वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 91–100

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 91–100

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५८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् प्राप्नोति । कीदृशं तद्ब्रह्म? शुक्र शुक्लं शुद्धम् विज्ञानानन्दस्वभावम् । अकायम् देहरहितम् । तत एवाकायमव्रणमक्षतम् । अस्नाविरं न विद्यन्ते स्नावा: शिरा यत्र तत् स्नायुरहितम् । अकायत्वादेव शुद्धमनु-पहतं सत्त्वरजस्तमभिः । अपापविद्धम् न पापविद्धम्, क्लेशकर्मविपा-कायैरपरामृष्टम् | अकायमव्रणमस्नाविरमिति २३ २३ पुनरुक्तिरादरार्था-ऽतिशयार्थी वा । य ईदृश उपासकः स शाश्वतीभ्यः समाभ्यः निरन्तर -मनन्तवर्षेभ्योऽर्थाय, अनन्तवर्षप्राप्तये याथातथ्यतः यथातथाभावो याथा-तथ्यं तेन यथास्वरूपमर्थान् व्यदधाद् विहितवान् । त्यक्तस्वस्वामिस-म्बन्धश्चेतनाचेतनै स्थैरुपभोगं कृतवान् । स च कविः क्रान्तदर्शी । मनीषी मेधावी । परिभूः परितः सर्वतोभवतीति, ज्ञानबलात् सर्वरूपो भवति । स्वयं भवतीति स्वयम्भूः ब्रह्मरूपेण भविता । ईदृशोऽपि पूर्वोक्त ' शुक्रमकायमित्यादिविशेषणविशिष्ट ं ब्रह्म प्राप्नोतीत्यर्थः । को प्रत्यक्ष अनुभव करता है, वह ऐसे परमात्माको प्राप्त हो जाता है । कैसे परमात्मा ( ब्रह्म ) को? जो देहरहित है, जो व्रण ( घाव ) से रहित है, जिसके स्नायु नहीं हैं । अशरीर होने से ही जो शुद्ध सत्त्व, रजः तथा तमो-गुण से युक्त नहीं है | जो पापरहित है, अर्थात् क्लेश - कर्म और कर्मों के फल तथा वासनाओंसे शून्य है । जो शरीर रहित होता है, वही व्रण तथा स्नायु से भी रहित होता है । जो व्रण रहित होता है, वही शरीर तथा स्नायु से रहित होता है तथा जो स्नायु से रहित होता है वही शरीर तथा द्रण से रहित होता है । भाव यह कि तीनों शब्द एक ही अर्थ के वाचक हैं, अतः यहाँ पुनरुक्ति है । एक अर्थ के वाचक अनेक शब्दों का एकत्र कथनरूप पुनरुक्ति का प्रयोग बिना प्रयोजन के किया जाय तो वह दोषरूप होता है; परन्तु यहाँ दोषरूप नहीं, क्योंकि यह पुनरुक्ति ब्रह्म के आदर अथवा अतिशय को बोधन करने के लिये है । जो ऐसा उपासक है उसने अनन्तवर्षी पर्यन्त स्वस्वामिभाव सम्बन्ध से ( अहंता-ममता से ) रहित पदार्थों से भोग किया है । वह क्रान्तदर्शी मेधायुक्त ज्ञान के बल से सर्वस्वरूप होता है । वह ' स्वयंभू ' अर्थात् स्वयं ही होता है । ब्रह्मस्वरूप होने से स्वयंभू होता है । इस प्रकार के ब्रह्म को प्राप्त होता है । २३. ' अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते ' ( निरु ० १०.४२ ) इति यास्कोक्तः ।

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वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ५६ यद्वा - पूर्वोक्तर्मन्त्रैरुक्तः स आत्मा पर्यगात् आकाशवत्परितो व्याप्नोति । स इति कविर्मनीषीति उभयत्र पुल्लिंगतया निर्देशात् शुक्रमित्यादीनि मध्यगतान्यपि विशेषणानि पुल्लिङ्गत्वेन नेयानि विप-रिणेयानि । शुक्र शुक्रः ज्योतिष्मान् स्वप्रकाशोऽखण्डबोधानन्दस्वरूपः । अकायम् अकायोऽशरीरः - लिङ्गशरीररहितः । अव्रणम् अव्रणोऽक्षतः -क्षतरहितः । अस्नाविरम् अस्नाविरः - स्नायुरहितः । आभ्यां विशेषणा-भ्यां स्थूल देहविवजित आत्मा प्रतिपिपादयिषितः । शद्धम् शुद्धो निर्मलः अविद्यामलशून्यः, कारणशरीररहितः । एवं शरीरत्रयशून्यः । अपापवि-द्धम् धर्माधर्मलक्षणेन पापेन अविद्धः रहितः, अकर्तृ स्वरूप इत्यर्थः । ननु तथात्वे परमात्मनो हिरण्यकेशत्व, हिरण्यरमश्रुत्व, हिरण्य-बाहुत्व, शितिकण्ठत्व, जगद्योनित्वादिकञ्च विरुद्धये ते तिचेन्न, नमो-हिरण्यबाहव इत्यादिवचनविरोधात् भगवत्स्वरूप विषमसत्ताक दिव्य-अथवा पूर्वोक्तमंत्रों से उक्त ( कहा गया ) वह आत्मा ' पर्यगात् ' आकाश के समान सर्व को सर्व ओर से व्याप्त करता है । आदि तथा अन्त के विशेषण पुल्लिङ्ग हैं; अतः मध्य के ' शुक्रं ' इत्यादि विशेषण नपुंसक होते हुए भी पुल्लिंग में परिवर्तित कर लेने ( बदललेने ) चाहिये | शुक्र -- स्वयंप्रकाश अखण्डज्ञान तथा परमानन्दस्वरूप, अकाय-- सूक्ष्मशरीर रहित, अव्रण - क्षत ( घाव ) रहित, अस्नाविर -स्नायु से रहित अर्थात् इन दोनों विशेषणों से स्थूलशरीर से रहित, शुद्ध - अविद्या मल अर्थात् कारणशरीर से रहित - शरीर में रहते हुए भीवस्तुतः तीनों शरीरों से रहित, अपापविद्ध - धर्माधर्मरूप पाप से रहित अर्थात् अकर्तास्वरूप आत्मा है । " परमात्मा शरीरादि से रहित होने पर तो परमात्मा सुनहरी केश - श्मश्रु ( दाढ़ी - मूंछ ), सुनहरी बाहुवाला तथा नीलकण्ठ, संसार का कारण है, यह सर्व कथन बाधित हो जायगा तथा इन धर्मों का परमे-श्वर में प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र भी अप्रमाण हो जायगा । " परन्तु ऐसा कहना उचित नहीं; क्योंकि इस कथन का ' नमो हिरण्यबाहवे ' इस शास्त्र से विरोध है । परमेश्वर को अशरीर तथा सुनहरे केशादि-वाले तथा शरीर से युक्त कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा से विषमसत्ता ( व्यावहारिकसत्ता ) वाला परमेश्वर का शरीर है; किन्तु

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६० ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् विग्रहवत्त्वेऽपि तत्समसत्ताकस्यैव शरीरत्रितयस्य निषेध एव नञः पर्य-वसानात् । ननु सर्वनिषेध एव कुतो न नञर्थ इतिचेन्न अनुदरी कन्येत्यत्र कृशोदरीत्यर्थस्येव प्रकृतेऽपि पूर्वोक्तार्थसामञ्जस्यात् । प्रकृतमुच्यते - कविः क्रान्तदर्शी सर्वद्रष्टा २४ " नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा " ( बृहदारण्यकोपनिषत् ३.७.२३ ) इतिश्रुतेः । मनीषी मनस ईषिता प्रेरकः, सर्वज्ञः परमेश्वरः । परिभूः -- परि उपरि सर्वेषां भवतीति परिभूः । स्वयम्भूः येषामुपरिभवति यश्चोपरिभवति स सर्वः स्वयमेव भवतीति स्वयम्भूः । स सर्वद्रष्टा सर्वज्ञः सर्वशक्तिः । याथात-थ्यतः परमार्थतः यथारूपानु, यथाभूतकर्मफलसाधनतो वा । अर्थान् कर्तव्यपदार्थान् । व्यदधात् विहितवान् । शाश्वतीभ्यः समाभ्यः प्रजापतिभ्यः । ' संवत्सरो वै प्रजापति: २५ ( शतपथब्राह्मण १०.२.६.१ ) इति श्रुतेः । ' त्वया इदं कर्तव्यमिति विधिरूपं यज्ञं जीवानुरूपं व्यभजत् । परमेश्वर के समानसत्ता ( परमार्थसत्ता ) वाला शरीर नहीं है । ' अशरीरादि शब्दों से सर्व प्रकार के शरीरादि का ही निषेध क्यों नहीं माना जाता? ' यह कहना भी उचित नहीं; क्योंकि जिस प्रकार अनुदरी कन्या ' का ' बिना उदर के, कन्या है, ' ऐसा अर्थ नहीं किया जाता, तु ' कृश ( अतिस्वल्प ) उदरवाली कन्या है ' ऐसा ही अर्थ किया जाता है, इसी प्रकार मन्त्र में अकाय शब्द का ' परमार्थसत्ताक शरीर नहीं ' यही अर्थ है । ' सर्वथा शरीर नहीं, ऐसा नहीं । कवि = सर्व द्रष्टा, क्योंकि बृहदारण्यक श्रुति, परमात्मा को सर्वद्रष्ट कहती है । मनीषी = मन का ईषिता ( प्रेरक ) सर्वज्ञ परमेश्वर, परिभू = जो सर्वोपरि है । स्वयंभू - जिनके ऊपर है, जो ऊपर है, वह सर्व स्वयं ही होता है; अतः स्वयंभू है । वह द्रष्टा सर्वज्ञ - सर्वशक्ति - पर-२४. परमात्मा से अतिरिक्त और कोई द्रष्टा नहीं है । २५. शतपथ ब्राह्मण में “ सम्वत्सर प्रजापति हैं " ऐसा कहा गया है; अतः मन्त्र में सम्वत्सर के वाचक ' समा ' शब्द का अर्थ प्रजापति किया है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ६१ २६ “ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । त ँह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वे शरणमहं प्रपद्ये ॥ " ( श्वेताश्वतरोपनिषत् ६.१८ ) ' स पर्यगात् ' इत्यात्मनो व्यापकत्वमुक्तम् । २७ “ यच्च किञ्चिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥ " इति श्रुतेः ( महानारायणो ० ११.६ ) व्यापकत्वात् स एवात्मा -२८ " यच्चाप्नोति यदादत्ते यत्त्वत्ति सकलानिह । यच्चास्य सन्ततोभावस्तस्मादात्मेति गीयते ॥ " इति स्मरणात् । मेश्वर कर्तव्यपदार्थों को प्रजापतियों के लिये यथाभूत कर्म के साधन-पूर्व विधान करता है । ' तुमको यह कर्तव्य है ' इस प्रकार विधिरूप यज्ञ का जीवानुरूप विभाग किया । ' यो ब्रह्माणं ' यह श्वेताश्वतरश्रुति ऐसा कह रही है । " यच्च " " स पर्यगात् " इतने वाक्य से आत्मा की व्यापकता कही; क्योंकि ' यह नारायणश्रुति उसे व्यापक बोधन कर रही है । व्यापक होने से वह परमात्मा ही आत्मा है, क्योंकि " यच्चा-प्नोति " ' इस स्मृति में आत्मा को व्यापक कहा गया है । वह परमात्मा अभिनआत्मा शुद्ध स्वयं ज्योति है, अर्थात् शुद्धज्योतिस्वरूप = नित्य २६. जिस परमात्मा ने पहिले ब्रह्मा को रचा है, जिसने उस ब्रह्मा के लिये वेद प्रदान किया है, मैं मुमुक्षु उस जीवों की बुद्धि के साक्षी परमात्मदेव की शरण हूँ । २७. जो कुछ जगत् देखा तथा सुना जाता है, उस सर्व को व्याप्त करके नारायण भगवान् स्थित है । २८. पाठान्तर — सकलानिह - विषयानिह, गीयते - कीर्त्यते । द्रष्टव्य - शाङ्करभाष्य कठो ० २.१.१ ।

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६२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् स च शुक्र शुद्धः स्वयंज्योतिः, शुक्लज्योतिस्वभावः नित्य-चिन्मात्रविग्रहः । अकायं लिङ्गदेहविवर्जितः । अव्रणमस्नाविरं व्रण-शिरादिविर्वाजितः । अपापविद्ध धर्माधर्मशून्यः । शुद्ध मायापाशर्वाजितः । कवि: क्रान्तदर्शी । मनीषी मनसोऽपि नियन्ता सर्वसाक्षी । परिभूः सर्वोपरिभविता । स्वयंभूः सर्वः, स्वयमेव भवति । यद्वा स देवो निरञ्जनो सर्वव्यापी सर्वगः देहद्वयविवर्जितः परिभवति सर्वकार्याणीति, स्वयमेव स्वातन्त्र्येण भवतीति स्वयंभूः । यद्वा स ईश्वरस्वरूपाभिन्न आत्मा पर्यगात् परितः समन्ताद-गादधिगतवान् । स चाकाय: - सूक्ष्म देहवर्जितः । कुतः इति चेत्तत्राह -अव्रणः । अस्नाविरः स्थूलशरीर रहितः सति स्थूले तद्ध ेतुत्वेन सूक्ष्मस्याप्यनुमातुं शक्यत्वात् । स्थूल देहराहित्ये हेतुः -- शुद्ध पुण्यपापादिरहितम् । तत्रापि हेतुरपापविद्धं पापं दुःखहेतुरविद्या, चेतनस्वरूप है | अकाय = 1 = लिङ्ग शरीररहित, क्षत ( घाव ) तथा स्नायु ( नस ) से रहित, धर्माधर्म से शून्य, मायापाश ( पंचक्लेशरूपपाश ) से रहित, मनीषी मनका नियन्ता - सर्वकासाक्षी, परिभू = सर्व से ऊपर वर्तमान ( परमार्थसत्तावान् ), स्वयंभू = स्वतः सिद्ध है । अथवा वह मायामल से रहित आत्मदेव, सर्वव्यापक देहदो ( स्थूल सूक्ष्म ) से रहित तथा सर्वकार्यों को अपने वश में रखनेवाला है । वह स्वयं अर्थात् स्वतन्त्ररूप से होता है । भाव यह कि वह स्वतः सिद्ध है । अथवा वह ईश्वर से अभिन्न आत्मा, सर्व ओर से व्याप्त है अर्थात् वह ऐसा व्यापक है कि उसके बिना किसी की सत्ता ही नहीं है । वह अकाय = सूक्ष्मशरीर से रहित है, क्योंकि वह अत्रण = क्षत-रहित और अस्नाविर = स्नायु से रहित अर्थात् स्थूलशरीर रहित है । स्थूलशरीर होने पर ही सूक्ष्मशरीर का अनुमान किया जा सकता है । जब स्थूलशरीर नहीं तो सूक्ष्मशरीर भी नहीं । स्थूलशरीर के अभाव हेतु है कि वह आत्मा शुद्ध = पाप - पुण्य से रहित है । पाप - पुण्य होने पर ही स्थूलशरीर मिलता है । पाप - पुण्य नहीं तब स्थूलशरीर भी नहीं । पाप - पुण्य के अभाव में हेतु है अपापविद्ध । पापशब्द का वाच्य यहाँ दुःख का हेतु होने से अविद्या है । अविद्या से भी आत्मा रहित

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ६३ न तेन विद्धमपापविद्धम् । यस्मादेतादृशं शुक्रमहमस्मि तस्मात् स जीवः पर्यगात्तस्मात्सोऽप्येवं विशेषणः, तेन न जीववदीश्वरस्या-प्यात्मत्वाद्द हादिसम्बन्धः सम्भवति । अनेजदादिरूपं यदुक्तमीट्स्वरूपं, तदेवाय जीवो s पि । कुतः! कविः क्रान्तदर्शी, अपास्तसर्वाविद्यः । मनीषी सर्वस्य हृदि सत्त्वेन मनसोनियन्तृत्वात् । परिभूः परिसमन्तात् भवत्यविद्यावशात् । अविद्यां परिभावयतीति वा परिभूः । कारणान्तर-निरपेक्षः । स्वयमेवभवतीति स्वयंभूः । स स्वाविद्यादशायां याथातथ्यतः साध्यसाधनादि प्रतिनियतस्वरूपेणार्यांश्चेतनाचेतनात्मक विविधपदार्था-व्यदधाद्विविधं कल्पितवान् । ज्योतिष्टोमेनैव स्वर्गो न कृष्यादिनो-पास्त्यादिरूपेण वा । साधनसाध्यात्मकं प्रतिनियतरूपं जगत् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः संवत्सराभिधाभ्योऽस्मिन्नस्मिनुकाल इदमिदं भविष्यतीत्या-दिना कल्पितवान् । है । अविद्या के बिना उसमें पाप - पुण्य संभव नहीं । " क्योंकि ऐसा शुद्ध ब्रह्म मैं हूँ ", अतः जीव भी व्यापक है, परमात्मा के समान ही विशेष -णवाला आत्मतत्त्व है । जीव के समान ईश्वर का भी आत्मा ( वास्त-विकस्वरूप ) होनेसे आत्मतत्त्व में देहादि किसी अनात्मपदार्थ का सम्बन्ध संभव नहीं । जो ईश्वर का स्वरूप कहा वही जीव का स्वरूप भी है । क्योंकि जीव का स्वरूप भी कविक्रान्तदर्शी अर्थात् सर्वअविद्या से रहित है । सर्वअविद्या से रहित भी सर्व के हृदय में विद्यमान होने से विद्या का नियन्ता होने के कारण ' मनीषी ' है । विद्या के वशीभूत होने से सर्व ओर है, सर्वशरीरों में है; अतः परिभू है । अविद्या का परिभावन - परिशीलन करता है, उससे तादा-त्यापन्न होता है अथवा अविद्या का पराभव ( बाध ) करता है इसलिये भी वह परिभू है । ज्योतिस्वरूप है, अतः अविद्या का भी प्रकाशक है । अत एव अविद्या से पराभूत ( तिरस्कृत ) नहीं, अपि तु ज्ञातत्वोपलक्षित आत्मा का ज्योतिस्वरूप ही अविद्या का बाधक है । किसी कारण की अपेक्षा के बिना स्वयं सिद्ध है; अतः वह स्वयंभू है । उस जीव - आत्मा ने अपनी अविद्यादशा में " यह साध्य है, यह साधन है " इस प्रकार नियत साध्य - साधनरूप से चेतन - अचेतन पदार्थों को विविधरूप में

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६४ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यद्वा यत्तदनित्यसम्बन्धात् यद्ब्रह्म पर्यंगात् परि सर्वतः जगत् अगात् व्याप्यासीत् । यच्च शुक्रं दीप्तिमत्वात् स्वप्रकाशं २६ " तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ” ( कठोपनिषत् अ. २ व. २ म. १५ ) इति श्रुतेः । अकायं सूक्ष्मदेहरहितम्, निरवयवत्वादत्र-णमस्नाविरं स्थूल देहरहितम्, ३० " अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थि-तम् ' ( कठोपनिषत् अ. १ व २ म. २१ ) । शुद्धम् - मायासम्बन्धशून्यम् ' तमसः परमुच्यते ' ३१ ( त्रिपाद. महा. ४. १, गीता १३.१७ ) इत्युक्तः । अपापविद्धम् पुण्यपापवजितम् पुनरावृत्तिहेतुत्वात्पुण्यमपि पापमेव ३२ ' न वर्धते कर्मणा नो कनीयानि ' ति श्रुतेः ( बृह ० उ ० ४.४.२३ ) । स तदेतादृशं ब्रह्मैव अनन्तब्रह्माण्डोत्पत्त्यादिशक्तिमादायेश्वरो भूत्वा कल्पना किया है । ज्योतिष्टोम से या किसी उपासना विशेष से ही स्वर्ग है, कृषि आदि से नहीं, इत्यादिरूप से साध्य - साधनात्मक ( कार्य-कारणात्मक ) ' नियतस्वरूपवाला जगत् इस काल में यह होगा तथा इस काल में यह होगा ' इस रूप से उसने कल्पना की है । . अथवा - यत् तत् का नित्यसम्बन्ध होने से यत् - जो ब्रह्म सर्व जगत् को व्याप्त कर विद्यमान है और जो शुक्र = दीप्तिवाला होने से स्वप्रकाश है । क्योंकि “ तमेव " यह श्रुति उसको स्वप्रकाश कह रही है । जो अकाय = मूक्ष्मशरीररहित, निरवयव होने से व्रण तथा स्नायु-रहित अर्थात् स्थूलशरीररहित है । " अशरीरम् " यह श्रुति भी उसे अशरीर कहरही है । जो शुद्ध = माया संबंध से शून्य है । श्रुति भी जिसे तम = माया से रहित कर रही है । जो अपापविद्ध = पुण्य - पाप से रहित है । पुनर्जन्म का हेतु होने से पुण्य भी पाप है, अत एव अपापविद्ध शब्द का पुण्य - पाप से रहित अर्थ किया । क्योंकि ' न वर्धते ' यह श्रुति २६. उस देदीप्यमान आत्मतत्त्व के पश्चात् ही सर्व प्रकाशित होता है । उसके प्रकाश से ही सर्व प्रकाशित होता है । ३०. अनवस्थित ( अनित्य शरीरों ) में शरीर रहित आत्मा स्थित है । ३१. आत्मा तम ( माया ) से परे कहा जाता है । ३२. वह परमात्मतत्त्व कर्म से न बढ़ता है, न घटता है ।

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् कविरतीतानागतद्रष्टा, [ ६५ ३३ ' सोऽकामयत बहुस्यां ' ( तैत्ति ० ३.६ ) इत्यादि श्रुतिभ्यः स्मृतेश्च " वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ " ३ ४ इत्यादि । ( भगवद्गीता ७.२६ ) परिभूः उपरि भवतीति सर्वोत्कृष्टः, ३५ पुरुषान्न परं किञ्चिदि'-ति ” ( कठो ० १.३.११ ) श्रुतेः । अन्यत्पूर्ववत् । यद्वा - शुक्रमित्यादिविशेषणोपलक्षितं ब्रह्मपर्यगात्, सर्वभावेन ज्ञातवान् गत्यर्थानां बुद्धयर्थत्वात् । स ब्रह्मज्ञः कविः क्रान्तदर्शी, मनीषी सम्बन्धराहित्ये प्रशस्त बुद्धिसम्पन्नः परिभूः परितो भवति सर्व-स्वरूपः, स्वयंभूः ब्रह्मरूपः सन् याथातथ्यतो यथास्वरूपं तेन तेन रूपेण उसे कर्मों के प्रभाव से रहित कह रही है । वह ऐसा ब्रह्म ही अनन्त-ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करनेवाली शक्ति को लेकर अर्थात् मायाशक्ति से विशिष्ट होकर, ईश्वरपद का वाच्य होकर कवि = भूत - भविष्यत् का ज्ञाता होता है । ' सोऽकामयत ', ' वेदाहं ' इत्यादिक अन्य श्रुतिस्मृतियाँ भी परमात्मतत्त्व को भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान का ज्ञाता कह रही हैं । परिभू = सर्व के ऊपर होता है, अर्थात् सर्वो-त्कृष्ट है, क्योंकि उसे " पुरुषात् " यह कठश्रुति सर्वश्रेष्ठ कह रही है । अन्य अर्थ पूर्ववत् है । अथवा - जिसने शुक्रादि विशेषणों से उपलक्षित शुद्धब्रह्म जान लिया, वह ब्रह्म को जाननेवालापुरुष कवि = क्रान्तदर्शी, मनीषी = सम्बन्ध से रहित श्रेष्ठबुद्धि से सम्पन्न ( युक्त ), परिभू = सर्व ३३. " मैं अतीत, अनागत और वर्तमान प्राणियों को जानता हूँ, पर मुझे कोई अभक्त नहीं जानता । ” ३४. परमात्मा ने इच्छा की कि ' मैं एक हूँ बहुत हो जाऊँ । ' ३५. पुरुष से श्रेष्ठ कोई नहीं है ।

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६६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अर्थान् पदार्थान् भोग्यविषयान् शाश्वतीभ्यः समाम्यः, तादर्थे चतुर्थी, अनन्तवर्षोपभोगाय, व्यदधात् - विविधं करोति । ३६ " यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्माऽस्मिन् संदेह्य गहने प्रविष्टः । स विश्वकृत्स हि सर्वस्य कर्ते ' तिश्रुतेः ( बृहदा ० उ ० ४।४।१३ ) । दयानन्दः - - ' " हे मनुष्याः? यद्ब्रह्मशुक्रम कायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् पर्यगात् यः कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः परमात्मा शाश्वतीभ्यः समाभ्यः याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात् स उपासनीयः । " इति । तदपि यत्किञ्चित् विप्रतिषिद्धत्वात् । अकायमित्यस्य स्थूल-सूक्ष्मकारणशरीर र हितार्थत्वे, अव्रणमस्नाविरमित्यनयोविशेषणयोर्नर-स्वरूप, स्वयंभू = ब्रह्मस्वरूप हुआ, यथास्वरूप अर्थात् उस - उसरूप के पदार्थ = भोग्य विषयों को अनेक प्रकार का करता ( बनाता ) है | श्रीदयानन्दभाष्य – “ हे मनुष्यो! जो शुक्र - शरीररहित - क्षत ( घाव ) तथा स्नायु से रहित शुद्ध पापों से असंसृष्ट व्यापक ब्रह्म है । जो कवि मनीषी - परिभू - स्वयंभू - परमात्मा शाश्वत प्रजा के लिये पदार्थों को विभक्त करता है, वही उपासनीय है । " यह भाष्य कुछ नहीं; क्योंकि इसमें परस्पर विरुद्ध कथन है । परमात्मा यदि स्थूल सूक्ष्म तथा कारण इन तीनों शरीरों से रहित है, ऐसा अकाय शब्द से अभिमत है, तत्र तो अव्रण तथा अस्नाविर ये विशेषण व्यर्थ हो जायँगे । क्योंकि स्थूल शरीर के होने पर ही व्रणादि संभव हैं । तीनों शरीरों से रहित में तो व्रणादिक जब संभव ही नहीं अर्थात् व्रणादि की प्राप्ति ही नहीं, तो निषेध की भी प्राप्ति नहीं । ३६. जिस विद्वान् को इस अनेक सङ्कटों के पुंज से युक्त, गहन शरीर में प्रविष्ट आत्मा शास्त्र तथा आचार्य के उपदेश से ज्ञात है तथा " मैं ब्रह्म हूँ " इस प्रकार अपरोक्ष है, वह आत्मवेत्ता विश्व का कर्ता ईश्वर है, उसका ही यह सर्व, लोक ( आत्मा ) है, वह विद्वान् आत्मा ही है ।

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वेदार्थपारिजात ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ६७ क्यापातात्, स्थूलशरीरस्य सत्त्वे एव व्रणादि संभवात् । समाभ्यः प्रजाभ्यः इत्यप्यसंगतम्, निर्मूलत्वात् । न च शाश्वतीभ्य इति तद्वि-शेषणं संभवति, विनश्वरत्वात् || ८ || 1

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते ।

ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्या रताः ॥६ ॥

इस मन्त्र के द्वारा नैरात्मवादी लोकायतिकों की निन्दा की जाती है । उनके मत में भूतसंघातरूप देह के अतिरिक्त आत्मा कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं; जैसे मादक द्रव्य के अतिरिक्त उससे निर्मित मद्य कोई अतिरिक्त पदार्थ नहीं । पर उनका यह मत उपयुक्त नहीं । श्रुति और युक्ति के द्वारा देहातिरिक्त आत्मा का अस्तित्व मानकर देहा-सक्तिपर्यन्त कर्मोपासना और दोनों के समुच्चयका आलम्बन लेना ही क्योंकि किसी की प्राप्ति होने पर ही निषेध उचित होता है । सर्षप में सुमेरु पर्वत की प्राप्ति नहीं तो " सर्षप में सुमेरु नहीं " ऐसा निषेध भी नहीं । यदि कहा जाय स्थूल शरीर का नहीं, सूक्ष्म - कारण शरीर का निषेध है; यह भी उचित नहीं, क्योंकि सूक्ष्म तथा कारण शरीर के विना स्थूल देह संभव ही नहीं । कैसा भी शरीर स्वीकार करने पर स्वसिद्धान्त से भी विरोध होगा । क्योंकि स्वामी दयानन्दजी के सिद्धान्त में परमेश्वर का किसी प्रकार का शरीर स्वीकार नहीं किया गया है । " समाभ्यः ” इस शब्द का अर्थ उनको प्रजा अभिमत है, यह भी उचित नहीं; क्योंकि समाके पर्याय सम्वत्सर का अर्थ प्रजापति ब्राह्मणों ( ब्राह्मणग्रन्थों ) में किया है । उस प्रकार प्रजा अर्थ नहीं किया, अतः प्रजा अर्थ करना निर्मूल है । किसी प्रकार यह मान भी लिया जाय कि ' समा ' शब्द का अर्थ प्रजा है तो भी शादवती विशेषण संभव नहीं; क्योंकि प्रजा शाश्वती -सदा रहनेवाली नहीं; क्योंकि वह ( प्रजा ) तो नश्वर है ॥ ८ ॥