वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 361–370

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 361–370

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( १० ) धृष्टियों के द्वारा दिशा में प्रादेश को रखता है । उसके उपरान्त अध्वर्यु ' स्वाहा मरुद्भि: ' ( ३७ | १३ ) और मन्त्र उदगग्र से १३ विकंकत गार्हपत्य अग्नि के अंगारों को महावीरों की चारों दिशाओं में रख कर प्रागग्र देता है । धवित्र ( पंखा ) से अग्नि का काठ के टुकड़ों से महावीर का परिश्रयण कर अंगारों के ऊपर उनको रख प्रदक्षिणा की जाती है । यदि पहले प्रज्वालन करते समय पहले यदि प्रदक्षिणा नहीं की गई है, तो यहाँ उसकी तीन, अग्नीत् प्रतिप्रस्थाता, प्रयोक्ता प्रदक्षिणा कर ली गई है, तो यहाँ अब एक ही प्रदक्षिणा करके ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु ३७।२० ) पर्यन्त अवकाश और यजमान – ये सब मिलकर ' गर्भो देवानाम् ' ( ३७ | १४ ) इत्यादि ' नमस्ते अस्तु कर ' ( महावीर को देख रही यजमान नाम वाले मन्त्रों से घर्म का उपस्थान करते हैं । इसके बाद शिर से अपना वस्त्र हटा केतुना ' ( ३७।२१ ) इत्यादि पत्नी को अध्वर्यु ' त्वष्टृमन्तः ' ( ३७/२० ) मन्त्र का वाचन कराता है । तदुपरान्त ' अहः प्रातः काल तथा इसी मन्त्र के इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र के पूर्वाधं से रोहिणहवनी स्रुचा से रोहिण पुरोडाश की उत्तराधं से द्वितीय रौहिण पुरोडाश की आहुति दी जाती है । ३८ वाँ अध्याय: महावीर संभरण बाँधने की रज्जु को हाथ में लेकर अध्वर्यु ' देवस्य त्वा ' जाकर ' इड एहि ' ( ३८२ ) इत्यादि तीन मन्त्रों से ( ३८1१ ) मन्त्र का धर्मदुधा गाय के पिछले पैरों को गाय को पुकारता है । उच्चारण करते हुए गार्हपत्य अग्नि के पीछे ३८ | ३ ) इत्यादि मन्त्र से उसे खंभे से फिर तीन बार उसका नाम लेकर पुकारता है । गाय के आ जाने पर ' अदित्यै ' ( से लिये छोड़ता है । तब ' अश्विभ्याम् ' ( ३८ । ४ ) मन्त्र बाहर गिरे दूध के कणों को ' स्वाहेन्द्रवत् ' ( ३८।४ ) ( बाँध कर ' पूषाऽसि ' ( ३८ ३ ) मन्त्र से बछड़े को दूध पिन्हाने के गाय को पिन्वन पात्र में दुहता है और दुहते समय पिन्वन पात्र के का स्पर्श कर इसी मन्त्र के इत्यादि मन्त्रगत तीन वाक्यों से अभिमन्त्रित करता है । ' यस्तै स्तनः ' ( ३८/५ ) से गाय के स्तन ' ( ३८ | ६ ) इत्यादि ' उर्वन्तरिक्षम् ' इत्यादि भाग का पाठ करते हुए गार्हपत्य अग्नि के पास पहुँचता है । फिर ' गायत्रम् के दूध से तूष्णीं सेचन कर कण्डिका के दो मन्त्रों से दो परीशासों का ग्रहण करता है । इसके बाद महावीर का बकरी अग्नि की ज्वाला के शान्त होने पर ' इन्द्राश्विना ' ( ३८ | ६ ) मन्त्र से उस पर गाय ' के दूध त्वा का ' सेचन ३८ | करता ७-८ ) है इत्यादि । ' प्रतु ब्रह्मणस्पति ' होता के ऐसा कहने पर अध्वर्यु आहवनीय अग्नि की तरफ बढता हुआ अध्वर्यु समुद्राय अपसव्य होकर दक्षिण दिशा में afusar ओं में पठितवात के बारह नामों का सस्वर उच्चारण करता है । अन्त में करे । तब धर्म को हाथ में मुँह करके ' स्वाहा धर्मः पित्रे ' ( ३७।९ ) मन्त्र का जप करे और सव्य होकर जल का स्पर्श के बाद ' विश्वा आशाः ' लेकर उसके निमित्त आहुति देने के लिये आश्रावण करे । वषट्कार का उच्चारण करने ऊपर उठा कर तीन बार ( ३८ | १० ) मन्त्र से धर्म की आहुति दे । तब ' दिवि घा: ' ( ३८ | ११ ) मन्त्र से महावीर ' को ( ३८ | ११ ) मन्त्र के बाद हिलावे | पहला उत्कम्पन समन्त्रक तथा बाकी दो तूष्णीं किये जाते हैं । ' स्वाहाग्नये ' वषट् स्वाहा ' कह कर घर्म की आहुति दी जाती है । अब ब्रह्मा ' अश्विना ' ( ३८।१२ ) मन्त्र से और यजमान ' अपाताम् ' ( ३८ | १३ ) मन्त्र से धर्म अनुमन्त्रण को अनुमन्त्रित करता करते हैं । ‘ इषे पिन्वस्व ' ( ३८ | १४ ) मन्त्र से आहवनीय अग्नि में सिच्यमान धर्म का भी यजमान ही ' अमेन्यस्मे ' मन्त्र से है | फिर इसी कण्डिका के ' धर्मासि ' इत्यादि मन्त्र से ईशान दिशा की तरफ उत्क्रमण करता है और साथ इस घर्माज्य की महावीर को खर पर रखता है । अब घर्म में घृत लगा कर विकंकत काष्ठ के सात टुकड़ों के विस्तृत किये हुए अंगुष्ठ और तर्जनी के मध्य भाग को प्रादेश कहते हैं ( वहीं, पृ ० ५०३ ) । २ १.. ब्राह्मण और सूत्र ग्रन्थों में धृष्टि शब्द गार्हपत्याग्नि से अंगारे उठाने के लिये प्रयुक्त चिमटे के अर्थ में आया है ( वैदिक कोश, पृ ० २२१ ) । प्रस्तुत स्थल पर यह शब्द द्विवचन में प्रयुक्त है ।

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( ११ ) जाती है । चतुर्थ काष्ठशकल की ' स्वाहा पूष्णे ' ( ३८।१५-१६ ) इत्यादि दो कण्डिकाओं के सात मन्त्रों वेदि से पर आहुति आस्तीर्ण दी बहि के दक्षिण भाग में उसे आहुति न देकर उत्तर दिशा को देखते हुए वेदि के दक्षिण भाग सातवें में काष्ठशकल को दक्षिण दिशा की तरफ देखता हुआ छिपा दिया जाता है । पूरे घर्मं को घृताभ्यक्त कर उसके साथ में फेंक देता है । बाकी के पाँच काष्ठखण्डों की अध्वर्यु प्रतिप्रस्थाता को दे देता है । प्रतिप्रस्थाता उसे शाला के उत्तर भाग दी जाती है और अन्त में होता, अध्वर्यु, घृत के साथ आहुति दी जाती है । यहाँ दो रौहिण पुरोडाशों की भी आहुति पात्र में आनीत धर्माज्य की अग्निहोत्र प्रकरण के ब्रह्मा, प्रस्तोता प्रतिप्रस्थाता, अग्नीत् और यजमान मिल कर उपयमनी साथ उसका भक्षण करते हैं । अब ' अभीमम् ' क्रम से समन्त्र आहुति देकर वाजिन याग के समान उपहव प्रार्थना के दो धर्मों को तूष्णीं रखा जाता है । तब अध्वर्यु ( ३८ । १७ ) मन्त्र से प्रचरणीय घर्म को आसन्दी पर रखा जाता है । अन्य । चतुर्गृहीत संस्कृत घृत से ' या ते धर्म ' ( ३८।१८ ) मन्त्र से आहुति देता है पाठ करता हुआ शाला से इसके बाद अध्वर्यु यजमानपत्नी को आगे करके ' क्षत्रस्य त्वा ' ( ३८ / १ ९ ) मन्त्र का सामने महावीर का आसादन कर जलयुक्त बाहर निकल जाता है । तब ' चतुःस्रक्ति: ' ( ३८/२० ) मन्त्र से नाभि के स्थानों को, अर्थात् तीन महावीर स्थानों, दो द्वीप में धर्म का उद्वासन कर देता है । इसके उपरान्त सात उत्सादन से दूध से भर देता है । इसके बाद साम का पिन्वन स्थानों, उपयमन स्थान और स्रुवा को ' घर्मेतत् ' ( ३८।२१ ) मन्त्र ' ( ३८ | २२ ) मन्त्र से धर्म की सूर्य के रूप में गान किया जाता है और उत्सादन देश को दूध से सींच कर ' अचिक्रदत् | २३ ) मन्त्र से चात्वाल का मार्जन करते स्तुति की जाती है । अब सपत्नीक ऋत्विक् और यजमान ' सुमित्रिया: ' यजमान ( ३८ ईशान कोण की तरफ जाता है । वहाँ से हैं । तब ' उद्वयम् ' ( ३८ २४ ) मन्त्र का उच्चारण करता हुआ में लेकर ' समिदसि ' ( ३८ २५ ) मन्त्र से आते समय बिना पीछे देखे ' एधोऽमि ' ( ३८ २५ ) मन्त्र से एक समिधा हाथ से सपवित्र अग्निहोत्रहवणी में दधिघमं का उसे आहवनीय स्थान में रख देता है । अब ' यावती ' ( ३८।२६ ) मन्त्र ' मयि त्यत् ' ( ३८ | २७ ) मन्त्र से ग्रहण कर उसकी आहुति दी जाती है । अवशिष्ट दधिधर्म का यजमान स्थित और ऋत्विक् गायत्री मन्त्र से भी दधिधर्म का भक्षण किया सोपहव भक्षण करते हैं । इस अध्याय की अन्तिम २८ वीं कण्डिका का भक्षण किया जाता है । जाता है । इस कण्डिका के शेष भाग से महाव्रतीय दिन में हुतशेष दधिधर्मं ३ ९वां अध्याय: धर्मभेदप्रायश्चित्त पड़ता है । इसकी प्रक्रिया प्रवर्ग्य का अनुष्ठान करते समय धर्मं यदि टूट जाय, तो इसके निमित्त टूटे हुए प्रायश्चित्त धर्म का करना स्पर्श कर परमेष्ठी आदि के लिये यों है - अध्वर्यु ' भूमिभूमिम् ' और ' य ऋते चित् ' इन दो मन्त्रों से देकर ' पृथिव्यै स्वाहा ' ( ३ ९ ।२ - ३ ) इत्यादि ३४ आहुतियाँ देकर ' स्वाहा प्राणेभ्यः ' ( ३ ९ | १ ) मन्त्र से एक पूर्णाहुति ' ( ३ ९ ४ ) इत्यादि मन्त्र से पुनः पूर्णाहुति मन्त्रों से २० आहुतियाँ सकृत् गृहीत आज्य की दे तथा अन्त में ' मनसः हैं कामम् । इनके मन्त्रों का स्वरूप भाष्य में दिया गया दे । इस प्रकार यहाँ प्रारम्भ और अन्त में दो पूर्णाहुतियां दी जाती उल्लेख पाँचवें मन्त्र में है । उन - उन अवस्थाओं है ( पृ ० २१३, २१५ ) । महावीर की संभ्रियमाण आदि अवस्थाओं का दी जाती हैं । इसी तरह से प्रथम, में महावीर का भेद होने पर ' प्रजापतये स्वाहा ' ( ३ ९ / ५ ) इत्यादि मन्त्रों से आहुतियाँ ' सविता प्रथमेऽहन् ' ( ३ ९ ।६ ) द्वितीय आदि दिनों में घर्मभेद होने पर तत्तद् देवताओं के लिये आहुतियों का विधान मारुत पुरोडाशों की ' शुक्रज्योतिः ' इत्यादि मन्त्रों द्वारा किया गया है । इन प्रायश्चित्ताहुतियों के पश्चात् चयन स्थान संज्ञक में छः सप्तम पुरोडाश की आहुति ' उग्रश्र्च ' ( १७ / ८०-८५ ) इत्यादि छः मन्त्रों से आहुतियां देने के बाद अरण्यानूच्य ( ३ ९! ७ ) मन्त्र से देते हैं । इस मन्त्र की विमुख संज्ञा है । १. ऋत्विजों द्वारा किसी प्रकार को प्रार्थनीय अनुमति को उपहव कहते हैं ( कात्या ०, पृ ० ४७३ ) ।

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( १२ ) विमुख संज्ञक इस मन्त्र से आगे की ' अग्नि हृदयेन ' ( ३ ९ १८ - ९ ) इत्यादि दो कण्डिकाओं से उन - उन देवताओं को उन - उन अश्वांगों के साथ चतुर्गृहीत आज्य की आहुतियाँ दी जाती हैं । आचार्य हरिस्वामी के मत से प्रयोग का स्वरूप कैसा होगा, यह भी भाष्य में बता दिया गया है ( पृ ० २१ ९ ) । इस आठवें मन्त्र से अध्याय की समाप्ति तक यहाँ अश्वमेघ सम्बन्धी अवशिष्ट मन्त्र पठित हैं । इनका पाठ भी अरण्य ( वन ) में ही किया जाता है, अतः अरण्यानूच्य ' उग्रश्र्व ' मन्त्र के साथ इनका भी पाठ यहाँ किया गया है । देवताओं का और उनके अवयवों का इन मन्त्रों में विधान है । आगे के ' लोमभ्यः स्वाहा ' ( ३ ९ | १० ) इत्यादि मन्त्रों में केवल अश्व के अवयवों का तथा ' आयासाय स्वाहा ' ( ३ ९ ।११ - १३ ) इत्यादि मन्त्रों में केवल देवताओं का विधान है । ' लोमभ्यः स्वाहा ' ( ३ ९ ।१० ) से लेकर अध्याय समाप्ति पर्यन्त मन्त्रों से ४२ प्रायश्चित्त निमित्तक आहुतियाँ दी जाती हैं । कुछ आचार्यों के मत से यहाँ इन अंगों की आहुतियाँ दी जाती हैं । अन्य आचार्य मानते हैं कि अश्वांगों के अभिमानी उन उन देवताओं की इन मन्त्रों से स्तुति की जाती है । यहाँ ' द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा ' ( ३ ९ । १३ ) मन्त्र से अन्तिम आहुति दी जाती है । शतपथ ब्राह्मण के अवधेम अंश मन्त्रों का यह विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र के प्रधानतः २१ और २५ - २६ अध्यायों के अनुसार बताया गया है । भाष्यकार ने कात्यायन के उक्त विनियोगों का समर्थन शतपथ ब्राह्मण के प्रायः १३-१४ काण्डों के वचनों को विस्तार अथवा संक्षेप में उद्धृत कर किया है । साथ ही मन्त्रों की विशिष्ट शब्दावली की व्याख्या भी शतपथ के प्रमाण से की है । ३१ वें अध्याय में शतपथ के वचन बहुत ही कम उद्धृत हैं । प्रथम मन्त्र में शतपथ के प्रमाण से पुरुष पद की व्युत्पत्ति दी गई है । बृहदारण्यकोपनिषद् भी उद्धृत है, जो कि शतपथ का ही अन्तिम भाग है । तैत्तिरीय संहिता आदि के प्रमाण से भी कहीं - कहीं कात्यायन के विनियोगों को समर्थन दिया गया है । १७ वें मन्त्र में कमदेवों और आजान-देवों के समर्थन में शतपथश्रुति उद्धृत है । इन वचनों का भी समावेश बृहदारण्यक में ही माना जाता है । ३२ वें अध्याय में सर्वमेध सम्बन्धी मन्त्र उपदिष्ट हैं । सर्वमेध के अप्तोर्याम संज्ञक सातवें दिन किये जाने वाले सहोम में इनका विनियोग विहित है, इस बात की पुष्टि शतपथ के प्रमाण से यहाँ पहले ही मन्त्र में की गई है । द्वितीय मन्त्र में बृहदारण्यकश्रुति उद्धृत है । ११ वें मन्त्र में भी शतपथ के षष्ठ काण्ड के और बृहदारण्यक के वचन मन्त्र के व्याख्यान की पुष्टि करते हैं । अन्यत्र शतपथ - वचन उद्धृत नहीं हैं । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इस अध्याय के भाष्य में शतपथ - वचनों का उपयोग बहुत कम किया गया है । ३३ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में शतपथ के चतुर्थ काण्ड के वचनों के प्रमाण से पुरोरुक् पद के अर्थ को समर्थन दिया गया है । आठवें मन्त्र में प्रथम काण्ड के वचन से चमस का अर्थं और प्रयोजन प्रदर्शित है । १८ वें मन्त्र में शतपथ के आधार पर ही मन्त्रों का विनियोग दिखाया गया है । ३० वें और ४४ वें मन्त्र का विनियोग भी शतपथ के आधार पर ही दिया गया है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सर्वमेध सम्बन्धी इस अध्याय के प्रारम्भ के ५४ मन्त्रों का विनियोग यहाँ शतपथ के आधार पर दिखाया गया है । यहाँ कात्यायन श्रौतसूत्र का कोई भी वचन उद्धृत नहीं है । इस अध्याय के आगे के मन्त्र अनारभ्याधीत हैं । उनका विनियोग किसी कर्म के अनुष्ठान में न होकर ब्रह्मयज्ञ में निर्दिष्ट है | अतः यहाँ अध्याय समाप्ति पर्यन्त किसी भी मन्त्र में कात्यायन श्रौतसूत्र अथवा शतपथ के वचन उपलब्ध नहीं होते । प्रसंगवश ७० वें और ७४ वें मन्त्र में कात्यायन के नवें अध्याय के वचन अवश्य मिलते हैं । ९ ० - ९ १ संख्या के मन्त्रों में भी बृहदारण्यक के एक - दो वचन दिखाई पड़ते हैं । ३४ अध्याय में भी स्पष्टतः शतपथ का कोई वचन उपलब्ध नहीं है । कुछ स्थलों पर बृहदारण्यक के साथ कुछ अन्य उपनिषदों के वचन भी अवश्य उपलब्ध होते हैं । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ३१-३४ अध्यायों में शतपथ के वचन बहुत ही कम मिलते हैं ।

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( १३ ) हैं । कात्यायन श्रौतसूत्र ३५ वें अध्याय के पहले ही मन्त्र में शतपथ के पितृमेध - सम्बन्धी वचन विस्तार से उद्धृत विधि - विधानों का इसमें विस्तार उल्लेख है । प्रारम्भ में के आधार पर महीधर द्वारा प्रदर्शित सारे पितृमेघ - सम्बन्धी के व्युहन ( बुहारना ) का प्रयोजन शव और श्मशान पदों की व्युत्पत्ति बताई गई है । पालाश शाखा से तृण, पर्ण आदि में पितृमेध के लिये निश्चित स्थान को स्पष्ट करते हुए यहाँ संक्षेप में मन्त्र की व्याख्या भी की गई है । द्वितीय मन्त्र गया है । यहाँ हल में छः बैल ही क्यों रस्सी से घेर कर भूमि - कर्षण के विधान को भी यहाँ शतपथ श्रुति से पुष्ट किया मन्त्र में उद्धृत वचनों से मिलता है । जोते जाते हैं और हल से चार ही रेखाएँ क्यों खींची जाती हैं, इसका समाधान तृतीय के बाद करना चाहिये, इसकी इसी प्रकार चौथे मन्त्र में सर्वोषधि वपन का प्रयोजन बताया गया है । अस्थिसंचय पदों सूर्योदय की व्याख्या भी की गई है । शतपथ पुष्टि में भी पांचवें मन्त्र में शतपथ के वचन प्रस्तुत किये गये हैं । यहाँ मन्त्र के स्थानों पर मन्त्र- पदों की व्याख्या भी ब्राह्मण की यह पद्धति ही है कि मन्त्रों का विनियोग बताने के साथ ही यहाँ अनेक भाष्य माना जाता है । इसी की गई है । इसीलिये शतपथ को तथा अन्य ब्राह्मण साहित्य को भी मन्त्रों का पहला हैं । श्मशान और ग्राम के पद्धति से यहाँ ७-८ और १०-१२ मन्त्रों की व्याख्या के साथ उनके विनियोग भी प्रदर्शित है । इस प्रकार हम मध्य में मर्यादालोष्ट के रखने के विधान को भी १५ वें मन्त्र में निर्दिष्ट शतपथ का समर्थन मिलता के रूप में निरन्तर चली आ रही देख सकते हैं कि इस प्रकार की अनेक वैदिक विधियाँ लोकव्यवहार में रीति - रिवाजों समर्थित हैं ही, लोकव्यवहार में हैं । १६ वें मन्त्र में व्याख्यात नेत्रांजन, पादाभ्यंजन जैसी विधियां शतपथश्रुति से तो आज भी वे किसी - न - किसी रूप में प्रचलित हैं । के वचन को उद्धृत कर बताया गया कि इस संहिता के अन्तिम ३६ वें अध्याय के पहले मन्त्र में ही शतपथ आश्वमेधिक मन्त्रों के साथ पांच अध्यायों के विषय सर्वप्रथम आथर्वण दध्यङ् ऋषि को ज्ञात हुए थे । इनमें आग्निक की और हानि न पहुँचावे, इसके लिये प्रवर्ग्य का प्रकरण विशेष महत्त्व का है । त्रयीविद्यासम्पन्न व्यक्ति को प्रवर्ग्य किसी प्रकार यहाँ ३६ वें अध्याय में सर्वविध शान्ति के सम्पादक मन्त्रों का पाठ किया जाता है । इन सत्रह शान्ति मन्त्रों की तथा आगे महावीर की स्तुति में विनियुक्त अन्तिम सात मन्त्रों ( ३६ । १८ - २४ ) की व्याख्या में भी कोई शतपथ वचन उद्धृत नहीं किया गया है । शतपथ के अनेक वचनों के ३७ वें अध्याय में पहले ही मन्त्र में महावीर संभरण का विधान अतिविस्तार से काण्ड कहा जाता है । इस प्रवग्यं आधार पर दिया गया है । शतपथ के १४ वें काण्ड के प्रथम तीन अध्यायों को प्रवग्यं का सिर है । rus में निर्दिष्ट विधि से यज्ञरूपी विष्णु के सिर का सन्धान किया जाता है । आदित्य ही इस यज्ञरूपी कर बाकी विष्णु अनेक देवगण शतपथ में यहाँ एक आख्यायिका दी गई है कि किसी समय कुरुक्षेत्र में अश्विनीकुमारों को वह छोड़ यज्ञरूपी विष्णु अहंकारवश यज्ञ ( सत्र ) कर रहे थे । इसके लिये एकत्र सभी देवताओं में विष्णु को श्रेष्ठ माना गया डोरी । ) को काट डाला । प्रत्यंचा के अपने सिरहाने धनुष को रख सो गया । इसी बीच दीमकों ने धनुष की प्रत्यंचा ( टूटने के साथ ही विष्णु का सिर धड़ से महावीर उठ गया । शतपथ में यहाँ घर्मं, अलग हो गया । देवगण संताप करने लगे कि आज हमारे बीच में से एक प्रवर्ग्यं, महावीर, सम्राट् आदि पदों की व्युत्पत्ति बताई गई है ( पृ ० १५६ ) । १. कात्यायनयज्ञपद्धतिविमर्श में प्रवर्ग्य और धर्म को पर्यायवाची शब्द माना गया है । वहीं कहा गया है कि अग्निष्टोम याग में प्रवग्यं विधान विहित है । महावीर संबन्धी समस्त कर्म प्रवर्ग्य है ( पृ ० ५० १ ) । धर्म-दिया है । यहाँ याग का परिचय पृ ० ४८० - ४८१ पर तथा महावीर पात्र का परिचय इन्होंने स्थलों पृ ० ५०८ को पर और भाष्य के इस पुन: कहा गया है कि प्रवर्ग्य और घमं महावीर का पर्याय है । इन तीनों को सम्पन्न विषय से संबद्ध स्थलों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रवर्ग्य याग का नाम है । इस विधि तप्त घृत में करने के लिये महावीर नामक पात्र का संभरण किया जाता है और इस तप्त महावीर पात्र में

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( १४ ) आख्यायिका में आगे बताया गया है कि दीमक फिर इस प्रकार का उपद्रव न करें, इसके लिये उनके निमित्त देवताओं ने अन्नाद्य ' ( अन्न और आद्य ) का विधान किया । तीन सवनों की भी यहाँ व्याख्या की गई है । आगे यज्ञरूपी विष्णु के सिर के पुनः सन्धान की कथा इस प्रकार वर्णित है कि देवगण को यह मालूम था कि अथर्ववेदी दव्य ऋषि उस प्रवयं की विधि को जानते हैं, जिससे कि यज्ञ में आने वाले विघ्नों को दूर किया जाता है । इस विद्या को सीखने के लिये इन्द्र उनके पास गया । दध्यङ् ऋषि ने इस शपथ पर इन्द्र को विद्या का उपदेश दिया कि वह किसी अन्य को यह विद्या नहीं सिखावेगा । इन्द्र ने भी दय ऋषि से कहा कि यदि आप इस विद्या का उपदेश दूसरे को करेंगे तो आपका सिर धड़ से अलग हो जायगा । अश्विनीकुमार भी दध्यङ् ऋषि के पास यह विद्या है, इस बात को जानते थे । अश्विनीकुमार जब बालक थे, तभी उन्होंने दध्यङ् ऋषि की चिकित्सा की थी और उसके बदले में वे इस विद्या को प्राप्त करना चाहते थे । उस समय अश्विनीकुमार बालक थे, अतः दध्यङ् ऋषि ने बाद में इस विद्या का उपदेश करने के लिये उनसे कहा था । बाद में इन्द्र के साथ घटी इस घटना से दध्यङ् ऋषि उस समय धर्मसंकट में पड़ गये, जब कि देवताओं की प्रार्थना पर अश्विनीकुमार इस विद्या को सीखने उनके पास पहुँचे । दध्यङ् ऋषि को अपने दिये वचन का पालन अवश्य करना था और वचन का पालन करने पर इन्द्र के साथ हुई प्रतिश्रुति के कारण शिरच्छेद का भय था । अश्विनीकुमारों ने इसका रास्ता खोज निकाला । उन्होंने दध्य ऋषि के सिर को हटाकर उसकी जगह अश्व का सिर लगा दिया । इस अश्व के सिर ( हयशीषं ) से उन्होंने दध्यङ् ऋषि से विद्या प्राप्त कर ली और इन्द्र की प्रतिश्रुति के अनुसार इस अश्व के सिर के छिन्न हो जाने पर अश्विनीकुमारों ने दध्यङ् ऋषि के अपने मनुष्य- सिर को पुनः अपने स्थान पर बैठा दिया । इसी प्रवयं विद्या की सहायता से अश्विनीकुमारों ने देवताओं के यज्ञरूपी विष्णु के सिर का भी पुन: इसी तरह से सन्धान कर दिया । इस आख्यायिका को समाप्त करते हुए शतपथ में बताया गया है कि कक्षीवान् नामक ऋषि ने भी ऋग्वेदीय मन्त्र ( १।११६।१२ ) में इस विद्या की चर्चा की है । अन्त में यहाँ बताया गया है कि इस प्रवर्ग्य विद्या का उपदेश सर्वसाधारण को नहीं करना चाहिये । इस विद्या की प्राप्ति के लिये किन - किन नियमों का पालन करना चाहिये, इस विषय की भी शतपथ में विस्तार से चर्चा है ( पृ ० १५८ ) । प्रवर्ग्य के लिये महावीर आदि मिट्टी के पात्रों को बनाने के लिये मृत्पिण्ड, वल्मीकवपा आदि संभारों के संचय की विधि भी यहाँ विस्तार से बताई गई है ( पृ ० १५ ९ - १६१ ) । इस पूरे विधान की प्रक्रिया ऊपर बता दी गई है । सूत्रकार द्वारा निर्दिष्ट महावीर का लक्षण और उसकी व्याख्या भी यहाँ ( पृ ० १६०-१६२ ) निर्दिष्ट है | आगे इस अध्याय के प्रायः सभी मन्त्रों में कात्यायन के विनियोगों का शतपथ के वचनों के आधार पर विस्तार से समर्थन किया गया है । तीसरे मन्त्र में मृत्पिण्ड, चौथे में वल्मीक त्रपा, पाँचवें में वराहविहत मृत्तिका और छठे में पूतीकरस के संभरण का विधान देखा जा सकता है । इसी तरह से ८ वें मन्त्र में अजाक्षीर के संभरण का विधान है । दूध मिला कर तैयार की गई धर्म नामक हवि की अग्नि में आहुति दी जाती है । अवशिष्ट घर्म का यजमान आदि प्राशन करते हैं । शतपथ ब्राह्मण के १४ वें काण्ड के प्रथम तीन अध्यायों में प्रवर्ग्य याग का विस्तार से निरूपण किया गया है । महावीर का लक्षण भाष्य में इस तरह से दिया गया है - " प्रादेशमात्रोन्नतानि पर्वत्रयन्ति घुण्टिकाकाराणि घर्महविः सन्तापनार्थानि त्रीणि मृन्मयानि पात्राणि महावीरा उच्यन्ते " ( पृ ० १६२ ) । इस पात्र की आकृति उक्त ग्रन्थ ( पृ ० ५४० ) में ही देखी जा सकती है । स्पष्ट है कि यह एक विशेष आकार का पात्र है और इसमें घर्म नामक हवि को तप्त दिया जाता है । वैदिक कोश में भी इन शब्दों का अर्थ सही नहीं दिया गया है । १. अत्तुं योग्यमन्नम्, दन्तव्यापारनिरपेक्षम् । आद्यं दन्तव्यापारसव्यपेक्षम् " ( भा ०, पृ ० १५७ ) ।

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( १५ ) गृहीत नवें मन्त्र में इन पाँच संभारों के संभरण का कारण और महत्त्व प्रदर्शित है । पंक्ति शब्द से यहाँ पाँच । संख्या यह विषय है । इन पांच संख्या वाले अन्य अनेक पदार्थों का उल्लेख भाष्य ( पृ ० १६६, १६ ९ ) में किया गया है संभरण वैदिक विद्वानों के लिये विशेष रूप से अवलोकनीय है । १० वें मन्त्र में पक्व महावीरों के उद्वाप के साथ महावीर -की यह विधि पूरी होती है । श्रौत ११ वें मन्त्र में महावीर के प्रोक्षण आदि संस्कार विहित हैं । शतमान रजत के उपगूहन के प्रसंग में एक मन्त्र कथा दी गई है ( पृ ० १७२ ) । यहाँ श्रौतसूत्र - प्रदर्शित मुंजप्रलव के आदीपन को भी समर्थन दिया को गया अलग है - । अलग १२ वें वाक्यों में महावीर के ऊपर हाथ रखकर यजमान द्वारा पाँच वाक्यों वाले इस मन्त्र के पाठ के विधान की व्याख्या करते हुए स्वीकृति दी गई है ( पृ ० १७३ - १७४ ) । १३ वें मन्त्र में तेरह विकंकत शकलों ( काष्ठ कर - खण्ड उत्तर ) से महावीर का परिश्रयण क्यों किया जाता है, इस प्रश्न का त्रयोदश मासात्मक संवत्सर ही प्रवर्ग्य है, यह कह करते दिया गया है ( पृ ० १७५ - १७६ ) । १४ वें मन्त्र में प्रसलवि ( सव्य ) और अप्रसलवि ( अपसव्य ) क्रम से प्रदक्षिणा से समय ब्रह्मा आदि ऋत्विग् घर्म पर पंखा झलते रहते हैं । ऐसा क्यों किया जाता है, इसका भी उत्तर शतपथ के प्रमाण यहाँ ( पृ ० १७७ - १७८ ) दियागया है । १६ वें मन्त्र में यज्ञ की वाक्स्वरूपता प्रदर्शित है और १७ वें मन्त्र में सूर्य को सब प्राणियों का रक्षक बताया गया है । १८ वें मन्त्र में प्रवर्ग्य प्रकरण को मधु ब्राह्मण नाम दिया गया है और उसका महत्त्व प्रदर्शित है । ब्रह्मा आदि के द्वारा महावीर की स्तुति कर लेने के उपरान्त यजमान - पत्नी महावीर का ईक्षण करती हैं । यहाँ प्रवर्ग्य को वृषा और यजमान पत्नी को योषा बताया गया है । इस अध्याय की अन्तिम ऋचा ( ३७।२१ ) और में रौहिण पुरोडाशों को चक्षुस्थानीय कहा गया है । यहाँ बताया गया है कि विष्णुरूपी यज्ञ का प्रवर्ग्य सिर है रोहिण पुरोडाश चक्षु है । यह रौहिण पुरोडाश क्या है, इसको भी यहाँ दिखाया गया है ( पृ ० १८३ ) । इस प्रकार इस अध्याय में अतिविस्तार से प्रायः प्रत्येक मन्त्र में शतपथ के वचन उद्धृत हैं और उनके द्वारा कात्यायन के विनियोगों को समर्थन तो मिला ही है, साथ में प्रसंगवश उठने वाले अनेक प्रश्नों का समाधान भी हमें मिलता है । ३८ वें अध्याय केदूसरे मन्त्र में शतपथ के प्रमाण से गाय केआह्वान की प्रक्रिया बताई गई है । वहाँ कहा गया है कि इडा, अदिति और सरस्वती ये सब गाय के ही नाम हैं । इन सामान्य नामों से गाय का आह्वान करने के बाद ऊँची आवाज में गाय को उसके अपने नाम से पुकारना चाहिये । तीसरे मन्त्र में गाय के पिछले पैरों को बाँधने हैं । और वत्स को दूध पीने के लिये छोड़ने और फिर गाय के सामने उसको बांधने की विधि के समर्थक वचन दिये मन्त्र गये में भी चौथे मन्त्र में भी कात्यायन वर्णित विनियोगों को शतपथ की अनेक कण्डिकाओं का समर्थन मिला है । पाँचवें शतपथ की ऐसी ही कण्डिकाएँ उद्धृत हैं । यहाँ यज्ञ को ही वाक् बताया गया है । छठे मन्त्र में उद्धृत शतपथ से स्पष्ट हो जाता है कि परीशास और शफ पर्यायवाची शब्द हैं । प्रवग्यं महावीर आदित्य का ही स्वरूप है । यहाँ विस्तार से शतपथ के वचनों को उद्धृत कर महावीर का उपयमनी पात्र गृहीत अजाक्षीर से सेचन आदि का विधान बताया गया है । यहाँ यह भी कहा गया है कि वाट् पद वषट्कार का ही निर्देशक है । ७ वें मन्त्र में वात के नामों को जपते हुए आहवनीय अग्नि के पास जाने का विधान है । यहाँ शतपथ में एक आख्यायिका दी गई है कि ऐसा क्यों किया जाता है । ८ वें और ९ मन्त्रों में भी बताया गया है कि इन्द्र, सविता, बृहस्पति, यम आदि सभी नामों से यहाँ वात का ही ग्रहण क्यों किया जाता है । नवीं कण्डिका में ' स्वाहा घर्माय ' मन्त्र से आहुति देने का प्रकार भी बताया गया है । १० वें मन्त्र में उद्धृत शतपथ में मन्त्र का अर्थ भो प्रदर्शित है । ११ वें मन्त्र के शतपथ में भी महावीर का तीन बार उत्कम्पन और बषट्कार के साथ होम का विधान प्रदर्शित है । ब्रह्मा द्वारा धर्म का अनुमन्त्रण और स्तवन १२ वें मन्त्र में मिलता है । इसी प्रकार इस अध्याय के आगे के प्रायः सभी मन्त्रों में शतपथ को उद्धृत कर संक्षेप अथवा विस्तार से पूर्व प्रदर्शित कात्यायन श्रौतसूत्र के विनियोगों का समर्थन

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( १६ ) करते हुए इन विधियों को स्पष्ट रूप से समझाया गया है । साथ ही यत्र - तत्र मन्त्र के पदों की व्याख्या भी की गई है । १५ वें मन्त्र में ' पाषाण और प्रतिरव की प्राणात्मकता वर्णित है । इसी मन्त्र में पितरों का स्वभाव भी वर्णित है । २२ वें मन्त्र के द्वारा गाये जाने वाले साम का नान वार्षाहर बताया गया है । २६ वें मन्त्र में निष्कैवल्य पद का अर्थ प्रदर्शित है । २७ मन्त्र में सूर्यतापनीयोपनिषद् को उद्धृत कर कहा गया है कि प्रातःकाल ऋग्वेद के मन्त्रों से, मध्याह्न में यजुर्वेद के मन्त्रों से और सायंकाल सामवेद के मन्त्रों से सूर्यस्वरूप धर्म की स्तुति को जाती है । इस प्रकार भगवान् सूर्यं कभी भी वेदों से अलग नहीं होते । वचनों को विस्तार से उद्धृत किया गया है । यहाँ कात्यायन प्रदर्शित इस अध्याय के मन्त्रों का विनियोग घर्मभेद निमित्तक प्रायश्चित्त-शवदाह प्रक्रिया को निकाला है । वह सर्वथा अप्रामाणिक है । इस ब्राह्मण के व्याख्याकार हरिस्वामी के मत के अनुसार बनने ३ ९वें अध्याय के दूसरे मन्त्र में शतपथ के विनियोगों को समर्थन देकर यह स्पष्ट किया गया है । होम में किया जाता है । स्वामी दयानन्द ने इन मन्त्रों से आगे के कुछ मन्त्रों में भी शतपथ के वचन उद्धृत हैं । वाले प्रयोग का स्वरूप भी यहाँ प्रदर्शित है । मन्त्रों का आध्यात्मिक अर्थ | ३१ वें अध्याय के प्रथम १६ मन्त्रों के पुरुष सूक्त की व्याख्या के प्रसंग में यहां बताया गया है कि इन मन्त्रों का आध्यात्मिक अर्थ सामान्य मन्त्रार्थं से ही गतार्थ हो जाता है, अत: अलग से इनका आध्यात्मिक अर्थं बताने की आवश्यकता नहीं है | मन्त्रार्थं की व्याख्या में ही यहाँ अनेक विशेष विषयों का प्रतिपादन दिखता है, जिनका विनियोग प्रधानतः चतुर्व्यूह ( वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध ) की उपासना में किया गया है । यहां कुछ विशेष स्थलों की चर्चा करना उचित होगा । तीसरे मन्त्र को व्याख्या में किसी विशेष आचार्य की व्याख्या को दिखाने के बाद सम्प्रदाय के वेत्ता आचार्यों का मन्तव्य प्रकट किया गया है ( पृ ० ३ - ४ ) । ऐसा लगता है कि प्रथम व्याख्या पांचरात्र वैष्णव सम्प्रदाय के किसी विद्वान् द्वारा की गई है । आगे के मन्त्रों में भी वैष्णव चतुर्व्यूहवाद के अतिरिक्त पांचरात्र आगम के नित्यमुक्त, विराट्, प्रकृति, अव्याकृत, परम व्योम जैसे पारिभाषिक शब्द मिलते हैं, जिनका कि उपयोग प्राचीन पांचरात्र मत में किया जाता रहा है । बृहज्जाबालोपनिषद्, वैकुण्ठसंहिता, महाभारत शान्तिपर्व, नृसिंहोत्तरतापनीय, विष्णुपुराण, शाबल्य-ब्राह्मण, श्रीमद्भागवत इत्यादि ग्रन्थों को यहाँ प्रमाण रूप से उद्धृत किया गया है । इससे भी उक्त बात की पुष्टि होती है । यहाँ चतुर्थ अनिरुद्ध स्वरूप को ही सृष्टि का संकल्पक बताया गया है ( पृ ० ४ ) | अद्वारक और सद्वारक सृष्टि की प्रक्रिया भी यहाँ ( पृ ० ५ ) बताई गई है । जीवात्मा को यहाँ कौस्तुभ मणि माना गया है और विष्णुपुराण के प्रमाण से सृष्टि - प्रक्रिया को विस्तारित किया गया है ( पृ ० ६ ) । आत्मसमर्पण की यागरूपता और मोक्ष, परमपद, अक्षरपद, परधाम, नाक, वैकुण्ठ, परमव्योम आदि की पर्यायता भी यहाँ ( पृ ० १४ ) वर्णित है । अनन्त, गरुड़, विष्वक्सेन आदि को यहाँ नित्यमुक्त माना गया है । इस अध्याय की अन्तिम छ: कण्डिकाएँ ( ३१।१७ - २२ ) उत्तरनारायण के नाम से प्रसिद्ध हैं । इन मन्त्रों की यहाँ अलग से आध्यात्मिक व्याख्या दी गई है । १७ वें मन्त्र की व्याख्या में पृथिवी पद को सूक्ष्म और स्थूल पंचमहाभूतों का प्रतीक माना गया है । १ ९ वें मन्त्र में प्रजापति के जीवरूप से और अन्तर्यामी रूप से गर्भ में प्रविष्ट होने की चर्चा इन उत्तरनारायण मन्त्रों की भी योजना प्रधानतः आध्यात्मिक अर्थ में ही ठीक से बैठती है । है । वस्तुतः देखा जाय तो ३२ वें अध्याय के सर्वमेध प्रकरण का भी आध्यात्मिक अर्थ ही प्रधान है । यों कहा जा सकता है कि पुरुष सूक्त के मन्त्रों के समान ही सर्वमेघीय प्रकरण के मन्त्रों का भी दार्शनिक महत्त्व है । यहाँ तृतीय मन्त्र में सजातीय, विजातीय, १. " प्राणा वे ग्रावाणः प्राणा वै प्रतिरवा: " ( भा ०, पृ ० २०० ) ।

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१७ ) का स्वरूप पहले बता स्वगत तीनों प्रकार के भेद से शून्य अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व प्रतिपादित है । अन्य मन्त्रों की व्याख्या ही प्रधानता है । १३ वें मन्त्र में दिया गया है । उसको देखने से स्पष्ट हो जाता है कि इन मन्त्रों में आध्यात्मिक अर्थ की १५ वें मन्त्र में वरुण पद की भी शम, दम आदि छः प्रकार की साधन - सम्पत्ति के उल्लेख से भी यही बात स्पष्ट होती है । को तथा धर्मार्थकाममोक्षपरक व्याख्या देखने ब्रह्मपरक व्याख्या की गई है । १६ वें मन्त्र में भी श्रीपद की कामार्थपरक और आध्यात्मिक अर्थ में कोई विशेष मिलती है । इस प्रकार स्पष्ट है कि इन दोनों ही अध्यायों में मन्त्रों के सामान्य अन्तर नहीं है ॥ प्रथम मन्त्र में अग्नि पद से ३३ वें अध्याय से पुनः पृथक् रूप से मन्त्रों की आध्यात्मिक व्याख्या मिलती है और तुरीय नामक स्वरूपों का व्यष्टि - समष्टि रूप आत्मा के विश्व तैजस, प्राज्ञ, अव्याकृत, विराट्, हिरण्यगर्भ में ईश्वर विद्या और अविद्या से ज्ञान और ग्रहण किया गया है । तृतीय मन्त्र में अग्निपद से जीवात्मा को और चौथे मन्त्र निवास के लिये हृदयाकाश के कर्म को संकेतित किया गया है । ७ वें मन्त्र में अग्नि पद से ईश्वर का ग्रहण कर उसके से तथा अन्य एक परिष्कार की चर्चा है । ९ वें मन्त्र में अग्नि पद का अग्रणी परमेश्वर अर्थ कर नारदीय महापुराण अग्निपद से परमेश्वर का हो ग्रहण कर

श्लोक से भी भगवान् की भक्तवत्सलता प्रतिपादित है । १० वें मन्त्र में भी गई है । ११ वें मन्त्र में

सभी गोपालों को विश्वेदेव, अर्जुन को इन्द्र, भीम को वायु कह कर पुनः भगवान् की स्तुति की इस सारे जगत् की स्थिति अग्निरूप भक्ति का पंचम पुरुषार्थ के रूप में ग्रहण है । १२ वें मन्त्र में भी बताया गया है कि का ही ग्रहण किया गया है । परमेश्वर के ही अधीन है । आगे के भक्तिपरक अनेक मन्त्रों में अग्नि पद से परमेश्वर व्यक्ति को करना १७ वें मन्त्र में भगवद्गीता को उद्धृत कर बताया गया है कि शास्त्रविहित कर्मों का अनुष्ठान प्रत्येक गोपद को वेदवाणी चाहिये । १८ वें मन्त्र से आगे के अनेक मन्त्रों में इन्द्र पद से परमेश्वर गृहीत हैं । १ ९ वें मन्त्र में में रसा पद से अथवा इन्द्रियों का वाचक माना है । २० वें मन्त्र में ज्ञानरूप सूर्य का उदय दर्शित है । २१ वें मन्त्र गंगा नदी का ग्रहण किया गया है । २७ वें मन्त्र में श्रीमद्भागवत के प्रमाण से बताया गया है कि भगवान् गरुड़ आदि वाहनों को भी छोड़कर छन्दोमय गरुड़ पर बैठ कर गजेन्द्र जैसे भक्तों की रक्षा के लिये दौड़ पड़ते हैं । एक अन्य है । अभियुक्त - वचन में गजेन्द्र की और द्रोपदी की रक्षा के लिये की गई भगवान् का त्वरा का उल्लेख व्यक्ति की चर्चा ३२ वें मन्त्र में सगुण और निर्गुण ब्रह्म की उपासना से ब्रह्मलोक - प्राप्ति की तथा ब्रह्मभावापन्न भगवद्गीता है । ३६ तथा आगे के भी मन्त्रों में सूर्योपाधिक अन्तर्यामी संबोधित हैं । यहाँ तरणि पद है । का अगले अर्थ बता मन्त्र कर में कहा गया है । और मुण्डक श्रुति के आधार पर बताया गया है कि यही सबका तारक और प्रकाशक कर सकता । ३८ वें मन्त्र में कि इस परमात्मा के सिवाय कोई अन्य देवता इस जगत् में ज्ञान का प्रसार नहीं अनुसार भगवान् की भविष्यपुराण स्थित आदित्य हृदय का प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत है और वाल्मीकिरामायण के वचन के गया है कि कर्म सर्वात्मकता प्रतिपादित है । ४१ वें मन्त्र में सूर्य पद से अन्तर्यामी परमेश्वर का ग्रहण कर बताया सब कुछ प्राप्त कर लेता है । इस प्रसंग महाभारत के शान्तिपर्व का और उपासना के समुच्चय के बल से साधक प्रकार अधिकार है, जैसे नारदप्रोक्त वचन भी उद्धृत है और कहा गया है कि परमेश्वर के घन में साधक का उसो कर ज्ञानसूर्य के पिता के धन में पुत्र का होता है । ४४ वें मन्त्र के विभिन्न पदों से हनुमान् और श्रीराम का ग्रहण में प्रतिपादित है कि उदय का विषय प्रस्तावित है । ४६ वें मन्त्र में राम और लक्ष्मण की चर्चा है । ४८ वें मन्त्र आधिदैविक जगत् के अनुग्रह से ही आध्यात्मिक जगत् संचालित होता है, अर्थात् देवताओं के में सद्गुणों की अभिव्यक्ति होती है । ५४ वें मन्त्र में सविता पद से सूर्यावच्छिन्न अन्तर्यामी का कि एक ही प्रमाण से परमेश्वर की सर्वप्रवर्तकता प्रतिपादित है । ५५ वें मन्त्र में ऋग्वेद के प्रमाण से बताया गया है ईश्वर को भक्तगण अनेक नामों से पुकारते हैं । ५८ वें मन्त्र में रामलक्ष्मण को संबोधित कर कहा गया है कि भक्ति-अनुग्रह से ही मनुष्य ग्रहण कर भगवद्गीता के ३

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( १८ ) सम्प्रदाय में भोग्य पदार्थ प्राकृत पदार्थों की तरह जड़ न होकर चेतन के समान महारसिक हैं, परमानन्द से भरपुर हैं । ५ ९ वें मन्त्र में सरमा पद से सीता अथवा भक्ति का ग्रहण किया गया है । ६१ वें मन्त्र में कहा गया है कि इन्द्र परमात्मा राम हैं और अग्नि लक्ष्मण | लक्ष्मण अग्निस्वरूप इसलिये हैं कि ये संकर्षण के अवतार माने जाते हैं । ६२ वें मन्त्र में नानाविध वैदिक और तान्त्रिक स्तोत्रों से भगवान् की स्तुति का विधान कर बताया गया है कि पुराणों में हरिहर की अभिन्नता के प्रतिपादन के साथ इनको परस्पर एक दूसरे की की गई उपासना का भी वर्णन है । ६३ वें मन्त्र में अंगद आदि वानर योद्धाओं का महावीर मेघनाद के साथ हुआ युद्ध वर्णित है । अगले मन्त्र में भी श्रीराम, हनुमान्, कौशल्या आदि की चर्चा है । ६५ वें मन्त्र में वृत्र पद से ब्रह्मात्मतत्व के प्रावरक अज्ञान का ग्रहण किया गया है । अगले मन्त्र में जीवन्मुक्ति की चर्चा है । ६ ९वें मन्त्र में परमेश्वर की प्रपंच के उत्पादक के रूप में स्तुति की गई है । ७० वें मन्त्र में भगवान् का सार्वात्म्य प्रतिपादित है और ७२६ मन्त्र में पुनः भक्त द्वारा आराधित भगवान् रामलक्ष्मण को चर्चा है । ७४ वें मन्त्र के विषय बताया गया है कि यह मन्त्र ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में भी उपलब्ध है । यहाँ अविद्या, काम और कर्म का स्वरूप समझाया गया है । इनसे अनभिभूत व्यक्ति ही ब्रह्मत्व को प्राप्त कर सकता है । ७६ वें मन्त्र में इन्द्राग्नी पद से रामलक्ष्मण का ग्रहण है । ७८ वें मन्त्र में वर्णित है कि यहाँ राम का हनुमान् और अंगद के साथ संवाद है । यह संवाद अगले मन्त्र में भी चलता है । ८० वें मन्त्र में श्रीराम अथवा श्रीकृष्ण का ग्रहण किया जाता है । मारीच, सुबाहु, पूतना, तृणावर्त आदि का ये नाश करते हैं । ८६ वें मन्त्र में इन्द्रवायू पद से श्रीराम और हनुमान् गृहीत हैं । ८७ वें मन्त्र में नरनारायण, बलकृष्ण और रामलक्ष्मण की चर्चा है । रामलक्ष्मण अगले मन्त्र में भी चर्चित हैं । ९ ० वें मन्त्र में बताया गया है कि यह सारा जगत् अग्नि और सोम के संयोग से बना है । अग्नीषोम पद से यहाँ शिव और शक्ति, सूर्य और चन्द्र अथवा सोम और अग्नि का ग्रहण किया जाता है । ९ १ वें मन्त्र में बृहदारण्यक श्रुति के प्रमाण से बताया गया है कि देवगण उस व्यक्ति की कोई सहायता नहीं करते, जो कि अपनी आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में देवताओं की स्थिति मानते हैं । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र ( ३४।९ ७ ) में इन्द्र पद से महेश्वर का ग्रहण कर कहा गया है कि वह अपने भक्त के बल को बढ़ाते हैं । ३४ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र के भाष्य में प्रतिपादित विषयों की चर्चा हम आगे भाष्य के विशेष अवधेय अंशों के प्रसंग में करेंगे । प्रथम छ: शिवसंकल्प मन्त्रों की व्याख्या प्रधानतः अध्यात्मपरक की गई है । ७ वें मन्त्र में तैत्तिरीय श्रुति और भगवद्गीता के प्रमाण से ब्रह्म की अनरूपता और सर्वात्मकता प्रतिपादित है । ८ वें मन्त्र में अखण्ड चिद्रूपा परा संवित को ही अनुमति माना गया है और इसके लिये भगवद्गीता का प्रमाण दिया गया है । अगले मन्त्र में अनुमति पद से हव्यवाहक अग्नि का ग्रहण है । १० वें मन्त्र में सिनीवाली पद से कृष्ण की भगिनी भगवती विन्ध्यवासिनी बोधित हैं और इसमें दुर्गासप्तशती का प्रमाण दिया गया है । सरस्वती पद से जिह्वानुगत नाडी का ग्रहण कर अन्य नाडियों की और कुण्डलिनी शक्ति की चर्चा ११ वें मन्त्र में है । १४ वें मन्त्र में अग्निपद से श्रीराम का ग्रहण कर बताया गया है कि यह कौशल्या का पुत्र भक्तों की प्रज्ञा को निर्मल करता है । ब्रह्माकार वृत्ति की भी यहाँ चर्चा है और इन विषयों की पुष्टि के लिये दो अलग - अलग भागवत के वचन प्रमाण के रूप में प्रस्तुत हैं । १६ वें मन्त्र में दशरथ के पुत्र श्रीराम की और रावण की चर्चा है और बताया गया है कि भक्तों का यह माहात्म्य है कि यह श्रीराम स्वयं उनकी स्तुति करते हैं । अगले तीन मन्त्रों ( ३४।१७- १ ९ ) में भी श्रीराम की चर्चा है | २० वें मन्त्र में साम्ब परमेश्वर का ग्रहण है और यहाँ सृष्टि-प्रक्रिया बताई गई है । २१-२३ मन्त्रों में भी सोमपद से साम्ब सदाशिव सम्बोधित हैं । अगले चार मन्त्रों ( ३४।२४-२७ ) में वेदान्तवेद्य सविता देव स्तुत हैं । २८-३० मन्त्रों में ' अश्विनी ' पद से रामलक्ष्मण अथवा बलकृष्ण गृहीत हैं । ३२ वें मन्त्र में रात्रि पद से महामाया का ग्रहण किया गया है । ३४ वें मन्त्र में अथवा बलकृष्ण तथा सोम पद से साम्ब सदाशिव गृहीत हैं । ४० वें मन्त्र में उषा पद से मित्रावरुण पद से रामलक्ष्मण भक्तिरूपी देवता बोधित है ।

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( १ ९ ) ४१ वें मन्त्र में पूषा पद परमेश्वर का बोधक है और बताया गया है कि अमृतत्व लक्षण मोक्ष भी निरावरण ब्रह्मरूप ही है । ४३ वें मन्त्र में गोपरूप विष्णु की चर्चा है और यहाँ महाकवि कालिदास के मेघदूत का वचन उद्धृत है । ४५ वें मन्त्र में द्यावापृथिवी पद से पुरुष और प्रकृति का ग्रहण किया गया है और बताया गया है कि जीव स्वरूपतः निर्विकार है और प्रकृति की प्रवाहनित्यता मानी जाती है । ४७ वें मन्त्र में नासत्य पद से रामलक्ष्मण अथवा बलकृष्ण गृहीत हैं । ४८ वें मन्त्र में भी ऋग्वेद का वह प्रसिद्ध मन्त्रउद्धृत है, जिसमें एक ही परमात्मा के विविध रूपों का वर्णन है । ४ ९ वें मन्त्र में प्राणाभिमानी ऋषियों की सृष्टियज्ञ में प्रवृत्ति बताई गई है । ५१ वें मन्त्र में मुण्डक श्रुति के प्रमाण से आत्मज्ञ की ही पूजा का विधान है । अगले मन्त्र में ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मसाक्षात्कार का उल्लेख है । भूतिकाम के लिये ५४-५५ मन्त्रों में ब्रह्म की सर्वात्मकता प्रतिपादित है । इस अध्याय के अन्तिम तीन मन्त्रों ( ३४ / ५६-५८ ) में ब्रह्मणस्पति के रूप में वेद-पालक परमात्मा स्तुत हैं, जो कि हमें धर्म और ब्रह्म का उपदेश करते हैं । ३५ वें अध्याय के पहले मन्त्र में यमपद की परमेश्वरपरक व्याख्या की गई है । द्वितीय मन्त्र का सविता पद जगत् के उत्पादक, सृष्टि - स्थिति - संहार की लीला करने वाले परमात्मा का बोधक है । तृतीय मन्त्र में साधक की पवित्रता के लिये परमेश्वर से प्रार्थना की गई है । चौथे मन्त्र में बताया गया है कि इन्द्रियों का और पांचभौतिक देह का दास हो जाने पर जीवात्मा को अश्वत्थ, अर्थात् संसाररूपी वृक्ष पर निवास करना पड़ता है । अगले दो मन्त्रों में साधक ( जीवात्मा ) को संबोधित कर कहा गया है कि कर्म और उपासना के समुच्चित अनुष्ठान से प्रसन्न हो परमेश्वर हमारे पारों को घो डालता है । ७ वें मन्त्र में कैवल्य और बृहदारण्यक उपनिषदों के वचनों के अनुसार देवयान और पितृयान मार्गों का स्वरूप प्रदर्शित है । ९ वें मन्त्र में छान्दोग्य के प्रमाण से बताया गया है कि ब्रह्मदृष्टिसम्पन्न साधक के लिये सब कुछ सुखमय हो जाता है । १० मन्त्र में साधकों को भित्र मानकर कहा गया है कि ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के बल से हम संसार नदी को पार कर मोक्ष पद को प्राप्त कर सकते है । ११ वें मन्त्र में बताया गया है कि मानस, और वाचिक पापों का परिमार्जन कर, दूसरों के द्वारा प्रेरित कृत्या, दुःस्वप्नजनित उपद्रव इत्यादि को दूर कर स्वस्थ हुए चित्त से ही ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सकता है । इसके लिये बाह्य द्रव्यों और मन्त्रों से मार्जन, सेचन आदि की भी आवश्यकता पड़ सकती है । १७ मन्त्र में अग्नि पद का अर्थ पापदाहक परमेश्वर किया गया है । २१ वें मन्त्र में कहा गया है कि भगवत्परायण बुद्धि संशय, विपर्यय आदि सारे कंटकों के साथ सारे पापों को भी जला डालती है । इस अध्याय के अन्तिम २ मन्त्र में श्रीमद्भागवत के प्रमाण से भगवान् से प्रार्थना की गई है कि यह साधक आपके अनुग्रह से सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य नामक मुक्ति के योग्य शरीर को प्राप्त कर सके । ३६ वें अध्याय के प्रथम १ १७ मन्त्रों में परमेश्वर से सर्वविध शान्ति के लिये प्रार्थना की गई है । यहाँ नवें मन्त्र में मित्र पद का अर्थ भक्त पर स्नेह करने वाला भगवान् किया गया है तथा १७ वें मन्त्र में बताया गया है कि सभी तरह के उपद्रवों से रहित शान्ति का पर्यवसान अन्ततः परब्रह्म में ही होता है, अर्थात् आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होने पर सारे उपद्रव अपने आप शान्त हो जाते हैं और सर्वत्र शान्ति का साम्राज्य फैल जाता है । १८ वें मन्त्र दृति पद का अर्थ सर्वाधिष्ठान परमेश्वर किया है और भागवत के एक श्लोक को उद्धृत कर भागवतोत्तम का लक्षण बताया है । २१ वें मन्त्र में परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी रूप एवं आन्तर नाद रूप शब्दब्रह्म का नमन कर बताया गया है कि यह ब्रह्म ही जीव के सोपाधिक स्वरूप को विलीन कर उसे चिदादित्य स्वरूप में प्रतिष्ठित करता है । २२ वें मन्त्र में भी परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि आप ही राम • कृष्ण आदि का रूप धारण कर नाना प्रकार की लीलाएँ करते हैं । २३ वें मन्त्र में बताया गया है कि मन्त्र और भावना के प्रभाव से सारी ओषधियाँ, सारी वस्तुएँ भक्त की भावना के अनुसार फल देने लगती हैं । इस अध्याय के अन्तिम २४ वें मन्त्र में वेदान्तवेद्य ब्रह्म को ही सबका चक्षु बता कर उससे शतायु स्वस्थ जीवन की कामना की गई है ।