वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 111–120
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 111–120
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७८ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् तच्चिन्त्यम्, विपरीतस्यैव सुवचत्वात् । हिरण्यगर्भस्यैश्वर्यवत्त्वेन तदुपा-सनेनानैश्वर्य लक्षण मृत्योरतितरणस्यैव युक्तत्वम् । तदुपासनेन प्रकृति-लयासंभवात्, अव्याकृतोपासनेनैव प्रकृतिलयसम्भवाच्च । अन्येषां रीत्याऽसम्भूर्तिकारणं य उपासते त अन्धंतमः प्रवि-शन्ति । ततोऽप्यधिकं तमस्ते प्रविशन्ति य उ सम्भूत्यां रताः । संभूतिः सम्यग्भवनमुत्पत्तिर्यस्य तत्कार्यं ४४ संभूतिः । तद्व्यति-रिक्तामव्याकृतरूपामसम्भूतिं कारणम् । सम्भूत्यसम्भूत्युपासनयोः पृथक् फलं भवति । स यश्च सम्भूतिं च विनाशं च सहोपासते स पृथक् विनाशेन हिरण्यगर्भोपासनेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्या सम्यग्भवति यस्मात् कार्य तत्कारणमव्याकृतं सम्भूतिस्तदुपासनेनामृतं प्रकृतिलयलक्षण-मश्नुते । अर्थात् ऐश्वर्य का अभाव तथा अधर्मादिरूप मृत्युको पारकर सम्भूति = हिरण्यगर्भ की उपासना से अमृत = प्रकृति में लयरूप अमृत को प्राप्त हो जाता है । " यह अर्थ विचारणीय है, क्योंकि - इस अर्थ से विपरीत अर्थ ही सुगम अर्थात् अक्षरों तथा भाव के अनुकूल है । हिरण्यगर्भ ( कार्यब्रह्म ) ही ऐश्वर्ययुक्त है । उसकी उपासना से ही अनैश्वर्य तथा अधर्मादिरूपमृत्यु का तरना युक्तिसंगत है । ऐश्वर्ययुक्त हिरण्यगर्भ की उपासना से प्रकृतिलय संभव नहीं । अन्यों की रीति से तो असंभूति = कारण की जो उपासना करते हैं, वे गाढ़ अन्धकार ( अज्ञान ) में प्रवेश करते हैं । उनसे भी अधिक तम ( अज्ञान ) में वे प्रवेश करते हैं, जो सम्भूति में रत हैं । कुछ विद्वान् और भी कहते हैं - सम्यक् भवन अर्थात् उत्पत्ति जिसकी होती है, वह कार्य है ' संभूति ', उसके अतिरिक्त अव्याकृत है असंभूति । दोनों की उपासना का अलग - अलग फल है । जो कोई सम्भूति तथा विनाश की एक साथ उपासना करता है, वह विनाश = हिरण्यगर्भ की उपासना से मृत्यु को पारकर सम्भूति - कारणभूत अव्याकृत की उपासना से प्रकृतिलयरूप अमृत को प्राप्त हो जाता है । ४४. दीपिकाकार के मत का चित्रण है ।
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वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ७ ४५ अन्येषां रीत्योपक्रान्तमात्मतत्त्वमुपक्रम्योपसंहृतम् । यस्तूक्त-तत्त्वानभिज्ञ एषणात्यागाभावेन संन्यासे च नाधिकारी संसारे च नात्यन्तासक्तस्तं प्रति चित्तैकाग्र्यार्थमुपासनासमुच्चयं वर्णयिष्यन् प्रत्येकमुपासनाफलं निन्दति समुच्चिचीषयैव ' न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते, अपि तु विधेयं स्तोतुमि ' तिन्यायात् । यद्वात्मज्ञान-स्यैव सर्वश्रेष्ठत्वं तद्व्यतिरिक्तानां संसारहेतुत्वप्रदर्शनेन हृदयति । ये s सम्भूतिमुपासते ते अन्धं तमः प्रकृतिलयं प्राप्नुवन्ति ये सम्भूत्यां रतास्ते तमः प्रकृतिलयाद्भूय इवाधिकमिव स्वरूपाज्ञानेन संसरण-हेतुत्वात्तमोऽणिमादिसिद्धिसमुदायं प्रविशन्ति । तत्र तयोभिन्नफलत्वे श्रुतिरार्चार्यवचः प्रमाणयति " अन्यदाहुः संभवादि " त्यादि । सम्भूत्यु-पासनादन्यदेवाणिमादिसिद्धिरूपं फलं तत्त्वज्ञाः वदन्ति । तथाऽसम्भवाद-सम्भूति शब्द कार्य का वाचक है तथापि ' कार्य जिससे होता है, उसे सम्भूति कहते हैं ' ऐसा अर्थ करने पर कारण का वाचक हो जाता है । अन्य विद्वानों की रीति से यह अर्थ किया है कि - आत्मतत्त्व के उपदेश को ' ईशावास्य ' यहाँ से प्रारम्भ कर ' स पर्यगात् ' यहाँ तक समाप्त कर दिया । अब जो आत्मतत्त्व को न जाननेवाला अज्ञानी, एषणाओं का त्याग न होने से संन्यास का अनधिकारी तथा संसार में अत्यन्त आसक्त भी नहीं ऐसे पुरुष के लिये चित्त की एकाग्रता के लिये उपासना के समुच्चय का वर्णन करने की इच्छा से प्रत्येक उपासना के फल की निन्दा करता है, क्योंकि शास्त्रों में " जिसकी निन्दा की जाती है, उस निन्दनीय की निन्दा करने में निन्दा का तात्पर्य होता नहीं, अपि जिसका विधान करना होता है, उसकी स्तुति करने में ही तात्पर्य होता है " ऐसा नियम है । अथवा - आत्मज्ञान से अतिरिक्त उपासना आदिक साधन संसार के हेतु हैं, ऐसा प्रदर्शन कर, आत्म-ज्ञान की श्रेष्ठता को मन्त्र दृढ करता है । जो असम्भूति = अव्यक्त की उपासना करते हैं, वे प्रकृतिलय को प्राप्त होते हैं । जो सम्भूति में रत ( प्रीतियुक्त ) हैं, वे प्रकृतिलय से भी अधिक जो अणिमादिसिद्धियों का ४५. यह मत ' ईशावास्यरहस्यविवृतिः ' कारका है ।
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50 ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् सम्भूतिरूपकारणाव्याकृतोपासनादन्यत्प्रकृतिलयाख्यं फलमाहुः । अन्य-पूर्ववत् । अन्ये तु ये s विद्यामुपासते तेऽन्धं तमः प्रविशन्तीत्युक्तम् । तत्रा-विद्यास्वरूपमुच्यते ' अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ' नास्ति सम्भूतिर्जगतः उत्पत्त्यादिर्यस्मात् सोऽसम्भूतिस्तम्, सम्भूतेरुपलक्षण-त्वात् परमेश्वरो न जगदुत्पत्त्यादिकर्ताऽपि तु स्वभावत एवोत्पद्यतेऽव-तिष्ठते नश्यतीत्यात्मानमुपासते तेऽन्धं तमः प्रविशन्ति । " यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते " ( तै ० उप ० ३.१ ) इत्यादि श्रुतिविरुद्धत्वात्, अन्यत् पूर्ववदेव । दयानन्द: - - ' हे मनुष्याः, यो विद्वान् सम्भूतिं सृष्टिं च विनाशं च - विनश्यन्ति, अदृश्याः पदार्थाः भविन्ति यस्मिन् तं सहोभयं तद्वेद-समुदायरूप तम है, उसमें प्रवेश करते हैं । अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति भी जन्म - मरणरूप संसारदुःख का हेतु है, अतः सिद्धिप्राप्ति प्रकृतिलय से भी अधिक तमरूप कहा गया है । सम्भूति तथा असंभूति की उपासनाएँ भिन्न फलवाली हैं, इसमें स्वयं श्रुति आचार्य के वचन को प्रमाण देती है । " अन्यदाहुः संभवादित्यादि प्रमाणभूत-वाक्य हैं । सम्भूति की उपासना से तत्त्वज्ञपुरुष अणिमादिसिद्धिकी प्राप्तिरूप एक अन्य फल कहते हैं तथा असंभव = अव्यक्त की उपा-सना से प्रकृतिलयरूप एक भिन्नफल कहते हैं । इस पक्ष में शेषवाक्य का अर्थ पूर्ववत् ही है । कुछ विद्वान् ऐसा अर्थ करते हैं कि - ' जो अविद्या की उपासना करते हैं, वे अविद्या के प्रति प्रवेश करते हैं, ' ऐसा मन्त्र में कहा है । मन्त्र में जिस अविद्या में प्रवेश करना कहा है, उस अविद्या का स्वरूप कहा जाता है कि जगत् की उत्पत्ति - स्थिति लय - आदिक जिससे हों ऐसा परमेश्वर आदिक कोई जगत् का कर्ता नहीं है । किन्तु यह संसार स्वभाव से ही उत्पन्न, स्थित तथा नष्ट होता है । इस प्रकार जो आत्मा की उपासना करते हैं, वे गाढ़ अन्धकार ( अज्ञान ) में प्रवेश करते हैं । यह उनकी उपासना अविद्यारूप इसलिये है कि ' यतो वा इमानि ' इस श्रुति से विरुद्ध है । शेषमन्त्र का अर्थ पूर्ववत् है ।
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ८१ तद्गुणकर्मस्वभावान् वेद, स विनाशेन नित्यस्वरूपेण विज्ञातेन कारणेन सह, मृत्युं शरीरवियोगजन्यं दुःखं तीर्त्वा, सम्भूत्या सृष्ट्या धर्मप्रवर्तयिल्या सहामृतं मोक्षमश्नुते " इति । तदपि यत्किञ्चित् सृष्टिगुणकर्मस्वभावज्ञानस्य मुक्तिहेतुत्वे प्रमाणाभावात् ' तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( वा. सं. ३१.१८ ) इति आत्मज्ञानातिरिक्तस्य मोक्षहेतुत्वनिषेधाच्च । " विनाशेन नित्यस्वरूपेण विज्ञातेन कारणेन सह मृत्युं शरीरवियोग-जन्यं दुःखं ती " त्यपि निरर्थकम् । विनाशपदस्य तादृशव्युत्पत्यापि कारणमात्रार्थता विज्ञायते न नित्यतापि । किञ्च कारणस्य मृत्युना सहभावः कथं सिद्धयति? किमत्राभिप्रेतम्? कि कारणेन सह मृत्यो- न
रतिक्रमणमन्यद्वा, नाद्यः साहित्यानिरूपणात् । नान्त्यमनिर्वचनात् ।
च सृष्टिनियमेन धर्मप्रवर्तयित्री, अधर्मस्यापि तत एव प्रवृत्तेः ॥११ ॥
श्री दयानन्द - हे मनुष्यो! जो विद्वान् सृष्टि तथा जिसमें पदार्थ अदृश्य हो जाते हैं अर्थात् सर्वपदार्थों का जो कारण - सृष्टि तथा कारण इन दोनों के गुण - स्वभाव को जानता है । वह विनाश = ज्ञात नित्यस्वरूपकारण के सहित मृत्यु = शरीरवियोग जन्यदुःख को तरकर, सृष्टि = धर्म को प्रवृत्त करनेवाली सृष्टि के साथ अमृत = मोक्ष को प्राप्त हो जाता है । यह भाष्य भी उचित नहीं, क्योकि ' सृष्टि के गुण - कर्म - स्वभाव का ज्ञान मुक्ति का कारण है, इसमें कोई प्रमाण नहीं तथा ' तमेव विदित्वा ' इत्यादिक श्रुतियों ने आत्मज्ञान से अतिरिक्त मुक्ति के साधन का निषेध भी किया है । जो यह कहा कि " ज्ञात नित्यस्वरूप कारण के साथ शरीरवियोगजन्य दुःख को तर जाता है " यह कथन भी अर्थ -शून्य है । क्योंकि जिसमें अदृश्य हुए कार्य नष्ट हो जाते हैं, वह विनाश कहलाता है, ऐसा विनाश शब्दका अर्थ कारण तो हो सकता है, परन्तु ऐसा निर्वचन करने पर भी विनाश शब्द से नित्यता अर्थ नहीं प्रतीत होता । कारण के साथ मृत्यु का सहभाव भी किसी प्रकार सिद्ध नहीं होता । कारण के साथ मृत्यु को पार करने का क्या अभिप्राय है? क्या कारण के साथ मृत्यु का अतिक्रमण अर्थ है, अथवा और कुछ अर्थ
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८२ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अ॒न्धन्तम॒ प्रवि॑शन्ति॒ येऽवि॑द्यामु॒षास॑ते ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ॥ १२ ॥
वे अदर्शनात्मक तम में प्रविष्ट होते हैं, जो अविद्या पदवाच्य कर्म की उपासना करते हैं और वे उनसे भी अधिक अदर्शनात्मक तम में प्रविष्ट होते हैं, जो विद्या अर्थात् हिरण्यगर्भोपासना में निरत हैं ॥१२ ॥
श्रीमच्छङ्करभगवत्पादीयभाष्यरीत्याऽऽद्य ेन मन्त्रेण सर्वेषणा-परित्यागेन ज्ञाननिष्ठोक्ता प्रथमो वेदार्थः । जिजीविषूणामज्ञानां ज्ञान-निष्ठाऽसम्भवेन कर्माणि कुर्वन्नेव जिजीविषेदिति कर्मनिष्ठारूपो द्विती-यो वेदार्थः दर्शितः ' सोऽकामयत जाया मेस्यात् ' ( बृह ० १.४.१७ ) इत्यादिनाऽज्ञस्य कामिनः कर्माणि विहितानि । आत्मविदां जायाद्येष-णात्रयसंन्यासेन कर्मनिष्ठाप्रातिकूल्येनाऽऽत्मस्वरूपनिष्ठैव दर्शितः । ४६ " किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोकः ' ( बृहदारण्यक उ ० ४.४.२२ ), ' असुर्या नाम ते लोका: ' ( ईशा ० उ ० ३ ) इत्यविद्वन्नि-है? प्रथम पक्ष तो सम्भव नहीं, क्योंकि कारण के साथ मृत्यु के अति-क्रमण का निरूपण ही संभव नहीं । द्वितीय पक्ष भी संभव नहीं, क्यों-कि उसका भी कहीं कथन नहीं । सृष्टि नियम से धर्म को ही प्रवृत्त करनेवाली नहीं, क्योंकि उसी से अधर्म भी प्रवृत्त होता है, अतः सृष्टि को धर्म प्रवृत्त करनेवाली ही कहना युक्तियुक्त नहीं ॥११ ॥
श्रीभगवत्पाद शंकराचार्य महाराज के भाष्य की रीति से तो प्रथम मन्त्र से सर्व एषणाओं के त्यागपूर्वक ज्ञाननिष्ठा, वेद का प्रथम-अर्थ है । जीने की इच्छावाले अज्ञानियों को ज्ञाननिष्ठा सम्भव नहीं; ४६. जिन हम लोगों को आत्मा ही फलरूप से अभिप्रेत है, वे हम प्रजा से क्या करेंगे?
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ८३ न्दाद्वारेण तान् प्रशस्यात्मनो याथात्म्यं ' स पर्यगादि ' त्यन्तैर्मन्त्रैरुपदि-टम् ( ईशा ० ८ ) । ते किमधिकृता: ४७ ' अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसङ्घजुटम् ' ( श्वेताश्वतर ६. २१ ) इति श्रुतेः । कर्मनिष्ठानां जिजीविषूणां कृते ' अन्धन्तम ' इत्यादिकमुक्तम् । ननु सर्वाप्युपनिषदेकं ब्रह्मविद्याप्रकरणं ततः प्रकरणभेदकरण-मनुचितमितिचेन्न, प्राणाद्य ुपासन विधानस्याप्युपनिषत्सुदर्शनात् । न च तदपि ब्रह्मज्ञानाङ्गमितिवाच्यम्, पृथक्फलश्रवणात् - फलवत् सन्निधाव-फलस्यैतदङ्गत्वनियमात् । विद्याऽविद्यासमुच्चयस्यापि न ब्रह्मज्ञाना-ङ्गत्वम्, तस्य स्वातन्त्र्येण फलविधानात् । तस्माद्यथा कर्मकाण्डेऽग्नि-होत्रादिप्रकरणं भिन्नमेवेष्यते, भिन्नाधिकारत्वात्तत्तत्कर्मणस्तथैवोपनि षत्स्वपि कर्माविरुद्धतद्विरुद्धविद्याप्रकरणभेदोऽपि युक्त एव । अतः " कुर्वन्नेवेह " इस मन्त्र से कर्मनिष्ठारूप वेद का द्वितीय- अर्थ प्रदर्शित कर दिया है । " अकेले पुरुष ने कामना की कि मेरे स्त्री हो " इत्यादिक श्रुतियों ने स्त्री आदि की कामनावाले अज्ञानी पुरुष के लिये कर्मों का विधान किया है । कर्मनिष्ठा के प्रतिकूल ( विरोधी ) होने से एषण तीन का त्यागरूप संन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठा ही आत्मवेत्ताओं के लिये प्रदर्शित की है । " असुर्या " इत्यादि श्रुतियों ने अविद्वान् ( अज्ञानी ) पुरुषों की निन्दा करके आत्मज्ञानी की प्रशंसापूर्वक आत्मा के यथार्थ-स्वरूप का वर्णन “ स पर्यंगात् " इत्यादिक मंत्रों ने किया है । “ अत्याश्र-मिभ्यः " इत्यादि श्रुतियों से आत्मा के यथार्थस्वरूप में निष्ठा के अधिकारी संन्यासी विद्वान् हैं । जीनेकी इच्छावाले कर्मनिष्ठपुरुषों के लिये " अन्धं तमः " इत्यादिक उपदेश कहा है । " सर्व उपनिषदें एक ब्रह्मविद्या का ही प्रकरणरूप हैं; अतः एक ही उपनिषद् में प्रकरणभेद करना अनुचित है । " यदि ऐसा कहा जाय तो वह भी उचित नहीं; क्योंकि उपनिषदों में प्राणादि की उपासना भी देखी जाती है, अतः उपनिषदों में प्रकरणभेद स्वीकार करना ४७. विद्वान् ऋषि ने ऋषिसमुदाय से सेवित इस परमपवित्र उपदेश को संन्यासियों के लिये कहा ।
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८४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ननु कुतो न समुच्चये सर्वेषामधिकार इतिचेदत्रोच्यते— ' यस्मि -सर्वाणिभूतान्यात्मैवाभूद्विजानत: ' ( ईशा ० ७ ) इत्यकामिनः साध्य-साधनभेदोपमर्देन कर्मासम्भवेन समुच्चयानुपपत्तेः । न च रामकृष्णविवादितत्त्वविदुषामपि कर्मदर्शनात्कुतः समु-च्चयाभाव इति वाच्यम्, तेषां कर्मणां कर्तृत्व- भोक्तृत्व- नानात्व-बुद्धयहंकाराभिनिवेशाभावेन कर्माभासत्वात् । यत्र कर्तृत्वादिबुद्धिर्न -भवेदहंकारोऽभिनिवेशश्च न स्यात् तत्र कर्मसत्वेऽपि कर्माभासत्वमेव न कर्मत्वम्-अनुचित नहीं । " प्राणादि की उपासना भी ब्रह्मविद्या का अंग है, अङ्ग से प्रकरणभेद होता नहीं " यह कहना भी उचित नहीं; क्योंकि उपासना ब्रह्मविद्या से भिन्न फल कहा गया है; अतः प्राणादि की उपासना ब्रह्मविद्या का अङ्ग नहीं । जो साधन फलवाला होता है, उसके समीप उसी के प्रकरण में फल से शून्य जिस साधन का वर्णन होता है, उस फलवाले साधन का तादृश फलहीन साधन अङ्ग होता है । ब्रह्मविद्या तथा प्राणादि उपासना के तो भिन्न - भिन्न फल हैं, अत: उनमें अङ्गाङ्गी ( साध्य - साधन ) भाव नहीं । अत एव विद्या तथा अविद्या के ' समुच्चय को भी ब्रह्मज्ञान की अङ्गता ( साधनता नहीं है । क्योंकि समुच्चय का भी शुद्ध ब्रह्मविद्या की अपेक्षा भिन्न फल का ही मन्त्र में श्रवण हुआ है; अत: जैसे भिन्न अधिकारी होने से कर्मकाण्ड में अग्निहोत्रादि का प्रकरण भिन्न स्वीकार किया जाता है, उसी प्रकार कर्म से विरुद्ध तथा अविरुद्ध विद्याओं के प्रकरण का भेद भी उचित ही है । " समुच्चय में सर्वका अधिकार क्यों नहीं? " इस प्रश्न का उत्तर यह है कि सर्वभूतों को आत्मा जाननेवाले अभेदर्शी सर्वकामना से शून्य विद्वान् का साध्य - साधन के भेद का बाध हो जाने पर कर्म तथा कर्म के साथ समुच्चय भी संभव नहीं । " राम - कृष्ण - विष्ण्वादिक परमतत्त्वज्ञानियों के भी कर्म देखे जाने से समुच्चय का अभाव कैसे संभव है? " ऐसा कथन भी उपयुक्त नहीं | कर्तृत्व- भोक्तृत्व - नानात्व बुद्धि, अहंकार और अभि-निवेश का अभाव होने से राम कृष्णादि के कर्म कर्म नहीं कर्माभास
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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्
" नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यशृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्तुन्मिषन्निमिषन्नपि I इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ' 1185 [ ८५ ( भगवद्गीता ५.८, 8 ) प्रकृते साध्यसाधनभावविचारश्चलति । न च तत्त्वज्ञानुष्ठित-कर्मणो मोक्षहेतुत्वम्, ज्ञानस्य मोक्ष हेतुत्वोक्तः । यथाऽग्नौ पिङ्गलतायां हैं । जहाँ ( जिस पुरुष में ) कर्तृत्वादिबुद्धि तथा अहंकाराभिनिवेश नहीं होता, उस पुरुष में प्रतीयमान कर्म कर्माभास ही होता है, न कि कर्म । क्योंकि ऐसा ही गीतावाक्य कहता है- ' नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । ' प्रकरण में साध्य - साधन का विचार चल रहा है । तत्त्वज्ञपुरुषों के द्वारा अनुष्ठान किया कर्म मोक्ष का साधन होता नहीं; क्योंकि ४८. इस मन्त्र के यहाँ तक के भाष्य का यह अभिप्राय है कि ज्ञान-निष्ठा और कर्मनिष्ठा ये दो वेदोक्तमार्ग हैं । ' ईशावास्य ' और ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि ' ( ईशा ० १, २ ) इन दो मन्त्रों में क्रमशः दोनों मार्गों के अधिकारियों का निरूपण किया गया है । सर्वेषणा ( संपूर्ण कामना ) - विमुक्त ज्ञाननिष्ठों में कर्मसंन्यास की सहज प्रतिष्ठा होती है । कर्मासक्ति - फलासक्ति - अहंकृति - नानात्वबुद्धि और अभिनिवेशशून्य तत्त्वज्ञों में कदाचित् कर्म प्रतिष्ठित भी तो भी मोक्ष के प्रति वह अन्यथासिद्ध उसी प्रकार होता है, जिस प्रकार अग्नि में अवस्थित पिङ्गलता दाह के प्रति । ऐसे तत्त्वज्ञ वसिष्ठ, व्यासादि के कर्म ' लीलाकर्म ' या ' कर्माभास ' ही मान्य हैं । ' नैवकिञ्चित्करोमीति ' ( गीता ५.८, ९ ) उनका यह निश्चय कि ' मैं कुछ नहीं करता ' उनमें अन्यारोपित कर्म को अकर्म बनाये रखता है । ' करते हुए भी न करने की उनकी मान्यता विक्षिप्त और अज्ञों जैसी नहीं मानी जा सकती, क्यों कि ' युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ' ( गीता ५.८ ) वे ' युक्त ' हैं, असमाहित या विक्षिप्त नहीं; ' तत्त्ववित् ' हैं, बालवत् अज्ञ नहीं ।
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८६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् सत्यामपि न दाहं प्रतिहेतुत्वमन्यथासिद्धत्वात्तथैव कर्मणां लोकसंग्रहा-थंमनुष्ठीयमानानामपि न मोक्षहेतुत्वमन्यथा सिद्धत्वादेव । अत्र तु पुरुषार्थसाधनत्वेन समुच्चयानुष्ठानं विधीयते । न हि आत्मैकत्वविज्ञा-नस्य केनचित्कर्मणा ज्ञानान्तरेण वा समुच्चयः सम्भवति । इह तु समु-च्चिचीषयाऽविद्वन्निन्दा क्रियते । तत्र यस्य येन समुच्चयः शास्त्रतो न्यायतश्च संभवति, तस्यैव समुच्चयो वक्तव्यः । ननु ' ईशावास्यामि ' ति ( ईशा ० १ ) मन्त्रे ब्रह्मविद्याया एव प्रक्रान्तत्वात्तस्या एव समुच्चिचीषया निन्देति चेन्न, प्रकृतमित्येतावतैव तद्ग्रहणानुपपत्तेः । योग्यतानुरोधेनैव सम्बन्धोपपत्तेः । शुद्धब्रह्म-विद्यायाः कर्तृ त्वाद्यध्यासोपमर्दकत्वेन कर्मसम्बन्धानर्हत्वात् । मोक्ष का साधन तो शास्त्र में ज्ञान को कहा है । जैसे अग्नि में पिङ्ग-रूप रहता है तथा अग्नि के दाह आदि कार्य से पूर्ववृत्ति भी है, किन्तु अन्यथासिद्ध होने से दाह के प्रति कारण नहीं, उसी प्रकार अन्यथासिद्ध होने से विद्वान् के द्वारा लोकसंग्रह के लिये किये हुए कर्मों को मोक्ष के प्रति साधनता नहीं । इस मन्त्र में पुरुषार्थ के साधन के रूप में समुच्चय के अनुष्ठान का विधान किया है । आत्मा की एकता के ज्ञान का किसी कर्म अथवा अन्य किसी ज्ञान के साथ समु-च्चय संभव नहीं । अतः यहाँ आत्मा के एकत्व - ज्ञान का प्रकरण नहीं । यहाँ समुच्चय के अनुष्ठान करने की इच्छा ( तात्पर्य ) से अविद्वानादि की निन्दा की गयी है । समुच्चय का प्रकरण होने पर तो जिसका जिसके साथ समुच्चय शास्त्र तथा युक्ति से संभव हो, उसका ही समुच्चय कहना चाहिये । " ईशावास्य " इस मंत्र के द्वारा ब्रह्मविद्या का प्रारम्भ होने से ब्रह्मविद्या के समुच्चय के तात्पर्य से ही मन्त्र में निन्दा है; अतः ब्रह्म-विद्या का ही किसी के साथ समुच्चय, इस मन्त्र का विषय होना चाहिये " ऐसा कहना उचित नहीं; क्योंकि ' ब्रह्मविद्या का प्रकरण में प्रारंभ है, इतने मात्र से समुच्चय में सम्बन्ध के लिये ब्रह्मविद्या का ग्रहण सम्भव नहीं; क्योंकि सम्बन्ध तो योग्यता के अनुसार ही सम्भव होता है । शुद्ध ब्रह्मविद्या तो कर्तृत्व - भोक्तृत्व के अध्यास का बाधक
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ८७ किञ्च यस्मिनिष्पन्नेऽपि फलस्य व्यवधानं सम्भाव्यते, तस्यैव दर्शादे: सहकारिसमुच्चयो युक्तः । इहत्वेकत्वमनुपश्यतः को मोहः कः शोक इत्येकत्वदर्शनसमकालमेव मोहादिनिवृत्त्यभिधानान्न कालान्त-यफलम् । ततो न सहकारिसमुच्चिचीषा सम्भवति । किञ्चास्या मन्त्रोपनिषदो ब्राह्मणे " ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽना-शकेन " ( बृहदारण्यक उप ० ४.४.२२ ) इति तृतीयाश्रुत्या यज्ञादेरिष्य-माणवेदने कारणत्वेन सम्बन्धः श्रूयते, तत्कथं दुर्बलेन प्रकरणेन सहका-रितया सम्बन्धो युज्यते? ' श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थ विप्रकर्षात् ' ( जैमिनीय सू ० ३.३.१४ ) इति विरोधात् । प्रधानस्य च विद्यायाः सहकारिसम्बन्धविधित्सया निन्देत्यप्य-युक्तम् " अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षेति ' ( ब्रह्मसूत्र ३.४.२५ ) सूत्र-होने से कर्तृत्व - भोक्तृत्व के अध्यासपूर्वक होनेवाले कर्मों के साथ सम्बन्धित होने के ही योग्य नहीं । पुनः कर्म के साथ उसका समुच्चय कैसे संभव हो सकता है? जिस साधन के अनुष्ठान के पूर्ण हो जाने पर भी फल की प्राप्ति में व्यवधान की संभावना की जाती है, ऐसे दर्श आदिक का ही अपने सहकारी के साथ समुच्चय उचित है - युक्तियुक्त है । ब्रह्मा-भिन्नात्मैकत्व के विद्वान् पुरुष में तो ' को मोह: ' इस श्रुति ने एकत्वज्ञान के समान काल में ही ( जिस काल ' ज्ञान उत्पन्न होता है, उस काल में ही ) मोहादि की निवृत्तिरूप फल का कथन किया है; अतः ब्रह्मविद्या के फल में काल का व्यवधान नहीं । इसी कारण से किसी सहकारी के साथ ब्रह्मविद्या के समुच्चय की इच्छा सम्भव नहीं । इस ईशावास्य मन्त्रोपनिषद् का ब्राह्मण ( शतपथ ) में " ब्राह्मणा विविदिषन्ति " इस श्रुति के द्वारा यज्ञ - दानादि कर्मों का विविदिषा ( ब्रह्मवेदन की जिज्ञासा ) के कारणरूप से सम्बन्ध वर्णन किया है । साक्षात् श्रुति यज्ञादिककर्मों को ब्रह्मविद्या का कारण कह रही है । जब प्रकरण से श्रुति बलवती होती है, तब श्रुति से दुर्बल प्रकरण से सिद्ध ब्रह्मविद्या के साथ यज्ञादि का सहकारी के रूप में सम्बन्ध कैसे उचित कहा जा सकता है? क्यों कि ऐसा कथन जैमिनीय सूत्र से विरुद्ध है ।