वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 271–280

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 271–280

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| २५८ ] स्रुव वामहस्ते कृत्वा वेदाग्राणां प्रतिपत्तिविधानात् छेदनेन वेदात् पृथग्भूतैमूलमारभ्य मुखपर्यन्तमुपरिदेशे स्रुव ' सम्माष्टि अनिशिता इति मन्त्रेण । पुनः किञ्चित् प्राग्गत्वा अग्रादारभ्य मूलपर्यन्तं वेदमूलैरनिशित इति सम्मृज्यात् स्रवः । २ - न निशितोऽनिशितः । हे स्र व त्वमनिशितोऽसि नितरां शितस्तीक्ष्णीकृतो निशितः, न निशितोऽनिशितः । अस्मद्विषये तीक्ष्णो न भवसि तथापि सपत्नक्षित् सपत्नान् क्षिणोतीति सपत्नक्षित् । ( क्षिणु हिंसायाम् ) सपत्नहन्तासि अत एव त्वां सम्माज्मि सम्यक् शोधयामि । कीदृशं त्वाम् वाजिनम् यज्ञवन्तम् यज्ञद्वाराऽन्नहेतुत्वादन्नवन्तम् । अन्यत्र वाजशब्दोऽन्नवचनस्तथाप्यत्र ' यज्ञो हि देवानामन्न ' ( श ० ५।१।१।२ ) मिति श्रुत्यनुसारेण यज्ञवचनः । तथा यज्ञाख्यम-नमर्हतीति वाजिनम् अहर्थिक इन् प्रत्ययः । किमर्थं सम्माज्मि वाजेध्यै ( ञिइन्धी दीप्तौ ) इन्धनमिन्ध्या दीप्तिः । वाजस्येध्या यज्ञो ज्वलनम् तस्यै वाजेध्यायै यज्ञस्य दीप्त्यै यज्ञप्रकाशनार्थं शोधितेन त्र वेणाज्ये गृहीते हुते च सति दीप्यते-ऽग्निः । तद्दीप्त्याहुतिफलभूतमन्न प्रकाशितं भवतीत्यर्थः । तथा च यज्ञप्रकाशनार्थं त्रबसम्मार्जनम् । प्रतप्य प्रतप्य प्रयच्छत्यनिशितेति स्र ुचः ' ( का ० श्र ० सू ० २२६ ४१ ) अर्थात् अनिशितेतिमन्त्रेण त्र चस्तिस्रो जुहूप्रभृद्ध वास्तथैव स्र ुवं सम्मृज्य प्रत्येकं प्रत्युष्टप्तं रक्ष इति प्रतप्य प्रतप्य वेद्यां स्थापनार्थमध्वर्यवे प्रयच्छेत् मन्त्राः पूर्ववदेव व्याख्यातव्याः । तत्र ' योषा वं स्रुक् वृषा स्रव: ' ( श ० १ ३ १ 14 ) इति श्रुत्या त्रवस्य पुंस्त्वात् स्र ुचः स्त्रीत्वादादी त्र वस्य सम्मार्ज-नम् । जुह्वादीनां त्र चां स्त्रीलिङ्गत्वात् तद्विशेषणत्वात् मन्त्रे अनिशितासि वाजिनोमिति स्त्रीत्वमुक्तमन्यत् समानमेव । स्रवत्र जुहूपभृद्ध वा यजमानं तदृत्विजः प्रति अनिशिता अतीक्ष्णस्वभावाः सौम्या हितावहास्तच्छत्रूणान्तु तीक्ष्णाः चाहिये । पुनः किञ्चित् प्राग्गमन कर स्रुव के अग्रभाग से लेकर मूल तक उन कुश मूलों से ' अनिशित ' इस मन्त्र से उसका ( का ) सम्मार्जन करना चाहिये । २ - जो निशित ( तीक्ष्ण ) नहीं है, उसे अनिशित कहते हैं । हे स्रव! तुम अनिशित हो । ' नितरां अत्यन्त शितः तीक्ष्ण किया गया निशित कहलाता है, जो ऐसा नहीं है, वह ' अनिशित ' कहलाता है । हमारे विषय में तीक्ष्ण नहीं हो, तथापि हमारे शत्रुओं ( सपत्नों ) के तुम घातक ( विनाशक ) हो अर्थात् तुम सपत्नक्षित् हो । हिंसा के अर्थ में ' क्षिणु ' धातु है । अत एव मैं तुम्हारा शोधन करता हूँ । क्योंकि तुम यज्ञ के द्वारा अन्न के हेतु रहने से अन्नवान् हो । यद्यपि ' वाज ' शब्द अन्यत्र अन्न का वाचक है तथापि यहाँ पर ' यज्ञो हि देवानामन्नम् - ( श ० ५।१ १/२ ) इस श्रुति के अनुसार यज्ञ वाचक है । तथा च यज्ञाख्य अन्न के योग्य है इसलिये वह वाजी कहलाता है । ' वाजिन् ' में अहर्थिक ' इन् ' प्रत्यय है । किसलिये स्र ुव का सम्मार्जन किया जा रहा है? तो बताते हैं कि ' वाजेध्यै ' ( त्रि इन्धि दीप्तौ ) दीप्ति अर्थ में ' त्रि इन्धि ' धातु है । ' इन्धनम् - इन्ध्या ' = दीप्तिः । वाजस्य इध्या अर्थात् यज्ञ की दीप्ति यानी ज्वलन, तस्यै बाजेयं अर्थात् यज्ञ की दीप्ति के लिये अर्थात् यज्ञ के प्रकाशनार्थ शोधन किये हुए स्रव से आज्य ( घृत ) के ग्रहण और हवन करने पर अग्नि प्रदीप्त होती है । उसके प्रदीप्त होने से हवन का फलभूत अन्न प्रकाशित होता है । तथा च यज्ञ के प्रकाशनार्थ स्रुव का सम्मार्जन किया जाता है । ' प्रतप्य प्रतप्य प्रयच्छत्यनिशितेति स्रुचः - ( का ० श्रौ ० सू ० २।६।४१ ) अर्थात् ' अनिशित ' इस मन्त्र से तीनों स्र चाओं ( जुहू, उपभृत्, ध्रुवाओं ) का उसी तरह स्रव का सम्मार्जन कर ( शोधन कर ) प्रत्येक का ' प्रत्युष्टप्तं रक्षः ' मन्त्र से प्रतपन करके वेदी में उन्हें रखने के लिये अध्वर्यु को दे । मन्त्रों की व्याख्या पूर्व के समान ही करनी चाहिये । ' योषा वै स्र ुक् वृषा स्रुव: ' ( श ० १ ३ ५२६ ) इस श्रुति के अनुसार ' स्रव ' का पुंस्त्व और स्रक् ' का स्त्रीत्व प्रतीत होने से प्रथमतः स्रव का सम्मार्जन किया जाता है । जुहू आदि चाओं का स्त्रीलिङ्ग रहने से उसके विशेषण भूत ' अनिशित ' और ' वाजिन् ' में भी स्त्रीत्व प्रदर्शित किया गया है, और सब समान ही है । त्रुवा, स्रक्, जुहू, उपभृत्, ध्रुवा ये सभी यजमान और उसके ऋत्विजों के प्रति तीक्ष्णता से रहित, ( अनिशित ) उनके हितकारक होते हैं, किन्तु उनके शत्रुओं के प्रति तीक्ष्ण और शत्रु घातक ही होते हैं । जैसे भगवान् नृसिंह उग्र होते हुए भी एवं हिरण्यकशिपु का अपने तीक्ष्ण नखों से विदारण करते हुए भी प्रह्लाद के प्रति

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[ २५ ] सपत्नक्षितः शत्रुघातका एव यथा नृहरिरुन्रोऽपि हिरण्यकशिपु तीक्ष्णैर्नखे विदारयन्नपि प्रह्लादं प्रति परमकारुणिकस्तद्वत् । नह्यत्र जडा: स्रवादयः प्रार्थ्यन्ते किन्तु तदन्तर्यांमी भगवानेव प्रार्थ्यते । ३ - - यत्तु स्वामिदयानन्देन - येनाहमनिशितेन सपत्नक्षित् सपत्नक्षितासङ्ग्रामेण प्रत्युष्ट रक्षः प्रत्युष्टा अरातयः निष्टप्त रक्षः निष्टप्ता अरातयः असि भवन्ति त्वा तं वाजिनं वाजेध्यायै युद्धाङ्गानि सम्माज्मि । अहं यया सपत्नक्षिता अनिशिता सेनया प्रत्युष्टं रक्षः प्रत्युष्टा अरातय: निष्टप्तं रक्षः निष्टप्ता अरातयः अस्ति भवन्ति तां वाजिनीं सेनां शिक्षया वाजेष्मायं सम्माज्मि इत्येकोऽर्थः । अहं येन अनिशित: अनिशितेन सपत्नक्षिता यज्ञेन प्रत्युष्ट रक्षः असि भवन्ति त्वा तं वाजिनं यज्ञं वाजेध्यायै सम्माज्मि एवं यया सपत्नक्षिता अनिशितया क्रियया प्रत्युष्ट रक्षः ' असि भवन्ति तां वाजिनीं वाजेध्यायै सम्माज्मि तथैव भवन्तोऽप्येतं सम्मार्जयन्तु । भावार्थस्तु – ईश्वर आज्ञापयति सर्व मनुष्यै विद्याशुभगुणदीप्त्या दुष्टशत्रु निवारणाय नित्यं पुरुषार्थः कर्त्तव्यः सुशिक्षया शस्त्रास्त्रपुरुषाढ्यसेनया श्रेष्ठानां रक्षणं दुष्टानां ताड़नं नित्यं कत्तव्यम् अतोऽशुद्धिक्षयात् सर्वं पवित्रता प्रवर्तते ' त्युक्तम् । ४- तन्न मनोज्ञम्, वेदबाह्यानामपि तथाभिप्रायदर्शनात् । इयं च राजनीतिरेव मनुशुक्रादिभिरपि तथैवाभि-प्रेतस्वात् । मन्त्रव्याख्यानमपि विभक्तिप्रत्यय पुरुषवचनव्यत्यय बहुलम् क्लिष्टकल्पना प्रायम् यथा प्रत्युष्ट प्रति दग्धव्यम् रक्षः विघ्नकारी प्राणी इत्यत्रापि मुख्यार्थ त्यागो गौणार्थस्वीकारः, रक्षोबन्धनेन रक्षयितव्यमित्यपि निर्मूलम् प्रसिद्धार्थत्यागे कारणाभावात् । सत्यविरोधिनोऽरातयः विद्याविरोधिनोऽर तयः इत्यत्रापि स्वेच्छामूलक एवार्थो गृहीतः । शाब्दनयेनेच्छास्वातन्त्र्यम्, अव्याहृतप्रसरत्वात्तस्याः । न विद्यते नितरां शिता तीक्ष्णक्रिया यस्मिन् स सङ्ग्रामो यज्ञपात्रं वा इत्यप्यशुद्धम्, सग्र ग्रामे छेदनभेदनादि रूपायास्तीक्ष्णायाः क्रियायाः सत्त्वात् । ५ - यत्तु - ' सङ्ग्रामो न केवलं दण्डेनैवापितुसामदानभेदेवंशीकारेऽपि जेतव्य इति भाव ' इति, तत्तुच्छम् सामदानादिभिरिष्टसिद्धौ सङग्रामाप्रवृत्तिरेव भवति न सङ्ग्रामजयः । परमकारुणिक रहते हैं, उसी तरह यहाँ भी समझना चाहिये । यहाँ पर स्र वादि जड़ पदार्थों की प्रार्थना न होकर उन के अन्तर्यामी भगवान् की प्रार्थना की गई है । ३ - स्वामी दयानन्द ने जो लिखा है - ' येनाहमनिशितेन '... सम्मार्जयन्तु । ' उसका भावार्थ इस प्रकार है - ' ईश्वर आज्ञा दे रहा है कि सभी मनुष्यों को अपनी विद्या एवं सुन्दर गुणों के प्रकाश से दुष्ट शत्रुओं का निवारण करने के लिये पुरुषार्थ नित्य करना चाहिये । शस्त्रास्त्र की अच्छी शिक्षा प्राप्त किये पुरुषों की सेना से श्रेष्ठों का रक्षण और दुष्टों का ताड़न नित्य करना चाहिये । उससे अशुद्धि का क्षय होकर सर्वत्र पवित्रता होगी । ' ४- - किन्तु यह स्वामी दयानन्द का कथन उचित प्रतीत नहीं हो रहा है । इस प्रकार अभिप्राय तो वेदबाह्यों भी दिखाई देता है । और यह तो राजनीति है. उसमें मनु, शुक्र आदि राजनीति के आचार्यों का भी यही अभिप्राय है | दयानन्दोक्त मन्त्र व्याख्यान में भी विभक्ति प्रत्यय, पुरुष, वचन आदि में व्यत्यय बहुलता है । और क्लिष्ट कल्पना भी है । जैसे— ' प्रत्युष्टं प्रतिदग्धव्यम्, रक्षः विघ्नकारी प्राणी ' यहाँ पर भी मुख्यार्थ का त्याग और गौणार्थ को स्वीकार किया गया है । ' रक्षोबन्धनेन रक्षयितव्यम् ' यह कथन भी निर्मूल है । क्योंकि प्रसिद्धार्थ के त्याग में कोई कारण नहीं हूँ । ' सत्य के विरोधी शत्रु और विद्या के विरोधी शत्रु ' यहाँ पर भी स्वेच्छामूलक अर्थ का ही ग्रहण किया है । शाब्द व्यवहार में इच्छा की स्वतन्त्रता नहीं हुआ करती, क्योंकि इच्छा की गति तो अप्रतिहत रहती है । ' अनिशित ' का अर्थ किया है कि ' नहीं है अत्यन्त तीक्ष्ण क्रिया जिसमें उसे संग्राम या यज्ञपात्र कहते हैं । किन्तु यह अर्थ करना भी अशुद्ध है, क्योंकि संग्राम में तो छेदन - भेदनादि रूप तीक्ष्ण क्रिया हुआ करती है । ५ - यह जो कहा है कि ' संग्राम केवल दण्ड से ही नहीं अपितु साम, दान, भेद के द्वारा वशीकार करने में

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[ २६० ] ६ - यत्तु - किञ्च निशिता पदेन तीक्ष्णा क्रियोच्यते ' इति, तदपि निर्मूलम् प्रमाणविरहात् । पात्रे च तीक्ष्णहवा-प्राप्त्या निशितेति विशेषणं व्यर्थमेव । _७ – यदपि - - ' सपत्नान् शत्रून क्षयति येन सः अत्र ' कृतो बहुलम् ' ( पा ० सू ० ३।३।११३ ) इति वार्तिकेन करणकारके क्विप् ( शि शये ) इत्यस्य रूपम्, एतदुब्बटमहीधराभ्यां क्षिणु हिंसायामित्यस्य भ्रान्त्या व्याख्यातम् ' इति, तदप्यशुद्धम्, प्रकृते कर्तृ कारकस्य विवक्षितत्वेन करणकारकस्याविवक्षितत्वात् । ६ - यत्तु -- क्षिणु हिंसायाम् ' क्विपि झल् परत्वाभावात् ( अनुदात्तोपदेशवनति ) पा ० सू ० ६ । ४ । ३७ इत्यादिना-ऽनुनासिकलोपो न सम्भवति इति तदपि तुच्छम् ' तनु वनु क्षणु क्षिणु ऋणु तृगु घृणु वनु मनु तनोत्यादिषु क्षिणो तेर्ग्रहणेन क्विपि सपत्नक्षिदिति सिद्धौ बाधाभावात् । न च क्विपः सर्वापहारिलोपेन झल्परत्वाभावात् नानुनासिकलोपः सम्भवतीति वाच्यम्, लोपेऽपि स्थानिवद्भावमाश्रित्य झल्परत्वानपायात् । अन्यथा ' सुकृत्, कर्मकृत्, मन्त्रकृत् इत्यादी क्पिो लोपे पित्कृत्परत्वाभावेन ' ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् ' ( पा ० सू ० ६ २ | ७१ ) इति सूत्राप्रवृस्था कथमेतेषां रूपाण सिद्धिः स्यात् । ‘ गमः क्वौ ' ( पा ० सू ० ६ | ४ | ४० ) इति स्थलीयस्य गमादीनामिति वक्तव्यम् इहापि यथा स्यात् परीतत् सहकुण्डिका संयत् परीतत् ' इति महाभाष्यस्यानुरोधेन क्षिणोतेरप्यनुनासिकलोपापत्तेः । - यत्तु भाष्ये क्षिणोतरपरिगणनात् न गमादित्वं तस्येति तत्तुच्छम् परिगणनासिद्धेः । परीतत् संयत् आदिप्रयोग स्तूपलक्षणमेव क्षिणोतेरपीति मन्तव्यम् । प्रकृते हिंसार्थस्यैव विवक्षितत्वेन ( क्षि क्षये ) इत्यसङ्गतेः । भी होता है, अर्थात् किसी तरह भी जीतना चाहिये यह अभिप्राय है । ' किन्तु यह अभिप्राय भी तुच्छ है । क्योंकि साम - दानादि के द्वारा इष्टसिद्धि होने पर न तो संग्राम में प्रवृत्ति होती है और न संग्राम में विजय कहा जाता है । ६ - और जो यह कहा है- ' किश्व निशिता ' पद से तीक्ष्ण क्रिया बतायी गई है ' वह भी निर्मूल है, क्योंकि कोई प्रमाण नहीं है । और पात्र में तीक्ष्णता की प्राप्ति न रहने ' निशिता: यह विशेषण देना व्यर्थ ही है । ७ -- उसी तरह ‘ सपत्नान् शत्रून् क्षयति येन सः ' यहाँ पर ' कृतो बहुलम् ' - ( पा ० सू ० ३ ३ १३ ) इति वार्तिक से करण कारक में ' क्विप् ' प्रत्यय करने पर ( ' शि ' शये ) धातु का रूप, दयानन्द जी ने कहकर उब्वट - महीधर को भ्रान्त बताया है, क्योंकि उन्होंने ' क्षिणु हिंसायाम् ' का रूप है, यह अपनी व्याख्या में कहा है । ' किन्तु दयानन्द, उव्वट- महीधर को भ्रान्त सिद्ध करते हुए स्वयं अपने को ही भ्रान्त सिद्ध कर बैठे । दयानन्द जी को सोचना चाहिये था कि प्रकृत में ' कर्तृ कारक की विवक्षा रहने से ' करणकारक ' अविवक्षित है । ८ — तदनन्तर यह जो कहा है कि ' क्षिणु हिंसायाम् ' क्विप् में झल् परत्व न होने से ' अनुदात्तोपदेशवनति ' ( पा ० सू ० ६ | ४ | ३७ ) से अनुनासिक लोप का होना सम्भव नहीं है । वह भी ठीक नहीं है । ' तनुवनु क्षणु क्षिणुऋण तृणु-घृणु वनु मनु तनोत्यादि में ' क्षिणु ' का ग्रहण होने से क्विप् करने पर ' सपत्नक्षित् ' की सिद्धि में कोई अड़चन नहीं है | यदि यह कहो कि ' क्विप् ' का सर्वापहारी लोप होने पर झल् परत्व न रहने से अनुनासिक लोप का होना सम्भव नहीं होगा । तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि लोप होने पर भी स्थानिवद्भाव का आश्रय करने पर झल्परत्व कायम रहता है । अन्यथा ' सुकृत्, कर्मकृत्, मन्त्रकृत्, इत्यादि स्थलों में ' क्विप् ' का लोप होने पर भी कृत्परत्व न होने से ' हस्वस्य पिति कृति तुक् ' ( पा ० सू ० ३ | ३ | ) सूत्र की प्रवृत्ति होने से इन रूपों की सिद्धि कैसे होगी? ' गमः क्वौ ' ( पा ० सू ० ६ | ४४० ) इस सूत्र के महाभाष्य ' गमादीनामिति - के अनुरोध से ' क्षिणोति ' के “ संपत् परीतत् अनुनासिक का भी लोप होने लगेगा! | - - यह जो कहना है कि ' भाष्य में ' क्षिणु ' का परिगणन न होने से उसमें गमादित्व नहीं है ' वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि परिगणन असिद्ध है । ' परीतत्, सम्पत् ' आदि प्रयोगों को तो ' क्षिणोति ' का भी उपलक्षण समझना

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[ २६१ ] अत एव ' सपत्नान् क्षिणुयात् ' ( श ० १ | ३ | १ | ६ ) इति श्रुतौ क्षिणोतेरेव प्रयोगः । एवमेव ' प्रत्युष्ट ' तापनीयं निष्टप्तं निःसारणीयमित्यपि न सङ्गतम्, धात्वर्थांननुगमात् । ' अनिशिता अति विस्तीर्णा सेना वेदिव ' इत्यप्यसङ्गतम्, ( शो तनू करणे ) इत्यस्य विशेषतो नि पूर्वस्य तीक्ष्णीकरणार्थत्वमेव 1 । नञोऽपि तदभावबोध पर्यवसायित्वमेव । अतएव - ' अहं येन निशितेनातिविस्तृतेन सपत्नक्षिता शत्रुनाशकेन सङ्ग्रामेण प्रत्युष्ट रक्षः प्रत्युष्टा अरातयः विघ्नकारी प्राणी सत्य-विरोधिनश्च दाहरूपेण दण्डेन दग्धाः, येन बन्धनेन निष्टप्तं रक्षः बन्धार्हो निष्टप्ता अरातयः विद्याविघ्नकारिणः सन्तप्ता भवन्ति त्वा तं वेगवन्तं सङ्ग्रामं वाजेध्यायै अन्नादि पदार्थैवलवत्त्वकरणयोग्य से नार्थ युद्धसाधनानि सम्माज्मि सम्यक् शोधयामि तदीयदोषान्निस्सारयामि । अहं यया शत्रुविनाशिन्या अनिशितयाऽतिविस्तीर्णया सेनया परसुखासहा मनुष्या द्यूतादिरता अपगुणाश्च मनुष्या निष्टप्ताः सन्ताप्यन्ते तां वाजिनीं बलवेगादिगुणशालिनीं सेनां वाजेध्यायै बहुभिः साधनैः प्रकाशनीयायै सत्यनीत्यै सम्माज्मि उत्तमोत्तम शिक्षाभिः शोधयामि ' इति, तदपि प्रलापमात्रम्, मन्त्राक्षरासम्ब-न्धात् । मन्त्रे संग्राम सेना बोधकपदाभावात् । १०- - ननु - अनिशित - सपत्नक्षिदितिपदयोस्तद्बोधकत्वं न सम्भवति, करणकारकक्विपः खण्डितत्वात् अनिशित इति प्रथमान्तविरोधात् असीतिमध्यमपुरुषक्रियाविरोधाच्च । न च व्यत्ययेन विभक्तिपुरुषविपरिणामो युक्तो, यथा श्रुतार्थबाधएव व्यत्ययाश्रयणोपपत्तेः । ' वाजशब्दोवेगादिगुणपर ' इत्यपि निर्मूलम्, प्रमाणानुपलम्भात् । ' अहम् अनिशिता-भिबृहतीभिः क्रियाभिः प्राप्तु ं योग्यं सपत्नक्षिद्भिः दोषाणां शत्रूणां वा नाशकैयज्ञः विघ्नकारिणः सत्यविरोधिनश्च दण्डेन दग्धा येन बन्धनार्हो विद्याविघ्नकारिणः सन्तापिता तं वाजिनं यज्ञ वाजेध्यायै अन्नाद्यभिव्यङ्ग्यायै क्रियायै सम्माज्मि शोधयामि । सपत्नक्षिता शत्रुनाशिकयाऽतिविस्तीर्णया क्रियया प्रत्युष्टं रक्षः प्रत्युष्टाः अरातयः विघ्नकारिणः प्राणिनः दुःखदोर्गन्ध्यादयो दोषाश्च नश्यन्ति त्वा त वाजिनीं सत्क्रियां वाजेध्यायै अनादिपदार्थेः प्रकाशनीयायं सत्यनीत्यै सम्माज्मि सम्यक् साधयामि ' इत्यपि विसङ्गतमेव पूर्वोक्तदोषदुष्टत्वात् । चाहिये । प्रकृत में हिंसार्थ की ही विवक्षा होने से ' क्षि क्षये ' धातु का रूप बताना असङ्गत ही है । अतएव ' सपत्नान् क्षिणुयात् ' - - ( ० १ ३ | || ६ ) इस श्रुति में ' क्षिणोति ' का ही प्रयोग किया गया है । उसी तरह ' प्रत्युष्ट ' तापनीयम्, निष्टप्तं निःसारणीयम् ' - यह कथन भी असङ्गत है । क्योंकि धात्वर्थ का अनुगम नहीं हो रहा है । उसी तरह ' अनि-शिता अतिविस्तीर्णा सेना वेदिर्वा ' - यह कथन भी सङ्गत नहीं हो रहा है । ' शो तनूकरणे ' धातु का ' निस् या निर् ' उपसर्ग लगने पर विशेषतः तीक्ष्णीकरण ही अर्थ हुआ करता है । ' नत्र ' का भी उसके अभाव बोधन में ही पर्यवसान है । अत एव ' अहं येनाऽनिशितेनाऽतिविस्तृतेन " " शोधयामि ' - यह दयानन्दीय व्याख्या केवल प्रलाप मात्र है । क्योंकि मन्त्र के अक्षरों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है । मन्त्र में संग्राम सेना आदि का बोधक कोई पद नहीं है । १० - करण कारक अर्थ में क्विप् का खण्डन हो जाने से ' अनिशित और सपत्नक्षित् ' ये दोनों पद उपर्युक्त अर्थ के बोधक नहीं हो सकते । तथा प्रथमान्त अनिशित पद से विरोध भी होगा । एवं ' असि ' इस मध्यम पुरुष की क्रिया के साथ भी विरोध होगा । व्यत्यय से विभक्ति और पुरुष में विपरिणाम करना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि व्यत्यय का आश्रय वहीं किया जाता है, जहाँ यथाश्रुत अर्थ का बाघ उपस्थित होता हो । ' वाज ' शब्द को वेगादि गुण परक बताना भी निर्मूल है, क्योंकि ऐसा करने में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है । ' अहं अनिशिताभि: बृहतीभिः क्रियाभिः... " सम्यक् साधयामि ' यह व्याख्यान भी पूर्वोक्त दोष से दूषित होने के कारण विसङ्गत ही है ।

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[ २६२ ] I अदित्यै रास्नासि विष्णोर्वेष्पोऽस्यूर्जे त्वाऽदब्धेन त्वा चक्षुषाव 1 पश्यामि । अग्नेर्जिह्वासि सुहूर्देवेभ्यो धाम्ने धाम्ने मे भव यजुषे यजुषे

॥ वा ० सं ० १ । ३० ॥

अर्थ - हे योक्त्र! ( यजमानपत्नी की कमर में बाँधी गई मूँज की डोरी को योक्त्र कहते हैं ) तुम पृथ्वी की करधनी हो । हे दक्षिण पाश! तुम यज्ञ के व्यापक हो । हे घृत! उत्तम रस की प्राप्ति के लिये तुझे तुम मैं अग्नि पतला की कर रहा हूँ । हे घृत! मैं उपद्रव रहित नेत्रों से नीचे की ओर ग्रीवा करके तुम्हें देख रही हूँ । के जिह्वा हो । और देवताओं के हविर्भाग हो । इस कारण मेरे भिन्न - भिन्न याग स्थानों में ' पृथक् - पृथक् यज्ञों की सिद्धि लिये तुम वहाँ प्राप्त होना ॥ ३० ॥

१ – ' पत्नी २७ ' सन्नह्यति प्रत्यग्दक्षिणतः उपविष्टां गार्हपत्यस्य मुञ्जयोक्त्रेण त्रिवृत्ता परिहरत्यधोवासो अदित्यै रास्नासीति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २७१ ) २- अध्वर्यु गर्हपत्यनि तिकोणे पूर्वतः समुपविष्टामीशानाभिमुखीं यजमानपत्नी त्रिगुणितेन मुनिमितेन ' योक्त्रेण नाभेरधः कटिप्रदेशे बध्नाति अदित्यै इतिमन्त्रेण परिहितवाससो बहिरुपरि तद्योक्त्रं परिवेष्टयेत् पत्नीसंस्कारत्वा-देव तत्प्रतिपत्नि कर्त्तव्यं सति पत्नी बहुत्वे । ३ - मन्त्रार्थस्तु - हे योक्त्र अदित्यै अदित्या भूमेस्त्वं रास्नासि रशनासि । योक्त्राधिष्ठातृदेवतस्य भूम्या निया-मकत्वेनैव भूमेरचलत्वम् योक्त्रेण यजमानपत्न्या अपि यज्ञानुष्ठानं यावदचलत्वम् । ४ - ' दक्षिणं पाशमुत्तरे प्रतिमुच्योर्ध्वमुद्गुहति विष्णोर्वेष्पो इति न ग्रन्थि करोतीति ' ( का ० ) श्रो इत्युणा ० सू ० २।७।२-३ ) अत्रपरम्पराप्राप्तः पाठो वेष्प इति पकारान्तो ज्ञेयः | ' पानीविषिभ्यः प: ' ( उ ० सू ० ३।३०३ १ - पत्नी ७ सन्नह्यति प्रत्यग्दक्षिणतः ' रास्नासीति ' - ( का ० श्री ० सू ०२ । ७ । १ ) । २ - अध्वर्यु, गार्हपत्य के नैर्ऋत्य कोण में पूर्व की ओर बैठी हुई, ऐशान्य दिशा की को ओर ' आदित्य मुख की ' मन्त्र हुई यजमान पत्नी की नाभि के नीचे कटि प्रदेश में पहने हुए वस्त्र पर मुझ से निर्मित त्रिगुणिक मेखला के रहने पर प्रत्येक से परिवेष्टित करता है । यह मेखला परिवेष्टन, पत्नी का संस्कार स्वरूप होने से अनेक पत्नियों पत्नी का मेखला येष्टन करना चाहिये । ३- मन्त्रार्थ इस प्रकार है- हे मेखले! तुम भूमि की रशना स्वरूप हो । मेखला ( योक्त्र के परिवेष्टन ) की अधिष्ठात्री के कारण देवता रूप भूमि की नियामक होने से ही भूमि की अचलता कही जाती है । अतः, उस योक्त्र यजमान पत्नी को भी यज्ञानुष्ठान तक अचल रहना चाहिये । न ४ – उसके दाहिने छोर को उत्तर की ओर निकाल कर ' विष्णोर्वेष्पो ' मन्त्र से ऊपर उसे उरस दे, परम्परा गाँठ लगावे इसे कात्यायन ने ' दक्षिणं पाशमुत्तरे ' - ( का ० श्री सू २७ २-३ ) सूत्र से बताया है । यहाँ मन्त्र में

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[ २६३ ] सूत्रेण विषेः पकारादेशेन रूपसिद्धिः । अध्वर्यु: योक्त्रस्य दक्षिणाग्रस्थितं पाशमुत्तराग्रस्थितस्य दक्षिणं पाशस्य पाशमूर्ध्वमुद्गृहति मध्ये उपरितः प्रवेश्य अध आकृष्य शङ कुस्थानीये प्रोतयित्वा ( ततः सामर्थ्यात् पाशं द्विगुण वेष्टयित्वा ) इति देवयाज्ञिकः । योक्त्रमध्य एव प्रेरयति । ऊर्ध्वं योक्त्रमध्ये गृहनसामर्थ्यात् द्विर्वेष्टनम् एकवेष्टने उद्गूहनस्याशक्यत्वात् । दक्षिणपाशस्यः हे दक्षिणपाश त्वं विष्णोर्यज्ञस्य वेष्पो व्यापकोऽसि । ( विष्लृ व्याप्तौ ) इतिघातोस्तद्र पनिष्पत्तेः वेष्टनं वा त्वमसि । यावद्यज्ञं नियामकत्वात्तस्य यज्ञव्यापकत्वोक्तिः । ( वेष्ट वेष्टने ) इत्यस्माद्वा वेष्नशब्दनिष्पत्तिः । यज्ञस्य पत्नीवेष्टनेन यज्ञ एव वेष्टितो भवति । आवर्ती वा वेष्पः त्वं यज्ञस्य विष्णोरावर्तोऽसि । ५- ' ऊर्जे त्वेत्याज्यमुद्वास्येति ' ( का ० श्रो ० सू ० २ | ७४ ) ऊजें त्वाम् उद्वासयामि इत्यध्याहारयुक्त , विलापितघृतस्य े न मन्त्रेणा-ध्वर्यु: आज्यमुद्वास्य पत्नीमवेक्षयेत् । हे आज्य त्वामुद्वासयामीति शेषः । किमर्थम् ऊर्जे उत्तमरसलाभाय सुस्वादुत्वात् । ६ – ' पत्नीमवेक्षयत्यदब्धेनेतीति ' ( का ० श्रो ० सू ० २७ ) पत्न्याज्यमवेक्षस्वेति अध्येषणा पूर्वकमाज्य- पश्यामि । मावेक्षयेत । हे आज्य अदब्धेन अनुपहिंसितेन चक्षुषा त्वामवपश्यामि: अवाचीनं यथा तथा अधोमुखी । पुंस्त्वमत्र-त्वमग्नेजिह्वासि । आज्यहोमावसरे जिह्वातुत्यज्वालोत्पत्तेः । सुहूः देवेभ्योऽर्थाय सुष्ठु हूयन्ते दृष्ट्वा इति देवा सुहूः आयान्तीत्यर्थः । छान्दसम् अथवा सुहूरिति जिह्वाया विशेषणम् । सुष्ठु हूयन्ते अनयेति सुहूजिह्वा । ज्वालां प्राप्त पाठ ' वेष्प ' ऐसा पकारान्त ही समझना चाहिये । ' पानी विषिभ्यः पः ' ( उ ० सू ० ) इस उणादि सूत्र से ' वर्षि ' को पकारादेश करने से ' वेष्प ' रूप सिद्ध होता है । अध्वर्यु, योक्त्र के दक्षिणाग्र में स्थित पिरोकर पाश ( उसके को उत्तराग्न सामर्थ्य . स्थित पाश के मध्य ऊपर की ओर प्रवेश कराकर और उसे नोचे खींचकर शङ कु स्थान उसे उरस देता है । योक्त्र में से पाश को द्विगुण लपेट कर ) दक्षिण पाश को ऊपर उरस देता है अर्थात् योक्त्र में ही गूहन करना शक्य नहीं है । ऊपर की ओर उसको उरसने से ( गूहन सामर्थ्यं से ) दो वेष्टन हो जाते हैं, एक वेष्टन में वेष्प: ' रूप की ऐसा देवयाज्ञिक कहते हैं । हे दक्षिण पाश! तुम यज्ञ के व्यापक हो, ( विष्लृ व्याप्तौ ) धातु से पाश इस को ' ) यज्ञ व्यापक निष्पत्ति हुई है । यह दक्षिण पाश, यज्ञ समाप्ति तक उसका ( यज्ञ का ) नियामक रहने से उसे ( वेष्टन हो, यह अर्थ कहा गया है । अथवा ' वेष्ट ' वेष्टने धातु से ' वेष्प ' शब्द की निष्पत्ति होती है । तब यज्ञ के तुम ' आवर्त ' भी हो होगा । पत्नी के वेष्टित होने से यज्ञ ही वेष्टित हुआ समझा जाता है । अथवा ' वेष्प ' शब्द का अर्थ सकता है । तुम यज्ञ रूप विष्णु के आवर्त हो । ५ – ' ऊर्जेत्वा इति आज्यमुद्वास्य ' - ( का ० श्रौ ० सू ० २७ ४ ), ' ऊर्जे त्वाम् उद्वासयामि ' इस अध्याहार ' यह शेष से युक्त हुए मन्त्र से अध्वर्यु आज्य का उद्वासन कर पत्नी का अवेक्षण करे । ' हे आज्य! त्वामुद्वासयामि हुआ ) घी लगना चाहिये । किसलिये? तो ऊर्ज में उत्तम रस के लाभ के लिये । क्योंकि तरल किया हुआ ( तपाया सुस्वादु होता है | ६ - ' पत्नीमवेक्षयत्यदब्धेनेतीति ' - ( का ० श्रौ ० सू ० २ | ७ | ) पत्नि! आज्यमवेक्षस्व ' इस प्रकार ) अध्ये- नेत्रों पूर्व ( आदरपूर्वक कहने पर ) पत्नी आज्य को देखे । हे आज्य! अनुपहिंसित अर्थात् निर्दुष्ट ( अदब्ध के से अधोमुखी होती हुई तुम्हें देख रही हूँ । तुम अग्नि की जिह्वा हो । आज्य से होम करने हवन के की अवसर जाती है पर, उसे जिह्वा ' सुहूः ' तुल्य ज्वालाओं की उत्पत्ति होती है । ' सुहू: ' -- देवताओं के लिये अच्छी प्रकार से जो अनया कहते हैं । यहाँ पर पुंस्त्व, छान्दस समझना चाहिये । अथवा ' सुहूः ' यह जिह्वा का विशेषण है स्थान । ' सुष्ठु सिद्धयर्थं हूयन्ते बनो । इति सुहू: जिह्वा ' । ज्वाला को देखकर देवताएँ आती हैं । अतः तुम तत्तद् यागफलोपभोग है इस कारण ' यजु ' को ' यजुष् ' शब्द, यहाँ पर याग परक है । ' फलेन युज्यते इति यजुर्यागः फल के साथ युक्त होता बन जाओ । क्योंकि याग भी कह सकते हैं । अतः ' यजुषे यजुषे ' का अर्थ तत्तदुद्यागसिद्ध्यर्थं हुआ, उसके लिये तुम

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[ २६४ ] अतो मै मम धाम्ने धाम्ने भव तथा यजुषे यजुषे भव । धामस्थानम् । तत्तद्यागफलोपभोगस्थानसिद्धयर्थं भव । यजुष्शब्दोऽत्र यागपरः । फलेन युज्यते इति यजुर्यागः । यजुषे यजुषे तत्तद्यागसिद्ध्यर्थं भव, आज्यसाध्यत्वा-द्यागस्य यागलभ्यफलस्थानस्यापि च । तत्साध्यत्वादाज्याधिष्ठातृदेवतमत्र प्रार्थ्यते । पत्न्यावेक्षितस्यैव संस्कृतत्वा-दाज्यस्य याग उपयोगः । आज्यावेक्षणञ्चकयैव पत्न्या कार्यम् द्रव्यसंस्कारत्वात् । एकावेक्षणेनोपपत्तौ अन्यस्य नरक्यात् । ७- स्वामिदयानन्दस्तु - ' हे जगदीश्वर यस्त्वमदित्यै अदित्या रास्नासि रसहेतुभूत क्रियासि, विष्णोर्विष्णुरसि सर्वस्य वेष्पोस्यग्नेजिह्वासि देवेभ्यो धाम्ने धाम्ने यजुषे यजुषे सुहूरसि एवं भूतं त्वामहमदब्धेन चक्षुषा ऊर्जे आदित्यै धाम्ने धाम्ने यजुषे यजुषे त्वा अवपश्यामि । स च त्वमस्माभिः कृपया विदितः पूजितश्च भव । ८ - यद्वा यतोऽयं यज्ञः अदित्या अन्तरिक्षस्य रास्ना रसादिपदार्थानां क्रियाकारणमस्ति । विष्णोर्यज्ञसम्ब-न्विकार्याणां वेपो व्यापकोऽसि अग्नेभौतिकस्य जिह्वासि, देवेभ्यो दिव्यगुणेभ्यो धाम्ने धाम्ने कीर्तिस्थानजन्मभ्यः, यजुषे यजुषे यजुषामाशयज्ञानाय सुहूः सम्यक् प्रशंसायं मे भव । अतस्त्वा त यज्ञमहं तस्मात्तमहमदब्धेन चक्षुषोर्जे-ऽवपश्यामि । तथात्वादित्यै देव भ्यो धाम्ने धाम्ने यजुषे यजुषे हितायावपश्यामि । सर्वेर्मनुष्यैरयं जगदीश्वरः प्रतिवस्तुषु स्थितः प्रतिमन्त्रं प्रतिपादितः पूज्यश्च भवतीति मन्तव्यम् । तथाचायं यज्ञः प्रतिमन्त्रेण सम्यगनुष्ठितः सर्वप्राणिभ्यः प्रतिवस्तुषु पराक्रमबलप्राप्तये भवतीति ' प्रोक्तवान्, एतदपि यत्किञ्चित्, यथेच्छव्यत्ययमूलकत्वात् । ६ - यत्तु अदितिपदार्थवर्णनप्रसङ्ग ' अनेन गमनागमनव्यवहारप्राप्तिहेतुरवकाशोऽन्तरिक्ष गृह्यते ' इति तन्न, याग का होना आज्य पर निर्भर रहने से याग, आज्य से साध्य है, और याग लभ्य फल स्थान भी आज्य से ही साध्य होने से आज्य की अधिष्ठात्री देवता की यहाँ प्रार्थना की गई है । पत्नी के द्वारा अवेक्षण संस्कार किया हुआ आज्य ही संस्कृत कहलाता है । तभी उस आज्य का याग में उपयोग हो पाता है । आज्य का अवेक्षण एक ही पत्नी करे । क्योंकि वह द्रव्य का संस्कार है । एक के अवेक्षण करने से ही जब संस्कार उपपन्न हो जाता है तब अन्य के द्वारा निरीक्षण करना निरर्थक है । ७ - स्वामी दयानन्द ने जो अर्थ किया है, वह उनका प्रलाप मात्र है, क्योंकि उन्होंने उसमें अपनी मनगढन्त व्यत्ययादि की कल्पना की है । स्वामी दयानन्द का अर्थ इस प्रकार है - ' हे जगदीश्वर! तुम अदिति की रस हेतुभूत क्रिया हो, तुम विष्णु हो, तुम अग्नि की जिह्वा हो, देवताओं के लिये प्रत्येक जगह तुम सुहू रूप हो, इस प्रकार के तुम को अदब्ध नेत्र से देखते हैं । इस प्रकार के तुम हमारे लिये कृपा करके विदित और पूजित हो जाओ । ८ - अथवा क्योंकि यह यज्ञ अन्तरिक्ष के रसादि पदार्थों की क्रियाओं का कारण है । यज्ञ से सम्बन्धित कार्यों में व्यापक है । तुम भौतिक अग्नि की जिह्वा रूप हो, दिव्य गुण वालों के लिये स्थान स्थान पर कीर्ति को पैदा करने वाले हो, यजुओं के आशय को जानने के लिये सुहू अर्थात् मेरी सम्यक् प्रशंसा के लिये बनो । अतः उस यज्ञ को मैं अदब्ध नेत्र से देख रही हूँ । उसी प्रकार देवताओं के लिये प्रत्येक स्थान पर तथा प्रत्येक यजु के हित के लिये देखती हूँ । यह जगदीश्वर प्रत्येक वस्तु में स्थित है, प्रत्येक मन्त्र में उसे बताया गया है वह पूजनीय है, ऐसा सभी मनुष्यों को मानना चाहिये । तथा च यह यज्ञ प्रत्येक मन्त्र के द्वारा सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित होने पर समस्त प्राणियों को प्रत्येक वस्तुओं में पराक्रम और बल की प्राप्ति के लिये होता है । उसी प्रकार अदिति पदार्थ के वर्णन के प्रसङ्ग में ' इससे गमनागमन व्यवहार प्राप्ति में हेतुभूत अवकाश ' शब्द से अन्तरिक्ष का ग्रहण किया है ' इति । यह भी उचित नहीं है, क्योंकि काल, आकाश आदि को समस्त कार्यों के प्रति साधारण कारण माना गया है, अतः उस विशेष कारणत्व उपपन्न नहीं हो सकता । ६ - उसी प्रकार ' रास्ना ' को रस हेतुभूत क्रिया कहना भी उचित नहीं है । क्योंकि जो सर्वसाधारण के प्रति

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[ २६५ ] कालाकाशादीनां सर्वकार्यं प्रति साधारणकारणत्वेन विशेषहेतुत्वानुपपत्तेः । यदपि रास्ना रसहेतुभूतक्रियेति तदपि न, सर्व-कारणस्य सर्वहेतुभूतक्रियावत्त्वेन वैशेष्यायोगात् । एवं चक्षुषा विज्ञानेन प्रत्यक्षप्रमाणेनेत्यपि निर्मूलम् इन्द्रियविशेषे रूढस्य चक्षुः शब्दस्य विज्ञानादिपरत्वायोगात् । शतपथ विरुद्धञ्च तत् । तथाहि-१० – ' अथ पत्नी ७ ° सन्नह्यति । जघनार्धो वा एष यज्ञस्य यत्पत्नी प्राङ् मे यज्ञस्तायमानो यादिति युनक्त्ये-वैनामेतत् युक्तामेव यज्ञमन्वासाता इति ' ( श ० १ | ३ | १ | १२ ) ११ - प्रषक्रमप्राप्त पत्नीसन्नहनं विधत्ते - अथेति । जघनार्थो वा गार्हपत्यानुष्ठेयेषु पत्नीसंयाजादिषु पत्न्याः सम्बन्धात् सा यज्ञस्यापरार्धः । किं तत् इत्याह प्रागिति । मदीयो यज्ञः प्रागपवर्गं तायमानः विस्तार्यमाणो यात गच्छेत । अतः परार्धमारभ्य यज्ञो विस्तारयितव्यः इत्यनेनाभिप्रायेण पत्नीं सन्नह्यदित्यर्थः । यदेतत्सन्नहनं तदेतत् रथे अश्वादीना-मिव पत्न्या यज्ञेन सार्धं योजनं बन्धनमित्याह युक्ता, योक्तुरभिप्रायाविष्करणम् । युक्ता च सा मदीयं यज्ञमनुलक्ष्य यज्ञ-समाप्तिपर्यन्तम् आसात आसीत नह्ययुक्तो रथो नियमेनास्ते । १२ – योक्त्रेण सन्नह्यति योक्त्रेणहि योग्यं युञ्जन्त्यस्ति वै पत्न्या अमेध्यं यदवाचीनं नाभेरथैतदाज्यम-वेक्षिष्यमाणा भवति । तदेवास्या एतद्योक्त्रेणान्तर्दधात्यथ मेध्येनैवोत्तरार्धेनाज्यमवेक्षते तस्मात् पत्नीं सन्नह्यति । ( श ० १ | ३ | १ | १३ ) १३ - एवं विहित सन्नहनं प्रशस्य तत्साधनं विधत्ते योक्त्रेणेति रथाद्यवयवस्य युगस्य धुरि बलीवर्दादि नियोजनार्थं दाम योक्त्रं सन्नह्यते । लौकिकोदाहरणेनैतत् द्रढयति योक्त्रेण योग्यं योजनीयमनडुदश्वादिकम् तच्च सन्नहनं नाभिदेशे कार्यमित्याह - भयज्ञियस्य पत्न्या नाभेरधोभागस्य यज्ञियस्योपरिभागस्य च मध्ये सन्नहनेन साङ्कर्य-निवारणात् यज्ञियेनैवोपरिभागेन विधास्यमानमाज्यावेक्षणं साधुकृत ं भविष्यतीत्यर्थः । कारण है, उसमें विशेष कारणता अनुपपन्न है । उसी प्रकार ' चक्षुषा विज्ञानेन ' अर्थात् प्रत्यक्ष प्राणी से कहना भी निर्मूल है | क्योंकि ' चक्षुष् ' शब्द, इन्द्रिय विशेष में रूढ़ ( प्रसिद्ध ) है, उसे विज्ञानादि परक मानना ठीक नहीं है । और उसे विज्ञान परक बताना, शतपथ के विरुद्ध भी है । तथाहि-१० - ' अथ पत्नी २७ सन्नह्यति । जघनार्थो वा ... यज्ञमन्वासाता ' इति ( श ० १ । ३ । १ । १२ ) । ११ – इस ब्राह्मण के द्वारा प्रषक्रम से प्राप्त पत्नी सन्नहन का विधान किया जा रहा है । ' जघनार्धो वा ' गार्हपत्य के अनुष्ठेय पदार्थों में अर्थात् पत्नी संयाजादिकों में पत्नी का सम्बन्ध रहने से, वह ( पत्नी ) यज्ञ का अपरार्ध भाग है । ' प्राक् ' से उसी को बताया जा रहा है । मेरा यज्ञ, ' प्राक् ' अपवर्ग तक विस्तार को प्राप्त करने वाला बने । अतः परार्ध से आरम्भ कर यज्ञ का विस्तार करना चाहिये । इसी अभिप्राय से पत्नी का सन्नहन करे । यह जो सन्नहन है, वह रथ में अश्वादिकों की तरह पत्नी का यज्ञ के साथ बन्धन ( योजन ) है । इसे युक्ता शब्द से बताया गया है, अर्थात् योक्ता के अभिप्राय को प्रकट किया गया है । यज्ञ साथ युक्त हुई वह पत्नी मेरे यज्ञ को ध्यान में रखकर यज्ञ की समाप्ति तक स्थिर रहे, क्योंकि बिना जुता रथ, नियमित नहीं रहता । १२ - ' योक्त्रेण सन्नह्यति पत्नीं सन्नह्यति ' - ( ० १ | ३ | १ | १३ ) १३ - इस प्रकार विहित सन्नहन की प्रशंसा करके उसके साधन का विधान ' योक्त्रेण ' से किया जा रहा है । दि के अवयवभूतयुग की धुरा में बलीवर्दादि ( बैल आदि ) के नियोजनार्थ योक्त्र ( दाम ) अर्थात् रस्सी को बांधे । इस लौकिक उदाहरण से यह दृढ़ किया जा रहा है कि योक्त्र ( रस्सी ) से अनडुह, आदि योग्य वाहक की योजना करनी चाहिये । उस सन्नहन को नाभिदेश में करना चाहिये । तात्पर्य यह है कि पत्नी की नाभि का अधोभाग अयज्ञीय है, और उसका उपरि भाग यज्ञिय है, उन दोनों भागों के बीच में सन्नहन करने ( बाँधने ) से साङ्कर्य नहीं हो पाता । यज्ञिय उपरि भाग से विधान किया जाने वाला आज्यावेक्षण उचित ( सम्यक् ) होगा, यह अर्थ है |

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[ २६६ ] १४ — स वा अधिवासः सन्नह्यति । ओषधयो वा वासो वरुण्या रज्जुस्तदोषधीरेवैतदन्तर्दधाति तथो हैनामेषा वरुण्या रज्जुर्न हिनस्ति तस्मादधिवासः सन्नह्यति । ( ० १ ३ ११३४ ) १५-- स सन्नह्यात् । अदित्यै रास्नासीतीयं वै पृथिव्यदितिः । सेयं देवानां पत्न्येषा वा एतस्य पत्नी भवति - तदस्या एतद्रास्नामेव करोति न रज्जु ७ ° हिरो वै रास्ना तामेवास्या एतत्करोति । ( श ० १ २ १।१५ ) विधत्ते स वा इति योक्त्रपत्नी शरीरयोर्वाससा व्यव-१६ - परिहितस्य वासस उपरि तत्सन्नहनं कार्यमिति धानं प्रशंसति - ओषधयः... " वै वास इति । सूत्रकार्पासादीनामोषधिप्रसूतत्वात् ओषधिवाससोस्तादात्म्य-व्यपदेशः । वरुणसम्बन्धिनी वरुण्या रज्जुः । स च वरुणपाशो निग्रहहेतुर्भवति, तस्य केनचिद् व्यवधानेन भाव्यमिति वासोलक्षणौषधिभिर्व्यवधानं युक्तम् । तस्य प्रयोजनमाह - तथो हेति । तथा सत्येषा वरुण्या रज्जुने॑नां यजमानपत्नीं हिनस्ति तस्मादधिवास: वासस उपरि सन्नह्यति । विहितं सन्नहनमनूद्य मन्त्रं विधत्ते स सन्नह्यति अदित्यं रास्नासीति मन्त्रेण मन्त्रं व्याचष्टे - इयं वै अदिति: अखण्डनीया देवानां पत्नी या पृथिवी सा चैषापि योषित् । एषा वा यजमानस्य पत्नी | पृथिव्या इवास्या रास्ना रशनामलङ्कारार्थी मणिमुक्तादिखचितां मेखलामेव बध्नाति न रज्जुमिति मन्त्र-प्रयोगाभिप्रायः । उक्तार्थपरतां रास्नाशब्दस्य दर्शयति हिरो वै रास्नेति । हिरशब्दो मेखलापर्याय: । तामेवास्याः करोति । योक्त्रे रज्जुबुद्धिमपोह्य अदितेर्मणिमुक्तादिखचितमेखलाबुद्धिः कार्येत्यर्थः । १७ – स वै न ग्रन्थि कुर्यात् । वरुण्यो वै ग्रन्थिः । वरुणोहपत्नीं गृहणीयात् यद्ग्रन्थि कुर्यात् । तस्मान्न ग्रन्थि कुर्यात् । ( ० १।३।१।१६ ) १८ – वरुणपाशो हि ग्रन्थिमान् । अतो ग्रन्थिरपि वरुणसम्बन्धी । तत्करणे वरुणः पत्नी गृहणीयात् बाधेत, तस्मान्न ग्रन्थि कुर्यात् । १४ – ' स वा अधिवासः सन्नह्यति । ओषधयो वा वासो " १५ - ' स सन्नह्यति | आदित्यं रास्नासीतीयं " ..... सन्नह्यति । ' ( श ० १ | ३ | १ | १४ ) एतत्करोति । ' ( श ० १ | ३ | १ | १५ ) १६ -- परिधान किये हुए वस्त्र के ऊपर उस सन्नहन को करने का विधान ' स वा इति ' से किया जा रहा है । योक्त्र और पत्नी शरीर दोनों के बीच में वस्त्र से हुए व्यवधान प्रशंसा ' ओषधयः वा वासः ' से किया गया है | क्योंकि सूत्र कार्पास आदि ओषधि प्रसूत होने से ओषधि और वस्त्र का तादात्म्य व्यपदेश ( व्यवहार ) किया गया है । ' वरुण्या रज्जु ' वरुण से सम्बन्धित है । वह वरुणपाश निग्रह करने में कारण होता है । अतः उसमें किसी व्यवधान का होना आवश्यक है, इसलिये वस्त्रात्मक ओषधियों से व्यवधान रहना उचित है । उस व्यवधान के रहने से यह वरुण्या रज्जु, इस यजमान पत्नी की हिंसा नहीं कर पाता, इसलिये वस्त्र के ऊपर सन्नहन किया जाता है । उक्त सन्नहन का अनुवाद करके ' स सन्नह्यति ' मन्त्र का विधान किया गया है । ' अदित्यं रास्नासि ' इस मन्त्र से मन्त्र की व्याख्या कर रहे हैं -- यह पृथिवी अखण्डनीय ( अदिति ) है, वह ( पृथिवी ) देवताओं की पत्नी है, यह यजमान की पत्नी भी पृथिवी के समान है, उसे अलंकृत करने के लिये मणि मुक्तादि रत्नों से जटित रशना ( मेखला ) ही पहनाता है, उसे रज्जु से बाँध नहीं रहा है, यह मन्त्र प्रयोग का अभिप्रय है । ' रास्ना ' शब्द की उक्तार्थ परता को ' हिरो वै रास्नेति ' से प्रदर्शित कर रहे हैं । ' हित ' शब्द से मेखला का पर्याय है । उस मेखला को ही उसे पहनाता है । योक्त्र में योक्त्र को रज्जु न समझे । वह अदिति की मणि - मुक्तादि खचित मेखला है, ऐसा रज्जु बुद्धि का त्याग कर अर्थात् समझना चाहिये | १७ – ' स वै न ग्रन्थि कुर्यात् । वरुण्यो वै ग्रन्थिः । ' ' ( श ० १ | ३ | १ | १६ ) " तस्मान्न ग्रन्थि कुर्यात् । ' १८ - - क्योंकि वरुण, ग्रन्थिमान् है । अतः ग्रन्थि भी वरुण से सम्बन्धित है । ग्रन्थि लगाने पर वरुण उस पत्नी का ग्रहण करेगा और उसे बाधा पहुँचावेगा । इसलिये ग्रन्थि नहीं लगानी चाहिये ।

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[ २६७ ] १६ - उर्ध्वमेवोद्गूहति । विष्णोर्वेष्पोऽसीति सा वै न पश्चात् न प्राची देवानां यज्ञमन्वास्ते तद्धेमा-मभ्यारोहेत् सा पत्नी क्षिप्रेऽमुं लोकमियात्तथोह पत्नी ज्योग्जीवति । तदस्या एवैतन्निह्न ते । तथो हैनामियं न हिनस्ति । तस्मादु दक्षिण इवेवान्वासीत ' ( श ० १ | ३ | १ | १७ ) 6 २० -- ननु ग्रन्थिकरणाभावे विस्त्रस्तं स्यादित्यत आह - योक्त्रस्य मूलाग्रे संयोज्य एकीकृत्य ऊर्ध्वमुद्गृहेत उपरिष्टात् लम्बयेत दक्षिणं पाशमुत्तरे प्रतिमुच्योर्ध्व मुद्गूहते । ' का ० श्र ० सू ० ) २१ – सन्नहनसमये गार्हपत्यस्य नैर्ऋत्यां दिशि पत्त्या अन्वासनं विधित्सुः साक्षात् पश्चात् प्राङ ्म मुखोपवेशनं निषेधति - सा वा इति । तदुपपादयति इयं वेति । इयं हि पृथ्वी देवानां पत्नी । सा गार्हपत्यस्य पश्चात् प्राङ्मुखी सदोप-विशति । अतस्तत्रान्वासीनामिमामेव देवपत्नीमन्वारोहेत । तथा च यो वाधरस्तं दर्शयति - सा पत्नी क्षित्रे अल्पकाल एव अमु ं लोकमियात् गच्छेत् । तथोहेति - पश्चादुपवेशनत्यागे सति उक्तदोषाभावाच्चिरकालं पत्नी जीवति तेन पश्चा-दासनत्यागेनास्या देवपत्न्या यदुपवेशनस्थानं तत् निह्र ते अपलपति । तत्स्थानवर्जनेन तां प्रीणयति । तथा चेयं पृथिवी - अपि एनां पत्नीं न हिनस्ति । तस्मात् देवपत्नी स्थानात् दक्षिणतो दक्षिणभागे गार्हपत्यस्य नैऋत्यां दिशी-त्यर्थः, अन्वासीत । २२ -- तदेव कात्यायनेन सूत्रितम् ' पत्नीं सन्नति प्रत्यग्दक्षिणत उपविष्टां गार्हपत्यस्य मुञ्जयोक्त्रेण ( का ० श्रौ ० सू ० २।१६४ ) २३ – ‘ अथाज्यमवेक्षते । योषा वै पत्नी रेत आज्यं मिथुनमेवैतत् प्रजननं क्रियते तस्मादाज्यमवेक्षते । ' ( श ० १ | ३ | १ | १८ ) २४ -- सावेक्षते । अदब्धेन त्वा चक्षुषावपश्यामीत्येवं तदाह अग्ने॑जिह्वासीति । यदा व एतदग्नोजुह्वत्यथाग्ने-१६ – ' ऊर्ध्वमेवोद्गृति । विष्णोर्वेष्पोऽसीति " " इवेवान्वासीत् । - ( श ० १।३।१।१७ ) । २०- यदि कोई शङ्का करे कि ग्रन्थि न लगाने पर वस्त्र ( पहना वस्त्र ) नीचे खिसक जायगा ( छूट जायगा ) तो इस शङ्का के समाधान में यह कहा गया है कि योक्त्र के मूलानों को एक करके ऊपर की ओर उरस देना चाहिये । कात्यायन ने भी कहा है- ' दक्षिणं पाशमुत्तरे प्रतिमुञ्चोर्ध्व मुद्गूहते ' - ( का ० श्र ० सू ० ) २१ – सन्नह्न के समय गार्हपत्य की नैर्ऋत्य दिशा में पत्नी के अन्वासन ( बैठना उपपादन ) विधि की ' इयं इच्छा वेति ' से से साक्षात् पश्चात् प्राङमुख होकर बैठने का निषेध ' सा वा इति ' से किया गया है । उसी का है । कर रहे हैं । यह जो पृथिवो है, वह देवों की पत्नी है । वह गार्हपत्य के पश्चात् प्राङ मुखी होकर सर्वदा बैठती हैं - वह अत: वहाँ पर बैठी हुई उसी पर देवपत्नी का अन्वारोहण होगा । उस कारण जो हानि होगी उसे बताते पत्नी अल्प काल में ही उस लोक को चली जायगी । किन्तु गार्हपत्य के पश्चात् भाग में जब नहीं बैठेगी तो उक्त दोष के न होने से चिर काल तक जीवित रहेगी । गार्हपत्य के पश्चात् भाग में आसन का त्याग करने से से उस इस देवपत्नी देवपत्नी की जो बैठने का स्थान है, उसे छोड़ देने से उस देवपत्नी का जो बैठने का स्थान है, उसे छोड़ देने के स्थान को वह प्रसन्न कर लेती है । तथा च यह पृथिवी भी इस पत्नी की हिंसा नहीं करती है । इसी कारण देवपत्नी से दक्षिण भाग में अर्थात् गार्हपत्य की नैर्ऋत्य दिशा में वह ( यजमान पत्नी ) बैठे । २२ -- इसी बात को कात्यायन ने भी अपने सूत्र में कहा है- ' पत्नीं सन्नह्यति " ( का ० श्रौ ० सू ० २।१६४ ) " मुञ्जयोक्त्रेण'-२३ – ' अथाज्यमवेक्षते । योषा वै पत्नी रेत आज्यं..... .... मवेक्षते । ' ( श ० १ | ३ | १ | १८ )