वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 21–30
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 21–30
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' २० ) समुद्र आदि को पार करने की कोई आवश्यकता नहीं है । ८ वें मन्त्र में मित्रावरुण पद का प्राण और उदान के समान वर्तमान शिल्पिय अर्थ किया है । शिल्पियों की प्राण और उदान से क्या समानता हो सकती है? इसको स्वामी दयानन्द ही जान सकते हैं । नवें मन्त्र की भी यही स्थिति है । १५ वें मन्त्र में त्रिवत्स पद से देह, इन्द्रिय और मन का ग्रहण करने में कोई प्रमाण नहीं दिया गया । २३ वें मन्त्र में रथन्तर और स्तोम पदों की मनमानी व्याख्या इनके वैदिक वाङ्मय के अज्ञान को उजागर करती है, क्योंकि त्रिवृत्, पंचदश आदि स्तोम और रथन्तर आदि साम वैदिक परम्परा में अतिप्रसिद्ध हैं | इस वैदिक प्रसिद्धि के विपरीत अर्थं करना कथमपि उचित नहीं है । इससे समाज में केवल उच्छृङ्खलता पनपती है । आगे के कुछ मन्त्रों में इसी प्रकार के दोषों को दिखाया गया है । इनमें एकविश, सप्तविंश आदि व्यवहारों का उल्लेख तो किया गया है, किन्तु इनका स्वरूप क्या है? इस विषय में स्वामी दयानन्द मौन हैं । २ ९ वें मन्त्र में वर्णित जीव की धूम्रवर्णता भी पूरी तरह से निराधार है, क्योंकि जीव का तो कोई रूप होता ही नहीं । ३२ मन्त्र में कर्कन्धु पद का क्रियापरक अर्थ करना अतीव हास्यास्पद है । ३५ वें मन्त्र में श्येन ( बाज पक्षी ) पद का अर्थ विद्वान् मनुष्य ३६ वें मन्त्र में सोत पद का धनद और ३ ९ वें मन्त्र में वनस्पति पद का किरणपालक अर्थ किया गया है, किन्तु इसमें कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं कराया गया । अन्य मन्त्रों में भी इस तरह के मनमाने अर्थ किये गये हैं । लोक में किस पद की संगति किसके लिये किस कारण से होती है, यह लोकव्यवहार से भी ज्ञात हो जाता है । इसके लिये वेद के उपदेश की कोई अपेक्षा नहीं है ( पृ ० २५ ) । ४२ वें मन्त्र की भी यही स्थिति है । ४३ वें मन्त्र में ' गृभ ' पद का अर्थ स्त्री किया है, किन्तु उसमें भी कोई प्रमाण नहीं दिया गया । ४६ वें मन्त्र में भाष्यकार ने स्वामी दयानन्द से अनेक प्रश्न किये हैं, उनका उनके पास कोई उत्तर नहीं है । संस्कृत - हिन्दी भाष्य और भावार्थं की असंबद्धता तो अनेक मन्त्रों में दिखाई पड़ती है । सरस्वती आदि अतिप्रसिद्ध पदों के भी यहाँ मनमाने अनेक अर्थ किये गये हैं । वेद में सर्वत्र सरस्वती पद का एकवचन में तथा उसके साथ अश्विनी पद का द्विवचन में प्रयोग क्यों किया गया है? इस प्रश्न का उत्तर भी उनके पास नहीं है । ५६ वें मन्त्र में ' अश्वि ' पद से जलविद्युत् का, वनस्पति पद से सूर्य का और सरस्वती पद से नीति का ग्रहण भी निराधार है । अगले मन्त्र में अध्वर पद की शिल्पार्थता की भी यही स्थिति है । ५८ वें मन्त्र में स्विष्टकृत् पद का अर्थ भी इनकी वैदिक परम्परा से अनभिज्ञता को उजागर करता है । यहाँ अन्तिम मन्त्र ( २१।६१ ) में बताया गया है कि इस प्रकार इनका यह पूरा व्याख्यान नाना प्रकार की विसंगतियों का पिटारा है । २२ वें अध्याय के पहले ही मन्त्र में असंगति यह है कि यहाँ मनुष्य को आयुपा कहा गया है । जो अपनी आयु की रक्षा करने में असमर्थ है, वह भला दूसरे की आयु की रक्षा क्या करेगा? दूसरे मन्त्र में बुद्धि की वक्तृता का उल्लेख है । बुद्धि वक्ता कैसे हो सकती है? यदि कहें कि बुद्धि विचार कर लेने के बाद ही मनुष्य कुछ बोलता है, तो इसमें दोष यह आवेगा कि हमारे मत में शब्द नित्य हैं, अतः उनकी बुद्धिपूर्वकता नहीं मानी जा सकती । ५ वें मन्त्र में श्रेष्ठ पुरुष द्वारा अश्व के ताडन की बात कही गई है, किन्तु यहाँ यह नहीं बताया गया कि श्रेष्ठ पुरुष किस प्रयोजन की सिद्धि के लिये अश्व का ताडन करता है? मन्त्र में ताडनार्थक और रोधनार्थंक कोई पद है भी नहीं । स्वाहा, हिंकार आदि पदों के अर्थ और उनकी उत्तम क्रिया आदि के स्वरूप पर तो अनेक बार प्रश्नचिह्न लगाया जा चुका है । चार्वाकों के समान यज्ञ का केवल इष्ट प्रयोजन मानने वालों के यहाँ अश्व की हिंकार आदि क्रियाओं का क्या विशेष फल हो सकता है? ८ वें मन्त्र में ' सब तरह की सुख प्राप्ति करते हैं ' इस पूरे वाक्य के बोधक पद मन्त्र में हैं ही नहीं । १३ वें मन्त्र विद्या की प्राप्ति के लिये परमात्मा से प्रार्थना की गई है । विद्या की प्राप्ति तो गुरु की सेवा से ही हो सकती है, इसके लिये केवल परमात्मा की प्रार्थना से कुछ नहीं मिल सकता । १५ वें मन्त्र के दयानन्दीय अर्थ में दोष यह है कि लोह, सुवर्ण, मणि आदि के लिये हव्य पद का प्रयोग अनुचित है, क्योंकि इनकी आहुति कहीं भी नहीं
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( २१ ) जाती । धातु का प्रयोग अग्नि को प्रज्वलित करने के अर्थ में कहीं नहीं मिलता । उत् उपसर्ग के साथ इस धातु का प्रयोग उद्बोधन के अर्थ में अवश्य होता है । अग्नि के प्रज्वालन से उसकी किसी प्रकार की संगति नहीं बैठती । १५-१७ मन्त्रों में भौतिक अग्नि को अमृत कहा गया है, यह भी सम्भव नहीं है । परमाणु रूप अग्नि का यहाँ ग्रहण नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें आहुति नहीं दी जाती । परमाणु रूप अग्नि के लिये वेद में कहीं इस पद का प्रयोग किया भी नहीं गया है । फिर भौतिक अग्नि दिव्य भोगों का सम्पादन करने में असमर्थ है । १ ९ वें मन्त्र में आपके मत से वह्नि के सेचन का विधान है, किन्तु ऐसा करने पर तो उसका लोप ही हो जायगा । यहाँ आत्मा की व्यापकता भी नहीं दिखाई जा सकती, क्योंकि आपके मत में आत्मा अणु है । २० वें मन्त्र में स्वाहा पद का जो सत्य क्रिया अर्थं किया गया है, उसके विषय में अनेक स्थलों पर कहा जा चुका है और आगे भी कहा जायगा | आधीत भूयः आदि शब्दों का अर्थ भी इसी तरह की असंगतियों से भरा हुआ है । २२ वें मन्त्र में कर्म से वर्ण - व्यवस्था मानने पर पुनरुक्ति आदि दोषों की उद्भावना की गई है । इस अध्याय के अन्तिम ३४ वें मन्त्र में संसर्प और अंहस्पति शब्द के जो अर्थ दयानन्दीय भाष्य में किये गये हैं, उनसे भारतीय ज्योतिःशास्त्र में प्रसिद्ध इन शब्दों के अर्थ की उनको कोई जानकारी नहीं है, यह बात स्पष्ट हो जाती है । वस्तुतः ये दोनों शब्द मलमास के पहले और बाद में पड़ने वाले दोनों अधिक मासों के लिये क्रमशः प्रयुक्त होते हैं । मलिम्लुच शब्द का प्रयोग भी प्रत्येक तीन वर्ष में आने वाले अधिक मास ( मलमास ) के लिये होता है । सामान्य भारतीय धार्मिक प्रजा भी इन शब्दों से प्रायः परिचित है । २३ वें अध्याय के तीसरे मन्त्र में निराकार परमेश्वर के प्रति भक्तिविशेष की और उनकी कमनीयता की कल्पना पूरी तरह से निराधार है । पंचम मन्त्र के दयानन्दीय अर्थ का खण्डन विशेष रूप से द्रष्टव्य है । यहाँ अनेक पदों का अर्थ द्रविड़ प्राणायाम की पद्धति से किया गया है । उपासना के लिये हृदय स्थल का सहारा लिया जाता है, मर्मस्थल का नहीं | यहाँ का भावार्थ मूल मन्त्र के अक्षरों से पूरी तरह से असंबद्ध है । छठे मन्त्र में भी दृष्टान्त-दान्तिक की चर्चा कर बताया गया है कि इस तरह का कोई पद मन्त्र में नहीं है । अन्य भी अनेक असंगतियाँ यहाँ दिखाई गई हैं । सातवें मन्त्र में शिल्पी का अथवा कलायन्त्र का बोधक पद है ही नहीं, तो भी अश्व और वात आदि पदों के ये अर्थ कर दिये गये हैं । ८ वें मन्त्र का अर्थ ' अव्यापारेषु व्यापारम् ' वाली कहावत को चरितार्थं करता है । वसु, छन्द, लाजा आदि पदों का यहाँ मनमाना अर्थ किया गया है । भूभ्रमण की भी यहां बिना प्रसंग के चर्चा कर दी गई है । १२ वीं कण्डिका का अर्थ ब्रह्मोत्र और ब्रह्मोद्य की बोधक श्रुति के विपरीत है । सूर्य की आकर्षण शक्ति का भी वेद में कहीं उल्लेख नहीं मिलता । अश्व पद का अर्थं अग्नि करने पर वह मार्ग को कैसे व्याप्त करता है, इसका स्वरूप बताना पड़ेगा । प्राणात्मक वायु जड़ है, वट आदि वृक्ष भी जड़ हैं । इन जड़ पदार्थों की प्रार्थना और स्तुति करना उनके अपने सिद्धान्त के ही विपरीत है ( पृ ० ८४ ) । १४ वें मन्त्र में भी प्राण, सोमपुरोगव आदि पदों का अर्थनिष्प्रमाण है । ब्रह्म पद महायोगी का बोधक कैसे हो जायगा? अगले मन्त्र में विद्यमान यज् धातु की गत्यर्थकता तो किसी तरह से मानी भी जा सकती है, किन्तु उसकी इच्छार्थता में कोई प्रमाण नहीं है । १६ वें मन्त्र में सुख शब्द के मूल में न रहने पर भी उसका निरर्थक अध्याहार किया गया है । १७ वें मन्त्र में पशु शब्द के असंगत अर्थ की ओर इंगित करने के लिये घट धातु का उदाहरण दिया गया है । अगले मन्त्र में अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका, अश्व आदि शब्दों के किये गये असंगत अर्थों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है । १ ९ वें मन्त्र में न्यायाधीश अर्थ की असंबद्धता को बताते हुए सिद्धान्त पक्ष को ब्राह्मण और सूत्र ग्रन्थों का समर्थन देते हुए उसकी प्रासंगिकता को भी स्पष्ट किया गया है । २० वें मन्त्र में राजा और प्रजा, अध्यापक और उपदेशक की चर्चा को अप्रासंगिक बता कर " वृषा और बाजी शब्दों के दयानन्दीय अर्थ की निर्मूलता दिखाई गई है ।
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( २२ ) २१ वें से ३१ वें मन्त्र तक की मनमानी व्याख्या कर स्वामी दयानन्द ने महीधर आदि के व्याख्यान पर अश्लीलता का आरोप लगाया है । प्रत्येक मन्त्र की व्याख्या में इनका सामान्यतः खण्डन करते हुए वेदार्थपारिजातकार ने अन्त में ( पृ ० १०१-१०३ ) इस दोष का परिहार विशेष रूप से किया है । ३२ वें मन्त्र में पुनः इसी सिद्धान्त को पुष्ट किया गया है । अगले मन्त्र में स्वयंवर का कोई प्रसंग न होते हुए भी, इसके बोधक पद के अभाव में भी उसकी चर्चा की गई है और त्वक्, रजत, सीस आदि पदों का यथेच्छ अर्थ किया गया है । इसी तरह आगे भी मूल मन्त्र में अविद्यमान पदों का बिना प्रयोजन के अध्याहार कर लिया गया है । ५० वें मन्त्र में वस्तुतः परमात्मा के अस्तित्व की कोई चर्चा न होकर उसके आवेश के विषय में प्रश्न है । आपके मत से परमात्मा निराकार, निरवयव और निरंग है । अत: प्रस्तुत मन्त्र में आपके मत से अंग की कल्पना भी निराधार है । ५८ वें मन्त्र में अशीति पद की अनन्तार्थ-बोधकता भी उचित नहीं है, क्योंकि शत, सहस्र आदि पदों की ही अनन्तार्थता मानी गई है । अनेक मन्त्रों में यहाँ स्पष्ट ही महीधर आदि प्राचीन भाष्यकारों से सहायता ली गई है, तथापि वे उन पर अनुचित आक्षेप करने से कभी चूकते नहीं । ६२ वें मन्त्र में वेदि, नाभि, सोम आदि पदों का असंगत अर्थ किया गया है । ६३ वें मन्त्र की भी निराकार -वाद की दृष्टि से कोई संगति नहीं बैठती, क्योंकि निराकार बीजधारण में समर्थ नहीं हो सकता । इसमें संकल्प की भी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि निराकार पक्ष में आत्मा और मन के संयोग का अभाव है और इसके बिना संकल्प भी नहीं हो सकता । ६४ वें मन्त्र में शतपथ के अनुसार महिम नाम के ग्रह का उल्लेख है । महिम पद का महत्त्व अर्थ करना पूरी तरह से अप्रासंगिक है । २४ वें अध्याय के पहले ही मन्त्र में बताया गया है कि अमरकोश के श्लोकों से जैसे कोई चिकित्सा करने लगे, उसी तरह का यहाँ अर्थ किया गया है । यहाँ अनेक प्रश्न पूँछ कर कहा गया है कि इनका उत्तर देना समाजियों के लिये अत्यन्त कठिन है । चौथे मन्त्र में प्लीहा शब्द के अर्थ की विसंगति को दिखा कर भावार्थ में निर्दिष्ट पशु - पक्षियों में उनके लिये निर्दिष्ट गुणों की अनुपलब्धि दिखाई गई है । छठे मन्त्र के भावार्थ में कहा गया है कि मनुष्यों को अग्नि की Hair क्रिया, पृथिवी की धारण क्रिया और वायु की प्ररोहण क्रिया को जान कर अपने हित में इनका उपयोग करना चाहिये | कैसे करना चाहिये? इसकी यहाँ कोई विधि नहीं बताई गई है । शब्द की ज्ञापकता और रूढि की योगापहारिता पर इन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया है । ये सारी बातें उसी को उचित लग सकती हैं, जो वैदिक प्रक्रिया से पूरी तरह से अनभिज्ञ हो । १३ मन्त्र के व्याख्यान में सारा उपक्रम मूर्खों को ठगने जैसा है । बहुत अधिक पदों का अध्याहार करने पर भी अर्थ में स्पष्टता नहीं आ पाई है । १४ वें मन्त्र में अन्वय, मन्त्रार्थ और भावार्थं परस्परविरोधी हैं । गाल पर हुए फोड़े के समान यह उनका दोष अनेक स्थलों पर देखने को मिलता है । १८ वें मन्त्र में संचर पद का अर्थ मार्ग किया गया है, जिसकी यहाँ कोई प्रासंगिकता नहीं है । इससे भाष्यकार की उच्छृङ्खलता ही प्रकट होती है । १ ९ वें मन्त्र में बताया गया है कि शब्दशास्त्र में की गई स्वेच्छाचारिता का भी यह एक अच्छा उदाहरण है । वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेध, शुनासीरीय जैसे वेदों में अतिप्रसिद्ध शब्दों के अर्थों से भी ये पूरी तरह से अपरिचित हैं । २० वें मन्त्र में दयानन्दीय मत के खण्डनार्थं किसी अभियुक्त ( प्रामाणिक व्यक्ति ) का वचन उद्धृत है । २४ वें मन्त्र में यह नहीं दिखाया गया है कि विद्वान् मनुष्यों की पत्नियों और बहिनों को दिये जाने वाले पक्षियों का उनके लिये क्या उपयोग है? २८ वें मन्त्र के तथा इस अध्याय के अन्य मन्त्रों के अर्थ की भी स्थिति अस्पष्ट है कि इन पक्षियों का और पुरुषों का परस्पर क्या सम्बन्ध है? २५ वें अध्याय के पहले ही मन्त्र में दयानन्दीय पद - पदार्थों का विस्तार से उल्लेख कर उसका खण्डन किया गया है कि मूल में ' अवबोधयामि ' पद नहीं है । शुक्ल पद की वीर्यार्थता, कृष्ण पद की कर्षणार्थता, स्वाहा पद की ब्रह्मचयं -क्रियार्थता अथवा सुन्दरशीलयुक्तक्रियार्थता किसी कोश ग्रन्थ में नहीं मिलती और न व्याकरण आदि से ही इसको TM
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( २३ ) सिद्ध किया जा सकता है । ये सब अर्थं श्रुति एवं सूत्र के विरुद्ध भी हैं । दूसरे मन्त्र में प्राण और अपान पदों का इनका अर्थ देखने लायक है । तीसरे मन्त्र में स्पष्ट किया गया है कि अश्वमेधीय प्रकरण का श्रुतिसूत्रसमर्थित अर्थ सायण, महीधर आदि के द्वारा ही किया गया है, वही उचित भी है । चौथे मन्त्र के व्याख्यान में शांखायन श्रुति का भी विरोध दिखाया गया है । आठवें मन्त्र में दिखाया गया है कि वैदिक द्रव्य और देवताओं से स्वामी दयानन्द पूरी तरह से अपरिचित हैं । इसीलिये क्रोड, पाजस्य, जत्रु, हृदयोपश पुरीतत्, मतस्ना जैसे शब्दों के इन्होंने बड़े अनोखे अर्थ किये हैं । १२ वें मन्त्र में प्रजापति के दो बाहुओं का उल्लेख करना इनके निराकारवाद के विपरीत है । १५ वें मन्त्र के अर्थ की निर्मूलता को दिखाकर कहा गया है कि गुरुजनों को आज्ञा नहीं दी जा सकती, आयु की वृद्धि विद्वान् मनुष्य के वश की बात नहीं है और विद्यादाता के प्रति गुरु- बुद्धि रखी जाती है, सख्यभाव नहीं । २० वें मन्त्र में ' पृषत् ' पद का अर्थ उनकी अपनी ही उक्ति के विपरीत है । २२ मन्त्र में बताया गया है कि विशिष्ट शक्ति से सम्पन्न देवताओं को आप मानते नहीं और घृत आदि की आहुतियों से आप केवल वायुशुद्धि रूप दृष्ट प्रयोजन मानते हैं । तब इनसे आपके अभीष्ट सिद्धि कैसे होगी? आप भी तो अनेक मन्त्रों में अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिये प्रार्थना और स्तुति का उल्लेख करते हैं । ३४ वें मन्त्र में बताया गया है कि ह्रस्व ' शु ' शब्द से दीर्घ शूल शब्द नहीं बन सकता । यहाँ इन्द्रियों की आहंकारिकता और भौतिकता का भी उल्लेख किया गया है । ३८ वें मन्त्र में विशेष रूप से यह दिखाया गया है कि अध्याहार का सहारा लेकर तो आपके भाष्य से ही आपके मत का भी खण्डन किया जा सकता है । यहाँ भी अनेक मन्त्रों में पदों के असंगत अर्थ को दिखाकर कहा गया है कि ऐसा करने से श्रुतहानि और अश्रुतकल्पना का दोष आता है । ४६ वें मन्त्र में बताया गया है कि सादृश्य के अभाव में दृष्टान्त और दाष्टन्तिकभाव नहीं बन सकता । सुख अपने कर्मों के अनुसार अनायास मिल जाता है और भुवन को धारण करने के लिये प्रयत्न की अपेक्षा हैं । इसको धारण करने में मनुष्य समर्थ भी नहीं हो सकता । फिर ' स दाधार ' इस मन्त्र में परमेश्वर को ही भुवनों का धारक बताया गया है, मनुष्य को नहीं । वैद्य पदमूल में है ही नहीं । सत्कार तो लोकतः प्राप्त है । इसके लिये वैदिक विधान की अपेक्षा नहीं है । २६ वें अध्याय के पहले मन्त्र में स्वामी दयानन्द ने सात संसदों और आठवीं भूतसाघनी का उल्लेख तो किया है, किन्तु इनका स्वरूप उन्होंने नहीं बताया । दूसरे मन्त्र में दयानन्दीय मत का खण्डन करते हुए बताया गया है कि पूर्णकाम परमेश्वर की कोई कामना नहीं हो सकती और न वेदवाणी का किसी को उपदेश करते हुए वे देखे गये हैं । तीसरे मन्त्र में यश का बोधक पद नहीं है । द्युमत् और क्रतुमत् शब्दों से मन और बुद्धि का ग्रहण नहीं किया जा सकता और पति शब्द का पालक अर्थ है, पालन में उसकी वृत्ति नहीं मानी जा सकती । पाँचवें मन्त्र में बताया गया है । कि मनुष्य कभी भी सूर्य के समान नहीं हो सकता और न वह गर्जनयुक्त किरणों के साथ कहीं जाता ही है | आपके मत में अग्नि जड़ है, अतः तदनुसार छठे मन्त्र में जड़ अग्नि से प्रार्थना नहीं की जा सकती, क्योंकि प्रार्थना तो चेतन से ही की जा सकती है । जड़पूजा को तो आप निन्दनीय मानते हैं | सातवें मन्त्र में ' साधनोति ' क्रिया पद नहीं है और आठवें मन्त्र में वैश्वानर और उक्थ पदों के आपके दिये अर्थ असंगत हैं । नवें मन्त्र में पाञ्चजन्य पद से किसी एक मनुष्य का ग्रहण अनुचित है । १० वें मन्त्र में दर्शित लौकिक नृपति की वज्रहस्तता सम्भव नहीं है और न यह नियमित रूप से सोलह कलाओं से सम्पन्न ही हो सकता है । अगले मन्त्र में दिखाया गया है कि लौकिक राजा प्रजा के दुःख को पूरी तरह से दूर नहीं कर सकता । उसके द्वारा रक्षित प्रजा को भी व्याधि, जरा, मरण आदि का दुःख सताता ही रहता है । १२ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि राजा के द्वारा किये जाने वाले सत्कार की मन्त्र में कोई चर्चा नहीं है । - १७ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि इन्द्र पद से ऐश्वर्यवान् अर्थ का बोध तो किसी तरह से हो सकता है, किन्तु उसका अर्थ ' ऐश्वर्य ' किसी भी रूप में सम्भव नहीं है । ' यज्यु ' पद का अर्थ भी सही नहीं है । १८ वें मन्त्र में
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( २४ ) देवता की जैसे कोई अपेक्षा प्रयोजन नहीं है । ' त्वष्टृ ' यह पद प्रयुक्त है, क्या यहाँ आप २३ वें मन्त्र में इन्द्र, बताया गया है कि शास्ति और सुखानि ये दोनों पद नहीं हैं । अगले मन्त्र में धर्म्य और अधर्म्य व्यवहार में नहीं है, उसी तरह से ज्ञान में विद्वान् की अपेक्षा होते हुए भी व्यवहार में इसका कोई पद का अर्थ २० वें मन्त्र में देदीप्यमान पति किया गया है, किन्तु यहाँ बहुवचन में अनेक पतियों की कल्पना करेंगे । अगले दो मन्त्रों में नेष्टृ शब्द की भी ऐसी ही स्थिति है । सोम, शश्वत्तम आदि शब्दों का अर्थ भी निराधार है । इस अध्याय के अन्तिम २६ वें मन्त्र स्वामी दयानन्द द्रोणकलश आदि वैदिक शब्दों से मनुष्य की चर्चा करना भी पूरी तरह से असंगत है । पूरी तरह से अपरिचित हैं । सोम के प्रसंग को छोड़ कर विद्वान् २७ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में बताया गया है कि ऋतुएँ तो जड़ हैं, वे प्रार्थना को सुनने में असमर्थ हैं । फिर आपके मत में जड़ की प्रार्थना भी अनुचित हैं । तृतीय मन्त्र में दिखाया गया है कि विद्वान् मनुष्य किसी की प्रार्थना को पूरा करने में असमर्थ है । ' अभिमाति ' पद यहाँ शत्रु के लिये प्रयुक्त है । इससे अभिमान का बोध नहीं हो सकता । चौथे मन्त्र में क्षत्र पद ओर चिनोति धातु का अर्थ अशुद्ध दिया गया है । ५ वें मन्त्र में भी क्षत्र और अग्नि पदों की यही स्थिति है । छठे मन्त्र से असत्य पद है ही नहीं । ७ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि धर्म एवं ब्रह्म के प्रतिपादक. वेद में राजनीति परायण मनुष्य के वर्णन की कोई अपेक्षा नहीं है । शिव पद का अर्थ सभ्य करने में भी कोई प्रमाण नहीं है । नवें मन्त्र में भी इसी तरह की अनेक असंगतियाँ दिखाई गई हैं । ११ वें मन्त्र में सूनु शब्द का अर्थ उणादि-कोश में दिये गये उनके अपने अर्थ के भी विपरीत है । १३ वें मन्त्र में विश्ववार शब्द का प्रयोग उसकी सामथ्यं के विपरीत है | अगले मन्त्र में यन्त्रचालक की स्तुति की गई है । इसी तरह की अपनी मनमानी कल्पनाएँ उन्होंने वेदों पर थोप दी हैं । १५ वें मन्त्र में ' ईम् ' पद का तथा अगले मन्त्र में ' अनुददन्ते ' क्रिया का अर्थ असंगत है । १८ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि शिष्ट जन अपने व्यवहार की स्वयं प्रशंसा नहीं करते । पुरुषार्थं के लिये इसका कोई उपयोग भी नहीं है । १ ९ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि वाणी प्रशस्त ज्ञान की जनक तो है, किन्तु जड़ होने से वह स्वयं ज्ञानस्वरूप नहीं है । सर्वशास्त्रस्वरूप होते हुए भी वह शास्त्रों की धारक नहीं हो सकती । २१ वें मन्त्र में वनस्पति के प्रसिद्ध अर्थ को अकारण छोड़ दिया गया है । २३ वें मन्त्र में वायु पद का वायुविद्या अर्थ करने में भी कोई प्रमाण नहीं है । अधिकारसूचक पद भी मन्त्र में नहीं है । २४ वें मन्त्र में धिषणा पद को स्त्री का और देव पद को पति का पर्याय बताया गया है । इसमें कोई प्रमाण नहीं है । पत्नी यदि धन के लिये पति को चाहेगी, तो वह पण्यवधू कहलावेगी, पत्नी नहीं । २५ वें मन्त्र में गर्भ पद की प्रधानार्थता भी निर्मूल है । असु शब्द प्राण का वाचक है, परमात्मा का नहीं । २६ वें मन्त्र में परमेश्वर में ज्ञान की उत्पत्ति की चर्चा वहाँ आत्मा और मन के संयोग के अभाव में निरर्थक है । इस जन्य ज्ञान की नित्यता भी नहीं मानी जा सकती । हमारे यहाँ तो परमात्मा ज्ञानस्वरूप ही है । २८ वें मन्त्र में ' यु ' धातु के अर्थ की विसंगति दिखाई गई है । २ ९ वे मन्त्र में बताया गया है कि उत्क्रमण, संक्रमण आदि क्रियाएँ परिच्छिन्न वस्तु में हो संभव हैं, अतः परमात्मा में इनकी सत्ता नहीं मानी जा सकती । ३० वें मन्त्र में मध्व पद का अर्थ गलत किया गया है । ३२ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि वायु यज्ञ के उद्देश्य से आता है । आपके मत में तो वायु जड़ है, तब उसमें किसी उद्देश्य से प्रेरित होने की कल्पना कैसे की जा सकती है । ३३ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि यह सारा अर्थ इनकी कपोलकल्पना है । अगले मन्त्र में की गई विद्वान् मनुष्य से रक्षा की प्रार्थना बालू से तेल निकालने के समान निरर्थक है । ३५ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि राजा कभी ईश्वर के समान सामर्थ्यशाली नहीं हो सकता और वेद में राजा या सभापति के वर्णन को खोजना निरी मूर्खता है । अगले मन्त्र में राजा के स्थान पर स्वामी दयानन्द ने ईश्वर की स्तुति की है, किन्तु इन दोनों मन्त्रों में से एक में राजा की और दूसरे में ईश्वर की स्तुति है, इसमें प्रमाण क्या है? इसका वहाँ कोई उल्लेख नहीं मिलता । फिर ऐसा करके अनजान में ही स्वामी दयानन्द मनुष्य
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देवता की सत्ता स्वीकार कर लेते हैं, मनमाने अर्थ किये गये हैं, जो कि पूरी ( २५ ) जो कि उनके अपने मत के विपरीत है । तरह से निराधार हैं । इस अध्याय के बता दिया गया है । ऐसा अर्थ करने पर तो मनुष्य को गन्तृत्व, भोक्तृत्व आदि आगे के मन्त्रों में भी अनेक पदों के अन्तिम मन्त्र में विद्वान् को संवत्सर समान क्रियाओं के आधार पर अश्व भी कहा जा सकता है । यहाँ यह भी दिखाया गया है कि " उषसः प्रभाता मङ्गलप्रदाः " इत्यादि पदों के मन्त्र में न रहने पर भी उनका बिना प्रयोजन के अध्याहार कर लिया गया है । २८ वें अध्याय के पहले मन्त्र में बताया गया है कि योद्धा घृत का पान करे | यह बात तो लोक से ही ज्ञात हो जाती है । इसको वेद में खोजने की आवश्यकता नहीं है । इसी तरह से तृतीय मन्त्र में वर्णित राजा और राजपुरुषों के व्यवहार को वेद से निकालना गलत है, क्योंकि वेद तो केवल धर्म और ब्रह्म का उपदेश करता है । आगे के कुछ मन्त्रों में किये गये आज्य, होता, द्वार, सूर्य आदि पदों का अनोखा अर्थ किया गया है और बिना प्रयोजन के अनेक पदों का अध्याहार किया गया है, जो कि शब्दशास्त्र में अराजकता को ही फैलाने वाला है । आठवें मन्त्र में भी इसी तरह की असंगतियां दिखाई गई हैं । नवें मन्त्र में बताया गया है कि वैद्य आदि की चर्चा वेद में नहीं हो सकती । ११ वें मन्त्र में इस बात को पुन: कहा गया है कि पदों का अन्वय संनिकृष्ट ( समीप ) पदों के साथ ही किया जाता है, विप्रकृष्ट ( दूर के ) पदों के साथ नहीं । १२ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि निष्ठान्त स्तीर्ण पद का अर्थ आच्छादित होता हैं, आच्छादनीय नहीं । यहाँ नैरोग्य पद मन्त्र में नहीं है, उसका निष्प्रयोजन अध्याहार किया गया है । इसी तरह से अगले मन्त्र में ' वर्जयित्वा ' क्रियापद नहीं है । १४ वें मन्त्र में बताया गया है कि निष्ठान्त सुप्रीत शब्द का अर्थ सुप्रीति का हेतु नहीं हो सकता । १५ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि स्वाप मात्र से यदि सब कोई मुक्त हो जाय, तो फिर प्रायश्चित्त की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जायगी । १६ वें मन्त्र में निर्दिष्ट है कि नई वस्तु तो समय के बीतने के साथ पुरानी हो सकती है, किन्तु पुरानो वस्तु के । नवीन हो जाने में कोई प्रमाण या दृष्टान्त नहीं मिलता । १७ वें सत्र में ' अघ ' शब्द का अर्थ चोर किया गया है, यह अनुचित है । ' रोगान् ' पद भी मन्त्र में नहीं है । १ ९ वें मन्त्र में ' त्रि ' पद का अर्थ त्रिविध सुख का ज्ञाता तथा शत का अर्थ सो संख्या के कर्म करना पूरी मनमानी है । शितिपृष्ठ होत्र, स्तोत्र, अध्वर्यु आदि पदों का जो अर्थ किया गया हैं, उससे श्रौत पदों के अर्थ के प्रति इनकी अनभिज्ञता प्रकट होती है । २२ वे मन्त्र में आये स्विष्टकृत् पद की भी यही स्थिति है । २४ वें मन्त्र में “ भिन्न प्रवृत्तिनिमित्त वाले शब्दों में विभक्ति की समानता होने पर भी सामानाधिकरण्य नहीं बन सकता ” इस शास्त्रीय नियम का उल्लेख कर दयानन्दीय अर्थ का खण्डन किया गया है । इसी तरह से आज्य ( घृत ) पद का विज्ञानरस अर्थ करने में भी कोई प्रमाण नहीं मिलता । २५ वें मन्त्र में गायत्री आदि छन्दों का और ' छन्दस् ' पद का भी विचित्र अर्थ किया गया है । वस्तुतः देखा जाय तो अक्षरसंख्या के भेद के आधार पर विभिन्न छन्दों के नाम रखे गये हैं । २८ वें मन्त्र में आज्य पद की जो व्युत्पत्ति दी गई है, उसके अनुसार तो हम घर की भी आज्य कह सकते हैं । ३१ वें मन्त्र में तीन हिरण्यमयी स्त्रियों की चर्चा भी इनका एक अजूबा ही है । ३२ वें मन्त्र के भावार्थ में इनका दुःसाहस पूरी तरह से उजागर हो जाता है । ३७ वें मन्त्र में दो स्त्रियों की चर्चा की गई है, जब कि मन्त्र में स्त्री पद है ही नहीं । इसी तरह से ३ ९ वें मन्त्र में ऊर्जा पद की संस्कारार्थता में कोई प्रमाण नहीं है । अगले सत्र में बताया गया है कि वक्त की इच्छा के अनुसार मनमाने अर्थ में शब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकता । ४३ वे मन्त्र में वट आदि पदों का अर्थ भी विद्वान् किया गया है । यहाँ देखना यह है कि वट आदि तो जड़ हैं, इनमें दिव्य गुण कहा से आयेंगे? स्विष्टकृत् एकयाग है और कर्ममीमांसा में इसका स्वरूप प्रदर्शित है, इस विषय की चर्चा ४५ वें मन्त्र में की गई है । २ ९. वें अध्याय के पहले ही मन्त्र के अनोखे अर्थ की चर्चा कर यहाँ दिखाया गया है कि घोड़ा मनुष्य को ढो है यह तो ठीक है । किन्तु कोई अतिबलशाली मनुष्य भी कभी किसी घोड़े को नहीं ढोता । चौथे मन्त्र में बहि पद का ४
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( २६ ) यान, देव पद का दिव्य पदार्थ और अदिति पद का विद्युत् अर्थ करना भी पूरी तरह से निराधार है । छठे मन्त्र में अश्विपद का अर्थ ' दिव्य शिल्पविद्या के प्रचारक ' किया गया है, किन्तु सर्वत्र इनको दो ही क्यों बताया जाता है, इसका कोई उत्तर आपने कहीं भी नहीं दिया है । शिल्पविद्या के प्रचारक तो अनेक व्यक्ति भी हो सकते हैं । अगले मन्त्र में भी द्विवचन की यही समस्या है । ८ वें मन्त्र में पुनः स्मरण कराया गया है कि शब्दों के प्रसिद्ध अर्थ को छोड़ कर गौण अर्थ करना उचित नहीं है । नवें मन्त्र में त्वष्टा पद के अनेक व्युत्पत्तिलभ्य स्मरण रखने की बात यह है कि रूढि यौगिक व्युत्पत्ति से बलवान् होती है । अर्थ दिये गये हैं, किन्तु यहाँ की असंगति दिखाई गई है । ११ वें मन्त्र में सद्योजात, तप, स्वाहा आदि १० वें मन्त्र में देवलोक पद की व्युत्पत्ति पदों के अर्थ की विसंगति पर ध्यान आकृष्ट किया गया है । १३ वें मन्त्र में भी प्रथम, रचना, अश्व आदि पदों की यही स्थिति है दृष्टान्त दिया गया है । १५ वें मन्त्र में प्राण, जल और समुद्र के तीन बन्धनों की तो । यहाँ पुनः जड़ वैयाकरण का बताया गया । १६ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि वेद कोई सेना, अश्व आदि चर्चा है, किन्तु इनका स्वरूप नहीं २० वें मन्त्र में मनुष्य के चरणों को मन के समान वेगयुक्त सिद्ध करने के लिये की कहा रक्षा का उपदेशक शास्त्र नहीं है । पाद है, किन्तु मन्त्र के पदों में तो इस बात का उल्लेख नहीं मिलता । २२ मन्त्र गया है कि यहाँ विमान ही इनके खड़ा किया गया है । २६ वें मन्त्र में तनूनपात् शब्द से विद्वान् का तथा मन्म में व्यर्थ ही पुनः सेना का प्रसंग ला २८ वे मन्त्र में प्रतिपादित है कि स्पर्धा कोई अच्छी बात नहीं मानी गई पद से यान का ग्रहण भी निराधार है । होता है, तो उससे उसे किसी पुरुषार्थ की प्राप्ति नहीं होती । अगले मन्त्र है में और किसी मनुष्य के प्रति पूज्यभाव उत्पन्न मुक्ति मिल जाय, तो फिर इसके लिये प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जायगी बताया गया है कि सबको यदि अनायास । ३२ वें मन्त्र में ' प्राचीनं ज्योतिः ' का शिल्पविद्या का प्रकाश अर्थ कियाहै । ज्योतिः पद ज्ञानार्थक हो सकता किन्तु उसका अर्थ शिल्पज्ञान कैसे हो जायगा? फिर यह ज्ञान तो अनित्य होता है, तब उसमें प्राचीनता है, ४३ वें मन्त्र में अभीशु शब्द का अर्थ रश्मि और वाजि पद अर्थ का अश्व होता है, किन्तु कहाँ से आवेगी? एवं अग्नि अर्थ किया गया है । ४६ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि यहाँ स्थित विशेषणों की यहाँ बिना प्रमाण के सद्योगन्ता नहीं बैठती । अगले मन्त्र में द्यावापृथिवी से कल्याण की आशा की गई है । जड़ राजपुरुष के साथ कोई संगति ४८ वें मन्त्र में ' धावन्ति ' क्रियापद और ' इव ' शब्द नहीं हैं । इनका व्यर्थ पदार्थ से ऐसी आशा रखना व्यर्थ है । शब्द को दान्त बना दिया गया है । ५२ वें मन्त्र का अर्थ निरुक्तकार यास्क अध्याहार की व्याख्या किया के गया है । इसी तरह से दन्त में बताया गया है कि पराक्रम का अन्यत्र संचारण मानव शक्ति के बाहर की बात है भी विपरीत है । अगले मन्त्र की सत्ता आप मानते नहीं । ५४ वें मन्त्र में वज्र शब्द का निपात और और अलौकिक शक्तिसम्पन्न देवताओं भ्रमपूर्ण है । यहाँ नाभि का अर्थ दिया गया है - आत्मा के मध्य में स्थित विचार मरुत् का । यहाँ मनुष्य अर्थ करना पूरी तरह से अर्थ को असंगति तो है ही, आत्मा केअणु होने से उसके किसी भाग की स्थिति भी संभव नहीं है । इसी तरह से प्रोथति धातुओं के अर्थ सही नहीं हैं । अगले मन्त्र में स्पष्ट किया गया है कि घोड़ों ५६ वें मन्त्र में आक्रन्दयति और सेना में तो युद्ध के लिये उनका उपयोग होता है, वहाँ उनका पालन नहीं किया का पालन अश्वशाला में होता है । में सेनापति के लिये लाल बैल की कोई उपयोगिता नहीं है । कृषि कार्य के लिये जाता । इसी तरह से ५ ९ वें मन्त्र कोई जरूरी नहीं है । इस अध्याय के अन्तिम ६० वे मन्त्र में पुनः दिखाया गया है कि त्रिवृत् आदि सामों का वर्णन ब्राह्मण - ग्रन्थों में मिलता है, उनसे स्वामी दयानन्द पूरी तरह से अनभिज्ञ आदि स्तोमों और रथन्तर हैं । ३० वें अध्याय के ५ वें मन्त्र में अनेक दोष दिखाये गये हैं । ब्रह्म पद का वेद अथवा ईश्वर अर्थ कर सकते हैं, किन्तु इससे ' वेद का प्रचार करना ' यह अर्थ किसी भी तरह से नहीं निकल सकता । क्षत्र, मस्तु, वैश्य, तपस्, शूद्र इत्यादि पदों के अर्थ भी मनमाने दिये गये हैं । नरक का अर्थ कारागार किया गया है । यह किसी चार्वाक की ही कल्पना हो सकती है । अगले कुछ मन्त्रों में आये सूत, शैलूष आदि पदों के अर्थ भी देखने लायक हैं । ऐसा अर्थ कर उपयोग मानने पर उसका लाल होना
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( २७ ) केवल मूर्खों को ही बहलाया जा सकता है । पुरुषव्याघ्र पद पर यहाँ विशेष रूप से विचार किया गया है ( पृ ० ३०७ ) । यातुधान पद का जो यहाँ अर्थ दिया गया है, तदनुसार तो यातुधन शब्द बनेगा यातुधान नहीं । फिर इसका hurat कारी से क्या सम्बन्ध है, यह नहीं बताया गया । इसी प्रकार इस पूरे अध्याय के विभिन्न चतुर्थ्यन्त और द्वितीयान्त पदों का बिना प्रमाण का यथेच्छ अर्थ किया गया है । साथ ही निर्मूल अध्याहार आदि दोषों की भी यहाँ भरमार है । १५ वें मन्त्र में संवत्सर, परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सर और इहत्सर नामक पाँच प्रकार के वत्सरों का उल्लेख है । इनका सही विवरण वराहमिहिर की बृहत्संहिता और उसकी भट्टोत्पल की टीका में मिलता है । परम्परा से पराङ्मुख स्वामी दयानन्द इनसे पूरी तरह से अपरिचित हैं । १६ वें मन्त्र में अनेक पदों और क्रियाओं का मनमाना अर्थं कितना अव्यावहारिक है, इस बात को स्पष्ट किया गया है । १७ वें मन्त्र में चरकसंहिता का प्रमाण देकर दयानन्दी अर्थ की विसंगति दिखाई गई है । १ ९ वें मन्त्र में स्पष्ट किया गया है कि प्रतिज्ञा समीचीन और असमीचीन दोनों ही तरह की होती है । सभी प्रतिज्ञा करने वाले सही बात कहते हों, यह जरूरी नहीं है, जैसे कि आजकल के शासकों की मण्डलायोग की अनुशंसा | २० वें मन्त्र में दिखाया गया है कि बलपूर्वक अध्याहार आदि करके तो कहीं भी कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है । २१ वें मन्त्र में स्वामी दयानन्द चण्डाल के शरीर को स्पर्श कर आये दुर्गन्धियुक्त पवन के सेवन का निषेध करते हैं । यह उनके ' कर्मणा वर्णव्यवस्था ' के सिद्धान्त के विपरीत है । इस अध्याय के अन्तिम २२ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि मागध आदि प्राजापत्य हैं और ब्राह्मण आदि नहीं, किन्तु इस विषय को यहाँ स्पष्ट नहीं किया गया । वेदों को पूरी तरह से चार्वाक जैसे नास्तिकों का ग्रन्थ बना देने के लिये स्वामी दयानन्द ने अनेक क्लिष्ट कल्पनाओं के सहारे जी - तोड़ परिश्रम किया है । भाष्य के विशेष अवधेय स्थल अन्त में हम सुबुद्ध पाठकों का ध्यान इस खण्ड के भाष्य के कुछ विशेष अवधेय स्थलों की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं | यहाँ ( पृ ० १० ) ' यह ' शब्द पर अच्छा विचार किया गया है । निघण्टु में या और यह्व दोनों ही शब्द मिलते हैं । निरुक्तकार यास्क यह शब्द की व्युत्पत्ति देते हैं, जब कि दशपादी उणादिवृत्ति में स्त्रीलिंग यह्वा शब्द निपातित है । भट्टोजी दीक्षित पुल्लिंग यह गब्द को ही स्वीकारते हैं । निघण्टु और निरुक्त के आधार पर यहाँ शिताम, पिष्ट आदि पदों की निरुक्ति देकर उनके अर्थों को स्पष्ट किया गया है । पृ ० ३४ पर दिखाया गया है कि मन एक इन्द्रिय है, इस विषय की पुष्टि प्रस्तुत मन्त्र ( २१ ५३ ) से भी हो जाती है । पृ ० ४६ पर चतुरक्ष शब्द के अर्थ को स्पष्ट किया गया है । आगम और तन्त्रशास्त्र में यमराज के दो कुत्तों का वर्णन मिलता है । हमारी विज्ञान-भैरव की हिन्दी व्याख्या ( पृ ० १७०-१७२ ) में इसका विवरण देखा जा सकता है । हम यहाँ चतुरक्ष शब्द से इनका भी ग्रहण कर सकते हैं । स्वामी दयानन्द ने और कुछ आधुनिक विद्वानों ने भी ' गणानां त्वा ' से लेकर ' यद्धरिणो यवमत्ति ' पर्यन्त मन्त्रों की उम्वट, सायण और महीधर द्वारा की गई व्याख्या में अश्लीलता को आरोपित किया है । इस पूरे प्रसंग पर पारिजातकार ने यहाँ ( पृ ० १०१-१०३ ) अच्छा विचार किया है । सीस और लोह शब्द से यहाँ ( पृ ० १०६ १०७ ) ताम्र धातु का ग्रहण किया गया है । पृ ० १०८ पर बताया गया है कि अश्व के शरीर में वपा नहीं मिलती । आरण्य पशुओं के सम्बन्ध में यहाँ ( पृ ० १३५ ) मानव श्रौतसूत्र और महीधर को उद्धृत किया गया है । अश्वमेधीय पशुओं की संख्या के विषय में यहाँ ( पृ ० १४५ ) किसी ग्रन्थ के एक श्लोक को उद्धृत किया गया है । स्वयंभू शब्द की व्युत्पत्ति के प्रसंग में भी हमें ऐसा ही श्लोक मिलता है ( पृ ० १५ ९ ) । पृ ० १६४ पर ' विथ ' शब्द की व्युत्पत्ति भी अवधाना है । ऐसे प्रसंगों में भाष्यकार द्वारा उद्धृत वचन बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं | इनका गंभीर मनन अपेक्षित है । " उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः " इस बृहदारण्यक वचन की दार्शनिक विशद व्याख्या ( पृ ० १८१-१८२ ) विशेष रूप से दर्शनीय है ।
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( २८ ) आगे के प्रकरणों में पाञ्चजन्य पद की व्याख्या पाणिनिसूत्रवार्तिक की पद्धति से की गई है ( पृ ० १ ९ २ - १ ९ ३ ) । छान्दोग्य के आधार और मैत्रायणी संहिता के सहारे मोमांसकों मिलती है । पृ ० २०८ २० ९ पर बृहस्पति पद की नैघण्टुक प्रकरण के पर पञ्चाहुति शब्द की व्याख्या पृ ० १ ९ ७ पर की व्युत्पत्ति देते हुए यहाँ ( पृ ० २१० ) मनुस्मृति का वचन प्रमाण आधार पर विवेचना की गई है । तनूनपात् शब्द त्र्यवि शब्द का अर्थ डेढ वर्ष की गाय किया गया है । इसको स्पष्ट के रूप में प्रस्तुत किया गया है । पृ ० २४ ९ पर करते हुए यहाँ कहा गया है कि अवि महीने में बच्चा जनती है, अतः लक्षणा वृत्ति के द्वारा इस शब्द से छः मास ( भेड़ ) छः का काल लक्षित होता है । छः को तिगुना करने से डेढ वर्ष होगा । आज्य ( घृत ) की वेद में बड़ी महिमा गाई गई है । इसे आयु और अमृत नाम से भी संबोधित किया जाता है । यहाँ भी ( पृ ० २६३ ) बताया गया है कि सभी देवताओं के मन में यह इच्छा रहती है कि सारा rate घृत मुझे ही मिल जाय । पाँच संवत्सरों ( पृ ० ३१३ ) के विषय में ( पृ ० ३१५ ) अच्छा विचार किया गया है । चरकाचार्यों के विषय में तथा पाश्चात्य बीभत्स शब्द की व्युत्पत्ति पर भी यहाँ विचारों की निष्प्रमाणता को भी यहाँ ( पृ ० ३१६ ) स्थापित किया विद्वानों के द्वारा व्यक्त किये गये गया है । एक स्थान पर ( पृ ० ३१७ आयोग की भी चर्चा है । आज यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो गई है कि यह निर्णय ) मण्डल कितना असमीचीन था । वाराणसी महाशिवरात्रि, संवत् २०४८ विद्वशंवद व्रजवल्लभ द्विवेदी
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विषय - सूची प्रतिपाद्य विषय प्रकाशकीय वक्तव्य दशाध्यायी ( २१ - ३० ) - भाष्य निष्कर्ष एकविंश अध्याय: सौत्रामणी याग १- २. अवभृथेष्टि विषयक वारुण एककपाल पुरोडाश सम्बन्धी याज्यानुवावया मन्त्र ३-४. अवभृथेष्टि विषयक आग्निवारुण याग के याज्या और पुरोनुवाक्या मन्त्र ५- ६. आदित्य चरु के निर्वाण के याज्यानुवाक्या मन्त्र ७. स्वर्गप्रापक यज्ञरूप शतारित्र नौका की स्तुति ८- ९. मैत्रावरुणी पयस्या के याज्यानुवाक्या मन्त्र १०-११. पयस्या सम्बन्धी वाजिन याग के याज्यानुवाक्या मन्त्र १२ - २२. वायोधस पशुसम्बन्धी याज्यानुवाक्या मन्त्र, आप्रीसंज्ञक ऋचाएँ २३-२८. वायोघस पशुसम्बन्धी वपा, पुरोडाश आदि के याज्या पुरोनुवावया मन्त्र २ ९ -४०. ' होता असत् ' इत्यादि १२ कण्डिकाओं में त्रिपशुसम्बन्धी प्रयाज- प्रेष मन्त्र ४१. एक ही कण्डिका में तीन वपाओं के प्रैष मन्त्र ४२. ग्रहसम्बन्धी चतुर्थ प्रैष मन्त्र ४३-४५. तीन कण्डिकाओं में आश्विन आदि हविर्यागों के प्रैष मन्त्र ४६-४७. दो कण्डिकाओं में वनस्पति याग और स्विष्टकृद् याग के प्रेष मन्त्र ४८-५८. त्रिपशुसम्बन्धी अनुयाजों से सम्बद्ध प्रेष और याज्या मन्त्र ५ ९ -६१ तीन कण्डिकाओं वाले सूक्त में सूक्तवाक के प्रेष मन्त्र द्वाविंश अध्याय: अश्वमेध याग १. अध्वर्यु द्वारा अश्वमेधीय यजमान के कण्ठ में निष्क का बन्धन २-४ अश्वमेधीय अश्व के कण्ठ में रशना का बन्धन ५. कण्डिका के तीन मन्त्रों से तालाब आदि के स्थिर जल से अश्व का प्रोक्षण ६. अश्व को अग्नि के समीप लाकर स्तोकीयसंज्ञक दस घृताहुतियों का प्रदान ७-८ दक्षिणाग्नि में प्रक्रमसंज्ञक ४ ९ आहुतियों के प्रदान के प्रसंग में अश्व की ४ ९ चेष्टाओं का वर्णन ९- १४. सावित्री इष्टि के छः याज्यानुवाक्या मन्त्र १५-१७. स्विष्टकृत् आहुतियों के तीन पुरोनुवाक्या मन्त्र १८. पवमान स्तवन १ ९. तृतीय सावित्र्येष्टि की समाप्ति पर अध्वर्यु और यजमान द्वारा अश्व के दक्षिण कर्ण में मन्त्र का पाठ • २०. चार आध्वरिक औद्भण, तीन आश्वमेधिक औद्ग्रभण आहुतियों का प्रदान, कृष्णाजिन दीक्षा २१. अग्निसम्बन्धी छः और माश्वमेधिक तीन आहुतियों को देने के बाद दशम औद्ग्रभण आहुति का प्रदान २२. कृष्णाजिन दीक्षा से उखा में तेरह समिधाओं के आधान पर्यन्त कृत्य के सम्पादन के बाद अध्वर्यु द्वारा प्रस्तुत मन्त्र का पाठ