वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 251–260

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 251 का मूल पृष्ठ
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[ २३८ ] डुत्सम्बन्धिभिश्चर्मभिः पश्चात् प्रतीचीं दिशमारभ्य प्राञ्चः प्राङ मुखा विभजमाना अभीयुः अभिजग्मुरित्यर्थः । तद्वै देवाः इति शुश्रुवुः असुरा इमां पृथिवीं विभजन्त इति । अधुनास्माकं तूष्णीमवस्थानमनुचितमस्माभिरपि तद्विषये प्रयतितव्यम् परस्परमभिमुखीकृत्य प्रतिपाद्यते - हे देवा: प्रेत यूयं गच्छत प्रोत्सहध्वम्, यत्रासुरा विभजन्ते तत्स्थानं गन्तव्यम् । गत्वाचा-सुरान् अस्यां पृथिव्यां नोऽस्मानेव अन्वाभजत संयोजयत भागेन । अस्माकमप्यस्यां पृथिव्यां भागोऽस्त्विति होचुः । ते हासुरा । असूयन्त इव अनादरमेवं कुर्वाणा यावन्तं देशं व्याप्यैष विष्णुः शेते तावत्परिमाणं स्थानं युष्मभ्यं प्रयच्छामेत्युक्तवन्तः असुरैस्तथोक्तं देवास्तदङ्गीचक्र: । विष्णुहि तदानीं वामनः खर्वो बभूव । अतएवासुरास्तेनाक्रान्तं हेडृ अनादरे स्थानं ) प्रयच्छाम भ्वादि: । इत्यब्र ुवन् । अथापि तत् असुररुक्तम् देवा नजिहीडिरे नह्यनाहतं चक्र: किन्त्वाद्रियन्ते स्मेत्यर्थः । ( निपात्य नोयज्ञसम्मितं स्थानं दत्तवन्तो यत् महद्वै तत् दत्तवन्त इति । एवं विचार्य ते यज्ञात्मकं विष्णुं प्राश्च प्राक्शिरसं दक्षिणतः पश्चात् उत्तरतश्च गायत्र्यादिछन्दोभिः सर्वतः पर्यगृह्णन् । तं विष्णुं छन्दोभिरभितो यज्ञेन गायत्र्यादिभिश्छन्दोभिः अचयन्तः पूजयन्तः परिगृह्य पुरस्तात् पूर्वस्यां दिश्याहवनीयमग्नि समाधाय प्रज्वाल्य तेन विष्णवात्मकेन परमेश्वरं श्राम्यन्तः कर्मानुष्ठानजनितं श्रमं प्राप्नुवन्तः चेरुः । पूर्ववत् ववृतिरे । चरित्वा च तेन यज्ञात्मकस्याधार- नामधेयं भूतेन स्थानेन देवाः सर्वामेवेमां पृथिवीं सम्यगलभन्त । अतोविद्यते लभ्यतेनेनेति यज्ञस्थानस्य वेदीरिति जातम् । गत्वा च यत् यदि अस्यै अस्याः पृथिव्याः सम्बन्धिस्थानं न भजेमहि न प्राप्नुयामः ततस्तहि वयमभागिनः स्याम के भविष्याम:? न केऽपि अर्थात् सर्वथा नगण्या एव भविष्याम इत्यर्थः । एवमालोक्य ते यज्ञरूपमेव विष्णुं पुरस्कृत्य पुनर्जग्मुः । ११ – ते होचुः अनु नोऽस्यां पृथिव्यामाभजतास्त्वेव नोऽप्यस्यां भाग इति । तेहासुरा असूयन्त इवोचुर्यावदेवैष विष्णुरभिशेते तावद्वो दम् इति । ' ( श ० प ० १ । २ । ५ । ४ ) अपनी उपजीविका चलायेंगे । ऐसा कहकर उस पृथ्वी को बैल के चर्म से पश्चिम दिशा से आरम्भ कर पूर्व दिशा तक पृथ्वी को आपस बाँट लिया है । इस नापकर उन्होंने उसे बाँट लिया । इस बात को देवों ने सुना कि असुरों ने इस होना चाहिये । समय हमारा चुपचाप ( निष्क्रिय ) होकर बैठना उचित नहीं है । अत हमें भी उस विषय में प्रयत्नशील चल पड़ो, जहाँ असुर इस प्रकार एक दूसरे के सन्मुख होकर कहने लगे । हे देवों! तुम लोग उत्साह धारण करके भी भाग लोग इस पृथ्वी को बाँट रहे हैं, उस जगह चलो । उन असुरों के पास चलकर कहें कि इस पृथ्वी पर हमारा बड़े रखो । इस पृथ्वी में हमारा भी हिस्सा ( भाग ) रहे, ऐसा देवों ने कहा । तब उन असुरों ने असूया स्थान से तुम भरकर लोगों को अनादर भाव से कहा कि जितने स्थान को व्याप्त कर यह विष्णु सो सकता है उतना परिमित ने अपने को वामन हम देंगे । इस प्रकार असुरों के कहने पर देवों ने उसे स्वीकार कर लिया । उस समय विष्णु लिया । असुरों ( बीना ) बना लिया । इसीलिये विष्णु के द्वारा व्याप्त होने वाले स्थान को देना असुरों ने स्वीकार कर असुरों ने दिया, ने जो देने के लिये कहा उसका देवों ने भी अनादर नहीं किया । हमारे लिये यज्ञ परिमित स्थान से जो लिटाकर दक्षिण, वह बहुत दे दिया है । ऐसा सोचकर उन देवों ने यज्ञात्मक विष्णु को पूर्व दिशा को ओर सिर के द्वारा विष्णु को सब पश्चिम और उत्तर तक गायत्री आदि छन्दों के सहारे सब ले लिया । गायत्री आदि छन्दों ओर व्याप्त कर दिया । पूर्व दिशा में आहवनीय संज्ञक अग्नि को प्रज्वलित कर उसे विष्णु रूप यज्ञ से पूजन किया । कर्मानुष्ठान से हुए परिश्रम से श्रान्त हो गये । इस प्रकार यज्ञात्मक विष्णु के आधारभूत स्थान के द्वारा देवों ने सम्पूर्ण अनेन पृथ्वी को अच्छी तरह से प्राप्त कर लिया । यज्ञस्थान को ' वेदि ' नाम देने का यही रहस्य है - ' विद्यते लभ्यते इति वेद: ' । जिससे सम्पूर्ण पृथ्वी का लाभ होता है, उसे ' वेदि ' कहते हैं । असुरों के पास जाकर यदि पृथिवी का भाग प्राप्त न हो, तो हमसे बढ़कर कौन अभागा होगा । अर्थात् कोई नहीं होगा । सब तरह से हम नगण्य ही हो जायेंगे । यह सोचकर यज्ञरूप विष्णु को अगुआ बनाकर पुनः चल पड़े ।

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[ २३८ ] १२ - ' वामनो ह विष्णुरास । तद्देवा न जिहीडिंरे महद्वै नोऽदुर्येनो यज्ञसम्मितमदुरिति । ( श ० १ २ ५१५ ) १३ – ' ते प्राञ्च विष्णुं निपाद्य छन्दोभिरभितः पर्यगृह्णन् । गायत्रेण त्वा छन्दसा परिगृह्णामीति । दक्षिणत-स्त्रष्टुभेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामीति । पश्चाज्जागतेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामीत्युत्तरतः । ' ( श ० १३२।५।६ ) १४ – ' त ं छन्दोभिरभितः परिगृह्य अग्नि पुरस्तात् समाधाय तेनार्चन्तः श्राम्यन्तश्चेरुः तेनेमां सर्वां पृथिवीं समविन्दन्त । तद्यदेनेनेमा ' सर्वा • समविन्दन्त तस्मात् वेदिर्नाम । तस्मादाहुर्यावती पृथिवीत्येत या ही मा सर्वा ७ ° समविन्दन्तवं ह वा इमा २७ सर्वा ७ सपत्नाना 5 संवृङ्क्ते निर्भजत्यस्यै सपत्नान् य एवमेतद्वेद । ' ( श ० १।२।२७ ) १५ - तदेदन्निर्वचनं श्रुत्या प्रदर्श्यते तद्यदेति - नेमा 25 सर्वा ७ समविन्दन्त तस्माद्वेदिर्नाम । तस्मादाहुर्या-वती वेदिस्तावती पृथिवी । एतया इमां सर्वां समविन्दन्देति । १६ – इत्थं पुरावृत्तमुपन्यस्य प्रकृते योजयति - यथैव हि वेदिपरिग्रहात् देवा असुरसकाशात् कृत्स्नां पृथिवी-मपहृतवन्तः, एवमेवायं यजमानोऽपि शत्रुसम्बन्धिनीं सर्वां भूमिमपहरति तांश्च शत्रून् अस्याः पृथिव्या निर्भजति भाग-रहितान् करोति । तस्माद् गायत्रेणेत्यादिभिर्मन्त्रः स्फ्येन वेदिं दक्षिणतः पश्चादुत्तरतश्च रेखया परिगृह्णीयादित्यर्थः । यस्माद् भूप्रदेशादररुनिष्कासितस्तस्मिन् भूप्रदेशे वेदेरियत्तां निश्चेतु दक्षिणादिदित्रये स्फ्येन रेखात्रयं कुर्यात् । हे वेदि त्वा गायत्र्यादिछन्दस्त्रयरूपतया भावितेन स्फ्येन दिक्त्रये परिगृह्णामि तत्तच्छन्दोदेवतादित्रये त्वामसुरेभ्यः . पालयिष्यामि । पूर्वस्यां दिश्याहवनीयाग्निरेव पालकोऽस्तीत्यभिप्रायः । १७ - तत्तिरीयरीत्यापि पुरा कदाचिदसुराणां विजये सत्येषा पृथिवी कृत्स्नापि तेष मेव स्वभूतासीत् देवानां भूम्यंशः कोऽपि स्वभूतो नासीत् किन्तु यो देवो यत्र यदोपविष्टो यावद्दूरं पश्यति तत्र तावान् देशस्तस्य देशस्य स्वाधीनो-ऽभवत् । ततो देवा असुरान् अयाचन्त युष्मदधीनायामस्यां पृथिव्यां कोऽप्यंशो नियताऽपेक्षितः तत्र तत्र कियत्स्थानमस्मभ्यं १। – ' ते होचुः अनुनोऽस्यां ' - ( श ० १/२/५/४ ), वामनो ह् विष्णुरास ' - ( ० १ २२५ ५ ), ' ते प्राञ्च ं विष्णु ं निपाद्य ' ( ० १ । २ । ५ । ६ ), ' तं छन्दोभिरभितः परिगृह्य ( श ० १।२।४।७ ) १५ - इस निर्वचन को श्रुति के द्वारा प्रदर्शित किया गया है । के १६ – इस प्रकार पुरावृत्त का उपन्यास करके प्रकृत में उसकी योजना कर रहे हैं- जैसे वेदि परिग्रह व्याज से देवों ने असुरों से सम्पूर्ण पृथिवी का अपहरण कर लिया, उसी प्रकार यह यजमान भी शत्रु की समस्त ’ पृथ्वी का अपहरण कर लेता है । और उन शत्रुओं को इस पृथिवी के भाग से रहित कर देता है । इसलिये ‘ गायत्रेण परिग्रह इत्यादि मन्त्रों को कहकर ' स्फ्य ' के द्वारा दक्षिण पश्चिम और उत्तर की रेखाओं को करते हुए वेदि का ( स्वीकार ) करे । जिस भूप्रदेश से ' अररु ' को निष्कासित किया है, उस भूप्रदेश में वेदि की इयत्ता को निश्चित करने के लिये दक्षिणादि तोन दिशाओं में ' स्पय ' से तीन रेखाओं को करे I । हे वेदि! गायत्री आदि तीन छन्दों के रूप में भावित किये हुए स्पय से तीन दिशाओं में तुम्हारा स्वीकार कर रहा हूँ । तत्तच्छन्दों की देवताएँ तीन दिशाओं में तुम्हारा पालन करेंगी । पूर्व दिशा में आहवनीय अग्नि ही पालक है । १७ - - तत्तिरीय श्रुति के अनुसार भी पहले किसी समय असुरों का विजय होने पर सम्पूर्ण पृथिवी ही अपनी हो गई । भूमि का कोई भी अंश देवों का अपना नहीं रहा । किन्तु जो देव जहाँ जब बैठा और जितनी दूर तक वह देख पाया वहाँ तक का देश उसके स्वाधीन हो गया । तब देवों ने असुरों से याचना की तुम्हारी अधीन हुई इस पृथिवी पर कोई भी अंश नियत होना चाहिये, उसमें कितना स्थान हमें दोगे? जितना तुमने परिगृहीत किया होगा उतना देंगे, ऐसा असुरों ने कहा । इसलिये यह वेदि परिग्रह असुरों का हुआ, और बैठा हुआ देव जहाँ तक

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[ २४० ] दास्यथेति । ततोऽसुरा यावद्भिः परिगृहीत तावद् दास्याम इत्यवोचन् । तस्मादयं वेदिपरिग्रहः असुराणां बा इयमग्र आसीत यावदासीन: परापश्यति तावद्देवानाम् । ते देवा अब्र ुवन् कस्त्वेव नोऽस्यामपीति कियत्सेयं स्वांशोऽन्योदास्यथेति यावत्स्वयं परिगृह्णीथेति श्रुतेः । तत्र वेदिखननात् पुरा क्रियमाणः पूर्वपरिग्रहः पश्चात् क्रियमाण उत्तरपरिग्रहः । अन्यत्रू-तमेव सिद्धान्त व्याख्याने । नात्र दयानन्दोक्तं मनागपि शतपथव्याख्यानेन सम्बन्धः । १८ - सोऽयं विष्णुग्लनः छन्दोभिरभितः परिगृहीतोऽग्निः पुरस्तान्नापक्रमणमास । स तत एवौषधीनां मूला-न्युमुलोच | ' ( श ० १।२।५८ ) १३ - वेदे: खननं विधित्सुः प्रकृतमितिहास शेषमनुक्रामति-- स यज्ञात्मको विष्णुः दक्षिणतः पश्चादुत्तरतश्च छन्दोभिः परिगृहीतत्वात् पूर्वस्याश्च दिश्यग्नेरवस्थानादितस्ततश्चलितुमशक्यत्वात् ग्लानः श्रान्तः सन् अपक्रमणमपगमनं नास न जगाम । ' अस गतिदीप्त्यादानेषु भ्वादि: । इत्यस्माल्लिटि रूपम् । यद्वा अस्तेरेव लिटि छान्दसो भूभावाभावः । ग्लानस्य तस्य विष्णोरपगमनं न बभूवेत्यर्थः । स सर्वतो गृहीतो विष्णुः तत एव तस्मिन्नेव स्थाने ओषधीनां मूलान्युपेत्य भूम्यन्तर्गतः सन् मुम्लोच अस्तं गतः अदृश्यो बभूव । २० - ' तेह देवा ऊचुः क्व नु विष्णुरभूत् क्व नु यज्ञोऽभूदिति ते होचुश्छन्दोभिरभितः परिगृहीतोऽग्निः पुरस्ता-न्नापक्रमणमस्त्यत्रैवान्विच्छतेति । तं खनन्त इवान्वीषुस्तं त्र्यङ गुलेऽन्वविन्दंस्तस्मात् त्र्यङ्गुला व ेदिः स्यात् तदुहापि पावित्र्यङ गुलामेव सौम्यस्याध्वरस्य वेदिं चक्र । ' ( श ० १२५ ) २१ - - ' तदु तथा न कुर्यात् । ओषधीनां वै समूलान्युपाम्लाचत्तस्मादोषधीनामेव मूलान्युच्छेत्तवं ब्रूयाद्यन्वेवात्र विष्णु मन्वविन्दंस्तस्माद्वेदि चक्र े । ( ० १ । २ । ५ । १० ) २२ - देवा विष्णुमपश्यन्तो वितर्कितवन्तः विष्णु क्व कुत्राभूत् तदात्मको यज्ञश्च क्वाभूत् । एवं वित तेर्निर्णीतमर्थं श्रुतिर्दर्शयति-- चतसृषु दिक्षु परिवृतत्वेन गमनासम्भवात् अत्रैव स्थाने तस्य विष्णोरन्वेषणं कुरुतेत्यर्थः । देख रहा था, वहाँ तक का भाग देवों का हुआ तब देव कहने लगे कि तुम्हारे समान हमारा भी इस भूमि पर कौन सा भाग है? कितना और अंश हमें दोगे? जितना तुम स्वयं ले रहे हो । वेदि के खनन करने के पूर्व किया जाने वाला पूर्व परिग्राह है, और पश्चात् किया जाने वाला उत्तर परिग्रह है । शेष सब सिद्धान्त व्याख्यान में कह चुके हैं । इस दयानन्दोक्ति में शतपथ व्याख्यासे किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं है । १८ – ' सोऽयं विष्णुग्लन: ' - ( श ० १ २०५८ ) वेदि के खनन का विधान करने की इच्छा से प्रकृत शेष इतिहास को बता रहे हैं । दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाएँ छन्दों के द्वारा परिगृहीत होने के कारण और पूर्व दिशा में अग्नि के स्थित रहने से इधर - उधर चलना शक्य न होने से वह यज्ञात्मक विष्णु श्रान्त होता हुआ वहाँ से निकल नहीं पाया । ' आस ' यह क्रिया पद ' अस ' गतिदीप्त्यादानेषु स्वादि गण के धातु के लिट् लकार में होता है । अथवा ' अस् ' धातु के ही लिट् लकार में यह रूप है, यहाँ भूभाव का अभाव छान्दस है । अभिप्राय यह है कि ग्लान हुविष्णु का वहाँ से अपक्रमण ( निर्गमन ) नहीं हुआ । सब ओर से परिवृत ( घिरा हुआ ) हुआ विष्णु उसी स्थान में भूमि के भीतर चला गया और अदृश्य हो गया । २० - ' तेह देवा ऊचु: ' - ( श ० १२५ ६ ), ' तदु तथा न कुर्यात् ' - ( श ० १।२ । ५। १० ) । २२ — उक्त शतपथ बता रहा है कि जब देवों ने विष्णु को नहीं देखा तब वे सोचने लगे कि विष्णु कहाँ गया? विष्णु रूप यज्ञ कहाँ गया? इस प्रकार सोचते हुए उन्होंने जो निर्णय किया, उसे श्रुति बता रही है - चारों दिशाओं में परिवृत ( घिरा हुआ ) होने से यहाँ से उसका निकल जाना तो सम्भव नहीं है । अत: इसी जगह उस विष्णु का अन्वेषण ( खोज ) करो । इस प्रकार परस्पर निश्चय कर भूमि को खोदते हुए विष्णु का अन्वेषण करने लगे ।

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[ २४१ ] इत्थं परस्परं निश्चित्य भूमि खनन्त इव विष्णुमन्विष्टवन्तः । अन्विष्य तं भूम्यन्तस्त्र्यङगुले अन्वविन्दन् अलभन्त । वत एवमत इदानीमपि यज्ञलाभाय वेदेस्त्र्यङ गुलमात्रं खननं कर्त्तव्यमिति विधत्ते -- तस्मात् त्र्यङ्गुलमिति, तस्मात् त्र्यङ-गुलपरिमाणेन खाता वेदिर्भवेदित्यर्थः वेदेस्त्र्यङ गुलखननमृषिसंवादेन दृढयति --- पाश्चिर्नाम कश्चित् । स खलु सोमयाग -स्यापि त्र्यङ्गुलखातामेव वेदिं कृतवान् । अतोऽत्रापि त्र्यङ गुलखाता वेदियुक्तेति । २३- तमिमं पक्षं निषिध्य पक्षान्तरमाह - स विष्णु रोषधीनां खलु मूलानि उपेत्यान्तर्हितोऽभवत् । तस्मा-द्यावद्देशे भूम्यामन्तरोषधीनां मूलानि प्रसरन्ति तावत्पर्यन्तं खात्वा तन्मूलान्येवोच्छेत्तुं ब्रूयात् । ' तुमर्थे सेसेनसे ' ( पा ० सू ० ३ | ४ | ६ ) इति वै प्रत्ययः । पूर्वं कृत्स्नपृथ्वीलाभहेतुतया वेदि नाम निरुक्तम् । यज्ञाधिकरणस्य विष्णोर्लाभा-धिकरणतयापि तन्निर्वक्ति - यज्ञरूपविष्णु मन्वविन्दन् । तस्माद् वेदिर्नाम तमनुविद्योत्तरेण परिग्रहेण पर्यगृह्णन् सुक्ष्मा-चासि शिवा चासीति । २४ -- तमनुविद्योत्तरेण परिग्रहेण पर्यगृह्णन् सुक्ष्मा चासि शिवाचासि । दक्षिणत इमावेवैतत् पृथिवी 25 संविद्य सुक्ष्मा २७ शिवामकुर्वन् स्योना चासि सुषदा चासीति । पश्चादिमामेव तत् संविद्य रसवतीमुपजीवनीयामकुर्वन् । ' ( श ० १ | २ | ५ | ११ ) २५- ' सव ै त्रिः पूर्वपरिग्रहं परिग्रह्णाति त्रिरुत्तरम् । तत् षट्कृत्वः षड् वा ऋतवः संवत्सरस्य संवत्सरो यज्ञः प्रजापतिः स यावानेव यज्ञो यावत्यस्य मात्रा तावन्तमेतत् परिगृह्णातीति । ' ( श ० १।२५।१२ ) २६ – वे ' देरुत्तरपरिग्रहः कर्त्तव्य इतीतिहासमुखेन विधिमुन्नयति तं विष्णु मनुविद्य लब्ध्वोत्तरेण परिग्रहेण पर्यंगृह्णन् देवाः, गायत्रेण त्वा च्छन्दसेत्यादिभि: प्राकृतः पूर्वपरिग्रहः, तदपेक्षयास्योत्तरत्वम् । सुक्ष्मा चासि शिवा चासीति यजुषा व देर्दक्षिणतः स्फ्येन लेखया गृह्णीयात् । २७ - मन्त्रतात्पर्यमाह - इमामेव तत् पृथिवी ७ संविद्य सुक्ष्मां शिवामकुर्वन् स्योनाचासि सुषदा चासीति मन्त्रेण पश्चात् वदेः पश्चिमायां दिशि स्फ्येन रेखया परिगृह्णीयात् । खोदते हुए उन्होंने भूमि के तीन अंगुल भीतर उसे पा लिया । यही कारण है कि आज भी यज्ञ के लाभार्थ ( यज्ञात्मक विष्णु की प्राप्ति के लिये ) वेदि का तीन अंगुल मात्र खनन करने का विधान ' तस्मात् त्र्यङ्गुलमिति ' उपलब्ध होता है । अर्थात् त्र्यंगुल परिमाण तक वेदि का खनन करना चाहिये । किसी ऋषि के सम्वाद से भी वेदि के त्र्यंगुल खनन का समर्थन हुआ बता रहे हैं - ' पाश्चि ' नाम के एक ऋषि थे । उन्होंने सोमयाग के लिये भी त्र्यंगुल खाता ही वेदि की थी । अतः यहाँ भी त्र्यंगुलखाता वेदि का बनाना ही उचित है । २३ -- उक्त पक्ष का निषेध कर एक दूसरे पक्ष को बता रहे हैं -- वह विष्ण ु ओषधियों के मूल ( जड़ ) तक पहुँच कर अन्तर्हित ( अदृश्य ) हो गया । इसलिये भूमि के भीतर जितने स्थान तक ओषधियों के मूल ( जड़ ) फैली हों, वहाँ तक खोदकर ओषधियों के मूल को ही उखाड़ने के लिये कहे । ' तुमर्थे सेसेनसे ' - - ( पा ० सू ० ३।४।६ ) से ' त ' प्रत्यय किया गया है । ' व'दि ' के नाम की निरुक्ति जो पहले बताई थी, वह सम्पूर्ण पृथिवी के लाभार्थं बताई थी । अब यज्ञात्मक विष्णु के लाभ का स्थान ( अधिकरण ) ही वह होने से उसका ' व'दि ' शब्द से नामकरण किया गया है, यह बात ' व वात्र ' से बताई गई है । इस प्रकार देवों ने यज्ञ रूप विष्णु को प्राप्त किया । ७ २४ - - ' तमनु विद्योत्तरेण ' - - - ( श ० १/२/५1११ ) स व त्रि: पूर्व परिग्रह ' ( श ० १/२/५/१२ ) ' व ेदिका उत्तर परिग्रह करना चाहिये ' इस विधि की कल्पना इतिहास के आधार पर की जा रही है । उस विष्णु को पाकर देवों ने उत्तर परिग्रह से उसको स्वीकार किया । ' गायत्रेण त्वा छन्दसे ' इत्यादि के द्वारा किया जाने वाला प्राकृत पूर्व परिग्रह है । उसकी अपेक्षा से यह उत्तर है । ' सूक्ष्माचासि, शिवा चासि ' इस यजुर्मंन्त्र से व ेदि के दक्षिण की ओर ' स्फ्य ' से रेखाओं को करते हुए ग्रहण करे । यही उत्तर परिग्रह का स्वरूप है ।

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[ २४२ J २८-- मन्त्राभिप्रायमाह -- इमामेव तत् पृथिवीं संविद्य स्योनां सुषदामकुर्वन् atra शन योग्यां करोति । ' ऊर्जस्वती चासि पयस्वती चे ' ति मन्त्रेणोत्तरतस्तथैव । सोऽध्वर्युरमेन मन्त्रेणेमां पृथिवीं स्फ्येन लेखया गृह्णीयात् । २६- तदभिप्रायवाह श्रुतिः -- इमामेव पृथिवीं संविद्य मन्त्रेण स्पयेन लेखया परिगृह्य मकुर्वत । अर्क, शब्देन बलकरो रसो विवक्षितः -- पयस्वतीत्यस्य व्याख्यानम् रसवतीमुपजीवनीया-गौ उपजीव्यते । उपजीवनीयां करोतीति -- पयस्विनी हि ३० - पूर्वोत्तरयोः परिग्रहयोः संख्यां समुच्चित्य प्रशंसति -- स वं त्रिः पूर्व परिग्रह परिगृह्णाति षट्कृत्वः । षड्वा ऋतवः संवत्सरस्य -- षडृतुसमुदायात्मकं संवत्सरात्मकं यज्ञमेव त्रिरुत्तरं तत् पतिः । संवत्सरकालभरणेन जातत्वादभेदोपचारः । ' तमेतावन्तं कालमभिर्यावाद सम्पादयति-- सवत्सरात्मकः प्रजा-परस्तादसृजते ' ( बृ ० उ ० १२४ ) तिश्रुतेः । ' ओश्रावय ' ' अस्तु श्रौषट् ' ' यज ' ' ये संवत्सरः, तमेतावतः कालस्य क्षरसाध्यत्वात् ' एष व सप्तदशः प्रजापतिर्यज्ञमन्वायत्त ' ( तै ० सं ० २ / ६ / ११ यजामहे ' ' वषट् ' इति सप्तदशा-यावान् यत्परिमाणविशिष्टः अस्य यज्ञस्य मात्रा परिमाणं च यावत् तत्परिमाणविशिष्टमेव ) इति श्रुतेर्यज्ञश्च सप्तदशात्मकः यज्ञः परिगृह्णाति स्वीकरोतीत्यर्थः । तं यज्ञं षट्संख्यात्वसम्पादनेन ३१ - षड्भिर्व्याहृतिभिः पूर्वपरिग्रह परिगृह्णाति षड्भिरुत्तरं तद् द्वादशकृत्वो संवत्सरो यज्ञः प्रजापतिः । स यावानेव यज्ञो यावत्यस्य मात्रा तावन्तमेव तत् परिगृह्णाति द्वादश व मासाः संवत्सरस्य । ( ० १ २३ | ५ | १३ ) ३२ - पूर्वोत्तरपरिग्रह्णोर्मन्त्रावयवसंख्यामनूद्य समुच्चित्य प्रशंसति -- षड्भिर्व्याहृतिभिः षड्भिरुतरमिति । व्याह्रियन्ते इति व्याहृतयो मन्त्रावयवाः । ते च पूर्व परिग्रहे षट् गायत्रेण त्वा पूर्व ष्टुभेन परिग्रहं त्वा गृह्णाति जागतेन २७ -- मन्त्र के द्वारा इसी तात्पर्य को बताते हैं-- ' इमामेव तत् पृथिवी १७ संविद्य पश्चिम दिशा में ' स्पय ' से रेखा करते हुए परिग्रह करे । ' मन्त्र से व ेदि के २८ -- मन्त्र का अभिप्राय इस प्रकार है -- अध्वर्यु इस मन्त्र से उस पृथिवी को है । ' उर्जस्वती चासि पयस्वती च ' इस मन्त्र से व ेदि की उत्तर दिशा में पूर्वोक्त देवों के बैठने योग्य करता करते हुए परिग्रह करे । प्रकार से ही ' रूपय ' से रेखाकरण २६ -- उसी का अभिप्राय, श्रुति कह रही है -- मन्त्रोच्चारण करते हुए ' स्पय ' पृथिवी को रसवती और उपजीवनीय बनावे । ' अर्क ' शब्द से बलकारक रस विवक्षित से रेखाकरण के द्वारा इस की व्याख्या ' उपजीवनीयां करोति ' उपजीवनीय बनाता है, की गई है । लोक व्यवहार किया गया है । ' पयस्वती ' उपजीव्य कही जाती है । में भी पयस्विनी गाय ही ३० - पूर्व और उत्तर दोनों परिग्रहों की संख्या को सम्मिलित प्रशंशा की जा रही है --परिग्रह के द्वारा | अभिप्राय यह है कि षडृतुसमुदायात्मक संवत्सरस्वरूप यज्ञ ' सवं त्रिः पूर्वं पति कर रहा है । संवत्सर कॉल का भरण करने से उत्पन्न होने के कारण यह अभेदोपचार का ही सम्पादन संवत्सरात्मक प्रजा-रण्यकश्रुति ( बृ ० उ ० १ २ ४ ) ने भी इसका समर्थन किया है । ओश्रावय ', ' अस्तु श्रौषट् दिखाया गया है । वृहदा-' वषट् ' इन सप्तदश ( सत्रह ) अक्षरों से साध्य होने से तथा तैत्तिरीय श्रुति ( ० सं ० ', ' यज ', ' ये यजामहे ', को सप्तदशात्मक यज्ञ कहते हैं । जितना परिमाण इस यज्ञ का है, उसकी मात्रा का परिमाण १६ | ११ ) के बताने से भी ' यज्ञ ’ का होगा, इस प्रकार के उस यज्ञ की षट् संख्या का सम्पादन करके उसको स्वीकार किया जाता भी, उतनी ही परिमाण है । ३२ - पूर्वोत्तर परिग्रहों की मन्त्रावयव संख्या का अनुवाद कर दोनों की सम्मिलित ( श ० १ | २ | ५ | १३ ) इस ब्राह्मण के द्वारा की जा रही है । छह व्याहृतियों से पूर्व परिग्रह प्रशंसा का ग्रहण ' षडभिर्व्याहृति करता ० ' है और

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[ २४३ ] त्वेति त्वान्तास्त्रयः छन्दसा परिगृह्णाति गृह्णाम्यन्तास्त्रयः ' उत्तरपरिग्रहे च सुक्ष्मासीत्येवमस्यन्ताः षड् व्याहृतयः । तद् द्वादशकृत्वो द्वादशमासाः संवत्सरस्य भवन्ति । शेषं पूर्ववत् । त्रिवृद्धि ३३ – व्याम मात्री पश्चात् स्यादित्याहुः । एतावान् वै पुरुषः । पुरुषसम्मिता हि त्र्यरत्नि: प्राची यज्ञो नात्र मात्रास्ति यावतीमेव स्वयं मनसा मन्येन तावतीं कुर्यात् | ' ( श ० १ | २ | ५ | १४ ) गार्हपत्याहवनीययोर्मध्ये - व्याम-सा वेदिरायाश्रतो यजमानमात्री । सा च पश्चात् विस्तृत्या चतुररत्निः पुरस्तात् त्र्यरत्निः कार्येति विधत्ते यज्ञस्य मात्रीति । प्रसारितकरद्वयान्तराललक्षणा त्रिभिररत्निभिविस्तृता प्राग्भागे त्रिवृद्धि वेदि यज्ञः स्वयं । सवनत्रयादिरूपेण मनसा हविरासादनादि-त्रिवृत्त्वम् । अथवा नात्र वेद्यां परिमाणं नैवास्ति । यावती यत्परिमाणविशिष्टामेव कार्यपर्याप्तां मन्येत तत्परिमाणविशिष्टां वेदि कुर्यात् । तथैव कात्य यनोऽप्याह पक्षद्वयम् व्याममात्री वै योषा पश्चात् वृषाण त्र्यरत्नि VI प्राचीमपरिमितां वा । सा वै अभितोऽग्निम 25 ° सा उन्नयति । यो षा वै वेदिः, वृषाग्निः परिगृह्य शेते मिथुनमेवैतत् प्रजननं क्रियते तस्मादभितोऽग्निम सा उन्नयति । ( श ० १।२।५।१६ ) ३४ - वेद्यंसयोराहवनीयस्य स्पर्शं विधत्ते - अग्निमभित आहवनीयस्य दक्षिणोत्तरपार्श्वयोर्वेद्यंसौ परिष्वज्य शेते उन्नयति । अतो ऊर्ध्वं प्रापयति तदेतत्प्रशंसति योषा वै वेदिवृषाग्निरिति । लोके हि योषित् पुमांसमंसाभ्यां उन्नयति । सा वेदेरप्यंसाभ्यामग्नेः परिष्वङ्गो युक्त एवेतिभावः । मिथुनमेवैतत् प्रजननं क्रियते । तस्मादभितोऽग्निमंसा सा मध्ये वै पश्चात् वरीयसी स्यात् मध्ये स 25 ह्वारिता पुनः पुरस्तादुर्व्यवमिह योषां प्रशंसन्ति । पृथुश्रोणिविमृष्टान्तरां सङ ्मग्राह्या जुष्टामेवैनामेतदेव स्यः करोति । ' ( श ० १/२/५/१६ ) . छह व्याहृतियों से उत्तर परिग्रह का ग्रहण करता है । ' व्यवह्रियन्ते इति व्याहृतयः ' अर्थात् जो ( व्याहृतियों व्यवहृत होती ) की हैं संख्या उन्हें ' व्याहृति ' कहते हैं । एवञ्च ' व्याहृति ' का अर्थ है - - ' मन्त्रावयव ' । पूर्वं परिग्रह में मन्त्रावयवों । और छह है । ( १ ) गायत्रेण त्वा, ( २ ) त्रैष्टुभेन त्वा, ( ३ ) जागतेन त्वा, इस प्रकार से तीन तो परिग्रह ' त्वान्त में हुए ' सूक्ष्मासि ' ' छन्दसा परिगृह्णामि ' जैसे ' गृहणाम्यन्त ' तीन हुए, दोनों मिलकर छह होते हैं । तथा उत्तर ही एक सवत्सर इस प्रकार ' अस्यन्त ', छह व्याहृतियाँ हैं । इस प्रकार पूर्वोत्तर परिग्रह की मिलकर बारह व्याहृतियाँ ( वर्ष ) के बारह मास कहलाते हैं 1 । बाकी सब पूर्ववत् ही है । रहा है । ३३ –'व्याममात्री पश्चात् स्य त् ' ( श ० १ | २ | ५ | २४ ) यह ब्राह्मण व ेदि निर्माण के प्रकार को बता पश्चात् भाग गार्हपत्य और आहवनीय के मध्य मे उस व ेदि को आयाम ( लम्बाई ) में यजमान के परिमाण करना की चाहिये और | फैलाये हुए में चार रत्नी विस्तृत ( चौड़ी ) और पूर्व भाग में ( सामने ) तीन अरत्नि के परिमाण परिमाण की के समान तीन अरत्नि दो हाथों के मध्य भाग को ' व्याम ' कहते हैं । अर्थात् फैलाये हुए दो हाथों के बीच की त्रिवृत्ता तीन सवनों के रूप में की विस्तृत ( चौड़ी ) व दि, प्रग्भाग में बनानी चाहिये । यह यज्ञ त्रिवृत् है । यज्ञ नहीं बताया गया है । स्वयं ही अपने है । कतिपय ऋषियों का कहना है कि उक्त ब्राह्मण के द्वारा वैदि का परिमाण व ेदि का निर्माण करे । मन से हविरासादनादि कार्य के लिये पर्याप्त जितनी भूमि समझे उतने ही परिमाण से युक्त ५ | १५ ) इति । कात्यायन ने भी इसी तरह दो पक्षों को बताया है - - ' व्याममात्री पश्चात् त्र्यरत्नि - - ( श ० १ | २ | ३४ – ' अग्निमभित आहवनीयस्य ' - ( श ० १/२/५/१६ ) ब्राह्मण से व ेदि के दोनों अंस प्रदेशों में का आहवनीय उपपादन के स्पर्श का विधान किया जा रहा है । ' योषा व ' से लौकिक स्त्री की तरह सिद्धवत् कहे गये स्त्रीत्व बताया गया है । कर ' सा वा ' से उसकी प्रशंसा की गई है । ' व्याम मात्री पश्चात् ' से उस वेदि को विस्तीर्णतर और पूर्व भाग में ' यरत्न प्राची ' यह विधान होने से पश्चित भाग के अनन्तर रहने वाले बीच के भाग में संकुचित स्त्री ) में जोड़ दी गई । विस्तीर्ण बनाई जाती है । इस प्रकार से वेदि के स्वरूप को बताकर उसकी समानता योषित् ( न्यून है । ' विमृष्टान्तरां सा ' से पृथु श्रोणि वाली, विपुल नितम्ब वाली, और उसके दोनों अंसों का मध्य भाग अत्यन्त

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[ २४४ । ३५ - योषा वै इति सिद्धवदुक्तं स्त्रीत्व लौकिकस्त्रीत्वसामान्येनोपपाद्य प्रशंसति सा वा इति सा व वैदिः वरीयसी उरुतरा विस्तीर्णतरा उक्त व्याममात्री पश्चादिति । मध्ये प्रत्यग्भागानन्तरभाविनि मध्यदेशे संहारिता सङ्कुचिता पुरः पूर्वभागे उर्वी विस्तीर्णा त्र्यरत्नि प्राचीतिविधानात् । एवं वेदिस्वरूपमभिधाय तत्साम्यं स्त्रियां योजयति विमृष्टान्तरां सेति श्रोणितो विमृष्ट पृथुश्रोणिविपुलनितम्बा न्यूनमन्तरवकाशो ययोस्तौ विमृष्टान्तरौ तथा-विधा ' सौ यस्याः सा तथोक्ता मध्यदेशे हस्तेन सङग्रहीतुं शक्या कृशोदरी एवं प्रशस्तयोषिदाकारां व ेदिं कुर्वन् देव भ्यो प्रियां करोति । ३६ —– ' सा वै प्राक् प्रवणा स्यात् प्राची हि देवानां दिगथो उदक्प्रवणोदीची हि मनुष्याणां दिक् दक्षिणतः पुरीषं प्रत्युद्वहत्येषा वै दिक् पितृणा सा यद्दक्षिणप्रवणा स्यात् क्षिप्रेह यजमानोऽमुळे लोकमियात्तथो दृहन् यजमानो ज्योग्जीवति तस्माद् दक्षिणतः पुरीषं प्रत्युद्वहति पुरीषवतीं कुर्वीत पशवो वै पुरीषं पशुमतीमेवैनामेतत्कुरुते । ' ( श ० २१ २२५।१७ ) ३७ - अथ सा वेदिः प्राक् प्रवणा उदक् प्रवणा वा कार्येति विधत्ते -- प्राक् प्राच्यां दिशि प्रवणं निम्नं यस्याः सा तथोक्ता, प्राच्या दिशो देवसम्बन्धित्वं दिग्विभाजनसमये तस्या देव रात्मीयतया स्वीकारात् । ' देवमनुष्या दिशो व्यभजन्त । प्राचीं देवा: ' ( तै ० ६ | १ | १ | १ ) इति श्रुतिप्रसिद्धेः । अथो उदकप्रवणा वा कार्या, उदीच्या मनुष्यसम्बन्धः शान्तरूपत्वात् । ' एषा व देवमनुष्याणां शान्ता दिक् । ' ( तै ० ब्रा ० २।१।३५ ) ३८ – वेदेर्दक्षिणभागस्य पांसुभिरौन्नत्यकरणं विधीयते -- दक्षिणतः पुरीषं खातं पांसु प्रत्युद्हति प्रतिक्षिपति । विहितमर्थमुपपादयितुं विपक्षे बाधकमुपन्यस्यति -- एषा वै दक्षिणा दिक् पितृणां स्वभूता । तथा च सा वेदिर्यदि दक्षिण-प्रवणा स्यात् दक्षिणतो निम्ना स्यात् तदा तत्रावस्थितोदकवत् यजमानोऽपि दक्षिणतोऽवस्थित पितृलोकं क्षिप्रे क्षिप्र-मियात् प्राप्नुयात् । प्राचीनप्रवणायान्तु नैष दोषः । तथा सति स यजमानो ज्योक् चिरं जीव ेत् । तस्माद्दक्षिणतः पुरीषं प्रत्युद्वहति । खाता व दिर्नोऽद्भिः श्लक्ष्णी करणीया किन्तु पांसुलैवकार्येति विधत्ते पुरीषवतीं कुर्वीत । ( सूक्ष्म ) ऐसा होना चाहिये जैसे कृशोदरी स्त्री का मध्य भाग ( कमर ) हाथ के भीतर समा जाता है । इस प्रकार प्रशस्त स्त्री के आकार की वेदि का निर्माण करके उसे देवता के लिये प्रिय बना दे । ३६ – ' सा वै प्राक् प्रवणा स्यात् ' ( श ० १ | २ | ५ | १७ ) ' अथ सा वेदिः प्राक् प्रवणा उदक् प्रवणा वा कार्या ' ऐसा विधान होने से पूर्व दिशा की तरफ वेदि को प्रवण ( निम्न ) करनी चाहिये । प्राची दिशा ( पूर्व दिशा ) देवों से सम्बन्धित होती है, क्योंकि दिग्विभाजन के समय उसका देवों ने अपने लिये स्वीकार किया है । इसी बात को तैत्तिरीय श्रुति ने भी कहा है- ' देवमनुष्या दिशो व्यभजन्त । प्राचीं देवा: ' ( तै ० ६ । १.१1१ ), अथवा उत्तर दिशा की तरफ उसे निम्न ( प्रवण ) करनी चाहिये, क्योंकि शान्त रूप होने से उदीची ( उत्तर दिशा ) के साथ मनुष्यों का सम्बन्ध भी कहा है- ' एषा वै देवमनुष्याणां शान्ता दिक्— है । इसी बात को तैत्तिरीय श्रुति ने ( तै ० ब्रा ० २ १/३ ५ ) ३८ - वेदि के दक्षिण भाग को धूलि ( पांसु ) से उन्नत बनाने का विधान होने से वेदि के दक्षिण भाग में ( दक्षिण दिशा में ) वेदि से खोदी गई मिट्टी को डाल देना चाहिये । विहित अर्थ के उपपादनार्थ विपक्ष में बाधक का का उपन्यास किया गया है -- वह दक्षिण दिशा पितरों की अपनी है । तथा च वह वेदि यदि दक्षिण की ओर निम्न रहे, तो निम्न स्थल स्थित जल के समान, वहाँ अवस्थित यजमान भी दक्षिण दिशा में स्थित पितृ लोक में शीघ्र प्राप्त हो जायगा । किन्तु वेदि के प्राचीन प्रवण रहने पर यह दोष नहीं है । प्राचीन प्रवण रहने पर वह यजमान चिरजीवी होगा । इसलिये दक्षिण की ओर पुरीष को डालना चाहिये । खुदी हुई वेदि को जल से श्लक्ष्ण ( चीकनी ) नहीं करनी चाहिये, किन्तु पांसुल ( धूलि युक्त ) ही करनी चाहिये, यह ' पुरीषवतीं कुर्वीत ' से बताया गया है । ' पशवो

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[ २४५ ] तत्प्रशंसति -- पशवो वौं पुरीषं पशुप्राप्तिहेतुत्वात् पुरीषस्य पशुत्वम् पुरीषैः पांसुभिः व ेदि कुर्वन् पशुभिर्युक्तामेव नां कुरुते । ३८ – तथा च दित्रये गायत्र्यादिभिः पुरस्तादग्निना पूज्यदेव ेन च त्वामसुरेभ्यः पालयामि । मन्त्रैरेभिः स्र ुव े कुशेन रेखात्रयं कुर्यात् । ४० -- अध्यात्मपक्षेऽपि -- ध्यानभजनादिसाधनोपयुक्तां भूमि परिगृह्णीत हे भूमे गायत्रेण छन्दसा छन्दोरूप-तया भावितेन त्रवेण त्वां साधनानुष्ठानाय परिगृह्णामि स्वायत्तीकरोमीति दक्षिणतः त्रैष्टुभेन छन्दसा तद्रूपतया भावि-तेन परिगृह्णामि पश्चात् जागतेन छन्दसा तद्रूपतया भावितेन स्त्रवेण त्वा परिगृह्णामि । हे साधनभूमे! त्वं सुक्ष्मासि शोभनभूमिरूपासि । सैव भूमिः शोभना यत्र भगवदाराधनध्यानादिकं सम्यक् सम्पद्यते । शान्तिदायकत्वात् भूमेः शान्तत्वं स्योना सुखरूपा चासि भगवद्ध्यानानन्दजनकत्वात् स्योनशब्दस्य सुखनामसु पाठात् । सुषदां सम्यगुपवेशन-योग्याम् – यद्वा सुष्ठु सीदन्ति देवा अस्यामिति सुषदा ऊर्जस्वती निष्ठादाढर्य रूपबलप्रदा पयस्वती पयस् शब्दः क्षीरस्य रसहेतोर्जलस्य च वाचकः, तदुभययुक्तासि पयोवत् भगवन्माधुर्यानुभावयित्री रसहेतुजलवत्प्राणप्रदा च-I ' पुरा करस्य विसृपो विरप्शिन्नुदादाय पृथिवीं जीवदानुम् । यामेरयं-I चन्द्रमसि स्वधाभिस्तासु धीरासोऽनुदिश्य यजन्ते । प्रोक्षणीरासादय द्विषतो वधोऽसि ॥ वा ० सं ० १ । २८ ॥ वै पुरीषम् ' से उसको प्रशंसा की गई है । पशु प्राप्ति में हेतुभूत होने से पुरीष पर पशुत्व का आरोप किया गया है । मिट्टी ( पुरीष, पांसु ) से वेदि बनाने वाला मानो उसे पशुओं से ही युक्त करता है । ३६- तथाच तीनों दिशाओं में गायत्री आदि छन्दों के द्वारा पहले अग्नि और पूज्य देव से तेरा असुरों से पालन करता हूँ इन मन्त्रों से स्रुव और कुश के द्वारा तीन रेखा करे । ४० - अध्यात्म पक्ष में भी ध्यान, भजन आदि साधनों के उपयुक्त भूमि का स्वीकार करे । ' हे भूमे! गायत्र छन्द से अर्थात् छन्दोरूप में भावित किये गये स्रुव से साधनों के अनुष्ठानार्थं तुम्हारा स्वीकार करता हूँ, अर्थात् अपने अधीन कर रहा हूँ ' यह कह कर दक्षिण की ओर, त्रैष्टुभ छन्द के रूप में भावित किये गये स्रुव से तुम्हें अपने स्वाधीन करता हूँ ' कहकर पश्चिम की ओर, जागतच्छन्द के रूप में भावित किये गये स्रुव से तुम्हें अपने अधीन करता हूँ | हे साधन भूमे! तुम शोभन भूमि रूप हो । वही भूमि शोभन कहलाती है, जहाँ भगवान् की आराधना ध्यानादि का सम्यक्तया सम्पादन किया जा सकता है, शान्तिदायक होने से ही भूमि का शान्तत्व है, और भगवद्धयान का आनन्द देने वाली होने से तुम सुख स्वरूप हो, ' स्योन ' शब्द का सुखवाचक नामों में पाठ किया है । ' सुषदां ' - सम्यग् उपवेशन ( बैठने के योग्य हो, अथवा देवता जिस पर अच्छी प्रकार से बैठते हैं ऐसी तुम हो । तथा ' ऊर्जस्वती ' अर्थात् निष्ठा, दृढ़ता रूप बल को देने वाली हो, एवं ' पयस्वती ' अर्थात् पय की तरह भगवन्माधुर्य का अनुभव कराने वाली हो, और रस के हेतुभूत जल की तरह प्राणप्रदात्री हो । ' पयस् ' शब्द क्षीर और रसहेतुभूत जल का वाचक है । भाव यह है कि तुम उर्जस्वती और पयस्वती दोनों ही हो ।

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[ २४६ ] अर्थ - हे वेदत्रयी रूप शब्द करने वाले वेदि रूप विष्णो! पृथ्वी पर जब महान् युद्ध होने की सम्भावना हुई, तब उसका सारभूत भाग निकाल कर व ेद के सहित उस भाग को देवताओं ने चन्द्र में रख दिया । बुद्धिमान् लोग उसी भाग पर याग करते हैं । उसी सारभूत भाग को ' व ेदी ' कहते हैं । हे आग्नीध्र! तुम प्रोक्षणी जल को वेदी पर रखो । हे स्य! तुम शत्रुओं के हिंसक हो ॥ २८ ॥

| --१ - निदानवानयं मन्त्रः । निदानवताञ्च मन्त्राणां पूर्वं निदानं वक्तव्यं पश्चाद् व्याख्यानं कार्यम्, तथा सति सुखावगमो भवति मन्त्रः -- तदुच्यते । २ - कदाचिद् देवानामसुरैः सह सङ्ग्रामः प्रवृत्तस्तदा देवै मिथो विचारितं यदस्या भूमेरुत्कृष्ट ं देवयजनस्थलं तच्चन्द्र संस्थाप्य युद्धं कुर्मः । तत्र यद्यस्माकं पराजयः स्यात् तदा देवयजने यागं विधाय पुनर्देत्यपराजयं करिष्यामहे इति समन्त्र्य भूमेः सारभागं देवयजनं चन्द्र स्थापयामासुः । तदेव कृष्णवर्णमिदानीमपि दृश्यते । तदेवाख्यानं मन्त्र ब्रूते । ३ -- ' पुरा क्रूरस्येत्यनुमाष्टि ' ( का ० श्रो ० सू ० २२६ । ३३ ), पुरा क्रूरस्येति त्रिष्टुपचन्द्रदेवत्या विविधं रक्षति व ेदत्रयेण शब्दं करोतीति विरप्शी तत्सम्बुद्धी हे विरप्शिन् वदित्वं प्राप्तो यज्ञो विष्णुः सम्बोद्धयते शब्दं करोति --- -- यज्ञगताना- हे विष्णो मृत्विजामृगादिमन्त्राणां पठनात् यज्ञे तच्छब्दकरत्वोपचारः, व दैनिर्वर्त्यमानो विविधं रप्सति हे विरप्शिन् विष्णो परमेश्वर त्वं शृणु अनुगृहाणेतिशेषः । संग्रामो व क्रूरम् ' ( श ० १।२५।१६ ) इति श्रुतेः । क्रूरस्य विप इति षष्ठयो । विविधं सर्पन्ति योधा अस्मिन्निति विसृपस्तस्मात् विविधयोद्धृयुतात् क्रू रात् संग्रामात् पुरा पूर्व देवा जीवदानु जीव ' ददातीति जीवदानुस्तां जीवदानु जीवदात्री सारभूतां पृथिवीमुपादाय ऊध्व गृहीत्वा स्वधाभिवदैः सह चन्द्रमसि ऐरयन् निःक्षिप्तवन्तः स्वधाशब्दो यद्यप्यन्नवाचकस्तथाप्यत्र लक्षणया यज्ञादिक्रमेणान्न-भूतां त्रय बोधयति । ' यां चन्द्रमसि ब्राह्मणा दधुः ' ( ० १ २५ | १६ ) इति श्रुतेः । ब्रह्मणा वेदेन सार्धमित्यर्थः । १ - यह मन्त्र निदानवान् है । निदानवान् मन्त्रों का निदान पहले कहना चाहिये, पश्चात् उनका व्याख्यान करना चाहिये - वैसा करने पर मन्त्र सुखबोध्य होता है । उसी को बताते हैं-( युद्ध ) होने को था । तब देवताओं आपस में विचार २- एक समय असुरों के साथ देवों का संग्राम युद्ध में हमारी किया कि इस भूमि ( पृथ्वी ) के उत्कृष्टभूत ' देवयजन स्थल ' को चन्द्र के पास रखकर युद्ध करें आपस । यदि में मन्त्रणा करके पराजय भी हो जाय, तो देवयजन स्थल में याग करके पुनः दैत्यों को हरा देंगे । इस प्रकार भी दिखाई देता धूमि के देवयजन रूप सार भाग को चन्द्र में स्थापित कर दिया । वही कृष्ण वर्ण ( काला धब्बा ) अभी है । उसी आख्यान को मन्त्र बता रहा है । ३ – ' पुरा रस्येत्यनुमाष्टि ' - ( का ० श्री ० सू ० २२६ । ३३ ) । ' पुरा रस्य ' यह मन्त्र कह रहा है इति कि विरप्शी त्रिष्टुप्, और चन्द्र देवताओं से सम्बन्ध रखने वाली यह ऋक् तीन वेदों के द्वारा शब्द करती है । ' विविधं रप्शति ' के तत्सम्बुद्धौ हे बिरप्शिन्! वेदित्व को प्राप्त हुआ यज्ञ रूप विष्णु सम्बोधित किया जा रहा है । यज्ञगत के द्वारा ऋत्विजों निष्पन्न द्वारा ऋगादि मन्त्रों के पठन करने के कारण यज्ञ को उपचार से तच्छब्द कर कहा गया है । वेदों विविध रीति से या विविध प्रकार के शब्द करने वाले हे विष्णो! हे परमेश्वर! तुम सुन लो अर्थात् अनुग्रह करो, । ' संग्रामो वै क्रूरम् ' - ( श ० १२।५।१६ ) इस श्रुति ने भी यही बताया है । ' क्रूरस्य ' विसृप: ' ये दोनों षष्ठियाँ क्रूर पञ्चमी के अर्थ में हैं । ' विविधं सर्पन्ति योधा अस्मिन् इति विसृपः तस्मात् ' अर्थात् विविध योधाओंसे युक्त हुए संग्राम से पूर्व देवताओं ने जीवनदात्री ( जीवदानु ) सारभूत पृथ्वी को लेकर अर्थात् ऊपर ( ऊर्ध्व ) उठाकर यहाँ वेदों पर ( स्वधाओं ) के साथ चन्द्रमा में उसे स्थापित कर दिया । ' स्वधा ' शब्द यद्यपि अन्न का वाचक है, तथापि ब्राह्मणा लक्षणा से यज्ञादि क्रम के द्वारा अन्न की हेतुभूत वेदत्रयी का बोधन करता है । इसी भाव को ' यां चन्द्रमसि

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[ २४७ } धीरासः धीरा मेधाविनः तामु तामेव ( उ एवार्थकः ) चन्द्रस्थां पृथिवीमनुद्दिश्य सैव भूमिरस्यां समीकरणरूपं वेद्यां वर्तत मार्जनं इति कुर्यात् भाव- । यित्वा यजन्ते यागं कुर्वन्ति । अनेन मन्त्रेण खातायां वद्यां लोष्टकृतव षम्यनिवृत्तये । ' द्विषतो वध प्रोक्षणी रासादयेति अग्नीध्रं प्रति प्रेषः । प्रोक्ष्यन्त आभिरिति प्रोक्षण्य आपस्ता आसादय व द्यां स्थापय इति स्यमुदच प्रहरतीति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २/६/४२ ) । ४- - प्रेषार्थमुद्यतं वज्रमध्वर्युरुदगग्रमुत्करे क्षिपति । मन्त्रार्थस्तु – हे स्पय त्वं द्विषतः शत्रोधोऽसि हन्तासि ५— अत्र स्वामिदयानन्दः - ' हे रत्नादिपदार्थविरप्शिन् जगदीश्वर भवानेव यां स्वधाभिर्युक्तां जीवदानु जीवनदात्रीं पृथिवीमुदाराय चन्द्रमसि चन्द्रसमीपे स्थापयितवानस्ति तस्माद् धीरास्तामिमां पृथिवीं प्राप्य भवन्तमनु-दिश्यानुसृत्य नित्यं यजन्ते यथा चन्द्रमस्यानन्देन वर्तमाना धीरासः यां जीवदानुं पृथिवीमनुदिश्याश्रित्य पुरा सेनां प्रोक्षणी- शस्त्रा-दादाय विसृपः क्रूरस्य संग्रामस्य मध्ये शत्रून् जित्वा राज्यमैरयत् प्राप्नुवन्ति यथा चैवं कृत्वा धीरासः भवेत् श्वासादितवन्तस्तथैव हे विरप्शिन् त्वमपि उ इति वितर्के तां प्राप्येश्वरं यज प्रोक्षणीश्चासादय यथा च द्विषतो तथा कृत्वानन्दे नित्यं प्रवर्तस्व ' त्याह । ६ —तदपि यत्किञ्चित्, स्थापितवानसीति क्रियापदस्य मूलेऽभावात् । एवं विसृपः क्रूरस्य सङ्ग्रामस्य मध्ये शत्रून् जित्वा राज्यमैरयतेत्यपि निर्मूलं, मूले तादृशपदाभावात् । सेनाशस्त्रादि चर्चापि मन्त्रे नास्त्येव । प्रोक्षणी-रासादयेत्यपि अप्रकृतप्रक्रियैव । सिद्धान्ते तु श्रुतिसूत्रोक्त | रीत्या सङ्गतिः । दधुः ' ( ० १ २५/१६ ) इस श्रुति ने भी बताया है | ' ब्रह्मणा ' अर्थात् वेद के साथ - यह अर्थ किया गया है । धीर अर्थात् मेधावी लोग ' तामु ' अर्थात् ' तामेव ' उसी को ( ' उ ' शब्द, एष के अर्थ में है ) यानी जो चन्द्रस्थ पृथिवी है, वही पृथिवी ( भूमि ) इस व ेद में है, इस प्रकार की भावना करके वहाँ याग करते हैं । इस मन्त्र से खनन की हुई व दि में लोष्टकृत वैषम्य के निवृत्त्यर्थं समीकरण रूप मार्जन करना चाहिये । ' प्रोक्षणीरासादय ' इस प्रकार आग्नीध्र को प्रेष दिया जाता है । ' प्रोक्ष्यन्ते आभिः इति प्रोक्षण्यः ' अर्थात् जल, उस जल को ' आसादय ' यानि वेदि में स्थापित करो ( रखो ) । ' द्विषतो वध इति स्फ्यमुदचं प्रहरति इति ' ( का ० श्रो ० सू ० २२६।४२ ) ४ -- प्रेष देने के लिये उठाये हुए वज्र को अध्वर्यु, उत्कर में उदगग्र रख देता है । मन्त्रार्थ इस प्रकार है-हे स्पय! तुम शत्रुहन्ता हो । ५ - स्वामी दयानन्द इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार करते हैं -- ' हे रत्नादिपदार्थ विरप्शिन्! जगदीश्वर! अपने ही स्वधाओं से युक्त, जीवनदात्री जिस पृथिवी को चन्द्र के समीप स्थापित किया है, उस कारण धीर लोग उस पृथिवी को प्राप्त कर आपका अनुसरण करते हुए नित्य याग हैं, जैसे चन्द्रमा में आनन्द से विद्यमान रहने वाले धीर लोग जोवनदात्री जिस पृथिवी का आश्रय करके सेना और शस्त्रों की सहायता से क्रूर संग्राम के मध्य में शत्रुओं को जीतकर राज्य को प्राप्त करते हैं । और जिस प्रकार धैर्यशाली लोगों ने इस प्रकार से प्रोक्षणियों को पाया था उसी प्रकार से हे विरप्शिन्! तुम भी ( ' उ ' शब्द वितर्क अर्थ में है ) उसे प्राप्त करके ईश्वर की पूजा करो और प्रोक्षणियों को प्राप्त करो, और जिस प्रकार शत्रुओं का पराजय हो सके वैसा प्रयत्न करके नित्य आनन्द का अनुभव करो । ' ६ - किन्तु इस प्रकार अर्थ करना नितान्त सारहीन है । क्योंकि ' स्थापितवानस्ति ' यह क्रियापद, मूल में नहीं है । उसी प्रकार ' विसृपः क्रूरस्य सङ्ग्रामस्य मध्ये शत्रून् क्षित्वा राज्यमैरयत् ' यह कथन भी निर्मूल है, क्योंकि मूल में वैसे पद ही नहीं है । सेना, शस्त्र आदि की चर्चा भी मन्त्र में नहीं है । ' प्रोक्षणीरासादय ' यह कहना भी अप्रकृत प्रक्रिया ही है । किन्तु सिद्धान्त में श्रुति और सूत्र के अनुसार सङ्गति स्पष्ट है अतः सैद्धान्तिक अर्थ ही उचित है । दया-नन्दोक्त अर्थ असङ्गत है ।