वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 121–130

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 121–130

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८८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् विरोधश्च । तत्र विद्यायाः पुरुषार्थहेतुत्वात् अग्नीन्धनाद्याश्रमकर्मणा विद्यया स्वार्थसिद्धौ नापेक्षितव्यानि । तस्मात्कर्माविरुद्धदेवताज्ञानस्यै-ara समुच्चयो विधित्स्यते । न च देवताज्ञानस्य कर्मफलातिरिक्तफलाभावात् समुच्चयो न संभवतीति वाच्यम्, ' विद्यया देवलोक ' ( बृ ० उ ० १.५.१६ ) इति पृथ-क्फलश्रवणात् । ननु समुच्चिचीषया निन्देति किमिति व्याख्यायते, अध्ययनविधेर्मोक्षादर्वा पर्यवसानानुपपत्ते देवलोकादिप्राप्तेः फला-भासत्वात्प्रहाणार्थेव निन्दास्यादितिचेन्न, पृथक्फलश्रवणेन शास्त्रविहि-तस्या कर्तव्यतानुपपत्तेः प्रहाणार्थानिन्दानुपपत्त्या समुच्चिचीषयैव तत्सं-भवात् । न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुमिति न्यायात्, ' विद्यया देवलोकः कर्मणा पितृलोक ' ( बृ ० उ ० १.५.१६ ) इत्यु-भयोः कर्मदेवतोपासनयोः फलश्रवणम् । " प्रधानभूत ब्रह्मविद्या का अपने किसी सहकारी के साथ सम्बन्ध के विधान की इच्छा ( तात्पर्य ) से ही निन्दा का कथन है, ' " " यह कथन भी उचित नहीं, क्योंकि इस कथन का " अग्नीन्धनादि " इस सूत्र से विरोध है । सूत्र में यह वर्णन किया है कि विद्या पुरुषार्थ का हेतु हैं । विद्या से पुरुष के स्वार्थ ( मोक्ष ) की सिद्धि हो जाने पर कर्म अपेक्षित ही नहीं; अतः कर्म से जिस विद्या ( देवोपासना ) से विरोध नहीं, उसी देवोपासनारूपविद्या का कर्म के साथ समुच्चय का विधान किया है । " स्वतन्त्र फलवालों का समुच्चय होता है, देवता की उपासना-रूपविद्या का कर्म के फल से अतिरिक्त कोई फल है नहीं; अतः देवोपा-सना का कर्म के साथ समुच्चय भी सम्भव नहीं ", ऐसा कथन भी उचित नहीं । क्योंकि " विद्या ( देवोपासना ) से देवलोक प्राप्त होता है " इस श्रुति ने देवोपासना का देवलोक की प्राप्तिरूप कर्मसे पृथक् फल कथन किया है । " अध्ययन विधि की मोक्ष से पूर्व विराम का असंभव होने से देवलोकादि की प्राप्ति फल नहीं फलाभास है; अतः साधनभूत देवोपासना के त्याग के लिये ही निन्दा है ", यह कथन भी उचित नहीं । क्योंकि देवोपासना का देवलोक की प्राप्ति रूप ब्रह्मविद्या से पृथक् फल का वर्णन किया है; अतः फल से युक्त शास्त्र से विहित

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ८ अन्धं तमः अज्ञानलक्षणं तमः ते प्रविशन्ति येऽविद्या स्वर्गाद्यर्थानि कर्माणि तामविद्यां अग्निहोत्रादिलक्षणामेव केवलामुपासते, तत्पराः सन्तोऽनुतिष्ठन्ति । ततस्तस्मादन्धात्मकात्तमसो भूय इव तमः बहुतर-मेव ते तमः प्रविशन्ति य उ ये अशुद्धचित्ता अपि कर्म हित्वा विद्यायामेव देवताज्ञान एव रताः कर्माधिकारे सत्यपि कर्मपरित्यागेन प्रत्यवायरूप-दोषयुक्ताः सन्तः । ये कर्म कुर्वन्ति ते तु स्वर्गादिकं प्राप्नुवन्ति । स्वर्गादि-कञ्चाज्ञान कार्यत्वाद् ब्रह्मज्ञानफलापेक्षयाऽन्धं तम एव । ये तु कर्माणि परित्यज्य केवलायां विद्यायां रतास्तेषां कर्माण्यन्तरा बुद्धिशुद्ध भावेन देवोपासना के अनुष्ठान की अकर्तव्यता नहीं कही जा सकती । इस तरह देवोपासना के परित्याग के लिये नहीं; अपि तु समुच्चय की इच्छा से ही निन्दा है । क्योंकि “ निन्दा निन्दनीय की निन्दा के लिये नहीं, अपितु विधेय की स्तुति के लिये होती है " यह नियम है । " विद्या से देवलोक ", " कर्म पितृलोक " प्राप्त होता है । इस प्रकार शास्त्र में कर्म तथा उपासना का पृथक् - पृथक् फल का श्रवण है; अतः योग्यतानुसार इन दोनों के समुच्चय का ही वर्णन है । अन्ध - गाढ़, तम = अज्ञान, को वे लोग प्राप्त होते हैं, जो विद्या ( कर्म ) का अनुष्ठान करते हैं । ' अविद्या ' शब्द का अर्थ यहां कर्म है, जो कि स्वर्गादि की प्राप्ति के लिये किये जाते हैं । उस अग्नि होत्रादि कर्मरूप अविद्या की ही जो उपासना करते हैं अर्थात् उसी मे तत्पर होकर अनुष्ठान करते हैं, वे गाढ़ तम को प्राप्त करते हैं । उर गाढ़ अज्ञानरूप तम से भी अधिक तम ( अज्ञान ) को वे लोग प्राप्त करते हैं, जो अशुद्ध चित्तवाले होकर भी कर्म का परित्याग कर, विद्य = देवतोपासना में ही रत हैं । कर्म में अधिकार होते हुए भी कर्म क परित्याग करने से प्रत्यवाय ( पाप ) रूप दोष से युक्त होते हुए भ केवल देवतोपासना में रत रहना, ऐसे कर्माधिकारियों के लिये उचित नहीं । भाव यह है कि जो कर्म करते हैं, वे स्वर्गादिकफल को प्राप्त होते हैं । स्वर्गादिक भी अज्ञान का कार्य होने से ब्रह्मज्ञान से प्राप्त फह की अपेक्षा गाढ़तम अज्ञान ही हैं । जो कर्मों का परित्याग कर केवल विद्या में रत हैं, बुद्धि - शुद्धि के अभाव के कारण देवतोपासना में भ उनकी स्थिति असंभव है । उभय ( दोनों ओर से ) भ्रष्ट होने से पूर्वोक्त

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६० ] विद्यायां प्रविशन्ति ४ वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् स्थित्यसम्भवेनोभय भ्रष्टत्वेन ततोप्यधिकमन्धन्तमः अन्धं तमः अज्ञानलक्षणं तमः ते प्रविशन्ति येऽविद्यां स्वर्गाद्य-र्थानि कर्माणि उपासतेऽनुतिष्ठन्ति । अत्र पर्युदासार्थ को नञ । पर्युदासस्तु स्वर्गादिरूप कर्मफल की अपेक्षा अधिक अज्ञानरूप तम को वे प्राप्त हैं । " येऽविद्यामुपासते " यहाँ अविद्या शब्द में पर्युदास अर्थवाला न शब्द है । पर्युदास का अर्थ होता है, “ उससे भिन्न होता हुआ उस के सदृश ”; अतः यहाँ नञ्च का अर्थ विद्या से भिन्न विद्या के सदृश है । ४६. जो ज्ञाननिष्ठा के अधिकार से अभी विभूषित नहीं, न ज्ञाननिष्ठा के करीब ( निकट ) ही हैं; बल्कि जीवन और जीवनोपयोगी वस्तुओं में रागान्वित हैं, वे योग्यता विरहवशात् शुद्धब्रह्मात्म-तत्त्व के एकत्वबोध के अनुपयुक्त हैं । शास्त्रोक्त विधि - निषेधानु-सार अनुष्ठितकर्म कालान्तरफलप्रद हैं । ज्ञान तत्कालफलप्रद है । अज्ञानावरणवारणपूर्वक निरावरण ब्रह्मात्मभाव के अभि-व्यञ्जनरूप फल को प्रदान करने के लिये ज्ञान को कर्मादि के योग की अपेक्षा नहीं । ऐसी स्थिति में मन्त्र में प्रयुक्त ' अविद्या ' स्वर्गादि अभीष्ट फलप्रद कर्म का और ' विद्या ' देवतोपासना का वाचक है । दोनों का विवक्षित योग ऐसा अर्थ स्वीकार करने पर ही संभव है । कर्म और विद्या का क्रमशः पितृलोक और देवलोकरूप पृथक् फल श्रुत होने पर भी कर्म की अपेक्षा न कर केवल देवताराधन कर्माधिकारी द्वारा अविचलभाव से सध पाना कठिन है । साथ ही देवतोपासना से विमुख रहकर केवल कर्मानुष्ठान से अन्तर्यामी और अधिदैवमण्डल के प्रति महत्त्व -बुद्धि की न्यूनता के कारण अभीष्टवस्तु की उपलब्धि में प्रति-बन्ध की द्रुतनिवृत्ति और निष्कामभाव से कर्मानुष्ठानपूर्वक मोक्ष के प्रति अभिरुचि और मनोवृत्ति असंभव है । इसीलिये यहाँ केवल कर्म और केवल ज्ञान की निन्दा दोनों के समुच्चय की भावना से प्रयुक्त है ।

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ११ तद्भिन्नत्वे सति तत्सदृशः । विद्याऽत्रदेवोपासना विवक्षिता कर्माणि च वेदविहितत्वे विद्यासदृशानि । विद्याभिन्नाऽविद्यापदेनोच्यते -" द्वौ न च समाख्यातौ पर्युदासप्रसज्यकौ । पर्युदासः सहग्ग्राही प्रसज्यस्तु निषेधकृत् ॥ " इत्युक्त ेः । यद्वा - यथा ब्राह्मणादन्ये क्षत्रियादय अब्राह्मणशब्देनाख्यायन्ते तथैव विद्याया अन्यानि कर्माणि अविद्यापदेनोच्यन्ते “ ५ ° तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्च नार्थाः षट् प्रकीर्तिताः ॥ " इत्यभियुक्तवचनात् । विद्या यहाँ देवोपासना है । कर्म वेद से विहित होने के कारण देवोपा-सना के सदृश है; क्योंकि देवोपासना भी वेदविहित है तथा विद्या से भिन्न भी है, अतः कर्म अविद्याशब्द के वाच्य हैं- अविद्या शब्द से कहे जाते हैं । ' नन ' शब्द दो प्रकार के कहे गये हैं । दो प्रकार ये हैं - ( १ ) पर्युदास ( २ ) प्रसज्य । पर्युदास सदृशग्राही को कहते हैं । निषेध करनेवाले को ‘ प्रसज्यक ' कहते हैं । अथवा – जैसे ब्राह्मण अतिरिक्त क्षत्रिय आदिक अब्राह्मण शब्द से कहे जाते हैं, उसी प्रकार विद्या से अतिरिक्त कर्म भी अविद्या पद से कहे जाते हैं । सादृश्य, अभाव, भिन्नता, षट् - अर्थ नञ्ञ के कहे गये हैं । अल्पता, अश्रेष्ठता और विरोध ये ५०. इनके क्रमशः उदाहरण हैं - ( १ ) अब्राह्मण:, ( २ ) अपापम्, ( ३ ) अघट:, ( ४ ) अनुदरा कन्या, ( ५ ) अकेशा:, ( ६ ) अधर्म:, असुरः ।

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६२ ] वेदार्थ पारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अ॒न्यदे॒वाहुवि॑द्याया॑ अ॒न्यदाहुरवि॑िद्यायाः इति शुश्रुम धीराणा ये नस्तद्विचचचिरे ॥१३ ॥

विद्या और अविद्या ( देवतोपासना और कर्म ) का अवान्तरफल -भेद दोनों के समुच्चय का कारण है । ' विद्यया देवलोकः ', ' कर्मणा पितृलोक: ' = ' विद्या से देवलोक ' और ' कर्म से पितृलोक ' इस बृहदा-रण्यक ( १.५.१६ ) के अनुसार यह सिद्ध है कि विद्या और कर्म ( अविद्या ) का अवान्तर फलभेद है । समुच्चय - विधान के अनन्तर सत्परम्पराप्राप्त अवान्तर फलभेद का मन्त्र वर्णन करता है-विद्या से मिलनेवाला फल अन्य ही है और अविद्या से मिलने-वाला फल अन्य ही है । ऐसा हमने उन विद्वानों से श्रवण किया है, जिन्होंने हमारे प्रति उसका व्याख्यान किया है ॥१३ ॥

तत्रावान्तरफलभेदं विद्याकर्मणोः समुच्चयकारणमाह- अन्यथा ‘ फलवत्सन्निधावफलं तदङ्गमि ' तिन्यायेन फलवदफलवतोः सन्निहितयो-रङ्गाङ्गितैवस्यात् । अन्यत्पृथगेव विद्यया क्रियते फलम् ' विद्यया देवलोकः ' ( बृह ० १.५.१६ ), ' विद्यया तदा रोहन्ती ' तिश्रुतेः । अन्यदाहु-विद्या तथा कर्म के समुच्चय का कारण जो अवान्तर फलभेद है, मन्त्र उसको कहता है- अवान्तर फलभेद को न कहने पर तो विद्या तथा कर्म का अङ्गाङ्गी भाव ही होता, समुच्चय नहीं हो सकता था । क्योंकि " फलवाले के समीप अफलवाले का कथन हो तो फल से रहित साधन फलवाले का अङ्ग होता है " इस न्याय ( नियम ) के अनुसार समीप में पठित फलवाले तथा अफल ( फल से शून्य ) का अङ्गाङ्गीभाव ५१. पाठा ० - विद्याया अन्यत्- विद्ययाऽन्यत्, अविद्यायाः - अविद्यया ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ 23 विद्यया कर्मणा अन्यदेवफलं क्रियते ' कर्मणा ५१ पितृलोक ' ( बृह ० १.५. १६ ) इतिश्रुतेः । इति वयं धीराणां धीमतां वचनं शुश्रुम श्रुतवन्तः । य आचार्या नो s स्मभ्यं तत्कर्म च ज्ञानञ्च विचचक्षिरे व्याख्यातवन्तस्तेषा-मयमागमः पारम्पर्यागतः || १३ ||

विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभय " सह ।

विद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥१४ ॥

afar शब्द से अग्निहोत्रादिकर्म कहे गये हैं । उनके अनुष्ठान से स्वाभाविक काम - कर्म और ज्ञान जो मृत्यु शब्द के वाच्य हैं, उनको पार करके देवता के ज्ञान ( उपासना ) से देवभावरूप अमृत को प्राप्त हो जाता है । यह सम - समुच्चय की दृष्टि से अर्थ है । जब विद्या का ही होता है, न कि समुच्चय । “ विद्या से देवलोक प्राप्त होता है " इस श्रुतिवाक्य के अनुसार विद्या से अतिरिक्त ही फल मिलता है । अन्य वाक्य भी कहता है कि ' विद्या से ही देवलोक पर आरूढ़ होते हैं अर्थात् पहुँचते हैं । ' अविद्याभूतकर्म से भिन्न फल किया जाता है । क्योंकि श्रुति कहती है कि " कर्म से पितृलोक प्राप्त होता है । " बुद्धिमानों का यह विद्या तथा अविद्या के फलों का विवेचन करने वाला वचन हमने श्रवण किया । जिन आचार्यों ने हमारे लिये ज्ञान और कर्म का व्याख्यान किया है, उनका यह आगम है, यह परम्परा से प्राप्त है ॥१३ ॥

५२. “ विद्यया तदारोहन्ति यत्र कामाः परागताः । न तत्र दक्षिणा यान्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः ॥ " " विद्या ( उपासना ) के द्वारा ब्रह्मलोक में आरूढ़ होते हैं, जहाँ पर कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं । केवल कर्मपरायण, अविद्वान् और तपस्विगण नहीं जाते । ”

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६४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अर्थ ब्रह्मात्मज्ञान मान्य हो तब क्रम - समुच्चय की दृष्टि से पहले कर्मानुष्ठान से अन्तःकरण की शुद्धि और फिर ब्रह्मात्मज्ञान से मोक्षो -पलब्धिरूप फल मान्य है || १४ || यतएवमतो विद्यां चाविद्यां च देवताज्ञानं कर्म च यस्तदेतदुभयं सहैकेन पुरुषेणानुष्ठेयं वेदोपासते, तस्यैव समुच्चयकारिणः एवैक पुरु-षार्थसम्बन्धः क्रमेण स्यात् । स अविद्यया कर्मणाऽग्निहोत्रादिना मृत्यु स्वाभाविकं कामकर्मज्ञानञ्च मृत्युशब्दवाच्यं तीर्त्वाऽतिक्रम्य विद्यया देवताज्ञानेनामृतं देवतात्मभावमश्नुते । देवात्मभावगमनमेवात्रामृतं-' तद्धयमृतमुच्यते यद्देवतात्मगमनमि ' ति श्रुतेः । उवटस्तु " विद्यामात्मज्ञानमविद्यां कर्म च यस्तदुभयं सहैकीभूतं कर्मकाण्ड ज्ञानकाण्डस्य गुणभूतं वेद - विजानाति, स अविद्यया कर्म-काण्डेन मृत्युं तीर्त्वात्तीर्य कृतकृत्यो भूत्वा विद्यया ब्रह्म परिज्ञानेनामृतं मोक्षमश्नुते प्राप्नोति । " तदपि समकालसमुच्चयविरोधेऽपि क्रमसमु-च्चयपक्षे नासङ्गतम् । क्योंकि ये दोनों भिन्न फलवाले हैं, अतः देवोपासना तथा कर्म उन दोनों को एक पुरुष के द्वारा अनुष्ठान करने के योग्य जानता है । तथा करता है । इनके समुच्चय का अनुष्ठान करनेवाले को क्रम से एक पुरुषार्थ सम्बन्ध हो जाता है । वह अविद्या श द से अग्नि-होतादि कर्म कहे गये हैं । उनके अनुष्ठान से स्वाभाविक काम कर्म तथा ज्ञान जो मृत्युशब्द के वाच्य हैं, उनको पार करके देवता के ज्ञान ( उपासन ) से देवभाव रूप अमृत को प्राप्त हो जाता है । यहाँ देवभाव को प्राप्त होना ही अमृतशब्द का वाच्य है, क्योंकि श्रुति स्वयं कह रही है कि यहाँ अमृत वही है जो देवरूप हो जाना है । उवट आचार्य तो कहते हैं कि - " विद्या - आत्मज्ञान तथा कर्म ' = दोनों को एकीभूत जानता है, अर्थात् कर्मकाण्ड को ज्ञानकाण्ड का गुणभूत जानता है, वह कर्मकाण्ड से मृत्यु को अतिक्रमण करके कृतकृत्य होकर अर्थात् कर्म के अधिकार को समाप्त कर विद्या = ब्रह्मज्ञान । " यह अर्थ समसमुच्चय पक्ष में से अमृत ( मोक्ष ) को प्राप्त हो जाता है विरुद्ध होने पर भी क्रमसमुच्चय पक्ष में असंगत नहीं है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ६५ कावखायां - विद्याऽविद्यासमुच्चयानन्तरं व्याकृताव्याकृतो-पासनसमुच्चय उक्तः, शांकरभाष्यन्तु काण्वशाखीयोपनिषदि दृश्यते । सायणाचार्या अपि काण्वशाखीये भाष्ये श्रीभगवत्पादमेवानुसरन्ति । श्रीशङ्करानन्दस्वामिनस्तु ये धनाभिलाषिणः, अन्धं तमः अहंममाभिमानलक्षणं प्रविशन्ति येऽविद्यां कर्मविधिनिष्पाद्य ज्योति-ष्टोमादि उपासते तदेकनिष्ठाः सन्तो विद्यामनुतिष्ठन्ति । नतु तह-त्याज्यं कर्मोपास्याश्च देवता अथवाऽहं ब्रह्मास्मीतिवक्तव्यमित्यत आह- ततस्तस्माद्भूयइवाधिकमिव ते देवतोपासका मुखतो ब्रह्मवादि-नो वानुत्पन्नसाक्षात्काराः कर्मत्यागिनस्तमोऽहंममाभिमानरूपं प्रवि शन्ति य उ ये तु विद्यायां देवताज्ञाने आत्मज्ञाने वा रतास्तदेकनिष्ठाः । काण्वशाखा की ईशावास्य उपनिषद् में विद्या तथा अविद्या के समुच्चय के कथन के अनन्तर व्याकृत तथा अव्याकृत की उपासनाओं का समुच्चय कहा है । शाङ्करभाष्य तो काण्वशाखा की उपनिषद् पर ही देखा जाता है, सायणाचार्य भी काण्वशाखा के भाष्य के विषय में श्रीभगवत्पाद ( शंकराचार्य ) का ही अनुसरण करते हैं । श्रीशङ्करानन्द स्वामी तो कहते हैं कि जो धन के अभिलाषी, अविद्या - कर्म के विधान से अनुष्ठान के योग्य ज्योतिष्टोमादिका उनमें निष्ठावान् हुए अनुष्ठान करते हैं, वे " अन्ध तम " - अहंता - मम-तारूपाभिमानरूप गाढ़ अन्धकार ( अज्ञान ) को प्राप्त होते हैं । प्रश्न - तब तो कर्म त्याज्य है तथा देवताओं की उपासना करनी चाहिये अथवा " अहं ब्रह्मास्मि " - मैं ब्रह्म हूँ, ऐसा कहना चाहिये । उत्तर - कर्म के अनुष्ठान से प्राप्त तम ( अज्ञान ) से भी अधिक - जैसा तम को वे लोग प्राप्त होते हैं जो विद्या - देवता की उपासना अथवा ब्रह्मज्ञान में रत हैं, अर्थात् जिन्होंने कर्म का परित्याग कर दिया है, ब्रह्म के अपरोक्षज्ञान से रहित हैं, मुख से ही ब्रह्म कहते हैं तथा देवताओं के उपासक हैं । शंका - कर्म तथा ज्ञान दोनों की मन्त्र में निन्दा होने पर तो दोनों ही निष्फल सिद्ध होते हैं ।

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६६ ] पारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ननु - उभयोनिन्दायामुभयमप्यफलमित्यत आह- अन्यदेवेति । कर्मणः फलात् पितृयाणलक्षणात् पृथगेव देवयानलक्षणमात्मप्राप्ति-लक्षणं वा विद्यायाः फलम् । अन्यच्छब्देन सफलत्वमेवशब्देन चाङ्गाङ्गि-भावनिषेधः । विद्यया देवताज्ञानेनाऽऽत्मज्ञानेन वाऽन्यविद्याफलात्पृथ-भूतन् । अत्रैवकाराभावादात्मज्ञानोत्पादकत्वमपि कर्मणामवगम्यते । आहुः कथयन्त्यविद्यया द्वितीयमन्त्रोक्त ेन कर्मणा अन्यत्फलमिति । न चात्राङ्गाङ्गिभावोऽपि शंकनीयः, अन्यदन्यच्च तदित्यनेन प्रकारेण शुश्रुम श्रुतवन्तः मन्त्रद्रष्टुरिदं वाक्यम् । धीराणां पूर्वोत्तरतन्त्रन्यायकुश-लानां विदुषां वेदविदां ये गुरवः नोऽस्मभ्यमेतद्ब्रह्मकर्मसहितं विचच-क्षिरे व्याख्यातवन्तः । एवं पक्षद्वयमभिधाय देवताज्ञानस्य शाब्दस्य वा ब्रह्मज्ञानस्य कर्मणा सह समुच्चयमाह विद्यां देवताज्ञानं केवलं ब्रह्मज्ञानं वा, अविद्यां द्वितीय - मन्त्रोक्तानि कर्माणि वा चकारावुपायोपेयभावेन समुच्चयार्थी, यः संजातवैराग्यः कर्मपरित्यक्तुमशक्तोऽन्तरालावस्थः तत्कर्म ज्ञानञ्च, उत्तर- ' कर्म के फल पितृयान से पृथक् ही देवयानरूप अथवा आत्मा की प्राप्तिरूप फल, देवोपासना अथवा आत्मज्ञान से प्राप्त होता है ' ऐसा वेदज्ञ विद्वान् कहते हैं । मन्त्र में, ' अन्य ' शब्द से दोनों की सफलता तथा ' एव ' से अङ्गाङ्गिभाव का निषेध किया है । द्वितीय मन्त्र में कहा जो कर्म उस कर्मरूपी अविद्या से भी विद्या के फल से अन्य फल की प्राप्ति वेदज्ञ पुरुष कहते हैं । कर्म के फल के वर्णन करने वाले मन्त्र के भाग में ' अन्यत् ' शब्द के साथ ' एव ' कार शब्द नहीं है; अतः सिद्ध होता है कि कर्मों का फल आत्मज्ञान की उत्पत्ति भी है । कर्म तथा विद्या फल से अन्य - अन्य हैं, अतः अङ्गाङ्गिभाव की भी शंका नहीं है । मन्त्र द्रष्टा ऋषि ऐसा कहते हैं, ऐसा हमने सुना है । पूर्वोत्तरमीमांसा के सहित वेदों के ज्ञाता धीरपुरुष जिन गुरुओं ने हमारे प्रति कर्मसहित ब्रह्म की व्याख्या की है, उनसे सुना है । पूर्वोक्त प्रकार से कर्म तथा विद्या इन दोनों पक्षों को कहकर देवता ज्ञान ( उपासना ) तथा शब्द से उत्पन्न अपरोक्ष ब्रह्मज्ञान का कर्म के साथ समुच्चय कहता है - विद्या = देवोपासना अथवा अपरोक्ष ब्रह्मज्ञान है । अविद्या द्वितीयमन्त्रों में कहे हुए कर्मों को कहा गया है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.स. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ६७ वेद जानाति । उभयमुक्तमुपायो पेयभावेन सह कर्मोपायो ब्रह्मज्ञानमुपेय-मिति मिलितम् । एवमुपायोपेय ज्ञानवतः फलमाह - अविद्यया द्वितीय मन्त्रोक्त ेन कर्मज्ञानेन संयोगपृथक्त्वन्यायेन, मृत्युमात्मज्ञानोत्पादप्रति-बन्धकं स्वाभाविकं कर्मज्ञानं च दुःखकारणं तीर्त्वाऽऽत्मज्ञानोत्पादेनाति-क्रम्य, विद्ययाऽहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारेणामृतं ब्रह्मात्मत्वमश्नुते व्याप्नोति स एव भवतीत्यर्थः ॥ ५३ यदा तु ज्ञानकर्मणोरेव समुच्चयो न तु तज्ज्ञानयोस्तदोपायोपेथ-शब्दौ विहायात्मज्ञानस्थले च देवताज्ञानशब्द पठित्वा " आभूतसम्प्लवं जो वैराग्यवान्, परन्तु कर्मों के त्यागने में असमर्थ मध्य अवस्था में स्थित पुरुष, कर्म तथा ज्ञान को उपायोपेयभाव से जानता है कि कर्म उपाय ( साधन ) है, ब्रह्मज्ञान उपेय ( साध्य ) है । ऐसे ज्ञानवाले पुरुष को मन्त्रद्रष्टा फल बतलाता है- अविद्या अर्थात् द्वितीयमन्त्र में कहे कर्म मृत्यु ( आत्मज्ञान की उत्पत्ति के प्रतिबन्धक स्वाभाविक कर्म - ज्ञान ) को आत्मज्ञान की उत्पत्ति से अतिक्रमण कर विद्या ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस ब्रह्म के अपरोक्ष ज्ञान से अमृत = ब्रह्म से अभिन्नात्मतत्त्व को प्राप्त करता है, अर्थात् ब्रह्मात्मरूप ही हो जाता है । जब ज्ञान और कर्म का सम - समु-उच्च प्राप्त हो तब अविद्यारूप कर्म का फल स्वाभाविक कर्म - ज्ञान से संतरण और विद्यारूप देवतोपासना का फल भूतविलयपर्यन्त स्थिर ५३. यह क्रम - समुच्चय की दृष्टि है । इसमें अविद्या का अर्थ कर्म और विद्या का अर्थ आत्मज्ञान मान्य है । कर्मयोग अन्तःकरण को संस्कृत कर आत्मा के अकर्तृत्व - अभोक्तृत्व का बोध करा देता है - आत्मा के अकर्तृत्व - अभोक्तृत्व के बोध की सहिष्णुता अभिव्यक्त करता है । जिससे स्वाभाविक काम ( विषयेच्छा ), कर्म ( कर्तृत्व- भोक्तृत्व पूर्वक प्रवृत्ति ) और ज्ञान - ( साध्य - साधना-नुसन्धानपूर्वक द्वतस्फुरण ) रूप मृत्यु का अतिक्रमण हो जाता है और ब्रह्मात्मज्ञान के अमोघ प्रभाव से कर्तृत्व - भोक्तृत्वादि-शून्य आत्मा ( त्वं पद लक्ष्यार्थरूप शोधित अहमर्थ ) की ब्रह्म-रूपता के बोध से अमृत - ब्रह्मात्मरूप से अवस्थितिरूपा मुक्ति की उपलब्धि होती है ।