वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 101–110

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 101–110

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६८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् उपयुक्त है । ' देहपात के बाद भी उत्क्रमण और पुनर्जन्म प्राप्त करने योग्य आत्मा का अस्तित्व मान्य है ' ऐसा न मानने के कारण जो ' असंभूति ' अर्थात् असंभव की उपासना करते हैं - मरणमात्र से मोक्ष मानकर जो पुनः आत्मा का अस्तित्व असंभव मानते हैं, वे अल्पदृष्टि अतत्त्वदर्शी होने के कारण अज्ञानात्मक तमको प्राप्त होते हैं । और जो ' संभूति ' - विज्ञानात्मक आत्मा को ही देहादिका कारण मानकर - विज्ञानातिरिक्त किसी अन्य को न मानकर कर्म से पराङ्मुख रहते हैं, वे विज्ञानाभिव्यञ्जक देहादि और उससे संभव कर्मादि की सर्वथा उपेक्षा की स्थिति में निविशेष - विज्ञान की असहिष्णुता के कारण मानो शून्यप्राय होने से असंभूति की उपासना करनेवाले की अपेक्षा भी अधिक अज्ञान में प्रवेश करते हैं । अथवा इस मन्त्र में ' असंभूति ' - अक्षर, अव्याकृत, कारणब्रह्मरूप अव्यक्त के उपासकों की निन्दा और उसकी अपेक्षा भी ' संभूति ' - व्यक्तोपासक की अधिक निन्दा दोनों की समुच्चित उपासना के अभिप्राय से है ॥ ॥ इत उत्तरं द्वितीयमन्त्रव्याख्यानभूता उपासनामन्त्रा उच्यन्ते । us नुष्टुभः । लोकायतिका नैरात्म्यवादिनो निन्द्यन्ते येषां मते यम-नियमादिसम्बन्धवान् विज्ञानात्मा कश्चिन्नास्ति जलबुदबुदवज्जीवाः मदशक्तिव विज्ञानं भौतिकमेव । ये नरा असंभूतिमसंभवमुपासते, मृतस्य सतः पुनः संभवो नास्ति, तेन शरीरान्ते सर्वस्य मुक्तिरेवेति ये वदन्ति, न हि विज्ञानात्मा कश्चिदनुच्छित्तिधर्माऽस्ति यो यमनियमैः परलोकैश्च सम्बद्धयते इत्येवमुपासते, ते अन्धतमः अज्ञानलक्षणं तमः अष्टममन्त्र के पश्चात् द्वितीयमन्त्र के व्याख्यानरूप उपासना के ' अंधं तमः ' इत्यादि मन्त्र कहे जाते हैं । इस मन्त्र में जो शरीर से भिन्न आत्मा स्वीकार नहीं करते, उन चार्वाकों की निन्दाकी जाती है, जिनके मत में यम - नियमादिसाधनों से सम्बन्धवाला ज्ञानस्वरूप कोई जीव नहीं है । सर्वजीव जल के बुदबुदों के समान ( अनित्य ) हैं । मादक-पदार्थोंमें जैसे मदशक्ति भौतिक है, उसी प्रकार शरीररूप अनित्य आत्मा में विज्ञान ( ज्ञानशक्ति ) भौतिक ही है । अभिप्राय यह है कि मदशक्ति जैसे मादक द्रव्य से अतिरिक्त कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं, वैसे ही विज्ञान ( चेतना ) भौतिक देह से अतिरिक्त कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं ।

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वेदार्थ पारिजात ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ६प्रविशन्ति । ये च सम्भूत्यां सम्भवति देहादिरस्याः सा संभूतिश्चिति -विज्ञानरूप आत्मा, तस्यामेवरताः तत्रैवासक्ताः, आत्मैवास्ति नान्यत् किञ्चिदस्तीत्यास्थाय कर्मपराङ्मुखाः ज्ञानकाण्ड कर्मकाण्डयोः सम्बन्धो नास्तीति वदन्तः, स्वबुद्धिलाघवमजानाना आत्मज्ञानमात्र-रताः, तेन ते अन्धात्तमसो भूय इव इवेत्यनर्थकः, बहुतरं तमोऽज्ञानं प्रविशन्ति । यद्वा - अत्र व्याकृताव्याकृतोपासनयोः समुच्चिचीषया प्रत्येकं निन्दा | संभूयते - उत्पद्यते इति सम्भूतिः, तद्विलक्षणा असम्भूतिः प्रकृतिः कारणमव्याकृताख्या ३७ तामक्षराख्यां प्रकृति कामकर्मबीजभूतामविद्या-मदर्शनात्मिकां य उपासते -- चिन्तयन्ति ते तदनुरूपमेवान्वं तमोदर्शना-सम्भूति ( असम्भव ) की उपासना करते हैं, " मरे हुए का पुनः जन्म नहीं होता, अत एव शरीर के अन्त ( समाप्ति ) होने पर सर्व की मुक्ति हो जाती है ' ऐसा कहते हैं, ' अविनाशी ज्ञानस्वरूप आत्मा नहीं है, न आत्मा यम - नियम तथा परलोकसे ही सम्बन्धित है ' ऐसी जो उपा-सना करते हैं, वे अज्ञानरूप अन्धकार में प्रवेश करते हैं । जो ' संभूति == देहादि जिससे सम्बन्धित हुआ उत्पन्न होता है, ऐसा चेतन - विज्ञान-स्वरूप आत्मा ही है उससे अतिरिक्त कुछ नहीं, ऐसा मानकर कर्म से ३७. भगवद्गीता अ ० १५, श्लोक १६ में शाङ्करभाष्य के अनुसार ' कूटस्थोऽक्षर उच्यते ' कहकर जिस मायाशक्ति का वर्णन किया गया है, उसीको यहाँ ' असंभूति ' कहा गया है । जिसे गीता में ' क्षरः सर्वाणिभूतानि ' कहा गया है, उसी को यहाँ ' संभूति ' कहा गया है । ‘ अक्षर ' भगवान्‌की मायाशक्ति इसलिये है; क्यों-कि बिना ब्रह्मज्ञान के उसका नाश नहीं होता । वह संसार का बीज है । क्षर पुरुष की उत्पत्ति उसी से होती है । भगवतो मायाशक्तिः क्षराख्यस्य पुरुषस्योत्पत्तिबीजमनेक-संसारिजन्तुकामकर्मादिसंस्काराश्रयोऽक्षरः पुरुष उच्यते । तस्य कथमक्षरत्वं विना ब्रह्मज्ञानमनाशात् । अनेकमायादिप्रकारेण स्थितः कूटस्थः संसारबीजानन्त्यान्न क्षरतीत्यक्षर उच्यते ॥

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७० ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् त्मकं संसारं प्रविशन्ति, प्रकृतिलयम्प्राप्नुवन्ति " तं यथायथोपासते तथैव भवति " ( मुद्गलो ० ३ ) इति श्रुतेः । ततस्तस्मादपि भूय इव बहुतरमिव अन्धं तमः प्रविशन्ति य उ सम्भूत्यां कार्यब्रह्मणि हिरण्यगर्भाख्ये रताः अनुरक्ताः भक्ताः सन्ति । नोच्यते । अत्र चित्रामाया परमेश्वरस्योपाधिभूता असम्भूतिशब्दे -विमुख होकर ज्ञानकाण्ड तथा कर्मकाण्ड का कोई सम्बन्ध नहीं है ', ऐसा कहते हुए अपनी बुद्धि के लाघव ( तुच्छता ) को न जानते हुए आत्मज्ञानमात्र में रत हैं । इसमें रत रहने से वे गाढ़ अन्धकार से भी अधिकतम ( अज्ञान ) में प्रवेश करते हैं । क्योंकि शास्त्रीयकर्म किये विना चित्त शुद्ध न होने से ज्ञानका उत्पन्न होना संभव नहीं तथा धर्मरहित जीवन, अन्ततोगत्वा पापमय जीवन बन जाता है; अतः शास्त्रीयकर्मों की उपेक्षा कर्माधिकारी अविद्वान के लिये उचित नहीं । कर्मसंन्यास की प्रशस्तयोग्यता तो प्रबुद्ध और अन्तर्मुख में ही होती है, अन्यों में नहीं । अथवा इस नवममंत्र व्याकृत तथा अव्याकृत की उपासना के समुच्चय की इच्छा से प्रत्येक की निन्दा है । जो उत्पन्न होता है । वह है संभूति, उससे विपरीत जो उत्पन्न नहीं होता वह है असंभूति ( प्रकृति ), जिसे कारणभूत अव्याकृत भी कहते हैं तथा उसका अक्षर नाम भी है । उस काम, कर्म की बीजभूत अविद्यात्मक प्रकृति की जो उपासना ( चिन्तन ) करते हैं, वे उपास्य प्रकृति के स्वभावानुसार उस अज्ञानात्मक ( अदर्शनात्मक ) प्रकृति को ही प्राप्त होते हैं । जिस प्रकृति . की प्राप्ति का नाम प्रकृतिलय है । क्योंकि " जो जैसी उपासना करता है, वह तद्रूप हो जाता है " ऐसा श्रुति कह रही है । उस तम से भी अधिकतम अर्थात् अज्ञान को वे उपासक प्राप्त होते हैं, जो संभूति = कार्यब्रह्मरूप हिरण्यगर्भ में अनुरक्त अर्थात् उसके भक्त हैं । यहाँ चेतन से अधिष्ठिता माया जो कि परमेश्वर की उपाधि है, वही ' असम्भूति ' शब्द से कही गई है । क्योंकि श्वेताश्वतरश्रुति

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् 3 " मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् || " [ ७१ ( श्वेताश्वतरोप ० ४.१० ) इतिश्रुतेः । न च परब्रह्मव प्रकृतिः, तस्यनिविकारस्य साक्षात्प्रकृतित्वानु-पपत्तेः । न च जडत्वात्प्रकृतेः फलदातृत्वानुपपत्तिरिति वाच्यम्, कर्मणां फलस्येवोपासनफलस्यापि परमेश्वरेणैव दास्यमानत्वात् । न च ' ताह-शफलस्यार्थ्यमानत्वं नोपपद्यते ' इति वाच्यम्, सषुप्तिवत् प्रकृतिलय-स्यापि पुरुषरर्थ्य मानत्वोपपत्तेः । दयानन्दः --- " ये परमेश्वरं विहाय असम्भूतिमुपासते, प्रकृत्याख्यं जड वस्तूपासते ते अन्धं तमः प्रविशन्ति ये सम्भूत्यां महदादिरूपायां सृष्टी रताः, त उ ततो भूय इव तमः प्रविशन्ति । " इति । माया को महेश्वर ( परमेश्वर ) की प्रकृति नहीं है, क्योंकि निर्विकल्प विना ) कारण होना संभव नहीं है । उपाधि कह रही है । परब्रह्म ही परब्रह्म का साक्षात् ( उपाधि के यह कहना भी उचित नहीं कि जड़ प्रकृति, अपने उपासक को फल कैसे प्रदान कर सकती है? क्योंकि जैसे कर्मों का फल परमेश्वर देता है, वैसे ही उपासना का फल भी परमेश्वर ही देता है । यह कहना भी उचित नहीं, कि जड़प्रकृति में विलयरूप फल के लिये कोई उपासना क्यों करेगा? मनुष्य तो सुख चाहता है, प्रकृति में विलय होना तो नहीं चाहता; क्योंकि सुषुप्ति के समान प्रकृतिलय में भी सुख रहने से मनुष्य की इच्छा संभव है । श्री दयानन्द भाष्य - " जो परमेश्वर को त्यागकर असम्भूति की उपासना करते हैं । प्रकृति नामवाली जड़ वस्तु की उपासना करते हैं, वे पुरुष अन्ध तम में प्रवेश करते हैं । जो सम्भूति अर्थात् महदादिरूप सृष्टि में रत हैं, वे उससे भी अधिक तम में प्रवेश करते हैं । " ३८. माया को संसार का परिणामी उपादान कारण जानो, माया के नियन्ता को महेश्वर जानो ।

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७२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् तदपि यत्किंचित् सृष्टे रुपासनस्याविहितत्वात्, निष्फलत्वाच्च फलमन्तरा ' फलवत्सन्निधावफलं तदङ्गमिति न्यायेनाङ्गाङ्गिभावा-पत्त्या समुच्चयानुपपत्तेः ॥६ ॥

यह भाष्य भी यत्किचित् ही है, क्योंकि न तो सृष्टि की उपा-सना का शास्त्र में विधान ही है न उसका कोई फल ही है । यदि " किसी क्रिया का विधान तो हो, किन्तु उसका फल शास्त्र ने न कहा हो तथा ऐसी क्रिया का किसी फलवाली क्रिया के समीप में कथन हो तो विना फल के कही क्रिया, फलवाली क्रिया का अंग होती है । " यह नियम है । दयानन्द - भाष्य में असंभूति की उपासना का तो ' अन्ध तम ( गाढ़ अन्धकार ) में प्रवेश ' फल वर्णन कर दिया, पर सृष्टि-उपासना का कोई फल वर्णन नहीं किया । इस प्रकार फल से रहित सृष्टि की उपासना का इसी मन्त्र में पठित फलवाली असंभूति की उपासना के समीप में ही विधान होने से इन दोनों में अङ्गाङ्गी ( सांघन - साध्य ) भाव होगा । अर्थात् ' सृष्टि उपासनारूप साधन से निष्पन्न असंभूति - उपासना ही एकमात्र इस मन्त्र का विषय है ' ' फल-वत्सन्निधावफलं तदङ्गम् ' इस नियम के अनुसार यह सिद्ध हुआ । ऐसा सिद्ध होने पर मन्त्र में जो समुच्चय का विधान है, वह संभव नहीं; क्योंकि दो स्वतन्त्र क्रियाओं का ही समुच्चय होता है, साध्य - साधन का समुच्चय होता नहीं ॥ ॥ ३८. अवान्तरफलभेदं समुच्चयकारणम् । अन्यथा फलवदफलवतो सन्निहितयोरङ्गाङ्गितैव स्यात् ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.स. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अ॒न्यदे॒वाहुः स॑भ॒वाद॒न्पदा॑हु॒रस॑भवात् । [ ७३ इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचचिरे ॥१० ॥

' संभव ' - कार्यब्रह्म की उपासना का फल अणिमादि - ऐश्वर्यो-पलब्धिरूप अन्य ही है और ' असंभव ' - कारणब्रह्मरूप अव्याकृत की उपासना से प्राप्त होनेवाला प्रकृतिलयरूप फल अन्य ही है । ऐसा हमने हमारे प्रति संभूति और असंभूति की उपासना से प्राप्त फलों की विभागपूर्वक व्याख्या करनेवाले विद्वान् महानुभावों के श्रीमुख से है || १० || अथोभयोरुपासनयोः समच्चयकारणमवयवफलभेदमाह । सम्भवात् सम्भूतेः कार्यब्रह्मोपासनात्, अन्यदेव पृथगेवाणिमाद्य श्वर्य-लक्षणं फलमाहुः कथयन्ति धीराः । असम्भवात् असम्भूतेरव्याकृता-दव्याकृतोपासनादन्यदेव फलमुक्तम् । अत्र प्रकरणानुसारेण संभवासंभ-वशब्दाभ्यां तत्तदुपासनमेवाभिप्रेतम् । अन्धं तमः प्रविशन्तीत्युक्त प्रकृतिलय इति पौराणिकं फलमाहुः, इत्येवंविधं धीराणां विदुषां वचः शुश्रुम वयं श्रुतवन्तः । ये धीराः नोऽस्माकं तत् पूर्वोक्तं सम्भूत्यसंभूत्यु-पासनफलं विचचक्षिरे व्याख्यातवन्तः । पूर्वोक्त कथन के अनन्तर इस मन्त्र में दोनों उपासनाओं के समुच्चय का कारण जो फल का भेद है, उसे कहते हैं । सम्भव ( कार्य-ब्रह्म ) की उपासना से अणिमादि ऐश्वर्य प्राप्तिरूप फल को तथा असंभूति ( अव्याकृत, प्रकृति ) की उपासना से अन्य प्रकृतिलयरूप फल को मंत्रद्रष्टा ऋषियों ने कहा है । मन्त्र में प्रकरण के अनुसार संभव तथा असंभव शब्दों से संभव - असंभव की उपासना ही अभिप्रेत है । प्रकृति की उपासना का पुराणोक्त प्रकृति में लयरूप फल को " अन्ध तमः प्रविशन्ति " इस मन्त्रभाग से कहते हैं । पूर्वोक्त फलभेद का बोधकवचन हमने उन विद्वानों का सुना है, जिन्होंने हमसे संभूति और

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७४ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् दयानन्द: - - " हे मनुष्याः? यथा वयं धीराणां सकाशात् वचः शुश्रम, ये नस्तद्विचक्षिरे, ते संभवादन्यदेवाहुरसंभवादन्यदाहुरिति यूयं श्रृणुतेति ", तदपि यत्किञ्चित् किन्तत्फलं मित्यनुक्त ेः ॥१० ॥

सम्भूतिं च विनाशञ्च यस्तद्वेदोभयं सह ।

विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥११ ॥

संपूर्ण जगत् के ' संभव ' ( अभिव्यक्ति ) का जो परमकारण है, वह परब्रह्म है । वही विविध शरीरों में शरीरी ( क्षेत्रज्ञ, क्षेत्री ) रूप से विद्यमान है । विनाशशील शरीर ' विनाश ' है । योगी ( आरुरुक्षु - योगा-रुढ़ होने की इच्छावाला ) दोनों तादात्म्यापन्न को विभागपूर्वक जानता है, अर्थात् देहभिन्न होने पर भी कर्मवशात् स्वयं को देह में अवस्थित जानता है । जो योगी ज्ञानोत्पत्ति की भावना से कर्मासक्ति, फलासक्ति और अहंकृति को ( शिथिल ) कर धृत्युत्साहपूर्वक भगवदर्थं कर्मों ( निष्काम कर्मों ) को करता है, वह शुद्धिसम्पादन के योग से ' विनाश ' से -- विनाशी शरीर से अन्तःकरण की अशुद्धिरूय मृत्यु को तर जाता है और ' संभूति ' अर्थात् आत्मज्ञान से अमृत ( मुक्ति ) -लाभ करता है । अथवा छान्दसवर्णलोपके योग से ' संभूति ' - ' असंभूति ' मान्य है | जिस का अर्थ है अव्याकृत ( कारणब्रह्म ) की उपासना | ' विनाश ' का अर्थ है, विनाशधर्मयुक्त कार्यब्रह्मोपासना । जो दोनों की सहोपासना करता है, वह कार्यब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) की उपासना से उपलब्ध ऐश्वर्य और धर्मादि के अमोघ प्रभाव से अनैश्वर्य - अधर्मादिरूप मृत्यु को पारकर कारणोपासना से प्रकृतिलयरूप अमृतफल को प्राप्त करता है ॥ ११ ॥

असंभूति की उपासना के फल की व्याख्या की थी । श्री दयानंदभाष्य - " हे मनुष्यो! जिन विद्वानों ने हमारे प्रति

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वेदार्थपारिजात: ( वा. स. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ७५ सम्भूतिं च- सर्वजगत्सम्भवैककारणं परं ब्रह्म । विनाशं -विनाशोऽस्यास्तीति विनाशः, अर्श आदित्वादच्प्रत्ययः, विनाशधर्मकं शरीरम् । तदुभयं शरीरिशरीररूपं द्वयं यो योगी सह एकीभूतं वेद विजानाति, देहभिन्नोऽहं कर्मवशाद्देहे निवसामीति ज्ञात्वा शरीरेण ज्ञानोत्पत्तिकराणि निष्कामकर्माणि करोति स विनाशेन विनाशिना शरीरेण मृत्यु ं तीर्त्वाऽन्तःकरणशुद्धि कृत्वाऽन्तःकरणाशुद्धिलक्षणं मृत्यु-मतिक्रम्य संभूत्या आत्मज्ञानेनामृतमश्नुते मुक्तिमाप्नोति ४० । यद्वा सम्भूत्य सम्भूत्युपासनयोरेक पुरुषार्थत्वात्समुच्चय एव युक्तः । सम्भूतिञ्चेत्यत्र छान्दसवर्ण लोपो द्रष्टव्यः, अन्यदाहरसंभवादि-कहते हैं तथा कारण की उपासना से भिन्न फल कहते हैं, उन विद्वानों के जैसे वचन हमने सुने हैं, उन वचनों को तुम भी श्रवण करो । " यह भाष्य इसलिये उचित नहीं कि भाष्य में दोनों उपासनाओं का भिन्न फल क्या होता है, ऐसा वर्णन नहीं किया । सिद्धान्त में आणिमादि ऐश्वर्य तथा प्रकृति में लय, ऐसा भिन्न - भिन्न फल वर्णन किया है; अतः वही उचित है || १० || सम्भूति = सर्व जगत् के संभव ( उत्पत्ति ) का मुख्यकारण परब्रह्म तथा विनाश = विनाशधर्मवाला शरीर इन दोनों को शरीर -शरीरिरूप में जो योगी सह = एकरूप जानता है । किस प्रकार जानता है - " मैं देह से भिन्न हूँ, कर्मवशात् देह में निवास करता हूँ, " ऐसा जानकर शरीर से ज्ञानकी उत्पत्ति करनेवाले निष्कामकर्मों को करता है, वह विनाशमिक शरीर से मृत्यु को पारकर अर्थात् अन्तःकरण की शुद्धि करके अन्तःकरण की अशुद्धिरूप मृत्यु का उल्लंघन कर, असंभूति ( आत्मज्ञान ) से अमृत = मुक्ति को प्राप्त हो जाता है । अथवा सम्भूति और असंभूति की उपासनाओं को एक पुरुष लिये होने से समुच्चय ही उचित है । सम्भूति = अव्याकृत उपासना, ४०. कर्म और ज्ञान का क्रमसमुच्चय मान्य है । कर्म अन्तःकरणका शोधक और ज्ञान अज्ञानवारक होने से विमोक्षक है । श्री उवट और महीधर के अनुसार यह अर्थ है ।

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७६ ] वेदार्थ पारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् त्यनुरोधात् । सम्भूतिमव्याकृतोपासनं विनाशं विनाशधर्मयुक्त कार्य-ब्रह्मोपासनं, तदुभयं सह समुच्चयेन वेद उपासते, स विनाशेन कार्य. ब्रह्महिरण्यगर्भोपासनेन ऐश्वर्यादिप्राप्त्यनैश्वर्याधर्मादिलक्षणं मृत्यु तीतिक्रम्य, संभूत्या असंभूत्या - अव्याकृतोपासनेन अमृतं प्रकृतिलय-लक्षणं फलमश्नुते ४१ । ४२. कश्चित्तु सम्भूतिपदेन कार्यं विनाशपदेन कारणमभिप्रैति । कार्यं यस्मिन् विनश्यति तद् विनाशं कारणं मायाबीजं, यच्च चैतन्य-विनाश - विनाशधर्म से युक्त कार्यब्रह्म की उपासना, उन दोनों उपासनाओं को जो समुच्चयरूप से ( एक साथ ) करता है, वह विनाश = कार्यब्रह्मरूपहिरण्यगर्भ की उपासना से मृत्यु = अनैश्वर्य तथा अधर्मादि को अतिक्रमणकर, सम्भूति ( अव्याकृत ) की उपासना अमृत ( प्रकृतिलयरूपफल ) को प्राप्त हो जाता है । कोई विद्वान् इस मन्त्र का ऐसा अर्थ करते हैं कि - सम्भूतिपद से कार्य, विनाशपद से कारण अभिप्रेत है । कार्य जिसमें विनाश को प्राप्त होता है, उसे कहते हैं ' विनाश, ' ऐसा विग्रह करने से विनाश शब्द का अर्थ कारण हो जाता है । सर्वका बीजभूतमाया कारण है । ४१. कारणब्रह्म और कार्यब्रह्म की उपासना के समसमुच्चयका यहाँ प्रतिपादन है । भगवत्पाद शङ्कर के अनुसार यह अर्थ है । ४२. ' ईशावास्य रहस्यम् ' के अनुसार यह विवरण है । इस व्याख्या का तात्पर्य इस प्रकार है - कार्य - कारणरूप से परब्रह्म ही स्थित है । ' संभूति ' कार्यब्रह्म हिरण्यगर्भात्मक है और ' विनाश ' चैतन्यसहित मायाबीज अव्याकृतात्मक है | श्रुति ब्रह्म की कार्यरूपता के साथ ही उसकी अन्तर्यामिरूपता और साक्षी-चेता केवल परब्रह्मरूपता का वर्णन करती है । साथ ही परम-शुद्ध सदद्वय ब्रह्म की आत्मरूपता का बोधन भी ' ब्रहमेव परमं शुद्ध ब्रह्मैवाहं सदद्वयम् ' । इस रहस्य का जानकार कार्य-कारण ज्ञान के साथ ही कार्य - कारणातीत परब्रह्म की आत्म-रूपता को जाननेवाला होने से विमुक्तिलाभ करता है ।

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वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ७७ कवलीकृतं तथा च यस्तयोः कार्यकारणयोरैक्यं वेदोपासते, स तयोपा-सतया मृत्यु स्वाभाविकं तमस्तीर्त्वा हिरण्यगर्भोपासनयाऽमृतमश्नुते मुच्यते | आत्मविद्यावधिः कारणं भवति । साक्षीचेता जगद्बीजमन्त-र्यामीति श्रुतेः । कार्यकारणनिर्मुक्त परं ब्रह्म ज्ञात्वा विमुच्यते । " तदेतदपि नातीवमनोज्ञं, सहेति शब्देनोभयोः समुच्चयविधानेनै-वयज्ञानस्याविवक्षितत्वात् । इह च कार्यकारणोपासनयोरेव विधानं, कार्यकारणातीत ब्रह्मोपासन विधायकशब्दाभावात् । ४ ३ यत्तुकेनचित् " उभयोविनाशशब्दयोरवर्ण लोपमभ्युपेत्य अविनाशेनाव्याकृतोपासनेन मृत्युमनैश्वर्यमधर्मकामादिदोषजातं च ती सम्भूत्या हिरण्यगर्भोपासनेनामृतं प्रकृतिलयलक्षणमश्नुत ' इति, मायाचैतन्य से व्याप्त है । जो कार्य - कारण की एकता की उपासना करता है; वह उस उपासना से मृत्यु ( स्वाभाविकतम ) को पारकर, हिरण्यगर्भ की उपासना से अमृत को प्राप्त हो जाता है अर्थात् मुक्त जाता है । आत्मविद्यापर्यन्त ही मायारूप कारण रहता है, भाव यह है कि माया आत्मा के ज्ञान से नष्ट हो जाती है । साक्षी चेता कार्य - कारणनिर्मुक्त = कार्य तथा कारण से रहित परब्रह्म को जानकर मुक्त हो जाता है । यह अर्थ भी विद्वानों के मन को प्रिय नहीं है, क्योंकि मंत्र में पठित ' सह ' शब्द से दोनों उपासनाओं का समुच्चय का विधान होने से ऐक्य ( अद्वितीय आत्मा से अभिन्न शुद्धब्रह्म का ) ज्ञान विवक्षित नहीं है । मन्त्र में तो कार्य - कारणब्रह्म की उपासना का ही विधान है । क्योंकि मन्त्र में कार्य - कारण से भिन्न शुद्धब्रह्म की उपासना के विधान ( कर्तव्यता ) का बोधक कोई शब्द है नहीं । कोई विद्वान् ऐसा कहते हैं कि “ मन्त्र में पठित दोनों विनाश-शब्दों में अवर्ण का लोप हो गया है, अतः विनाशशब्द के स्थान में अविनाश पढ़ना चाहिए । अविनाश = अव्याकृत की उपासना से मृत्यु ४३. ' अस्या ऋचोऽर्थान्तरम् । यथा -- लिखकर श्रीमहीधरजी ने यह भाव व्यक्त किया है ।