वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 381–390

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 381–390

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प्रतिपाद्य विषय प्रकाशकीय वक्तव्य विषय - सूची नवाध्यायी ( ३१-३९ ) - भाष्य निष्कर्षं afusar संख्या एकत्रिंश अध्याय: पुरुष सूक्त १-१६. पुरुष सूक्त के सोलह मन्त्रों से परम पुरुष महानारायण की विभूति का आख्यान एवं पूर्वाध्याय में नियुक्त पशुओं का दक्षिण में उपविष्ट ब्रह्मा द्वारा स्तवन १७-२२. उत्तरनारायण संज्ञक छः मन्त्रों द्वारा सूर्योपस्थान द्वात्रिंश अध्याय: सर्वमेघ याग १ - १०. सर्वमेघ याग के अप्तोर्यामसंज्ञक सातवें दिन सर्वहोम के विनियोजक मन्त्र ११-१२. सर्वमेधयाजी गृहस्थ की मुक्ति का निरूपण १३-१६. तीन मन्त्रों से मेघा की और चौथे से श्री की याचना यश अध्याय: सर्वमेधीय पुरोनुवाक्या १-१७. सर्वमेघ के अग्निष्टोमसंस्थ अग्निस्तुत्संज्ञक प्रथम दिन के विभिन्न ग्रहों के ग्रहण में विनियुक्त पुरोनुवाक्या मन्त्र १८-२९. सर्वमेघ के उक्थसंस्थ इन्द्रस्तुत्संज्ञक द्वितीय दिन के विभिन्न ग्रहों के ग्रहण में विनियुक्त पुरोनुवाक्या मन्त्र ३०-४३. सर्वमेघ के सूर्यस्तुत् नामक तृतीय दिन के विभिन्न ग्रहों के ग्रहण में विनियुक्त पुरोनुवाक्या ४४-५४. सर्वमेघ के वैश्वदेवस्तुत् चतुर्थ दिन के विभिन्न ग्रहों के पुरोनुवाक्या मन्त्रों का ब्रह्मयज्ञ में विनियोग मन्त्र ५५-६९. अनारभ्याधीत प्रथम अनुवाक के पुरोनुवाक्या मन्त्रों का ब्रह्मयज्ञ में विनियोग ७०-८४. अनारम्याधीत द्वितीय अनुवाक के पुरोवाक्या मन्त्रों का ब्रह्मयज्ञ में विनियोग ८५ ९ ७. अनारम्याधीत तृतीय अनुवाक के पुरोनुवाक्या मन्त्रों का ब्रह्मयज्ञ में विनियोग चतुस्त्रिँश अध्याय: शिवसंकल्प मन्त्र १- ६. इस अनारम्याधीत अध्याय के प्रथम छः मन्त्रों से मन्त्रद्रष्टा द्वारा शिवसंकल्प कीकामना ७-५४. अन्न, अनुमति, सिनीवाली, अहिर्बुध्न्य आदि देवताओं की स्तुति, अनुमति देवता की स्तुति, सिनीवाली देवता की स्तुति, सरस्वती नदी की स्तुति, अग्नि देवता की स्तुति, इन्द्र देवता की स्तुति, सोम देवता की स्तुति, सावित्री की स्तुति, अश्विनीकुमारों की स्तुति, सविता देवता की स्तुति, रात्रि देवता की स्तुति, उषा देवता की स्तुति, अग्नि, इन्द्र आदि देवताओं की स्तुति, भग देवता की स्तुति, उषा देवता की स्तुति, पूषा देवता की स्तुति, विष्णु देवता की स्तुति, द्यावापृथिवी देवताओं की स्तुति, अग्नि, इन्द्र आदि देवताओं की स्तुति, अश्विनीकुमारों की स्तुति, महत् देवताओं की स्तुति, ऋषि - सृष्टि के प्रतिपादक मन्त्र, हिरण्य की स्तुति आदित्य देवता की स्तुति,, ५५. अध्यात्मवादिनी ऋक् ५६-५८. ब्रह्मणस्पति देवता की स्तुति १

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१- १ ९. पितृमेध सम्बन्धी मन्त्र ( ३१ ) पञ्चत्रिंश अध्याय: पितृमेध याग २०. जातवेदा ( अग्नि ) देवता की स्तुति २१. पृथिवी देवता की स्तुति २२ पुत्र आदि के द्वारा आज्याहुति का विधान षट्त्रिंश अध्याय: प्रवर्ग्य १- २४. वाणी आदि की पवित्रता, मन - प्राण आदि की शान्ति और शतायु की कामना के लिये प्रवर्ग्य, बृहस्पति, सविता, इन्द्र आदि की प्रार्थना सप्तश अध्याय: महावीर संभरण १- २. उखासंभरण की पद्धति से प्रथम मन्त्र में उदुम्बर अथवा विकंकत काष्ठ से बनी हस्तप्रमाण अि का आदान और तदुपरान्त ' युञ्जते ' मन्त्र का पाठ ३. तृतीय कण्डिका का पाठ करते हुए उखासंभरण की पद्धति से मृत्पिण्ड का साम्रि दक्षिण और वाम हस्त से उपादान ( उठाना ) ४. उत्तरविशा में स्थापित प्राग्ग्रीव उत्तरलोम वाले कृष्णाजिन पर मृत्पिण्ड का तूष्णीं निधान, प्रस्तुत मन्त्र के उच्चारण के साथ वल्मीकवपा का आदान और उसका भी तूष्णीं निघान ५. ' इयत्यग्रे ' मन्त्र से वराहोत्खात मिट्टी का ग्रहण और उसका वल्मीकवपा की उत्तर दिशा में निधान ६. ( इन्द्रस्योज: ' मन्त्र से पूतीक तृणों का ग्रहण और उनको वराहोत्खात मृत्तिका की उत्तर दिशा में कृष्णाजिन पर रखना, ' मखाय ' से दुग्ध का ग्रहण, उसका भी पूतीक तृण के उत्तर में निधान ७. अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उद्गाता द्वारा ससंभार कृष्णाजिन को चारों तरफ से पकड़ कर अन्तःपात्य की उत्तर दिशा में स्थापन और वहाँ महावीर का निर्माण ८. निष्पन्न महावीर का मन्त्रोच्चार के साथ वाम कर से स्पर्श तथा अन्य दो महावीरों का भी इसी पद्धति से निर्माण और स्पर्श ९. दक्षिणाग्नि से प्रदीप्त अश्त्र की लीद से तीनों महावीरों का प्रस्तुत कण्डिका के तीन मन्त्रों से धूपन और उनका उखावत् श्रपण १०. श्रपण - संस्कार द्वारा परिपक्व महावीरों का तीन कण्डिकाओं के द्वारा एक - एक कर उद्धार ११. ब्रह्मा द्वारा अनुज्ञात अध्वर्यु का ' यमाय ' कण्डिका के तीन मन्त्रों से प्रचरणीय महावीरों का तीन बार प्रोक्षण १२. महावीरों के ऊपर यजमान का अपने हाथ को रखना और अध्वर्यु द्वारा पाँच वाक्यों के इस पूरे मन्त्र का एक साथ वाचन १३. अध्वर्यु द्वारा महावीरों की चारों तरफ भस्म और अंगारों का प्रक्षेप, उनके ऊपर तेरह वैकंकत काष्ठशकलों का परिश्रयण और धवित्र ( पंखा ) से अग्नि का प्रज्वालन १४-२०. तीन परिक्रमा के बाद ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु, अग्नीत्, प्रतिप्रस्थाता और यजमान द्वारा अवकाश संज्ञक इन मन्त्रों के द्वारा महावीर का उपस्थान २०. शिरोवस्त्र को हटा कर महावीर को देखती हुई यजमानपत्नी का अध्वर्यु द्वारा उच्चरित इस fuser के ' त्वष्टृमतः ' इत्यादि मन्त्र को दोहराना २१. दिन और रात्रि में प्रस्तुत कण्डिका के दो मन्त्रों से दो - दो रौहिण आहुतियों का देना

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( ३२ ) अष्टात्रिंश अध्याय: घर्मधुक् दोहन १ - २. ' देवस्य त्वा ' मन्त्र के अध्वर्यु का गाय को बाँधने के लिये रज्जु का आदान और द्वितीय मन्त्र से गाय का उसके नाम से तीन बार आह्वान ३. गाय के आ जाने पर उसे खम्भे से बांधना और वत्स को दूध पीने के लिये छोड़ना ४. दूध दुहने के पात्र ( पिन्धन ) में गाय को दुहना और स्तन स्पर्श ६. कण्डिका स्थित दो मन्त्रों से परीशासों का आदान और उनसे महावीर का ग्रहण ७ - ९. होता के प्रैष के अनुसार आहवनीय अग्नि की तरफ जाते हुए अध्वर्यु द्वारा तीन कण्डिकाओं में स्थित वात के समुद्र आदि बारह नामों का उच्चारण १०. वषट्कार के उच्चारण के साथ धर्माहृति प्रदान ११. महावीर का तोन बार उत्कम्पन १२-१३ ब्रह्मा और यजमान द्वारा धर्म का अनुमन्त्रण १४. पिन्वमान धर्म का अनुमन्त्रण, ईशान दिशा में गमन और खर पर महावीर का आसादन १५. विकंकत काष्ठ के टुकड़ों को घर्म में डुबो कर उनकी आहुति देना, चतुथं टुकड़े की आहुति न देकर वेदि के दक्षिण भाग में उसका उपगूहन १६. सातवें टुकड़े को घृतसिक्त कर दक्षिण दिशा को देखते हुए प्रतिप्रस्थाता को देना १७. प्रचरणीय धर्म का मन्त्रोच्चार के साथ आसन्दी पर आसादन १८. चतुर्गृहीत संस्कृत आज्य की तीन आहुतियाँ देना १ ९. आहुति देने के बाद अध्वर्यु का यजमान -पत्नी को आगे कर यज्ञशाला से निष्क्रमण २०. नाभिस्पृष्ट धर्म का जलयुक्त द्वीप में उद्वासन २१. सात पात्रों को दूध से भरना २२. सामगान के साथ उत्सादन- देश को सींचना और प्रस्तुत मन्त्र के द्वारा घर्म की सूर्यरूप में स्तुति २३. ऋत्विक् और सपत्नीक यजमान के द्वारा चात्वाल का मार्जन २४. ' उद्वयम् ' मन्त्र का उच्चारण करते हुए यजमान का ईशान दिशा की ओर गमन २५. ईशान दिशा से लौटते समय बिना पीछे देखे यजमान द्वारा समिधाग्रहण और आहुतिप्रदान २६. अग्निहोत्रहवणी में दधिधर्म का ग्रहण २७-२८. हृतशेष दधिधर्म का यजमान और ऋत्विग्गण द्वारा सोपहव भक्षण ऊनचत्वारिंश अध्याय: धर्मभेव प्रायश्चित्त १-४. अध्वर्यु द्वारा भग्न घर्म का अभिमर्शन, परमेष्ठी आदि के लिये २४ आहुतियाँ, ' स्वाहा प्राणेभ्यः ' से पूर्णाहुति पृथिवी आदि के लिये २१ आहुतियाँ और ' मनसः ' मन्त्र से पूर्णाहुति देना ५. संम्रियमाण आदि अवस्थाओं में धर्म का भेद होने पर प्रायश्चित्त - स्वरूप उस उस अवस्था के प्रजापति आदि देवताओं के लिये आहुतियाँ देना ६. दिनभेद से धर्मभेद होने पर उस उस दिन के अधिपति देवताओं के निमित्त आहुति प्रदान ७. ' शुक्रज्योतिश्च ' इत्यादि छः मारुत मन्त्रों से छ: मारुत पुराडाशों के अर्पण के बाद अरण्य में अनुच्य सप्तम पुरोडाश की विमुखसंज्ञक ' उग्रश्च ' मन्त्र से आ १ - ९. दो कण्डिकाओं में पठित मन्त्रों से चतुर्गृहीत आज्य से चार तथा अन्य आहुतियाँ देना १०-१३. ' लोमभ्यः स्वाहा ' आदि चार कण्डिकाओं से ४२ आहुतियों का प्रदान

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एकत्रिंशोऽध्यायः

स॒हस्र॑शीषु॒ पुरु॑षः सहस्राक्षः स॒हस्र॑पात् ।

स भूमि॑ स॒र्वत॑ः स्प॒त्वाऽत्य तिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ १ ॥

मन्त्रार्थ - सभी लोकों में व्याप्त महानारायण सर्वात्मक होने से अनन्त शिर वाले, अनन्त नेत्र वाले और अनन्त नीचे चरण ( पैर ) वाले हैं । ये पांच तत्वों से बने इस गोलकरूप समस्त व्यष्टि और समष्टि ब्रह्माण्ड को तिरछा, ऊपर, सब तरफ से व्याप्त कर नाभि से दस अंगुल परिमित देश, हृदय का अतिक्रमण कर अन्तर्यामी रूप में स्थित हुए थे ॥ १ ॥

सहस्रशीर्षेति पोडशचं सूक्तम् । नारायणो नाम ऋषिः । अन्त्या त्रिष्टुप् शिष्टा अनुष्टुभः । अव्यक्त-महदादिविलक्षण यचेतनः पुरुषः, ' पुरुषान्न परं किञ्चित् ' ( कठोप ० ३।११ ) इत्यादिश्रुतिषु प्रसिद्धः स देवता । तथा चानुक्रान्तम् – ' सहस्रशीर्षा षोडशचं मानुष्टुभं त्रिष्टुवन्त्यं पुरुषो जगद्वीजं मन्त्रदेवता ' इति । वेदवेद्यः परमेश्वरः सर्वान्तरात्मत्वात् समष्टिप्राणिदेहैरपि देहवानिति सर्वप्राणिसमष्टिरूपो ब्रह्माण्डात्मक विरारूपेण सहस्रशीर्षा । सहस्रशब्दोऽनन्तवचनः । अनन्तैः शिरोभिर्युक्तः । यानि सर्वप्राणिनां शिरांसि तानि सर्वाणि तद्देहान्तःपातित्वात् तदीयान्येव । एवमेव सहस्राक्षत्वं सहस्रपात्त्वं च । स परमात्मरूपः पुरुषः, भूमि ब्रह्माण्डगोलक रूपां प्रकृतिरूपां वा स्मृत्वा परिवेष्ट्य कारणत्वादज्ञानं तत्कार्यात्मकं प्रपञ्चमाध्यासिकतादात्म्य-सम्बन्धेनैव व्याप्य दशाङ्गुलं दशाङ्गुलपरिमितं देशमत्यतिष्ठद् अतिक्रम्य व्यवस्थितः । दशाङ्गुलं दशगुणं महापरिमाणं वा देशमत्यतिष्ठत्, ब्रह्माण्डमण्डलाद् बहिरपि व्याप्य स्थितः, प्रकृतितद्विकाराणां तदेकदेशस्थितत्वात् । अस्य भाष्यं शौनको नाम ऋषिरकरोत् । प्रथमं विच्छेदः क्रियाकारकसम्बन्धः समासः प्रमेयार्थव्याख्येत सर्वमेतज्जनकाय मोक्षार्थं कथयामासेत्युव्वटाचार्यः । ' नियुक्तान् ब्रह्माऽभिष्टौति होतृवदनुवाकेन सहस्रशीर्षेति ' ( का ० श्र ० २१ | १ | ११ ) । ब्रह्मा यूपे नियुक्तान् ब्राह्मणमित्यादिपशून् षोडशर्चेन सहस्रशीर्षेत्यनुवाकेन उपविष्टः सन् होतृवत् ' त्रिः प्रथमान्त्ये ' ( का ० श्र ० १ ९ | ६ | २७ ) अनुवाकस्य प्रथमान्त्ये द्वे ऋचौ त्रिः पठनीये, ' ओङ्कार ऋगन्ते ' ( का ० श्रौ ० १ ९ ।६।२ ९ - ३० ) निविदवसाने ओङ्कारः पठनीय इति होतृधर्मेण शस्त्रशंसनधर्मेणेति यावत्, अभिष्टुवीतेति सूत्रार्थः । ' त्रैधातव्यन्ते समारोह्यात्मन्नग्नी सूर्यमुपस्थायान्द्रय इत्यनुवाकेनानपेक्षमाणोऽरण्यं गत्वा न प्रत्येयात्, ग्रामे वा विवत्सन्नरण्यो: ' ( का ० श्र ० २१११।१७ - १८ ) । धातवी उदवसानीयेष्टिः । तदन्ते ' अयं ते योनिः ' इत्यग्नीनात्मनि समारोप्य सूर्यमुपस्थाय ' अद्भयः सम्भृतः ' इत्यनुवाकेन षडूचेन सूर्यमुपस्थाय पश्चादपश्यन् वनं गत्वा न प्रत्येयात्, वानप्रस्थो भवेदिति यावत् । ग्रामं नागच्छेत् । यद्वा ग्रामे वस्तुमिच्छ्न् अरण्योरग्नीन् समारोप्य अर्कोपस्थानानन्तरं ग्रामे गत्वा यज्ञान् कुर्यादिति सूत्रद्वयार्थः । धातवी उदवसानीयेति परमर्षिः कात्यायनः । तथाहि स आह-- ' त्रैधातव्युदवसानीया ' ( का ० श्री ० १३।३।३३ ) इति । नारायणपुरुषदृष्टा जगद्बीजपुरुषदेवत्याः षोडश ऋचः । पञ्चदशानुष्टुभः षोडशी त्रिष्टुप् । ब्रह्मणे ब्राह्मणमित्याद्याः पुरुषमेधरूपस्य परमात्मनोऽवयवाः पूर्वाध्यायान्ते प्रोक्ताः । तदवयवी पुरुषोऽत्र स्तूयते । सहस्रशब्दोऽनन्तवचन इत्युक्तमुपरिष्टात् संख्यावाचकत्वे सहस्राक्ष इति विरोधः स्यात्, नेत्रसहस्रद्वयस्योचित-

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२ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ३१ त्वात् । ' शीषंश्छन्दसि ' ( पा ० सू ० ६ | १ | ६० ) इति छन्दसि शिरः शब्दस्य शीर्षन्नादेशः । शिरोग्रहणं सर्वावयवोपलक्षणम् । यानि सर्वप्राणिनां शिरांसि तानि सर्वाणि तद्देहान्तःपातित्वात् तस्यैवेति सहस्रशीर्षत्वम् । एवमग्रेऽप्यूह्णम् । सहस्राक्षः सहस्रमक्षीणि यस्य स तथोक्तः । ' बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच् ' ( पा. सू ० ५ | ४ | ११३ ) इति षचि रूपसिद्धिः । अक्षिग्रहणं सर्वज्ञानेन्द्रियोपलक्षकम् । सहस्रपात् सहस्रं पादा यस्यः स तथोक्तः । ' संख्या सुपूर्वस्य ' ( पा ० सू ० ५ | ४ | १४० ) इति पादशब्दान्त्यलोपे रूपसिद्धिः । पादशब्दः कर्मेन्द्रियार्थोपलक्षकः । स पुरुषो भूमि ब्रह्माण्डगोलकरूपां सर्वतस्तिर्यगूर्ध्वमधश्च स्मृत्वा व्याप्य, ' स्पृ प्रीतिसेवनयोः ' स्वादिः । अत्र व्याप्त्यर्थे वृत्तिः । यद्वा भूमिशब्दो भूतोपलक्षकः । पञ्च महाभूतानि व्याप्य दशाङ्गुलपरिमितं देशमध्यतिष्ठद् अतिक्रम्यावस्थितः । दशाङ्गुलमित्युपलक्षणम्, ब्रह्माण्डाद्वहिरपि सर्वतो व्याप्यावस्थित इत्यर्थः । यद्वा नाभेः सकाशाद् दशाङ्गुलमतिक्रम्य हृदि स्थितः, ' कतम आत्मा ' ( वृ ० ४।३।७ ) इत्युपक्रम्य ' योऽयं विज्ञान-मयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योति: ' ( वृ ० ४ | ३ | ७ ) इति श्रुतेर्नाभिपदार्थलाभः । विज्ञानात्मनो हृद्यवस्थानं कर्मफलोप-भोगाय अन्तर्यामिणो नियन्तृत्वेन । तदुक्तम् -'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयो -रन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ' ( मु ० ३ | १ | १ ) इति । स पुरुषोऽत्र देवता । ' इमे लोकाः पूरयमेव पुरुषो योऽयं पवते सोऽस्यां पुरि शेते तस्मात् पुरुषः ' ( श ० १३।६।२।१ ) इति श्रुतेः । अध्यात्मपक्षेऽप्ययमेवार्थः । दयानन्दीयोऽर्थोऽत्र वेदार्थ पारिजात ( भूमिकाभाग ) स्य द्वितीये भागे १२३३ तमपृष्ठीयं द्वितीयमनुच्छेदं प्रारभ्य १२३६ तमपृष्ठीयं प्रथममनुच्छेदं यावद् द्रष्टव्यः ॥ १ ॥

पुरु॑ष ए॒वेद॒ सर्व॒ यद् भृतं यच्च॑ भा॒व्य॒म् । उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति ॥ २ ॥

मन्त्रार्थ- - यह जो अतीत ब्रह्मसंकल्पमय जगत् है और जो भविष्य में होने वाला ब्रह्मसंकल्पमय जगत् हैं, जो जगत् का बीज अथवा अन्न के परिणामभूत वीर्य से वृक्ष, नर, पशु आदि के रूप में प्रकट होता है, वह सब कुछ अमृतत्व ( मोक्ष ) के स्वामी महानारायण पुरुष का ही विस्तार है ॥ २ ॥

पुरुष एव इदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । उत अमृतत्वस्य ईशानो यद् अन्नेन अतिरोहति ॥ स एव पुरुष: पूर्व पर्यायविशेषित एवशब्दो नान्यः । इदं वर्तमानकं सर्वं यच्च भूतमतीतं यच्च भाव्यं भविष्यत् तस्य कालत्रयस्य ईशानः । न केवलं कालत्रयस्येशानः, उत अमृतत्वस्यापि मोक्षस्यापि । उतशब्दोऽपिशब्दार्थे । कस्मात् कारणात्? यद् अन्नेन अमृतेन अतिरोहति अतिरोधं करोति, सर्वस्येश्वर इति । यद् इदं वर्तमानं जगत् तत्सर्वं पुरुष एव । यद् भूतमतीतं जगत् यच्च भाव्यं भविष्यं जगत्, तदपि पुरुष एव । यथास्मिन् कल्पे वर्तमानाः प्राणिदेहाः सर्वेऽपि विराट् पुरुषस्यावयवाः, तथैवातीतागामिनोरपि कल्पयोर्द्रष्टव्यम् । उतापि च अमृतत्वस्य देवस्य ईशानः स्वामी स पुरुषः, यद् यस्माद् अन्नेन प्राणिनां भोग्ये -नान्नेन फलेन निमित्तभूतेन, अतिरोहति स्वीयां कारणावस्थामतिक्रम्य परिदृश्यमानां जगदवस्थां प्राप्नोति, तस्मात् पुरुष एव । प्राणिनां कर्मफलभोगाय जगदवस्थास्वीकारान्नेदं तस्य वस्तुत्वमित्यर्थः । यद्वा सर्वं पुरुषश्चेतहि परिणामी स्यादित्याशङ्कयाह-- अमृतत्वस्येशान इति । अमृतत्वस्य अमरणधर्मस्य ईशानो मुक्तेरीशो मोक्षे-श्वरो न म्रियत इति यावत् । किञ्च यज्जीवजातमन्नेनातिरोहति उत्पद्यते, तस्य सर्वस्येशानः । अनेन ब्रह्मादि -

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म ० २-३ ] वेदार्थपारिजात भाष्यसहिता स्तम्बपर्यन्तो भूतग्राम उक्तः, तस्यान्नेनैव स्थितेः । तथा च श्रुतिः - ' इतः प्रदानाद्धि देवा उपजीवन्ति ' ( श ० ११- १५।२४ ) इति । अध्यात्मपक्षेऽप्ययमेवार्थः । दयानन्दीयार्थस्तु वेदार्थपारिजात ( भूमिकाभाग ) स्य द्वितीये भागे १२३७ तमपृष्ठीयं द्वितीयमनुच्छेदं प्रारभ्य १२३८ पृष्ठीयं तृतीयमनुच्छेदं यावद् द्रष्टव्यः ॥ २ ॥

एतावा॑नस्य महिमाऽतो ज्याया॑श्च॒ पूरु॑षः ।

पार्दोऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृते॑ दि॒वि ॥ ३ ॥

मन्त्रार्थ इस महानारायण पुरुष की इतनी राव विभूतियाँ है, अर्थात् भूत, भविष्यत् वर्तमान में विद्यमान सब संसार से भी अतिशय अधिक । इसीलिये यह कुछ उसी की महिमा का एक अंश है । वह महानारायण पुरुष तो इस सारा ब्रह्माण्ड इसका पादमात्र ( चतुर्थांश ) है । इसके बाकी बचे तीन पाद उस दिव्य लोक में विद्यमान हैं, जहाँ ब्रह्म-स्वरूप यह महानारायण अपनी दिव्य ज्योति के साथ निवास करते हैं ॥ ३ ॥

एतावान् अस्य महिमा अतो ज्यायांच पूरुषः । पादः अस्य विश्वा भूतानि त्रिपात् अस्य अमृतं दिवि ॥ अस्य पुरुषस्य पूर्वोक्तविशेषणविशेषितस्य, एतावान् महिमा एतदेव महत्त्वमस्य । अतः कारणाद् ज्यायांश्च पूरुषः, महानित्यर्थः । कस्मान्महत्त्वमायातम्? यस्मात् पाद एकोऽशोऽस्य पुरुषस्य विश्वा भूतानि विश्वानि चतुर्दशभुवन-समूहे यानि चतुर्धा भूतानि तान्येकोंऽशः । त्रिपात् पुनस्त्रयोंऽशा अस्य पुरुषस्य अमृतमृग्यजुःसामलक्षण-मादित्यलक्षणं वा दिवि द्योतत इति । अत्र केचित् · · भूतान्यचित्संसृष्टा जीवाः, तस्य पुरुषस्य पादस्तुरीयांशः । दिवि परमव्योमपदवाच्ये समस्त समष्टितत्त्वबहिर्भूता प्राकृतस्थानविशेषरूपे परमपदेऽमृतं जरामरणादिरहितं नित्यवस्तुजातमस्य त्रिपात् पादत्रयम् । भोग्य - भोगोपकरण - भोगस्थानरूपस्य त्रिविधस्य वस्तुनः सत्त्वात् तेषां पादत्रयत्वव्यपदेशः । यद्वा जगदन्तर्गत वस्त्वभिमानिनामस्त्रभूपणादिरूपाणां नित्यानां भगवदनुभवमात्रप राणां नित्यानां मुक्तानां च परमपदे सत्त्वात् तेषां त्रत्त्वव्यपदेशः । अथवा पादो भगवदाश्रयायाः सृष्ट्यादिशक्तेरेकदेशः, परमपुरुषशक्तिलेश-विजृम्भितमिदं जगदित्यर्थः । तथा चाह पराशरः ' यस्यायुतायुतांशांशे विश्वसृष्टिरियं स्थिता ' इति । अस्य त्रिपादधिकांशस्त्वमृतममरणधर्मकं नित्यमुक्तरूपं दिवि परमव्योम्नि, भासत इति शेषः, ' जागृवांसः समिन्धते ' ( बृहज्जाबालोपनिषद् ८६ ) इति श्रुतेः । अथवा त्रिशब्दो बहुपरः पादशब्दच गुणपरः । तथा चानन्तज्ञाना-नन्दादिगुणविशिष्टमित्यर्थः । अथवा वासुदेव सङ्कर्षण - प्रद्युम्नानिरुद्धात्मकस्य भगवतस्तुरीयोंऽश: ( अनिरुद्धः ) सर्वाणि भूतानि, अवशिष्टं च त्रिपाद्रूपं दिवि नाकपृष्ठे, निवसतीति शेष इत्यर्थमाहुः | एतावानस्य महिमा, सर्वं पूर्वोक्तमस्य महिमा वैभवम् । यद्यपि तद्वैभवेयत्ता तु नास्त्येव, तथाप्यपरिच्छिन्नस्य एतत्परिच्छेदे बाधाभावात् । अतोऽपरिच्छिन्नज्ञानशक्त्यादिमत्त्वसर्वान्तर्यामित्वरूपाद्धेतोः पुरुषो ज्यायान् । अथवा अस्य प्रपञ्चस्य एतावान् महिमा, पुरुषश्चातो ज्यायानेव । अथवा सर्वमपि पूर्वोक्तमस्य पुरुषस्य महिमा सामर्थ्यमात्रम् | अतः सर्वस्मादस्मात् पुरुषो ज्यायान् । ज्यायस्त्वमेव प्रपञ्चयति - पादोऽस्य विश्वा भूतानीति । अस्य पुरुषस्येति भावः । ३

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४ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ३१ सम्प्रदायविदस्त्वित्थं वर्णयन्ति - अतीनानागतवर्तमानरूपं जगद् यावदस्ति, एतावान् सर्वोऽप्यस्य पुरुषस्य महिमा स्वकीयसामर्थ्यविशेषः, न तु तस्य वास्तवं स्वरूपम् । वस्तुतस्तु पुरुषोऽतो महिम्नोऽपि ज्यायान् अतिशयेनाधिकः । तदेव प्रपञ्च्यते - अस्य पुरुषस्य विश्वा भूतानि कालत्रयवर्तीनि सर्वाणि भूतानि प्राणिजातानि पादश्चतुर्थांशः । अस्य पुरुषस्य अवशिष्टं त्रिपात्स्वरूपम् अमृतं विनाशरहितं सद् दिवि द्योतनात्मके स्वप्रकाशस्वरूपे, व्यवतिष्ठत इति शेषः । यद्यपि च ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० उ ० २ १ ) इत्याम्नातस्य परब्रह्मण इयत्ताभावाच्चतुष्पात्त्वमपि निरूपयितुमशक्यम्, तथापि जगदिदं ब्रह्मस्वरूपापेक्षयाऽयमिति विवक्षितत्वात् पादत्वोपन्यासः । अथवा ' अयमात्मा चतुष्पात् ' ( माण्डूक्य ० २ ) इति भगवत्पादव्याख्यातदिशोन्नेयम् । अध्यात्मपक्षेऽप्ययमेवार्थः । दयानन्दीयार्थस्तदालोचनं च वेदार्थपारिजात ( भूमिकाभाग ) स्य द्वितीये भागे १२३ ९ तमपृष्ठीयं तृतीयमनुच्छेदमारभ्य १२४१ तमपृष्ठीयं प्रथममनुच्छेदं यावद् विद्यते ॥ ३ ॥

त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑ष॒ः पादॊऽस्ये॒हाभ॑व॒त् पुन॑ः ।

ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि ॥ ४ ॥

मन्त्रार्थ- --- यह महानारायण अपने तीन पादों के साथ ब्रह्माण्ड से ऊपर उस दिव्य लोक में अपने सर्वोत्कृष्ट स्वरूप में निवास करते हैं और अपने एक चरण ( चतुर्थांश ) से इस संसार को व्याप्त करते हैं । अपने इसी चरण को माया में प्रविष्ट करा कर ये महानारायण देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के नानारूप धारण कर समस्त चराचर जगत् में व्यास हो जाते हैं ॥ ४ ॥

त्रिपात् ऊर्ध्वः उत् ऐत् पुरुषः पादः अस्य इह अभवत् पुनः । ततः विष्वङ् वि अक्रामत् साशनानशने अभि ॥ यस्मादयं पुरुषस्त्रिपात् त्र्यंशभूतः ऊर्ध्व उपरिष्टात्, उदेद् देदीप्यमानस्तिष्ठति । अस्य च पुरुषस्य पाद एकशः, इह त्रैलोक्ये बीजभूतं चतुर्षु भूतेषु, अभवद् भूतम्, ततस्तस्मात् कारणात्, विष्वङ् भुवनकोशं व्यक्रामद् उत्पन्नमित्यर्थः । तस्मादेव पुरुषात् साशनानशने अभि साशनं स्वर्गम्, अनशनं मोक्षं प्रति च, तस्मादेवोत्पन्नमित्यर्थः । त्रिपाद् अपरिच्छिन्नज्ञानशक्त्यादिमान् वासुदेव- सङ्घर्षण- प्रद्युम्नरूपो नित्यमुक्तादिभिः परिचर्यमाण ऊर्ध्वे प्रकृतिमण्डलादुपरि परमव्योम्नि वैकुण्ठे उदैद् उदगच्छत् । तस्यैवंभूतस्य जगत्स्रष्टृत्वादिकं न स्वप्रयोजनाय भवति, न वाऽन्यनियमाधीनम्, केवलं कृपामूलकमेव । पादोऽस्य इह लीलाविभूतौ अभवद् अवातरत् । तस्माज्जगत् स्रष्टुं ब्रह्माऽभवत् । तदुक्तं वैकुण्ठसंहितायाम् - ' सर्वव्यापी विष्णुः स्वाच्छरीराज्जगत् त्रातुं सङ्कर्षणमभावयत्, स प्रद्युम्नं सोऽप्यनिरुद्धमभावयत् । तस्माज्जगत् स्रष्टुं ब्रह्माभवत् । ' एवं चतुर्धा संव्यूह्य स्वात्मानं पुरुषोत्तमः । अण्डेभ्यः परतो नित्यं त्रिपादेन विराजते । ' इति । अनिरुद्धात्मा स भगवान् सृभ्यनुकूलं सङ्कल्पं करोति । ततो योगनिद्रावसाने स एव विष्वक् समन्ताद् व्यक्रामत् स्वराङ्कल्पेन रामाक्रान्तवान्, ' बहु स्यां प्रजायेय ' ( छा ० ६ | २ | ३ ) इति श्रुतेः । साशनं जङ्गमं देवमनुष्यादिरूपम्, अनशनं स्थावरं वृक्षगुल्मलतादि-रूपम्, ते उभे अभि उद्दिश्य स्थावरजङ्गमात्मककृत्स्नजगद्रूपेण बहुभवनसङ्कल्पमकरोत् । त्रिपात् पुरुषः संसाररहितो ब्रह्मस्वरूपः । ऊर्ध्व उदैत् । अस्माद् अज्ञानकार्यात् संसाराद् बहिर्भूतः, अत्रत्यैर्गुणदोषैरस्पृष्ट उत्कर्षैग स्थितवान् । अस्य पादश्चतुर्थोऽशो लेशो वा इह मायायां पुनरभवत् सृष्टिसंहाराभ्यां पुनः पुनरागच्छति । सर्वस्य जगतः परमात्मलेशत्वं भगवताऽप्युक्तम् - विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ' ( भ ० गी ०

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 388 का मूल पृष्ठ
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म ० ४-५ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता १०।४२ ) । ततो मायायामागत्य अनन्तरं विष्वङ् देवमनुष्य तिर्यगादिरूपेण विविधः सन् व्यक्रामद् गिरिनद्यादिकम् व्याप्तवान् ॥ किं कृत्वा? साशनानशने अभिलक्ष्य साशनं भोजनादिव्यवहारोपेतं चेतनम्, अनशनं तद्रहितं तदुभयं यथा स्यात्तथा स्वयमेव विविधो भूत्वा व्याप्तवानित्यर्थः । अध्यात्मपक्षेऽप्ययमेवार्थः । दयानन्दीयार्थस्तदालोचनं च वेदार्थपारिजात ( भूमिकाभाग ) स्य द्वितीयभागे १२४२ तमपृष्ठीयं चतुर्थ-मनुच्छेदं प्रारभ्य १२४४ पृष्ठीयं प्रथममनुच्छेदं यावद् वर्तते ॥ ४ ॥

तत विराड॑जायत विराजो अधि॒ पूरु॑षः ।

स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद् भूमि॒मथो॑ पु॒रः ॥ ५ ॥

मन्त्रार्थ- - उस महानारायण पुरुष से सृष्टि के प्रारम्भ में विराट्स्वरूप ब्रह्माण्ड देह तथा उम्र की देह | का बाद अभिमानी में उसने पुरुष ( हिरण्यगर्भ ) प्रकट हुआ । उस विराट् पुरुष ने उत्पन्न होने के साथ ही अपनी श्रेष्ठता स्थापित भूमि का तथा तदनन्तर देव, मनुष्य आदि के पुरों ( शरीरों ) का निर्माण किया ॥ ५ ॥

ततो विराट् अजायत विराजः अधिपूरुषः । सः जातः अति अरिच्यत पश्चात् भूमिम् अथो पुरः ॥ तस्मादेव पुरुषाद्विश्वोत्पत्तिः । तत्र पूर्वं विराड् अजायत । विराजोऽधि पूरुषः प्रधानं तेजः । स क्षेत्रज्ञो ब्रह्मा सृष्टिकृज्जातः सन् अतिरिच्यते । सोऽभितः पश्चाद् अस्मात् क्षेत्रज्ञाद् ब्रह्मणो भूमिः पृथिवी आदौ जाता उत्पन्ना इति । अथ एवमेकोंऽशः, तेनैव अनन्तरं पुरः शरीराणि पुराणि चतुर्विधानि भूतान्यजायन्त, पुत्रादीनि तेनैवोत्पादितानि । स सर्वं विश्वमुत्पादितमिति । ततः सङ्कल्पाद्धेतोर्विराड् महदादिरूपेण विविधं राजत इति विराट् प्रकृतिः, अजायत महदाद्यण्डपर्यन्त-रूपेण जायत । अद्वारका सृष्टिरेषा । अथ सद्वारकां सृष्टि वक्तुं चतुर्मुखसृष्टिरुच्यते - विराजोऽण्डपर्यन्तप्रकृति-मण्डलस्य अधि अनन्तरं पूरुषश्चतुर्मुखोऽजायत । अथवा ततः परमपुरुषाद् विराड् विशेषेण राजत इति विराड् अनिरुद्धः अजायत परमपुरुषोऽनिरुद्धरूपेणावतीर्ण इत्यर्थः । तदुक्तं मोक्षधर्मे - ' तपो यज्ञश्च यष्टा च पुराणः पुरुषो विराट् । अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकानां प्रभवाप्ययः ॥ ' ( म ० भा ० शान्ति ० ३४१।१५-१६ ) । विराजो विराट्पुरुषाद् अनिरुद्धात् अधि पुरुषोऽधिकारिपुरुषश्चतुर्मुखोऽजायत । स चतुर्मुखो भगवत्कृपया प्रवृद्धकायोऽ-, भवत् येन अतिमहदपि वस्तु कर्तुं शक्नुयात् । तद्वृद्धिमेव दर्शयति-- पश्चाद् भूमि भूमेः पश्वादित्यर्थः भूमेरधः । अथो भूमि पुरो भूमेरूध्वं च अत्यरिच्यत । भूमिशब्दो ब्रह्माण्डपर्यन्तस्योपलक्षणम्, ब्रह्माण्डस्य बहिरन्तश्च व्यापकोऽभूत् । अथवा ' विष्वङ् व्यक्रामत ' इति पूर्वोक्तांशस्यैवात्र प्रपञ्चः । तस्मादादिपुरुषाद् विराड् ब्रह्माण्डदेहोऽजायत । विविधानि वस्तूनि राजन्तेऽत्रेति विराट् । विराजो अधि विरा देहस्योपरि तमेव देहमधिकरणं कृत्वा पुरुषस्तद्देहाभिमानी कश्चित् पुमानजायत । सोऽयं सर्ववेदान्तवेद्यः परमात्मा स्वकीयया माया विदेहं ब्रह्माण्डाख्यं सृष्ट्वा तत्र जीवरूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देवतात्मा जीवोऽभवत् । तदुक्त-माथर्वणे नृसिंहोत्तरतापनीये - ' स वा एष भूतानीन्द्रियाणि विराजं देवताः कोषांव सृष्ट्वा प्रविश्यामूढो मूढ इव व्यवहरन्नास्ते माययैव ' ( नृ ० उ ० ९ ।८ ) इति । स जातो विराट् पुरुषः, अत्यरिच्यत अतिरिक्तोऽभूत् अथो, विराद्व्यतिरिक्तो देवतिर्यङ मनुष्यादिरूपोऽभूत् । पश्चाद् देवादिजीवभावादूर्ध्वं भूमि ससर्जेति शेषः । भूमिसृष्टेरनन्तरं पुरस्तेषां जीवानां शरीराणि, सप्त धातुभिः पूर्यन्त इति पुरः, ससर्ज । अध्यात्मपक्षेऽप्ययमेवार्थः ।

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६ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ३१ दयानन्दीयार्थस्तदालोचनं च वेदार्थपारिजातस्य ( भूमिकाभागस्य ) द्वितीयभागे १२४५ पृष्ठीयं चतुर्थमनुच्छेदं प्रारभ्य १२४६ पृष्ठपर्यन्तं विद्यते ॥ ५ ॥

तस्मा॑द्यज्ञात् सर्वहुत: सम्भृतं पृषदा॒ज्यम् ।

प॒शूंस्तच॑क्रे वाय॒व्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥ ६ ॥

मन्त्रार्थ उस सर्वात्मा महानारायण ने सर्वात्मा पुरुष का जिसमें यजन किया जाता है, ऐसे यज्ञ से पृषदाज्य ( दधि से मिश्रित घृत ) को सम्पादित किया । उस महानारायण ने उन वायुदेवता वाले पशुओं को भी उत्पन्न किया, जो हरिण आदि वनवासी तथा अश्व आदि ग्रामवासी थे ॥ ६ ॥

तस्मात् यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम् । पशून् तान् चक्रे वायव्यान् आरण्याः ग्राम्याः च ये ॥ यथा अग्निप्रोमाख्यात् तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् तेन वायव्यान् पशून् आरण्या ग्राम्याश्च ये तान् कृतवन्तः । एवमात्मयज्ञात् सर्वहुतात् पूरितादुत्पन्तेन योगिनः सर्वान् पशून् सर्वाणि भूतजातानि करतलवत् पश्यन्ति, पश्यन्ति किल ज्ञानतेजसा भूतजातानि । तस्मादात्मसमर्पणरूपेण यज्ञेन आराधितात् पुरुषाल्लब्धसृष्ट्यनुकूलज्ञानशक्त्यादिकश्र्चतुर्मुखो यथापूर्व जगत् ससर्ज । सर्वहुतः सर्व जुहोतीति सर्वहुत्, तस्मात् । सर्वं स्वीयसर्वभरं भगवते समर्पितवतः । अथवा कौस्तुभस्थानीयस्य जीवात्मनोऽत्युत्तमतया तमेवानर्धतमं स्वात्मानं समर्पितवताऽनेन सर्वं समर्पितप्रायमिति सर्वहुत्, तस्मात् । यद्वा सर्वशब्दवाच्यो भगवान् तस्मै जुहोतीति सर्वहुत्, भगवदुद्देश्यकात्मसमर्पणरूपयज्ञकृत्, तस्मात् । यज्ञाद् यजनीयात् । तस्माच्चतुर्मुखात् । पृषदाज्यं दधिमिश्राज्य स्थानीयतत्तद्विचित्ररूपं सृज्यवस्तुजननहेतुशुक्ल-नीलादि सम्भृतम् उत्पन्नम् । यदा त्विदं वाक्यद्वयं न जगत्सृष्टिपरम्, तदा सर्वहुत: सर्वहोमाधिष्टानभूतात् पृषदाज्यं सम्भृतम् । यद्वा सर्वं यस्मिन्निति व्युत्पत्त्या सर्वहुन्नारायण एव, सर्वाय हूयतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या तु तादृशयज्ञपरः । तस्मात् तादृशाद् यज्ञाद् यज्ञार्थम्, प्रयोजनस्य हेतुत्वविवक्षया पञ्चमी, अध्ययनाद् वसतीतिवत् । पृषदाज्यं मिश्राज्यं सम्भृतं कल्पितम् । वायव्यान् वायुमार्गचरणशीलान् पक्षिरूपान् पशून् चक्रे । आरण्यान् अरण्ये भवान्, ये ग्राम्या ग्रामे भवाः, तांश्च चक्रे । तथा च विष्णुपुराणे प्रथमांशे पञ्चमाध्याये -- ' गौरजः पुरुषो मेषश्चाश्वाश्वतरगर्दभाः । एतान् ग्राम्यान् पशूनाहुरारण्यांश्च निबोध मे । श्वापदा द्विखुरा हस्तिवानराः पक्षि-पञ्चमाः । औदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमाश्च सरीसृपाः ॥ ' इति । सर्वहुतः सर्वः सर्वात्मकः पुरुषो यस्मिन् यज्ञे हूयते सोऽयं सर्वहुत्, तादृशात् तस्मात् पूर्वोक्तान्मानसाद् यज्ञात् पृषदाज्यं सम्भृतं सम्पादितम् । तथा वायव्यान् वायुदेवताकान् लोकप्रसिद्धान् आरण्यान् पशून् चक्र उत्पादितवान् । आरण्या हरिणादयः, तथा ये च ग्राम्या गवाश्वादयस्तानपि चक्र े । पशूनामन्तरिक्षद्वारा वायुदेवत्यत्वं यजुर्ब्राह्मणे समाम्नायते – ' वायवः स्थेत्याह । वायुर्वा अन्तरिक्षस्याध्यक्षोऽन्तरिक्षदेवत्याः खलु वै पशवो वायव एवैनान् परिददाति ' ( तै ० ब्रा ० ३।२।१।३ ) इति । आध्यात्मिक पक्षेऽप्ययमेवार्थः । दयानन्दीयार्थस्तदालोचनं च वेदार्थपारिजातस्य ( भूमिकाभागस्य ) द्वितीयभागे १२४८ तमपृष्ठीये प्रारम्भतोऽनुच्छेदविद्यते ॥ ६ ॥

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म ० ७-८ ] वेदार्थंपारिजातभाष्यसहिता

तस्मा॑य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॒ ऋचः सामानि जज्ञिरे ।

छन्दांसि जज्ञिरे॒ तस्माद्यजस्तस्मादजायत ॥ ७ ॥

मन्त्रार्थ - उस सर्वहुत यज्ञपुरुष से ऋग्वेद और सामवेद उत्पन्न हुए, उसी से सर्वविध छन्द उत्पन्न हुए । यजुर्वेद को भी उसी यज्ञपुरुष ने प्रकट किया ॥ ७ । । तस्मात् यज्ञात् सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् यजुः तस्मात् अजायत ॥ तस्मादेव यज्ञात् सर्वहुतः प्रज्वालिताद् यथा ऋचः सामानि यजूंषि च देवा उत्पादयन्ति छन्दांसि च एवमात्मयज्ञे सर्वं वाङ्मयं प्रणवेन दीपिते स्वयमेव ज्ञानादधिष्ठितानि भवन्ति । एवं येन परमात्मनि ज्ञायते, तेन सर्वे जग्धाः, ज्ञातं भवतीति भावः । तस्माच्चतुर्मुखाद् ऋच एकविंशतिः शाखाः सामानि सामवेदाः सहस्रशाखाः, जज्ञिरे तत्सर्गीय प्रथमोच्चारण-विषयत्वरूपामुत्पत्ति प्रापुः । तस्मादेव छन्दांसि गायत्र्यादीनि । यजुर्नवाधिकशतशाखो यजुर्वेदोऽजायत इतरसापेक्षोच्चारणेषु प्राथमिकत्वस्य विवक्षितत्वादेव तत्सर्गीयप्रथमोच्चारणविषयतैवोत्पत्तिः । तत्सर्गीयप्रथमो -च्चारणविषयत्वरूपोत्पत्तिरेव सृष्टिः । तेन वेदानां तत्सर्गीयचतुर्मुखकर्तृकप्राथमिकोच्चारणविषयत्वरूपं चतुर्मुखजन्यत्वमपि यद्यपि न सम्भवति, तथापीतरसापेक्षोच्चारणेषु प्राथमिकत्वस्य विवक्षितत्वान्न दोषः । तस्मात् परमपुरुषाद्वा वेदानां तादृशोत्पत्तिः, तस्यैव चतुर्मुखं प्रत्युपदेष्टृत्वात् । प्रवाहानादित्वं च स्वसमानजातीय-शब्दासमानकालीन प्रागभावाप्रतियोगित्वम् । तादृशध्वंसाप्रतियोगित्वं च प्रवाहनित्यत्वम् । स्वसमानजातीयत्वं च स्ववृत्त्यानुपूर्वीवत्त्वरूपम् । तत्तदुच्चारणभेदेनानुपूर्वीभेदे तु स्ववृत्त्यानुपूर्वीसजातीयानुपूर्वीसत्त्वमेव साजात्यम् । सर्वहुतस्तस्मात् पूर्वोक्ताद् यज्ञाद् ऋचः सामानि जज्ञिरे उत्पन्नाः । तस्मात् छन्दांसि गायत्र्यादीनि जज्ञिरे । तस्माद् यजुरप्यजायत । अध्यात्मपक्षे - उक्तेऽर्थे आध्यात्मिकोऽप्यर्थो गतार्थः । दयानन्दीयार्थस्तदालोचनं च वेदार्थपारिजात ( भूमिकाभाग ) स्य प्रथमभागे ४८४ तमं पृष्ठमारभ्य ४८६ तमपृष्ठीयं प्रथममनुच्छेदं यावद् विद्यते ॥ ७ ॥

तस्मा॒दश्वा॑ अजायन्त॒ ये के चो॑भ॒याद॑तः ।

गाव ह जज्ञिरे तस्मात्तस्मा॑ज्जाता अ॑जा॒वयः॑ः ॥ ८ ॥

मन्त्रार्थ उसी यज्ञपुरुष से अश्व उत्पन्न हुए और वे सब प्राणी उत्पन्न हुए जिनके ऊपर - नीचे दोनों तरफ दाँत हैं । उसी से गाय - बैल उत्पन्न हुए और उसी से भेड़ - बकरियाँ पैदा हुईं ॥ ८ ॥

तस्मात् अश्वाः अजायन्त ये के च उभयादतः । गावः ह जज्ञिरे तस्मात् तस्मात् जाताः अजावयः ॥ तस्माद् यज्ञाद् अश्वा अजायन्त उत्पन्नाः । तथा ये के च अश्वातिरिक्ता गर्दभादयोऽश्वतराश्च उभयादत उभयोर्भागयोर्दन्ता येषां ते उभयादतः छान्दसं दीर्घत्वम् ऊर्ध्वाधोभागयोर्दन्तयुक्ताः सन्ति तेऽप्यजायन्त । तथा स्फुटं तस्माद् यज्ञाद् गावो ह जज्ञिरे । किञ्च तस्माद्यज्ञाद् अजावयोऽजा अवयश्च जाताः । नहि पशुभिर्विना यज्ञः सिद्धयेत् ।