वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 131–140
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 131–140
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६८ ] वेदार्थपारिजात ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् स्थानममृतत्वं हि भाष्यते " ( विष्णु ० पु ० २.८.६६ ) इति न्यायेनामृतं ब्रह्मलोकपर्यन्तमिति ५४ व्याकुर्यात् । ५५ अन्ये तु पाठक्रमादर्थक्रमो बलीयानिति कर्माऽऽत्मज्ञानञ्च पूर्वापराधिकारभेदेन सहैकपुरुष कर्तव्यत्वेन समुच्चितं यो वेद सोऽवि-या कर्मणोपासना s पि मानसं कर्मैव, मृत्युं स्वरूपविस्मरणहेतुं चित्तमलमनैकाग्रयं तीर्त्वाऽतिक्रम्य, विद्ययाऽऽत्मज्ञानेनामृतं मोक्षमश्नुते " तमेवविदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय " ( वा. सं. ३१. १८, श्वेता ० ३.८ ) इति श्रुतेः । रहनेवाले ( पंचभूतों की अवधि तक नाश न होनेवाले ) ब्रह्मादि लोकों प्राप्ति मान्य है । अन्य आचार्य तो यह कहते हैं कि - पाठ के क्रम से अर्थ का क्रम बलवान् होता है । पहिले कर्माधिकार पश्चात् कर्म से अन्तःकरण शुद्ध होने पर ज्ञानाधिकार । इस प्रकार पूर्वाधिकार तथा अपर अधि-५४. यह सम - समुच्चय की दृष्टि है । इसमें विद्या ( ज्ञान ) का अर्थ देवतोपासना है । कर्म का अर्थ है स्व - अधिकारानुसारप्राप्त अग्निहोत्रादि कर्म । दोनों के सहानुष्ठान से अविद्यारूप कर्म द्वारा स्वाभाविक कर्म - ज्ञानरूप मृत्यु की निवृत्ति और विद्या-रूप देवोपासना से देवलोक से ब्रह्मलोकपर्यन्त दिव्यलोकों की प्राप्ति होती है । प्रलय से भूतलयरूप महाप्रलयपर्यन्त दिव्य लोकों की प्राप्ति आपेक्षिक अमृतत्व है । इस प्रकार उपनिषद् शब्द में प्रयुक्त सद्धातु का विशरण ( हिंसन, निवारण ) और गतिरूप अर्थद्वय उक्त क्रमसमुच्चय में अविद्या निवृत्ति और उससे उपलक्षित तत्त्वोपलब्धि के कारण चरितार्थ होता है । सम - समुच्चय में पुनः पुनः जन्म - मृत्यु - जरा - व्याधिरूप क्लेश का अवसादन ( शिथलीकरण ) हो जाता है । इस तरह सदूधातु का अवसादन- अर्थ चरितार्थ हो जाता है । ५५. ईशावास्य रहस्य विवृति के अनुसार यह दिग्दर्शन है ।
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वैदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ εε ५६ माण्डूक्य कारिकाभाष्ये क्रमसमुच्चय उक्तः । तत्र अविद्यया कर्मोपासनसमुच्चयानुष्ठानेन मृत्युमनैश्वर्यादिकमंश्वर्यादिप्राप्त्याऽति-क्रम्य पश्चात् विद्यया ब्रह्मात्मसाक्षात्कारेणामृतमश्नुते । कार के भेद से एक पुरुष को ही कर्तव्यरूप से प्राप्त कर्म तथा ज्ञान के समुच्चय को जो जानता है, वह अविद्या = कर्म, इस अविद्याशब्द से कर्म तथा उपासना दोनों का ग्रहण है, क्योंकि उपासना भी मानसकर्म ही है । अत: कर्म तथा उपासनारूप अविद्या से मृत्यु = स्वरूप के विस्मरण का कारण जो चित्त का मल = अशुद्धिरूप दोष तथा विक्षेप का अतिक्रमण करके विद्या = आत्मज्ञान से अमृत = मोक्ष को प्राप्त हो जाता है । क्योंकि " तमेव विदित्वा " यह श्रुति ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति कह रही है । ५६. शा ० भाष्य - एषणालक्षणादविद्याया मृत्योरतितीर्णस्य विर-क्तस्योपनिषच्छास्त्रार्थालोचनपरस्य नान्तरीयकी परमात्मैकत्व-विद्योत्पत्तिरिति पूर्वभाविनी मविद्यामपेक्ष्य पश्चाद्भाविनी ब्रह्मविद्याऽमृतत्वसाधनैकेन पुरुषेण सम्बध्यमानाऽविद्यया समुच्चीयत इत्युच्यते । आ ० टीका - कामचारकामवादकामभक्षणादिलक्षणस्वाभाविक-प्रवृत्तिरूपाशुद्धिवियोग: संस्कारो यथा नित्याग्निहोत्रादिफलं तथा निष्कामेनानुष्ठितसमुच्चयफलं कामाख्याशुद्धिव्यावृत्ति-रित्यर्थः 1 । ( ३.२५ ) भावार्थ - साध्य - साधन की कामना मृत्यु है । इस मृत्यु से पार व्यक्ति ब्रह्मविद्या अधिकारी है । पहले नित्यकर्मरूप अविद्या का आलम्बन लेने से व्यक्ति का अन्तःकरण शुद्ध होता है । कामचार, कामवाद, कामभक्षण आदि स्वाभाविक प्रवृत्ति अशुद्ध है | भगवदर्थ निष्कामभाव से स्वकर्मानुष्ठान से अन्तःकरण संस्कृत होता है । फिर ब्रह्मविद्या की उपलब्धि से जीव का परमकल्याण होता है । यह क्रम समुच्चय है । ज्ञानो तर कर्म अकर्म हो जाता है, अतः कर्मोत्तर ज्ञान का अधिकार प्राप्त है ।
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१०० ] न च -वेदार्थ पारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्
५७८८ " आत्माज्ञातव्य " इत्येतन्मोक्षार्थं न च चोदितम् ।
कर्म प्रवृत्तिहेतुत्वमात्मज्ञानस्य लक्ष्यते ॥
विज्ञाते चास्य पारार्थ्ये याऽपि नाम फलश्रुतिः । सार्थवादो भवेदेव न स्वर्गादेः फलान्तरम् ॥ " ( श्लोकवातिके सम्बन्धाक्षेपे परिहारः १०३, १०४ ) ५ इति भट्टपादरीत्या देहव्यतिरिक्तात्मविज्ञानस्य कर्मप्रवृत्त्यु-पयोगित्वेनाशनायाद्यतीत ब्रह्मात्मविज्ञानस्य तच्छेषत्वानुपपत्त्या कर्मा-f धकारविरोधेऽप्याज्यावेक्षण ब्रीहिप्रोक्षणादिवद दृष्टद्वारेणोपयोगः, न चा-धिकारविरोधः, तथाभूतविदामपि यमनियमादौ प्रवृत्तिवत् कर्मप्रवृत्त्य-माण्डूक्यकारिका के भाष्य में क्रम समुच्चय कहा है । उसके अनुसार कर्मोपासना के समुच्चय के अनुष्ठानरूप अविद्या से ऐश्वर्यादि की प्राप्ति से अनैश्वर्य, अधर्मादि का अतिक्रमण करके पश्चात् विद्या ( ब्रह्मात्मसाक्षात्कार ) से मोक्ष को प्राप्त हो जाता है । शङ्का - " आत्मा ज्ञातव्यः ", ' आत्मा को जानना चाहिये ' इस श्रुति में मोक्ष के लिये ज्ञान का विधान है, कर्म की प्रवृत्ति का कारण-भूत जो आत्मा का ज्ञान, इस वाक्य से विहित नहीं है, ऐसा नहीं मानना चाहिए । इस वाक्य से कर्म की प्रवृत्ति का हेतुभूत ज्ञान बोधन किया गया है । क्योंकि -५७. ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' ( बृह ० २.४.५ ), ' आत्मान्वेष्टव्यः ' ( छा ० ८.७.३ ), ' आत्मा विजिज्ञासितव्य: ' ( छा ० ८.७.३ ), ' आत्मेत्येवो-पासीत ' ( बृह ० १.४.७ ), ' आत्मा विज्ञेय: ' ( माण्डूक्य ७ ) ५८. ननु ' आत्मा ज्ञातव्यः ' ( श्रुति ) इति विवेकज्ञानविधावप्यपुनरा-वृतिर्वाक्यशेषे श्रूयते, अत आह— " आत्मा ज्ञातव्यः " कथम्? इत्यत आह- ' कर्मप्रवृत्तिहेतुत्वम् ', विवेकज्ञानस्य पारलौकिकफलेषु ज्योतिष्टोमादिषु प्रवृत्तिरध्ययनस्येव प्रयोजनं दृष्टमेवेति नादृष्टफलापेक्षेति || १०३ || निर्ज्ञाते च ज्ञानस्य कर्म-
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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १०१ विरोधात् जनकोद्दालकप्रभृतीनामपि कर्मप्रवृत्तिदर्शनादितिचेन्न, ब्रह्मा-त्मविज्ञानस्य श्रुतिलिङ्गादिभिः कर्मोपयोगानिरूपणादधिकारविरो-धाच्च । तथा हि न ताव ' ' दैन्द्रयागार्हपत्यमुपतिष्ठते ' ( मै ० सं ० ३.२.४ ) इतिवदात्मविज्ञानस्य कर्माङ्गत्वे श्रुतिरस्ति । न च ' यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेववीर्यवत्तरमि ' ति ( छा ० १. १. १० ) श्रुत्यात्मविद्यायाः कर्माङ्गत्वं सिद्धयति इति वाच्यम्, ' विज्ञाते चास्य ' इस भट्टपाद की रीति के अनुसार देह से अति-रिक्त आत्मा का ज्ञान कर्म की प्रवृत्ति का उपयोगी है । भोग की इच्छा आदि धर्मों से रहित ब्रह्म से अभिन्नात्मा का ज्ञान, कर्मों का अङ्ग ( उपयोगी ) सम्भव नहीं । इस प्रकार यद्यपि ब्रह्म से अभिन्न आत्मा ज्ञान से कर्म के अधिकार का विरोध है तथापि आज्यावेक्षण तथा ब्रीहिप्रोक्षण के समान अदृष्ट के द्वारा उस अज्ञान का कर्म में उपयोग है । कर्म के अधिकार से विरोध भी नहीं, क्योंकि ब्रह्मसे अभिन्न आत्मा के ज्ञाताओं की जैसे यम - नियमादिक साधनों में प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार कर्म में प्रवृत्ति से कोई विरोध नहीं । जनक - उद्दालक आदिकों की कर्म में प्रवृत्ति देखी जाने से भी ज्ञान से कर्म के अधिकार से विरोध नहीं । " ५८. प्रवृत्तिहेतुतया कर्मफलस्वगद्यर्थत्वे वाक्यशेषस्था फलश्रुतिः पर्णमयी न्यायेनार्थवादमात्रं स्यात्, न फलान्तरमलं बोधयितु-मित्याह - ' विज्ञाते चास्य ', उपासनात्मकस्य तु ज्ञानस्य कर्मणि पुरुषे च दृष्टप्रयोजनाभावाददृष्टापेक्षायां श्रुत्याद्यभावेन क्रत्वर्थ-त्वाभावादुवाक्यशेषोपनीताभ्युदयनिःश्रेयसफलतया रात्रिसत्र-वत् पुरुषार्थत्वमेवेति व्याकरणाधिकरणे वक्ष्यतीति । ५६. ' ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' ( सत्या.श्रौ.सू. ) इति प्रत्यक्षश्रुत्यास्या ऋचो गार्हपत्योपस्थाने विनियोगस्य कृतत्वात्प्रत्यक्षश्रुतेश्चानुमित ( ऐन्द्रयन्द्रमुपतिष्ठते ) श्रुत्यपेक्षया बलवत्त्वाद् गार्हपत्योपस्थाने विनियोगो भवति । तत्र ऐन्द्रयेति तृतीया गार्हपत्यमिति द्वितीया च विनियोक्त्री श्रुतिः । तृतीययैन्द्रया ऋच उपास्थानाङ्गत्वं प्रतिपद्यते । द्वितीयया च गार्हपत्यस्योपस्थानाङ्गित्वं प्रतिपाद्यते ।
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१०२ ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् तस्याः प्रकृतोद्गीथविद्याविषयत्वेनात्मज्ञाने तदप्रवृत्तेः । न च श्रद्धाव-त्सार्वत्रिकं किन्नस्यादिति वाच्यम्, उपासनाप्रकरणपठितत्वेनोपासना-मिकाया विद्याया एव कर्माङ्गत्वोपपत्तेः । " बहिर्देवसदनं दामि " ( मै ० सं ० १. १. ३ ) इतिवत् श्रुतिसामर्थ्यलक्षणेन लिङ्ग ेनापि नात्मज्ञानस्य कर्माङ्गत्वं सिद्धयति तथा लिङ्गानुपलब्धेः । न चोद्दालकादीनां कर्मणा सहात्मविज्ञानसद्भावे लिङ्गम् " कि प्रजया करिष्यामः " ( बृह ० ४.४.२२ ), " किमर्थं वयमध्येष्यामहे " इति वैपरीत्यस्यापि दर्शनात् । उत्तर- यदि ऐसा कोई कहे तो यह उचित नहीं; ' क्योंकि श्रुत तथा लिङ्गादिक विनियोजक प्रमाणों के द्वारा ब्रह्मात्मज्ञान का कर्म में उपयोग का निरूपण नहीं किया गया है । ज्ञानका कर्म के अधिकार के साथ विरोध भी है । " इन्द्रदेवताक ऋचा से गार्हपत्य अग्नि की स्तुति करे " इस तृतीया श्रुति से ऐन्द्री ऋचा को गार्हपत्य अग्नि की स्तुति में उपयोग बताया है, उस प्रकार ब्रह्म से अभिन्न आत्मा के ज्ञान को कर्म का अङ्ग कहनेवाली कोई श्रुति नहीं है । " यदेवविद्यया " इस श्रुति से आत्मज्ञान, कर्म का अङ्ग सिद्ध होता है ", ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि इस श्रुति का विषय तो उद्गीथविद्या है, यह आत्मज्ञान के वर्णन में प्रवृत्त नहीं है । " श्रुति में ही श्रद्धा का जैसे सर्वकर्मों में उपयोग है, विद्या का भी सर्व कर्मों में उपयोग क्यों न मान लिया जाय? " ऐसा कथन भी उपयुक्त नहीं । उक्त श्रुति उपासना के प्रकरण में पठित है, उपासनारूप विद्या को ही सर्वकर्मों की अङ्गता ( साधनता ) संभव है, आत्मविद्या को नहीं । " बहिर्देवसदनं " श्रुतिगम्य अपने अर्थ प्रकाशनसामर्थ्यरूपलिङ्ग के सदृश किसी लिङ्ग से भी आत्मज्ञान को कर्म की अङ्गता ( साधनता ) सिद्ध होती नहीं । क्योंकि उस प्रकार का कोई लिङ्ग उपलब्ध नहीं । “ उद्दालकादिकों के कर्म के साथ आत्मज्ञान का सद्भाव, कर्म तथा ज्ञान के समुच्चय में लिङ्ग है । " यह कहना उचित नहीं; क्योंकि " हम प्रजा से क्या करेंगे अर्थात् हमें क्या प्रयोजन ", " हमको अध्ययन से क्या प्रयोजन " ऋषियों का यह भी निश्चय देखा जाता है । जिससे
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वेदार्थपारिजातः ( वा.स. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १०३ न च ' यस्य पर्णमयी जुहुर्भवति " ( तै ० सं ० ३.५.७ ) इतिवद्-वाक्याद्विनियोगः, पर्णमयीत्ववदात्मनोऽव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धाभावा-त्तस्य लौकिकवैदिक सर्वकर्मसाधारण्यात् । न चात्मज्ञानं कर्मप्रकरणे श्रुतं येन प्रयाजादिवत् कर्माङ्गता -मश्नुवीत, नापि स्थानक्रमसन्निधानपठ्यमानत्वात् । नापि समाख्या संज्ञासाम्याभावात् । न चात्मज्ञानस्य कर्मण्युपकारप्रकारो निरूप्यते । देहव्यतिरिक्तात्मज्ञानस्योपयोगेऽपि अशनायाद्यतीताकर्त्रभोक्तृनाना-त्मक ब्रह्मात्मविज्ञानस्य तत्रानुपकारित्वात् । नाप्याज्यावेक्षणादिवद-दृष्टद्वारेण तादृशात्मज्ञानस्य कर्मण्युपयोगः स्वप्रकरणपठितसंसारनिवृ-त्तिलक्षणदृष्टफलनिराकाङक्षस्यादृष्टफलकल्पनाऽनुपपत्तेः संभवति दृष्टफलकत्वे सत्यदृष्टफल कल्पनस्यान्याय्यत्वात् । सिद्ध होता है कि स्त्री -पुत्र -धन- अध्ययन आदिकों से विरक्त ऋषियों के कर्म का ज्ञान के साथ सद्भाव ही संभव नहीं । “ यस्य पर्णमयी " इस श्रुति वाक्य से पर्णमयी जुहु का यज्ञ सम्बन्ध है, उसी प्रकार वाक्य से भी आत्मज्ञान का कर्म के साथ सम्बन्ध संभव है ” ऐसा भी नहीं; क्योंकि पर्णमयी जुहु का जैसा यज्ञ के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध है, वैसा आत्मा का अव्यभिचरित सम्बन्ध यज्ञ के साथ नहीं, आत्मा का सम्बन्ध तो लौकिक कर्मों के साथ भी है । शास्त्र में कर्म के प्रकरण में आत्मज्ञान का श्रवण नहीं, जिससे कि यह कहा जा सके कि प्रयाजादि के समान, आत्मज्ञान भी कर्म का अङ्ग है | समाख्या भी कर्म तथा ज्ञान का विनियोजक नहीं; क्यों कि कर्म तथा ज्ञान की संज्ञा समान नहीं है । न आत्मज्ञान का कर्म में उपकार के प्रकार का ही निरूपण है । देह से अतिरिक्त आत्मा के ज्ञान का कर्म में उपयोग होने पर भी भूख - प्यास से अतीत अकर्ता, अभोक्ता भेदरहित ब्रह्मस्वरूप आत्मा के ज्ञान का कर्म में कोई उपकार नहीं । आज्यावेक्षणादि के समान अदृष्ट के द्वारा भी ब्रह्म से अभिन्न आत्मा के ज्ञान का कर्म में कोई उपकार नहीं । आत्मज्ञान के प्रकरण में पठित जो संसार उसकी निवृत्तिरूप फल से फल की आकांक्षा से
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१०४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् क्रियाकारक फलशून्यमद्वै तमात्मानं पश्यतः कर्मणि प्रवृत्यसंभ-वात् च । न च यमनियमादिवत्तदविरोधः तत्राप्यपरोक्षज्ञानवद् विधितः प्रवृत्त्यनङ्गीकारात् । ' तस्य कार्यं न विद्यते ' इति ( ३. १७ ) गीतोक्ते:, ' ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः । नैवास्ति किञ्चित्कर्तव्य -मस्तिचेन्न स तत्त्ववित् ' ( १.२३ ) इति जाबालदर्शनोपनिषद्वचनात् । न च भिक्षाटनादाविव तत्र प्रवृत्तिस्तत्र प्रवृत्तः प्रारब्धमूलकत्वात् । न च कर्मणि तथा प्रवृत्तिः, तस्य नियतदेशकालतया विधानात् । ननु भवतुब्रह्मविद्याया कैवल्यसाधनता तथापि कर्मसमुच्चिताया एव न केवलाया इति चेन्न, विरोधादेव द्वधापि समुच्चयः संभवति, समप्राधान्येन षड्यागवद् गुणप्राधान्येन वा प्रयाजदर्शपूर्णमासवत्, रहित आत्मज्ञान के अदृष्ट फल की कल्पना ही संभव नहीं । क्योंकि दृष्ट फल संभव होने पर अदृष्ट फल की कल्पना उचित नहीं । क्रिया - कारक - फल से शून्य अद्वितीय आत्मा के ज्ञाता की कर्म प्रवृत्ति ही असंभव है । ' यम - नियम में प्रवृत्ति के समान कर्म में भी प्रवृत्ति संभव है ', यह कहना भी उचित नहीं; क्योंकि अपरोक्ष ज्ञान सम्पन्न विद्वान् की यम - नियमादिकों में भी विधि से प्रवृत्ति स्वीकृत नहीं । क्योंकि गीता विद्वान् के लिये किसी भी कर्तव्य का निषेध करती है । " ज्ञानामृतेन " इस जावालदर्शनोपनिषद् के वचन से भी ज्ञानी के लिये कर्तव्य का निषेध किया है । “ भिक्षाटनादिकों में प्रवृत्ति के समान यज्ञादिककर्मों में प्रवृत्ति संभव है " यह कथन भी उचित नहीं; क्योंकि भिक्षाटन में प्रवृत्ति का हेतु प्रारब्ध है । कर्म में प्रवृत्ति प्रारब्ध से नहीं होती; यज्ञादिककर्म का तो देशविशेष तथा कालविशेष में ही विधान होता है । " ब्रह्मविद्या को मोक्ष की साधनता भले ही रहे, तथापि कर्म से युक्त ब्रह्मविद्या ही मोक्ष का साधन है, केवल नहीं " यदि ऐसा कहा जाय तो उचित नहीं; क्योंकि विरोध होनेसे दोनों प्रकार का समुच्चय ६०.
" यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।
यच्चास्य संततो भावस्तस्मादात्मेति कीर्त्यते ॥
( लिङ्ग ० १.७०.१६ )
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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १०५ तत्रापि ज्ञानं गुणः कर्मप्रधानमिति वा, विपरीतं वा, तमेतमात्मानंब्राह्मणाः विविदिषन्ति ' ( बृह ० ४.४.२२ ) इति साध्यसाधनभावावगमान्न समुच्चयः । गुणप्रधानपक्षेऽपि परम्परया ज्ञानम्प्रति कर्मणां गुणभावोऽभ्युपगत एव । यत्त कर्म प्रधानं ज्ञानं गुण इति तदपि यत्किञ्चित्, स्वरूपविरोधात् तदुक्त वार्तिककृता " यद्धि यस्यानुरोधेन स्वभावमनुवर्तते । तत्तस्य गुणभूतं स्यान्न प्रधानाद्गुणो यतः ॥ ” ( बृह ० वार्तिक ३.३.६८ ) प्रधानात् प्रधानमत्तीति तथोक्तः । यत्कर्मप्रवृत्तिविघातकं ज्ञानं तत्कर्मप्रतिगुणो न भवति । विभिन्नविरुद्धफलत्वाच्च न गुणगुणीभावः । किञ्चोत्पत्त्यापित संस्कृतिविकृतयः कर्मणः फलम् । विद्याया अविद्या-सम्भव नहीं । समानप्रधानरूप से षड्याग, अथवा गुणप्रधानरूप से प्रयाज तथा दर्शपूर्ण मास के समुच्चय के समान समुच्चय संभव नहीं । समुच्चय ' ज्ञान गौण व कर्म प्रधान अथवा कर्म गौण ज्ञान प्रधान रहे, दोनों ही प्रकार से समुच्चय संभव नहीं; क्योंकि " तमेतं " इस श्रुति से ज्ञान तथा कर्म में साध्य ( कार्य ) - साधन ( कारण ) - भाव का निश्चय होने से समुच्चय संभव नहीं । गुण- प्रधानपक्ष में भी परम्परा से ज्ञान प्रतिकर्म का गुणभाव स्वीकृत है ही । “ कर्म प्रधान है, ज्ञान गौण है ", यह कथन तो कुछ नहीं, क्योंकि दोनों के स्वरूप में विरोध है । यह बात वार्तिककार ने भी कही है । जो ज्ञान कर्म की प्रवृत्ति का विघातक है वह ज्ञान कर्म के प्रति गौण ( कर्म का अनुसारी ) नहीं होता है । भिन्न - भिन्न विरुद्ध फलवाले होने से भी इन दोनों में गुण - गुणीभाव नहीं है । उत्पत्ति, प्राप्ति संस्कृति ( संस्कार ) तथा विकार ये कर्म के फल हैं । अविद्या की सर्वथा निवृत्ति ( ज्ञातत्व से उपलक्षित आत्मा ) विद्या का फल है । ऐसी दशा में अर्थात् ज्ञान तथा कर्म के परस्पर विरुद्ध फल होने पर दोनों का सहभाव कैसे संभव है? शुक्तिखण्ड को देखनेवाले मनुष्य की रजत - भ्रमनिवृत्ति, स्नान - आचमनादि किसी कर्म की अपेक्षा करके विलम्ब नहीं करती । भाव यह है कि शुक्तिखण्ड के ज्ञात होते ही
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१०६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् S स्तमयरूपत्वात् कुतः साहित्यसंभवः, न हि शुक्तिकाशकलं सकल-माकलयतः रूप्यभ्रमनिवृत्तिः स्नानाचमनादिकर्मापेक्षया विलम्बते । तदेवं लौकिकेन न्यायेन ब्रह्मसाक्षात्कार एव तदविद्यानिवृत्तिरिति मन्तव्यम् ", " तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय " ( श्वेता ० ३.८ ), " न कर्मणा न प्रजया धनेन " ( नारायणो ० १-५ ), नास्त्य -कृतः कृतेन ”, ( मुण्डक १.२.१२ ), ६१ " ज्ञानादेव तु कैवल्यं प्राप्यते येन मुच्यते " । " कर्मणा बध्यते जन्तुविद्यया च विमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥ " ( संन्यासोपनिषत् ६८, शान्तिपर्व २४१.७ ) न त्वेतानि वचनानि केवलानां कर्मणां कैवल्यसाधनत्वनिरा-करणपराणि, न समुच्चितानामिति तत एवान्धंतमः प्रविशन्ति इत्येकं -कनिन्दापुरस्सरं ' विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय I सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते || ' इति ज्ञानकर्मणोः समुच्चितयोरेव मोक्षसाधनत्वप्रतिपादनम् । संसारनिवृत्तिर्ब्रह्मप्राप्तिश्च मुक्तिः । तत्र विद्येतरत्वेनाविद्यामूलत्वेन वा अविद्यापदवाच्यानां कर्मणां मृत्युपदवेद-रूप्यभ्रम की निवृत्ति हो जाती है, किसी कर्म की अपेक्षा नहीं करती, जिससे कि शुक्ति के ज्ञान होने पर कुछ विलम्ब हो । इस लौकिक युक्ति के अनुसार ' ब्रह्म साक्षात्कार ही ब्रह्म विषयक अज्ञान की निवृत्ति है, ऐसा मानना चाहिये । " तमेव विदित्वा ", " न कर्मणा ”, “ नास्त्य-कृतः ”, “ ज्ञानादेव तु ", " तस्मात्कर्म न " इत्यादिक वाक्य, केवलकर्मों की मोक्षसाधनता के निराकरण में तात्पर्यवाले हैं, ज्ञान से समुचित कर्मों की मोक्षसाधनता के निवारण में तात्पर्यवाले नहीं हैं । इसलिये ही ' अन्धं तमः ' इस श्रुति से एक - एक ( पृथक् - पृथक् ) ज्ञान तथा कर्म की निन्दा पूर्वक, ' विद्यां चाविद्यां च ' इस वाक्य से समुच्चित ज्ञानकर्म को मोक्ष का साधन कहा गया है । ' संसार की निवृत्तिपूर्वक ब्रह्मप्राप्ति मोक्ष है ' । विद्या से भिन्न होने अथवा अविद्या मूलक होने ६१. पञ्चदशी रामकृष्णटीका में उद्धृत ६.६७
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वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १०७ नीयकर्मक्षयद्वारेण संसारनिवृत्तावुपयोगः । ब्रह्मत्वमात्मरूपतया नित्य-प्राप्तमविद्यामात्र तिरोहितं कण्ठगतचामीकरवत् । न तत्राविद्यानिवृत्ते-रधिकं कर्तव्यमस्ति इत्यविद्यानिवृत्तौ विद्याया उपयोगः । यच्च ' विद्याशब्देन देवताज्ञानं विवक्षित्वा तस्य कर्मणा समु-च्चयोऽनेन मन्त्रेण तन्न युक्तम्, प्रक्रमाऽननुगुणत्वात्, ' ईशावास्य-मिति ' परमात्मनः प्रक्रान्तत्वात् । ननु ६२ “ सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः || ” ( मुण्डकोपनिषत् ३.१.५ ) से ' अविद्या ' पद के वाच्य कर्मों का मृत्युपद से जाननेयोग्य जो कर्म उसके क्षय ( विनाश ) द्वारा संसार की निवृत्ति में उपयोग है । ब्रह्मत्व तो आत्मरूप है, अतः नित्यप्राप्त है । कण्ठ के भूषण के समान अविद्या मात्र से आवृत है | ब्रह्म की प्राप्ति में अविद्या की निवृत्ति से अतिरिक्त और कुछ कर्तव्य नहीं है, इसलिये अविद्या की निवृत्ति में विद्या का उपयोग है । शङ्का - " जो ऐसा कहा है कि विद्या शब्द से देवोपासना की विवक्षा करके देवोपासना का कर्म के साथ समुच्चय, इस मन्त्र से वर्णित है । यह कथन उचित नहीं; क्योंकि यह कथन उपक्रम के अनुसार नहीं है । ' ईशावास्य ' इस वाक्य से परमात्मा का ही यहाँ उपक्रम ( प्रारम्भ ) है । “ तपो विद्या च " इत्यादिक स्मृतियाँ समुच्चय ६२. अत्र सम्यग्ज्ञानशब्देन वस्तुविषयावगतिफलावसानं वाक्यार्थ-ज्ञानमुच्यते । अवगतिफलस्य स्वकार्येऽविद्यानिवृत्तौ सहकार्य -पेक्षासंभवात् । अतोऽपरिपक्वज्ञानस्य सत्यादीनां च परिपक्व -विद्यालाभाय समुच्चय इष्यत एव । नैतावता भास्कराभिमत-सिद्धि:, परिपक्वविद्यायाः सहकार्यपेक्षायां मानाभावात् । ततः कर्मासंश्लेषश्रवणाद्दे वादीनां कर्मविहीनानां मुक्तिश्रवणाच्चेति ।