वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 21–30

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 21–30

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २० से - विनाशी शरीर से अन्तःकरण की अशुद्धिरूप मृत्यु को तर जाता है और ' सम्भूति ' अर्थात् आत्मज्ञान से अमृत ( मुक्ति ) लाभ करता है । अथवा छान्दसवर्णलोप के योग से ' संभूति ' - ' असंभूति ' मान्य है । जिसका अर्थ है अव्याकृत ( कारणब्रह्म ) की उपासना | ' विनाश ' का अर्थ है, विनाशधर्मयुक्त कार्यब्रह्मोपासना । जो दोनों की सहोपासना करता है, वह कार्यब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) की उपासना से उपलब्ध ऐश्वर्य और धर्मादि के अमोघ प्रभाव से अनैश्वर्य - अधर्मादिरूप मृत्यु को पारकर कारणोपासना से प्रकृतिलयरूप अमृतफल को प्राप्त करता है । ' अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ' इस बारहवें ( काण्व ० ६ ) मन्त्र के भाष्य में इस तथ्य का प्रकाश किया गया है कि ' कर्म ' वेद विहित होने से ' विद्या - सदृश ' कहा जाता है । विद्या भिन्न अन्य ' अविद्या ' यहाँ ' कर्म ' है । ब्राह्मण अन्य क्षत्रियादि को अब्राह्मण कहने की प्रथा इस प्रसङ्ग में हृदयङ्गम करने योग्य है । ' विद्या ' यहाँ देवोपासना है । वे अदर्शनात्मक तम में प्रविष्ट होते हैं, जो अविद्या पदवाच्य कर्म की उपासना करते हैं । वे उनसे भी अधिक अदर्शनात्मक तम में प्रविष्ट होते हैं, जो विद्या अर्थात् हिरण्यगर्भोपासना में निरत हैं । यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ' न हि शास्त्रविहितं किञ्चिदकर्तव्यतामियात् ', ' फलवत्सन्निधावफलं तदङ्गम् ' - ' शास्त्र-विहित कुछ भी अकर्तव्य नहीं होता ', ' फलसहित की सन्निधि में पठित - सन्निहित फलरहित उसका ( फलयुक्त का ) अङ्ग होता है । '; क्योंकि विद्या ( देवोपासना ) और अविद्या ( कर्मानुष्ठान ) दोनों शास्त्रसिद्ध हैं; अतः ये अकर्तव्य नहीं हो सकते, साथ ही विद्या और अविद्या के देव और पितृ - लोक की प्राप्तिरूप अवान्तर फलभेद दोनों के समुच्चय ( सहानुष्ठान ) में हेतु है, न कि अङ्गाङ्गिभाव की सिद्धि में । समुच्चय-प्रशंसा के अभिप्राय से दोनों की निन्दा की गयी है । महानुभावों ने कहा भी है- ' न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते, अपि तु विधेयं स्तोतुम् ' = ' निन्दा निन्दनीय की निन्दा के लिये प्रवृत्त न होकर, विहित ( विधित्सित, विधेय ) की स्तुति के लिये होती है । ' ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा ये दो वेदोक्तमार्ग हैं । ' ईशा वास्य ' और ' कुर्वन वेह कर्माणि ' ( ईशा ० १ २ ) इन दो मन्त्रों में क्रमशः दोनों मार्गों के अधिकारियों का निरूपण किया गया है । सर्वेषणा ( सम्पूर्ण -

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२१ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् कामना ) - विमुक्तज्ञाननिष्ठों में कर्मसंन्यास की सहज प्रतिष्ठा होती है | कर्मासक्ति - फलासक्ति अहंकृति - नानात्वबुद्धि और अभिनिवेशशून्य तत्त्वज्ञों में कदाचित् कर्म प्रतिष्ठित भी हो तो भी मोक्ष के प्रति अन्यथासिद्ध उसी प्रकार होता है, जिस प्रकार अग्नि में अवस्थित पिङ्गलता दाह के प्रति । ऐसे तत्त्वज्ञ वसिष्ठ, व्यासादि के कर्म ' लीलाकर्म ' या ' कर्माभास ' ही मान्य हैं । ' नैव किञ्चित्करोमीति ' ( भगवद्गीता ५.८, ६ ) उनका यह निश्चय कि ' मैं कुछ नहीं करता ' उनमें अन्यारोपित कर्म को अकर्म बनाये रखता है । ' करते हुए भी न करने की उनकी मान्यता ' विक्षिप्त और अज्ञों जैसी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि ' युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ' ( गीता ० ५.८ ) वे ' युक्त ' हैं, असमाहितया विक्षिप्त नहीं; ' तत्त्ववित् ' हैं, बालवत् अज्ञ नहीं । जो ज्ञाननिष्ठा के अधिकार से अभी विभूषित नहीं, न उसके करीब ( निकट ) ही हैं, बल्कि जीवन और जीवनोपयोगी वस्तुओं में रागान्वित हैं, वे योग्यता विरहवशात् शुद्ध ब्रह्मात्मतत्त्व के एकत्वबोध के अभी अनुपयुक्त हैं । शास्त्रोक्त विधि - निषेधानुसार अनुष्ठित कर्म कालान्तर फलप्रद हैं । ज्ञान तत्काल फलप्रद है । अज्ञानावरणवारण-पूर्वक निरावरण ब्रह्मात्मभाव के अभिव्यञ्जनरूप फल को प्रदान करने के लिये ज्ञानको कर्मादि के योग की अपेक्षा नहीं । ऐसी स्थिति में मन्त्र में प्रयुक्त ' अविद्या ' स्वर्गादि अभीष्टफलप्रद कर्म का और ' विद्या ' देवतोपासना का वाचक है । दोनों का विवक्षित योग ऐसा अर्थ स्वीकार करने पर ही संभव है । कर्म और विद्या का क्रमशः पितृलोक और देवलोकरूप पृथक् फल श्रुत होने पर भी कर्म की अपेक्षा न कर केवल देवताराधन, कर्माधिकारी द्वारा अविचलभाव से सध पाना कठिन है । साथ ही देवतोपासना से विमुख रहकर केवल कर्मानुष्ठान से अन्तर्यामी और अधिदैवमण्डल के प्रति महत्त्वबुद्धि की न्यूनता के कारण अभीष्टवस्तु की उपलब्धि में प्रतिबन्ध की तनिवृत्ति और निष्कामभाव से कर्मानुष्ठानपूर्वक मोक्ष के प्रति अभिरुचि तथा मनोवृत्ति असम्भव है । इसीलिये यहाँ केवल कर्म और केवल ज्ञानकी निन्दा दोनों के समुच्चय की भावना से प्रयुक्त है । ' अन्य देवाविद्याया ' इस तेरहवें ( का ० १० ) मन्त्र में सत्परम्प-राप्राप्त फलभेद का वर्णन किया गया है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २२ ' विद्याञ्चाविद्याञ्च ' इस चौदहवें ( का ० ११ ) मन्त्र के भाष्य में इस रहस्य का विवेचन किया गया है कि अविद्या शब्द से अग्नि-होत्रादिकर्म कहे गये हैं । उनके अनुष्ठान से स्वाभाविक काम - कर्म और ज्ञान जो ' मृत्यु ' शब्द के वाच्य हैं, ( उपासना ) से देवभावरूप अमृत को उनको पार करके देवताज्ञान प्राप्त हो जाता है । यह ' सम-समुच्चय ' की दृष्टि से अर्थ है । जब विद्या का अर्थ ब्रह्मात्मज्ञान मान्य हो तब ' सम - समुच्चय ' की दृष्टि से पहले कर्मानुष्ठान से अन्तःकरण की शुद्धि और फिर ब्रह्मात्मज्ञान से मोक्षोपलब्धि फल मान्य है । ' क्रम - समुच्चय ' की दृष्टि से अविद्या का अर्थ ' कर्म ' और विद्या का अर्थ ' आत्मज्ञान ' मान्य है । कर्मयोग अन्तःकरण को संस्कृतकर आत्मा के अकर्तृत्व - अभोक्तृत्व के बोध की सहिष्णुता अभिव्यक्त करता है । जिससे स्वाभाविक काम ( विषयेच्छा ), कर्म ( कर्तृत्वपूर्वक प्रवृत्ति ) और ज्ञान - ( साध्य - साधनानुसन्धानपूर्वक द्वतस्फुरण ) रूप मृत्यु का अतिक्रमण हो जाता है और ब्रह्मात्मज्ञान के अमोघ प्रभाव से कर्तृत्व भोक्तृत्वादिशून्य आत्मा ( ' त्वं ' पद लक्ष्यार्थरूप शोधित अहमर्थ ) की ब्रह्मरूपता के बोध से अमृत ( ब्रह्मात्मरूप से अवस्थितिरूपा मुक्ति ) की उपलब्धि होती है । साध्य - साधन की कामना मृत्यु है । इस मृत्यु से पार हुए व्यक्ति ब्रह्मविद्या का अधिकारी है । पहले नित्यकर्मरूप अविद्या का आलम्बन लेने से व्यक्ति का अन्तःकरण शुद्ध होता है । कामचार, कामवाद, कामभक्षण आदि स्वाभाविक प्रवृत्ति ही अशुद्धि है | भगवदर्थ निष्कामभाव से स्वकर्मानुष्ठान से अन्तःकरण संस्कृत होता है, फिर ब्रह्मविद्या की उपलब्धि से जीव का परमकल्याण होता है । यह क्रम समुच्चय है । ज्ञानोत्तर कर्म अकर्म हो जाता है, अतः कर्मोत्तर ज्ञान का अधिकार प्राप्त है । ' सम - समुच्चय ' की हट से विद्या ( ज्ञान ) का अर्थ देवतोपासना है और कर्म का अर्थ स्व - अधिकारानुसार प्राप्त अग्निहोत्रादिकर्म है । दोनों के सहानुष्ठान से अविद्यारूप कर्म द्वारा स्वाभाविक कर्म - ज्ञानरूप मृत्यु की निवृत्ति और विद्यारूप देवलोक से ब्रह्मलोकपर्यन्त दिव्यलोकों की प्राप्ति होती है । लोकलय से भूतलय तक दिव्यलोकों की प्राप्ति आपेक्षिक अमृतत्व है । इस प्रकार उपनिषत् शब्द में प्रयुक्त सधातु का विशरण ( हिंसन, निवारण ) और गतिरूप अर्थद्वय उक्त क्रम - समुच्चय में अविद्या

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२३ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् की निवृत्ति और उससे उपलक्षित तत्त्वोपलब्धि के कारण चरितार्थ होता है । सम - समुच्चय में पुनः पुनः जन्म - मृत्यु - जरा - व्याधिरूप क्लेश का अवसादन- अर्थ चरितार्थ हो जाता है । इस सम्बन्ध में यह हृदयङ्गम करना आवश्यक है कि कर्मकाण्ड परक श्रुतियाँ मुक्त स्वर से आत्मा को कर्ता - भोक्ता मानती हैं । देह को aft और आत्मा को नित्य मानकर ही ऐसा मानना सम्भव है । देहातिरिक्त नित्य आत्मा को न मानने पर अकृताभ्यागम और कृत विप्रणाशरूप दोषद्वय अनिवार्य है । इसके वारण के लिये आत्मा को नित्य मानना ही चाहिये । कर्ता भोक्ता जीव का अनुवादकर उसकी अद्वितीय परब्रह्मरूपता के प्रतिपादन में सभी उपनिषदें चरितार्थ होती हैं । फिर भी पूर्वमीमांसा की रीति से ' आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति ' ( वृ ० उ ० २.४.५ ) आत्मा की परं प्रेमास्पदता अनुभवसिद्ध है । श्रुति इस संसारी आत्मा का अनुवाद करती है, ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' ( बृ ० उ ० २.४.५ ) यह श्रुति उसी को द्रष्टव्य, श्रोतव्य, मन्तव्य और ध्यातव्य बताती है । ' य आत्माऽपहत पाप्मा ' ( छा ० ८.७.१ ) इन वाक्यों के द्वारा यद्यपि ऐसा ध्वनित होता है कि आत्मा अकर्ता, अभोक्ता, असंसारी है; पर वस्तुस्थिति यह है कि कर्ता - भोक्ता संसारी आत्मा की स्तुति ही इन वाक्यों से की गयी है, उसमें उपनिषदों का तात्पर्य कदापि नहीं, अत: आत्मज्ञान कर्तृ संस्कार के द्वारा ऋतु का ही अङ्ग है, स्वतन्त्र पुरुषार्थ नहीं । औपनिषद् आत्मज्ञानरूप संस्कार से संस्कृत कर्ता पारलौकिक कर्मोपभोग के योग्य होकर वैसे ही क्रतु का अङ्ग हो जाता है, जैसे प्रोक्षणरूप संस्कार से संस्कृत व्रीहि । परमाचार्य ने कहा भी है- ' द्रव्यसंस्कारकर्मसु परार्थत्वात्फलश्रुतिरर्थ-वाद: ' ( जै ० सू ० ४.३.१ ) = पर्ण आदि द्रव्य, अञ्जनादिरूप संस्कार और प्रयाजादिरूप अङ्ग - कर्म - ये सभी परार्थ ( याग के अंग ) हैं, स्वतन्त्र फलाकाङक्षा से रहित हैं, अतः इनके फलों का निर्देश करनेवाले ' यस्य पर्णमयी जुहुर्भवति न स पापं श्लोकं श्रृणोति ' ( तै ० सं ० ३.५.७. २ ), ' दाङ क्त ' चक्षुरेव भ्रातृव्यस्य वृङ क्त ' ( तै ० सं ० ६.१.१.५ ), ' वर्म तद् यज्ञस्य क्रियते यत्प्रयाजानुयाजा इज्यन्ते ' ( तै ० सं ० २.६.१.५ ) वाक्य अर्थवादमात्र हैं । " केवल उक्त वाक्य प्रमाण के द्वारा ही नहीं, अपि तु ' यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा - तदेव वीर्यवत्तरं भवति ' ( छा ० १.१.१० )

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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २४ इस तृतीया श्रुति से भी आत्मज्ञान में क्रत्वङ्गत्व सिद्ध है । ' यत् ', ' तत् ' रूप सर्वनाम और ' एव ' रूप अवधारण के द्वारा यह श्रुति उद्गीथ विद्या के अतिरिक्त अन्यत्र भी ' यदेव कर्म विद्यया सहितं करोति, तदेव कर्मवीर्यवत्तरं भवति ' ऐसी सामान्य व्याप्ति द्वारा ' य एव धूमवान् देशः, स एव वह्निमान् भवति ' इस न्याय से चरितार्थ है । ' तं विद्या-कर्मणी समन्वारभेते ' ( वृ ० उ ० ४.४.२ ), ' सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ' ( मुण्डक ३.१.४ ) आदि वचन भी ज्ञान और कर्म के ' सम- समुच्चय ' के प्रतिपादक हैं । यह भी नहीं कहा जा सकता कि अङ्ग और अङ्गीरूप से ये चरितार्थ हो लेंगे; क्योंकि दर्श- पूर्णमासगत आग्नेयद्वय, उपांशु, अग्नीषोमीय और ऐन्द्रद्वय-रूप छः कर्मों के समान ये ' सम - प्रधान ' भी हो सकते हैं । औपनिषद आत्मज्ञान इसलिये भी कर्माङ्ग हो सकता है, क्योंकि वेदार्थ ज्ञानवाले पुरुष के प्रति ही कर्म का विधान है और औपनिषद आत्मा भी वेदार्थ है । फिर ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि ( वा ० सं ० ४०.२ ) इस प्रकार कर्मानुष्ठान के नियम से भो आत्मज्ञान में कर्माङ्गत्व प्रतिष्ठित होता है । उक्त कथन आपात रमणीय होने पर भी सिद्धान्तसहिष्णु नहीं है । शब्द प्रमाणका यह स्वभाव है कि अधिगतार्थ का वह प्रतिपादन ( विधान ) करता है; अतः उपनिषत्प्रमाण से प्रतिपादित नित्य शुद्ध, असङ्गस्वरूप आत्मा का ज्ञान कर्मानुष्ठान का विरोधी होने के कारण कर्म से कोई सम्बन्ध ही नहीं रखता, फिर वह अव्यभिचरित क्रतु सम्बन्धी होकर क्रतु का अङ्ग क्यों होगा? ' योऽयं सर्पः सा रज्जुः ' की उक्ति जिस प्रकार रज्जु से सर्वभ्रमवारण के लिये है, उसी प्रकार ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( छा ० ८.७.१ ) आदि उक्ति ' न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति ' ( वृ ० उ ०४.५.६ ) आदि वचनों से निरूपित आत्मा के संसारित्व के वारण के लिये हैं, अनधिगत ब्रह्मत्व की ही प्रतिपादिका हैं । याज्ञवल्क्यादि के संन्यास का प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ आत्मविद्या को कर्माङ्ग नहीं सिद्ध करतीं । ' सत्येन ' आदि श्रुतियाँ अपक्व विद्या को स्थिति में हो कर्म को स्वीकृति देती हैं । ' कुवन्नेवेह कर्माणि ' आदि कर्माधिकारपरक वचन ‘ क्रम समुच्चय ' विधा को या सकामी के लिये आत्मज्ञान के अधिकार को द्योतित करते हैं । ' यदेव विद्यया करोति ' ( छा ० १.१.१० ) यह व्याप्ति प्रदर्शन भी केवल प्रक्रान्त उद्गीथ विद्या को उसी प्रकार सिद्ध करता है, जिस प्रकार

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२५ वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ' सर्वे ब्राह्मणा भोज्यताम् ' यह वचन केवल निमन्त्रित ब्राह्मणको ही विषय करता है । जनकादि तत्त्वज्ञों के जीवन में कर्मयोग कृतार्थता का हेतु न होकर अग्नि में पिङ्गलता की विद्यमानता दाह के प्रति अन्यथासिद्धतुल्य है । ' तं विद्याकर्मणी ' ( वृ ० ४.४.२ ) यह उत्क्रमण-श्रुति उत्क्रमण का प्रतिपादक होने के कारण ही ' विद्या ' को निरङकुश -बोधरूप ब्रह्मविद्या नहीं सिद्ध होने देती । ' वायुरनिलममृतमथेदं ' इस पन्द्रहवें / का ० १७ ) मन्त्र के भाष्य में इस तथ्य को द्योतित किया गया है कि उपासना के योग से ही उपास्यस्मृति लब्धयोगी प्रार्थना करता है । देवतोपासना और कर्मानुष्ठान से संस्कृत वायु अर्थात् प्राणवायु से उपलक्षित कर्तृ - करणा-त्मक सूक्ष्मशरीररूप अध्यात्म अब सूत्र और हिरण्यगर्भरूप अधिदैव-सायुज्य को प्राप्त हो! प्राणविरहित स्थूल शरीर अन्त्येष्टि संस्कार से सम्पन्न होकर भस्मरूपता को प्राप्त हो! ' ॐ ' यह ब्रह्म - नाम है । योगवृन्द ब्रह्मबुद्धि से इसकी भावना करते हैं । हे ओम्! हे संकल्पा-त्मक देव! हमने ब्रह्मचर्यादि आश्रमों में आप ब्रह्मात्मक अग्नि की उपासना की है । आदरपूर्वक आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमारी उपासना का स्मरण कर अपना सायुज्य प्रदान करें - हिरण्यगर्भ और वैश्वानररूप कार्यब्रह्म की प्राप्ति का बानक बना दें! ' अग्ने नय सुपथा राये ' इस सोलहवें ( काण्व ० १८ ) मन्त्र की व्याख्या का अभिप्राय यह है - ' हे अग्ने! आप सम्पूर्ण कार्यात्मक जगत् को व्याप्त करनेवाले दिव्यदर्शी अभयप्रद हिरण्यगर्भस्वरूप देव हैं । देवयान मार्ग सुपथ है । हम मुक्तिरूप धन के इच्छुक हैं । हमें सुपथ से ले जाकर समुच्चयानुष्ठान से प्राप्य अभीष्ट मुक्तिरूप फल को आप प्राप्त करा दें! दक्षिण पितृयानमार्ग से हम उपराम हो चुके हैं । हमें नहीं चाहिये पुनर्जन्म पर्यवसायी वह धूममार्ग । आप सम्पूर्ण ज्ञान ( उपासना ) और कर्मों को जाननेवाले हैं । कल्याणमार्ग के प्रतिबन्धक दुरितों को दूर कर दें! जिसके फलस्वरूप हम अभीष्ट लोक को प्राप्त कर सकें । हम इस समय आपकी किसी अन्य रीति से सेवा नहीं कर सकते, केवल बार - बार नमस्कार ही निवेदित करते हैं । ' हिरण्मयेन पात्रेण ' इस अन्तिम ( माध्यन्दिनीय ) - सत्रहवें ( का ० ( १५ ) मन्त्र की व्याख्या में सर्वभूतहृदय स्वामिपादने यह रहस्य प्रकाशित किया है कि ज्योतिर्मय मण्डलरूप पात्रसे आदित्यान्तर्गत

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २६ अविनाशी पुरुषरूप सत्य का मुख - शरीर - स्वरूप आच्छादित है । वह प्राण और प्रज्ञाशक्ति से जगत् को व्याप्त कर शरीर में प्रतिष्ठित रहनेवाला और पुरुषाकार होने से ' पुरुष ' कहा जाता है । अन्त में पूर्ववत् ध्यान करे कि ' ऐसा पुरुष मैं हूँ ' । आकाशवत् - व्यापक ब्रह्म ‘ ॐ ' है । ३. परिशिष्टप्रणयन " पयोव्रतं ब्राह्मणस्य यवागू राजन्यस्यामिक्षा वैश्यस्य ", " ब्राह्मणो यजेत ", " अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयीत तमध्यापयीत, एकादश-वर्ष राजन्यं द्वादशवर्षं वैश्यम् ', ' वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत ' ( तै ० ब्रा ० १.१.२.६ ) इत्यादि श्रुतियों के अनुसार जन्मनियन्त्रित वर्ण और वर्ण-नियन्त्रित आश्रम की शास्त्रीय प्रथा है । तदनुसार ही ' ईशा वास्य ' इस प्रथम मन्त्र के ' तेन त्यक्त ेन भुञ्जीथा मा गृध: ' इस अंश की व्याख्या के सन्दर्भ में श्रीस्वामिपाद ने ब्राह्मण का ही सलिङ्ग संन्यास में अधिकार सिद्ध किया है । इस अंश को परिशिष्ट के प्रारम्भ में ग्रथित किया गया है । श्रीवार्तिककार सुरेश्वर के मत को त्रैवर्णिक सलिङ्ग - संन्यासपरक जो महानुभाव मानते हैं, उनके में छह दोषों की प्राप्ति होती है, जिनका दिग्दर्शन टिप्पणी ११८, पृ ० १६३, १६४ में कराया गया है । ' परिशिष्ट ' के अन्त में श्री पूज्यचरणों द्वारा विरचित ' शाङ्कर सिद्धान्त पर किये गये आक्षेपों का समाधान ' नामक ग्रन्थ ( श्रीसंवत् १ ९ ६४ वि ० ) से ' विद्याऽविद्यादि तत्त्वमीमांसा ' द्वितीय निबन्ध भी गुम्फित किया गया ( द्रष्टव्य पृ ० २२२ - २३४ ), जोकि सहृदय और सत्य सहिष्णु प्रामाणिक विचारकों के लिये परमोपयोगी है । ' परिशिष्ट ' के मध्य में ( १ ) ' पूषन्नकर्षे यम! ' इस काण्वशाखीय अतिरिक्त सोलहवें मन्त्र का भाष्य श्रीभगवत्पाद शङ्कर, श्रीसायण और श्रीशङ्करानन्द के अनुसार चित्रित किया गया है ( पृ ० २०१ - २०३ ) । ' मुक्तिकोपनिषत् ' के अनुसार ' ऋग्वेदादि विभाग से शांतिपाठ को यथाक्रम सङ्कलित किया गया है ( पृ ० २०४ ) । ' ईशा वास्योपनिषत् ' से सम्बन्धित शांतिमंत्र ' पूर्णमदः ' का भगवत्पाद आद्य शङ्कराचार्य के अनुसार ( बृ ० उ ० ५. १. १ ) भाष्य भी सानुवाद सङ्कलित किया गया है ( पृ ० २०५-२१६ ) ।

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२७ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् काशाखीय सस्वर पाठ भी यथाक्रम दिया गया है ( पृ ० २१६-२२१ ) । उद्धृत वचनों के अर्थ और स्थल तथा १२३ मार्मिक टिप्पणियों से समलङकृत सानुवाद यह ' वेदार्थ पारिजात ' नामक उपनिषद्भाष्य ' जिज्ञासुओं, भगवदुभक्तों विरक्तों, धर्मशीलों, सन्तों, सद्गृहस्थों और तत्त्वदर्शियों तथा विद्वानों के लिये अनुशीलन करने योग्य है । इस भाष्य में ईशादि मन्त्रों पर श्रीस्वामी दयानन्दजी के अर्थों का अद्भुत दक्षता और प्रामाणिकता से निराकरण किया गया है । बारहवें, तेरहवें और चौदहवें मन्त्रों पर स्वामी श्रीदयानन्द जी के अर्थों को १४ वें मन्त्र की व्याख्या के प्रसङ्ग में पृष्ठ ११३ और ११४ पर एक - साथ उद्धृत कर उनकी निःसरता सिद्ध की गयी है । ४. अभिनन्दन: पूज्य चरणों के हस्तलेख को समझने, समझकर उतारने, भाष्यगत भावों को हृदयङ्गम कर अनुवाद करने और स्थल - स्थल पर परमोपयोगी टिप्पणी गुम्फित करने, स्थलनिर्देश देने और पुनरीक्षणादि में अधिकृत महानुभावों ने पूर्ण सतर्कता का परिचय दिया है । फिर भी ज्ञात - अज्ञात में जो भी त्रुटि रह गयी है, उसका आरोप ग्रन्थकार-स्वामिपाद पर न करें, यह सहृदय विज्ञ पाठकों से अनुरोध है । श्रीहरि-गुरु - करुणा के अमोघ प्रभाव से ही इस प्रकार का दायित्वपूर्ण और दुरूह कार्य सम्पन्न हो सका है । पूज्यचरण अनन्त श्रीविभूषित जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थ जी महाराज ( पुरी ) ने अद्भुत आह्लाद के साथ अनुरोध के अनन्तर ही श्लोकबद्ध ' भूमिका ' रच कर हमें प्रोत्साहित और प्रमुदित किया है । पूज्यवर विरक्तशिरोमणि विद्वद्वर्य परमहंस स्वामी श्रीवामदेवजी महाराज ने ' भाष्यानुवाद ' सम्पन्न कर हमें आह्लादित किया है । श्रद्धेय स्वामी श्री चिन्मयानन्द सरस्वती जी महाराज ने ' परिशिष्ट ' के अन्तिम चरण की ' प्रेस कापी ' सुघटित कर और ' प्रूफ रीडिंग ' में सोत्साह सहयोग समर्पित कर हमें स्निग्ध किया है । श्री पं ० सच्चिदानन्द द्विवेदी जी ने मूल भाष्य की ' प्रेस कापी '

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २८ प्रस्तुत कर हमें प्रसन्न किया है । श्री डा ० शशिधर शर्मा सप्ताचार्य ( चण्डीगढ़ ) ने ' भूमिका ' का हिन्दी अनुवाद और ' श्रीकरपात्राष्टकम् ' रचकर हमें प्रफुल्लित किया है । श्री डा ० नरेन्द्र शर्मा ( मुजफ्फर नगर ) ने ' भूमिका ' और ' श्रीकरपात्राष्टकम् ' का ' आंग्ल- अनुवाद ' प्रस्तुत हमें आह्लादित किया है । श्रीगिरिराज जी ने जिस धृत्युत्साह के साथ कर सुन्दर और यथा संभव शुद्ध मुद्रण प्रस्तुत किया है, वह सराहनीय है । श्रीहनुमानप्रसाद धानुका जी इसी भगवत्प्रदत्त श्रद्धा और उदारता के साथ स्वामिपाद के साहित्य सदा प्रकाशित करते रहें, यह भावना है । आनन्द वेदविद्याकेन्द्र वृन्दावन होली, २०४३ निश्चलानन्द सरस्वती

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श्रीहरिः प्रकाशकीय अनन्त श्रीविभूषित पूज्यपाद प्रातः स्मरणीय स्वामी श्री करपात्री जी महाराज द्वारा लिखित यजुर्वेद संहिता के प्रथम अध्याय का भाष्य विजयदशमी को प्रकाशित हुआ था । उसके बाद अब चालीसवें अध्याय का भाष्य प्रकाशित हो रहा है । यह अन्तिम अध्याय वेदान्त होने से बहुत महत्त्वपूर्ण है । यह ' ईशा वास्योपनिषत् ' से प्रसिद्ध है । इसकी प्रसिद्धि के कारण ही इसे पहले प्रकाशित किया जा रहा है । प्रथम अध्याय जिन - जिन सन्तों -विद्वानों तथा देश के उच्च शिक्षाविदों अधिकारियों के करकमलों में पहुँचा है, उनको अपार हर्ष हुआ है । इससे अत्यन्त प्रभावित होकर पूज्य श्रीस्वामी जी महाराज के अवशिष्ट भाष्य को शीघ्र प्रकाशित करने की सत्प्रेरणा प्राप्त होती रहती है । यह इतना महत्त्वपूर्ण कार्य है जो होना आवश्यक है, परन्तु साथ में यह इतना बड़ा काम है कि भगवान् और पूज्य श्रीस्वामी जी महाराज की कृपा से ही सम्भव है । ईशावास्योपनिषत् भाष्य का हिन्दी अनुवाद विरक्त शिरोमणि विद्वद्वर्य पूज्य श्रीस्वामी वामदेवजी महाराज की अहैतुकी कृपा से सम्पन्न हुआ है । पूज्य श्रीस्वामी निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज ने सभी तरह से बहुत तत्पर रहकर इस प्रकाशन कार्य को पूर्ण किया है । इस भाष्य की भूमिका लेखक के रूप में, हिन्दी अनुवाद के रूप में, समय - समय पर उचित परामर्श दाता के रूप में, प्रूफ पुनरीक्षण कर्ता के रूप में, प्रेस कापी तैयार करने वाले के रूप में. अनुच्छेद साधक ( पैराग्राफ निर्धारक ) के रूप में और प्रकाशन सम्बन्धी सभी साज - सज्जाओं को तैयारकर इस अमूल्य ग्रन्थरत्न को सबके सम्मुख