वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 71–80
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 71–80
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[ ५८ ] अपितु देवताओं का शंसन स्तवन आदि करना ही उनका कार्य है । ' रूढियोंग मपहरति ' - रूढि, योग का अपहरण करती है - इस न्याय से परिभाषित यज्ञ में ही यजर्मन्त्रों का उपयोग होता है । ' यज्ञ ' का स्वरूप महर्षि कात्यायन ने बताया है - " यज्ञ का व्याख्यान करते हैं ", " द्रव्य, देवता, और त्याग ही यज्ञ है । " कर्काचार्य ने इसकी व्याख्या की है-' तद्धितप्रत्यय अथवा चतुर्थ्यन्त पद से द्रव्य के प्रति देवतात्व प्रकट होता है । उस द्रव्य की देवता के प्रति जो उत्सर्ग-क्रिया होती है, वही ' याग ' पदार्थ है । ' यज्ञ ' शब्द भी उसी अर्थ में प्रसिद्ध है । इस रूप में प्रसिद्ध ' याग ' जिन का कर्मों ही यजु- का मन्त्रों के द्वारा अनुष्ठान होता है । दर्श- पूर्णमासाभ्यां यजेत् ' इत्यादि विधिवाक्यों के द्वारा विधिभाग में विधान है उन्हीं में ' यजु ' आदि का उपयोग होता है । जैमिनिमहर्षिप्रणोत द्वादशाध्यायी मीमांसा में भी उसी ' यज्ञ ' का विचार हुआ है । वहीं पर यथास्थान देवपूजा, सङ्गतिकरण आदि का भी समावेश है । महर्षि कात्यायन ने भी ' तिष्ठद्धोमा ' इत्यादि से याग और होम का भेद बताया है । खड़े होकर जिनमें होम होता है, वे ' तिष्ठद्धोम ' कहलाते हैं । वषट्कार के द्वारा जिनमें आहुति दी जाती हो उन्हें ' वषट्कार प्रदान ' कहते हैं । जिनमें ' याज्या ' और ' पुरोनुवाक्या ' का प्रयोग होता है, वे ' याग ' कहलाते हैं । सामान्य पूजा, दान आदि कर्मों में का तो ' वषट्कार ' पूर्वक होम होता नहीं है । उनमें ' याज्या, पुरोनुवाक्या ' का प्रयोग भी नहीं होता । ' होम ' नामक कर्म ' भी ' याग ' से भेद बताया गया है । जहाँ कर्ता के द्वारा बैठकर ही ' स्वाहाकार ' पूर्वक आहुति दी जाती है, जहाँ ' याज्या ' आदि का प्रयोग नहीं होता है और ' जुहोति ' पद से विहित होता है, उसे ' होम ' कहते हैं । ' हवि ' का अर्पण करने के लिये जो विहित कर्म है, उसे ' याज्या ' कहते हैं । देवता का अनुस्मरण करने के लिये ' अनुवाक्या ' होती है । ' ह्वयति ' ' पुरोनुवाक्या ' आदि श्रुति से उसका कथन किया जाता है । वस्तुतः मन्त्र में वक्ता ' ऋषि ' होता है । मन्त्र के बताई द्वारा है जो । कहा जाता है, वह ' देवता ' होती है । सर्वानुक्रमणीकार ने तो " इषेत्वा " इत्यादि मन्त्र की देवता ' शाखा ' उसका अनादर करना तो प्रमाद ही कहा जायगा । विनियोग से देवता का निर्णय करना दुर्गाचार्य की रीति से प्रदर्शित कर ही चुके हैं । यह जो कहना है कि ' सर्वानुक्रमणीकार ' के द्वारा प्रदर्शित ' देवतावाद ' तो आधुनिक है । किन्तु यह कथन अत्यन्त तुच्छ है । आधुनिक आङ्ग्ल पद्धति से तो आपकी ' शाकली संहिता ' आधुनिक होने से नहीं बच रही है । यह तो आपने कहा है कि " गुरु से तर्क से, शतपथ श्रुति से मन्त्रों के छन्द, ऋषि और देवताओं का कथन ही करता हूँ ” – इस प्रकार कहते हुए ' उव्वटाचार्य ने सर्वानुक्रमणी की अवहेलना की है - यह कथन सर्वथा उपेक्षणीय है | श्लोक में प्रयुक्त ' च ' शब्द से सर्वानुक्रमणी का भी बोध हो रहा है । यह जो आपने कहा है कि " स्थावर होने के कारण उनको ' देवता ' कहना उचित नहीं है " - किन्तु यह कथन भी भ्रमपूर्ण ही है, क्योंकि ' देवता ' तो अधिष्ठात्री दया- हुआ करती है । उव्वाचार्य ने भी ' शाखा ' को ही देवता होना बताया है । ' शाखा आदि तो उसकी प्रतीक हैं । स्वामी नन्द जी ने तो निरुक्त, दुर्गाचार्य आदि के द्वारा प्रदर्शित रीति से हविर्देवता के अनुरोध से भी इषेत्वा ' आदि की ' शाखा ' ' देवता न बताकर स्वयं अपनी कल्पना से ' सविता को देवता कह दिया है । किन्तु ' इषेत्वा ' आदि मन्त्र से ' सविता ACT कोई सम्बन्ध ही नहीं है । जो यह कहा गया है कि " नवो नवो भवति ' इस मन्त्र का सर्वानुक्रमणीकार ने ' चन्द्रमा ' देवता कहा है । और यास्क ने " आदित्य " देवतावाला दूसरा पाद बताया है । तथा ' प्रवर्धयते ' में ' चन्द्रमा ' देवता कहा है ।'- किन्तु सब आखों में धूल झोंकनामात्र है । यहाँपर यास्क ने यथा ने यथाकथञ्चित् ' पूर्वापरं चरतो ' इस द्वितीय पाद का ही ' आदित्य ' को देवता बताया है, न कि सम्पूर्ण मन्त्र के विषय में यह बात कही है । सर्वानुक्रमणीकार तो समस्त मन्त्र के अभिप्राय से ' चन्द्र ' को देवता कह रहे हैं । ऐसी स्थिति में विरोध कहाँ है? आश्वलायन आदि श्रौतसूत्रों के उदाहरणों को प्रदर्शित कर जो एक मन्त्र के अनेक विनियोग दिखाकर होता है विरोध । उस का उद्भावन किया है, वह उपेक्षणीय है 1 । विनियोग का भेद तो ब्राह्मणवाक्य तथा आर्षवाक्यों से प्राप्त
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[ ५६ ] स्थिति में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती है । अतएव आश्वलायन श्रौतसूत्र तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में यह मन्त्र ' चान्द्र-मस ' चरु ' में विनियुक्त हुआ है । तैत्तिरीय बौधायनादि सूत्रों में आदित्य देवतावाले चरु में ' यः पापयक्ष्मगृहीत: ' इस मन्त्र का विनियोग बताया है । मैत्रायणी संहिता में यह मन्त्र,, वैश्वदेव चरु में विनियुक्त है । ये विनियोग प्रामाणिक है । इस प्रकार के अनेक प्रामाणिक विनियोग होने से एक ही मन्त्र के भिन्न - भिन्न देवताओं के होने में कोई विरोध नहीं है । और्णनाभ के मत से इस मन्त्र के देवता अश्विनी हैं । मन्त्र के पद ही देवता हैं, उनके अर्थ, देवता नहीं हैं । इत्यादि कथन में भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि ऋषियों के मतभेद से ' विनियोग, देवता आदि में भी भेद हो जाता है । ' बृहद्द ेवता, सर्वानुक्रमणी आदि से उनका समन्वय संभव हो जाता है । क्योंकि ' सर्वानुक्रमणी ' और ' बृहद्देवता ' का देवतावाद प्रामाणिक है । उसका आज तक कोई बाधक नहीं हुआ है | आर्षग्रन्थों में समन्वय ही अभीष्ट होता है । श्रोत-fafa योग के बल से " ऐन्द्रया ' इस ऐन्द्री ऋचा के ' कदाचन ' इस मन्त्र का ' गार्हपत्य ' के उपस्थान में विनियोग होता है । प्रमाणबल से तदनकूल अर्थ भी लिया जाने योग्य है । ऐश्वर्य के योग से गार्हपत्याग्नि भी ' इन्द्र ' पद से सम्बोधित है । स्मार्त विनियोग के कारण ' शन्नोदेवी " इस मन्त्र का ' शनि ' पूजा में भी विनियोग होता है । विभिन्न प्रामाणिक ग्रन्थों और ऋषियों के परस्पर मतभेद होने पर अथवा एक ही प्रामाणिक ग्रन्थ में ऋषियों के मतभेद रहने पर सभी की आदरणीयता होती है । इसीलिये ' प्रसुष्टुति " इस ऋचा में ' शाकपूणि ' ने ' इलस्पति ' को देवता कहा ' गालव ऋषि ' ने ' पर्जन्याग्नि ' को, यास्क महर्षि ' ने ' पूषा ' को और ' शौनक ऋषि ' ने ' इन्द्र ' को तथा ' भागुरि ' ने ' वैश्वानर ' को देवता बताया है । ऋषियों के ' कथन भी विरुद्ध नहीं हैं, क्योंकि समानबल होनेपर विकल्प संभव हो जाता है । इसका यह तात्पर्य नहीं है कि केवल कोई व्याख्याता, जो ऋषि नहीं है वह भी देवता या विनियोग की कल्पना करने लग जाय । मन्त्रार्थ दृष्टि के भेद से स्वामी दयानन्दोक्त देवताओं के समर्थन में ' उच्चाक्यैः ' आदि जो प्रमाण के रूप में दिया जाता है, वह व्यर्थ है, क्योंकि वहाँपर मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की ' उच्चाक्यदृष्टि ' कही गई है । स्वामी दयानन्दजी कोई मन्त्रद्रष्टा 1 ऋषि नहीं हैं । निरुक्त के परावर ज्ञाताओं में अधिक विद्यावान् प्रशस्त होता है ' - इस कथन से स्वामी दयानन्दजी के परा-बरज्ञ होने के कारण उनकी ' देवताकल्पना ' का समर्थन, जो समाजी लोग करते हैं, वह भी कुश- काशावलम्बन के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । क्योंकि आशय को बिना समझ े ही यह कहा गया है । उक्त वचन के द्वारा ऋषि के अति-रिक्त या तपस्वी के अतिरिक्त किमी पुरुष का देवता आदि के निर्धारण में स्वातन्त्र्य नहीं है । अपितु अनेक पारोवर्य'-वेत्ताओं में से अधिक विद्वान को प्रशस्त कहा गया है । इसपर दुर्गाचार्य की व्याख्या है - वहाँ पहिले यह कहा गया है कि मन्त्रार्थ के चिन्तन में प्रवीणता प्राप्त होनेपर भी श्रुति से भी केवल तर्क के आधार पर पृथक करके मन्त्रों की व्याख्या करनी चाहिये । ऋषि या तपस्वी के अतिरिक्त किसी पुरुष को मन्त्रों का प्रत्यक्ष नहीं है । इस मन्त्र में ' सविता देवता का निर्णय करने में श्रुति सहायक नहीं है, क्योंकि वैसा कहीं उल्लेख नहीं है । किश्व मन्त्र का व्याख्यान, प्रकरण के अनुरोध से ही होना चाहिये । जहाँ कहीं तर्क या बहुश्रुतता के आधार पर प्रकरण के बिना ही मन्त्रों का व्याख्यान नहीं किया जाता । मन्त्रों की व्याख्या प्रकरण के अनुसार ही होनी चाहिये । ये प्रकरण - यज्ञ, देवता, अध्यात्म, इति-हासानुप्रवेश हैं । यदि यह कहा जाय कि वेदाध्यायी विद्वान् प्रकरण भी जान सकता है, तो उसपर कहना यह है कि इन प्रक-रणों का प्रत्यक्ष ऋषि से भिन्न या तपस्वी से भिन्न किसी अन्य पुरुष को नहीं हुआ करता । जो उपदेश प्राप्त करनेवाले हैं उनके प्रति यह कथन है कि उन परावरज्ञ अर्थात् मन्त्रार्थों के पर- अवरभाव को जाननेवालों में अधिक विद्याभ्यासी तथा बहुश्रुत पुरुष मन्त्रार्थ के ज्ञान में प्रशस्त माना गया है । आधुनिक स्वामी दयानन्द आदि ऋषि नहीं हैं । यह बात भी वहीं के पर्यालोचन से ज्ञात होती है । ऋषियों ने उत्क्रमण करते हुए देवताओं से पूछा कि ' हमारा ऋषि कौन होगा? तब देवताओं कहा कि ' तुम्हारा ऋषि तक होगा । मन्त्रार्थ की चिन्ता में ऊहापोह ही ' तर्क ' है । इससे स्पष्ट होता है कि सभी ' ऋषि ' नहीं होते हैं । ऋषियों से भिन्न सभी पुरुषों
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[ ६० ] को निरुक्त आदि आर्ष ग्रन्थों के आधार पर ही मन्त्रों के अर्थों का ज्ञान होना सम्भव होता है । दुर्गाचार्य ने कहा है कि निरुक्त शास्त्र में परिश्रम किये हुए जो विद्वान् हैं, वे मन्त्रार्थ के विषय में जो कुछ विचार करते हैं, उन्हें आर्ष कहते हैं । वे अपनी इच्छा के अनुसार स्वतन्त्ररूप से मन्त्रार्थ नहीं बताया करते हैं । इतना ही नहीं, महर्षि यास्क ने निरुक्त विद्या का भी ' तप के द्वारा ' पर ' की अभिलाषा करनी चाहिये ' - कहा है । ' अपनी आयु की इच्छा रखनेवाले को मनमाना निर्वचन नहीं करना चाहिये ' - यह भी उन्होंने कहा है ॥ १ ॥
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[ ६१ ] वसो॑ प॒वित्र॑मसि॒ यो॑र॑सि पृथि॒व्य॒सि मात॒रिश्व॑नो घ॒र्मोऽसि वि॒श्वधा E-असि । परमेण धाम्ना दृद्ध् हस्व मा ह्वार्मा ते यज्ञपतिर्द्धापित् ॥२ ॥
- ( वा ० सं ० १२ ) १ – “ वसोः पवित्रमिति पवित्रमस्यां बध्नाति कुशी ' ( का ० श्री ० सू ० ४।२।१५ ) ' त्रिवृद्वा ' ( का ० श्रौ ० सू०-४।२।१६ ) अस्यां शाखायां कुशावेव पवित्र बध्नीयात् । इति प्रथमसूत्रार्थः । द्वौ कुशौ कुशत्रय ं वा पवित्रमुच्यते । अथवा त्रिवृत् = त्रीणि दर्भतृणान्येव पवित्रं शाखायां बध्नीयात् । इति द्वितीय सूत्रार्थः । एतत्पवित्रबन्धन शाखोपगूहनात् पूर्व-मेव कार्यम् । पाठक्रमादार्थक्रमो बलीयानिति न्यायात् । वसोः वासयति वृष्ट्यादिद्वारा स्थापयति विश्वमिति वसुर्यज्ञः । ' यज्ञो वै वसु: ' ( श ० १/७/१14 ) इति श्रुतेः । तस्य । यज्ञशब्देन तदीयहविद्र व्यरूपं सानाय्य लक्ष्यते । हे दर्भमय पवित्र वसोः इन्द्रदेवताया निवासहेतोः पयसः शोधकं पवित्र त्वमसि । अनेन मन्त्रेण पवित्रं निर्माय पर्णशाखायां बध्नीयात् । २ - प्रोक्त ' ' द्यौरसीति स्थाल्यादानम् ' ( का ० श्री ० सू ० ४।२।१६ ) वत्सं संसृज्य ' उपसृष्टा ' इति दोग्ध्रा प्रोक्त अध्वर्युः द्योरसोति मन्त्रेण स्थाल्यादानं कुर्यात् इति सूत्रार्थः । यस्यां स्थाल्यां क्षीरं प्रक्ष ेप्तव्यं तद्ग्रहणा-र्थोऽय ं मन्त्रः । द्यौरसि । स्थाल मृज्जलाभ्यां निष्पन्ना त्वं द्यौरसि जलहेतुवृष्टिप्रदद्य लोकरूपासि । द्य सम्बन्धात् तद्रू -पत्वमस्यामुपचर्यते । तथा पृथिव्यसि पृथिव्याः सकाशादुद्धृतया मृदा निष्पन्नत्वात् त्वं पृथिवीरूपासि । ' मातरिश्वन इत्याधिश्रयति ' ( का ० श्री ० सू ० ४।२।२० ) मातरिश्वन इति मन्त्रेण गार्हपत्यादुदीचोऽङ्गारान्नि-रुह्य तेषूखामधिश्रयेदिति सूत्रार्थः । हे उखे त्वं मातरिश्वनः मातरि अन्तरिक्ष पूर्वयति गच्छति वर्धते वेति मातरिश्वा वायुः, तस्य । अथवा मातरि अन्तरिक्ष श्वसिति चेष्टते इति मातरिश्वा वायुः । तस्य । छान्दसो न कारः । धर्मः जिघर्तीति धर्म: दीपकः । घृक्ष रणदीस्योः ) सञ्चारस्थानप्रदानेन वायोर्दीपक: अभिव्यञ्जकः अन्तरिक्षलोकरूपासि । यतो हि तवोदरेऽपि अन्तरि-क्षरूपस्य अवकाशस्य सद्भावः । उखायाः लोकत्रयरूपत्वात् त्वं विश्वधासि विश्व दधातीति विश्वधा: विश्वधारणसमर्थासि । १ - श्रौतसूत्र के अनुसार शाखा में पवित्र को बाँधना चाहिये । दो या तीन कुशों को ' पवित्र ' कहते हैं । यह पवित्र का बन्धन शाखोपगूहन से पूर्व करना चाहिये । क्योंकि पाठ क्रम की अपेक्षा आर्यक्रम बलवान् माना गया है । ' यज्ञो वै वसुः ' श्रुति के अनुसार ' वसु ' शब्द का ' यज्ञ ' अर्थ है, और लक्ष्यार्थं ' सान्नाय्य हविद्रव्य ' है । उस दर्भमय पवित्र से निवेदन किया जा रहा है कि इन्द्रदेवता के निवासहेतुभूत पयस् ( दूध ) के शोधक तुम हो । इस प्रकार ' वसोः पवित्र-मसि ' मन्त्र कहकर पवित्र का निर्माण करे और पर्णशाखा में उसे बाँध I २ - तदनन्तर दोग्धा के कहनेपर ' द्यौरसि ' मन्त्र से ' स्थाली ' का ग्रहण करे । और उससे कहे कि हे स्थालि!
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। ६२ । यतः एवंरूपा अतः त्वं परमेण उत्तमेन धाम्ना बहुक्षीरधारणसामर्थ्य रूपेण तेजसा हस्व दृढाभव । त्व-निष्ठस्य क्षोरस्य गलनं वारयितुमिति शेषः । अन्यथा भग्नायास्तव छिद्र ेण क्षीर गलेत् । यद्यपि धातुपाठे वृद्धय-र्थोऽय ं स्मर्यं ते तथापि दाढये सति भङ्गाभावेन चिरमवस्थानात् दाढ नाम स्थितौ कालवृद्धिरेव । ३ - किश्व हे उखे त्वं मा ह्वाः कुटिला मा भव । यद्युरवा कुटिला तिरश्चीना स्यात् तदापि तस्याः सकाशात् क्षीरं गलेत् । अतः क्षीरधारणाय दाढर्य मकौटिल्यमर्थ्यते । किञ्च ते यज्ञपतिः त्वत्सम्बन्धी यजमानः मा ह्वार्षीत् । त्वन्निष्ठक्षी रस्कन्दनेन अनुष्ठानविघ्न एव यजमानस्य कौटिल्यम् । तच्च त्वदीयेन दाढयेन कौटिल्याभावेन च न भविष्यतीति प्रार्थ्यते । ' त्रयो घर्मा अग्निवायुसूर्य देवत्या: । ' साधवे त्वेति । अयं वै साधुर्योऽयं पवते ' ( श ० १४।१।२।२३ ) इति श्रुतेः अयं मध्यमो धर्मः स त्वमसि । यतश्च त्वं वायुरतः विश्वधा असि सर्वस्य धारयिता भवसि । किश्व परमेण धाम्ना हस्व । धामानि त्रीणि भवन्तिःस्थानानि नामानि जन्मानि च । अतः उत्कृष्टेन नाम्नाभिहिता सती धर्मोसीत्यादि-नेत्यर्थः । आत्मानं दृढीकुरुष्वेति उच्चटाचार्यः । [ अत्र ब्राह्मणम् -- ' तस्यां पवित्रं करोति । वसोः पवित्रमसीति यज्ञो वै वसुस्तस्मादाह वसोः पवित्रमसीति ' ( To 1191912 ) 1 इदानीं दोहनार्थं शाखायां समन्त्रकं पवित्रवन्धनं विधत्ते तस्यां पवित्रमिति । दोहनार्थं तस्यां शाखायां पवित्रं कुशद्वयात्मकं त्रिवृतं करोति बन्धीयात् । तथा च सूत्रम् - वसोः पवित्रमिति पवित्र मस्यां बध्नाति कुशौ ' ( का ० 4 श्री ० सू ० ४।२।१५ ) ' त्रिवृद्वा ' ( का ० श्री ० सू ० ४।२।१६ ) इति । ‘ अथोखामादत्ते । द्यौरसि पृथिव्य सीत्युपस्तौत्येवैनामेतन्महयत्येव यदाह द्यौरसि पृथिव्यसीति मातरिश्वनो घर्मोऽसीति यज्ञमेवैतत्करोति यथा घर्मं प्रवृञ्जयादेव प्रवृणक्ति विश्वधा असि परमेण धाम्ना ह ँ, हस्व माह्वारिति ७, हत्येवैनामेतदशिथिलां करोति मा ते यज्ञपतिर्द्धार्षीदिति यजमानो वै यज्ञपतिस्तद्यजमानायैवैतदह्वलामाशास्ते । ' ( श ० १।७।१।११ ) । अत्र सायणः - अध्वर्योः समन्त्रकं स्थाल्यादानं विधत्ते अथोरवामिति । उखायाः द्युपृथिव्यात्मकत्वस्य कदा-चिदप्यसम्भवात् उपस्तुतिमात्रमिदमित्याह - उपस्तौत्येवेति । सापि किमर्थेत्यत आह - महयत्येवेति । स्तुत्या पूजनं लोके द्ध । अमन्त्रमाह - मातरिश्वन इति । मातरि अन्तरिक्षे श्वयतीति मातरिश्वा । वायुरादित्यो वा ( नि ० ७।२६ ) । तस्य धर्मस्त्वमसि । तेन दीप्यमानत्वात् एतत्पाठेन यज्ञमेव कृतवान् भवति । तदुपपादयति - यथेति । यज्ञ ' ७ मृत्तिका और जल से निष्पन्न हुई तुम ' द्युलोकस्वरूप ' हो । अर्थात् जलहेतुभूत वृष्टिप्रदायक द्यलोकरूप हो । और पृथ्वी से निकाली गई मृत्तिका से निष्पन्न होने के कारण तुम पृथ्वीस्वरूप हो । ' मातरिश्वा ' शब्द का अर्थ वायु है । ' धर्म ' शब्द का अर्थ, दीपक है । अत: हे उखे! तुम वायु को सञ्चार करने के लिये स्थान प्रदान करने के कारण उसके दीपक हो अर्थात् अन्तरिक्ष लोकस्वरूप हो, क्योंकि तुम्हारे उदर में अन्तरिक्षरूप अवकाश का सद्भाव है । तुम लोकत्रय होने के कारण सम्पूर्ण विश्व को धारण करने में समर्थ हो । ऐसी तुम, विपुल क्षीर धारणसामर्थ्य रूप अपने तेज से सुदृढ़ हो जाओ । जिससे तुम्हारे भीतर स्थित क्षीर नीचे टपक न जाय । ३ – किश्व हे उखे! तुम तिरछी भी मत होना, अन्यथा क्षीर नीचे गिर जायगा । तव यजमान के यज्ञानुष्ठान far ( कौटिल्य ) होगा । किन्तु जब तुम दृढ़ ( ठीक - ठीक ) रहोगी तो दूध के न गिरवाने से उसके अनुष्ठान में
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[ ६३ ] यथा घर्मं प्रवर्ग्यं प्रवृञ्जयात् एवं स्थात्यधिश्रयणेन प्रवृणक्ति प्रवर्ग्यं कृतवान् भवति । ह्वला नाशः, तदभावमाशास्ते मा ह्वार्षीदित्यनेन I । शेषं स्पष्टम् । ४ - अध्यात्मपक्ष - हे बुद्धे त्वं वसोः सर्वत्रैव निवसतः सर्वाधिष्ठानस्य सर्वात्मनः पवित्रं निष्कलुषमाविर्भाव-स्थलमसि । त्वमेव रूपा पृथिवीरूपा चासि । हार्दाकाशे भगवदाविर्भावात् । ध्यानादिना तत्रैव प्राकट्यविस्ताराच्च । त्वमेव च मातरिश्वनो घर्मोऽसि । ' प्राणबन्धन हि सौम्य मनः ' ( छा ० उ ० ६८२ ) इति छान्दोग्यश्रुतेः । त्वं परमेण धाम्ना तेजसा दधाति स्वं रूपमिति धाम | परमात्मस्वरूपाविर्भावेण दृ हस्व स्थिराभव । मा ह्वाः कुटिला मा भव काम-क्रोध लोभमोहमदमात्सर्यादीनां कृते अवसर मा दा: । तथाविधां त्वां यज्ञपति: पालको विष्णुर्माह्वार्षीत् त्वत्तः प्रकटित-स्वरूपलोपं मा कार्षीत् । सर्वदा प्रस्फुरेत् । अथवा यज्ञपतिर्यजमानः ध्याता जोवः त्वयि प्रकटस्य भगवत्स्वरूपस्य व्यापा-रान्तरेण लोपको माभूत् । ५- स्वामिदयानन्दस्तु - ' हे विद्वन्मनुष्य यो वसोः वसुरयं यज्ञः अत्र अर्थात् विभक्त विपरिणाम:, इति प्रथमा-विभक्तिविपरिणम्यते । पवित्रम् पुनाति येन कर्मणा तत् । असि भवति । द्यौः विज्ञानप्रकाशहेतुः । असि भवति । पृथिवी विस्तृतः । असि भवति । मातरिश्वनः मातरि अन्तरिक्ष श्वसिति आश्वानिति वा तस्य वायोः । धर्मः अग्नितापयुक्तः सुख-शोधकः । घर्म इति यज्ञनामसु पठितम् ( निघ ० ३।१७ ) असि भवति । विश्व धा असि । विश्वं दधातीति संसारस्य धारको भवति । परमेण प्रकृष्टसुखयुक्तेन । धाम्ना सुखानि यत्र दधति तेन । बाहुलकात् डुधाञ धातोर्मनिन प्रत्ययः । हस्व वर्धते । अत्र पुरुषव्यत्ययो लडथें लोट् च । मा निषेधार्थे । ह्वाः ह्वरतु । अत्र लोडर्थे लुङ । मा निषेधार्थे । ते तव -यज्ञपतिः यज्ञस्य स्वामी यज्ञकर्ता यजमानः । ह्वार्षीत् ह्ररतु ह्ररवेति तत्तुच्छम् । श्रुतिसूत्रविरोधात् । विपरिणामबाहु-ल्यात्, व्यर्थ विशेषणाश्च । परमेणेति पदस्य प्रकृष्टसुखयुक्त नेति कथङ्कारमर्थः? यद्येष एवार्थ उररीक्रियते तर्हि धाम्नेति- तु सूर्य-• पदे सुखानि यत्र तोति व्याख्याने सुखानीति पदं व्यर्थमेव । द्यौः शब्दस्य विज्ञानप्रकाशहेतुः कथमर्थः? अन्वये रश्मिस्थ इत्यर्थः कृतः । कतरोऽर्थः साधीयान्? यज्ञः परमेण धाम्ना सह वर्धते । यः यज्ञः सुखंधारकेण धाम्ना वर्धते कथ-ङ्कार ं कश्चन सचेताः तं त्युक्त ं प्रभुः स्यात्? इति मा त्यजेत्युपदेशोऽप्यपार्थक एव । अत्र यज्ञस्वरूपप्रतिपादनमपेक्षित-कोई विघ्नबाधा नहीं होगी । इसी अभिप्राय को शतपथ ब्राह्मण ने भी अच्छी तरह से स्पष्ट किया है, जिसे सायणाचार्य और भी अधिक सरलता से बताया है । ४ - अध्यात्मपक्ष में प्रस्तुत मन्त्र का अर्थ इस प्रकार होगा - हे बुद्धे! तुम ही सर्वव्यापक सर्वाधिष्ठानभूत सर्वात्मा के आविर्भाव का पवित्र स्थान हो । हृदयाकाश में भगवान् का आविर्भाव होने से तुम ही रूप और के पृथिवी लिये -: रूप हो । परमात्म स्वरूप के आविर्भावार्थ तुम स्थिर रहो । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सरादि दोषों और ध्याता अवसर मत देना । तब यज्ञपति भगवान् विष्णु तुम में सर्वदा प्रस्फुरित होते रहेंगे । अथवा यज्ञपति यजमान जीव तुम में प्रकट हुए भगवत्स्वरूप का किसी अन्य व्यापार से लोप न कर सकें । ५ - स्वामी दयानन्द जी प्रस्तुत मन्त्र का अर्थ इस प्रकार करते हैं- " हे विद्वन्मनुष्य! अर्थात् मन्त्र में प्रयुक्त ' वसो: ' इस षष्ठयन्त पद को वे सम्बोधन का रूप समझ रहे हैं । किन्तु मन्त्र में ' वसोः ' पद सम्बुद्धयन्त नहीं है । ' वसोः ’ इसकी षष्ठी का ' वसुः ' यह प्रथमा विभक्ति में विपरिणाम कर दिया है । ' ह ' हस्व ' पद, मन्त्र में है, जो लोट् लकार अर्थ, मध्यम पुरुष, एक वचन का है, किन्तु यहाँ पर भी पुरुषव्यत्यय करके ' वर्धते अर्थ कर रहे हैं । और स्वेच्छानुसार तथा कर दिया है । किन्तु वह अर्थ, श्रुति और सूत्र के विरुद्ध होने से अप्रामाणिक है । इस प्रकार के अर्थ में विपरिणाम व्यर्थ विशेषणादि दोष हो गये हैं । ' द्यौः ' शब्द का अर्थ, ' विज्ञानप्रकाशहेतु ' बता रहे हैं । किन्तु अन्वय प्रदर्शन होंगे में, उनके ' सूर्य-रश्मिस्थः ' अर्थ कर रहे हैं । उक्त दो अर्थों में से कौन - सा अर्थ, ठीक है? उसे स्वामी दयानन्दजी ही जानते उस पाठक की समझ के बाहर की बात है । ' मा त्यज ' यह उपदेश करना भी व्यर्थ है । कौन ऐसा विवेकी उसकी होगा तो जो स्वामी यक्ष का त्याग करेगा । यज्ञ का स्वरूप, उसकी इति कर्तव्यता का प्रतिपादन इत्यादि जो अपेक्षित है,
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[ ६४ ] मासीत् । तत्र साधनमितिकर्त्तव्यता च वर्णनीयासीत् तदुपेक्ष्य कामकारतया यत्किञ्चित् व्याख्यायते इति प्रज्ञावतो हेयत्वात्र स्यात् । हे विद्वन्मनुष्येति सम्बुद्ध: मन्त्रे अभावाच्च । ( वा ० सं ० १।२ ) । वसः प॒वित्र॑मसि शतधारं वसोः प॒वित्रमसि स॒हस्रधारम् । दे॒वस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण वसोः पवित्रेण शतधारेण सुष्वा कामधुक्षः ॥ ३ ॥
॥ ॥ ( वा ० सं ० १1३ ) १ – ' वसोः पवित्रमिति पवित्रमस्यां करोत्युदग्वा ' ( का ० श्रो ० सू ० ४।२।२१ ) अध्वर्यु: स्थाल्या उपरि शाखा-पवित्रमुदगग्र ं प्रागग्र ं वा स्थापयेत् इति सूत्रार्थः । अस्यामुखायां स्थापनीयस्य पवित्रस्य प्रागग्रत्वं सामान्यतः प्राप्तमिति सिद्धवत्कृत्वोदगग्रत्वं विकल्प्यते । हे शाखापवित्र त्वं बसो: इन्द्रदेवतानिवासहेतोः पयसः पवित्रं शोधकम् असि । क्षीरेण सह स्थाल्यां पततां तृण-पर्णादीनां पवित्रेण व्यवधाने सति प्रतिबध्यमानत्वात् पवित्रस्य क्षीरशोधकत्वम् । कथंभूतं पवित्रम्? शतधारम् शतं धारा यस्मिंस्तत् तथोक्तम् । तथा सहस्रधारम् सहस्र धारा यस्मिंस्तत् तथोक्तम् । पवित्रच्छिद्र: स्थाल्यां पतन्तीनाम् क्षीर-धाराणाम् शतसहस्रसंख्याकानाम् सद्भावात् शोधकत्वमाहतुम् वसोः पवित्रमिति द्विरुक्तिः । ' अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते ' ( नि ० १०/४२ ) इति निरुक्तवचनात् । शब्दाभ्यासे यत्रान्यविशेषो नास्ति तत्रैवं विशेषमाचार्या मन्त्रार्थतत्त्वविदो मन्यन्ते यदुतार्थभूयस्त्वमिति भगवान् दुर्गः । अथवा अर्थभूयस्त्वात् अनन्तधारमर्थः । ' स्थात्यन्वारब्धे देवस्त्वेत्यासिच्यमाने जपति ' ( का ० श्रो ० सू ० ४।२।२३ ) स्थालीमन्वारब्धे यजमाने दोग्धा गां दुग्ध्वा स्थाल्यामासिच्यमाने पयसि धृतशाखापवित्रोऽध्वर्यु: देवस्त्वेति मन्त्रं पठेत् इति सूत्रार्थः । देवत्वेति पयोदेवता । दोहनादूर्ध्वं स्थाल्यामासिच्यमान हे क्षीर! सविता प्रेरको देवः त्वा त्वां पुनातु शोध-तु निर्दोषं करोतु । केन पवित्रेण । कथंभूतेन शतधारेण । पुनः कथंभूतेन पवित्रेण सुप्वा सुष्ठु पुनातीति सुपुतेन सुवा । ' इकोऽचि विभक्तौ ' ( पा ० सू ० ७।१।७३ ) इति नुमागमाभाव आर्षः । साधुपवनेन पवित्रेण । ' कामधुक्ष ' इति प्रश्न: ' ( का ० श्री ० सू ० ४।२।२४ ) कामधुक्ष इति दोग्धारं प्रति अध्वर्योः प्रश्नः । एकस्यां गवि दुग्धायां दोग्धारम् अध्वर्युः पृच्छेत् । हे दोग्धः क्विमात्रानां वह्नीनां गवां मध्ये त्वं कां गामधुक्षः दुग्धवानसि । अत्र ब्राह्मणम् —'वसोः पवित्रमसीति । यज्ञो वै वसुस्तस्मादाह वसोः पवित्रमसीति शतधा ७, सहस्रधार-मित्युपस्तीत्येवंर देतन्महयत्येव यदाह शतधार 25, सहस्रधारमिति । ( श ० १।७।१।१४ ) | स्पष्टार्थं ब्राह्मणम् । दयानन्दजी ने उपेक्षा करदी है और स्वेच्छानुसार अनावश्यक यत्किञ्चित् व्याख्या करते चले गये, जो विचारशील मनीष की दृष्टि से यकोटि की ही समझी जावेगी । १ – अध्वर्यु ' के द्वारा स्थाली पर उदगग्र अथवा प्रागग्र स्थापित किये हुए शाखा पवित्र से प्रार्थना की जा रही है - हे शाखपवित्र! तुम इन्द्रदेवता के निवास हेतुभूत पयस् ( दूध ) के शोधक हो । क्योंकि दूध के साथ ही स्थाली में गिरने वाले तृण - पर्ण आदि का वह ' पवित्र ', प्रतिबन्धक होने से उसे क्षीर का शोधक कहा गया है । पवित्र-
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[ ६५ ] ' तदानीं यजमानमभिमन्त्रयते । देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुवेति । ' ( श ० १।७।१।१६ ) । पयस आसेचनसमये अध्वर्योर्जयं विधत्ते - तदानीं यमानमिति । अभिमन्त्रणम् आभिमुख्येन जपः । शेषं स्पष्टार्थम् । २ - अध्यात्मपक्षे - हे बुद्ध त्वं वसोः सर्वत्र निवसतः परमात्मनः पवित्र प्राकट्य स्थानमसि यतः, अतः शत-धारम् स्वीयायां शतधारायां वृत्तौ सहस्रधारायां वा वृत्ती सर्वत्रेव परमात्मानमाविर्भावयितुं यत । सविता सर्व प्रेरक: देवः द्योतनात्मकः परमात्मा त्वा त्वां शतधारेण शतधा अरति गच्छति प्रादुर्भवतीति शतधारम् ( भावप्रधानो निर्देशः ) सहस्रधाविर्भावकारणेन पवित्रेण सुप्वा परमपावनेन परमशोभनेन च स्वस्वरूपेण पुनातु । उदीयमानासु बुद्ध ेः सर्वासु वृत्तिषु कामधुक्ष: कां स्वीयां वृत्ति भगवदाविर्भावेण प्रपूरितवत्यसि । ३ - स्वामिदयानन्दस्तु - ' वसोः, वसुर्यज्ञः । पवित्र शुद्धिकारकं कर्म । असि अस्ति । अत्र सर्वत्र पुरुषव्यत्ययः । शतधारम् शतं बहुविधमसंख्यातं विश्वं धरतीति तम् । शतमिति बहुनामसु पठितम् । ( निघ ० ३ | १ ) पवित्रम् शुद्धि. निमित्तम् । असि अस्ति । सहस्रधारम् सहस्र बहुविधं ब्रह्माण्डं धरतीति । तं यज्ञम् । सहस्रमिति बहुनामसु पठितम् । ( निघ ० ३।१ ) देवः स्वयंप्रकाशस्वरूपः परमेश्वरः । त्वा तं यज्ञम् । सविता सर्वेषां वसूनामग्निपृथिव्यादीनाम् त्रयस्त्रि-शतो देवानाम् प्रसविता । ' सविता वै देवानां प्रसविता ( श ० १।१।२।१७ ) पुनातु पवित्री करोतु । वसोः पूर्वोक्तो यज्ञः । पवित्रेण पवित्रतानिमित्तेन वेदविज्ञानकर्मणा । शतधारेण वहुविद्याधारकेण परमेश्वरेण वेदेन वा । सुप्वा सुप्ठुतया पुन पवित्रताहेतुर्वा तेन । काम् कां कां वाचम् । अधुक्ष: दोग्धुमिच्छ्सीति प्रश्नः । लडर्थे लुङिति, तदपि यत्किञ्चित्, अध्या-हारात्. असामञ्जस्यात् । श्रुतिसूत्रविरोधाच्च । यत्तदोरध्याहारे मूलाभावात् । वसुर्यज्ञः स्वयं शतधा शुद्धिकारकः । तमपि सविता देवः पुनातु इत्यसमञ्जसम् । अन्वयार्थे तु हे जगदीश्वर भवान् तेन अस्माभिरनुष्ठितेन यज्ञ ेन अस्मान् पुनातु इति, छिद्रों में से होकर स्थाली में गिरनेवाली सैंकड़ों - सहस्रों क्षीरधाराओं के होने से आजकल की चलनी ( छन्न ) की तरह वह क्षीरशोधन का काम करता है । यहाँ ' शत ' ' सहस्र ' का अर्थ अनेक या अनन्त है । दोहन के बाद स्थाली में रहनेवाले हे क्षीर! प्रेरक सविता देव तुम्हें दोषरहित करे । एक गौ के दुहनेपर अध्वर्यु ', देग्धा से ' कामधुक्ष: ' यह प्रश्न करता है, क्योंकि गोशाला में गौएँ अनेक हैं, उनमें से किस गौ को तुमने दोहा है? २ - अध्यात्मपक्ष में- हे बुद्ध! तुम सर्वव्यापक परमात्मा के प्रकट होने के लिये पवित्र स्थान हो । अतः अपनी सैंकड़ों, अथवा हजारों वृत्तियों में अर्थात् सर्वत्र ही उसे आविर्भूत करने का प्रयत्न करो । सर्वप्रेरक परमात्मा शतधा सहस्रधा प्रकार से प्रकट होनेवाले अपने परमपावन और परम सुन्दर स्वरूप से तुम्हें पवित्र करे । उदीयमान होनेवाली अपनी समस्त वृत्तियों में से किस वृत्ति को भगवदाविर्भाव से तुमने पूरित किया है । ३ – स्वामी दयानन्दजी ने इस मन्त्र का अर्थ करते हुए सर्वत्र पुरुष व्यत्यय किया है, जो शास्त्रदृष्ट्या अनु-चित है । ' वसो: ' इस षष्ठ्यन्त पद का अर्थ, प्रथमान्त पद के रूप में पवित्र शुद्धिकारक कर्म ' करते हैं । यज्ञ, असंख्यात विश्व को धारण करता है, वह शुद्धि क । निमित्त है । सहस्र अर्थात् बहुविध ब्रह्माण्ड को धारण करनेवाले उस यज्ञ को वसु, अग्नि, पृथिवी आदि तैंतीस देवताओं का प्रसविता देव, पवित्र करे । ' वसोः अर्थात् पूर्वोक्त यज्ञ, पवित्रता के निमित्तभूत वेदविज्ञानरूप कर्म से अथवा परमेश्वर से या वेद से किस किस वाणी को दोहना चाहते हो? यह प्रश्न किया गया है । ' किन्तु उनका यह अर्थ भी अकिञ्चित्कर है । क्योंकि इस प्रकार का अर्थ अध्याहार आदि के द्वारा बड़ी खींच-तान से उन्होंने किया है । इस अर्थ में कोई सामञ्जस्य नहीं है, और श्रुति के साथ तथा सूत्र के साथ विरोध भी है । यत् - तत् का अध्याहार भी निर्मूल ही है । जो यज्ञ, शतधा शुद्धिकारक है, उसे भी सविता देव पवित्र करे - इस प्रकार अर्थ करने में कोई सामञ्जस्य ही नहीं है । अन्वयार्थ करते समय तो यह बता रहे हैं कि ' हे जगदीश्वर! आप हमारे द्वारा अनुष्ठित किये गये यज्ञ से हमें पवित्र करें । और भावार्थ करते समय कह रहे हैं कि ' जो मनुष्य पूर्वोक्त यज्ञ को
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[ ६६ ] भावार्थे तु ये मनुष्याः पूर्वोक्तं यज्ञमनुष्ठाय पवित्रा भवन्ति एतेभ्यो बहुविधं सुखं ददाति ये क्रियावन्तः परोपकारिणः सन्तिः सुखमाप्नुवन्ति नेतरे इति । हे विद्वन् जिज्ञासो इत्यादीनामर्थानां मन्त्र अभावात् । श्रुतिसूत्रविरोधस्तु. स्फुट एव || ( वा ० सं ० १३ ) । “ सा विश्वायुः सा विश्वकर्मासा विश्वधायाः । इन्द्रस्य त्वा भाग | सोमे॒नात॑न॒च्छ॒ विष्णो॑ ह॒व्य ॐ रक्ष ॥ ४ ॥ ’
( वा ० सं ० १४ ) १ – ' प्रोक्त ' सा विश्वायुरित्याह ' ( का ० श्रौ ० सू ० ४।२।२५ ) दोग्ध्रा अमूम् गङ्गामिति वा गोनाम्नि प्रोक्त अध्वर्यु ': ' सा विश्वायुरिति मन्त्र ं ब्रूयात् । इति सूत्रार्थः । ' एवमितरे उत्तराभ्यां प्रतिमन्त्रम् ' ( का ० श्री ० सू ० ४।२।२६ ) अनेनैव प्रकारेण गां धुक्ष्वेत्यादिना इतरे द्वे गावौ अध्वर्युः उत्तराभ्यां सा विश्वकर्मा, सा विश्वधायाः इति मन्त्राभ्यां प्रतिमन्त्रमेकैकां गामभिदधत् दोहयेत् इति सूत्रार्थः । या गौस्त्वया दुग्धा मया च पृष्टा सा विश्यायुः शब्दाभिधेया । विश्वायुः विश्वमायुर्यस्याः सा । यजमानस्य पुरुषायुषमायुः प्रयच्छतीत्यर्थः । यथा प्रथमा गौः पृष्टा एवमितरे द्वितीयतृतीये गावौ तद्दोहनादूर्ध्वं कामधुक्ष इति मन्त्रेण प्रष्टव्ये । दोग्ध्रा सूत्त-मिति प्रोक्ता विश्वकर्मा सा विश्वधायाः इति मन्त्राभ्यां क्रमेण तयोराशिषं ब्रूयादध्वर्युः । या द्वितीया गौस्त्वया दुग्धा मया च पृष्टा सा विश्वकर्मा, या तृतीया गोस्त्वया दुग्धा मया च पृष्टा सा विश्वधायाः । विश्वस्य जगतः कर्मा कर्त्री, विश्वधायाः विश्वान् सर्वान् देवान् धापयति क्षीरदध्यादिहविर्यानेन पुष्णातीति पाययतीति वा विश्वधायाः । धयतेणिजन्तस्य असुनि प्रत्यये रूपम् । यज्ञादेव सर्वाः प्रजाः प्रजायन्ते । तस्य गोषूपचारः । ‘ उद्वास्यातनक्ति प्राग्घुतशेषेणेन्द्रस्य त्वेति ' ( का ० श्रौ ० सू ० ४।२।३३ ) । २ - अध्वर्युः पयः श्रपयित्वा उद्वास्य प्राक् पूर्वं चतुर्दश्यां सायं हृतशेषेण दधिभावमापादितेन आतनक्ति कठि-नभवनार्थम् । अर्थात् दधित्वसम्पत्त्यर्थं दुग्धमध्ये दधिप्रक्षिपतीत्यर्थः । इन्द्रस्य त्वेति मन्त्रे गेति सूत्रार्थः । आतनच्मि । क्वथितं क्षीरमग्नेरुद्वास्य मन्दोष्णे तत्र प्रातःकालिकहोमावशिष्टेन दध्ना तत्र दधिनिष्पत्तये अनुष्ठान करके पवित्र होते हैं, उन्हें वह बहुविध सुख देता है जो क्रियावान् हैं, परोपकारी हैं, वे सुख पाते हैं, जो अन्य लोग वैसे नहीं हैं, वे सुख नहीं पाते हैं । पाठक लोग स्वयं देख लें कि मन्त्र में ' विद्वन् ', ' जिज्ञासो ' इत्यादि अर्थों के वाचक किसी शब्द के न रहने पर भी ' अर्थात् ' शब्द से ही अर्थ कर दिया है, परन्तु वह अर्थ, किस शब्द का कर रहे हैं,, - इस बात को उन्होंने सोचा ही नहीं । श्रुति, सूत्र से जो विरोध हो रहा है, वह तो स्पष्ट ही है । १ - जिस गौ को तुमने दुहा है, जिसके बारे में मैंने पूछा था वह ' विश्वायु ' नाम की है । वह यजमान को पुरुष की पूर्ण आयु प्रदान करती है । जो दूसरी गो तुमने दुही है, वह ' विश्वकर्मा ' है । जो तीसरी गो तुमने दुही है, वह ' विश्वधाया है । २ - अध्वर्यु उस दूध को तपाने के अन्तर उसे उतारकर पूर्वदिन चतुर्दशी के सायं प्रातः हवन करके शेष रहे हुए दूध में आतञ्चन करता है, यानी दही जमाने के लिये दूध में दही डालता है । हे क्षीर! तुम इन्द्र देवता के ' भाग '
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आनं कुर्यात् । हे क्षीर इन्द्रस्य भाग सङ्कोचनार्थः । घनीभावेनैव तरलं द्रव्यं [ ६७ ] त्वां समेन सोमवल्लीरसेन आतनच्मि दध्यर्थं सङ्कोचनं करोमि । तचतिः संकुचति । अतः घनीभावमापाद्य कठिनीकरोमीत्यर्थः । ३ - यद्यप्यत्र आतञ्चनहेतुर्दधिशेषस्तथापि भावनया तस्यैव सोमत्वं सम्पाद्यत इत्यर्थः । यथा कश्चित् पुमान् बन्धुत्वेन भावितो बन्धुर्भवति प्रातिकूल्येन भावितश्च शत्रुः । तथा चोक्तवान् वशिष्टः-' बन्धुत्वे भावितो बन्धुः परत्वे भावितः परः । विषामृत ह स्थितिर्भावनिबन्धना । ' इति । भोज्यं वा विषत्वेन भावितम् वान्ति ं करोति । अमृतत्वेन च भावितम् जीर्णं सद्बलहेतुर्भवति । तथा च दधि-शेषस्य भावनया सोमत्वम् । ' सोदकेनापि दधात्यमृण्मयेन विष्णो हव्यमिति ( का ० श्री ० सू ० ४।२।३४ ) सोदकेन अमृतमयेन उत्तानेन पात्रेण . दोहस्थाली विष्णो हव्यं रक्षति मन्त्रेण दोहस्थालीं पिदध्यात् । विष्णो इदं हयं क्षीर रक्ष गोपाय । सर्वत्र सृष्टौ पालने संहारे च ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा अभिमानिनो देवाः इति विष्णु सम्बोध्य हविषो रक्षा प्रार्थ्यते । यथाह श्रीमद्भागवतम् – ' सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेगुणास्तैर्युक्तः परः पुरुष एक इहास्य धत्ते । स्थित्यादये हरिविरिविहरेति संज्ञा: ' ( श्री ० भा ० म ० पु ० १।२।२३ ) । अथवा यज्ञपुरुष एव प्रार्थ्यते । ' यज्ञो वै विष्णुः ' ( श ० १ १/२/१३ ) इतिश्रुतेः । ४ - अध्यात्मपक्ष - ननु कामधुक्षः कां स्वीयां वृत्तिं पूरितवत्यसीति प्रश्नो मुधैव । यतो हि परिणमद्भिः 1 आक्रान्तं सर्वापि बुद्धेवृत्तिरुदेति । सर्वासामपि वृत्तीनां परमात्मभावेन पूरणं विधातव्यमिति तत्राह - सा विश्वायुः इति । सा सत्त्वपरिणामाक्रान्ता वृत्तिः विश्वेभ्योऽपि आयुः प्रयच्छति । सा रजः परिणामाक्रान्ता वृत्तिः विश्वकर्मा हो । इसलिये सोमवल्ली के रस से तुम्हारा आतञ्चन करता हूँ । अर्थात् दही के लिये तुम्हारा सङ्कोचन करता हूँ । घनीभाव होने से ही तरल द्रव्य संकुचित होता है । अत: तुम्हें घनीभाव को प्राप्त कराकर गाढ़ा ( चक्का ) कर रहा ३ - यद्यपि यहाँ पर आतश्चन में हेतु. दधिशेष है, तथापि उसी में ' सोम ' की भावना की जा रही है । जैसे किसी पुरुष में बन्धुत्व की भावना करने से उसे ' बन्धु ' मान लिया जाता है, उसमें प्रतिकूलता की भावना करने से ' शत्रु ' मान लिया जाता है । इस प्रकार की बुद्धि ' भावनिबन्धन ' ही हुआ करती है । किसी भोज्य पदार्थ में विष की भावना हो जाने पर ' वान्ति ' हो जाती है, और उसी में अमृत की भावना रहने पर, वही भोज्य पदार्थ, जीर्ण होकर सद्बल-दायक होता है । उसी तरह यहाँ भी दधिशेष में सोम की भावना की गई है । दोहस्थाली पर अमृण्मय उत्तान पात्र ढ़क देता है कि हे विष्णो! इस क्षीर भूत हव्य की रक्षा करो । सर्वत्र सृष्टि, उसके पालन, और उसके संहार करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर संज्ञक देवता होते हैं । श्रीमद्भागवत में भी इसी बात को बताया गया है । अथवा यह भी कह सकते हैं कि ' यज्ञपुरुष ' की ही प्रार्थना की गई है, क्योंकि वही तो विष्णु है - ' यज्ञो वै विष्णु: ' इस प्रकार ब्राह्मण बता रहा है । ४ - ' अध्यात्म पक्ष में उक्त मन्त्र का अर्थ इस प्रकार होगा -शङ्का - ' कामधुक्ष: ' अर्थात् बुद्धि ने अपनी किस वृत्ति को पूर्ण कर लिया है? -- यह प्रश्न करना तो व्यर्थ ही है । क्योंकि परिणत होनेवाले सत्त्वरजस्तमोगुणों के द्वारा आक्रान्त होकर ही समस्त बुद्धिवृत्तियाँ उदित हुआ करती हैं । अतः सभी वृत्तियों का पूरण परमात्मभाव से करना चाहिये । समा ० — उस पर उत्तर दिया है कि ' वह विश्वायु ' है । अर्थात् सत्त्व परिणाम से आक्रान्त हुई वह वृत्ति