वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 261–270
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 261–270
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[ २४८ ] ७ -- अत्र भावार्थत्वेन यदुक्तम् तेन - ' येनेश्वरेणान्तरिक्षे पृथिव्यास्तत्समीपे चन्द्रस्तत्समीपे पृथिव्योऽन्योन्यं समीपस्थानि नक्षत्राणि सर्वेषां मध्ये सूर्यलोका एतेषु विविधाः प्रजाश्च रचयित्वा स्थापिताः सर्व स्तत्रत्यं मनुष्यैः एवोपास्योऽस्ति । यावन्मनुष्या बलक्रियाभ्यां युक्ता भूत्वा शत्रून् न विजयन्ते नैव तावत्स्थिरं राज्यसुखं प्राप्नुवन्ति स नैव युद्धबलाभ्यां विना शत्रवो बिभ्यति, नैव विद्यान्यायविनयै विना यथावत् प्रजाः पालयितु ं शक्नुवन्ति कुतो जितेन्द्रियैर्भु ' त्व ' तत्समासाद्य सर्वेषां सुखं कर्तुं मनुलक्ष्य नित्यं प्रयतितव्यम् । ' तस्मात् सर्व-८- इति, तदपि न सङ्गतम्, दूरतोऽपि मन्त्राक्षरासम्बन्धात् । परमेश्वरेण चन्द्रसूर्यादयो रचयित्वा स्थापिता इत्यस्यार्थस्य बोधकानि कानिचिदपि पदानि प्रकृतमन्त्रे न सन्त्येव । तत्रत्यैर्मनुष्यः स एवोपासनीय इत्यस्याप्यर्थस्य बोधकं पदमत्र नास्ति । यथा कश्चित् क्वचिदेकं रजतताम्रादिखण्डमालोक्यात्रा मुकस्य राज्ञो राजधान्यासीत् चतस्रो भार्याः शतं पुत्रा आसन्नित्यादिकमिति वृत्तं कल्पयेत् तद्वदेव ' पृथिवीं यामैरयंश्चन्द्रमसी ' त्यादि पदानि तस्य परमेश्वरेण सूर्यादयो रचयित्वा परस्परसमीपे स्थापयिता इति, ' क्रूरस्य विसृप: ' इति पदे दृष्ट्वा सङ्ग्राम दृष्टवा ' यजन्ते ' इति दृष्ट्वा तदुपासना कर्त्तव्येति, ' प्रोक्षणी रासादये ' दिति दृष्ट्वा यज्ञेन्द्रियनिग्रहादि इति द्विषतोवध इति इति, दृष्ट्वा शत्रुविजयेन स्थिरं राज्यमित्यादिकल्पनम् कृतम् । नात्र कश्चन सम्बद्धो गम्भीरोऽर्थः । वस्तुतस्तु अध्याहार-व्यत्ययादिस्वातन्त्र्येणैवमेव तद्विरुद्धा अपि बह्यः कल्पनाः कतु शक्यन्ते । ऐरयन्निति बहुवचनस्य द्विषतोवधोऽसीति मध्यमपुरुषप्रयोगस्य च का गतिरिति नैव विचारितम् । ६- शतपथव्याख्यानस्य सङ्क ेतः प्रतिमन्त्रं क्रियते किन्तु तद्विरुद्धमेव व्याख्यायन्ते मन्त्रा इत्याश्चर्यमेव । ७- - यहाँ पर भावार्थ के रूप में जो कहा गया है, उससे - ' जिस ईश्वर ने अन्तरिक्ष में अर्थात् पृथिवी के समीप चन्द्र, उसके समीप पृथिवियाँ, परस्पर समीप रहने वाले नक्षत्र, सबके मध्य में अनेक सूर्यलोक, और उनमें विविध प्रजाओं को रचकर स्थापित किया, अतः वहाँ रहने वाले सभी मनुष्यों का वही उपास्य है । जब तक मनुष्य, बल और क्रियाशील होकर शत्रुओं को नहीं जीतते हैं, तब तक वे स्थिर राज्यसुख को प्राप्त ही नहीं कर पाते । क्योंकि युद्ध और बल के बिना शत्रु भयभीत नहीं हुआ करते, और न ही विद्या, न्याय, विनय के बिना प्रजा का पालन यथावत् कर पाते हैं, इस कारण सभी लोग जितेन्द्रिय होकर उपर्युक्त सभी बल, क्रिया, विद्या आदि साधनों को प्राप्त करें और सभी को सुखी बनाने के लिये प्रयत्न करें । ' ८- यह दयानन्दोक्त भावार्थ भी असङ्गत है, क्योंकि मन्त्राक्षरों से उसका कोई किसी प्रकार का सम्बन्ध ही नहीं है । ' परमेश्वर ने चन्द्र, सूर्य आदि की रचना करके उन्हें स्थापित किया । इस अर्थ का प्रतिपादन करने वाला एक भी शब्द, प्रकृत मन्त्र में नहीं है । ' वहाँ रहने वाले मनुष्य, उसी की उपासना करे ' इस अर्थ का भी कोई पद, इस मन्त्र में नहीं है । यह कथन तो उसी प्रकार की गप्प मारने के समान है. जैसे किसो ने कहीं पर एकाध चाँदी या ताँबे के टुकड़े को पाकर कल्पना कर ली कि यहाँ पर अमुक राजा की राजधानी थी, उसकी चार रानियाँ थी और सौ पुत्र थे । ठीक उसी तरह ' पृथिवीं यामैरयंश्चन्द्रमसी ' इत्यादि कुछ पदों को देखकर ' परमेश्वरेण सूर्यादयो रचयित्वा परस्परसमीपे स्थापिता इति, कल्पना कर लेना उसी तरह ' क्रूरस्य विसृप: ' इन दो पदों को देखकर ' संग्राम ' की कल्पना कर लेना - ' यजन्ते ' पद को देखकर ' तदुपासना कर्तव्या ' की कल्पना कर लेना, ' प्रोक्षणीरासादयेत् ' को देख कर ' यज्ञ, इन्द्रियनिग्रह आदि की कल्पना करना, ' द्विषतो वधः ' को देखकर ' शत्रु विजयेन स्थिरं राज्यम् ' इत्यादि कल्पना कर लेना आदि यह सब स्वामी दयानन्द जी की केवल कपोलकल्पना ही कही जायगी, क्योंकि न तो मन्त्राक्षरों से सम्बद्ध कोई है, और न उसमें कोई गम्भीरता ही है । वस्तुतस्तु अध्याहार, व्यत्यास आदि की स्वतन्त्रता से तो कितनी ही उसके विरुद्ध कल्पनाओं को भी किया जा सकता है । ' ऐरयन् ' इस बहुवचन की और ' द्विषतो वधोऽसि ' इस मध्यम पुरुष के प्रयोग की क्या गति होगी विचार नहीं किया । ६- शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या का संकेत तो प्रत्येक मन्त्र में किया गया है, किन्तु उसके विरुद्ध ही मन्त्रों
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[ २४६ ] निदानवतां मन्त्राणां पूर्व निदानं वक्तव्यं पश्चान्मन्त्रार्थस्तथा क्षिप्रावगमो भवतीत्युव्वाचार्याः । निदानविचारमन्तरैव दयानन्दीयं व्याख्यानमतएव विशृङ्खलम् । शतपथे च निदानमुक्तम् - तां प्रतिमाष्टि देवा ह वै सङ्ग्राम 28 ° सन्निधा-स्यन्तस्ते होचुर्हन्त यदस्यै पृथिव्या अनामृतं देवयजनं तच्चन्द्रमसि निदधाम है । यदि न इतोऽसुरा जयेयुस्तत एवाचंन्तः श्राम्यन्तः पुनरभिभवेमेति । स यदस्यै पृथिव्या अनामृतं देवयजनमासीत्तच्चन्द्रमसि न्यदधत । तदेतच्चन्द्रमसि कृष्णम् । तस्मादाहुश्चन्द्रमस्यस्यै पृथिव्यै देवयजनमित्यपि ह वा अस्यैतस्मिन् देवयजनं इष्टं भवति । तस्माद्वै प्रतिमाष्टि । ' ( श ० १/२/५/१८ ) पुरा क्रूरस्येति मन्त्रेण यद्वेदेर्मार्जनं विधत्ते तत्प्रशंसार्थमितिहासमाह - देवाहेति । पुरा खलु देवा असुरैः सह योत्स्यमाना एवमवोचन् किमिति - अस्याः पृथिव्या: सम्बन्धि अनामृतम् आसमन्तान्मृतं सर्वदा नश्वरमामृतं तद्विपरीतं सर्वदा बाधविधुरम् दृग्विधं यद्देवयजनम् देवयागाधिकरणं स्थानं तत् चन्द्रमसि चन्द्रमण्डलमध्ये निक्षिपामः स इति व्यत्ययेनैकवचनम् । तेऽसुरा यदि नोऽस्मान् इतोऽस्मात् स्थानात् जयेयुः तदा वयमेतत्स्थानं परित्यज्य तत एव चन्द्रमसि निहिते तस्मिन् स्थान एव पुनर्यज्ञं कुर्वाणा अर्चन्तः श्राम्यन्तस्तेन यज्ञेनासुरान् पुनरभिमवामेति ईदृग्विधोपाय ज्ञानजनित हर्षद्योतको हन्त शब्दः । एवं विचार्य तथैव तैः कृतमिति दर्शयति श्रुतिः सयदिति । व्यत्ययेन पुल्लिङ्गता तद्यदस्याः पृथिव्या: सम्बन्धि अनामृतं तच्चन्द्रमसि न दधत निहितवन्तः । तत् निहित देवयजनमिदानीं चन्द्रमसि कृष्णवर्णं सत् कलङ्कात्मतया दृश्यते । उक्तेऽर्थे लोकप्रसिद्धिमुदाहरति -- तस्मादाहुः यस्मादेव पृथिव्या अनामृत देवयजनं यच्चन्द्रमसि निःक्षिप्त तस्मादेव कारणादस्याः पृथिव्या: सम्बन्ध्युदीरितलक्षणं देवयजनं चन्द्रमसि विद्यत भज्ञः कथयन्ति । यदीदृग्विधं देवयजनम् एतस्मिन्नेव पुरा क्रूरस्येति मन्त्रेण प्रतिमार्जनं कुर्वतोऽस्य यजमानस्यापि यज्ञेनेष्ट भवति । व्याख्या की गई है, यह एक आश्चर्य ही है । ' निदान वाले मन्त्रों का पहले निदान बताना चाहिये, उसके पश्चात् मन्त्रार्थ करना चाहिये, ऐसा करने से ज्ञान शीघ्र होता है, इस प्रकार उव्वटाचार्य ने कहा है । किन्तु दयानन्द का व्याख्यान, निदान का विचार किये बिना ही हुआ है, अतएब वह विशृङ्खल है । शतपथ में निदान बताया गया है— ' तां प्रतिमाष्टि देवा ह वै ' - ( श ० प ० १२ ५ १८ ) । ' पुरा क्रूरस्य ' मन्त्र से जा मार्जन का विधान किया गया है, उसकी प्रशंसा करने के लिये इतिहास बता रहे हैं - ' देवा हेति ' । पहले किसी समय देवगण, असुरों के साथ जब युद्ध करने के लिये तैयार हुए, तब यह कहने लगे कि इस पृथिवी का जो अनामृत भाग है, अर्थात् – समस्त बाधाओं से रहित देवयजन ( देवयागाधिकरण ) स्थान है, उसे चन्द्र मण्डल में रख देंगे । ( आमृत - आसमन्तात् मृतं सर्वदा नश्वरं तद्विपरीतं अनामृतम्, सर्वदा बाधरहितम् ) ' सः ' यह व्यत्यय से एक वचन है । वे असुर यदि हमें इस स्थान पर जीत लेंगे, तो हम इस स्थान को छोड़कर चन्द्र मण्डल पर रखे हुए उस स्थान पर हो पुनः यज्ञ ( अर्चन ) करेंगे, और उस यज्ञ के द्वारा पुनः असुरों को पराजित करेंगे । ( यहाँ पर ' हन्त ' शब्द असुरों के पराभवार्थ उपाय ज्ञान से होने वाले हर्ष का सूचक है ) । इस प्रकार विचार करके उसी तरह उन्होंने किया इसे ' सपदिति ' श्रुति ने दिखाया है । ( यहाँ पर लिङ्ग व्यत्यय है । इस पृथिवी का जो अनामृत भाग है, उसे चन्द्र मण्डल में रख दिया गया है । चन्द्र मण्डल में रखा हुआ पृथिवी का जो भाग ( देवयजन ) है, वही चन्द्रमा में कृष्ण वर्ण कलङ्क के रूप में दिखाई देता है । इस उक्त अर्थ के समर्थन में लोकप्रसिद्धि को भी दिखा रहे हैं - इसीलिये कहते हैं कि जिस कारण से पृथिवी के इस प्रकार के देवयजन रूप अनामृत भाग को चन्द्रमा में रख छोड़ा है, उसी कारण विद्वान् लोग कहा करते हैं कि इस पृथिवी से सम्बन्धित जो देवयजन भाग है, वह चन्द्रमा में स्थित है । इस प्रकार का का वह देवयजन, यज्ञानुष्ठान के समय ' पुरा रस्य ' मन्त्र से प्रति मार्जन करने वाले यजमान का अभीष्ट भी यज्ञ के द्वारा सिद्ध कर देता है ।
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[ २५० ] १० - स प्रतिमाष्टि पुरा क्रूरस्य विसृपो विरप्शिन्निति सङ्ग्रामो वै क्रूर १७ ° सङ्ग्रामे क्रूरं क्रियते हतः पुरुषो हतोऽश्वः शेते पुराह्य तत्सङ ग्रामान्न्यदधत् तस्मादाह पुरा क्रूरस्य विसृपो विरप्शिन्नित्युदादाय पृथिवीं जीवदानु-मित्युदादाय हि यदस्यै पृथिव्यै जीवमसिस्तच्चन्द्रमसि न्यदधत् तस्मादाहोदादाय पृथिवीं जीवदानुमिति यामैरयंश्चन्द्र-मसि ब्रह्मणा दधुरित्येवैतदाह तामुधीरासोऽनुदिश्य यजन्त इत्येतेनोह तामनुदिश्य यजन्ते ह वा अस्यै तस्मिन् देवयजनं इष्ट भवति य एवमेतद्वेद | ( ० १ २/५/१६ ) ११ – विहित प्रतिमार्जनमनूद्य मन्त्रं विधत्ते स इति । पुरा क्रूरस्येतिमन्त्रगत रशब्दस्यार्थं माह सङ्ग्रामो वै क्रूरमिति । कथं सङ्ग्रामस्य क्रूरशब्दवाच्यतेत्याशङ्कयोपपादयति — सङ्ग्रामे हि क्रूरं कर्म क्रियते हतः पुरुषो हतोश्वः शेते । पुरुषोदश्चतुरङ्गबलस्य तत्र हननलक्षणक्रूरकर्मकरणात् तदधिकरणभूतः सङग्रामोऽपि क्रूरशब्देन प्रतिपाद्यत इत्यर्थः । क्रूरस्य सङ्ग्रामस्य विसृपः विसर्पणादागमनात् पुरा इति मन्त्रवाक्याथं इत्यभिप्रायः । १२ - मन्त्रस्य द्वितीयं भागमनूद्य जीवदानुपदस्य विवक्षितमर्थं दर्शयन् व्याचष्टे - उदादायेति, अस्याः पृथिव्याः जीवं जीवनरूपं जीवात्मभूतं यदनामृत देवयजनमासीत् तथा च जीवदानु जीवनप्रदां जीवभूतां पृथिवीमितिमन्त्रपदा-भिप्राय वर्णितो भवति । वैयाकरणास्तु जीवेस्तदानुः इति जीवदानु पदं व्युत्पादयन्ति । तथैव तत्तिरीयकैराना-तम् -- ' अभिन्नो धर्मो जीरदानुः ' इत्यादि ( तै ० सं ० १ ५ १० ) जीरं जीवनं पुरोडाशद्वारेण यज्ञस्य ददातीति तत्र सायणाचार्यः । १३ – मन्त्रस्य भागान्तरमनूद्य व्याचष्टे -- यामिति एतेनेदानीन्तनेन देवयजनेन तां चन्द्रमस्यवस्थितामना-मृतां पृथिवीमनुदिश्य तदेवेदमिति तादात्म्येनानुसन्धाय यजन्ते । तद्वेदनं प्रशंसति -- अपि ह वा अस्यैव वेदिन एतस्मिन् देवयजन इष्टं भवति । १४ – अत्र सायणः काण्वभाष्ये – ' कदाचित्किल देवानामसुरैः सह सङ्ग्रामः प्राप्तः । तत्र ब्रह्मादयो देवा १० - स प्रतिमाष्ट पुरा रस्य विसृप - ( ० १२५६ ) यह ब्राह्मण, प्रतिमार्जन का अनुवाद करके मन्त्र का विधान कर रहा है । ' पुरा रस्य ' ' इस मन्त्र में आये हुए ' क्रूर ' शब्द के अर्थ को ' सङग्रोमो वै क्रूरम् ' से बता रहे हैं । ' संग्राम ' को ' क्रूर ' शब्द से क्यों कहा जाता है? इस प्रकार आशङ्का करके उपपादन कर रहे हैं- -क्योंकि संग्राम में क्रूर कर्म किया जाता है । उसमें चतुरङ्ग सेना का हनन लक्षण क्रूर कर्म किया जाता है, उस कारण तदधिकरणभूत संग्राम को भी ' क्रूर ' शब्द से कहा जाता है । ( पुरा क्रूरस्य विसृपः का अर्थ है कि संग्राम के उपस्थित पूर्व ) । १२- अब मन्त्र के द्वितीय भाग का अनुवाद करके ' जीवदानु ' पद के विवक्षित अर्थ को बताते हुए ' उदादाय ' इत्यादि से व्याख्या की जा रही है । इस पृथिवी का जीवन रूप जो अनामृत देवयजन था तथा च ' जीवदानु ' का अर्थ ' जीवन प्रद जीवभूत पृथिवी को यह अभिप्राय मन्त्रगत जीवदानु पद का बताया गया है । वैयाकरण विद्वान् ' जीवेरदानुक् ' सूत्र से जीवदानु पद का व्युत्पादन करते हैं । उसी तरह तैत्तिरीयकों ने भी कहा है – ' अभिन्नो धर्मो जीरदानु ' इत्यादि -- ( तै ० सं ० १५1१० ) इस पर सायणाचार्य कहते हैं कि पुरोडाश के द्वारा यज्ञ को जीवन ( जीर ) देती है, इसलिये उसे जोरदानु कहा गया है । १३ - मन्त्र के भागान्तर का अनुवाद कर ' यामि'ति से व्याख्या करते हैं इस समय ( यागानुष्ठान कालीन ) देवयजन के साथ चन्द्रमण्डल में अवस्थित अनामृत पृथिवी का तादात्म्यानुसन्धान करके यज्ञ करते हैं । उस तादात्म्या-नुसन्धान की ' अपि ह वा ' से प्रशंसा की गई है । १४ - इस प्रसङ्ग पर काण्व भाष्य में सायण कह रहे हैं - ' किसी समय देवों का असुरों के साथ संग्राम होने
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[ २५१ ] इत्थं सम्मन्त्र्येदं चक्र: देवासुरसङ्ग्रामे सति तेषां रुधिरादिभिरियं भूषिता देवयजनानर्हा भविष्यति अतोभुव: सूक्ष्मरूपं सारभूतमादाय चन्द्रमण्डले स्थापयिष्यामः । तदेव मध्यन्दिनवत् कण्त्रोऽपि दर्शयामास - देवा ह वै असुरैः ग्रामं सन्निधास्यत इत्यादिना-१५ – तथा च मन्त्रार्थ: - विसृपः क्रूरस्येति षष्ठ्यौ पञ्चम्यर्थे । विविधं सर्पन्ति योधा अस्मिन्निति विसृप् सङ्ग्राम:। क्रूरात्सङ् ग्रामात्पूर्वं तदुक्तं पुरा सङग्रामादित्येवैतदाहेति विरप्शिन्निति महतः परमेश्वरस्य सम्बोधनं महन्नाम सुपाठात् जीवदानुं जीवस्यदात्रीं यां पृथिवीमुदादाय जीवात्मभूतामत्यन्तसारभूतां पृथिवीं संक्षिप्त्यादाय चन्द्रमस्यैरयन् चन्द्रमण्डले देवाः प्रक्षिप्तवन्तः । केन साधनेन प्रक्षिप्तवन्त इति तदुच्यते स्वधाभिरिति । यद्यपि स्वधा-शब्दोऽन्ननामसु पठितस्तथापि तेन शब्देन तत्साधनभूतां वेदत्रयगता मन्त्रविद्येोच्यते ' ब्रह्मणा दधु रिति मध्यन्दिन श्रुतेः । अर्थात् पृथिव्याः सारांशस्य चन्द्रमण्डले यत्स्थापनं तद्वेदत्रयरूपेण साधनेनैव । १६ ६ - यद्वा ' अस्या जीवममन्यन्त तच्चन्द्रमसि न्यदधत यामैरयंश्चन्द्रमसि स्वधाभिरिति या मधुश्चन्द्रमसि ब्रह्मणेत्येवैतदाहेति काण्वश्रुतेः । चन्द्रमण्डले मृगरूपः कृष्णवर्णो यः कलङ्को दृश्यते सोऽयं भूमेः सारांश: पुरा द्यावा पृथिव्यौ सहैवास्थिते सत्यौ यदा परस्परं वियुज्येते स्म तदानीमन्योन्यसरांशं यज्ञयोग्यमन्योऽन्यस्वरूपेण स्थापितवत्यौ तत्र भूमेः सारांशश्चन्द्रमसि दृश्यमानः कृष्णरूपमित्येव तित्तिरिराह - द्यावापृथिवोसहास्यां ते वियती अब्रू तां अस्येषनो स यज्ञियमिति । यदमुष्यायज्ञियमासीत् तस्यामदधात् तदुषा अभवत् यदस्या यज्ञियमासीत्तदमुष्यामदधात् ततश्चन्द्र-मसि कृष्णमिति ( तै ० ब्रा ० १।१।३।२ ) तैत्तिरीय ब्राह्मणश्रुतेः । यदमुष्यादिवो यज्ञयमासीत्तत्तस्यां पृथिव्यामदधात् । ` तदुषा अभवत् । यदस्याः पृथिव्या यज्ञियं रूपमासीत् तदमुष्यां दिवि अदधात् । ततश्वन्द्रमसि कृष्ण धोरासो धीरा बुद्धिमन्सो यजमानास्तां चन्द्रमःस्थितां कृष्णवर्णां भूमिमुद्दिश्य वेद्यामस्यां विद्यत इति कथयित्वा तादात्म्येनानुसन्धाय वा को था । उस समय ब्रह्मादि देवगणों ने इस प्रकार मन्त्रणा ( सलाह ) कर यह तय किया कि देवासुर संग्राम होने पर उनके रुधिरादि से यह पृथिवी दूषित हो जायगी, जिससे वह यज्ञ के योग्य नहीं रहेगी । अतः पृथिवी के सूक्ष्म ( सारभूत ) भाग को चन्द्र मण्डल में रख देंगे । इसी भाव को मध्यन्दिन के समान कण्व ने भी ' देवा ह वै ' से प्रदर्शित किया है । १५ — तथा च मन्त्र का अर्थ इस प्रकार हुआ । ' विसृप: ' और ' क्रूरस्य की षष्ठी विभक्तियाँ, पश्चमी के अर्थ में हैं । ' विविधं सर्पन्ति योधा अस्मिन्निति ' विसृप् ' = सङ्ग्रामः । विरप्शम् ' यह परमेश्वर का सम्बोधन है । जीवन दात्री अत्यन्त सारभूत पृथ्वी को उठाकर चन्द्रमण्डल में स्थापित कर दिया । किस उपाय ( साधन ) से स्थापित किया? ऐसी जिज्ञासा करने पर कहा कि ' स्वधा ' के द्वारा । यद्यपि ' स्वधा ' शब्द का पाठ अन्न के नामों में किया गया है । तथापि उस शब्द से तत्साधनभूता वेदत्रयगता मन्त्र विद्या बताई गई है । यह बात मध्यन्दिन श्रुति ' ब्रह्मणा दधुः ' से कही गई है । अर्थात् पृथिवी के सारभूत अंश का चन्द्र मण्डल में जो स्थापन है, वह वेद त्रय रूप साधन के द्वारा ही 1. किया गया है । १६ – अथवा ' अस्या जीवममन्यन्त इस काण्व श्रुति ने भी यही बताया है । चन्द्र मण्डल में मृग रूप कृष्ण वर्ण जो कलङ्क दिखाई देता है, वह पृथ्वी का सारभूत भाग ही है । पहले किसी समय द्यावा पृथिवी एक साथ ही रहती थीं, जब वे परस्पर वियुक्त हुई, तब एक दूसरे के सारभूत यज्ञयोग्य अंश को एक दूसरे के स्वरूप में स्थापित किया गया । उनमें से चन्द्र में दिखाई देने वाला भूमि का सारभूत अंश कृष्ण रूप है । इसी को तित्तिरि ने बताया है-' द्यावापृथिवी सहास्यां ' ( तै ० ब्रा ० ) । लोक का जो यज्ञिय भाग था, उसे पृथिवी में रख दिया । वही उषा के रूप में परिणत हो गया । अर्थात् उसे ' उषा ' कहने लगे । और जो इस पृथिवी का यज्ञिय रूप था, उसे द्यु लोक में स्थापित कर दिया । तब बुद्धिमान् यजमानों ने चन्द्रमा में स्थित कृष्णवर्ण भूमि को इस वेदि में मानकर उसका तादात्म्यानुसन्धान करके यज्ञ करना प्रारम्भ किया । ' पुरा क्रूरेण ' इस मन्त्र से खोदी हुई इस भूमि के लोष्टकृत
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[ २५२ ] यजन्ते यज्ञं कुर्वन्ति पुरा क्रूरेणेतिमन्त्रेण खातायां वेद्यामस्यां लोष्टकृतवैषम्य परिहाराय समीकरणरूपं मार्जनं कुर्यात् । हे विरप्शिन् हे परमेश्वरेति सम्बोधनस्य अनुगृहाणेति पदमध्याहृत्यान्वयः कार्यः । १७ –'अथाह प्रोक्षणीरासादयेति । वज्रो वै स्पयो ब्रह्मणश्चेममं पुरा यज्ञमभ्यजुगुपतां वत्रो वा आपस्तद्-वज्रमेवैतदभिगुप्त्या आसादयति । स वा उपर्युपर्येव प्रोक्षणीषु धार्यमाणास्वथ स्फ्यमुद्यच्छति - अथ यन्निहित एव स्फ्ये प्रोक्षणी रासादयेत् वज्री ह समृच्छेयातां तथोह वज्रौन समुद्यच्छेते तस्मादुपर्युपर्येव प्रोक्षणीषु धार्यमाणास्वथ स्पय-मुद्यच्छति । ( श ० १।२५ २० ) वेदिकरणानन्तरं कर्त्तव्यं विधत्ते - प्रोक्षणांरासादयेत्यादिक प्रैषं ब्रूयादित्यर्थः । प्राक्षत्यभिरिति प्रोक्षण्य आपः । तासामासादनं यज्ञरक्षार्थमिति व्याचष्टे वज्ञो वै स्पय इति । स्फ्यस्तावद् वज्रः तदश-परिणामरूपत्वात् । तस्य स्पयस्तृतीयं वा यावद्वा इति पूर्वमाम्नातत्वात् । ब्राह्मणोऽपि वज्ररूपः तद्वन्मन्त्रसामर्थ्येन हन्तृत्वात् । तौ खलु पुरेमं यज्ञं अभ्यजुगुफ्ताम् अभितोऽरक्षिष्टाम् । गुपू रक्षणे ' भ्वादि:, इत्यस्माल्लुङि ' गुपेश्छन्दसि ' ( पा ० सू ० ३।१।५० ) चङि रूपम् | ' आयादय आर्धधातुके वा ' ( पा ० सू ० ३ | ३ | ३१ ) इत्याय प्रत्ययो विकल्प्यते । वो वा आप इत्यपामपि वज्रत्वं पूर्वमुक्तम् वज्ररूपाणां तासामासादनं यज्ञस्याभितो रक्षार्थं सम्पद्यते । प्रोक्षणीनामा-सादनसमये आग्नीध्रकर्तृकं स्फ्योद्यमनं विधत्ते - स वा उपर्युपरि समीपे उपरिदेशे आसाद्यमानासु प्रोक्षणीषु धार्यमाणा-सु सतीषु अथानन्तरमासादन समकालमेवाग्नीध्रः स्वयमुद्यच्छति धारयति । उपबंध्यसः सामीप्ये ' ( पा ० सू ० ८ | १ | ७ ) इतिसूत्रेणोपरि शब्दस्य द्विर्वचनम् । उपर्युपरि समीप उपरिदेश इत्यर्थः । १६ - विपक्षे बाधकमाह - अथा यन्निहित एव - स्फ्य प्रोक्षणीरासादयेत् वज्री समृच्छेयाताम् उद्यमनमकृत्वा पूर्व वेदमध्ये निहितस्य स्पयस्योपरिसादने स्फ्याब्लक्षणो वज्रौ सङ्गतौ भवेताम् । तथा च वज्रद्वयसङ्गमाद् यजमानस्य वाधः स्यात् स्वपक्षे तद्दोषाभाव दर्शयति तथोहेति । तथा च स्पयस्य वेदेः सकाशादुद्यमने सति वज्रो न समृच्छेते तस्मात् वैषम्य का परिहार करने के लिये समीकरण रूप मार्जन किया जाता है । हे विरप्शिन् ' इस सम्बोधन पद का अन्वय ' अनुगृहाण ' इस अध्याहृत पद से किया जाता है । १७ – ' अथाह प्रोक्षणीरासादयेति । वज्रो वै स्पयो ' - ( श ० १।२५।२० ) यह ब्राह्मण वेदिकरण के पश्चात् कालीन कर्तव्य का विधान कर रहा है । अर्थात् ' प्रोक्षणीरासादय ' इत्यादि प्रेष को बोले । उसकी व्याख्या करते हुए बता रहे हैं कि ' प्रोक्षति आभिः इति प्रोक्षण्यः आपः ' जिनसे प्रोक्षण किया जाता है, उन्हें ' प्रोक्षणी ' यानी जल कहते हैं, उनका स्थापन, यज्ञ की रक्षा के लिये किया जाता है । ' स्पय ' वज्र स्वरूप है । क्योंकि वह, वज्र के अंश का ही परिणाम है । और तस्य स्पयस्तृतीयं वा यावद् वा ( का ० १, प्र ० २. ब्रा ० २, कं ० १ ) से भी यही पहले कहा जा चुका है । उसी तरह मन्त्र सामर्थ्य से हनन करने का सामर्थ्य होने से ब्राह्मण भी वज्र स्वरूप है । इन दोनों ने पहले किसी समय इस यज्ञ की सब तरह से रक्षा की थी । ( अजुगुपताम् शब्द की सिद्धि ' गुप्पू रक्षणे ' इस स्वादिगणीय धातु सेलुङ, लकार में ' गुपेश्छन्दसि ' - ( पा ० सू ० ३ | १ | ५० ) से ' चङ ' करने पर होती है । ' आयादय आर्धधातुके वा'- -( पा ० सू ० ३ | १1३१ ) से ' आय ' प्रत्यय वैकल्पिक होता है । ' वत्रो वा आपः ' कहकर जल को भी वज्र पहले ( कां ० १, प्र ० १, ब्रा ० १, कं ० १७ ) कह चुके हैं । वज्र रूप उन जलों का आसादन ( स्थापन ) यज्ञ की सब प्रकार से रक्षा करने के लिये ही है । प्रोक्षणी के आसादन के समय ही आग्नीध्र कर्तृक स्पय के उद्यमन का विधान ' सवा ' के द्वारा किया जा रहा है । आग्नीध्र के द्वारा समीप में ही ऊपर की ओर प्रोक्षणी के स्थापन करने पर अनन्तर ही अर्थात् आसादन सम काल में ही आग्नीध्र स्पय को उठाता है । ' उपर्यध्यधसः सामीप्ये ' - ( पा ० सू ० ८ | १/७ ) सूत्र से ' उपरि ' शब्द को दो बार कहा गया है । ( उपरि- उपरि का अर्थ है समीपे उपरिदेशे ) । १८ - विपक्ष में बाधक बताते हैं । स्पय को बिना उठाये पहले से ही वेदि में रखे हुए स्फ्य के ऊपर आसादन ( स्थापन ) करने पर स्पय और अप ( जल ) ये दोनों वज्र परस्पर मिलते हैं । तथा च दो वज्रों के परस्पर मिलने से यजमान का बाध हो सकता है । किन्तु स्वपक्ष में यह उक्त दोष नहीं है । तथा च स्पय को वेदि में से उठा लेने पर,
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[ २५३ ] प्रोक्षणीषु धार्यमाणासु स्फ्यमुद्यच्छति तां वाचं वदति प्रोक्षणीरासादयेध्मं बहिरूपसादय स्रुचः सम्मृदि पत्नीं सन्ना-ज्येन देहीति सम्प्रेष एवं ष स यदि कामयेत ब्रूयादेतद्यद्युकामयेतापि नाद्रियेत स्वयमुळे व तद्वेदेदमतः कर्मं कर्त्तव्यमिति । ' ( श ०१।२।५।२१ ) १६ - प्रतीकग्रहणेन विहितसम्प्र ेष मन्त्रं साकल्येनानुवदति अथैतामिति हे आग्नीध्र प्रोक्षणार्था अप आसादय — अग्निसमिन्धनार्थ मिध्मम् वेदिस्तरणार्थं बहिः आहवनीयसमीप आसादय जुह्वाद्याः स्रुचः सम्मार्जनसंस्कारेण संस्कुरु । यजमानस्य या पत्नी तां योक्त्रेण सन्नह्य यत्प्रागग्नावधिश्रितमाज्यं तेन उदेहि आगच्छेति सम्प्रषमन्त्रार्थः । एवमेष मन्त्रः परप्रत्यायनाय प्रयुक्तत्वात् सम्प्र्ष एव न तु मन्त्रान्तरवददृष्ट कप्रयोजन इत्याह सम्प्रष इति । यदीत्यादि प्रोक्षण्यासादनादिकं यदि कामयेत तदा एतत् सम्प्रषवाक्यम् ब्रूयात् । यदि तथा न कामयेत तदा एतन्नाद्रियेतापि । तत्रोपपत्तिमाह – स्वयमेवेति । अतोऽस्मात्कर्मणोऽनन्तरमिदं कर्म कर्त्तव्यं स्वयमेवैतद्वेद तस्मात् परं प्रत्यज्ञातज्ञापनार्थः सम्प्रषो निरर्थक इत्यर्थः । २०- अथोदञ्च ं स्फ्यं प्रहरति- अमुष्ये त्वा वज्र ' प्रहरामीति यद्यभिचरेत् वज्रो वै स्फ्यस्तृणुते हैवैवैनेन । ' ( श ० १।२।५।२२ ) २१ - द्विषतो वध इति मन्त्रेण स्पयस्य बहिर्वेदि उदङ् निरसनं विधत्ते यद्यभिचरेत् चतुर्थ्यन्तं शत्रोर्नाम निर्दिशेत् । वज्रो वै स्पयः स्तृणुते ह्ये वन शत्रु मन्त्रार्थस्तु -- हे स्फ्य द्विषतः शत्रोर्वधोऽसि हिंसकोऽसि यं द्वेष्यं प्रहरामित्येवं प्रहरणकाले मनसा भावयेत् । २२ -- स येहा ईजिरे तेहस्मावमर्श यजन्ते ते पापीया 25 स आसुरथ येनेजिरे ते श्रेया १७ ° स आसुस्तः दोनों वज्रों का परस्पर सम्मिलन नहीं हो पाता । इस लिये प्रोक्षणी के आसादन सम काल में ही स्पय को उठा लिया जाता है । ' तां वाचं वदति ' ( ० १ २ । ५ । २१ ) १६ - प्रतीक ग्रहण के द्वारा विहित सम्प्रेष मन्त्र का सम्पूर्णतया अनुवाद करते हैं - हे आग्नीध्र! प्रोक्षणार्थ जल का आसादन करो, अग्नि को प्रज्वलित करने लिये इध्म को, वेद में आस्तरण के लिये बहि को, आहवनीय के समीप रखो । जुह्वादित्र गादि पात्रों का सम्मार्जन संस्कार से संस्कार ( शोधन ) करो । यजमान पत्नी को मेखला ( योक्त्र ) पहना कर, प्रागग्नि ( आहवनीयाग्नि ) पर अधिश्रित आज्य को लेकर आओ । यह सम्प्रष मन्त्र का अर्थ है । इस प्रकार यह मन्त्र पर प्रत्यायन ( दूसरे व्यक्ति को बताने के लिये ) के लिये प्रयुक्त किया होने से सम्प्रेष मन्त्र ही है, अन्य मन्त्रों की तरह इसका अदृष्ट मात्र प्रयोजन नहीं है । प्रोक्षणी का आसादनादि कार्य यदि आग्नीध्र के द्वारा कराने की इच्छा हो तो इस सम्प्रष वाक्य को बोले, और यदि स्वयं ही उस कार्य को करने की इच्छा हो तो इस मन्त्र को न बोले । क्योंकि अमुक कर्म के अनन्तर अमुक कर्म करने का ज्ञान तो स्वयं को है ही, तब दूसरे के प्रति अज्ञातज्ञापनार्थ प्रयुक्त किया हुआ सम्प्रष निरर्थक ही होगा । २०- ' अथोदञ्च ' स्पयं प्रहरति / - ( श ० १/२/५/२२ ) इसके द्वारा ' द्विषतो वध ' इस मन्त्र से वेदि के बाहर फ्य का उदङ निरसन ( उत्तर की ओर त्याग ) बताया जा रहा है, यदि अभिचार करना हो तो शत्रु के नाम को चतुर्थी विभक्ति लगाकर निर्दिष्ट करे । स्पय, प्रत्यक्ष वज्र है, वह उस शत्रु को नष्ट कर देता है । मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है - हे स्पय! तुम द्वेष्टा शत्रु के घातक ( हिंसक ) हो, प्रहरण करते समय अपने मन में ' अपने द्वेष्य शत्रु पर प्रहार कर रहा हूँ - — ऐसी भावना करनी चाहिये । २२ -- ' स येहाग्र ईजिरे तेह स्मा वमर्श यजन्ते ' ( श ० १ | २ | ५ | २४ ) इस ब्राह्मण के द्वारा, शृत ( परिपक्व हुए ) हवियों का याग करने से पूर्व और निर्माण की हुई वेदि में बहिस्तरण के पूर्व स्पर्श का निषेध करने का विधान
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[ २५४ ] तोऽश्रद्धामनुष्यान् विवेद ये यजन्ते पापीया 25 सस्ते भवन्ति य उ न यजन्ते श्रेया १७ सस्ते भवन्तीति ततइतो देवान् हविर्न जगामेतः प्रदानाद्धि देवा उपजीवन्ति । ' ( श ० १ । २ । ५ । २४ ) २३ - मृतानां हविषां यागात्प्राङ निर्मिताया वेदेश्च बहिस्तरणात् पूर्वं स्पर्श निषेधं विधित्सुस्तत्सिद्ध्यर्थं मिति-हासमाचष्टे -- पूर्ववद्बहुवचनस्थाने स इत्येकवचनम् । ये प्रसिद्धा यजमाना अग्रेपुरा ईजिरे इष्टवन्तः ते खलु यागसमये तानि हवींषि क्लृप्तां वेदि च अवमर्श अवमृश्य यजन्तेस्म । ते च तेनावमर्शजनितेन दोषेण पापीयांसो निकृष्टा बभूवुः । यागमकुर्वाणास्तु अवमर्शजनितदोषविरहात् श्रेष्ठा एव बभूवुः । ततोऽनन्तरमेवावमर्शनस्य दोषहेतुत्वमजानानान् मनुष्यान् अश्रद्धा यागविषयारुचि: विवेद प्राप्नोति । तामेवाश्रद्धां दर्शयति ये यजन्ते पापीयांसस्ते य उ न यजन्ते श्रेयांसस्ते | ततोऽश्रद्धाप्राप्त्यनन्तरं केनचिदपि प्रागस्याननुष्ठानात् इतः अस्माद् भूलोकात् देवान् प्रति हविश्चरुपुरोडाशादिकं न जगाम । ननु मा गमद्धविः अमृतोपजीविनां देवानां किं तेनेत्यत आह- इतः प्रदानाद्धि देवा उपजीवन्ति अस्माल्लोकात् प्रदीयमानं यद्धविस्तस्माद् देवा उपजीवन्ति । ' कृत्यल्युटो बहुलम् ' ( पा ० सू ० ३ | ३ | ११३ ) प्रपूर्वाद्ददातेः कर्मणि ल्युट् । २४ - ते ह देवा ऊचुः । वृहस्पतिमाङ्गिरसमश्रद्धा वै मनुष्यानविदत्तेभ्यो विधेहि यज्ञमिति । स हेत्युवाच वृह-स्पतिराङ्गिरस कथा न यजध्व इति होचुः किं काम्या यजेमहि ये येजन्ते पापीया २७ सस्ते भवन्ति । य उ न न यजन्ते श्रेयांसस्ते भवन्ति । ' ( श ० १।२।५।२५ ) २५ -- तत्रेतिहासमाह-- हविरागमनाभावेन निराहारा देवा अङ्गिरसः पुत्रं वृहस्पतिमुक्तवन्तः अश्रद्धावै । मनुष्यानविदत् यागविषया अश्रद्धा मनुष्यानुप्राप्नोति तत्तां निरस्य तेभ्यो यज्ञं विधेहि यजध्वमिति विधिं कुर्या इत्यर्थः करने की इच्छा से एक इतिहास बताते हैं-- पहले की तरह बहुवचन के स्थान में एकवचन किया गया है । जिन प्रसिद्ध यजमानों ने पहले यज्ञ किया था, उन्होंने याग के समय परिपक्व हवियों को और निर्मित वेदि को स्पर्श करके याग किया था । उस स्पर्श ( अवमर्श ) जनित दोष से वे निकृष्ट हो गये । किन्तु जिन्होंने याग नहीं किया वे अवमर्श ( स्पर्श ) जनित दोष से रहित रहे, उस कारण वे श्रेष्ठ हुए । उसके अनन्तर ही दोष का हेतु अवमर्श ( स्पर्श ) होता है, इस रहस्य को न जानने वाले लोगों में याग विषयक अश्रद्धा ( अरुचि ) पैदा हुई । अर्थात् जो याग करते हैं, वे पापी हैं, और जो याग नहीं करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं, यह समझने लगे । यही अश्रद्धा का स्वरूप है । इस प्रकार जब याग के प्रति अश्रद्धा हो गई तब कोई भी यागानुष्ठान नहीं करने लगा । उस कारण इस भूलोक से देवताओं को हवि, चरू, पुरोडाश आदि का प्राप्त होना बन्द हो गया । इस पर यदि कोई यह कहे कि भले ही देवताओं को हवि चरू - पुरोडाश आदि की प्राप्ति न हो, देवता तो अमृतोपजीवी होते हैं, उन्हें हवि - चरु - पुरोडाश आदि की क्या आवश्यकता? इसके उत्तर यह कहा गया है कि ' इतः प्रदानाद्धि देवा उपजीवन्ति ' अर्थात् इस भू लोक से दिया जाने वाला जो हवि है, उससे देवतागण जीवित रहते हैं । ' कृत्यल्युटो बहुलम् ' ( पा ० सू ० ३ | ३ | ११३ ) इस सूत्र से प्रपूर्वक ' दद् ' धातु से कर्मणि ल्युट् किया गया है । २४-- ' ते ह देवा ऊचुः । वृहस्पतिमाङ्गिरसमश्रद्धा ' - ( श ० १ २ २५ २५ ) इतिहास बताया जा रहा है कि हवि की प्राप्ति न होने से निराहार रहने वाले अङ्गिरस आदि देवताओं ने अपने पुत्र वृहस्पति से कहा - मनुष्यों को याग के प्रति अश्रद्धा हो गई है, उनसे उस अश्रद्धा को हटाकर उनसे यज्ञ करने के लिये कहो तब वृहस्पति ने यहाँ आकर मनुष्यों से कहा- हे मनुष्यों! तुम लोग यज्ञ का अनुष्ठान क्यों नहीं करते हो । ' था हेतौ च छन्दसि ' कि ' कान्यायते - ( पा ० सू ० ५। ३ | ३६ ) सूत्र से ' था ' प्रत्यय हुआ है । बृहस्पति के इस प्रकार पूछे जाने पर यनुष्यों ने कहा -- वे मही ' अर्थात् किस फल की इच्छा से यज्ञ करें | जो लोग यज्ञ करते हैं, वे पापी होते हैं, और जो लोग यज्ञ नहीं करते कल्याण को प्राप्त करते हैं ।
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[ २५५ ] स वृहस्पतिरागत्य मनुष्यानुष्यानुक्तान् - - हे मनुष्याः कथा कथं कस्माद्धेतोर्न यजध्वे । ' था हेतौ च छन्दसि ' ( पा ० सू ० ५।३।३६ ) इति था प्रत्ययः । एवं पृष्टस्तैरुक्तम्, किकाम्या यजेमहीत्यादि स्पष्टम् । २६ -- सहोवाच वृहस्पतिरङ्गिरसो यद्वै शुश्रुम परिषूतं तदेष यज्ञो भवति यच्छ्रुतानि हवींषि क्लृप्ता वेदिस्ते-नावमर्शमाचारिष्ठ तस्मात् पापीया 25 सो भूत तेनानवमर्श यजध्वं तथा श्रेया ७ सो भविष्यथेत्या कियत इत्या वर्हिषस्तरणादिति बहिषा ह वै खल्वेषा शाम्यति । स यदि पुरा बर्हिस्तरणात्किश्विदापद्येत बहिरेव तत् स्तृणन्न-पास्येदथ यदा हिंस्तृणन्त्यपि यदाभितिष्ठन्ति स यो हैवं विद्वाननवमर्शं यजते श्रेयान् हैव भवति । तस्मादनवमर्शमेव यजेत । ' ( श ० १।२।५।२६ ) २७- एवं ं यागानुष्ठानत्यागकारणमुक्तवत्सु तेषु वृहस्पतिरयथानुष्ठानजनितमेव तत्पापीयस्त्व ं न तु सम्यक् यागानुष्ठानजमिति बोधयंस्तेषां विपर्यस्ततां निरस्यति श्रुतिः -- सहोवाचेति - यद्वै शुश्रुम यत् खलु देवानामर्थं परिषूतं परिगृहीतं शुश्रुम तत एतदात्मक एव यज्ञः तत्साध्यत्वात् । सामान्येनोक्तं विशिनष्टि - यच्छ्रुतानि पक्वानि पुरोडाशा-न हवींषि पूर्व परिग्रहादिभिः क्लृप्ता वेदिनिर्मिता वेदिरिति यदस्ति एतत्साध्यो देवार्थो यागोऽनेनं वे दृग्विधेन यज्ञेन हे मनुष्य यूयमवर्श अवमृश्य यागात्प्राक् पक्वानि हवींषि बहिस्तरणात्पूर्व वेदिश्च संस्पृश्य अचारिष्ट आचरणं कृतवन्तः । यागसाधनस्य च मनुष्यसंस्पर्शो न मुक्तः । अतस्तस्मादेवावमर्शनात् हे मनुष्या यूयं पापीयांसो भूत न तु यागात् अतोऽव-मर्श परित्यज्य यजध्वम् । तथा च श्रेष्ठ्य वो भविष्यति । २८-- एवं वृहस्पतिना बोधितेऽवमर्शनपरित्यागस्यावधि पृच्छति आकियत इति कियत्कालपर्यन्तं संस्कृतां वेदिं न स्पृशेत् एतच्च हविषामप्युपलक्षणम् । अतः पक्वानि हवींष्यपि यागात्पूर्व ' न स्प्रष्टव्यानि । सूत्रितं च कात्यायनेन ' प्राक् स्तरणात् वेदिं नावमृशेत् । शृतानि च हवींष्याप्रचरणात् ' ( का ० श्रौ ० सू ० २ १७८ - १८० ) वेद्यां ' बर्हिस्तरणात्प्राक् तस्याः स्पर्शो न कार्यः । प्रधानयागावदानात् पूर्व पक्वहविषाच स्पर्शो न कार्यः । ' अङगुष्ठाङ्गुलिभ्यां मासरहिताभ्यामवद्यन्त्येकैका ' ( का ० श्र ० सू ० २ १८१ ) मांससम्बद्धाभ्यामनखलग्नाभ्यामनखलग्नाभ्यामर्थात् २६ —— स होवाच वृहस्पतिरङ्गिरसो यद्वै शुश्रुम ' - ( श ० १ २ ५।२६ ) इस ब्राह्मण के द्वारा यह कह रहे हैं कि मनुष्यों ने इस प्रकार जब याग का अनुष्ठान न करने का कारण वृहस्पति को बताया तब वृहस्पति ने उन्हें समझाया कि पाप भागी होने का कारण है कि यज्ञ का यथा विधि ( शास्त्र विधि के अनुसार ) अनुष्ठान न करना । सम्यक् यागानुष्ठान से पाप भागी नहीं होता । इस प्रकार समझाते हुए उनकी विपर्यस्त हुई बुद्धि को श्रुति ने दूर किया । श्रुति कह रही है कि जो वस्तु देवताओं के लिये स्वीकृत की गई सुना गया है, वह यज्ञ है, क्योंकि उसी से वह साध्य होता है । सामान्यतया बताये गये अभिप्राय को ही अब विशेष रूप से बता रहे हैं- परिपक्व हुए पुरोडाशादि हवि, पूर्वपरिग्रहादि से निर्मित वेदि आदि जो पदार्थ हैं, उनसे ही साध्य ( सम्पन्न होने वाला ) यह देवतार्थं यज्ञ है । इस प्रकार के ही यज्ञ से हे मनुष्यों! तुम लोग, याग के पूर्व पक्व हुए हवियों को, तथा बहिस्तरण से पूर्व वेदि को स्पर्श ( अवमर्श ) करके तुमने अपने आचरण को भ्रष्ट किया । याग के साधनभूत पदार्थों का स्पर्श करना मनुष्य को उचित नहीं है । अतः उसी अवमर्शन ( स्पर्श ) से हे मनुष्यों! तुम पाप के भागी बने हो, याग के अनुष्ठान से नहीं । अतः अवमर्श को त्यागकर यज्ञ का अनुष्ठान करो । उससे तुम्हारी श्रेष्ठता होगी । २८ - इस प्रकार वृहस्पति के द्वारा बोधित किये जाने पर, उन्होंने अवमर्शन ( स्पर्श ) के परित्याग करने की अवधि को पूछा, अर्थात् कितने समय तक स्पर्श न किया जाय । तब उत्तर दिया कि बहिस्तरण तक संस्कृत वेदिका स्पर्श न करे । यह हवियों का भी उपलक्षण है, यानी पक्व हवियों का भी याग से पूर्व स्पर्श न करे । अतएव कात्यायन ने भी कहा है -- ' प्रास्तरणात् वेदिं नावमृशेत् ', ' शृतानि च हवींष्याप्रचरणात् ' - ( का ० श्रौ ० सू ० २।१७६ - १८० ) । उसे स्पर्श न करना उचित भी है क्योंकि बहिःस्तरण के पूर्व अशान्त रहने वाली वह वेदि, स्तरण किये जाने वाले हि से शान्त हो जाती है । अतः अशान्त वेदि का स्पर्श करने पर पूर्वोक्त दोष का होना उचित ही है बहि स्तरण के
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[ २५६ ] काष्ठादिकं विना साक्षादेवाङ गुष्ठाङ्गुलिभ्यां केचिदवदानं कुर्वन्ति सामर्थ्यात् स्वधिति मांसे द्रवद्रव्ये स्रवः हस्तकाष्ठे पुरोडाशमवदातु प्रकल्पिते ( मी ० सू ० १ | ४ | ११ ) युक्तञ्च तदित्याह वर्हिषेति बर्हिषस्तरणात्पूर्व मशान्ता स्मृतः वेदिः, स्तीर्यमाणेन बर्हिषा खलु शान्ता भवति । अतोऽशान्तायाः स्पृष्टौ प्रागुक्तो दोषो युज्यत इत्यर्थः । स यदीति - बर्हिषः स्तरणात् पूर्व यदि वेदिमध्ये किञ्चित् तृणादिकमापद्येत तदा तन्निरासार्थमपि न स्पृशेत् किन्तु बहि स्तृणन् स्तरणसमये बर्हिषः स्तरणं कुर्वन्नेव तत् तृणादिकं निरस्येत् । स्तरणप्रभृति वेदिस्पर्शो न दोषायेत्यभिप्रेत्याह - अथेति यदा बहमुष्टि स्तृणन्त्यध्वर्यवः तदानीं पदा पादेनाप्यधितिष्ठन्ति अतस्तस्मिन् समये स्पर्शो न दुष्यति । २६ - एवमितिहासमुखेन प्रतिपादितमर्थमिदानीमनुष्ठेयत्वेन विधत्ते -- स य एवं विद्वान् उक्तमितिहासं जानन्ननवमशमेव यजेत, नायं विधिर्मन्त्रेण ज्ञातुं शक्यते तस्मान्मन्त्रो ब्राह्मणञ्च वेद इति । अत सूत्रंरेव वेदार्थो व्यज्यते त्रिधा बद्धो वृषभोरोरवीति । नैतत्सर्वं प्रत्यक्षानुमानाभ्यां ज्ञातुं शक्यम् । एव सावमर्शेन च मन्त्रब्राह्मण-पापीयस्त्वं फलासिद्धिश्च । शृतहविषां वेदेश्चानवमर्शेन श्रेष्ठ्य फलसम्पत्तिश्चेति । ' प्रत्यक्षेणानुमित्या यागेन वा यस्तूपायो न बुद्ध्यते । एनं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य देवता ॥ ' ( मी ० श्लो ० वा ० १। २ ) इति दयानन्दीयो वेदार्थस्तु सर्वथास्याः प्रक्रियाया बहिर्भुत एव । ३० - अध्यात्मपक्षेऽपि -- हे विरप्शिन् निरतिशयबृहत्परमेश्वर क्रूरस्य सर्वसंहारकस्य कालस्य विसृपो विसर्प-णात्पुरा जीवदानु जीवदात्रीं पृथिवीं भूमिरूपां सोपाधिकां चिति उदादायानात्मतादात्म्यविच्छेदेनोवमुत्थाप्य यां चन्द्रमसि सुशीतले निरुपाधिके ब्रह्मणि स्वधाभिः गुरुवेदान्तोपदेशसंस्कारैः ऐरयन् ये स्थापयन्ति भेदापोहेनैक्यमनुभवन्ति धीरासो धीरा निगृहीतचित्ताः साधकाः तामु सोनाधिकामात्मचिति निरुपाधिकब्रह्माभेदानुसन्धानेन ये यजन्ते ब्रह्मयज्ञ-पूर्व यदि वेदि में कुछ तृणादि गिरा रहे, तब भी उसे हटाने के लिये उसे न छूए: किन्तु बर्हिस्तरण करते हुए ही उस गिरे हुए तृणादि को हटावे । जिस समय अध्वर्यु बहिर्मुष्टि का वेदि में स्तरण करता है, उस समय वह उसमें पैर रख कर भी खड़ा रहता है । अत: उस समय का स्पर्श रोषावह नहीं होता है । २६ - इस प्रकार इतिहास के द्वारा प्रतिपादित अर्थ को अब अनुष्ठेय के रूप में बताते है - विद्वान् उक्त इतिहास को जानकर अनवमर्श ( अस्पर्श ) पूर्वक ही याग करे । इस विधि का ज्ञान, मन्त्र से होना सम्भव नहीं इसलिये मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को ' वेद ' शब्द से कहा गया अतएव मन्त्र, ब्राह्मण और सूत्रों से ही वेदार्थ व्यक्त होता है । अभिप्राय को ' त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति ' से बताया गया है । यह सब प्रत्यक्ष और अनुमान से जान लेना शक्य नहीं है । सावमर्श ( स्पर्श सहित ) याग से पापीयस्त्व ( पापभागि ) और फल की अप्राप्ति बताई गई है । किन्तु परिपक्व हवि के और वेदि के अनवमर्श से श्रेष्ठता तथा फल का लाभ होता है । वार्तिककार भट्टपाद ने भो कहा है कि ' प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्ध्यते । एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता । ( मी ० श्लो ० वा ० १ ) दयानन्दीय वेदार्थ तो इस उक्त प्रक्रिया के सर्वथा बहिभूत है । ३० - अध्यात्मपक्ष में भी - हे विरप्शिन्! अर्थात् निरतिशय वृहत् परमेश्वर! क्रूरस्य सर्वसंहारक काल के विस्तृत विसर्पण से पूर्व जीवदानु जीवनदात्री पृथिवी अर्थात् भूमि रूप सोपाधिक चिति को उदादाय जड़ के साथ तादात्म्य का विच्छेद करते हुए ऊपर उठाकर चन्द्रमसि सुशीतल निरुपाधिक ब्रह्म में स्वधाभि: गुरु- वेदान्तोपदेश के संस्कारों से ऐरयन् स्थापित करते हैं अर्थात् भेद का निरसन कर ऐक्य का अनुभव करते हैं, ऐसे धीरासः निगृहीत चित्त वाले धीर साधक तामु सोपाधिक आत्मचिति ( आत्मचैतन्य ) का निरुपाधिक ब्रह्म ( ब्रह्मचिति चैतन्य ) के साथ अभेदानुसन्धान करते हुए यजन्ते ब्रह्मयज्ञ परायण होकर अभ्यास करते हैं, उन्हें हे प्रभो! प्रोक्षणी: शोधिका ब्रह्मा-कावृत्ति को प्राप्त कराओ, अर्थात् उनकी ब्रह्माकार वृत्ति कर दो । तुम द्विषतः अज्ञान और उसके जगत् रूप कार्य के वधोऽसि घातक ( विनाशक ) हो । तुम सर्व साधक होते हुए भी महावाक्य जन्य परब्रह्माकार वृत्ति में अभिव्यक्त
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[ २५७ ] परायणा अभ्यस्यन्ति हे प्रभो प्रोक्षणी: शोधिका ब्रह्माकारावृत्तीरासादय प्रापय । त्वं द्विषतोऽज्ञानतत्कार्यस्य जगतो धोऽसि धातकोऽसि सर्वसाधकोऽपि त्वं महावाक्यजन्यपरब्रह्माकारवृत्त्यभिव्यक्तः सन् सर्वव्यापकोऽसि । ' ग्रसिष्णु प्रभविष्णु ख ' ( श्री ० भ ० गी ० १३ । १६ ) इति गीतावचनात् । यथा तुलराशिप्रकाशकोऽपि सौरालोकः सूर्यकान्तमणियोगेन स्फुर-ज्ज्वालाजटिलोऽनलः सन् तूलराशिनाशको भवतीति तद्वत् । 1 प्रत्युष्ट ४ ं रक्षः प्रत्युष्टाऽअरातयो निष्टप्त ४ ं रक्षो निष्टप्ताऽथरा-तयः । अनिशितोऽसि सपत्नचिद्वाजिनं त्वा वाजेध्यायें संमाज्मि । प्रत्युष्ट ४ रक्षः 1 प्रत्युष्टाऽथरातयो निष्टप्त छ ं रक्षो निष्टप्ताऽयरातयः । अनिशितासि सपत्नक्षि-द्वाजिनीन्त्वा वाजे ध्यायें संमाज्मि ॥ वा ० सं ० ११२६ ॥ -अर्थ - अग्नि पर स्रवा का प्रतपन करे । इस स्रवा के तपाने से उसमें स्थित राक्षस और प्रतिबन्धक शत्रु, जल जाते हैं । उसी तरह उसमें गुप्त रूप से स्थित राक्षस और प्रतिबन्धक शत्रु भी पूर्ण रूप से जल गये । हे स्र ुव तुम, हम पर अत्यन्त तीक्ष्ण नहीं होते हो । तुम शत्रु नाशक हो, इसलिये मैं तुम्हें धोकर शुद्ध करता हूँ । तुम यज्ञ के द्वारा अन्न के उत्पादक हो । यज्ञ प्रकाशनार्थ मैं तुम्हारी शुद्धि करता हूँ । इस स्रवा के तपाने से उसमें स्थित रहने वाले राक्षस और प्रतिबन्धक समस्त शत्रु जल गये । उसी प्रकार इसमें गुप्त रूप से रहने वाले राक्षस और प्रतिबन्धक शत्रु पूर्णतया जल चुके । हे स्रुक्! हम पर तीक्ष्ण मत होना । तुम शत्रुओं के नाशक हो । अतः मैं तुम्हें शुद्ध करता हूँ । तुम यज्ञ के द्वारा अन्नोत्पादक हो । अतः यज्ञ प्रकाशनार्थ मैं तुम्हारी शुद्धि करता हूँ || २६ || १ - वंप्रतप्य पूर्ववदिति ' ( का ० श्रो ० सू ० २६ । ३६ ) अध्वर्यु गर्हिपत्यस्य पश्चादुपविश्य पूर्ववत् ( यथा शूर्पाग्निहोत्रहवण्योः प्रत्युष्टप्तमिति प्रतपनं कृतं तथैव ) प्रत्युष्ट रक्ष इतिमन्त्रेण स व प्रतप्य किञ्चिदिव प्राग्देशं गत्वा होकर ( विनाशक ) हो श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा है - ' ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ' -- ( श्री ० म ० गी ० सब व्यापादक १३ । १५ ) । जैसे तूलराशि ( रुई का ढेर ) का प्रकाशक होता हुआ भी सौरालोक ( सूर्यप्रकाश ), सूर्यकान्त मणि के सम्बन्ध से उद्दीप्त ज्वालाओं से परिपूर्ण अग्नि का रूप धारण कर समस्त तूलराशि का नाशक होता है, उसी तरह वह ब्रह्म चैतन्य, सम्पूर्ण अज्ञान और उसके कार्य का विनाश कर देता है । १ - स्रुव प्रतप्य पूर्ववत् इति ' - ( का ० श्रो ० सू ० २२६ ३६ ), अध्वर्यु, गार्हपत्य के पीछे ( पश्चिम में ) बैठकर पूर्ववत् ( जैसे शूर्प और अग्निहोत्रहवणी का ' प्रत्युष्टुप्तम् ' मन्त्र से प्रतपन ( गरम ) किया था, उसी तरह ) ' प्रत्युष्ट r ं रक्ष: ' इस मन्त्र से स्रुव को तपाकर किश्विन्मात्र प्राग्देश में जाकर स्रुव को बांये हाथ में लेकर वेद ( कुश मुष्टि ) के अग्र भागों की प्रतिपत्ति का विधान रहने से छेदन करने के कारण वेद ( कुश मुष्टि ) से पृथक् हुए उन अग्र भागों से स्र व के मूल से आरम्भ कर उसके मुख तक ऊपर की ओर उसका ( स्रुव का ) ( शिता ' इस मन्त्र से सम्माजन करना