वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 141–150
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 141–150
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१०८ ] वेदार्थ पारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् स्पष्टमेव श्रुतिः समुच्चयं प्रतिपादयति । स्मृतिश्च -" तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयस्करं परम् । तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते || " ( मनु ० १२.१०४ )
" तत्प्राप्ति हेतु ज्ञानं च कर्म चोक्तं महामुने ।
यथाऽन्नं मधुसंयुक्तं मधु चान्नेन संयुतम् ॥
एवं तपश्च विद्या च संयुक्त मोक्षसाधनम् । " ( भवसंतरणोपनिषत् १.३२,३३ ) तेन वाचनिकसमुच्चयानुसारेण कर्मनिन्दापराणां वाक्यानां केवल कर्मविषयतैव । न च ज्ञानस्यैव साक्षान्मोक्षसाधनत्वं कर्मणां तु पापापाकरणद्वारेण साधनत्वमिति व्यवस्था युक्ता । न च " कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः " ( गीता ३.२० ) इत्यादेस्तु ' लाङ्गलेनवयं जीवामहे ' इतिवत्पारम्पर्येणापि तत्साधनत्वोपपत्तेः । साक्षान्मोक्ष-साधनत्वेन प्राप्तस्य कर्मणः साधनत्वग्रहणे प्राप्तान्वयबाधप्रसङ्गात् । ' नान्यः पन्थाः ' इत्यादेस्तु केवलकर्मविषयतया निषेधो नेयः । " इति चेदत्रोच्यते - यतो हि ' तमेतमात्मानं वेदानुवचनेने ' का प्रतिपादन करती हैं । अतः श्रुति तथा स्मृतिवचन से कथित समुच्चय के अनुसार होने से कर्म की निन्दा करनेवाले वाक्य केवल कर्म की निन्दा करते हैं, ऐसा मानना चाहिये । ' ज्ञान को ही साक्षात् मोक्ष की साधनता है, कर्मोंको पाप की निवृत्ति द्वारा मोक्षकी साधनता है, यह व्यवस्था भी उचित नहीं । ' कर्म ' से ही जनकादिक मोक्ष को प्राप्त हुए हैं, गीता के इस वचनानुसार कर्म से मोक्ष सिद्ध होता है । इस वाक्य का तात्पर्य यही संभव है कि कर्म परम्परा से मोक्ष का साधन है, साक्षात् नहीं, ऐसा कथन भी उचित नहीं; ऐसा मानने पर तो साक्षात् मोक्ष के साधनरूप से - निर्दिष्ट कर्म की साधनता के ग्रहण में प्राप्त संबन्ध के बाध का प्रसंग हो जायेगा | अतः ' नान्यः पन्था ' इस श्रुति से जो ज्ञान से अन्य साधन का निषेध किया है, वह केवल कर्म विषयक है, ऐसा जानना चाहिये । ”
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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १०८ ( बृहदारण्यक उ ० ४.४.२२ ) ति तृतीयाश्रुत्यैव यागादेः विधेयविज्ञान-कारणत्वेन प्रतिपादनं दृश्यते, कर्मणां यागादीनां फलोपकार्य ङ्गत्वकल्पने श्रुतिबाधप्रसंगात् । न च प्रकरणप्रमाणेन प्रयाजानुयाजादिवद्गृह्यमाण-विशेषतयेति कर्तव्यतात्वमेव यज्ञादीनां शमादिवदितिवाच्यम् । प्रकरणस्य सामान्यतः शेषत्वबोधनेऽपि गतार्थत्वात्, तद्विशेषं प्रतिश्रुत्यादीनामेव प्रमाणत्वात् । तस्मात् ' ब्रीहिभिर्यजेत ' इत्यादाविव करणशरीरनिर्व र्तकतया यज्ञादीनां करणत्वम् ' यज्ञेने ' ( बृ ० ४.४.२२ ) ति तृतीयाश्रुत्या निश्चीयते । यज्ञादिभिरुपकृत्येति व्याख्याने साध्याहारयोजना प्रसंगात् । यज्ञादीनां श्रवणादिवत्साक्षाद्विज्ञान साधनत्वाभावात् करण-त्वानुपपत्तिः, परम्परासाधनेष्वपि लोके वेदेऽपि करणत्वाभ्युपगमात्, ज्वालाव्यवधानेनैव काष्ठानां पाके करणत्वाभ्युपगमादपूर्वव्यवधानेन समाधान - यदि ऐसा कहा जाय तो उत्तर कहते हैं कि क्योंकि " तमेतमात्मानं " इस श्रुति के द्वारा यागादिक कर्म, विधेय - विज्ञान के कारण हैं, ऐसा प्रतिपादन देखा जाता है । अतः यागादिक कर्मों को विज्ञान के फलभूत मोक्ष के प्रति साधन की कल्पना करने पर, ज्ञान के प्रति कर्मों को साधन बतानेवाली, उपर्युक्त श्रुति के बाध का प्रसंग होने से ज्ञान- कर्मका समुच्चय संभव नहीं । ' प्रकरणरूप प्रमाण से प्रयाज - अनुयाज जैसे याग के प्रति इति कर्तव्यतारूप हैं, उसी प्रकार शमादि के समान यज्ञादि कर्मों को ज्ञान के प्रति इतिकर्तव्यता है ', ऐसा कहना भी उचित नहीं; क्योंकि प्रकरणरूपप्रमाण से सामान्यरूप से साधनता बोधन करदेने पर भी चरितार्थ हो जाने से साधन विशेष के प्रति तो श्रुति आदिक ही प्रमाण होते हैं । यज्ञ के प्रकरण में पठित ' ब्रीहि से यज्ञ करे ' इस श्रुति में यज्ञ के प्रति कारणता प्रतीत होने पर भी यज्ञ के साधन पुरोडाश का ही साधक है न कि साक्षात् यज्ञ का । इसी प्रकार मोक्ष के प्रकरण में पठित कर्म ' यज्ञेन ' इस श्रुति से ज्ञान के प्रति ही साधन बताए हैं, मोक्ष के प्रति नहीं । ' यज्ञादिकों से उपकृत विद्या मोक्ष को प्राप्त होती है ' ऐसा व्याख्यान करने पर भी अध्याहार करके योजना का प्रसंग होगा; अतः यह व्याख्यान भी उचित नहीं । ' श्रवणादि के समान साक्षात् ज्ञान के ज्ञान के प्रति यज्ञादि की करणता संभव नहीं ' प्रति साधन न होने से ऐसा कहना भी उचित
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११० ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यागस्य स्वर्गसाधनत्वाभ्युपगमाच्च । तद्वदिहापि परिपन्थिदुरितशोधन-व्यवधानेन यज्ञादेः ज्ञानकरणताया बाधाऽयोगात् । तदेवं तृतीया श्रुत्या यज्ञादेविज्ञानकरणात्वाभ्युपगतौ सर्वाण्यपि समुच्चयवचनानि परम्परासमुच्चयप्रतिपादनपराण्येवेति मन्तव्यम्; श्रुत्यपेक्षया वाक्यस्य दुर्बलत्वात् । यच्च केवलविद्यायाः साधनत्वे ' ततो भूय ' इति तन्निन्दा नोप-पद्यते, विधित्सितस्य निन्दायोगात्, तन्न निन्दाया देवताज्ञानविषयत्वे-नोपपत्तेः । न च तथात्वे प्रक्रमविरोधः, बलीयसा तृतीयाश्रुत्या प्रक्रमस्य बाध्यत्वात् । अस्तु वा परमात्मविद्यवोपक्रमानुसारेण, तथापि न विरोधः, उपायोपेयभावेन क्रमसमुच्चयोपपत्त ेः । समुच्चयवचनानां नहीं; क्योंकि लोक तथा वेद में परम्परा से साधन के प्रति भी करणता स्वीकार की गई है । जैसे लोक में काष्ठों को अग्नि की ज्वाला का व्यवधान होने पर भी पाक के प्रति करण स्वीकार किया गया है तथा वेद में अपूर्व के व्यवधान होने से भी यज्ञ को स्वर्ग के प्रति करण स्वीकार किया गया है; उसी प्रकार ज्ञान के प्रतिबन्धक पापरूपमल की निवृत्ति द्वारा यज्ञादिकों की ज्ञान के प्रति कारणता का बाध भी अनुचित है । इस प्रकार ' यज्ञेन ' इस तृतीया श्रुति से यज्ञादिककर्मों को ज्ञान के प्रति करण स्वीकार करलेने पर सर्वसमुच्चयप्रतिपादक वाक्य, परम्परा से समुच्चय के प्रतिपादन में ही तात्पर्यवाले हैं, ऐसा मानना चाहिये । ' यज्ञेन ' इस श्रुति की अपेक्षा वाक्य दुर्बल है; अतः परम्परा से समुच्चय ही उचित है । ' यदि केवल विद्या ही मोक्ष का साधन है तो अविद्या के अनु-ष्ठाता से भी अधिक विद्या के अनुष्ठाता को गाढ़ तम मिलता है, ऐसी विद्या की निन्दा संभव नहीं । क्योंकि विधान करने को इष्ट साधन की निन्दा करना अनुचित है । ' यह शङ्का भी उचित नहीं; क्योंकि निन्दा ब्रह्मविद्याकी नहीं, अपि तु देवता विज्ञान ( विद्या ) की है । यदि ऐसा कहा जाए कि ' देवता विज्ञान की निन्दा स्वीकार करने पर प्रकरण का विरोध होगा । ' यह भी उचित नहीं, क्योंकि प्रकरण से
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १११ क्रमसमुच्चयविषयत्वेनाप्युपपत्तिसम्भवात् ' अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ' इति पौर्वापर्याभिधानाच्च । ननु परम्परापक्षे ' सह वेदे ' ति फलं प्रति साहित्यमनुपपन्नमिति -चेन्न, फलम्प्रति साहित्याभावेऽप्युपायत्वज्ञान एव सहभावस्य विवक्षित-त्वात् । ननु प्रकृतानुरोधेन परमात्मविद्याकर्मणोः परम्परया समुच्चय-स्वीकारे साक्षान्मोक्षसाधनभूत केवलविद्यानिन्दा कथमुपपद्यत इति चेन्न, परिपक्वविद्याय एवं निन्दाभ्युपगमात् । अन्तःकरणशुद्धेः प्रागेवाहढा-पातज्ञानोदय मात्र एव कृतार्थम्मन्या ये विहितानि चित्तशोधकानि कर्माणि त्यजन्तित उभयभ्रष्टाः समुपचितदुरितनिचयाश्चात्यन्तमधः पततीति । तथा च विद्यां परिपक्वात्मज्ञानलक्षणां, अविद्यां च कर्मलक्षणां, बलवती श्रुति से उसका बाध हो जाता है । अथवा ' ईशा वास्यम् ' इस प्रारम्भ ( प्रकरण ) के अनुसार ब्रह्मविद्या ही विद्या शब्द का अर्थ मान लेने पर भी कोई विरोध नहीं; क्योंकि साधन और साध्य रूप से भी ज्ञान तथा कर्म का क्रम - समुच्चय संभव है । क्योंकि समुच्चयबोधक वाक्यों को क्रम - समुच्चय विषयक मानने से भी चरितार्थता संभव है । ' अविद्या से मृत्यु को तर कर विद्या से अमृत को प्राप्त हो जाता है ' इस श्रुति में पूर्वापरता का कथन होने से भी क्रम- समुच्चय ही संभव है | ' परम्परा ( क्रम - समुच्चय ) पक्ष में ' सह वेद ' इस श्रुति से फल ( मोक्ष ) के प्रति कर्म तथा ज्ञान का साहित्य का वर्णन, असिद्ध हो जायगा । ' यदि ऐसा कहा जाए तो उचित नहीं, क्योंकि मोक्षभूत फल के प्रति कर्म का साहित्य न होने पर भी उपायभूत ज्ञान में ही साहित्य विवक्षित है । शङ्का - ' ईशा वास्यं ' इस उपक्रम ( प्रारम्भ ) के अनुसार परमात्म-विद्या तथा कर्म का परम्परासे समुच्चय स्वीकार करलेने पर साक्षात् मोक्ष के साधनरूप केवल परमात्मविद्या की निन्दा कैसे बन सकती है?
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११२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यः सह - उपायोपेयभावेन वेद सोऽधिकृतः पुरुषोऽविद्यया कर्मलक्षणया विद्योत्पत्तिप्रतिबन्धकं मृत्युपदवेदनीयं पापं तीर्त्वा विद्यया परिपक्वा -त्मसाक्षात्कारलक्षणया अमृतं निर्वाणमश्नुते प्राप्नोतीति । तस्मादा-विद्यापरिपकात् यथा स्वं कर्मानुष्ठेयम् । विद्या तु परिपक्वा कर्मनि-रपेक्षैव मोक्षं साधयिष्यतीति । समुच्चयवादिनाऽपि तावत्काम्यकर्मणां समुच्चयः स्वीकतु युक्तः तस्य मुमुक्षुणा परित्यागात् । नापि नित्यनैमित्तिकैस्तत्तदाश्रमवि-हितानामुत्कर्षापकर्षत्वेन कर्मभूयस्त्वात् फलभूयस्त्वन्यायेन कैवल्यफले उत्तर - ऐसा नहीं, क्योंकि निन्दास्थल में अदृढ़ ब्रह्मविद्या की ही निन्दा स्वीकार की गयी है । अन्तःकरण की शुद्धि से पहिले ही अदृढ आपात ( अविचारित ) रमणीय ब्रह्मज्ञान के उदयमात्र में ही अपने को कृतार्थ माननेवाले जो पुरुष चित्त को शुद्ध करनेवाले कर्मों को त्याग देते हैं, वे उभय भ्रष्ट भली प्रकार से वृद्धि को प्राप्त पाप से युक्त पुरुष अत्यन्त अध: पतन को प्राप्त होते हैं । पूर्वोक्तशंकाओं के निवृत्त हो जाने पर यह अर्थ सिद्ध होता है कि दृढ़ आत्मज्ञानरूप विद्या तथा कर्मरूप अविद्या को जो अधिकारी साधन -साध्य - भाव से साथ जानता है, वह अधिकारी पुरुष कर्मरूप अविद्या से विद्या की उत्पत्ति के प्रति -बन्धक मृत्युशब्द से कहे जाने योग्य पाप को तर ( निवृत्तकर ) के दृढ़ अपरोक्ष आत्मा के ज्ञानरूप विद्या से मोक्ष को प्राप्त हो जाता इसलिये विद्या की परिपक्वता की योग्यतापर्यन्त कर्म अनुष्ठान करने के योग्य है | परिपक्व = दृढअपरोक्ष विद्या कर्म की अपेक्षा ( सहायता ) के बिना ही मोक्ष को सिद्ध कर देगी । दृढ़ अपरोक्ष विद्या की योग्यता ( मुमुक्षुता ) पर्यन्त ही समुच्चय-वादी के द्वारा काम्यकर्मों का समुच्चय स्वीकार करना चाहिये । क्यों कि मुमुक्षु काम्यकर्मों का परित्याग कर देता है । शंका- नित्य नैमित्तिक कर्मों के सहित सर्व आश्रमों के लिये विधान किये कर्मों का उत्कर्ष - अपकर्ष होता है, अतः " कर्मभूयस्त्वेन ” इस न्याय के अनुसार अर्थात् ' कर्म के अधिक होने से फल के अधिक होन ' के नियमानुसार मोक्षरूप फल में वे दोनों प्रकार के कर्म भी स्वीकार के योग्य हैं ।
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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ११३ तावप्यभ्युपेयौ स्याताम्, स्वर्गवदपवर्गस्यापि सातिशयत्वेनानित्यादि-दोषप्रसंगात् । तस्माज्ज्ञानमेव कैवल्यसाधनमित्यकामेनाप्यभ्युपेतव्यम् ' सत्येन लभ्य ' इत्यत्रापि सत्यादीनां ज्ञानसाधनत्वमेव विविदिषावाक्ये यज्ञादीनां विज्ञानसाधनत्वस्यावधृतत्वात् । ' तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्तैज-सरच ' ( बृह ० ४.४.९ ) इतिब्रह्मवित्पुण्यकृतोश्च मार्गे समुच्चयः, मार्गश्च ब्रह्मगोचरः । नेयं श्रुतिः परब्रह्मविषया ' तेनैति ' गच्छतीति मार्गे समुच्चयश्रवणात् । परब्रह्मणि गत्यानर्थक्यात् असंभवाच्च । न च विगलितनिखिलस्थूलसूक्ष्मोपाधिजालस्य व्योमवत्सर्वगतस्यात्मनो गमनं सम्भवति । दयानन्दः - " ये मनुष्याः? अविद्यां - अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्ये ति ( यो ० द ० २.५ ) ज्ञानादिगुणरहितं उत्तर - ऐसा नहीं; क्योंकि मोक्ष का साधन कर्मों को मानने पर कर्म से प्राप्त स्वर्ग के समान मोक्ष को भी सातिशय होने से अनि-त्यता के दोष का प्रसंग हो जायगा । इसलिये ' केवल ज्ञान ही मोक्ष का साधन है ' ऐसा न चाहने वाले को भी स्वीकार करना ही पड़ेगा । अन्यथा मोक्ष अनित्य मानना पड़ेगा, जो कि उचित नहीं । ' सत्येन लभ्य: ' इस वाक्य में भी सत्यादि साधन ज्ञान के ही साधन हैं, न कि मोक्ष के; क्योंकि विविदिषावाक्य में यज्ञादिकर्मों को विज्ञान ( ब्रह्म-( ज्ञान ) का साधन निश्चित किया है । शङ्का - ' तेनेति ' इस श्रुति के अनुसार तो ब्रह्मवेत्ता तथा पुण्य-कर्ता का मार्ग में समुच्चय है, मार्ग भी ब्रह्म की प्राप्ति का है । अतः ब्रह्मकी प्राप्ति में ज्ञान तथा कर्म का समुच्चय ही सिद्ध होता है । उत्तर - ' तेनेति ' - यह श्रुति परब्रह्म की प्राप्ति को कहनेवाली नहीं है, क्योंकि मार्ग में समुच्चय का श्रवण है । परब्रह्म की प्राप्ति में तो गमन ही अनर्थक है, ब्रह्ममें गति मानने पर परब्रह्म परिच्छिन्न तथा अनित्य हो जायगा तथा व्यापक मानने पर गमन ही असंभव है । समस्त स्थूल तथा सूक्ष्म उपाधियों से रहित आकाश के समान व्यापक आत्मभूत परमात्मा का गमन संभव नहीं । दयानन्दभाष्य - " जो मनुष्य अनित्य, अपवित्र, दुःख तथा
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११४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् वस्तु कार्यकारणात्मकं जडं परमेश्वराद् भिन्नमुपासते अभ्यस्यन्ति तेऽन्धं तमः प्रविशन्ति, ये विद्यायां शब्दार्थ सम्बन्धविज्ञानमात्रेऽवैदिके आचरणे रता उ ततो भूय इव तमः प्रविशन्ति " इति । तदपि यत्किञ्चित् तादृश्या अविद्याया हेयत्वेन प्रसिद्धाया उपा-स्यत्वाप्राप्त्या तन्निन्दानुपपत्तेः । ज्ञानादिगुणरहितकार्य कारणात्मकं जडं वस्तु तु नाविद्यापदवाच्यम्, प्रमाणानुपलब्धेः । यदि विद्याराहित्यमात्रेण घटादिकमविद्या तदाऽनित्यादौ नित्यादिख्यातेः कथमविद्यात्वम्, युगप-द्विरुद्धत्वानुपपत्तेः । एवं विद्यापदस्याप्यर्थश्चिन्तनीयः । कथञ्चिद्वि-ज्ञाने विद्यापदप्रवृत्तावप्याचरणे तत्प्रवृत्तौ बीजाभावात् । अनात्मा में नित्य, पवित्र, सुख तथा आत्मा की बुद्धि ही अविद्या है, इसलिये ज्ञानादिक गुणों से रहित, कार्य - कारणात्मक परमेश्वर से भिन्न जड़वस्तु का ही अभ्यास करते हैं, वे गाढ़ अन्धकार को प्राप्त होते हैं । जो विद्या = शब्द और अर्थ के सम्बन्ध विषयक विज्ञानमात्र अवैदिक आचरण में रत हैं, वे उससे भी अधिक अन्धकार को प्राप्त होते हैं । " यह भाग्य भी कुछ नहीं; क्योंकि जैसी अविद्या का वर्णन किया है, वह तो लोक में हेय रूप से प्रसिद्ध है; अतः उसकी तो उपासना प्राप्त ही नहीं, तब उसकी निन्दा कैसे संभव हो सकती है? क्योंकि प्राप्त ही की तो निन्दा होती है? ज्ञानादिक गुणों से रहित जड़वस्तु को तो कोई भी अविद्या कहता नहीं, अतः अविद्या पदका वाच्य भी नहीं । ऐसी दशा में अविद्या पदका अर्थ जड़वस्तु करना अत्यन्त विरुद्ध है । ' जड़वस्तु अविद्यापद वाच्य है, ' इसमें कोई प्रमाण ही उपलब्ध नहीं है । यदि कहा जाय कि जड़वस्तु घटादिकों में विद्या नहीं है, इसलिये घटादिक जड़ वस्तु अविद्या है, तो पुनः अनित्यादिक पदार्थों में नित्यादि बुद्धि को जो अविद्या कहा वह कैसे संभव है? क्योंकि बुद्धि तो स्वयं ज्ञान ( विद्या ) ही है । यदि कहा जाय कि वह विद्या भी है । तथा अविद्या भी है तो यह कथन भी उचित नहीं; क्योंकि एक काल में एक पदार्थ में विरुद्धधर्म संभव नहीं । अविद्या के समान विद्या पद IT भी अर्थ विचारणीय है; क्योंकि विद्यापद का अर्थ आचरण किया है | ज्ञान में विद्यापद की प्रवृत्ति होने पर भी आचरण में विद्यापद की
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वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ११५ " यो विद्वान् विद्यां चाविद्यां च तदुभयं सहवेद सोऽविद्यया मृत्यु arraf विद्ययाऽमृतमश्नुते " इति तदप्यसंगतम् । भ्रान्तिरूपा विद्या मरणदुःखभयरूपमृत्युतरणासंभवात् । शरीरादिजडरूपयाऽपि तया न दुःखभयतरणं सम्भवति, तत्कृतेन पुरुषार्थे नेत्यर्थ करणन्तु शाब्दिकमर्या-दातिक्रमणमेव । नापि पूर्वोक्तया शब्दार्थसम्बन्धिविज्ञानमात्ररूपया-वैदिकाचरणरूपया वाऽविद्यया नाशरहितं स्वस्वरूपं परमात्मानं वा प्राप्तुं शक्नोति कश्चित् । आत्मशुद्धान्तःकरणसंयोगधर्मजनित यथार्थ-दर्शनरूपा विद्या तु पूर्वोक्तव्याख्यानविरुद्ध व । यथार्थदर्शनमेव वा विद्या भवतु, तथात्वे पूर्वोक्तव्याख्यानमेवासंगतं स्यात् । प्रवृत्ति नहीं होती, अर्थात् विद्यापद का अर्थ आचरण नहीं होता । विद्यापद की प्रवृत्ति का बीज ( निमित्त ) ज्ञानत्वधर्म होता है । आचरण में ज्ञानत्व धर्म है नहीं । " जो विद्वान् विद्या और अविद्या इन दोनों को साथ जानता या अनुष्ठान करता है, वह अविद्या से मृत्यु को पारकर विद्या से अमृत को प्राप्त हो जाता है । " यह भाष्य भी असंगत है; क्योंकि भ्रान्तिरूप अविद्या से मरणदुःख के भय से तरना ( मुक्त होना ) सम्भव नहीं । शरीरादि जड़रूप अविद्या से भी दुःख भय से तरना संभव नहीं । ' शरीर के किये पुरुषार्थ से ' ऐसा अर्थ करना शब्द की मर्यादा का अतिक्रमण ही है । पूर्वोक्त शब्द और अर्थ सम्बन्धिविज्ञानमात्ररूपा अथवा अवैदिक आचरणरूपा अविद्या से नाश रहित अपने स्वरूप अथवा परमात्मा को भी कोई प्राप्त नहीं कर सकता । ' आत्मा'३ तथा शुद्ध - अन्तःकरण के संयोग और धर्म से उत्पन्न यथार्थ दर्शनरूपा जो विद्या ' ऐसा व्यख्यान तो पूर्वोक्त व्याख्यान से विरुद्ध ही है! अथवा यथार्थ ज्ञान ही विद्या रहो, तब भी पूर्वोक्त व्याख्यान असंगत हो जायगा । ६३. आत्मा और शुद्ध - अन्तःकरण के संयोग में जो धर्म उससे उत्पन्न हुए यथार्थ दर्शनरूप विद्या से नाशरहित अपने स्वरूप बा परमात्मा को प्राप्त होता है ।
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११६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ' यथा न हिंस्यात् सर्वाभूतानीति ' ( महा ० बन ० २१२.३४ ) शास्त्रादवगतः पशुवधनिषेधः ' अध्वरे पशु हिंस्यादिति शास्त्रेणैव बाध्यते, एवं विद्याकर्मणोः विरोधाविरोधावपि शास्त्रगम्यौ । ' विद्या-ञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभयसह ' इति समुच्चयः शास्त्रेण प्राप्यते । ' दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या याच विद्येति ज्ञाता ' ( क ० उ ० १.२.४ ) इति श्रुतेः, शास्त्रेणैव बाध्यते । ' विषूची ' नानागती भिन्नफले विद्याविद्य ' ' दूरं विपरीते ' अतिशयेन विरुद्ध इति श्रुत्यर्थः । ननु काठके विरोधश्रवणात् तद्गतविद्याविद्ययोरस्तुविरोध इह-त्वविरोधो भविष्यतीतिचेन्न, विरोधाविरोधयोः सिद्धत्वेन विकल्पासंभ-वात् । ६ उदितानुदित होमयोहि पुरुषतन्त्रत्वाद्युक्तोविकरुपः । प्रकृते जैसे किसी भूत - प्राणी की हिंसा न करें ' इस शास्त्र से पशुके वध का निषेध प्राप्त है । शास्त्र से प्राप्त यह निषेध, ' यज्ञ में पशुबध करे इस शास्त्रसे बाधित किया जाता है, इसी प्रकार विद्या तथा अविद्या के विरोध तथा अविरोध दोनों ही शास्त्र से जानने योग्य हैं । ' विद्या और अविद्या को जो साथ अनुष्ठान करता है ' इस शास्त्र में विद्या तथा अविद्या का सहभाव अर्थात् अविरोध प्राप्त होता है । ' दूरमेते विपरीते विञ्ची ' इस शास्त्र से ही वह अविरोध बाधित कर दिया जाता है । क्योंकि ' दूरमेते ' इस श्रुति में उन दोनों को अत्यन्त विरुद्ध कहा गया है । शङ्का - कठ उपनिषद् में विद्या तथा अविद्या का विरोध श्रवण होने से उसमें स्थित विद्या का अविद्या का विरोध रहो, यह हम मानते हैं; किन्तु यहाँ माध्यन्दिनीय शाखा में अविरोध होगा । उत्तर - विरोध तथा अविरोध तो सिद्ध है, वह किसी द्वारा किया नहीं जाता है; अतः विरोध तथा अविरोध का विकल्प नहीं हो सकता - विकल्प असंभव है । ' सूर्य के उदयकालिक तथा अनुदयकालिक होम का जिस प्रकार से विकल्प है, उसी प्रकार विरोध तथा अविरोध का भी विकल्प सम्भव है ' यदि ऐसा कहा जाय तो इसका समाधान ६४. " उदिते जुहोति " ( आप ० श्री ० ६.४.१० )
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ११७ ` तु न विकल्पः सम्भवति । ननु तर्हि समुच्चयविधिबलादस्त्वविरोध इति चेन्न, मुख्यब्रह्मविद्याविद्ययोः शुक्तिविद्याऽविद्ययोरिव सह संभवानुप-पत्तः, हेतुस्वरूपफल विरोधाच्च । समुच्चयविध्यसिद्धेः सिद्ध े समुच्च-विधौ तद्बलादविरोधावगमोऽविरोधावगमाच्च समुच्चयविधिरित्य-न्योन्याश्रयापातात् । ननु सहभावानुपपत्तावपि क्रमेणैवै काश्रये विद्याविद्ये स्यातामिति-चेदत्रोच्यते-- यदि पूर्वमविद्यापश्चात्त, विद्येतिक्रमस्तष्यत एव यदि पश्चात्त संभव एव । विद्योत्पत्तावविद्याया ह्यस्तत्वात्तदाश्रयेऽविद्या-पतः । न ह्यग्निरुष्णः प्रकाशश्चेति ज्ञानं यस्मिन्नाश्रय उत्पन्न तत्र शीतोऽग्निरप्रकाश वेत्यविद्याया उत्पत्तिः सम्भवति । ' यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः । ' यह है कि - दोनों प्रकार के होम तो पुरुष के अधीन हैं, इसलिये विकल्प उचित है | प्रकरण में तो विद्या और अविद्या का विरोध तथा अविरोध संभव नहीं; क्योंकि विरोध तथा अविरोध पुरुष के अधीन नहीं हैं । शङ्का - " उभयं सह " इस समुच्चय के विधान से अविरोध ही मान लेना चाहिये । उत्तर - मुख्य ब्रह्मविद्या तथा अविद्या की साथ उत्पत्ति इस प्रकार सिद्ध नहीं होती, जिस प्रकार शुक्तिज्ञान तथा अज्ञान ( अविद्या ) की एककाल में उत्पत्ति संभव नहीं । विद्या तथा अविद्या के कारण, स्वरूप तथा फल का विरोध होने से भी विरोध है; अतः समुच्चयविधि असिद्ध है । समुच्चयविधि सिद्ध हो तो अविरोध सिद्ध हो, अविरोध की सिद्धि से समुच्चय की विधि सिद्ध हो । परस्पर की सिद्धि में परस्पर की अपेक्षा होने से अन्योन्याश्रय दोष की भी आपत्ति है । शङ्का - सहभाव की असिद्धि होने पर भी क्रम से एक आश्रय में विद्या अविद्या रहें तो क्या हानि? उत्तर - यहाँ पर भी यह कहना है कि यदि ' पहिले अविद्या हो,