वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 31–40

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 31–40

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afusari ख्या ( ३० ) २३- ३४. घृत, सक्तु, घाना और लाजा की रात्रि के प्रत्येक प्रहर में बारह कण्डिकाओं द्वारा आहुतियाँ यो अध्याय: अश्वमेध याग १. उस्थ्य संस्था के दिन दो महिम ग्रहों का ग्रहण २. दशापवित्र से प्रथम ग्रह का परिमार्जन और आसादन ३. राजत उलूखल से द्वितीय ग्रह का ग्रहण ४. वपायाग के अन्त में द्वितीय महिम ग्रह में गृहीत सोम की आहुति ५. रथ में अश्व का योजन ६. अन्य तीन अश्वों का भी रथ में योजन ७. इन चार अश्वों से युक्त रथ पर आरूढ अध्वर्यु और यजमान का तालाब आदि जलाशय के लिये प्रस्थान, अश्वों का जलप्रवेश ८. जलाशय से यजन - स्थान पर वापस आने पर अश्वमेधीय अश्व को रथ से वियुक्त कर महिषी, वावाता और परिवृक्ता नामक राजपत्नियों के द्वारा घृताभ्यंजन और सक्तुप्रदान ९ -१०. ब्रह्मा और होता का परस्पर प्रश्नोत्तर ११-१२ होता और ब्रह्मा का परस्पर प्रश्नोत्तर १३-१६. चार कण्डिकाओं से अश्वमेधीय अश्व का प्रोक्षण १७. अश्व के मुख में प्रोक्षणी का निधान १८. तीन आहुतियों का प्रदान, राजपत्नियों का संवाद १ ९. राजपत्नियों द्वारा अश्व की तीन प्रदक्षिणा २०. महिषी और अश्व का अधीवास द्वारा आच्छादन २१. यजमान द्वारा अश्व का अभिमन्त्रण २२- ३१. अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता, होता और क्षत्ता का राजपत्नियों से अभिमेथनसंज्ञक संवाद [ भाष्य में अभिमेथन - संवाद सम्बन्धी दयानन्दीय मत का खण्डन ] ३२. अश्लील भाषणजनित वाणी के दोष का अपनोदन ३३- ३८ तीन राजपत्नियों द्वारा सूचियों से अश्व का तोदन ३ ९ -४४. छः ऋचाओं के पाठ के साथ वपा के लिये अश्व के उदर का विपाटन ४५-४८. वपाहोम से पहले चार मन्त्रों में होता और अध्वर्यु का संवाद ४ ९ -५२. चार मन्त्रों में ब्रह्मा और उद्गाता का संवाद ५३-५६. चार मन्त्रों में होता और अध्वर्यु का संवाद ५७-६०. चार मन्त्रों में ब्रह्मा और उद्गाता का संवाद ६१-६२. यजमान और अध्वर्यु का संवाद ६३-६५. इस ब्रह्मोद्य कथा के उपरान्त महिम ग्रहसम्बन्धो याज्या, अनुवाक्या और प्रैष के तीन मन्त्र चतुविश अध्याय: अश्वमेध याग १-१३. अश्वमेधीय इक्कीस यूपों में नियोजनीय पंचदशिन पशुओं का विभिन्न देवताओं से सम्बन्ध बताने वाले तेरह मन्त्र

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( ३१ ) पंचविश अध्याय: अश्वमेध याग अन्त में जुम्बकहुति १४-२३. विश्वेदेव देवता वाले पशुओं की दस याज्यानुवाक्याएँ ४०-४५. ' यत्ते ' इत्यादि छः मन्त्रों से अश्वमेधीय अश्व की स्तुति ४६-४७, दो कण्डिकाओं के छः मन्त्रों से छः आहुतियों का समर्पण वंश अध्याय: खिल मन्त्र १. प्रथम कण्डिका के सात सन्नति मन्त्रों का लैंगिक विनियोग २. यजमान की भगवान् के प्रति प्रार्थना ३. बृहस्पतिसव के लिये बार्हस्पत्य ग्रह का ग्रहण ४- ५. गोसव के लिये ऐन्द्र ग्रह का ग्रहण ६-८. तीन वैश्वानरीय पुरोनुवाक्या मन्त्र ९. अग्निसम्बन्धी पुरोनुवाक्या १०. माहेन्द्र देवता की पुरोरुक् ११. जप, स्वाध्याय आदि में विनियुक्त मन्त्र १२- १४. अग्नि देवता की भक्ति के सूचक मन्त्र १५-१८ सोम देवता की स्तुति के मन्त्र १ ९. आशीर्वादपरक मन्त्र २०. अग्नि देवता का मन्त्र २१-२२. ऋतु देवता सम्बन्धी मन्त्र २३. इन्द्र देवता का मन्त्र २४. त्वष्टा देवता का मन्त्र २५-२६. जप आदि में विनियुक्त सोम देवता का मन्त्र सप्तविंश पंचचितिकाध्याम देवता सम्बन्धी नौ ऋचाएँ १०. सूर्य देवता का उपस्थान . पृष्ठसंख्या १३१-१३४ १३४-१४६ १४७-१५८ १५८-१५९ १६०-१६७ १६७-१७८ १७८-१८३ १८३-१८५ १८६-१८७ १८७-१८८ १८८-१८९ १८ ९ -१ ९ ० १ ९०-१९ २ १ ९२-१९ ३ १ ९३-१९ ४ १ ९ ४ १ ९४-१९ ६ १ ९६-१९ ८ १ ९ ८ १ ९९ १ ९९ -२०० २०० २०१ २०१-२०२ २०३-२०१ २० ९ १४- १ ९. चातुर्मास्य वरुणप्रघासीय, साकमेधीय और शुनासीरीय पशुओं का विभिन्न देवताओं से सम्बन्ध बताने वाले मन्त्र २०-४०. इक्कीस यूपों के बीच के बीस अन्तरालों में नियोजनीय आरण्य, बिलज आदि पशुओं और उनके देवताओं के द्योतक मन्त्र १ ९. वनस्पति याग के बाद और स्विष्टकृद् याग से पहले प्रजापति के निमित्त शूल्य मांस की आहुति देकर शाद से लेकर त्वक् पर्यन्त देवताओं को अश्व के विभिन्न अंगों के निमित्त घृताहुति एवं १०-१३. प्रजापति देवता वाले अश्व आदि पशुओं के चार याज्यानुवाक्या मन्त्र २४-३९. ‘ मा नः ' इत्यादि सोलह कण्डिकाओं से चतुर्गृहीत आज्य की आहुति १ - ९, इष्टका पशु में समिध्यमान और समिद्वती के अन्तराल में विनियुक्त अग्नि, बृहस्पति और सविता

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( ३२ ) २३-२८. हुत पशु - सम्बन्धी छः याज्यानुवाक्या मन्त्र ३५-३६. रथन्तरयोनि ऐन्द्र प्रगाथ सम्बन्धी दो ऋचाएँ ३७-३८. बृहत्सामयोनि ऐन्द्र प्रगाथ सम्बन्धी दो ऋचाएँ ३ ९ -४१. वामदेव्य सामयोनि इन्द्र देवता के तीन मन्त्र ४२-४३. यज्ञायज्ञिय सामयोनि अग्निदेवता का प्रगाथ ४४. यजमानकृत अध्वर्यू की प्रार्थना अष्टाविशाध्याय: सौत्रामणी याग आदित्य देवता के प्रयाजों के प्रैष मन्त्र १२-२२. ऐन्द्र पशु सम्बन्धी अनुयाजों के प्रैष मन्त्र २३. यजमान द्वारा होता अग्नि की प्रार्थना २४-३४. वायोधस पशुसम्बन्धी एकादश प्रयाज- प्रैष मन्त्र ३५-४५. वायोघस पशुसम्बन्धी एकादश अनुयाज- प्रेष मन्त्र ४६. यजमान द्वारा होता अग्नि की प्रार्थना एकोनविंशाध्याय: आश्वमेधिक १-११. अश्व की स्तुति में विनियुक्त आप्रीसंज्ञक ग्यारह त्रैष्टुभ मन्त्र योद्धाओं के साथ धनुष, ज्या, धनुष्कोटि, आदि की स्तुति ५८. अश्वमेघीय प्रथम एकादश पशु और उनके देवता ५ ९. अश्वमेघीय द्वितीय एकादश पशु और उनके देवता त्रिशाध्याय: पुरुषमेध याग यूप में नियोजन ९ -२० अन्य यूपों में ४८ पुरुषों का नियोजन २०-२१. अवशिष्ट पशुओं का द्वितीय उच्छ्रित यूप में नियोजन २२. आठ विपरीत स्वभाव वाले शुद्रब्राह्मणभिन्न पशुओं का आलभन पृष्ठसंख्या २० ९ -२१६ २१६-२२१ २२२-२२४ २२५-२२६ २२६-२२७ २२७-२१९ २२ ९ -२३० २३०-२३१ २३१-२३२ २३३-२४० २४०-२४८ २४८-२४९ २४ ९ -२५६ २५६-२६१ २६१-२६२ २६३-२६९ २६ ९ -२७७ २७७-२८५ २८५-३०० ३००-३०१ ३०१ ३०१-३०२ ३०४-३०८ ३०८-३१७ ३१७-३१८ ३१८-३२० ११-२२. प्रयाज देवता वाली आत्री संज्ञक बारह ऋचाओं के द्वारा अग्नि देवता की स्तुति २ ९ -३४. वायव्येष्टका पशुसम्बन्धी वपा आदि द्रव्यों के छः याज्यानुवाक्या मन्त्र ४५. पंचसंवत्सरात्मक युगाध्यक्ष प्रजापति के रूप में चित्याग्नि की स्तुति १-११. इन्द्र देवता की विभूतिरूप आत्री देवताओं से सम्बद्ध ऐन्द्र पशुसम्बन्धी समित्, तनूनपात् और १२- २४. अश्व की स्तुति में विनियुक्त तेरह मन्त्र, अन्तिम मन्त्र में यजमान की शुभाशंसा २५-३६. समित्, तनूनपात् आदि देवताओं से सम्बद्ध आप्रीसंज्ञक बारह त्रैष्टुभ मन्त्र ३७-५७. अश्व के रक्षक योद्धाओं और युद्धोपकरणों की स्तुति के प्रसंग में प्रथमतः अग्नि की तथा बाद में ६०. दश आहुति वाली अवेष्टिसंज्ञक इष्टि की हवि और देवता के प्रतिपादक मन्त्र १-४. सविता देवता के चार मन्त्रों से अतिष्ठाकाम ब्राह्मण और राजन्य के लिये आहवनीयाग्नि में आहुतियाँ ३०३-३०४ ५ - ९. प्रत्येक यूप में ११-११ पशुओं के नियोजन के उपरान्त मन्त्रपठित ४८ पुरुषों का अग्निष्ठ

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एकविंशोऽध्यायः

इ॒मं मे॑ वरुण श्रुधी हव॑म॒द्या च॑ मृडय । त्वाम॑व॒स्युराचके ॥ १ ॥

मन्त्रार्थ- - अवभृथ में वरुण के पुरोडाश का यह पुरोनुवाक्या मन्त्र है । हे वरुण देव! मेरे आह्वान को आप सुनिये और आज मुझे सभी प्रकार से सुखी कीजिये । मैं अपनी रक्षा के लिये आपको बुला रहा हूँ ॥ १ ॥

श्रीरामं पुण्डरीकाक्षं प्रणमामि सलक्ष्मणम् ।

ससीतं शिव हार्दस्थं शिवात्मानं शिवप्रियम् ॥

न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत् ।

घोषणा रामभक्तस्य महावीरः स मे गतिः ॥

‘ इमं मे तत्त्वेत्येककपालस्य ' ( का ० श्र ० १ ९ ७ ७ ) । अवभृथेष्टौ वारुणस्यैककपालस्य पुरोडाशस्य इमं मे, तत्त्वा यामीति द्वे पुरोऽनुवाक्यायाज्ये इति सूत्रार्थः । वरुणदेवत्ये गायत्रीत्रिष्टुभौ शुनःशेपदृष्टे । हे वरुण, त्वं मे मम इमं हवम् आह्वानं श्रधी श्रुधि शृणु । ' श्रुशृणुपृकृवृभ्यश्छन्दसि ' ( पा ० सू ० ६ | ४ | १०२ ) इति हेधिः । संहितायां दीर्घः । च पुनः । अद्य दिने अस्मान् मृडय सुखय मा कालविलम्बनं कृथा इति यावत् । यतोऽहं त्वाम् आचके कामये । ' आचक इति कान्तिकर्मा ' ( निघ ० २२६ | ११ ) । कीदृशोऽहम्? अवस्युः, अवनमवः ' सर्वधातुभ्योऽसुन् ' ( उ ० ४।१ ९ ० ) इत्यवतेरसुन्, तदिच्छतीत्यवस्यति ' सुप आत्मनः क्यच् ', अवस्यतीत्यवस्युः ' क्याच्छन्दसि ' ( पा ० सू ० ३।२।१७० ) इत्युप्रत्ययः, आत्मनो रक्षणमिच्छन् त्वामिच्छामीत्यर्थः । अध्यात्मपक्षे -- हे वरुण सर्ववरणीय परमात्मन् त्वं मे हदमाह्वानमद्य अस्मिन्नेव दिने कालविलम्बमन्तरेण तो s हं त्वामाचके कामये । त्वं मां मृडय सुखय । अहं च अवस्युर् आत्मनोऽपारसंसारसमुद्राद् अवनमिच्छन् त्वामिच्छामीत्यर्थः । दयानन्दस्तु - ' हे वरुण, योऽवस्युरहमिमं त्वामाचके स त्वं मे हवं श्रुधि, अद्य मां मृडय च ' इति, तदपि यत्किञ्चित् मनुष्यात् तादृशकामना सिद्धेः । न च वरुणपदाभिधेयो मनुष्यो विद्वानत्राभिप्रेतः, वेदस्य धर्मब्रह्म-परत्वात् । न च विद्यार्थिनस्तत्कालमानन्दनं सम्भवति, अध्ययनसाफल्यस्य कालसाध्यत्वात् ॥ १ ॥

तत्त्वा॑यामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान॒स्तदाशा॑स्ते॒ यज॑मानो ह॒विर्भिः ।

अहेडमानो वरुणे॒ह बोद्धयुरुश समान आयुः प्रमोषीः ॥ २ ॥

मन्त्रार्थ - हे वरुण देवता! हम आपको स्तुति करते हैं । यजमान हवि प्रदान कर जो कुछ याचना करता है, यह वेद के द्वारा स्तुति करता हुआ आपको ही शरण में जाता है । मैं भी आपसे याचना करता हूँ कि है परम आराध्य देव! आप क्रोध न करते हुए हमारी प्रार्थना सुनें, हमारी आयु का नाश न होने दें ॥ २ ॥

इयम १८४ ९ स्थले व्याख्यातपूर्वा ॥ २ ॥

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२ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० २१

त्वं नो॑ अग्ने॒ वरु॑णस्य विद्वान् देवस्य हेडो अव॑यासिसोष्ठाः ।

यजि॑ष्टा॒ वह्नतम॒ शोशु॑चानो॒ विश्वा॒ द्वेषऽसि॒ प्रम॑मुग्ध्य॒स्मत् ॥ ३ ॥

मन्त्रार्थ - हे अग्निदेव! आप सब कुछ जानने वाले हैं । यज्ञ में आपकी ही प्रधानता है । आप हवि को भली माँ पहचानते हैं, कान्ति से सम्पन्न हैं । आप वरुण देवता के क्रोध से हमारी रक्षा कीजिये, सकल द्वेष दुर्भाग्य से हमें छुटकारा दिलाइये ॥ ३ ॥

' अग्नीवरुणयोस्त्वं नः स त्वमिति ' ( का ० श्र ० १ ९ । ७/८ ) अवभृथेष्टावेव आग्निवारुणयागे त्वं नः ( १ ), स त्वं ( २ ) इति पुरोनुवाक्यायाज्ये इति सूत्रार्थः । अग्नीवरुणदेवत्ये त्रिष्टुभौ वामदेवदृष्टे । हे अग्ने, त्वं नोऽस्मान् प्रति वरुणस्य देवस्य हेडः क्रोधम् अवयासिसीष्ठा अवगमय, निवर्तयेत्यर्थः । अवपूर्वस्य ' यसु प्रयत्ने ' इति दैवादिकस्य णिजन्तस्य आशीर्लिङि रूपम् । किञ्च विश्वा विश्वानि सर्वाणि द्वेषांसि दौर्भाग्यानि अस्मद् अस्मत्तः सकाशात् प्रमुमुग्धि प्रमुञ्च दूरीकुरु । मुचेर्व्यत्ययेन शपः श्लुः । कीदृशस्त्वम्? विद्वान् स्वाधिकारं जानन् | यजिष्ठो यष्टृतमः, अतिशयेन यष्टा । ' तुरिष्ठेमेयः सु ' ( पा ० सू ० ६ । ४ । १५४ ) इति तृचो लोपः । वह्नितम व्यं वहतीति वह्निः, ' वहिश्रश्रु ' ( उ ० ४।५२ ) इत्यादिना नित्प्रत्ययः, अतिशयेन वह्निर्वह्नितमो देवेभ्यो हविषां वोढा, शोशुचानः, अत्यन्तं शोचति दीप्यत इति शोशुचानः, धातूनामनेकार्थत्वात् शोचतेर्यङन्तात्.. शानचि रूपम् । अध्यात्मपक्षे - हे अग्ने भगवन् परमेश्वर, त्वमस्मान् प्रति वरुणस्य वारयति श्रेय इति वरुणः, तस्य श्रेयः प्रतिबन्धकस्य देवस्य हेडः क्रोधम् अपगमय । यतो विद्वान् तदुपायं जानासि सर्वज्ञत्वात् । भवान् यजिष्ठः श्रीरामादिरूपेण यष्टृतमः । वह्नितमः सर्वेषां प्राणिनां वोढृतमो निर्वाहयितृतमः । शोशुचानः अतिशयेन दीप्यमानः । ईदृगैश्वर्यशाली त्वमस्मत्सकाशाद् विश्वानि द्वेषांसि दौर्भाग्यानि प्रमुमुग्धि दूरीकुरु । दयानन्दस्तु - ' हे अग्ने, तद्वत्प्रकाशमान! यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विद्वांस्त्वं वरुणस्य श्रेष्ठस्य हेडोऽनादरः, तमवयासिसीष्ठा मा कुर्या: । अव निषेधार्थः । हे अग्ने, त्वं नोऽस्माकं हेडो भवेत्तं मा स्वीकुर्याः । हे शिक्षक, त्वमस्मद् विश्वा द्वेषांसि प्रमुमुग्धि प्रमोचय ' इति, तदपि यत्किञ्चित् अवेत्यस्य निषेधार्थकतायां प्रमाणस्योपन्यसनीयत्वात् । उपदेशको हि द्वेषादीनां त्यागायोपदेशमेव दातुं प्रभवेत्, न द्वेषादित्याजनं कर्तुं पारयेत्, तत्र तस्य सामर्थ्याभावात् । अग्न्यादिपदानां मनुष्ये गौण्या वृत्त्यैव प्रवृत्तित्वेन तस्य स्वीकारे मानाभावाच्च ॥ ३ ॥

सत्वं नो॑ अग्नेऽव॒मो भ॑वो॒ती नेदि॑ष्ठो अ॒स्या उषसो व्युष्टौ ।

अव॑य॒क्ष्व नो॒ वरु॑ण॒भुं ररा॑णो वीहि मृडीकथं सुहबों न एधि ॥ ४ ॥

मन्त्रार्थ - हे अग्निदेव! आप इस उषा काल को समृद्धि में अपनी पालन शक्ति के साथ हमारी रक्षा के लिये यहाँ आइये । हवि पहुँचाते समय आप हमारी तरफ से वरुण देवता को तृप्त कीजिये, स्वयं भी सुखदायक हरि का आस्वादन कीजिये और हमारे श्रेष्ठ आह्वान को सुनिये ॥ ४ ॥

हे अग्ने, स त्वम् अस्या उषसः प्रभातस्य व्युष्टौ समाप्तिकालेऽस्मिन्नेवाहनि ऊती ऊत्या अवनेन नः अस्माकम् अवमो रक्षकः, अवतीत्यवम:, ' अवद्यावमाधमार्वरेफाः कुत्सिते ' ( उ ० ५।५४ ) इत्यवतेरमः प्रत्ययः ।

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म ० ४-५ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता ३ अत्र कुत्सितग्रहणमतन्त्रम् । कुत्सितार्थे तु अवत्यात्मानमस्मादित्यवम इति विग्रहो ज्ञेयः । नेदिष्ठोऽन्तिकतमश्च भव । अत्यन्तमन्तिके वर्तमानो नेदिष्ठ: ' अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ ( पा ० सू ० ५।३।६३ ) इतीष्ठनि नेदादेशः । समीपतम इत्यर्थः । यद्वा अवतीत्यवः, पचाद्यच् । अतिशयेनावोऽवतमः, छान्दसः तकारलोपः । किञ्च, राणी रममाणो हविर्ददद्वा नोऽस्माकं वरुणं वरणीयम् अवयव अवगत्य यज । यथा वयं स्वाभिलषितं प्राप्नुयाम तथा देवेषु हविः सङ्गमय । यद्यप्यवपूर्वको यजिर्नाशनार्थकः, तथाप्यत्र धात्वन्तरयोगात् स्वार्थमेव वक्ति । अपूर्वाद् यजेर्लोट शपो लुकि रूपम् । ततो मृडीकं सुखकरं हविर्वीहि भक्षय । ' वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसन-खादनेषु ' इत्यस्य रूपम् । किञ्च, नोऽस्माकं सुहवः स्वाह्वानः, एधि भव । अध्यात्मपक्षे - हे परमात्मन् अग्ने, स त्वं नोऽस्माकमूत्यावनेन अवमः अवितृतमो भव । अन्तिकतमश्च सर्वतोऽपि भगवानेव सर्वान्तरतमत्वात् । रराणो रममाणः सर्वेषु प्राणिषु जाग्रदाद्यवस्थासु चान्तर्यामिरूपेण विश्वविराडादिरूपेण च रममाणो देवताभ्यो रामादिरूपेण हविर्वा ददत् वरुणं वरणीयमभीष्टमवयक्ष्व सङ्गमय । ततो मृडीकं सुखकरं हविर्वीहि भक्षय । नोऽस्माकं सुहवः स्वाह्वानो भव । नहि सर्वेषां कृते सर्वस्याह्वानं सुकरम् । भक्तानां भगवानेव स्वाङ्खनो भवति । ---दयानन्दस्तु - ' हे अग्ने, यथास्या उषसो व्युष्टौ विविधदाहे वह्निर्नेदिष्ठो रक्षकश्च भवति, तथा स त्वमृती ऊत्या प्रीत्या नोऽवमो भव । नो वरुणं गुणं गुणिजनम् अवयव । रराणः सन् मृडीकं वीहि । नः सुहवो भव ' इति, तदपि यत्किञ्चित्, अग्निपदस्य मुख्यार्थत्यागे मानाभावात्, वरुणपदस्य गुण्यर्थतापि निर्मूला ॥ ४ ॥

म॒हो म॒षु मा॒तर॑थ॒ सुव्र॒ताना॑स॒तस्य॒ पत्नी॒मव॑से हुवेम । तु॒वि॒क्ष॒त्राम॒जर॑न्तीमु॒रू॒चो सुशर्माणमदिति सुप्रणतिम् ॥ ५ ॥

मन्त्रार्थ - यह आदित्य चह का याज्या मन्त्र है । परम महिमा वाली शुभ कर्मों की माता सत्य और यज्ञ की पालिका, अनेकों प्रकार की पीड़ा से रक्षा करने वाली, जरारहित, विस्तीर्ण मार्ग पर चलने वाली सुखरूप सुन्दर प्रेममयी अदिति का हम अपनी रक्षा के लिये आह्वान करते हैं ॥ ५ ॥

' आदित्यस्य सुत्रामाणं महीमूषु मातरमिति ' ( का ० श्र ० १२१७१ ९ ) ' आदित्यं चरुं यक्ष्यमाणो निर्वपत्या-दित्यमीजान: ' ( श ० १२ / ९ / २ / ११ ) इति श्रुतौ आदावन्ते च आदित्य: ( अदितिदेवत्यः ) चरुरुक्तः । तस्य ' सुत्रामाणम् ' ( वा ० सं ० २११६ ) इति पुरोऽनुवाक्या, ' महीमूषु ' इति याज्येति सूत्रार्थः । अदितिदेवत्या त्रिष्टुप् । ऊषु निपातौ पादपूरणायौं । संहितायामाद्यस्य दीर्घः, अन्त्यस्य च षत्वम् । महीं महतीं सुव्रतानां शोभनकर्मणां मातरं निर्मात्रीम् । व्रतमिति कर्मनाम ( निघ ० २०१७ ) । ऋतस्य यज्ञस्य पत्नीं पालयित्रीम् । तुविक्षत्रां बहुक्षरणां बहुक्षतात् त्राणशीलां वा । तुवीति बहुनाम ( निघ ० ३ १ २ ) | अजरन्तीं न जीर्यतीत्यजरन्ती, तां जरारहिताम्, नित्यनूतनामिति यावत् । उरूचीम् उरु अञ्चतीति उरूची बहुगमनशीला, ताम्, बहुव्यञ्जनां वा । सुशर्माणं शोभनं शर्म आश्रयः सुखं वा यस्याः सा सुशर्मा ताम् । कल्याणाश्रयां साधुसख्यां वा । सुप्रणीतिः सुष्ठु शोभना प्रणीतिः प्रणयनं भजनं यस्यास्ताम् । अदितिम् अदीनां देवमातरम् | ' अदितिरदीना देवमाता ' ( निरु ० ४। २ २ ) इति याकः । तादृशीमदितिं वयमवसे अवितुं रक्षितुम, तुमर्थे असे प्रत्ययः । अवनाय तर्पणाय वा हुवेम आह्वयामः ।

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४ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० २१ अध्यात्मपक्षे - शोभनानां कर्मणां सङ्कल्पानां मातरं निर्मात्रीम् ऋतस्य ससत्यस्य यज्ञस्य पत्नीं पालयित्रीम्, ससत्यस्य ब्रह्मणः पत्नीं जायां वा । तुविक्षत्रां बहुक्षतत्राणाम् I । अजरन्तीं जरादिविकाररहिताम् । उरूची बहुव्यापिनीं सर्वव्यापिकामित्यर्थः । सुप्रणीति सुप्रणेत्रीम्, अथवा सुष्ठु शोभना प्रणीतिः प्रणयनम् अन्तः प्रवेशनं हृदये ध्यानं वा यस्याः सा सुप्रणीतिस्ताम् । अदितिम् अखण्डनीयां नित्यां भक्तिदेवीं ध्यानादीनां रक्षणाय वयमाह्वयामः । दयानन्दस्तु – हे ' मनुष्याः, यथा वयं मातरमिव सुव्रतानामृतस्य पत्नी स्त्रीवद्वर्तमानाम् अजरन्तीं वयोहानिरहिताम्, शोभनानि शर्माणि गृहाणि यस्यास्ताम् । शोभनाः प्रकृष्टा नीतयो यस्यास्ताम्, अवसे हुवेम तथा यूयम् अपि गृह्णीत ' इति, तदपि यत्किञ्चित् पृथ्व्याः सत्यपत्नीतुल्यत्वस्य निराधारत्वात् कार्यंमात्रस्य षड् विकारवत्त्वेन पृथिव्या अजरत्वानुपपत्तेश्च, जडायां तस्यां नीतेरप्यनुपपत्तेश्च ॥ ५ ॥

सु॒त्रामा॑णं पृथि॒वीं द्याम॑ने॒हसः॑ सु॒शमा॑ण॒मद॑तिधु॑ स॒प्रणी॑तिम् ।

देव॒ नाव॑भिः॒ स्वरि॒त्रामना॑गस॒ मन॑वन्त॒मारु॑हेमा स्व॒स्तये॑ ॥ ६ ॥

मन्त्रार्थ - विशाल स्वर्ग रूप, क्रोध रहित, रक्षा करने वाली, सबको शरण देने वाली, सुन्दर घर वाली, परम प्रेममयी, निर्दोष, निन्दाशून्य, देवसम्बन्धी यज्ञ के स्वरूप वाली, अच्छी पतवार वाली, अखण्डित अदिति नामक नाव पर कल्याण पाने के निमित्त हम चढ़ते हैं, अर्थात् यथाविधि सम्पादित यज्ञमयी नौका बनाकर हम अनेक प्रकार के सुख भोग के लिये स्वर्ग जाना चाहते हैं ॥ ६ ॥

अदितिदेवत्या त्रिष्टुप् गयः प्रातदृष्टा । देवीं देवसम्बन्धिनीं नावं यज्ञमयीमारुहेम, यज्ञं कृत्वा स्वर्गं गच्छेमेत्यर्थः । कीदृशीं नावम्? सुत्रामाणं सुष्ठु त्रायते रक्षतीति सुत्रामा साधुपालयित्री, ताम् । लुप्तोपमा । पृथिवीं पृथिवीमिव विशालाम् । द्यां द्यामिव वाहयित्रीं जीवनहेतुभूताम् । ' अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्ट-कामधुक् । ' देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ' ( भ ० गी ० ३।१०-११ ) इति भगवद्वचनात् । स्वर्गसाधनत्वात् स्वर्गरूपां वा । अनेहसं नास्ति एहः क्रोधो यत्र सा अनेहाः, ताम् । ' एह इति क्रोधनाम ' ( निघ ० २।१३।६ ) । सुशर्माणं साधुशरणाम् । अदितिमखण्डिताम् । सुप्रणीत सुप्रणेत्रीम्, स्वरित्रां शोभनमरित्रं यस्यां सा स्वरित्रा, ताम् । अरित्रशब्दः केन्दुवालवचनः । ' अरित्रं केनिपातकः ' ( अ ० को ० १।१०।१३ ) इत्यमरः । केन्दुवालशब्दस्य भाषायां पतवार इत्यर्थः । अथवा नौकाया उभयतो वहनसाधनानि काष्ठान्यरित्राणि तानि चालकप्रेरितानि यथा चालकमनोऽनुसारं नावं गमयन्ति तथैव यज्ञे प्रयाजानुयाजादयः, तैरेव यज्ञनिर्वहणात् । अनागसम् अनपराधाम् । अस्रवन्तीम् अच्छिद्रां निर्दोषामिति यावत् । ईदृशीं नावमारुहेमा, संहितायां दीर्घः । कस्मै प्रयोजनाय? स्वस्तये कल्याणाय अविनाशाय । अध्यात्मपक्षे - वयं स्वस्तये परमकल्याणाय मोक्षाय, अनौपचारिकस्याविनाशस्य तत्रैव सत्त्वात् । दैवीं देवः स्वप्रकाशः परमेश्वरः, तत्सम्बन्धिनीं ब्रह्मविद्यारूपां नावमारुहेम, ब्रह्मविद्यया ब्रह्मात्मनावस्थानरूपं मोक्षमारुहेम । कीदृशीं नावम्? सुत्रामाणं साधुपालयित्रीम्, तदतिरिक्तस्य पालकत्वायोगात् ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( वा ० सं ० ३१।१८ ) इति मन्त्रवर्णात् । पृथिवीं तद्वद्विशालाम्, विषयस्यानन्तत्वेन ब्रह्मविद्याया विशालत्वात् । द्यां द्यामिव प्रकाशरूपाम् । अनेहसं कालवदनतिक्रमणीयाम् क्रोधादिदोषनिबर्हणी शोभनाश्रयभूताम् अदितिम् अबाधितां बाधकप्रमाणरहिताम्, सुप्रणीति ब्रह्मात्मभावप्रणेत्रीम्, स्वरित्रां सुष्ठु

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म ० ६-८ ] वेदार्थपारिजात भाष्यसहिता शोभना अरित्रस्थानीयाः शमदमादयो यस्यां सा स्वरित्रा, ताम् । अनागसं सर्वापराधप्रशमनीम् । अस्रवन्तीं निश्छिद्रां तादृशीं ब्रह्मविद्यामारुहेम । दयानन्दस्तु - ' हे शिल्पिनः, यथा वयं स्वस्तये सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीति स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीं देवीं नावमारुहेम, तथा यूयमारोहत ' इति, तदपि यत्किचित् नौकास्वविदुषामपि सम्बन्धाविशेषात् तस्यां जडायां राज - प्रजाखण्डनीतिसम्बन्धायोगाच्च । शिल्पिन इति सम्बोधनमपि निर्मूलम् । न च तस्यामनौपचारिकं सुखं भवति, बाह्य साधनसाध्यत्वेनानित्यत्वात् ॥ ६ ॥

सुनाव॒मारु॑य॒ मन॑वन्त॒मना॑गसम् । श॒तारि॑त्राधः॑ स्व॒स्तये॑ ॥ ७ ॥

मन्त्रार्थ -- छिद्ररहित, अपराध रहित होने से सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली, वेद मन्त्ररूप अनेक पतवार वाली इस यज्ञमयी श्रेष्ठ नौका पर हम संसार सागर पार होने के निमित्त चढ़ते हैं ॥ ७ ॥

स्वर्गसम्बन्धिनी नौ यज्ञदेवत्या गायत्री, ' तद्वै सर्व एव यज्ञो नौः स्वर्ग्या ' ( श ४ | २५ | १० ) इति श्रुतेः । स्वर्ग्या नौर्यज्ञ एव । सुनावं शोभनां नावं यज्ञरूपां स्वस्तयेऽविनाशाय संसारसागरोत्तारणाय अहमारुहेयम्, आरोहेयम्, यज्ञेन यजेयमित्यर्थः । कीदृशीं नावम्? अस्रवन्तीं निश्छिद्राम्, निर्दोषामित्यर्थः । अनागसं निरपराधाम्, अभीष्टार्थसाधनतत्परा मित्यर्थः । शतारित्रां शतानि ऋग्यजुः साममन्त्ररूपाण्यरित्राणि वहनसाधनानि केन्दुवालानि यस्यां सा शतारित्रा, तां तादृशीं सुनावमारोहेयमिति सम्बन्धः । अध्यात्मपक्षे – ज्ञानयज्ञरूपेयं नौः, तस्या एवानुपचरितं स्वर्गप्राप्तिसाधनत्वात् । तादृशी नावं स्वस्तये संसारसमुद्रोत्तारणाय विमोक्षाय आरोहेयम् । कीदृशीम्? अस्रवन्तीं निश्छिद्रामनागसमपापाम्, पापनाशिनीमिति यावत् । ' यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते ऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ' ( भ ० गी ० ४ | ३७ ) इति भगवद्वचनात् । शतारित्रां शतान्यपरिगणितानि वेदमहावाक्यान्यरित्र स्थानीयानि यस्यां सा शतारित्रा ताम् । दयानन्दस्तु - ' हे मनुष्याः यथाहं स्वस्तये अस्रवन्तीमनागसं शतारित्रां नावमारुहेयम्, तथाऽस्यां यूयमारोहत ' इति, तदपि तुच्छम् विकल्पानुपपत्तेः? तथाहि कोऽयमस्य मन्त्रस्य वक्ता? न जीवः, तस्याप्युपदेष्टव्य तुल्यत्वात्, वेदस्य पौरुषेयत्वापाताच्च । नापीश्वरः, तस्य व्यापकत्वेन तरणीयत्वाभावात्, निरस्तसमस्तानर्थस्य तस्य स्वस्तिरूपस्य स्वस्तये तरेरनपेक्षणात् ॥ ७ ॥

आ नो॑ मित्रावरुणा घृतैर्गव्यू॑तिमुक्षतम् । मध्वा रजसि सुक्रतू ॥ ८ ॥

मन्त्रार्थ - हे श्रेष्ठ कर्म वाले मित्रावरुण देवताओं, हमारे यज्ञ मार्ग को आप धी से सींचिये और स्वर्गं आदि लोकों के मार्ग को मधु से सींचिये ॥ ८ ॥

' आ नः प्र बाहवेति पयस्यायाः ' ( का ० श्र ० १ ९ । ७ । १० ) । ' अवभृथादुदेत्य मैत्रावरुण्या पयस्यया यजते ' ( श ० १२।९ ।२।१२ ) इति विहिता या पयस्या तस्या आ नो मित्रावरुणेति पुरोऽनुवाक्या प्र बाहवेति याज्या इति सूत्रार्थ: । मित्रावरुणदेवत्या गायत्री विश्वामित्रदृष्टा । हे मित्रावरुणा, मित्रावरुणौ तन्नामकौ देवौ, युवां • नोऽस्माकं गव्यूतिं गव्यूतिपर्यन्तं यज्ञमार्गं घृतैरक्षारोदकैः शुद्धोदकैरा समन्ताद् उक्षतं सिञ्चतम् । यद्वा

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शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० २१ वि पृथिव्यामूर्तिमवनहेतुभूतं क्षेत्रं गोप्रचारं वा आ समन्तात् सिञ्चतम् । किञ्च हे सुक्रतू, सुष्ठु शोभनः क्रतुः कर्म ययोस्तौ सुक्रतू तत्सम्बोधने, मध्वा मधुना मधुस्वादूदकेन रजांसि लोकान् उक्षतम् । मध्वेत्यत्र आगमशास्त्रस्य अनित्यत्वान्नुमभावः । अध्यात्मपक्षे — हे मित्रावरुणा तद्वद् बलकृष्णौ घृतैर्धृतदुग्धादिभिर्गव्यूति क्षेत्रमुक्षतं सिञ्चतम् । हे सुक्रतु शोभनसङ्कल्पौ, मध्वा मधुना रसेन मधूदकेन रजांसि लोकान् उक्षतं सिञ्चतम् । दयानन्दस्तु – हे ' मित्रावरुणा, प्राणोदानवद्वर्तमानौ सुक्रतू शिल्पिनौ, युवां घृतैर्नो गव्यूति क्रोशद्वयं मध्वा जलेन रजांसि उक्षतम् ' इति, तदपि यत्किञ्चित् गौणार्थग्रहणस्य निर्मूलत्वात् शिल्पिनोः प्राणोदानयोः सारूप्यानिरूपणात्, द्विवचनस्य अतन्त्रत्वाच्च । शिल्पिद्वयस्य हि लोकद्वयरोचने सामर्थ्याभावात् सर्वलोकरोचनं तु दूरतो निरस्तम् ॥ ८ ॥

प्र बा॒हवा॑ सिसृतं ज॒वमे॑ न॒ आ नो॒ गव्यू॑तिमुक्षतं घृ॒तेन॑ ।

आ मा॒ जने॑ श्रवयतं युवाना श्रुतं में मित्रावरुणा हवेमा ॥ ९ ॥

मन्त्रार्थ हे तरुण मित्रावरुण देवताओं! आप मेरी इस पुकार को सुनिये, हमारे चिरकाल तक के जीवन के निमित्त भुजाओं को फैलाइये, हमारे अन्तरिक्ष को शुद्ध जल से सब तरफ से सींचिये और हमारी कीर्ति को सभी लोकों में फैलाइये ॥ ९ ॥

मित्रावरुणदेवत्या त्रिष्टुप् वसिष्ठ दृष्टा । हे मित्रावरुणा मित्रावरुणौ, हे युवाना युवानौ तरुणौ उच्छिन्नजरसौ, नोऽस्माकं जीवसे चिरं जीवनाय बाहवा बाहू प्रसिसृतं प्रसारयतम् | अन्तर्भाविण्यर्थः । बाहुप्रसारणमपि जीवनहेतुप्रतिपक्ष निराकरणायेत्यर्थः । किञ्च, नोऽस्माकं गव्यूति जीवनहेतुभूतं क्षेत्रं घृतेनाक्षारोदकेन आ आभिमुख्येन उक्षतं सिञ्चतम् । तदर्थं हि वृष्टिः प्रार्थ्यमाना दृष्टार्था भवति । गो विषयभूतां वा ऊतिम् अवनमार्गम् । भक्षणमार्गाभिप्रायमेतत्, अतो गोत्रवाटमिति यावत्, गवां स्थितिस्थानाद् अदूरवर्तिनी गोचरभूमिरिति तात्पर्यम् । एवं भवत्सिक्तक्षेत्र धान्यैः सान्नायादिभिश्च यज्वानं मा मां जने प्रतिजन जनपदे वा आश्रावयतम् इत्थं भूरि अदाद इत्थमयाक्षीद् अहो अस्य यज्ञसम्पत्तिः श्रद्धासम्पत्तिश्चेति लोकेषु कथयतं वर्णयतमित्यर्थः । किञ्च 1 युवां मे मम हवेमा इमा इमानि हवा हवानि आह्वानानि श्रुतं शृणुतम्, शृणोतेः शपो लुक् श्रुत्वा च मदभिहितं कुरुतमित्यर्थः । अध्यात्मपक्षे - हे पूर्वोक्तौ मित्रावरुणौ बलकृष्णौ रामलक्ष्मणौ वा, युवानौ छिन्नजरसौ दिव्यत्वात्, नोऽस्माकं जीवसे जीवनसाफल्याय बाहू प्रसिसृतं प्रसारयतम् । शेषं पूर्ववद् व्याख्येयम् । दयानन्दस्तु — ' हे मित्रावरुणा, बाहवा बाहू इव मिश्रिता युवाना युवां नो जीवसे जीवितुं मां प्रसिसृतं प्राप्नुतम् । घृतेन जलेन नो गव्यूति क्रोशयुग्मं ओक्षतं नानाकीर्तिमाश्रावयतम् । मे जन इमा हवा श्रुतं शृतम् ' इति, तदपि यत्किञ्चित्, जीवनस्य मनुष्यातन्त्रत्वात् न च क्रोशद्वयसिचनस्य सार्थक्यम् अतन्त्रत्वात् । न चाध्यापकपदेशकयोरायत्तं जीवनं कीर्तिवर्धनं वा निष्पद्यते? न वा वादिप्रतिवादिनोर्वादविवादयोः श्रवणं पुरुषार्थः, लोकसिद्धत्वात् ॥ ९ ॥

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वैदार्थपारिजार्तभाष्यसहिता

शं नो भवन्तु वाजिनो हवे॑षु दे॒वता॑ता मि॒तद्र॑वः स्व॒र्काः ।

ज॒म्भय॒न्तो वृएं रक्षसि॒ सर्वे॑भ्य॒स्मद्य॑व॒न्नमी॑वाः ॥ १० ॥

७ मन्त्रार्थ - देवताओं के कार्य के निमित्त यज्ञ में बुलाने पर बड़ी तेजो से दौड़कर आने वाले, श्रेष्ठ प्रकाश वाले सांप, भेड़िये और राक्षसों का नाश करने वाले घोड़े हमारे लिये कल्याणकारी हों, हमारी सब प्रकार की दीर्घकाल की बीमारियों को दूर भगा दें ॥ १० ॥

' वाजिनस्य शं नो वाजे वाज इति ' ( का ० श्र ० १ ९ | ७ | ११ ) । पयस्यायां वाजिनयागोऽस्ति तत्र शं न इति पुरोऽनुवाक्या, वाजे वाजे ( वा ० सं ० २१।११ ) इति याज्येति सूत्रार्थः । इयं पुरोऽनुवाक्या ९ | १६ स्थले व्याख्याता ॥ १० ॥

वाजेवाजेऽवत वाजिनो नो धने॑षु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः ।

अ॒स्य मध्वः॑ पिबत मा॒दय॑ध्वं तृप्ता या॑ति प॒थिभि॑िदे॑व॒याने॑ः ॥ ११ ॥

मन्त्रार्थ - हे अश्वों, तुम बुद्धिमान् दीर्घजीवी सत्य को जानने वाले हो, सब प्रकार के धन और अन्न से हमारा पालन करो । यहाँ से जाने के पहले हमारी दी हुई इस मधुर हथि को नी बार सूंघ कर उसका पान करो और तृप्त हो जाओ । तृप्त होने के उपरान्त देवयान में अधिष्ठित मार्गों से गमन करो ॥। ११ ॥

इयं याज्या ९ ।१८ स्थले व्याख्याता ॥ ११ ॥

समि॑द्धो अ॒ग्निः स॒मिधा सुसमिद्धो वरेण्यः ।

गा॒य॒त्री च्छन्द॑ इन्द्रि॒यं व्यवि॒र्गौर्वयो॑ दधुः ॥ १२ ॥

मन्त्रार्थ - बड़ी - बड़ी समिधाओं के द्वारा भली प्रकार प्रज्वलित की गई, पूर्णतया प्रदीप्त प्रार्थना करने योग्य अग्नि देवता, गायत्री छन्द की शक्ति और डेढ़ वर्ष की गो— ये सब पूजित होकर यजमान में बल और आयु की स्थापना करें ॥ १२ ॥

' वायोधसाप्रियः समिद्धोऽग्निः समिधेति ' ( का ० श्रौ ० १ ९ / ७ / १३ ) । ' वायोधसस्य पशोराप्रियः प्रयाजयाज्याः ' समिद्धो अग्निः समिधा ' इत्येकादशर्चो भवन्तीति सूत्रार्थः । एकादश आप्रीदेवत्या अनुष्टुभः स्वस्त्यात्रेयदृष्टाः । ` अग्निः, गायत्रीच्छन्दः, गौश्च एते त्रय इन्द्रे इन्द्रियं वीर्यं वयः सत्त्वमन्नमायुर्वा दधुः दधतु प्रयच्छन्तु । कथम्भूतोऽग्निः? समिधा प्रयाजदेवतया समिद्धो दीप्तः, सुसमिद्धश्च अतिदीप्तः, प्रयाजघृ शेषः । वरेण्यो वरणीयः सम्भजनीयः । कीदृशो गौः? त्र्यविः, त्रयोऽवयोऽनुचरत्वेन यस्य सः । यद्वा षण्मासावधिः कालोऽविः, ततस्त्रयोऽवयो यस्य सः, सार्धवत्सरो गौरित्यर्थः । अध्यात्मपक्षे - समिधा दीप्तिसाधनभूतया बुद्ध्या समिद्धो दीप्तश्चिदात्मा वेदान्तवाचा सुतरामिद्धोऽत्यन्तं दीप्तः सन् ब्रह्मात्मना दीप्यते, स च वरेण्यो वरणीयः सम्भजनीयो भवति । तादृशोऽग्निः, गायत्री च्छन्दस्तदधिष्ठाता देव, त्र्यविगश्च अर्थात् तदधिष्ठाता देवश्च इन्द्रे चक्षुरादिभिर्विशिष्टदीप्तियुक्तेऽधिकृते जीवे इन्द्रियं वीर्यं वयः सत्त्वमन्नमायुर्वा दधुः दधतु । दयानन्दस्तु - ' यथा समिद्धोऽग्निर्वह्निः समिधा, सुसमिद्धः सूर्यो वरेण्यो वरणीयो जनः, गायत्रीच्छन्द-• श्चेन्द्रियं मनः प्राप्नोति, यथा च त्र्यविगर्वियो दधाति तथा विद्वांसो जीवनं दधुः । त्रयाणां शरीरेन्द्रियात्मनाम्