वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 41–50

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 41–50

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[ २८ ] ४– प्रथमान्तपदव्यपदिष्टं वायव इति कर्तृपदं स्थ इति क्रियापदसम्बन्धात् निराकांक्ष जातम्, ' प्रार्पयतु ' इति क्रियापदस्य सकर्मकस्य कर्मत्वेन व इति पदं विद्यते । मूले यत्तदोरभावेऽपि वः युष्माकं यानि प्राणान्तःकरणानि इन्द्रियाणि सन्ति तानि सविता श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्रार्पयतु इतिकल्पनमपि स्वाच्छन्द्यमेव । ' आप्यायध्व ' मितिस्थाने आप्यायामहे इत्याद्यपि निर्मूलम् । द्वितीयव्याख्याने परमेश्वर एव कथं परमेश्वरेण सम्बोध्यते? II ५० – इन्द्रशब्दस्यैश्वर्यं वत्पुरुषपरत्वेऽपि कथमैश्वर्यपरत्वम्? मूले यजमानशब्दो यज्ञकर्तृ परः इति तस्य जीव-सामान्यपरत्वयोजनं निराधारमेव । भावार्थस्तु दूरतोऽपि मन्त्राक्षराणि न स्पृशति । ५१ - ' विश्वानि देव सवितरिति व्याख्याने ' ईश्वरेण जीवानां गुणगुणिविज्ञानोपदेशाय ॠग्वेदे सर्वान् पदार्थान् व्याख्यायेदानीं मनुष्यैस्तेभ्यो यथायथोपकारग्रहणाय क्रियाः कथं कर्त्तव्या इत्युपदिश्यते । है, क्योंकि व्युत्पत्ति तो तात्पर्य के अनुरोध से ही की जाती है - इस अभिप्राय को मीमांसा सूत्रकार महर्षि जैमिनि ने १७ ' अथैकत्वादेकं वाक्यम् ' इस सूत्र के द्वारा स्पष्ट कह दिया है कि - एक अर्थ होने से एक वाक्य होता है । तब एक ही वाक्य का अनेक अर्थों में तात्पर्य प्रदर्शन करना कैसे सङ्गत हो सकता है? विवरणकार ने भी वाक्ययोजक विचार के प्रसङ्ग में कहा है कि पूर्वोक्त रीति से एक ही सरणि का आश्रय, किसी वाक्ययोजनार्थ नहीं किया जा सकता, क्योंकि भिन्न - भिन्न व्याख्याकारों की बुद्धि भी भिन्न - भिन्न होती है । ऐसी स्थिति में भी भाष्यकारों क विविध रीति से की गई वाक्ययोजना १५ औरउसके अनुसार उनके विविध अर्थों को प्रामाणिक माना जा सकता है । वेदान्त गीता आदि के भाष्यों में कथित सभी अर्थों में ग्रन्थकर्ता का वह अभिप्राय है, ऐसा किसी तरह भी नहीं कहा जा सकता है । इसी प्रकार वेद में भी उसे प्रकाशित करने वाले सत् चित् आदि गुण विशिष्ट ब्रह्म का विभिन्न भाष्यकारों द्वारा प्रतिपादित विविध प्रकार सभी अर्थों में अभिप्राय है, यह नहीं माना जा सकता । अतः इच्छा न होते हुए भी यह बात माननी होगी कि ' वेद ' का अर्थ शास्त्रवचनों का अनुगामी होकर ही प्रामाणिक हो सकता है । ऐसा होने पर आपकी 20 रीति से भी स्वामी दयानन्द जी का किया हुआ अर्थ इसलिये स्वीकार करने योग्य नहीं रहता, क्योंकि वह मन्त्र, ब्राह्मण, सूत्र, परम्परा और याज्ञिक पद्धति के विरुद्ध है । क्योंकि श्रुति ने तो अप्राणो ह्यमनाः ' कहकर उसे मनरहित-प्राणरहित बताया है । ४६- किञ्च ' वायवः ' यह प्रथमान्त कर्तृ पद ' स्थ ' इस कियापद से अन्वित होकर निराकांक्ष हो गया है, और ' प्रार्पयतु ' इस सकर्मक क्रिया पद का कर्म ' वः ' विद्यमान है । किन्तु उपस्थित पदों की प्रकृति तथा व्याकरण की २५ प्रक्रिया की ओर ध्यान न देकर मूलमन्त्र में ' यत्- तत् ' शब्दों के न रहने पर भी ' तुम्हारे जो प्राण अन्तःकरण इन्द्रिय आदि है, उन्हें ' सविता ' भगवान् श्रेष्ठतम कर्म में लगावे ' - इस प्रकार अभिनव अर्थ की कल्पना करना अपनी स्वच्छ-न्दता के अतिरिक्त और क्या हो सकता है । उसी तरह स्वामी दयानन्दजी ने ' आप्यायध्वम् ' की जगह ' आप्यायामहे ' की कल्पना कर ली है । किन्तु वह भी निर्मूल है । द्वितीय व्याख्यान में ' परमेश्वर ही प ' मेश्वर के द्वारा सम्बोधित कैसे हो सकेगा? ३० ५० — तथा ‘ इन्द्र ' का अर्थ ऐश्वर्यशाली पुरुष करने में भी उसका ' ऐश्वर्यपरत्व ' कैसा? मूल मन्त्र में ' यजमान ' शब्द यज्ञकर्तृ परक है, उसे जीवने सामान्यपरक बताना निराधार ही है । भावार्थ जो बताया है, वह तो दूरसे भी मन्त्र के अक्षरों को स्पर्श नहीं कर रहा है । ५१ - तथा ' विश्वानि देव सवितः ' मन्त्र का व्याख्यान करते हुए स्वामी दयानन्दजी ने जो कहा कि ' जीवों को गुणगुणिविज्ञान का उपदेश करने के लिये ऋग्वेद में सम्पूर्ण पदार्थों की व्याख्या करके अब उनसे यथोचित लाभ के लिये मनुष्यों को किस तरह क्रिया करनी चहिये - यह ईश्वर के द्वारा बताया जा रहा है ।

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[ २८ ] ५२ - इति यत्, तदपि निर्मूलमेव ऋग्वेदस्य पदार्थ वर्णनपरत्वाभावात् । नहि ऋग्वेदः न्यायवैशेषिकशास्त्रवत् पदार्थवर्णनपरोग्रन्थः । यदि पदार्थवर्णनपरोग्रन्थोभवेत् तर्हि त्वयाप्याप्तत्वेनाभिमतेर्गोतमादिभिः स एव व्याख्यातोभवेत् । अपरञ्चेदादीन्तनै वैज्ञानिकै र्ये पदार्थ गुणगुणिभावाश्च विविच्यन्ते किं त्वद्भाष्येऽपि तदुपयोगिविश्लेषणमुपलभ्यते? स्वोक्तिप्रामाण्याय ' यजुर्भिर्यजन्तीतिमूलकृता ' यदेनमृग्भिः शंसन्ति यजुभिर्यजन्ति सामभि: स्तुवन्ती ' ति विवरणकृता च श्रुतिवाक्यान्युद्धृतानि । परं तेषामन्यार्थत्वेनतदसाधकत्वमेव । ५३ – तत्र ' यजुभिर्यजन्ती ' तिवचनस्य यजुर्मन्त्रैर्यज्ञ कुर्वन्तीत्येवार्थः । दयानन्दस्तु ' येन मनुष्या ईश्वरं धार्मिकान् विदुषश्च पूजयन्ति सर्वचेष्टासाङ्गत्यं शिल्पविद्यासङ्गतिकरणं शुभविद्यागुणदानं यथायोग्यतया सर्वोपकारे शुभे व्यवहारे विद्वत्सु च द्रव्यादिव्ययं च कुर्वन्ति तद्यजुरिति । तदप्यविचारितरमणीयम्, यजिधात्वर्थानुसारेण ' विदुषां ( नि ० पूजासङ्गतिकरणदानादिषु यजुर्मन्त्राणामकिञ्चित्करत्वात् विनापि यजुभिर्लोके तत्प्रवृत्तेः । ' ऋग्भिः शंसन्ति १० १३।७ ) | ( काठक - संहिता ४० ७ ) इत्यादीनामपि न पदार्थानां गुणगुणिवर्णनं कार्यं किन्तु देवतानां शंसनस्तवनाद्येव कार्यम् । रूढिर्योगमपहरतीति न्यायेन परिभाषितयज्ञ एव यजुषामुपयोगः । यज्ञस्वरूपं तु महर्षिणा कात्यायनेनोक्तम्-‘ यज्ञ ं व्याख्यास्यामः ' ( १।२1१ ) ' द्रव्यं देवता त्यागः ' ( का ० श्र ० सू ० १।२।२ ) । व्याख्यातश्च तत्कर्काचार्येण तद्धितेन वार्थे द्रव्यं प्रतिदेवतात्वं गम्यते चतुर्थ्यन्तत्वेन वा । तस्य द्रव्यस्य देवतां प्रति या उत्सर्गक्रिया स याग इति । अस्मिन्न यज्ञशब्द: प्रसिद्ध इति । तस्यैवंविधस्यैव यागस्य यजुर्मन्त्रैरनुष्ठानं भवति । ' दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेते ' त्यादिभिविधि-५२ - किन्तु उनका इस प्रकार का व्याख्यान निर्मूल ही है । क्योंकि ऋग्वेद का कार्य, पदार्थ वर्णन करना १५ नहीं है । न्याय - वैशेषिक शास्त्र के समान ' ऋग्वेद ', पदार्थवर्णन परक ग्रन्थ नहीं है । न्याय - वैशेषिक शास्त्र तो पदार्थ -वर्णनपरक ही है, अतएव उसको ' पदार्थ विज्ञानशास्त्र ' के नाम से भी कहा जाता है । यदि ऋग्वेद भी पदार्थ वर्णनपरक ग्रन्थ होता, तो स्वामी दयानन्दजी के द्वारा भी आप्त समझे जाने वाले महर्षि गौतम आदि के द्वारा उसकी व्याख्या की गईहोती । अपर आधुनिक वैज्ञानिकों के द्वारा जिन पदार्थों और गुण - गुणिभावों की विवेचना की जाती है, क्या दयानन्दी भाष्य में भी तदुपयुक्त विश्लेषण उपलब्ध होता है? अपनी उक्ति की प्रामाणिकता बताने के लिये मूलकार शंसन्ति ' २० ( भाष्यकार स्वामी दयानन्दजी ) ने ' यजुभिर्यजन्ति ' प्रमाण बताया और उसके विवरणकार ने ' यदेनमृग्भिः आदि श्रुति वाक्यों से जो उद्धरण दिये हैं, वे सभी किसी अन्य अर्थ को ही बताते है । अतः उनसे मूल का अभीष्ट अर्थ सिद्ध नहीं हो रहा है । इसलिये वे सब उद्धरण इनके अभीष्ट के असाधक ही रहे । ५३ – ' यजुभिर्यजन्ति ' इस वाक्य का अर्थ स्पष्ट ही है कि ' यजुर्मन्त्रों से यज्ञ करते हैं । किन्तु स्वामी दयानन्द से मनुष्य, ईश्वर की धार्मिकों की विद्वानों को पूजा २५ उक्त वाक्य का अर्थ इस प्रकार करते है - " यजु ' वह है, ' जिस करते है, और जिसकी सहायता से समस्त चेष्टाओं का साङ्गत्य, शिल्पविद्यासङ्गतिकरण, शुभविद्यागुणदान, यथायोग्य-रीति से सभी के उपकार में, शुभव्यवहार में, विद्वानों में द्रव्यादि का व्यय करते हैं । ' अर्थात् पूजासाधन, उपकार के अनु-आदि के साधन को ' यजु ' बताया है । " किन्तु उक्त कथन की अविचारित रमणीय है । क्योंकि यजिधात्वर्थ सार विद्वानों की पूजा, सङ्गतिकरण, दानादिकों में यजुर्मन्त्र अकिञ्चित्कर है । लोकव्यवहार में यजुर्मन्त्रों के बिना भी उन कार्यों में लोकप्रवृत्ति होती दीखती है । ' ऋग्भिः शंसन्ति ' - इत्यादि वाक्य भी पदार्थों के गुण - गुणिवर्णनात्मक कार्य ३० को नहीं बताते हैं, अपितु देवताओं के शंसन - स्तवनादि कार्य को ही बता रहे हैं । ' रूढिर्योग मपहरति ' इस न्याय से परिभाषित यज्ञ में ही ' यजुओं ' का उपयोग होता है । यज्ञ के स्वरूप को महर्षि कात्यायन ने बताया है - ' यज्ञ ' व्याख्या-स्यामः ', ' द्रव्यं देवतात्याग: ' । और कर्काचार्य ने इसकी व्याख्या की है - तद्धित प्रत्यय से अथवा चतुर्थीविभक्ति से ' द्रव्य ' के प्रति ' देवतात्व ' की प्रतीति होती है । देवता को उद्देश्य कर ( देवता के प्रति ) उस द्रव्य की जो ' उत्सर्गक्रिया ' ( द्रव्यत्याग ) उसी को ' याग ' समझना चाहिये । इसी अर्थ में ' यज्ञ ' शब्द भी प्रसिद्ध है । - इसप्रकार के ' याग ', का विधि- ही यजुर्मन्त्रों से अनुष्ठान हुआ करता है । ' दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत् ' - इत्यादि विधिवाक्यों से जिन कर्मों का विधान

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[ ३० ] art कर्मणां विधानं विधिभागेषु विद्यते तत्रैव यजुरादीनामुपयोगः । द्वादशलक्षण्यां जैमिनिनिर्मितायां मीमांसायामपि तादृशस्यैव यज्ञस्य विचारः । तत्रैव यथायोग्यं देवपूजासङ्गतिकरणादीनामपि सन्निवेशः । ५४ - महर्षिणा कात्यायनेनैव तिष्ठद्धोमविषट्कारप्रदाना याज्यापुरोनुवाक्यावन्तो यजतयः, उपविष्टहोमाः स्वाहाकारप्रदाना जुहोतय: ' इति यागहोमयोर्भेदोऽप्युक्तः । तिष्ठता होमो येषु ते तिष्ठद्धोमाः, वषट्कारेण प्रदानं येषु ते वषट्कारप्रदानाः, याज्यावन्तः पुरोवाक्यावन्तश्च ये ते यजतयो भवन्ति । नहि सामान्यपूजादानादिकर्मसु वषट्कार-पूर्वको होमो भवति । नवा तत्र याज्यापुरोऽनुवाक्याः प्रयुज्यन्ते । होमकर्मणोऽपि यागाद् भेद उक्तः । यत्रोपविष्टेन कर्त्रा स्वाहाकारपूर्वको होम: क्रियते यत्र च याज्यादयो न प्रयुज्यन्ते स होमो भवति जुहोतीत्यादिभिर्विहितः । हविःसमर्पणार्थी याज्या भवति, देवतानुस्मरणार्थानुवाक्या भवति । ह्वयति वानुवाक्या प्रयच्छति याज्यया इत्युक्तः । ' पुरोऽनुवाक्या-मनुच्य याज्यया जुहोति ' ति श्रुतेः ( श ० | १ | ४ | १ | १३ ) । वस्तुतो मन्त्रे वक्ता ऋषिर्भवति, मन्त्रेण यदुच्यते तस्यैव देवत्वं भवति । सर्वानुक्रमणोकारेण तु इषेत्वेत्यस्य मन्त्रस्य शाखा देवतोक्ता । तदनादरस्तु प्रमाद एव । ५५ – यदुक्तम् ' दुर्गस्कन्दयोरपि शाखादयो देवता अनभिमताः । तद्येऽनादिष्टदेवता मन्त्रास्तेषु देवतोपपरीक्षा इत्युपक्रम्य यद्द ेवतः स यज्ञो वा यज्ञाङ्ग वा तद्ददेवता भवन्ति, ( नि ० ७ ४ ) इति यास्केनोच्यते ' | ५६ -- इति, तत्तुच्छम् शाखादीनां यज्ञाङ्गत्वेन निरुक्तोक्त्यापि देवतात्वोपपत्तेः । यद्देवतं प्रधानं हविः तद्यथा प्रकृतावैन्द्र ं सान्नायं माहेन्द्र वा तत्संस्कारपराइषे त्वेत्यादयः । तेनानाविष्कृतदेवतालिङ्गा ऐन्द्रा एव भवन्ति महेन्द्रा वा ' ( नि ० ७१४ ) इति दुर्गवचनं तु हविः प्राधान्येन इषेत्वादीनामपि ऐन्द्रा माहेन्द्रा वेत्येतत्परम् । किश्वानाविष्कृत-लिङ्गानां मन्त्राणां देवता निरूपणप्रसङ्ग इषेत्वादीनां समेषां मन्त्राणां यदुद्देश्येन हविस्त्यज्यते तेषां माहेन्द्रादीनां T भागों में है, उन्हीं के अनुष्ठान में यजुरादि मन्त्रों का उपयोग होता है । महर्षि जैमिनि के द्वारा विरचित द्वादशलक्षणी-मांस में भी उसी प्रकार के यज्ञ का विचार किया गया है, उसी प्रसङ्ग में यथोचित रूप से देवपूजा सङ्गतिकरण आदि का भी निवेश किया गया है । ५४ - महर्षि कात्यायन ने ही ' तिष्ठद् होमा वषट्कारप्रदाना याज्यापुरोनुवाक्यावन्तो यजतयः, उपविष्टहोमा: स्वाहाकारप्रदाना जुहोतय: ' - जहाँ खड़े होते हुए होम तथा ' वषट् ' कार, ओर याज्या - पुरोनुवाक्या होती हैं - वे तो - पुरोनु-' याग ' कहलाते हैं । सामान्य पूजनादि कर्मों में ' वषट्कार ' पूर्वक होम नहीं होता है और न ही उनमें याज्या -क्याओं का प्रयोग होता है । ' इस तरह ' होम ' संज्ञक कर्म से भी ' याग ' को भिन्न बताया है । जहाँ बैठे - बैठे ही कर्ता के द्वारा स्वाहाकार पूर्वक होम किया जाता है, और जहाँ याज्या आदि का प्रयोग नहीं होता उसे ' होम ' कहते हैं, ' जुहोति ' इत्यादि शब्दों से वह विहित होता है । हविः समर्पणार्थ - ' याज्या ' होती है, और देवतानुस्मरणार्थ ' अनुवाक्या ' ( पुरोनुवाक्या ) होती है । क्योंकि ' ह्वयति वानुवाक्यया प्रयच्छति याज्यया ' ऐसा कहा गया है । तथा ' पुरोऽनुवाक्या-मनूच्य याज्यया जुहोति ' यह श्रुति भी उक्त कथन में प्रमाण है । वस्तुतः मन्त्र का वक्ता ' ऋषि ' होता है । मन्त्र के द्वारा जो बताया जाता है, उसी में ' देवतात्व ' होता है । सर्वानुक्रमणीकार ने ' इषेत्वा ' इस मन्त्र की देवता ' शाखा ' बताई है । उसे न मानना तो बड़ा प्रमाद ही है । ५५ - स्वामी दयानन्दजी ने यह जो कहा है कि दुर्गाचार्य, स्कन्दस्वामी ' ने भी ' शाखा ' आदि को देवता के रूप में स्वीकार नहीं किया है । यास्काचार्य कहते हैं—- ' तद्येऽनादिष्टदेवतामन्त्रा: ' इत्यादि से आरम्भ करके ' यद्देवतः स यज्ञो वा ० ' इत्यादि । ५६ - किन्तु स्वामी दयानन्दजी का उक्त कथन और उसकी पुष्टि में जो प्रमाण उपस्थित किया वया है, वह सब निरर्थक है क्योंकि यज्ञाङ्ग के रूप में ' शाखादिकों ' को बताने पर भी उनमें ' देवतात्व ' के उपपन्न होने में कोई बाधा नहीं हो रही है । क्योंकि ' यद्देवतं प्रधानं हविः ', जैसे - प्रकृति में ' सान्नाय ' हवि ' ऐद्र ' अथवा ' माहेन्द्र ' होता है, अत:

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[ ३१ ] ति देवतात्वमुक्तम् । प्रजापतिर्देवोक्ता । तत्रैव दुर्गाचार्येण प्राजापत्यग्रहणे विनियोगात् ' कुविदङ्ग ' ( ऋ ० सं ० १।१३१।२ ) निमन्त्रस्य ५७ - ' यद्देव इति ऐन्द्र पयोऽमावास्यायाम् ' ( तै ० सं ० २२५ | ३ | ४ ) माहेन्द्र वा । तच्छेषभूता: शाखाच्छेदना-दिषु सान्नाय्य संस्कारत्वेन विनियुक्ताः । इषे त्वादयस्तद्वत्या इति स्कन्दवचनमपि तदभिप्रायकमेव । किञ्च सान्नाय्य -संस्कारत्वेन तदङ्गभूतानामिषे त्वादीनां सर्वेषां मन्त्राणां माहेन्द्रादयो देवता भवन्ति । न तेन तत्तन्मन्त्रगतप्रातिस्विक - ५ देवतापलापः । अन्यथाअविशिष्टदेवता त्वमग्नावेवेति सर्व देवतामितिपदात् ' अग्निर्वे सर्वा देवता: ' ( काठक संहिता १०1१ ) इति मेषामग्निदेवताकत्वे किमर्थमन्यदेवतान्वेषणं मन्त्रेषु क्रियते? झं ५८ - महर्षिणा काण्वेन तु प्रथममेव - ऋषिदेवतच्छन्दांस्यनुक्रमिष्यामो यजुषामनियताक्षरत्वात् एषां छन्दो परमेष्ठ्यादयो देवतान्तर्भूताः । अग्न्यादिका हविर्भाजः स्तुतिभाजो वा न विद्यते । द्रष्टार ऋषयः स्मर्तारः इत्युक्त्वा अनःशाखोखाशम्योपवेषक पालेध्मोलूखलादयश्च प्रतिमाभूता ' इत्युक्तम् । तेन शाखादीनां देवतात्वमव्याहतमेव । १० तत्र ेव छन्दांसि गायत्र्यादीनि एतान्यविदित्वा योऽधीतेऽनुब्र ते जयति जुहोति यजेत याजयते तस्य ब्रह्म निर्वीर्यं यातयाम भवति अथान्तगर्त वा पद्यते स्थाणु वति प्रमीयते वा पापीयान् भवत्यथ विज्ञायैतानि योऽधीते तस्य वीर्यवदथ योऽर्थवित्तस्य वीर्यवत्तरं भवति । जपित्वा हुत्वेष्ट्वा तत्फलेन युज्यते । एवं महत्त्वास्पदं ऋषिदेवतादिज्ञानं नोपेक्षणीयं नवा स्वेच्छया निर्धारयितुं शक्यम् । विनियोगाद्देवतानिर्णयो दुर्गाचार्यरीत्या प्रदर्शित एव । ५६ - यत्तु - ' सर्वानुक्रमणीकारप्रदर्शितो देवतावाद आधुनिक इति, तत्त च्छ्म्, आधुनिकाङ्गलादिदृष्ट्या त्वदी- १५ यशाली संहिताया अपि आधुनिकत्वानपायात् । उनके संस्कारपरक ' इषेत्वा ' इत्यादिकमन्त्र हैं । उस कारण अनाविष्कृतदेवतालिङ्गक ' ऐन्द्र ' अथवा ' माहेन्द्र ' ही होते हैं | दुर्गाचार्य का वचन - हविः प्राधान्य को देखते हुए ' इषेत्वा ' इत्यादि मन्त्रों के द्वारा ' ऐन्द्र ' अथवा ' माहेन्द्र ' हवि ही होते हैं - यह बता रहा है । किश्व अनाविष्कृत लिङ्गक मन्त्रों के देवता निरूपण के प्रसङ्ग में ' इषेत्वादि ' समस्त मन्त्रों पर २० से के, जिसके उद्देश्य से ' हवि ' का त्याग किया जा रहा है, उन माहेन्द्रादिकों को देवता बताया गया है । और वहीं ' को दुर्गाचार्य ने प्राजापत्य के ग्रहण करने में विनियोग रहने से ' कुविदङ्ग ' ' इस मन्त्र की देवता ' प्रजापति बताया है । 1 ५७ - ' यद्देवत इति ऐन्द्र पयोऽमावास्यायाम् ' माहेन्द्र वा इत्यादि स्कन्दवचन भी उसी अभिप्राय को बता उस रहे हैं । किञ्च सान्नाय्य हवि के संस्कारक तदङ्गभूत ' इषेत्वा ' आदि समस्त मन्त्रों के देवता ' माहेन्द्रादि ' होते हैं । कारण तत्तत् मन्त्रगत प्रातिस्विक ( अपनी - अपनी ) देवता का अपलाप नहीं हो पाता है । अन्यथा अग्नि में हो अवि-शिष्ट देवतात्व रहने मे वही सब कीं देवता कही जा सकती है । ' अग्निर्वै सर्वा देवता: ' इस काठक श्रुति के अनुसार सभी की देवता ' अग्नि ' को मान लेने पर अन्य देवताओं का अन्वेषण मन्त्रों में क्यों किया जाता है? ५८ - महर्षि कण्व के ' ऋषिदेवतछन्दांस्यनुक्रमिष्यामः ' इत्यादि कथन के अनुसार ' शाखा ' आदि में देवतात्व तो अव्याहत ही है । वहीं पर ' छन्दांसि गायत्र्यादीनि एतान्यविदित्वा योऽधीते ' इत्यादि से महत्वास्पद ऋषिदेवता आदि के ज्ञान की उपेक्षा कर देना उचित नहीं हैं, तथा अपनी इच्छा के अनुसार उनका निर्धारण करना भी उचित नहीं है । विनियोग को देखकर देवता का निर्णय करना दुर्गाचार्य की रीति के अनुसार पहिले बता ही चुके हैं । ५६ - स्वामी दयानन्दजी ने जो यह कहा है कि ' सर्वानुक्रमणीकार के द्वारा प्रदर्शित देवतावाद आधुनिक है ' - यह कथन भी सराहनीय है । क्योंकि आधुनिक पाश्चात्यदीक्षा दीक्षित लोगों की दृष्टि के अनुसार आपकी अभिमत शाकलो संहिता को भी आधुनिक कहना होगा ।

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[ ३२ ] ६० – यदुक्तम् — ' गुरुतस्तर्कतश्चैव तथा शतपथश्रुतेः ऋषीन् वक्ष्यामि मन्त्राणां देवताश्छान्दसं च यत् । ' इत्यु-व्वटेन सर्वानुक्रमुण्या अवहेलना कृतेति तत्तच्छम् चकारेण सर्वानुक्रमण्या अपि सूचनात् । यदुक्तम् स्थावरत्वाद्देवतात्वं दुर्लभमिति, अब्रूमः, अधिष्ठात्र्यो देवता विद्यन्ते । उव्वटेनापि शाखैवदेवतोक्ता । ' प्रतिमाभुतास्तु शाखादय ' इति । किञ्चदयानन्देन तु निरुक्त दुर्गाचार्यादिप्रदर्शितरीत्या हविर्देवतानुरोधेनापि इषेत्वेत्यस्य देवतानोक्ता, किन्तु स्वाभ्युहिता ५ सविता देवतोक्ता परं इषे त्वेति मन्त्रेण सवितृदेवतासम्बन्ध एव न विद्यते । ६१ – यच्चोक्त ं - ‘ नवो नवो भवति जायमान ' ( ऋ ० सं ० १० ८५।१६ ) इत्यस्य सर्वानुक्रमणीकारश्चन्द्रमा देवतेत्याह ' यास्कस्तु ' आदित्यदेवतो द्वितीयपाद इत्येके प्रवर्धयते चन्द्रमा दीर्घमायुः ' इति चन्द्रमा देवतेत्याहे ' ति, तदेतत् धूलिप्रक्षेपमात्रम् यतो यास्कः कस्यचिद्रीत्या पूर्वापरं चरतो माययैतौ ' इति द्वितीयपादस्यैवादित्यदैवतत्वमाह, न तु सर्वस्य मन्त्रस्य । सर्वानुक्रमणीकारस्तु समस्तमन्त्राभिप्रायेण चन्द्रदैवत्य वक्ति तथा च क्व विरोध:? II ६२ – यत्त, आश्वलायनादिश्रौतसूत्रोदाहरणे नैकस्य मन्त्रस्य नैकविधविनियोगप्रदर्शनेन विरोध उद्भावितः, तदपि तुच्छम् ब्राह्मणवाक्यादाषवाक्याच्च विनियोगभेदस्याभ्युपगमे बाधाभावात् । अतएव आश्वलायन श्रौतसूत्रे ( ८ ) तैत्तिरीय ब्राह्मणे ( ३ | १ | ३ | १ ) चायं मन्त्रश्चान्द्रमसे चरौ विनियुक्तः । तथा ' यः पापयक्ष्मगृहीतः स्यात् तस्मा एतदादित्य ं चरु ' अमावास्यायां निर्वपेत् ' ( तै ० सं ० २ | ३ | ५ | ३ ) बौधायन श्रौतसूत्र ( १३/२८ ) सत्याषाढश्रौतसूत्र ( २२/४/१५ ) इत्यादिषु आदित्य देवताके चरौ विनियुक्तः । मैत्रायणीसंहितायां तु ( २ २ ३ ) वैश्वदेवे चरौ बिनियुक्तः । १५ ६०, स्वामी दयानन्दजी ने जो यह कहा है कि गुरुतस्तर्कतश्चैव ' - इसमें उब्वट ने सर्वानुक्रमणी की अवहे -ना की है । किन्तु यह कथन भी सारहीन है । क्योंकि उपर्युक्त वचन में ' च ' कार के ग्रहण करने से ' सर्वानुक्रमणी ' को भी सूचित किया गया है । स्वामी दयानन्दजी ने यह जो कहा है कि ' स्थावरत्वाद् देवतात्वंदुर्लभम् ' - - स्थावर होने से उनमें देवतात्व का स्वीकार करना उचित नहीं है । इस पर समाधान यह है कि उनकी अधिष्ठात्री देवताएँ उनमें रहती हैं | उब्वट ने भी ' प्रतिमाभूतास्तु शाखादयः ' कहकर ' शाखा ' को ही ' देवता ' बताया है । किश्व स्वामी दयानन्द १० जी ने तो निरुक्त, दुर्गाचार्य आदि के द्वारा प्रदर्शित रीति के अनुसार हवि को देवता के अनुरोध से भी ' इषेत्वा की देवता नहीं बताई है, अपितु अपनी कपोलकल्पित ' सविता ' देवता, उसकी बता दी है, किन्तु ' इषेत्वा ' इस मन्त्र से ' सविता ' देवता का कोई सम्बन्ध ही नहीं है । = ६१ – स्वामी दयानन्दजी ने जो यह कहा है कि ' नवो नवो भवति जायमानः ' की ' चन्द्रमा ' देवता, सर्वानु-क्रमणीकार ने कही है, किन्तु यास्क ने ' आदित्य दैवतो ' इत्यादि कहकर उसकी देवता ' आदित्य ' को बताया है ' - किन्तु १५ स्वामी दयानन्द जी का यह कथन, केवल धूलिप्रक्षेपमात्र है । क्योंकि यास्क ने ' पूर्वापरं चरतो माययैतौ — इस द्वितीयपाद की ही ' आदित्य ' देवता बताई है, सम्पूर्ण मन्त्र की नहीं । सर्वानुक्रमणीकार ने तो सम्पूर्ण मन्त्र के अभिप्राय से ' चन्द्र ' देवता कही है, अतः कोई भी विरोध नहीं है । ६२ - स्वामी दयानन्दजी ने आश्वलायनादि सूत्र का उदाहरण देकर ' एक मन्त्र के अनेक विधविनियोग को विरुद्ध बताया है - वह भी निःसार है, क्योंकि ब्राह्मणवाक्य और आर्षवाक्य के अनुसार विनियोग भेद के स्वीकार ३० करने में कोई बाधा नहीं है । अतएव आश्वलायन श्रौतसूत्र और तैत्तिरीय ब्राह्मण में इस मन्त्र का विनियोग ' चान्द्र -मस चरु ' में किया गया है । तथा तैत्तिरीयसंहिता, बोधायन श्रौतसूत्र, सत्याषाढ श्रौतसूत्र आदि में आदित्यदेवताक चरु में उसका विनियोग बताया है । मैत्रायणी संहिता में वैश्वदेवचरु में उसका विनियोग कहा है । ये सभी विनियोग प्रामाणिक हैं । तथा च अनेकविध विनियोगों के प्रामाणिक होने से एक ही मन्त्र के भिन्न - भिन्न देवताओं का होना किसी प्रकार भी विरुद्ध नहीं है । और्णनाभ के मत से ' आश्विनो देवते ' उक्त मन्त्र की देवता है । ' मन्त्रगत वर्ण ' ही देवता होती हैं, मन्त्रों के अर्थ को देवता नहीं कहा गया है । यह कोई विरुद्ध कथन नहीं है । क्योंकि ऋषियों के विभिन्न मतों

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[ ३३ ] एते विनियोगाः प्रामाणिकाः । तथा च नैकविधप्रामाणिक विनियोगसत्त्वेन एकस्यैव मन्त्रस्य भिन्नदेवतावत्त्वं न विरुध्यते । और्णवाभमते आश्विनौ देवते अस्य मन्त्रस्य । मन्त्रगतपदान्येव देवता न तेषामर्था देवता इत्यादिकं न विरुद्धम् । ऋषीणां मतभेदेन विनियोगदेवतादिभेदे बाधाभावात् । वृहद्देवता सर्वानुक्रमण्यादिभिस्तेषां समन्वयसम्भवात् । तस्मात्सर्वानुक्रमणी वृहद्देवता च देवतावादे परमं प्रमाणमित्यस्याद्याप्यबाधात् । आर्षग्रन्थानां समन्वयस्यैवाभीष्टत्वात् । श्रतादिविनियोगबलात् ' ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' ( सत्याषाढश्रौतसूत्रम् ) इति ऐन्द्रया अपि कदाचनस्तरी रसि ' ( तै ०५ सं ० १।४।२२।१ ) इत्यृचो गार्हपत्योपस्थाने विनियोगो भवति । प्रमाणबलेन तदनुगुणोऽप्यर्थः कतु योग्यः इति, ऐश्वर्य-योगात् गार्हपत्याग्निरपि इन्द्रपदेन सम्बोध्यते । स्मार्त विनियोगवशात् ' शन्नो देवी रभिष्टय इति मन्त्रस्य शनिपूजायामपि विनियोग: । विभिन्नेषु ग्रन्थेषु ऋषीणां परस्परं मतभेदे एकस्मिन्नेव वा ग्रन्थे ऋषीणां मतभेदे प्रस्तुते समेषामेवादर-णीयता । अत एव ' प्रसुष्टुति ' रित्यस्यामृचि - इलस्पति शाकपूणिः पर्जन्याग्नी तु गालवः । यास्कस्तु पूषणंमेने स्तुतमि-न्द्रन्तु शौनकः । वैश्वानरं भागुरिस्तु ' इत्यादिक ' न विरुद्धयते, समबलत्वेन विकल्पसम्भवात् । न च तावतापि अनृषिणा १० केनचित् व्याख्यात्रापि विनियोगदेवतादिकल्पना: कत्तु शक्यन्ते । ६३– यच्च मन्त्रार्थ दृष्टिभेदेन दयानन्दोक्तदेवता समर्थनाय ' उच्चावचैरभिप्रायैऋषीणां मन्त्रदृष्टयो भवन्ती-त्युक्तम्, तत्तुच्छम्, यतस्तत्र मन्त्रद्रष्टृ णामृषीणामुच्चावचदृष्टय उक्ताः । न तु दयानन्दो मन्त्रद्रष्टा ऋषिः । ६४ - ' पारोवर्य वित्सु तु खलु वेदितृषु भूयोविद्यः प्रशस्यो भवति ' ( नि ० १३।१२ ) इति वचनेन दयानन्दस्य पारोवयं वित्त्वेन देवतादिकल्पकत्वं समर्थयितुमिष्यते, तदपि कुशकाशावलम्बनमेव भावानववोधात् । नानेन वचनेना - १५ नृषेरतपसो वा स्वातन्त्र्येण देवतादिनिर्धारयितृत्वमुच्यते, किन्तु पारोवर्यवित्सु भूयोविद्यस्य प्रशस्यत्वमेवोक्तम् । के अनुसार मन्त्रों के विनियोग और देवताओं के भिन्न रहने में कोई किसी प्रकार की बाधा नहीं है । वृहद्देवता, सर्वानुक्रमणी आदि के द्वारा उनका समन्वय करना सम्भव है । इसलिये सर्वानुक्रमणी और वृहद्देवता ये दोनों ग्रन्थ देवतावाद में नितान्त प्रमाणभूत आजतक माने जा रहे हैं । क्योंकि आर्ष ग्रन्थों में समन्वय करना ही अभीष्ट माना गया है | ' ऐन्द्रयागाई पत्यमुपतिष्ठते ' इस श्रोत विनियोग के बल पर ही ' कदाचनस्तरी रसि ' इस ऐन्द्री ऋचा का भी ' गार्ह - २० पत्य ' के उपस्थान में विनियोग किया जाता है । प्रमाण के बल पर तदनुगुण अर्थ भी किया जा सकता है, क्योंकि ऐश्वर्य ' के सम्बन्ध से ' गार्हपत्याग्नि ' को भी ' इन्द्र ' पद से कहा जा सकता है । उसी तरह स्मार्त विनियोगवशात् ' शन्नो देवी ' इस मन्त्र का ' शनि ' की पूजा में भी विनियोग किया जाता है । भिन्न - भिन्न ग्रन्थों में ऋषियों का परस्पर मतभेद रहने पर अथवा एक ही ग्रन्थ में ऋषियों का मतभेद प्रस्तुत होने पर सभी को आदरणीय ही माना जाता है । अतएव ' प्रसुष्टुति: ' इस ऋचा में शाक पूणि, गालव, यास्क, शौनक, भागुरि आदि का मत भिन्न - भिन्न रहने पर भी २५ उनमें कोई विरोध नहीं है क्योंकि सभी के मत, समान बल के होने से उनमें ' विकल्प ' माना जाता है । किन्तु उसी तरह यदि कोई साधारण आदमी अर्थात् जो ऋषि न हो, वह भी मन्त्र का व्याख्यान करते समय उस मन्त्र के विनियोग तथा देवता की मनमानी कल्पना करने लगे, तो उसे उचित नहीं कहा जायगा । ६३ – यह जो कहा गया है कि मन्त्रार्थ की दृष्टि भिन्न होने से स्वामी दयानन्दोक्त देवता के समर्थनार्थ ' उच्चावचैरभिप्रायऋषीणां मन्त्रदृष्टयो भवन्ति । किन्तु यह कथन भी सारहीन है, क्योंकि वहाँ पर मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ३० की उच्चावचदृष्टि को बताया है । स्वामी दयानन्द तो कोई मन्त्रद्रष्टा ऋषि नहीं है । ६४ – निरुक्त के ' पारोवर्यवित्सु तु खलु भूयोविद्यः प्रशस्यो भवति ' इस वचन को देखकर स्वामी दयानन्द को पारोवर्यं वित् समझकर उनके भक्तों ने उनमें देवतादिकल्पकत्व का समर्थन करना जो चाहा है, वह भी कुशकाशावलम्बन के समान ही है । उन भक्तों को निरुक्त के वचन का अभिप्राय समझना चाहिये । निरुक्त वचन यह नहीं बता रहा है कि कोई भी साधारण आदमी जो ऋषि न हो, तपस्वी न हो, वह भी स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी स्वेच्छा के अनुसार देवता ३५ आदि का निर्धारण कर ले । उस वचन ने तो पारोवर्यविदों में भूयोविद्य व्यक्ति का प्रशस्यत्व ही बताया है । दुर्गाचार्य

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[ ३४ ] ना व्याख्यातञ्चैतद् दुर्गाचार्येण तत्र पूर्वमुक्त मन्त्रार्थ चिन्ताभ्यू होम्यूढेऽपि श्रुतितोऽपि तर्कतो न पृथवत्वेन मन्त्रा निर्वक्तव्याः । प्रत्यक्ष अनुषे रतपसोवा । न चात्र मन्त्रे सवितृदेवतात्वनिर्णये श्रुतिसाहाय्यमस्ति तदनुल्लेखात् । तत्रापि प्रकरणानुसारेणैव यतः कुतश्चित् श्रुतेस्तर्कतोऽपि प्रकरणमन्तरा न मन्त्रा निर्वक्तव्याः । तदुक्तम् - प्रकरणश एव निर्वक्तव्याः । तान्येतानि प्रकरणानि याज्ञ दैवतमध्यात्ममितिहासानुप्रवेशादीनि । ५ ६५ - ननु प्रकरणमपि ज्ञातुं शक्यते विद्वद्भिरिति चेत्तत्रोच्यते - नह्येषु प्रत्यक्षमनृषेरतपसो वा । ये पुनरी-पदेशिकास्तानधिकृत्योच्यते पारोवर्यवित्स्विति उपदेशतः पारोवर्ये परोवरभावेन मन्त्रार्थान् प्रतिपद्यन्ते ते पारोवर्यविदः । तेषु भूयविद्यो बहुश्रुत: मन्त्रार्थज्ञाने प्रशस्यो भवति । नेदानीन्तना दयानन्दादय ऋषयः । इत्यपि तत एव ज्ञायते । ' ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्र वन् को नु ऋषिर्भविष्यतीति । तेभ्य एनं तर्क मृषि प्रायुच्छन् । मन्त्रार्थ चिन्ताभ्यूहमभ्यूढम् । ' एतावता स्पष्टं विज्ञायते यत् सर्वे ऋषयो न भवन्तीति । ऋषिभिन्नानां निरुक्ता ग्रन्थानुरोधेनैव मन्त्रार्थज्ञानं सम्भ-१० वति । तदुक्तं दुर्गाचार्येण – निरुक्तशास्त्रे योऽनूचानो विद्वान् स यदेव किञ्चिन्मन्त्रार्थेषु अभ्यूहति आर्षं तद्भवति । न तत्स्वमनीषिकयोच्यते । नैतावदेव तत्रैव महर्षिणा यास्केन निरुक्तविद्याया अपि ' तपसा पारमीप्सितव्यम् ' इत्युक्तम् । तदिदमायुरिच्छता न निर्वक्तव्यम् इत्यपि तेनैवोक्तम्, अतः स्वातन्त्र्येण देवतादिकल्पनम् विरुद्धमेव । तस्मात्कात्यायनादि-महर्षिप्रोक्तविनियोगानुसारेणैव देवतादयो ज्ञातव्याः । ' इषे त्वा शाखानुष्टुप्वनियोगः कल्पकारोक्त इति सायणोद्धृत-ब्राह्मणेनापि कात्यायनोक्ता शाखादेवतैवेषे त्वेति मन्त्रस्य ज्ञेया । ६६ – कि ' इषे त्वादि पशून् पाहीत्यन्त एको मन्त्रोऽभ्युपगम्यते । तत्र सवितृशब्ददर्शनादापाततः ने उस वचन के अभिप्राय को अपनी व्याख्या के द्वारा स्पष्ट भी किया है । उक्त मन्त्र की देवता ' सविता ' को बता रूप में किसी श्रुति वचन का उल्लेख भी नहीं किया है । प्रकरण के अनुसार ही प्रकरण को त्यागकर किसी भी श्रुति वचन से या केवल तर्क से ही मन्त्र की में स्वामी दयानन्दजी ने प्रमाण के मन्त्र का व्याख्यान करना होता है । व्याख्या नहीं की जाती है । २७ ६५ - शङ्का– इस पर यदि यह कहा जाय कि विद्वान् लोग प्रकरण को भी जान , सकते हैं । किन्तु इस बात का अपलाप नहीं किया जा सकता कि जो ऋषि या तपस्वी न हो उसे भी उसका ज्ञान हो जाय । जो लोग औपदेशिक हैं, उन्हीं को लक्ष्य करके ' पारोवर्यवित्सु ' कहा गया है । उपदेशपूर्वक परोवरभाव से मन्त्रार्थों को जो जानते हैं, उन्हें ' पारोवयं विद् ' कहा जाता है । उन पारोवर्य विदों में जो बहु विद्य अर्थात् बहुश्रुत रहता है, उसे मन्त्रार्थ ज्ञान में प्रशंस-नीय समझा जाता है । आजकल के आधुनिक स्वामी दयानन्दजी जैसे लोगों को ' ऋषि ' तो कह नहीं सकते । क्योंकि २५ निरुक्त ही बता रहा है कि - ' ऋषिषूत्क्रामस्तु देवानब्र ुवन् ' अतः स्पष्ट है कि सभी लोग ' ऋषि ' नहीं कहलाते । साधारण प्राकृत लोगों को तो निरुक्त आदि आर्ष ग्रन्थों के अनुरोध से ही मन्त्रार्थ का ज्ञान हो सकता है । दुर्गाचार्य ने भी कहा है कि निरुक्तशास्त्र में जो अनूचान विद्वान् होता है उसी का मन्त्रार्थ विषयक अभ्यूहन ' आर्ष ' कहलाता है । वह अनूचान अपनी कपोलकल्पित कोई बात नहीं कहता है । महर्षि यास्क ने निरुक्तविद्या के वारे में भी कहा है कि ' - तप के द्वारा ही इस मन्त्रार्थार्णव के पार पहुंचा जा सकता है । महर्षि यास्क ने यह भी कहा ' तपसा पारमीप्सितव्यम्'-निर्वचन करने का प्रयत्न न करे । स्वेच्छानुसार स्वतन्त्रतापूर्वक ३० है कि जिसे दीर्घायु होना हो वह स्वबुद्धिकल्पित अतः मन्त्रदेवता की कल्पना कर लेना शास्त्र विरुद्ध ही है । इसलिये कात्यायनादि महर्षि प्रोक्त विनियोग के अनुरोध से ही मन्त्रदेवता आदि को जानना चाहिये । भाष्यकार सायणाचार्य के इस उद्धृत काण्वशाखीय ब्राह्मणने भी कात्यायनोक्त ' इत्वा शाखानुष्टुप् विनियोग: कल्पकारोक्तः ' वचन के अनुसार ' इषेत्वा ' इस मन्त्र की देवता - ' शाखा ' को ही बताया है, अत: उसे ही मानना उचित है । ६६– किश्व ' इषेत्वा ' से लेकर ' पशून् पाहि ' तक एक ही मन्त्र समझकर और उसमें आये हुए ' सवितृ ' शब्द

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[ ३५ ] सवितास्य मन्त्रस्य देवतेत्युक्तम्, ब्राह्मणसूत्राद्यनुरोधेन तु कण्डिकायामस्याम् ' इषेत्वा ' ' ऊर्जेत्वा ' इत्यादयोऽनेके मन्त्राः सन्ति । धयि ६७ – यत्तु ब्रह्मदत्तेन - “ पशुहिंसा वारिता च यजुर्वेदादिमन्त्रतः " इति ( महाभारतीयं ( शान्तिपर्व ३४४ २१ ) पद्यमुद्धरता पशून् पाहीत्यन्तस्यै वादिमन्त्रत्वेन सम्पूर्णेव कण्डिका एकोमन्त्र इति साधितुं प्रयतिम्, तदप्यकिश्चित्करम्, श्रुतिविरोधात् । यजुर्वेदादिकण्डिकायां ये मन्त्रास्तेषु ( सप्तम्यास्तसिल् । इति व्युत्पत्त्या वाक्षेपानर्हत्वात् । मन्त्रपदस्य मन्त्रसमूहरूपायां कण्डिकायां वा गौण्या वृत्त्या प्रयोगात् । अन्यच्च नात्र पशुहिंसा वार्यते किन्तु पशुपालनं प्रार्थ्यते । न खलु पालनमेव हिंसावारणम्, आधुनिकैः शासकैः पशुपालने प्रयासवद्भिरपि हिंसा प्रतायत एव । न च यजुर्वेदशब्देनेय-मेकैव संहिता ग्रहीतुं शक्या, कृष्णयजुर्वेदस्यापि यजुर्वेदत्वेन प्रसिद्धेः । तत्र यजुर्वेदादिमन्त्रत इत्यस्य यजुर्वेदादिमन्त्रेभ्य इत्यर्थः । तत्र मन्त्रपदं ब्राह्मणस्याप्युपलक्षणम् ' मा हिंस्यात् सर्वाभूतानी ' त्यादि ब्राह्मणवचनैश्च तन्निषेधात् । ' अग्नी-षोमीय पशुमालभेतेति वचनन्त्वपवादभूतम् । तथा च यज्ञगतालम्भनातिरिक्तहिंसाया वेदेषु निषेधादित्येवार्थः । यद्वा १० यजुर्वेदादिषु सर्वेषु वेदेषु मन्त्रतो निषेधपर्यवसायिवाक्यतः इत्यर्थः । निषेधपर्यवसायिवाक्येषु विधिपर्यवसायिवाक्येषु चोभयत्रैव मन्त्रपदप्रयोगात् । यथा ' ये मन्त्राः प्रोक्षणे गवाम् ' ( म ० भा ० उ ० प ० १७ ६ ) इत्यादिस्थलेषु । ६८– [ एतेन यदुक्तम् - " इषे त्वोर्जेत्वा ' इति मन्त्रद्वय गोपथकारेण नाङ्गीक्रियते । किन्तु ' श्रेष्ठतमाय कर्मण ' इत्येवमादि ' कृत्वा यजुर्वेदमधीयते ' ( गो ० १।१।२ 2 ) इति वदता सम्पूर्ण पाठस्यैकमन्त्रत्वं द्योत्यते " इति, तदपि न किञ्चित्, तत्रादिपदस्य मन्त्रादिपरत्वे त्वदभिमतस्य पाहिपर्यन्तस्य मन्त्रत्वानापत्तेः । तत्र कण्डिकाप्रतीकोपादानस्यैवेष्ट - १५ ' सुनकर उस मन्त्र की देवता ' सविता ' है - यह जो कहा, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि ब्राह्मण और सूत्र आदि के अनुरोध से इस कण्डका में ' इषेत्वा ', ' उर्जेत्वा ' इत्यादि अनेक मन्त्र हैं । एक मन्त्र नहीं है । ६७ - ब्रह्मदत्त ने “ पशुहिंसा वारिता च यजुर्वेदादिमन्त्रतः " इस महाभारतीय पद्य का उद्धरण देते हुए ' पशून्-पाहि ' तक समाप्त होनेवाले को प्रथम ( आदि ) मन्त्र के रूप में सम्पूर्ण कण्डिका को ही ' एक मन्त्र ' सिद्ध करने का जो प्रयत्न किया है, वह भी अकिञ्चित्कर ( व्यर्थ ) है । क्योंकि श्रुति का विरोध होता है । तथाहि - यजुर्वेद की प्रथम कण्डिका में जो मन्त्र हैं उनमें अथवा ( सप्तम्यास्तसिल् = सप्तमी विभक्ति के अर्थ में ' तसिल् ' ) इस व्युत्पत्ति से आक्षेप करना योग्य नहीं है, क्योंकि मन्त्र पद का प्रयोग, मन्त्रसमूह में अथवा कण्डिका में गोणीवृत्ति की सहायता से ( लक्षणा से ) किया गया है । दूसरी बात यह है कि यहाँ पशुहिंसा का निवारण नहीं किया जा रहा है, अपितु पशु-पालन की प्रार्थना की जा रही है । ' पालन करने ' को ही ' हिंसा निवारण ' नहीं कहा करते हैं । आधुनिक शासक, पशु-पालन का प्रयास करते हुए भी हिंसा को बढ़ावा दे ही रहे हैं । ' यजुर्वेद ' शब्द से इस एक ही संहिता का ग्रहण करना योग्य नहीं है, क्योंकि ' कृष्णयजुर्वेद ' को यजुर्वेद के नाम से कहा जाता है । तब ' यजुर्वेदादिमन्त्रतः ' का अर्थ ' यजुर्वेदादि -मन्त्रेभ्यः ' करना चाहिये । वहां पर ' मन्त्र ' पद, ' ब्राह्मण ' का भी उपलक्षण है । क्योंकि ' मा हिंस्यात् सर्वभूतानि ' इत्यादि ब्राह्मणवाक्यों से उसका निषेध किया गया है । ' अग्नीषोमीय ' पशुमालभेत ' यह वचन तो अपवादभूत है । तथा च यज्ञगत आलम्भन के अतिरिक्त की जानेवाली हिंसा का वेदों में निषेध किया गया है - यही अर्थ होता है । अथवा यजुर्वेदादि सभी वेदों में ' मन्त्रतः ' अर्थात् निषेध पर्यवसायी वाक्य से – यह अर्थ भी किया जा सकता है । क्योंकि निषेध पर्यवसायी तथा विधिपर्यवसायी दोनों प्रकार के वाक्यों में ' मन्त्र ' पद का प्रयोग हुआ करता है । जैसे- ' ये मन्त्राः प्रोक्षणे गवाम् ' इत्यादि स्थलों में किया गया है । ६८ - यह जो कहा गया है कि " इषेश्वोर्जेत्वा " में दो - मन्त्रों का होना, गोपथकार ने स्वीकार नहीं किया है, किन्तु ' श्रेष्ठतमाय कर्मणे ' इस प्रकार मन्त्र का आरम्भ करके यजुर्वेद का अध्ययन करते हैं " यह कहते हुए उन्होंने सम्पूर्ण पाठ की ' एकमन्त्रता ' को ही सूचित किया है । किन्तु गोपथ का आशय न समझ सकने कारण आप ऐसा कह रहे हैं | अतः आपके उक्त कथन में कोई सार नहीं है । गोपथ वाक्य में जो ' आदि ' पद है, उसे यदि ' मन्त्रादिपरक '

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[ ३६ ] त्वात् । कण्डिकास्वनेकेषां मन्त्राणां सत्त्वादेव नमस्काराद्य ेकं यजुः, नमस्कारान्तमेक यजुरिति यास्काद्य क्तयः सङ्गच्छन्ते । ६६ - यदप्युक्तम् – “ इषेत्वोर्जेत्वा वायवः स्थदेवो व ' इत्येवमादि कृत्वा यजुर्वेदमधीयत इतिवचनात् गोपथकारस्य कृष्णयजुर्वेदो वेदत्वेन नाभिमतइति तदपि तुच्छम्, तत्र यजुर्वेदशब्दस्य अन्ययजुर्वेदीय ग्रन्थानामुपलक्षण-१ स्वात् । अन्यशाखीयसंहितानामपि वेदत्वस्य पारम्पर्यात् श्रुतिस्मृतिपुराणादिभ्योऽपेि सिद्धत्वात् । मुक्तिकोपनिषदादौ पुंराणेषु महाभाष्ये चानेकशाखोपबृं हितस्य वेदचतुष्टयस्य वर्णनात् । यथा ' अग्निमीले पुरोहितम् ' ' इषे त्वोर्जेत्वा ' ' अग्न आयाहि वीतये ' इति ऋचां यजुषां साम्रामादिमन्त्रप्रतीकोपादानं कृत महाभाष्ये तथैव अर्थवेदस्य ' शन्नो देवीरभिष्टये ’ इति मन्त्रप्रतीकोपादान ं कृतम् । स च न शौनकीसंहिताया आदिमो मन्त्रः किन्तु पिप्पलादसंहिताया आदिमो मन्त्रः । न च सा संहिता त्वदभिमतो वेदः । एवञ्च महाभाष्यकाररीत्या तव वर्त्मना शौनकी संहिताया अवेदत्वमेव स्यात् । पिप्पलाद संहितायाश्च वेदत्वम् । ७० -- किच काण्वानुसारेण जैमिनिनापि ' इषे त्वा ' दीनां पृथङ मन्त्रत्वं निर्णीतम् । तथाहि द्वितीयाध्यायस्य प्रथमे पादे -- ' अर्थैकत्वादेक वाक्य साकांक्ष चेद्विभागे स्यात् ' ( मी ० सू ० २।१।४६ ) इत्यत्र शाबरभाष्ये विचारितम् प्रश्लिष्टपठितेषु यजुःषु कथमवगम्येत यदेकं यजुरित्याशङ्कयोक्तम् यावता पदसमूहेनेज्यते तावान् पदसमूह एक यजु-रित्युत्तरितम् । कियता चेज्यते इत्याशङ्कय पुनरुत्तरितम् यावता क्रियाया उपकारः प्रकाश्यते तावत् वक्तव्यत्वात् वाक्य-मित्युच्यते । तेनाभिधीयते अर्थेकत्वादेक वाक्यम् ' तत्रैव ' समेषु वाक्यभेदः स्यात् ' ( मी ० सू ० २।१।४७ ) इति सूत्र े मानेंगे तो आप अभिमत ' पाहि ' पर्यन्तभाग में ' मन्त्रत्व ' नहीं बन पायेगा । क्योंकि वहाँ कण्डिका में ' प्रतीक ' का ग्रहण करना हो अभीष्ट है । एक कण्डिका में अनेक मन्त्रों के होने से ही ' नमस्कारादि एक यजु ' है, और ' नमस्कारान्त ' एक यजु है - इस यास्कोक्ति की सङ्गति भी लग जाती है । ६६ - यह जो कहा गया है कि " इषे त्वोर्जेत्वा वायवः स्थ देवो वः प्रकार आरम्भ करके इस ' यजुर्वेदमधीयते ' -- इस वचन के अनुरोध से गोपथकार को ' कृष्णयजु ' का ' वेदत्व ' अभिमत नहीं है । - यह कथन भी अत्यन्त तुच्छ है । क्योंकि वहाँ ' यजुर्वेद ' शब्द, अन्य यजुर्वेदीय ग्रन्थों का उपलक्षण है । अन्यशाखीय संहिताओं का भी ' वेदत्व ', -- प्राचीन शिष्ट परम्परा तथा श्रुति, स्मृति, पुराणादिकों से भी सिद्ध है । मुक्तिकोपनिषद् आदि में, पुराणों में और महाभाष्य में भी अनेक शाखाओं से उपबृंहित हुए चारों वेदों ( वेद चतुष्टय ) का वर्णन उपलब्ध होता है । जैसे ' अग्निमीले पुरोहितम् ', ' इषेत्वोर्जेत्वा ', अग्न आयाहि वीतये ' - - इस प्रकार ऋक्, यजु और सामादि मन्त्रों के प्रतीकों .का उपादान महाभाष्य में किया है, वैसे ही अथर्ववेद का ' शन्नो देवीरभिष्टये ' - - इस मन्त्र के प्रतीक का उपादान किया है | यह मन्त्र ' शौनकी संहिता का आदिम ( प्रथम ) मन्त्र नहीं है, किन्तु पिप्पलादसंहिता का आदिम मन्त्र है । आप तो उस संहिता को ' वेद ' कहते ही नहीं हैं । एवञ्च आपके सम्प्रदाय की दृष्टि में महाभाष्यकार की रीति से ' शौनकी-संहिता ' को अवेद कहना होगा, और ' पिप्पलाद संहिता ' को वेद कहना होगा । ७० — किञ्च काण्व के अनुसार जैमिनि ने भी ' इषेत्वा ' आदि में पृथक मन्त्रत्व का निर्णय किया है । तथाहि, द्वितीयाध्याय के प्रथम पाद में अथैकत्वादेकं वाक्य ', के शाबरभाष्य में उसका विचार किया है कि प्रश्लिष्ट पठित यजुओं में कैसे जाना जायगा कि यहां तक ' एक यजु ' है -- ऐसी आशङ्का करके समाधान किया है कि जहाँ तक के पद-समूह के द्वारा याग किया जाता है, वहाँ तक का पदसमूह ( उतना पदसमूह ) ' एक यजु ' कहलाता है । पुन: शङ्का कर सकते हैं कि कितने पदसमूह से याग किया जाता है । उसपर उत्तर दिया है कि जितने से क्रिया का उपकार किया जा सकता है । क्रियोपकारक, उस पदसमूह को ' वाक्य ' कहा जाता है । अतएव यह कहा गया है ' अर्थैकत्वादेक ' वाक्यम् ' | वहीं पर ' समेषु वाक्यभेदः स्यात् ' -- सूत्र के द्वारा विचार किया है कि ' इषेत्वा, ' उर्जेत्वा ', तथा ' आयुर्यज्ञेन कल्पतां

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 50 का मूल पृष्ठ
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[ ३७ ] इत्वा ऊर्जेत्वा इति तथा ' आयुर्यज्ञ ेन कल्पतां प्राणो यज्ञ ेन कल्पतामितिभिन्न वाक्यमुतैकम्? इषेत्वा इत्येवमुक्ते न किश्चिद्दृष्टप्रयोजनम्, तथा ऊर्जेत्वा इत्यपि च, वचनसामर्थ्याददृष्टं तदुभाभ्यामेकम् ( अदृष्ट ) कल्पयितुं न्याय्यम् | एवं स्वल्पीयानुमान कल्पना भविष्यति एवं पूर्वपक्षय्य समाहितम् - समेषु वाक्यभेदः स्यादिति समेषु नोपलभ्यते परस्परानाकांक्षेषु श्रुत्या वाक्यंभिद्यते । इषेत्वेत्यनेनैकोऽर्थः क्रियते उर्जे त्वेत्यनेनापर: । यद्यपि प्रत्यक्षादिना प्रमाणेन दृष्टोऽर्थो ५ तु गम्यते इषे त्वेति छिनत्ति ऊर्जे त्वेत्यनुमाष्टि इति । एतावता शाबरभाष्येणोपयुक्त ' काण्ववाक्यद्वयं श्रुतित्वेनोदाहृत्य एकस्यां इषे त्वा उर्जेत्वा इति वाक्यद्वयमङ्गीकृत्य मन्त्रद्वयमङ्गीकृतम् । तस्मात् पूर्वमीमांसासूत्र - भाष्याभ्यामनेके वैक क्रियापदे मन्त्रा । असत्यर्थ-कण्डिकायां सिद्ध्यन्ति । जैमिनीयाधिकरणन्यायमालायामपि - ' इषे त्वादिर्मन्त्र एको भिन्नो -स्मारकत्वादेकादृष्टस्य कल्पनात् ॥ छेदने मार्जने चैतौ विनियुक्त क्रियापदौ । अध्याहृते स्मारकत्वात् सत्येकादृष्टस्य मन्त्रभेदोऽर्थ भेदतः ॥ ' इषे त्वोर्जे त्वेत्यत्र क्रियापदाभावेन ' उरुप्रथस्व ' प्रथस्वेति मन्त्रवदर्थस्मारकत्वाभावाददृष्टार्थे 10 कल्पने लाघवादेक एव मन्त्र इति पूर्वपक्ष: । सिद्धान्तस्तु काण्वब्राह्मणे छिनत्ति अनुमाष्टति विनियोगश्रवणात्तदनुरोधेन पर्णशाखां इत्वा छिन ऊर्जेत्वाऽनुमार्मि इति क्रियापदेऽध्याहृते सत्यस्मारकत्वाद्भिनौ मन्त्री । कात्यायनमहर्षिणापि इति पलाशशाखा छिनत्तिशामील वा इषे त्वोर्जे त्वेति वा छिनमि इति वोभयोः साकांक्षत्वात् सन्नमयामीति वोत्तर शमीशाखा वात्र विकल्पिता । तच्छेदने इषे त्वोर्जे त्वेति द्वौ मन्त्री विकल्पितौ । ७१ - [ यत्तु ' इषे अन्नविज्ञानयोः प्राप्तये ' इत्युक्तम्, तदपि न युक्तम्, पूर्वोक्तकाण्वश्रुत्या इषे इत्यस्य वृष्टयर्थ- १५ ताप्रतिपादनात् । यदुक्तम् - यस्य पदस्य यद्धातोर्यस्मिन् प्रत्यये यस्मिन्नर्थे व्याकरणनिरुक्तभाष्यकारादिभिर्व्युत्पत्तिः :, अपितु प्रदर्शिता तस्मादेवधातोस्तास्मिन्नेव प्रत्यये तस्मिन्नेवार्थे च पदमिदं व्युत्पादनीयमिति नैकान्तो नियम प्राणो यज्ञ ेन कल्पताम् ' – ये सब भिन्न - भिन्न वाक्य हैं अथवा सब मिलकर सम्पूर्ण एक ही वाक्य है? ' इषेत्वा ' इतना कहने पर किसी दृष्ट प्रयोजन की उपलब्धि नहीं होती है, तथा ' ऊर्जेत्वा ' के कहने पर भी वैसा ही है । स्वल्प किन्तु करनी वचन सामर्थ्यात् दोनों से एक ही अदृष्ट की कल्पना करना ही न्यायोचित है । इस प्रकार अनुमान कल्पना सू ० २1१1४७ ) 20 पड़ेगी । यह पूर्वपक्ष किया गया है । उसपर समाधान देने के लिये ' समेषु वाक्यभेदः स्यात् ' ' वाक्य - ( मी ' ० भिन्न - भिन्न माने सूत्र को उपस्थित किया गया है । ' समेषु ' यानी एक दूसरे को परस्पर आकांक्षा न रहने पर प्रत्य जाते हैं । ' इवा ' कहनेवर एक अर्थ किया जाता है और ऊर्जेत्वा ' कहनेपर अन्य अर्थ किया जाता है । यद्यपि छिनत्ति ' -क्षादि प्रमाण से किसी दृष्ट अर्थ की उपलब्धि नहीं हो रही है, किन्तु श्रुति से जाना जाता है कि ' इषेत्वेति चाहिये । इषेत्वा मन्त्र बोलकर छेदन करना चाहिये, ऊर्जेत्वेत्यनुमाष्टि ' ' ऊर्जेत्वा ' मन्त्र बोलकर अनुमार्जन कर ' इषेत्वा करना ' – ऊर्जेत्वा ' २५ इस शाबर भाष्य के द्वारा उपर्युक्त काण्व के दो वाक्यों को श्रुति के रूप में उदाहरण प्रस्तुत भाष्य की को दो वाक्य मानते हुए उन्हें दो मन्त्रों के रूप में स्वीकार किया है । एवञ्च पूर्वमीमांसासूत्र और उसके कि ' इषे-दृष्टि में ' अनेक मन्त्र ', एक कण्डिका में हुआ करते हैं । जैमिनीय अधिकरण न्यायमाला में भी कहा गया कारण है जब उसे त्वोर्जेत्वा ' में किसी ‘ क्रियापद ' के न रहने से ' ऊरुप्रथा इस मन्त्र के समान अर्थस्मारकत्व न होने के अदृष्टार्थक ही कहना होगा, तब एक अदृष्ट की कल्पना करने में लाघव होने से ' इषेत्वोर्जेत्वा ' इतना एक ही मन्त्र है - ३० यह पूर्वपक्ष किया गया है । किन्तु सिद्धान्त यह किया गया है कि काण्व ब्राह्मण में ' छिनत्ति, अनुमाष्टि ' इस करने प्रकार पर विनियोग श्रुत रहने से, तदनुरोधेन, ' इषेत्वा छिनकि, ऊर्जेत्वा अनुमाज्मि ' इस प्रकार क्रियापद का अध्याहार भी ' पर्णशाखां ' छिनद्भि ' कहकर उक्त मन्त्रों में अर्थस्मारकत्व स्पष्ट हो जाता है । कात्यायन महर्षि ने दोनों के साकांक्ष होने से ' सन्नयामीति वोत्तरे ' यह कहकर पलाश शाखा अथवा शमीशाखा का विकल्प यहाँपर दिखाया है । उसके छेदन में ' इषेत्वा ', ' ऊर्जेत्वा ' दो मन्त्रों को विकल्प से बताया है । ---७१ – स्वामी दयानन्द जी ने " इषे " का अर्थ ' अन्न और विज्ञान की प्राप्ति के लिये ' किया है । किन्तु यह अर्थ भी उचित नहीं है, क्योंकि काण्व श्रुति के द्वारा " इषे " का अर्थ ' वृष्टि ' के लिये किया गया है । निरुक्त और दुर्गा-चार्य के ये वचन कि " जिन पदों में स्वर और संस्कार समर्थ होकर प्रादेशिक गुणों से अन्वित होते हैं । उनका