वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 281–290

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 281–290

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 281 का मूल पृष्ठ
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[ २६८ ] जिह्वा इवोत्तिष्ठन्ति तस्मादाहाग्नेजिह्वासीति । सुहूर्देवेभ्य इति साधुदेवेभ्य इत्येव तदाह- धाम्ने धाम्ने मे भव यजुषे यजुषे इति सर्वस्मै मे यज्ञायधीत्येव तदाह । ' ( श ० १ ३ । १ । १६ ) २५ – विहितमवेक्षणमनूद्य मन्त्रं विधत्ते सेति मन्त्रगतमदब्धेनेतिपदं व्याचष्ट अनार्तेनेति । अतिहिंसा तद्र-हितेन चक्षुषा त्वा त्वामवपश्यामि । अग्नेजिह्वासि - आज्यस्य जिह्वारूपत्वमुपपादयति- यदा वै एतदाज्यमग्नौ जुह्वति तदाग्नेजिह्वा जिह्वासदृशज्वालाहेतुत्वादाज्यं जिह्व त्युच्यते । मन्त्रगत सुहूरिति पद व्याचष्टे सुष्ठ हूयमानत्वात् सुहूः । अन होमानुगुण्येन साधुत्वं लक्ष्यत इत्यर्थः । धाम्ने धाम्ने इति मन्त्रशेषं व्याचष्ट सर्वस्मै मे यज्ञाय धीत्येवैतदाह धाम्ने धाम्ने तत्तद्ददेवताशरीराय यजुषे यजुषे तत्तद्ग्रहणमन्त्राय च पर्याप्तं भवेति मन्त्रार्थः । अतः सर्वस्मै यज्ञाय एधि भवेति तदर्थप्रतिपादनं मन्त्रेण क्रियते । २६ – ' अथाज्यमादाय प्राङ दाद्रवति आहवनीयेऽधिश्रयति यस्याहवनीये हवींषि श्रपयन्ति सर्वो मे यज्ञ आहवनीये शृतोऽसदित्यर्थः । यदमुत्राग्रे अधिश्रयति पत्नी ७ वाशयिष्यन् भवति नहि तदवकल्पते यत्सामि प्रत्यग्धरेत पत्नीमवकाशयिष्यामीत्यथ यत् पत्नीं नावकाशयेदनारियाद्ध यज्ञात् पत्नीं तथोह यज्ञात् पत्नीं नान्तरेति तस्मात् सार्धमेव विलाप्य प्रागुदाहरत्यवकाश्य पत्नीं यस्योपपत्नी न भवत्यग्र एव तस्याहवनीयेऽधिश्रयति तत्रत आदत्ते तदन्तर्वेद्यासादयति । ' ( श ० १।३।१।२० ) २७ - पुरस्ताद्धरणं विधत्ते अथ पत्न्यवेक्षणानन्तरं पुनस्तस्याज्यस्याहवनीयाधिश्रयणं विधत्ते तदाहवनीये अधियतीति । हविः श्रपणमाहवनीयगार्हपत्ययोर्विकल्पितम् । तत्राहवनीयाधिश्रयणपक्षे पत्न्यवेक्षणानन्तरं पुरस्ताद्-धृत्वा आहवनीयेऽधिश्रयेत् । एवं कुर्वतोऽभिप्रायमाह सर्व इति । सर्वो मे यज्ञ आहवनीये शृतोऽसदित्यादि । यागसाधन-त्वाद्धविरत्र यज्ञशब्दार्थः । सर्वं मदीयं हविराहवनीये संस्कृतमिति - अस्मिन्नपि पक्षे प्रथमतो गार्हपत्याधिश्रयणे कारणमाह - अथ यदमुत्रेति । अमुत्न गार्हपत्ये अग्रे पशुपुरोडाशाधिश्रयणकाले पत्नीमवकाशयिष्यन् पत्न्याज्यावेक्षणा-२४ - ' सावेक्षते । अदब्धेन त्वा चक्षुषा " " त्येवैतदाह । ' ( श ० १ | ३ | १ | १६ ) २५ - विहित अवेक्षण का अनुवाद करके ' सेति ' से मन्त्र का विधान किया जा रहा है । मन्त्रगत ' अदब्धेन ' पद की व्याख्या ' अनातेन ' से करते हैं । ' अति ' शब्द का अर्थ है हिंसा । अतः हिंसा रहित चक्षुषा से तुम्हें देखता हूँ । तुम अग्नि की जिह्वा हो । आज्य की जिह्वा रूपता का उपपादन करते हैं- जब आज्य भाग ( दो आज्य भाग ) की आहुति देने हैं, तब अग्नि की जिह्वा के समान ज्वाला का हेतु होने से आज्य को जिह्वा शब्द से कहा जाता है । मन्त्रगत ' सुहः ' पद की व्याख्या करते हैं - ' सुष्ठु हूयमानत्वात् सुहूः ' अच्छी तरह हूयमान होने से ' सुहूः ' कही जाती है । होम के इस आनुगुण्य ( आनुकूल्य ) से साधुत्व लक्षित होता है । ' धाम्ने धाम्ने ' इस मन्त्र शेष की व्याख्या करते हैं - मेरे सम्पूर्ण यज्ञ के लिये आओ । इसी बात को बता रहे हैं ' धाम्ने धाम्ने ' तत्तद् देवता शरीर के लिये और ' यजुषे यजुषे ' तत्तद् ग्रहण मन्त्र के लिये पर्याप्त हो जाओ । यह मन्त्रार्थ है । अतः सम्पूर्ण यज्ञ के लिये तुम बने रहो, इस अर्थ का प्रतिपादन मन्त्र से किया गया है । 4 २६ – ' अथाज्यमादाय प्राङ दाद्रवति " -" तदन्तर्वेद्या सादयति । - ( श ० १1३1१/२० ) २७ – ' अथेति ' ब्राह्मण से पुरस्तात् ( सामने से ) हरण का विधान किया गया है । ' अथ ' शब्द का अर्थ पत्नी के द्वारा अवेक्षण करने के अनन्तर है । पुनः आहवनीय पर उसके अधिश्रयण का विधान ' तदाहवनीये ' इत्यादि ब्राह्मण से किया गया है । हविः श्रपण, आहवनीय पर अथवा गार्हपत्य पर करने का विकल्प है । आहवनीय पर श्रपण करने के पक्ष में पत्नी के द्वारा आज्यावेक्षण कर चुकने पर ही उस आज्य को सामने ( पुरस्तात् ) रखकर आहवनीय पर रखे ( अधिश्रित करे ) । इस प्रकार करने का अभिप्राय ' सर्वो मे यज्ञ ' से कह रहे हैं । याग का साधन होने से ' हवि '

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[ २६६ ] तोस्तत्सन्निधानाय गार्हपत्येधिश्रयणं कर्त्तव्यमित्यर्थः । प्रथमत एवाज्यास्याहवनीयेऽधिश्रयणे दोषमाह -नहीति । पुरोडाशाधिश्रयणकाल एव आहवनीये यद्याज्यमधिश्रयेत तदा गार्हपत्यसमीपेऽन्वासीनायाः पत्न्यास्तदन्वावेक्षणं न घटते भिन्नदेशत्वात् । यदि च पत्नीमवकाशयिष्यामि अवेक्षयिष्यामि इति तदर्थं सामि संस्कारमध्ये तत् प्रत्यक् पश्चात् पत्न्याः समीपमाहरेत् तदा संस्कारविघातः स्यात् तदपि न युज्यते । अथैतद्दोषपरिजिहीर्षया पत्नीं नावेक्षयेतेति । तस्याः पत्न्या यज्ञादन्तरायो भवति तस्माद् गार्हपत्यै हविः श्रपणपक्षे ह्याज्यमपि तत्रैवाधिश्रीयते इति समीपोपविष्टायाः पत्न्या-स्तदवेक्षणं घटते इति न काप्यनुपपत्तिः । आहवनीयश्रपणपक्षे प्रथमत एवाज्यस्यापि तत्रैवाधिश्रयणे पूर्वोक्तदोषः प्रसज्यते । कथं तहि तस्मिन् पक्षे कार्यमिति चेत् उच्यते - प्रथमतो गार्हपत्येऽधिश्रित्य पत्न्यवेक्षणानन्तरमाहवनीय-समीपं नीत्वा तत्राधिश्रयेत । तथासत्युक्तदोषो न भविष्यति । तथोह यज्ञात्पत्नी नान्तरेति - तस्मादु सार्धमेव विलाप्य प्रागुदाहरत्यवकाश्य पत्नीमिति । यस्मादेवमाहवनीये प्रथमतोधिश्रयणे दोषस्तस्मात् पत्न्या सार्धं गार्हपत्ये प्रथमाज्यस्य विलापनम् । यस्य तु पत्न्या रजोदर्शनादिनिमित्तवशेनासन्निधानात् तदीयकर्माण्याज्यावेक्षणादीनि न क्रियन्ते तस्योक्तदो-षाभावात् प्रथमत एवाहवनीय आज्याधिश्रयण कार्यम् २५- '- ' तदाहुर्नान्तर्वेद्यामासादयेदतो वै देवानां पत्नीः संयाजयन्ति - अवसमा आह- देवानां पत्नीः करोति परः पु ७ ° सो हास्य पत्नी भवतीति । तदुहोवाच याज्ञवल्क्यो यथादिष्टं पत्न्या अस्तु कस्तदाद्रियेत यत्परः पुसा पत्नी स्यात् । यथा वा यज्ञो वेदिर्यज्ञ आज्यं यज्ञाद्यज्ञ निर्मिमा इति तस्मादन्तव द्येवासादयेत् । ' ( श ० १।३।१।२१ ) को यहाँ पर ' यज्ञ ' शब्द से कहा गया है । मेरा आज्य - पुरोडाशादि रूप सभी हवि, आहवनीय पर संस्कृत हो, इस अभिप्राय से यह कहा गया है । इस पक्ष में भी प्रथमतः गार्हपत्य पर अधिश्रयण करने का कारण ' अथ यदमुत्र ' इत्यादि से बताते हैं । ' अमुत्र ' गार्हपत्य पर, ' अग्रे ' पशु पुरोडाश का अधिश्रयण करते समय ' पत्नीमवकाशयिष्यन् ' पत्नी उसे देख सके इस निमित्त उसके सन्निधान के लिये गार्हपत्य पर उसका अधिश्रयण करना चाहिये । प्रथमतः ही आहवनीय पर आज्य का अधिश्रयण करने पर ' न हि ' इत्यादि से दोष बताते हैं । पुरोडाशाधिश्रयण काल में ही आहवनीय पर यदि आज्याधिश्रयण करें तो दोनों का देश भिन्न रहने से गार्हपत्य के समीप बैठी हुई पत्नी उसे अच्छी तरह से देख नहीं सकेगी । और पत्नी को ' अवकाशयिष्यामि ' अवेक्षण करा दूँगा ( दिखा दूँगा ) ' इति ' इस इच्छा से ' सामि ' संस्कार के मध्य में उसे ' प्रत्यक् ' गार्हपत्य के पश्चात् भाग में बैठी हुई पत्नी के समीप यदि ले जाय तो संस्कारका विघात हो जायगा, तो वह ( संस्कार का विघात होना ) भी उचित नहीं है । यदि संस्कार विधात रूप दोष का परिहार करने की इच्छा से पत्नी को उसे न दिखाया जाय तो उस पत्नी का यज्ञ में कोई प्रयोजन ही नहीं रहेगा । तात्पर्य यह है कि गार्हपत्य पर हविश्रपण पक्ष में आज्य का गार्हपत्य पर ही अधिश्रयण होने से और उसी के समीप पत्नी के बैठे रहने से वह उसे अच्छी प्रकार से देख सकती है, देखने में उसे कोई बाधा नहीं रहती । किन्तु आहवनीय श्रपण पक्ष में प्रथमत एव आज्य का भी उस पर अधिश्रयण करने पर उक्त दोष की प्रसक्ति होगी । अतः इस पक्ष में कैसे करना होगा? ऐसी जिज्ञासा होने पर बताया गया है कि प्रथमतः गार्हपत्य पर अधिश्रयण करके पत्नी के द्वारा अवेक्षण किये जाने पर आहवनीय के समीप ले जाकर उस पर उसे अधिश्रित करे । ऐसा करने पर उक्त दोष नहीं होगा । निष्कर्ष यह है कि आहवनीय पर प्रथमतः अधिश्रयण करने पर दोष होता है । इस कारण पत्नी के साथ प्रथमतः गार्हपत्य पर आज्य का विलापन किया जाता है किन्तु रजोदर्शनादि के कारण जिसकी पत्नी का सन्निधान नहीं रहता, उस समय पत्नी सम्बन्धित आज्यावेक्षणादि कर्म का अनुष्ठान नहीं किया जाता उस समय अनवेक्षण जनित दोष के न हो पाने से आहवनीय पर प्रथमतः ही आज्याधिश्रयण करने के लिये ' यस्योपत्नी ' इत्यादि ब्राह्मण से बताया गया है । २८ - तबाहुनन्ति I द्यामासादयेदतो ..... सादयेत । ' - ( श ० १।३।१।२१ )

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[ २७० ] २६- तस्याज्यस्यान्तर्वेद्यासादनं केषाञ्चिन्मतेन निषेधति तदाहुरिति । निषेधाभिप्रायमाह - अतः अस्मादेव खल्वाज्यात् देवपत्नीनां यागः, अतस्तत्सम्बद्धस्याज्यस्यान्तवद्यासादने सति तदैव देवपत्नी: अवसमा अवगत जनसमूहाः करोति यष्टव्यदेवसङ्घस्य वेद्यामवस्थानात् । मह इति निपातो विनिग्रहे । अस्तु तथात्वं देवपत्नीनां किं तत परस्ता- इत्यत आह - देवपत्नीनां समाप्रापणात् अस्य यजमानस्य पत्न्यपि पर: पुंसा भवति । परस् इत्ययं सकारान्तः शब्दः दर्थे स्वपुरुषादन्यत्र राजवीथ्यादौ पुरुषसमूह प्राप्ताः परः पुंसा इत्युच्यते ' अचतुरविचतुरे ' ( पा ० सू ० ५।४।७७ ) त्यादि स्त्रीति निपातितत्वात् परःपुरंसेत्युप् पदान्तरेऽपि समासान्तो ऽच्प्रत्ययः । इत्येकीयमत समाप्त्यर्थं याज्ञवल्क्यमते-नान्तद्यासदनमेव निगमयति श्रुतिः तदिति । यथादिष्टं यथादेशनं यथाशास्त्र पत्न्याः सम्बन्धि कार्यमस्तु अतः पत्नीसंयाजार्थमन्तव द्यासादनमिति न युक्तम् पत्न्यपि परः पुरंसा वा भवतु प्रयाता यथा तथा वा भवतु तथापि किं प्रयोजनम् अतः परः पु ' सेति दूषणं को वा आद्रियेतेत्यर्थः । एवमुक्तदूषणं निरस्य वेद्यासादनपक्षमुपपादयति यज्ञो वेदिः । वेदिराज्यश्वोभयमपि यज्ञसाधनत्वात् यज्ञः । तथा च वेद्यासादने वेदिरूपाद्यज्ञादाज्यरूपं यज्ञं निर्मिमे निर्मितवान् भवती-त्यभिप्रायेण तत्रैवासादयेदित्यर्थः । तस्मादन्तर्वेद्ये वासादयेत् । ३० - एवं श्रुतिसूत्रानुसारेण मन्त्रार्थः स्पष्टो भवति । हे योक्त्ररज्जो त्वमदित्यैभूम्या रास्नासि रशना मेखला भवसि । यद्वा अदित्या इन्द्राण्या सन्नहनं वस्त्रस्योपरि सम्यग्बन्धन हेतु सौवर्णदामस्थानीयमसि । तमेतं मन्त्रं तित्तिरिरपि स्पष्ट व्याख्याति - अदित्यैरास्नासि इयं वा अदिति: । अस्मा एतद्वास्नां करोति इन्द्राण्यै सन्ननमित्याह -- ' इन्द्राणी वा अग्रे देवताना १७ सन्नत आध्नोंदितिश्रुतेः । हे योक्त्र पाश त्वं विष्णोर्व्यापकस्य यज्ञस्य वेष्पो वेष्टनरूपोऽसि । २६ - कुछ लोगों के मत से अन्तर्वेदि में उस आज्य के आसादन ( स्थापन ) करने का निषेध किया गया है । निषेध करने का अभिप्राय यह है कि इसी आज्य से देव पत्नियों के लिये याग करना है, अतः तत्सम्बन्धित आज्य का अन्तर्वेदी में आसादन करने पर, उसी समय देव पत्नियों को जन समूह से अवगत कराया जाता है, क्योंकि यष्टव्य देव समूह वेदी में अवस्थित रहता है । विनिग्रह के अर्थ में ' अह ' निपास है । यह सब करने से देव पत्नियों को क्या लाभ हुआ? उसे बता रहे हैं- देव पत्नियों को प्राप्त कराने से इस यजमान की पत्नी भी परः पुंसा होती है । ' परस् ' शब्द सकारान्त ' परस्तात् ' के अर्थ में है । राजवीध्यादि मार्ग में स्वपुरुष के अतिरिक्त पुरुष समूह में प्राप्त होने बाली को ' परः पु'सा ' कहते हैं । ' अचतुरविचतुर ' ( पा ० सू ० ५।४।७७ ) सूत्र में ' स्त्री पुस ' ऐसा निपातन करने के कारण ' परः पुंसा में उपपद का व्यवधान रहने पर भी समासान्त ' अच् ' प्रत्यय किया गया है । इस प्रकार किसी एक के मत की समाप्ति का प्रदर्शन करने के लिये ' इति ' शब्द कहा गया गया है । अब याज्ञवल्क्य के मत से भगवती श्रुति ' तदिति ' से अन्तर्वेद्यासदन करने को ही बता रही है । शास्त्र के आदेशानुसार अर्थात् शास्त्र ने जैसा विधान किया हो तदनुसार हा पत्नी सम्बन्धित कार्य होना चाहिये । अतः पत्नी संयाजार्थ अन्तर्वेदी में आज्यासादन करना उचित नहीं है । यजमान पत्नी भी परः पुंसा हो अथवा जो कुछ भी हो, तथापि उससे कौन सा प्रयोजन सिद्ध हो रहा है । अत: ' परः पुंसा ' इस दूषण का आदर कौन करेगा । इस प्रकार उक्त दूषण का निरसन करके वेद्यासादन पक्ष का ' यज्ञोवेदिरिति ' से उपपादन करते हैं । वेदि और राज्य दोनों ही यज्ञ के साधन रहसे से ' यज्ञ ' रूप हैं । तथा च वेद्यासादन में वेदि स्वरूप यज्ञ से आज्य स्वरूप यज्ञ निर्मित होता है, इस अभिप्राय से वेदि में ही आज्यासादन करना चाहिये । एवञ्च अन्तर्वेदि में ही आज्यासादन करे । ३० - इस प्रकार श्रुति और सूत्र के अनुसार मन्त्र का अर्थ स्पष्ट हो जाता है । हे योक्त्र अर्थात् हे रज्जो! तुम भूमि की रशना ( मेखला ) हो, अथवा ' आदित्या: ' इन्द्राणी के ' सन्नहनं ' वस्त्र के ऊपर सम्यग्बन्धन की हेतुभूत सुवर्ण की रशना स्वरूप तुम हो । तित्तिरि ने भो इस मन्त्र की स्पष्ट व्याख्या की है-- अदित्यै रास्नासि इयं वा अदितिः । ' इन्द्राण्यै सन्नहनम् ' से उसके लिये इसकी रस्ना ( रशना ) करता | क्योंकि ' इन्द्राणी वा अग्रे ' इस श्रुति ने कहा है । हे योक्त्र पाश! तुम ' विष्णोः ' व्यापक यज्ञ के ' वेष्प: ' वेष्टन रूप हो । ' विष्लृ व्याप्ती ', ' वेष्ट वेष्टने ' इन दो

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[ २७१ ] ' from व्याप्त ' ( वेष्ट वेष्टने ) इत्यनयोरूपम् । हे आज्य विलापनाय पूर्वं वह्नावधिश्रितं त्वा त्वामिदानीमूर्जे अधिकपा-काभावे स्वादुतमरसलाभाय बह्रिप्रदेशाद्बहिरुद्वासयामीति शेषः । हे आज्य अदब्धेन हिंसारहितेन चक्षुषा त्वा त्वामव-पश्यामि । अवाचीनं यथास्यात्तथा अधोमुखी सती पश्यामि, आज्यमग्नौ यदा जुह्वति तदाग्नेजिह्वेव ज्वालोत्पद्यते अतस्तन्निमित्तत्वादग्नेजिह्वासि । किश्व हे आज्य त्वं सुहूः देवेभ्योऽर्थाय सुष्ठ, हूयसे इति सुहूः पुंस्त्वं छान्दसम् । यद्वा जिह्वाविशेषणम् -सुष्ठु हूयन्ते आहूयन्ते देवा अनया सा सुहजिह्वा । अतो हे आज्य मे धाम्ने धाम्ने भव धामस्थाने तत्त-द्यागफलोपभोगस्थान सिद्ध्यर्थं भव । यजुषे यजुषे तत्तद्यागसिद्धये योग्यं भव । ३१ -- अध्यात्मपक्षेऽपि - हे परचितिरूपे त्रिपुरसुन्दरि त्वम् अदित्या इन्द्राण्या रास्नासि मेखलोपलक्षितसर्वा -लङ्कारभूतासि । हे श्रुतिसीमन्तसिन्दूरीकृत पादाब्जधूलिके विष्णोर्व्यापकस्य यज्ञस्य विष्णोर्वा वेष्पो वेष्पासि पुंस्त्वमार्षं वेष्टनरूपासि व्यापकरूपासि सर्वाधिष्ठानरूपत्वात् । हे देवि त्वां अदब्धेनानुपहसितेन ( अनुपहतेन ) अर्थात् सानुरागेण चक्षुषा ज्ञानचक्षुषा त्वदनुग्रहोपेतेन बाह्यचक्षुषा चावपश्यामि । अन्तर्मुखः सन् पश्यामि । त्वमग्ने रग्न्युपलक्षितानां सर्वदेवानां जिह्वासि जिह्वादिवत् सर्वरसादिग्राहयित्री असि श्रोत्रस्य श्रोत्रम् चक्षुश्चक्षुरित्यादिश्रुतेः । त्वं च देवेभ्यो हिताय सुहूः सुष्ठतया सर्वेहूयसे स्तूयसे इति सुहूः । यद्वा देवेभ्यः सुष्ठ, हूयतेऽनयेति सुहूः स्वाहा असि । स्वाहाकारस्य देवतृप्तिहेतुत्वात् । हे चिद्रूपे सा त्वं धाम्ने धाम्ने प्रतिदिव्यस्थान यजुषे यजुषे प्रतियाग प्राप्यतया इज्यतया च त्वमेव भव । धातुओं से यह ' वेष्प: ' रूप बना है । हे आज्य! विलापन ( पिघलाने ) के लिये वह्नि पर अधिश्रित किये तुम्हें अब मैं ' ऊर्जे ' अत्यधिक पाक के अभाव में अत्यन्त सुस्वादु रस प्राप्ति के लिये अग्नि पर से बाहर उसे निकालता हूँ । हे आज्य! हिंसा रहित चक्षु से तुम्हें मैं देख रहा हूँ । और अधोमुख होकर मैं तुम्हें देखती हूँ । दो आज्य भागों का जब हवन करते हैं तब अग्नि की जिह्वा की तरह ज्वाला उत्पन्न होती है । उस कारण तुम अग्नि की जिह्वा रूप हो । किश्व हे आज्य! तुम सुहू स्वरूप हो । देवताओं के उद्देश्य से अच्छी तरह से तुम्हारा हवन किया जाता है इस कारण तुम्हें ' सुहू ' कहा जाता है । यहाँ पुंस्त्व प्रयोग छान्दस है । अथवा उसे जिह्वा का विशेषण भी कह सकते हैं | अच्छी प्रकार से बुलाये जाते हैं देवता जिससे ऐसी सुहू अर्थात् जिह्वा अतः हे आज्य! मेरे धाम स्थान में अर्थात् तत्तद् धाम फलोपभोग स्थान की प्राप्ति के लिये तुम कारण बनो । उसी प्रकार तत्तद् याग सिद्धि कराने के योग्य तुम बन जाओ । ३१ - अध्यात्म पक्ष में भी - हे परचितिरूपे त्रिपुर सुन्दरि! तुम इन्द्राणी की रास्ना स्वरूप हो । अर्थात् मेखला के रूप में उसके सम्पूर्ण अलङ्कार स्वरूप हो । हे श्रुतिसीमन्त सिन्दूरी कृत पादाब्ज धूलिके । इस व्यापक यज्ञ अथवा विष्णु के वेष्प हो यानी वेष्टन रूप हो, सर्वाधिष्ठान रूप होने से व्यापक रूप हो । यहाँ पुस्त्व का प्रयोग आर्ष है । हे देवि! मैं तुम्हें अनुपहत ( अदब्ध ) यानी सानुराग चक्षु से ( ज्ञान चक्षु से ) और तुम्हारे अनुगृहीत बाह्य चक्षु से भी देख रही हूँ । अन्तर्मुख होकर देख रहा हूँ । तुम अग्नि से उपलक्षित हुए समस्त देवताओं की जिह्वा के समान सम्पूर्ण रस आदि की ग्रहण करने वाली हो । क्योंकि श्रुति ने तुम्हें श्रोत्र की भी श्रोत्र और चक्षु की भी चक्षु बताया है । और तुम देवताओं के हित के लिये सुहू रूप हो । सभी लोगों के द्वारा सुष्ठतया तुम स्तुत होती हो इस कारण तुम्हें ' सुहू ' कहा गया है । अथवा देवताओं के लिये सुष्ठु तया इससे हवन किया जाता है इसलिये तुम सुहू यानी स्वाहा रूप हो । स्व'हाकार से देवताओं की तृप्ति हुआ करती है । हे चि पे! प्रत्येक दिव्य स्थान में और प्रत्येक याग में प्राप्त होने योग्य और यजन के योग्य तुम ही हो जाओ ।

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[ २७२ ] 1 सवितुस्त्वा प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । 1 I 1 तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि धामनामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसिं ॥ वा ० सं ० ११३१ ॥ अर्थ - हे आज्य! प्रेरक सूर्य देवता की प्रेरणा से मैं छिद्र रहित पवित्र और सूर्य किरणों के द्वारा तुम्हें शुद्ध कर रहा हूँ । उसी तरह हे प्रोक्षणी जल! यज्ञ निवास स्थान भूत सूर्य की किरणों से और छिद्र रहित पवित्र से मैं तुम्हें प्रेरक देवता की प्रेरणा के कारण शुद्ध कर रहा हूँ । हे आज्य! तुम शरीर की कान्ति को देने वाले तेज हो और प्रका-शक हो और अविनश्वर हो । उसी तरह हे आज्य! तुम समस्त देवताओं के स्थान हो, सबको झुकाने वाले हो और देवताओं के द्वारा तिरस्कार न करने के कारण तुम उनके प्रिय हो । और तुम देवताओं के याग के साधन हो, इसलिये मैं तुम्हारा ग्रहण करता हूँ, ।३१।३ १ --- अध्वर्यु ': पवित्राभ्यामाज्यं प्रोक्षणीश्चोत्पुनाति सवितुर्वं इति मन्त्राभ्याम् । ' सवितुस्त्वेत्याज्यमुत्पुनातीति ' ( का ० श्र ० सू ० २ | ७ | ७ ) सवितुर्देवस्य प्रसवे आज्ञायां वर्तमानोहं त्वा त्वां उत्पुनामि शोधयामि । ' प्रोक्षणीश्च पूर्ववत् ' ( का ० श्री ० ० सू २ | ७ | ८ ) वः युष्मान् उत्पुनामि । आज्यमवेक्षते तेजोऽसीति । ' ( का ० श्री ० सू ० २७७ ) हे आज्य स्व ' तेजोऽसि । शरीरकान्तिहेतुत्वादाज्यस्य तेजस्त्वम् । शुक्रमसि दीप्तिमदसि । स्निग्धरूपत्वात् दीप्तिमत्त्व अमृतमसि विनाशरहितमसि बहुदिनावस्थानेऽपि ओदनादिवत् पर्युषितत्वादिदोषाभावादमृतत्वम् भक्षण- दान - हवनादिभिराज्यं तेजस्वित्व दीप्तिमत्वामृतत्वादीनि सम्पादयति । २ - ' त्रवेणाज्यग्रहणं चतुर्जुह्वां धाम नामेति सकृन्मन्त्रम् ' ( का ० श्रो ० सू ० २ / ७ / ११-१२ ) स्र ुवेण जुह्वां चतुर्वारमाज्यं गृह्णीयात् । चतुरः स्र ुवान् पूर्णान् गृह्णीयात् । अतएव मन्त्रः प्रथमत्र वग्रहणे प्रयोज्यः । हे आज्य त्व १ - ' स्त्वा ' और ' सवितुर्व: ' इन दो मन्त्रों से अध्वर्यु दोनों हाथों में परस्पर असंसृष्ट पवित्र रखकर उनसे भाज्य और प्रोक्षणी स्थित जल का उत्पवन करे । ' सवितुस्त्वेत्याज्यमुत्पुनाति ' - ( का ० श्री ० सू ० २ | ७/७ ) – सबिता देव की आज्ञा में रहने वाला में तुम्हारा शोधन करता हूँ । ' प्रोक्षणीश्च पूर्ववत् ' मैं तुम्हारा उत्पवन करता हूँ । ' ' आज्यमवेक्षते तेजोऽसीति ' - ( का ० श्री ० सू ० ३ | ७ | ८ ) हे आज्य! तुम तेजोरूप हो । शरीर की कान्ति का उत्पादक होने से आज्य को ' तेज ' कहते हैं । तुम शुक्र स्वरूप हो, दीप्तिमान् हो । स्निग्ध रूप होने से उसमें दीप्तिमत्ता है । तुम अमृत रूप हो यानी विनाश रहित हो । बहुत दिनों तक रहने पर भी ओदन ( भात ) आदि की तरह उसमें पर्युषित-त्वादि दोष न होने के कारण उसे अमृत कहा जाता है । भक्षण, दान, हवन आदि के द्वारा आज्य, तेजस्वित्व, दीप्तिमत्व अमृतत्व को सम्पन्न करता है । २ - त्रवेणाज्यग्रहणं चतुर्जुवां धाम नामेति सकृन्मन्त्रम् ' ( का ० श्रौ ० सू ० २ | ४ | ११-१२ ) स्र ुव से जुहू में चार बार आज्य का ग्रहण करे । आज्य से पूर्ण हुई चार स्रुवाओं को ग्रहण करे । अतएव प्रथम स्रव के ग्रहण में मन्त्र

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[ २७३ ] धाम स्थानमसि । धीयते स्थाप्यते चित्तवृत्तिर्देवैरत्रेति धाम | भोग्यत्वेन देवानामपि त्वद्विषयिणी बुद्धिर्धीयते त्वयि । तथा त्वं नामासि नामयति स्वात्मानं प्रति सर्वाणि भूतानीति नाम । आज्यदर्शनेन सर्वेऽप्यत्तुं नमन्ति । तथा देवानां प्रियमिष्टमसि त्वं तथा अनाधृष्टमनभिभूतं गतरसत्वादिना पुरोडाशादिवदतिरस्कृतम्, चिरस्थित्या चरुपुरोडाशादिकं यथा गतसारं भवति न तथाज्यमित्यर्थः । यद्वा अनाधृष्टं अर्धर्षितम् अप्रतिहतं रक्षोभिः । देवयजनमसि देवा इज्यन्ते -Sad देवयजनमर्थात् देवयजनसाधनमसि त्वमित्यतस्त्वां गृह्णाम्युत्पुनामि च । ३ - स्वामिदयानन्दस्तु - ' यतोऽयं यज्ञस्तेजोऽस्यस्ति शुक्रमस्यस्ति धामास्यस्ति देवानां प्रियमनाधृष्टं देवयजनमसि तेनानेन यज्ञेनाहं सवितुः प्रसवे अच्छिद्रण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिर्वा युष्मानेतान् सर्वान् पदार्थों-चोत्नामि | ४- अथवा यो यज्ञः अच्छिद्र ेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः सह सर्वान् त्वा तं यज्ञं यजमानं वाहमुत्पुनामि । एवञ्च सवितुः प्रसवेऽच्छिद्र ेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिर्वा युष्मानेतांश्च पदार्थान् यज्ञेनोत्पुनामि । हे ब्रह्मन् यतस्त्वं तेजोऽमृतमसि धामसि नामासि देवानां प्रियतममस्यनाधृष्टमसि तस्मात्त्वामहमाश्रयामि । ५ - ईश्वरो यज्ञविद्याफलं ज्ञापयति - युष्माभिर्यदनुष्ठितो यज्ञः सूर्यस्य रश्मिभिविहरति स्वकीयेन पवित्रेणा-छिद्र ेण गुणेन सर्वान् पदार्थान् पवित्रयति स च तद्वारा सूर्यस्य रश्मिभिः तेजस्विनः शुद्धान् अमृतरसहेतुकान् प्रसन्नता-जनकान् दृढान् यज्ञहेतून् पदार्थान् करोति यतस्तद्भोजनाच्छादनद्वारा वयं शरीरपुष्टिबलादीन् शुद्धगुणांश्च सम्पाद्य नित्यं सुखयाम इति । का प्रयोग करना चाहिये । हे आज्य! तुम धाम अर्थात् स्थान रूप हो । ' धीयते ' स्थापन की जाती है चित्तवृत्ति, देवताओं के द्वारा जहाँ पर उसे ' धाम ' कहते हैं । देवता भी तुम्हें योग्य समझ कर तुममें बुद्धि रखते हैं । उसी प्रकार तुम अपनी ओर सबको नवाते हो, इसलिये तुम्हें ' नाम ' कहा जाता है । क्योंकि आज्य ( घृत ) को देखकर सभी लोग उसके भक्षणार्थं अपने को नवाते हैं । तथा देवताओं के लिये तुम प्रिय ( इष्ट ) हो, तथा अनभिभूत ( अनाधृष्ट ) हो, अर्थात नष्ट रस हुए पुरोडाश की तरह तिरस्कृत नहीं हो । तात्पर्य यह है कि दीर्घ काल तक रहने से चरु, पुरोडाश आदि जैसे सारहीन हो जाते हैं, वैसे आज्य नहीं होता है । अथवा राक्षसों के द्वारा अप्रतिहत अर्थात् अंघर्षित ( अनावृष्ट ) हो । तथा तुम देवयजन हो, देवताएँ पूजी जाती हैं जिससे उसे देवयजन कहते हैं, अर्थात् देवयजनके साधन रूप हो, इसलिये मैं तुम्हारा ग्रहण और उत्पवन करता हूँ । प्रकार करते हैं - ' क्योंकि यह यज्ञ, तेजोरूप है, शुक्र रूप ३ --- किन्तु स्वामी दयानन्द उक्त मन्त्र का अर्थ इस है, धाम रूप है, देवताओं को प्रिय है, अनावृष्ट है, देवयजन रूप है, इसलिये इस यज्ञ से मैं सविता के प्रसव में अच्छिद्र पवित्र से अथवा सूर्य की रश्मियों से इन सब पदार्थों का उत्पवन करता हूँ । ४ - अथवा जो यज्ञ, सूर्य की अच्छिद्र पवित्र रश्मियों के साथ तुम सबको, उस यज्ञ को या यजमान को मैं शुद्ध करता हूँ । एवञ्च सविता के प्रसव में सूर्य की अच्छिद्र, पवित्र रश्मियों से तुम्हें और इन समस्त पदार्थों को यज्ञ हो, के द्वारा शुद्ध करता हूँ । हे ब्रह्मन्! क्योंकि तुम तेजो रूप हो, अमृत, धाम, नाम स्वरूप हो, देवताओं के प्रियतम तथा अनाधृष्ट हो, इसलिये मैं तुम्हारा आश्रय लेता हूँ । ५ - ईश्वर यज्ञ विद्या के फल को बता रहा है- तुम लोगों के द्वारा अनुष्ठित हुआ यज्ञ, सूर्य की रश्मियों के साथ विहरण करता है और अपने पवित्र अच्छिद्र गुण से समस्त पदार्थों को पवित्र करता है और उसके द्वारा वह सूर्य की रश्मियों की सहायता से तेजस्वी, शुद्ध, अमृत रस की हेतुभूत, प्रसन्नता देने वाले, सुदृढ़, यज्ञ के साधनभूत पदार्थों को करता है । क्योंकि उसके भोजन, आच्छादन द्वारा हम लोग शारीरिक पुष्टि, बल आदि शुद्ध गुणों का सम्पादन कर नित्य सुख प्राप्त करते हैं ।

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[ २७४ ] ६ – ईश्वरेणास्मिन्नध्याये मनुष्यान् शुद्धकर्मानुष्ठातु दोषांश्च निवारयितुं यज्ञक्रियाफलं ज्ञातु ं सम्यक् पुरुषार्थं तु ' विद्या विस्तारयितुं धर्मेण प्रजाः पालयितुं धर्मानुष्ठाने निर्भयतया स्थातु सर्वैः सह मित्रतामाचरितुं वेदाध्ययना-ध्यापनाभ्यां सर्व विद्याग्रहीतुं ग्राहयितुं च शुद्धये परोपकाराय प्रयतितुमाज्ञा दत्तास्ति । सेयं सर्वैर्मनुष्य यथावदनुष्ठात-व्येति ' इत्याह । ७- तदेतत्सव विसङ्गतमेव निष्प्रमाणत्वात्, व्यत्ययादिमूलकत्वाच्च । ८ - किश्च तद्रीत्या यज्ञः शुक्रादिकमस्ति । तेन च परमेश्वरः सर्वानुत्पुनात्येव तदा सर्वो शुद्धाः सुखिन एव भवेयुः । न च तथा दृश्यते, न वा तत्सम्भवति तथात्वे जीवपुरुषार्थ व यर्थ्यापत्तिः । ६ - यो यज्ञः अच्छिद्र ेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः सह सर्वान् पदार्थान् पुनाति तं यज्ञं यजमानं वाह-मुत्पुनानीत्यत्र कः कर्ता? न जीवो यजमानः, तस्य कर्मत्वेन निर्देशात् । नापीश्वरः पूर्वोक्तदोषानुषङ्गात् । हे ब्रह्मनिति सम्बोधनमपि निर्मूलं मन्त्रे तादृशापदाभावात् । मन्त्रसम्बन्धितश्रुतिसूत्राद्य बोधितत्वाच्च । वस्तुतस्तु त्वदीयो यज्ञोऽप्याकाशकुसुमायित एव श्रुतिसूत्रादिसम्मत याज्यापुरोऽनुवाक्यावद् वषट्कारप्रधानस्य विहितदेवतो -द्देश्यकद्रव्यत्यागलक्षणस्य यागस्य त्वयानवगमातत्तदनभ्युपगमाच्च भौमिकेन बह्निना सूर्यस्य रश्मिभिश्चान-भीष्टा अभीष्टा नानापदार्थ रसा उन्त एव दोषदोर्गन्ध्यादिनाशकाश्चाने के आधुनिकाः पदार्थाः सन्ति यैर्होममन्तरापि पदार्थ रसादयः शुद्धयन्त्येव पावित्र्यमपि किमिति युष्माभिर्न निर्णेतुं शक्यते । न च स्वच्छतैव पवित्रता म्लेच्छाद्युच्छिष्ट सीसकीय चीनीयपात्रादिषु व्यभिचारात् । गोमूत्रादिष्वव्याप्तेश्च । ' योऽयं वातः पवते ' ' आपः पुनन्तु ' इत्यादिभिर्वाचनः प्रत्यक्षानुमानैश्च वायुजलाग्न्यादीनां स्वतः शोधकत्वमाधुनिकैः शास्त्रप्रामाण्या-६ – ईश्वर ने इस अध्याय में मनुष्यों को शुद्ध कर्मों का अनुष्ठान करने की दोषों का निवारण करने की, यज्ञ क्रिया के फल को जानने की, सम्यक् पुरुषार्थ करने की, विद्या विस्तार करने की, धर्म से प्रजा पालन करने की, धर्मानुष्ठान में निर्भय होकर स्थित रहने की, सबके साथ मित्रता का व्यवहार करने की, वेद के अध्ययनाध्यापन के द्वारा समस्त विद्याओं को ग्रहण करने और कराने की शुद्धि और परोपकारार्थ प्रयत्न करने की आज्ञा दी है । उसकी इस आज्ञा का पालन सभी मनुष्यों को यथावत् करना चाहिये । ७- दयानन्दोक्त यह सम्पूर्ण मन्त्रार्थ, प्रमाण रहित होने से विसङ्गत ही है, इस प्रकार अर्थ करने में व्यत्य-यादि का आश्रय भी उन्हें करना पड़ा है । ८- किञ्च - तुम्हारे कथनानुसार यज्ञ शुक्रादि रूप होने से परमेश्वर ने सबको शुद्ध कर ही दिया है, तब सभी को शुद्ध और सुखी हो जाना चाहिये था, किन्तु संसार में वैसा दिखाई नहीं देता, और न सभी का सुखी होना सम्भव ही है । अन्यथा जीव का पुरुषार्थ करना ही व्यर्थ होगा । ६ - दयानन्द जी ने जो अर्थ ( यो यज्ञः अच्छिद्र ेण पवित्रेण " यजमानं वाऽहमुत्पुनामि ) किया है, उसमें कर्ता कौन है? जीव या यजमान को कर्ता नहीं कह सकते, क्योंकि उसका तो कर्म के रूप में निर्देश किया है । ईश्वर को भी कर्ता नहीं कह सकते, अन्यथा पूर्वोक्त दोषापत्ति होगी । ' हे ब्रह्मन्! ' यह सम्बोधन भी निर्मूल है, क्योंकि मन्त्र में वैसा कोई पद नहीं है । और मन्त्र सम्बन्धित किसी श्रुति या सूत्र आदि के द्वारा वैसा बोधित भी नहीं हुआ | वस्तुतस्तु तुम्हारा यज्ञ भी आकाश पुष्प की तरह ही है । क्योंकि याग तो वही होता है, जिसमें श्रुति - सूत्रादि सम्मत आज्या पुरोऽनुवाक्या होती है, वषट्कार की प्रधानता रहती है, और विधि विहित देवता के उद्देश्य से विधि विहित द्रव्य का त्याग किया जाता है । इस प्रकार का त्याग ही याग का स्वरूप है । इस प्रकार के उक्त लक्षण वाले याग को तो तुम मानते नहीं हो, और न तुम्हें उसका ज्ञान ही है । तुम तो पार्थिव वह्नि और सूर्य की रश्मियों से

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 288 का मूल पृष्ठ
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[ २७५ ] नुपगन्तृभिरपि अभ्युपगमात् युक्तिभिस्तत्सिद्धेः शास्त्रप्रामाण्याभ्युपगमेऽपि श्रुतिसूत्रादिभिः सनातनिसम्मत एवार्थोभ्युप-गन्तव्यःस्यात् । १० एतेन प्रथमाध्याये ईश्वरेण शुद्धं कर्माद्यनुष्ठातुमाज्ञा दत्तेत्याद्यपि निर्मूलं तत्र तत्र मन्त्राणां तथार्थस्य खण्डितत्वात् शतपथश्रुतिविरोधाच्च । तथाहि-११ - प्रोक्षणीषु पवित्रे भवतः । ते तत आदत्ते । ताभ्यामाज्यमुत्पुनात्येको वा उत्पवनस्य बन्धुर्मेध्यमेवैत-त्करोति । ' ( श ० १।३।१।२२ ) १२ – तस्याज्यस्योत्पवनं विधत्ते - प्रोक्षणीष्विति । प्रोक्षण्युत्पवनं याभ्यां पवित्राभ्यां कृतं ते तत आदाय ताभ्यामेवाज्यस्योत्पवनं कार्यमित्यर्थः । उत्पवनविधिस्तावकं वृत्रो ह वा इदं सर्वमित्यादिकं प्रागाम्नातं ब्राह्मणमाज्यो-त्पवनस्यापि समानमित्यत आह एको वा उत्पवनस्य बन्धुः । १३- पर्यवसितमर्थमाह मेध्यमेव तत्करोति । स उत्पुनाति -सवितुस्त्वां प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्र ेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिरिति सोऽसावेव बन्धुः । ( ० १ । ३ । १/२३ ) १४ – विहितमुत्पवनमनूद्य मन्त्रं विधत्ते - स उत्पुनातीति । आज्यस्य एकत्वात् त्वा इत्येकवचवान्ततैव प्रोक्ष-युत्पवन मन्त्रतोऽस्य विशेषः । अतस्तन्मन्त्रव्याख्यानरूप सविता व देवानां प्रसविता इत्यादिकं ब्राह्मणमत्रातिदिशति सोऽसावेव बन्धुरिति । अनभीष्ट तथा अभीष्ट अनेक पदार्थ रसों की कल्पना करते हो, उसी प्रकार दोष, दुर्गन्ध आदि के नाशक आधुनिक अनेक पदार्थ हैं, जिनसे बिना होम किये भी पदार्थ रस आदि शुद्ध हो ही जाते हैं । पवित्रता का भी निर्णय तुम नहीं कर सकते । केवल स्वच्छता ही पवित्रता नहीं है, म्लेच्छादि लोगों के उच्छिष्ट शीशे के या चीनी के पात्र भी ', स्वच्छ ' आपः रहते है किन्तु वे पवित्र नहीं रहते । गोमूत्र आदि स्वच्छ न रहने पर भी पवित्र रहते हैं । ' योऽयं वातः पवते को पुनन्तु ' इत्यादि वचनों से और प्रत्यक्ष, अनुमानादि प्रमाणों से वायु, जल, अग्नि आदि पदार्थों में प्रामाण्य स्वतः शोधकता के स्वीकार शास्त्र प्रामाण्य का स्वीकार न करने वाले आधुनिकों ने भी स्वीकार किया है । शास्त्र अर्थ ही करने पर भी युक्ति से भी उनकी शोधकता सिद्ध होती है । अत: श्रुति सूत्रादि से प्रमाणित सनातनिसम्मत स्वीकार करने योग्य होगा । १० — अत: ‘ प्रथमाध्याय में ईश्वर ने शुद्ध कर्मादि के अनुष्ठान करने की आज्ञा दी है ' अर्थ इत्यादि का विरोध कथन निर्मूल है, क्योंकि मन्त्रों के तथाविध अर्थ का खण्डन हो जाता है और शतपथ श्रुति से तथाविध भी है । ११ - ' प्रोक्षणीषु पवित्रे भवतः ' १२ – इस शतपथ ब्राह्मण के द्वारा का उत्पवन किया है, उन पवित्रों को स्तावक ब्राह्मण ' वृत्रो ह वा इदं सर्वं इसीलिये ' एको वा उत्पवनस्य बन्धुः ' कहा गया है । " तत्करोति । - ( श ० १।३।१।२२ ) आज्य के उत्पवन का विधान किया गया है । जिन पवित्रों से प्रोक्षणी उससे लेकर उन्हीं से आज्य का उत्पवन करना चाहिये । उत्पवन विधि का इत्यादि, जो पहले पढ़ा गया है, वही आज्योत्पवन में भी समझना चाहिये । १३ - सम्पूर्ण निष्पन्न अर्थ को ' मेध्यमेवैतत्करोति ' से बताया गया है । १४ - ' स उत्पुनाति...... " सोऽसावेव बन्धु: ' - ( श ० १ | ३ | १ | २३ ) विहित उत्पवन का अनुवाद करके ' स उत्पनाति ' से मन्त्र का विधान किया जा रहा है । ' आज्य के एक होने से ' त्वा ' को एकवचन में ही रखा गया है ।

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[ २७६ ] १५ - तद्यदाज्यलिप्ताभ्यां पवित्राभ्यां प्रोक्षणीरुत्पुनाति तदप्सु पयोदधाति । तदिदमप्सु पयो दधाति तदिदम-पयोहितमिद २७ ° हि यदा वर्षत्यथौषधयो जायन्त ओषधीर्जग्ध्वा अपः पीत्वा ततएषरसः सम्भवति तस्माद् रसस्यैव सर्वत्वाय । ( श ० १।३ १।२५ ) १६ - आज्यलेपसहिताभ्यां पवित्राभ्यां प्रोक्षण्युत्पवनमुपपादयति तत् तत्र यत् इदमाज्यलिप्ताभ्यां पवित्रा-भ्यामुत्पवनं तेन पय एवाप्सुदधाति स्थापयति संयोजयति आज्यस्य पयः कार्यत्वात् । अप्सु हि परम्परया तत्कार्यत्वात् यः प्रतिष्ठितम् एतदेवोपपादयति- यदा वर्षति अथानन्तरमोषधयो जायन्ते । ओषधीर्जग्ध्वापः पीत्वा ततएषपयोरूपो सो जायते । यस्मादेवं गव्यं पयः परम्परयोदकपरिणामरसरूपं तस्मात्कारणात् तत्कार्यस्याज्यस्यापाञ्च यदुत्पवने संस-र्जनं तद्रसस्यैव सर्वत्वाय कारस्न्याय भवति । १७ -- ‘ अथाज्यमवेक्षते तद्वै के यजमानमवख्यापयन्ति ' ( श ० १1३१।२६ ) १८ - इहाध्वर्यो राज्यवेक्षणं विधत्ते - केचिच्छाखिनस्तु यजमानमेवावख्यापयन्ति अवेक्षयन्ति, तच्च याज्ञवल्क्यरीत्या निरस्यति यतो यजमानाः स्वयमेवाध्वर्यवो न भवन्ति न वा स्वयमेव होतारो भूत्वा याज्यानुवाक्या-अन्तर्यवादौ तत्करणमन्त्रैर्बहुतरा इवाशिषः फलप्रार्थनाः क्रियन्ते तादृक्फलप्रतिपादकमन्त्रविशिष्ट-माध्वर्यवादिकश्च स्वयमेव कथं न कुर्वन्ति आज्यावेक्षणमेव कुतो यजमानेनैव कर्त्तव्यमित्याग्रह:? वस्तुतस्तु दक्षिणा परिक्रीतत्वात् ऋत्विग्भिर्यत्फलमाशास्यते तद् यजमानस्यैव भवति तेन न पृथगाशासनं कार्यम् अतोऽध्वर्यु ' -रेवावेतेति । प्रकृते शाखान्तरनिन्दनं स्वशाखीय कर्मप्रशंसार्थमेव नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते किन्तु विधेयं स्तोतुमिति सिद्धान्तात् । प्रोक्षण्युत्पवन मन्त्र से इस मन्त्र में कुछ विशेषता है । अतः उस मन्त्र के व्याख्यान रूप ' सविता वै देवानां प्रसविता ' इत्यादि ब्राह्मण का यहाँ पर ' सोऽसावेव बन्धुः ' कहकर अतिदेश किया गया है । १५ - ' तद्यदाज्य लिप्ताभ्यां पवित्राभ्यां ' चैव सर्वत्वाय ' ( श ० १।३।१।२५ ) । १६ -- आज्य लेप सहित दो पवित्रों से प्रोक्षणी के उत्पवन का उपपादन करते हैं- आज्य लिप्त पवित्रों से जो उत्पवन किया जा रहा है, उससे यह प्रतीत होता है कि पय को ही जल में स्थापित किया जा रहा है । क्योंकि ' आज्य ' पयस् का ही कार्य है । यह पयस् परम्परया जल का ही कार्य है, अत: वह जल में प्रतिष्ठित रहता है । जब वर्षा होती है, तब उससे ओषधियाँ पैदा होती हैं: ओषधियों को खाकर जल पीकर उससे यह पयोरूप रस उत्पन्न होता है । जबकि इस प्रकार से गाय का पय ( दूध ) परम्परया उदक ( जल ) परिणाम भूत रस रूप है, उस कारण कार्यं भूत आज्य का और जल का उत्पवन करने में जो संसर्जन ( सम्बन्ध ) है, वह उसके रस को सम्पूर्णता के लिये ही है । १७ – ' अथाज्यमवेक्षते ' ख्यापयन्ति ' ( श ० || ३।१।२६ ) । १८ - इस ब्राह्मण से अध्वर्यु के आज्यावेक्षण का विधान किया गया है । कुछ अन्य शाखा वाले विद्वान् यजमान का ही अवेक्षण करते है । किन्तु याज्ञवल्क्य ने उसका निरसन किया है । क्योंकि जो यजमान रहते हैं वे स्वयं नहीं होते और न ही स्वयं होता बनकर याज्या अनुवाक्या आदि कहते हैं । जिस आध्वर्यव आदि कर्म में करण मन्त्रों के द्वारा अनेक फल प्रार्थना की जाती है, उस फल प्रतिपादक मन्त्र विशिष्ट आध्वर्यवादि कर्म को स्वयं ही क्यों नहीं करते? आज्यावेक्षण के सम्बन्ध में ही यह आग्रह क्यों है कि उसे यजमान ही करे । वस्तुतस्तु दक्षिणा के द्वारा परिक्रीत होने से ऋत्विजों द्वारा जो फल माँगा जाता है, वह यजमान के लिये हो होता है, इसलिये अध्वर्यु को अपने लिये पृथक् फल माँगने की आवश्यकता नहीं होती । अतः अध्वर्यु ही अवेक्षण करे । ' न हि निन्दा निन्द्यं ' इस सिद्धान्त के अनुसार शाखान्तर की निन्दा, उसकी निन्दा के लिये न होकर स्व शाखीय कर्म की प्रशंसार्थ ही है ।

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२७७ ] १६ - सोऽवेक्षते । ( श ० १ / ३।१।२७ ) २० - इति तदवेक्षणमनूद्य प्रशंसति - अवेक्षणस्य कारणं चक्षुः तच्च यथाभूतमेव वस्तु विषयीकरोतीति तत्सत्यम् । यद् विवदमानयोर्द्वयोर्मध्ये यश्चक्षुषा दृष्टवानस्मीति वदति तद्वचनमेव श्रद्धा भवति न तु श्रुतवानस्मीति वक्त वंचनम् तथा श्रद्धेयं तस्मात् सत्यं वे चक्षुः । २१ – सोऽवेक्षते । तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसीति स एव मन्त्रस्तेजो ह्य ेतच्छुक 25 ह्य ेतदमृत 5 ह्य तत्सत्ये-नैव तत्समर्धयति । ( ० १ ३ | १ | २८ ) २२ -- विहितमवेक्षणमनूद्य मन्त्रं विधत्ते - तेजोऽसि शुक्रमसीत्यादिमन्त्रेणाध्वर्यु राज्यमवेक्षेतेत्यर्थः । योऽय तेजो-ऽसीतिमन्त्रः स एष सत्यः यथार्थ एव विद्यमानार्थप्रकाशकत्वात् न गौणार्थं इत्यर्थः कुत इत्यत आह - हि यस्मात् एतदाज्यं तेजः तद्धेतुत्वात् तथा शुक्र निर्मलम् अमृतम् यागादिद्वारा अमरणसाधनत्वात् अमृतवत्पुष्टिकारकत्वाच्च । एवमाज्यस्यैवं रूपत्वात् विद्यमानार्थप्रकाशकत्वात् मन्त्रः सत्य इति युक्तमेव । तथाचाध्वर्यु ' रुक्तमन्त्रेण सत्यात्मकेन चक्षुषाज्यमवेक्षमाणः सत्येनैव तदाज्यं तत्साध्यं कर्म च समृद्धियुक्तमेव करोति । २३ – ' पुरुषो वै यज्ञः ' ( श ० १।३।२।१ ) २४ - अत्र जुहूपभृद्ध वासु एतस्याज्यस्य सुवेण ग्रहणं विधित्सुः तत्समुदायस्य पुरुषः वयवकल्पनया स्तुत्यर्थं तत्साध्यस्य यज्ञस्य पुरुषतादात्म्यमुक्तम् । पुरुषप्रयत्ननिर्वत्र्त्यत्वात् यज्ञस्य पुरुषत्वम् अतएव यज्ञस्तायमानो विस्तार्यमाणो यदवयवपरिमाणविशिष्टः पुरुषः तादृगवयवपरिमाणविशिष्ट एव विधीयते । १६ - ' सोऽवेक्षते ' - ( श ० १।३।१।२७ ) २० -- उस अवेक्षण का अनुवाद कर प्रशंसा करते हैं - अवेक्षण का कारण चक्षु होता है, वह यथाभूत वस्तु अपना विषय बनाता है, इसलिये उसे सत्य कहा जाता है । विवाद करते हुए दो व्यक्तियों में से जो यह कहता है कि मैंने चक्षु से देखा है, उसी का वचन श्रद्धेय समझा जाता है । मैंने सुना है, यह कहने वाले का वचन वैसा श्रद्धेय नहीं माना जाता है, इसलिये चक्षु ही सत्य है । २१ – ' सोऽवेक्षते । तेजोऽसि समर्धयति । ' ( श ० १ । ३ । १ । २८ ) २२ -- विहित अवेक्षण का अनुवाद करके मन्त्र का विधान किया गया है । ' तेजोऽसि शुक्रमसि ' इत्यादि मन्त्र से अध्वर्यु आज्य का अवेक्षण करे । जो यह ' तेजोऽसि ' मन्त्र है, वह सत्य है, अर्थात् विद्यमान अर्थ का प्रकाशक ( प्रति-पादक ) होने से यथार्थ है । वह गौणार्थ प्रतिपादक नहीं है । क्योंकि वह तेज का उत्पादक होने से स्वयं तेज ही है । उसी तरह वह निर्मल ( शुक्र ) है और याग आदि के द्वारा अमरण का साधन होने से तथा अमृत के समान पुष्टिकारक होने से वह अमृत है । आज्य का स्वरूप उपर्युक्त प्रकार का होने से यानी विद्यमान अर्थ का प्रकाशक होने से मन्त्र को सत्य कहना उचित ही है । तथा च अध्वर्यु उक्त मन्त्र से सत्यात्मक चक्षु के द्वारा आज्य का अवेक्षण करता हुआ सत्य के द्वारा ही उस आज्य को और तत्साध्य कर्म को समृद्धि से युक्त करता है | २३ – ' पुरुषो वै यज्ञ: ' - ( श ० १।३।२1१ ) २४ -- यहाँ पर जुहू ', उपभृत् और ध्रुवा में स्रव के द्वारा आज्य के ग्रहण करने का विधान करने की इच्छा १. ये सब यज्ञ के काष्ठमय पात्र हैं । ' खादिरः स्रवो भवति, पर्णमयी जहूर्भवति, आश्वत्थी उपभृत्, वैकङ्कती ध्रुवा भवति एतद्वै स ुचां रूपम् ' - ( तै ० सं ० ३ ५ ७ )