरन्तिमप्रदेशे शतेन योऽन्धतामिस्रो पाशैः शतसख्याकाभिर्बन्धनरज्जुभि-वधान । नरकोस्ति तस्मिन् वा १७ - अध्यात्मपक्षे - हे देवयजनि देवा इज्यन्ते यस्यां सा देवयजनी धीनां मूलं मूलभूतां त्वां मा हिंसिषम् । एतावता न केवलं मनुष्येषु किन्तु ओषधिमूलायाः तत्सम्बुद्धौ हे देवयजनि ओषध्या ओष-सर्वस्यैव प्रपञ्चस्य ब्रह्मात्मकत्वात् । ' सर्व ' खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति पृथिव्या अपि हिंसा वार्यते श्रुतेः । पृथिव्या देवयागाश्रयत्वेनौषधीनां यागसाधनत्वेन चाहिसनीयत्वात् शान्त उपासीत ' ( छा ० उ ० ३ | १४ | १ ) इति तस्यापि गोभिरूपेते व्रजे प्रेषणम् । द्यौद्युलोकाभिमानी देवो वर्षतु तेन क्षतिपूर्तिः । यागाङ्गत्वेन यत्पृथिव्या: पांसुरुत्सार्यते पृथिव्या ओषधीनाञ्च पुनः प्ररोहणम् । वाली अपवित्रता का निवारण हो जाता है । इसी बात सोऽबिभेत् ।------... ओषधीनाम हिंसाया इति । ' ( तै ० " को (.... तित्तिरि ) । जो ने भी कहा है- ' विषाद्वैनामासुर आसीत् । हैं । अत एव यह ' विषात् ' नाम का असुर यज्ञ के द्वारा देवकृत विष को भक्षण करता है उसे ' विषात् ' कहते किये गये वृत्र और लोहित से पृथिवी अशुचि ( अपवित्र ) हो गई । उस अभिभव की आशङ्का से उसने पृथिवी पर वमन जाता है । अपवित्रता का निवारण ' देवयजनि ' मन्त्र से हो १६ - अत: श्रुति और सूत्र का अनुसरण करने वाला मन्त्र व्याख्यान का मन्त्र व्याख्यान तो श्रुति एवं सूत्र को स्पर्श तक नहीं कर रहा ही सर्वथा उचित है । स्वामी दयानन्द हुई धूलि ही पुरीष है । इसलिये हे पुरीष! तुम व्रज में जाओ । गौएँ है । दयानन्द कहते हैं - स्पय के प्रहार से निष्पन्न को कहते हैं । गौओं का जो स्थान है उसे गोष्ठान कहते हैं । गौओं जहाँ रहने के लिये जाती हैं उस देश ( स्थान ) तुम्हारे लिये द्युलोकाभिमानी देव जल सेचन करे । खननादि से युक्त गोष्ठान देश को जाओ । हे वेदि! मन्त्र से मृत्तिका को उत्कर में करता है । वेदी के उत्तर भाग उपद्रव में तृण का परिहार होना वर्षण का प्रयोजन है । ' बधान ' हैं । हे देव सवित: | इस अन्तिम पृथिवी पर शतसंख्यक बन्धन धान्यादि के परित्याग प्रदेश को ' उत्कर ' कहते से निकाली गई धूलि में छिपे हुए हमारे विरोधी को तुम रस्सियों रज्जुओं से हमारे विरोधियों को बाँध दे । अर्थात् स्फ्य अन्धतामिस्र नाम का नरक है, उसमें उन विरोधियों को बाँध के रखो से बाँध दो । अथवा भूमि के अन्तिम प्रदेश में जो । १७ -- अध्यात्म पक्ष में- हे देवयजनि! देवों का अर्चन उसका सम्बोधन रूप ' हे देवयजनि! ' है । ओषधियों के मूलभूत जिसमें होता है, वहदेवयजनी प्रदेश कहलाता है, मनुष्यों में ही नहीं, किन्तु ओषधियों की मूलभूत पृथिवी की हिंसा तुम्हारी का हिंसा हमसे न हो । इस कथन से केवल प्रपञ्च ही ब्रह्मात्मक है । छान्दोग्य श्रुति कह रही है -- ' सर्व ' खल्विदं भी वारण किया गया है । क्योंकि सम्पूर्ण ३ | १४ | १ ) यह पृथिवी, देवयाग का आश्रय ( आधार ) है और ओषधियाँ ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत् ' ( छा ० उ ० याग साधन है, इस कारण वह अहिंसनीय है ।

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[ २२७ ] गवां देवयजनस्थाने ओषधिबहुल प्रदेशे गावो यत्र प्रदेशे तिष्ठन्ति यत्र च वर्तन्ते तादृशस्य गोष्ठानस्य सर्वस्यैव व्रजस्य राष्ट्रस्य प्रदेशस्य भूमण्डल -मूत्रपुरीषादिप्रभावेण वृष्टिहेतुत्वम् वृष्टिवैषम्यनिवारणहेतुत्वश्च भवति । चेतनाचेतनात्मकस्य च सर्व सर्वस्य मधु । स्य विश्वस्य च ब्रह्मात्मकत्वेन चैतन्यप्राधान्यम् । परस्पराहिंसनत्वेन परस्परोपकारहेतुत्वेन यदि कश्चिदस्मान् चेतनानाममृतपुत्रत्वेनाचेतनानाञ्च तदुपकरणत्वेन तच्छक्तिमयत्वम् । एवं ब्रह्मात्मभावनायामपि पृथिव्यां द्वेष्टितत एव यं वयं द्विष्मः तं बाधकं शत्रु हे देव सवितः परमस्यामन्तिमायामन्धतामिस्रनरकादिरूपायां । एव ं शतेनानन्तैः पाशैवधान । मा मौक् कदाचिदपि तं मा मुच उग्रदण्ड विधानस्यापि शान्तिसामञ्जस्यहेतुत्वात् मधुरूपं सुखमयं यथायोग्यं शिष्टपरिपालनेन दुष्टनिग्रहेण च परस्पराहिंसनेन परस्परोपकार्योपकारभावेन गोदकत्वात् भवति । 1 अपाररु ं पृथिव्यै देवयजनाद्वध्यासं व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्या 23 शतेन पाशैर्योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं [ द्विष्मस्तमतो मा मौक् । अररो दिवं मा पप्तो द्रप्सस्ते द्यां मा स्कन् व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्या ं शतेन पाशैर्योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौक् ॥ वा ० सं ० १।२६ ॥ प्रेषित किया पृथिवी की धूलि का उत्सारण, जिसे यागाङ्ग मानकर किया जाता है, उसे भी गौओं से युक्त का व्रज पुनः में प्ररोहण होगा । जाता है । लोकाभिमानी देव वर्षा करे, उससे क्षति पूर्ति होगी अर्थात् पृथिवी पर ओषधियों गोबर ) आदि के ओषधि बहुल प्रदेश वाले देवयजन स्थान में जहाँ गौएँ खड़ी रहती हैं, वह व्रज प्रदेश, गोमूत्रपुरीष ( प्रभाव से वर्षा का हेतु तथा वृष्टि वैषम्य के निवारण का भी हेतु होता है । जड़ - चेतनात्मक सम्पूर्ण विश्व ही ब्रह्मात्मक ( ब्रह्म रूप ) होने से चैतन्य - प्रधान है । परस्पर की अहिंसा से और परस्पर के उपकार का हेतु होने से सब हैं सबका । इस मधु है । सभी चेतन, अमृत के पुत्र हैं, और अचेतन ( जड़ ) उसके उपकरण हैं, अतः उसकी शक्ति से वे हैं, पूर्ण इस प्रकार प्रकार ब्रह्मात्म भावना में भी यदि कोई हमारा द्वेष करता है, उसी कारण जिसका हम द्वेष करते पृथिवी का ब्रह्मात्म भावना में बाधक होने वाले उस शत्रु को हे सविता देव! अन्धतामिस्र नामक नरक में विधान जो भी शान्ति अन्तिम भाग है वहाँ रस्सियों से बाँध दो । और उसे कभी भी मत छोड़ो । इस प्रकार का उग्र दण्ड और सामञ्जस्य बनाये रखने में कारण होता है । एवं यथायोग्य शिष्ट परिपालन और दुष्ट निग्रहण के द्वारा परस्पर उपकार्य - उपकारक भाव होने से वह आनन्दप्रद होता है तथा सुखमय ( मधुरूप ) होता है ।