वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 371–380

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 371–380

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( २० ) ३७ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में अभि पद की बुद्धिपरक व्याख्या कर बताया गया है कि शास्त्र के रहस्य को जानने के लिये उसकी सहायता अपेक्षित है । चौथे मन्त्र में वत्री पद का अर्थ ज्ञानवमनशील इन्द्रियाँ किया गया है । और कठोपनिषद् के प्रमाण से कहा गया है कि इनकी सहायता से साधक परम पद को प्राप्त कर सकता है । ७-८ मन्त्रों का आध्यात्मिक अर्थ एक साथ किया गया है । यहाँ ब्रह्मणस्पति, अर्थात् वेदों के उपदेष्टा परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि आप ही सबको प्रिय लगने वाली त्रयीरूप वाणी प्रदान कर हमें ब्रह्मज्ञान से सम्पन्न कर दें । ब्रह्मज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति किसी के भी प्रति द्वेषभाव नहीं रखता और सदा सब प्राणियों के हित में लगा रहता है । यहाँ महावीर संभरण के प्रकरण में धर्म अथवा महावीर को सर्वत्र ज्ञानयज्ञ के रूप में संबोधित किया गया है । १३ वें मन्त्र में मरुत् पद का अथं हनुमान् जैसे ज्ञानी जन बताकर कहा गया है कि इनका सहारा लेने से साधक सर्वविध आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक मधु को प्राप्त कर सकता है । २० वें मन्त्र में ज्ञानयज्ञ के अधिष्ठाता परमेश्वर की तथा ब्रह्मज्ञानसम्पन्न बुद्धि की प्रार्थना की गई है । ३८ वें ' अध्याय के पहले मन्त्र प्रेमरज्जु को भगवती त्रिपुरसुन्दरी की मेखला माना गया है । दूसरे मन्त्र में बताया गया है कि ब्रह्मयज्ञ में वैदिक और लौकिक सभी प्रकार की वाणियों का उपयोग किया जाता है । आगे के मन्त्रों में यहाँ प्रेमरज्जुपाश, विचारपीयूष, ज्ञानविज्ञानाधिष्ठात्री सरस्वती, ज्ञानयज्ञ आदि को संबोधित किया गया है । छठे मन्त्र में किसी वचन को उद्धृत कर बताया गया है कि ज्ञानयज्ञ के लिये शास्त्रकुशल व्यक्ति को छोटी - बड़ी सभी वस्तुओं से उसी प्रकार उपदेश ग्रहण करना चाहिये, जैसे कि भ्रमर पुष्पों से उनके सारभाग को ग्रहण कर लेता है । इस अध्याय में भी महावीर अथवा धर्मं को ज्ञानयज्ञ के रूप में संबोधित किया गया है । नवें मन्त्र में यम पद की परमेश्वरपरक व्याख्या की गई है । १० वें और १२-१३ मन्त्रों में ' अश्विनौ ' पद से रामलक्ष्मण अथवा बलकृष्ण का ग्रहण किया गया है | १४ वें मन्त्र में ज्ञानयज्ञ को संबोधित कर एक ' श्लोका की सहायता से कहा गया है कि मनुष्य का श्रेष्ठ घर्मं यही है कि वह योग की सहायता से आत्मदर्शन का प्रयत्न करे । २० वें मन्त्र में ज्ञानयज्ञ को ' चतुःस्रक्ति ' इसलिये बताया गया है कि इस ज्ञान का प्रकाश चारों तरफ फैल जाता है और उसकी सहायता से हमें ऋत और सत्य ब्रह्म की प्राप्ति हो सकती है । अगले मन्त्र में कहा गया है कि वेदान्त का अध्ययन और अध्यापन इस कार्य में हमारा सहायक बन सकता है । २२ वें मन्त्र में हरिपद की व्युत्पत्ति बताते हुए कहा गया है कि संसार के दुःख का हरण करने के कारण घर्मरूप परमात्मा हरि कहलाते हैं । २७ वें मन्त्र में कर्म, उपासना और ज्ञान के अनुष्ठान से ज्योति ज्ञानयज्ञ को अपने हृदय में प्रदीप्त कर साधक को सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपों को अपने प्रत्यक् चैतन्य से अभिन्न रूप से अनुभव करने का उपदेश किया गया है । इस अध्याय के अन्तिम २८ वें मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय यह है कि इस संहिता में वर्णित प्रवग्यं पर्यन्त सभी अनुष्ठान परमेश्वर की आराधना के लिये ही वर्णित हैं । ३ ९ अध्याय के पहले मन्त्र में बताया गया है कि समष्टि लिंगशरीर का अभिमानी परमात्मा ही प्राण की प्रधानता से सूत्रात्मा और बुद्धि की प्रधानता पर हिरण्यगर्भ कहलाता है । अन्य सारे देवगण इस ब्रह्म की ही विभूतियाँ हैं । तृतीय मन्त्र में इसी की सर्वात्मकता प्रतिपादित है । चतुर्थ मन्त्र में साधक स्वयं अपने लिये आशीर्वादात्मक प्रार्थना करता है कि मैं अपनी मनोकामना पूरी कर सकूं । ५ वें मन्त्र में बताया गया है कि ज्योतिष्टोम आदि यागों में प्रवर्ग्य का अनुष्ठान करते समय महावीर संभरण आदि जो कर्म किये जाते हैं, वहाँ सर्वत्र घर्मान्तर्यामी परमेश्वर की ही उन उन अवस्थाओं में अभिव्यक्त हुए स्वरूपों की उन उन नामों से स्तुति की जाती है, क्योंकि यहाँ सब कुछ ब्रह्ममय है | १. " इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् । अयं तु परमो धर्मो यद् योगेनात्मदर्शनम् ॥ ” ( ११८ ) यह वचन याज्ञवल्क्यस्मृति का है ।

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( २१ ) कहा गया है कि सारे द्रव्य “ वें मन्त्र में भगवान् शिव को ही उम्र आदि शब्दों से संबोधित किया गया है । अगले मन्त्र में , प्रयास आदि देवगण और देवताओं में सर्वत्र सदा ब्रह्म की ही भावना करनी चाहिये । ११ वें मन्त्र में निर्दिष्ट है कि आयास पुरुषार्थरूप भगवत्पद की भगवान् की प्राप्ति में सहायक होते हैं, अतः ये भी पूज्य हैं । १२ वें मन्त्र में निर्दिष्ट है कि परम, मृत्यु, ब्रह्महत्या प्राप्ति के कारणभूत तप आदि भी देवस्वरूप ही हैं । इस अध्याय के अन्तिम तेरहवें मन्त्र में ' यम, अन्तक अन्तर्यामी परमात्मा को आदि पदों के आध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत कर त्रिपाद्विभूति - महानारायणोपनिषत् के प्रमाण से सबके में ही आहुति सर्वस्व समर्पित कर देने का उपदेश किया गया है । यहाँ उपनिषद् का कहना है कि मैं स्वयं अपनी अपने दे देता हूँ, अर्थात् मैं अपने स्वरूप को उस सर्वाश्रयभूत ब्रह्म में प्रतिष्ठित कर देता हूँ । स्वामी दयानन्द के भाष्य की समालोचना वेदार्थपारिजात के भूमिकाभाग में प्रसंगवश पूरा ३१ वां अध्याय उद्धृत है और वहीं स्वामी दयानन्द से यहाँ के प्रत्येक द्वारा की गई इन मन्त्रों की व्याख्या का खण्डन भी किया गया है । उसकी पुनरावृत्ति न हो, इस अभिप्राय मन्त्र केवल स्थलनिर्देश कर दिया गया । यह पूरा प्रसंग वहाँ द्वितीय भाग, पृ ० १२३३ से १२८२ तक देखा जा सकता है । प्रस्तुत कर बताया गया है कि दयानन्दीय एक गुण के आधार पर अग्नि इत्यादि पदों का गौण दूसरे मन्त्र में बताया गया है कि निमेष - उन्मेष आदि कोई आवश्यकता नहीं है । ' न तस्य प्रतिमा ' ( ३२।३ ) किन्तु यहाँ स्पष्ट कर दिया गया है कि यह प्रतिमा ३२ वें अध्याय के पहले मन्त्र में सामानाधिकरण्य का तार्किक लक्षण अर्थ में यह सामानाधिकरण्य घटित नहीं होने पाता और किसी प्रयोग मानने पर तो कहीं भी इनकी प्रवृत्ति माननी पड़ जायगी । तो नेत्र के धर्मं हैं, इनके लिये किसी विद्युत्पुरुष की कल्पना करने की मन्त्र से स्वामी दयानन्द मूर्तिपूजा का खण्डन बड़े संभार से करते हैं, के प्रतीक दिये गये हैं | आगे शब्द मूर्ति का वाचक न होकर सादृश्य का सूचक है । इस मन्त्र के उत्तरार्धं में कुछ मन्त्रों को बिना समझे इनका मनमाना अर्थ भी अनेक मन्त्रों में इसी पद्धति से प्रतीक मन्त्रों की सूचना दी जाती है । इस बात गया है कि अन्तः पद का कर स्वामी दयानन्द ने अपने को हास्यास्पद स्थिति में डाल दिया है । चौथे मन्त्र में बताया का कोई प्रसंग उठ ही अन्तःकरण अर्थ नहीं हो सकता । फिर आपके मत में तो ईश्वर निराकार है । वहाँ अन्तःकरण में गौण अर्थ करना पूरी नहीं सकता । यह अनेक बार बताया जा चुका है कि मुख्यार्थ जब हो सकता है, उस स्थिति हो सकता है । तरह से अनुचित है | सातवें मन्त्र में लिखा गया है कि योगाभ्यास की अपेक्षा उसका फल प्रश्न ही हमें उठता अभीष्ट है कि परमात्मा में ८ वें मन्त्र का स्वामी दयानन्द ने अर्थ किया है कि यह जगत् परमात्मा में स्थित है । यहाँ मिथ्या नहीं मानते, अतः यह किस रूप में स्थित है । इनका समवाय सम्बन्ध आपको अभीष्ट नहीं है । आप । आधाराधेयभाव जगत् को भी इनका नहीं माना रज्जु में सर्प की तरह परमात्मा में जगत् का अध्यास भी नहीं माना जा सकता नवें मन्त्र में गुहा पद से जायगा, क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमेश्वर की निरवयवता के कारण यह बन ही नहीं सकता । करती है । जीव की बुद्धि बुद्धि गृहीत है । यह बुद्धि ईश्वर की नहीं हो सकती, क्योंकि मुण्डक श्रुति इसका निषेध प्रकृति को धाम के रूप में प्रसिद्धि आप नित्यमुक्ति की स्थिति मानते ही नहीं । १० वें मन्त्र में बताया गया है कि जीव और नहीं है । इसके अभाव में ईश्वर को तृतीय धाम नहीं माना जा सकता । ११ वें मन्त्र के अर्थ में अनुपपत्ति यह है कि सत्य सबका अधिष्ठान है, अतः उसका कोई दूसरा अधिष्ठाता नहीं हो सकता । १२ वें मन्त्र में कहा गया कि ईश्वर तो आप्त-१. इस प्रसंग में नित्याषोडशिकार्णव की टीका ऋजुविमर्शनी में उद्धृत ये दो श्लोक अवधेय हैं -- “ कालो मृत्युर्यमो व्याधिस्तत्त्वतस्त्वेक एव तु । वृत्त्यन्तरविशेषेण पर्यायेणाभिधीयते ॥ सर्वावच्छेदकः कालो मृत्युर्मारयिता श्च सः । यमनाद्यम एवायं व्याधिश्विन्ताप्रदो हि सः ॥ " ( पृ ० २७३ ) ।

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( २२ ) काम है, अतः उसको किसी वस्तु की प्राप्ति की कोई अपेक्षा ही नहीं है सुख और विज्ञान पदों के अर्थ और सम्बन्ध को इन्होंने स्पष्ट नहीं किया और सुखरूप की सद्यः सुख की प्राप्ति की बात भी पूरी तरह से निराधार है । १३ वें मन्त्र भला यह कैसे संभव हो सकता है? अगले मन्त्र में उपस्थित होगा, क्योंकि आपके मत से ये दोनों शब्द में निराकार परमात्मा को सदसस्पति ( सभापति ) बताया गया है । देवगण और पितृगण का अलग - अलग उल्लेख है । यहाँ पुनरुक्ति दोष मनुष्य के ही वाचक हैं । तैंतीसवें अध्याय के पहले मन्त्र के स्वामी दयानन्द के भाष्य में दोष यह है कि अग्नि, विद्युत् आदि उत्पाद-विनाशशील पदार्थ हैं, इनकी अजरता कभी सिद्ध नहीं हो सकती । फिर विद्युत् में धूम की उपलब्धि भी नहीं होती । अतः ' अचंद्धमासः ' यह विशेषण वहाँ अपन्न नहीं होगा । द्वितीय मन्त्र में दोष यह है कि मन्त्र में वर्णित यत्नशीलता जड़ पदार्थों में नहीं हो सकती । सातवें मन्त्र में ' सहस्राणि ' पद का अर्थ ' हजार कोस का मार्ग ' किया गया है । यह कथमपि संभव नहीं हो सकता । ऐसा अर्थ मानने पर दूसरा दोष यह आवेगा कि तब इस मन्त्र के ' त्रीणि शता त्रिशच्च नव च ' ये पद व्यर्थं हो जायंगे | अग्नि, सूर्य, वायु आदि देववाचक पदों का इन्होंने मनमाना अर्थ किया है और इनके मत में ये सब जड़ पदार्थ हैं । ऐसी स्थिति में इनमें संबोध्यत्व अथवा पानकर्तृत्व आदि विशेषणों की कोई संगति नहीं बैठ सकती । यही दोष यहाँ दसवें मन्त्र में तथा अन्यत्र भी अनेक स्थलों पर दिखाया गया है । १२ वें मन्त्र में अग्नि पद से राजा का ग्रहण किया है, किन्तु राजा सारी मानव जाति को ऐसा उपदेश अथवा परामर्श देने में पूरी तरह से असमर्थ है । १३ व तथा आगे के मन्त्रों में भी अग्नि पद से मनुष्य को सम्बोधित किया गया है । १५ वें मन्त्र में इन सबका उत्तर देते हुए कहा गया है कि वेद तो धर्म और ब्रह्म का प्रतिपादक है । कोई चार्वाक दर्शन का अनुयायी ही ऐसी बातें कर सकता है । १६ वें मन्त्र में बताया गया है कि प्रत्यक्ष और अनुमान से जो ज्ञात हो सकते हैं, ऐसे विषयों का उल्लेख वेद में मानने पर उसकी अज्ञातज्ञापकता नष्ट हो जायगी । ये मन्त्रों के पदों का प्रायः गौण अर्थ ग्रहण करते हैं । इस विषय पर अनेक बार लिखा जा चुका है कि मुख्यार्थ का बाध होने पर ही ऐसा अर्थ किया जा सकता है, अन्यथा नहीं । १८-१९ मन्त्रों में इन्होंने निष्प्रयोजन ' इव ' पद का अध्याहार किया है । २२ वें मन्त्र में ' महत् ' पद से विद्युत् का ग्रहण करने में भी कोई प्रमाण नहीं दिया गया । अगले मन्त्र में द्यावापृथिवी कृत सेवा का वर्णन है, किन्तु जड़ पदार्थ किसी की भी सेवा करने में असमर्थ है | परमात्मा तो सभी अवस्थाओं से अतीत हैं, अतः २४ वें मन्त्र में उनकी युवावस्था का उल्लेख सर्वथा असंगत है । अल्प शक्ति वाला जीव कभी इन्द्र नहीं हो सकता, इतना कह कर १५ वें मन्त्र में बताया गया है कि मनुष्य की तृप्ति के लिये सोम की कोई उपयोगिता नहीं है और न आर्यसमाजी किसी राजा अथवा विद्वान् का सोमपर्व से जन ही करते हैं । २७ वें मन्त्र में ' हरिव ' पद के दयानन्दीय अर्थ की यहाँ सयुक्तिक समालोचना की गई है और इस प्रसंग में अमर-कोश के साथ वाल्मीकिरामायण के एक प्रसंग का भी उल्लेख किया गया है । २८ वें मन्त्र में भी इन्द्र और ऊर्व पद पर इसी पद्धति से विचार किया गया है । ३० और ३१ संख्या के मन्त्रों में राजपरक अथवा विद्वत्परक गौण अर्थ करने में अनेक दोष दिखाये गये हैं । ३४ वें मन्त्र में युवानः, विश्वानर, सविता आदि पदों के अर्थों की असंगति दिखाई गई है | ३७ वें मन्त्र में कहा गया है कि परमेश्वर तो नित्य समाहित है, उसके लिये समाधि की कोई आवश्यकता नहीं है । ३८ वें मन्त्र में कहा गया है कि आप सूर्य पद से कहीं राजा, कहीं विद्वान् और कहीं ईश्वर का ग्रहण करते हैं । यहाँ सूर्य पद के प्रसिद्ध अर्थ को छोड़ने का आपका प्रयोजन क्या है? फिर ईश्वर का शुद्ध और अशुद्ध दो तरह का रूप तो होता नहीं, क्योंकि वह तो सर्वतः शुद्ध है । हमारे मत में तो पुण्यात्मा पर अनुग्रह और पापात्मा का निग्रह करने से सूर्य के निग्रहानुग्रहात्मक दोनों रूप उपपन्न हो जाते हैं । आगे भी अनेक मन्त्रों में सूर्य की गौणमुख्यार्थता पर विचार किया गया है | ४३ मन्त्र में बताया गया है कि सविता आपके मत में अचेतन है । वह मन्त्रोक्त किसी भी कार्य को

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( २३ ) करने में असमर्थ हैं । सूर्य की गति भी आपकोस्वीकार नहीं है । ४४ वें मन्त्र में यही दोष वायु और सूर्य को लेकर दिया गया है । ४८ वें मन्त्र में दोष यह है कि आप आत्मा को अणु परिमाण का मानते हैं, अतः मन्त्रोक्त आत्मा की व्यापकता आपके मत से संभव नहीं हो सकती । ' नासत्यौ ' पद की आपकी व्युत्पत्ति भी असंभव है । ४ ९ वें मन्त्र में बताया गया है कि एक तरफ जड़ पूजा का आप विरोध करते हैं और दूसरी तरफ इन्द्र, अग्नि, मेघ, पर्वत आदि की स्तुति करते हैं । स्तुति भी तो पूजा का ही एक रूप है । ५४ वें मन्त्र में कहा गया है कि मोक्ष की प्राप्ति में तत्त्वज्ञान की ही कारणता हो सकती है, कर्म की नहीं । इसके समर्थन में यहाँ इसी संहिता का वचन उद्धृत है । ५५ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि निघण्टु में वायु के अश्व के लिये नियुत शब्द प्रयुक्त है, अतः उसका पुरुषपरक अर्थं प्रामाणिक नहीं माना जा सकता । ५७ वें मन्त्र में ' हुवे ' क्रियापद की स्वीकारायंता कथमपि संभव नहीं है । अगले मन्त्र में अभिषुतपद का अर्थ वैदिक प्रक्रिया के विपरीत है । ६० वें मन्त्र में आपके मत से जड़ अग्नि में चालन क्रिया संभव नहीं है । उसमें हित और अहित का ज्ञान भी इसी लिये असंभव है । हमारे मत में तो देवता दिव्यशक्ति से सम्पन्न होते हैं । ६१ वें मन्त्र में ' इन्द्राग्नी ' पद से सभापति और सेनापति का ग्रहण किया गया है । इस तरह के अर्थों की समालोचना यहाँ अनेक स्थानों पर हो की है । ६२ वें मन्त्र में उपगान पद का अर्थ भी अनोखा है । ६३ वें मन्त्र के मघवन्, हरिव इत्यादि पद इन्द्र के बोधक हैं, इन पदों का स्वयं असहाय मनुष्य के लिये प्रयोग सर्वथा अनुचित है । यथा - तथा पद मन्त्र में हैं ही नहीं । यही स्थिति ६४ वें मन्त्र की है । वहाँ यथा तथा के साथ ' इव ' पद भी मन्त्र में नहीं है । ६७ वें मन्त्र की आपकी व्याख्या में दोष यह है कि यहाँ ' अन्वीयतुः ' क्रियापद के अनुगुण कर्तृपद नहीं दिया गया । ७२ वें मन्त्र में व्युत्पत्ति के बल से ' रिशादशी ' पद का अर्थ अध्यापक और उपदेशक किया है, किन्तु इसी पद्धति से इसके अन्य भी अनेक अर्थ किये जा सकते हैं । ७४ वें मन्त्र में रश्मि पद पर विचार किया गया है कि यहाँ यह शब्द एकवचन प्रयुक्त है । आपके किये अर्थ के अनुसार एक ही रश्मि अनेक विपरीत दिशाओं में नहीं जा सकती । ७५ वें मन्त्र में दोष यह दिखाया गया है कि विद्युत् रूप अग्नि को व्यापक नहीं माना जा सकता । वस्तुतः यहाँ वेद का तात्पर्य ब्रह्मरूप और देवतारूप अग्नि के वर्णन में है । ७६ वें मन्त्र में इन्द्राग्नी पद से सभाध्यक्ष - सेनाध्यक्ष का अथवा अध्यापक-उपदेशक का ग्रहण करने में कोई प्रमाण नहीं है । ७८ वें मन्त्र में इसी पद से अध्यापक और अध्येता का ग्रहण करने में भी वही दोष है । उक्थ, स्तोत्र आदि वैदिक पदों के अर्थ से इनका कोई परिचय हो, ऐसा तो लगता ही नहीं । ८१ र्वे मन्त्र के अर्थ में दोष यह है कि निरतिशय ब्रह्म की स्तुति से उसमें वृद्धि को कल्पना असंगत है । पदार्थ विद्या की प्रशंसा से परमेश्वर की प्रशंसा मानने पर तो भौतिक विषयों की प्रशंसा भी परमात्मा की उपासना मानी जाने लगेगी । ८२ वें मन्त्र में बताया गया है कि यह सारा विश्व राजा का दास नहीं हो सकता । परमेश्वर पद से क्षुद्र नृपति का ग्रहण वैदिक मर्यादा के विपरीत है । ८५ वें मन्त्र में वायु पद के मुख्यार्थों का निरूपण करके बताया गया है कि यहाँ इस पद से राजा के ग्रहण में कोई प्रमाण नहीं है । यही स्थिति ८६ वें मन्त्र के इन्द्र और वायु पदों की भी है । ८ ९ वें मन्त्र में यथा - तथा पद नहीं हैं । प्रत्यक्ष यज्ञ को छोड़ कर कर्मान्तर की कल्पना भी निराधार है । ९ ० वें मन्त्र में बताया गया है कि यहाँ हरि पद निघण्टु के प्रमाण से इन्द्र के अश्व के लिये प्रयुक्त है, अतः आपका किया अर्थ असंगत है । ' कनिक्रदत् ' क्रिया का स्वारस्य भी आपने नहीं बताया । ९ १ वे मन्त्र में दिखाया गया है कि विद्वान् मनुष्य की भी क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति इतनी समर्थ नहीं होती कि वह सबकी प्रार्थना पूरी कर सके । यहाँ प्रायः सभी मन्त्रों में विद्वान् मनुष्य अथवा अध्यापक उपदेशक की चर्चा की गई है, जो कि सर्वथा निराधार है । ९ ६ वें मन्त्र में शतक्रतु शब्द की चर्चा है । सौ अश्वमेघ यज्ञ करने वाले इन्द्र के लिये यह शब्द प्रयुक्त है । उसका असंख्य बुद्धि अर्थ करना सर्वथा असंगत है । इसी तरह से शतपर्व शब्द से वज्र का ग्रहण किया जाता है, अन्य किसी अस्त्र का नहीं । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र में बताया गया है कि इन्द्र आदि देवताओं का अपलाप नहीं किया जा सकता, क्योंकि अमरसिंह आदि सभी कोशकारों ने देववर्ग और मनुष्यवर्ग का अपने - अपने कोशों में पूरी तरह से पृथक् रूप से वर्णन किया है ।

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( २४ ) ऊपर बताया जा चुका है कि ३४ वें अध्याय के प्रथम छः मन्त्र शिवसंकल्प में विनियुक्त हैं | अपनी आदत के अनुसार स्वामी दयानन्द ने इनका भी मनमाना अर्थ किया है । जाग्रत अवस्था में मनुष्य का मन बाह्य इन्द्रियों के अधीन रह कर ही कार्य कर सकता है, अतः तब उसकी स्वतन्त्र स्थिति नहीं मानी जा सकती । इस विषय की चर्चा भाष्य के विशेष अवधेय अंशों की प्रस्तुति के समय की जायगी । जिस किसी का मन सर्वोत्तम गुण, कर्म और स्वभाव से युक्त होता भी नहीं । श्रुति में मन की उत्पत्ति वर्णित है, अतः उसमें स्वरूपतः अमृतता भी नहीं मानी जा सकती । अतीत और अनागत वस्तु का ग्रहण कभी प्रत्यक्ष प्रमाण से नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसी तरह से चित्त और मन तो एक ही हैं, अतः किसी एक मन में सभी प्राणियों के चित्त के समावेश की बात भी निराधार है । सिद्धान्त पक्ष के अनुसार तो यहाँ समष्टि मन का ग्रहण करना पड़ेगा, जो कि आपको अभिप्रेत नहीं है । इसी तरह से मन इन्द्रिय होने के कारण करण है । वह कर्ता का नियामक कभी नहीं हो सकता । शिवसंकल्प मन्त्रों के अर्थ की इस अनुपपत्ति को दिखाने के बाद अन्य मन्त्रों के विषय में बताया गया है कि स्वामी दयानन्द ने मन्त्रों के देववाचक पदों से कहीं राजसामान्य, कहीं विद्वान् सभापति आदि अर्थ किये हैं । वे सब असंगत हैं । ९ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि मुख्यार्थ त्याग और गौणार्थं के ग्रहण के कारण इनके अर्थ में सर्वत्र असंगति ही दृष्टिगोचर होती है । अनुमति, सिनीवाली और सरस्वती ( ३४१ ९ - ११ ) पदों का अर्थ भी बड़ा विचित्र है । १४ वें मन्त्र में वृषण पद की यज्ञार्थता में भी कोई प्रमाण नहीं है । आपके मत में यज्ञ का फल केवल वायु - शुद्धि हैं । इडा पद का प्रशंसित स्त्री अर्थ करने में कोई प्रमाण नहीं दिया गया । १५ वें मन्त्र में इडा पद का अर्थ वाणी किया गया है । यह सब उनकी मनमानी ही तो है, क्योंकि ऐसा अर्थ करने के लिये न तो यहाँ कोई व्युत्पत्ति दी गई है और न कोश आदि का प्रमाण हो । १६ वें मन्त्र में आंगुष पद की विद्याशास्त्र - बोधकता में भी कोई प्रमाण नहीं है । १८ वें मन्त्र में अभिषव पद की निष्पादनार्थता भी अप्रामाणिक है । ' ग्रावाणः ' पद का अर्थ पाषाण है, उसका अर्थ ' गर्जना करने वाली ' करना पूरी तरह से उपहासास्पद है । २० वें मन्त्र में अषाढ, सुक्षिति आदि पदों की भी यही स्थिति है । कोई राजा सोम ओषधि के समान रोग का नाश नहीं कर सकता, पृथ्वी और जल को पैदा भी नहीं कर सकता और न सूर्य के समान अन्धकार को दूर करने में ही समर्थ है, २२ वें मन्त्र की ये ही सब असंगतियाँ हैं । यहाँ अनेक मन्त्रों का मनुष्यपरक अर्थं दिया गया है । उन सबमें इसी तरह के दोष यहाँ चर्चित हैं । २७ वें मन्त्र में असंगति यह है कि भूमि पर कोई भी मार्ग धूल से रहित नहीं मिल सकता और अन्तरिक्ष में किसी को ले जाने की सामर्थ्य विद्वान् मनुष्य में नहीं है । अगले अनेक मन्त्रों में अश्विनौ अथवा दस्रौ पदों के किये गये अध्यापक उपदेशक, सभा - सेनेश आदि अर्थ पूरी तरह से निराधार हैं । ३४ वें मन्त्र में मित्रावरुण पद का प्राण और अपान अर्थ भी इसी प्रकार का है । ३६ वें और आगे के भी मन्त्रों में भग पद की भी यही स्थिति है । ३ ९ वें मन्त्र में अध्वर पद का अर्थ अहिंसक व्यवहार किया गया है । ऐसा करने पर तो क्रय - विक्रय व्यवहार में भी अध्वर पद प्रयुक्त होने लगेगा । वस्तुतः वैदिक यज्ञ को ही अध्वर कहा जाता है और इस अर्थ को बताने वाली व्युत्पत्ति भी भाष्य में बताई गई है । ४२ वें मन्त्र में ' स्तुयाम ' पद है ही नहीं, इसका यहाँ निरर्थक अध्याहार किया गया है । अगले मन्त्र में विक्रमण और धर्म शब्दों का अर्थ गलत किया गया है । ४६ वें मन्त्र में निर्दिष्ट इन्द्र, अग्नि, वसु आदि पदों की आपने जड़परक व्याख्या की है । फिर उनमें किसी सामर्थ्य की कल्पना नहीं की जा सकती । ४८ वें मन्त्र में स्तोम, मरुत् आदि पदों की भी यही स्थिति है । ४ ९वें मन्त्र में सहस्तोम शब्द की विचित्र व्याख्या की गई है । ५२ मन्त्र में दाक्षायण पद का अर्थ पूरी तरह से असंगत है । मन्त्र में ' आयुष्मान् ' पद है, किन्तु पदच्छेद का ठीक ज्ञान न होने से ' युष्मान् ' पद कल्पना कर ली गई है । ५५ वें मन्त्र के सात ऋषियों में ये कभी जीव की गणना करते हैं, तो कभी बुद्धि की । त्वक् इन्द्रिय के सिवाय अन्य इन्द्रियाँ सारे शरीर को व्याप्त कर रहती भी नहीं । ५७ वें मन्त्र में बताया गया है कि परमात्मा वेद का उपदेश करते हैं, किन्तु आपके मत से तो वे निराकार हैं

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( २५ ) और कण्ठ, तालु आदि अंगों के बिना वेद का उच्चारण असंभव है । परमेश्वर आकाश के समान सावकाश भी नहीं हो सकते, क्योंकि निराकार ईश्वर निरवयव होने से निरवकाश ही रहेंगे । इस अध्याय के अन्तिम ५८ वें मन्त्र के ब्रह्म पद से ब्रह्माण्ड के ग्रहण में भी कोई प्रमाण नहीं है । ' अवन्ति ' क्रिया का ' उपदिशन्ति ' अर्थ करना भी निर्मूल है । ३५ वें अध्याय के पहले मन्त्र में ' सुषाव ' क्रिया की सुतकमपरक व्युत्पत्ति दी गई है, जिसमें कि गौरव दोष है । यम पद का भी प्रसिद्ध अर्थं न ग्रहण कर यन्ता अर्थ किया गया है । द्वितीय मन्त्र में जीव को सम्बोधित कर उस्रिया पद का अर्थ किरण किया है । वस्तुतः यहाँ यजमान सम्बोधित है और ' उत्रियाः ' का अर्थ बैल है । तीसरे मन्त्र का भावार्थं पूरी तरह से निर्मूल है । चौथे मन्त्रार्थ के खण्डन में पूर्व प्रतिपादित सिद्धान्तों का स्मरण कराया गया है कि रूढि योग की अपेक्षा प्रबल मानी जाती है । गौणार्थं और मुख्यार्थ में मुख्यार्थं का ही प्रायः ग्रहण किया जाता है । कुछ विशेष परिस्थितियों में गौणार्थ अवश्य स्वीकार किया जाता है, जैसे कि बादरायण सूत्रों में आकाश और प्राण शब्दों के विषय में निर्णय दिया गया है । इस तरह का कोई बाघक प्रमाण प्रस्तुत मन्त्र के विषय में नहीं है कि गौणार्थं का ग्रहण किया जाय । ५ वें मन्त्र में सविता पद के मुख्यार्थ को छोड़ कर बिना प्रसंग के उसका पिता अर्थ किया गया है । छठे मन्त्र में जीव और ईश्वर विषयक विकल्प प्रस्तुत कर स्वामी दयानन्द के प्रतिपाद्य अर्थ को असंगत बताया गया है । इस तरह के विकल्प पहले भी अनेक स्थलों पर प्रदर्शित हैं । नवें मन्त्र में इस तरह के विकल्प के आधार पर पुनः उनके अर्थ में असंगति दिखाई गई है, जिसका कि उनके पास कोई उत्तर नहीं है । ११ वें मन्त्र में अपामार्ग पद के प्रसिद्ध अर्थ को छोड़ दिया गया है । जड़ अपामागं और सज्जन पुरुष में भी दूसरों के पापों का दुःस्वप्नों का नाश कर देने की सामर्थ्य नहीं है । हमारे मत में तो इस ओषधि की अधिष्ठात्री देवता में यह सामर्थ्यं विद्यमान है । १२ वें मन्त्र की भी यही स्थिति है । आपके मत से जल जड़ है और हम उसमें सामर्थ्य सम्पन्न देवता का आवाहन करते हैं । १३ वें मन्त्र में आपके द्वारा चर्चित यान - निर्माण की वहाँ कोई विधि नहीं दिखाई पड़ती । १५ वें मन्त्र में पर्वत पद से ब्रह्मचर्य के ग्रहण में कोई प्रमाण नहीं है । ' अन्यस्य ' पद भी मन्त्र में नहीं है, इसका व्यर्थ अध्याहार किया गया है । १७ वें मन्त्र में अग्नि पद को राजार्थंक मान कर मुख्यार्थ को बिना प्रमाण के छोड़ दिया गया है । मनुष्य के लिये घृतप्रतीक, घृतयोनि जैसे विशेषण भी अनावश्यक हैं । १८ वें मन्त्र में पर्यनेषत और पर्यहृष्यत इन दोनों क्रियापदों का अर्थ गलत किया गया है । १ ९ वें मन्त्र में क्रव्याद और यमराज शब्दों का अर्थ प्रमाण - विरुद्ध है । २० वें मन्त्र में भी जातवेदा, पितृभ्यः इत्यादि पदों के प्रसिद्ध अर्थ को अकारण छोड़ दिया गया है । २१ वें मन्त्र में पृथिवी शब्द का अर्थ पृथिवी के समान वर्तमान स्त्री किया है और इस अध्याय के अन्तिम २२ वें मन्त्र में विद्वान् मनुष्य को अकारण सम्बोधित कर जो कुछ कहा गया है, वह पूरी तरह से निराधार है । ३६ वें अध्याय के पहले मन्त्र में भी मनुष्य को सम्बोधित करने में कोई प्रमाण नहीं है । ऋग्वेद के समान यजुर्वेद और सामवेद में भी वाक्तत्त्व की समान स्थिति है और यजुर्वेद का मन से सादृश्य कहीं वर्णित नहीं है । दूसरे मन्त्र में बृहस्पति पद के प्रसिद्ध अर्थ को अकारण छोड़ दिया गया है । परमेश्वर की विद्युत् से समानता आपके जैसे निराकारवादी के मत में कैसे सम्भव होगी, वें मन्त्र में यही प्रतिपादित है । नवें मन्त्र में स्वामी दयानन्द प्राणप्रिय मित्र की चर्चा कर बैठे हैं । १० वें मन्त्र में विकल्प उपस्थित किया गया है कि वर्षा कराने की शिक्षा निराकार ईश्वर दे नहीं सकता और विद्वान् मनुष्य में ऐसी सामर्थ्यं नहीं है । ११ वें और १२ वें मन्त्र में भी यही विषय कुछ विस्तार से प्रतिपादित है । १७ वें मन्त्र का मनुष्य को सम्बोधित कर जो अर्थ किया है, वह पूरी तरह से निराधार है । १८ वें मन्त्र में बताया गया है कि परमेश्वर सर्वान्तर्यामी है । उससे भिन्न किसी विद्वान् मनुष्य में यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अन्य व्यक्तियों में अलौकिक सामर्थ्यं भर सके । यही दोष १ ९ वें मन्त्र में भी है । २१ वें मन्त्र का जो अर्थ आपने किया है, उससे तो परमेश्वर साकार सिद्ध हो जाता है, जो कि आपको अभिप्रेत नहीं है । २३ वें मन्त्र में वर्णित जल और I

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( २६ ) safari आपके मत में जड़ हैं । इनमें पक्षपात अथवा द्वेष की भावना मानना निरर्थक है, क्योंकि ये सब तो चेतन के धर्म हैं । भगवान् तो भक्त का अनुरोध स्वीकार करते हैं, अतः उनसे सब तरह की प्रार्थना की जा सकती है । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र में प्रतिपादित है कि इस मन्त्र का देवता सूर्य है । इस बात को स्वीकार कर के भी आपने मन्त्रार्थं करते समय इसमें परमेश्वर से प्रार्थना की है । परमेश्वर केवल देवताओं का ही हितकर नहीं है, वह तो सबका कल्याण करता है । चक्षु पद का चक्षुतुल्य अर्थ करने पर भी चेतन ब्रह्म की निराकारता के कारण उसका दर्शन होना असंभव है । ३७ वें अध्याय के पहले ही मन्त्र में अध्यापक और उपदेशक के हाथों से विद्वान् व्यक्ति के ग्रहण की बात कही गई है । यहाँ ग्रहण करने वाला कौन है? यह नहीं बताया गया । दूसरे के हाथों और बाहुओं से कोई अन्य व्यक्ति किसी वस्तु को कैसे ग्रहण करेगा? इसकी पद्धति यहाँ नहीं बताई गई । तीसरे मन्त्र में भी अध्यापक और उपदेशक की निष्प्रमाण चर्चा है | यज्ञ का सिर क्या है, इस विषय को भी यहाँ स्पष्ट नहीं किया गया । चतुर्थ मन्त्र में पूंछा गया है । कि अल्पवयस्क तेजस्विनी स्त्री के द्वारा देवयजन किस उद्देश्य से किया जाय? देवयजन शब्द का यहाँ पूजन अर्थ किया गया है और आगे छठे मन्त्र में देवयजन स्थान अर्थ करते हैं । इस प्रकार शब्दों से खिलवाड़ कर ये मूर्खों को ही ठग सकते हैं । ८ वें मन्त्र में इन्होंने मख शब्द की जो व्युत्पत्ति दी है, तदनुसार तो क्रय - विक्रय आदि लौकिक व्यवहारों में भी इस शब्द का प्रयोग होने लगेगा | नवें मन्त्र में मख शब्द का अर्थ वायुशुद्धि किया है । क्या कोई व्यक्ति सभ्य पुरुष के आने पर उसका स्वागत धूप से करता है । फिर इस शब्द का अर्थ धूपदान न होकर केवल धूप है, जिसका कि सही अर्थ अगुरु, चन्दन, गुग्गुल आदि का धूप होता है । ११ वें मन्त्र में दिखाया गया है कि कोई भी विद्वान् स्पर्शमात्र से किसी की रक्षा करने में असमर्थ है । अचि पद का ' अचि के समान ' यह गौण अर्थ भी निष्प्रमाण है । १२ वें मन्त्र में बताया गया है कि विद्वान् मनुष्य किसी दूसरे को आयु आदि देने में असमर्थ है । दूसरे की पत्नी पर अन्य व्यक्ति का अधिकार आर्यमर्यादा के विपरीत है । १३ वें मन्त्र में मधु पद की कर्मार्थता में कोई प्रमाण नहीं है । संस्पृश पद का विद्युत् अर्थ भी कहीं देखने को नहीं मिलता । १४ वें मन्त्र में मति शब्द का अर्थ मननशील मेघावी करना भी पूरी तरह से निराधार है । १६ वें मन्त्र में बताया गया है कि तप से परमेश्वर की उत्पत्ति आपके मत में भी स्वीकृत नहीं है । उत्पत्ति का अर्थ प्राकट्य हो सकता है, किन्तु आपने इस पक्ष को माना ही नहीं है । १७ वें मन्त्र में भी इस प्रकार का दोष है कि निराकार ईश्वर का आप दर्शन कैसे करेंगे । दूसरे की आत्मा को देखने में मन की भी सामथ्यं नहीं है । निराकार परमेश्वर के किसी प्रकार के आचरण की भी सम्भावना नहीं है, क्योंकि साकार में ही यह सम्भव है । उसकी आच्छादकता भी इसीलिये नहीं मानी जा सकती । १८ वे मन्त्र का अर्थ पूरी तरह से शतपथश्रुति के विपरीत है । १ ९ वें मन्त्र में बताया गया है कि ईश्वर किसी प्रकार का प्रचार करते हुए देखा नहीं गया और देवपद का विद्वान् अर्थ करने पर उसके लिये विद्या के प्रचार की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, क्योंकि वह तो स्वयं ही विद्वान् हैं । परस्परविरोधी और श्रुतिविरोधी अर्थ करने में ही स्वामी दयानन्द अपनी सारी बुद्धि लगा देते हैं । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र में केतु पद का अर्थं जागरूक ज्ञान, जागृतावस्था किया है, किन्तु उसमें कोई प्रमाण नहीं दिया गया । अड़तीसवें अध्याय के अनेक मन्त्रों में स्वामी दयानन्द ने विदुषी स्त्री, मानवी, कन्या, विद्वान् पुरुष, स्त्री - पुरुष, राजा - रानी आदि को संबोधित किया है । हम पहले ही बता चुके हैं कि ऐसे संबोधन पूरी तरह से निराधार हैं । यहाँ प्रथम मन्त्र के अदिति पद का अर्थं नाशरहित नीति किया है । इसमें तथा स्त्री - पुरुष का वर्णन करने में भी कोई प्रमाण नहीं दिया गया । तीसरे मन्त्र में अदिति पद का नित्यविज्ञान, इन्द्राणी पद का परमैश्वर्यवती नीति और उष्णीष शब्द का उष्णीषतुल्य अर्थ भी निष्प्रमाण है । चौथे मन्त्र में उपनिषत्, पातंजल महाभाष्य, ब्रह्मसूत्र आदि के प्रमाण से अथ शब्द का दृष्टान्त देकर सयुक्तिक समझाया गया है कि प्रसिद्ध रूढ अर्थ का बाघ होने पर ही यौगिक अर्थ का ग्रहण

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( २७ ) किया जा सकता है, अपने मनमाने तरीके से नहीं । छठे मन्त्र के भाष्य में मूल में अविद्यमान स्त्रीपद का अध्याहार किया गया है । चौथे मन्त्र की तरह यहाँ भी बताया गया है कि कभी - कभी वाक्यशेष के बल से भी अर्थान्तर ( गौण अर्थ ) का ग्रहण किया जाता है और इसके लिये छान्दोग्य उपनिषद् को उद्धृत कर उसकी पुष्टि ब्रह्मसूत्र, बृहदारण्यक के वचनों से की गई है । ऐसा कोई प्रसंग न रहते हुए भी स्वामी दयानन्द व्यर्थ ही श्रुतहानि और अश्रुतकल्पना का सहारा लेते रहते हैं | सातवें मन्त्र में पुनः इसी प्रसंग में ब्रह्म पद पर भी विचार किया गया है और वात अथवा वायु पद की गौणार्थकता को असंगत बताया गया है । आठवें मन्त्र में स्वाहा, विभु इत्यादि पदों के अर्थ के प्रसंग में सांख्यदर्शन तथा उपनिषद् के वचनों को उद्धृत करते हुए भाक्त प्रयोग की समस्या पर प्रकाश डाला गया है । इस प्रकार हम देखते हैं कि स्वामी करपात्री जी महाराज ने इन मन्त्रों के दयानन्दीय अर्थ का खण्डन करते समय मुख्यार्थ और गौणार्थ की समस्या पर बड़ा गम्भीर दार्शनिक विचार प्रस्तुत किया है । यम पद से न्यायाधीश का ग्रहण इन्होंने अनेक स्थलों पर किया है । विद्युत् आदि की असमय चर्चा ये करते रहते हैं । यहाँ के नवें मन्त्र में भी इन्होंने यही किया है । १० वें मन्त्र में और आगे भी अश्वि और घमं पद का इनका अर्थनिर्मूल है | ११ वें मन्त्र में आकाश शब्द के दृष्टान्त से इनके यज्ञ पद के व्याख्यान का खण्डन कर इसके वास्तविक अभिधेय को स्पष्ट किया गया है । यही स्थिति १४ वें मन्त्र के धर्म, सुधर्म, ब्राह्मण आदि पदों की भी है । १६ वें मन्त्र में बताया गया है कि जीव, प्राण आदि को स्तुति से किसी पुरुषार्थं की सिद्धि नहीं हो सकती । १७ वें मन्त्र में दिव पद का इन्होंने अविद्या आदि गुणों का प्रकाशक अर्थ किया है, वह इसलिये निराधार है कि अविद्या गुणस्वरूप न होकर अन्धकार -स्वरूप होती है । उसका प्रकाश के वाचक दिव शब्द से ग्रहण नहीं किया जा सकता । २० वें मन्त्र में नाभि की चतु: स्रक्तता ( चतुरस्रता ) पर विचार किया गया है । २६ वें मन्त्र में ग्रह का अर्थ सामर्थ्य किया है । इसी तरह से २७ वें मन्त्र में धर्म शब्द का प्रताप और त्रिशुक् पद का मृदु, मध्य और तीव्र दीप्ति अर्थ किया है, किन्तु इसमें कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र में रेतस् पद का पराक्रम अर्थं दिया है । उसकी यहाँ पूरी समीक्षा की गई है और अन्त में बताया गया है कि यह सब मत्तप्रलपित मात्र है । ३ ९ अध्याय के पहले मन्त्र में बताया गया है कि आपके मत से पृथिवी आदि जड़ पदार्थ हैं । इनके लिये स्वाहा ( सत्य वाणी ) के प्रयोग की कोई उपयोगिता नहीं हो सकती । यहाँ दिये भावार्थ का तो मूल से कोई सम्बन्ध ही नहीं है और न अपने कथन के समर्थन में कोई प्रमाण ही दिया है । स्वामी दयानन्द ने प्रस्तुत अध्याय के मन्त्रों का विनियोग मृत व्यक्ति के शरीरदाह के लिये बताया है, किन्तु इसमें इन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया । श्रुति, सूत्र इत्यादि में तो इनका विनियोग घर्मपात्र के टूट जाने पर प्रायश्चित्त के लिये विहित । इस विषय को विस्तार से दिखा कर यहाँ स्वामी दयानन्द के मत का खण्डन किया गया है । तीसरे मन्त्र में दिखाया गया है कि मृत शरीर में वाणी आदि की स्थिति नहीं रहती, तब उनके लिये स्वाहाकार करने की क्या आवश्यकता है । यही दोष चौथे मन्त्र के अर्थ में भी दिखाया गया है । ५ वें मन्त्र में सम्राट्, सरस आदि पदों के इनके दिये अर्थों की निर्मूलता प्रदर्शित है । देहत्याग के बाद जीव उन - उन देवताओं को प्राप्त करता है, छठे मन्त्र के इस अर्थ में दोष यह दिखाया गया है कि एक तो इसके समर्थन में कोई प्रमाण नहीं दिया गया, दूसरे मन्त्र में ये पद हैं ही नहीं । ये विश्वदेव जीव द्वारा क्यों प्राप्त किये जाते हैं, इसका आपने कोई समाधान नहीं दिया और न विश्वेदेव पद का अर्थ ही बताया । देव नाम की कोई विशेषयोनि आपको मान्य नहीं है । आगे के मन्त्रों में भी इस तरह के निरर्थक अध्याहार किये गये हैं । स्वाहा पद का आपका अर्थ भी बड़ा विचित्र है | १० वें मन्त्र का आपका अर्थ जड़ पदार्थ की पूजा में पर्यवसित होता है और मूर्तिपूजा का आप खण्डन करते हैं । ये दोनों बातें एक ११ वें मन्त्र में मनुष्य के साथ कैसे हो सकती हैं? ऐसा करके तो आप अपने मान्य सिद्धान्त से ही च्युत हो जाते हैं । लिये स्वाहाकार के प्रयोग की आवश्यकता क्या है, यह नहीं दिखाया गया । १२ वें मन्त्र में

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( २८ ) वेदार्थपारिजातभाष्यकार ने बताया कि बिना प्रयोजन के किसी कार्य में प्रवृत्ति पागल को ही हो सकती है । इस अध्याय के अन्तिम १३ वें मन्त्र में स्वाहाकार के प्रयोग पर फिर प्रश्नचिह्न लगाया गया है । ' स्वाहाकार ' शब्द के बोलने मात्र से भूमि का शोधन नहीं हो सकता । थोड़े से घृत और चन्दन की आहुति देने से भी यह संभव नहीं है । चन्दन सुगन्ध फैलने से रही । इसीलिये इस तरह की बातें उन्माद की अवस्था में दिया गया प्रलाप-की एक बूंद से समुद्र में मात्र हैं । सिद्धान्त पक्षमें तो आहुति देते समय मन्त्र का उच्चारण किया जाता है और उससे अदृष्ट की जाती है । उस अदृष्ट की सामथ्यं से सब कुछ संभव हो जाता है । आप अदृष्ट को स्वीकार नहीं करते, उसका खण्डन कर दिया है । भाष्य के विशेष अवधेय अंश उत्पत्ति मानी क्योंकि आपने यहाँ पृ ० ३-४ पर किसी आचार्य के मत का उल्लेख करने के बाद ' सम्प्रदायविदस्तु ' कह कर सिद्धान्त पक्ष को स्थापित किया गया है । इसी तरह पृ ० ८ पर विष्णुपुराण के प्रमाण से वैदिक वाङ्मय की सृष्टि प्रतिपादित है, जो कि अन्य अनेक पुराणों में भी इसी रूप वर्णित मिलती है । पृ ० १३ पर सात परिधियों ' और २१ समिधाओं का वर्णन दर्शना है । पृ ० १ ९ -२० पर ' न मे भक्तः प्रणश्यति ' भगवद्गीता के इस वाक्य की हृदयाभिराम व्याख्या की गई है । पृ ० २५ पर हम " यत्र विश्वं भवत्येकनीडम् " इस प्रसिद्ध वेदवचन को देखते हैं । कवीन्द्र रवीन्द्र की विश्वभारती का यही वेदवचन आदर्श वाक्य है । इससे संहिता भाग की दार्शनिक गंभीरता का भी पता चलता है । ऐसे ही वाक्यों से प्रेरणा प्राप्त कर हम द्वेष और कलह से परे आधुनिक विश्व को मानव जाति का सुहृद्गृह बना सकते हैं । पृ ० ४ ९ -५० पर मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ करते समय तथा दयानन्दीय अर्थ की समालोचना करते समय कुछ ग्रन्थों के आधार पर भगवान् की भक्तवत्सलता प्रदर्शित है । इन्द्र के अश्व का वर्ण हरित है, निरुक्त की इस उक्ति का समर्थन रामायण के प्रमाण से किया गया है । ५ ९ पृष्ठ पर भक्त पूरे आत्मविश्वास के साथ कहता है कि मैं भगवान् के दर्शन करने में अपनी योग्यता के आधार पर अवश्य समर्थ हूँ । पृ ० ७८ पर नासदीय सूक्त के प्रसिद्ध मन्त्र ' तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषाम् ' की अधियज्ञ व्याख्या देखने योग्य है । वहीं कहा गया है कि अध्वर्यु उत्तर हविर्धान के नीड पर एक अम्भ्रण की स्थापना करता है । उसे आघवनीय कहा जाता है । प्रउग स्थान पर द्वितीय अम्भ्रण की स्थापना की जाती है । इसे पूतभृत् कहते हैं । हविर्धान शकट को कहते हैं, यह पहले बताया जा चुका है । बड़े मुह वाले मिट्टी के कहलाती है । इस नीड के बाहर के भाग को प्रउग घड़े को अम्भ्रण कहा जाता है । शकट पर बैठने की जगह नीड कहते हैं । मन्त्र से संस्कृत प्रादेश प्रमाण नीचे से ऊपर तक बिना टूटे हुए दो दर्भों को मिलाकर प्रोक्षण के निमित्त पवित्र बनाया जाता है । उद्गाता ( सामगान करने वाला ) आदि के द्वारा सोम के ऋजीष, कल्क आदि को छानने के उपयोग में आने वाला वस्त्र दशापवित्र कहलाता है । ग्रह, चमस, आघवनीय आदि पात्रों में छने हुए सोमरस को स्थापित किया जाता है । पृ ० ८८ पर ' पंक्तिराघसम् ' पद की व्याख्या २. " आहवनीयादीनां त्रिषु पार्श्वेषु प्रथममेखलाया उपरि विधीयमानानि मेखलापरिमितायामानि काष्ठानि परिषय उच्यन्ते ।उत्तरवेदिपरिघयस्त्रयः , आहवनीपरिधयस्त्रयः, सप्तमश्च आदित्यः परिधिरिति सप्त परियो भवन्ति " ( भा ०, पृ ० १३ ) । आहवनीय स्वर के पश्चिम, दक्षिण और उत्तर में जो पलाश की समित् रखी जाती है, वह परिधि है । यह बाहुमात्र लम्बी होती है ( कात्या ०, पृ ० ४ ९ २ ) । " समिघोऽग्नेर्दीप्ति साधनाभूतानि काष्ठानि " ( भा ०, पृ ० १३ ) । हवन के निमित्त पलाश या अन्य विहित यज्ञकाष्ठ को समित कहते हैं । यह अंगुली की मोटाई से अधिक मोटी न होनी चाहिये । सड़ी और घुनी भी नहीं होनी चाहिये ( कात्या ०, पृ ० ५२२ ) ।

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( २ ९ ) विस्तार से की गई है । इस शब्द की व्याख्या अन्यत्र ( पृ ० १६ ९ ) भी मिलती है, किन्तु यहाँ हविष्पंक्ति, नाराशंस-पंक्ति और सवनपंक्ति को अधिक स्पष्ट रूप से समझाया गया है । इस विषय को पृ ० १६६ पर भी देखा जा सकता है । है । यहाँ टिप्पणी में बताया गया है कि इनका वर्णन ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है । ऊपर इस बात की चर्चा हो चुकी कि यह विषय वैदिक विद्वानों के लिये विशेष रूप से अवलोकनीय है । पृ ० ८ ९ पर बृहदारण्यक के एक वचन के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि भगवान् आराधक की आत्मा में छिपा रहता है । हमें लगता है कि ' देवो भूत्वा देवान् यजेत् ' जैसे वाक्य अपने भीतर छिपे हुए भगवद्भाव की ओर ही इंगित करते हैं । पृ ० ९ १ पर बताया गया है कि मूलाधार से उठकर वाणी तीस अंगुल का मार्ग तय करके मुख तक आती है । व्याख्या करते समय पृ ० ९ ५ पर प्रथम मन्त्र में मन के अतीत, ३४ वें अध्याय के छः शिवसंकल्प मन्त्रों की पदार्थों को भी देख सकने की शक्ति की औपचारिकता का उपनिषद् के अनागत, वर्तमान, संनिकृष्ट, विप्रकृष्ट, व्यवहित पहचान प्रमाण से वर्णन किया गया है । यहाँ बताया गया है कि गान्धर्व शास्त्र के अभ्यास से उत्पन्न षड्ज आदि स्वरों की प्रमा का और की तरह प्रत्यगभिन्न ब्रह्मरूप का महावाक्यजन्य प्रमात्मक मानस साक्षात्कार हो सकता है । महावाक्यजन्य सांख्य, वेदान्त, न्यायशास्त्र आदि दर्शनों और विभिन्न ग्रन्थों के प्रमाण से मन की शक्ति एवं जागरण, स्वप्न, प्रस्वाप चाहिये । आदि दशाओं का यहाँ सप्रमाण विवरण दिया गया है । दार्शनिकों को इस प्रसंग का अवलोकन अवश्य करना भी निवास है । पृ ० ९ ८ - ९९ पर इस मत का उल्लेख किया गया है कि मस्तक में मस्तिष्क का जो स्थान है, वहीं मन का है । बाद में इस मत का यहाँ खण्डन कर दिया गया है और हृदय - पुण्डरीक में ही मन की स्थिति मानी गई पितृमेघ की प्रक्रिया का भी यहाँ ( पृ ० १३० - १३१ ) विस्तार से वर्णन है, जिसका कि स्वरूप ऊपर बता वर्णन दिया यहाँ गया है । मुख्यार्थ को छोड़कर गौणार्थं का ग्रहण किन - किन स्थितियों में किया जा सकता है, इस हमने विषय ऊपर का लिखा है कि अनेक स्थलों ( पृ ० १३४, १८७ - १८८, १ ९ १ - १ ९ २, १ ९ ३ ) पर किया गया है । इसीलिये किया दयानन्दीय अर्थ का खण्डन करते समय मुख्यार्थ और गौणार्थ की समस्या पर बड़ा गंभीर दार्शनिक विचार प्रस्तुत १६१ ) । गया है । पितृमेघ के समान ही महावीर के संभरण की प्रक्रिया का भी यहाँ विस्तार से वर्णन है ( पृ ० १५६ -इसके स्वरूप को भी ऊपर यथास्थान देखा जा सकता है । है । यह इस प्रकार इस ग्रन्थ के विभिन्न खण्डों में उपस्थापित ११ - ३ ९ अध्यायों का भाष्यनिष्कर्ष पूरा दस होता अध्यायों का विधि का विधान ही है कि ४-१० अध्यायों के मुद्रण कार्य में अत्यधिक विलम्ब हो जाने के कारण प्रथम से भाष्यनिष्कर्ष अभी तक नहीं लिखा.... जा सका । यह कार्य भी शीघ्र सम्पन्न हो जाय, इसके लिये हम भगवान् प्रार्थना करते हैं । वाराणसी फाल्गुन पूर्णिमा, संवत् १ ९ ४८ विद्वद्वशंवद व्रजवल्लभ द्विवेदी