वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 51–60

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 51–60

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[ ३८ ] ७ यस्माद्यस्मादपि धातोर्यस्मिन् प्रत्यये यस्मिन्नर्थे यं यमर्थ वक्त ं पदं समर्थं स्यात् तथा तथा निर्वक्तु ं शक्यते ' इति, तत्तु सर्वथा विरुद्धमेव, तात्पर्यानुरोधेनैव व्युत्पत्तेराश्रयणीयत्वात् । ' अर्थैकत्वादेकं वाक्यमिति ( मी ० सू ० २।१।४६ ) सूत्रे जैमिनिना स्पष्टमेतदुक्तम् । तथा च नैकस्य वाक्यस्याने केऽथस्तात्पर्यगोचरा वक्तु ं शक्यन्ते । विवरणकृतापि वाक्ययोज-नाविचारप्रसङ्ग े चोक्तम् पूर्वोक्तरीत्या नैका सरणिर्वाक्ययोजना यामाश्रयितुं शक्यते व्याख्यातृणां बुद्धिभेदात् । सत्यप्येवं ५ भाष्यकाराणां विविधापि वाक्ययोजना तदनुसारी च विविधोऽप्यर्थः प्रामाणिक एवेति स्वीकतु शक्यते । वेदान्तगीतादि-भाष्योक्तेषु सर्वेष्वप्यर्थेषु ग्रन्थकतुरभिप्रायोऽस्तीति न कथमपि शक्यते वक्तम् । एवमेव वेदेऽपि तत्कतुः सच्चिदानन्द-त्वादिगुणविशिष्टस्य ब्रह्मणो विभिन्न भाष्यकारप्रतिपादितेषु विविधेषु सर्वेष्वर्थेष्वभिप्रायोऽस्तीति न शक्यते वक्तुम् । तस्मादकामेनापि शास्त्रवचनानुसृत एव वेदार्थः प्रामाणिको भवितुमर्हतीत्यङ्गीकरणीयम् । तथा सति मन्त्रब्राह्मणसूत्र-पारम्पर्ययाज्ञिकपद्धतिविरुद्धो दयानन्दीयोऽर्थस्त्वद्रीत्यापि न स्वीकारार्हः 10 अथ निर्वचनं तद्यषु पदेषु स्वरसंस्कारौ समर्थों प्रादेशिकेन गुणेनान्वितौ स्याताम्, तथा तानि निब्रूयात्, अथानन्वितेऽर्थेऽप्रादेशिके विकारेऽनित्यः परीक्षेत केनचिद् वृत्तिसामान्येन अविद्यमाने सामान्येऽप्यक्षरवर्णसामान्यान्नि-ब्रूयात् न त्वेव न निब्रूयात् न संस्कारमाद्रियेत विशेयवत्यो हि वृत्तयो भवन्ति ' ( नि ० २1१ ) इति निरुक्तवचनानि तत्रत्यानि च दुर्गाचार्यादिवचनानि न शास्त्रप्रकरणादिविरुद्ध यथेच्छनिर्वचनसमर्थकानि किन्तु तेषां ' अर्थनित्यः परीक्षेत ' अर्थादर्थप्रधानः परीक्षेतेत्यत्रैव तात्पर्यम् । अर्थप्राधान्येनैवानाहत्य स्वरसंस्कारौ परीक्षेत | अर्थोहि प्रधानं तद्गुणभूतः १५ शब्दः, तस्माच्छब्दसामान्यादर्थ सामान्य बलीय इति तात्पर्यांनुरोधेनैव व्युत्पत्तयो ग्राह्याः । तात्पर्यानुरोधेनानेका अपि व्युत्पत्तयो न दोषावहा बुद्धि वैशद्यहेतुत्वात् । स्वेच्छया स्वरसंस्कारवचन पुरुषव्यत्यासे शाब्दन्यायेऽराजकतैव स्यात् । तस्माद्यत्र स्त्ररसंस्कारादयस्तात्पर्यानुरोधिनो न भवेयुस्तत्रैव तदनादरेण निर्वचनं युक्तम् । विशेषतस्तु आस्माकीनवेद-भाष्यभूमिकायां विवेचिता इमे विषयाः । अर्थप्राधान्येन धातुतोऽर्थोऽवगन्तव्य इति निर्वचन सिद्धान्ते स्वीकृतेऽपि न हानि: । ' अनुपक्षोणशक्तयो हि विभवो वेदशब्दा यथाप्रज्ञां पुरुषाणामर्थाभिधानेषु विपरिणममानाः सर्वतोमुखा अनेकान- 1 1 र्थान् प्रब्र ुवन्ति ' ( नि ० टीका पृ ० ६४ ) इति वचनमपि तात्पर्यानुरोधेनैव नेतव्यम्, न यथेच्छम् इत्यर्थकम्, पुरुषेच्छाया अव्याहतप्रसरत्वात् । निर्वचन उसी प्रकार करना चाहिये, जो अर्थ - अनन्वित हैं । प्रादेशिक विकार है, वहां अर्थ नित्यता की परीक्षा करनी चाहिये | किसी वृत्ति के कारण सामान्य के अविद्यमान होनेपर अक्षर वर्ण से समानता को लेकर निर्वचन करना चाहिये । निर्वचन ही न हो, ऐसा नहीं होना चाहिये । संस्कार का ही अत्यधिक आदर नहीं करना चाहिये, क्योंकि २५ वृत्तियां सविषयक होती हैं " शास्त्र के विरुद्ध यथेच्छ निर्वचन के समर्थक नहीं है, अपितु उनका तात्पर्य अर्थ को प्रधान रखकर परीक्षा करने में ही है । स्वर और संस्कार का अनादर करके भी अर्थ को ही प्रधान मानकर परीक्षा करनी चाहिये, क्योंकि अर्थ की प्रधानता होती है । ' शब्द ' उसकी अपेक्षा गौण होता है । इसलिये शब्द सामान्य से अर्थ -सामान्य हो बलवान् होता है । इस तात्पर्य का अनुरोध रखते हुए ही व्युत्पत्तियों को ग्रहण करना चाहिये । तात्पर्य का यदि अनुरोध हो तो अनेक प्रकार की व्युत्पत्तियाँ भी बुद्धि की विशदता सम्पादन के कारण दोषावह नहीं होतीं हैं । अपनी इच्छानुसार स्वर, संस्कार, वचन और पुरुष का व्यत्यास माननेपर तो शब्दविषयक न्याय में अराजकता ही फैल जायगी । अत: स्वर और संस्कार का अनादर वहींपर सह्य होता है, जहाँपर वे तात्पर्य का अनुरोध नहीं रखते । हमारी वेदभाष्यभूमिका में इन विषयों पर विशेष विचार हो चुका है । अर्थ की प्रधानता के कारण धातु से अर्थ को जानने के लिये निर्वचन के सिद्धान्त को मानने में कोई हानि नहीं है । निरुक्त का यह कथन है कि " वेद के शब्द, अक्षीण शक्ति से सम्पन्न, विभुता से युक्त हैं । पुरुषों की प्रज्ञा के अनुसार अर्थों के अभिधानों में विपरिणत होते हुए सर्वतोमुखभाव से अनेक अर्थों को कहते हैं " । इसे तात्पर्य के अनुरोध से ही समझना चाहिये । इसका अभिप्राय यथेच्छ अर्थ करने में कथमपि नहीं है, क्योंकि पुरुष की इच्छापर उसे छोड़ने पर तो उसकी कहीं पर रुकावट ही नहीं होगी ।

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[ ३६ ] षड्‌वि ७२ - [ ननु व्युत्पत्तिवशादर्थज्ञानमर्थज्ञानाच्च व्युत्पत्तिनिर्णय इत्यन्योन्याश्रयः, इति चेन्न, अर्थपदेन तात्पर्यस्य विवक्षितत्वात् । तन्निर्णयस्तु - ' उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् | अर्थवादोपपत्ती च लिङ्ग तात्पर्यनिर्णये ॥ ' इति तात्पर्यग्राहक लिङ्ग र्भवति । तात्पर्य च लोके तत्प्रतीतीच्छ्योच्चरितत्वम् वेदे तु तदितरप्रतीतीच्छ्यानुच्चरितत्व-रूपम् । न चोपक्रमादिवाक्येष्वपि व्युत्पत्तिनिर्णयाधीनमेवार्थज्ञानम् विप्रतिपन्नस्थले व्युत्पत्तिनिर्णयापेक्षायां सत्यामपि सर्वत्र विप्रतिपत्त्यसम्भवेनादोषात् । प्रकृते तु काण्वश्रुत्यैवेष इत्यस्य वृष्ट्यर्थता निर्णीता । न च ' अन्न ' वा इषम् ' ( कौ ० ५ ब्रा ० २८ | ५ ) इति श्रुत्यैवान्नार्थतापि विज्ञायते इषशब्दस्येति वाच्यम्, काण्वशाखीयमन्त्रव्याख्याने काण्वश्रुतेः कौषीतक्य-पेक्षयाऽन्तरङ्गत्वेन, बहिरङ्गव्याख्यानग्रहणानौचित्यति । काण्व माध्यन्दिनीशाखयोश्च वाजसनेयित्वेन माध्यन्दिनीशाखा-यामपि तस्या एव ग्राह्यत्वात् । किञ्चेषेत्वेति मन्त्रस्य तद्गतस्य ' खुष इति चतुर्थ्यन्तपदस्यैव व्याख्यां काण्वश्रुत्तिः करोति । कौषीतकिस्तु इषमिति द्वितीयान्तस्यान्य मन्त्रगतस्य व्याख्यानं करोति इति व्यवस्थैव युक्ता, तथा च न पर-स्पर ं बाध्यबाधकभावः । अत एव इषु इच्छायाम् ' इत्यनुसारेणोत्तमेच्छा इत्यप्यर्थोऽसङ्गत एव । इच्छाया वस्तुसौन्दर्य- १० ज्ञानजनितत्वेन प्रार्थनीयत्वानुपपत्तेः । ७३ - [ यत्तु ' सर्वनाम्नः पूर्वपरामशित्वात् ऋग्वेदेन पूर्वनिर्दिष्टस्वरूप: सर्वोऽपि पदार्थसमूहोऽत्र ग्रहीतु त्वेति शक्यते, पुनरपि ब्रह्मणः प्रधानत्वात् भाष्यस्य चाध्यात्मपरत्वात् परमेश्वर एव परामृश्यते, प्रसिद्धपरामशित्वाद्वा ७२ – इस पर यदि यह शङ्का करो कि व्युत्पत्ति होनेपर अर्थज्ञान होगा और अर्थज्ञान के होनेपर व्युत्पत्ति का निर्णय होगा, तब अन्योन्याश्रयदोष आवेगा । किन्तु यह शङ्का उचित नहीं होगी, क्योंकि यहाँ ' अर्थ ' पद से ' तात्पर्य ' १५ विवक्षा की जाती है । और ' तात्पर्य ' का निर्णय ' उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उप-पत्ति ' - इन छह प्रकार के तात्पर्यग्राहक चिह्नों से किया जाता है । तात्पर्य का अर्थ, लोकव्यवहार में ' तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्व ' अर्थात् उसको बताने की इच्छा से उच्चारण करना ' है, किन्तु वेद में ' तदितरप्रतीतीच्छ्याऽनुच्चरितत्व ' अर्थात् ' उसमे इतर ( भिन्न ) की प्रतीति की इच्छा से उच्चारण न करना ' होता है । और यह भी नहीं है कि ' उप-क्रमोपसंहारी ', इत्यादि वाक्यों में भी ' अर्थज्ञान ', व्युत्पत्तिनिर्णय के ही अधीन हो । विप्रतिपत्ति स्थलों में व्युत्पत्ति से १० निर्णय की अपेक्षा होनेपर भी सभी स्थलों पर विप्रतिपत्ति का होना संभव नहीं है । अतः कोई दोष उपस्थित ' है, नहीं इस होता है । प्रकृत में तो काण्वश्रुति के द्वारा हो ' इष ' पद का अर्थ ' वृष्टि ' निर्णीत किया गया है । ' अन्न ' - ' इष श्रुति के द्वारा ' इष ' शब्द का अर्थ ' अन्न ' भी कहा गया है । ऐसी शङ्का यहाँपर उठाने योग्य नहीं है, क्योंकि जब काण्व-श्रुति का व्याख्यान करना है तब काण्वश्रुति ' कौषीतकी अपेक्षा अन्तरङ्ग है । अत: उससे भिन्न जो बहिरङ्ग माध्यन्दिनी है - । २५ उसका ग्रहण करना यहाँ उचित नहीं है । ' काण्व ' और ' माध्यन्दिनी ' शाखाएँ वाजसनेयी की हैं । अतः शाखा में भी उसी का ग्रहण करना उचित होगा । काण्वश्रुति “ इषे त्वा " मन्त्र की और उसके अन्तर्गत “ इषे ” इस चतुर्थी विभक्त्यन्त पद की ही व्याख्या कर रही है । और कौषीतकी तो " इषम् " इस अन्य मन्त्र के अन्तर्गत ' द्वितीया-विभक्त्यन्त ' पद की व्याख्या कर रही है । अतः उक्त व्यवस्था ही यहाँ उपयुक्त है । उक्त व्यवस्था को स्वीकार करनेपर इन दोनों में ' परस्पर बाध्य - वाधकभाव नहीं होगा । अतः ' इषु इच्छायाम् ' के अनुसार ' उत्तम इच्छा के लिये -- यह अर्थ करना भी स्वामी दयानन्दजी का असङ्गत ही है । क्योंकि ' इच्छा ' तो वस्तुसौन्दर्य के ज्ञान से उत्पन्न है, वह प्रार्थ-नीय नहीं हो सकती । ७३ -- यह जो कहा गया है कि ' सर्वनाम शब्द, पूर्वोक्त अर्थ को ही प्रकट करता है ' - इसलिये ऋग्वेद के द्वारा पूर्व-निर्दिष्ट सभी पदार्थ समूह का यहाँ ग्रहण हो सकता है, फिर भी ' ब्रह्म ' के प्रधान होने के कारण तथा भाष्य के अध्या-त्मक होने मे ' परमेश्वर ' का ही ग्रहण यहाँ किया गया है, अथवा ' त्वा ' पद के प्रसिद्ध अर्थ के कारण उससे ' ब्रह्म ' का ही निर्देश माना गया है ' - ( पृ ० ८३ ) । किन्तु यह सम्पूर्ण कथन कुशकाशावलम्बनमात्र ही है । यद्यपि सर्वनाम पूर्वपरामर्शक होता है, तो भी पूर्व में यदि समीप और दूरभाव हो तो सर्वनाम शब्द उनमें से समीप का ही ग्रहण करता है, जो उचित भी है । अतः अन्य ग्रन्थ के पदार्थों का परामर्श ' सर्वनाम ' शब्द से

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[ ४० ] पदेन ब्रह्मणो निर्देश: ' ( पृ ० ८६ ) इति, तदपि कुशकाशावलम्बनमात्रम्, सर्वनाम्नां पूर्वपरामशित्वेऽपि सन्निहितासन्नि -हितयोः सन्निहितपरामशित्वस्यौचित्याद्ग्रन्थान्तरीयवस्तु परामर्शासम्भवात् । ऋग्वेदेन पूर्व निर्दिष्टः सर्वोऽपि पदार्थसमूहस्तु नतरां ग्रहीतुं शक्यते, सम्बोध्यत्वविशिष्टचेतनस्यैव युष्मदर्थतयाऽचेतनपदार्थसमूहस्य त्वेतिपदेन ग्रहीतुमशक्यत्वात् । ब्रह्मणोऽर्थं विधया प्राधान्येऽपि न ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( तै ० उ ० २ ।१ ) इत्यत्र शब्दविधया प्राधान्यं ' विद् ' इत्यस्य ५ विशेषणत्वेनाप्राधान्यात् । प्रसिद्धपरामशित्वमपि सन्निहितासन्निहितयोः सन्निहितस्यैव युक्तम् । प्रकृते तु शाखाछेदने विनियुक्तस्य मन्त्रस्य शाखां प्रति गुणत्वात् शाखेव प्रधानभूता । अन्यथा यत्र क्वापि ' भूताय त्वा नारातये स्वरभिविख्ये-षम् ' ( वा ० सं ० १।३१ ) इत्यादावपि त्वेति प्रसिद्धत्वात् परमेश्वर एव कुतो न गृह्यते? त्वया तु तत्र हेमनुष्य अहं त्वां सर्वेषां भूतानां सुखदानाय पृथिव्यां रक्षयामीत्यत्र त्वापदेन मनुष्य एव गृहीतः । वस्तुतस्तु सर्वनामत्वेऽपि युष्मच्छन्दस्य न प्रकृतपरामशित्वं न वा प्रधानपरामशित्वं किन्तु सम्बोध्यत्वविशिष्टचेतनबोधकत्वमेव । लक्षणयाऽचेतनोऽपि त्वमिति १७ सम्बोधयितुं शक्यत इति सर्वत्र त्वमिति प्रयोगसम्भवेन सर्वनामत्वोक्तिः समञ्जसा । ७४ - [ यत्तु पुरुषव्यत्ययसमर्थनाय व्यत्ययो बहुलम् ' ( पा ० सृ ० ३ १ ८५ ) इत्यादि सूत्रमुद्धृतम् तत्र नास्ति विप्रतिपत्तिः । प्रकृते व्यत्ययोऽपेक्षितो न वा इत्येव तु विवेचनीयम् । व्यत्यमन्तरापि ब्राह्मण - सूत्र- पारम्पर्यैरर्थोपपत्ती सत्यां स्वाभ्युहितार्थसाधनाय लिङ्गवचनपुरुषव्यत्ययः सर्वथाऽसङ्गत एव । सर्वत्रैव यथाश्रुतार्थानुपपत्तौ सत्यामेव व्यत्ययो भवति । ' श्रीहि पशव: ' ( श ० ११८ | १ | ३६ ) ' प्रजावैपशवः ' ( श ०१ | ६ | १ | १७ ) इतीमानि वचनानि तु भूमिकायां व्या-१५ ख्यातानि । ब्रह्मदत्तेन दुर्गाचार्य स्कन्दस्वाम्यादीनां वचनानि स्वपक्षपोषणाय तत्र तत्रोप्रियन्ते परं सिद्धान्तस्तु तद्विरुद्ध एवानुगम्यते । दुर्गाचार्यादयस्तु ब्राह्मण - सूत्र- पारम्पर्यं समनुगतमेवार्थं समर्थयन्ते । सत्यामनुपपत्तावेव वचनादिव्यत्ययमङ्गी-कुर्वन्ति । मानना असम्भव है । ऋग्वेद के द्वारा पूर्व निर्दिष्ट समस्त पदार्थ समूह का परामर्श तो कथमपि नहीं हो सकता । ' " त्वा ” शब्द ' युष्मद् ' शब्द है, उसका व्यवहार उसी के लिये हो सकता है, जो सम्बोधित हो सके और ' चेतन ' हो तब अचेतन पदार्थ समूह का परामर्श ' त्वा ' पद से होना संभव नहीं है । अर्थदृष्टि से ' ब्रह्म ' के प्रधान होने पर भी " ब्रह्मविदाप्नोति परम् " यहाँ शब्द मर्यादा से ' ब्रह्म ', विद् का विशेषण होने के कारण अप्रधान है | सर्वनाम के प्रसिद्धपरामशित्व का नियम भी यदि समीपस्थ और दूरस्थ दोनों हों तो समीप में ही सङ्गत होता है । प्रकृत में तो शाखा छेदन के लिये fafa क्त हुए मन्त्र की ' शाखा ' के प्रति गोणता है और शाखा की ही प्रधानता है । अन्यथा ' त्वा ' शब्द का ' भूताय त्वा ' आदि मन्त्रों में जहाँ प्रयोग मिलता है वहाँ ' त्वा ' के प्रसिद्ध परामर्शक होने से ' परमेश्वर ' का ही ग्रहण क्यों नहीं होता? स्वामी दयानन्दजी ने तो " हे मनुष्य! मैं तुम्हें समस्त भूतों को सुख पहुँचाने के लिये पृथिवी पर रखता हूँ " -इस प्रकार वहाँ “ त्वा " का अर्थ ' मनुष्य ' किया है । यथार्थता तो यह है कि ' युष्मद् ' शब्द के सर्वनाम होने पर भी न तो वह प्रकृत का परामर्शक है और न प्रधान का परामर्श करता है, अपितु वह उस चेतन का बोधक होता है, जिसमें सम्बोधित होने की योग्यता हो । लक्षणा के द्वारा अचेतन भी ' त्वम् ' शब्द से सम्बोधित हो सकता है । अतः ' त्वम् ' का प्रयोग होना सर्वत्र संभव होता है, इसलिये उसे ' सर्वनाम ' कहा गया है । ७४ - प्रथम, मध्यम, उत्तम पुरुषों में व्यत्यय का बोधन करने के लिये जो ' व्यत्ययो बहुलम् ' सूत्र उद्धृत किया है, उसमें आपत्ति नहीं है । सोचना तो यह है कि प्रकृत स्थल में ' व्यत्यय ' अपेक्षित है या नहीं । बिना व्यत्यय के भी ब्राह्मण - सूत्र परम्पराओं से अर्थ की युक्तिसङ्गतता प्राप्त हो जाने पर भी अपने कल्पित अर्थ को सिद्धि के लिये लिंग, वचन, पुरुष का व्यत्यय सर्वथा असङ्गत ही है । व्यत्यय तो तभी होता है, जब यथाश्रुत अर्थ ठीक नहीं बैठता । ' श्रीहिं पशव: ', ' प्रजा वै पशव: ' - अर्थात् ' श्री ' पशु है, ' प्रजा ' पशु है - इन वचनों की व्याख्या वेदभाष्यभूमिका में करदी गई है । श्रीब्रह्मदत्तजी ने ' दुर्गाचार्य, स्कन्दस्वामी ' आदि भाष्यकारों के वचनों को तत्तत् स्थलों पर अपने पक्ष के पोष गार्थ उद्धृत करके भीअपना सिद्धान्त उनके विपरीत ही स्थापित किया है,, - - इस प्रकार धूलिप्रक्षेप करके अपने पक्ष का प्रतिपादन श्रीब्रह्मदत्तजी ने किया है । दुर्गाचार्य - स्कन्दस्वामी आदि भाष्यकार तो ब्राह्मण, सूत्र तथा परम्परा से

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[ ४१ ] ७५– [ यदुक्तम् -- “ सर्वदर्शनेषु सर्वे मन्त्रा योजनीयाः कुतः ' अर्थं वाचः पुष्पफलमाह ' ( नि ० १।२० ) यज्ञा-दीनां पुष्पफलत्वेन प्रतिज्ञानात् । सर्वदर्शनेषु सर्वे मन्त्रा योजनीया इत्यनेन वेदस्य समस्तमन्त्राणां सर्वेष्वपि पक्षषु आध्यात्मिकनैरुक्त याज्ञिकादिपरा अर्था भवन्ति किमुर्तकस्याध्यायस्य मण्डलस्य सूक्तस्य वेति सर्वथा विस्पष्ट " मित्यादि, तत्सर्वमविचारितरमणीयम्, ' अर्थ वाचः पुष्पफलम् ' ( नि ० १।३० ) इति निरुक्तवाक्यस्यार्थानवबोधात् । नह्यत्र सर्वेषां मन्त्राणां त्रिविधा अर्था भवन्तीति प्रतिपादितम्, किन्तु दुर्गाचार्य रीत्यायमभिप्रायः सर्वोपि मन्त्रब्राह्मणराशिरेव त्रिधा - ५ विभक्तः । यदाभ्युदयलक्षणो धर्मोऽभिप्रेयते तदा याज्ञ पुष्पंफलं दैवतम् । पूर्वं हि पुष्पं भवति फलार्थं याज्ञमपि पूर्वं तन्यते देवतार्थं चेत्येतस्मात् सामान्यात् याज्ञ पुष्पं दैवतं फलं भवति । यदा तु निःश्रेयस लक्षणो धर्मोऽभिप्रेयते याज्ञदैवतयोः पुष्पत्वमेव भवति देवतार्थत्वात् याज्ञस्य देवतेऽन्तर्भावात् । अध्यात्मार्थत्वादधिदैवतस्याध्यात्मे पुरुषार्थस्य निष्ठानाद नतं पुष्प मध्यात्मं फलमित्येव युक्तम् । ७६ - [ अनेकेषां मन्त्राणां निरुक्तकारैरेवाध्यात्मिकपक्षमाश्रित्य केषाश्विद्याज्ञिकपक्षमाश्रित्य केषाञ्चिञ्चति-हासिक पक्षमाश्रित्य व्याख्यानं कृतम् । यथा - ' वृत्रो मेघ इति नैरुक्ताः त्वाष्ट्रोऽसुर इत्यैतिहासिकाः इन्द्रस्य न कोऽपि शत्रुः, मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु मेघ एवाहिरित्यभिधीयते ' इति च ( नि ० २।१६ ) । पूर्वोत्तरमीमांसा दृष्ट्या तु धर्मब्रह्मपर एव वेदार्थो युक्तः । तत्र धर्मोऽभ्युदयार्थी निष्कामस्य बुद्धिशुद्धिद्वारा ब्रह्मात्मसाक्षात्कार एव पर्यवस्यति । अनुगत अर्थ का ही समर्थन करते हैं । ब्राह्मण, सूत्र, याज्ञिक परम्परा के विरुद्ध अर्थ का समर्थन वे कथमपि नहीं करते हैं । ७५ - यह जो कहा गया है कि " सभी दर्शनों में सभी मन्त्रों को लगाना चाहिये क्योंकि " अर्थं वाचः पुष्प-फलमाह " - अर्थ ' को ' वाणी ' का पुष्प फल कहा है - । ' यज्ञ ' आदि पुष्प फल के रूप में प्रतिज्ञात हैं । सर्व दर्शनों में सभी मन्त्रों को लगाना चाहिये - ' सर्वदर्शनेषु सर्वेमन्त्रा योजनीयाः - ऐसा कहा होने से वेद के समस्त मन्त्रों के सभी पक्षों में आध्यात्मिक, नैरुक्त, याज्ञिक आदि प्रक्रियापरक अर्थ हो सकते हैं, तब किसी अध्याय, मण्डल अथवा सूक्त की क्या है? यह सर्वथा विस्पष्ट हो जाता है । " किन्तु यह सब अविचारितरमणीय ही है । क्योंकि निरुक्त के कथन - ' शब्द का जो अर्थ है, वह वाणी का पुष्प फल है'- - का ज्ञान ठीक ठीक न हो पाने से स्वामी दयानन्दजी वैसा कह गये हैं । निरुक्तकार ने यह नहीं कहा है कि सभी मन्त्रों के तीन प्रकार के अर्थ होते हैं किन्तु दुर्गाचार्य की रीति से उसका अभिप्राय यह है कि समस्त मन्त्र - ब्राह्मणराशि के तीन विभाग हैं । जब अभ्युदयरूप धर्म अभिप्रेत हो तब ' यज्ञ ' पुष्प और फल ' देवता ' विवक्षित हैं । क्योंकि पहिले ' पुष्प होता है, यज्ञ भी फल के लिये और देवता के लिये पहिले किया जाता है | इसी सादृश्य को देखकर ' यज्ञ ' पुष्पं दैवतं फलं भवति ' कहा गया है । जब निःश्रेयस रूप धर्म अभिप्रेत हो, तब यज्ञ विषयक और देवता विषयक पदार्थ पुष्पस्थानीय ही समझने चाहिये । क्योंकि यज्ञीय पदार्थ देवता के निमित्त होने से देवता सम्बन्ध में ही उनका अन्तर्भाव होता है । अधिदैवत पदार्थ, अध्यात्म के लिये होने से अध्यात्म में ही पुरुषार्थ की अधिष्ठानता होती है । अतः ' दैवत ' को पुष्पस्थानीय और ' अध्यात्म ' को फलस्थानीय कहना ही उचित है । ७६ – स्वयं निरुक्तकार ने ही अनेक मन्त्रों का ध्याख्यान आध्यात्मिकपक्ष का आश्रय लेकर कुछ मन्त्रों का व्याख्यान ऐतिहासिक पक्ष का आश्रय लेकर किया है । जैसे - ' वृत्रो मेघ: ' - वृत्र मेघ है, यह निरुक्त के अनुयायी कहते हैं, और ' त्वाष्ट्रोऽसुर: ' - त्वाष्ट्र ( वृत्र ) असुर है, ऐसा ऐतिहासिक कहते हैं । ' इन्द्र ' का शत्रु कोई नहीं है । मन्त्रों में और ब्राह्मणों में ' मेघ ' को अहि कहा गया है ( निरु ० ) । पूर्व और उत्तरमीमांसा की दृष्टि से तो ' वेद ' का अर्थ, धर्म-परक और ब्रह्मपरक ही करना ही उपयुक्त है । क्योंकि अभ्युदय करनेवाला धर्म, निष्काम पुरुष की बुद्धि को शुद्ध बनाता हुआ ब्रह्मसाक्षात्कार में ही परिपूर्ण होता है ।

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[ ४२ ] ७७ - [ ' य ईं चकार न सोऽस्य वेद " य ई ददर्श हिरुगिन्नु तस्मात् । स मातुर्योनापरिवीतो अन्तर्बहुप्रज्ञा निर्ऋतिमाविवेश ॥ ' ( ऋ ० सं ० १।१६४ | ३२ ) । अत्र बहुप्रज्ञा: कृछ्रमापद्यते इति परिव्राजकाः । वर्षकर्मेति नैरुक्ताः ’ ( नि ० २८ ) इति निरुक्त स्पष्टमुक्तम् । कश्चिद् बह्वपत्यो दरिद्रः सुदुष्पोषत्वादपत्यानां व्यापन्नत्वात् दु: ख कुछमाप-द्यते । सा या तस्य कृछ्रापत्तिः सैवास्यामृचि निर्ऋति शब्देनोच्यते इति परिब्राजकाः । स एव प्रदर्श्यते यः करोति गर्भं न सोऽस्य गर्भस्य तत्त्वं वेद केवलं त्वसौ कामार्तः पुत्रार्थी करोत्येव गर्भ य ई ददर्श पश्यति चैनं हिरुक् अन्तर्हितमेत-स्मिन् जठरे शरीरे वा जन्तु तस्मात्तस्यैष एव गर्भो याथात्म्यतः प्रत्यक्षो भवत्यध्यात्मशास्त्रदृष्ट्या नेतरस्य गर्भकतु -र्गर्भः पुनरेव गर्भो मातुर्योनौ गर्भाशयस्थाने अन्तरुदरे पुष्यति । स मातुरशितपीतलीढभक्षितेन चतुविधेनाहारेण ततः परिवीतो जरायुगा परिवेष्टितो यथा कालं जायते । ७८- ८ - अथैवं बहुशः प्रजायमानः स गर्भकर्ता गर्भतत्त्वमजानानो निर्ऋति दुःखमाविवेश आविशति । एवं गर्भ-तत्त्वाज्ञानात् यो गर्भं करोति स दुःखमापद्यते । यस्त्वध्यात्मदृष्टया गर्भतत्त्वं वेद स गर्भकर्मणो निवर्तते स निर्ऋतिं नापद्यते इत्येष परिव्राजकार्थः । ७६ - अन्येषां रीत्या तु यः करोति गर्भं स गर्भभूतो जन्मान्तरेषु बहुषु प्रजायमानो जन्ममरणसन्तानानुवद्धां निर्ऋतिमाविशति यो रेतः सिञ्चति तद् भूयोभूयो जन्मान्तरेण बहुशः प्रजायमानो जन्ममरणसन्तानानुबद्धो भवति । ८० - नैरुक्तानां दृष्ट्या वर्ष कर्मैतदुच्यते । निर्ऋतिश्चात्र भूमिरुच्यते । यः करोति वर्षं स मेघः वर्ष कर्ता विक्षप्ता वा । न सोऽस्य वर्षस्य तत्त्वं वेद कुतोऽप्येतदुदकं मय्यागच्छति यन्मया विसृज्यते कि वोदकस्य तत्त्वं केवलं ७७– “ य ई चकार ” इस मन्त्र का तात्पर्य, परिब्राजकों के मतानुसार यह है कि बहुत प्रजा वाला कष्ट को प्राप्त करता है । ' वर्ष कर्मेतिनैरुक्ताः ' - वर्ष, कर्म है - यह निरुक्तानुयायिकों का स्पष्ट कहना है । अनेक सन्तानों वाला कोई दरिद्र पुरुष, बड़े कष्ट से सन्तान का पोषण करने के कारण उन अपत्यों के विपद्ग्रस्त होने पर दुःख तथा कष्ट का अनुभव करता है । इस प्रकार उस दरिद्र पुरुष के द्वारा अनुभूयमान जो शोक है, उसी को इस ऋचा में ' निर्ऋति ’ शब्द से बताया गया है - ऐसा परिव्राजकों का मत है । उक्त मन्त्र का अर्थ, परिव्राजक लोग इस प्रकार करते हैं - ' जो गर्भाधान करने वाला है, वह इस गर्भ के तत्त्व को नहीं जानता है, वह तो केवल कामार्त या पुत्रार्थी होता हुआ गर्भ का आधान मात्र कर देता है । किन्तु जठर में संस्थित गर्भ को जो देखता और जानता है, उसी को गर्भ के यथार्थ -स्वरूप का अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से प्रत्यक्ष होता है । माता के उदरान्तर्गत गर्भाशय में वह गर्भ पुष्ट होता है । माता के द्वारा किये जानेवाले भोजन, लेहन, पान, भक्षण आदि चतुविध आहारों से तथा उसी गर्भाशय में समुत्पन्न जरायु से आच्छादित होता हुआ कालक्रम से यथासमय उत्पन्न होता है । ७८ - इस प्रकार बहुश: ( अनेक बार ) उत्पन्न करनेवाला वह गर्भकर्ता ' गर्भ ' के स्वरूप को न समझपाने से शोक दुःख ( निति ) को पाता रहता है । अभिप्रायः यह है कि ' गर्भतत्त्व ' के अज्ञान से जो ' गर्भ कर्म ' में प्रवृत्त होता है, वह दुःखभागी बनता है, परन्तु जो अध्यात्मदृष्टि से ' गर्भतत्त्व ' को जान लेता है, वह ' गर्भ कर्म ' से निवृत्त होकर दुःखशोकादि निति - को प्राप्त नहीं करता है - यह अर्थ, परिव्राजकों के मत से किया जाता है । ७६ - अन्य व्याख्याकार उक्त मन्त्र का अर्थ इस प्रकार करते हैं- " जो गर्भं का आधान करनेवाला है, वह स्वयं ही गर्भरूप होकर अन्यान्य जन्मों में अनेक माता - पिताओं से उत्पन्न होता हुआ जन्म - मरण के प्रवाह में पड़कर उससे अनुबद्ध शोक ( निति ) में प्रविष्ट होता है । जो शुक्र का सेचन करता है, वह अपने इस कर्म से पुन: पुन: अनेक जन्मों को प्राप्त करता हुआ - जन्म - मरण के क्रम से बँध जाता है । ८० - नैरुक्तों की दृष्टि से उक्त मन्त्र ' वर्ष कर्मैतदुच्यते ' के अनुसार ' वर्षा कर्म ' का बोधक है । इस अर्थ में ' नि'ति ' का अर्थ ' – ' भूमि ' है । वर्षा को उत्पन्न करनेवाला ' मेघ ' वर्षण का कर्ता या विक्षेप्ता है । वह इस वर्षण के

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[ ४३ ] cant विसृजत एवोदकम् । य ई ददर्श एतद्वर्षं हिरुगिन्नु तस्मादन्तर्हितमन्तरिक्षलोके तस्यैव प्रत्यक्ष नेतरस्य मेघस्य मध्यस्थानस्य स एवास्य वर्षस्य तत्त्वं वेद यो ददर्श पश्यति आदित्य रश्म्यन्तर्गतमव्यक्त वर्ष कौऽसौ इन्द्र: असावपि मध्यमः, तत इदमुक्तम् न सोऽम्य वेद मध्यम: ( मेघ: ) स एवास्य वेद मध्यम: ( इन्द्रः ) स एव महानुदक संस्त्यायः इन्द्रप्रत्यक्ष मातुरन्तरिक्ष लोकस्योदकाभिव्यक्तिस्थाने परिवीतः परिवेष्टितः सौर्येण रश्मिजालेन वायुना च मेघोदरान्त-र्गतः प्रावृट्काले वर्षरूपेणाभिव्यक्तो बहुप्रजाः बहुशो जायमानः निर्ऋति भूमिमाविवेश । तदेवं मन्त्रेषु शब्दगतिविभु- ५ त्वात् निर्ऋतिशब्दे कृछ्रापत्तिः, भूमिश्चोभयमप्युपपद्यते । ८१ – तद्यथा दधिक्राव्णो अकारिषम् ' ( ऋ ० सं ० १२ | ४ | ३ | ६ ) इत्येष मन्त्रोऽग्न्युपस्थानेऽग्निहोत्रे नैत्रायणी-संहितायाम् ( १।५।६ ) इत्यत्र, अयमेव चाग्निष्टोमे ' दधिक्राव्णोऽकारिषमित्यग्रोध भक्षयन्ति ' ( आश्वला ० श्रौ ० सू०-१२।१२ ) इत्यत्र दधिभक्षणे, तथा चाश्वमेधे दधिक्राव्णोऽकारिषमित्युत्थितायां सर्वा जयन्ति इत्यश्वसन्निधावेतं पत्न्यो 10 जयन्ति महिष्यामुत्थितायाम् । तत्रैवं सति प्रतिविनियोगमस्य मन्त्रस्यान्येनान्येनार्थेन भवितव्यम् । ८२ - एते वक्तुरभिप्रायवशादर्थान्यथात्वमपि भजन्ते मन्त्राः । नह्य तेष्वर्थेषु इयत्तावधारणमस्ति, महार्था ह्येते दुष्परिज्ञानाश्च । यथाश्वारोह वैशेष्यात् अश्वः साधु साधुतरञ्च बति - एवमेवेमे वक्तृवैशेष्यात् साधून् साधुसरां-श्चार्थान् स्रवन्ति । तत्रैवं सति लक्षणोद्द शमात्रमेवैतस्मिन् शास्त्रे निर्वचनमेकैकस्य क्रियते । क्वचिच्चाध्यात्माधिदेवाधि- । यज्ञोपदर्शनार्थम् । तस्मादेतेषु यावन्तोऽर्था उपपद्येरन् अधिदेवाध्यात्माधियज्ञाश्रयाः सर्व एव ते योज्याः । नात्रापराधोस्ति तत्त्व को नहीं जानता कि जिस जल का में वर्षण कर रहा हूँ, वह मेरे भीतर कहाँ से आता है? अथवा ' जल ' का १५ स्वरूप क्या है? उसे ' मेघ ' नहीं जानता, वह तो केवल जल की वर्षा करना जानता है । जो इन्द्र इस वर्षण का प्रत्यक्ष-' कर्ता ( देखने वाला ) है, वह इन्द्र ही इसे जानता है । जो अन्तरिक्ष के ही विशाल प्रदेश विशेषरूप योनि में अव्यक्त-रूप से स्थित है, वही इम तत्त्व को जानता है । उसके अतिरिक्त मध्यस्थान में स्थित रहनेवाले मेघ आदि इस तत्त्व से नहीं जानते । वही इस वर्षा के तत्त्व को जानता है, जिसने उसे देखा है कि सूर्य की रश्मियों में निहित अव्यक्तरूप २० स्थित ' वर्षा ' है । यह जानने वाला ' इन्द्र ' कौन है? उत्तर दिया कि ' असावपि मध्यमः ' वह भी मध्यम, है स, एवास्य अर्थात् ' वही वेद मध्यम इन्द्र इसकी यथार्थता को जानता है । इसीलिये यह कहा गया है कि ' सोऽस्य वेद मध्यमः मध्यमः ' अर्थात् वह मध्यम यानी मध्य - स्थानीय ' मेघ ' इस वर्षण के तत्त्व को नहीं जानता किन्तु वही के मध्यम अभिव्यक्ति ' इन्द्र ' इसके याथार्थ्य को जानता है जल के उसी महान् राशि को इन्द्र ने देखा है । वही जल, अन्तरिक्ष लोक वर्षा के रूप में स्थान में एकत्र होकर सूर्य की रश्मियों तथा वायु के द्वारा ' मेघ ' के उदर में प्रविष्ट होकर वर्षाकाल में की विभुता के २५ अभिव्यक्त होता हुआ अनेक प्रकार से उत्पन्न होकर भूमिपर आता है । इस प्रकार मन्त्रों में शब्दगति कारण ' निर्ऋति ' शब्द के ' कृच्छ्र ' ( शोक ) की आपत्ति और ' भूमि ' दोनों अथं उपपन्न होते हैं । ८१ - " दधिक्राव्णो अकारिषम् " इत्यादि मन्त्र का विनियोग मंत्रायणी संहिता में अग्निहोत्र के अग्नि के उप-स्थान के लिये कहा गया है | और अग्निष्टोम में इसी मन्त्र का विनियोग दधिभक्षण के लिये बताया गया है प्रत्येक । तथा अश्वमेध याग में महिषी के उठ जानेपर सबकी अन्य पत्नियों को भी विजय की प्राप्ति होती है । इस प्रकार विनियोग में इस एक ही मन्त्र का भिन्न - भिन्न ही अर्थ होगा । ८२ - अतः कहना होगा कि वक्ता के अभिप्रायानुसार ही अन्यान्य अर्थों का प्रकाशन भी ' मन्त्र ' किया करते हैं । इन अर्थों की सीमा का निर्धारण नहीं किया जा सकता । इन महार्थं मन्त्रों के अन्यान्य अर्थ भी होते हैं । इनका परिज्ञान भी कठिन है । जैसे ' अश्वारोही ' की विशेषता से अश्व अच्छी तरह से वहन करता है, उसी प्रकार ये मन्त्र भी वक्ता की विशिष्टता से शोभन - शोभनतर अर्थों को प्रकट करते हैं । ऐसी स्थिति में लक्षणा का उद्देश्य इतना ही है कि इस मन्त्र में एक- एक का निर्वचन किया जा रहा है । कहीं इस निर्वचन का उद्देश्य, अध्यात्म, अधिदैव, अधियज्ञ का निर्देश करना है । अत: इनमें जितने अर्थों का प्रकाशन आध्यात्मिक आध्यात्मिक आधिदैविक और अधियज्ञ प्रक्रिया का

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[ ४४ ] केन विदुषा जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् इति श्रीमद्भागवतीयाद्यपद्यस्याष्टोत्तरशतसंख्याकानि व्याख्यानानि कृतानि । ८३ - यदा स्थितिरेतादृशी पौरुषेयेषु वाक्येषु तदा परमेश्वरीयनित्यविज्ञानमयानि वैदिकमन्त्रब्राह्मण-वाक्यानि बह्वर्थानि भवेयुरित्यत्र नास्ति मनागपि विप्रतिपत्तिः । तथापि प्रामाणिकानि तानि व्याख्यानानि तात्पर्यातु-५ गुणानि उपपत्तिमन्ति भवेयुस्तदैव ग्राह्याणि नान्यथा । तत्रार्थविनियोगवशादर्थ भेदो युक्तः । विनिनोगवशादुपक्रमादि-लिङ्गवशाच्च यत्र मुख्यं तात्पर्यं निश्चीयते तदविरोधेनवेतराणि व्याख्यानानि ग्राह्याणि । इतरथा ग्रहणे परस्परविरुद्धा-र्थवादित्वेनाप्रामाण्यमेव स्याद्वेदानाम् । ८४- दयानन्दीयव्याख्यानानि पुरुषवचनलिङ्गव्यत्ययबहुलानि नैवं रीत्या शक्यसमर्थनानि । एवमेव छान्दसंव्यत्ययेन स्वरसिद्धिरपि यथाश्रुतार्थानुपपत्तावेवाङ्गीकार्या । १० ८५ – अत एव ' अघ्न्या ' इति निघात ( सर्वानुदात्त ) स्वरः सम्बोधने आमन्त्रितस्य च ' ( पा ० सू ० ८1१1१ ) इति सूत्रेणैव सिद्ध्यति । एवं यथाश्रुतार्थोपपत्तौ सत्यां द्वितीयाबहुवचनान्तमभ्युपगम्य ' व्यत्ययो बहुलम् ' ( पा ० सू ० ३।-१/८५ ) इत्यादिभि: सर्वानुदात्तत्वोपपादनमयुक्तमेव । ८६- यत्तु -- " नि ० ५।२३ इत्यत्र कथमुदात्तप्रकृति नाम स्यात् । दृष्टव्यत्ययं तु भवति समस्य समस्मिन् इति विभक्त्यन्तत्वश्रवणात् समपदस्य नामत्वमङ्गीकृत्यैव फिट्सूत्रकारोऽपि त्वत्त्वसमसिमेत्यनुच्चानि ' ( फिट् सू ०७८ ) आश्रय लेकर होता है, वे सभी उपयुक्त और ग्राह्य हैं । उन्हें उपयुक्त समझकर ग्रहण करना कोई अपराध नहीं है । एक विद्वान् ने श्रीमद्भागवत के " जन्माद्यस्य यतः " इस प्रथम श्लोक के एक सौ आठ व्याख्यान किये हैं । ८३ - जब पौरुषेय वाक्यों की यह स्थिति है, तब परमेश्वर के नित्य विज्ञानमय वैदिक मन्त्र ब्राह्मणों के वाक्य अनेक अर्थवाले हों, इस विषय में कौन - सी विप्रतिपत्ति है? तथापि वे ही व्याख्याएँ ग्राह्य होती हैं, जो प्रमाण-सिद्ध तथा तात्पर्य के अनुरूप और तर्क से पुष्ट रहती हैं । अन्यथा ग्राह्य नहीं होतीं । उनमें आर्षविनियोग के कारण अर्थ में भेद रहना उचित है । विनियोग के कारण तथा उपक्रमादि लिङ्गों के कारण जहाँ मन्त्र के मुख्य तात्पर्य का निश्चय किया जाता है । उससे विरोध न रखते हुए व्याख्यान ही ग्राह्य होते हैं विनियोग तथा उपक्रमादि षड्लिङ्गादि निर्णीत किये गये मुख्य तात्पर्य के विरुद्ध व्याख्याओं का ग्रहण करनेपर अन्योन्य विरुद्ध अर्थों को प्रकट करने के कारण वेदों में अप्रामाण्य ही पैदा हो जायगा । ८४ - स्वामी दयानन्दजी के द्वारा की गई मन्त्रव्याख्या में पुरुष, वचन, लिङ्गों का अत्यधिक परिवर्तन किया गया है । इसलिये शास्त्रीय प्रामाणिक रीति के अनुसार उनकी व्याख्या को मानना या उसका समर्थन करना कभी भी संभव नहीं है । इसी प्रकार छान्दसव्यत्यय करने से निष्पन्न स्वर भी यथाश्रुत अर्थ की अनुपपत्ति में ही सहायक होता है । ८५ – अत एव ‘ अघ्न्या ” पद में " आमन्त्रितस्य च " सूत्र से ही सम्बोधन में सर्वानुदात्त स्वर ( निघातस्वर ) होता है । इससे यथाश्रुत अर्थ की उपपत्ति रहते, उक्त पद को द्वितीया विभक्ति के बहुवचन में मानकर " व्यत्ययो बहुलम् " सूत्र से उसको सर्वानुदात्त बताना सर्वथा अनुचित है । ८६ - यह जो कहना है कि " नाम शब्द उदात्त प्रकृति वाले कैसे हो सकते हैं? व्यत्यय तो वहाँ होता ही है । ' समस्य ' भी ' समस्मिन् ' का अर्थ देता ही है । उसके इस विभक्त्यन्तत्व के स्मरण से ' सम ' पद को ' नाम ' रूप से स्वी-कार करके ही फिट् सूत्रकार ने भी ' त्वत् त्व समसिमेत्यनुच्चानि ' इस सूत्र से उसके अनुदात्तस्वर का विधान किया

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[ ४५ ] इति सूत्रेणानुदात्तत्वं विहितवान् । ” ( पृ ० १३ ) इति, तदप्यकिञ्चित्करम् गत्यन्तराभावे स्वरादिव्यत्ययस्य सिद्धान्तेऽ-प्यङ्गीकारात् । अन्यथा सर्वत्र बाहुलकादेवेष्टस्वरादिसिद्धो तत्तत्नरादिविधायक सूत्रणां वैयर्थ्य मेव स्यात् । त्स्व ८७ – यत्तु " मरुतः ” (ऋ ० सं ० १।१६५७ ) इत्यत्र मरुत् इति पदे निघात स्वरो विद्यते, न च तत्रामन्त्रितत्वम्, आमन्त्रितत्वाभावाच्छान्दसमनुदात्तत्वमिति भट्टभास्करेणोक्त " ( पृ ० १३ ) मिति, तदपि न किञ्चित् तत्र सम्बो-सङ्गत्या प्रथमा बहुवचनान्ताभ्युपगमे व्यत्ययेनानुदात्तत्वोपपादनं तुच्छमेव । प्रकृते तु अघ्न्या इत्यस्य सम्बोधना- ५ भ्युपगमे नास्त्येव काचिदनुपपत्तिः । ८८ - [ यदप्युक्तम् - " प्रजावती - अनमीवा - अयक्ष्मा इति पदैरन्या इत्यस्य सामानाधिकरण्येऽध्याहारापत्तिः, त्रिष्वप्यनिष्टस्वरत्वं च स्यात्, त्रयाणामप्येषामामन्त्रितत्वम् सर्वानुदात्तत्वं च मन्तव्यम् । यदि नैतेषामामन्त्रितत्वम् तथा-त्वे अघ्न्या इत्यनेन कथमेकवाक्यता? कथञ्व सामानाधिकरण्यम्? इत्युभयतः पाशारज्जु रिति, छान्दसव्यत्ययपक्षाङ्गी-कारे तु न क्वापि दोष " ( पृ ० १४ ) इति । १० ८ - तदप्यज्ञानविजृम्भितम्, स्वमतानुसारेण अघ्न्या इत्यस्य सम्बोधनत्वेऽपि प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा इत्यादीनां द्वितीयान्तत्वाभ्युपगमे बाधाभावात्, सामानाधिकरण्यानुपपत्तिस्त्वनभ्युपगमादेव पराहता । वो युष्मान् स्तेनो है ” - यह कथन भी अकिञ्चित्कर ही है । जब कोई गति ही न हो तब स्वर आदि के व्यत्यय को सिद्धान्त पक्ष में भी स्वीकार किया ही जाता है । अन्यथा बाहुलक नियम से अभीष्ट स्वर आदि की सिद्धि होनेपर तो विशेष पदों के विशेष-१५ स्वरों का विधान करनेवाले सब सूत्र ही व्यर्थ हो जावेंगे । ८७- यह जो कहा गया है कि " मरुतः " इस मन्त्र में ' मरुत् ' पद में निघात स्वर है, किन्तु निघात स्वर के विधान में आवश्यक ' आमन्त्रितत्व ' अर्थ वहाँ नहीं है । आमन्त्रितत्व के अभाव में भट्टभास्कर ने वहाँ छान्दस अनुदा-तत्व ही माना है । " - ( पृ ० १३ ) | किन्तु उक्त कथन में भी कुछ सार नहीं है । क्योंकि वहां प्रथमाबहुवचनान्तु की सम्बोधन में अर्थ की ङ्गति न हो सकने के कारण व्यत्यय करके अनुदात्त स्वर का उपादन करना तो उचित ही है । किन्तु प्रकृतप्रसङ्ग में तो २० ' अघ्न्याः ' पद को सम्बोधन मानने में कोई भी किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं है । - यह भी जो कहा है कि मन्त्र में पठित ' प्रजावती: ' अनमीवा: ' अयक्ष्मा: इन पदों के साथ ' अघ्न्याः ' पद का सामानाधिकण्य मानने पर अध्याहार करना पड़ेगा, और तीनों में अनिष्ट स्वर भी मानना होगा । इसलिये इन तीनों में भी आमन्त्रितत्व और सर्वानुदात्तत्व ही स्वीकार करना चाहिये । यदि इनमें आमन्त्रितत्व नहीं मानेंगे तो ' अघ्न्या: ' पद के साथ इनकी एकवाक्यता और सामानाधिकरण्य कैसे हो सकेगा? ( पृ ० १४ ), इस प्रकार उभयतः पाशारज्जुः की स्थिति प्राप्त हो रही है । किन्तु छान्दस व्यत्यय पक्ष को मानने पर कहीं भी दोष की प्राप्ति नहीं होती है । " - स्वामी दयानन्दजी का उपर्युक्त कथन भी उनके अज्ञान का ही विलासमात्र है । क्योंकि स्वर के अनु-सार ' अघ्न्या ' पद को सम्बोधन मानने पर भी ' प्रजावती: ', अनमीवाः, अयक्ष्मा: ' इन पदों को द्वितीयाविभक्त्यन्त स्वी-कार करने में कोई बाधक भी नहीं है । सामानाधिकरण्य में जो अनुपपत्ति प्रदर्शित की थी, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ सामानाधिकरण्य कौन मान रहा है? ' वो युष्मान् स्तेनो बाधितुं मा ईशत ' - तुम्हें बाधा पहुंचाने में चोर समर्थ न हो - 1 ' कीदृशीः युष्मान् ' - तुम कैसी हो? - ' यह जिज्ञासा होने पर कहा जाता है कि ' प्रजावती: ' - तुम अपनी प्रजाओं ( सन्तानों ) से युक्त हो - इस प्रकार से सापेक्ष पदों का परस्पर अन्वय सुसङ्गत होता है । ' अल्पज्ञ लोगों के द्वारा किये जानेवाले प्रहार के भय से ' वेद ' डरता रहता है ' - यह उक्ति तो ' आर्य समाजियों ' पर ही घटित हो रही

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[ ४६ ] बाधितु ं मा ईशत । कीदृशीयु ष्मानित्यपेक्षायां प्रजावतीरित्यादीनामन्वयाभ्युपगमात् । ' विभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रह-रिष्यती ' ति वचनं तु सामाजिकेष्वेव घटते । तैर्वेदोपबृ ' हकेतिहासपुराणादिप्रामाण्यानभ्युपगमात् । इदं वचनमपि पौरा-णिकमेव । सामाजिकैः स्वपक्षपोषणाय पौराणिकवचनोपस्थापनमपि तेषां कृते लज्जावहमेव । ६० — ' अथ कथमनुदात्तप्रकृति नाम स्यात् दृष्टव्यत्ययन्तु ' इत्यादिक ं तु भूमिकायामेव व्याख्यातं विस्तरेण । यत्तु - अयनम् अयः, गमनं, क्ष्मा पृथिवी, अयः क्ष्मायां यासां ता इत्युव्वटव्याख्याने दोषमुद्भावयतोक्तम् " बहुब्रीही प्रकृत्या पूर्वपदम् ' ( पा ० सू ६।२।१ ) इतीणोऽच्यन्तोदात्तत्वेन पूर्वपदप्रकृतिस्वरे मध्योदात्तत्वप्रसङ्ग " इति तत्त्वविचारितरम-णीयमेव, स्वयं बाहुलकात् स्वरसिद्धि व्युत्पादयता त्वया वक्तुमशक्यत्वात् उव्वटेनापि बाहुलकाश्रयणस्य संम्भवात् । ११ - यदपि च ' माङि लुङ् ( पा ० सू ० ३३।१७५ ) मा युष्माक चोर ईशनं कार्षीदिति यदुव्वटोक्त ेरविचा-रितरमणीयत्वमुक्तं तत्तुच्छम् छान्दसव्यत्यये च्लेरङ्कादेशे ईशतं इत्युक्त बधाभावात् । यदुक्तम् - ' लुङि प्राप्ते लङ छान्दस इतिभवितव्यमिति, तन्न, माड, योगे प्राप्तविधेर्वाधायोगात् । १२ – “ यन्महीधर आह्— ' अघ ' शंसति इच्छति ( शसि इच्छायाम् ) अच् ' तत्पुरुषे तुल्यार्थे ' ( पा ० सू ० ६ २-) त्यादिना पूर्वपद प्रकृतिस्वरत्व ' मिति, तदयुक्तम्, कुतः अघ शंसतीति व्युत्पत्त्योपपदसमासो निर्विवादः । तेन ' गति-कारकोपपदात् कृत् ' ( पा ० सू ० ६ २ १३ ९ ) इत्यनिवार्यतया प्राप्नोति । न च तत्पुरुषे तुल्यार्थ तृतीयासप्तम्युपमाना-है । क्योंकि उन्होंने ही वेद के उपबृंहक ( सुदृढ़ बनानेवाले ) इतिहास - पुराणादि ग्रन्थों को प्रमाण नहीं माना है । ' विभेत्यल्पश्रुतात् ' यह वचन भी पुराण का ही है । पुराणों की प्रामाणिकता को न माननेवाले आर्य समाजी विद्वान् अपने पक्ष के समर्थन में उन्हीं पौराणिक वचनों का उद्धरण देते हैं, कितनी लज्जा की बात है? ६० - ' अथ कथमनुदात्त प्रकृति नाम स्यात् दृष्टव्यत्ययन्तु ' इत्यादि सन्दर्भ का तो भूमिका में ही सविस्तार व्याख्यान किया जा चुका है । ' अयनम्, अयः ', गमनं, क्ष्मा पृथिवी, अय: क्ष्मायां यासां ताः -- इस उव्वट के व्याख्यान में दोष दिखलाने का प्रयत्न करते हुए जो स्वर- दोष प्रदर्शित किया है, वह तो अविचारितरमणीय ही है । क्योंकि आप स्वयं बाहुलक से ही स्वरसिद्धि को जब बता रहे हैं, तब उसी को दूसरे की व्याख्या में दोष के रूप में क्यों कह रहे हैं? उव्वाचार्य भी बाहुलक का आश्रय कर सकते हैं । 21 - और जो ' माङि लुङ ' मा युष्माकं चौर ईशनं कार्षीत् - -इस उव्वटोक्ति को आपने अविचारित रम-कह दिया है, वह कहना भी तुच्छ है, निःसार है । क्योंकि छान्दस व्यत्यय से ' चिल ' को ' अङ ' आदेश करनेपर ' ईशत ' पद के होने में कौन - सी बाधा है? यह जो कहा था ' लुङ प्राप्ते लङ छान्दस: ' - लुङ, की प्राति होनेपर ' लङ लकार छान्दस होगा, वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि ' माङ ' का योग रहनेपर जो विधि प्राप्त है, उसका बाध नहीं होता है । ६२ - स्वामी दयानन्दजी ने भाष्यकार महीधर पर आक्षेप किया है कि ' महीधर ने जो कहा है - अघ शंसति इच्छतीत्यघशंसः ' शसि इच्छायाम् ' अच् । ' तत्पुरुषे तुल्यार्थं ', इत्यादि सूत्र से पूर्वपद प्रकृति स्वर होता है ' । इस महीधर के कथन को स्वामी दयानन्द अयुक्त बता रहे हैं । अयुक्त बताने में कारण यह देते हैं कि ' अघशंस ' में पूर्वपद-प्रकृतिस्वर करनेवाले ' तत्पुरुषे तुल्यार्थ ', सूत्र की प्राप्ति ही संभव नहीं है । यथा कथञ्चित् प्राप्ति हो भी तो वह गति-कारकोप पद ' सूत्र की प्राप्ति का बाध कैसे कर सकेगी? क्योंकि ' अघ शंसति ' इस व्युत्पत्ति से उपपद समास की प्राप्ति में कोई बाध ही नहीं है, तब ' गतिकारकोपपदात् कृत् ' सूत्र की प्राप्ति का होना अनिवार्य है । " - स्वामी दयानन्द का भाष्यकार महीधर पर इस प्रकार आक्षेप करना अत्यन्त असङ्गत है, उस आक्षेप में कुछ सार ही नहीं है ।

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[ ४७ ] न व्ययद्वितीयाकृत्या: ' ( पा ० सू ० ६ २ २ ) इति सूत्रस्य कथमपि प्राप्तिसम्भवः कथञ्चित्प्राप्तावपि ' गतिकारकोपपदे ' ( पा ० सू ० ६।२।१३६ ) ति प्राप्तिः कथ ं बाधिष्यते " इति यदुक्तम् ' तत्तुच्छम्, अघेन तीव्रपापेन भक्षणादिना शंसोघातक इति व्युत्पत्तावेव तत्पुरुषे तुल्यार्थ इत्यादिना पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वोक्तः । अघ शंसतीति तु तदर्थप्रदर्शनपरम्, यथा त्वयापि ' अघस्य पापस्य स्तोता ' इति ( वा ० सं ० ३३।६६ ) इत्यत्र ' तत्त्वर्यप्रदर्शनपरमित्युक्तम् । प्रामादिक एव वा पाठः, पूर्वोक्त-व्युत्पत्तिविरोधात् । शासि स्तुतो ' इति धातुरपि नोपलभ्यते । II --६३ – यत्तु – ' अघ शंसतीति व्युत्पत्तौ ' समासस्य ' ( पा ० सू ० ६।१।२२३ ) इत्यन्तोदात्तत्वे प्राप्ते तद्वध ‘ गतिकारकोपपदात् कृत् ’ ( पा ० सू ० ६।२।१३६ ) इत्यनेनोत्तरपदप्रकृतिस्वरत्वं प्राप्यते, तस्मात् ' कुरु गर्हिपतरिक्तगुर्व-सूतज रत्यश्लील दृढरूपाप / रेबडवा तैतिलकद्रा पण्य कम्बलोदासीभाराणा ' ( पा ० सू ० ६।२।४२ ) इत्यनेन पूर्वपदप्रकृतिस्वर-त्वेऽन्तोदात्तत्वसिद्धिः । ' दासीभारादीनामिति वक्तव्यम् ' इहापि यथा स्यात् देवहूतिः, देवनीतिः, ओषधिः, चन्द्रमाः । तत्तर्हि वक्तव्यम् न वक्तव्यम् योगविभागः करिष्यते कुरु ' पुण्यकम्बली इति, ततो दासीभाराणाश्च ेति । तत्र १० बहुवचननिर्देशात् दासीभारादीनामिति विज्ञास्यते इति 1 पा ० सू ० ६ २ ४२ ) इति महाभाष्यवचनादिति तन्न, अघशंस-शब्दस्य दासीभारादिषु पाठे मानाभावात् । न चोपपदसमाससिद्धस्य ओषधिपदस्य निर्देशादेव सर्वेऽपि तथाविधाः शब्दा दासीभारादिषु मन्तव्या इति सङ्गतम्, तत्र बीजाभावात् । ६४ - " कैयटजयादित्यादयस्तु " यस्य तत्पुरुषस्य पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वमिष्यते न च विहितम्, स सर्वोऽपि दासी-भारादिष्वन्तर्भावमभिप्रयन्ति । प्रकृते तु अघेन शंस इति व्युत्पत्त्या ' तत्पुरुषे तुल्यार्थे ' ( पा ० सू ० ६ २ २ ) त्यादिना पूर्व - १५ पदप्रकृतिस्वरत्वेन अन्तोदात्तत्वं सिद्धमेवेति । अतएव भट्टभास्करेणापि अधे पापे भक्षणलक्षणे शंसा अभिलाषो यस्येति योगेन अघशंसः पापतत्परः इत्यत्र बहुव्रीहौ पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वमुक्तम् । अधेन तीव्रपापेन भक्षणादिना शंसो घातुको व्याघ्रादिरपि हिंसको माभूदिति काण्वभाष्ये सायणेनापि तथैवाभिप्रेतम् । भाष्यकार महीधर ने तो ' अधेन तीव्रपापेन भक्षणादिना शंसो घातकः ' - ऐसी व्युत्पत्ति करके ही ' तत्पुरुषे तुल्यार्थ ', सूत्र से ' पूर्वपदप्रकृतिस्वर ' का होना बताया है । ' अघ ' शंसति ' यह तो उसका अर्थ प्रदर्शनमात्र है । जैसे आपने १७ भी ' अघस्य पापस्य स्तोता ' - ( वा ० सं ० ३३।६६ ) को ' तत् तु अर्थप्रदर्शनहरम् ' - अर्थ प्रदर्शनपर ही तो बताया है । अथवा पूर्वोक्त व्युत्पत्ति के विरोध से उसे ' प्रामादिकपाठ ' तक कह दिया है । और ' स्तोता ' अर्थ करने के लिये स्तुत्यर्थक ' शास ' धातु भी कहीं नहीं है । फिर भी ' स्तोता ' अर्थ कर रहे हैं, कैसा आश्चर्य है! ६३ --महाभाष्यकार के वचन को प्रस्तुत करके जो अपनी बात बताई है कि ' अघं शंसति ' इस व्युत्पत्ति में ' समासस्य ' इस सूत्र से ' अन्तोदात्तत्व ' प्राप्त होनेपर, उसका बाध करके गतिकारकोपपदात्कृत् सूत्र से ' उत्तरपद- २५ प्रकृतिस्वर ' की प्राप्ति होती है । इसलिये ' कुरुगार्हपतरिक्तगुर्वसूत ', सूत्र से पूर्वपदप्रकृतिस्वर के होने पर ' अन्तोदात्त ' हो जाता है । अपनी बात के समर्थनार्थ ' दासीभारात् ', इत्यादि महाभाष्य के वचन का उद्धरण भी निष्फल है । क्योंकि ' दासीभारादि ' के अन्तर्गत ' अघशंस ' शब्द, पठित नहीं है । उपपदसमास के कारण ' ओषधि ' पद के निर्देश से ही उस प्रकार के सभी शब्दों को ' दासीभारादि ' में मान लेना चाहिये ' – किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकार कह देना निर्मूल रहने से अप्रमाण है । ३० ६४ - कैयट, जयादित्य के अनुसार तो जिस तत्पुरुष का पूर्वपदप्रकृतिस्वर इष्ट होता है, और उसे नहीं बताया है, ऐसी जगह उन सभी पदों को दासीभारादिगण में स्वीकार कर लिया जाता है । जहाँ प्रकारान्तर से पूर्व पदप्रकृतिस्वर की उपपत्ति नहीं होती है, उसी का दासी भारादिगण में अन्तर्भाव माना जाता है - यह कैयट, जयादित्य अभिप्राय है । प्रकृत में तो ' अघेन शंस: ' इस व्युत्पत्ति से ' तत्पुरुषे तुल्यार्थ ' सूत्र से पूर्वपदप्रकृतिस्वर के होने से ‘ अन्तोदात्तत्व ' तो सिद्ध ही है । इसीलिये भट्टभास्कर ने भी ' अघे शंसा यस्य ' इस व्युत्पत्ति से अघशंसः ' का अर्थ, पाप- ३ ५ तत्पर किया है, और इस बहुव्रीहि में पूर्वपदप्रकृतिस्वर को माना है । सायण ने भी काण्त्रभाष्य में ' अघ ' अर्थात् भक्ष-णादि तीव्रपाप से ' शंस ' अर्थात् घातक व्याघ्र आदि भी हिंसक न हों - यही कह | है |