वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 241–250

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 241–250

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 241 का मूल पृष्ठ
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[ २२८ ] अर्थ - देवयागसाधनभूत पृथ्वी पर अर्थात् वेदी पर जो राक्षस संज्ञक अशुद्ध द्रव्य है उसे मैं दूर करता हूँ । अशुद्ध द्रव्य! तुम गौएँ जहाँ निवास करती हैं वहाँ जाओ । हे वेदि! तुम्हारे लिये द्युलोकाभिमानी देवता वृष्टि करे । सवितृ देव! जो हमसे द्वेष रखता है और जिससे हम द्वेष करते हैं, उस शत्रु को सीमा की भूमि पर शत रज्जु पाशों से बाँध दो, और अन्धतामिस्र नरक से उसे कभी भी मुक्त मत होने दो । हे असुर! ( हे अशुद्ध द्रव्य! ) तुम गौओं के निवास स्थान में जाओ । हे वेदि! तुम्हारे लिये द्युलोकाभिमानी देवता वृष्टि करे । हे सवितृ देव! हमारे द्व ेष्य को अर्थात् जो हमसे द्वेष रखता है उस शत्रु को सीमा की भूमि पर शत रज्जु पाशों से बाँध दो और अन्धतामिस्र नरक से उसको कभी भी मुक्त मत होने दो ॥ २६ ॥

१ – ' अपारुरमिति द्वितीयं प्रहरति ' ( का ० श्र ० सू ० २ ६ | १४ ) पूर्ववदेव - पृथिव्यै देवयजनात् पृथिव्याः सम्बन्धिनो देवयजनाख्यात् वेदिस्थानात् अरुरं अरुरनामानमसुग्म् अपवध्यासम् अपनीय यथा हतो भवति तथा करवाणि अनेन मन्त्रेण द्वितीयवारं पूर्ववदेव प्रहरेत् । स्पयेनोद्धृतां मृदमुत्करे निःक्षिपेत् मन्त्रास्तदर्थाश्च पूर्ववदेव । २ - ' अभिन्यस्यत्यग्नीदुत्करम र रोदिवमिति ' ( का ० श्र ० सू ० २/६/१५ ) अग्नीत् तन्नामक ऋत्विक् हस्तद्वये-नोत्करमभिमृशेत् । हे अररो असुर दिवं द्युलोकं यागफलरूपं त्वं मा पप्तः मा गमः । स्वर्गे त्वया न गन्तव्यम् । ( पत्लृ गतौ ) इति धातो: लुङि पतः पुम् ' ( पा ० सू ० ७ १194 ) इति सूत्रेण पुमागमे पप्त इति रूपनिष्पत्ति: । ' द्रप्सस्त इति तृतीयमिति ' ( का ० श्र ० सू ० २/६/१६ ) द्रव्यस्त इति मन्त्रेण तृतीयवारं प्रहरणादिकं कुर्यात् । ३ - हे वेदि देवते ते तव पृथिवीरूपाया यो द्रप्स उपजीव्यो रसः द्यां द्युलोकं मास्कन् मास्कन्दतु मा स्कान्सीत् मा गच्छतु । व्रजं गच्छेत्यादीनां पूर्ववदेव व्याख्यानम् तूष्णीं चतुर्थं सतृणं पुरीषमुत्करे प्रक्षिपेत् । ' तूष्णीं चतुर्थ १७ सतृ-णम् ' ( का ० श्रौ ० सू ० २।६।१७ ) ४ - स्वामिदयानन्दस्तु - ' हे देव सवितर्भवत्कृपया वयं परस्परं विद्या मेवोपदिशामः । यथायं सविता देवः सूर्यलोकोऽस्यां पृथिव्यां शतेनपाशैर्बन्धनहेतुभिः किरणैराकर्षणेन पृथिव्यादीन् सर्वान् पदार्थान् बध्नाति तथैव त्वमपि १ - अपारुरं पृथिव्यै देवयजनाद्वध्यासं व्रजं गच्छ ' तथा ' अपारुरमिति द्वितीयं प्रहरति ' - ( का ० श्रौ ० सू ० २ | ६ | १४ ) का अर्थ पूर्ववत् ही है । पृथिवी के देवयजन नामक वेदिस्थान से ' अररु ' संज्ञक असुर को हटाकर जैसे भी वह मारा जाय वैसा करें । इस मन्त्र से पूर्ववत् ही द्वितीय बार प्रहार करे । ' स्पय ' से उद्धृत मृत्तिका को उत्कर में फेंक दे । मन्त्र और उसका अर्थ पूर्ववत् ही है । २ – ‘ अभिन्यस्यत्यग्नीदुत्करम र रोदिवमिति ' - ( का ० श्री ० सू ० २२६ १५ ) अग्नीत् नाम का ऋत्विक् दोनों हाथों से उत्कर का स्पर्श करे । हे अररो असुर! याग फल स्वरूप द्युलोक तुम्हें प्राप्त न हो । अर्थात् स्वर्ग में तुम मत जाओ । ( पत्लृ गतौ ) धातु का लुङ् लकार में ' पतः पुम् ' ( पा ० सू ० ७ १1१ ) सूत्र से पुमागम करने पर ' पप्त ' रूप बनता है । ' द्रसस्त इति तृतीयमिति ' - ( का ० श्र ० सू ० २२६ । १६ ) सूत्र कहता है कि ' द्रप्सस्त ' इस मन्त्र से तीसरी बार प्रहरण आदि करे । ३ - हे वेदि देवते! तुम पृथिवी स्वरूप हो, तुम्हारा जो उपजीव्य रस ( द्रप्स ) है, वह द्युलोक में न जाय । ' व्रजं गच्छ ' इत्यादि की पूर्व की तरह ही व्याख्या है | ' तूष्णीं चतुर्थ १७ सतृणम् ' - ( का ० श्रौ ० सू ० २/६/१७ ) सूत्र से बताया है कि चौथा तूष्णीम् अर्थात् बिना मन्त्र के तृण सहित पुरीष को उत्कर में डाल दे । ४ - किन्तु स्वामी दयानन्द कहते हैं - हे सविता देव! आपकी कृपा से हम लोग परस्पर विद्या ( ज्ञान ) का ही उपदेश करते रहते हैं । जिस प्रकार यह सविता देव ( सूर्य लोक ) बन्धन के हेतुभूत अपने सैकड़ों किरणों से पृथिवी आदि सम्पूर्ण पदार्थों का आकर्षण कर उन्हें बाँधता है, व ैसे ही तुम भी दुष्टों को बाँधकर शुभ गुणों को प्रकाशित

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[ २२६ ] दुष्टान् बध्वा शुभगुणान् प्रकाशय । हे विद्वांसो यथाहं पृथिव्यां देवयजनादररुमपवध्यासं तथैव तं यूयमप्यपाघ्नत । यथाहं व्रजं गच्छामि तथैव त्वमप्येतं गच्छ । यथाहं गोष्ठानं वर्षामि तथैव भवानपि वर्षतु । यथा मम द्यौविद्याप्रकाशः सर्वान् प्राप्नोति तथैव ते तवापि प्राप्नोतु । यथाऽहं योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तं परमस्यां पृथिव्यां शतेन पाशैर्नित्यं बध्नामि कदाचितं न त्यजामि । तथैव हे वीर तं त्वमिमं बधान । तातः कदाचिन्मा मौक् । योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतोबन्धनात् कोऽपि वा मुञ्चतु । एवं च तं प्रति सर्व उपदिशन्तु । हे अररो त्वं दिवोमा पप्तः तथा तव द्रप्सो द्यां मास्कन् । हे सन्मार्गजिज्ञासो यथाह व्रजं सन्मार्गं गच्छामि तथैव त्वमप्येतं गच्छ । यथेयं द्यौर्गो-ष्ठानं वर्षति तथैवेश्वरो विद्वान् वा ते तव कामान् वषैतु । यथायं सविता देवः सूर्यलोकः परमस्यां पृथिव्यां शतेन पाशै-बन्धहेतुभिः किरणैराकर्षणेन पृथिव्यादीन् बध्नाति तथा त्वमपि च योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्ते परमस्यां पृथिव्यां शतेन पाशैर्बंधान । यथाहं द्वेष्टारं शत्रु शतेन पाशैर्बध्वा न कदाचिन्मुञ्चामि तथैव त्वमप्येनं बधान । कदाचिन्मा मौक् । लुप्तोपमालङ्कारः । ईश्वर आज्ञापयति हे मनुष्या युष्माभिविद्वत्कार्यानुष्ठाने विघ्नकारिणो दुष्टाः प्राणिनः सदा-ऽपहन्तव्याः । सत्समागमेन विद्यावृद्धिनित्यं कार्या । यथा अनेकोपायैः श्रेष्ठानां हानिदुष्टानाश्च वृद्धिर्नस्यात् तथैवानु-ष्ठेयम् । सदा श्रेष्ठाः सत्कार्याः दुष्टास्ताड़नीया बन्धनीयाश्च परस्परं प्रीत्या विद्याशरीरबलं सम्पाद्य क्रियया कलायन्त्रः कानि यानानि रचयित्वा सर्वेभ्यः सुखं देयम् । निरन्तरमीश्वरस्याज्ञापालनम् कर्तव्यम् स एव उपासनी-यश्च इति । जल्पितवान्, ५- तदविचारितरमणीयम्, पदार्थासङ्गतेः । अररुमित्यस्य असुरराक्षसस्वभावं शत्रु मित्यर्थे करो! हे विद्वानों! जैसे मैंने पृथिवी पर देवयजन को अरुर नामक असुर को विनष्ट किया, वैसे ही तुम लोग भी उसे नष्ट करो | जैसे मैं व्रज में जाता हूँ, व ैसे ही तुम भी उस व्रज को जाओ । जैसे मैं गोष्ठान पर वर्षा करता हूँ, तुम भी वर्षा वो । जैसे मेरी विद्या का प्रकाश सबको प्राप्त होता है, व ैसे ही तुम्हारी विद्या का प्रकाश भी सबको प्राप्त हो । जैसे मैं अपने द्वेष्टाओं को इस पृथिवी पर सैकड़ों पाशों से नित्य बाँधता रहता हूँ, कभी भी उन्हें नहीं छोड़ता हूँ, उसी तरह हे वीर! तू उसे बाँध, और उसे कभी भी उस बन्धन से मुक्त मत कर । जो हमारा द्वेष करता है, और जिसका हम द्वेष करते हैं, ऐसे उभय विध शत्रु को बन्धन से कोई भी न छुड़ावे । एवञ्च उसके प्रति सभी लोग उपदेश करें । हे अररो! तुम स्वर्ग में मत जाओ । तथा तुम्हारा उपजीव्य रस, स्वर्ग में न जाय । हे सन्मार्ग जानने की इच्छा करने वाले जैसे मैं सन्मार्ग ( व्रज ) पर चलता हूँ, वैसे ही तुम भी उस पर चलो । जैसे यह द्यौ: ( स्वर्ग ) गोष्ठान पर जल सेचन करती है, उसी तरह ईश्वर अथवा विद्वान् तुम पर तुम्हारे अभीष्ट फलों की वर्षा करे, अर्थात् तुम्हारे मनोरथों को पूर्ण करे । जैसे यह सविता देव सूर्यलोक इस पृथिवी पर उसके सब पदार्थों को अपनी सैकड़ों बन्धन कारक किरणों से आकर्षित कर बाँधता है, उसी तरह तुम भी इस पृथिवी पर अपने द्वेष्टाओं को सैकड़ों बन्धनों से बाँध दो र्जसे मैं अपने द्वेष्टा शत्रु को सैकड़ों बन्धनों से बाँधकर पुनः उसे कभी छोड़ता नहीं हूँ उसी तरह तुम भी उसे बाँधो, कभी भी उसे मत छोड़ो । यहाँ लुत्तोपमालङ्कार है । ईश्वर आज्ञा देता है कि हे मनुष्यों! तुम लोग विद्वानों के कार्यों में विघ्न पहुँचाने वाले दुष्ट प्राणियों को सर्वदा नष्ट करो । और सत्समागम के द्वारा विद्या का संवर्धन नित्य किया करो । जितने भी उपायों से हो उन सभी उपायों से श्रेष्ठों की हानि और दुष्टों की वृद्धि जिस तरह न हो पाये, " सा ही किया करें । श्रेष्ठों का सर्वदा सत्कार किया करो | और दुष्टों का ताड़न और बन्धन किया करो । परस्पर प्रीति पूर्वक विद्याबल और शरीरबल का सम्पादन करते हुए कलापूर्ण यन्त्रों से कतिपय यान आदि को बनाकर सबको सुख दिया करो । ईश्वर की आज्ञा का पालन निरन्तर करते रहना चाहिये । क्योंकि वही उपासनीय है । ' इस प्रकार दयानन्द स्वामी ने जल्पन किया है । ५- जब तक उस पर विचार नहीं किया जाता, तभी तक वह रमणीय प्रतीत होता है । क्योंकि पदार्थों की परस्पर कहीं कोई सङ्गति नहीं है । ' अररु ' पद का असुर राक्षस

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[ २३० ] गौरवमेव । अररुपदस्य शतपथश्रुतौ राक्षसविशेषवाचकतया तदुपेक्ष्य राक्षस सामान्यपरत्वाभ्युगमे श्रुतिविरोधात् व्रजशब्दस्य । वथा कथञ्चित् राक्षससामान्यपरत्वेऽपि तत्स्वभावशत्रु परत्वाभ्युपगमस्तु सर्वथाऽप्रामाणिक व्यवहारे एव । तथैव गतिनिवृत्त्यसम्भ-सत्सङ्गपरत्वमध्ययनाध्यापनव्यवहारपरत्वमपि न सङ्गतमनैकान्तिकत्वात् । गवां वाणीनां । द्यौरित्यस्य विद्याप्रकाशोऽर्थोऽपि वात् । वर्षतु इत्यस्यापि शब्दस्य विद्यावृष्टिर्नार्थः, जलसेचने तत्प्रसिद्धिविरोधात् विवरणमप्य-न सङ्गतस्तत्र शिष्टप्रयोगाभावात् । परमस्यामित्यस्य उत्कृष्टायां पृथिव्यामित्यस्य बहुप्रदायामित्यादि न सम्भवति, सामाजि-सङ्गतम्, बन्धनाधारत्वाय पृथिव्यामुत्कृष्टत्वबहुप्रदत्वादि विशेषणानपेक्षणात् परस्पर मुगदेशोऽपि केष्वपि अध्यापकेभ्यश्छात्र कर्तृ ' कोपदेशासम्भवात् । ६ – किञ्च सूर्यलोको यथा बन्धनहेतुभिः किरणैः पृथिव्यादीन् पदार्थान् बध्नाति तथा त्वमपि दुष्टान् बध्यो-त्तमान् गुणान् मे प्रकाशयेत्यपि न सङ्गतम् दृष्टान्तस्यैवाप्रसिद्धत्वात् पूर्वत्रनिरस्तत्वाच्च । ७ – किञ्च दृष्टान्ते बन्धनंधारणरूपोऽनुग्रह एव दान्ते तु निग्रहरूपं बन्धनं किरणानां बन्धकत्वञ्चाकर्षणा-भ्युपगन्तृभिरपि नानुमन्यते । ८ -- किश्च देवयजनशब्दस्य सङ्ग्रामोऽर्थ इति प्रमाणसापेक्षमेव । अहमीश्वरो यथा पृथिव्यां सङ्ग्रामात् । नचा-दुष्टस्वभावान् शत्रून् हन्मि तथैव त्वमपि तं मारयेत्यपि न सङ्गतम्, ईश्वरस्य दुष्टैः सार्धं युद्धस्याप्रसिद्धत्वात् -प्रसिद्धो दृष्टान्त: सम्भवति । विष्णु - राम कृष्णादिरूपेणासुरादिभिः परमेश्वरस्य युद्धं सम्भवति तच्च युष्माभिर्नाम्युपे सर्वज्ञस्य यते । यथाहमुत्तमगुणज्ञापकैः सज्जनैः सङ्गति प्राप्नोमि तथा त्वमपि प्राप्नुहि इत्यपि न सङ्गतम् शब्दविन्दुभिर्वर्षयामि ईश्वरस्य सत्सङ्गत्यनपेक्षणात्, तदप्रसिद्धेश्च । यथाहं पठनपाठनव्यवहारबोधक मेघगर्जन वेदवाण्योत्तमैः का वाचक स्वभाव वाला शत्रु अर्थ करने पर गौरव दोष होता है । शतपथ श्रुति तो ' अररु ' पद को राक्षस विशेष पर श्रुति विरोध बताती है । किन्तु उस अर्थ की उपेक्षा करके अररु ' पद को राक्षससामान्य के अर्थ में स्वीकार करने परत्व रूप अर्थ का हो गया है । यथाकथञ्चित् राक्षस सामान्यपरक भी मान लिया जाय तब भी तत्स्वभाव शत्रु स्वीकार करना तो अप्रामाणिक ही कहा जायगा । तथैव व्रज ' शब्द का सत्सङ्गपरत्व और अध्ययनाध्यापनपरत्व नहीं है । कहना भी अनैकान्तिक होने से असङ्गत है । ' गो ' अर्थात् वाणी के व्यवहार में गति निवृत्ति का होना सम्भव ' शब्द का ' वर्ष ' का भी विद्या वृष्टि अर्थ नहीं है । जल सेचन अर्थ करने पर उसकी प्रसिद्धि का विरोध होता है ' तथा । ' द्यौं ' उत्कृष्टायां भी विद्या प्रकाश अर्थ करना सङ्गत नहीं है, क्योंकि शिष्ट लोगों का वैसा प्रयोग नहीं है । ' परमस्याम् पृथिव्याम् ' का ' बहुप्रदायां ' यह विवरण करना भी असङ्गत है । बन्धनाधारत्व के लिये पृथिवी को में उत्कृष्टत्व भी अध्यापकों , बहुप्रद- को त्वादि विशेषणों की कोई अपेक्षा नहीं है । परस्पर उपदेश करना भी सम्भव नहीं है । समाज छात्र उपदेश नहीं दिया करते हैं । ६ - किश्च सूर्य लोक जिस प्रकार बन्धन हेतुभूत किरणों से पृथिव्यादि पदार्थों को बाँधता है प्रसिद्ध वैसे तुम नहीं भी है दुष्टों को बाँधकर उत्तम गुणों को प्रकाशित करो, यह कथन भी असङ्गत है. क्योंकि दृष्टान्त ही कोई और पहले इस कथन का निरसन भी हो चुका है । ७ --- - किञ्च दृष्टान्त में बन्धन धारण रूप अनुग्रह ही है, किन्तु दाष्टन्ति में निग्रह रूप बन्धन और किरणों का बन्धकत्व, आकर्षण को स्वीकार करने वाले भी नहीं मानते हैं । ८-- किञ्च ' देवयजन ' शब्द का संग्राम अर्थ करना प्रमाण सापेक्ष ही है । मैं ईश्वर जिस प्रकार पृथिवी पर संग्राम करके दुष्ट स्वभाव वाले शत्रुओं को मारता हूँ, वैसे ही तुम भी उन्हें मार दो, यह कथन भी सङ्गत नहीं है, करना कहीं प्रसिद्ध नहीं है । अप्रसिद्ध को दृष्टान्त के रूप में ' कहना कभी भी क्योंकि ईश्वर का दुष्टों के साथ युद्ध सकता है, उचित नहीं होता । असुरादिकों से परमेश्वर का विष्णु, राम, कृष्ण के रूप में तो युद्ध करना सम्भव हो किन्तु उसे तो आप स्वीकार नहीं कर सकते । जैसे मैं उत्तम गुणों के ज्ञापक सज्जनों से सङ्गति करता हूँ, वैसे तुम

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[ २३१ ] तथा त्वमपि वर्षय यथा मद्विद्यायां या द्यौः शोभा सर्व दृष्टिगोचरा तथैव त्वदीयापि विद्या सुशोभितास्तु इत्यादिकमपि निःसारम्, निराकारस्य कण्ठतालवाद्यभावेन मेघगर्जनतुल्य शब्दविन्दुवर्षणासम्भवात् । ईश्वरविद्याया शोभापि न सर्व -दृष्टिगोचरा, तथात्वे नास्तिक्यानापत्तेः । यथाहं - यो मूर्खोऽस्मान् विद्याप्रचारकान् द्वेष्टि यं च विरोधिनं जनं वयं द्विष्मस्तं परमस्यामुत्कृष्टायां सर्व पदार्थधारिकायां विविधसुखदात्र्यां पृथिव्यां बहुभिः पाशैर्बन्धनैनित्यं बध्नामि कदा-चिदपि न त्यजामि हे वीर तथैव त्वमपि तं बन्धय कदापि मा त्यज अर्थात् कोऽपि तादृशं पुरुषं न त्यजेदित्यादि सर्व-मेतत् निरर्थकम् दृष्टान्ताप्रसिद्धेः । ६ – किवोत्कृष्टायां सर्व पदार्थधारिकायां सर्व सुखदाभ्यां भूमौ दुष्टस्य बद्ध्वावस्थापनमपि सुखदाय्येव स्यात् तस्याः सर्व सुखदातृत्वात् । १० – किञ्च वयं सर्वे तं दुष्टमुपदिशामः, हे अररो दुष्टपुरुष त्वं दिवं प्रकाशमुन्नति मा प्राप्नुहि । तथा तवानन्ददायकं विद्यारसं दिवमानन्दं मास्कन् मा प्राप्नुहि इत्यपि मूढजनजल्पितमेव दुष्टस्य उपदेशसाध्यत्वासम्भवात् । नहि कचिदुपदेशात् कश्चिदुन्नतिप्राप्तेरानन्दप्राप्तेर्वा विरतो भवति । सिद्धान्ते तु परमेश्वरस्य देवानामृषीणाञ्चाज्ञा- न च वचनादुन्नतिरानन्दप्राप्तिश्च प्रतिबद्धयते नोपदेशात् । सर्वसाधारणस्याज्ञावशादपि न कस्यचिदुन्नतिरवरुद्ध्यते विद्वत्प्रा-कोऽपि कचिदप्येवमुपदिशति त्वयोन्नतिर्न कर्त्तव्या आनन्दप्राप्तिश्च न कर्त्तव्येति । किमुत परमेश्वरः । यथाहं भी उनसे सङ्गति करो, यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि सर्वज्ञ ईश्वर को सत्सङ्गति की क्या जरूरत वेद? वाणी और ईश्वर ने सत्सङ्गतिकी, यह कहीं भी प्रसिद्ध नहीं है । जैसे मैं पठन - पाठन व्यवहार बोधक में मेघ जो गर्जन शोभा तुल्य ( द्यौः ) सबके के उत्तम शब्द रूप विन्दुओं से वर्षा करता हूँ, वैसे तुम भी वर्षा करो, जैसे मेरी विद्या तालु गोचर होती है, वैसे ही तुम्हारी विद्या भी सुशोभित हो, इत्यादि कथन भी निसार है । निराकार है को । ईश्वर कण्ठ विद्या आदि अवयव नहीं हुआ करते, अतः उससे मेघगर्जन तुल्य शब्द विन्दुओं की वर्षा होना सम्भव नहीं मूर्ख, हम की शोभा भी सब के दृष्टिगोचर नहीं है । वैसा यदि हो तो नास्तिकता कहीं रहेगी ही नहीं । जैसे मैं, जो को विद्या प्रचारकों का द्वेष करता है और जिस विरोधी मनुष्य का हम द्वेष करते हैं उस शत्रु को समस्त हूँ, कभी पदार्थों भी उसे धारण करने वाली, तथा विविध सुखों को देने वाली इस पृथिवी पर अनेक पाशों से नित्य बाँधता मत करो, अर्थात् कोई भी मैं उस बन्धन से मुक्त नहीं करता, उसी तरह हे वीर! तुम भी उसको बाँधो, कभी भी उसे मुक्त नहीं है । वैसे आदमी को न त्यागे, इत्यादि सभी कथन निरर्थक हैं, क्योंकि कोई दृष्टान्त ही प्रसिद्ध ६ – किञ्च सकल पदार्थ धारिणी सर्व सुखदात्री उत्कृष्ट भूमि पर दुष्ट को बाँधकर रखना भी सुखदायी ही होगा, क्योंकि पृथ्वी ( भूमि ) सवको सुख देने वाली होती है । उन्नति को १० - किञ्च हम सब उस दुष्ट को उपदेश करें कि हे अररो! दुष्ट पुरुष! तुम प्रकाश कथन अर्थात् भी मूढ़ जन के मत प्राप्त करो तथा तुम्हारा आनन्द दायक विद्या रस आनन्द को न प्राप्त करे और । इत्यादि न कोई किसी के उपदेश से जल्पन की तरह ही है, क्योंकि दुष्ट, कभी भी उपदेश साध्य नहीं हुआ से करता तो परमेश्वर ।, देवता, और ऋषियों के अपनी उन्नति या आनन्द प्राप्ति का त्याग करता है । सिद्धान्त की दृष्टि । सर्वसाधारण की आज्ञा भी किसी की उन्नति आदेश से ही उन्नति एवं आनन्द प्राप्ति होती है, उपदेश से नहीं मत करो, आनन्द को मत अवरुद्ध नहीं हुआ करती और न कोई किसी को ऐसा उपदेश ही देता है कि तुम कहता उन्नति है, यह कैसे माना जाय जैसे प्राप्त करो । जब साधारण मनुष्य भी इस प्रकार नहीं कहता, तो परमेश्वर ऐसा यह कहना भी निःसार है । मैं विद्वानों के प्राप्त करने योग्य श्रेष्ठ मार्ग को प्राप्त करता हूँ वैसे तुम भी उसे प्राप्त करो, की क्या आवश्यकता? क्योंकि श्रेष्ठ मार्ग तो परमेश्वर के द्वारा ही समुपदिष्ट है । उसको उस मार्ग के प्राप्त ही करने ईश्वर अथवा विद्वान् तुम्हारी सूर्य का प्रकाश जैसे – गोष्ठान, पृथिवीस्थान, अन्तरिक्ष को सिश्चित करता है, व ैसे

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[ २३२ ] त्तियोग्यं श्रेष्ठमार्गं प्राप्नोमि तथा त्वमपि तं प्राप्नुहि इत्यपि निःसारम् श्रेष्ठमार्गस्य परमेश्वरेणैवोपदिष्टत्वेन तस्य तत्प्राप्ऽयनपेक्षणात् । सूर्यप्रकाशो यथा गोष्ठानं पृथिवीस्थानमन्तरिक्षं सिश्वति तथैवेश्वरो विद्वान् वा त्वदीयां कामनां वर्षतु पूरयतु इत्यप्यसङ्गतम्, अग्निना सिञ्चतीत्यादिवाक्यवदयोग्यत्वात् ईश्वरश्च कर्मानुसारेणैव वाञ्छापूरको भवति न स्वातन्त्र्येणेत्युक्तिरपार्थैव एवमन्यूदप्यूह्यम् । ११ – शतपथविरुद्धञ्चैतत् । तथाहि - ' अथ द्वितीयं प्रहरति अपाररुं पृथिव्यै देवयजनाद् वध्यासमित्य र रुर्ह वै नामासुरराक्षसमास । तं देवा अस्या अपाघ्नत । तथो एवैनमेनमेतदेषोऽस्या अपहते व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्वधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्या २ ९ शतेन पाशैर्योऽस्मान् द्वेष्टि यश्च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौगिति । ( श ० १।२।४ १७ ) एवं स्तम्ब्रयजुर्हणस्य प्रथमपर्यायमभिधाय द्वितीयपर्यायार्थं प्रहरणादिकं समन्त्रक विधत्ते अथेति अररुर्नामासुरराक्षसं सुराणां विरोधि रक्षो बभूव । ' अनसन्तात् ' ( पा ० सू ० १ ४ १०३ ) इत्यकारः समासान्तः । ' अररु नामासुर आसीत् । स पृथिव्यामुपप्लुनोऽशयत् । तं देवा अपहतोऽररुः पृथिव्या इति पृथिव्या अपानत । ' ( श ० ब्रा ०१।२४ । १७ ) देवा अस्यै अस्या: पृथिव्याः सकाशात् अपाघ्नत अपहृतवन्तः । देववदेवेदानीन्तन एषोऽध्वर्यु रपाररुमिति मन्त्रेण पृथिव्याः सकाशात् तम-पहन्ति । अररुनामकोऽसुरः पृथिव्यां वेदिस्थाने गुहाशये वृततमे तमररुं पृथिव्यं पृथिव्याः सम्बन्धिनो देवयजनाख्यात् वेदिस्थानात् अपवध्यासम् । अपनीय यथा हतो भवति तथा करवाणीत्यर्थः । व्रजं गच्छेत्यादिकस्य सर्वस्य द्वितीये पर्याये प्रयोज्यस्य प्रागुक्त एवार्थ इत्यभिप्रेत्यानुवदति व्रजं गच्छेति । १२ - ' तमग्नीदभिनिदधाति अररो दिवं मापप्त इति । यत्र वै देवा अररुमसुर राक्षसमपाघ्नत स दिवमपि -पतिषत्तमग्निरभिन्यदधादररो दिवं मा पप्त इति । स नदिवमपप्तत्तयोऽएवैनमेतदध्वर्यु रेवास्माल्लोकादन्तरे दिवोऽध्य-ग्नीत्तस्मादेवं करोति । ' ( श ० १ | २ | ४ | १८ ) उत्करे न्युप्तस्य स्तम्बयजुषोऽभिधानं समन्त्रकमाह - तमिति । अभिनिदधाति उपरि हस्तनिधानेनाधस्तात् क्षिपतीत्यर्थः । मा पप्त इति पतनाभावप्रार्थनं समर्थयितुं पुरावृत्रमुदाहरति स देवैरपहतो अररुः अपिपतिषत् दिवं पतितुं गन्तुमैच्छत् । तं तथाविधं पिपतिषुमररुमुत्तरतः परिगतोग्निः अभिन्यदधात् । उपरि कामनाओं को बरसावे यानी पूर्ण करे । यह कहना भी असङ्गत है । क्योंकि अग्निना सिञ्चति ' वाक्य की तरह उपर्युक्त कथन भी अयोग्य है | और ईश्वर, कर्मानुसार ही इच्छा पूरक होता है, उसमें उसकी स्वतन्त्रता नहीं है, यह कथन भी निरर्थक ही है, इसी प्रकार अन्यत्र भी समझ लेना चाहिये । ११ - तथा यह सब दयानन्दीय कथन शतपथ के विरुद्ध भी है । तथाहि - शतपथ ब्राह्मण ( १ | २ | ४ | १७ ) स्तम्बयजुर्हरण के प्रथम पर्याय को बताकर द्वितीय पर्याय के लिये समन्त्रक प्रहरणादि का विधान किया गया है । अररु नाम का राक्षस था, जो देवताओं का विरोधी था । मन्त्र में ' असुररक्षसम् ' पद है । ' रक्ष: ' शब्द से ‘ अनसन्तात् ’ ( पा ० सू ० १/४ | १०४ ) सूत्र के द्वारा अकार ' समासान्त हुआ है । तित्तिरी ने भी कहा है कि देवों ने इस पृथिवी पर से उसका अपहरण किया । देवता के तुल्य ही इस समय का यह अध्वर्यु ' अपाररुम् ' मन्त्र से उसका इस पृथिवी पर से अपहरण करता है । अररु नाम का असुर वेदि स्थान में जो छिपा हुआ है, उसे देयजन संज्ञक वेदि स्थान से हटाया, और हटाकर जैसे भी नष्ट हो जाय वैसा कर दिया । द्वितीय पर्याय में प्रयुक्त होने वाले ' व्रज गच्छ ' इत्यादि का अर्थ पहले बता दिया है । १२ – शतपथ ब्राह्मण ( १ | २ | ४ | १८ ) उत्कर में रखे हुए स्तम्बयजु के अभिनिधान को समन्त्रक बता रहा है | अभिनिधान का अर्थ है, ऊपर हाथ रखकर नीचे डाल देना । ' मा पप्त ' से पतनाभाव ( न गिरने ) की प्रार्थना ( इच्छा ) का समर्थन करने के लिये पुरावृत्त ( इतिहास ) बताते हैं । देवताओं के द्वारा अपहृत हुआ वह ' अररु, नीचे न गिरू ँ इस इच्छा से स्वर्ग लोक को जाने की इच्छा करने लगा । उस प्रकार इच्छा करने वाले उस अररु को उत्तर की ओर चारों ओर से व्याप्त हुए अग्नि ने उसकी गति को कुण्ठित कर दिया । ऊपर हाथ के रखने से उसे नोचे की ओर प्रेरित किया । यह कहते हुए प्रेरित किया कि हे अररो! तुम द्यु लोक ( स्वर्ग लोक ) को मत जाओ । ( गति के अर्थ

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[ २३३ ] हस्तनिधानेनाधस्तात् प्रेरितवान् । किं ब्रुवन् हे अररो दिव द्युलोकं मा पप्तः मा प्राप्नुहि । ( पत्लृ गतौ ) भ्वादि: । लुङि लुदित्वादङ ' पतः पुम् ' ( पा ० सू ० ७ ४ १६ ) इति पुमागमः । एवमग्निनाऽभिहिते सति सोऽररुः दिव ं न प्राप्नोत् । तद्वदेवेदानीमपि अध्वर्युः स्तम्बयजुर्हरन् अस्माद् भूलोकात् एनमररु अन्तरेति अन्तरितं व्यवहितं करोति । आग्नीध्र-श्चैतन्मन्त्रकरणेनोत्कराभिनिधानेन दिवोऽन्तरिक्षात् तमसुरमन्तरितं करोति । अथ तृतीयं प्रहरति- द्रप्सस्ते द्यां मास्क-नित्ययं वा अस्यैद्रप्सो यमस्या इम १७ रसं प्रजाउपजीवन्त्येषु ते दिवं मा पप्तदित्येवैतदाह - व्रज गच्छ । गोष्ठानं वर्षतु । ते द्यौर्बंधान देवसवितः परमस्यां पृथिव्या ं शतेनपाशैर्योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौगिति । ' ( श ० १ | २ | ४ | १६ ) अथ तृतीयं पर्यायं विधत्ते - अथेति । मन्त्रं व्याचष्टे अयं वा इति । अस्याः पृथिव्याः सम्बन्धिनं यमिमं मधुरादिरसं सर्वाः प्रजाउपजीवन्ति अयं खल्वस्याः पृथिव्या द्रप्सः । तथा च हे पृथिवी ते त्वदीय एष रसः दिवं लोकं मात्मातत्विति इममर्थमेषमन्त्रो ब्रूत इत्यर्थः । अस्मिन् तृतीयेऽपि पर्याये व्रज गच्छेत्यादिकं सर्व पूर्व-वदेव प्रयोक्तव्यमित्यभिप्रेत्य तत्पठति व्रजमित्यादि । तस्माच्छतपथानुसारि सिद्धान्तमन्त्रसम्मतव्याख्यानमेव युक्तम् न दयानन्दाद्युक्तम् । १३ - ' स वै त्रिजुषा हरति ' ( श ० १/२/४/२० ) इत्यादिना समन्त्रकं त्रिर्हरणमनूद्य प्रशंसति - इमे पृथिव्या-दयस्त्रयो लोका त्रिष्कृत्वो हरणेन एभिस्त्रिभिरेवलोकैरेनमररुमभिनिदधाति अभितो निक्षिपति बाधत इति यावत् । यजुर्मन्त्रेण हरणस्य लोकत्रयस्य च साम्यमाह - पृथिव्यादयस्त्रयोलोका अद्धा प्रत्यक्षमेव त्रिर्यजुर्हरणश्वाद्धा प्रत्यक्षमेव अनुष्ठेयार्थस्य साक्षात्प्रतिपादकत्वात् । एवं लोकानां यजुषाञ्च प्रत्यक्षत्वसाम्यात् तुल्यत्वं त्रिवारं यजुषा हरणेन लोकत्रया-देवारुरोर्बाधो भवति । १४ - तूष्णीं चतुर्थमिति । ( श ० १ | २ | ४ | २१ ) अमन्त्रकं चतुर्थं पर्यायं विधत्ते - तस्य प्रयोजनञ्चोक्तम्-इमान् प्रागुक्तान् त्रल्लोकानतिक्रम्य यत् चतुर्थं लोकजातमस्ति तत् अस्ति न वा इति सन्दिग्धम् अत्यन्तविप्रकृष्टत्वेना-में वादिगण का ' पत्लृ ' धातु है । लृदित होने से लुङ् लकार में ' अङ ' हुआ और ' पतः पुम् ' ( पा ० सू ० ७ ४.१६ ) सूत्र से पुमागम किया । इस प्रकार अग्नि के कहने पर वह अररु स्वर्ग लोक को प्राप्त नहीं कर सका । उसी तरह इस समय स्तम्बयजुर्हरण करता हुआ अध्वर्यु भी इस भू लोक से अररु को अन्तरित ( व्यवहित ) करता है और आग्नीध्र भी इस मन्त्र से कराभिनिधान के द्वारा उस असुर को अन्तरिक्ष से अन्तरित ( व्यवहित ) करता है । उसके अनन्तर शतपथ ब्राह्मण श ० १ | २ | ४ | १६ ) से तृतीय पर्याय का विधान किया गया है । ' अयं वा ' से मन्त्र की व्याख्या करते हैं - इस पृथिवी का जो मधुरादि रस है जिसके बल सम्पूर्ण प्रजा जीवित है, वह इस पृथिवी का उपजीव्य रस ( द्रप्स ) है । तथाच हे पृथिवि! तुम्हारा यह उपजीव्य रस ( द्रप्स ) द्यु लोक ( स्वर्ग लोक ) में न जाय । इस अर्थ को यह मन्त्र बता रहा है । इस तृतीय पर्याय में भी व्रजं गच्छ ' इत्यादि सबका पहले की तरह ही प्रयोग करना चाहिये । इसी अभिप्राय से ' जम् ' इत्यादि पढ़ा गया है । इस शतपथानुसारी सिद्धान्त मन्त्र सम्मत व्याख्यान ही युक्त है । दयानन्द कृत व्याख्यान उचित नहीं है । १३ ' सवै त्रिजुषा हरति ' - ( ० १ २ | ४ | २० ) से समन्त्रक निर्हरण का अनुवाद करके प्रशंसा की जा रही है । ये पृथिव्यादि तीन बार हरण करके वे स्वयं ही उस अररु को फेंक देते हैं । यजुर्मन्त्र के द्वारा किये हुए हरण का लोकत्रय से साम्य बताते हैं - पृथिव्यादि तीन लोक प्रत्यक्ष ही हैं । और त्रिर्यजुर्हरण भी प्रत्यक्ष हो है, क्योंकि अनुष्ठेयार्थ का प्रतिपादक है । इस प्रकार से लोक और यजुओं का प्रत्यक्षत्व समान होने से दोनों की तुल्यता है । तीन बार यजु के द्वारा हरण करने से ये लोकत्रय ही अररु का बाध करते हैं । १४ -- ' तूष्णीं चतुर्थमिति ' ( ० १ २ | ४ | २१ ) इससे चतुर्थ पर्याय का अमन्त्रक विधान किया गया है । उसका प्रयोजन भी बताया है - पहले कहे हुए इन तीन लोकों का अतिक्रमण कर जो चौथा लोक है, उसके होने, न होने में सन्देह है । क्योंकि वह अतीव दूरतर होने से अनुभव में नहीं आता है । इस चतुर्थ हरण से उसी सन्दिह्यमान लोक के

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[ २३४ ] नुभवागोचरत्वात् । एतच्चतुर्थहरणात्तेनैव सन्दिह्यमानेन लोकजातेन विद्वेषं कुर्वन्तं शत्रुजातं बाधते । तदुपपादयति-तूष्णीं हरणस्य चतुर्थस्थानस्य च साम्यमुच्यते तूष्णीं हरणस्यापि अनुष्ठेयार्थ प्रतिपादकमन्त्राप्रयोगादप्रत्यक्ष चतुर्थस्य स्थानस्य चाप्रत्यक्षत्वमिति । १५ - अध्यात्मपक्षेऽपि पृथिव्याः सम्बन्धिदेवयजनात् अररुं तन्नामकमसुरराक्षसं भगवत्सम्बन्धिकर्मोपासना-दिबाधकमपनीय वध्यासम् । व्रजं गच्छेत्यादिकं पूर्ववदेव व्याख्यातव्यम् । अररो दिवमन्तरिक्षं मा पप्तः मा गमः । हे पृथिवि द्रप्सस्ते त्वदीयो रसो द्यां दिवं मास्कन् मा गच्छतु । अर्थात् भगवदाराधनादिप्रतिबन्धकोऽसुरादिः सर्वतो रुद्धो नाशमेव गच्छतु । पृथिव्यास्तु - द्रप्सो रसो द्यां मा गच्छत द्रपनवत्यां पृथिव्यामेवं । I गायत्रेण त्वा छन्दसा परिगृह्णामि त्रष्टुभेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामि जागतेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामि । सुक्ष्मा चासि शिवा चासि स्योना चासि सुषदा चास्यूर्जस्वती चासि पयस्वती च ॥ वा ० सं ० १ । २७ ॥ अर्थ - हे विष्णो! गायत्र, त्रैष्टुभ्, और जागत इन तीन छन्दस्संस्कारों से युक्त हुए स्फ्य के द्वारा गायत्र से दक्षिण दिशा में, त्रैष्टुभ् से पश्चिम दिशा में, और जागत से उत्तर दिशा में मैं तुम्हारा ग्रहण कर रहा हूँ । हे वेदि! तुम्हारी भूमि अच्छी है अर्थात् खनन करके स्वच्छ की है, राक्षसों को हटा देने से ( खदेड़ देने से ) तू शान्त और सुख हेतु है । तथा तू बैठने के योग्य है । तुझमें ( वेदी में ) अन्न और दही आदि रखा है ॥ २७ । १ – पूर्वं परिग्रहं गृह्णाति दक्षिणतः पश्चात् उत्तरतश्च स्पेन गायत्रेणेति प्रतिमन्त्रमिति ' ( का ० श्री ० सू ० २।६ । ) यतोऽर रुनिष्काशितस्तत्र वेदेरियत्तां निश्चेतु ं दक्षिणादिदित्रये स्फ्येन रेखाकरणम् पूर्वः परिग्रहः । तं कुर्या -दध्वर्युः । अत्र मन्त्रत्रयस्य विष्णुर्देवता ते प्राश्च विष्णुं निपाद्य छन्दोभिरभितः पर्यगृह्णन् ( श ० ब्रा ० १।२।५-६ ) इति श्रुतेः । साथ द्वेष करने वाले शत्रु वर्ग को वह पीड़ा पहुँचाता है । उसी का उत्पादन करते हैं- तूष्णीं हरण और चतुर्थ स्थान दोनों का साम्य बताते हैं । तूष्णीं हरण भी अनुष्ठेयार्थं प्रतिपादक मन्त्र प्रयोग से रहित होने के कारण अप्रत्यक्ष है और चतुर्थ स्थान भी अप्रत्यक्ष है । १५ -- अध्यात्म पक्ष में भी - पृथिवी से सम्बन्धित देवयजन से भगवत्सम्बन्धि कर्मोपासनादि करने में बाधा पहुँचाने वाले अररु नामक असुर को हटाकर मार दिया है । ' व्रजं गच्छ ' इत्यादि की व्याख्या पूर्ववत् ही करनी चाहिये । हे अररो! अन्तरिक्ष में मत जाना । हे पृथिवि! तुम्हारा रस स्वर्ग में न जाय अर्थात् भगवदाराधना के प्रतिबन्धक असुरादिकों का सब प्रकार से नाश हो । पृथिवी का रस स्वर्ग में न जाकर पृथिवी पर ही रहे । १ - पूर्वं परिग्रहं गृह्णाति ' ( का ० श्र ० सू ० २।६ । ) चूँकि अररु को निष्काशित किया जा चुका है, अतः वेद के परिणाम का निश्चय करने के लिये दक्षिणादि तीन दिशाओं में स्पय से रेखा करने को अपूर्व परिग्रह कहते हैं, उसे अरे । श्रुति ( ० १ २२५ - ६ ) ने बताया है कि यहाँ तीन मन्त्रों की देवता विष्णु हैं ।

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[ २३५ ] २ - तेन विष्णुरेवात्र सम्बोध्यते - हे विष्णो त्वा त्वां गायत्रेण छन्दसा गायत्र्यादिछन्दस्त्रयरूपतया भावितेन पये दिये परिगृह्णामि एवं त्रैष्टुभेन छन्दसा त्रैष्टुभछन्दोरूपेण स्फ्येन त्वां परिगृह्णामि जागतेन छन्दो रूपेण छन्द-त्वां परिगृह्णामि ततश्छन्दोदेवता दिक्त्रयेऽसुरेभ्यस्त्वां पालयिष्यन्ति पूर्व भाग आहवनीयः पालयिष्यति । ३ - से प्राश्च विष्णु ं निपाद्य इत्यस्याः श्रुतेरियं कथानुसन्धेया - देवाश्चासुराश्च प्राजापत्याः परस्परं स्पर्धा -RE: । देवान् पराजितान् मत्वाभू ' मिमसुरा बिभेजुः । तदानीं देवा वामन रूपं विष्णुमग्र कृत्वाऽसुरानागत्यास्मभ्यमपि भूम्यंशोदातव्य इति तानयाचिषुः । असुरा असूयन्तोऽयं विष्णुर्यावति भूभागे शेते तावान् भवदीयोस्तु इत्यूचुः । देवास्तु बत्रेतदस्माकमित्युक्त्वा प्राश्व ं विष्णु निपात्य गायत्रेणेत्यादिमन्त्रैर्यज्ञभूमिं जगृहुः । यज्ञो विष्णुर्यत्र तिष्ठति सैव यज्ञभूमि-भूमिरिति तैर्विदितत्वात् । ४- ततोऽध्वर्युद्यां प्रागायतास्तिस्रो रेखाः स्फ्येनोल्लिख्प हात्रिः इति प्रेषमन्त्रं पठति । ' वेदिरिति भूमेर्नाम ' ( श ० १ २५१ - ७ ) इति श्रुतेः । तत एव पूर्व वेदिग्रहणं विधेयम् । ततोऽग्नीत् रेखाभ्य: पांसून त्रित्वोत्करे निःक्षिप्य लेखाः संस्पृशति संमर्शनेन समीकरोति । तत उत्तरपरिग्रहं परिगृह्णाति ' सूक्ष्मा स्योनोजस्वतीति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २ | ६| ) वेदिकरणानन्तरं स्पयेन पूर्ववत् दिक्त्रये रेखाकरणं उत्तर: पारिग्राहः । हे वेदे त्वां सुक्ष्मासि शोभना क्ष्मा-भूमिः सुक्ष्मोच्यते । खननेनाश्मादिदोषनिरसनेन भूमेः शोभनत्वं सम्पाद्यते । शिवासि उग्रस्यासुरस्य निष्कासनेन शान्तत्वम् । गुणद्वयस्यान्योन्यसमुच्चयार्थी चकारौ । एकोऽयं मन्त्रः सुक्ष्माचासि शिवा चासीति । दक्षिणतः स्योनाचासि सुखदा चासीति पश्चिमतः । ऊर्जस्वती चासि पयस्वती चेत्युत्तरतः । स्योना सुखरूपा सुषदा सुष्ठु सीदन्ति देवा यस्यां २ – उस कारण यहाँ विष्णुरेखा को सम्बोधित किया जा रहा है- हे विष्णो! गायत्री आदि तीन छन्दों के रूप में कल्पित किये गये स्फ्य से तीन दिशाओं में तुम्हारा स्वीकार कर रहा हूँ । उसी प्रकार त्रैष्टुभच्छन्द के किये गये स्फ्य से रूप में कल्पित स्फ्य से तुम्हारा स्वीकार कर रहा हूँ, तथा जागत छन्द के रूप में कल्पित तुम्हारा स्वीकार कर रहा हूँ । इस कारण ये छन्दो देवता तीनों दिशाओं में तुम्हारा पालन करेंगी । और पूर्व भाग में आहव-नी तुम्हारा पालन करेगा । ३ - पूर्वोक्त ' ते प्राश्च विष्णुं निपाद्य ' श्रुति की इस कथा का अनुसन्धान कर लेना चाहिये । प्रजापति के पुत्र देव ओर असुर परस्पर स्पर्धा करने लगे । देवों को पराजित हुआ समझकर असुरों ने भूमि को बाँट लिया 1 तब देवों ने वामन रूप धारी विष्णु को आगे कर असुरों के पास आगमन किया, और हम देवों को भी भूमि का अंश मिलना चाहिये, इस प्रकार असुरों से उन्होंने याचना की । देवों से असूया रखने वाले असुरों ने कहा कि ' यह विष्णु ( वामन रूप ) जितने भूभाग पर सोता हो उतना भू भाग तुम लोगों का रहेगा । तब देवों ने कहा- हमारे लिये इतना बहुत है । और पूर्व दिशा की ओर विष्णु को लिटा कर ' गायत्रेण ' इत्यादि मन्त्रों से यज्ञभूमि को अपने अधीन कर लिया । क्योंकि देव यह जानते थे कि ' विष्णु जहाँ स्थित रहता है, वही यज्ञ भूमि है । ४ यही कारण है कि अध्वर्यु नाम का ऋत्विज् वेदि में पूर्व दिशा की विस्तार वाली तीन रेखाओं का ' स्फ्य ' से उल्लेखन करता है । और तीन बार प्रेष मन्त्र को पढ़ता है । ' वेदिरिति भूमेर्नाम ' ( श ० १।२।५।१-७ ) इस शतपथ श्रुति के अनुसार ही प्रथमतः वेदिग्रहण करना चाहिये । उसके बाद अग्नीत् नाम का ऋत्विज्, पूर्वोल्लिखित तीन रेखाओं से धूलि को तीन बार लेकर उत्कर में डाल दे । पश्चात् लेखाओं का संगर्शन ( स्पर्श करके उन्हें समान कर दे । उसके वाद ' उत्तर परिग्रह ' का परिग्रह करता है । वेदिकरण के अनन्तर ' स्फ्य ' से पूर्वदत् ही तीनों दिशाओं में जो रेखाकरण किया जाता है, उसे उत्तर परिग्रह कहते हैं । हे वेदे! तुम सूक्ष्म हो । शोभन भूमि को सूक्ष्म कहते हैं । खनन आदि के द्वारा अश्मादि ( पत्थर आदि ) दोषों का निरसन करने से भूमि को शोभन बनाया जाता है । हे भूमि! तुम शिवा हो, अर्थात् उग्र असुर के निष्कासन से तुम शान्त हो गई हो । उक्त दो गुणों के परस्पर समुच्चयार्थ दो ' च ' कार मन्त्र में दृष्टिगत होते हैं । ' सूक्ष्मा चासि शिवा चासि ' इतना एक मन्त्र है, दक्षिण दिशा में तथा पश्चिम दिशा में

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[ २३६ ] सा सुषदाचासि । अत्रापि चकारौ समुच्चयार्थी । द्वितीयो मन्त्रः । ऊर्जा: शब्दोऽन्नवाची । पयः शब्दस्तद्विकारदध्यादि-वाची । अन्नवती दध्यादिमती चासि । तृतीयोऽयं मन्त्रः । ५ — अत्र स्वामिदयानन्द: - ' येन यज्ञेनोत्तमैः पदार्थः सह सुक्ष्मासि भवति येन कल्याणकारिभिर्गुणैर्मनुष्ये-चेयं शिवासि भवति येन चानुत्तमैः सुखंः सहेयं स्योनासि भवति येन चोत्तमाभिः सुखकारिकाभिः स्थितिगतिभि: स सुदास भवति येन चोत्तमैर्यवादिभिरन्नः सहेयमूर्त स्वती असि भवति येन चोत्तमैर्मधुरादिरसवद्भिः फलैर्युक्त यं पयस्वती जायते अहं यज्ञविधाविन्मनुष्यो गायत्रेण छन्दसा त्वा तं यज्ञ परिगृह्णामि । अहं त्रैष्टुभेन च्छन्दसा त्वा तमिमं पदार्थ समूहं परिगृह्णामि । अहं जागतेन छन्दसा त्वा तमिमं परिगृह्णामि ' इत्याह । ६ - भावार्थत्वेन तु -- ' वेदप्रकाश केश्वरोऽस्मान् प्रत्यभिवदति युष्माभिर्नचान्तरेण वेदमन्त्राणां पटनं तदर्थज्ञानं यज्ञानुष्ठानं च सुखफलं प्राप्तु ं सर्वसुखगुणाढ्याः सुखकारिणोऽन्नजलवाय्वादयः पदार्थाः शुद्धाश्च कतु शवयन्ते । तस्मादेतेभ्यः त्रिविधस्य यज्ञस्य सिद्धि प्रयत्नेन निष्पाद्य सुखे स्थातव्यम् । ये चास्यां वायुजलौषधिदूषका दुर्गन्धादयोदोषा दृष्टाश्च मनुष्याः सन्ति ते सर्वदा निवारणीयाः । इति वर्णितवान्, ) -6 तद्वयमपि निःसारम्, येन यज्ञेनेति पदयोर्मन्त्रासंस्पशित्वात् । उत्तमैः पदार्थः कल्याण-भादीन्यपि मन्त्रबाह्यानेव । एवमेव गायत्रेण छन्दसा त्वा त यज्ञं परमात्मानं वा परिगृह्णामीति प्रतिज्ञा मात्रं न स्वं पोषयितुं क्षममुपपत्तिशून्यत्वात् । त्रिष्टुप् छन्दसा पदार्थसमूहं परिगृह्णामीत्यपि नियुक्तिकमेव छन्द-‘ स्योनाचासि सुखदाचासि’- यह द्वितीय मन्त्र है । और उत्तर दिशा में ' ऊर्जष्वती चासि पयस्वती च ' - यह तृतीय मन्त्र है । तुम स्योना अर्थात् सुखरूपा हो और जिस पर देव अच्छी तरह से बैठते हैं, ऐसी सुखदा भी तुम हो । यहाँ पर भी दोनों ' च ' कार समुच्चय बताने के लिये ही हैं । ' ऊर्जा ' शब्द, अन्न का वाचक है । पयः ' शब्द, उसके विकार दधि आदि का वाचक है । तात्पर्य यह है कि हे वेदि तुम अन्नवती, दध्यादिमती हो । यह तृतीय मन्त्र है । ५- इस पर स्वामी दयानन्द का व्याख्यान इस प्रकार है " जिस यज्ञ के द्वारा उत्तम पदार्थों साथ तुम सूक्ष्म होते हो और जिन कल्याणकारक गुण विशिष्ट मनुष्यों से यह कल्याणकारिणी होती है, जिन अनुत्तम सुखों के साथ यह सुखपूर्ण होती है । और जिन उत्तम सुखकारक स्थिति - गतियों के साथ यह सुखप्रद होती है, जिन उत्तम यवादि अन्नों के साथ यह ऊर्जा स्वती होती है और जिन उत्तम मधुरादि रस वाले फलों से युक्त होकर यह पयस्वती होती है । यज्ञ विद्या को जानने वाला मैं मनुष्य गायत्र छन्द से उस यज्ञ को स्वीकार करता हूँ । त्रैष्टुभ छन्द से मैं उस पदार्थ समूह को स्वीकार करता हूँ । जागत छन्द से मैं इसको स्वीकार करता हूँ । ६ - इसका भावार्थ यह है- ' वेद प्रकाशक ईश्वर हमसे यह कह रहा है कि तुम लोग वेद मन्त्रों के पठन के बिना, उसके अर्थ का ज्ञान हुए विना, और यज्ञ का अनुष्ठान किये बिना सुख रूप फल की प्राप्ति के लिये सर्व प्रकार के सुख गुणों से युक्त अन्न, जल, वायु आदि पदार्थों को शुद्ध नहीं कर सकते हो । इसलिये इनसे त्रिविध यज्ञ की सिद्धि को प्रयत्न पूर्वक प्राप्त कर सुख से रहना चाहिये । इसमें वायु, जल, ओषधि को दूषित करने वाले जो दुर्गन्धादि दोष हों, उनका सर्वदा निवारण करना चाहिये । इस प्रकार दयानन्द ने वर्णन किया है । ) --6 किन्तु यह व्याख्या और भावार्थ दोनों ही सारहीन है । ' येन और यज्ञेन ' ये दोनों पद, मन्त्र से सम्बद्ध नहीं हैं । ' उत्तम पदार्थों से तथा कल्याणकारी गुणों से ' इत्यादि शब्द भी मन्त्र के बाहर के हैं । इसी प्रकार ' गायत्रेण छन्दसा ' इत्यादि केवल प्रतिज्ञा मात्र है, उपपत्ति से रहित होने के कारण वह प्रतिज्ञा पुष्ट नहीं हुई है । ' त्रिष्टुप् छन्दसा ' इत्यादि कथन भी युक्तिरहित है । क्योंकि ' छन्दसा ' पद से आह्लाद

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[ २३७ ] सेतिपदेन आह्लादकारित्वम् स्वातन्त्र्यानन्दप्रदत्वमत्यानन्दप्रकाशकत्वं कया व्युत्पत्त्या गृहीतमित्यस्यानुक्तत्वात् । ' इन्द्रियं वीर्यं छन्दांसि रसो वै छन्दांसि ' ( श ० ७ | ३ | ११३७ ) वीर्यं वै त्रिष्टुप् इत्याद्युद्धरणान्यपि प्रकृतार्थपोषणे नोपयुज्यन्ते । अन्तरेण वेदमन्त्राणां पठनम् तदर्थज्ञानं यज्ञानुष्ठानं सुखफलं प्राप्तु ं न शक्यन्ते इत्यपि निर्मूलम् मन्त्र-बाह्यत्वात् । ८ - भूमिकायां तु मन्त्राणां पठनमभ्यासार्थमेवाभ्युपगतमिह तु तद्विपरीतं तदन्तराफलमेव न प्राप्तु शक्यत इत्युच्यते । लोके तु तद्विपरीतमेव दृश्यते । वेदबाह्याश्च वेदमन्त्रपठनमन्तरापि सुखप्राप्ति वायुजलादिशुद्धि चासादय-त्येव । शतपथश्रुतिविरुद्धमप्येतत् । तथाहि - देवाश्च वा असुराश्चोभये प्राजापत्या पस्पृधिरे । ततो देवा अनुव्यमि-वासुस्थहासुरा मेनिरेऽस्माकमेवेदं खलुभूवनमेवेदमिति ' ( श ० प ० १ | २ | ५ | १ ) ते होचुः । हन्तेमां पृथिवीं विभज्योप-जीवामेति । तामोक्ष्णैश्चर्मभिः पश्चात् प्राश्ञ्चो विभजमाना अभीयुः । ( श ० ११२५५२ ) तद्वै देवाः शुश्रुवुः । विभजन्ते ह वा इमामसुराः पृथिवीं प्रेत तदेष्यामः । यत्रेमामसुरा विभजन्ते ततः स्याम यदस्यैनं भजेमहीति ते यज्ञमेव विष्णु ं पुरस्कृत्येयुः । ' ( श ०१ / २ / ५३ ) ६ – इत्थं स्तम्बयजुर्हरणं तच्च स्तम्बरूपं स्पयेन मित्वोत्कर देशे हरेत् ' ( तै ० ब्रा ० ३२६ ) यजुषा मन्त्रेण हरणीय: पांसुसहितः स्तम्बः स्तम्बयजुस्तस्य हरणम् ( तै ० सं ० १1१/६ ) वेदिस्थानात्सतृणस्य पांसोर्मन्त्रेणान्यत्र हरणं स्तम्बयजुर्हरणम् । तदनन्तरं वेदिपरिग्रह वक्त मितिहासमुपन्यस्यति देवाश्चेति ---१० — उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे स्पर्धां कृतवन्तः । स्पर्धमानानां तेषां मध्ये देवास्ततस्तेभ्योसुरेभ्यः अनुव्यमिव अनुगमनं न्यग्भूमिं प्राप्ता इव बभूवुः । ततस्तेऽसुरा इदं खलु भुवनमस्माकमेवेति मेनिरे । ते होचुः हन्त हर्षस्थाने देवान्य-अतो निष्प्रत्यूहमिमां पृथिवीं विभजामहै विभज्य च यथाभागमुपजीवामेति । एवमुक्त्वा तां पृथिवीमौक्ष्णैरन-कारित्व, स्वातन्त्र्यानन्दप्रदत्व, अत्यानन्दप्रकाशकत्व आदि अर्थ का स्वीकार किस व्युत्पत्ति से आपने किया है, वह नहीं बताया है । ' इन्द्रियं वीर्यं छन्दांसि रसो वै छन्दांसि ' ( श ० ७ | ३ | १ | ३७ ), और ' वीर्यं वै त्रिष्टुप् ' इत्यादि उद्धरण जो दिये हैं, वे भी प्रकृत अर्थ के पोषक नहीं हैं । ' वेद मन्त्रों के पठन उनके अर्थज्ञान, और यज्ञ के अनुष्ठान के बिना सुख फल प्राप्त नहीं किया जा सकता ' - यह कथन भी निर्मूल है, क्योंकि मन्त्र से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् मन्त्रबाह्य है । ८- आपने भूमिका में तो मन्त्रों का पठन, अभ्यास के लिये ही माना है । किन्तु यहाँ पर उसके विपरीत ' उसके बिना, फल प्राप्ति ही नहीं हो सकती कह रहे हैं । लोक व्यवहार में उसके विपरीत भी देखते हैं - जो वेदबाह्य लोग हैं, वे वेदमन्त्रों का पाठ किये बिना भी सुख प्राप्त करते हैं । वायु, जल आदि की शुद्धि भी कर लेते हैं । किश्व दयानन्द स्वामी का कथन, शतपथ श्रुति के विरुद्ध भी है । तथाहि - ' देवाश्च वा असुराश्च ' – ( रा ० १ २ | ५ | १ ), ' ते होचुः । हन्तेमां ’ – ( श ० १ २ ५। २ ), ' तद्वै देवाः शुश्रुवुः । विभजन्ते ' - ( श ० १ २ ५३ ), ' इत्थं स्तम्बयजुर्हरणं ' – ( तै ० ब्रा ० ३२६ ), ' यजुषा मन्त्रेण हरणीयः - ( तै ० सं ० १1१14 ) इत्यादि । ६ - वेदिस्थान से तृण सहित धूलि ( पांसु ) के अन्यत्र हरण ( हटाना ) करने की क्रिया को ' स्तम्बयजुर्हरण ' कहते हैं । तदनन्तर वेदि परिग्रह को बताने के लिये एक इतिहास उपस्थित किया जा रहा है – ' देवाश्चेति ' । १० - दोनों प्राजापत्य ( प्रजापति के पुत्र - देव और दैत्य ) परस्पर स्पर्धा करने लगे । स्पर्धा करते हुए उन देव - दैत्यों में से देव, उन दैत्यों ( असुरों ) की अपेक्षा कुछ निर्बल से पड़ गये । तब उन असुरों ने यह समझ लिया कि ' यह सम्पूर्ण भुवन निश्चित रूप से अब हमारा ही है । ' वे ( असुर ) बोले- बड़े हर्ष की बात है कि देव पराजित हो गये हैं । अतः इस पृथ्वी को अब हम निर्विघ्नतया आपस में बाँट लेंगे । बाँटकर अपने अपने भाग को प्राप्त करके