वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 61–70

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 61–70

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[ ४८ ] ६५ - यदुक्तम् - ' सायणाचार्यास्तैत्तिरीयसंहिताभाष्ये ४६ पृष्ठे इन्द्रशब्दं वृषादित्वात् ( पा ० सू ० ६।१।२०३ ) इत्यनेनाद्यदात्तमाहुः । स तु तेषां स्ववचोविरोध एव । यतो हि ते स्वीये ऋक्संहिताभाष्ये प्रथममण्डले द्वितीयसूक्त ' षष्ठे मन्त्रे इन्द्रशब्दस्य व्युत्पत्तिपक्षे रन् प्रत्ययान्तेन ' नित्यादिनित्यम् ' ( पा ० सू ० ६ | १ | ११७ ) इत्याद्य ुदात्तत्वप्रतिपादना-दिति, तदपि तुच्छम् उभयथापि सिद्धो बाधकं विनाविरोधात् । अव्युत्पन्नप्रातिपदिक इन्द्रशब्द इतिपक्ष वृषादित्वेन सिद्धि व । न च ' ग्रामादीनाश्च ' ( फिट् सू ० ३८ ) इति सूत्रेणेष्टसिद्धी वृषादिगणे तत्पाठोऽनर्थक इति वाच्यम्, वृषादित्वादेवेष्टसिद्धौ ग्रामादित्वाश्रयणमनर्थकमेवेति विपरीतस्यैव सुवचत्वात् । ग्रामस्य समूहवाचकत्वेन इन्द्रशब्दस्य तत्रार्न्तभावापेक्षया वृषादिष्वेव तत्पाठस्य युक्तत्वात् । ६६ – यत्तूक्तम् —'कस्य भाष्यकारस्याभिप्रायः प्रामाणिक इत्याकांक्षायां व्याकरणाद्याश्रयेण ' बुद्धिपूर्वा वाक्य-कृतिर्वेदे ' ( वै ० सू ० ६।१।१ ) इति शास्त्रवचनानुसृत एव वाक्यार्थः प्रामाणिकोभवितुमर्हति नान्य ' इति, तदपि न किञ्चित् यतः सायणादीनां समेषामाचार्यांणां शास्त्राननुसाव्यिाख्यानमिति न ह्यमूढः कश्चिदपि वक्तु ं शक्नोति । किञ्च बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे इत्यस्य कोऽर्थः? किं यथा लोके बुद्धिपूर्वाणि वाक्यानि तथैव वेदेऽपि यानि वाक्यानि सन्ति तानि बुद्धिपूर्वकायेवेति मन्यते युष्माभिः? यदि वाढं तर्हि लौकिकानि वाक्यानीव तान्यपि कुतो नानित्यानि? ‘ न च तथेष्यन्ते सामाजिकैर्वेदानां नित्यत्वाभ्युपगमात् । न चेश्वर बुद्धिपूर्वकत्वात् तेषां नित्येत्वमिति वाच्यम् तथात्वे पृथिव्यादिप्रपञ्च-स्यापि ईश्वर बुद्धिपूर्वकत्वेन नित्यत्वापत्तेः । ६५ – यह जो कहा है कि ' सायणाचार्य ने तैत्तिरीय संहिता के भाष्य में ' इन्द्र ' शब्द को ' वृषादित्वात् ' सूत्र से आदात्त बताया है । किन्तु यह तो उनके अपने वचन से ही विरुद्ध प्रतीत हो रहा है, क्योंकि उन्होंने ही अपने ऋक् -संहिताभाष्य में प्रथम मण्डल के द्वितीय सूक्त के षष्ठ मन्त्रगत ' इन्द्र ' शब्द व्युत्पत्ति पक्ष में ' रन् ' प्रत्ययान्त होने से ' नित्यादिनित्यम् ' सूत्र में उसमें आद्य दात्तत्व का प्रतिपादन किया है । " किन्तु यह कथन भी तुच्छता से पूर्ण है । क्योंकि दोनों ही प्रकार से शब्द की सिद्धि होने में किसी बाधक के न रहने से कोई विरोध ही नहीं है । ' इन्द्र ' शब्द को अव्युत्पन्न प्रातिपादिक मानने के पक्ष में तो उसके वृषादिगण पटित रहने से उसकी सिद्धि करना उचित ही है । इसपर यदि आप यह कहें कि ' ग्रामादीनाञ्च ' इस फिट्सूत्र से ही इष्टसिद्धि हो जाने से वृषादिगण में उसका पाठ करना व्यर्थ है, तो यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि वृषादिगण में पठित होने से यदि इष्टसिद्धि होती है तो ' ग्रामादीनाश्व ' सूत्र का आश्रय करना व्यर्थ है - ऐसा विपरीत ही क्यों न कहा जाय? यह विपरीत कथन ही सुवच होगा क्योंकि ' ग्राम ' शब्द, समूह का वाचक होता है । उसमें ' इन्द्र ' शब्द का अन्तर्भाव करने की अपेक्षा वृषादिगण में ही उसका पाठ करना अधिक युक्ति युक्त होगा । ६६ - यह जो कहा है कि ' किस भाष्यकार का अभिप्राय प्रामाणिक है? ' ऐसी आकांक्षा होनेपर व्याकरण आदि का आश्रय करते हुए ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ' इस वैशेषिकशास्त्र वचन का अनुसरण करने वाला वाक्यार्थ ही प्रामाणिक कहलाने योग्य होता है, अन्य नहीं ' । किन्तु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति, जो मूर्ख नहीं हैं वह कभी नहीं कह सकता है कि ' साय-णादि समस्त आचार्यों का व्याख्यान, शास्त्रानुसारो नहीं है । दूसरी बात यह है कि ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिवेदे ' इस वाक्य SAT या अर्थ है? क्या लोक व्यवहार में जैसे बुद्धिपूर्वक वाक्य रचना होती है, वैसे ही वेद में भी जो वाक्य हैं, वे भी पूर्व ही होते हैं, यह आप मान रहे हैं? यदि यही मानते हैं तो लौकिक वाक्यों की तरह उन वैदिक वाक्यों को At aft क्यों नहीं कहते हैं? किन्तु वैदिक वाक्यों को समाजी विद्वान् अनित्य तो कह नहीं सकते, क्योंकि वेद को Safar कहते हैं । यदि यह कहा जाय कि ईश्वर की बुद्धि का अनुसरण करने के कारण वे ( वेद ) नित्य हैं, तो यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि पृथिवी, जल, तेज आदि सम्पूर्ण प्रपञ्च ही ईश्वर की बुद्धि का अनुसरण करता है, तब उसे भी नित्य कहना होगा ।

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[ ४६ ] ६७ - [ यच्च विज्ञानप्राप्तये पराक्रमाय च विज्ञानस्वरूपमनन्तपराक्रमानन्दरसघनं ज्ञानानां भाजनं परमेश्वरं त्वामाश्रयामः एवमाप्यायामहे । सर्व विद्याद्योतको देवः सर्वजगदुत्पादकः सकलैश्वर्यवान् जगदीश्वरः प्राणेन्द्रियान्तःकर-णानि श्रेष्ठतमाय कर्मणे । ईश्वरानुग्रहेण सर्वेषां सुखैश्वर्यस्य वृद्धिः स्यादित्यर्थे प्रार्पयतु । हे परमात्मन् परमैश्वर्यप्राप्तये अनमीवा अयक्ष्मा इन्द्रियाणि प्रार्पयतु । अस्माकं मध्ये कश्चिच्चौरः पापी मोत्पद्यताम् । गवां पतिरिन्द्रियाणां पतिस्तस्य-धार्मिकमनुष्यस्य समीपे इन्द्रियाणि बह्वीः घ्रवाः स्युः । यः परमेश्वर यजति तस्य विदुषो जीवस्य पशून् पाहि । किञ्च भावार्थे - येनेयं विशिष्टा सृष्टी रचिता तस्य धन्यवादा वाच्याः । एवं कुर्वतो भवतः परमदयालुरीश्वरः स्वकृपयैव सदा रक्षयिष्यतीति मन्तव्यम् ' इत्याध्यात्मिकोऽर्थ उच्यते सामाजिकैस्तदसङ्गतमेव । यद्यपि परमेशप्रार्थना यथाकथञ्चिदपि युक्तंव तथाप्यस्य मन्त्रस्य नायमर्थः सम्भवति मन्त्रपदाननुगुणत्वात् तद्रीत्यास्य मन्त्रस्य परमेश्वरो वक्ता स कथं ‘ त्वां परमेश्वरमाश्रयाम ' इति वदेत् । ६८ - ' आश्रयामः ' इति पदमपि मूले नास्त्येव । स्वेच्छयाऽध्याहारापेक्षया श्रुत्यनुसारेण ' इषे ' छिनमीति श्रुतिसम्मत एवाध्याहारः कुतो नाश्रयणीय: । ' त्वा ' इति पदस्य त्वामित्येवार्थ: विज्ञानस्वरूप मानन्दरसघनमित्यादिकन्तु तस्य परमात्मपरत्वे निश्चिते परमेश्वरविशेषणत्वेन कल्पनैव । आप्यायध्वमित्यस्य पुरुषव्यत्ययो निर्मूल एव । एवमेव देवशब्दोऽपि सवितृविशेषणत्वेन प्रयुक्तः । सविता च भगवान् सूर्य एव, तत्रैवास्य शब्दस्य प्रसिद्धेः व्यवहारस्तु शक्तिग्राह-केषु मूर्धन्यः । देवशब्दस्यापि परमेश्वरपरत्वनिश्चये सत्येव जगदीश्वरत्वादि विशेषणानि तत्र सङ्गच्छन्ते । ६७ - स्वामी दयानन्दजी के अनुयायी आर्यसमाजी विद्वान् प्रकृत मन्त्र का जो यह आध्यात्मिक अर्थ करते हैं कि विज्ञान की प्राप्ति के लिये, पराक्रम के लिये विज्ञानस्वरूप, अनन्त पराक्रम, आनन्दरसघन, ज्ञानों के भाजन, हे परमेश्वर! हम तुम्हारा आश्रय ग्रहण करते हैं, इसमे हमें तृप्ति मिलती है । समस्त विद्याओं के द्योतक देव, समस्त जगत के उत्पादक, सकल ऐश्वर्य मे सम्पन्न, जगदीश्वर! श्रेष्ठतम कर्म करने के लिये प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरण की प्रकृष्टरूप से प्राप्ति करा दे, और ईश्वर के अनुग्रह से सभी के सुख, ऐश्वर्य की वृद्धि हो, इसलिये भी प्राण आदि की प्राप्ति करा दे । हे परमात्मन्! परमैश्वर्य की प्राप्ति के लिये अनमीवा और अयक्ष्मा अर्थात् सभी प्रकार की नियन्त्रण व्याधियों से रहित इन्द्रियों को हमें दे । हमारे बीच में कोई भी चोर अथवा पापी उत्पन्न न हो । अपनी इन्द्रियों पर रखनेवाले धार्मिक परुष को इन्द्रियाँ सर्वदा कार्य क्षम रहें । परमेश्वर का अर्चन करनेवाले विद्वान् के पशुधन की रक्षा करो । किश्व भावार्थ बताते हुए कहा है कि जिसने इस विशिष्ट सृष्टि की रचना की है, उसे धन्यवाद देने चाहिये | अर्थ ऐसा, करने पर वह परम दयाल ईश्वर अपनी कृपा से ही सर्वदा आपकी रक्षा करेगा । - इस प्रकार जो आध्यात्मिक समाजी भाइयों ने बताया है, वह भी असङ्गत ही है । यद्यपि परमेश्वर की प्रार्थना, किसी प्रकार युक्त कही भी जाय नहीं, तथापि उसे प्रस्तुत मन्त्र का अर्थ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि मन्त्रगत शब्दों से वह स्तुति - प्रार्थनारूप अर्थ कैसे निकलता है । अन्यथा उस मन्त्र का वक्ता जो परमेश्वर है, वही स्वयं ' तुझ परमेश्वर का हम आश्रय करते हैं ' कहेगा? ८- क्योंकि ' आश्रयाम: ' यह शब्द भी मूलमन्त्र में नहीं है । अपनी स्वेच्छा से अध्याहार करने की अपेक्षा श्रुति के अनुसार ' इत्वा छिनत्ति ' इस श्रुतिसम्मत अध्याहार का ही आश्रय क्यों नहीं करते? मूलमन्त्र में आये हुए ' त्वा ' पद का अर्थ ' त्वाम् ' ही है । ' विज्ञानस्वरूप आनादरसघन इत्यादि की तो उसके परमात्मपरक होने के निश्चय की कल्पना करके उसे विशेषण के रूप में बताना केवल कल्पनामात्र ही है । " आप्यायध्वम् " पद में ' पुरुषव्यत्यय ' करना मूल ही है । इसी प्रकार ' देव ' शब्द को भी ' सविता ' के विशेषणरूप में प्रयुक्त किया है । ' सविता भगवान् ' सूर्य ही हैं 1 । ' सविता ' शब्द ' सूर्य ' के अर्थ में ही प्रसिद्ध है । शक्तिग्राहकों में प्रधानता तो ' व्यवहार ' की ही होती है । ' देव ' शब्द का भी अर्थ, जब ' परमेश्वर ' परक निश्चित हो जाय, तभी जगदीश्वरत्वादि विशेषण उसमें सङ्गत हो सकेंगे ।

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[ ५० ] ६ - सवितृशब्दस्य कथञ्चित् तत्परत्वेऽपि जगदुत्पादकत्वादिविशेषणं तत्र सङ्गच्छते । सकलैश्वर्यंवानिति तु स्वाहितमेव । प्राणेन्द्रियान्तः करणानि श्रेष्ठतमाय प्रापयत्विति कः प्रार्थयते? कस्य प्राणादीनि श्रेष्ठतमाय कर्मणे कः प्रार्थयत्विति न स्पष्टम् । हे परमात्मन् नः प्राणादीनि श्रेष्ठतमाय कर्मगे भवान् प्रार्पयत्विति तु वक्तव्यमासीत् । श्रेष्ठतम-कर्मत्वेन श्रुत्या तु यज्ञ उक्तः । स चार्थो न गृहीतः । इन्द्रपदस्यैश्वर्यवानर्थस्तु सम्भवति । तमपहायैश्वर्यपरत्वमस्याप्रामा-किमेव ऐश्वर्य प्राप्तिस्तु कथमिन्द्रशब्दस्यार्थ इति विद्वांसो निभालयन्तु । १०० – ' अघ्न्या ' इति सम्बोधनबहुवचनान्तपदम् सर्वानुदात्तस्वरानुरोधात् । तेन यूयमाप्यायध्वमिति क्रियापदेन तस्य सम्बन्ध: स्वाभाविकः, तं परित्यज्य तत्र स्वेच्छाचारः शाब्दन्यायातिक्रम एव ' अघ्न्या ' इति पदं नेन्द्रियपरम्, इन्द्रि -याणामतीन्द्रियत्वेन नित्यत्वात् हननाप्रसक्त्या अघ्न्येति तत्र प्रयोगायोगात् । १०१ - अन्धत्वादिकन्तु गोलकविधानादेवोपपद्यते । ' अध्न्या इति गवां नाम के एता हन्तुमर्हती ' ( म ० भा ० शा०-प ० २६२।४६ ) त्यत्र महाभारते धेनूनामेवान्यात्वेनाइन्तव्यत्वोक्त: । इन्द्रिय ं वै वीर्यं गाव: ' ( ० ५ | ४ | ३ | १० ) इति गोपदस्य कथञ्चिदिन्द्रियपरत्वेऽप्यघ्न्यापदस्य तत्राप्रवृत्ते नहीन्द्रियाणि वर्धयितुमर्हाणि न वा हन्तु शक्यन्ते नित्यत्वादेव । ' माता रुद्राणां दुहिता वसूना ' मितिमन्त्रो नेन्द्रियपरः किन्तु धेनुपर एव । ' अघ्न्या ' इति गोनामसु पठितम् । निरुक्त ( २1११ ) इत्यत्रापि पशुविशेषस्यैव गोनामेति विवक्षितम् नेन्द्रियनाम प्रकृतम् । ६६ - ' सवितृ ' शब्द का अर्थ किसी प्रकार से परमेश्वरपरक होनेपर ही उसमें जगत् उत्पादक आदि विशे-षण सङ्गत हो सकेंगे । ' सकल ऐश्वर्यवान् ' यह अर्थ करना तो केवल अपनी कपोल कल्पनामात्र ही है । श्रेष्ठतम कर्म के लिये प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरण की प्राप्ति की प्रार्थना कौन कर रहा है? ' श्रेष्ठतम कर्म के लिये किसके प्राण आदि को को अर्पित करे ' यह स्पष्ट नहीं किया गया है । आपको इस प्रकार कहना चाहिये था कि ' हे परमात्मन्! हमारे प्राण आदि को श्रेष्ठतम कर्म के लिये आप अर्पित करें । ' श्रुति ने तो ' यज्ञ ' को ही श्रेष्ठतम कर्म कहा है । किन्तु इस श्रुत्यर्थ को तो आपने स्वीकार नहीं किया है । ' इन्द्र ' पद का अर्थ - ऐश्वर्यवान् तो कहा जा सकता है, किन्तु उस वास्त-विक अर्थ को त्यागकर उसका ' ऐश्वर्य ' अर्थ बताना तो अप्रामाणिक ही है । स्वामी दयानन्दजी ने ' इन्द्र ' शब्द का अर्थं ' ऐश्वर्य की प्राप्ति ' जो बताया है, उसे विद्वान् लोग देख लें । १०० - अघ्न्या ' पद, सर्वानुदात्त स्वर के कारण सम्बोधन के बहुवचन में है । अतः यूयमाप्यायध्वम् ' - तुम तृप्त हो जाओ - इस प्रकार क्रियापद के साथ उसका सम्बन्ध होना स्वाभाविक है । किन्तु आपने उस स्वाभाविक सम्बन्ध को त्यागकर स्वेच्छानुसार उसका सम्बन्ध जोड़ना ' शाब्दन्याय ' का उल्लङघन करना ही है । ' अघ्न्या ' पद का अर्थ ' इन्द्रिय ' नहीं है । क्योंकि ' इन्द्रियाँ ' स्वयं अतीन्द्रिय होने के कारण नित्य हैं, उनका ' हनन ' कभी संभव नहीं है | अतः ' इन्द्रिय ' के लिये ' अन्या ' शब्द को बताना कथञ्चिदपि सङ्गत नहीं हो सकता । १०१ – ' अन्धत्व ' आदि तो ' गोलक ' के विधान से ही उपपन्न होता है । महाभारतकार तो बताते हैं कि ' अघ्न्या ' यह गौओं की संज्ञा है । उन गौओं का हनन कौन कर सकता है? महाभारत ( शां ० प ० २६२।४६ ) में गौओं को ही ' अन्य ' कहते हुए उन्हें न मारने योग्य कहा गया है । ' इन्द्रियं वै वीयं गाव: ' -- ( शत प ० ५ | ४ | ३ | १० ) इस प्रकार शतपथ में प्रयुक्त हुए ' गो ' पद का यथा कथञ्चित् ' इन्द्रिय ' अर्थ, मान भी ले तो भी ' अघ्न्या ' पद का प्रयोग ' इन्द्रिय ' के लिये बताना तो कथमपि उचित नहीं है । क्योंकि ' इन्द्रियों ' के नित्य होने से न तो वे वृद्धिङ्गत की जा सकती हैं और न उनका हनन ही संभव हो सकता है । ' माता रुद्राणाम् ' आदि मन्त्र ' इन्द्रिय ' परक नहीं है, अपितु ' धेनु ' परक ही है । ' अघ्न्या ' पद ' गौ ' के नामों में पठित है । निरुक्त ' में ' पशुविशेष ' ही ' गौ ' के नाम से विवक्षित है | यहाँ पर ' इन्द्रिय ' का अर्थ, प्रसङ्ग से भी प्राप्त नहीं हैं ।

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[ ५१ ] १०२ - अयक्ष्मा अनमीवा इति विशेषणे अपि नेन्द्रियेषु सङ्गच्छतः । यक्ष्मादीनां देहरोग त्वेन प्रसिद्धेः । न ह्यतीन्द्रियेषु इन्द्रियेषु क्षयाख्यो यक्ष्मा सम्भवति । इन्द्रियपक्षे प्रजावतीरिति विशेषणमपि न सङ्गच्छते, पशुरूपाणामेव गवां तदुपपत्तेः । किञ्च प्रापयत्विति क्रियायाः श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्राणादिकर्मभिः सम्बन्धेन शान्ताकांक्षाया अनमीवा अयक्ष्मा इन्द्रियाणि प्रार्पयत्विति पुनः सम्बन्धो न सम्भवति बीजाभावात् । अस्मासु स्तेनो मोत्पद्यतामित्यपि न सङ्गतम् माङ, योगे लोटो ऽसाधु त्वात् । अस्मास्वितिबोधक पदाभावाच्च । १०३ - ' ईशत ' इत्यस्योत्पत्तिरपि नार्थः, निष्प्रमाणत्वात् । गोपतिपदस्य धार्मिकमनुष्यस्येति नार्थः, निष्प्रमाण-त्वात् । तस्य समीपे इन्द्रियाणि बीघ्र ' वा: स्युरित्यपि न सङ्गतम्, समीपे इत्यस्य निरर्थकत्वात् । बह्वीरित्यपि निर-मन्द्रियाणां परिगणितत्वात् । अत्रार्थे भागपदार्थस्तु नोक्तः । जगदीश्वरस्य धन्यवादा अवश्यं वाच्या: परमयं मन्त्र-गतस्य कस्य पदस्यार्थं इति तु नोक्तम् । दयानन्देन तु भाग भजनीयं त्वामाश्रयाम इत्युक्तम् । 1०४ --- अथ अधियज्ञार्थपरीक्षणम् - यदुक्तम्- ' अन्नस्य प्राप्तये उत्तमरसलाभाय जगदुत्पादकं सेवनीयमग्नि-माश्रयामः । सर्वजगदुत्पादकः सकलैश्वर्यवान् देवः सविता भौतिकोऽग्निः, ' अग्निरेव सविता ' ( जै ० उ ० ४।२७।१ ) ( गो ० ब्रा ० पू ० भा ० १।३३ ) ये सर्वक्रियाप्राप्तिहेतवः सन्ति तान् श्रेष्ठतमाय कर्मणे यज्ञाय प्रार्पयति । इन्द्राय परमैश्वर्यप्राप्तये यज्ञार्थं प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा अघ्न्या गावः स्युः । एवं रोगाख्यो विघ्नः चौरः पापी स्तेनो हरणशीलो हतु समर्थो १०२ – ' अयक्ष्मा ' और ' अनमीवा ' ये विशेषण भी ' इन्द्रियों ' के अर्थ में सङ्गत नहीं हो रहे हैं । क्योंकि ' यक्ष्मा ' • आदि शरीर ' के रोग के रूप में प्रसिद्ध हैं । जो इन्द्रियां स्वयं अतीन्द्रिय हैं, उनमें ' क्षय ' नामक ' यक्ष्मा ' कैसे संभव हो सकता है । ' इन्द्रियों ' के पक्ष में ' प्रजावती: ' यह विशेषण भी सङ्गत नहीं हो रहा है । उसकी युक्तियुक्तता तो ' पशुरूप , गाय ' के अर्थ में ही होती है । प्रार्पयतु ' इस क्रिया की आकांक्षा तो श्रेष्ठतम कर्मों अर्थात् प्राणादि कर्मों से सम्बद्ध होकर शान्त हो गई है । अतः उसका ' अनमीवा ' ' अयक्ष्मा ' इन्द्रियों को अर्पित करे - इस अर्थ के साथ पुनः सम्बन्ध करना सम्भव नहीं है । क्योंकि पुनः सम्बन्ध करने में कोई कारण नहीं है । ' हमारे मध्य कोई चोर उत्पन्न न हों ' - यह अर्थ. करना भी सङ्गत नहीं हो रहा है । क्योंकि ' माङ ' के योग में ' लोट् ' लकार का प्रयोग करना अशुद्ध है । ' अस्मासु ' इस अर्थ को बतानेवाले पद का भी मन्त्र में अभाव है । १०३ - ' ईशत ' इस पद का अर्थ भी ' उत्पत्ति ' नहीं है । क्योंकि ऐसा अर्थ करने में कोई प्रमाण नहीं है । ' गो-पति ' पद का अर्थ ' धार्मिक मनुष्य ' बताने में भी कोई प्रमाण नहीं है । ' उसके समीप इन्द्रियाँ बहुत - सी ध्रुव हों ' - यह अर्थ भी सङ्गत नहीं हो रहा है । क्योंकि ' समीप ' अर्थ करना निरर्थक ही है । ' बी ' - बहुत - कहना भी निरर्थक है, क्योंकि ' इन्द्रियां ' तो परिगणित ही होती हैं । इस अर्थ में ' भाग ' पद के अर्थ को छोड़ ही दिया है । जगदीश्वर को धन्यवाद तो अवश्य देना चाहिये, किन्तु यह भी तो बताना होगा कि मन्त्र में प्रयुक्त हुए किस शब्द का अर्थ किया जा रहा है, यह बताना तो भूल ही गये । स्वामी दयानन्दजी ने ' भागं भजनीयं त्वामाश्रयामः ' - भाग अर्थात् भजन करने योग्य तुम्हारा आश्रय हम ले रहे हैं - यही अर्थ लिखा है । अथ अधियज्ञार्थं परीक्षणम् १०४ - अब ' अधियज्ञ अर्थ का भी परीक्षण करते हैं । अधियज्ञार्थ को बताते हुए जो यह कहा गया है कि " अन्न की प्राप्ति, उत्तमरस के लाभ के लिये जगत् के उत्पादक होने से सेवा करने योग्य ' अग्नि ' का हम आश्रय लेते हैं । समस्त जगत् का उत्पादक सकल ऐश्वर्य से युक्त देव ' सविता ' भौतिक अग्नि है । " अग्निरेव सविता " – ( जै ० उ०-४।२७।१ ) तथा ( गो ० ब्रा ० पू ० भा ० १1३३ ) - अग्नि ही सविता है - समस्त क्रियाओं की प्राप्ति के ये जो हेतु हैं, उन्हें श्रेष्ठतम कर्म अर्थात् ' यज्ञ ' के लिये अर्पित करता है । " इन्द्राय " – परमेश्वर्ष की प्राप्ति के लिये, यज्ञ के निमित्त ' प्रजावती ' ' अनमीवा ', ' अयक्ष्मा ', ' अघ्न्या ' गौए हों । इस प्रकार रोगनामक विघ्न, जो चोर, पापी, स्तेन, अपहरण स्वभाव वाला है, वह हरण करने में समर्थ न हो, और सभी प्रजा, सुखों को प्राप्त करे । प्रजा इन प्रत्यक्ष गौओं के

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[ ५२ ] न भवेत् प्रजाश्च सर्वाणि सुखानि प्राप्नुयुः ता अस्मिन् गोपतौ प्रत्यक्षे गवां स्वामिनि निश्चलसुखहेतवः स्युः । सर्वोपकारं भजति यस्तस्य विदुषो यजमानस्य पशून् प्रजाः श्रियः वा भौतिकोग्निः पाति ( पृ ० २०1१ ) । ' इति, तदपि न किञ्चित्, असङ्गतेः । १०५ – नहि भौतिकस्याग्नेः सर्वजगदुत्पादकत्वं सम्भवति, महदादिवाय्वन्तानां तदकारणत्वात् । सकलैश्वर्य-वत्त्वमपि तत्र न सम्भवति, तस्य परमेश्वरधर्मत्वात्, केवलस्याचेतनस्य सम्बोध्यत्वासम्भवाच्च । न च तदधिष्ठाता देवविशेषोऽग्निरत्र सम्वोध्यः, तवापसिद्धान्तापातात् । वायवः स्थेऽति पुरुषव्यत्ययोऽपि निष्प्रमाण:, यथाश्रुतार्थानुपपत्ता-वेव बाहुलकस्य व्यत्ययस्य चाश्रयणीयत्वात् । तानीत्यस्याध्याहारोऽपि निर्मूल एव । वायुपदस्य सर्वक्रियाप्राप्तिहेतव इत्यपि नार्थः, वायुपदस्य तत्राशक्तत्वात् । १०६ – नापि लक्षणया तादृशोऽर्थो ग्रहीतुं शक्यः, तात्पर्यानुपत्त्यादिलक्षणान्रीजासम्भवात् । किञ्च लक्षणयापि ' गोभि: श्रीणीत मत्सर ' ( ऋ ० सं ० ६ ४६ ४ ) मितिवत् वायुपदेन वायुविकाराणां प्राणानां ग्रहणसम्भवेऽपि न चक्षुरा-दीन्द्रियन्तःकरणादीनां ग्रहणं सम्भवति तेषां तदकार्यत्वात् । इन्द्रायेत्यस्य परमैश्वर्यप्राप्तिरपि नार्थः, निर्मूलत्वात् । ध्रुवा इत्यस्य निश्चलत्वमेवार्थः न निश्चल सुखहेतुत्वम्, ध्रुवशब्दस्य ध्रुवसखहेतावशक्तत्वात् । भौतिकाग्नेः प्रजापशु-श्रियां पालकत्वमपि न सम्भवति भौतिकत्वादेव । अधियज्ञार्थेऽपि ब्राह्मणसूत्रप्रसिद्धो यज्ञोपयोगी पदार्थो नोक्तः, तत्तु मन्ये याज्ञिकंप्रक्रियाया अज्ञानवशा देवेति । स्वामी के संरक्षण में निश्चल सुख का कारण बनें । जो सबके उपकार में संलग्न है, ऐसे विद्वान् यजमान की पशुरूप प्रजा अथवा लक्ष्मी की भौतिक अग्नि रक्षा करता है । " इस प्रकार जो व्याख्यान स्वामी दयानन्दजी के द्वारा किया गया है. वह निष्प्रयोजन और असंगत भी है । १०५ - क्योंकि भौतिक अग्नि समस्त जगत् का उत्पादक नहीं है, और न हो सकता है । ' महान् ' से आरम्भ करके ' वायु ' तक का कारण वह नहीं है । उसमें सर्वेश्वर्ययुक्तता की भी संभावना नहीं की जा सकती है, क्योंकि वह परमेश्वर का धर्म है । केवल अचेतन को सम्बोधित भी नहीं किया जा सकता । भौतिक अग्नि का अधिष्ठाता देवविशेष ' अग्नि ' को भी यहाँ पर सम्बोधित किया जाना भी नहीं कह सकते, क्योंकि वैसा स्वीकार करना आपके सिद्धान्त के विरुद्ध होगा । " वायवः स्थ " यहाँ ' पुरुष ' का व्यत्यय करने में भी कोई प्रमाण नहीं है । ' बालक ' या ' व्यत्यय ' का आश्रय तभी लिया जाता है, जब यथाश्रुत अर्थ सङ्गत न होता हो । " तानि " यह अध्याहार भी निर्मूल ही है । " वायु पद का ' समस्त क्रियाओं की प्राप्ति के हेतु " - यह अर्थ भी नहीं है । क्योंकि इस अर्थ को प्रकट करने में ' वायु ' पद शक्त नहीं है । १०६ - लक्षणावृत्ति से भी ' वायु ' पद का वह अर्थ नहीं कर सकते, क्योंकि लक्षणावृत्ति का आश्रय तब किया जाता है, जब ' तात्पर्य ' की अनुपपत्ति हो । उसके न होने से ' लक्षणा ' कैसे कर सकते हैं? किश्व - लक्षणा से भी ' गोभि: श्रीणीत ' के समान ' वायु ' पद से वायुविकाररूप प्राणों का ग्रहण करना संभव होनेपर भी ' चक्षुरादि इन्द्रिय अन्तः-करणादि का ग्रहण करना कथमपि संभव नहीं है, क्योंकि वे उसके कार्य नहीं हैं । इन्द्राय " पद का अर्थ ' परमैश्वर्य'-की प्राप्ति ' कहना भी निर्मूल है । " वा " का अर्थ ' निश्चलत्व ' है । उसका अर्थ - निश्चलसुख का हेतु ' कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ' ध्रुव ' पद ' ध्रुवसुख का कारण ' इस अर्थ को बताने में असमर्थ है । भौतिक अग्नि का ' प्रजा, पशु, श्री का पालक होना ' भी संभव नहीं है, क्योंकि वह भौतिक होने से असमर्थ है । अधियज्ञवाले अर्थ में भी ब्राह्मण, सूत्र आदि में प्रतिपादित यज्ञोपयोगी पदार्थों को नहीं कहा । न कहने का कारण यही प्रतीत हो रहा है कि सम्भवतः याज्ञिक प्रक्रिया से परिचित न होना ही होगा ।

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[ ५३ ] १०७ - आधिदैविकार्थपरीक्षणम् । यदुक्तम्- ' पराक्रमायोत्तमरसलाभाय सर्वपदार्थानां सम्प्रयोगेण पुरुषार्थ -सिद्धये भाग भगानां धनानां भाजनम् तं सवितारमाश्रयामः । ' सविता वै सर्वस्य प्रसविता ' ( नि ० १०। ३२ ) एवमाप्य-यामहे सर्वजगदुत्पादकः सकलैश्वर्यवान् द्य स्थानो देवः सविता । ( सूर्यः सर्वोषधिवनस्पत्यादीनामुत्पादकः ) ये सर्व क्रिया-प्राप्तिहेतवः स्पर्शगुणा भौतिका वायवः सन्ति श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्रार्पयति । परमैश्वर्यप्राप्तये अघ्न्याः पृथिव्यादयोऽन-Har: अयक्ष्माः प्रजावती: प्रार्पयतु । सवितरि सति स्तेनो विघ्नो वा समर्थो न भवति । गोपतो पृथिव्यादिरक्षणमिच्छु-कस्य ताः ध्रुवः स्युः सविता सर्वोपकार यजति यस्तस्य यजमानस्य श्रीः रक्षति ' ( पृ ० २०/६ ) इति । १०८ - तदपि न युक्तम्, पूर्वोक्तदोषदुष्टत्वात् । त्वद्रीत्या सविता सूर्योऽपि जड एवेति न तस्याश्रयणं युक्तम् । आश्रयणमुपासनमेव । जड़पूजायास्त्वया प्राणपणेन निषिद्धत्वात् । नापि तदधिष्ठातृदेवः पूज्यस्त्वया तदनङ्गीकरात् । नवा सवितुर्भगानां धनानां वा भाजनत्वं सम्भवति, तस्याग्निगोलकत्वाविशेषात् । सकलजगदुत्पादकत्वमपि तस्य न सम्भवति, तस्यापि जगदन्तः पातित्वात् । नापि सकलैश्वर्यवत्त्वं तस्य परमेशधर्मत्वात् नापि सवितुः श्रेष्ठतमाय कर्मणे वाय्वादिसमर्पकत्वं सम्भवति जडत्वादेव । नापि सविता अनमीवा अयक्ष्माः प्रजावतीः पृथिव्यादी: समर्पयितुं समर्थोऽ-चेतनत्वात् । चेतन एव सर्वोपकारं तद्याजिन च ज्ञातु ं शक्नोति । स एव श्रियो रक्षितुं शक्नोति । तस्मादङ्गीकर्त्तव्यः सनातन धर्मः, तत्सम्बन्धी देवतावादश्च । १०६ -- एतेनैव ' हे परमेश्वर भवान् कृपया अस्माकमिन्द्राय परमैश्वर्यप्राप्तये श्रेष्ठतमाय कर्मणे चेमाः आधिदैविकार्थ परीक्षणम् १०७ – आधिदैविक अर्थ करते समय स्वामी दयानन्दजी ने जो कहा है कि ' पराक्रमाय ' = उत्तम रस - लाभ के लिये सभी पदार्थों के सम्यक् प्रयोग से पुरुषार्थ की सिद्धि के लिये भागम् ' = भग अर्थात् धनों के भाजन उस सविता IIT आश्रय लेते हैं । " ' सविता ' सब का प्रसविता है " - - इस प्रकार तृप्ति का अनुभव करते हैं । समस्त जगत् का उत्पा-दक, सकल ऐश्वर्यं सम्पन्न, द्यस्थानवाला देव सविता सूर्य, समस्त ओषधि, वनस्पतियों का उत्पादक है । समस्त क्रियाओं की प्राप्ति के हेतु, स्पर्शगुणवाले जो भौतिक वायु हैं, उन्हें श्रेष्ठतम कर्म के लिये वह अर्पित करता है । वह ' अघ्न्या ', ' अनमीवा ', ' प्रजावती ', ' पृथिवी ' आदि का अर्पण करे । सविता के रहनेपर चोर या विघ्न समर्थ नहीं हो पाता है । पृथिवी आदि की रक्षा के इच्छुक ( गोपति ) के लिये ये ध्रुव हों । सभी के उपकार के लिये यजन करने-वाले यजमान की श्री की रक्षा, सविता करता है । " १०८ - किन्तु इस प्रकार व्याख्या करना भी ठीक नहीं है । क्योंकि पूवोक्त दोष यहाँ भी विद्यमान हैं । क्योंकि आपके सिद्धान्तानुसार ' सविता ' या ' सूर्य ' भी जड़ ही है । उसका आश्रय करना उचित नहीं होगा । क्योंकि आश्रय-ग्रहण करने का तात्पर्य ' उपासना ' ही है । आपने तो ' जड़ ' की पूजा का प्राणपण से निषेध किया है । सूर्य की अधि-ष्ठात्री देवता पूजनीय है - यह भी आप नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसी देवता आपके मत में मान्य नहीं है । सूर्य ', ' भगों अर्थात् धनों का भाजन भी नहीं हो सकता, क्योंकि वह अग्निगोलक के सिवा अन्य कोई पृथक पदार्थ नहीं है । वह समस्त जगत् का उत्पादक भी नहीं हो सकता, क्योंकि वह स्वयं भी ' जगत् ' के ही अन्तर्गत है । वह सकल ऐश्वर्य -सम्पन्न भी नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो केवल परमेश्वर का ही धर्म है । सविता का श्रेष्ठतम कर्म के लिये वायु आदि का समर्पक होना भी उसके जड़ होने के कारण ही असम्भव है । जड़ होने से ही वह ' अनमीवा ', ' अयक्ष्मा ', ' प्रजावती ', ' पृथिवी ' आदि को समर्पित करने में भी असमर्थ है । वह चेतन ही होता है, जो सबके उपकार और याजक को जान सकता है, वही श्री की रक्षा कर सकता है । इसलिये अपने उक्त अर्थो की सिद्धि के लिये, सनातनधर्म और उसके द्वारा प्रतिपादित देवतावाद की ही आपको शरण लेनी होगी । १०६ - स्वामी दयानन्दजी का अगला व्याख्यान भी - " है परमेश्वर! आप कृपा करके हमारी परमैश्वर्य -

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[ ५४ ] प्रजावती नमीवा अयक्ष्मा अघ्न्याः गाः सदा प्रार्पयतु हे परमात्मन् भवत्कृपया मार्क मध्ये कश्चिदघशंसः पापी स्तेन-चोरः मेशत कदाचिन्मोत्पद्यताम् । तथा त्वमस्य यजमानस्य जीवस्य पशून् पाहि सततं ' यतो वा ता गा इमान् पशू ंश्चा-घशंसः स्तेनो मेशत हन्तुं समर्थो न भवेत् यतोऽस्मिन् पतौ पृथिव्यादिरक्षणेच्छुकस्य समीपे बह्वीयो गावो ध्रुवाः स्यात् भवेयुरिति दयानन्दीयं व्याख्यानमपि प्रत्याख्यातमेव, उक्तदोषात् । गोपतिपदस्य पृथिवीपतिरित्यर्थसम्भवेऽपि तदिच्छुकस्येति तु न कथमप्यर्थः सम्भवति । ११० -- यत्तु भावार्थत्वेनोक्तम् - ' मनुष्यैः सदैव धर्म्यं पुरुषार्थमाश्रित्यर्वेदाध्ययनेन गुणगुणिनो ज्ञात्वा सर्वपदा-र्थानां सम्प्रयोगेण पुरुषार्थं सिद्धये श्रेष्ठतमाभिः क्रियाभिः संयुक्तर्भाव्यम् यत ईश्वरानुग्रहेण सर्वेषां सुखैश्वर्यस्य वृद्धि: स्यात् । तथा सम्यक क्रियया प्रजाया रक्षणशिक्षणे सदैव कर्त्तव्ये यतो नैव कश्चिद्रोगाख्यो विघ्नश्चोरश्च प्रबल: कदा-चिद्भवेत् । प्रजाश्च सर्वाणि सुखानि प्राप्नुयुः । येनेयं विचित्रसृष्टी रचिता तस्मै जगदीश्वराय धन्यवादा वाच्याः । एवं कुर्वतो भवतः परमदयालुरीश्वरः कृपया सदैव रक्षयिष्यतीति ' ( पृ ० २२ ) इति, तत्तु सर्वथाऽसङ्गतम्, मूलाक्षरा-सम्बद्धत्वात् ऋग्वेदाध्ययनेन गुणगुणिज्ञानं भवतीति तु भूमिकायामेव खण्डितम् । १११ - कोऽयं धर्म्यः पुरुषार्थो यमाश्रित्यर्वेदाध्ययनं कार्यम्? धर्मश्च कः? वैदिकैस्तु चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मोऽभ्युपेयते । चोदनेति विधिनिषेधवाक्यानि भवन्ति । तानि च ब्राह्मणगतानि । न च तेषां त्वया प्रामाण्यमभ्युपेयते । ऋगादिमन्त्रस्तु गुणगुणिज्ञाने पदार्थानां सम्प्रयोगस्तन्यते । धर्मः केन कथं ज्ञायताम्? पुरुषार्थसिद्धीनां श्रेष्ठतमानां मन्त्र-ब्राह्मणात्मकं वेदं बिना ज्ञातुमशक्यत्वात् । प्राप्ति के लिये और श्रेष्ठतम कर्म के लिये इन प्रजावती, अनमीवा, अयक्ष्मा, अधन्या, – गौओं को सदा अर्पित करें | हे परमात्मन्! आपकी कृपा से हमारे मध्य में कोई अघशंस पापी चोर उत्पन्न न हो । तुम इस यजयान के पशुओं की सदा रक्षा करो इन गौओं और पशुओं को कोई अघशंस स्तेन न मार सके | इस पृथिवी आदि की रक्षा के इच्छुक गोपति के पास बहुत - सी ध्रुवा गौएँ हों । " - स्वयं असिद्ध हो गया है, क्योंकि उक्त दोष यहाँ भी विद्यमान हैं । ' गो-पति ' का अर्थ ' पृथिवीपति ' होना तो संभव है, परन्तु ' पृथिवी - की रक्षा का इच्छुक ' यह अर्थ तो कथमपि संभव नहीं हो सकता । ११० - भावार्थ के रूप में जो कहा गया है कि - " मनुष्यों को सदा ही धर्मसम्मत पुरुषार्थ का आश्रय लेकर ऋग्वेद आदि के अध्ययन से गुण और गुणी को जानकर सभी पदार्थों का सम्यक् प्रयोग करते हुए पुरुषार्थं की सिद्धि के लिये श्रेष्ठतम क्रियाओं से संयुक्त होना चाहिये जिससे ईश्वर के अनुग्रह के द्वारा सब के सुख और ऐश्वर्य की वृद्धि हो । सम्यक क्रिया से प्रजा का रक्षण और शिक्षण सदा ही करना चाहिये । जिससे कोई रोगरूप विघ्न न हो, और चोर कभी प्रबल न हों सकरें, तथा प्रजा समस्त सुखों को प्राप्त करे । जिसने यह विचित्र सृष्टि रची है, उस जगदीश्वर को धन्यवाद देने चाहिये । ऐसा करनेवाले तुम लोगों की परमदयालु ईश्वर कृपा करके सदा ही रक्षा करेगा । " - यह भावार्थ प्रतिपादनात्मक व्याख्यान भी सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि मन्त्र के अक्षरों से उसका कोई सम्बन्ध ही नहीं हो रहा है । हमने अपने इस ग्रन्थ की भूमिका भाग में स्वामी दयानन्दजी की उक्त व्याख्या ' ऋग्वेदाध्ययन से गुण - गुणों का ज्ञान होता है ' - का खण्डन कर दिया है । १११ - धर्मयुक्त यह पुरुषार्थ कौन - सा है, जिसका आश्रय लेकर ऋग्वेद आदि का अध्ययन करना चाहिये । धर्म कौन है? वैदिकों के द्वारा तो ' चोदना ' स्वरूप धर्म को स्वीकार किया जाता है । विधिवाक्य और निषेधवाक्य ही ' चोदना ' शब्द से कहे जाते हैं । वे वाक्य ब्राह्मणग्रन्थों में हैं, और उन ग्रन्थों को आप प्रमाण मानते नहीं हैं । ' ऋग् ', आदि के मन्त्र तो ' गुण - गुणी के ज्ञान ' में पदार्थों का सम्यक प्रयोग बतलाते हैं । धर्म को कौन कैसे समझ े ? श्रेष्ठतम पुरुषार्थ की सिद्धियों को मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद के बिना जानना संभव नहीं है ।

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[ ५५ ] प्रथम मन्त्र का हिन्दी सारांश [ एवञ्च ' इषेवे ' ति छिनत्ति, अर्थात् पलाशशाखा का अथवा शाल्मली शाखा का छेदन करता है । अथवा ' इषेत्वोर्जेत्वा ' का प्रयोग करते हुए ' छेदन ' करता हूँ । अथवा दोनों के साकांक्ष होने से ' शाखा ' को झुकाता हूँ – यह उत्तर है । पलाश की शाखा अथवा शमी की शाखा में विकल्प माना गया है । उसके छेदन में ' इषेत्वोर्जेत्वा ' इन दो मन्त्रों का विकल्प किया गया है । उसका कोई दृष्ट प्रयोजन नहीं है । यही स्थिति ' उर्जेत्वा ' की भी है । वचन सामर्थ्य से अदृष्ट प्रयोजन मानने पर तो दोनों के द्वारा एक ही अदृष्ट प्रयोजन की कल्पना करना न्याय सङ्गत होगा । इस प्रकार अल्प अनुमान करना होगा - इस पूर्वपक्ष को उपस्थित करके समाधान किया गया है कि जो ' सम होता है, वहाँ वाक्यभेद होता है । ' सम ' का अर्थ है कि जिनमें परस्पर कोई आकांक्षा न हो वहाँ वाक्यभेद हुआ करता है । ' इषेत्वा " से एक अर्थ किया जाता है । " उर्जेत्वा " से दूसरा अर्थ किया जाता है । यद्यपि प्रत्यक्षादि प्रमाण से कोई दृष्ट अर्थ प्राप्त नहीं हो रहा है, तथापि श्रुति से तो अर्थ प्राप्त हो रहा है कि - " इषेत्वा " से छेदन करना और ' उर्जेत्वा " से अनुमार्जन करना । निष्कर्ष यह है कि शाबरभाष्य के द्वारा उपर्युक्त काण्वसंहिता के दोनों वाक्य श्रुति के रूप में उदाहृत करके ' इषेत्वा ' और ' उर्जेत्वा ' इन दो वाक्यों को स्वीकार करके दो मन्त्र माने गये हैं । इस रीति से पूर्व -fier सूत्र और उसके भाष्य के द्वारा एक कण्डिका में अनेक मन्त्र सिद्ध होते हैं । माधवाचार्य की अधिकरण न्याय-माला में भी " इषेत्वोर्जेत्वा ' में क्रिया पद के अभाव के कारण " उरु प्रथस्व " मन्त्र के समान स्मारकत्व के अभाव से एक अदृष्ट की कल्पना करने में लाघव होने के कारण यह एक ही मन्त्र है - यह पूर्व पक्ष उपस्थित किया गया है । सिद्धान्तपक्ष में कहा गया है कि काण्व ब्राह्मण में ' छिनत्ति ', ' अनुमाष्टि ' इस प्रकार से विनियोग के श्रुत होनेपर उसके अनुरोध से भिन्न - भिन्न दो मन्त्र हैं । यहाँ पर ' छिनमि ' और ' अनुमाज्मि ' इन क्रिया पदों का अध्याहार करना होता है । महर्षि कात्यायन ने भी पर्ण की शाखा का छेदन बताया है । किन्तु पर्ण शाखादन का ' इषेत्वा ' मन्त्र, शौनकी संहिताका आदि मन्त्र नहीं है । अपितु पिप्पलाद संहिता का वह प्रथम मन्त्र है । किन्तु आपकी दृष्टि से तो वह ' संहिता ' वेद ही नहीं है । महाभाष्य की रीति से चलने पर आपके मार्ग की शौनकी संहिता वेद से बहिर्भूत हो जायगी तथा ' पिप्पलाद संहिता ' भी वेद नहीं कही जायगी! पुनश्च काण्व के अनुसार ' इषेत्वा " आदि के स्वतन्त्र मन्त्र होने का निर्णय किया गया हैं । द्वितीय अध्याय के प्रथम पाद में " अर्थैकत्वात् " सूत्र पर शाबरभाष्य में विचार हुआ है कि प्रश्लिष्ट रूप से पठित यजुओं में यह कैसे समझा जाय कि यह एक यजुर्मन्त्र है - इस आशङ्का पर बताया गया है कि जितने पदों से एक ' यजन ' रूप अर्थ प्रति-पादित हो उतना पदसमूह एक यजु है । कितने पदसमूह से एक यजनरूप अर्थ होता है? ऐसी शङ्का उपस्थित कर उत्तर दिया है कि जितने से क्रिया का उपकार प्रकाशित हो, उतना कथनीय होने के कारण उसे एक वाक्य समझा है | यह प्रसिद्ध है कि ' एक अर्थ का प्रतिपादक एक वाक्य होता है । ' वहींपर " समेषु वाक्यभेदः स्यात् " -सम मन्त्रों में वाक्यभेद होगा - इस सूत्र से " इषेत्वा ", " उर्जेत्वा " ये दो वाक्य होंगे । तथा " आयुर्यज्ञ ेन " आदि भिन्न-भिन्न वाक्य हैं या एक वाक्य है? " इषेत्वा " इतने मात्र से ही उसका निर्णय हो जाता है । ' मा हिस्यातु सर्वाभूतानि ' से हिंसा मात्र का निषेध किया जाता है । " अग्नीषोमीयं पशुमालभेत " अग्नीषोमदेवताक पशु का आलम्भन ( हिंसा ) करे- ' - निषिद्ध है । वेद में प्रतिपादित हिंसानिषेध रे - यह वचन तो अपवादरूप है । यज्ञगत हिंसा के अतिरिक्त ' हिंसा STATE है । अथवा यजुर्वेद आदि सभी वेदों में मन्त्र से निषेध में पर्यवसित होनेवाले वाक्य का अभिप्राय है । निषेध और विधि दोनों में पर्यवसित होनेवाले वाक्यों के लिये ' मन्त्र ' पद का प्रयोग होता है, जैसे- " ये मन्त्रा प्रोक्षणे गवाम् " आदि स्थलों में है । इससे " इषेत्वोर्जेत्वा " यहाँ गोपथकार दो मन्त्र नहीं मानते किन्तु " श्रेष्ठतमाय कर्मणे ” यहाँ से प्रारम्भ करके ‘ यजुर्वेदमधीयते " तक सम्पूर्णपाठ को एक ही मन्त्र के रूप में द्योतित करते हैं । " स्वामी दया-नन्दजी का यह कथन भी कोई महत्त्व नहीं रखता है, क्योंकि वहाँ का ' आदि ' पद, मन्त्र के आदि का द्योतक है । आपके कथनानुसार " पाहि " तक की मन्त्रता इससे नहीं सिद्ध होती है । वहाँ कण्डिका के प्रतीक का ग्रहण ही इष्ट है ।

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[ ५६ ] efuser ओं में अनेक मन्त्र होते हैं । अत एव नमस्कार आदिवाला एक यजु है और नमस्कारान्त एक यजु है - ये यास्कादि महर्षियों की उक्तियां सङ्गत होती हैं । यह जो कहा गया है कि “ इषेत्वोर्जेत्वा " को आदि कहकर यजुर्वेद का अध्ययन किया जाता है - यह गोपथ-कार का वचन है, यहाँ कृष्णयजुर्वेद विवक्षित नहीं है " - यह कथन भी नितान्त उपेक्षणीय है । क्योंकि यहाँपर ' यजुर्वेद ' शब्द, अन्य यजुर्वेद ग्रन्थों का उपलक्षण है । अन्य शाखाओं की संहिताओं में ' वेदत्व ', परम्परा प्राप्त है - यह बात श्रुति, स्मृति, पुराण आदि से भी सिद्ध है । मुक्तिकोपनिषद्, पुराण और महाभाष्य में अनेक शाखाओं से युक्त चारों वेदों का वर्णन है । महाभाष्य में जैसे - ऋक, यजु, साम वेदों के प्रतीक के रूपों में " अग्निमीले पुरोहितम् ”, “ इषेत्वो-र्जेत्वा ", " अग्न आयाहि वीतये " - इनका ग्रहण किया है, वैसे ही अथर्ववेद का प्रतीक ' शन्नोदेवी ” मन्त्र भी वहाँ बताया है | अतः स्वेच्छा से देवता आदि की कल्पना करना मन्त्रार्थ के विरुद्ध चलना ही है । कात्यायन आदि महर्षियों के विनियोगों के आधार पर ही देवता आदि का ज्ञान प्राप्त करना होता है । सायण के द्वारा उद्धृत काण्व ब्राह्मण के द्वारा भी ' इषेत्वा ' इस मन्त्र की देवता, कात्यायन के द्वारा बोधित ' शाखा ' ही है । यह भी विचारणीय है कि " इषेत्वा ' से लेकर पशून् पाहि ' तक एक ही मन्त्र मानागया है । " यहाँपर ' सवितृ शब्द के देखने से आपाततः कहा गया है कि इस मन्त्र की देवता ' सविता ' है । ' ब्राह्मण ', ' सूत्र ' आदि के अनुसार तो इस कण्डिका में ' इषेत्वा ', ' उर्जेत्वा ' इत्यादि अनेक मन्त्र हैं । पण्डित ब्रह्मदत्तजी ने " यजुर्वेदादि मन्त्र पशुहिंसा का वारण हुआ है ” — इस महाभारत के पद्य को उद्धृत करके ' पशून् पाहि ' तक सम्पूर्ण कण्डिका एक ही मन्त्र है, यह सिद्ध करने का प्रयास किया है, किन्तु श्रुति विरोध को न समझपाने के कारण उनका प्रयास व्यर्थ ही हो गया है । यजुर्वेद की प्रथम कुण्डिका में जितने मन्त्र हैं उनमें ' सप्तम्यास्तसिल् ' को समझनेपर आक्षेप नहीं हो पायगी । अथवा ' मन्त्र ' पद का मन्त्रसमूहरूप कण्डिका में गौण प्रयोग भी हो सकता है । किञ्च यहाँ पशुहिंसा का वारण नहीं है, अपितु ' पशुपालन ' की प्रार्थना है । ' पालन ' को ही हिंसा का वारण नहीं कह सकते । आधुनिक शासकों के द्वारा पशुपालन के प्रयास होते रहने पर भी ' हिंसा ' भी स्वीकार की ही जा रही है । यह भी नहीं है कि ' यजुर्वेद ' शब्द से एक ही संहिता ग्रहण की जाय । ' कष्णयजुर्वेद ' भी यजुर्वेद शब्द से ही प्रसिद्ध है । जहाँ ' यजुर्वेदादि मन्त्र से कहा गया है, वहाँ यजुर्वेदादि मन्त्रों से ' - यह अर्थ होता है | वहाँ ' मन्त्र ' शब्द ' ब्राह्मण ' का भी उपलक्षण है । ' मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' इस ब्राह्मण वाक्य से हिंसा का निषेध होता है, किन्तु ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' इस अपवादक वचन को देखने पर ज्ञात होता है fa यज्ञीय हिंसा के अतिरिक्त स्थल में हिंसा का निषेधक वह वचन चरितार्थ होता है । जो यह कहा गया है कि " दुर्गाचार्य और स्कन्दस्वामी को भी ' शाखा ' आदि को देवता के रूप में स्वीकार ..... करना अभिमत नहीं है, यास्क ने भी ' तद्य अनादिष्ट देवता ' आदि से उपक्रम करके ' यद्देवतः स यज्ञो... ' इत्यादि कहा है ' — यह तर्क करना उचित नहीं है, वह तक न रहकर कुतक करना ही कहलाएगा । क्योंकि ' शाखा ' आदि को निरुक्त में यज्ञाङ्ग बतलाने पर भी उनका देवता होना युक्ति सिद्ध है । प्रधान हवि, जिस देवता की होती है, उसके संस्कारपरक मन्त्र होते हैं । जैसे प्रकृत में ' ऐन्द्रसान्नाय्य ' या ' माहेन्द्र ' प्रधान हवि है । अतः ' एषेत्वा ' आदि उसी के संस्कारपरक हैं । जिन मन्त्रों में देवता बोधक लिङ्ग न हों, वे ' ऐन्द्र ' या ' माहेन्द्र ' होते हैं । यह दुर्गाचार्य का वचन तो fa के प्रधान होने से ' इषेत्वा ' आदि मन्त्र ' ऐन्द्र ' या ' माहेन्द्र ' हैं - यह द्योतित करता है । जिन मन्त्रों में देवताबोधक लिङ्ग का प्रकाशन नहीं है, उनके देवता निरूपणप्रसङ्ग में ' इषेत्वा ' आदि समस्त मन्त्रों के ' माहेन्द्र ' आदि ही देवता हैं, जिनके उद्देश्य से हविः प्रदान हुआ है - ऐसा बताया गया है । ' कुविदङ्ग ' आदि मन्त्र का विनियोग प्राजापत्यग्रहण में दुर्गाचार्य ने बताया है, अतः वहाँ प्रजापति देवता है । ' आमावास्या में पय ऐन्द्र या माहेन्द्र है ', अतः शेषभूत मन्त्र शाखाच्छेदन आदि में सान्नाय्यसंस्काररूप से विनियुक्त है । ' इषेत्वा ' आदि उस देवता के हैं ' -- यह स्कन्दवचन भी वही अभिप्राय रखता है । पुनश्च सान्नाय्य के संस्काररूप से उसके अङ्गभूत ' इषेत्वा ' आदि

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[ ५७ ] सभी मन्त्रों के माहेन्द्र आदि देवता होते हैं । इस कारण तत्तन्मन्त्रों की अपनी - अपनी देवताओं का अपलाप नहीं होता । अन्यथा ' अग्नि सर्वदेवरूप है ' । अतः जो मन्त्र या कर्म विशिष्टदेवतापरक नहीं हैं, उनकी देवता ' अग्नि ' है - ऐसे वचनों का आधार होनेपर भी मन्त्रों में देवताओं का अन्वेषण क्यों किया गया है? महर्षि कण्व ने तो प्रथम ही कहा है- " ऋषि, देवता और छन्द का विवरण आरम्भ करेंगे । यजुर्वेदस्थ मंत्रों के अक्षरों की नियम गणना न होने से कुछ मन्त्रों में छन्द नहीं हैं । उनके द्रष्टा ही उनके ऋषि हैं । उनके स्मरणकर्ता परमेष्ठी आदि देवताओं में अन्तर्भूत हैं । अग्नि आदि हविग्रहण करनेवाले तथा स्तुतिग्रहण करनेवाले हैं । " - ऐसा कह-कर अनस् शाखा उखा शमी उपवेश कपाल इध्म उलूखल आदि प्रतिमाभूत हैं ऐसा कहा है । अत: ' शाखा ' आदि को देवता कहने में कोई बाधा नहीं है । वहाँ गायत्री आदि छन्दों के विषय में कहा गया है कि इन सब को बिना जाने जो व्यक्ति अध्ययन, पाठ जप, हवन, यज्ञ, याजन, करता है, उसका ज्ञान निर्वीर्य ( बासी ) हो जाता है । तदनन्तर वह गर्त में गिर जाता है । स्थाणु ( ठूंठ ) बन जाता है । वह मृत्यु को प्राप्त कर पापयोनियों में जाता है । और जो इनका ज्ञान प्राप्त करके अध्ययन करता है, उसका ज्ञान, वीर्यवान् तथा अर्थ वेत्ता का ज्ञान वीर्यवत्तर होता है । जप, हवन, यज्ञ का फल उसे प्राप्त होता है । इस प्रकार के महत्त्व से परिपूर्ण ऋषि, देवता, आदि के ज्ञान की उपेक्षा नहीं की जा सकती और न ही उनका अपनी इच्छा से निर्धारण किया जा सकता है । ' प्राण ' आदि श्रुतियों में ईश्वर को मन और प्राण से रहित कहा गया है । प्रथमान्तरूप में पठित ' वायवः ' यह कर्तृ'पद ' स्थ ' इस क्रियापद से सम्बन्ध के कारण निराकांक्ष हो गया है । ' प्रापयतु ' इस सकर्मक क्रियापद के कर्म के रूप में ' व: ' यह पद है । मूल में ' यत् ' तत् ' के अभाव में भी ' वः ' ( तुम्हारे ) जो प्राण अन्तःकरण आदि हैं, उन्हें सविता श्रेष्ठतम कर्म के लिये प्रकृष्टरूप से अर्पित करे ' - ऐसी कल्पना करना भी स्वच्छन्दता ही कहलाएगी । ' आप्या-यध्वम् ' के स्थानपर ‘ आप्यायामहे ' व्याख्या करना भी निर्मूल ही है । द्वितीय व्याख्यान में यह असङ्गति है कि परमेश्वर ही परमेश्वर को कैसे सम्बोधित करता है? ' इन्द्र ' शब्द का अर्थ जब ऐश्वर्यवान् पुरुष है, तब वह ' ऐश्वर्य ' की प्रार्थना कैसे करेगा? मूल में ' यजमान ' शब्द, यज्ञकर्ता का बोधक है । अत: उसका ' जीवसामान्य ' अर्थ करना भी निराधार हो है । और भावार्थ तो दूर से भी मन्त्र के अक्षरों का स्पर्श भी नहीं कर रहा है । ' विश्वानि देव ' इत्यादि मन्त्र के व्याख्यान में ' ईश्वर के द्वारा जीवों के लिये तथा गुण - गुणिविज्ञान के उपदेश के लिये ऋग्वेद सभी पदार्थों की व्याख्या करके ' मनुष्यों को उनसे यथा तथा उपकार ग्रहण करने के लिये कैसे क्रियाएँ करनी चाहिये ' - यह यहाँ पर उपदिष्ट है, यह जो कहा है, वह भी निर्मूल ही है । क्योंकि ऋग्वेद पदार्थ वर्णन परक नहीं है । न्याय - वैशेषिक शास्त्रों के समान ऋग्वेद कोई पदार्थ वर्णन करनेवाला ग्रन्थ नहीं है । यदि वह पदार्थवर्णन करनेवाला ग्रन्थ होता तो स्वामी दयानन्दजी के द्वारा भी रूप से स्वीकृत किये गये गोतम आदि महर्षि उसी का व्याख्यान करते । पुनश्च आधुनिक वैज्ञानिकों के द्वारा पदार्थ और गुण- गुणभाव विवेचित हुए हैं, क्या स्वामी दयानन्दजी के भाष्य में उस उपयोग में आने योग्य विवेचन उपलब्ध है? अपनी उक्ति को प्रमाणित करने के लिये मूल में ' यजुभिर्वजन्ति ' और विवरण में ऋक से शंसन करते हैं, यजु से यजन करते हैं, साम स्तुति करते हैं - इत्यादि श्रुतिवाक्य उद्धृत किये हैं, परन्तु उनके दूसरे अर्थ हैं । अतः प्रस्तुत में वे साधक नहीं हो रहे हैं । ' वहाँ पर ' यजुभिर्यजन्ति ' A इस मन्त्र का ' यजुर्मन्त्रों ' से यज्ञ करते हैं - यही अर्थ है । स्वामी दयानन्दजी तो जिससे मनुष्य, ईश्वर तथा धार्मिक विद्वानों की पूजा करते हैं, समस्त विद्याओं को सङ्गति, शिल्प विद्याओं का सङ्गति करण, शुभविद्याओं का गुणदान, यथायोग्य सबके उपकार में, शुभव्यवहार में, तथा बिद्वानों में द्रव्यादि का व्यय करते हैं, वह ' यजु ' है ' – ऐसा कह रहे हैं । किन्तु यह भी अविचारितरमणीय है । क्योंकि ' यज् ' धातु के अर्थ के अनुसार विद्वानों की पूजा सङ्गतिकरण, और दान आदि में यजुर्मंन्त्र अकिञ्चित्कर हैं । बिना यजुमंन्त्रों के भी मनुष्यों की उनमें प्रवृत्ति होना सिद्ध है । ' ऋचाओं का शंसन करते हैं ' इत्यादि के द्वारा भी पदार्थों का गुण - गुणिवर्णन नहीं हुआ करता ।